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सुषमा ने दरवाजे की घण्टी बजाई। दूसरे ही क्षण दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाला संध्या का पति शंकर था। शायद वह कहीं जाने के लिए तैयार हो रहा था। उसके चेहरे से ऐसा लगा जैसे उसे सुषमा का आना नागवार लगा हो, फिर दूसरे ही क्षण जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोला- ‘आओ-आओ सुषमा!’
‘सुषमा चोर-चोर सी अन्दर दाखिल हुई तो शंकर ने जरा ऊंची आवाज में कहा- ‘संध्या, देखो तुम्हारी बहन आई है।’
‘कौन? रजनी?’
‘नहीं, सुषमा।’
‘ओह आती हूं।’ जवाब ऐसी ही था जैसे संध्या को सुषमा के आने से कोई खुशी न हुई हो।
कुछ क्षण बाद संध्या बाहर निकली। उसने एक कीमती साड़ी बांध रखी थी। गले में हार था, हाथों में कंगन, कानों में बुन्दे। हाथों में पर्स लटका हुआ था। वह जबरदस्ती मुस्कराने की कोशिश करती हुई बोली‒
‘कैसी हो सुषमा, कैसे आई?’
‘जी मैं... मैं दीदी।’
‘मैं जरा बाथरूम होकर आता हूं।’ शंकर चला गया।
‘दीदी।’ सुषमा ने कहा, ‘मैं दरअसल इसलिए आई हूं कि-।’
‘सुषमा, बाबूजी अब कैसे हैं?’ संध्या उसकी बात काट कर बोली।
‘अभी वैसी ही तबीयत है दीदी, वोह मैं....’
‘दरअसल हम लोग जरा जल्दी में है।’ संध्या कलाई की घड़ी देखकर बोली, ‘तुम्हारे जीजाजी के एक दोस्त... वह बोली, ‘अजी, जल्दी कीजिए।’
‘दीदी।’ सुषमा ने जल्दी-से कहा ‘मुझे साढ़े तीन सौ रुपये की जरूरत है।’
‘साढ़े तीन सौ, भला किस काम के लिए?’
‘मैं पास तो हो गई हूं, मगर डिग्री रुक गई है, क्योंकि छः महीने से फीस नहीं दी गई। तुम तो घर की हालत जानती हो, अगर मुझे डिग्री मिल गई तो नौकरी भी मिल जाएगी।’
‘सुषमा, तू क्या जाने हम लोग घर का खर्च कैसे चलाते हैं। इनके पिता ने दोनों बेटों के लिए रकमें बांध रखी हैं, उसमें से ही सब कुछ करना पड़ता है। वैसे भी उनके सामने कैसे कह सकती हूं।’
इतने में शंकर आया और मुस्कराकर बोला‒
‘तुम लोगों की बातें खत्म हो गयी हों तो चलें।’
‘बातें क्या बस बाबूजी का हाल बताने आ गई। चलिए।’
वे दोनों बाहर आए तो सुषमा उनके पीछे-पीछे बाहर आई। शंकर ने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट किया। संध्या पीछे बैठ गई। सुषमा वहां खड़ी ही रह गई। उन दोनों ने पलटकर भी नहीं देखा। सुषमा का जी चाह रहा था कि हवा में उड़कर संध्या को पकड़ ले और उसे बताए कि ‘संध्या दीदी’ मैं तुम्हारी बहन हूं, जिसने अपनी आबरू गंवाकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे अपाहिज पिता हैं, जिन्होंने अपनी टांगें खोकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे पास मुझसे बात करने की फुर्सत नहीं।’
उसके होंठ गुस्से से बुरी तरह भिंचे हुए थे और आंखों में आंसुओं की दो बूंदें तैर रही थीं।
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सुषमा ने घण्टी बजाई। दरवाजा रजनी ने खोला। एक क्षण के लिए ठिठकी फिर मुस्करा कर बोली‒ ‘सुषमा, आओ-आओ।’
सुषमा अन्दर आई। रजनी के पति ने अन्दर के कमरे से निकलते हुए कहा, ‘अरे, सुषमा तुम हो। इधर कैसे भूल गई आज?’
