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प्यार के दुश्मन हज़ार होते हैं. प्यार को दुनिया की नज़र भी लग जाती है. बहुत खुश थे आलिया और राज एक दूसरे का प्यार भरा खत पा कर. आलिया के पाँव ज़मीन पर नही थम रहे थे. राज भी खुशी से झूम रहा था.
सनडे को लेने जाना था राज को आलिया को. आने जाने की टिकट उसने बुक करा ली थी. अभी २ दिन बाकी थे. उसने सोचा क्यों ना आलिया के आने से पहले अपने पापा के कारोबार को संभाल लिया जाए. वही बचा था अब इक लौता वारिस उसे ही सब संभालना था. आलिया की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए ये ज़रूरी भी था.
बहुत बड़ा कपड़े का व्यापार था राज के पापा कालिदास त्रिवेदी का. बिना देख रेख के वो यू ही नुकसान में जा रहा था. दंगो के बाद राज ने सुध ही नही ली व्यापार की. लेकिन अब उसे ज़िम्मेदारी का अहसास हो चला था. आलिया की खातिर उसे उस बीखरे हुवे व्यापार को फिर से खड़ा करना था. प्यार कई बार ज़िम्मेदारी भी सीखा देता है.
राज सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा. सभी कर्मचारी राज को देख कर बहुत खुश हुवे. सभी परेशान थे कि फॅक्टरी अगर यू ही चलती रही तो जल्दी बंद हो जाएगी और उनका रोज़गार छिन जाएगा. राज ने सभी को भरोसा दिलाया कि वो फिर से फॅक्टरी को पहले वाली स्थिती में ले आएगा.
पूरा दिन राज ने फॅक्टरी में ही बिताया. किसी बिगड़े काम को ठीक करने के लिए अक्सर एक सच्चे पर्यास की ज़रूरत होती है. उसके बाद सब कुछ खुद-ब-खुद ठीक होता चला जाता है. ऐसा ही कुछ हो रहा था कालिदास त्रिवेदी की उस फॅक्टरी में. राज के आने से उम्मीद की एक किरण जाग उठी थी सभी के मन में. जो कि एक बहुत बड़ी बात होती है.
काफ़ी दिनो बाद कुछ काम हुवा फॅक्टरी में. राज बहुत खुश था. फॅक्टरी में रहा राज मगर हर वक्त उसके जहन में आलिया का चेहरा घूमता रहा.
शाम को वो खुशी खुशी घर लौट रहा था. अंजान था कि कई बार खुशी को किसी की नज़र भी लग जाती है. जब वो अपने घर पहुँचा तो पाया कि कुछ गुंडे टाइप के लोग आलिया के टूटे-फूटे घर के बाहर खड़े हैं. वो उन्हे इग्नोर करके अपने घर में घुसने लगता है. मगर उसे कुछ ऐसा सुनाई देता है कि उसके कदम घर के बाहर ही थम जाते हैं.
“यार जो भी हो. क्या मस्त आइटम थी वो जरीना. मैं तो दंगो के दौरान बस उसे ही ढूंड रहा था. एक से एक लड़की को ठोका उस दौरान पर आलिया जैसी कोई नही थी उनमे. पता नही कहा छुप गयी थी साली. उसकी छोटी बहन की तो अच्छे से ली थी हमने.”
“हो सकता है वो घर पर ना हो कही बाहर गयी हो.”
“हो सकता है? पर यार उसकी लेने की तम्माना दिल में ही रह गयी. अफ क्या चीज़ थी साली. ऐसे दंगो में ही तो ऐसा माल हाथ आता है. वो भी निकल गया हाथ से.”
राज तो आग बाबूला हो गया ये सुन कर. प्रेमी कभी अपनी प्रेमिका के खिलाफ ऐसी बाते नही सुन सकता. भिड़ गया राज उन लोगो से बीना सोचे समझे. जो आदमी सबसे ज़्यादा बोल रहा था वो उस पर टूट पड़ा.
