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Romance दो कतरे आंसू

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सुषमा ने दरवाजे की घण्टी बजाई। दूसरे ही क्षण दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाला संध्या का पति शंकर था। शायद वह कहीं जाने के लिए तैयार हो रहा था। उसके चेहरे से ऐसा लगा जैसे उसे सुषमा का आना नागवार लगा हो, फिर दूसरे ही क्षण जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोला- ‘आओ-आओ सुषमा!’

‘सुषमा चोर-चोर सी अन्दर दाखिल हुई तो शंकर ने जरा ऊंची आवाज में कहा- ‘संध्या, देखो तुम्हारी बहन आई है।’

‘कौन? रजनी?’

‘नहीं, सुषमा।’

‘ओह आती हूं।’ जवाब ऐसी ही था जैसे संध्या को सुषमा के आने से कोई खुशी न हुई हो।

कुछ क्षण बाद संध्या बाहर निकली। उसने एक कीमती साड़ी बांध रखी थी। गले में हार था, हाथों में कंगन, कानों में बुन्दे। हाथों में पर्स लटका हुआ था। वह जबरदस्ती मुस्कराने की कोशिश करती हुई बोली‒

‘कैसी हो सुषमा, कैसे आई?’

‘जी मैं... मैं दीदी।’

‘मैं जरा बाथरूम होकर आता हूं।’ शंकर चला गया।

‘दीदी।’ सुषमा ने कहा, ‘मैं दरअसल इसलिए आई हूं कि-।’

‘सुषमा, बाबूजी अब कैसे हैं?’ संध्या उसकी बात काट कर बोली।

‘अभी वैसी ही तबीयत है दीदी, वोह मैं....’

‘दरअसल हम लोग जरा जल्दी में है।’ संध्या कलाई की घड़ी देखकर बोली, ‘तुम्हारे जीजाजी के एक दोस्त... वह बोली, ‘अजी, जल्दी कीजिए।’

‘दीदी।’ सुषमा ने जल्दी-से कहा ‘मुझे साढ़े तीन सौ रुपये की जरूरत है।’

‘साढ़े तीन सौ, भला किस काम के लिए?’

‘मैं पास तो हो गई हूं, मगर डिग्री रुक गई है, क्योंकि छः महीने से फीस नहीं दी गई। तुम तो घर की हालत जानती हो, अगर मुझे डिग्री मिल गई तो नौकरी भी मिल जाएगी।’

‘सुषमा, तू क्या जाने हम लोग घर का खर्च कैसे चलाते हैं। इनके पिता ने दोनों बेटों के लिए रकमें बांध रखी हैं, उसमें से ही सब कुछ करना पड़ता है। वैसे भी उनके सामने कैसे कह सकती हूं।’

इतने में शंकर आया और मुस्कराकर बोला‒

‘तुम लोगों की बातें खत्म हो गयी हों तो चलें।’

‘बातें क्या बस बाबूजी का हाल बताने आ गई। चलिए।’

वे दोनों बाहर आए तो सुषमा उनके पीछे-पीछे बाहर आई। शंकर ने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट किया। संध्या पीछे बैठ गई। सुषमा वहां खड़ी ही रह गई। उन दोनों ने पलटकर भी नहीं देखा। सुषमा का जी चाह रहा था कि हवा में उड़कर संध्या को पकड़ ले और उसे बताए कि ‘संध्या दीदी’ मैं तुम्हारी बहन हूं, जिसने अपनी आबरू गंवाकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे अपाहिज पिता हैं, जिन्होंने अपनी टांगें खोकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे पास मुझसे बात करने की फुर्सत नहीं।’

उसके होंठ गुस्से से बुरी तरह भिंचे हुए थे और आंखों में आंसुओं की दो बूंदें तैर रही थीं।

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सुषमा ने घण्टी बजाई। दरवाजा रजनी ने खोला। एक क्षण के लिए ठिठकी फिर मुस्करा कर बोली‒ ‘सुषमा, आओ-आओ।’

सुषमा अन्दर आई। रजनी के पति ने अन्दर के कमरे से निकलते हुए कहा, ‘अरे, सुषमा तुम हो। इधर कैसे भूल गई आज?’

‘जी, मैं तो कई बार आ चुकी हूं, मगर आप लोग ही...।’

‘क्या बताऊं सुषमा,’ रजनी जल्दी से बोली, ‘घर-बार से फुर्सत की नहीं मिलती।’

‘मैं जरा कपड़े बदल लूं।’ प्रकाश ने अन्दर कमरे में जाते हुए कहा, ‘तब तक तुम अपनी बहन के लिए कुछ चाय वगैरह बना लो।’

प्रकाश अन्दर चला गया। जब अन्दर चला गया तो सुषमा ने रजनी से कहा- ‘दीदी, मैं एक जरूरी काम से आई थी।’

‘हां, कहो।’

‘मेरा रिजल्ट रुक गया है। साढ़े तीन सौ रुपये फीस भरनी है। अगर डिग्री मिल जाए तो मुझे कहीं नौकरी मिल जाएगी, घर की हालत तो तुम जानती ही हो।’

‘अरे बहन, आजकल किसके घर की हालत किससे छिपी है। अब तुम्हें क्या बताऊं, हर महीने बंधे लगे पैसे घर आते हैं। फिर भी महीने के आखिरी दिनों में तंगी हो जाती है। फिर यह भी तो कितने शर्म की बात है कि मैं तुम्हारे जीजाजी से कहूं कि मेरे मायके वाले कंगाल हो गए हैं।’

इससे पहले कि सुषमा कुछ कहे प्रकाश बाहर आ गया।

‘अरे, तुमने चाय नहीं बनाई सुषमा के लिए?’

‘बनाती हूं,’ रजनी झटके से उठकर किचन में चली गई। प्रकाश ने मुस्कराकर सुषमा से कहा, ‘जिन्दगी भर नहीं भूल सकता वह बात।’

‘जी।’

‘अरे, जब मैं और मेरे भैया रजनी और संध्या भाभी को देखने गए थे।’ प्रकाश हंसकर बोला, ‘तुमने भेंगी और अपाहिज बनकर हमारा स्वागत किया था। अरे, अगर तुम अपने वास्तविक रूप में हमारे सामने आ जाती तो शायद रजनी की जगह तुम किचन में होती।’

सुषमा कुछ न बोली। इतने में रजनी चाय लेकर आई। उसने जरा कड़ी नजरों से प्रकाश को देखा तो वह सकपका गया और बोला-

‘अच्छा भई, मैं जा रहा हूं। मुझे एक दोस्त के यहां पहुंचना है।’

‘चाय तो पी लीजिए।’ सुषमा ने कहा।

‘नहीं सुषमा।’ रजनी बोली, ‘यह चाय बहुत कम पीते हैं।’

फिर प्रकाश चला गया तो रजनी ने इस तरह चाय की प्याली सुषमा की तरफ सरकाई जैसे भीख दे रही हो। सुषमा के दिल में गुस्से की लहर-सी उठी। मगर उसने अपने ऊपर काबू रखते हुए कहा-

‘दीदी, मेरा जी नहीं चाह रहा चाय पीने को।’

रजनी ने दोबारा चाय के लिए कहे बगैर प्याली उठा ली और एक घूंट भर कर बोली- ‘बाबूजी कैसे हैं?’

‘वैसे ही।’ सुषमा ने उठते हुए कहा।

‘हां सुनो।’ रजनी ने कहा, ‘मैं तुमसे कई रोज से एक बात कहना चाहती थी।’

‘हां कहो।’

‘तुम दोपहर में आया करो।’

‘क्यों?’ सुषमा ने तेज लहजे में पूछा।

‘अब तुम्हें साफ-साफ बता दूं।’ रजनी आंखें निकालकर बोली, ‘तुम्हारी वजह से कई बार मेरी और दीदी की शादी की बात टल गई थी। तुम्हारे जीजा के सामने तुम्हारा यहां आना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं, क्योंकि वह जरा दिलफेंक तबीयत के हैं।’

सुषमा का खून खौल गया। वह अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करती हुई बोली-

‘इतना ही खतरा है तो घर से क्यों निकलने देती हो। आंचल में बांध कर रखा करो। अकेली मैं ही तो तुमसे ज्यादा खूबसूरत नहीं। शहर में बहुतेरी लड़कियां और भी हैं।’

‘बदतमीज़, जुबान चलाती है।’ रजनी ने तमाचा उठाया, मगर सुषमा ने उसकी कलाई पकड़ ली।

‘अहसान-फरामोश, अगर तू मेरी बड़ी बहन न होती तो तेरी कलाई मरोड़ देती।’

फिर वह झटके से उसका हाथ छोड़कर दरवाजे की तरफ बढ़ी तो रजनी ने गुस्से-से कांपते हुए कहा, ‘खबरदार जो आइन्दा मेरे घर में कदम रखा।’

‘अरे, तू मर गई तो भी सूरत देखने नहीं आऊंगी।’

सुषमा बाहर निकल आई। क्रोध के मारे उसके पांव आड़े-तिरछे पड़ रहे थे। उसके अंग-अंग से जैसे लावा-सा उठ रहा था। फिर वह जैसे ही गली की तरफ मुड़ी तो प्रकाश नजर आया जो स्कूटर रोके खड़ा हुआ था। मुस्कराकर बोला, ‘मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।’

‘क्यों?’ सुषमा का लहजा कुछ तीखा था।

‘मैंने तुम्हारी और रजनी की बातें सुन ली थीं, तुम्हारा रिजल्ट रुक गया है ना?’

सुषमा की कल्पना में रजनी का चेहरा उभरा। दिमाग में भट्टी-सी जल उठी और उसे अपने-आपको संभालते हुए कहा, ‘हां, सिर्फ साढ़े तीन सौ रुपये के लिए।’

‘अगर तुम्हें साढ़े तीन सौ रुपये मिल जाएं तो तुम्हें डिग्री मिल जाएगी और डिग्री मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी और घर के हालात भी संभल जायंगे। तुम्हारे घर के हालात किससे छिपे हुए हैं।’

‘आप ठीक कहते हैं।’

‘ऐसे समय पर रिश्तेदार ही रिश्तेदारों के काम आते हैं।’

‘अच्छा।’ सुषमा ने जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा, ‘आपको इस बात अहसास है?’

‘जानवरों को अहसास नहीं होता। मैं तो इन्सान हूं।’

‘तो फिर लाइए, साढ़े तीन सौ रुपये दीजिए मुझे।’

प्रकाश ने फौरन बटुआ खोला और साढ़े तीन सौ रुपये निकालकर सुषमा को दिए। सुषमा साढ़े तीन सौ रुपये गिरेबान में डाल, स्कूटर पर हाथ रखकर बड़ी अदा-से मुस्कराती हुई बोली-

‘अब बताइए आपकी इस नेकी का बदला कैसे चुकाऊं?’

‘बदला चुकाना चाहती हो?- प्रकाश अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराया- ‘यह तो इस हाथ दे और उस हाथ ले की बात होती है।’

‘मैं जानती हूं कि जब तक पप्पू बड़ा न हो जाए मैं शादी नहीं कर सकती। मगर मैं भी इंसान हूं, कोई देवी तो हूं नहीं।’

‘सच!’ प्रकाश की आंखें चमक उठीं।

‘लेकिन इतना याद रखिए, किसी को कानों-कान पता न चले।’

‘क्या बात करती हो।’ प्रकाश हंसता हुआ बोला- ‘भला यह बात किसी से कह सकता हूं। चलो, कहां चलोगी इस समय।’

‘अभी नहीं, मेरी एक शर्त और भी होगी।’

‘जल्दी बोलो।’

‘अब देखिए, जिस घर में मैं आती हूं, वह आपका घर है। दीदी हमेशा की शक्की है। आज उसने मुझे साफ शब्दों में कह दिया है कि मेरे पति दिलफेंक तबीयत के आदमी हैं। तू यहां मत आया कर।’

‘उसकी यह मजाल, मैं अभी उसकी खबर लेता हूं।’

‘ओह, नहीं।’ सुषमा ने मुस्कराकर कहा, ‘खबर लेना कोई सजा नहीं होती।’

‘फिर जो तुम कहो।’

‘मानेंगे आप मेरी बात?’

‘दिल और जान से।’

‘देखिए, मेरी एक सहेली है, जिसकी शादी को दो-तीन वर्ष हो गए। छः महीने तक वह बड़ी तुनक-मिजाज और नखरीली थी। पति को चुटकियों में बनाती थी। एक बार उसके पति ने तंग आकर दोस्तों से सलाह की। दोस्तों ने कहा पत्नी से सलूक वही रखना जो करते हो, बस दो-तीन महीने तक उसके शरीर को मत छूना। एक रोज खुद-ब-खुद कदमों पर आ गिरेगी। मेरी सहेली एक महीने के बाद ही अपने पति के कदमों में गिर गई और अब यह हालत है कि उनके इशारों पर नाचती है। वह रात को दिन कहे तो दिन कहेगी और दिन को रात कहे तो रात।’

‘तुम चाहती हो कि मैं छः महीने तक रजनी से अलग रहूं। अरे, मैं तो साल-भर के लिए उससे अलग रह लूंगा।’

‘इतने लम्बे अर्से की जरूरत नहीं पड़ेगी, मगर साथ ही मेरी दो शर्तें होंगी।’

‘बोलो।’

‘देखिए बहन-बहन का रिश्ता अपनी जगह होता है। मगर जिस तरह रजनी दीदी ने मेरा अपमान करके मुझे घर से निकाला है, ऐसा तो कोई गैर भी नहीं करता।’

‘बेशक।’

‘आप दीदी को तब तक तड़पाइए जब तक वह आपके कदमों में न गिर पड़े और जिस दिन वह कदमों पर गिरे उसे कहिए, तुमने बिना वजह अपनी बहन का अपमान किया है, उससे जाकर माफी मांगो और खुद उसे घर लेकर आओ और मैं तुम्हारे किसी और औरत के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता। बस जिस रोज वह मुझसे माफी मांगने आएगी, उस रोज मैं आपसे कहूंगी मुझे स्कूटर पर वापस घर पहुंचा दीजिए और फिर आप खुद समझ जाइए।’

‘तो पक्का वादा?’

‘बिल्कुल पक्का।’

‘बस तो ड्रामा आज ही से शुरू।’

‘मैं जल्दी से जल्दी आपकी कामयाबी का इन्तजार करूंगी। मगर याद रखिए अगर आप बहक गए और किसी रोज यह बात किसी टोन में दीदी से कह गए तो फिर दीदी आपको सारी उम्र गुलाम बनाकर रखेगी और मैं भी आपके साढ़े तीन सौ रुपये लौटा दूंगी।’

‘अरे, तुमने समझ क्या रखा है, मर्द, मर्द है। तुम्हारी दीदी से पहले न जाने कितनी बांहों में आकर चली गई। तुम्हारे लिए तो दस साल तक रजनी को हाथ न लगाऊं। बाजार भरे पड़े हैं, रजनी जैसी औरतों से।’

सुषमा को होंठों पर एक विजयी मुस्कराहट फैल गई।’
 
11

सुषमा घर में दाखिल हुई तो बाबूजी को एक डॉक्टर देख रहा था। और पप्पू पास ही खड़ा हुआ था। सुषमा ने घबराकर कहा, ‘क्या हुआ डॉक्टर साहब?’

‘बेटी।’ डॉक्टर ने बताया, ‘रघुनन्दनजी की कटी हुई टांगों के घावों में जहर फैलने लगा है।’

‘नहीं।’ सुषमा सिर से पांव तक कांप गई।

‘किसी भी तरह इनका ऑपरेशन कल शाम तक हो जाना चाहिए, क्योंकि ज्यों-ज्यों जहर ऊपर चढ़ता जाएगा, खतरनाक होता जाएगा। अभी तो एक इंचभर ही और टांगें काटनी पड़ेंगी, नहीं तो बाद में...।’

‘नहीं नहीं, ऐसा मत कहिए।’

डॉक्टर ने एक पर्चा लिखकर दिया और बोला-

‘दौड़कर यह इंजेक्शन ले आओ, आज रात-भर हर दो घंटे के बाद देने पड़ेंगे ताकि जहर को फैलने से रोका जा सके। लगभग तीन सौ रुपये के आएंगे।’

‘ओह और ऑपरेशन में कितना खर्च होगा?’

