S
StoryPublisher
Guest
दीपू और डॉली स्कूल जाने लगे तो उसने उन दोनों को अच्छी तरह समझाया कि वह सीधे स्कूल जाया करें और स्कूल से सीधे घर लौटा करें। बीच की छुट्टी में स्कूल की बाउंड्री से बाहर न निकला करें और न किसी अजनबी से ही बातें किया करें।
दोनों बच्चों को स्कूल भेजकर सुषमा तैयार होने लगी तो जूली ने कहा- “एक बात पूछूं, मेम साहब।”
“पूछो।”
“आपने जब से मिसेज छाबड़ा की हत्या की खबर सुनी है, आपको क्या हो गया हैं?”
“जूली, तुझे याद है, कृष्ण को दस वर्ष की सजा हुई थी। रूबी की हत्या के जुर्म में?”
“हां।” जूली चौंक पड़ी।
“दस साल हो चुके हैं। कृष्ण या तो छूटने वाला होगा या छूट चुका होगा। रूबी को मारने की खबर के बाद उसने फोन पर मुझे धमकी दी थी कि एक-न-एक दिन वह मुझे भी मार डालेगा।”
“नहीं!” जूली भय से कांप उठी।
“जूली, मुझे अपनी चिन्ता नहीं है। चिन्ता है अपने बच्चों की वे अभी तक बहुत छोटे हैं। मेरे मर जाने के बाद वे अनाथ हो जायेंगे।”
“भगवान न करे कि आपको कुछ हो। आप डरती क्यों हैं, मेम साहब। ऊपर वाले पर भरोसा रखिए। वह बदमाश आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
सुषमा ठंडी सांस लेकर रह गई। कुछ देर रुककर सुषमा ने कहा-
“जूली, मैं सोचती हूं क्यों न हम लोग बम्बई छोड़कर किसी दूसरे शहर में चले जायें। मैं अपने धन्धे से उकता चुकी हूं। इन्सान कहलाने वाले जानवरों की आंखें जब मेरे शरीर को घूरती हैं तो ऐसा लगता है जैसे मेरे शरीर में कोई सुइयां चुभो रहा हो। जहरीली सूइयां।”
“लेकिन आप कहां जायेंगी? क्या करेंगी?”
“कहीं भी चली जाऊंगी। मेरे पास इतना पैसा है कि कोई कारोबार कर सकूं।”
“मेम साहब, कारोबार के लिए एक मर्द की जरूरत होती है। क्या आप संभाल सकेंगी?”
“सुषमा को जैसे एक झटका-सा लगा। उसके होंठ भिंच गए। और उसकी आंखों के आगे महेश का चेहरा नाच उठा।
सुषमा ने कार के शीशे चढ़ा रखे थे और निरुद्देश्य सड़कों पर भटक रही थी। वह आज काम पर नहीं गई थी। हालांकि आज एक बहुत बड़ी फर्म की विज्ञापन फिल्म बनने वाली थी।
उसका खाली-खाली मन कह रहा था कि जैसे उसे किसी चीज की तलाश है। उसकी बेचैन नजरें किसी चीज की खोज में इधर-उधर भटक रही थीं।
अचानक उसकी नजर एक बिल्डिंग की ओर उठ गई जो अभी बन ही रही थी। कुछ मजदूर काम कर रहे थे। और एक आदमी उन्हें सुपरवाइजर कर रहा था। उसके बदन पर गहरे रंग की पतलून और शर्ट थी। सिर पर धूप से बचने के लिए टोपी थी। उसकी कनपटियों पर से सफेद बाल झांक रहे थे। चेहरा सांवला-सांवला दिखाई दे रहा था।
