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‘आज यह चीजें मेरी तनख्वाह में तो हो नहीं सकती थीं। होतीं थी तो सालों लग जाते, इसलिए आशा ने सुझाव दिया कि क्यों न वह नौकरी कर ले। मुझे आशा के चरित्र पर विश्वास था। आशा ने जब नौकरी की इच्छा व्यक्त की तो उसकी आंखों में ऐसी कोई भावना नहीं आती थी कि वह अपनी आजादी के लिए नौकरी की इच्छुक है।
‘हम लोगों ने अखबारों में कॉलम देखने शुरू कर दिए। फिर आशा को एक कांवेंट स्कूल में नौकरी मिल गई, जहां वह एक ही साल में तरक्की करते-करते प्रिंसिपल बन गई। हम दोनों के घर का नक्शा बदल गया। हम लोगों का जीवन स्वर्ग बन गया, मगर...।
‘मगर अचानक लगभग पंद्रह-बीस दिन से आशा कुछ बदली-बदली सी और खोई-खोई नजर आने लगी। कई बार देर से भी घर आई। मेरे पूछने पर उसने बहाना बना दिया कि कुछ काम निकल आया था या कोई गेस्ट आ गया था। या कोई एक्स्ट्रा क्लास लेनी पड़ गई। लेकिन बहानों के समय उनमें जोर नहीं होता था। वह बात मैंने हमेशा महसूस की। और इससे पहले कि कोई तूफान आए, मैंने आशा के सामने बगैर उसकी तब्दीलियों का अहसास दिलाए, यह सुझाव दिया कि अब घर में जरूरत की हर चीज आ चुकी है। वैसे भी अब हमारे मुन्ने को मां की ममता की जरूरत है। और मैं खुद इंजीनियर बनने वाला हूं। अतः वह नौकरी छोड़ दे। आशा ने तुरंत वादा करने की बजाए कह दिया कि मैं सोचूंगी। तब मेरा माथा ठनका।’
‘फिर एक रोज मैं दफ्तर के बहाने घर से निकला और लंच टाइम में दफ्तर छोड़कर, कार भी वहीं छोड़कर टैक्सी में आशा के स्कूल के पास पहंचकर रुक गया। आशा छुट्टी से कुछ समय पहले बाहर निकली। वह बहुत खुश और फूल की तरह खिली हुई थी और उसके साथ स्कूल मैनेजर सूरी भी था। वह एक तीस-बत्तीस साल का सुन्दर और स्वस्थ युवक था। आशा-उसके साथ कार में बैठी और मैंने टैक्सी में उसका पीछा किया। सूरी आशा को एक ऐसे होटल में ले गया, जहां सिर्फ आठ घंटे के लिए रूम मिलेगा। रूम भी छोटे-छोटे केबिनों की शक्ल में होते हैं।
‘मैंने साथ वाला रूम बुक लिया। मैनेजर ने हैरानी से पूछा मैं अकेला कमरा लेकर क्या करूंगा। मैंने बताया कि थोड़ी देर बाद, मेरी गर्ल-फ्रेंड आने वाली है। वह मेरा नाम पूछे तो रूम-नंबर बता देना। फिर थोड़ी देर बाद मैं बराबर वाले रूमनुमा केबिन में था। आशा और सुरी का वार्तालाप साफ-साफ-सुन रहा था। उनके वार्तालाप से स्पष्ट था कि सूरी शुरू से ही आशा पर जाल फेंक रहा था और कहता था कि मैंने इससे पहले भी उसे कहीं देखा है। फिर उसने आशा को अखबारों की कुछ घटनाएं सुनाई। कुछ सुनेे हुए किस्से सुनाए और उसने आशा के दिमाग में यह बात अच्छी तरह बिठा दी कि आशा और वह पिछले जन्म में भी प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी थे। मैंने सूरी के केबिन में व्हिस्की और खाने के सामान जाते देखे। सूरी ने आशा को व्हिस्की ऑफर की, मगर आशा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि उसके पति को संदेह हो जायगा। मगर दोनों में यह निर्णय हुआ कि प्यार करने वालों का प्यार जन्म-जन्म का होता है, मगर आशा इस जन्म में मुझे अपने बच्चे की वजह से नहीं छोड़ सकती। न सूरी अपनी पत्नी और दो बच्चों को छोड़ सकता है, इसलिए दोनों इसी तरह छिप-छिपकर मिलते रहेंगे। सूरी अपनी पत्नी पर यह भेद नहीं खुलने देगा और आशा मुझसे सब-कुछ छिपाकर रखेगी। वह नौकरी छोड़ने के बाद भी सूरी से सम्बन्ध रखने का इरादा रखती थी।
