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Romance दो कतरे आंसू

‘आज यह चीजें मेरी तनख्वाह में तो हो नहीं सकती थीं। होतीं थी तो सालों लग जाते, इसलिए आशा ने सुझाव दिया कि क्यों न वह नौकरी कर ले। मुझे आशा के चरित्र पर विश्वास था। आशा ने जब नौकरी की इच्छा व्यक्त की तो उसकी आंखों में ऐसी कोई भावना नहीं आती थी कि वह अपनी आजादी के लिए नौकरी की इच्छुक है।

‘हम लोगों ने अखबारों में कॉलम देखने शुरू कर दिए। फिर आशा को एक कांवेंट स्कूल में नौकरी मिल गई, जहां वह एक ही साल में तरक्की करते-करते प्रिंसिपल बन गई। हम दोनों के घर का नक्शा बदल गया। हम लोगों का जीवन स्वर्ग बन गया, मगर...।

‘मगर अचानक लगभग पंद्रह-बीस दिन से आशा कुछ बदली-बदली सी और खोई-खोई नजर आने लगी। कई बार देर से भी घर आई। मेरे पूछने पर उसने बहाना बना दिया कि कुछ काम निकल आया था या कोई गेस्ट आ गया था। या कोई एक्स्ट्रा क्लास लेनी पड़ गई। लेकिन बहानों के समय उनमें जोर नहीं होता था। वह बात मैंने हमेशा महसूस की। और इससे पहले कि कोई तूफान आए, मैंने आशा के सामने बगैर उसकी तब्दीलियों का अहसास दिलाए, यह सुझाव दिया कि अब घर में जरूरत की हर चीज आ चुकी है। वैसे भी अब हमारे मुन्ने को मां की ममता की जरूरत है। और मैं खुद इंजीनियर बनने वाला हूं। अतः वह नौकरी छोड़ दे। आशा ने तुरंत वादा करने की बजाए कह दिया कि मैं सोचूंगी। तब मेरा माथा ठनका।’

‘फिर एक रोज मैं दफ्तर के बहाने घर से निकला और लंच टाइम में दफ्तर छोड़कर, कार भी वहीं छोड़कर टैक्सी में आशा के स्कूल के पास पहंचकर रुक गया। आशा छुट्टी से कुछ समय पहले बाहर निकली। वह बहुत खुश और फूल की तरह खिली हुई थी और उसके साथ स्कूल मैनेजर सूरी भी था। वह एक तीस-बत्तीस साल का सुन्दर और स्वस्थ युवक था। आशा-उसके साथ कार में बैठी और मैंने टैक्सी में उसका पीछा किया। सूरी आशा को एक ऐसे होटल में ले गया, जहां सिर्फ आठ घंटे के लिए रूम मिलेगा। रूम भी छोटे-छोटे केबिनों की शक्ल में होते हैं।

‘मैंने साथ वाला रूम बुक लिया। मैनेजर ने हैरानी से पूछा मैं अकेला कमरा लेकर क्या करूंगा। मैंने बताया कि थोड़ी देर बाद, मेरी गर्ल-फ्रेंड आने वाली है। वह मेरा नाम पूछे तो रूम-नंबर बता देना। फिर थोड़ी देर बाद मैं बराबर वाले रूमनुमा केबिन में था। आशा और सुरी का वार्तालाप साफ-साफ-सुन रहा था। उनके वार्तालाप से स्पष्ट था कि सूरी शुरू से ही आशा पर जाल फेंक रहा था और कहता था कि मैंने इससे पहले भी उसे कहीं देखा है। फिर उसने आशा को अखबारों की कुछ घटनाएं सुनाई। कुछ सुनेे हुए किस्से सुनाए और उसने आशा के दिमाग में यह बात अच्छी तरह बिठा दी कि आशा और वह पिछले जन्म में भी प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी थे। मैंने सूरी के केबिन में व्हिस्की और खाने के सामान जाते देखे। सूरी ने आशा को व्हिस्की ऑफर की, मगर आशा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि उसके पति को संदेह हो जायगा। मगर दोनों में यह निर्णय हुआ कि प्यार करने वालों का प्यार जन्म-जन्म का होता है, मगर आशा इस जन्म में मुझे अपने बच्चे की वजह से नहीं छोड़ सकती। न सूरी अपनी पत्नी और दो बच्चों को छोड़ सकता है, इसलिए दोनों इसी तरह छिप-छिपकर मिलते रहेंगे। सूरी अपनी पत्नी पर यह भेद नहीं खुलने देगा और आशा मुझसे सब-कुछ छिपाकर रखेगी। वह नौकरी छोड़ने के बाद भी सूरी से सम्बन्ध रखने का इरादा रखती थी।

‘फिर दूसरे केबिन में लगभग एक घंटे तक खामोशी और अंधेरा रहा। मैं सिर्फ कपड़ों की सरसराहट और कभी-कभी सिसकारियां सुनता रहा। एक घंटे के बाद केबिन में रोशनी हो गई। आशा ने कहा, वह टैक्सी से घर जायेगी। मैंने सूरी की कार देखी थी कि उसने कहां पार्क की है। इससे पहले कि सूरी कार में पहुंचता, मैं उसकी कार तक पहुंच गया और अंधेरे में छिप गया। सूरी ने पहले कार का लॉक खोला, फिर एक जगह पेशाब करने के लिए खड़ा हो गया।

‘मैंने चुपके से उसकी कार का पिछला दरवाजा खोला और पिछली सीट पर छिप गया। मैंने ब्लेड निकाल लिया था। सूरी अच्छा-सा नौजवान था, मगर मुझसे ज्यादा भी नहीं था। जैसे ही सूरी कार में सवार हुआ, मैंने पीछे-से उसके गले में ब्लेड मार दिया। फिर सुरी तड़पता रहा, मगर उसके गले से आवाज न निकल सकी। वैसे भी मेरे अन्दर इस समय बहुत सब्र के बावजूद न जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई थी। सूरी के मरने के बाद मैंने उसकी कार ड्राइविंग साइड से भी अन्दर से लॉक करके बंद कर दी।’

‘फिर पहले मैं एयरपोर्ट गया, दिल्ली जाने वाले प्लेन का टिकट बुक कराया और घर आ गया। बाद में आशा को बताया की टिकट कल दोपहर का मिला है। सामान सुबह पैक कर लेना। रात को जब हम लोग सोने के लिए लेटे तो नौकर जो ऊपर का दूध पी जाता था, उसमें एक गोली काम्पोज की डाल दी, वह बिल्कुल बेखबर सो गया। आशा के दूध में पूरी दो गोलियां डाली और वह भी लेटते ही सो गई। बस, फिर मैंने बड़े आराम से, बिना किसी खौफ या डर के आशा की गर्दन काटी और उसके दोनों हाथ काटे। अपना लिबास बदला, छुरी साफ करके रखी। फिर मैं दिन निकलने से पहले ही सोते हुए मुन्ना को लेकर दिल्ली चला गया।’

छाबड़ा एक क्षण के लिए रुका, उसकी आंखों में आंसू तैर रहे थे। फिर वह बोला, ‘मैं नहीं जानता, गलती मेरी थी या सूरी की। मैं इतना जानता हूं कि आशा से कॉलेज के दौर से प्यार करता हूं और आशा सूरी के पुनर्जन्म के जाल में कुछ इस तरह फंस चुकी थी कि उससे उसका निकलना नामुमकिन था। मैं आशा को तलाक देकर भी जिन्दगी-भर अंगारों पर नहीं लोट सकता था। इसलिए मैंने आशा से बदला लिया और सूरी से एक पवित्र औरत को बहकाकर उसका चरित्र बर्बाद करने का। आशा को मौत के कारण मेरे जीवन में कुछ नहीं रह गया। इसलिए में खुद अपने आप को कानून के हवाले करने के लिए पेश हो गया हूं।’

छाबड़ा ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। उसकी आंखों से आंसुओं के दो कतरे निकलकर उसके उभरे हुए सीने पर गिर पड़े। चारों तरफ मौत का सन्नाटा था। और सुषमा तो इस तरह खड़ी थी जैसे उसका शरीर पत्थर का हो गया हो।

वह बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाती हुई अपनी कार के पास गई। उसके साथ जूली भी थी जो सहमी हुई। उसने सहमी-सहमी-सी आवाज में कहा‒ ‘आपने देखा मेम साहब, कैसा डेंजर आदमी हैं, दो-दो खून करके जरा-सा भी डरा हुआ नहीं है। और खुद ही फांसी के लिए आ गया।’

‘हूं!’ सुषमा ने भयभीत-सी आवाज में कहा, ‘तू ठीक कहती है।’

‘मगर असली फाल्ट उस सूरी के बच्चे का है जिसने पुनर्जन्म का जाल रचकर मिसेज छाबड़ा को उसमें फंसा लिया।’

‘हां, तू ठीक कहती है।’

जूली ने हैरानी से सुषमा की तरफ देखा और बोली‒

‘मगर मेम साहब यह गाड़ी तो अन्दर ले चलिए।’

‘तू‒तू ले आ, मुझसे ड्राइव नहीं होगी।

‘मगर मैं ड्राइविंग कहां जानती हूं, मेम साहब!’

‘नहीं जानती, किसी से धक्का लगवाकर अन्दर करवा दे।’

जूली आश्चर्य से सुषमा ने अन्दर जाते देखती रही। फिर उसने सामने के फ्लैट वाले दो नौकरों को बुलाया और धक्का लगाकर गाड़ी अन्दर करवाई। उसे लॉक किया। अन्दर पहुंची तो सुषमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई कांप रही थी।

‘क्या हुआ मेम साहब आपको?’ जूली ने हैरानी से पूछा।
 
‘कुछ नहीं जूूली मेरी तबियत बहुत खराब हो रही है। तू ऑफिस फोन करके एक हफ्ते की छुट्टी के लिए कह दे।’

‘मैं डॉक्टर को भी फोन कर दूं?’

‘नहीं‒ नहीं, डाक्टर को फोन करने की जरूरत नहीं, थोड़ी देर आराम करूंगी तो ठीक हो जाएगा।’

फिर जूली बाहर निकल गई। सुषमा फटी-फटी आंखों से शून्य में देख रही थी।

फिर उसने सुषमा को काम्पोज की दो गोलियां पानी के साथ दी और उसके हाथ-पैरों को सहलाने गली। सुषमा की आंखें बराबर शून्य में घूर रही थीं। जूली ने उसके चेहरे को गौर से देखा और बोली‒

‘मेम साहब, ऐ मेम साहब।’

‘हूं।’ सुषमा जैसे सोते से जागी हो।

‘जूली, एक बात बताओ जूली।’ सुषमा ने जूली का हाथ थाम लिया।

‘जी, पूछिए।’

‘क्या छाबड़ा ने अपनी बेवफा पत्नी को जान से मारकर ठीक किया है?’

‘ओह, मेम साहब, वह सोचना कानून का काम है, आप क्यों इसके बारे में सोच-सोचकर परेशान हो रही हैं।’

‘देखो जूली, इस घटना का बच्चों को पता नहीं चलने पाए।’

‘कैसी बातें करती हैं, मेम साहब। सारे इलाके में यह घटना मशहूर हो गई है, क्या उन लोगों को मालूम नहीं होगा?’

‘नहीं, तू यह मत बताना कि यह घटना देखकर मेरी यह हालत हो गई थी।’

‘क्यों, मेमसाहब?’

‘तू बात-बात में यह सवाल करती है।’ सुषमा झुंझला उठी, ‘जैसा कह रही हूं, वैसा करना।’

‘अच्छा मेम साहब।’ जूली सहमकर बोली।

‘अच्छा जा, अब मुझे नींद आ रही है। शायद काम्पोज असर कर रही है।’

जूली चुपचाप बाहर आई और उसने धीरे से दरवाजा बन्द कर दिया। सुषमा की आंखें धीरे-धीरे बन्द होती चली गई।

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पिछली खिड़की पर किसी प्रकार की आहट हुई और सुषमा ने चौंककर पलटकर देखा। कोई साया-सा था जो खिड़की का शीशा तोड़ने की कोशिश कर रहा था। सुषमा को ऐसा लगा जैसे उसकी जबान गूंगी हो गई हो। उसने चीखने की कोशिश की मगर आवाज गले मैं घुटकर रह गई। हाथ-पैर हिलाने चाहे, मगर जैसे उनसे दम निकल गया हो।

खनखनाहट की आवाज के साथ खिड़की के शीशे टूटे। किसी ने हाथ अन्दर डालकर सिटकनी खोली। फिर एक साया अन्दर दाखिल हुआ और धीरे-धीरे सुषमा की ओर बढ़ने लगा, उसका चेहरा काले कपड़े से ढका हुआ था। उसने काले दस्ताने पहन रखे थे और उसके दाएं हाथ में खुला हुआ चाकू था।

सुषमा ने एक बार फिर चीखने के लिए पूरा जोर लगाया। उसे ऐसा लगा जैसे आवाज उसके गले से कभी न निकलेगी। धीरे-धीरे चाकूवाला उसके पास पहुंच गया। उसका हाथ हवा में लहराया और फिर एक सुषमा के सीने में धंसता चला गया। साथ ही सुषमा के गले से एक जोरदार चीख निकली।

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सुषमा दोनों हाथ कानों पर रखकर बेतहाशा चिल्ला रही थी और उसकी आंखें भय से फटी हुई। फटाक से दरवाजा खुला, जूली दौड़ती हुई अन्दर आई।

‘मेम साहब! क्या हुआ मेम साहब?’ जूली ने सुषमा को पकड़कर झिंझोड़ डाला।

‘जूली।’ सुषमा ने कांपती हुई आवाज में पूछा, ‘तू कहां चली गई थी?’

‘आपने ही तो कहा था कि मैं बाहर जाऊं, आप सोएंगी। क्या आपने कोई भयानक सपना देख था?’

‘सपना‒ हां एक बहुत भयानक सपना देख था। तू मेरे इस तरह चीखने की बात बच्चों को मत बताना।’

‘नहीं, बताऊंगी मेम साहब।’ जूली ने सुषमा को सहमी हुई नजरों से देखते हुए कहा।

‘मगर वे लोग आपसे पूछेंगे, आपकी हालत इतनी खराब क्यों हो गई है, तो आप क्या जवाब देंगी?’