उस आदमी को देखते ही सुषमा का दिल इतनी जोर से धड़का जैसे उसके दिल की धड़कने एकदम बन्द होने वाली हों। वह बड़े ध्यान से उसे देखने लगीं। उसका मस्तिष्क चीखने लगा- “महेश-महेश-हां यह महेश ही है। समय ने उसके चेहरे पर अपने कदमों के निशान छोड़ दिए हैं।”
कार रोककर वह नीचे उतर गई। और दरवाजे के पास खड़ी-खड़ी महेश को देखने लगी।
महेश बहुत ही व्यस्त दिखाई दे रहा था।
कुछ देर के बाद अचानक महेश की नजरें सुषमा की ओर उठ गईं। कुछ पल के लिए जैसे वह पत्थर की मूर्ति बन गया। वह अपनी पलकें तक झपकाना भूल गया।
फिर धीरे-धीरे जैसे उसके चेहरे पर बदन का सारा लहू सिमट आया। आंखें चमक उठीं। वह धीरे-धीरे चलता हुआ सुषमा के पास आ गया।
सुषमा के होंठ कांप रहे थे। आंखों में आंसू छलक उठे थे। महेश की आंखें भी गीली हो उठी थीं।
महेश कुछ देर खड़ा-खड़ा उसे देखता रहा फिर कांपती हुई आवाज में धीरे-से बोला- “सुषमा तुम।”
“हां, महेश।” सुषमा की आवाज भी कांप रही थी।
“तुमने मुझे कैसे पहचान लिया है?”
“जिस तरह तुमने मुझे पहचान लिया।”
“तुम्हें तो सारा देश ही पहचानता है। तुम रत्ती-भर भी तो नहीं बदलीं, सुषमा? जैसे चौदह वर्ष पहले थीं, आज उससे भी अधिक सुन्दर दिखाई दे रही हो।”
“छोड़ो, तुम यहां क्या करते हो?”
“पायल बिल्डर्स के यहां ठेकेदारों को असिस्ट करता हूं।”
“कहां रहते हो?”
“एक छोटा-सा फ्लैट ले लिया है। एक रूम है, किचन है।”
“इतने छोटे से फ्लैट में तुम्हारे बाल-बच्चों का गुजारा हो जाता है?”
“बाल बच्चे?” महेश धीरे-से हंस पड़ा, “बाल बच्चे हों तो गुजर मुश्किल है।”
“क्या मतलब? तुमने शादी नहीं की?”
महेश के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। उसने धीरे से कहा-
“जो सिन्दूर जिस मांग के लिए खरीदा था, वह उस मांग में नहीं भर सका। फिर किसी दूसरी मांग में कैसे भरता, वैसे भी शायद मैं किसी को खुश न रख पाता। इसलिए मैंने यही उचित समझा कि अपने दुखों को अपने सीने से ही लगाए रखूं। अब तो जिन्दगी में आनन्द आने लगा है। खैर छोड़ो, तुम कैसी हो? तुम्हारे पति कैसे हैं। बच्चे कितने हैं?”
“दो-बड़ी लड़की है डॉली। तेरह वर्ष की है। छोटा लड़का है दीपू। लगभग दस वर्ष का।”
“बधाई हो। पतिदेव तो अच्छी तरह रखते हैं न?”
“उन्हें छोड़े हुए तो दस वर्ष हो गये, दीपू ने तो उनकी सूरत भी नहीं देखी। डॉली भी इतनी छोटी थी कि शायद ही पहचान सके।”
महेश भौंचक्का-सा रह गया, फिर धीरे-से बोला-
“लेकिन क्यों?”