‘सब मिलाकर दो हजार से ऊपर ही हो जाएगा।’

‘दो हजार!’ सुषमा की आवाज कांपकर रह गई।

‘जल्दी करो बेटी, यह इंजेक्शन बहुत जरूरी है।’

सुषमा पलटकर दौड़ती हुई घर से निकल गई।

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सुषमा ने बड़े सन्तोष के साथ कॉटेज का फाटक खोला। धीरे-धीरे चलती हुई वह सुन्दर लॉन से गुजरी। फिर बरामदे में पहुंची। फिर उसने घंटी का बटन दबाया। और अन्दर से कदमों की चापें गूंजीं। दरवाजा खुला और सामने खड़ी लता उसे देखकर मुस्कराई- ‘स्वागत है।’

‘अगर तुम चाहो तो मेरे अन्दर आने से पहले चांटे का जवाब दे सकती हो।’ सुषमा ने बड़ी शांति से कहा।

‘लता का दिल इतना छोटा नहीं है।’

लता ने मुस्कराकर उसका हाथ पकड़ा और अन्दर ले आई। कॉटेज किसी बंगले की तरह बड़ी खूबसूरती से सजा हुआ था। फर्श पर कीमती गलीचा था। कीमती सोफा सैट। एक कोने में टेलीविजन भी रखा हुआ था। स्टीरियो भी मौजूद था। फ्रिज और एयर कन्डीशनर भी। लता ने उसे सोफे पर बिठाया और मुस्कराकर बोली-

‘जब मैंने अपनी सलाहकार को चांटा मारा था, तब यह एक गन्दा-सा झोंपड़ा था और आज तुम इसका बदला हुआ रूप देख रही हो। मेरा छोटा भाई कांवेंट है, मां सेनिटोरियम में। छोटी बहन शिमला में पढ़ रही है। पड़ोसवाले समझते हैं कि हमारे नाम हमारा कोई बुजुर्ग बड़ी जायदाद छोड़कर मरा है। क्योंकि मैं अपने पड़ोस की लड़कियों की निगाहों का जवाब भी ऐसी नजरों से देती हूं कि वह कांप जाती हैं। यहां के लोगों की निगाहों में मुझसे ज्यादा शरीफ लड़की पूरे इलाके में और कोई नहीं होगी। यह सब कैसे है, इसके गुर मैं तुम्हें सिखाऊंगी।’

सुषमा कुछ न बोली, ‘चुपचाप लता की बातें सुनती रही।

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लता और सुषमा के बदन बुर्को से ढके हुए थे। चेहरे भी ढके हुए थे। सुषमा लता के घर से ही कपड़े बदलकर निकली थी। उसके शरीर पर शलवार, कमीज और दुपट्टा थे और ऊपर बुर्का। यही लिबास लता के बदन पर भी था। दोनों बस में सवार होकर वर्ली तक आई थीं। फिर वर्ली पर उतरकर एक टैक्सी में बैठ गई थीं। वर्ली से कोलाबा का सफर उन दोनों ने टैक्सी में किया। एक जगह टैक्सी छोड़कर वे बड़ी-बड़ी और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच घूमने लगी। थोड़ी देर बाद वह एक बारह मंजिला इमारत में लिफ्ट पर ऊपर जा रही थीं।

बारहवें माले पर पहुंचकर लिफ्ट रुक गई। दोनों लिफ्ट से निकलीं। लता ने लिफ्ट का दरवाजा बन्द किया और फिर एक माले की सीढ़ियां उतरकर नीचे गई। सुषमा ने हांफते हुए कहा- ‘क्या परेड करवा रही है तू?’

‘पगली, ऐसे कामों में ऐसी ही परेड करनी पड़ती है।’ लता ने कहा, ‘अव्वल तो इन बुर्कों में हमें किसी ने नहीं पहचाना होगा। फिर बस में अक्सर ऐसी सवारियां सफर करती हैं जिनका रोज का आना जाना होता है तो उन लोगों ने हमें वर्ली पर उतरते हुए देखा होगा। फिर वर्ली से हमने जो टैक्सी की उसे क्या मालूम है कि हम वर्ली की हैं या कहां की। उसने हमें कोलाबा में भी मेन रोड पर छोड़ दिया है। हम जिस बिल्डिंग में घुसे हैं, वह बारह माला की है। किसी ने देखा भी होगा तो एक दो माले तक देखा होगा। किसी ने इंडीकेटर देखा भी होगा तो बारह माला देखा होगा और हम ग्यारहवें माले पर आए हैं।’

फिर लता एक फ्लेट के दरवाजे पर रुक गई, जिस पर एक खूबसूरत सी प्लेट लगी थी, जिस पर लिखा था, ‘रियाजुद्दीन बिल्डर्स’। लता ने चेहरे पर से नकाब हटाया और घंटी बजाई। शायद किसी ने सूराख से झांककर देखा होगा। फिर आहट हुई और दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाली एक अधेड़ उम्र की औरत थी, जिसने गरारा और जम्पर पहन रखा था। सफेद दुपट्टा सलीके से सिर पर जमा हुआ था। चेहरे और आंखों से वह बहुत ही सम्मानित और ऊंचे खानदान की मालूम होती थी।

‘आओ बेटी।’ उसने एक तरफ हटते हुए कहा।

लता और सुषमा अन्दर दाखिल हुई। बड़ा खूबसूरत तीन रूम का सजा हुआ फ्लैट था। एक बड़ी-सी मेज पर कुछ इमारतों के मॉडल रखे थे। औरत ने उन दोनों को ड्राइंगरूम में बिठाया और नौकरानी को बुलाकर चाय लाने के लिए कहा। सुषमा का नकाब अब उलट चुका था। वह बिल्कुल गम्भीर और चुपचाप बैठी हुई थी। उसके चेहरे पर एक ऐसा आत्मविश्वास झलक रहा था कि अधेड़ औरत भी उससे प्रभावित हुए बिना न रह सकी। लता ने बताया, ‘यह मेरी क्लासफैलो है। नीला जैक्सन।’

‘बड़ी खूबसूरत क्लासमेट है, तुम्हारी मिस मीना फरेरा।’ औरत ने मुस्कराकर कहा, ‘मगर कहीं तुम्हारी सहेली गूंगी तो नहीं?’

‘जी, ऐसा तो नहीं।’ लता ने मुस्कराकर कहा, ‘मगर यह बिना कारण बहुत कम बोलती है। इसके फॉदर दिल्ली में चीफ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर थे। करोड़ों की आमदनी थी। एक बार किसी जले-भुने ठेकेदार ने पांच लाख के नोटों की ऐसी गड्डियां दे दी, जिन पर मैजिस्ट्रेट के साइन थे। बस तब से अब तक पांच साल बीत गए, मुकदमा चल रहा है। मिस्टर जैक्सन जेल नहीं जाना चाहते। यहां उनके कुछ रिश्तेदार रहते हैं। पिछले साल मिस्टर जैक्सन को अपना बंगला भी बेचना पड़ा था। तब उन्होंने और उसके छोटे भाइयों को यहां भिजवाया था।’

फिर उसने एक ठंडी सांस ली और बोली-

‘मगर पिछले महीने मिस्टर जैक्सन को पांच साल की सजा सुनाई गई, जिस पर अपील के लिए पूरे पन्द्रह हजार रुपए की जरूरत है।’

अधेड़ औरत ने सुषमा को सर से पांव तक देखा फिर बोली, ‘बेटी, जरा बुर्का उतारने की तकलीफ करोगी?’

सुषमा ने बड़े इत्मीनान से उठकर बुर्का उतार दिया। औरत ने सिर से लेकर पांव तक उसे देखा और लता से बोली- ‘मीना बेटी। सचमुच कमी तो कोई नहीं। मगर पन्द्रह हजार बहुत होते हैं।’

‘मगर पंद्रह हजार से कम में काम नहीं चल सकता। आंटी, आपको तो आगे भी कमीशन के और मौके मिल जाएंगे। मगर इतना याद रखिए, नीला न पहले कभी यहां आई है और न दोबारा कभी आएगी।’

‘वैसे, क्या मेरे यहां ही पहला जीना चढ़ी है?’

‘हांथ कंगन को आरसी क्या?’

‘अच्छा।’ औरत ने कहा, ‘तुम ठहरो, मैं एक मिनट में आती हूं।’

औरत उठकर कमरे में आई और टेलीफोन पर किसी का नम्बर डायल किया और रिसीवर कान में लगा लिया। चन्द क्षण बाद दूसरी तरफ से आवाज आई- ‘मैसर्ज के. के. बिल्डिंग डिजाइनर्ज। आप...?’

‘मैं कांट्रेक्टर रियाजुद्दीन की पर्सनल सैक्रेटरी।’

‘जस्ट ए मिनट।’

थोड़ी देर बाद रिसीवर पर आवाज आई, ‘यस? के. के. हीयर।’

‘के. के. साहब, मैं आपकी खादिमा।’

‘ओह, अच्छा अच्छा।’

‘एक बिल्डिंग की कंस्ट्रक्शन के सिलसिले में आपसे बातें करनी हैं। साइट बहुत शानदार है। सिर्फ पंद्रह हजार रुपये में जगह मिल रही है।’

‘पंद्रह हजार तो बहुत ज्यादा है।’

‘साइट देखकर आप कहेंगे कि जगह बहुत सस्ती है। फैसले के लिए सोचने का भी समय नहीं, दूसरे कांट्रेक्टर आगे-पीछे दौड़ रहे हैं।’

‘बुक कर लीजिए। मैं आ रहा हूं।’

‘ओ. के.।’ औरत ने रिसीवर रख दिया। मुस्कराती हुई ड्राइंग-रूम में आई और लता से बोली- ‘मुबारक हो।’

‘ओह थैंक्स आंटी, अब मैं चलती हूं।’ फिर उसने सुषमा से कहा, ‘ठीक चार बजे तुम उसी रास्ते से आ जाना, जिस रास्ते से आई थी। जहां तुम रहती हो, वहां मैं तुम्हारे लिए कोई भी बहाना बना दूंगी।’

सुषमा कुछ न बोली। लता ने एक मुस्कराती हुई नजर उस पर डाली और चली गई।

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सुषमा किसी दुल्हन की तरह सजी हुई थी। उसके शरीर पर गहरे लाल रंग का ही लम्बा लबादा था। उसका मेकअप किया गया था। ठीक दस बजे दरवाजा खुला और शराब की एक तेज गंध अंदर आयी। सुषमा ने बुरी तरह नाक सिकोड़ी। आने वाला एक नौजवान था। लेकिन आंखों के नीचे हल्के-हल्के स्याह घेरे उसके अय्याश होने का सबूत दे रहे थे। वह दरवाजा बन्द करके सुषमा की तरफ मुड़ा। सुषमा अब खड़ी हो गई थी। शराब की बू से उसका दिमाग फटा जा रहा था और जाने क्यों उसे आने वाले नौजवान से घिन-सी आने लगी थी। हालांकि वह शरीर से खूबसूरत भी था और नौजवान भी। उसने सुषमा को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर होंठों को सिकोड़कर सीटी बजाई। सुषमा के माथे पर बल पड़ गए और उसने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा-

‘आप वैसे तो पढ़े-लिखे मालूम होते हैं, मगर इतना भी नहीं जानते, इस तरह गुंडे सीटी बजाते हैं।’

‘वैरी गुड!’ नौजवान ने चुटकी बजाकर लहराते हुए कहा, ‘काफी स्मार्ट मालूम होती है।’

‘यह भी बहुत घटिया रिमार्क है।’

‘शटअप- क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हमने तुम्हें पंद्रह हजार रुपए में खरीदा है।’

‘पंद्रह हजार क्या होते हैं, यह रकम तो मैंने अपनी सहेली के कहने पर मंजूर कर ली है।’

‘बहुत बददिमाग मालूम होती हो।’

‘आप मेरा इंटरव्यू लेने आए हैं क्या?’

नौजवान ने जेब में ठुंसी हुई बोतल निकाली और मेज पर रखते हुए लांग चेयर पर पसर गया। उसने दोनों टांगें मेज पर फैला दीं और रईसाना अंदाज में बोला- ‘चलो, पैग बनाओ।’

‘मैं तो इसे हाथ भी न लगाऊंगी।’

‘तो तू क्या बिना हाथ लगाए पिएगी?’

‘व्हाट?’

‘अरे तुम नहीं पिओगी तो क्या खाक मजा आएगा।’

सुषमा सन्नाटे में खड़ी रह गई थी। एकाएक उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे वह किसी गहरे ख्वाह से जाग पड़ी हो। हे भगवान्! यह मैं कहां आ गई, यह मैं क्या करने चली आई! बाबूजी की जान बचाने के लिए पप्पू की पढ़ाई के लिए मैं जानबूझकर इतना गिर गई। और रजनी के लिए मैंने अपना सब-कुछ गंवा दिया। उसके बदले में मुझे क्या मिला? संध्या और रजनी भी तो बाबूजी की ही बेटियां हैं। क्या वह बाबूजी और पप्पू के लिए कुछ नहीं कर सकती थीं। वे चाहें तो सब कुछ कर सकती हैं। नहीं, नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगी। प्रेम ने जबर्दस्ती मेरी इज्जत लूटी थी। मैंने उसकी जान ले ली। यहां मैं जानबूझकर अपनी अस्मत का सौदा करने आई हूं।

‘नहीं-नहीं।’ सुषमा हड़बड़ाई- ‘यह नहीं हो सकता यह नामुमकिन है।’

‘चलो, चलो।’ नौजवान ने कहा, ‘हर लड़की पहले इसी तरह नखरे करती है, बाद में राह पर आ जाती है।’

अचानक सुषमा को ऐसा लगा जैसे उसके सामने नौजवान नहीं कोई राक्षस खड़ा हो जो उसे अभी चीरफाड़ कर खा जाएगा और वह बेतहाशा दरवाजे की तरफ भागी। मगर नौजवान उससे कहीं ज्यादा फुर्तीला था। उसने दरवाजा घेरकर सुषमा के दोनों हाथ ऊपर करके पकड़ लिया। सुषमा गिड़गिड़ाई- ‘जाने दो, मुझे जाने दो।’

‘खूब!’ नौजवान की मुस्कराहट गहरी हो गई, ‘अब आंटी की बात पर यकीन आ गया कि सचमुच तुम्हें पहले किसी ने छुआ तक नहीं।’

‘मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं, मुझे जाने दो।’

‘एडवांस दे चुका हूं, पन्द्रह बाजार। कमीशन अलग है।’

‘पन्द्रह हजार- पंद्रह हजार, पन्द्रह हजार,’ सुषमा के कानों में जैसे नोटों की कड़कड़ाहट गूंजने लगी। बीस हजार के लिए उसे प्रेम ने लूट लिया था। मगर दुनिया को आज तक नहीं पता कि मेरी आबरू का मोती प्रेम ने चूर-चूरकर दिया था। यह बात सिर्फ मैं जानती हूं।

अगर आज, आज मैं पन्द्रह हजार ठुकरा दूँ तो कल बाबूजी की अर्थी उठ जाएगी। संध्या और रजनी को तो गर्ज नहीं है। वे तो खुदगर्ज हैं। वे पप्पू के सिर पर कभी हाथ नहीं रखेंगी। बाबूजी अपाहिज हैं। मैं खुद बेसहारा हो जाऊंगी। अब एक सहारा तो है। एक छत तो है मेरे सिर पर। पप्पू को अगर मैं पढ़ा-लिखाकर नौकरी दिलवा दूँ तो जरूरी नहीं कि वह भी संध्या और रजनी की तरह खुदगर्ज निकले। कल वह मेरा भी सहारा बन सकता है। फिर उसके कानों में प्रेम की आवाज गूंजी-

‘पाप वह कहलाता है, जिसका भेद खुल जाए।’

लता भी तो यही सब-कुछ करती है। लेकिन खुद उसके पड़ोसी तक उसे कितना शरीफ समझते हैं। मेरा राज़ तो सिर्फ लता को ही मालूम होगा। और लता का राज मुझे मालूम है। न यह आदमी असली नाम जानता है, न व औरत। फिर जब मैं एक बार लुट ही चुकी हूं तो क्या बचाने के लिए मैं बाबूजी की जीवन और पप्पू का भविष्य कुरबान करूं?

सुषमा दोनों हाथों से मुंह छिपाकर रोने लगी। नौजवान उसे जबर्दस्ती खींचता हुआ बिस्तर तक ले गया। अब उसके पहलू में सुषमा थी। दूसरे ही क्षण कमरे में गहरा अन्धेरा छा गया।

12

सुषमा बेचैनी से वार्ड के बाहर टहल रही थी, पप्पू एक बैंच पर बेचैन बैठा हुआ था। ऑपरेशन थियेटर का लाल रंग का बल्ब जल रहा था। लगभग एक घण्टे के बाद एक डॉक्टर बाहर निकला। सुषमा ने उसकी तरफ बढ़कर बेचैनी से पूछा- ‘डॉक्टर साहब, क्या हुआ?’

‘घबराइए मत, ऑपरेशन कामयाब रहा है। आपके बाबूजी को कुछ नहीं होगा।’ और सुषमा पप्पू को अपने साथ चिपटाकर फफक-फफक कर रो पड़ी।

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बाबूजी अपने बिस्तर पर लेटे थे। उनके पास ही पप्पू भी बैठा हुआ था। वह पप्पू के सिर पर प्यार से हाथ फेर रहे थे।

‘तो जब मैं बेहोश हो गया था तो डॉक्टर ने क्या बताया था?’

‘यही कि अगर चौबीस घंटे के अन्दर आपका ऑपरेशन न हुआ तो भगवान न करे....।’

‘और खर्चा कितना बताया था?’

‘दो-ढाई हजार के करीब।’

‘यह इतनी बड़ी रकम क्या संध्या और रजनी ने दी थी?’

‘नहीं बाबूजी, वह तो छोटी दीदी ने इन्तजाम किया था।’

‘क्या! सुषमा ने?’ बाबूजी की आंखें हैरत से फटी रह गई और बोले, ‘कहां से इन्तजाम किया था, उसने इतनी बड़ी रकम का?’