‘कह दूंगी, पड़ोस की घटना ने दिमाग पर बुरा असर डाला है।’

‘मगर पड़ोस में तो और भी लोग रहते हैं, किसी की हालत आप जैसी नहीं हुई। क्या बेबी इस बात को महसूस नहीं करेंगे? कुछ भी हो, दोनों समझदार हैं।’

‘तू ठीक कहती है।’ सुषमा ने कहा, ‘मैं उनके आने से पहले ही काम्पोज की गोलियां लेकर सो जाऊंगी। तू कह देना, अचानक ब्लड प्रेशर हाई हो गया था। डॉक्टर ने पूरा आराम करने के लिए कहा है। सोते से मत जगाना, अपने आप जगने देना। फिर सुबह भी मैं देर तक सोती रहूंगी। वे लोग चले जाएंगे तो उठूंगी।’

‘जी, जैसे आपकी आज्ञा।’

‘और देख जूली, तू मेरे कमरे में ही सोना। बच्चों से कह देना, डॉक्टर नहीं आ रहा था कि वह वही औरत है जिसकी तरफ उठने वाली नजर तक कांप जाती थी। एक छोटी-सी घटना ने सुषमा को क्या-से-क्या बना दिया।

‘मेम साहब, ऐ मेम साहब।’ जूली ने धीरे-से पुकारा।

मगर सुषमा ने जवाब नहीं दिया। जूली समझी कि सुषमा सो गई है। उसने एक ठण्डी और लम्बी सांस ली और बत्ती बुझा दी। अन्धेरा होते ही सुषमा की आंखें खुल गई। उसकी नजरें खिड़की के पार शून्य में घर रही थीं। दूर, बहुत दूर, जैसे इस समय वह अपने कमरे में न हो। अपने अन्दर हो। अपने आप से बहुत दूर निकल गई हो। बहुत पीछे ऐसी जगह जहां उसके शरीर को न मालिश की जरूरत थी न ही जवानी और खूबसूरती को मेन्टेन रखने के लिए किसी व्यायाम की जरूरत थी। जब वह एक स्मार्ट और खूबसूरत-सी लड़की थी। चीनी मिट्टी की गुड़िया की तरह खूबसूरत। अपनी दोनों बड़ी बहनों से कहीं ज्यादा खूबसूरत। जब उसकी बहनें इन्टर और मैट्रिक के बाद पढ़ना छोड़ चुकी थीं। मगर वह बी. ए. कर रही थी। क्योंकि वक्त के साथ-साथ औरत की शिक्षा की जरूरत का अहसास भी लोगों में बढ़ता जा रहा था। कितने सुन्दर और चैन के थे वे दिन। सुषमा की नजरों से आंसुओं के दो कतरे टपके और उसकी आंखें धुंधला गई। उसे गला जैसे उस आंसुओं में भी कई चेहरे उभर रहे हैं। कई जाने-पहचाने चेहरे, यह उसकी बड़ी बहन है। संध्या। यह मंझली बहन है रजनी, जिसने इन्टर के बाद पढ़ना छोड़ा। यह उसका छोटा भाई पप्पू है, जिसका पूरा नाम प्रदीप, मगर घरवाले प्यार से उसे पप्पू कहते हैं और यह उसके बाबूजी रघुनन्दन है जो एक प्राइवेट फर्म में हैड क्लर्क हैं। धीरे-धीरे वे सब उसे लचते-फिरते और बातें करते नजर आने लगे।

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रघुनन्दन ने जल्दी-जल्दी सूट पहना। टाई की गिरह ठीक की। चश्मा आंखों पर लगाया और अपनी छड़ी उठाकर चलते हुए बाहर निकले।

‘अरे संध्या, रजनी...कहां हो तुम लोग?’

‘मैं बाथरूम में हूं बाबूजी।’

‘ऐ जल्दी करो, नाश्ता लाओ। मेरे दफ्तर जाने का समय हो गया है।’

‘अभी लाई, बाबूजी।’

‘अरे, ओ सुषमा।’

‘जी बाबूजी।’

‘तेरे कालेज जाने का समय हो गया। तू अभी तक तैयार नहीं हुई?’

‘में तो बिल्कुल तैयार हूं, नाश्ता तैयार नहीं हो रहा अभी।’

‘ओफ्फोह, अरे यह पप्पू स्कूल के लिए तैयार हो गया?’

‘हां बाबूजी, बिल्कुल तैयार हो गया।’

इतने में सुषमा जल्दी-जल्दी किताबें लिए बाहर आई। उसके शरीर पर काली कमीज, सफेद दुपट्टा और सफेद सलवार थे। उसने बाबूजी को देखा तो एक जोर का कहकहा लगाया और लगातार हंसती चली गई। बाबूजी ने हैरानी से पूछा, ‘क्यों हंस रही है री?’

मगर सुषमा की हंसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बाबूजी झुंझलाकर बोले‒

‘बस, हर वक्त ही-ही-ही, इसके सिवा तुझे कुछ और आता भी है। ससुराल जाएगी तो ताला पड़ जाएगा मुंह पर।’

मगर फिर भी सुषमा की हंसी नहीं रुकी। इतनी देर में पप्पू भी बाहर आया। वह भी कहकहे लगाने लगा। बाबूजी उछल पड़े।

‘अरे, तू भी पागल हो गया।’ फिर संध्या नाश्ता लेकर आ गई और रजनी भी आ गई। वे दोनों भी मुंह में आंचल ठूंसकर बेतहाशा हंसने लगीं। बाबूजी ने झुंझलाकर‒ ‘अरे, बाबा, मैं क्या कोई कार्टून हूं, जिसे देखकर तुम लोगों की हंसी रुकती ही नहीं।’

‘बाबूजी।’ संध्या ने उनके पैरों की तरफ इशारा किया। बरबस ही वे हंस पड़े, क्योंकि उन्होंने सूट पहन लिया था लेकिन पैरों में सिर्फ जुराबें ही पहने रह गए थे।

सुषमा ने उनके जूते लाकर दिए। बाबूूजी ने पहनते हुए कहा‒

‘क्या बताऊं, बुढ़ापे में आदमी की अक्ल इसी तरह खराब हो जाती है। जूते पहनने के बाद वह जल्दी-जल्दी नाश्ता करने लगे और बोले‒

‘और हां सुषमा, तुम शाम को अपनी किसी सहेली के घर चली जाना।’

‘क्यों बाबूजी?’

‘मैं जो कह रहा हूं इसलिए।’

‘अरे, तो मुजरिम को सजा सुनाने से पहले उसका जुर्म भी तो बताना पड़ता है।

‘अरे, अब क्या तुझे बार-बार समझाऊंगा। सदानन्द का बेटा संध्या को देखने आया और तुम्हें देखकर मचल गया। श्यामसुन्दर अपने दोनों बेटों के लिए संध्या और रजनी को देखने आए, मगर तुझे देखकर दोनों में बहस होने लगी। संध्या और रजनी कुछ शरमा-सी गई थीं। पप्पू ने पूछा‒

‘तो आज कोई और देखने आ रहा है?’

‘क्या मतलब?’

‘मेरा मतलब है, दीदियों को।’

‘हां, मेरे एक मित्र हैं, व्यापारी आदमी हैं। उनके भी दो बेटे हैं। चाहते हैं कि किसी घर से दो बहिनें ही वे बहु बनाकर लाएं। ताकि दोनों बहिनों का आपस में झगड़ा न हो, घर में शांति रहे। वे तीनों आज संध्या और रजनी को देखने आ रहे हैं।

‘घबराइए मत बाबूजी। आज इन लोगों में झगड़ा नहीं होगा।’ सुषमा ने बड़े इत्मीनान से कहा।

‘क्यों?’

‘अगर वे दोनों भाई मुझ पर मचलेंगे तो मैं उनके बाप पर लट्टू हो जाऊंगी। कहूंगी कि मैं तो इन्हीं से शादी करूंगी।’

सब हंस पड़े, मगर रघुनन्दन ने कहा‒ ‘सचमुच तेरी जबान कैंची की तरह चलने लगी है, बेशर्म। बाप तक का लिहाज नहीं करती।’

‘देखिए, शादी तो मेरी एक दिन होनी ही है। सास बहुओं के झगड़े का चक्कर भी खत्म हो जाएगा। और फिर बूढ़े अपनी जवान बीवियों को रखते भी तो बहुत प्यार से हैं।’

रघुनन्दन छड़ी उठाकर सुषमा को मारने दौड़े और सुषमा कहकहा लगाती हुई किताबें लेकर बाहर भागी। रघुनन्दन चिल्लाए‒

‘अरे, नाश्ता तो करती जा।’

‘मैंने किचन में कर लिया था, आपसे तो यों ही कह रहीं थी।’

वह बाहर निकल गई तो भी सब लोग देर तक हंसते रहे। रघुनन्दन ने कहा- ‘सचमुच यह लड़की तो ससुरालवालों को अंगुलियों पर नचाएगी।’

फिर वह नाश्ता खत्म करके उठ गए।

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पूरा क्लास रूम शोर से गूंज रहा था। जोर-जोर से कहकहे उठ रहे थे, क्योंकि ब्लैक बोर्ड पर चाक से एक कार्टून बना हुआ था, जिसके नाक से निकलने वाली छींको के साथ क्लास का स्टुडेंट उड़ता हुआ क्लास रूम से बाहर जा गिरता है। कोई पंखे में लटक जाता है। तभी किसी ने चीख कर कहा‒

‘साइलेंट, साइलेंट, मिस्टर छींक बिहारी तशरीफ ला रहे हैं।’

क्लास-रूम में सन्नाटा छा गया। क्लास-रूम के दरवाजे के पास ही एक जोरदार छींक की आवाज गूंजी। फिर रूमाल से नाक पोंछते हुए एक दुबले-पतले और छोटे-से कद के लेक्चरर अंदर दाखिल हुए। क्लास में आते ही उन्होंने एक छींक और मार दी और उसके साथ ही एक और छींक किसी तरफ से गूंजी। उन्होंने चौंककर इधर-उधर देखा और गुस्से से कहा, ‘यह कौन बदतमीज छींका?’

साथ ही उन्हें एक छींक और आ गई और सुषमा ने झुके-झुके कहा‒

‘सर, यह छींक आपकी है?’

‘यू शट अप, एण्ड स्टैंड अप!’

सब लोग एक साथ खड़े हो गए। लेक्चरर ने गुस्से से कहा‒

‘मैं सिर्फ उस बदतमीज को खड़ा होने के लिए कह रहा हूं, जो छींका था।’

साथ ही उन्हें एक छींक आ गई। सब बैठ गए। लेक्चरर ने गुस्से से कहा‒ ‘खड़ा नहीं हुआ।’

‘सर, आप खड़े तो हैं। सुषमा ने गर्दन झुकाए हुए कहा।

लेक्चरर गुस्से में एक बार फिर जोर से छींके। उन्होंने चबूतरे से उतरकर एक लम्बा राउंड लगाया, मगर सब लोग इतनी गम्भीरता और शराफत से बैठे थे कि उन्हें किसी पर सन्देह नहीं हो सकता। इनमें सबसे ज्यादा गंभीर और मासूम सुषमा बनी हुई थी। लेक्चरर उसके पास जाकर रुक गए और क्रोध से बोल‒ ‘खड़ी हो जाओ।’

सुषमा न सिर्फ खड़ी हो गई, बल्कि इतनी तेजी से रोने लगी जैसे उसे किसी ने बहुत जोर से थप्पड़ मारा हो। लेक्चरर बुरी तरह घबरा गए और एक जोरदार छींक मार कर बोले‒

‘हाय-हाय, रोती क्यों हो? क्या मैंने मारा तुम्हें?’

‘आप मुझे मारेंगे भी!’ सुषमा बिफर-बिफर कर रो पड़ी।

पूरी क्लास बड़ी मुश्किल-से हंसी रोक रही थी। लेक्चरर की छींके कुछ ज्यादा तेज हो गई थीं। उन्होंने जल्दी-जल्दी कहा‒

‘मैं...मैंने कब कहा, मैं तुझे मारूंगा। यह भी कोई रोने की बात है।’

‘मैं तो इसलिए रो रही हूं कि लता ने मुझे इतनी जोर से नोचा है।’

‘अरे हाय-हाय, मैंने तुम्हें कब नोचा है।’ लता ने घबराकर कहा।

‘झूठ बोलती हो तुम।’ लेक्चरर ने पलटकर कहा, ‘तुमने जरूर नोचा होगा।’

‘अरे सर। यह झूठी है।’

‘देखिए सर।’ सुषमा ज्यादा जोर से रो पड़ी, ‘मैंने जिन्दगी में कभी सच नहीं बोला, यह मुझे झूठी कह रही है।’

‘लता।’ लेक्चरर ने डांटकर कहा, ‘गेट आऊट ऑफ द क्लास।’

‘मगर सर...।’

‘आई से गेट आऊट।’

लता ने सुषमा को खूंखार नजरों से घूरा ओर होंठों में कुछ बड़बड़ाकर बाहर चली गई। लेक्चरर बच्चों की तरह पुचकार-पुचकार कर सुषमा को चुप कराने लगे।

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जैसे ही क्लास खत्म हुई, लड़कियां और लड़के बाहर निकले। सुषमा इधर-उधर देखती हुई चुपके-चुपके निकली। लता दूर एक पेड़ की आड़ में खड़ी उसे देख रही थी। जैसे ही सुषमा उसके पास गुजरने लगी, वह सामने आ गई और दांत पीसकर बोली‒ ‘अब देखती हूं तुझे।’

‘क्यों ?’ सुषमा ने हैरानी से कहा, ‘पहले कभी नहीं देखा क्या?’

‘तूने झूठा इल्जाम लगाकर मुझे क्लास से निकलवा दिया।’

‘कौन-सा इल्जाम?’

‘मैंने तुझे कब नोचा था?’

‘तो ले अब नोच ले। इसमें लड़ाई काहे की?’ सुषमा ने मासूमियत से कहा।

लता बेहद क्रोध के बावजूद हंस पड़ी और बोली‒

‘साली, जी तो चाह रहा था कि आज तेरी चटनी बना दूंगी। मगर न जाने है क्या चीज! कभी किसी को तेरे ऊपर गुस्सा भी आता है?’

‘हां, आता है।’

‘किस गधे को?’

‘इतनी देर से किस पर गुस्सा कर रही थी?’

लता बरबस ही हंस पड़ी और बोली‒

‘दरअसल तेरी शरारतें लोग इसलिए माफ कर देते हैं कि तू दूसरों का बड़े-से-बड़ा कमीनापन तक माफ कर देती है। मेरे साथ तो तू तीन वर्ष से है। बराबर तुझे देख रही हूं। क्लास का कौन-सा लड़का ऐसा है, जिसने तेरे ऊपर डोरे नहीं डाले। तेरी किताबों में लव लेटर या फूल नहीं रखे। मगर तूने सबको सिर्फ हंसी में उड़ा दिया। तूने न तो किसी की शिकायत ही की और न किसी से नाक सिकोड़कर मिली। फिर सबसे बड़ी घटना तो उस लड़के मदन की है जो पहले तुझ पर डोरे डालता रहा। फिर जब तू काबू में नहीं आई तो तुझ पर जबरदस्ती हमला कर दिया। लेकिन जब लड़के-लड़कियां मदन को पकड़कर प्रिंसिपल के पास ले गए तो तूने कह दिया कि उन लोगों को गलतफहमी हुई है। मदन तो मेरा भाई बना हुआ है। प्रिंसिपल तेरा झूठ समझ गए थे। मगर फिर भी वह मदन को सजा न दे सके। मदन तुझसे इतना शर्मिन्दा हुआ कि वह कॉलेज ही हमेशा के लिए छोड़ गया।’

‘अरे पगली!’ सुषमा ने कहा, ‘आदमी की जिन्दगी सिर्फ चन्द सांसों के हवाई धागे पर झूल रही है। जरा-सा झटका लगा और धागा टूट गया। इस दुनिया में लोगों के पास प्यार तक करने के लिए तो पूरा समय है नहीं। फिर लड़ाई-झगड़े में समय क्यों बिगाड़ा जाए!’

‘तू तो जरूर फिलॉस्फर बनेगी।’

‘अच्छा, अब मेरी तारीफें ही किए जाएगी या एक प्याली चाय भी पिलाएगी?’

दोनों कैन्टीन की तरफ चल पड़ीं। कैन्टीन में अचानक सुषमा की निगाहेें काऊंटर पर खड़े नवयुवक पर पड़ीं। वह ठिठक कर रुक गई। लता भी रुक गई और चौंककर बड़बड़ाई‒‘अरे, यह तो महेश है।’

‘हां महेश ही है।’ सुषमा ने धीरे-से कहा।

तभी महेश की नजरें उन दोनों की तरफ उठी फिर वह काऊंटर झुक गया जैसे कोई बात ही न हो। सुषमा लता के साथ आकर केबिन में बैठ गई। क्षण के लिए उसके माथे पर सोच की लकीरें उभरीं लेकिन फिर उसका पुराना मूड लौट आया। लता से नहीं रहा गया। वह बोली‒

‘यह महेश को आखिर हो क्या गया?’