सुषमा ने पूरी कहानी सुना दी। फिर भर्राई आवाज में बोली-
“अब मैं इतनी थक चुकी हूं महेश कि एक कदम भी आगे बढ़ने की शक्ति मुझे में नहीं रही। मेरे कानों में हर समय कृष्ण की धमकी गूंजती रहती है। सोते में उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देखती हूं। और चीखकर जाग जाती हूं। मैं कितनी अभागिनी हूं। मेरी दो बहने है, उनके पति है। उनका परिवार है। भाई है। उसका परिवार है। लेकिन उन तीनों के परिवार जिसने बसाए थे। आज वह बेसहारा है। इस भरी दुनिया में मेरा कोई भी अपना नहीं है।”
“ऐसा क्यों कहती हो, सुषमा। सच्चे प्यार पर इल्जाम का अन्धेरा मत डालो। इस दुनिया में अभी एक ऐसा व्यक्ति मौजूद है जो सुषमा के लिए पराया नहीं है। तुम अकेली नहीं हो सुषमा। तुम इस हालत में भी अकेली नहीं हो।”
“मैं जानती हूं, महेश!” वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “मेरी नजरें भी तुम्हीं को खोज रही थीं महेश। मैं जानती हूं कि सिन्दूर की वह डिबिया तुम्हारे पास आज भी सुरक्षित रखी होगी। लेकिन अब मेरे बच्चे इतने बड़े हो चुके हैं कि मैं उस सिंदूर को अपनी मांग में नहीं भरवा सकती। अगर मैं ऐसा करूंगी तो शायद एक मां पर से बच्चों का विश्वास ही उठ जाएगा।”
महेश के होंठों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई। उसने कहा-
“सुषमा, तुमने प्यार को इतना स्वार्थी क्यों समझ लिया कि तुम्हारी मांग में सिन्दूर भरे बिना मैं तुम्हारी ढाल नहीं बन सकता?”
“महेश!” सुषमा की आवाज कांप उठी।
“हां सुषमा, प्यार केवल शरीरों के मिलन का ही नाम नहीं है। प्यार तो आत्माओं के मिलाप का नाम है। यह प्यार ही तो है जिसने मुझे आज तक अकेला रखा है। यह प्यार ही तो है कि जब तुम थक गईं और तुम्हें सहारे की जरूरत महसूस हुई तो तुम्हारी नजरों ने महेश को ही खोजा और यह प्यार की सच्चाई का ही सबूत है कि तुमने मुझे खोजना शुरू किया और बम्बई जैसे शहर में तुमने मुझे खोज लिया।”
“तुम ठीक कहते हो महेश, ठीक कहते हो तुम।”
कहते-कहते सुषमा रो पड़ी।
24
सुषमा ने कार रोक दी और महेश के साथ कार से उतर आई।
उसने दरवाजे की घंटी बजाई तो जूली ने दरवाजा खोल दिया और महेश को देखते ही ठिठककर पीछे हट गई।
“दीपू और डॉली कहां है?” सुषमा ने अन्दर जाते हुए पूछा।
“जी, अपने-अपने कमरे में है।”
“जाओ, दोनों को बुला लाओ।”
जूली चली गई।
थोड़ी देर बाद डॉली और दीपू आ गए।
महेश को देखती ही दोनों ठिठक गए। महेश उन दोनों को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके पूरे शरीर में बिजली की लहरें दौड़ रही थीं। झुरझुरी-सी आ रही थी, जैसे ठंड लग रही हो। ऐसा लग रहा था जैसे ये बच्चे उसके अपने बच्चे हों। सुषमा के बच्चे क्या उसके बच्चे नहीं है?
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और दोनों को चिपटाकर उनके माथे चूम लिए। उसकी आंखें भीग गईं। फिर भर्राई आवाज में बोला-
“कितने प्यारे बच्चे हैं!”
सुषमा बड़ी कठिनाई से अपने आंसू रोक पाई।
डॉली ने कहा- “मम्मी यह-?”