तभी सुषमा अन्दर दाखिल हुई तो बाबूजी की शक भरी निगाहें उसकी तरफ उठ गई। उसने बाबूजी के आखिरी शब्द सुने थे जो उसके दिल में तीर की तरह चुभ गए थे।

‘बाबूजी, आप जानना चाहते हैं, जिस रकम से आपको जिंदगी मिली है, वह मुझे कहां से प्राप्त हुई?’

‘बेटी।’

सुषमा ने लता को हाथ पकड़कर अंदर खींच लिया और बोली-

‘पहचान लीजिए, इस सूरत को अच्छी तरह से। यह है वह देवी जिसकी वजह से मैं आपके प्राण बचाने में कामयाब हो सकी हूं। इसका नाम लता है। यह मेरी क्लासमेट थी।’

‘नमस्ते बाबूजी।’ लता ने हाथ जोड़कर कहा।

‘जीती रहो बेटी।’ बाबूजी मुस्कराकर बोले, ‘जब तुम इसकी क्लासमेट हो तो यह भी जानती होगी कि यह कितनी खुशमिजाज और शरारती है, मगर हालात आदमी का मिजाज तक बदल कर रख देते हैं।’

फिर बाबूजी, ने सुषमा से कहा‒

‘बेटी, मैं तो यूं ही पूछ रहा था।’

‘बाबूजी, आपके लिए ‘व्हील चेयर’ आ गई है।’ सुषमा ने कहा, ‘अब आपको बिस्तर पर पड़े-पड़े बोर नहीं होना पड़ेगा।’

फिर सुषमा व्हील चेयर अंदर लेकर आ गई। व्हील-चेयर देखकर वह भावुक हो गए। सुषमा और लता के सहारे से वह उसमें बैठे और फिर उन्होंने पहियों को हिलाकर इधर-उधर रुख किया तो भर्राई हुई आवाज में बोले- ‘मैं-मैं तो घूम फिर सकता हूं। मैं अपाहिज नहीं हूं।’

कहते-कहते बाबूजी रो पड़े।

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बाबूजी व्हील-चेयर पर बैठे हुए थे और उसे घुमाते जा रहे थे। तभी दरवाजा खुला-संध्या, शंकर, रजनी और प्रकाश अंदर दाखिल हुए। उन चारों को देखकर बाबूजी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई और उन्होंने हाथों को फैलाकर कहा, ‘आओ-आओ मेरे बच्चो।’

चारों ने झुककर बाबूजी को प्रणाम किया और बाबूजी ने चारों के सिर पर हाथ फेरा। संध्या ने कहा‒

‘माफ कीजिएगा, बाबूजी! आप सोचते होंगे कि यह लोग अस्पताल तक नहीं आए। दरअसल यह सुबह दुकान पर चले जाते हैं और शाम को ही लौटते हैं।’

‘हां बाबूजी।’ रजनी ने कहा, ‘मेरा भी यही हाल है। दिल तो एक-एक पल तड़पता रहता था।’

‘भगवान का शुक्र है कि ऑपरेशन कामयाब हो गया।’ शंकर बोला।

‘भगवान न करे जरा-सी भी देर हो जाती तो बड़ी गड़बड़ हो जाती।’

‘अरे, तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं।’ बाबूजी ने कहा, ‘अपने बच्चों से भी कोई शिकायत की जाती है।’

‘नहीं बाबूजी, हम लोग सचमुच शर्मिन्दा हैं।’ प्रकाश इधर-उधर देखकर बोला, ‘यह पप्पू और सुषमा नजर नहीं आ रहे?’

13

‘पप्पू तो शायद किसी के साथ खेलने गया है। सुषमा अंदर है।’ फिर बाबूजी ने पुकारा, ‘सुषमा बेटी! देख तो कौन आया है।’

जाने क्यों रजनी के चेहरे का रंग उड़ने लगा था। अंदर से सुषमा ने जोर से कहा, ‘मैंने सुन लिया है बाबूजी, कौन-कौन आया है।’

‘मैं बुलाकर लाती हूं।’ रजनी उठती हुई बोली।

वह सुषमा के कमरे में आई तो सुषमा बड़ी गम्भीरता और इत्मीनान से अपने बाल ठीक कर रही थी। रजनी उसके करीब पहुंच गई। सुषमा ने बड़े अंदाज से मुस्कराकर आईने में रजनी का छाया देखी।

‘आइए मिसेज प्रकाश, कैसे तकलीफ की?’

‘मैं तुझसे एक बात पूछने आई हूं।’ रजनी ने नथुने फुलाकर कहा।

‘जरा ऊंची आवाज में पूछिए तो ऐसे ही जवाब दूं।’

‘उनको सुनवाकर क्या तलाक दिलवाना चाहती है। कोई तेरा हाथ पकड़ने को भी राजी न होगा।’

‘तुम्हारा घर तो बस गया फिर तुम्हें किस बात की चिन्ता है।’

‘तू मेरे घर में आग लगाने की क्यों कोशिश कर रही है?’

‘कितना कुछ जल गया है अब तक?’

‘मैं जानती हूं, तू जरूर छिप-छिपकर उनसे मिलती होगी। अब तो स्वयं वह मुझसे बात तक नहीं करते।’ रजनी की आवाज भारी हो गई। ‘और इल्जाम मुझे देने आई हो। पति तुम्हारा दिल फेंक है और घर आने से तुमने मुझे रोका। मुझे मारने के लिए हाथ उठाया। मुझे अपमानित करके घर से निकाला। मिसेज प्रकाश, तुम वह रात भूल गई, जिस रात मैं चेक लेकर न आती तो आज तुम मांग में यह सिंदूर भरे न बैठी होती?’

‘ताना किस बात का देती है। वे रुपये तो बाबूजी के फन्ड के थे।’

‘तुम तो अपने बाप तक की वफादार नहीं हो। अपाहिज बाप के घर में फांके हो रहे थे, जहर फैलने से उनकी मौत हो जाती। इस बात की भी तो चिन्ता नहीं थी। एक परिवार में हर कोई पैसे वाला नहीं होता। किसी के पास कम होता है, किसी के पास ज्यादा तो किसी के पास कुछ नहीं। क्या अपना-अपना घर मिलते ही इस तरह आंखें बदल लेते हैं, जैसे किसी से जन्म का या खून का कोई रिश्ता ही न हो।’

‘मैं समझ गई।’ रजनी दांत पीसकर बोली, ‘तुम मुझसे और संध्या से नहीं, हम लोगों को खुशहाली से जलती हो। क्या तू किसी की किस्मत छीन सकती है? बाबूजी ने हमारे लिए क्या करके रखा था। दहेज के लिए भी बीस हजार रुपए फन्ड से लेने पड़े। वरना हम लोग भी अब तक तेरी तरह अनब्याही पड़ी रहतीं और अब देखेंगे कि तेरी शादी कैसे होगी। कौन आएगा तुझे पूछने?’

‘ऐ मिसेज प्रकाश।’ सुषमा आंखें निकालकर बोली, ‘इतना याद रखना कि मैं सुषमा हूं, जिसके कारण तुम दोनों बहनों के रिश्ते टूट जाते। और इतना याद रखो कि आज तुम सिर्फ नाम की मिसेज प्रकाश हो, इसलिए कि तुमने मेरे ऊपर झूठा आरोप लगाकर मेरा अपमान किया था। जब तक तुम मेरे अपमान का मुझसे माफी नहीं मांगोगी, समय से भी डरकर रहना कि तुम किसी दिन मेरी तरह इस जगह कैसी नजर आओगी। और सुषमा मिसेज प्रकाश बन चुकी होगी।’

‘लेकिन तू इतना गिर जाएगी, यह बात मैंने कभी सपने में भी नहीं सोची थी। बहन होकर बहन का घर बरबाद करोगी?’

‘तुम्हारा घर आबाद भी तो मैंने ही किया था। आज अपना घर बचाने के लिए मुझे बहन कह रही है। उस रोज मैं बहन नहीं थी जिस रोज मेरा अपमान करके मुझे घर से निकाला था?’

रजनी खौफनाक आंखों से उसे घूरती रही और बोली, ‘मैं मर भी जाऊंगी, लेकिन तुझसे माफी नहीं मांगूंगी।’

‘तब तो फिर तुम्हें मरना ही पड़ेगा।’ सुषमा खुलकर हंस पड़ी।

रजनी ने होंठ चबाकर अपने आंसू रोके और तेजी से बाहर निकल गई फिर प्रकाश से सम्बोधित होकर तेज स्वर में बोली-

‘चलो जी, घर में बहुत काम पड़ा है।’

‘अरे क्यों, सुषमा नहीं आई?’

‘मिल तो ली मैं सुषमा से।’

‘जरा मैं भी मिल लूं

रजनी ने झुंझलाकर कहा, ‘क्या तुम्हारा मिलना जरूरी है?’

‘अरे-अरे, यह मैंने कब कहा?’ प्रकाश बौखलाकर बोला।

‘अरे बेटी!’ बाबूजी ने जल्दी से कहा, ‘यूं बगैर चाय की प्याली के चली जाएगी तू घर से?’

तभी सुषमा ने दरवाजे से मुस्कराकर कहा, ‘बाबूजी, न घर में चाय है न शक्कर फिर यह लोग चाय कैसे पिएंगे?’

‘तो कहता कौन है पीने को।’

संध्या तमतमा कर उठती हुई बोली, ‘चलो जी चलो, हम बाबूजी को देखने आए थे यहां, हमारे लिए चाय और शक्कर की क्या कमी है।’

‘अरे, अब तो थूकने भी नहीं आएंगे, जब तक सुषमा यहां मौजूद है।’ रजनी ने गुस्से से कहा।

‘क्यों जीजाजी?’ सुषमा ने बड़ी मीठी आवाज में प्रकाश से कहा, ‘क्या आपका भी वही फैसला है जो मिसेज प्रकाश का है?’

‘नहीं, तुम बहनों का झगड़ा है, मुझे क्यों बीच में घसीटती हो। मेरी तो यह ससुराल है। बाबूजी मेरे पिता के समान हैं। और पप्पू मेरा साला। आज मैं पत्नी के कहने पर आना-जाना बन्द कर दूं और कल तुम बहनों में मेल-जोल हो जाए तो?’

सुषमा खिलखिलाकर हंस पड़ी और रजनी ने सख्ती से अपने होंठ भींचकर अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश की। बाबूजी सबको बारी-बारी देख रहे थे। उन्होंने क्रोधित होकर सुषमा से कहा-

‘बकवास बन्द करो।’

सुषमा चुप हो गई और बाबूजी ने कहा-

‘देखो तुम आपस में लड़ो, झगड़ो, सिर फुटोवल करो, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। मेरे मरने के बाद एक दूसरी की शक्ल भी न देखना। मगर जब तक मैं जिंदा हूं, यह घर मेरा है और तुम सब मेरी सन्तान हो। मेरी जिन्दगी में तुम्हें हर हाल में यहाँ आना पड़ेगा। समझे?’

कोई कुछ न बोला। सुषमा बड़े इत्मीनान से उठकर अंदर चली गई।

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सुषमा के बदन पर बड़ा ही कातिलाना लिबास था। ऐसा लिबास कि कोई भी मर्द देखे तो उसका दिल फड़क उठे। वह बड़े अच्छे मूड में ऑफिस के दरवाजे को जरा-सा खोलकर अंदर झांककर बोली, मैं अंदर आ सकती हूं?’

‘अरे आओ, आओ सुषमा।’ प्रिंसिपल जरा सम्भलकर बैठता हुआ मुस्कराया।

‘थैंक्स सर।’

सुषमा बड़े शोख अंदाज में अंदर आई और कुर्सी की तरफ इशारा करके बोली- ‘मैं बैठ सकती हूं, सर?’

‘अरे बैठो-बैठो, भला कौन रोक रहा है तुम्हें?’

‘थैंक्स सर।’

प्रिन्सिपल के चेहरे और आंखों से ऐसा लग रहा था जैसे उसकी लार टपक रही हो। उसने हाथ मलते हुए कहा-

‘अरे, तुम तो उस रोज के बाद नजर ही नहीं आई?’

‘दरअसल, मेरे बाबूजी की तबीयत खराब हो गई थी।’

‘अरे, पहले क्यों नहीं बताया? हम देखने आते उन्हें।’

‘कोई बात नहीं अब पधारिएगा, घर है आपका।’

‘जरूर-जरूर,’ प्रिंसिपल ने हाथ मलते हुए कहा, ‘मगर वह तुम्हारा रिजल्ट, क्या तुम्हें डिग्री नहीं लेनी?’

‘क्यों नहीं सर, मुझे टाइप और शार्टहैंड सीखनी है, इसलिए डिग्री जरूरी है।’

‘मगर जब तक रिजल्ट रुका रहेगा, डिग्री कैसे मिलेगी?’

‘यही तो मैंने सोचा था, सर।’

‘अरे, तुम बिना कारण चिंता में पड़ती हो। तुम आज शाम को आ जाना, मैं तुम्हारा रिजल्ट क्लीयर करा दूंगा।’

‘सर।’ सुषमा ने बड़ी शोखी से कहा, ‘रिजल्ट तो मैंने क्लीयर करा लिया है।’

‘क्या?’ प्रिंसिपल का चेहरा फीका पड़ गया।’ बस अब तो उस एप्लीकेशन पर आपके साइन होने रह गए हैं, जो मैंने डिग्री के लिए लिखी है।’

सुषमा ने एप्लीकेशन प्रिंसिपल के सामने रखी। प्रिंसिपल के चेहरे का रंग उड़ गया था, जैसे किसी शिकारी के जाल में आते-आते कोई खूबसूरत पंछी फुर्र से उड़ गया हो। उसने कांपते हाथों से अपना चश्मा ठीक किया और फिर पेन उठाकर एप्लीकेशन पर दस्तखत करने लगा। सुषमा बड़े शोख अंदाज से टांगें हिलाती हुई उसे देखती रही। प्रिंसिपल ने साइन करके एप्लीकेशन उसकी तरफ बढ़ा दी। सुषमा ने एप्लीकेशन उठाते हुए बड़ी शोखी से कहा, ‘थैंक्स सर।’

फिर वह ऑफिस से निकल आई। प्रिंसिपल उसे इस तरह देखता रहा, जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और वह एकदम कंगाल हो गया हो।

सुषमा बाहर आई तो अचानक लता की गाड़ी उसके पास आकर रुक गई। उसने जोर से पुकारा- ‘हाय सुषमा।’

सुषमा धीरे-धीरे चलती हुई उसके नजदीक आई और लता ने हंसकर कहा, ‘कमाल है, तेरी तो सूरत ही देखने को नहीं मिलती। जानती है, आन्टी कितनी बार पूछ चुकी है तुझे, और वह के. के. तो पन्द्रह हजार रुपये लेकर रोज इस आस में आन्टी के चक्कर लगाता है कि तू फिर कब आएगी।’

लता की बात खत्म हो गई। मगर सुषमा फिर भी कुछ न बोली। वह चुपचाप लता को देख रही थी।

‘चल कहां चलना है, तुझे छोड़ दूंगी।’

‘अरे क्या हो गया है, तुझे?’ लता ने हैरानी से पूछा, ‘क्या तू बहरी और गूंगी तो नहीं है?’

‘माफ कीजिए?’ सुषमा ने गम्भीरता से कहा , ‘मैंने आपको पहचाना नहीं और अजनबी लोगों से मैं बेतकल्लुफी पसन्द नहीं करती।’

‘क्या?’

लता की मुंह खुला रह गया। सुषमा बड़े इत्मीनान के साथ रजिस्ट्रार के दफ्तर की तरफ बढ़ गई। लता के चेहरे से ऐसा लगता था जैसे वह बेहोश होकर गिर पड़ेगी।

12

नौकरी के उम्मीदवारों में सबसे पहला नाम सुषमा का ही था, क्योंकि वह रघुनन्दन जी का खत लेकर आई थी। हालांकि खत देखकर असिस्टेंट मैनेजर ने कहा था, ‘बेटी तुम बेकार ही खत लाई हो, क्योंकि छोटे मालिक सिद्धांतों के बहुत पक्के हैं, वह योग्यता के आधार पर तो नौकरी दे सकते हैं, सिफारिश के जोर पर नहीं। फिर भी मैं तुम्हारी एप्लीकेशन सबसे पहले रख देता हूं।’

‘थैंक्स अंकल, बस इतना ही काफी है।’

फिर वह उम्मीदवारों की कतार में बैठ गई थी, जिनमें लड़के कम थे और लड़कियां ज्यादा। लड़के जो थे भी वह पहले से ही निराश नजर आ रहे थे और लड़कियों को इस तरह से देखते थे जैसे यह तितलियां कहां से उनका पत्ता काटने आ गई। दूसरी तरफ हर लड़की अपने आपका ज्यादा स्मार्ट और खूबसूरत सिद्ध करने की कोशिश कर रही थी, मगर सुषमा के आने के बाद उन लड़कियों के चेहरों पर फटकार-सी बरसने लगी थी। जाने क्यों उन्हें ऐसा लग रहा था कि अब उन्हें निराश होना पड़ेगा।

फिर सब से पहले सुषमा का ही नाम पुकारा गया। सुषमा एक अदा के साथ उठी। ऑफिस के पास पहुंची और बड़ी सभ्यता से बोली, ‘मैं अन्दर आ सकती हूं, सर?’