‘क्या हो गया, अच्छा भला तो है।’

‘मेरा मतलब है, पहले अचानक क्लास से गायब हो गया। फिर कॉलेज में नजर आया लेकिन कैन्टीन मैनेजर बनकर।’

‘होगी कोई मजबूरी।’

‘तू उसे इस तरह नजर अंदाज क्यों कर रही है? शायद इसलिए कि उसने तुझे देखकर नजरें झुका ली थीं।

‘तुम गलत समझ रही हो। जानती हो कि किसी से बदला लेना मेरी आदत नहीं है। वह कैंटीन मैनेजर बना खड़ा है। पढ़ाई भी छोड़ चुका है। इन सब बातों से क्या यह जाहिर नहीं होता कि वह परेशान है। उसे इस तरह खड़े होने से अपने जाननेवालों के सामने शर्मिन्दगी भी जरूर महसूस होती रहेगी। फिर उसे ज्यादा शर्मिन्दा करने से क्या फायदा!’

लता चुप हो गई। दोनों चुपचाप चाय पीती रहीं।

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सुषमा को देखकर महेश ठिठककर रुक गया। उसके शरीर पर सस्ते कपड़े की कमीज और सस्ते कपड़े की पतलून थी। सुषमा उसे देखकर अपने विशिष्ट अंदाज में मुस्कराई। महेश ने उसे गौर से देखा। फिर नजरें झुकाकर बोला‒‘कब से खड़ी हो यहां?’

‘जब से आखिरी पीरियड खत्म हुआ है।’

‘शायद तुम भी दूसरों की तरह यही पूछना चाहती होगी कि मेरी साइकिल कहां गई। मैंने पढ़ना क्यों छोड़ दिया? मैं कॉलेज क्यों छोड़ गया? मैं कैंटीन मैनेजर बनके क्यों नजर आ रहा हूं?’

सुषमा उसी अंदाज में मुस्कराई, ‘मां की तबियत कैसी है?’

‘मुझसे भूल हुई।’ महेश हल्की-सी मुस्कराहट के साथ बोला, ‘मैं जानता हूं, तुम किसी के जख्मों को कुरेदना नहीं चाहती। मां की हालत बहुत खराब है। मैंने गांव से उन्हें यहीं बुला लिया है। वे अस्पताल में दाखिल हैं। डॉक्टर मुझे कुछ बताते नहीं, बस तसल्लियां देते रहते हैं या फिर दवाओं के नुस्खे। मां की देखभाल और इलाज से मेरे पास न इतना समय बचता है न पैसा कि पढ़ाई जारी रख सकूं। बहुत जगह नौकरी ढूंढ़ी, नहीं मिली। साइकिल बेचकर कुछ दिन काम चलाया। इधर कैंटीन के ठेकेदार को रहम आ गया तो उसने दो सौ रुपए महीने की नौकरी दे दी।’

महेश ने ठण्डी सांस ली और बोला‒‘सब सपने बिखर गए, सुषमा दुनिया में मेरी एक अकेली मां ही तो थी। गांव में थोड़ी-सी खेती थी, जिसे पट्टे पर चढ़ाकर कुछ चक्कर-वक्कर चला लेती थी। कुछ मुझे भेजती थी। मैं सोचता था पढ़-लिखकर एग्रीकल्चरल इंजीनियर बनूंगा। अपने गांव वापस जाऊंगा। आधुनिक तरीके से स्वयं खेती करूंगा। गांव की हालत सुधारुंगा। गांववालों को कोआपरेटिव फर्म बनाने के लिए तैयार करूंगा। मगर-मगर‒’

बोलते-बोलते महेश की आवाज भारी हो गई। आंखों में आंसुओं की दो बूंदें झलकने लगीं। सुषमा के होंठों पर पहले की तरह मुस्कराहट थी। महेश ने नजरें उठाकर उसे देखा और कहा‒

‘तुम्हें यह सब कुछ जानकर दुःख नहीं हुआ?’

‘दुःख तो जरूर हुआ, मगर यह सब कुछ जानकर नहीं, मगर यह देखकर हुआ कि तुमने इतनी जल्दी तकदीर से हार मान ली। इतने ऊंचे सपने देखने वाला, इतना जी छोड़ और बुजदिल हो सकता है, यह बात मैंने कभी सपने में भी नहीं सोची थीं।’

‘सुषमा!’ महेश की आवाज कांप गई।

‘एक छोटे से बीज को वृक्ष के बनने के लिए धरती की छाती फोड़नी पड़ती है। महेश, अगर यह छोटी-छोटी रुकावटें आदमी के उद्देश्य में रुकावट बनने लगें तो कोई भी अपने उद्देश्य में सफल न हो। तुम्हारी थोड़ी-सी भाग-दौड़ ने जब तुम्हें दो सौ की नौकरी दिलवा दी तो तुम खुद सोचो अगर तुम अपने सभी पुराने स्वप्नों को समेट कर उनमें नया रंग, नया उत्साह भर कर छलांग लगाते तो कहां पहुंच जाते।’

‘सुषमा।’ महेश की आवाज कांप गई। उसने सुषमा के हाथ अपने हाथों में ले लिए और उसकी आंखों से आंसुओं के कतरे निकल कर सुषमा में हाथों पर गिर पड़े। और वह भर्राई हुई आवाज में बोला‒ ‘तीन महीने में तुम पहली लड़की हो जिसने मुझे सोते से झिंझोड़कर जगा दिया है, नहीं तो आज तक मुझे जितने भी लोग मिले, किसी ने हमदर्दी के चन्द बोल-बोल दिए तो किसी ने व्यंग्य-भरी मुस्कराहट के साथ मजाक उड़ाया।’

‘तुम क्या मुझे भी अपने उन सहपाठियों में गिनते हो?’ सुषमा मुस्कराई, ‘क्या तुम उन तीन महीनों में भूल गए थे कि एक सुषमा भी है, तुम्हारी जीवन में। जो तुम्हारी किसी और तरह से मदद न सके, लेकिन तुम्हें जुबानी हमदर्दी तो जाता ही सकती है। तुम यह क्यों भूल गए कि अपनी दोनों बहनों की विदाई के बाद मुझे तुम्हारी ही बनना है। तुम्हारा दुख मेरा दुख है।

‘सचमुच सुषमा, मैं अपने दुखों में सब कुछ भूल गया था। सच मानो तो मुझे प्यार से विश्वास ही उठ गया था। मुझे लगता था कि तुम अपने सपनों से भिन्न महेश को देखकर वह सुषमा रहेगी या नहीं।’

‘इसका मतलब है, तुमने प्यार को सौदा समझ लिया था।” सुषमा मुस्कराई, ‘मिस्टर, अगर तुम कहीं के राजा होते तो मेरी तुमसे शादी हो जाती और तुम भिखारी बन जाते तो मैं तुम्हें छोड़ देती? अरे, तुम हवाई जहाज चलाओ या टैक्सी, किसान बने या मजदूर, सेठ बनो या नौकर, सुषमा तो श्रीमती महेश की कहलाएगी।’

‘सुषमा, आज तुमसे इतनी बातें करके मेरे मन से कितना बड़ा बोझ हट गया है, मैं तुम्हें बता नहीं सकता, मगर कुछ ही दिनों में तुम देखोगी, तुम्हारा महेश अपने अन्दर क्या नया इन्कलाब लाता है।’

‘यह हुई न कोई बात!’ सुषमा महेश के दिल पर हाथ रखकर बोली,

‘इन्कलाब जिन्दाबाद।’

फिर दोनों हंस पड़े। फिर सुषमा ने चौंककर कहा, ‘मर गए, आज तो संध्या और रजनी को कुछ लोग देखने आ रहे हैं, अच्छा अब में चलूंगी।’

‘मां तुम्हें देखने को कह रही थी।’

‘बस कल-परसों मैं तुम्हारे साथ चली चलूंगी।’

‘ठीक है।’ महेश ने कहा। उसके होंठों पर बड़ी जानदार मुस्कराहट थी।

रघुनंदन ने पूरे घर में हंगामा मचा रखा था। संध्या और रजनी इधर-उधर भागी फिर रही थीं। घर की सफाई की गई थी। बिस्तरों पर धुली चादरें और तकियों पर गिलाफ चढ़ाए गए थे। कई तरह की मिठाइयां बनाई गई थीं। ज्यों-ज्यों जानकीदास और उनके बेटों के आने का समय नजदीक आ रहा था, रघुनन्दन की बौखलाहट बढ़ती जा रही थी। बिना कारण ही वह कभी इधर-और कभी उधर दौड़ते। कई बार वह यह पूछ चुके थे कि सुषमा को अपनी सहेली के घर जाने के लिए बताया या नहीं।

‘अरे, रघुनन्दन संध्या और रजनी को देखकर चिल्लाए, ‘तुम दोनों ने अभी तक हुलिये भी नहीं बदले। उन लोगों के आने में दस मिनट रह गए हैं।’

‘बाबूजी।’ संध्या ने धीरे से कहा, ‘अभी-अभी तो फुरसत मिली है।’

‘अरे, तुम क्या देख रही हो खड़ी-खड़ी, जाओ जल्दी से कपड़े बदलों।’

दोनों बाथरूम की तरफ लपकी। बाबूजी बेचैनी से टहलने लगे और चिल्लाए, ‘पप्पू, अरे ओ पप्पू!’

‘बाबूजी।’ अन्दर से रजनी ने जवाब दिया, ‘पप्पू को तो आपने गली के नुक्कड़ पर खड़ा कर दिया है।’

‘गली के नुक्कड़ पर, काहे के लिए?’

‘सुषमा को रोकने के लिए, अगर वह आ जाए तो?’

‘अरे हां, मैं तो भूल ही गया था, मैंने उससे कह दिया था कि वह अपनी किसी सहेली के यहां चली जाए। और आठ बजे से पहले न आए।’

‘आपने ही तो कहा था।’

‘मेरा तो भेजा ही खाली होकर रह गया है।’

तभी किसी ने जोर-जोर से दरवाजा खटखटाया।

रघुनन्दन एकदम उछल पड़े। बौखलाहट में उनके हाथों से छड़ी छूटकर गिर गई।

‘लो आ गए, वे लोग।’

फिर वह झपटकर दरवाजे पर गए। जल्दी से उन्होंने दरवाजा खोला तो पप्पू हांफता हुआ अन्दर आया और बोला‒

‘आ गई वह।’

‘क्या जानकीदास आ गए?’

‘नहीं, छोटी दीदी।’

‘सत्यानाश। उसको तो मैंने सुबह ही कह दिया था कि आठ बजे से पहले न आए।’

इतने में सुषमा किताबें लिए हुए अन्दर दाखिल हुई। रघुनन्दन उसे देखकर गर्राए‒ ‘तुझे मैंने क्या कहा था।?’

‘क्या कहा था?’ सुषमा सहमकर बोली।

‘अरे, तुम से कहा था कि आज जानकीदास और उसके दोनों लड़के आ रहे हैं।’

‘वे तो संध्या और रजनी दीदी को देखने आ रहे हैं।’

‘अरे, इसीलिए तो कहा था कि तू आठ बजे तक न आना।’

‘ओह बाबूजी।’ सुषमा सिर झुकाकर बोली, ‘मैं तो नौ बजे तक बाहर रहती मगर एक सहेली से कहा तो उसने कह दिया कि उसके घर कोई उसे देखने आ रहा है, मैं जाऊंगी तो मुझे न पसन्द कर ले। दूसरी ने बताया कि उसका भाई लफंगा है। पड़ोस से ही शिकायतें आती रहती हैं। फिर एक से कहा तो...।’

‘अरे, अब बड़बड़ किए जाएगी, जा अन्दर जाकर बैठ।’

‘जी, बहुत अच्छा।’

‘और खबरदार, उन लोगों के सामने बाहर आई तो अच्छी तरह खबर लूंगा।’

‘और अगर उन लोगों ने ही बुला लिया तो?’

‘क्या बकती है?’

‘बाबूजी, उन लोगों को तो मालूम है ना कि आपकी तीन बेटियां है।’

तभी खुले दरवाजे के सामने से ही आवाज आई‒

‘रघुनन्नदजी घर में हैं?’

रघुनन्दन के पैरों के तले से जमीन निकल गई, क्योंकि आनेवाले जानकीदास थे और उनके पीछे उनके दोनों लड़के खड़े थे। रघुनन्दन जी आगे बढ़कर बौखलाए हुए से बोले, ‘आइए-आइए जानकीदासजी, आपको ही याद कर रहा था।’

जानकीदास और उनके दोनों लड़के अन्दर आ गए। रघुनन्दनजी जानकीदास के गले मिले। रघुनन्दन कोशिश कर रहे थे कि वह सुषमा को अपने पीछे छिपाकर रखे। पीछे हाथ से इशारा भी कर रहे थे। मगर वह वहीं खड़ी होकर हाथ जोड़कर बोली‒‘नमस्ते।’

‘जीती रहो।’ जानकीदास ने जवाब दिया। जानकीदास ने कहा, ‘यह शायद आपकी छोटी बेटी है?’

‘जी-जी हां।’ रघुनन्दन ने हकलाकर कहा, ‘आइए अन्दर चलकर बैठिए।’

‘आइए, आइए।’ सुषमा ने भी कहा।

रघुनन्दन खूंखार लहजे में सुषमा की तरफ मुड़े, मगर जैसे ही उनकी नजरें सुषमा पर पड़ी वे ठिठक गए, क्योंकि सुषमा की दोनों आंखें भीगी हुई थीं और मुंह इस तरह लटका हुआ था, जैसे उसे किसी ने मारा हो। रघुनन्दन ने राहत की सांस ली और सुषमा से कहा‒

‘जाओ बेटी, तुम कॉलेज से आई हो, आराम करो। संध्या और रजनी से कहना, मेहमानों के लिए मिठाई ले आएं।’

वे लोग बैठ चुके थे। संध्या और रजनी सिर झुकाए हुए मिठाई की थालियां लेकर आई और लड़कों ने उन्हें गौर से देखा। दोनों की नजरें झुकी थीं। जानकीदास ने उन्हें गौर से देखा। फिर लड़कों से आंखों से इशारे हुए। रघुनन्दनजी दोनों हाथ मल रहे थे। जानकीदास ने मिठाई का टुकड़ा मुंह में रखकर कहा‒

‘रघुनन्दनजी, बच्चों को आपस में बातें करके एक-दूसरे के विचार जानने दीजिए, हम लोग दूसरे कमरे में चलें।’

‘जरूर-जरूर।’

जानकीदास के साथ रघुनन्दन दूसरे कमरे में आकर बैठ गए। रघुनन्दन हाथ मल रहे थे। जानकीदास आराम से बैठे हुए थे। वे बोले‒

‘आप तो मेरी आदत जानते हैं, बड़ा स्पष्टवादी हूं।’

‘जी, वह तो मैं जानता हूं।’

‘मुझे आपकी दोनों लड़कियां पसन्द है।’

‘जानकीदासजी!’ रघुनन्दन ने कहा, ‘आपने मेरे सिर से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया है।’

‘दोस्त हूं आपका। मेरा और आपका बोझ अलग-अलग थोड़े ही है। मगर एक बात और साफ हो जाए तो अच्छा है, ताकि फिर कोई गड़बड़ न हो।’

‘वह भी बता दीजिए, आप तो मेरी हैसियत और नौकरी दोनों के बारे में जानते हैं।’

‘बेशक‒ इसलिए मैं मुंह नहीं फाडूंगा आप मुझे जानते हैं मैं लालची नहीं हूं। मेरे दोनों बेटे मुझसे बड़े व्यापारी निकल रहे हैं। भगवान् ने चाहा तो छोटी‒सी दुकान ही किसी दिन बहुत बड़ा स्टोर बन जाएगी।’

‘भगवान् आपकी जुबान शुभ करे।’

‘मगर मेरे पिता का एक उसूल था। उनके भी दो ही बेटे थे। जब तक पिताजी जिन्दा रहे, उन्होंने दुकान अपने नाम रखी। बेटे भी साथ ही रहे। जब बेटों की शादी हुई तो उन्होंने कोई दहेज नहीं मांगा। बस, दोनों लड़कियों को अलग-अलग रहने की जगह दिलवा दी ससुराल से, शादी दोनों आपस में कभी लड़े नहीं।’

‘वह तो ठीक है, मगर दोनों बेटियां आपस में बहने हैं।’

मगर रघुनन्दनजी एक जगह रहने से भाइयों में भी झगड़ा हो ही जाता है। मुझे दस-बीस लाख का दहेज नहीं चाहिए। बस, दोनों के रहने के लिए अलग-अलग घर का इन्तजाम आप कर दीजिए। चाहे अपनी बेटियों के नाम ही रखें और चाबियां भी अपने हाथ से दें। मेरी बस एक ही शर्त है। वैसे लड़कियां मुझे पसन्द हैं और घर-बार के बारे में आपको जानता ही हूं।’

‘ठीक है, जानकीदसजी आपका हुक्म जरूर पूरा होगा।’

‘बस, तो फिर चलिए मुंह मीठा कीजिए।’

जानकीदास ने मिठाई का टुकड़ा उठाकर रघुनन्दन के मुंह में रख दिया।

7

रघुनन्दन इजाजत लेकर फर्म के मैनेजर प्रेम चंद के दफ्तर में दाखिल हुए तो मैनेजर ने कहा‒ ‘आइए आइए, बैठिए रघुनन्दन जी।’

‘धन्यवाद।’ रघुनन्दन बैठते हुए बोले।

‘क्या बात है, आप कुछ परेशान नजर आ रहे है?’