‘जी, मैं तो कई बार आ चुकी हूं, मगर आप लोग ही...।’
‘क्या बताऊं सुषमा,’ रजनी जल्दी से बोली, ‘घर-बार से फुर्सत की नहीं मिलती।’
‘मैं जरा कपड़े बदल लूं।’ प्रकाश ने अन्दर कमरे में जाते हुए कहा, ‘तब तक तुम अपनी बहन के लिए कुछ चाय वगैरह बना लो।’
प्रकाश अन्दर चला गया। जब अन्दर चला गया तो सुषमा ने रजनी से कहा- ‘दीदी, मैं एक जरूरी काम से आई थी।’
‘हां, कहो।’
‘मेरा रिजल्ट रुक गया है। साढ़े तीन सौ रुपये फीस भरनी है। अगर डिग्री मिल जाए तो मुझे कहीं नौकरी मिल जाएगी, घर की हालत तो तुम जानती ही हो।’
‘अरे बहन, आजकल किसके घर की हालत किससे छिपी है। अब तुम्हें क्या बताऊं, हर महीने बंधे लगे पैसे घर आते हैं। फिर भी महीने के आखिरी दिनों में तंगी हो जाती है। फिर यह भी तो कितने शर्म की बात है कि मैं तुम्हारे जीजाजी से कहूं कि मेरे मायके वाले कंगाल हो गए हैं।’
इससे पहले कि सुषमा कुछ कहे प्रकाश बाहर आ गया।
‘अरे, तुमने चाय नहीं बनाई सुषमा के लिए?’
‘बनाती हूं,’ रजनी झटके से उठकर किचन में चली गई। प्रकाश ने मुस्कराकर सुषमा से कहा, ‘जिन्दगी भर नहीं भूल सकता वह बात।’
‘जी।’
‘अरे, जब मैं और मेरे भैया रजनी और संध्या भाभी को देखने गए थे।’ प्रकाश हंसकर बोला, ‘तुमने भेंगी और अपाहिज बनकर हमारा स्वागत किया था। अरे, अगर तुम अपने वास्तविक रूप में हमारे सामने आ जाती तो शायद रजनी की जगह तुम किचन में होती।’
सुषमा कुछ न बोली। इतने में रजनी चाय लेकर आई। उसने जरा कड़ी नजरों से प्रकाश को देखा तो वह सकपका गया और बोला-
‘अच्छा भई, मैं जा रहा हूं। मुझे एक दोस्त के यहां पहुंचना है।’
‘चाय तो पी लीजिए।’ सुषमा ने कहा।
‘नहीं सुषमा।’ रजनी बोली, ‘यह चाय बहुत कम पीते हैं।’
फिर प्रकाश चला गया तो रजनी ने इस तरह चाय की प्याली सुषमा की तरफ सरकाई जैसे भीख दे रही हो। सुषमा के दिल में गुस्से की लहर-सी उठी। मगर उसने अपने ऊपर काबू रखते हुए कहा-
‘दीदी, मेरा जी नहीं चाह रहा चाय पीने को।’
रजनी ने दोबारा चाय के लिए कहे बगैर प्याली उठा ली और एक घूंट भर कर बोली- ‘बाबूजी कैसे हैं?’
‘वैसे ही।’ सुषमा ने उठते हुए कहा।
‘हां सुनो।’ रजनी ने कहा, ‘मैं तुमसे कई रोज से एक बात कहना चाहती थी।’
‘हां कहो।’
‘तुम दोपहर में आया करो।’
‘क्यों?’ सुषमा ने तेज लहजे में पूछा।
‘अब तुम्हें साफ-साफ बता दूं।’ रजनी आंखें निकालकर बोली, ‘तुम्हारी वजह से कई बार मेरी और दीदी की शादी की बात टल गई थी। तुम्हारे जीजा के सामने तुम्हारा यहां आना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं, क्योंकि वह जरा दिलफेंक तबीयत के हैं।’
सुषमा का खून खौल गया। वह अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करती हुई बोली-
‘इतना ही खतरा है तो घर से क्यों निकलने देती हो। आंचल में बांध कर रखा करो। अकेली मैं ही तो तुमसे ज्यादा खूबसूरत नहीं। शहर में बहुतेरी लड़कियां और भी हैं।’
‘बदतमीज़, जुबान चलाती है।’ रजनी ने तमाचा उठाया, मगर सुषमा ने उसकी कलाई पकड़ ली।
‘अहसान-फरामोश, अगर तू मेरी बड़ी बहन न होती तो तेरी कलाई मरोड़ देती।’
फिर वह झटके से उसका हाथ छोड़कर दरवाजे की तरफ बढ़ी तो रजनी ने गुस्से-से कांपते हुए कहा, ‘खबरदार जो आइन्दा मेरे घर में कदम रखा।’
‘अरे, तू मर गई तो भी सूरत देखने नहीं आऊंगी।’
सुषमा बाहर निकल आई। क्रोध के मारे उसके पांव आड़े-तिरछे पड़ रहे थे। उसके अंग-अंग से जैसे लावा-सा उठ रहा था। फिर वह जैसे ही गली की तरफ मुड़ी तो प्रकाश नजर आया जो स्कूटर रोके खड़ा हुआ था। मुस्कराकर बोला, ‘मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।’
‘क्यों?’ सुषमा का लहजा कुछ तीखा था।
‘मैंने तुम्हारी और रजनी की बातें सुन ली थीं, तुम्हारा रिजल्ट रुक गया है ना?’