‘कम इन प्लीज।’ आवाज में कुछ गुस्सा था।

सुषमा आराम और बड़े आत्मविश्वास से दफ्तर में प्रविष्ट हुई। केदार की पीठ दरवाजे की तरफ थी और रघुनन्दन का लैटर और सुषमा की एप्लीकेशन उसके हाथ में थी। उसने बगैर मुड़े हुए गुस्से से पूछा-

‘मिस सुषमा वर्मा, मिस्टर रघुनन्दन वर्मा आपके पिता हैं?’

‘यस सर।’

‘और आप सिफारिश के लिए उनका पत्र लाई हैं क्योंकि वह यहां एक लम्बे अर्से तक हैड क्लर्क रह चुके हैं?’

‘सर, आपने अभी तक मुझे बैठने के लिए नहीं कहा।’

‘व्हाट!’ केदार गुर्रा कर मुड़ा, दूसरे ही क्षण उसकी आंखें इस तरह फटी रह गई, जैसे उसके सामने दुनिया का आठवां आश्चर्य खड़ा हो।

सुषमा अपनी खूबसूरती में इस समय सचमुच दुनिया का आठवां आश्चर्य नजर आ रही थी। केदार जाने कितनी देर तक उसे यूं ही देखता रहा। अचानक सुषमा ने खामोशी तोड़ी और एक खास अदा के साथ मुस्कराती हुई बोली- ‘क्या अब भी मैं खड़ी रहूं, सर?’

‘अरे।’ केदार हड़बड़ा कर जैसे होश में आ गया और जल्दी से सम्भलकर बैठता हुआ बोला, ‘बैठिए बैठिए, आप खड़ी क्यों हैं?’

‘थैंक्स सर।’

सुषमा इत्मीनान के साथ बैठ गई। उसके बैठने के ढंग में इतना ज्यादा आत्म-सम्मान था और वह इतना आकर्षक था कि केदार नर्वस नजर आने लगा था। वह एप्लीकेशन और रघुनन्दन का लेटर मेज पर रखता हुआ बोला, ‘आप ठण्डा, लेना पसन्द करेंगी या गर्म?’

‘सर आप भूल रहे हैं, मैं यहां इन्टरव्यू के लिए आई हूं, नौकरी के लिए।’

‘आप अंकल रघुनन्दनजी की बेटी हैं ना?’

‘उनका खत आपके सामने रखा है। मेरे बाबूजी ने इस फर्म की सेवा में बीस साल से कुछ ज्यादा ही गुजारे हैं।’

‘मेरे डैडी भी उनकी बहुत तारीफ करते हैं। कल जब घर पर आपकी एप्लीकेशन और रघुनन्दनजी का लेटर मिला था और अब वह अपाहिज हैं। उनकी बेटी का खास ख्याल रखना।

‘शायद आपको मेरा ख्याल रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’

‘जी, मैं समझा नहीं।’

‘आपकी फर्म के लिए एक स्टैनो टाइपिस्ट की जरूरत है न?’

‘जी हां।’

‘मेरी टाइपिंग स्पीड छियासठ शब्द प्रति मिनट है। शायद इन सब उम्मीदवारों में किसी की स्पीड इतनी नहीं होगी।’

‘ओह गॉड, वैरी फाइन।’

‘नम्बर दो, शार्टहैन्ड में मेरी स्पीड फास्टेस्ट है। आप चाहें तो परीक्षा ले सकते हैं।’

‘वैरी गुड।’ केदार ने कहा, ‘मगर एक आखिरी प्राब्लम रह जाती है।’

‘हुक्म कीजिए।’

‘दरअसल मुझे स्टैनो के अलावा एक पर्सनल सेक्रेटरी की भी जरूरत थी।’

सुषमा मुस्कराकर उसकी बात काटती हुई बोली-

‘जो पार्टियों में आपके साथ जा सके और जब आप पर्सनल सेक्रेटरी के साथ पार्टी में पहुंचें तो पार्टी में मौजूद हर आदमी आपको हसरत भरी नजर से देखने लगे।’

‘जी वह....!’

‘देखिए, कोई बड़ा आदमी किसी भी क्लब, होटल, फंक्शन या पार्टी में अपनी पर्सनल सेक्रेटरी के बगैर अधूरा समझा जाता है। क्या मैं गलत कह रही हूं?’

‘आप तो जरूरत से ज्यादा समझदार दिखाई दे रही है।’ केदार अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराया।

‘शायद- एक सफल पर्सनल सेक्रेटरी में जिन खूबियों की जरूरत होती है, उन पर भी मैं पूरी उतर सकूं।’

‘मेरे ख्याल से, आपका ख्याल गलत नहीं है।’ केदार ने मुस्कराकर कहा, ‘मैं आपका एप्वाइंटमेंट लेटर बनवाए देता हूं।’

‘एक मिनट, मैं तो आपकी जरूरतों पर पूरी उतरती हूं सर, मगर मेरी भी कुछ शर्तें होंगी।’

‘हां, कहिए।’

‘मेरा वेतन?’

‘बतौर स्टैनोग्राफर पन्द्रह सौ रुपए माहवार और बतौर पर्सनल सेक्रेटरी ढाई हजार रुपये महावार।’

‘माफ कीजिए सर, मेरे काम से आपकी फर्म का स्टैंडर्ड और सम्मान जिस स्तर से बढ़ेगा, उसे देखते हुए यह राशि बहुत कम है।’

‘इतना ज्यादा विश्वास है, आपको अपने पर।’

‘तनख्वाह तो एक महीने बाद ही मिलेगी।’

‘चलिए दोनों पोस्टों के लिए फिलहाल पांच हजार से स्टार्ट करते हैं।’

‘स्वीकार है। मगर कुछ और शर्तों भी होंगी मेरी।’

‘वह क्या?’

‘नम्बर एक, पांच वर्ष का एग्रीमेंट। मेरी कई सहेलियों को शिकायत है कि जब उनके बॉस उनकी निकटता से उकता जाते हैं तो एक महीने की तनख्वाह बतौर नोटिस देकर उनकी छुट्टी कर देते हैं। मगर आप मुझे पांच वर्ष तक मेरे काम में कोई गलती निकाले बगैर नहीं निकाल सकते। या बगैर किसी विशेष कारण के जैसे साल दो साल में मैं शादी कर लूं नौकरी छोड़ना चाहूं तो आप मुझे तो खुशी से एक महीने के नोटिस पर छुट्टी दे सकेंगे।’

‘शर्तें काफी सख्त हैं। मगर आप जैसी स्टैनो और पर्सनल सेक्रेटरी के लिए, इतनी खूबसूरत और स्मार्ट लड़की के लिए, शर्तें स्वीकार की जा सकती हैं।’

‘थैंक्स सर।’

केदार ने मुस्कराकर इन्टरकाम का बटन दबाया और असिस्टेंट मैनेजर को फोन पर बाकी उम्मीदवारों को विदा करने का आदेश देकर सुषमा का एग्रीमेन्ट और ‘एप्वाइंटमेन्ट लेटर’ डिक्टेट कराने लगा। सुषमा की कलम जितनी तेजी से चल रही थी, उसे देखकर केदार को आश्चर्य हो रहा था। कभी वह उसकी खूबसूरत अंगुलियों की बनावट को देखता और कभी उसके होंठों के आकर्षक किनारे को देखकर उसके शरीर में सनसनी दौड़ जाती। और यह सोच-सोचकर उसका दिल जोर-जोर से धड़क उठता कि अब यह सुन्दर काया हर तरह से उसके काम आएगी।

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सुषमा वर्ली की गली में दाखिल हुई तो उसका लिबास, उसके चलने का अंदाज और उसकी मदमस्त अदाओं को देखने के लिए शायद पहले से ही बस्ती के कई आवारा छोकरे तैयार खड़े थे। उन्होंने उसे देखती ही जल्दी से पैंतरे बदले और एक लड़का जो उनका रिंग लीडर लगता था, दिल पर हाथ रखकर सीटी बजाता हुआ बड़बड़ाया, ‘भगवान की सौगन्ध, कलेजा निकाल कर ले गई सीने से।’

‘सुषमा के कानों तक उसकी सीटी की आवाज पहुंची थी। वह बड़े इत्मीनान से किसी और लड़के की तरफ रुख करके बड़े आकर्षक और दिलफरेब ढंग से मुस्कराई। और लड़का सीने पर हाथ मारकर बुरी तरह कराहा- ‘हाय गजब....।’

‘चन्दन!’ सुषमा ने बड़े प्यार से उसे पुकारा।

‘सुषमा जी।’ चन्दन हाथ मलता हुआ उसके नजदीक पहुंच गया।

सुषमा ने बड़े इत्मीनान और प्यार से अपनी सैन्डल उतार ली और उसे दिखाकर बोली - ‘जानते हो, इसे क्या कहते हैं?’

‘सैंडल।’

‘और इसका नम्बर?’

‘पांच।’

‘जरा गिनना तो शुरू करो।’ सुषमा ने उसके सिर पर ताड़-ताड़ सैन्डल बजाते हुए कहा।

‘एक-दो तीन चार-पांच।’

चन्दन बौखलाकर पीछे हटता चला गया था। सैन्डल की एड़ी की चोटों से उसके सिर पर पांच जगह, गांठें उठ आई थीं। बाकी लड़के दुम दबाकर भाग गए थे। चन्दन के भागने से पहले ही उसने झपटकर चन्दन का गिरेबान पकड़ लिया था और बड़े सन्तोष से मुस्कराती हुई बोली, ‘चन्दन भैया, जब तुम नाली पर पेशाब किया करते थे, तब तुम्हारा कद मुझसे दस पांच इंच जरूर छोटा होगा। कद बढ़ जाने से उम्र नहीं बढ़ जाती। इतना याद रखना कि मैं इसी बस्ती की एक खोली में पैदा हुई हूं। वैसे इस बस्ती की सारी लड़कियां तुम लोगों की बहनों के समान हैं और जो लोग उन रिश्तों को भूल जाते हैं, उनके लिए यह पांच नम्बर का सैन्डल और पांच निशान याद कराने के लिए काफी हैं। समझो?’

‘स....समझ गया।’ चन्दन रुआंसी सूरत बनाकर बोला।

‘शाबाश! अब अच्छे भाई की तरह कान पकड़कर पांच बार उठक-बैठक करो ओर फिर चलते फिरते नजर आओ।’

चन्दन ने पांच बार उठक-बैठक की और फिर बेतहाशा भागता हुआ नजर आया। सुषमा बड़े इत्मीनान से अपने घर की तरफ बढ़ गई। इलाके के कुछ और लोगों ने भी यह तमाशा देखा था। उनके तेवर अच्छे नहीं नजर आ रहे थे, लेकिन सुषमा का अंदाज ऐसा ही था जैसे वह उन सबको अपने जूतों की नोक पर रखती हो।

थोड़ी देर बाद उसने घर में प्रवेश किया तो देखा, पप्पू लाल रंग की ऊंची गद्दीवाली साइकिल को घर में ही चलाकर प्रेक्टिस कर रहा था। सुषमा को देखते ही वह चिल्लाया-

‘दीदी आ गई? देखो, अब मैं सड़क पर भी साइकिल चला सकता हूं।’

‘शाबाश! अब तुम आराम से साइकिल पर स्कूल जाया करोगे। बस का चक्कर खत्म। तुम्हारे लिए इस महीने दो यूनिफार्म और बनवा दिए जाएंगे।’

‘ओह! थैंक्स दीदी!’

‘अब तुम गली में जाकर साइकिल चलाने की प्रेक्टिस करो।’

‘दीदी, मैं सुबह गली में गया था, मगर लड़के साइकिल छीनने लगते हैं। एक लड़के ने मुझे गिरा ही दिया था।’

‘और तुम नामर्द होकर चुपचाप चले आए।’ सुषमा ने गुस्से से कहा, ‘जाओ, साइकिल लेकर बाहर जाओ। अगर तुम्हारी तरफ नजरें भी उठाकर देखे तो उसकी आंखों में मिट्टी झोंक देना। कोई साइकिल को हाथ लगाए तो उस पर साइकिल चढ़ा देना। कोई जुबान से कुछ कहे तो उसे पत्थर खींच मारना। बाकी जो कुछ होगा, मैं देख लूंगी।’

पप्पू खुशी-खुशी साइकिल लेकर बाहर चला गया।

‘तुम आ गई, सुषमा?’

‘हां, बाबूजी।’ सुषमा बाबूजी की ओर मुड़ी जो व्हीलचेयर पर थे- देखिए मैं आपके लिए टॉनिक लेकर आई हूं। इसमें कई विटामिन्स हैं और आपको हर वक्त बैठे रहने से बदहजमी की शिकायत भी नहीं होगी।’

‘पप्पू को बाहर भेज दिया?’

‘हां, वह बाहर साइकिल नहीं चला सकेगा तो स्कूल कैसे जाया करेगा?’

‘और साथ में उसे आवारा लोगों की शिक्षा भी दे रही हो?’

तभी पप्पू लौट आया। उसका मुंह फूला हुआ था और वह सुषमा से नजरें बचाने की कोशिश कर रहा था।

सुषमा ने उसे आश्चर्य से देखा और बोली-

‘क्या हुआ, तुम लौट क्यों आए?’

‘कुछ नहीं।’ पप्पू झटके से कमरे की तरफ जाने लगा।

‘ठहरो।’ सुषमा ने सख्ती से कहा।

पप्पू ठहर गया। मगर सुषमा की तरफ मुड़ा नहीं। सुषमा ने उसी सख्ती से कहा-

‘मेरी तरफ मुंह करो।’

पप्पू मुड़ा। मगर उसकी नजरें झुकी ही रहीं। सुषमा ने सख्ती से पूछा-

‘वापस क्यों आ गये? बताते क्यों नहीं?’

‘वे लड़के।’ पप्पू ने कहा, ‘जो कुछ कहते हैं, मैं सुन नहीं सकता।’

‘क्या कहते हैं वह लड़के?’ सुषमा ने आंखें निकालकर पूछा।

‘वह....वह चन्दन कह रहा था, दीदी धंधा करती है, भाई ऐश करता है।’

सुषमा को ऐसा लगा जैसे उसके तन-बदन में आग लग गई हो। उसने बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से पर काबू करते हुए कहा-

‘तुमने क्या जवाब दिया?’

‘मैं क्या जवाब देता?’

इसके साथ ही सुषमा का एक जन्नाटेदार चांटा पप्पू के मुंह पर पड़ा और पप्पू हड़बड़ाकर कई कदम पीछे हट गया। उसके गाल पर सुषमा की अंगुलियों के निशान उभर आए थे। और सुषमा कह रही थी-

‘तुमने उनकी बात का जवाब नहीं दिया। इसका मतलब है कि तुम भी अपने नहीं हो। यही सवाल तुम कभी मुझसे पूछते तो तुम्हारे सवाल का जवाब मैंने आज ही दे दिया है, ताकि भविष्य में तुम्हारे दिमाग में कभी यह सवाल सिर न उठाए।’

तभी बाबूजी गुस्से से व्हीलचेयर को आगे बढ़ाते हुए बोले-

‘बहुत खूब जवाब दिया है छोटे भाई को, उसके मुंह पर चांटा मार कर। इसलिए कि वह आज तुम्हारी कमाई का मोहताज है। शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे बारे में इलाके वाले क्या-क्या कहने लगे हैं। दरवाजे के सामने से इतनी जोर से खुले आम बातें करते हुए गुजरते हैं कि सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है।’

‘अच्छा।’ सुषमा ने व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ कहा, ‘किन पड़ोसियों की बातें कर रहे हैं आप? चन्दन के बापू का धन्धा जानते हैं। कच्ची दारू की भट्टी है। नन्द लाल के घरवालों को जानते हैं आप? खूबसूरत पत्नी का बदसूरत शौहर जो महीने में आठ दिन मजदूरी करने जाता है। उसका बाकी खर्चा कैसे चलता है?’

‘दुनिया में करोड़ों बुरे काम होते हैं।’ हमें अपने घर से मतलब है या बाहर किसी से। अपनी इज्जत के हम खुद रखवाले हैं।’

‘क्या यही बात वे लोग नहीं सोच सकते?’

‘इसलिए कि वे जाहिल हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं।’

‘तो जाहिलों को उनकी जबान में ही जवाब देना चाहिए। मैं आज ही रात को चन्दु के बाप के यहां छापा पड़वाकर उसकी भट्टी बन्द करवा दूंगी। और कल रात नन्दलाल की पत्नी की जासूसी करूंगी।’

‘तो क्या इन हरकतों से उन सवालों का जवाब मिल जाएगा जो पड़ोसी पप्पू से पूछते हैं।’

‘क्या मतलब?’ सुषमा चौंककर हैरत से बोली।

‘मान लो जो सवाल तुमसे पप्पू ने किया है, वही सवाल मैं पूछूं तो मुझे भी वही जवाब दोगी जो तुमने पप्पू को दिया है?’

‘बाबूजी... क्या आपके दिमाग में यह सवाल है?’

बाबूजी ने पहिए घुमाकर कुर्सी मोड़ी और उसकी तरफ पीठ करके धीरे से बोले- ‘अगर मैं कहूं हां है, तो?’