सुषमा ने जल्दी से कहा-
“बेटी, यह तुम्हारे अंकल हैं। तुम्हारे डैडी के बहुत पुराने और घनिष्ठ मित्र। पहले यह दिल्ली में रहते थे। इन्हें पता नहीं था कि तुम्हारे डैडी का स्वर्गवास हो चुका है। आज अचानक ही यह मिल गए।”
“बच्चों।” महेश ने दोनों के सिरों पर हाथ फेरते हुए कहा, “अपने अंकल को कभी पराया मत समझना।”
कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई।
✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦
दोनों बच्चों को स्कूल भेजकर सुषमा तैयार होने लगी तो जूली ने कहा- “एक बात पूछूं, मेम साहब।”
“पूछो।”
“आपने जब से मिसेज छाबड़ा की हत्या की खबर सुनी है, आपको क्या हो गया हैं?”
“जूली, तुझे याद है, कृष्ण को दस वर्ष की सजा हुई थी। रूबी की हत्या के जुर्म में?”
“हां।” जूली चौंक पड़ी।
“दस साल हो चुके हैं। कृष्ण या तो छूटने वाला होगा या छूट चुका होगा। रूबी को मारने की खबर के बाद उसने फोन पर मुझे धमकी दी थी कि एक-न-एक दिन वह मुझे भी मार डालेगा।”
“नहीं!” जूली भय से कांप उठी।
“जूली, मुझे अपनी चिन्ता नहीं है। चिन्ता है अपने बच्चों की वे अभी तक बहुत छोटे हैं। मेरे मर जाने के बाद वे अनाथ हो जायेंगे।”
“भगवान न करे कि आपको कुछ हो। आप डरती क्यों हैं, मेम साहब। ऊपर वाले पर भरोसा रखिए। वह बदमाश आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
सुषमा ठंडी सांस लेकर रह गई। कुछ देर रुककर सुषमा ने कहा-
“जूली, मैं सोचती हूं क्यों न हम लोग बम्बई छोड़कर किसी दूसरे शहर में चले जायें। मैं अपने धन्धे से उकता चुकी हूं। इन्सान कहलाने वाले जानवरों की आंखें जब मेरे शरीर को घूरती हैं तो ऐसा लगता है जैसे मेरे शरीर में कोई सुइयां चुभो रहा हो। जहरीली सूइयां।”
“लेकिन आप कहां जायेंगी? क्या करेंगी?”
“कहीं भी चली जाऊंगी। मेरे पास इतना पैसा है कि कोई कारोबार कर सकूं।”
“मेम साहब, कारोबार के लिए एक मर्द की जरूरत होती है। क्या आप संभाल सकेंगी?”
“सुषमा को जैसे एक झटका-सा लगा। उसके होंठ भिंच गए। और उसकी आंखों के आगे महेश का चेहरा नाच उठा।
सुषमा ने कार के शीशे चढ़ा रखे थे और निरुद्देश्य सड़कों पर भटक रही थी। वह आज काम पर नहीं गई थी। हालांकि आज एक बहुत बड़ी फर्म की विज्ञापन फिल्म बनने वाली थी।
उसका खाली-खाली मन कह रहा था कि जैसे उसे किसी चीज की तलाश है। उसकी बेचैन नजरें किसी चीज की खोज में इधर-उधर भटक रही थीं।
अचानक उसकी नजर एक बिल्डिंग की ओर उठ गई जो अभी बन ही रही थी। कुछ मजदूर काम कर रहे थे। और एक आदमी उन्हें सुपरवाइजर कर रहा था। उसके बदन पर गहरे रंग की पतलून और शर्ट थी। सिर पर धूप से बचने के लिए टोपी थी। उसकी कनपटियों पर से सफेद बाल झांक रहे थे। चेहरा सांवला-सांवला दिखाई दे रहा था।
उस आदमी को देखते ही सुषमा का दिल इतनी जोर से धड़का जैसे उसके दिल की धड़कने एकदम बन्द होने वाली हों। वह बड़े ध्यान से उसे देखने लगीं। उसका मस्तिष्क चीखने लगा- “महेश-महेश-हां यह महेश ही है। समय ने उसके चेहरे पर अपने कदमों के निशान छोड़ दिए हैं।”
कार रोककर वह नीचे उतर गई। और दरवाजे के पास खड़ी-खड़ी महेश को देखने लगी।
महेश बहुत ही व्यस्त दिखाई दे रहा था।
कुछ देर के बाद अचानक महेश की नजरें सुषमा की ओर उठ गईं। कुछ पल के लिए जैसे वह पत्थर की मूर्ति बन गया। वह अपनी पलकें तक झपकाना भूल गया।
फिर धीरे-धीरे जैसे उसके चेहरे पर बदन का सारा लहू सिमट आया। आंखें चमक उठीं। वह धीरे-धीरे चलता हुआ सुषमा के पास आ गया।
सुषमा के होंठ कांप रहे थे। आंखों में आंसू छलक उठे थे। महेश की आंखें भी गीली हो उठी थीं।
महेश कुछ देर खड़ा-खड़ा उसे देखता रहा फिर कांपती हुई आवाज में धीरे-से बोला- “सुषमा तुम।”
“हां, महेश।” सुषमा की आवाज भी कांप रही थी।
“तुमने मुझे कैसे पहचान लिया है?”