सुषमा की कल्पना में रजनी का चेहरा उभरा। दिमाग में भट्टी-सी जल उठी और उसे अपने-आपको संभालते हुए कहा, ‘हां, सिर्फ साढ़े तीन सौ रुपये के लिए।’
‘अगर तुम्हें साढ़े तीन सौ रुपये मिल जाएं तो तुम्हें डिग्री मिल जाएगी और डिग्री मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी और घर के हालात भी संभल जायंगे। तुम्हारे घर के हालात किससे छिपे हुए हैं।’
‘आप ठीक कहते हैं।’
‘ऐसे समय पर रिश्तेदार ही रिश्तेदारों के काम आते हैं।’
‘अच्छा।’ सुषमा ने जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा, ‘आपको इस बात अहसास है?’
‘जानवरों को अहसास नहीं होता। मैं तो इन्सान हूं।’
‘तो फिर लाइए, साढ़े तीन सौ रुपये दीजिए मुझे।’
प्रकाश ने फौरन बटुआ खोला और साढ़े तीन सौ रुपये निकालकर सुषमा को दिए। सुषमा साढ़े तीन सौ रुपये गिरेबान में डाल, स्कूटर पर हाथ रखकर बड़ी अदा-से मुस्कराती हुई बोली-
‘अब बताइए आपकी इस नेकी का बदला कैसे चुकाऊं?’
‘बदला चुकाना चाहती हो?- प्रकाश अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराया- ‘यह तो इस हाथ दे और उस हाथ ले की बात होती है।’
‘मैं जानती हूं कि जब तक पप्पू बड़ा न हो जाए मैं शादी नहीं कर सकती। मगर मैं भी इंसान हूं, कोई देवी तो हूं नहीं।’
‘सच!’ प्रकाश की आंखें चमक उठीं।
‘लेकिन इतना याद रखिए, किसी को कानों-कान पता न चले।’
‘क्या बात करती हो।’ प्रकाश हंसता हुआ बोला- ‘भला यह बात किसी से कह सकता हूं। चलो, कहां चलोगी इस समय।’
‘अभी नहीं, मेरी एक शर्त और भी होगी।’
‘जल्दी बोलो।’
‘अब देखिए, जिस घर में मैं आती हूं, वह आपका घर है। दीदी हमेशा की शक्की है। आज उसने मुझे साफ शब्दों में कह दिया है कि मेरे पति दिलफेंक तबीयत के आदमी हैं। तू यहां मत आया कर।’
‘उसकी यह मजाल, मैं अभी उसकी खबर लेता हूं।’
‘ओह, नहीं।’ सुषमा ने मुस्कराकर कहा, ‘खबर लेना कोई सजा नहीं होती।’
‘फिर जो तुम कहो।’
‘मानेंगे आप मेरी बात?’