‘वह‒ बात यह है कि आप तो जानते हैं कि मैं फर्म का कितना पुराना मुलाजिम हूं।’

‘अच्छी तरह जानता हूं। मुझसे पहले जो मैनेजर थे, वह आपकी बहुत तारीफ करके गए है।’

‘वह खुद भी बहुत भले आदमी थे। एक बार मैं बीमार हो गया था तो न केवल तनख्वाह के साथ एक महीने की छुट्टी दिलवा दी थी, बल्कि मेरे फन्ड से एक हजार रुपया भी दिलवा दिया था। जो बाद में थोड़ा-थोड़ा करके तनख्वाह में से कटवा दिया था।’

‘तो क्या अब भी ऐसी कोई परेशानी पेश आ गई है?’

‘साहब, वह प्रॉब्लम तो भारत के हर घर में आती है। मेरी तीन लड़कियां हैं। एक सबसे छोटा लड़का है। दो लड़कियां मैट्रिक और इन्टर करके पढ़ना छोड़ चुकी हैं। तीसरी बी. ए. कर रही है। पहले तो जो आते थे, वह छोटी को देखकर ही दोनों को फेल कर जाते थे, क्योंकि बड़ी दोनों बहनों से वह ज्यादा खूबसूरत और चंचल है। इस बार किसी-न-किसी तरह दोनों बड़ी लड़कियों के रिश्ते पक्के हुए हैं।’

‘कमाल है, आपके हमें कभी बताया ही नहीं कि आपकी तीन बेटियां हैं और तीसरी इतनी खूबसूरत और चंचल।’

‘बस, क्या पूछिए साहब। चंचलता से तो मैं खुद भी तंग हूं। शरारत पर उतर आए तो मुझे भी माफ नहीं करती।’

‘बहुत खूब‒अच्छा आपने परेशानी तो बताई ही नहीं।’

रघुनन्दन ने समस्या बताई और बोले‒ ‘मैंने दो मकान देख लिए है। दस-दस हजार में मिल रहे हैं। अगर मुझे फंड में से बीस हजार रुपए मिल जाएं तो एक नहीं दो बड़े बोझ सिर से उतर जाए।’

‘बीस हजार।’ मैनेजर ने परेशानी से कहा, ‘यह रकम तो बहुत होती है आपकी तनख्वाह के हिसाब से।’

‘मैं जानता हूं साहब!’ रघुनन्दन हाथ-जोड़कर गिड़गिड़ाए, ‘मगर मैं यह भी जानता हूं कि मालिक आपका बहुत मान करते हैं और आपके सीने में भी दिल है। आप चाहें तो मेरी नैया पार लगा सकते हैं।’

‘अच्छा!’ मैनेजर ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘हम कोशिश करेंगे, मगर एक शर्त होगी हमारी।’

‘हुक्म कीजिए, साहब।’

‘भई आप तो जानते है, हम नागपुर से ट्रांसफर होकर यहां आए हैं। बंगले में अकेले ही हैं। बच्चे और दूसरे घरवालें बहुत याद आते हैं। मगर बच्चे स्कूलों के सेशन तक नहीं आ सकते। महीनों से नौकरी के हाथ का उल्टा-सीधा खाना खाना पड़ रहा है। सोचिए, क्यों न इस इतवार को आपके घर खाना खाएं।’

‘मेरे घर’, रघुनन्दन हाथ जोड़कर बोले, ‘और आप ! ये तो मेरे लिए बहुत मान की बात होगी।’

‘नहीं भई, हम छोटा-बड़ा नहीं मानते। कई महीनों से घर के माहौल को तरस रहे हैं। आपके घर जाने लगेंगे तो जरा मन लग जाएगा।’

‘साहब, आपने तो मुझे आकाश पर चढ़ा दिया। आप इन्सान नहीं देवता हैं साहब।’ बोलते-बोलते रघुनन्दन की आंखें भीग गई।

‘नहीं-नहीं, बिना कारण भावुक होने की जरूरत नहीं। इस दुनिया में आदमी छोटा और बड़ा, आपने कद से होता है, कुर्सी से नहीं।’

रघुनन्दन अपने आंसू पोंछते हुए बाहर निकल गए। खुशी के मारे उनका चेहरा लाल हो गया था और आंसू थे कि बार-बार उमड़ चले आ रहे थे।

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रघुनन्दन के घर में आज बड़ी चहल पहल थी। उन्होंने दफ्तर से आते ही एक हंगामा-सा खड़ा कर रखा था। कई तरह के पकवान बनवाए गए थे। घर की सफाई की गई थी। संध्या, रजनी और सुषमा तीनों पकवान बनाते-बनाते थक गई थीं। आखिर सुषमा ने रोटी के गोल-गोल गोले बनाए और चूने के पानी में डालकर गाढ़ा-गाढ़ा चूरा भर दिया तो संध्या बौखलाकर बोली‒ ‘अरे-अरे, क्या करती हो?’

‘दही बड़े।’ सुषमा नमक-मिर्च छिड़कती हुई बोली।

‘अरी दिमाग खराब हो गया है, वह बाबूजी के ऑफिस का मैनेजर है। और अपने हैड क्लर्क के यहां खाना खाने आ रहा है। जब तक साले को स्पेशल आइटम नहीं मिलेगी उनकी तबियत हरी नहीं होंगी। वरना उसका क्या, रोज आ जाया करेगा। घर का माहौल चाहिए साहब को।’

‘तू जरूर पिटवाएगी बाबूजी से।’

‘अरे, पिटूंगी तो मैं, तुम दोनों क्यों मरी जा रही हो।’

फिर वही किचन से निकलकर आई। हाथ धोए। कुछ सोचकर अन्दर गई। अन्दर एक कुर्सी रखी, जिसका बेंत टूट गया था। बीच का हिस्सा बिल्कुल खाली था। सुषमा ने जल्दी से कुर्सी उठाई। बाहर लाकर उसे झाड़ा‒पोंछा और एक सबसे खूबसूरत गद्दा उसके ऊपर रख दिया।

थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई और बाबूजी घबराकर बोले‒

‘वे आ गए हैं साहब।’

इससे पहले कि कोई बाहर जाता। सुषमा भागकर आगे पहुंची। दरवाजा खोला। दरवाजे के सामने सफेद रंग की फिएट खड़ी थी और एक अधेड़ आदमी बेहतरीन सूट में खड़ा था। उसने सुषमा को दरवाजा खोलते देखा।’ सुषमा जल्दी-से बोली‒‘आइए, आइए, पधारिए।’

‘आइए, मैनेजर साहब, ‘रघुनन्दन ने जल्दी से आगे आकर कहा और पप्पू से बोले, ‘बेटा, तू बाहर खड़ा रह, कोई साहब की कार खराब न कर दे।’

8

पप्पू बाहर चला गया। और मैनेजर अन्दर आता हुआ सुषमा को देख मुस्कराकर बोला‒ ‘शायद यही है, आपकी सबसे छोटी बेटी, सुषमा।’

‘जी हां, साहब।’

‘शक्ल से ही शरारती मालूम होती है।’

सुषमा ने शरमा जाने की एक्टिंग की। वे लोग अन्दर पहुंचे। सुषमा ने जल्दी-से टूटी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा‒

‘बैठिए बैठिए।’

‘भई, घर तो खूब सजा रखा है।’ मैनेजर कहते हुए कुर्सी पर बैठा।

दूसरे की क्षण वह कुर्सी के अन्दर धंस गया। बाबूजी ने बौखलकार कहा‒ ‘अरे, अरे, यह क्या हुआ?’

‘हाय राम, ‘सुषमा घबराकर बोली, ‘शायद पप्पू ने भूल से टूटी हुई कुर्सी रख दी है।’

बाबूजी के चेहरे पर हवाइंया और आंखों में खून उतरा हुआ था। बाहर संध्या और रजनी बड़ी मुश्किल से मैनेजर को खींचकर बाहर निकाला। मैनेजर खिसयानी सी हंसी हंस रहा था। बाबूजी ने सुषमा से गुर्राकर कहा‒

‘मैं पूछता हूं, यह कुर्सी किसने रखी थी?’

‘मु...मुझे क्या मालूम!’

मालूम की बच्ची, मैं सब समझता हूं।’ कहते-कहते बाबूजी ने सुषमा को मारने के लिए छड़ी उठाई और दूसरे ही क्षण मैनेजर ने उसका हाथ पकड़ लिया और बेतहाशा हंसता हुआ बोला‒

‘भई, मान गए रघुनन्दनजी, इतनी शानदार शरारत कभी हमारी साली ने भी नहीं की। यह शरारत नहीं, चतुराई है, चतुराई।’

‘माफ कीजिए मैनेजर साहब, यह लड़की पागल है।’

‘काश ! सारी दुनिया की लड़कियां ऐसी ही पागल हो जाएं।’

‘चल माफी मांग साहब से।’ रघुनन्दन ने सुषमा से कहा।

‘माफ कर दीजिए साहब।’ सुषमा रुआंसी होकर बोली।

‘अरे-अरे, यह क्या बेवकूफी है। मुझे तो इस शरारत से बहुत मजा आया है।’

फिर वे लोग बैठ गए। मैनेजर पेट पर हाथ फेरकर बोला ‘बड़ी जोर से भूख लगी है, जल्दी से खाना मंगवाइए।’

थोड़ी देर बाद ही मैनेजर के सामने मेज पर खाना लगा हुआ था और मैनेजर होंठों पर जबान फेरता हुआ कह रहा था‒

‘आज शायद इतना खाऊंगा।’ सुषमा ने कहा ‘यह दीदी ने अपने हाथ से बनाए हैं, वे दही-बड़ों की-स्पेशलिस्ट हैं।’

‘अरे भई, यह तो मेरी मनपसन्द डिश है।’

मैनेजर ने प्लेट आगे सरकार चम्मच से एक बड़ा उठा लिया। मगर मुंह में पहुंचते ही, बड़ा कच्ची-सी रोटी रह गया और मुंह में चूने का मजा फैल गया। मैनेजर का मुंह बन्द का बन्द रह गया और सुषमा मुंह दबाकर बाहर निकल गई। रघुनन्दन ने हैरानी से कहा‒

‘क्या हुआ साहब, खाइए ना।’

मैनेजर ने दही-बड़ा ढककर पानी का गिलास उठा कर कुल्लियां कीं। रघुनन्दन ने फिर घबराकर पूछा, ‘क्या हुआ साहब?’

मैनेजर के ऊपर हंसी का दौरा-सा पड़ गया। रघुनन्दन उसे हैरानी से देख रहे थे। साथ ही उनकी आंखों में गहरी खुशी की चमक भी लहरा रही थी।

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सुषमा बड़ी देर तक बेतहाशा हंसती रही और महेश चुपचाप खड़ा हुआ उसे देखता रहा। वे लोग एक बस स्टॉप पर खड़े थे। बहुत देर बाद सुषमा को ख्याल आया कि वह अकेली ही हंसे जा रही है तो उसकी हंसी अचानक रुक गई। उसने महेश की तरफ देखा और बोली‒

‘मैंने इतने जोरदार लतीफे सुनाए, हंसी तो दरकिनार तुम मुस्कराए तक नहीं।’

‘सुषमा।’ महेश ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘मुझे तुम्हारे ऐसे लतीफों पर हंसी आने की बजाय डर लगने लगता है।’

‘क्या मतलब?’

‘शायद तुमने कभी अपने-आपको गौर से नहीं देखा, सुषमा। सिर्फ दूसरों के मुंह से ही सुना होगा कि तुम कितनी सुन्दर हो, उस सुन्दरता के साथ जब तुम्हारी सादगी और शरारतें भी मिल जाती है। शायद तुम अपनी धुन में यह नहीं जानती कि तुम अपनी शरारतों के समेत सामनेवाले के दिल में किसी जलते हुए तीर की तरह घुस जाती हो। तुम्हारे इसी कॉलेज में कितने दीवाने रहे हैं और अब भी कितने हैं। एक सिरफिरे ने तो जबरदस्ती तुम्हें पाने की कोशिश भी की थी। मैं डरता हूं कि कहीं तुम्हारी यह चंचलता, शरारतें यह शोखियां, यह कहकहे, भगवान न करे किसी दिन तुम्हारे लिए ऐसे आंसू बन जाएं, जिनमें तुम हमेशा के लिए डूब जाओ।’

सुषमा आश्चर्य-से महेश को देखती रह गई। फिर बोली‒

‘मुझे समझ में नहीं आता, तुम क्या कह रहे हो!’

‘अगर हो सके, समझने की बजाय अपने-आपको इस हद तक मजबूत करो कि लोग तुम्हें असभ्य न समझने लगें।’

इतने में बस आ गई और महेश उसके साथ बस में सवार हो गया।

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सुषमा और महेश अस्पताल में दाखिल हो, जनरल वार्ड की तरफ बढ़ने लगे तो जनरल वार्ड से निकलता हुआ डॉक्टर चमनलाल उन्हें देखकर रुक गया। फिर जब वे लोग नजदीक पहुंचे तो उसने महेश से कहा‒‘अच्छा हुआ आप आ गए, मिस्टर महेश। पहले आप मेरे साथ ऑफिस में आइए।’ महेश हैरान-सा डॉक्टर के साथ ऑफिस में आ गया। सुषमा भी उसके साथ थी। डॉक्टर के साथ ऑफिस में आ गया। सुषमा भी उसके साथ थी। डॉक्टर ने दोनों को बिठाया और खुद कुर्सी पर बैठता हुआ सुषमा की तरफ इशारा करके बोला‒

‘यह आपकी कोई रिश्तेदार हैं?’