‘मगर मैं आपको इस सवाल का जवाब देने से पहले कुछ सवाल करूं तो क्या आप उनका जवाब देंगे?’

‘मैं गूंगा नहीं हूं।’

‘तो फिर मेरे पहले सवाल का जवाब दीजिए। आपने पढ़े-लिखे होकर भी कोई सरकारी नौकरी क्यों नहीं की जिसमें रिटायरमेन्ट के समय आपको इज्जत से फन्ड भी मिलता और पेंशन भी?’

‘आपको फर्म से जो वेतन मिलता था, उसका आपने कभी कोई बजट क्यों नहीं बनाया?... कतरा-कतरा दरिया होता है। अगर आपने पांच रुपये माहवार भी जमा किए होते तो बीस वर्ष की नौकरी में किया आपको फर्म के फन्ड से बीस हजार रुपया कर्ज लेने के नौबत आती? क्या आपने यह नहीं सोचा था कि आपकी सन्तान में तीन लड़कियां हैं, लड़के के कमाने का जब समय आएगा, तब आपकी गर्दन और हाथ हिलते होंगे?’

‘फिर जब आपने फन्ड से बीस हजार रुपये का कर्ज मांगा था और आपकी फर्म के मैनेजर ने रात को उस कर्ज का चेक देने के लिए मुझे ही बुलाने का दबाव डाला था तो आपने मेरे बार-बार इन्कार करने पर भी क्यों मुझ पर दबाव डाला था कि चेक लेने मैं ही जाऊं? क्या उस समय आपके लिए मस्तिष्क में एक ही बात नहीं थी कि संध्या और रजनी के फेरे रुक जाएंगे?’

तभी बाबूजी ने एक झटके से कुर्सी उसकी तरफ घुमाई। उनके चेहरे पर एक भूकम्प-सा था और एकाएक सुषमा को अहसास हुआ कि वह कुछ ज्यादा ही बोलती जा रही है। उसने अपने आपका सम्भाला और फिर बोली- ‘अब आपकी आंखें मुझसे जो सवाल कर रही है, उनका मतलब भी समझाती हूं। शायद आपको याद होगा उसी रात आपका एक्सीडेंट हुआ था और उसी रात से प्रेम अपनी कार के साथ गायब है।’

‘हां।’ बाबूजी की आवाज कांप गई, ‘मगर-’

‘उसने मुझे चेक दिया था और फिर वह जो कुछ चाहता था, उसके बदले में उसे धोखा देने के बाद बाहर भाग आई थी। भागते-भागते मैंने बस पकड़ी थी। प्रेम कार लेकर मेरे पीछे दौड़ा था। उसने मुझे बस में सवार होते देख लिया था, मगर वह शराब के नशे में धुत्त था। टीले से उसकी कार टकराई थी। वर्ली के पास उसकी जली हुई कार का मलबा भी पुलिस को मिला था, जिसमें जली-भुनी लाश की शिनाख्त तक न हो सकी थी।’

सुषमा की बात खत्म होने के बाद भी बाबूजी उसे आंखें फाड़कर देख रहे थे। और ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें सुषमा की बात पर कुछ विश्वास भी हो और कुछ न भी हो। मगर अब सुषमा शांत हो चुकी थी। उसके चेहरे और आंखों से गुस्सा उतर चुका था। उसने गम्भीरता से कहा ‘मेरा ख्याल है, अब आपको किसी और सवाल की जरूरत नहीं होगी और न आज के बाद मैं ही कोई नया सवाल सुनना पसन्द करूंगी।’

फिर वह तेजी से अपने कमरे की तरफ चली गई। रघुनन्दन उस दरवाजे की तरफ देखते रह गए, जिस दरवाजे से सुषमा गई थी। उनकी आंखों में आंसुओं की दो बूंदें चमक रही थीं मगर वह पलकों से गिरा नहीं पा रहे थे।

14

सुषमा के शरीर पर एक बहुमूल्य और बेहतरीन कपड़े की झिलमिल करती हुई पोशाक थी और केदार उसके साथ अपने आपको बहुत खुशनसीब महसूस कर रहा था, क्योंकि सचमुच उस रोज कॉन्फ्रेंस में बहुत बड़े-बड़े लोग आए हुए थे और उनमें से किसी की भी साथी लड़की इतनी आकर्षक और सुन्दर नहीं लग रही थी, जितनी सुषमा नजर आ रही थी।

यह होटल होराइजन का हॉल था, जहां किसी फर्म की तरफ से पार्टी दी गई थी और वहां देश की बड़ी-बड़ी फर्मों और फैक्टरियों के मालिक आए हुए थे। हॉल में आर्केस्ट्रा पश्चिमी धुन बजा रहा था। रंग-बिरंगे आंचल लहरा रहे थे। एक अर्ध-नग्न नर्तकी स्टेज पर रंग-बिरंगी जलती-बुझती रोशनियों में अपना जिस्म हिला रही थी, लेकिन उसकी तरफ किसी का भी ध्यान नहीं था। हल्के-फल्के नग्मे गूंज रहे थे। औरतें अपनी आरजुओं और इरादों को ज्यादा-से-ज्यादा दिलकश बनाने के चक्कर में सीमाओं से भी आगे निकली जा रही थी।

केदार बड़े गर्व से सुषमा का हाथ अपने हाथ में लिए हुए हॉल में दाखिल हुआ था और चारों तरफ से आवाज आई थी-

‘हाय! मिसेज केदार।’

‘हाय।’

‘हाय।’

जब केदार और सुषमा के गिर्द। भीड़ जमा हो गई तो केदार ने परिचय कराया- ‘यह मेरी पर्सनल सेक्रेटरी है, मिस सुषमा वर्मा।’

‘यह मिस्टर सुशील कुमार, स्टील किंग भी है और सोशल वर्कर भी। कई मन्दिर और कई मस्जिदें बनवा चुके हैं।’

‘यह हैं मिस्टर श्यामनन्दन मिश्रा-मिश्रा फेब्रिक्स के मैनेजर।’

‘यह हैं मिस्टर घनश्यामदास मिश्र- सावित्री एडवरटाइजिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर।’

‘प्लीज्ड टू मीट यू।’

‘प्लीज्ड टू सी यू।’

लोग बढ़-बढ़कर सुषमा से हाथ मिला रहे थे। सुषमा का सौन्दर्य जैसे उस समय गजब ढा रहा था। उसकी मुस्कराहट ने हॉल में मौजूद सारी औरतों की मुस्कराहटों को बेजान बना दिया था। इतने में ट्रॉलियां हरकत में आ गई। सब ने अपने-अपने पैग उठा लिए। केदार ने शैम्पेन का एक पैग सुषमा की ओर बढ़ा दिया। सुषमा ने पैग एक दिलकश कहकहे के साथ लिया। सब ने चीयर्स कहा।

सबने पहला-पहला घूंट लिया। लेकिन सुषमा ने पैग को इस तरह होंठों से लगाया जैसे उसने घूंट भरा हो और फिर बातें करने लगी। बातें करते-करते अचानक म्यूजिक शुरू हो गया और जोड़े एक-दूसरे के साथ फ्लोर पर नाचने लगे। सुषमा ने अपना पैग पास से गुजरती हुई एक ट्रॉली में इस तरह रख दिया कि कोई देख न ले कि वह खाली है या नहीं।

फिर केदार ने सुषमा को बांहों में लिया और फ्लोर पर आ गया। डांस करते-करते केदार ने कहा- ‘खुदा की कसम, आज मैं अपने आपको दुनिया का सबसे खुश किस्मत सरमाएदार समझ रहा हूं।’

‘रीयली?’ सुषमा जोर से हंसी।

‘सच मानो जितनी भी आई हुई हैं, सब के चेहरे उतर गए हैं तुम्हें देखकर। शायद यह दुआ कर रही होंगी कि तुम वापस चली जाओ।’

सुषमा फिर धीरे से हंसी। केदार ने फिर कहा-

‘कल अपनी नजर जरूर उतरवाना।’

‘थैंक्स सर।’

‘मगर हां, तुमने शैम्पेन क्यों नहीं ली थी?’

‘आपने पैग तो दिया था।’

‘मगर वह पैग तुमने ज्यों-का-त्यों ट्रॉली में रख दिया था, मैंने यह भी देखा था।’

‘आप मेरे बाबूजी को जानते ही हैं, अगर मैं पैग लेकर घर जाती तो?’

‘लेकिन सोसायटी ज्वाइन करोगी तो पीनी ही पड़ेगी। न पीनेवाले को लोग काफिर कहते हैं।’

इतने में ही डांस फ्लोर पर एक अधेड़ आदमी ने सुषमा की तरफ हाथ बड़ा दिए और केदार को विवश होकर अपनी पार्टनर उसकी पार्टनर से बदलनी पड़ी। फिर सुषमा एक सूटेड-बूटेड आदमी के साथ डांस कर रही थी। वह बेहद नशे में मालूम होता था। लड़खड़ाती आवाज में बोला- ‘जानती हैं, मैं कौन हूं?’

‘इस पार्टी के मेहमान।’

‘गलत, ‘वह आदमी गर्दन झटककर बोला, ‘इस पार्टी में जितने कीमती लिबासवाले नजर आ रहे हैं वे सब अंदर से उतने ही घटिया है।’

‘अच्छा?’

‘इनमें से कोई भी मेरा मुकाबला नहीं कर सकता।’

‘कुश्ती में?’

‘नहीं, मेरी योग्यता और मेरी अक्ल में।’

‘अच्छा, आप कौन है?’

‘मैं आर्ट फिल्मों का निर्माता हूं। स्वतंत्र बख्शी मेरा नाम है। क्योंकि मैं अपने थिकिंग के मामले में बिल्कुल आजाद हूं। मैंने हिन्दुस्तान की पुरानी परम्पराओं को जिंदा किया है। मैंने पश्चिम की तरफ दौड़ते हुए दिमागों का रुख मोड़ा है, अपने देश के कल्चर, अपने देश की सभ्यता की ओर। वह देश जिसमें औरत को कैबरे कराने या बेदिंग सूट पहनाने के बहाने नंगा नहीं किया जाता। बल्कि भारतीय औरत का असली रूप दिखाया जाता है। वह भारतीय औरत जो सीता भी थी और सावित्री भी और झांसी की रानी भी।’

‘और शूर्पनखा भी।’ सुषमा हंसकर बोली।

‘शी...शी...शी-काम की बात सुनो।’

‘जी, सुनाइए।’

‘मैं एक बहुत बड़ी फिल्म बना रहा हूं। रामायण पर तीन साल से मेरी रिसर्च चल रही है और स्क्रिप्ट तैयार किया जा रहा है। जिसे मैंने दस करोड़ के बजट से तीन जुबानों में बनाने का फैसला किया है।’

‘अच्छा!’

‘पर देखिए, दिलीप कुमार खुद मेरे पास भागकर आया था लक्ष्मण के लिए, अमिताभ और धर्मेन्द्र पीछे पड़े हुए हैं। मगर मैंने फैसला नहीं किया-दशरथ के लिए मैंने चार्ल्स हस्टन से एग्रीमेंट किया है।’

‘वैरी गुड!’

‘दिलीप कुमार के मुकाबले में मैं एक नई हीरोइन को पेश कर रहा हूं।’

‘दिस इज आलसो गुड।’

‘तुम्हें यह फटीचर केदार कितनी तनख्वाह देता है?’

‘पांच हजार रुपये महीना।’

‘बस।’ वह हिकारत से बोला, ‘मैं तुम्हें दिलीप कुमार के मुकाबले में हीरोइन बनाऊंगा। दस हजार रुपए माहवार। आने-जाने के लिए गाड़ी और रहने के लिए बंगला। पब्लिसिटी पर पांच लाख रुपया अलग से खर्च करूंगा। बोलो मंजूर हैं?’

‘मगर मेरा इस फर्म से पांच वर्ष का एग्रीमेंट है।’

‘शश- एग्रीमेंट तो एक घूंस में टूटता है। मेरे पास ऐसे बहुत सारे हथियार हैं, बस तुम खूबसूरत होंठों से हां करो, जिन्हें देखते-देखते मेरा ब्ल्डप्रेशर कई गुना बढ़ चुका’ है फिर वह सुषमा के होंठों को चूमने के लिए झुका तो सुषमा जल्दी से बीच में हाथ लाती हुई बोली-

‘अरे-रे-रे! यह आप क्या कर रहे हैं?’

‘दस हजार रुपए महीना! बंगला, कार, पब्लिसिटी।’

‘मुझे सीता बनाने के लिए जो भारतीय नारियों के लिए एक आदर्श थी। फिर भारतीय नारी का भविष्य क्या होगा?’

इतने में दोनों के बीच केदार आ चुका था जो काफी जला-भुना नजर आ रहा था। सुषमा फिर केदार के साथ डांस कर रही थी। अब शायद केदार ज्यादा पी चुका था। उसने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा-

‘क्या बकवास कर रहा था- यह उल्लू का चरखा?’

‘मुझे दिलीप कुमार के साथ सीता बनाकर मेरे होंठों को किस करने की कोशिश कर रहा था।’

‘बास्टर्ड।’ केदार गुर्राया- ‘यहां मौजूद हर आदमी की नजरें तुम्हारे ऊपर ही हैं।’

‘तो चलो, खिसक चलें।’

दोनों भीड़ से बाहर निकल आए। जब केदार दरवाजे की बजाय लिफ्ट की तरफ बढ़ने लगा तो सुषमा ने कहा- ‘दरवाजा उधर है।’

‘अरे चलिए, ऊपर चलेंगे।’

‘किस लिए?’

‘अरे, मैंने रूम बुक कराके रखा है, रात-भर के लिए। डिनर भी वहीं मंगवाया है। इस सभ्य जंगलीपन से अलग-थलग बैठेंगे।’

‘तो कहीं खुले में चलिए ना।’

‘क्या मतलब फिर रूम काहे के लिए बुक कराया है?’

‘रूम तो आपने बुक कराया है, मैंने नहीं।’

मगर मैंने तो तुम्हारे लिए ही बुक कराया है।’

‘क्यों? क्या मेरा घर नहीं है?’

‘मजाक छोड़ो सुषमा, फिर कोई आ टपकेगा।’

केदार उसे गौर से देखता रहा। फिर गम्भीरता से बोला- ‘क्या तुम सीरियस हो?’

‘क्या मैं आपको नॉन-सीरियस नजर आती हूं?’

‘फिर तुमने नौकरी काहे के लिए की थी?’

‘काम के लिए, वह मैं करती ही हूं।’

‘मैं कहता हूं, पर्सनल सेक्रेटरी काहे के लिए बनी थी?’

पर्सनल सेक्रेटरी का कर्तव्य पूरा करने के लिए।’

‘फिर इंकार क्यों?’

माफ कीजिए, पर्सनल सेक्रेटरी के काम में क्या यह भी शामिल होता जो एक पत्नी या खरीदी हुई औरत कर सकती है?’

‘यह बात क्या तुम्हें पहले नहीं मालूम थी?’ केदार गुस्से से कांपता हुआ बोला।

‘पहले नहीं मालूम थी, क्योंकि एग्रीमेंट में ऐसी कोई शर्त नहीं थी।’

‘मैं तुम्हें डिसमिस कर दूंगा।’

‘पांच साल से पहले आप मुझे डिसमिस कर ही नहीं सकते।’

‘बकवास बन्द करो।’

‘सर, आप मेरे बॉस हैं, कुछ भी कह सकते हैं।’

‘मैं कहता हूं, तुम मेरे साथ ऊपर चलती हो या नहीं?’

‘वह देखिए-लाल कपड़ों वाली लड़की।’ सुषमा ने हंसकर कहा, ‘वह दो-चार सौ रुपये से मिल जाएगी। उसे शायद जरूरत है किसी ग्राहक की।’

‘ओह सुषमा, मैंने तुम्हें पर्सनल सेक्रेटरी इसलिए नहीं बनाया था कि हराम की तनख्वाह पांच हजार रुपए दिया करूं। समझी?’

‘समझ गई, मगर मेरे फर्ज में कोई कोताही?’

‘सुषमा!’

‘मिस सुषमा वर्मा।’

‘तुम कल से मेरे ऑफिस में काम नहीं करोगी।’

‘कोई बात नहीं। ऑफिस तो मैं आऊंगी। तनख्वाह भी लूंगी। काम कराएं या न कराएं, आपकी मर्जी। जहां तक डिसमिस करने का सम्बन्ध है, पांच साल तक आप मुझे मेरी मर्जी के बगैर निकाल नहीं सकते। जी चाहे तो कोर्ट खुली हुई है, आजमा कर देख लीजिएगा।’

फिर सुषमा बड़े इत्मीनान से पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ गई। केदार एक ऐसे भूख भेड़िए की तरह उसे देखता रह गया जिसके आगे से अचानक ही उसका शिकार खींच लिया गया हो।

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सुषमा अपने केबिन में बैठी हुई तेजी से टाइपराइटर पर अंगुलियां चला रही थी, उसके बराबर में टाइप किए हुए कागजों का एक ऊंचा-सा ढेर लग गया था। लेकिन सुषमा के चेहरे पर न थकन थी न कोई ऐसा भाव, जिससे जाहिर होता कि वह किसी तरह घबराई हुई है।

तभी इन्टरकाम घनघनाया। सुषमा ने बड़े शांत भाव से रिसीवर उठाया और उसी अंदाज में बोली- ‘यस प्लीज।’

‘मिस वर्मा।’ यह केदार की आवाज थी, ‘रिपोर्ट टू मी इमीडियेटली।’

‘यस सर।’

सुषमा ने रिसीवर रख दिया। ठंडी सांस लेकर उठी। बड़े ही शांत अंदाज में बाहर निकली और केदार के केबिन की तरफ बढ़ी। कुछ देर बाद वह केदार के केबिन में थी। और केदार एक तरफ रखे हुए कागजात देख किसी बिगड़े हुए सांड की तरह तन कर बैठा हुआ था।

‘मिस वर्मा, यह आपने क्या किया है? टाइप किया है या झक्क मारी है?’