‘दिल और जान से।’
‘देखिए, मेरी एक सहेली है, जिसकी शादी को दो-तीन वर्ष हो गए। छः महीने तक वह बड़ी तुनक-मिजाज और नखरीली थी। पति को चुटकियों में बनाती थी। एक बार उसके पति ने तंग आकर दोस्तों से सलाह की। दोस्तों ने कहा पत्नी से सलूक वही रखना जो करते हो, बस दो-तीन महीने तक उसके शरीर को मत छूना। एक रोज खुद-ब-खुद कदमों पर आ गिरेगी। मेरी सहेली एक महीने के बाद ही अपने पति के कदमों में गिर गई और अब यह हालत है कि उनके इशारों पर नाचती है। वह रात को दिन कहे तो दिन कहेगी और दिन को रात कहे तो रात।’
‘तुम चाहती हो कि मैं छः महीने तक रजनी से अलग रहूं। अरे, मैं तो साल-भर के लिए उससे अलग रह लूंगा।’
‘इतने लम्बे अर्से की जरूरत नहीं पड़ेगी, मगर साथ ही मेरी दो शर्तें होंगी।’
‘बोलो।’
‘देखिए बहन-बहन का रिश्ता अपनी जगह होता है। मगर जिस तरह रजनी दीदी ने मेरा अपमान करके मुझे घर से निकाला है, ऐसा तो कोई गैर भी नहीं करता।’
‘बेशक।’
‘आप दीदी को तब तक तड़पाइए जब तक वह आपके कदमों में न गिर पड़े और जिस दिन वह कदमों पर गिरे उसे कहिए, तुमने बिना वजह अपनी बहन का अपमान किया है, उससे जाकर माफी मांगो और खुद उसे घर लेकर आओ और मैं तुम्हारे किसी और औरत के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता। बस जिस रोज वह मुझसे माफी मांगने आएगी, उस रोज मैं आपसे कहूंगी मुझे स्कूटर पर वापस घर पहुंचा दीजिए और फिर आप खुद समझ जाइए।’
‘तो पक्का वादा?’
‘बिल्कुल पक्का।’
‘बस तो ड्रामा आज ही से शुरू।’
‘मैं जल्दी से जल्दी आपकी कामयाबी का इन्तजार करूंगी। मगर याद रखिए अगर आप बहक गए और किसी रोज यह बात किसी टोन में दीदी से कह गए तो फिर दीदी आपको सारी उम्र गुलाम बनाकर रखेगी और मैं भी आपके साढ़े तीन सौ रुपये लौटा दूंगी।’
‘अरे, तुमने समझ क्या रखा है, मर्द, मर्द है। तुम्हारी दीदी से पहले न जाने कितनी बांहों में आकर चली गई। तुम्हारे लिए तो दस साल तक रजनी को हाथ न लगाऊं। बाजार भरे पड़े हैं, रजनी जैसी औरतों से।’
सुषमा को होंठों पर एक विजयी मुस्कराहट फैल गई।’
‘सुषमा चोर-चोर सी अन्दर दाखिल हुई तो शंकर ने जरा ऊंची आवाज में कहा- ‘संध्या, देखो तुम्हारी बहन आई है।’
‘कौन? रजनी?’
‘नहीं, सुषमा।’
‘ओह आती हूं।’ जवाब ऐसी ही था जैसे संध्या को सुषमा के आने से कोई खुशी न हुई हो।
कुछ क्षण बाद संध्या बाहर निकली। उसने एक कीमती साड़ी बांध रखी थी। गले में हार था, हाथों में कंगन, कानों में बुन्दे। हाथों में पर्स लटका हुआ था। वह जबरदस्ती मुस्कराने की कोशिश करती हुई बोली‒
‘कैसी हो सुषमा, कैसे आई?’
‘जी मैं... मैं दीदी।’
‘मैं जरा बाथरूम होकर आता हूं।’ शंकर चला गया।
‘दीदी।’ सुषमा ने कहा, ‘मैं दरअसल इसलिए आई हूं कि-।’
‘सुषमा, बाबूजी अब कैसे हैं?’ संध्या उसकी बात काट कर बोली।
‘अभी वैसी ही तबीयत है दीदी, वोह मैं....’
‘दरअसल हम लोग जरा जल्दी में है।’ संध्या कलाई की घड़ी देखकर बोली, ‘तुम्हारे जीजाजी के एक दोस्त... वह बोली, ‘अजी, जल्दी कीजिए।’
‘दीदी।’ सुषमा ने जल्दी-से कहा ‘मुझे साढ़े तीन सौ रुपये की जरूरत है।’
‘साढ़े तीन सौ, भला किस काम के लिए?’