“बहुत बकवास कर रहा है. तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बाते करने की” राज ने उसे ज़मीन पर गिरा कर उस पर घूँसो की बोचार कर दी. मगर वो पांच थे और राज अकेला था. जल्दी ही उसे काबू कर लिया गया. ये कोई हिन्दी मूवी का सीन नही था जहा कि हीरो पांच तो क्या दस लोगो को भी धूल चटा देता है. ये रियल लाइफ का द्रिश्य था.
दो लोगो ने राज को पकड़ लिया और एक ने चाकू निकाल कर कहा, “क्यों बे ज़्यादा चर्बी चढ़ि है तुझे. हम कौन सा तेरी मा बहन के बारे में बोल रहे थे. उन लोगो के बारे में बोल रहे थे जो हमारे दुश्मन हैं. धर्मी हो कर धर्मी पर ही हाथ उठाते हो वो भी हमारे दुश्मनो की खातिर. तुम्हारे जैसे लोगो ने ही धरम को कायर बना रखा है.”
“कायरता खुद करते हो और पाठ मुझे पढ़ा रहे हो. छोड़ो मुझे और एक-एक करके सामने आओ. खून पी जाऊंगा मैं तुम लोगो का.”
“सत्तू मार साले के पेट में चाकू और चीर दे पेट साले का. ज़रूर इसी ने छुपाया होगा आलिया को. इसके घर में देखते हैं. क्या पता जो दंगो के दौरान नही मिली अब मिल जाए…हे…हे.”
“उसके बारे में एक शब्द भी और कहा तो मुझसे बुरा कोई नही होगा.” राज छटपटाया. मगर दो लोगो ने उसे मजबूती से पकड़ रखा था.
किसी तरह से राज ने दोनो को एक तरफ धकेला और टूट पड़ा उस गुंडे पर जिसके हाथ में चाकू था. होश खो बैठा था राज. होता है प्यार में ऐसा भी कभी. मगर ये ज़्यादा देर नही चला. फिर से उसे जकड़ लिया गया.
और फिर वो हुवा जिसके बारे में राज ने सोचा भी नही था. चाकू के इतने वार हुवे उसके पेट पर की खून की नादिया बह गयी वहा. राज को तडपता छोड़ वो गुंडे भाग गये वहा से.
राज की फॅक्टरी का एक कर्मचारी, कमलेश राज से कुछ पेपर्स पर साइन लेने उसके घर पहुँचा तो उसने राज को वहा खून से लथपथ पाया. तुरंत किसी तरह एम्बुलांस बुलाई उसने और राज को हॉस्पिटल ले जाया गया.
बहुत सीरीयस हालत में था वो. ऑपरेशन किया डॉक्टर्स ने मगर बचने की उम्मीद कम ही बता रहे थे. खून बहुत बह गया था. चाकू के इतने वार हुवे थे कि पेट छलनी छलनी हो रखा था उसका. बड़ी देर लगी ऑपरेशन में भी. ऑपरेशन के बाद राज को आई.सी.यू में रख दिया गया. उसे होश नही आया था. सनडे आ गया मगर अभी भी वो कोमा में ही था. राज के बारे में सुन कर मुंबई से उसके चाचा, चाची मिलने आए. कालिदास त्रिवेदी की मौत के वक्त नही आ पाए थे वो क्योंकि माहोल ठीक नही था. चाचा का नाम था रामदास त्रिवेदी और चाची का नाम था कमला देवी.
“डॉक्टर साहिब कब तक रहेगा कोमा में राज.” रघुनाथ ने पूछा.
“कुछ नही कह सकते. हम जो कर सकते थे हमने किया. अब सब भगवान के उपर है.” डॉक्टर कह कर चला गया.
आज के दिन राज को आलिया को लेने दिल्ली जाना था. मगर वो तो कोमा में पड़ा था. उसे होश ही नही था कि आलिया तड़प रही होगी राज के लिए. या फिर होश था उसे मगर कुछ कर नही सकता था. कोमा चीज़ ही कुछ ऐसी है. बेसहाय बना देती है इंसान को.
आलिया तो सुबह से ही बेचैन थी. बेसब्री से इंतेज़ार कर रही थी राज का. उसे मौसी को बिना कुछ कहे घर से निकलना था, राज के पीछे पीछे. बस एक बार दिख जाए राज गली में. आँखे बिछाए बैठी थी वो. छत की बाल्कनी में खड़ी हो गयी सुबह सवेरे ही.