‘मैं समझी नहीं, सर।’ सुषमा ने बड़ी शांति से मुस्कराकर कहा।

‘खुद पढ़कर देखिए। यह लेटर्ज मैंने फॉरेन कम्पनियों के लिए डिक्टेट करवाए थे, इनमें कितनी गलतियां हैं। अगर यह लेटर्ज चैक किए बगैर चले गए होते तो हमारे ऑफिस की रेपुटेशन क्या रहती?’

सुषमा के होंठों पर एक मुस्कराहट फैल गई, जिसने जलती पर तेल का काम किया। केदार भिन्नाकर बोला-

‘उलटे मुस्करा रही हैं आप?’

‘सर, मैं इसलिए मुस्करा रही हूं कि इन लेटर्ज में कोई गलती ही नहीं है।’

‘आप मुझे जाहिल समझती हैं?’

‘सर, आप मुझसे ज्यादा योग्य हैं। दरअसल जिस समय आप डिक्टेशन दे रहे थे तो आप शायद बहुत जल्दी में थे और दिमागी उलझन में। आप गलत डिक्टेशन दे रहे थे, मगर मैं नोट करते समय उन्हें सही करती जा रही थी। शायद आपने इनमें से एक भी लेटर नहीं पढ़ा।’

‘शट अप!’ केदार ने मेज पर घूंसा मारकर कहा, ‘एण्ड गेट आऊट।’

‘अपने ऊपर काबू रखिए सर! मैं कोई चपरासी नहीं, वैसे चपरासी भी इज्जत रखते हैं।’

फिर सुषमा उसके केबिन से बाहर निकल आई। और केदार इस तरह दांत पीसता रह गया जैसे उसका छोड़ा हुआ कोई तीर खाली चला गया हो।

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सुषमा ने इन्टरकाम की आवाज सुनकर रिसीवर उठाया और बोली-

‘यस प्लीज!’

‘मिस वर्मा, काम कितना रह गया है?’

‘लगभग पचास लेटर बाकी है।’

‘आपके काम की रफ्तार दिन-ब-दिन सुस्त होती जा रही है।’

‘आपका ख्याल ही गलत है। मेरी शार्टहैंड और टाइप की स्पीड से अनुमान लगाइए, तब आपको पता चलेगा कि मेरी स्पीड पहले से ज्यादा हो गई है, मैं किसी भी आम स्टेनोग्राफर से डेढ़ गुना काम करती हूं।’

‘बहरहाल मुझे आरगुमेंट नहीं, काम चाहिए। पचास लेटर कल सवेरे ही पोस्ट करने हैं।’

‘मगर ऑफिस टाइम में सिर्फ पन्द्रह मिनट बाकी रह गए हैं और पंद्रह मिनट में इतना ज्यादा काम कैसे हो सकता है?’

‘इस ऑफिस में डबल रेट पर ओवर टाइम कराया जाता है।’

‘माफ कीजिए, सर! मैं इंसान हूं, मशीन नहीं। दिन-भर में अपनी शक्ति से ज्यादा काम करती हूं, अब इतनी शक्ति मुझ में नहीं है कि ओवर टाइम लगा सकूं।’

‘आप चाहती हैं कि कम्पनी का नुकसान न हो?’

‘दुनिया की किसी भी कम्पनी में जबर्दस्ती ओवर टाइम का कानून नहीं है, मिस्टर केदार। ख्याल रखिए, आप मुझे जितना परेशान करेंगे, मैं उतनी ही मजबूत बन जाऊंगी। दूसरी तरफ आप खुद भी बदले और असफलता की आग में जलते रहेंगे। आप यह भी जानते हैं कि एग्रीमेंट के अनुसार आप मुझे पांच साल से पहले नहीं निकाल सकते। आप बेकार ही ऐसी हरकतें करके मानसिक परेशानी उठा रहे हैं।’

‘तुम मुझे नसीहत दे रही हो?’

‘नहीं, आपका एक बीस वर्ष के नमक हलाल की बेटी की हैसियत से समझा रही हूं कि इस दुनिया के बाजार में मुझसे भी ज्यादा खूबसूरत शरीर आपको मिल जाएंगे। आपकी जेब भारी होनी चाहिए। फिर आप मेरे पीछे ही क्यों पड़े हैं?’

‘होल्ड यूअर टंग, तुम अपने बॉस से बात कर रही हो।’

‘अच्छा ठीक है, कल शायद मैं आपके डैडी के पास जाऊंगी।’

‘व्हाट?’

‘जी हां, मैं उनसे पूछूंगी, क्या वह भी पर्सनल सेक्रेटरी कोई खूबसूरत लड़की ही रखते थे? क्या उसकी ड्यूटी में वह काम भी शामिल होता था जो आप मुझसे चाहते हैं?’

चन्द क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। फिर धीरे-से नर्म लहजे में कहा गया- ‘तुम वहां नहीं जाओगी।’

‘समझौते की शर्तें?’

‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम यहां से खुद ही रिजाइन दे दो?’

‘हो सकता है। पांच वर्ष तक मुझे यहां रहकर जो कुछ मिलता। उसमें से अब तक जो मिला हुआ है, काटकर बाकी पैसा, नकद। इस तनख्वाह पर दूसरी नौकरी, ऐसे ही एग्रीमेंट के साथ। जिस रोज आप मेरी यह शर्त पूरी करेंगे, मैं इस्तीफा दे दूंगी।’

‘तुम मुझे ब्लैक-मेल कर रही हो।’

‘नहीं, मैं पांच वर्ष क्या, दस वर्ष तक की नौकरी के लिए तैयार हूं।’

‘मैं तुम्हारी मांगी हुई रकम दे सकता हूं, लेकिन इन शर्तों पर तुम से पांच साल का एग्रीमेंट कौन बेवकूफ करेगा?’

‘आपने कैसे कर लिया था, सर?’

‘मैं तो धोखा खा गया।’

‘दूसरे एग्रीमेंट पर साइन करने के बाद ही मैं इस्तीफा लिखूंगी।’

‘क्या तुम सचमुच इतनी ही पत्थर-दिल हो?’

‘क्या मतलब?’

‘मैं तुम्हें तनख्वाह के अतिरिक्त हर रात साथ गुजारने के लिए हर बार रकम अलग से देने को तैयार हूं।’

‘आप अभी हारे नहीं है।’ सुषमा हंसकर बोली।

‘सुषमा, उम्मीद पर दुनिया कायम है।’

‘तो फिर इस दुनिया को कायम रहने दीजिए, क्योंकि जब कोई उम्मीद पूरी हो जाती है तो उसका क्रेज भी खत्म हो जाता है।’ फिर उसने बगैर जवाब का इन्तजार किए हुए रिसीवर रख दिया।

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सुषमा ने अब लोकल ट्रेन का पास बनवा लिया था। स्टेशन से बाहर निकल, कर टैक्सी ली और कार्टर रोड की तरफ चल पड़ी। अब वह बान्द्रा की झोपड़पट्टी वाले इलाके में नहीं रहती थी। उसने कार्टर रोड पर एक थ्री रूम फ्लैट ले लिया था। एक रूम में बाबूजी और पप्पू। दूसरे रूम में खुद सुषमा और तीसरा ड्राइंगरूम के तौर पर इस्तेमाल होता था।

टैक्सी बिल्डिंग के नीचे रुकी तो रात का अन्धेरा फैल चुका था। वह टैक्सी से उतर गई और किराया देने लगी। दूसरी ओर समुद्र की लहरें किसी विरहन की तरह फुंकार रही थीं। और जिस्म से टकराती नम और सर्द हवा कांटों की तरह चुभ रही थी।

सुषमा ने किराया अदा किया और बिल्डिंग की तरफ बढ़ी ही थी कि उसके कानों में एक आवाज टकराई- ‘सुषमा।’

सुषमा ठिठक कर रुक गई। उसने आवाज की दिशा में देखा, एक ऊंची दीवार के अन्धेरे से, जिसकी एक साइड में बरामदा बना हुआ था। सुषमा ने ठण्डी सांस ली। साया रजनी का था जो कह रही थी-

‘इधर आओ।’

सुषमा उधर बढ़ी। रजनी उसका बाजू पकड़ कर उसे अन्धेरे में ले गई। फिर उसने जमीन पर बैठकर सुषमा के पांव पकड़ लिए, बिलबिला कर रोती हुई गिड़गिड़ाने लगी- ‘सुषमा, भगवान् के लिए मुझे माफ कर दो।’

सुषमा के होंठों पर व्यंग्य- भरी मुस्कराहट फैल गई। उसने बड़े घमण्ड से कहा, ‘उठो, खड़ी हो जाओ।’

‘रजनी खड़ी हो गई। उसकी सिसकियां जारी थीं। सुषमा ने गम्भीरता से पूछा, ‘बोलो क्या चाहती हो?’

‘मैं नहीं जानती तुमने अपने जीजाजी पर क्या जादू कर दिया है। छः महीने हो गए, वह मेरे करीब तक नहीं आते। वैसे उसी तरह बोलते हैं, चलते हैं, काम भी कराते हैं। मगर एक पत्नी को अपने लिए खाना, कपड़ा, घर ही चाहिए- क्या और कुछ नहीं?’

‘एक पत्नी को अपने पति से जिस चीज की जरूरत होती है वह इस तरह नहीं मिलती जिस तरह तुम हासिल करना चाहती हो। मर्द एक चलता दरिया है और औरत उस दरिया की एक लहर। और तुम जानती हो कि अगर लहर ज्यादा उछाला लेने लगती है या हवाओं के जोर पर उछलने लगती है तो दरिया उसे उछाल कर बाहर फेंक देता है। वह मिट्टी में जज्ब होकर सूख जाती है। भरे समुद्र से, अगर कोई पानी का एक कटोरा भर कर ले जाए तो पानी में कमी नहीं आती। याद रखो, पति को जितना भी पाबन्दियों में जकड़कर रखने की कोशिश करोगी, वह उतना ही बेलगाम होता जाएगा और जैसे कि तुम खुद ही कहती हो जीजाजी जरा दिलफेंक तबीयत के आदमी हैं। वह तो अपने इर्द-गिर्द की गुजरने वाली हर खूबसूरती को कम-से-कम नजरों से ही चूमते चलेंगे तो क्या तू सड़कों से लड़कियों का गुजरना ही बन्द करवा देगी?’

‘मिसेज रजनी प्रकाश, अक्लमंद औरतें घर में ही वैसा लजीज खाना पकाने लगती हैं तो पति होटल में जाना तक पसन्द नहीं करते। पति पति होता है कोई जानवर नहीं होता जिसे हंटर मार-मार कर साध लो। पति को बदलना है तो पहले उसके लिए अपने आपको बदल डालो....समझी।’

‘मिसेज रजनी प्रकाश, अपनी चीजें खोने लगें तो किसी चोर को इल्जाम मत दो। अपने आप में झांक कर देखो कि तुम्हारी अपनी लापरवाही से चीजें खोई हैं।’

‘सुषमा लगता है, तुमने अब तक मुझे माफ नहीं किया।’

‘ऐसा क्यों लगा तुम्हें?’

‘क्या मैं तेरी बड़ी दीदी अब नहीं रही जो बार-बार मिसेज रजनी प्रकाश कहकर सम्बोधित कर रही हो?’

सुषमा के होंठों पर एक तल्ख मुस्कराहट फैल गई। वह व्यंग्यात्मक लहजे में बोली, ‘मिसेज रजनी प्रकाश, यह सवाल तो तुम्हें खुद अपने से करना चाहिए, मुझसे नहीं। याद करो वह रात, जब तुम और संध्या इस पशोपेश में थी कि अगर मैं मैनेजर के यहां जाकर बाबूजी के फन्ड का चेक न लाई तो क्या होगा। मैंने चेक लाकर दिया। तुम लोगों के घर बस गए। तुम लोग तो खाते-पीते घरानों की बहुएं बन गई।

‘क्या तुम्हें पता है कि मैंने उस समय को कैसे व्यतीत किया था? बाबूजी और पप्पू का पेट मैंने कैसे भरा? बाबूजी को मैंने किस तरह बचाया? बड़ी मुश्किल से मैंने बी. ए. का एग्जाम दिया था। सिर्फ साढ़े तीन सौ रुपये की खातिर मैं तुम लोगों के पास भीख मांगने गई थी, मगर मिसेज संध्या को अपने पति के दोस्त की शादी में जाना था और प्रेजेन्ट भी खरीदना था।

‘तुम...तुम्हें मेरा वहां आना ही नागवार गुजरा था। मेरा तुमसे और संध्या से सम्बन्ध उसी रोज टूट गया था। क्योंकि उस परीक्षा में मैंने क्या एक ही बाप और एक ही मां के पेट से जन्म लेने वाली बहनें भी इतनी खुदगर्ज हो सकती है। मुझे ऐसा लगा था जैसे तुम बाबूजी के घर में खुद को कैद समझती थीं और अपने-अपने पतियों के घर पहुंचकर तुमने आजादी के सांस लिए थे।

‘बाबूजी तुम्हारे पिता हैं। वे तुम लोगों से सम्बन्ध रख सकते हैं, मगर तुम और संध्या यह हमेशा के लिए भूल गए कि तुम्हारी कोई छोटी बहन भी थी।’

‘सुषमा!’ रजनी की आवाज कांप गई।

सुषमा ने पर्स खोलकर उसमें से साढ़े तीन सौ रुपये निकाले और रजनी की तरफ बढ़ा कर बोली- ‘लो, यह रुपये अपने पास रखो।’

‘रुपये क्यों?’

‘यह अपने पति को देकर कह देना कि यह रुपये सुषमा ने वापस किए हैं। वह तुम्हें उसी समय माफ कर देंगे?’

‘मैं समझी नहीं।’

‘समझकर भी क्या करोगी? तुम्हारा एक पति है- वह तुम्हें वापस मिल जाएगा। तुम्हारा एक छोटा-सा घर भी है, जिसमें कुछ दिन नन्हे-मुन्ने बच्चों की आवाजें भी गूंजने लगेंगी, नन्हे मुन्ने खिलौने भी आएंगे, मगर...।’

सुषमा ने एक ठण्डी और लम्बी सांस ली और बोली- ‘मैं तो सोलह साल की उम्र में ही दो बच्चों की मां बन चुकी हूं।’

‘क्या?’ रजनी उछल पड़ी।

‘जी हां मिसेज प्रकाश, मेरे बड़े बच्चे की उम्र साठ वर्ष है और वह अपाहिज भी है। छोटे बच्चे की उम्र चौदह वर्ष के लगभग है। वह अभी दुनियादारी को नहीं समझता। मुझे मालूम नहीं कि आखिर किस उम्र तक मुझे इन बच्चों की परवरिश करनी पड़ेगी। मेरे संघर्ष और बलिदान का उन लोगों से मुझे क्या सिला मिलेगा, यह भी भगवान् ही जाने।’

फिर उसने अपनी पलकों में उमड़ते आंसुओं को जबरदस्ती रोका और तेजी से अपनी बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ने लगी।

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रजनी ने उस रोज अपना छोटा-सा फ्लैट बड़ी खूबसूरती से सजाया था। हर तरफ महक-ही-महक आती थी। रजनी ने नहा-धोकर अपनी वह बेहतरीन साड़ी पहनी थी जिसका रंग प्रकाश की पसंद का था। उसने घर में पकवान भी अच्छे-अच्छे बनाए थे और नौकर को शाम से छुट्टी भी दे दी थी। उसे मालूम था कि प्रकाश को हर शाम दो-एक पैग पीने की भी आदत है, उसने अपनी एक सहेली के नौकर से व्हिस्की मंगवाकर भी रख ली थी। इस समय उसके बदन से ऐसी खुशबू निकल रही थी, जैसे वह खुशबू उसके अपने बदन की हो। उसने चेहरे पर ज्यादा-से-ज्यादा शोखी पैदा करने की कोशिश की थी।

रात के लगभग आठ बजे फ्लैट की घण्टी बजी। रजनी ने जल्दी-जल्दी अपने मेकअप का आखिरी जायजा लिया और उठकर दरवाजा खोला। सामने प्रकाश खड़ा हुआ था। उसकी टाई की नॉट ढीली थी और आंखों और चेहरे से ऐसा लग रहा था जैसे वह एक-दो पैग नहीं ज्यादा पीकर आया हो। चेहरे पर कुछ मायूसी और आवाज में झुंझलाहट थी। उसकी नाक के नथुनों के खुशबू का तेज भभका टकराया।

एक क्षण के लिए उसके होंठ कुछ कहने के लिए खुले, मगर फिर वह गम्भीर होता हुआ अन्दर चला गया। रजनी के चेहरे पर रौनक आते-आते चली गई। मगर फिर उसने अपने आपको सम्भाला और मुस्कराकर बड़े शोख लहजे में बोली, ‘आज तो बड़ी जल्दी आ गए आप?’