‘मैं पास तो हो गई हूं, मगर डिग्री रुक गई है, क्योंकि छः महीने से फीस नहीं दी गई। तुम तो घर की हालत जानती हो, अगर मुझे डिग्री मिल गई तो नौकरी भी मिल जाएगी।’
‘सुषमा, तू क्या जाने हम लोग घर का खर्च कैसे चलाते हैं। इनके पिता ने दोनों बेटों के लिए रकमें बांध रखी हैं, उसमें से ही सब कुछ करना पड़ता है। वैसे भी उनके सामने कैसे कह सकती हूं।’
इतने में शंकर आया और मुस्कराकर बोला‒
‘तुम लोगों की बातें खत्म हो गयी हों तो चलें।’
‘बातें क्या बस बाबूजी का हाल बताने आ गई। चलिए।’
वे दोनों बाहर आए तो सुषमा उनके पीछे-पीछे बाहर आई। शंकर ने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट किया। संध्या पीछे बैठ गई। सुषमा वहां खड़ी ही रह गई। उन दोनों ने पलटकर भी नहीं देखा। सुषमा का जी चाह रहा था कि हवा में उड़कर संध्या को पकड़ ले और उसे बताए कि ‘संध्या दीदी’ मैं तुम्हारी बहन हूं, जिसने अपनी आबरू गंवाकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे अपाहिज पिता हैं, जिन्होंने अपनी टांगें खोकर तुम्हारा घर बसाया है और तुम्हारे पास मुझसे बात करने की फुर्सत नहीं।’
उसके होंठ गुस्से से बुरी तरह भिंचे हुए थे और आंखों में आंसुओं की दो बूंदें तैर रही थीं।
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सुषमा ने घण्टी बजाई। दरवाजा रजनी ने खोला। एक क्षण के लिए ठिठकी फिर मुस्करा कर बोली‒ ‘सुषमा, आओ-आओ।’
सुषमा अन्दर आई। रजनी के पति ने अन्दर के कमरे से निकलते हुए कहा, ‘अरे, सुषमा तुम हो। इधर कैसे भूल गई आज?’
‘जी, मैं तो कई बार आ चुकी हूं, मगर आप लोग ही...।’
‘क्या बताऊं सुषमा,’ रजनी जल्दी से बोली, ‘घर-बार से फुर्सत की नहीं मिलती।’
‘मैं जरा कपड़े बदल लूं।’ प्रकाश ने अन्दर कमरे में जाते हुए कहा, ‘तब तक तुम अपनी बहन के लिए कुछ चाय वगैरह बना लो।’
प्रकाश अन्दर चला गया। जब अन्दर चला गया तो सुषमा ने रजनी से कहा- ‘दीदी, मैं एक जरूरी काम से आई थी।’
‘हां, कहो।’
‘मेरा रिजल्ट रुक गया है। साढ़े तीन सौ रुपये फीस भरनी है। अगर डिग्री मिल जाए तो मुझे कहीं नौकरी मिल जाएगी, घर की हालत तो तुम जानती ही हो।’
‘अरे बहन, आजकल किसके घर की हालत किससे छिपी है। अब तुम्हें क्या बताऊं, हर महीने बंधे लगे पैसे घर आते हैं। फिर भी महीने के आखिरी दिनों में तंगी हो जाती है। फिर यह भी तो कितने शर्म की बात है कि मैं तुम्हारे जीजाजी से कहूं कि मेरे मायके वाले कंगाल हो गए हैं।’
इससे पहले कि सुषमा कुछ कहे प्रकाश बाहर आ गया।
‘अरे, तुमने चाय नहीं बनाई सुषमा के लिए?’
‘बनाती हूं,’ रजनी झटके से उठकर किचन में चली गई। प्रकाश ने मुस्कराकर सुषमा से कहा, ‘जिन्दगी भर नहीं भूल सकता वह बात।’
‘जी।’
‘अरे, जब मैं और मेरे भैया रजनी और संध्या भाभी को देखने गए थे।’ प्रकाश हंसकर बोला, ‘तुमने भेंगी और अपाहिज बनकर हमारा स्वागत किया था। अरे, अगर तुम अपने वास्तविक रूप में हमारे सामने आ जाती तो शायद रजनी की जगह तुम किचन में होती।’
सुषमा कुछ न बोली। इतने में रजनी चाय लेकर आई। उसने जरा कड़ी नजरों से प्रकाश को देखा तो वह सकपका गया और बोला-
‘अच्छा भई, मैं जा रहा हूं। मुझे एक दोस्त के यहां पहुंचना है।’
‘चाय तो पी लीजिए।’ सुषमा ने कहा।
‘नहीं सुषमा।’ रजनी बोली, ‘यह चाय बहुत कम पीते हैं।’
फिर प्रकाश चला गया तो रजनी ने इस तरह चाय की प्याली सुषमा की तरफ सरकाई जैसे भीख दे रही हो। सुषमा के दिल में गुस्से की लहर-सी उठी। मगर उसने अपने ऊपर काबू रखते हुए कहा-
‘दीदी, मेरा जी नहीं चाह रहा चाय पीने को।’
रजनी ने दोबारा चाय के लिए कहे बगैर प्याली उठा ली और एक घूंट भर कर बोली- ‘बाबूजी कैसे हैं?’