‘जी, मेरी क्लासमेट है, मां को देखने आई है।’

‘ओह अच्छा।’ डॉक्टर ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘मैं जो कुछ कहने जा रहा हूं उसे धीरज से सुनिए, क्योंकि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति सदा जिन्दा रहने के लिए पैदा नहीं होता। आप जब अपनी मां को यहां लेकर आए थे, तब ही वे इलाज के दौर से गुजर चुकी थीं।’

‘जी।’ महेश को ऐसा लगा जैसे उसके कन्धों पर कोई दीवार आ गिरी हो और उसके सिर पर छत।

‘देखिए।’ डॉक्टर ने कहा, ‘मैंने आपसे पहले की कहा था कि मेरी बात धीरज से सुननी पड़ेगी। आपकी मां कैंसर का शिकार हैं और जब उन्हें यहां लाया था, वह इलाज के दौर से गुजर चुकी थीं। हमारे अनुमान के अनुसार उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा छः महीने दवाओं पर जिन्दा रखा जा सकता है। वे सारी कोशिश हम करते रहे। हमने आपको इसके बारे में फौरन नहीं बताया था कि आप इतनी बड़ी दुर्घटना से इतनी देर तक दो चार रहते। आज हम यह सब कुछ आपको इसलिए बताने पर मजबूर हैं कि आपकी मां बस दो-चार दिन की मेहमान है।’

‘नहीं...नहीं...नहीं।’

‘सच्चाई छिपाने से कोई फायदा नहीं। अब आप जितना ज्यादा से ज्यादा उनके पास रह सके, रह लीजिए। मगर उन्हें कुछ मत बताइए।’

महेश इस तरह बैठा था जैसे उसके सारे बदन की जान निकल गई हो। उसका चेहरा सफेद हो गया था। दिल सीने में उछलता हुआ सा लग रहा था। सुषमा खुद भी सन्नाटे में बैठी हुई थी। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जब वह पहली बार महेश की मां से मिलने जाएगी तो इतनी खतरनाक खबर सुनेगी। अचानक उसके कानों से डॉक्टर की आवाज टकराई‒ ‘जाइए, आप लोग उनसे मिल लीजिए।’

सुषमा ने अपने-आपको सम्भाला और महेश का बाजू पकड़ती हुई बोली‒ ‘चलो महेश।’

महेश बड़ी मुश्किल से उठ सका। फिर वे दोनों वार्ड में आ गए तो सुषमा ने महसूस किया कि महेश को खुद अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है। उसने महेश का बाजू पकड़ा और धीरे से बोली‒

‘महेश, क्या तुम इस हालत में मां के सामने जाओगे?’

‘सुषमा।’ महेश ने पलटकर सुषमा के कन्धों पर सिर रख दिया और बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगा। सुषमा ने उसे रोने से रोका नहीं। महेश का कंधा थपकती रही, वह रोता रहा और कहता रहा‒

‘सुषमा मेरी मां ने मुझे बड़ी मुश्किल और बड़ी मुसीबतें उठाकर पाला है। पिताजी के देहान्त के समय में केवल चार वर्ष का था। चारों तरफ लूटने-खसोटनेवाले रिश्तेदारों की भीड़ थी। हमारी जमीन जायदाद पर कब्जे कर लिए। सबके सब मुझे और मां को मारने के लिए तुले हुए थे। उन तूफानों से बचाकर मेरी मां ने मुझे बड़ा किया। रिश्तेदारों की बंदर-बांट के बाद थोड़ी खेती बची थी, उसे मां ने मेरे भविष्य के लिए दांव पर लगा दिया। वे खुद घुल-घुलकर मेरे भविष्य के लिए काम करती रही। और अभी तो उसका लगाया हुआ पौधा फल देने के काबिल नहीं हुआ। वह उस पेड़ का एक फल भी नहीं खा सकी। वह मुझे छोड़कर जा रही है। मैं कैसे जिन्दा रहूंगा। सुषमा, मां के बगैर कैसे जिन्दा रहूंगा। यह क्या हो गया सुषमा, यह क्या हो गया।’

महेश बुरी तरह फूट-फूटकर रो रहा था। इतना रोया कि सुषमा का कंधा भीग गया था। फिर जब उसकी हिचकियां सिसकियों में बदल गई तब सुषमा ने गम्भीरता से कहा‒

‘बस महेश, अब तुम अपने आपको एक मर्द की तरह संभालो।’

महेश ने उसके कंधे से आंखें हटा लीं और उमड़ते हुए आंसुओं को रोकने की कोशिश करते हुए आंखें के आंसू पोंछने लगा। सुषमा ने उसका चेहरा गौर से देखा, फिर बोली‒

‘इस धरती पर करोड़ों बेटे रहते हैं। उन्हीं में से तुम एक हो। क्या जबसे तुमने देखना शुरू किया, आज तक किसी इतिहास में यह पढ़ा है या कानों से सुना है कि दुनिया में किसी भी बेटे की मां हमेशा के लिए जिंदा रही। जो इस धरती पर आया है उसे एक रोज हर हाल में जाना है। मां औलाद के रोएं-रोएं में रहती है। मां ने जो पेड़ लगाया है, उसमें फल लगने लगें, मां की आत्मा के लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या होगी!’

धीरे-धीरे महेश ने अपने ऊपर काबू पा लिया। फिर सुषमा ने कहा, ‘चलो, तुम्हें मां के सामने चलना है। अभी मां जिन्दा है। तुम्हारी किसी भी हरकत पर किसी भी भाव में मां को अपनी मौत की झलक नजर नहीं आनी चाहिए। हो सकता है कि उसकी जिंदगी के एक दो रोज और घट जाएं तो तुम जिम्मेदार होगे।’

महेश ने सचमुच अपने आपको आश्चर्यजनक सीमा तक संभाल लिया, वे दोनों उस जनरल बोर्ड की तरफ बढ़े जिसमें मां का बिस्तर था। जब वह वार्ड में दाखिल हुए तो मां बेड पर तकिया लगाए बैठी हुई दरवाजे की तरफ देख रही थी। महेश और सुषमा को देखकर मां के चेहरे पर यकायक खुशी की सुर्खी दौड़ गई, जैसे उसने मौत को परास्त करने का फैसला कर लिया था।

महेश पूरा हिल गया था। उस मुस्कराती मां को देखकर जिसकी मुस्कराहट से वह वंचित होने वाला था। सुषमा ने उसका बाजू दबाया तो उसने अपने आपको संभाल लिया और गले की तरफ उठते हुए गोले को रोका। फिर वे दोनों बेड के पास पहुंच गए। महेश ने सुषमा की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मां, यह सुषमा है।’

‘मैं तो दूर से ही समझ गई थी।’ मां की आवाज, खुशी से कांप रही थी।

‘नमस्ते, मां जी।’ सुषमा ने मां के पैर छुए।

मां ने सुषमा को कंधों से पकड़कर उसका माथा चूमा। फिर गौर से उसका चेहरा देखा और बोली‒

‘बिल्कुल यही रंग-रूप तो मैं अपनी बहू के लिए सपने में देखा करती थी। कितनी खुशनसीब हूं मैं कि भगवान् ने मेरा सपना पूरा कर दिया।’ सुषमा कुछ न बोली। वह स्वयं अपने ऊपर काबू पाने की कोशिश कर रही थी। मां कह रही थी‒

‘महेश तब से ही तेरे बारे में बहुत कुछ लिखकर भेजा करता था, जब मैं गांव में थी और जब मैं यहां आ गई तो इतने रोज बाद मिलाने लाया है मुझसे।’

‘ओह मां।’ महेश जल्दी से बोला, ‘मैंने तुम्हें बताया था कि वह अपनी मौसी के यहां गई हुई है। अभी तीन चार दिन पहले ही लौटी है।’

‘क्यों बेटी? इसने कभी मां के बारे में तुझे बताया था?’

‘बहुत कुछ बताया था, मां जी।’

सुषमा ने कहा, ‘बल्कि सब-कुछ बता दिया है, आप कितने बजे उठती हैं, कब तक पूजा करती है। कब-कब क्या-क्या करती हैं और कब बिस्तर पर लेटतीं हैं। कोई बात ऐसी नहीं है जो इन्होंने न बताई हो।’

‘बेटी, तू बम्बई की तो नहीं लगती?

‘नहीं मां जी, मेरे पिताजी दिल्ली के हैं। नौकरी के लिए वह बम्बई आ गए थे, तब मैं बहुत छोटी थी।’

‘तो तूने बम्बई में ही होश संभाला है?’

‘हां मां जी!’

‘मगर बेटी बम्बई जैसी जगह में रहने के बाद तुम्हें क्या गांव में रहना अच्छा लगेगा?’

‘मां जी, जगह अच्छी बुरी थोड़े ही होती है, अच्छा बुरा लगना तो उन रिश्तों पर है, जिनके साथ जहां रहना है।”

‘सचमुच जैसा सुना बिल्कुल वैसा ही पाया है तुझे।’ मां ने कहा, ‘पर क्या तेरे माता-पिता तुझे गांव भेजने पर राजी हो जाएंगे?’

‘हां, मेरी मां मुझे बहुत छोटी-सी छोड़कर परलोक सिधार गई थीं। दो बहनों की शादी होने वाली है। मेरे बाबूजी इतने बड़े आदमी नहीं कि बहुत सारा दहेज दे सकें।’

‘हमें दहेज चाहिए भी नहीं। न मेरे पति ने ही मेरे पिता से दहेज लिया था। यह तो आनी जानी चीज है, बेटी। आज हम किसी तरह दस लाख भी जमा कर लें और कल वे चोरी हो जाएं तो क्या कर लेंगे?’

‘आपके विचार बहुत महान् हैं मां जी।’

‘मगर हां।’ मां ने फिर कहा, ‘बेटी तू यह अच्छी तरह सोच समझ लेना कि गांव में तुम्हें खेतों-खलिहानों से लेकर मवेशियों तक की देखभाल करनी पड़ेगी। सब काम मजदूरों पर छोड़ दो तो एक महीने में ही जानवरों की खालें लटक जाती हैं।’

एक क्षण रुककर उन्होंने फिर कहा, ‘बस, अब मैं दो-चार दिन में अच्छी हो जाऊंगी। फिर मैं खुद तुझे मांगने तेरे पिता के पास जाऊंगी। शादी भी मैं अभी करूंगी। तूने जितना पढ़ लिया है, काफी है। तू गांव में मेरे पास रहेगी। तीन साल महेश की पढ़ाई और है। उसके बाद महेश भी गांव आ जाएगा। वैसे सालाना और होली-दिवाली की छुट्टियों में तो आता ही रहेगा। अब मुझे वहां किसी बात की चिंता नहीं होगी। तू सब कुछ संभाला करेगी और मैं अपना बाकी जीवन पूजा-पाठ में गुजारूंगी।’

मां बोलती जा रही थी और महेश की आंखों में इतने आंसू रुके हुए थे कि समुद्र-सा बन गया था। उसे डर था कि कहीं मां के सामने ही यह बांध टूट न जाए। मां कहे जा रही थी‒

‘लोग कहते हैं, अरे हमारी बहू तो चांद का टुकड़ा है। अरे, मैं तो यह कहती हूं कि बहू को लेकर गांव जाऊंगी तो चांद भी शरमा जाएगा। सात गांवों तक शोहरत पहुंच जाएगी कि ठाकुर कपालसिंह की बहु आयी है तो अमावस की रात ही गायब हो गई है।’ फिर उसने ठंडी लम्बी सांस ली और बोली, ‘एक ही तो बेटा है मेरा। सोचती थी कि भगवान् जाने कैसी बहु आएगी। मगर शुक्र है भगवान् का उसने मुझे सपनों से ज्यादा अच्छी बहु दी है। अब तो बस यही सपना बाकी रह गया है कि महेश को दूल्हा और तुझे दुल्हन बनी देख लूं।’

महेश से बर्दाश्त न हो सका और वह बोला‒

‘सुषमा, बहुत देर हो रही है।

‘अरे वाह!’ मां ने सुषमा का बाजू पकड़कर कहा, ‘पहली बार तो लेकर आया है बहू को। जरा मुझे जी भर कर देख तो लेने दे।’

‘मां यह घर बताकर नहीं आई कि कहां जा रही है। कॉलेज के बाद ही इधर चली आयी है, घरवाले फ्रिक कर रहे होंगे।’

‘तो क्या हुआ, कह देगी मेरे पास थी।’

‘मां, वो लोग बम्बई में जरूर रहते हैं मगर इतने मॉडर्न नहीं हैं। उनके यहां अब भी भारत की संस्कृति जिंदा है।’

‘वह तो बहू को देखकर ही अंदाजा हो गया।’

‘चलो सुषमा।’

‘अच्छा बेटी, मगर फिर कब आएगी तू मेरे पास ?’

‘कल ही आएगी मां।’ महेश बोला, ‘मैं कल इसे लेकर आऊंगा।’

‘सच?’

‘हां मां, मैं कल आऊंगी।’

मां ने फिर सुषमा को प्यार किया और सुषमा ने मां के पैर छुए और बाहर निकले आई। उसकी रफ्तार बहुत तेज थी। अस्पताल के कम्पाउंड तक पहुंचते-पहुंचते, वह सिसक-सिसक कर रो पड़ी। महेश उसके पास रुक गया था। उसने उसके कंधों पर हाथ रखकर भराई हुई आवाज में कहा‒

‘देख लिया तुमने। तुम मुझे धीरज बंधा रही थी।’

‘महेश, तुमने इतनी देर क्यों कर दी, मुझे अपनी मां से मिलाने में?’

‘इसलिए कि मैं समझाता था मेरे सपनों के साथ मेरे और तुम्हारे बीच बंधी डोर भी टूट गई होगी।’

‘क्या तुम्हें मेरे प्यार पर विश्वास नहीं था?’

‘मुझे तुम्हारे प्यार पर भरोसा है, पूरा विश्वास है। आज उसी विश्वास के बल पर तो तुमसे कुछ मागूंगा और यह अच्छी तरह सोचकर कि तुम्हारी हां या ना पर मेरा भविष्य होगा।’

‘यह तुम कैसी बातें कर रहो, तुम्हारा भविष्य क्या मेरा भविष्य नहीं है।?’

‘तो फिर कल ही मुझसे शादी कर लो।’

‘शादी!’ सुषमा हड़बड़ाकर बोली, ‘और कल ही, यह कैसे हो सकता है, अभी तो मेरी बड़ी बहनों की भी शादी नहीं हुई।’

‘मेरी बातों को समझने की कोशिश करो, सुषमा। तुम्हारे सामने ही डॉक्टर ने बताया है कि मां दो-तीन दिन की मेहमान है। मगर मां की इस बात का गुमान तक नहीं होगा कि अब वह कभी गांव वापस नहीं जा सकेगी। वह अब कभी अपने खेत-खलिहान या मवेशी नहीं देख सकेगी। मेरी मजबूर, बेबस और दुनिया को सताई हुई मां की असर कोई दौलत है तो सिर्फ मैं। उसका इकलौता बेटा। इसका अंदाजा तो तुम खुद ही लगा चुकी होगी। बगैर फेरों के मां तुम्हें बहू लगी है। अगर वे अपनी बहू को देखे बगैर परलोक सिधार गई तो उनकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी।’

फिर बोलते महेश की आवाज गले में ही रुंध गई। फिर वह बड़ी मुश्किल से बोला‒

‘हम लोग सिर्फ शादी करेंगे। एक दूसरे के साथ बन्धनों में बँधेंगे। मगर यह मेरा वचन है कि जब तक मैं तुम्हारी दोनों बहिनों को विदाई के बाद तुम्हें डोली में बिठाकर घर नहीं ले आऊंगा हम दोनों शारीरिक रूप से एक दूसरे के लिए अजनबी ही रहेंगे।’

‘मगर अचानक शादी के लिए मैं अपने बाबूजी से कैसे कहूंगी?

‘जरूरत ही नहीं बाबूजी को बताने की। यह बात तो बाद में भी बताई जा सकती है।’

‘और तुम अपनी मां से क्या कहोगे?’

‘मैं कह दूंगा कि तुम्हारे बाबूजी ने अचानक तुम्हें बताया कि वह तुम्हारा रिश्ता अपने किसी दोस्त के बेटे के साथ तय कर चुके हैं। इसलिए हम दोनों ने छिपकर शादी कर ली है और मां अच्छी हो जाएगी तो उसे बाबूजी के पास ले जाएंगे। बाबूजी नरम दिल के आदमी है, वह मान जाएंगे।’

‘मगर?’

‘देखो सुषमा, क्या तुम तेरी मां को जीवन के आखिरी क्षणों में कोई खुशी नहीं दे सकती?’