‘हां।’ प्रकाश सोफे पर गिर गया और बोला, ‘आज एक दोस्त से एप्वाइंटमेन्ट था, वह समय पर आ नहीं सका तो ‘मूड’ खराब हो गया।

एक गिलास पानी ले आओ गला सूख रहा है।’

‘मैं लाती हूं अभी।’

‘क्यों-नौकर कहां गया?’

‘पेट में दर्द था, मैंने आज रात की छुट्टी दे दी।

‘ठीक है, जल्दी पानी लाओ।

रजनी ने प्रकाश की बात का बुरा नहीं माना। वह सीधी अन्दर चली गई। प्रकाश ने बड़े थके-थके अंदाज में जूते और मौजे उतारे। फिर मेज पर टांगें फैलाकर सिगरेट निकालने लगा। मगर दूसरे ही क्षण उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गई, क्योंकि रजनी मुस्कराती हुई एक ट्रे उठाकर ला रही थी। उसमें पानी का जग था। एक खूबसूरत गिलास था, एक क्वाटर ह्विस्की और एक प्लेट। उसने ट्रे मेज पर रखी तो प्रकाश हड़बड़ाकर उठ कर बैठ गया। उसकी आंखों में हल्की सी चमक आ गई और वह हैरानी से बोला-

‘यह-यह सब क्या है?’

‘पॉयलेट मछली बनाई है मैंने आपके लिए। तली हुई पॉयलेट बड़ी लजीज होती है।’

‘वह तो ठीक है, मगर यह व्हिस्की?’

‘यह मेरे लिए नहीं।’ रजनी खिलखिलाकर हंस पड़ी, ‘आप ही के लिए हैं।’

‘मगर-मगर मैं...।’

‘क्यों जो काम आप बाहर करते हैं, यहां करने में क्या हर्ज है, फिर जो लोग बदनाम करते हैं वह अपने ही हैं।’

‘कौन बदनाम करता है?’

प्रकाश ने चौंककर पूछा।

‘अब क्या कहूं।’ रजनी ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा, ‘मुझे तो शर्म आती है कि वह कमीनी मेरी बहन है। काश! उसने हमारे परिवार में जन्म न लिया होता।’ कहते-कहते रजनी ने बोतल खोलकर व्हिस्की गिलास में डाली।

‘किसकी बात कर रही हो, साफ-साफ कहो क्या बात है?’

‘बात किसकी करूंगी, अरे वह एक ही निकली है हमारे घर में। जानने वाले थू-थू करते हैं। मुझे और संध्या दीदी को तो शर्म आती है उसे बहिन कहने के लिए। क्योंकि अब उसके लक्षण किसी से भी छिपे नहीं रहे।’

‘तुम सुषमा की बात कर रही हो?’

‘और क्या! जरा सोचिए तो। कल तक खाने के लाले थे और आज पच्चीस हजार का फ्लैट लिए बैठी है। टैक्सी में सफर करती है। ऐसे-ऐसे कपड़े पहनती है कि देखकर मर्दों को भी शर्म आ जाए। इतने कीमती होते हैं कि करोड़पति होने पर भी नहीं खरीद सकते। आखिर यह सब-कुछ आता कहां से है उसके पास, एक बच्चा भी समझ सकता है।’

‘क्या उसने मेरे बारे में तुमसे कुछ कहा था?’ प्रकाश उसका चेहरा गौर से देखकर बोला।

‘कहा था। अरे, खून का रिश्ता बीच में न होता तो मैं उसका मुंह नोच लेती, जान से मार डालती अपने पति पर कीचड़ उछालने वाली को। चाहें वह मेरी सगी बहन ही है मगर हर पति स्त्री का भगवान होता है।’

‘मगर वह कह क्या रही थी?’

‘कह रही थी, यह देखिए,’ उसने साढ़े तीन सौ रुपये पर्स से निकालकर प्रकाश के सामने डालते हुए कहा, ‘कुतिया ने यह रुपये मेरे मुंह पर मारे और कहने लगी, जीजाजी से कह देना सुषमा साढ़े तीन सौ रुपये में बिकनेवाली चीज नहीं है। दस-दस बीस-बीस रुपये में बिकने वाली उन्हें बहुत मिल जाएंगी।’

कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा जैसे प्रकाश को सांप सूंघ गया हो। उसके चेहरे का रंग कई बार बदला। इसी दौरान रजनी ने गिलास में पानी डालकर प्रकाश के आगे कर दिया और बोली, ‘कमीनी, मुझे मेरे ही पति के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रही थी।’

‘हूं।’ अब तक प्रकाश अपने आपको सम्भाल चुका था। वह बोला, ‘मैंने उसे रहम खाकर साढ़े तीन सौ रुपये उस रोज दिए थे, जब वह तुमसे मांग रही थी। तुमने इंकार कर दिया था। मैंने सोचा अब तुम्हारे सामने दूंगा तो तुम्हारा अपमान होगा। मगर मेरी भलाई का बदला मुझे तुम्हारी बहन से इस तरह मिलेगा, यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।’

‘मत कहिए, उसे मेरी बहन। मुझे तो उसकी सूरत तक से नफरत हो गयी है। मैंने तो बाबूजी से भी यह कह दिया था कि इस घर में अब मैं और मेरे पति थूकने भी नहीं आएंगे। दीदी और जीजाजी भी उसे बुरा-भला कह रहे थे। ऐसी नाक कटवाई है उसने कि जानने वालों के सामने नजरें शर्म से झुक जाती हैं। अब वे लोग भी उनसे मिलने कभी नहीं जाएंगे।’

प्रकाश पीता रहा। उसके चेहरे पर भीतरी गुस्से के आसार साफ नजर आ रहे थे। रजनी उसके दिल में भड़कती नफरत की आग को और ज्यादा हवा देती गई और धीरे-धीरे उसके नजदीक आती गई। फिर उसने प्रकाश के गले में बाहें डालकर कहा-

‘छोड़िए भी, जीवन तो हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ गुजारना है, फिर क्यों हम किसी की खातिर अपनी जिंदगी में कड़वाहट घोलें।’

दूसरे ही क्षण प्रकाश ने रजनी को बड़ी बुरी तरह अपनी बांहों में जकड़ लिया था।’

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सुषमा बड़े संयत अंदाज में टाइप कर रही थी। आज उसकी ट्रे में कागजों के पहाड़ नहीं थे। बहुत दिनों बाद केदार का रवैया भी उसे प्रति नर्म हो गया था। अब वह न क्रोधित होता था न सुषमा को देखकर उसे झुंझलाहट होती थी।

तभी इन्टरकाम पर आवाज आई और सुषमा चौंक पड़ी। उसने रिसीवर कान से लगाकर कहा- ‘यस प्लीज?’ ‘मिस वर्मा।’ यह केदार की आवाज थी, ‘एक मिनट के लिए तकलीफ कीजिए।’

‘ओ. के. सर!’ सुषमा ने रिसीवर रख दिया, फिर थोड़ी देर बाद वह इजाजत लेकर केदार के कमरे में दाखिल हो रही थी। वहां बैठे हुए घनश्यामदास को देखकर वह एक क्षण के लिए ठिठकी। फिर मुस्कराई और बोली, ‘गुड मॉर्निंग।’

‘मॉर्निंग।’ केदार बड़े अच्छे मूड में बोला, ‘आइए आइए, मिस वर्मा, बैठिए।’

सुषमा बैठ गई। केदार ने घनश्याम की तरफ इशारा करके मुस्कराकर कहा-

‘इनसे तो आप परिचित होंगी?’

‘मिस्टर घनश्यामदास ऑफ सावित्री एडवरटाइजज?’

‘गुड लॉर्ड!’ घनश्याम रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ बोला, ‘आपकी स्मरण-शक्ति बहुत तेज मालूम होती है।’

‘थैंक्स।’

‘दरअसल।’ केदार सुषमा की तरफ देखकर मुस्कराता हुआ बोला, यह मुझ से मेरे ऑफिस की रौनक मांगने आये हैं। मैं कशमकश में पड़ गया हूं। मगर मिस्टर घनश्याम मेरे इतने पुराने दोस्त हैं कि मैं इन्हें इंकार भी नहीं कर सकता और अगर मेरे मुलाजिमों का कुछ भला हो तो मैं उसे ईर्ष्या की नजरों से भी नहीं देखता।’

‘मैं आपका मतलब नहीं समझी।’

‘दरअसल घनश्याम के यहां जो लड़की एडवरटाजिंग फिल्मों में काम करती थी, वह शादी करके लन्दन चली गई है। वह मिस्टर घनश्याम की पर्सनल सेक्रेटरी भी थी। मिस्टर घनश्याम ने आपको उस पार्टी में देखा था। अब इन्होंने वैसी लड़की के लिए पता नहीं कितनी लड़कियों के इन्टरव्यू लिए, स्क्रीन टैस्ट, साउंड टैस्ट लिए लेकिन किसी से भी संतुष्ट नहीं हो सके। बार-बार इनकी निगाहों में आपका ही चेहरा घूम जाता था। आखिर बड़ी हिम्मत करके मिस्टर घनश्याम मेरे पास आए हैं, आपको मांगने के लिए।’

‘मगर मेरा फायदा क्या है?’

‘मिस्टर घनश्याम बतौर पर्सनल सेक्रेटरी आपको पांच हजार रुपए महीना दिया करेंगे। जब पब्लिसिटी फिल्म बनेगी तो उसके लिए अलग से पांच हजार रुपए आपको नजर करेंगे। इसके अतिरिक्त अगर आप इनके यहां स्टैनोग्राफर का काम भी करेंगी तो ढाई हजार रुपए महीना आपको अलग से मिलेगा।’

‘मगर मेरी एक शर्त होगी।’

‘वह क्या?’

‘मिस्टर घनश्याम स्टाम्प पेपर पर इस किस्म का अनुबन्ध करेंगे कि जब तक मैं खुद इस्तीफा न दूं, मेरा बदन पब्लिसिटी फिल्मों में काम करने के योग्य रहेगा, तब तक यह मुझे पोस्ट से निकालेंगे नहीं। और अगर मेरी कोई मजबूरी होगी तो मैं एक महीने के नोटिस पर काम छोड़ सकती हूं।

‘हमें स्वीकार है।’ घनश्याम ने बेचैनी से पहलू बदलकर कहा।

‘दूसरी शर्त, दस हजार रुपये एडवांस होंगे जो हमेशा मेरे ऊपर रहेंगे, जब तक कि हम लोगों का अनुबन्ध खत्म न हो।’

‘मुझे यह भी मन्जूर है।’

‘बस तो फिर आप आज की तारीख में एग्रीमेंट टाइप करा लीजिए। आज तक तनख्वाह लेकर मैं कल अपनी पोस्ट से इस्तीफा दे दूंगी।’

‘आज ही क्यों नहीं?’

‘ओह, नो सर।’ सुषमा ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराकर कहा, ‘पुरखों ने कहा है लगी हुई रोजी को कभी लात नहीं मारनी चाहिए। हो सकता है, कल मिस्टर घनश्याम का इरादा बदल जाए तो कम-से-कम मेरी पहली नौकरी तो बरकरार रहेगी।’

‘बहुत चालाक है आप।’ केदार ने मुस्कराकर कहा।

‘नो सर, इसे चालाक नहीं दूरदर्शी कहते हैं, क्यों मिस्टर घनश्याम?’

‘ओह, यस यस।’

घनश्याम हंस पड़ा। केदार को भी हंसी में सम्मिलित होना पड़ा।

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सुषमा ने शॉवर के नीचे खड़े होकर कपड़े उतारे तो बदन पर अन्डरवियर रह गया। फिर उसने शॉवर खोला और साबुन को अपने शरीर पर मला। साबुन को सामने करके मुस्कराती हुई बोली, ‘लोग मुझसे मेरी खूबसूरती का राज़ पूछते हैं, अगर मैं उन्हें बता दूं कि मैं साधना ब्यूटी से नहाती हूं तो सब ही मेरी तरह खूबसूरत हो जाएंगे।’

फिर वह धीरे से खिलखिलाकर हंस पड़ी। सुषमा अपने बदन पर लबादा डालकर बाहर आ गई। घनश्याम की आंखें खुशी से चमक रही थीं। सुषमा ड्रेस रूम में कपड़े बदलने चली गई। डायरेक्टर ने घनश्याम के पास आकर कहा-

‘सर, यह नगीना कहां से ढूंढ़कर लाए हैं आप?’

‘देखा तुमने, हमारी नजरें पत्थरों में से हीरा तलाश कर लेती है।’

‘सर, अगर यह लड़की हमारी कम्पनी में काम करेगी तो भारत-भर में पचास प्रतिशत पब्लिसिटी-फिल्मों के कान्ट्रेक्ट हमारी कम्पनी को मिला करेंगे।’

घनश्याम ने बड़ी खुशी और उत्साह से सिर हिलाया। इतने में सुषमा कपड़े बदलकर आ गई। घनश्याम ने उठते हुए कहा, ‘आइए मिस वर्मा, आज डिनर हम लोग साथ लेंगे।’

‘नो, थैंक्स।’ सुषमा मुस्कराई- मैं डिनर हमेशा अपने घर पर ही लेती हूं। अपने बाबूजी और छोटे भाई के साथ।’

घनश्याम का चेहरा एक क्षण के लिए बुझ-सा गया फिर वह मुस्कराकर बोला- ‘एकाध पैग ‘शैम्पेन’ का तो ले लीजिए।’

‘नो थैंक्स, मैं ड्रिंक नहीं करती।’ फिर उसने कलाई की घड़ी देखी और घनश्याम से बोली, ‘सॉरी मिस्टर घनश्याम, आई एम वैरी लेट।’

फिर वे बड़े इत्मीनान से चली गई। और घनश्याम उसे पीछे से जाते हुए इस तरह देखता रह गया जैसे उसके शरीर से कोई आत्मा निकाल कर ले गया हो। फिर वहीं आराम से बैठ गया और बड़बड़ाया-

‘वह डिनर के लिए इन्कार कर गई।’

‘सर।’ डायरेक्टर अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ बोला- ‘नई-नई छोकरी है, आपको भी इतनी बेसब्री नहीं करनी चाहिए। आखिर आप कम्पनी के मालिक हैं। अपना ग्रेस कायम रखिए। शुरू-शुरू में क्या मिस कैली ने नखरे नहीं दिखाए थे, लेकिन जब आपने उसे प्रभावित कर दिया तो वह खुद ही आपके कदमों में आ गिरी थी।’

‘तुम ठीक कहते हो।’ घनश्याम ने मुर्दा सी आवाज में कहा।

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संध्या, रजनी, शंकर और प्रकाश फिल्म देख रहे थे। स्क्रीन पर सुषमा का चेहरा और नग्न शरीर नजर आया तो संध्या उछल पड़ी। जल्दी से रजनी का बाजू झिंझोड़ कर बोली- ‘देखा तूने, यह तो सुषमा है।’

‘दीदी, आहिस्ता बोलो,’ रजनी ने अपना कन्धा छुड़ाते हुए कहा, ‘किसी ने सुन लिया तो क्या कहेगा?’

‘ओह।’ शंकर बुदबुदाया, ‘इस लड़की ने तो बेशर्मी की हद कर दी।’

मगर प्रकाश कुछ न बोला। उसका दिल बहुत जोर से धड़क रहा था। बदन में खून की सनसनाहट दौड़ रही थी।

15

सुषमा की छोटी-सी खूबसूरत स्टैंडर्ड कार फ्लैट के सामने जाकर रुक गई। उसने घण्टी का बटन दबाया। कुछ क्षण बाद पप्पू ने दरवाजा खोला, मगर उसके चेहरे से ऐसा नहीं लगा, जैसे वह सुषमा को देखकर खुश हुआ हो। बस, थोड़ी-सी मुस्कराहट उसके होंठों पर आकर रुक गई।

सुषमा बगैर उससे कुछ कहे, गुनगुनाती हुई आगे बढ़ी तो उसने देखा कि बाबूजी अपने व्हीलचेयर का रुख मोड़कर कमरे की तरफ जा रहे हैं। सुषमा के दिल पर एक घूंसा-सा लगा, मगर फिर भी वह कुछ न बोली, गुनगुनाती हुई अपने कमरे में दाखिल हो गई।

तभी उसके कानों से पप्पू की उत्साह भरी आवाज टकराई, ‘अरे संध्या दीदी, रजनी दीदी।’

सुषमा ठिठक गई। उसने सुना, आवाजें उन्हीं की थीं। संध्या, रजनी, शंकर और प्रकाश। बाबूजी की आवाज भी बहुत उत्साह-भरी थी, ‘अरे, तुम लोग आज इतने दिनों बाद!’