‘वैसे ही।’ सुषमा ने उठते हुए कहा।
‘हां सुनो।’ रजनी ने कहा, ‘मैं तुमसे कई रोज से एक बात कहना चाहती थी।’
‘हां कहो।’
‘तुम दोपहर में आया करो।’
‘क्यों?’ सुषमा ने तेज लहजे में पूछा।
‘अब तुम्हें साफ-साफ बता दूं।’ रजनी आंखें निकालकर बोली, ‘तुम्हारी वजह से कई बार मेरी और दीदी की शादी की बात टल गई थी। तुम्हारे जीजा के सामने तुम्हारा यहां आना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं, क्योंकि वह जरा दिलफेंक तबीयत के हैं।’
सुषमा का खून खौल गया। वह अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करती हुई बोली-
‘इतना ही खतरा है तो घर से क्यों निकलने देती हो। आंचल में बांध कर रखा करो। अकेली मैं ही तो तुमसे ज्यादा खूबसूरत नहीं। शहर में बहुतेरी लड़कियां और भी हैं।’
‘बदतमीज़, जुबान चलाती है।’ रजनी ने तमाचा उठाया, मगर सुषमा ने उसकी कलाई पकड़ ली।
‘अहसान-फरामोश, अगर तू मेरी बड़ी बहन न होती तो तेरी कलाई मरोड़ देती।’
फिर वह झटके से उसका हाथ छोड़कर दरवाजे की तरफ बढ़ी तो रजनी ने गुस्से-से कांपते हुए कहा, ‘खबरदार जो आइन्दा मेरे घर में कदम रखा।’
‘अरे, तू मर गई तो भी सूरत देखने नहीं आऊंगी।’
सुषमा बाहर निकल आई। क्रोध के मारे उसके पांव आड़े-तिरछे पड़ रहे थे। उसके अंग-अंग से जैसे लावा-सा उठ रहा था। फिर वह जैसे ही गली की तरफ मुड़ी तो प्रकाश नजर आया जो स्कूटर रोके खड़ा हुआ था। मुस्कराकर बोला, ‘मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।’
‘क्यों?’ सुषमा का लहजा कुछ तीखा था।
‘मैंने तुम्हारी और रजनी की बातें सुन ली थीं, तुम्हारा रिजल्ट रुक गया है ना?’
सुषमा की कल्पना में रजनी का चेहरा उभरा। दिमाग में भट्टी-सी जल उठी और उसे अपने-आपको संभालते हुए कहा, ‘हां, सिर्फ साढ़े तीन सौ रुपये के लिए।’
‘अगर तुम्हें साढ़े तीन सौ रुपये मिल जाएं तो तुम्हें डिग्री मिल जाएगी और डिग्री मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी तो नौकरी भी मिल जाएगी और घर के हालात भी संभल जायंगे। तुम्हारे घर के हालात किससे छिपे हुए हैं।’
‘आप ठीक कहते हैं।’
‘ऐसे समय पर रिश्तेदार ही रिश्तेदारों के काम आते हैं।’
‘अच्छा।’ सुषमा ने जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा, ‘आपको इस बात अहसास है?’
‘जानवरों को अहसास नहीं होता। मैं तो इन्सान हूं।’
‘तो फिर लाइए, साढ़े तीन सौ रुपये दीजिए मुझे।’
प्रकाश ने फौरन बटुआ खोला और साढ़े तीन सौ रुपये निकालकर सुषमा को दिए। सुषमा साढ़े तीन सौ रुपये गिरेबान में डाल, स्कूटर पर हाथ रखकर बड़ी अदा-से मुस्कराती हुई बोली-
‘अब बताइए आपकी इस नेकी का बदला कैसे चुकाऊं?’