‘फिर दूसरे केबिन में लगभग एक घंटे तक खामोशी और अंधेरा रहा। मैं सिर्फ कपड़ों की सरसराहट और कभी-कभी सिसकारियां सुनता रहा। एक घंटे के बाद केबिन में रोशनी हो गई। आशा ने कहा, वह टैक्सी से घर जायेगी। मैंने सूरी की कार देखी थी कि उसने कहां पार्क की है। इससे पहले कि सूरी कार में पहुंचता, मैं उसकी कार तक पहुंच गया और अंधेरे में छिप गया। सूरी ने पहले कार का लॉक खोला, फिर एक जगह पेशाब करने के लिए खड़ा हो गया।
‘मैंने चुपके से उसकी कार का पिछला दरवाजा खोला और पिछली सीट पर छिप गया। मैंने ब्लेड निकाल लिया था। सूरी अच्छा-सा नौजवान था, मगर मुझसे ज्यादा भी नहीं था। जैसे ही सूरी कार में सवार हुआ, मैंने पीछे-से उसके गले में ब्लेड मार दिया। फिर सुरी तड़पता रहा, मगर उसके गले से आवाज न निकल सकी। वैसे भी मेरे अन्दर इस समय बहुत सब्र के बावजूद न जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई थी। सूरी के मरने के बाद मैंने उसकी कार ड्राइविंग साइड से भी अन्दर से लॉक करके बंद कर दी।’
‘फिर पहले मैं एयरपोर्ट गया, दिल्ली जाने वाले प्लेन का टिकट बुक कराया और घर आ गया। बाद में आशा को बताया की टिकट कल दोपहर का मिला है। सामान सुबह पैक कर लेना। रात को जब हम लोग सोने के लिए लेटे तो नौकर जो ऊपर का दूध पी जाता था, उसमें एक गोली काम्पोज की डाल दी, वह बिल्कुल बेखबर सो गया। आशा के दूध में पूरी दो गोलियां डाली और वह भी लेटते ही सो गई। बस, फिर मैंने बड़े आराम से, बिना किसी खौफ या डर के आशा की गर्दन काटी और उसके दोनों हाथ काटे। अपना लिबास बदला, छुरी साफ करके रखी। फिर मैं दिन निकलने से पहले ही सोते हुए मुन्ना को लेकर दिल्ली चला गया।’
छाबड़ा एक क्षण के लिए रुका, उसकी आंखों में आंसू तैर रहे थे। फिर वह बोला, ‘मैं नहीं जानता, गलती मेरी थी या सूरी की। मैं इतना जानता हूं कि आशा से कॉलेज के दौर से प्यार करता हूं और आशा सूरी के पुनर्जन्म के जाल में कुछ इस तरह फंस चुकी थी कि उससे उसका निकलना नामुमकिन था। मैं आशा को तलाक देकर भी जिन्दगी-भर अंगारों पर नहीं लोट सकता था। इसलिए मैंने आशा से बदला लिया और सूरी से एक पवित्र औरत को बहकाकर उसका चरित्र बर्बाद करने का। आशा को मौत के कारण मेरे जीवन में कुछ नहीं रह गया। इसलिए में खुद अपने आप को कानून के हवाले करने के लिए पेश हो गया हूं।’
छाबड़ा ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। उसकी आंखों से आंसुओं के दो कतरे निकलकर उसके उभरे हुए सीने पर गिर पड़े। चारों तरफ मौत का सन्नाटा था। और सुषमा तो इस तरह खड़ी थी जैसे उसका शरीर पत्थर का हो गया हो।
वह बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाती हुई अपनी कार के पास गई। उसके साथ जूली भी थी जो सहमी हुई। उसने सहमी-सहमी-सी आवाज में कहा‒ ‘आपने देखा मेम साहब, कैसा डेंजर आदमी हैं, दो-दो खून करके जरा-सा भी डरा हुआ नहीं है। और खुद ही फांसी के लिए आ गया।’
‘हूं!’ सुषमा ने भयभीत-सी आवाज में कहा, ‘तू ठीक कहती है।’
‘मगर असली फाल्ट उस सूरी के बच्चे का है जिसने पुनर्जन्म का जाल रचकर मिसेज छाबड़ा को उसमें फंसा लिया।’
‘हां, तू ठीक कहती है।’
जूली ने हैरानी से सुषमा की तरफ देखा और बोली‒
‘मगर मेम साहब यह गाड़ी तो अन्दर ले चलिए।’
‘तू‒तू ले आ, मुझसे ड्राइव नहीं होगी।
‘मगर मैं ड्राइविंग कहां जानती हूं, मेम साहब!’