‘महेश!’ सुषमा ने ठण्डी लम्बी सांस लेकर कहा, ‘तुम्हारी मां को काश मैं अपनी जिन्दगी देकर बचा सकती। मुझे तुम्हारी हर बात स्वीकार है। जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा ही करूंगी।’

‘सुषमा!’ महेश की आवाज भारी हो गई।

‘अब मुझे प्रोग्राम बताओ।’

‘देखो, कल शाम को ठीक सात बजे मैं महालक्ष्मी मन्दिर के बाहर तुम्हारा इन्तजार करूंगा। वहां हम दोनों शादी करेंगे और फिर मां के पास चलेंगे।’

‘ठीक है, कल शाम को मैं तुम्हें मंदिर पर मिलूंगी।’

महेश ने सुषमा का हाथ थाम लिया।

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रघुनन्दन ने दरवाजा खोला। और सम्मान से बोले, ‘आपने मुझे याद किया साहब?’

‘रघुनन्दजी!’ मैनेजर में तम्बाकू भरता हुआ बोला‒ ‘हां हां, आइए, आइए।’

रघुनन्दन अन्दर आए और मैनेजर की इजाजत से उसके सामने कुर्सी पर बैठ गए। और दोनों हाथ मलने लगे। मैनेजर ने पाइप सुलगाया और एक गहरा कश लेकर रघुनन्दन की तरफ देखता हुआ बोला‒

‘रघुनन्दजी, आपकी उम्र क्या होगी?’

‘जी, कोई एक बरस ऊपर साठ।’

‘मतलब आप साठ-पैंसठ वर्ष के जरूर होंगे?’

‘मगर साहब मेरी उम्र...मैं समझा नहीं?’

‘बड़ी मुश्किल आन पड़ी है, रघुनन्दजी, मेरा दिमाग ही काम नहीं कर रहा।’

‘कैसी मुश्किल साहब?’ रघुनन्दन का चेहरा फक्क पड़ गया।

‘आप तो जानते हैं, यह प्राइवेट फर्म है। सरकारी मुलाजिमों को तो साठ वर्ष की आयु में ही रिटायरमेन्ट मिल जाता है। हमारे मालिक रहमदिल इन्सान हैं। खुद भी अस्सी वर्ष के लगभग हो गए हैं, इसलिए कम ही दफ्तर आते हैं। उनका बेटा उच्च शिक्षा के लिए अमरीका गया हुआ था। वहां से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन का डिप्लोमा लेकर आया है। शायद महीने से चार्ज सम्भालेगा।’

मैनेजर ने रुककर पाइप का कश लिया और रघुनन्दन का ऊपर का सांस ऊपर रह गया और नीचे का नीचे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने गला तर करके कहा, ‘फिर?’

मैनेजर ने बुझा पाइप दोबारा सुलगाया और बोला‒

‘दरअसल वह नौजवान है। अमरीका से आया है। उसके ख्यालात बड़े मॉडर्न हैं। उसका कहना है कि हमारे देश में पढ़े-लिखे नौजवानों की बेकारी का वास्तविक कारण यह है कि साठ वर्ष से बड़ी उम्र के बूढ़े भी अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपक रहते हैं। जिस तरह सरकारी कर्मचारियों को साठ वर्ष की उम्र में नौकरी से रिटायर्ड कर दिया जाता है, उसी तरह प्राइवेट फर्मों में भी होना चाहिए। क्योंकि बूढ़े लोग उतनी तेजी से काम भी नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप फर्मों का मुनाफा भी एक जगह ठहर जाता है। अगर बूढ़ों की बजाय नौजवानों को नौकरी दे दी जाए तो बेकारी की समस्या भी हल हो जाए और देश की तरक्की की गति भी तेज हो जाए।’

रघुनन्दन इस तरह सन्नाटे में बैठे रह गए जैसे उनके पूरे बदन की जान ही निकल गई हो। वह आंखें फाड़े मैनेजर की तरफ देख रहे थे। मैनेजर ने फिर पाइप का कश लिया और बोला‒

‘पता नहीं क्यों, आपसे और आपके परिवार से इतनी हमदर्दी हो गई है। मैं सोचता हूं भगवान् न करे उसकी निगाहें आपकी कुर्सी पर पड़ गई तो क्या होगा। आपकी तीन-तीन बेटियां हैं और लड़का भी अभी बहुत छोटा है।’

‘नहीं-नहीं।’ रघुनन्दन हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए‒ ‘भगवान के लिए ऐसा मत कहिए, मैनेजर साहब। वरना मेरा तो पूरा परिवार बरबाद हो जाएगा।’

‘भगवान् न करे कि ऐसा हो। मैं इसी समस्या का तो कोई ढूंढ़ रहा हूं।’

‘मैनेजर साहब।’ रघुनन्दन हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए‒ ‘आप चाहें तो मेरी लड़की नौकरी कर सकती है।’

‘देखिए रघुनन्दनजी, जिस तरह आप फर्म के नौकर हैं, मैं भी नौकर ही हूं, बस फर्क इतना है कि आप हैड क्लर्क हैं और मैं मैनेजर। हां, इतना जरूर है कि बॉस का लड़का किसी जमाने में एम. काम. करते हुए मेरा क्लासफैलो रह चुका है। शायद मेरी बात मान ले।’

‘मैनेजर साहब, वह आपकी बात जरूर मान लेंगे।’

‘मगर कितने दिन के लिए? साल दो साल के लिए एक्सटेंशन मिल जाएगा। साल दो साल में न आपकी बेटियों की शादी हो सकती है, न पप्पू की पढ़ाई खत्म हो सकती है।’

‘फिर, फिर मैं क्या करूं?’

‘देखिए,’ मैनेजर ने कहा, ‘मेरे ख्याल से इसमें कोई हर्ज नहीं है।’

‘किस बात में?’

‘आपका बेटा कौन-सी क्लास में है?’

‘मैट्रिक में।’

‘फिर लड़का जहीन भी मालूम होता है। उसे आप एम. काम. तक पढ़ाकर मेरे द्वारा ही इस फर्म में असिस्टैंट मैनेजर लगवा सकते हैं। उसके बाद वह आपका बोझ आराम से सम्भाल लेगा। एक साल के लिए तो मैं आपका एक्सटेंशन कराने का भी जिम्मा लेता हूं। इस दौरान आपकी छोटी बेटी ग्रेजुएशन कर लेगी। बाई दी वे, क्या उम्र होगी सुषमा की?’

‘सत्रह साल के लगभग।’

‘तो फिर किस बात की चिन्ता है! आजकल सरकार ने वैसे भी लड़की की शादी अठारह साल की उम्र से पहले न करने का बिल पास कर दिया है। एक साल आप नौकरी कर लें। फिर मैं आपकी लड़की सुषमा को बाकी सालों के लिए अपनी स्टैनों की नौकरी दिलवा दूंगा। वैसे भी आजकल लड़कियों का नौकरी करना बुरा नहीं समझा जाता। आजकल के लड़के ऐसी लड़कियों की शादी करना ज्यादा पसन्द करते हैं जो नौकरी भी करती हों। इस तरह परिवार की इनकम दुगनी हो जाती है।’

‘मगर उसे न तो टाइप आती है, न शार्टहैण्ड।’

‘एक साल काफी है, इसके लिए। तब तक के लिए तो आपकी एक्सटेंशन हो जाएगी। कल ही केदार से कह दूंगा कि ऑफिस सम्भालते वक्त छंटनी में आपका ख्याल रखे।’

‘आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मगर...।’

‘मगर क्या?’

‘अरे वो, बीस हजार के फन्ड की बात।’ मैनेजर ने हंसकर कहा, ‘अब आपके यहां खाना खाकर आया हूं, क्या आपका इतना काम भी नहीं कर सकता।’

‘जी।’ रघुनन्दन के हाथ से खुशी के मारे छड़ी गिरते-गिरते बची।

‘अरे, इस सिलसिले में तो मैंने केदार के कानों तक बात ही नहीं पहुंचने दी थी। मैंने बड़े मालिक से ही बात कर ली थी। वह भी आपकी बहुत इज्जत करते हैं। उन्होंने तुरन्त ही बीस हजार का चेक आपके नाम काट कर दे दिया था।’

फिर मैनेजर ने अपना बैग खोला। और चेक ढूंढने लगा। रघुनन्दन बैठे देखते रहे। मैनेजर ने कहा‒

‘शायद घर रह गया है.... ओह मेरे बंगले में रह गया है।’

‘कोई बात नहीं साहब, कल ले लूंगा मैं।’

‘कल!’ मैनेजर ने कहा’ ‘जनाब कल तो दफ्तर आने से पहले उसे अपने बैंक में डाल दीजिएगा, ताकि परसों तरसों तक तो कैश हो जाए। कोई भरोसा नहीं, चेक बुक केदार के हाथ में पड़ जाय तो वह स्टॉप पेमेन्ट कर दे।’

‘नहीं।’ रघुनन्दन का दिल बैठने लगा, फिर तो मैं इसी वक्त आपके साथ चलूंगा आपकी कोठी।’

‘यही तो गड़बड़ है। छुट्टी के बाद मैंने एक दोस्त को सी ऑफ करने एयरपोर्ट पर जाना है। वहां से सात-साढ़े साल बजे तक लौटूंगा। बेहतर हो, कोई सात और साढ़े सात बजे के दरम्यान मेरी कोठी से चेक ले ले, वरना उसके बाद मैं आठ बजे पार्टी में चला जाऊंगा।’

‘जी, तो मैं सात और साढ़े सात बजे के दरम्यान आ जाऊंगा।’

‘आप आ जाएं, कोई बात नहीं।’

‘जी शुक्रिया।’ रघुनन्दन उठने लगे।

‘मगर ठहरिए।’ मैनेजर ने पाइप की राख झाड़ते हुए कहा।-

‘आप एक काम कीजिएगा।’

‘वह क्या है?’

‘सुषमा को भेज दीजिएगा, वह चेक ले जाएगी।’

‘सुषमा।’ रघुनन्दन के मस्तिष्क को झटका सा लगा।

‘हां।’ मैनेजर ने जोरदार कहकहा लगाकर कहा, ‘हां, बच्चों को दो दिन की छुट्टी हुई थी, मेरी पत्नी और साली बच्चों के साथ नागपुर से आ गई हैं। मैंने उन्हें सुषमा के लतीफे सुनाए तो वे हंसते-हंसते बेहाल हो गई। बड़ा शौक पैदा हो गया है, उनके दिल में सुषमा से मिलने का।’

‘ओह।’ रघुनन्दन ने ठण्डी सांस ली और बोला, ‘ठीक है, मैं सुषमा को भेज दूंगा।’

फिर वह उठकर बाहर निकल आए और मैनेजर पाइप में नया तम्बाकू भरता हुआ बुड़बुड़ाया‒

‘सुषमा!’

फिर वह पाइप सुलगाने लगा।

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‘सात बजे।’ सुषमा ने चौंककर कहा, ‘मगर सात बजे कैसे जा सकती हूं।’

‘क्यों?’ रघुनन्दन ने पूछा।

‘वोह-वोह सात बजे मेरी एक सहेली की सगाई है ना।’

‘सुषमा, तुम्हें सहेली की सगाई ज्यादा पसन्द है या बहनों की विदाई।’

‘मगर-बाबूजी...।’

‘सुषमा, किसी तरह से वह चेक सुबह मेरे एकाउन्ट में जमा हो ही जाना चाहिए। वरना केदार की नजर पड़ गई तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। सब किया धरा खाक में मिल जाएगा। आजकल अच्छे लड़के मिलते ही कहां है!’

‘मगर आप क्यों नहीं चले जाते?’

‘इसलिए कि मैनेजर ने तुझे बुलाया है।’

‘मुझे क्यों?’ सुषमा चौंक पड़ी।’

‘उसकी पत्नी और साली आई हुई हैं। मैनेजर ने उन्हें तेरी शरारतें सुनाई हैं। वे तुझसे मिलना चाहती हैं और फिर इस समय मैनेजर को नाराज करना ठीक नहीं। वह मुझे एक साल की एक्सटेंशन दिलवा रहा है, और तुझे बारह सौ रुपये महीने की तनख्वाह भी मिलने लगेगी, उनके द्वारा।’

सुषमा ने संध्या और रजनी की तरफ देखा। उसे ऐसे लगा जैसे उनकी निगाहें खुशामद कर रही हैं, चली जा बहन, अगर चेक रुक गया तो कहीं हमारी विदाई न रुक जाए।’

सुषमा ने एक लम्बी और ठण्डी सांस ली और बोली,

‘ठीक है, मैं चली जाऊंगी, मगर इतनी जल्दी मैं बस से कैसे पहुंच सकती हूं। वैसे भी बारिश हो रही है, अगर चेक भीग गया तो?’

‘यह ले रुपए, टैक्सी में चली जाना।’

सुषमा ने दस-दस के दो नोट रघुनन्दन से लिए। फिर चुपचाप बाहर निकल आई। उसकी कल्पना में महेश का चेहरा घूम रहा था। थोड़ी देर बाद उसकी टैक्सी सड़क पर दौड़ रही थी। उसका दिमाग जैसे हवा में उड़ रहा था। टैक्सी का रुख महालक्ष्मी मन्दिर की तरफ ही था। बारिश की रफ्तार अभी तेज नहीं थी। ड्राइवर विंड-स्क्रीन साफ करता चल रहा था। वाइपर की खट-खट उसे अपने दिमाग पर हथौड़ों की तरह लग रही थी।

थोड़ी देर बाद टैक्सी महालक्ष्मी के मन्दिर के पास रुकी और सुषमा ने ड्राइवर से कहा, ‘कुछ मिनट ठहरो, फिर मैं तुम्हारे साथ चलूंगी।’

सुषमा टैक्सी से उतरी। बारिश से बचने के लिए भागते हुए सीढ़ियों तक पहुंची, जहां महेश बेचैनी से उसकी राह देख रहा था। उसके हाथ में दो हार थे। एक डिबिया सिन्दूर। उसने आगे बढ़ती हुए बेचैनी से कहा‒

‘तुम आ गई, सोच रहा था कि कहीं बारिश की वजह से गड़बड़ न हो जाए।’

‘मैं तो आ गई हूं, मगर यह शादी आज नहीं हो सकेगी।’ सुषमा ने कहा।

‘क्यों?’ महेश चौंक पड़ा, ‘मैं तो हार, सिन्दूर, पोशाक सब ले आया हूं।

‘आज मुझे एक जरूरी काम पड़ गया है।’

‘क्या इस जरूरी काम को एक घण्टे के लिए नहीं टाला जा सकता?’

‘उस काम को तो नहीं टाला जा सकता। अगर तुम आज ही चाहते हो तो फिर एक घण्टा मेरी इन्तजार करो। मैं एक घण्टे बाद आ जाऊंगी।’

‘मैं एक घंटा तो क्या दस जन्म इन सीढ़ियों में तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं। मगर तुम यह तो जानती हो कि मेरी मां के लिए एक-एक पल कीमती है। हर पल के साथ मौत उनकी तरफ बढ़ रही है।’

‘मैं जानती हूं, मगर भगवान, इतना बेरहम भी नहीं है। सिर्फ एक घंटे के इंतजार से तुम्हारा प्रोग्राम खराब हो सकता, मगर मेरे न जाने से मेरी दोनों बहनों की शादी रुक जाएगी।’

‘शादी।’ महेश चौंक पड़ा‒ ‘कहां जा रही हो तुम?’

‘बाबूजी के मैनेजर के घर।’

‘क्यों?’ महेश ने उसके दोनों बाजू पकड़ कर कहा, ‘वहां जाने से तुम्हारी बहनों की शादियों का क्या सम्बन्ध है?’