“जिस तरह तुमने मुझे पहचान लिया।”
“तुम्हें तो सारा देश ही पहचानता है। तुम रत्ती-भर भी तो नहीं बदलीं, सुषमा? जैसे चौदह वर्ष पहले थीं, आज उससे भी अधिक सुन्दर दिखाई दे रही हो।”
“छोड़ो, तुम यहां क्या करते हो?”
“पायल बिल्डर्स के यहां ठेकेदारों को असिस्ट करता हूं।”
“कहां रहते हो?”
“एक छोटा-सा फ्लैट ले लिया है। एक रूम है, किचन है।”
“इतने छोटे से फ्लैट में तुम्हारे बाल-बच्चों का गुजारा हो जाता है?”
“बाल बच्चे?” महेश धीरे-से हंस पड़ा, “बाल बच्चे हों तो गुजर मुश्किल है।”
“क्या मतलब? तुमने शादी नहीं की?”
महेश के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। उसने धीरे से कहा-
“जो सिन्दूर जिस मांग के लिए खरीदा था, वह उस मांग में नहीं भर सका। फिर किसी दूसरी मांग में कैसे भरता, वैसे भी शायद मैं किसी को खुश न रख पाता। इसलिए मैंने यही उचित समझा कि अपने दुखों को अपने सीने से ही लगाए रखूं। अब तो जिन्दगी में आनन्द आने लगा है। खैर छोड़ो, तुम कैसी हो? तुम्हारे पति कैसे हैं। बच्चे कितने हैं?”
“दो-बड़ी लड़की है डॉली। तेरह वर्ष की है। छोटा लड़का है दीपू। लगभग दस वर्ष का।”
“बधाई हो। पतिदेव तो अच्छी तरह रखते हैं न?”
“उन्हें छोड़े हुए तो दस वर्ष हो गये, दीपू ने तो उनकी सूरत भी नहीं देखी। डॉली भी इतनी छोटी थी कि शायद ही पहचान सके।”
महेश भौंचक्का-सा रह गया, फिर धीरे-से बोला-
“लेकिन क्यों?”