‘नहीं जानती, किसी से धक्का लगवाकर अन्दर करवा दे।’
जूली आश्चर्य से सुषमा ने अन्दर जाते देखती रही। फिर उसने सामने के फ्लैट वाले दो नौकरों को बुलाया और धक्का लगाकर गाड़ी अन्दर करवाई। उसे लॉक किया। अन्दर पहुंची तो सुषमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई कांप रही थी।
‘क्या हुआ मेम साहब आपको?’ जूली ने हैरानी से पूछा।
‘हम लोगों ने अखबारों में कॉलम देखने शुरू कर दिए। फिर आशा को एक कांवेंट स्कूल में नौकरी मिल गई, जहां वह एक ही साल में तरक्की करते-करते प्रिंसिपल बन गई। हम दोनों के घर का नक्शा बदल गया। हम लोगों का जीवन स्वर्ग बन गया, मगर...।
‘मगर अचानक लगभग पंद्रह-बीस दिन से आशा कुछ बदली-बदली सी और खोई-खोई नजर आने लगी। कई बार देर से भी घर आई। मेरे पूछने पर उसने बहाना बना दिया कि कुछ काम निकल आया था या कोई गेस्ट आ गया था। या कोई एक्स्ट्रा क्लास लेनी पड़ गई। लेकिन बहानों के समय उनमें जोर नहीं होता था। वह बात मैंने हमेशा महसूस की। और इससे पहले कि कोई तूफान आए, मैंने आशा के सामने बगैर उसकी तब्दीलियों का अहसास दिलाए, यह सुझाव दिया कि अब घर में जरूरत की हर चीज आ चुकी है। वैसे भी अब हमारे मुन्ने को मां की ममता की जरूरत है। और मैं खुद इंजीनियर बनने वाला हूं। अतः वह नौकरी छोड़ दे। आशा ने तुरंत वादा करने की बजाए कह दिया कि मैं सोचूंगी। तब मेरा माथा ठनका।’
‘फिर एक रोज मैं दफ्तर के बहाने घर से निकला और लंच टाइम में दफ्तर छोड़कर, कार भी वहीं छोड़कर टैक्सी में आशा के स्कूल के पास पहंचकर रुक गया। आशा छुट्टी से कुछ समय पहले बाहर निकली। वह बहुत खुश और फूल की तरह खिली हुई थी और उसके साथ स्कूल मैनेजर सूरी भी था। वह एक तीस-बत्तीस साल का सुन्दर और स्वस्थ युवक था। आशा-उसके साथ कार में बैठी और मैंने टैक्सी में उसका पीछा किया। सूरी आशा को एक ऐसे होटल में ले गया, जहां सिर्फ आठ घंटे के लिए रूम मिलेगा। रूम भी छोटे-छोटे केबिनों की शक्ल में होते हैं।
‘मैंने साथ वाला रूम बुक लिया। मैनेजर ने हैरानी से पूछा मैं अकेला कमरा लेकर क्या करूंगा। मैंने बताया कि थोड़ी देर बाद, मेरी गर्ल-फ्रेंड आने वाली है। वह मेरा नाम पूछे तो रूम-नंबर बता देना। फिर थोड़ी देर बाद मैं बराबर वाले रूमनुमा केबिन में था। आशा और सुरी का वार्तालाप साफ-साफ-सुन रहा था। उनके वार्तालाप से स्पष्ट था कि सूरी शुरू से ही आशा पर जाल फेंक रहा था और कहता था कि मैंने इससे पहले भी उसे कहीं देखा है। फिर उसने आशा को अखबारों की कुछ घटनाएं सुनाई। कुछ सुनेे हुए किस्से सुनाए और उसने आशा के दिमाग में यह बात अच्छी तरह बिठा दी कि आशा और वह पिछले जन्म में भी प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी थे। मैंने सूरी के केबिन में व्हिस्की और खाने के सामान जाते देखे। सूरी ने आशा को व्हिस्की ऑफर की, मगर आशा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि उसके पति को संदेह हो जायगा। मगर दोनों में यह निर्णय हुआ कि प्यार करने वालों का प्यार जन्म-जन्म का होता है, मगर आशा इस जन्म में मुझे अपने बच्चे की वजह से नहीं छोड़ सकती। न सूरी अपनी पत्नी और दो बच्चों को छोड़ सकता है, इसलिए दोनों इसी तरह छिप-छिपकर मिलते रहेंगे। सूरी अपनी पत्नी पर यह भेद नहीं खुलने देगा और आशा मुझसे सब-कुछ छिपाकर रखेगी। वह नौकरी छोड़ने के बाद भी सूरी से सम्बन्ध रखने का इरादा रखती थी।