‘बदला चुकाना चाहती हो?- प्रकाश अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराया- ‘यह तो इस हाथ दे और उस हाथ ले की बात होती है।’
‘मैं जानती हूं कि जब तक पप्पू बड़ा न हो जाए मैं शादी नहीं कर सकती। मगर मैं भी इंसान हूं, कोई देवी तो हूं नहीं।’
‘सच!’ प्रकाश की आंखें चमक उठीं।
‘लेकिन इतना याद रखिए, किसी को कानों-कान पता न चले।’
‘क्या बात करती हो।’ प्रकाश हंसता हुआ बोला- ‘भला यह बात किसी से कह सकता हूं। चलो, कहां चलोगी इस समय।’
‘अभी नहीं, मेरी एक शर्त और भी होगी।’
‘जल्दी बोलो।’
‘अब देखिए, जिस घर में मैं आती हूं, वह आपका घर है। दीदी हमेशा की शक्की है। आज उसने मुझे साफ शब्दों में कह दिया है कि मेरे पति दिलफेंक तबीयत के आदमी हैं। तू यहां मत आया कर।’
‘उसकी यह मजाल, मैं अभी उसकी खबर लेता हूं।’
‘ओह, नहीं।’ सुषमा ने मुस्कराकर कहा, ‘खबर लेना कोई सजा नहीं होती।’
‘फिर जो तुम कहो।’
‘मानेंगे आप मेरी बात?’
‘दिल और जान से।’
‘देखिए, मेरी एक सहेली है, जिसकी शादी को दो-तीन वर्ष हो गए। छः महीने तक वह बड़ी तुनक-मिजाज और नखरीली थी। पति को चुटकियों में बनाती थी। एक बार उसके पति ने तंग आकर दोस्तों से सलाह की। दोस्तों ने कहा पत्नी से सलूक वही रखना जो करते हो, बस दो-तीन महीने तक उसके शरीर को मत छूना। एक रोज खुद-ब-खुद कदमों पर आ गिरेगी। मेरी सहेली एक महीने के बाद ही अपने पति के कदमों में गिर गई और अब यह हालत है कि उनके इशारों पर नाचती है। वह रात को दिन कहे तो दिन कहेगी और दिन को रात कहे तो रात।’
‘तुम चाहती हो कि मैं छः महीने तक रजनी से अलग रहूं। अरे, मैं तो साल-भर के लिए उससे अलग रह लूंगा।’
‘इतने लम्बे अर्से की जरूरत नहीं पड़ेगी, मगर साथ ही मेरी दो शर्तें होंगी।’
‘बोलो।’
‘देखिए बहन-बहन का रिश्ता अपनी जगह होता है। मगर जिस तरह रजनी दीदी ने मेरा अपमान करके मुझे घर से निकाला है, ऐसा तो कोई गैर भी नहीं करता।’
‘बेशक।’
‘आप दीदी को तब तक तड़पाइए जब तक वह आपके कदमों में न गिर पड़े और जिस दिन वह कदमों पर गिरे उसे कहिए, तुमने बिना वजह अपनी बहन का अपमान किया है, उससे जाकर माफी मांगो और खुद उसे घर लेकर आओ और मैं तुम्हारे किसी और औरत के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता। बस जिस रोज वह मुझसे माफी मांगने आएगी, उस रोज मैं आपसे कहूंगी मुझे स्कूटर पर वापस घर पहुंचा दीजिए और फिर आप खुद समझ जाइए।’
‘तो पक्का वादा?’
‘बिल्कुल पक्का।’
‘बस तो ड्रामा आज ही से शुरू।’
‘मैं जल्दी से जल्दी आपकी कामयाबी का इन्तजार करूंगी। मगर याद रखिए अगर आप बहक गए और किसी रोज यह बात किसी टोन में दीदी से कह गए तो फिर दीदी आपको सारी उम्र गुलाम बनाकर रखेगी और मैं भी आपके साढ़े तीन सौ रुपये लौटा दूंगी।’
‘अरे, तुमने समझ क्या रखा है, मर्द, मर्द है। तुम्हारी दीदी से पहले न जाने कितनी बांहों में आकर चली गई। तुम्हारे लिए तो दस साल तक रजनी को हाथ न लगाऊं। बाजार भरे पड़े हैं, रजनी जैसी औरतों से।’
सुषमा को होंठों पर एक विजयी मुस्कराहट फैल गई।’