‘प्रेमी बहुत शक्की होते हैं,’ सुषमा ने मुस्कराकर कहा।

सुषमा ने महेश को पूरी बात सुना दी। महेश के चेहरे के रंग बदलते रहे। यह सुषमा के बाजू को पूरी ताकत के साथ पकड़कर बोला, ‘नहीं, सुषमा नहीं, मैं तुम्हें वहां नहीं जाने दूंगा।’

‘कैसी बातें करते हो तुम? मैं न गई तो हमारा परिवार तबाह हो जाएगा। सुबह अगर चेक केदार की नजर में आ गया तो मेरी दोनों बहनों की शादी रुक जाएगी। मैनेजर बाबूजी को एक साल की एक्सटेंशन नहीं दिलवाएगा। न मुझे नौकरी मिलेगी।’

‘सुषमा, जब हम दोनों एक-दूसरे के हैं तो हमारे दुख-दर्द एक दूसरे के हैं। आज मेरी बात मान लो सुषमा। मैं मेहनत मजदूरी करूंगा और तुम्हारी बहनों के हाथ मैं पीले करूंगा। तुम्हारे भाई की शिक्षा मैं पूरी करवाऊंगा। मेरे होते हुए तुम्हें नौकरी हरगिज नहीं करनी पड़ेगी। तुम्हारे बूढ़े बाबूजी मेरे पिता के समान मेरे कन्धों का बोझ होंगे।’

‘महेश, अगर मुझे विश्वास होता कि मैं यह सब बोझ तुम्हारे पर डालकर तुम्हें कोई दुःख नहीं दे रही तो सहर्ष तुम्हारी बात मान लेती। मगर मैं जानती हूं कि अभी तुम्हारी बाजुओं में इतनी शक्ति नहीं है। अभी तुम्हें खुद के सहारे की जरूरत है। जिस दिन तुम अपना सपना पूरा कर लोगे, मैं स्वयं अपना बोझ तुम्हारे ऊपर डाल दूंगी।’

‘सुषमा, मैं तुम्हें कैसे समझाऊं?’

‘क्या समझाना चाहते हो मुझे?’

‘सुषमा, यह वही मैनेजर है, जिसने खुद फरमाइश कर के तुम्हारे यहां दावत खाई थी। यह वही मैनेजर है जो तुम्हारी शरारतों से खुश हो रहा था। यह वही मैनेजर है, जिसने तुम्हारी बहनों की शादी के लिए बीस हजार का इंतजाम कर दिया है फिर उसने कह दिया है कि तुम्हारे पिता को वृद्ध हो जाने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाएगा, मगर वह उन्हें एक साल का एक्सटेंशन भी दिलवा देगा। और तुम्हें भी नौकरी दिलवाएगा। आज वह अपनी पत्नी और साली से मिलवाने के लिए तुम्हें घर बुला रहा है। सुषमा, क्या तुम्हें उसकी नीयत में जरा-सा भी खोट का अहसास नहीं होता?’ ‘महेश! सुषमा सीने पर हाथ रखकर बोली, ‘मैं तुम्हारी एक-एक बात समझ रही हूं, मगर शायद तुम यह भी अच्छी तरह समझते हो कि मैं लड़की जरूर हूं, मगर सही वातावरण और आदमी की नजर पहचान लेती हूं।’

‘सुषमा, और कितनी भी अक्लमंद क्यों न हो, मगर मर्द कभी-कभी उसकी अक्ल के कारण रावण की तरह सीताहरण भी कर लेता है।’

‘महेश मुझे देर हो रही है, तुम मेरा यहीं इंतजार करना।’

‘ठीक है।’ महेश ने एक ठंडी लम्बी सांस ली और बोला, ‘मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करूंगा, मगर मेरी एक बात याद रखना, तुम्हें अपने महेश के पास आना जरूर है, यह याद रहे, मैं तब तक तुम्हारी राह देखूंगा, जब तक तुम मेरे पास न आ जाओगी, कैसी भी हालत में, किसी भी हालत में।’

सुषमा ने एक बार गौर से महेश को देखा, फिर तेजी से टैक्सी की ओर बढ़ गई।

9

टैक्सी मैनेजर की कोठी के कम्पाउंड में दाखिल हो रही थी और बार-बार बिजली भी कड़क रही थी। बादल भी गरज रहे थे। सुषमा ने ड्राइवर से कहा‒

‘बस, थोड़ी देर ठहरो, मैं वापस महालक्ष्मी मन्दिर जाऊंगी।’

‘वैल, मेम साहब।’ ड्राइवर ने कहा, ‘अपुन को आगे जाना है।’

‘मगर मुझे वापस जल्दी पहुंचना है।’

‘मेम साहब, मैं तो माफी चाहता हूं।’

सुषमा ने उतरकर किराया अदा कर दिया। टैक्सी चली गई। फिर सुषमा ने डरते-डरते घण्टी का बटन दबाया, अंदर आवाज गूंजी। फिर कदमों की चापें गूंजीं और किसी ने दरवाजा खोलां सामने ही मैनेजर खड़ा हुआ था जो जल्दी-से बोला, ‘ओह सुषमा तुम आ गई, आओ आओ।’

‘नमस्ते।’ सुषमा ने अंदर दाखिल होते हुए कहा।

‘आओ, आओ, डरती क्यों हो? हम लोग तुम्हारी ही राह देख रहे थे।’ सुषमा डरते-डरते अंदर दाखिल हुई। मगर किसी तरफ से औरतों और बच्चों की बातें करने और कहकहों की आवाजें सुनकर उसकी जान में जान आई। मैनेजर ने सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘बैठो-बैठो।’

‘जी मुझे जरा जल्दी है।’

‘थोड़ी देर तो इंतजार करना पड़ेगा। मेरी पत्नी, साली और बच्चे खाना खा रहे हैं, ड्राइंग-रूम में। अरे, हां तुम खाना खाओगी?’

‘जी नहीं, मैं वापस जाकर खाऊंगी।’

‘अच्छा, एक कप चाय तो पीनी ही पड़ेगी।’

‘जी, तकल्लुफ की जरूरत नहीं।’

‘अरे वाह, रघुनन्दनजी क्या कहेंगे, मेरी बेटी को चाय तक को नहीं पूछा। घबराओ मत चाय में कोई मजाक नहीं होगा।”

फिर उसने कहकहा लगाया और ड्राइंगरूम की तरफ चला गया। ड्राइंग रूम में पहुंचकर उसने कनखियों से बाहर देखा। फिर अंदर टेबल पर रखे टेप रिकार्डर को देखा, जिसका स्विच ऑन था और औरतों व बच्चों की आवाजें उसमें से ही आ रही थीं। फिर उसने जल्दी-जल्दी एक प्याली चाय निकाली और उसमें एक गोली डालकर हिलाने लगा, फिर वह चाय लेकर बाहर आया तो सुषमा जल्दी से उठकर खड़ी हो गई।

‘अरे, आपने तकलीफ क्यों की?’

‘क्या बताऊं यह नौकर कभी-कभी वक्त पर धोखा दे जाते हैं। पति-पत्नी नौकर हैं, आज सिनेमा देखने गए हैं।’ फिर उसने ड्राइंग-रूम की तरफ मुंह करके कहा, ‘अरे सरला, जरा जल्दी खा लो, इन्हें जल्दी जाना है।’

सुषमा ने चाय का घूंट लेकर कहा, ‘यहां कोई टैक्सी तो इस समय मिलेगी नहीं।’

‘क्यों, बसें तो थोड़ी-थोड़ी देर के बाद जाती हैं।’

‘मुझे दरअसल महालक्ष्मी मन्दिर जाना है। मेरी एक सहेली, वहां मेरा इंतजार कर रही होगी। उससे कुछ जरूरी काम था।

‘कोई बात नहीं, मैं कार में पहुंचा दूंगा।’

सुषमा चाय पीती रही और मैनेजर, जिसका नाम प्रेम था, उसे बातों में उलझाए रहा। आहिस्ता-आहिस्ता सुषमा को अपना बदन सनसनाता हुआ महसूस होने लगा। सिर इस तरह नीचे आया, जैसे भारी होकर लुढ़क गया हो। उसने झटके से सिर को झटका और आंखें फाड़कर बोली‒

‘यह मुझे चक्कर क्यों आ रहे हैं?’

‘तुम्हें नशा हो रहा है।’ प्रेम आराम से बोला।

‘नशा।’ सुषमा हड़बड़ाकर खड़ी होने लगी। प्याला उसके हाथ से गिर और झनझनाकर टूट गई। टुकड़े-टुकड़े हो गई।

प्रेम ने कहा, ‘घबराओ मत, चाय में एक गोली थी और उसका नशा आधे घंटे से ज्यादा नहीं रहता। बस सरूर आता रहता है।’

फिर वह हंसने लगा। सुषमा को ऐसे लगा जैसे कोई राक्षस हंस रहा हो। वह बुदबुदा कर बोली‒ ‘नहीं, नहीं। यह नहीं हो सकता।’

‘भोली लड़की।’ प्रेम मुस्कुराता हुआ बोला, ‘हर लड़की के साथ ऐसा होता है। और तेरे जैसी कातिल अदाओं वाली लड़की के लिए जाने कितने लोग पागलों की तरह तड़पते होंगे।’

‘आपको शर्म नहीं आएगी, आपकी बीवी-बच्चे?’

‘हां हां, उनसे पूछ लो।’

सुषमा बेसाख्ता ड्राइंग रूम की तरफ दौड़ी। मगर ड्राइंग-रूम में टेबल पर रखा टेप रिकार्डर देखकर उसे अपने पैरों के नीचे से जमीन निकलती हुई महसूस हुई। वह झटके से पलटी तो सामने प्रेम खड़ा मुस्करा रहा था। सुषमा ने पीछे हटते हुए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाकर कहा‒

‘मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूं, भगवान् के लिए मेरे ऊपर रहम खाइए। मेरी पवित्रता को भंग मत कीजिए वरना मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी।’

‘पगली, पाप और कलंक वह कहलाता है, जिसका भेद खुल जाए। यह बात तो मेरे और तुम्हारे सिवा किसी तक नहीं पहुंचेगी।’

‘मगर-मगर भगवान् की नजर से कुछ नहीं छिपा।’

‘भगवान् क्या धरती पर आकर गवाही देते हैं?’

‘मैं कहती हूं, मुझे जाने दीजिए।’

‘बेवकूफ, मैं तुम्हारे लिए इतना कर रहा हूं, उसका कुछ बदला तो मुझे मिलना चाहिए।’

‘नहीं-नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए।’

‘तुम्हारी बहनों की शादी रुक जाएगी।’

‘रुक जाने दीजिए।’

‘तुम्हारा भाई पढ़ नहीं सकेगा।’

‘वह मजदूर बन जाएगा।’

‘पागल लड़की, तुम अहम हो सकती हो कि इतने फायदे गंवा दो। तुम्हारी पहली झलक ने ही मेरे दिल में एक जलता हुआ तीर-सा घोंप दिया था। तुम्हारे चंचल हिरणी जैसी आंखें मेरे शरीर में तीरों की तरह चुभ रही थीं। तुम्हारे कहकहे मेरी आत्मा में जलतरंग बजा रहे थे। भला ऐसी हालत में मैं तुम्हें कैसे छोड़ सकता हूं।’

प्रेम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था और सुषमा धीरे-धीरे गिड़गिड़ाती हुई पीछे हटती रही।

‘जाने दीजिए, भगवान् के लिए मुझे जाने दीजिए।’

फिर प्रेम ने झपटकर उसे दबोच लिया। उसके गले से एक तेज चीख निकली जो बादल की गरज में गुम हो गई। फिर प्रेम ने बेहोश सुषमा को बड़े आराम से बाजुओं पर उठाया और धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

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सुषमा का नशा पूरी तरह उतर चुका था। उसका चेहरा इस तरह सपाट था जैसे उसके दिल में कोई भावना ही न हो। उसने बड़े सुकून से साड़ी बांधी। फिर प्रेम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा-

‘बाल भी संवार लो।’

सुषमा ने चुपचाप कंघी उठाई और आईने के सामने बाल ठीक करने लगी। अपना पर्स उठाया। प्रेम से बोली- ‘बीस हजार का चेक?’

‘चेक-हां, यह लो।’

फिर प्रेम ने चेक उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने चेक लेकर पर्स में रखा और गम्भीरता से बोली-

‘मेरे, यहां आने का पता और किसी को तो नहीं था?’

‘नहीं, सिवा तुम्हारे बाबूजी के।’

‘यहां के किसी नौकर को भी पता नहीं था?’

‘नहीं, मगर तुम यह सब क्यों पूछ रही हो?’

‘यूं ही, क्या आप मुझे कार में छोड़ने नहीं जाएंगे?’

‘महालक्ष्मी मन्दिर?’

‘नहीं, अब वहां नहीं घर जाना है। देर हो चुकी है।’

‘चलो, जरूर छोड़ने चलूंगा।’

प्रेम उसके साथ बाहर आया। कार बरामदे में ही खड़ी थी। प्रेम ने स्टीयरिंग सम्भाला और सुषमा उसके बराबर बैठ गई। कार सड़क पर दौड़ने लगी। उसके चेहरा झुका हुआ था और उसके कानों में महेश के वाक्य गूंज रहे थे‒ ‘मैं तुम्हें वहां हरगिज नहीं जाने दूंगा।’

‘औरत कितनी भी चतुर क्यों न हो, कभी-कभी कोई रावण उसे छल देने के लिए सोने का हिरण भी भेज देता है।’

‘वह इतने लालच दे रहा है, क्या तुम इस सबका मतलब नहीं समझती?’

पर यह सब महेश ने कहा था, जिसने प्रेम की सूरत तक नहीं देखी थी। मगर बाबूजी, वह तो वर्षों से फर्म में काम कर रहे हैं। वह जान-बूझकर प्रेम को धार पर लाए थे, मुझे दिखाने के लिए। संध्या और रजनी को ब्याहने के लिए उन्होंने मेरी पवित्रता का बलिदान दिया। पप्पू को पढ़ाने के लिए भी मुझसे ही नौकरी कराना चाहते हैं। आज- आज उन्होंने जिद करके भेजा था। क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी बहनों की शादी रुक जाए। मैनेजर साहब नाराज हो गए तो मेरी नौकरी चली जाएगी। और बाबूजी ने मैनेजर को खुश करने के लिए अपनी बेटी की पवित्रता भेंट चढ़ा दी। क्या कोई बाप सचमुच इतना स्वार्थी हो सकता है? जाने क्यों उसके दिल में धीरे-धीरे बाबूजी के लिए नफरत उभरने लगी।

बारिश अब भी तेज थी। सड़क सुनसान पड़ी थी। बहुत दूर किसी गाड़ी की दो रोशनियां नजर आ रही थीं जो इधर आ रही थी। सुषमा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने प्रेम को देखा जो इस वक्त बड़ी मुस्तैदी से स्टीयरिंग घुमाता हुआ पूछ रहा था- ‘तुम काफी समझदार मालूम होती हो।’

‘जी।’

‘अच्छा अब कब मुलाकात होगी?’

‘आकाश पर।’

‘क्या मतलब?’

अचानक सुषमा ने प्रेम के घर से ही उठाया हुआ चाकू खोला और उसका फल प्रेम की गर्दन में घोंप दिया। प्रेम के दोनों पांव तन गए और उसके मुंह से फरफराहट निकलने लगी। एक्सीलरेटर पर पांव का दबाव बढ़ जाने से गाड़ी फर्राटे भरने लगी। सुषमा ने बड़ी फुर्ती से दरवाजा खोलकर बाहर छलांग लगा दी। वह अपने ही जोर में काफी दूर तक लुढ़कती चली गई और छपाक से पानी के गड्ढे में गिरी। दूसरी तरफ उसने देखा प्रेम की गाड़ी एक सामने से आती हुई बस से टकराते-टकराते बची थी। बस वाला बचाकर तेजी से निकला चला गया था। फिर प्रेम की कार फुटपाथ पर चढ़कर एक दुकान के अन्दर घुस गयी थी और उसमें से शोले निकलने लगे थे। बसवाले ने शायद डर के मारे पलटकर देखा भी नहीं था और इस तूफानी बारिश में और कोई वहां था भी नहीं। सुषमा ने बड़े आराम से चाकू का फल रगड़कर पोंछा और उसे पानी के गड्ढे में फेंक दिया। फिर बारिश के पानी से अपने हाथ और कपड़े धोए और दूसरी तरफ से निकल कर बस-स्टॉप की तरफ बढ़ने लगी।

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रघुनन्दन की घबराहट हर पल बढ़ती जा रही थी। ज्यों-ज्यों समय गुजरता जाता उन्हें यों महसूस होता जैसे कोई नुकीली चीज उनके दिल में गहरी उतरती जा रही हो। बार-बार उनके निगाहों में प्रेम का चेहरा घूम जाता। प्रेम का खुद कहकर यहां खाने पर आना। सुषमा की शरारतों से खुश होना। बीस हजार रुपये फन्ड में से दिलाने का वादा। सुषमा को चेक लेने के लिए बुलवाना। रघुनन्दन को हर पल गुजरने के साथ ऐसा लगता था जैसे वह धोखा खा गए हैं। सम्भवतः केदार द्वारा नौकरों की छटनी महज एक धोखा हो। यह भी हो सकता है कि प्रेम की पत्नी और बच्चे आए ही न हों। वह घर पर अकेली हो। हे भगवान्, यह मैंने क्या कर दिया?

तभी घड़ी ने रात के दस बजाए और उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके दिल पर घूंसे लग रहे हों। उन्होंने फुर्ती से छतरी उठाई और उसे खोल ही रहे थे कि संध्या ने जल्दी से पूछा-

‘कहां जा रहे हैं बाबूजी?’

‘सुषमा को देखने, आखिर अब तक आई क्यों नहीं?’

‘बाबूजी, वह अपनी किसी सहेली के यहां जाने को कह रही थी। शायद वहां देर लग गई होगी।’

‘या फिर,’ रजनी ने कहा, ‘आप देख रहे हैं कैसी तूफानी बारिश हो रही है, उसे आने के लिए कोई सवारी न मिल रही हो। भीगती हुई आती तो वह चेक भीग कर खराब हो जाता।’

‘कुछ भी हो, मैं देखता हूं।’

बाबूजी छतरी खोलकर जल्दी से बाहर निकल गए। वह बारिश में सिर्फ अपने सिर को बचा पा रहे थे। आंधी और हवा की तेजी के कारण उनका सारा बदन भीग गया था, मगर उनकी बेचैन नजरें इधर-उधर देखती जा रही थीं। वे आगे बढ़ते जा रहे थे। बड़ी सड़क पर पहुंचकर उन्होंने एक बस आते हुए देखी और वह उस फुटपाथ पर रुक गए। शायद सुषमा उसी बस में आ रही हो।

बस स्टॉप पर रुकी और उसमें से सिर्फ सुषमा ही उतरी। रघुनन्दन बेचैनी से सड़क पर लपकते हुए बोले- ‘सुषमा!’

मगर इस बेचैनी में वह दूसरी तरफ से आते हुए ट्रक को न देख सके। ट्रक ने उन्हें एक जोरदार टक्कर मारी और वह उछलकर गिरे। ट्रक उनकी दोनों टांगों पर से गुजरता चला गया। सुषमा कानों पर दोनों हाथ रखकर पागलों की तरह चिल्लाई- ‘बाबूजी!’

रघुनन्दन की आंखों के आगे अन्धेरा फैलता चला गया था।

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सुषमा ने बेचैनी से रघुनन्दन की तरफ देखा। फिर डॉक्टर की तरफ देखती हुई बोली- ‘डॉक्टर साहब, बाबूजी के जीवन को कोई खतरा तो नहीं।’

‘नहीं, मगर अब वह अपने पैरों पर कभी नहीं चल पाएंगे।’

सुषमा सन्नाटे में रह गई। संध्या, रजनी और पप्पू बिलबिलाकर रो पड़े थे। पप्पू रोता हुआ कह रहा था-

‘दीदी, बाबूजी बार-बार यही कह रहे थे कि छोटी दीदी अब तक क्यों नहीं आई।’

‘ठीक दस बजे तक बेचैनी से टहलते रहे थे।’ संध्या बोली।

‘फिर हमारे मना करने के बावजूद बेचैन होकर तुम्हें देखने को निकल पड़े थे।’

सुषमा के दिल की अजीब-सी हालत थी। वह सोच रही थी कि मैं बेकार ही बाबूजी की नीयत पर शक करने लगी थी। बिना कारण ही उनके प्रति अपने दिल में नफरत पैदा करने लगी थी। कोई भी बाप अपनी बेटी का इस तरह सौदा नहीं कर सकता। बाबूजी, ऐसे माहौल के भी तो नहीं। उनकी दुनिया भी तो दफ्तर से घर तक सीमित थी। प्रेम ने जरूर बाबूजी के भोलेपन और सादगी का फायदा उठाने की योजना बनाई होगी। तभी बाबूजी धीरे-धीरे कराहे। उनकी आंखें खुल गई। उनके सामने संध्या थी। बाबूजी ने सबसे पहले एक ही सवाल किया- ‘सुषमा कहां है?’

‘मैं यहां हूं बाबू जी,’ सुषमा की आवाज भर्रा गई।

‘बेटी-बेटी!’ बाबूजी ने बेचैनी से पूछा, ‘तू ठीक तो है बेटी? तुझे-तुझे इतनी देर क्यों हो गई थी?’

‘मैं अपने सहेली की सगाई में चली गयी थी बाबूजी।’

‘हे भगवान्! तेरा लाख-लाख शुक्र है।’

अचानक सुषमा बाबूजी के सीने पर सिर रखकर फूटफूटकर रोने लगी। बाबूजी भी रो रहे थे। साथ ही सुषमा की पीठ भी थपथपाते जा रहे थे। उन्हें न अपनी तकलीफ का अहसास था और न उन्होंने चेक के बारे में ही पूछा था।

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जानकीदास और उनके दोनों बेटे बाबूजी के बेड के गिर्द बैठे थे। जानकीदास बाबूजी का हाथ अपने हाथ में लेकर कह रहे थे‒

‘यह क्या हो गया रघुनन्दनजी? मैंने तो बच्चों की शादी का मुहूर्त तक निकलवा लिया था।’

‘जो होना होता है, वह होता ही है।’ बाबूजी ने फीकी मुस्कराहट के साथ कहा, ‘मगर आप इत्मीनान रखिए, आपने जो मुहूर्त निकलवाया है, शादी उसी मुहूर्त पर होगी।’

‘शुक्र है भगवान का।’ जानकीदास ने कहा, ‘मैंने तो लड़कों के लिए मकान तक भी देख लिए थे।’

‘वह सब इंतजाम हो गया है।’

सुषमा के दिल में जानकीदास के लिए गुस्से और नफरत की एक तेज लहर उठी। उसने संध्या और रजनी को देखा जो जानकीदास के लड़कों की तरफ पीठ करके बैठी हुई थीं, मगर बार-बार कनखियों से उन्हें देखती जा रही थीं। दोनों लड़के भी उन्हें देख कर मुस्करा रहे थे और सुषमा सोच रही थी यह वे बेटियां हैं, जिनका बाप जीवन-भर के लिए अपाहिज हो गया, मगर इन दोनों के चेहरों पर इस बात का जरा भी मलाल नजर नहीं आता। बल्कि उनके चेहरे खुशी से दमक रहे थे कि उनके लगन का शुभमुहूर्त नहीं बीतने पाएगा।

सुषमा को गहरी घुटन का अहसास होने लगा तो वह उठकर बाहर निकल आई। फिर वह बरामदे से उतर ही रही थी कि अचानक सामने महेश को देखकर ठिठक गई। अचानक उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई बहुत बड़ी इमारत रेत के ढेर की तरह धड़ाम-धड़ाम करके नीचे गिरी हो। महेश की आंखें सूजी हुई थीं। चेहरा उतरा हुआ था। शेव बढ़ी हुई थी। बाल बिखरे हुए थे। दोनों एक-दूसरे के सामने कुछ देर तक खड़े रहे। फिर महेश ने ही खामोशी तोड़ते हुए कहा‒

‘कल रात मां का स्वर्गवास हो गया।’

सुषमा को ऐसा लगा जैसे उसके सिर पर एक बहुत वजनदार पत्थर आ गिरा हो। मगर वह बुत बनी खड़ी रही। महेश ने पूछा‒

‘तुम्हें खबर करने तुम्हारे घर गया था। वहां बाबूजी के हादसे के बारे में मालूम हुआ। यह मेरे लिए दूसरा सदमा है। मैं जानता हूं, तुम्हारे दिल पर क्या बीत रही होगी।’

महेश और सुषमा ने एक-दूसरे को तसल्ली दी।

‘सुषमा मैं....’

‘देखिए।’ सुषमा ने बड़ी हिम्मत करके कहा, ‘शायद आपको कोई गलतफहमी हुई है। मैं वह सुषमा नहीं हूं, जिसे आप मिलने आए हैं।’

महेश ने बड़ी शान्ति से सुषमा की बात सुनी। उसके होंठों पर फीकी मुस्कराहट आई और फिर होंठों से शब्द निकले‒

‘कल रात जब मैं तुम्हें रोक रहा था, अगर तुम मेरी बात मान लेती तो आज तुम वही सुषमा होती, जिससे मैं मिलने आया हूं। कल रात तीन बजे तक मैंने मन्दिर में तुम्हारा इन्तजार किया था और उसके बाद मुझे विश्वास हो गया था कि दूसरी सुबह जब सूरज निकलेगा तो सुषमा का रूप दूसरा होगा मगर सिर्फ तुम्हारे लिए। मैंने तुम्हारे सुन्दर शरीर से प्यार नहीं किया था। और न प्यार शरीर से किया जाता है। अगर ऐसा होता तो या तो लोग भगवान् से प्यार न करते या फिर भगवान् का भी कोई शरीर होता। मैंने तुम्हें कहा था- दो-चार रोज क्या और जीवन-भर ही नहीं, कई जन्मों तक तुम्हारी राह देखूंगा। जिन्दगी बहुत बड़ी है। शहर की सुन्दर और पक्की इमारतें बहुत सख्त होती हैं, उनमें और गांव की कच्ची सड़कों में जमीन और आकाश का फर्क होता है। मैं जानता हूं कि एक रोज तुम इस जिन्दगी की दौड़ में जरूर थक जाओगी और जिस रोज तुम थक जाओ, बगैर किसी पशोपेश के, चुपचाप सुषमा बनके चली आना, दो बाजू और सिन्दूर की डिबिया तुम्हारा इन्तजार करते रहेंगे।’

आखिर में उसकी आवाज रुंध गई। आंखों से आंसुओं के दो कतरे टपके। फिर वह पलटा और धीरे-धीरे चलता हुआ फाटक की तरफ बढ़ने लगा। सुषमा के होंठ कांपे और उसके अन्दर से एक चीख निकली‒

‘ठहरो महेश, मुझे छोड़कर मत जाओ।’

मगर उसका सिर्फ हाथ उठ कर रह गया। उसके होंठों से आवाज न निकल सकी और अन्दर जैसे कोई सुषमा कह रही थीं‒

‘तुम कितने महान हो महेश, ऐसे मोतियों का हार गले में डालने को तैयार हो, जिनकी आब हमेशा के लिए उतर चुकी है। मैं इतनी खुदगर्ज नहीं कि भगवान् के कदमों में गन्दगी-भरे फूलों का चढ़ावा चढ़ाऊं।’

फिर उसने नीचे देखा। जहां महेश की आंखों से टपके दो आंसू गिरे थे। वह धीरे-धीरे नीचे झुकी। उसने आंसुओं के उन निशानों को छुआ और अपनी मांग से लगा लिया। उसकी आंखों से आंसुओं के दो कतरे निकले जो महेश के आंसुओं के निशानें पर गिर पड़े और उनमें मिल गए।

10

‘मिस सुषमा वर्मा।’ प्रिंसिपल ने कहा, ‘आप पास तो हो गई हैं, मगर आपका रिजल्ट इसलिए रोक लिया गया है कि आपके ऊपर छः महीने की फीस बाकी है। मैंने आपकी परेशानियों को देखते हुए आपको परीक्षा में बैठने की इजाजत तो दिलवा दी थी, मगर अब रिजल्ट और डिग्री तो मेरे बस की बात नहीं।’

‘मगर सर....।’

‘देखिए मिस सुषमा, यह पूरे साढ़े तीन सौ रुपए का मामला है।’

प्रिंसिपल ने कुर्सी की पुश्त से पीठ लगाते हुए कहा‒

‘जी, मुझे मालूम है, मगर‒’

‘देखिए, मैं कोई रास्ता निकालने की कोशिश करूंगा। आप ऐसा करें, आज शाम को छः-सात बजे मेरी कोठी पर आ जाएं। अगर कोई रास्ता न निकल सका तो मैं फिर अपने पास से ही किसी तरह दूंगा।’

बात खत्म करते-करते वह कुछ इस अंदाज में मुस्कराया था कि सुषमा को ऐसे लगा जैसे उसके मुंह से ढेर सारी गन्दगी निकल कर उसकी देह से चिपक गई हो और उसका दिमाग बदबू से फटा जा रहा हो। वह बड़ी तेजी से पलटकर बाहर निकली। उसके निकलते-निकलते पीछे से आवाज आई थी‒ ‘भूलिएगा मत, ठीक साढ़े छः और सात बजे के दरम्यान, उस समय मैं कोठी पर ही होता हूं।’

मगर सुषमा ने पलटकर नहीं देखा, वह बरामदे से उतरी तो उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। उसकी सांसें तेज तेज चल रही थीं। पास ही उसे लता नजर आई। उसने पुकारा, ‘अरे सुषमा, किधर को?’

सुषमा लता के पास जाकर रुक गयी और लता ने पूछा, ‘तेरा रिजल्ट रुक गया है?’

‘हां।’ सुषमा ने बड़ी मुश्किल से अपने पर काबू पाने की कोशिश की।

‘क्या फीस रह गई थी?’

‘हां, पूरे साढ़े तीन सौ रुपए।’

‘हूं।’ लता ने मुस्कराकर उसका हाथ पकड़ा और उसे बगीचे में ले जाती हुई बोली‒ ‘इस प्रिंसिपल ने तुम्हें कोई ऐसी पेशकश की होगी कि तेरा खून खौल गया होगा?’

‘बात मत कर उस कमीने की।’

‘पगली, इस जिन्दगी में तुझे न जाने ऐसे कितने कमीने मिलेंगे। अब क्या इरादा है तेरा?’

‘मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा।’

‘देखो, जब आदमी का अपना दिमाग काम न करे तो उसे अपने किसी हमदर्द से सलाह लेनी चाहिए।’

‘तो तू बता, क्लास में तेरे सिवा मेरा हमदर्द कौन है?’

‘तो फिर इधर आ, कान में सुन।’

सुषमा ने कान लता की तरफ बढ़ा दिया। लता ने चुपके-चुपके उसके कान में कुछ कहा और सुषमा का चेहरा गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने एक कदम पीछे हट कर लता के गाल पर एक जोरदार चांटा रसीद किया, जिसकी आवाज दूर तक गूंज गई। वह गुस्से-से कांपती हुई आवाज में बोली- ‘कमीनी! कुतिया! तू इतनी जलील निकलेगी, यह बात मैंने कभी सपने में भी न सोची थी।’

लता के चेहरे के भावों में जरा भी तब्दीली नहीं आई। न उसकी आंखों में गुस्सा झलका। इसके विपरीत उसने मुस्करा कर कहा-

‘जब पहली बार मुझे ऐसी सलाह मिली थी तो मैंने भी सलाह देने वाली के गाल पर चांटा मारा था और फिर तीसरे दिन उससे माफी मांगनी पड़ी थी। मगर मैं तुझे माफी मांगने को नहीं कहूंगी। जब तुम्हें महसूस हो जाए कि मेरी सलाह गलत नहीं थी तो चुपचाप मेरे पास चली आना।’

सुषमा ने गुस्से से उसकी तरफ थूक दिया और तेजी से बाहर निकल गई।

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