‘फिर दूसरे केबिन में लगभग एक घंटे तक खामोशी और अंधेरा रहा। मैं सिर्फ कपड़ों की सरसराहट और कभी-कभी सिसकारियां सुनता रहा। एक घंटे के बाद केबिन में रोशनी हो गई। आशा ने कहा, वह टैक्सी से घर जायेगी। मैंने सूरी की कार देखी थी कि उसने कहां पार्क की है। इससे पहले कि सूरी कार में पहुंचता, मैं उसकी कार तक पहुंच गया और अंधेरे में छिप गया। सूरी ने पहले कार का लॉक खोला, फिर एक जगह पेशाब करने के लिए खड़ा हो गया।
‘मैंने चुपके से उसकी कार का पिछला दरवाजा खोला और पिछली सीट पर छिप गया। मैंने ब्लेड निकाल लिया था। सूरी अच्छा-सा नौजवान था, मगर मुझसे ज्यादा भी नहीं था। जैसे ही सूरी कार में सवार हुआ, मैंने पीछे-से उसके गले में ब्लेड मार दिया। फिर सुरी तड़पता रहा, मगर उसके गले से आवाज न निकल सकी। वैसे भी मेरे अन्दर इस समय बहुत सब्र के बावजूद न जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई थी। सूरी के मरने के बाद मैंने उसकी कार ड्राइविंग साइड से भी अन्दर से लॉक करके बंद कर दी।’
‘फिर पहले मैं एयरपोर्ट गया, दिल्ली जाने वाले प्लेन का टिकट बुक कराया और घर आ गया। बाद में आशा को बताया की टिकट कल दोपहर का मिला है। सामान सुबह पैक कर लेना। रात को जब हम लोग सोने के लिए लेटे तो नौकर जो ऊपर का दूध पी जाता था, उसमें एक गोली काम्पोज की डाल दी, वह बिल्कुल बेखबर सो गया। आशा के दूध में पूरी दो गोलियां डाली और वह भी लेटते ही सो गई। बस, फिर मैंने बड़े आराम से, बिना किसी खौफ या डर के आशा की गर्दन काटी और उसके दोनों हाथ काटे। अपना लिबास बदला, छुरी साफ करके रखी। फिर मैं दिन निकलने से पहले ही सोते हुए मुन्ना को लेकर दिल्ली चला गया।’
छाबड़ा एक क्षण के लिए रुका, उसकी आंखों में आंसू तैर रहे थे। फिर वह बोला, ‘मैं नहीं जानता, गलती मेरी थी या सूरी की। मैं इतना जानता हूं कि आशा से कॉलेज के दौर से प्यार करता हूं और आशा सूरी के पुनर्जन्म के जाल में कुछ इस तरह फंस चुकी थी कि उससे उसका निकलना नामुमकिन था। मैं आशा को तलाक देकर भी जिन्दगी-भर अंगारों पर नहीं लोट सकता था। इसलिए मैंने आशा से बदला लिया और सूरी से एक पवित्र औरत को बहकाकर उसका चरित्र बर्बाद करने का। आशा को मौत के कारण मेरे जीवन में कुछ नहीं रह गया। इसलिए में खुद अपने आप को कानून के हवाले करने के लिए पेश हो गया हूं।’
छाबड़ा ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। उसकी आंखों से आंसुओं के दो कतरे निकलकर उसके उभरे हुए सीने पर गिर पड़े। चारों तरफ मौत का सन्नाटा था। और सुषमा तो इस तरह खड़ी थी जैसे उसका शरीर पत्थर का हो गया हो।
वह बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाती हुई अपनी कार के पास गई। उसके साथ जूली भी थी जो सहमी हुई। उसने सहमी-सहमी-सी आवाज में कहा‒ ‘आपने देखा मेम साहब, कैसा डेंजर आदमी हैं, दो-दो खून करके जरा-सा भी डरा हुआ नहीं है। और खुद ही फांसी के लिए आ गया।’
‘हूं!’ सुषमा ने भयभीत-सी आवाज में कहा, ‘तू ठीक कहती है।’
‘मगर असली फाल्ट उस सूरी के बच्चे का है जिसने पुनर्जन्म का जाल रचकर मिसेज छाबड़ा को उसमें फंसा लिया।’
‘हां, तू ठीक कहती है।’
जूली ने हैरानी से सुषमा की तरफ देखा और बोली‒
‘मगर मेम साहब यह गाड़ी तो अन्दर ले चलिए।’
‘तू‒तू ले आ, मुझसे ड्राइव नहीं होगी।
‘मगर मैं ड्राइविंग कहां जानती हूं, मेम साहब!’
‘नहीं जानती, किसी से धक्का लगवाकर अन्दर करवा दे।’
जूली आश्चर्य से सुषमा ने अन्दर जाते देखती रही। फिर उसने सामने के फ्लैट वाले दो नौकरों को बुलाया और धक्का लगाकर गाड़ी अन्दर करवाई। उसे लॉक किया। अन्दर पहुंची तो सुषमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई कांप रही थी।
‘क्या हुआ मेम साहब आपको?’ जूली ने हैरानी से पूछा।