“क्या बात है बेटा आज सुबह जल्दी उठ गयी.” मौसी ने आवाज़ लगाई आलिया को.
आलिया मौसी की आवाज़ सुन कर चौंक गयी, “सलाम वालेकुम मौसी.”
“सलाम वालेकुम बेटा. क्या बात है आज सुबह सुबह यहा खड़ी हो. सब ख़ैरियत तो है.”
“हां मौसी सब ख़ैरियत है. बस वैसे ही खड़ी थी.”
“तुमसे कोई मिलने आ रहा है आज.” मौसी ने कहा.
“कौन?”
“सलीम नाम है उसका. यही पड़ोस में रहता है. अच्छा लड़का है. तेरे बारे में बताया मैने उसे. बहुत दुख हुवा उसे सुन कर तुम्हारे बारे में.
मिलना चाहता है तुम से. आ जाओ नीचे वो आता ही होगा. बहुत अहसान है उसके हम पर. उस से मिलोगी तो अच्छा लगेगा हमें.”
“ठीक है मौसी मैं आती हूँ आप चलिए.” आलिया ने कहा.
मौसी सोच में पड़ गयी कि आख़िर क्या है बाल्कनी में ऐसा आज जो आलिया वहा से हटना नही चाहती. मौसी के जाने के बाद आलिया ने फिर से झाँक कर देखा गली में मगर उसे कोई दीखाई नही दिया. “शायद बाद में आएगा राज. अभी तो सारा दिन पड़ा है. मिल आती हूँ पहले इस सलीम से.”
आलिया जब सीढ़ियाँ उतर कर आई तो उसने पाया की सलीम उसका इंतेज़ार कर रहा था.
“तो आप हैं आलिया खान. खुदा कसम बहुत खूबसूरत हैं आप. हमारी नज़र ना लग जाए आपको.” सलीम ने आलिया को देखते ही कहा.
“आओ बेटी बैठो. यही है सलीम. बहुत काबिल लड़का है. जब भी कोई काम बोलती हूँ इसे वो ये झट से कर देता है.”
“ये तो आपकी जर्रा नवाज़ी है खाला. हम इतने काबिल भी नही हैं. सब खुदा की रहम है.”
“नही सलीम तुम सच में बहुत काबिल हो. अच्छा तुम दोनो बाते करो मैं चाय लेकर आती हूँ.”
आलिया मौसी को रोकना चाहती थी पर कुछ कह नही पाई.
“लगता है आपको खुशी नही हुई हमसे मिल कर. आप कहें तो हम चले जाते हैं.” सलीम ने कहा.
“जी नही आप हमें ग़लत ना समझे. हम थोड़ा परेशान हैं.” आलिया ने कहा.
“समझ सकते हैं हम आपकी परेशानी. हम बेख़बर नही हैं आपकी परेशानी से. खाला हमें सब कुछ बता चुकी हैं. हम यहा आपका गम बाटने आयें हैं.” सलीम ने कहा.
“बहुत बहुत शुक्रिया आपका मगर हम उस बारे में बात नही करना चाहते.”
“समझ सकते हैं हम. गुज़रे दौर की बाते जख़्मो को और हवा ही देती हैं. हम आपसे माफी चाहेंगे अगर हमने आपके जख़्मो को कुरेद दिया हो तो. हमें ज़रा भी इल्म नही था कि इन बातो का जिकर नही होना चाहिए. हम तो बस आपका गम हल्का करना चाहते थे.”
“आपसे इज़ाज़त चाहूँगी. मुझे जाना होगा.”
“रोकेंगे नही आपको. मगर आप बैठेंगी तो हमें अच्छा लगेगा. आपसे ही मिलने आयें हैं हम.”
आलिया बहुत बेचैन हो रही थी ये जान-ने के लिए कि राज आया की नही. उसके चेहरे पर ये बेचैनी सॉफ झलक रही थी.
“आप हमें कुछ बेचैन सी लग रही हैं. सब ख़ैरियत तो है.” सलीम ने कहा.
“सब ख़ैरियत है आप हमारी फिकर ना करें.” आलिया थोड़ा गुस्से में बोल गयी.
तभी मौसी चाय ले आई. आलिया वहा से उठी और बोली, “मौसी मैं अभी आती हूँ.”
“चाय ठंडी हो जाएगी बेटा.”
आलिया को कुछ नही सुन-ना था. उसे तो बस उपर आ कर बाल्कनी से झाँक कर देखना था कि राज आया है कि नही. दौड़ कर आई वो उपर और दिल में राज को देखने की बेचैनी लिए उसने चारो तरफ देखा गली में. मगर उसे कोई नज़र नही आया. थक हार कर वो वापिस आ गयी.
“चाय ठंडी हो गयी, ऐसा क्या ज़रूरी काम था उपर.” मौसी ने पूछा.
“शायद आलिया को चाय पसंद नही है.” सलीम ने कहा.
“बहुत पसंद है इसे चाय. पता नही आजकल क्या हो गया है इसे.”
“खाला आलिया गम के ऐसे दौर से गुज़री है कि इंसान की रूह काँप जाए. इंसान का खो जाना लाजमी है. अब इज़ाज़त चाहूँगा खाला. कुछ ज़रूरी काम है मुझे. फिर मिलेंगे. खुदा हाफ़िज़!”
“खुदा हाफ़िज़ बेटा. आते रहना.”
“खुदा हाफ़िज़ आलिया जी. हम फिर मिलेंगे.” सलीम ने मुस्कुराते हुवे कहा.
“खुदा हाफ़िज़…” आलिया ने जवाब दिया.
“हमारी यही दुवा है कि अल्ला का रहम हो आप पर और आप इस गम के दौर से जल्द निकल आयें बाहर. हम इस खुबसुरत से चेहरे पर जल्द से जल्द मुस्कान देखना चाहते हैं.” सलीम ने कहा.
आलिया ने कुछ नही कहा. उसका ध्यान ही नही था सलीम की बात पर. वो तो राज के ख़यालो में खोई थी.
“आलिया जी हम आपको दुवा दे रहें हैं और आप कबूल नही कर रहीं. क्या हमसे कोई गुस्ताख़ी हुई है.”
आलिया को होश आया और वो झट से बोली, “शुक्रिया आपका. बहुत बहुत शुक्रिया.”
सनडे को लेने जाना था राज को आलिया को. आने जाने की टिकट उसने बुक करा ली थी. अभी २ दिन बाकी थे. उसने सोचा क्यों ना आलिया के आने से पहले अपने पापा के कारोबार को संभाल लिया जाए. वही बचा था अब इक लौता वारिस उसे ही सब संभालना था. आलिया की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए ये ज़रूरी भी था.
बहुत बड़ा कपड़े का व्यापार था राज के पापा कालिदास त्रिवेदी का. बिना देख रेख के वो यू ही नुकसान में जा रहा था. दंगो के बाद राज ने सुध ही नही ली व्यापार की. लेकिन अब उसे ज़िम्मेदारी का अहसास हो चला था. आलिया की खातिर उसे उस बीखरे हुवे व्यापार को फिर से खड़ा करना था. प्यार कई बार ज़िम्मेदारी भी सीखा देता है.
राज सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा. सभी कर्मचारी राज को देख कर बहुत खुश हुवे. सभी परेशान थे कि फॅक्टरी अगर यू ही चलती रही तो जल्दी बंद हो जाएगी और उनका रोज़गार छिन जाएगा. राज ने सभी को भरोसा दिलाया कि वो फिर से फॅक्टरी को पहले वाली स्थिती में ले आएगा.
पूरा दिन राज ने फॅक्टरी में ही बिताया. किसी बिगड़े काम को ठीक करने के लिए अक्सर एक सच्चे पर्यास की ज़रूरत होती है. उसके बाद सब कुछ खुद-ब-खुद ठीक होता चला जाता है. ऐसा ही कुछ हो रहा था कालिदास त्रिवेदी की उस फॅक्टरी में. राज के आने से उम्मीद की एक किरण जाग उठी थी सभी के मन में. जो कि एक बहुत बड़ी बात होती है.
काफ़ी दिनो बाद कुछ काम हुवा फॅक्टरी में. राज बहुत खुश था. फॅक्टरी में रहा राज मगर हर वक्त उसके जहन में आलिया का चेहरा घूमता रहा.
शाम को वो खुशी खुशी घर लौट रहा था. अंजान था कि कई बार खुशी को किसी की नज़र भी लग जाती है. जब वो अपने घर पहुँचा तो पाया कि कुछ गुंडे टाइप के लोग आलिया के टूटे-फूटे घर के बाहर खड़े हैं. वो उन्हे इग्नोर करके अपने घर में घुसने लगता है. मगर उसे कुछ ऐसा सुनाई देता है कि उसके कदम घर के बाहर ही थम जाते हैं.
“यार जो भी हो. क्या मस्त आइटम थी वो जरीना. मैं तो दंगो के दौरान बस उसे ही ढूंड रहा था. एक से एक लड़की को ठोका उस दौरान पर आलिया जैसी कोई नही थी उनमे. पता नही कहा छुप गयी थी साली. उसकी छोटी बहन की तो अच्छे से ली थी हमने.”
“हो सकता है वो घर पर ना हो कही बाहर गयी हो.”
“हो सकता है? पर यार उसकी लेने की तम्माना दिल में ही रह गयी. अफ क्या चीज़ थी साली. ऐसे दंगो में ही तो ऐसा माल हाथ आता है. वो भी निकल गया हाथ से.”
राज तो आग बाबूला हो गया ये सुन कर. प्रेमी कभी अपनी प्रेमिका के खिलाफ ऐसी बाते नही सुन सकता. भिड़ गया राज उन लोगो से बीना सोचे समझे. जो आदमी सबसे ज़्यादा बोल रहा था वो उस पर टूट पड़ा.
“बहुत बकवास कर रहा है. तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बाते करने की” राज ने उसे ज़मीन पर गिरा कर उस पर घूँसो की बोचार कर दी. मगर वो पांच थे और राज अकेला था. जल्दी ही उसे काबू कर लिया गया. ये कोई हिन्दी मूवी का सीन नही था जहा कि हीरो पांच तो क्या दस लोगो को भी धूल चटा देता है. ये रियल लाइफ का द्रिश्य था.
दो लोगो ने राज को पकड़ लिया और एक ने चाकू निकाल कर कहा, “क्यों बे ज़्यादा चर्बी चढ़ि है तुझे. हम कौन सा तेरी मा बहन के बारे में बोल रहे थे. उन लोगो के बारे में बोल रहे थे जो हमारे दुश्मन हैं. धर्मी हो कर धर्मी पर ही हाथ उठाते हो वो भी हमारे दुश्मनो की खातिर. तुम्हारे जैसे लोगो ने ही धरम को कायर बना रखा है.”
“कायरता खुद करते हो और पाठ मुझे पढ़ा रहे हो. छोड़ो मुझे और एक-एक करके सामने आओ. खून पी जाऊंगा मैं तुम लोगो का.”
“सत्तू मार साले के पेट में चाकू और चीर दे पेट साले का. ज़रूर इसी ने छुपाया होगा आलिया को. इसके घर में देखते हैं. क्या पता जो दंगो के दौरान नही मिली अब मिल जाए…हे…हे.”
“उसके बारे में एक शब्द भी और कहा तो मुझसे बुरा कोई नही होगा.” राज छटपटाया. मगर दो लोगो ने उसे मजबूती से पकड़ रखा था.
किसी तरह से राज ने दोनो को एक तरफ धकेला और टूट पड़ा उस गुंडे पर जिसके हाथ में चाकू था. होश खो बैठा था राज. होता है प्यार में ऐसा भी कभी. मगर ये ज़्यादा देर नही चला. फिर से उसे जकड़ लिया गया.
और फिर वो हुवा जिसके बारे में राज ने सोचा भी नही था. चाकू के इतने वार हुवे उसके पेट पर की खून की नादिया बह गयी वहा. राज को तडपता छोड़ वो गुंडे भाग गये वहा से.
राज की फॅक्टरी का एक कर्मचारी, कमलेश राज से कुछ पेपर्स पर साइन लेने उसके घर पहुँचा तो उसने राज को वहा खून से लथपथ पाया. तुरंत किसी तरह एम्बुलांस बुलाई उसने और राज को हॉस्पिटल ले जाया गया.
बहुत सीरीयस हालत में था वो. ऑपरेशन किया डॉक्टर्स ने मगर बचने की उम्मीद कम ही बता रहे थे. खून बहुत बह गया था. चाकू के इतने वार हुवे थे कि पेट छलनी छलनी हो रखा था उसका. बड़ी देर लगी ऑपरेशन में भी. ऑपरेशन के बाद राज को आई.सी.यू में रख दिया गया. उसे होश नही आया था. सनडे आ गया मगर अभी भी वो कोमा में ही था. राज के बारे में सुन कर मुंबई से उसके चाचा, चाची मिलने आए. कालिदास त्रिवेदी की मौत के वक्त नही आ पाए थे वो क्योंकि माहोल ठीक नही था. चाचा का नाम था रामदास त्रिवेदी और चाची का नाम था कमला देवी.
“डॉक्टर साहिब कब तक रहेगा कोमा में राज.” रघुनाथ ने पूछा.
“कुछ नही कह सकते. हम जो कर सकते थे हमने किया. अब सब भगवान के उपर है.” डॉक्टर कह कर चला गया.
आज के दिन राज को आलिया को लेने दिल्ली जाना था. मगर वो तो कोमा में पड़ा था. उसे होश ही नही था कि आलिया तड़प रही होगी राज के लिए. या फिर होश था उसे मगर कुछ कर नही सकता था. कोमा चीज़ ही कुछ ऐसी है. बेसहाय बना देती है इंसान को.
आलिया तो सुबह से ही बेचैन थी. बेसब्री से इंतेज़ार कर रही थी राज का. उसे मौसी को बिना कुछ कहे घर से निकलना था, राज के पीछे पीछे. बस एक बार दिख जाए राज गली में. आँखे बिछाए बैठी थी वो. छत की बाल्कनी में खड़ी हो गयी सुबह सवेरे ही.
“क्या बात है बेटा आज सुबह जल्दी उठ गयी.” मौसी ने आवाज़ लगाई आलिया को.
आलिया मौसी की आवाज़ सुन कर चौंक गयी, “सलाम वालेकुम मौसी.”
“सलाम वालेकुम बेटा. क्या बात है आज सुबह सुबह यहा खड़ी हो. सब ख़ैरियत तो है.”
“हां मौसी सब ख़ैरियत है. बस वैसे ही खड़ी थी.”
“तुमसे कोई मिलने आ रहा है आज.” मौसी ने कहा.
“कौन?”
“सलीम नाम है उसका. यही पड़ोस में रहता है. अच्छा लड़का है. तेरे बारे में बताया मैने उसे. बहुत दुख हुवा उसे सुन कर तुम्हारे बारे में.
मिलना चाहता है तुम से. आ जाओ नीचे वो आता ही होगा. बहुत अहसान है उसके हम पर. उस से मिलोगी तो अच्छा लगेगा हमें.”
“ठीक है मौसी मैं आती हूँ आप चलिए.” आलिया ने कहा.
मौसी सोच में पड़ गयी कि आख़िर क्या है बाल्कनी में ऐसा आज जो आलिया वहा से हटना नही चाहती. मौसी के जाने के बाद आलिया ने फिर से झाँक कर देखा गली में मगर उसे कोई दीखाई नही दिया. “शायद बाद में आएगा राज. अभी तो सारा दिन पड़ा है. मिल आती हूँ पहले इस सलीम से.”
आलिया जब सीढ़ियाँ उतर कर आई तो उसने पाया की सलीम उसका इंतेज़ार कर रहा था.
“तो आप हैं आलिया खान. खुदा कसम बहुत खूबसूरत हैं आप. हमारी नज़र ना लग जाए आपको.” सलीम ने आलिया को देखते ही कहा.
“आओ बेटी बैठो. यही है सलीम. बहुत काबिल लड़का है. जब भी कोई काम बोलती हूँ इसे वो ये झट से कर देता है.”
“ये तो आपकी जर्रा नवाज़ी है खाला. हम इतने काबिल भी नही हैं. सब खुदा की रहम है.”
“नही सलीम तुम सच में बहुत काबिल हो. अच्छा तुम दोनो बाते करो मैं चाय लेकर आती हूँ.”
आलिया मौसी को रोकना चाहती थी पर कुछ कह नही पाई.
“लगता है आपको खुशी नही हुई हमसे मिल कर. आप कहें तो हम चले जाते हैं.” सलीम ने कहा.
“जी नही आप हमें ग़लत ना समझे. हम थोड़ा परेशान हैं.” आलिया ने कहा.
“समझ सकते हैं हम आपकी परेशानी. हम बेख़बर नही हैं आपकी परेशानी से. खाला हमें सब कुछ बता चुकी हैं. हम यहा आपका गम बाटने आयें हैं.” सलीम ने कहा.
“बहुत बहुत शुक्रिया आपका मगर हम उस बारे में बात नही करना चाहते.”
“समझ सकते हैं हम. गुज़रे दौर की बाते जख़्मो को और हवा ही देती हैं. हम आपसे माफी चाहेंगे अगर हमने आपके जख़्मो को कुरेद दिया हो तो. हमें ज़रा भी इल्म नही था कि इन बातो का जिकर नही होना चाहिए. हम तो बस आपका गम हल्का करना चाहते थे.”
“आपसे इज़ाज़त चाहूँगी. मुझे जाना होगा.”
“रोकेंगे नही आपको. मगर आप बैठेंगी तो हमें अच्छा लगेगा. आपसे ही मिलने आयें हैं हम.”
आलिया बहुत बेचैन हो रही थी ये जान-ने के लिए कि राज आया की नही. उसके चेहरे पर ये बेचैनी सॉफ झलक रही थी.
“आप हमें कुछ बेचैन सी लग रही हैं. सब ख़ैरियत तो है.” सलीम ने कहा.
“सब ख़ैरियत है आप हमारी फिकर ना करें.” आलिया थोड़ा गुस्से में बोल गयी.
तभी मौसी चाय ले आई. आलिया वहा से उठी और बोली, “मौसी मैं अभी आती हूँ.”
“चाय ठंडी हो जाएगी बेटा.”
आलिया को कुछ नही सुन-ना था. उसे तो बस उपर आ कर बाल्कनी से झाँक कर देखना था कि राज आया है कि नही. दौड़ कर आई वो उपर और दिल में राज को देखने की बेचैनी लिए उसने चारो तरफ देखा गली में. मगर उसे कोई नज़र नही आया. थक हार कर वो वापिस आ गयी.
“चाय ठंडी हो गयी, ऐसा क्या ज़रूरी काम था उपर.” मौसी ने पूछा.
“शायद आलिया को चाय पसंद नही है.” सलीम ने कहा.
“बहुत पसंद है इसे चाय. पता नही आजकल क्या हो गया है इसे.”
“खाला आलिया गम के ऐसे दौर से गुज़री है कि इंसान की रूह काँप जाए. इंसान का खो जाना लाजमी है. अब इज़ाज़त चाहूँगा खाला. कुछ ज़रूरी काम है मुझे. फिर मिलेंगे. खुदा हाफ़िज़!”
“खुदा हाफ़िज़ बेटा. आते रहना.”
“खुदा हाफ़िज़ आलिया जी. हम फिर मिलेंगे.” सलीम ने मुस्कुराते हुवे कहा.
“खुदा हाफ़िज़…” आलिया ने जवाब दिया.
“हमारी यही दुवा है कि अल्ला का रहम हो आप पर और आप इस गम के दौर से जल्द निकल आयें बाहर. हम इस खुबसुरत से चेहरे पर जल्द से जल्द मुस्कान देखना चाहते हैं.” सलीम ने कहा.
आलिया ने कुछ नही कहा. उसका ध्यान ही नही था सलीम की बात पर. वो तो राज के ख़यालो में खोई थी.
“आलिया जी हम आपको दुवा दे रहें हैं और आप कबूल नही कर रहीं. क्या हमसे कोई गुस्ताख़ी हुई है.”
आलिया को होश आया और वो झट से बोली, “शुक्रिया आपका. बहुत बहुत शुक्रिया.”