‘हम लोग तो अब भी नहीं आते।’ संध्या ने तेज लहजे में कहा, ‘मगर मजबूर होकर आपके पास आना पड़ा।’

‘यह क्या कह रही हो, बेटी?’

‘बाबूजी, संध्या सही कह रही है।’ रजनी ने कहा।

‘मगर आखिर बात क्या है?’

‘बात ऐसी है कि जुबान पर लाते हुए भी शर्म आती है।’

‘तो फिर मुझे पता कैसे चलेगा?’

‘मैं बताता हूं आपको।’ शंकर ने कहा, ‘बाबूजी, पहले ही हम लोगों की नजरें दुनियावालों के सामने नहीं उठती थीं। अब तो आपकी छोटी बेटी ने हमें इस काबिल कर दिया है कि घरों में बन्दी होकर बैठ जाएं।’

‘मगर कैसे, क्या उसने- ?’

‘पब्लिसिटी फिल्मों में काम करने लगी है।’

‘क्या?’

‘और हालत यह है कि पर्दे पर आई भी तो नंगी। आप देखते तो शर्म से आत्महत्या ही कर लेते।’

‘हे भगवान्! यह मैं क्या सुन रहा हूं? आखिर मैं यह सब सुनने से पहले मर क्यों नहीं गया?’

‘हम आप से यह कहने आए हैं कि आप ही उसे रोक सकते हैं। संध्या ने कहा।

तभी सुषमा कमरे के दरवाजे पर आ गई। उसका चेहरा बिल्कुल शांत और सपाट था। उसने एक हाथ चौखट पर और दूसरा हाथ कमर पर रखकर कहा- ‘पप्पू!’

‘जी।’ पप्पू उसकी तरफ मुड़ा।

वे सब लोग भी चौकस होकर उसकी तरफ देखने लगे थे। प्रकाश को ऐसा लगा जैसे उसका दिल सीने से बाहर ही निकला पड़ रहा है। मगर सुषमा ने उनमें से किसी की ओर देखे बगैर कहा, ‘इन लोगों के लिए दरवाजा किसने खोला था?’

‘वह खुला हुआ था।’

‘देखा बाबूजी।’ रजनी चिल्लाई, ‘यह हमारी बेइज्जती कर रही है।’

‘सुषमा।’ बाबूजी ने डांटने के अंदाज में कहा, ‘तुम्हें इतनी भी शर्म नहीं कि तेरी बहनों के साथ तेरे बहनोई भी हैं।’

‘पप्पू।’ सुषमा ने कहा, ‘इन लोगों से कहो, अगर अपनी इज्जत चाहते है, तो यहां से चले जाए।’

पप्पू के होंठ खुलकर रह गए। बाबूजी ने गुस्से से कहा- ‘यह नामुमकिन है-नहीं जाएंगे ये लोग।’

‘बाबूजी, आप भूल रहे हैं, यह घर मेरा है और मैंने अपने नाम से खरीदा है। इस घर में वही होगा, जो मैं चाहूंगी।’

‘मुझे नहीं मालूम था कि मेरी मौजूदगी में मेरी बेटी भी घर की मालिक बन सकती है।’ बाबूजी गुस्से से बोले, ‘ठीक है, अब मैं भी इस घर में नहीं रहूंगा।’

‘यह आपका, अपना सोचने का ढंग है, अपना फैसला है। मैं आपका अपमान नहीं कर रही और न करूंगी।’

‘चलो पप्पू।’ बाबूजी ने पप्पू से कहा, सामान ठीक करो अपना, हम लोग अभी यहां से चलेंगे।’

‘मगर कहां?’ पप्पू ने पूछा।

‘अरे, दो-दो बेटियां है, तू संध्या के यहां चला जाना और मैं रजनी के यहां-।’

‘म....मेरे घर।’ संध्या संभलकर बोली, ‘हां हां, जरूर बाबूजी, मैं कल ही शाम को किसी से आपको बुलवाऊंगी।’

‘क्यों, आज क्यों नहीं?’

‘आज दरअसल इनके दोस्त, उनकी पत्नी और दो बच्चे बम्बई घूमने आए हुए हैं। कल सुबह की गाड़ी से वह चले जाएंगे।’ फिर उसने शंकर की तरफ देखकर कहा, ‘क्यों जी ठीक है ना?’

‘बिल्कुल ठीक है, कल मैं खुद दुकान से लौटते समय टैक्सी में ले जाऊंगा आपको।’

‘तो फिर पप्पू।’ रजनी बोली, ‘तू भी कल ही आना, इसलिए कि बाबूजी को किसी की देखभाल की जरूरत तो है ही।’

‘तुम ठीक कहती हो, रजनी।’

फिर वह लोग इतनी जल्दी वहां से बाहर निकल गए कि कहीं बाबूजी और पप्पू सचमुच उसी वक्त जाने के लिए पीछे न पड़ जाएं। बाबूजी और पप्पू आश्चर्य से देखते रह गए।

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सुषमा गाड़ी से उतरकर, पर्स हिलाती हुई दरवाजे तक आई और उसने घण्टी बजाई। दरवाजा पप्पू ने खोला तो सुषमा ने हैरत से कहा, ‘अरे, तुम मौजूद हो अभी तक।’

पप्पू नजरें झुकाकर एक तरफ हट गया। सुषमा अन्दर दाखिल हुई और पप्पू ने दरवाजा बन्द कर दिया। तब उसे बाबूजी की व्हीलचेयर नजर आई जिसे मोड़कर वह अन्दर की तरफ जा रहे थे। सुषमा ने पूछा-

‘बाबूजी, वह लोग अभी आपको लेने नहीं आए?’

‘तुम कहो तो हम लोग पुरानी खोली में चले जाएं?’

‘जरूर, उसी खोली में खेती भी तो हैं, जहां अनाज उगता है और ऐसे पेड़ भी हैं, जिनमें रुपए लगते हैं।’

‘अगर मुकद्दर में फांके लिखे हैं तो वह भी करेंगे।’

‘जानबूझकर खाने पर लात मारकर जाने को मुकद्दर कहते हैं?’

‘ऐसे खाने से तो फांके भले हैं।’

‘कैसे खाने की बात कर रहे हैं आप?’

‘जिस तरह तुम कमाकर लाती हो।’

‘किस तरह कमा कर लाती हूं? क्या चोरी करती हूं, डकैती डालती हूं। लोगों की जेबें काटती हूं या पेशा करती हूं?’

‘कल रात वे लोग क्या बता रहे थे?’

‘मैं विज्ञापन फिल्मों में काम करने लगी हूं।’

‘तो क्या यह अच्छी बात है?’

‘अगर बुरी बात है तो वह लोग फिल्म देखने क्यों गए थे। जो काम देखना बुरा नहीं, उसे करना कैसे बुरा हो गया। लोग कोठों पर मुजरा सुनने जाते हैं, तो वहां मुजरा करने वाले भी बुरे कहलाते हैं और सुनने वाले भी बुरे कहलाते हैं।’

रघुनन्दन कुछ न बोले। पप्पू चुपचाप नजरें- झुकाए खड़ा था। सुषमा ने धीरे से कहा-

‘मैंने आज तक आपके सामने बहुत गलत शब्द इस्तेमाल किए हैं, बाबूजी, मगर मेरे सवालों पर गौर जरूर कीजिएगा। आप जानते हैं कि मैं जो कुछ भी कर रही हूं आपके और पप्पू के लिए कर रही हूं। मैं किसी के सामने अपनी सफाई इसलिए नहीं देना चाहती कि मैं खुद को अपने अन्दर से जानती हूं और अपनी जगह पूरी तरह सन्तुष्ट हूं, जहां तक दुनियावालों की बक-बक का सवाल है तो यह वही लोग हैं, जिन्होंने सीता मां को धरती मां की गोद में समा जाने पर मजबूर कर दिया था। मैं तो सीता मां के चरणों की धूल भी नहीं हूं।’

फिर वह अपने कमरे में चली गई। बाबूजी और पप्पू आश्चर्य से उस दरवाजे की तरफ देखते रह गए, जिससे वह अन्दर गई थी।

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‘आपने मुझे याद किया, सर?’ सुषमा अन्दर दाखिल होती हुई बोली।

‘हां हां, मिस वर्मा। घनश्याम ने कुर्सी की तरफ इशारा करके कहा।

सुषमा बैठ गई तो थोड़ा ठहरकर घनश्याम ने कहा-

‘मैं आपसे-।’

तभी टेलीफोन की घण्टी बजी। घनश्याम ने बुरा-सा मुंह बनाकर रिसीवर उठाया और कान से लगा लिया। कुछ झुंझलाते हुए बोला-

‘यस।’

‘यस।’ ऑपरेटर ने कहा, ‘मिस वर्मा ऑफिस में हैं?’

‘हां हैं पर?’

‘उनका फोन।’

‘आपका फोन?’ घनश्याम ने सुषमा की तरफ रिसीवर बढ़ा दिया।

‘यस।’ सुषमा रिसीवर कान को लगाकर बोली।

‘मिस वर्मा!’

‘स्पीकिंग।’

‘देखिए, मैं ब्यूटी एडवरटाइजर्स से बोल रहा हूं।’

‘ब्यूटी एडवरटाइजर्स।’ सुषमा मुस्कराई।

घनश्याम जरा सम्भलकर बैठ गया। दूसरी तरफ से आवाज आई।

‘मिस वर्मा, क्या आप हम से पर्सनल मुलाकात कर सकती हैं?’

‘मुलाकात करने में कोई हर्ज नहीं है। आपकी दावत का शुक्रिया। लेकिन मैंने शायद कल भी आपसे कहा था कि मैं सावित्री एडवरटाइजर्ज के अनुबन्ध में बंधी हुई हूं। और उन लोगों की इजाजत के बगैर किसी कम्पनी की पब्लिसिटी फिल्म में काम नहीं कर सकती।’

‘मगर?’

‘आई एम सॉरी, सर। आप चाहें तो बाकायदा सावित्री एडवरटाइजर से इजाजत ले लें।’

‘मगर वह लोग कैसे ऐसा करेंगे?’

‘तब फिर मैं मजबूर हूं।’

‘सॉरी, हमने आपको तकलीफ दी।’

‘कोई बात नहीं।’ दूसरी तरफ से कनैक्शन कट गया।

घनश्याम ने रिसीवर ‘क्रेडिल’ पर रखते हुए कहा, ‘ब्यूटी ऐडवरटाइजर्स?’

‘यस सर। कई रोज से मेरे पीछे पड़े है। कहते हैं अगर मैं स्थायी रूप से उनके यहां चली जाऊं तो दस हजार रुपया माहवार और बंगला भी देंगे।’

‘हूं।’ घनश्याम ठंडी सांस लेकर बोला, ‘मैनेजर ने बताया था कि और भी कई कम्पनियों की ऑफर्स आई थीं आपके पास।’

‘अब तो रोज ही कोई-न-कोई कम्पनी ऑफर करती है। हालत यह हो गई है कि मुझे अपनी कार के शीशे गहरे रंग के करवाने पड़े है। वरना लोग पहचान लेते हैं और सड़क पर घेराव कर लेते हैं।’

‘सचमुच आपको बहुत पब्लिसिटी मिली है।’

‘बेशक।’

‘और हमारी कम्पनी से मिली है।’

‘नो सर।’

‘क्यों?’

‘आपकी कम्पनी वाले ही कहते हैं, जो आपकी कम्पनी की सबसे खूबसूरत मॉडल थी उसे भी इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी। और अब भारत की लगभग साठ प्रतिशत कम्पनियों की ओर से कांट्रेक्ट आप की कम्पनी को मिलते हैं तो सिर्फ सुषमा वर्मा की खूबसूरती के कारण।’

‘ठीक कहती हैं, इसमें आपकी खूबसूरती का भी बहुत बड़ा हाथ है।’

‘गुस्ताखी माफ सर, अब मैं चलूं?’

‘अरे, आप से कुछ कहना था। वह....आज शाम को एक पार्टी है, क्या आप डिनर मेरे साथ लेना पसंद करेंगी?’

सुषमा बैठ गई और मुस्कराती हुई बोली, ‘आपसे एक प्रार्थना करूं, सर?’

‘हां....हां कहो।’

‘आज के बाद आप कभी मुझे डिनर पर इन्वाइट मत करिएगा।’

‘क्यों?’

‘इसलिए कि मैंने आपको पहले ही बताया था कि मैं डिनर अपने घर के अलावा कहीं लेना पसंद नहीं करती। और यह बात आप अच्छी तरह जानते हैं कि अगर आपको ऐसी ही पर्सनल सेक्रेटरी की जरूरत है और आप मुझे अनुबन्ध की शर्त के मुताबिक निकाल नहीं सकते तो मैं एक लाख रुपए लेकर आपको रिजाइन दे सकती हूं, ताकि आप अपने साथ डिनर खाने वाली पर्सनल सेक्रेटरी का चुनाव कर सकें और आप यह तो जानते हैं कि मेरे लिए पब्लिसिटी फिल्मों की कमी नहीं है। मैं अपनी शर्तों पर किसी भी कम्पनी से अनुबंध कर सकती हूं। मेरे जाने के बाद आपकी कम्पनी का क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं, मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं।’

फिर वह बड़े आराम से उठी और बगैर इजाजत लिए बाहर निकल गई। दरवाजे के दोनों पल्ले हिल रहे थे और उससे भी ज्यादा बुरी तरह घनश्याम का दिल हिल रहा था।

16

सुषमा की कार फ्लैट के सामने रुक गई। वह कार से उतरी और घंटी का बटन दबाया। कुछ क्षण बाद ही दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाला पप्पू था। सुषमा ने अंदर दाखिल होते हुए कहा-

‘हाय प्रदीप, आज तुम्हारा रिजल्ट निकलने वाला था?’

‘हाँ, दीदी।’ प्रदीप उर्फ पप्पू ने धीरे-से कहा।

‘क्या रहा?’

‘मैं पास हो गया, फर्स्ट क्लास, फर्स्ट ग्रेजुएट।’

‘ओह वैरी गुड।’ सुषमा ने खुशी से उसका माथा चूम लिया और बोली, ‘इतनी बड़ी खुशी की खबर और तुम मुझे ऐसे ही सुना रहे हो।’

फिर उसने इधर-उधर देखा और बोली, ‘बाबूजी कहां है? जल्दी से मिठाई लाओ। मैं तुम्हें कल ही नौकरी दिलवाऊंगी और वह भी किसी बढ़िया फर्म में।’

प्रदीप चुपचाप खड़ा रहा। कुछ बोला नहीं और सुषमा ने हैरत से पूछा- ‘क्या बात है, तुम चुप क्यों खड़े हो? मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देते?’

‘दीदी, मैंने नौकरी भी ढूंढ ली है।’

‘नौकरी ढूंढ ली है? कहां- कितनी तनख्वाह है?’

‘संध्या दीदी के दोस्त की फर्म में। फिलहाल तीन सौ रुपये तनख्वाह है।’

‘तीन सौ रुपये! अरे, तुम्हें कम-से-कम एक हजार रुपया स्टार्ट दिलवाऊंगी।’

प्रदीप के होंठों पर हल्की-सी मुस्कराहट फैल गई और उसने कहा- ‘तीन सौ रुपये मेरे और बाबूजी के खर्चे के लिए काफी होंगे?’

‘क्या मतलब?’ सुषमा ने हैरानी से पूछा।

‘बाबूजी को आज अपनी पुरानी खोली में पहुंचा आया हूं। इस फ्लैट की चाबी तुम्हें देनी थी, इसलिए रुका हुआ था।’ फिर उसने धीरे-से चाबी मेज पर रख दी और बिना कुछ कहे दरवाजे से बाहर निकल गया। सुषमा इस तरह दरवाजे को देखती रही, जैसे दरवाजा न हो गोली हो। उसे ऐसा लगने लगा था कि पूरा फ्लैट ही उसके लिए गोलियां बन गया हो। फ्लैट की एक एक चीज उसके लिए गोली बन गई हो। हे भगवान्! यह बदला है, मेरी भलाई का।’

‘जिस बाप की खातिर मैंने अपनी इज्जत गंवा दी और जिसको बचाने के लिए मैंने खुद को बेचा, वह बाप मुझसे मिले बगैर चला गया।’

‘जिन बहनों की खातिर मेरी इज्जत की चादर पर दाग लगा वह तो पहले ही मुझे छोड़ चुकी हैं। आज वह भाई भी मुझे भूल गया है, जिसे मैंने इतनी मेहनत और लगन से पढ़ाया।’

‘क्या आज तक के लिए बाबूजी और प्रदीप को मेरी जरूरत थी?’

‘क्या इस दुनिया में पैसा ही सब-कुछ है?’

‘यहां कौन किसका बाप है? कौन किसका भाई है और कौन किसकी बहन है?’

‘फिर उसका जी चाहा कि वह चीखें मार-मारकर रोने लगे और चिल्ला-चिल्लाकर सारी दुनिया को इकट्ठा कर ले और पूछे, ‘क्या भगवान् ने इसलिए दुनिया को बनाया है? क्या इन रिश्तों की सच्चाई यही है?’

न जाने वह कितनी देर तक हक्की-बक्की पागलों की तरह खड़ी रही। जैसे वह किसी घने जंगल में खड़ी हो...।

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