सुषमा ने पूरी कहानी सुना दी। फिर भर्राई आवाज में बोली-
“अब मैं इतनी थक चुकी हूं महेश कि एक कदम भी आगे बढ़ने की शक्ति मुझे में नहीं रही। मेरे कानों में हर समय कृष्ण की धमकी गूंजती रहती है। सोते में उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देखती हूं। और चीखकर जाग जाती हूं। मैं कितनी अभागिनी हूं। मेरी दो बहने है, उनके पति है। उनका परिवार है। भाई है। उसका परिवार है। लेकिन उन तीनों के परिवार जिसने बसाए थे। आज वह बेसहारा है। इस भरी दुनिया में मेरा कोई भी अपना नहीं है।”
“ऐसा क्यों कहती हो, सुषमा। सच्चे प्यार पर इल्जाम का अन्धेरा मत डालो। इस दुनिया में अभी एक ऐसा व्यक्ति मौजूद है जो सुषमा के लिए पराया नहीं है। तुम अकेली नहीं हो सुषमा। तुम इस हालत में भी अकेली नहीं हो।”
“मैं जानती हूं, महेश!” वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “मेरी नजरें भी तुम्हीं को खोज रही थीं महेश। मैं जानती हूं कि सिन्दूर की वह डिबिया तुम्हारे पास आज भी सुरक्षित रखी होगी। लेकिन अब मेरे बच्चे इतने बड़े हो चुके हैं कि मैं उस सिंदूर को अपनी मांग में नहीं भरवा सकती। अगर मैं ऐसा करूंगी तो शायद एक मां पर से बच्चों का विश्वास ही उठ जाएगा।”
महेश के होंठों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई। उसने कहा-
“सुषमा, तुमने प्यार को इतना स्वार्थी क्यों समझ लिया कि तुम्हारी मांग में सिन्दूर भरे बिना मैं तुम्हारी ढाल नहीं बन सकता?”
“महेश!” सुषमा की आवाज कांप उठी।
“हां सुषमा, प्यार केवल शरीरों के मिलन का ही नाम नहीं है। प्यार तो आत्माओं के मिलाप का नाम है। यह प्यार ही तो है जिसने मुझे आज तक अकेला रखा है। यह प्यार ही तो है कि जब तुम थक गईं और तुम्हें सहारे की जरूरत महसूस हुई तो तुम्हारी नजरों ने महेश को ही खोजा और यह प्यार की सच्चाई का ही सबूत है कि तुमने मुझे खोजना शुरू किया और बम्बई जैसे शहर में तुमने मुझे खोज लिया।”
“तुम ठीक कहते हो महेश, ठीक कहते हो तुम।”
कहते-कहते सुषमा रो पड़ी।
24
सुषमा ने कार रोक दी और महेश के साथ कार से उतर आई।
उसने दरवाजे की घंटी बजाई तो जूली ने दरवाजा खोल दिया और महेश को देखते ही ठिठककर पीछे हट गई।
“दीपू और डॉली कहां है?” सुषमा ने अन्दर जाते हुए पूछा।
“जी, अपने-अपने कमरे में है।”
“जाओ, दोनों को बुला लाओ।”
जूली चली गई।
थोड़ी देर बाद डॉली और दीपू आ गए।
महेश को देखती ही दोनों ठिठक गए। महेश उन दोनों को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके पूरे शरीर में बिजली की लहरें दौड़ रही थीं। झुरझुरी-सी आ रही थी, जैसे ठंड लग रही हो। ऐसा लग रहा था जैसे ये बच्चे उसके अपने बच्चे हों। सुषमा के बच्चे क्या उसके बच्चे नहीं है?
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और दोनों को चिपटाकर उनके माथे चूम लिए। उसकी आंखें भीग गईं। फिर भर्राई आवाज में बोला-
“कितने प्यारे बच्चे हैं!”
सुषमा बड़ी कठिनाई से अपने आंसू रोक पाई।
डॉली ने कहा- “मम्मी यह-?”
सुषमा ने जल्दी से कहा-
“बेटी, यह तुम्हारे अंकल हैं। तुम्हारे डैडी के बहुत पुराने और घनिष्ठ मित्र। पहले यह दिल्ली में रहते थे। इन्हें पता नहीं था कि तुम्हारे डैडी का स्वर्गवास हो चुका है। आज अचानक ही यह मिल गए।”
“बच्चों।” महेश ने दोनों के सिरों पर हाथ फेरते हुए कहा, “अपने अंकल को कभी पराया मत समझना।”
कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई।
✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦✦ ✦ ✦