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Romance दो कतरे आंसू

दीपू और डॉली स्कूल जाने लगे तो उसने उन दोनों को अच्छी तरह समझाया कि वह सीधे स्कूल जाया करें और स्कूल से सीधे घर लौटा करें। बीच की छुट्टी में स्कूल की बाउंड्री से बाहर न निकला करें और न किसी अजनबी से ही बातें किया करें।

दोनों बच्चों को स्कूल भेजकर सुषमा तैयार होने लगी तो जूली ने कहा- “एक बात पूछूं, मेम साहब।”

“पूछो।”

“आपने जब से मिसेज छाबड़ा की हत्या की खबर सुनी है, आपको क्या हो गया हैं?”

“जूली, तुझे याद है, कृष्ण को दस वर्ष की सजा हुई थी। रूबी की हत्या के जुर्म में?”

“हां।” जूली चौंक पड़ी।

“दस साल हो चुके हैं। कृष्ण या तो छूटने वाला होगा या छूट चुका होगा। रूबी को मारने की खबर के बाद उसने फोन पर मुझे धमकी दी थी कि एक-न-एक दिन वह मुझे भी मार डालेगा।”

“नहीं!” जूली भय से कांप उठी।

“जूली, मुझे अपनी चिन्ता नहीं है। चिन्ता है अपने बच्चों की वे अभी तक बहुत छोटे हैं। मेरे मर जाने के बाद वे अनाथ हो जायेंगे।”

“भगवान न करे कि आपको कुछ हो। आप डरती क्यों हैं, मेम साहब। ऊपर वाले पर भरोसा रखिए। वह बदमाश आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

सुषमा ठंडी सांस लेकर रह गई। कुछ देर रुककर सुषमा ने कहा-

“जूली, मैं सोचती हूं क्यों न हम लोग बम्बई छोड़कर किसी दूसरे शहर में चले जायें। मैं अपने धन्धे से उकता चुकी हूं। इन्सान कहलाने वाले जानवरों की आंखें जब मेरे शरीर को घूरती हैं तो ऐसा लगता है जैसे मेरे शरीर में कोई सुइयां चुभो रहा हो। जहरीली सूइयां।”

“लेकिन आप कहां जायेंगी? क्या करेंगी?”

“कहीं भी चली जाऊंगी। मेरे पास इतना पैसा है कि कोई कारोबार कर सकूं।”

“मेम साहब, कारोबार के लिए एक मर्द की जरूरत होती है। क्या आप संभाल सकेंगी?”

“सुषमा को जैसे एक झटका-सा लगा। उसके होंठ भिंच गए। और उसकी आंखों के आगे महेश का चेहरा नाच उठा।

सुषमा ने कार के शीशे चढ़ा रखे थे और निरुद्देश्य सड़कों पर भटक रही थी। वह आज काम पर नहीं गई थी। हालांकि आज एक बहुत बड़ी फर्म की विज्ञापन फिल्म बनने वाली थी।

उसका खाली-खाली मन कह रहा था कि जैसे उसे किसी चीज की तलाश है। उसकी बेचैन नजरें किसी चीज की खोज में इधर-उधर भटक रही थीं।

अचानक उसकी नजर एक बिल्डिंग की ओर उठ गई जो अभी बन ही रही थी। कुछ मजदूर काम कर रहे थे। और एक आदमी उन्हें सुपरवाइजर कर रहा था। उसके बदन पर गहरे रंग की पतलून और शर्ट थी। सिर पर धूप से बचने के लिए टोपी थी। उसकी कनपटियों पर से सफेद बाल झांक रहे थे। चेहरा सांवला-सांवला दिखाई दे रहा था।

उस आदमी को देखते ही सुषमा का दिल इतनी जोर से धड़का जैसे उसके दिल की धड़कने एकदम बन्द होने वाली हों। वह बड़े ध्यान से उसे देखने लगीं। उसका मस्तिष्क चीखने लगा- “महेश-महेश-हां यह महेश ही है। समय ने उसके चेहरे पर अपने कदमों के निशान छोड़ दिए हैं।”

कार रोककर वह नीचे उतर गई। और दरवाजे के पास खड़ी-खड़ी महेश को देखने लगी।

महेश बहुत ही व्यस्त दिखाई दे रहा था।

कुछ देर के बाद अचानक महेश की नजरें सुषमा की ओर उठ गईं। कुछ पल के लिए जैसे वह पत्थर की मूर्ति बन गया। वह अपनी पलकें तक झपकाना भूल गया।

फिर धीरे-धीरे जैसे उसके चेहरे पर बदन का सारा लहू सिमट आया। आंखें चमक उठीं। वह धीरे-धीरे चलता हुआ सुषमा के पास आ गया।

सुषमा के होंठ कांप रहे थे। आंखों में आंसू छलक उठे थे। महेश की आंखें भी गीली हो उठी थीं।

महेश कुछ देर खड़ा-खड़ा उसे देखता रहा फिर कांपती हुई आवाज में धीरे-से बोला- “सुषमा तुम।”

“हां, महेश।” सुषमा की आवाज भी कांप रही थी।

“तुमने मुझे कैसे पहचान लिया है?”

“जिस तरह तुमने मुझे पहचान लिया।”

“तुम्हें तो सारा देश ही पहचानता है। तुम रत्ती-भर भी तो नहीं बदलीं, सुषमा? जैसे चौदह वर्ष पहले थीं, आज उससे भी अधिक सुन्दर दिखाई दे रही हो।”

“छोड़ो, तुम यहां क्या करते हो?”

“पायल बिल्डर्स के यहां ठेकेदारों को असिस्ट करता हूं।”

“कहां रहते हो?”

“एक छोटा-सा फ्लैट ले लिया है। एक रूम है, किचन है।”

“इतने छोटे से फ्लैट में तुम्हारे बाल-बच्चों का गुजारा हो जाता है?”

“बाल बच्चे?” महेश धीरे-से हंस पड़ा, “बाल बच्चे हों तो गुजर मुश्किल है।”

“क्या मतलब? तुमने शादी नहीं की?”

महेश के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। उसने धीरे से कहा-

“जो सिन्दूर जिस मांग के लिए खरीदा था, वह उस मांग में नहीं भर सका। फिर किसी दूसरी मांग में कैसे भरता, वैसे भी शायद मैं किसी को खुश न रख पाता। इसलिए मैंने यही उचित समझा कि अपने दुखों को अपने सीने से ही लगाए रखूं। अब तो जिन्दगी में आनन्द आने लगा है। खैर छोड़ो, तुम कैसी हो? तुम्हारे पति कैसे हैं। बच्चे कितने हैं?”

“दो-बड़ी लड़की है डॉली। तेरह वर्ष की है। छोटा लड़का है दीपू। लगभग दस वर्ष का।”

“बधाई हो। पतिदेव तो अच्छी तरह रखते हैं न?”

“उन्हें छोड़े हुए तो दस वर्ष हो गये, दीपू ने तो उनकी सूरत भी नहीं देखी। डॉली भी इतनी छोटी थी कि शायद ही पहचान सके।”

महेश भौंचक्का-सा रह गया, फिर धीरे-से बोला-

“लेकिन क्यों?”

सुषमा ने पूरी कहानी सुना दी। फिर भर्राई आवाज में बोली-

“अब मैं इतनी थक चुकी हूं महेश कि एक कदम भी आगे बढ़ने की शक्ति मुझे में नहीं रही। मेरे कानों में हर समय कृष्ण की धमकी गूंजती रहती है। सोते में उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देखती हूं। और चीखकर जाग जाती हूं। मैं कितनी अभागिनी हूं। मेरी दो बहने है, उनके पति है। उनका परिवार है। भाई है। उसका परिवार है। लेकिन उन तीनों के परिवार जिसने बसाए थे। आज वह बेसहारा है। इस भरी दुनिया में मेरा कोई भी अपना नहीं है।”

“ऐसा क्यों कहती हो, सुषमा। सच्चे प्यार पर इल्जाम का अन्धेरा मत डालो। इस दुनिया में अभी एक ऐसा व्यक्ति मौजूद है जो सुषमा के लिए पराया नहीं है। तुम अकेली नहीं हो सुषमा। तुम इस हालत में भी अकेली नहीं हो।”

“मैं जानती हूं, महेश!” वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “मेरी नजरें भी तुम्हीं को खोज रही थीं महेश। मैं जानती हूं कि सिन्दूर की वह डिबिया तुम्हारे पास आज भी सुरक्षित रखी होगी। लेकिन अब मेरे बच्चे इतने बड़े हो चुके हैं कि मैं उस सिंदूर को अपनी मांग में नहीं भरवा सकती। अगर मैं ऐसा करूंगी तो शायद एक मां पर से बच्चों का विश्वास ही उठ जाएगा।”

महेश के होंठों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई। उसने कहा-

“सुषमा, तुमने प्यार को इतना स्वार्थी क्यों समझ लिया कि तुम्हारी मांग में सिन्दूर भरे बिना मैं तुम्हारी ढाल नहीं बन सकता?”

“महेश!” सुषमा की आवाज कांप उठी।

“हां सुषमा, प्यार केवल शरीरों के मिलन का ही नाम नहीं है। प्यार तो आत्माओं के मिलाप का नाम है। यह प्यार ही तो है जिसने मुझे आज तक अकेला रखा है। यह प्यार ही तो है कि जब तुम थक गईं और तुम्हें सहारे की जरूरत महसूस हुई तो तुम्हारी नजरों ने महेश को ही खोजा और यह प्यार की सच्चाई का ही सबूत है कि तुमने मुझे खोजना शुरू किया और बम्बई जैसे शहर में तुमने मुझे खोज लिया।”

“तुम ठीक कहते हो महेश, ठीक कहते हो तुम।”

कहते-कहते सुषमा रो पड़ी।

24

सुषमा ने कार रोक दी और महेश के साथ कार से उतर आई।

उसने दरवाजे की घंटी बजाई तो जूली ने दरवाजा खोल दिया और महेश को देखते ही ठिठककर पीछे हट गई।

“दीपू और डॉली कहां है?” सुषमा ने अन्दर जाते हुए पूछा।

“जी, अपने-अपने कमरे में है।”

“जाओ, दोनों को बुला लाओ।”

जूली चली गई।

थोड़ी देर बाद डॉली और दीपू आ गए।

महेश को देखती ही दोनों ठिठक गए। महेश उन दोनों को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके पूरे शरीर में बिजली की लहरें दौड़ रही थीं। झुरझुरी-सी आ रही थी, जैसे ठंड लग रही हो। ऐसा लग रहा था जैसे ये बच्चे उसके अपने बच्चे हों। सुषमा के बच्चे क्या उसके बच्चे नहीं है?

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और दोनों को चिपटाकर उनके माथे चूम लिए। उसकी आंखें भीग गईं। फिर भर्राई आवाज में बोला-

“कितने प्यारे बच्चे हैं!”

सुषमा बड़ी कठिनाई से अपने आंसू रोक पाई।

डॉली ने कहा- “मम्मी यह-?”

सुषमा ने जल्दी से कहा-

“बेटी, यह तुम्हारे अंकल हैं। तुम्हारे डैडी के बहुत पुराने और घनिष्ठ मित्र। पहले यह दिल्ली में रहते थे। इन्हें पता नहीं था कि तुम्हारे डैडी का स्वर्गवास हो चुका है। आज अचानक ही यह मिल गए।”

“बच्चों।” महेश ने दोनों के सिरों पर हाथ फेरते हुए कहा, “अपने अंकल को कभी पराया मत समझना।”

कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई।

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डाइनिंग-टेबल पर सुषमा, महेश, दीपू और डॉली खाना खा रहे थे।

महेश चुटकुले सुना रहा था। दोनों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया था।

डॉली ने बड़ी कठिनाई से अपने आंसू पोंछते हुए कहा-

“आप इतने दिनों से कहां थे अंकल?”

“क्यों?”

“आप इतने अच्छे हैं कि जी चाहता है आप और भी पहले से हमारे साथ होते।”

“अब तो तुम्हारे साथ हूं।”

“अब यहीं रहेंगे ना?”

“तुम्हारी मम्मी तो यही कह रही हैं।”

“मम्मी की ही नहीं हम दोनों की भी यही इच्छा है।”

“तो फिर तुम्हारे अंकल भला इन्कार कैसे कर सकते हैं।”

बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे। सुषमा के चेहरे पर इत्मीनान झलक उठा।

डॉली ने कहा- “मम्मी तो इतनी बिजी रहती हैं कि हमें पिकनिक पर भी नहीं ले जा पातीं।”

“घबराओ मत बेटी, अब तुम्हारी मम्मी की व्यस्तता बहुत जल्दी समाप्त हो जायगी। और हर समय तुम्हारे साथ ही रहा करेंगी।”

“वह कैसे मम्मी?”

“बेटी, पहले घर में कोई कमाने वाला नहीं था इसलिए मुझे काम करना पड़ता था। अब भगवान की कृपा से तुम्हारे अंकल आ गए हैं। बिल्डिंग कनस्ट्रक्शन का काम जानते हैं तुम दोनों के नाम बहुत-सा रुपया बैंकों में जमा है। तुम्हारे अंकल बहुत जल्दी एक कन्स्ट्रक्शन कम्पनी खोलने वाले हैं, जिसका नाम होगा, “डॉली दीप बिल्डर्स’ और उसके मालिक होंगे डॉली और दीप और मैनेजर होंगे तुम्हारे अंकल।”

“सच मम्मी?”

“हां बेटी।”

“फिर तो आप फिल्मों में काम नहीं किया करेंगी?”

“नहीं बेटी।”

“हम सब लोगों के सामने आपको मम्मी कहकर पुकार सकेंगे?”

“हां बेटी!” सुषमा की आवाज भर्रा गई- “अब तुम्हें दूसरों के सामने अपनी मां के लिए अनजान बनकर नहीं रहना पड़ेगा। अब तुम मुझे सारी दुनिया के सामने मम्मी कहकर पुकार सकोगे।”

कहते-कहते सुषमा की आवाज भर्रा गई। आंखें भीग गई।

“मम्मी!” डॉली की आवाज खुशी से कांप उठी। उस की आंखें भी गीली हो उठी थीं।

“मम्मी!” दीपू रो पड़ा।

“मेरे बच्चों!” सुषमा ने दोनों बच्चों को अपने सीने से चिपटा लिया और उन्हें चूमने लगी।

महेश की आंखें भी गीली हो उठी थीं। जूली और दर्शन भी अपनी-अपनी गीली आंखें पोंछ रहे थे।

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सुषमा ने कार रोक दी और गर्दन उठाकर देखा तो उसका दिल खुशी से धड़क उठा। ‘डॉली दीप बिल्डर्स’ की पहली बिल्डिंग लगभग पांच मंजिल तक तैयार हो चुकी थी। सैकड़ों मजदूर मर्द और औरतें काम कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे मजदूरों ने यह संकल्प कर लिया हो कि शाम तक बिल्डिंग को पूरा बन जाने के बाद ही चैन की सांस लेंगे। वे लोग बड़ी मेहनत और लगन से काम कर रहे थे। उन्हें कोई सुपरवाइजर भी नहीं कर रहा था।

सुषमा कार स्टार्ट करने ही वाली थी कि अचानक उसकी निगाहें एक ऐसे आदमी पर पड़ीं जिसे देखते ही वह बुरी तरह चौंक पड़ी। उस आदमी के बदन पर मैली-सी कमीज-पतलून थी। पैरों में हवाई चप्पलें थीं। आंखें गड्ढे में धंसी हुई थीं। गाल पिचके हुए थे। उसकी आंखों से एक विचित्र-सी वीरानी और निराशा झांक रही थी। वह सुषमा का भाई प्रदीप था।

सुषमा का दिल भर आया। प्रदीप की यह क्या हालत हो गई है। यह इस तरह यहां क्यों बैठा है? कहीं इन मजदूरों के साथ तो काम नहीं कर रहा है?

उसने इंजन बंद कर दिया और कार से उतरने लगी।

तभी उसे याद आया कि प्रदीप तो उससे अत्यधिक घृणा करता है। क्या वह घृणा समाप्त हो गई होगी? मैं अब भी तो वही मॉडल गर्ल हूं।

अचानक एक मजदूर औरत सिर पर सीमेंट से भरी परात रखे उसके पास से गुजरी। सुषमा ने जल्दी उसे रोककर पूछा-

“सुन लड़की-?”

“जी, मेम साहब-!”

“वह जो सामने मैली-सी पतलून-कमीज पहने बैठा है, वह कौन है?

“वह हमारे सुपरवाइजन साहब हैं।”

सुषमा सन्नाटे में रह गई। उसने तेजी से गाड़ी आगे बढ़ा दी।

थोड़ी देर के बाद गाड़ी एक ऑफिस के सामने खड़ी थी जिस पर “डॉली दीप बिल्डर्स” का बड़ा-सा बोर्ड लगा हुआ था। वह गाड़ी से उतर आई।

वह मैनेजर के कमरे में पहुंची तो महेश एक कीमती सूट पहने कुर्सी पर बैठा था। सुषमा को देखते ही वह हड़बड़ाकर खड़ा हो गया।

“सुषमा तुम आओ बैठो।”

सुषमा सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने धीरे-से कहा-

“मैं अभी-अभी साइट पर होकर आई हूं।”

“अच्छा।” महेश ने खुशी-भरे स्वर में कहा, “तुमने देखा। मजदूरों ने क्या चमत्कार किया है। दूसरे सारे बिल्डर्स हैरान हैं। निश्चित समय से आधे समय में पांच मंजिलें तैयार हो गई हैं। और अब इससे भी कम समय में बाकी पांचों मंजिलें तैयार हो जायेंगी।”

“मैंने देखा था। लेकिन साइट पर ऐसा लगता ही नहीं था कि मजदूर वहां मजदूरी के लिए काम कर रहे हैं।”

“हां, मैंने तुम्हें बताया नहीं। मैंने कन्स्ट्रक्शन में कुछ नए फार्मूले इस्तेमाल किए हैं जिनके कारण मजदूर खुश होकर तेजी से काम करते है और बिल्डिंग जल्द तैयार हो जाती है। दूसरे लोग भी हमीं से बिल्डिंग बनवा रहे हैं। अभी पहली बिल्डिंग आधी ही बनी है लेकिन हमें दस-दस मंजिल की दस बिल्डिंगों के ठेके मिल चुके हैं। हर मंजिल में आठ-आठ फ्लैट होंगे।”

“ऐसा क्या फार्मूला इस्तेमाल किया है तुमने?”

“मैंने अपनी योजना के अनुसार मजदूरों को निश्चित मजदूरी से एक-एक रुपया अधिक बढ़ा दिया है एक गरीब मजदूर के लिए एक रुपया बहुत होता है। इसके अलावा मैंने घोषणा की है कि अगर मजदूर निश्चित समय से आधे समय में बिल्डिंग तैयार कर देंगे तो कम्पनी की ओर से उन्हें एक-एक खोली मुफ्त बनाकर दी जाएगी। इस घोषणा की परिणाम यह हुआ है कि मजदूरों का पूरा परिवार काम में लगा हुआ है। हमें मजदूरों की पक्की खोलियां बना कर देनी पड़ेंगी लेकिन उन पर जो लागत आयेगी वह एक महीने की मजदूरी और अन्य खर्चों से कम होगी और दूसरे महीने में दूसरी बिल्डिंग शुरू हो जायेगी। इस तरह हम जो पचास खोलियां बना कर देंगे ये हमें मुफ्त में पड़ जायेंगी। जिन मजदूरों को सपने में भी पक्की खोली नसीब नहीं होती, उन्हें सर्दी-गर्मी और बरसात में सिर छिपाने के लिए पक्की खोली मिल जायेगी। हमारी इस स्कीम से सरकार भी बहुत खुश हैं। इसलिए हमें अब न तो अफसरों की खुशामद करनी पड़ती है न रिश्वत देनी पड़ती है। कच्चे माल का परमिट अगर दूसरों को दो महीने में मिलता है तो हमें दो दिन में मिल जाता है।

“इसके अलावा हम साइट पर अपनी बिल्डिंग के ग्राहकों को इन्वाइट करते हैं कि वे हर मंजिल बन जाने के बाद इंजीनियरों को बुलाकर मेटीरियल चैक कर लिया करें। इससे ग्राहक की सन्तुष्टि हो जाती है कि बिल्डिंग मजबूत बन रही है। इससे मेटीरियल सप्लाई करने वाले भी सावधान हो जाते हैं और हमें खराब मेटीरियल सप्लाई नहीं करते। क्योंकि वे बिल्डिंग बनवाने वालों की नाराजगी मोल नहीं ले सकते।”

“वैरी गुड!”

“हमारी कम्पनी ने अगले दो साल तक के लिए बुकिंग कर ली है। लेकिन ग्राहक पांच साल तक इन्तजार करने के लिए तैयार हैं। हर ग्राहक को फार्म भरते समय दस हजार रुपया एडवांस जमा करना पड़ता है। हिसाब लगाइए, अगर हमारे दस लाख रुपये दो साल तक बैंक में पड़े रहे तो सोलह प्रतिशत के हिसाब से कितना ब्याज मिलेगा। इस पर ग्राहक को कोई आपत्ति भी नहीं होती।”

“तब तो तुम एक दिन इस कम्पनी को आसमान पर ले जाओगे। मेरे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो गया। मैं निश्चिंत हो गई।”

“तो फिर तुम अपना काम कब छोड़ रही हो।”

“पहली बिल्डिंग बन जाने के दूसरे दिन बाद।”

“वैरी गुड।”

“महेश, मैंने साइट पर आज एक ऐसा दृश्य देखा है जिसने मुझे बेचैन कर दिया है।” कहते-कहते सुषमा की आवाज भर्रा गई।

“कैसा दृश्य?” महेश ने चौंककर पूछा, “क्या बात है, मुझे बताओ। मैं तुम्हारा दुख बांटने वाला मौजूद हूं फिर तुम्हें गम छिपाने की क्या जरूरत है?”

सुषमा ने प्रदीप के बारे में बताया।

महेश का चेहरा भी उदास हो गया।

“लेकिन उसे क्या हुआ? वह तो एक अच्छी कम्पनी का नौकर था।”

“भगवान ही जाने-महेश एक काम करोगे?”

“बोलो।”

“अगर मैं प्रदीप को कोई पोस्ट ऑफर करूंगी तो वह उसे ठुकरा देगा। तुम उसे कोई अच्छी-सी पोस्ट दे दो।”

महेश के होंठों, पर मुस्कराहट फैल गई। उसने कहा-

“तुम कितनी महान हो सुषमा। दुनिया ने आज तक तुम्हें नहीं पहचाना। और जिसने भी तुम्हें पहचानने में भूल की उसी ने दुःख उठाए। मैं प्रदीप को बुलवाता हूं। लेकिन अभी बुलाऊं या तुम्हारे जाने के बाद?”

“अभी बुलवा लो। मैं बराबर वाले कमरे से सुनूंगी। बहुत दिनों से मैंने उसे पास से नहीं देखा है। पता नहीं शादी किस तरह हुई। कितने बच्चे हैं। संध्या और रजनी कैसी हैं। बातों-बातों में तुम उससे पूछ लेना।”

महेश ने मुस्करा कर घण्टी बजा दी।

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सुषमा ने पर्दे में थोड़ी-सी झिरी बनाकर देखा और फिर प्रदीप की आवाज सुनकर उसके दिल को एक जोरदार धक्का लगा।

“मैं अन्दर आ सकता हूं, सर?”

“यस, कम इन।”

प्रदीप अन्दर आया तो महेश की पीठ उसकी ओर थी। वह रिसीवर कान से लगाए कोई कॉल रिसीव कर रहा था। उसने बिना मुड़े ही कहा-

“सिट डाउन प्लीज।”

“ज-ज-जी-म-मैं-” प्रदीप हकलाया।

“बैठिए-बैठिए। आप हमारे ठेकेदार के सुपरवाइजर हैं। और हमारी फर्म में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। मालिक से लेकर मजदूर तक सब बराबर हैं।”

“वही तो देख रहा हूं सर। भगवान ने आप लोगों को जितनी दौलत दी हैं उतने ही विशाल हृदय भी दिए हैं। मैं भी इसी आशा से काम कर रहा हूं। कि शायद एक पक्की खोली मुझे भी मिल जाए।”

सुषमा के दिल पर फिर घूंसा-सा लगा।

महेश ने पूछा-

“इस समय कहां रहते हैं?”

“बांद्रा-कोला-वाड़ा की एक झोपड़ी में।”

“बाल-बच्चे?”

“पत्नी और दो बच्चियां हैं-पत्नी काफी दिनों से बीमार है।”

“क्या बीमारी है आपकी पत्नी को?”

“पहले तो गरीबी ही सबसे बड़ी बीमारी है। दोनों बच्चियों की डिलेवरी के बाद उसे फांके मारने पड़े थे या रूखी-सूखी रोटी खानी पड़ी थी।”

“एजूकेशन कहां तक है?”

“बी. काम.- फर्स्ट क्लास।”

“पहले कहीं नौकरी की थी?”

“जी हां। एक फर्म में नौकर था। साढ़े चार सौ मिलते थे। बड़े मालिक की मृत्यु के बाद जब नए मालिक आए और उन्होंने जब यह सुना कि विख्यात मॉडल गर्ल मिस सुषमा वर्मा मेरी बहन है तो उन्होंने खुश होकर मुझे प्रमोशन दे दिया। एक दिन कहने के लिए लगे, किसी दिन अपनी बहन से परिचय करा दो। इस बात पर मुझे गुस्सा आ गया। मेरा हाथ उठ गया। मैंने कहा, मैं दलाल नहीं हूं। मैं तो अपनी बहन की सूरत तक नहीं देखता। उन्होंने पहले तो मुझे चपरासियों से पिटवाया और फिर नौकरी से निकाल दिया। उसके बाद कोई नौकरी नहीं मिली। बेकारी में मकान भी बिक गया। फांकों की नौबत आ गई। अचानक आपकी कम्पनी का विज्ञापन देखा। ठेकेदार ने पढ़ा-लिखा देखकर सुपरवाइजर-कम-एकाउन्टेण्ट की नौकरी दे दी। मजदूरी भी मैं ही बांटता हूं।”

सुषमा ने मजबूती से अपना कलेजा पकड़ लिया था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उसका दिल मसोस रहा हो। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी सिसकियां रोकीं। उसकी आंखों से आसूं बहे चले जा रहे थे।

महेश ने रिसीवर रखकर रिवाल्विंग चेयर घुमाई और फिर प्रदीप को खड़े देखकर बोला- “तुम अभी तक बैठे नहीं।”

प्रदीप आश्चर्य से उछल पड़ा। उसने झिझकते हुए कहा-

“ओह, महेश बाबू-!”

“हां, बैठो-बैठो।”

प्रदीप हैरानी में डूबा बैठ गया। फिर बोला-

“आप और यहां?”

“इस फर्म के मालिक बहुत भले हैं। मैं इस फर्म मैं मैनेजर हूं। काला-सफेद सब-कुछ मेरे ही हाथों में हैं। लेकिन मैं उसका अनुचित लाभ कभी नहीं उठाता। हां, उचित लाभ उठाना कोई पाप नहीं। तुम बी. काम. होकर एक मामूली सुपरवाइजर और एकाउन्टेण्ट का काम करो, मुझे इस बात से दुख होगा। यह फर्म हाल ही में शुरू हुई है। स्टाफ पूरा नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें अपना असिस्टेन्ट यानी फर्म का असिस्टेन्ट मैनेजर बनाए देता हूं।”

“महेश बाबू!” प्रदीप की आवाज खुशी से कांप उठी।

“हां, ढाई हजार रुपये माहवार वेतन मिलेगा। मैं अपने एकाउन्ट में से तुम्हें पांच हजार दे रहा हूं। इनसे अपने लिए कपड़े वगैरह बनवा लो। आखिर असिस्टेन्ट मैनेजर की पोस्ट कोई मामूली पोस्ट तो है नहीं। अपनी पत्नी का फौरन इलाज शुरू कर दो। और हां, इस समय मेरे पास एक रूम का फ्लैट है, उसमें तुम अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आराम से रह सकते हो। दूसरी बिल्डिंग में तुम्हारे लिए फ्लैट की व्यवस्था कर दी जायेगी। बहुत ही आसान किस्त पर, जो तुम्हारे वेतन से कटता रहेगा।”

“महेश बाबू!” प्रदीप रो पड़ा, “आप इंसान नहीं, देवता है।”

“नहीं प्रदीप, यह देवता की नहीं देवी की कृपा है।”

“क्या मतलब?”

“लक्ष्मीदेवी, यह देवी कब किससे रूठ जाए और कब किस पर दयालु हो जाए कोई भरोसा नहीं।”

फिर महेश ने पांच हजार रुपये का चेक देते हुए कहा-

“यह है पांच हजार का चेक।” और फिर एक चाबी निकालकर देते हुए कहा, “यह रही फ्लैट की चाबी।”

प्रदीप की आंखों से खुशी के मारे आंसू बह रहे थे। उसने दोनों चीजें जेब में रखते हुए कहा- “मैं अब चलूं?”

“चले जाना। इतने दिनों के बाद मिले हो। जी चाहता है, सारा काम छोड़कर तुमसे ही बातें करता रहूं- अरे हां, संध्या दीदी और उनके परिवार का क्या हाल है? रजनी दीदी और उनका परिवार तो मजे में हैं ना?”

अचानक प्रदीप को चेहरा उतर गया। उसने धीरे-से कहा-

“दोनों बहुत बुरी हालत में हैं।”

सुषमा के दिल को फिर धक्का लगा।

महेश ने चौंककर कहा-

“क्यों? उन्हें क्या हुआ? उन दोनों भाइयों का कारोबार तो बहुत अच्छा चल रहा था। बड़ी मौके की दुकान थी!”

“लेकिन संध्या दीदी के पति प्रकाश काफी रंगीन और शौकीन मिजाज थे। उनका समय घर पर कम और बाजारू औरतों में ज्यादा गुजरता था। दीदी पहले तो बहुत बिगड़ा करती थीं। फिर प्रकाश ने मारमीट शुरू कर दी। दीदी को अपनी गैरत बचाने के लिए चुप्पी साध लेनी पड़ी। घुटते रहने की वजह से उन्हें टी. बी. हो गई, आज कल वह अस्पताल में हैं। जनरल वार्ड में पड़ी है। मैं कभी-कभी उन्हें देख आता हूं। जनरल वार्ड में होने की वजह से न ढंग से दवा मिलती है और न खाना मिलता है। मेरे पास इतना पैसा नहीं कि बाजार से उनके लिए दवा और खाने की चीजें पहुंचा सकूं और उनका इलाज ढंग से करा सकूं।”

सुषमा ने होंठ सख्ती से भींच लिए थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके दिल को कोई मुट्ठी में दबाकर निचोड़ रहा था।

महेश ने ठंडी सांस लेकर कहा-

“तो प्रकाश अपनी?”

“अब तो प्रकाश एक देसी शराब के ठेके के बाहर पड़े रहते हैं। कोई रहम खाकर पिला दे तो पिला दे। उनकी आवारा-गर्दी देखकर उनके भाई शंकर ने कारोबार में हिस्सा बांट दिया था। प्रकाश जीजाजी ने अपना हिस्सा ऐय्याशियों में उड़ा दिया।”

“हूं और शंकर का क्या हाल है?”

“उन्होंने दीवाली पर आतिशबाजी का सामान रखा था। पता नहीं कैसे आग लग गई। सारी दुकान जलकर राख हो गई। शंकर जीजाजी का आधा चेहरा भी जल गया था। रजनी दीदी के जेवर बेचकर उन्होंने छोले-भटूरे की दुकान खोल ली है। किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। संध्या दीदी के दोनों बच्चे भी उन्हीं के पास है।”

महेश ने एक ठंडी सांस ली और बोला-

“देखो प्रदीप, अब न तो तुम्हें कोई मजबूरी है और न तुम गरीब हो। तुम जितनी जल्दी हो सके, संध्या को किसी हिल स्टेशन के सेनीटोरियम में भेज दो। संध्या तुम्हारी बहन है इसलिए मेरी भी बहन के ही बराबर है। उसे सेनीटोरियम के स्पेशल वार्ड में एडमिट कराना। उसके इलाज में जो भी खर्च होगा, मैं दूंगा।”

“आप?”

“हां, प्रदीप मैं इस फर्म का मैनेजर हूं। मुझे केवल पन्द्रह हजार रुपये माहवार वेतन ही नहीं, आमदनी में से पांच प्रतिशत कमीशन भी मिलता है। तुम अपने आप को नौकर नहीं बल्कि मालिक समझकर काम करोगे तो हम एक और एक ग्यारह हो जायेंगे। फिर फर्म कितनी तरक्की कर सकती है, इसका तुम खुद ही अंदाज लगा सकते हो।”

“महेश बाबू-मैं अपनी जान लगा दूंगा इस फर्म में, जिसने मुझे ही नहीं मेरे इतने बड़े परिवार को नया जीवन दिया है।”

“ठीक है प्रदीप, फिर तुम इसका रिटर्न भी देखोगे। और हां, सुनो....शंकर के लिए क्या किया जा सकता है?”

प्रदीप ने ठंडी सांस लेकर कहा-

“उनकी दुकान का तो बीमा था। दो लाख रुपये का नुकसान हुआ था। दो लाख मिल भी जाते लेकिन अड़ोस-पड़ोस के दुकानदार उनकी तरक्की देखकर जलते थे। उन्होंने बीमा कम्पनी वालों से कह दिया कि दुकान में कुछ था ही नहीं। क्योंकि जो कुछ था उसे शंकर का शराबी भाई प्रकाश खा-पीकर। सब खत्म कर गया था, इसीलिए बंटवारा हुआ था। शंकर ने बीमे की रकम हथियाने के लिए जान-बूझकर आग लगाई थी। बीमा कम्पनी ने रकम रोक दी। अब अगर कोई अच्छा वकील उनकी ओर से मुकदमा लड़े तो रकम मिल सकती है। यहां का सबसे बड़ा वकील थडानी, दस हजार रुपए फीस पहले मांगता है। उनका कहना है कि दो लाख के अलावा बीमा कम्पनी ने जितने दिनों तक रकम रोक रखी है उस पर दस प्रतिशत का ब्याज भी दिलवा देगा। ब्याज में आधा रुपया उसका होगा लेकिन शंकर जीजाजी के पास तो दस पैसे भी नहीं है, दस हजार रुपए कहां से देंगे। खोमचे से अपने बाल-बच्चों और संध्या दीदी के बच्चों का पेट ही बड़ी मुश्किल से भर पाते हैं। फिर वह वकील की फीस कहां से दे सकते हैं!”

“तो फिर शंकर बाबू के परिवार की समस्या दस हजार पर अटकी हुई है।”

“हां।”

“थडानी को पूरा विश्वास है कि वह केस जीत लेगा।”

“उसने कहा है कि अगर वह केस हार जायेगा तो सारी रकम वापस कर देगा। क्योंकि उसे मालूम है कि दुकान में आग सचमुच लगी थी और पड़ोसियों ने झूठ बोला था।”

“हूं!” महेश ने एक लम्बी सांस लेकर कहा, “तो फिर उनका काम भी सिर्फ दस हजार के लिए नहीं रुकना चाहिए।”

“जी?”

महेश ने दस हजार रुपए का एक चेक काटकर प्रदीप को देते हुए कहा-

“यह चेक मेरी ओर से शंकर जीजाजी को दे देना। कहना, मैं भी उनका एक साला ही हूं। केस जीत जाने के बाद रुपए वापस कर दें।”

“जी, मगर!”

“जाओ, नेक काम में देर नहीं करनी चाहिए।”

“महेश बाबू।” प्रदीप की आवाज कांप रही थी, “अब तो आपको देवता भी नहीं कहा जा सकता। ऐसा लगता है जैसे आप भगवान का ही अवतार हैं।”

“नहीं प्रदीप, अपने भले ही कितने ही दिनों तक एक-दूसरे से दूर रहें, पर अपने-अपने ही होते हैं। मैं तुम में से किसी को भी पराया नहीं समझता। तुम सभी मेरे अपने हो। मुझे सबको सुखी और खुश देखकर खुशी ही होगी।”

“अच्छा महेश बाबू, अब मैं चलता हूं’।’

“अरे हां, कभी सुषमा से भी मिलते हो?”

“सुषमा?” प्रदीप की आंखों में गहरी घृणा उभर आई, “नाम मत लीजिए उसका मेरे सामने। वह बहन के नाम पर ही नहीं पत्नी के नाम पर भी कलंक का टीका है। हमारा पूरा परिवार उससे इतनी घृणा करता है कि अगर वह सोने की भी बनकर आ जाए तो उस पर थूकना पसंद नहीं करेंगे।”

सुषमा ने होंठ सख्ती से भींच लिए।

प्रदीप के जाने के बाद वह बाहर आई तो उसकी आंखों में आंसू थे। महेश ने ठंडी सांस लेकर कहा-

“मेरा विचार है, मैंने संध्या और रजनी के लिए जो कुछ किया है गलत नहीं था। तुम इससे सहमत होगी।”

“तुम्हारी जगह मैं होती तो यही करती।”

“लेकिन तुमने सुना- प्रदीप के क्या शब्द थे तुम्हारे बारे में?”

“सुन लिए।”

“फिर भी तुम?”

“महेश बाबू, नदी की लहरें हर पल एक दूसरे से टकराती रहती हैं, फिर भी नदी से अलग नहीं होतीं। कोई लहर उछलकर किनारे पर चली भी जाती है तो उसे धरती अपने आप में समा लेती हैं परिवार भी तो एक नदी ही है। और फिर ये लोग मुझे कब तक गलत समझेंगे। एक-न-एक दिन इस सबको अपनी भूल का अहसास होगा। ये लोग मुझसे घृणा करके अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। और मैं जो कुछ कर रही हूं अपने कर्तव्य का पालन कर रही हूं। पता नहीं एक हाथ में भगवान कितनों के भाग्य लिख देता है। और कभी अपने ही हाथ से भाग्य की रेखायें मिटा देता है।”

“तुम धन्य हो सुषमा। जिस दिन ये लोग तुम्हें पहचान लेंगे, उस दिन तुम्हारी मूर्ति मन्दिर में स्थापित करके पूजा करने लगेंगे।”

सुषमा कुछ न बोली। उसकी नजरें दूर शून्य में कुछ खोज रही थीं।

25

होराइजन होटल के सेन्ट्रल हॉल में बड़ी चहन-पहल और रौनक थी। बड़े अखबारों के रिपोर्टर और फोटोग्राफर आए हुए थे। सुषमा बहुत ही सादा लिबास में थी। लोग उसे आश्चर्य से देख रहे थे।

घनश्याम ने धीरे से कहा-

“मिस वर्मा, आपने यह क्या हुलिया बना रखा है? देखिए, दूसरी फर्म की माडल-गर्ल्स केवल अपने लिबास और मेकअप के कारण आप से अधिक सुन्दर दिखाई दे रही हैं।”

“तो क्या हुआ?”

“फिर भी कोई कारण तो होगा?”

“थोड़ी देर बाद आप खुद ही समझ जायेंगे।”

तभी हॉल के मेन गेट से डॉली और दीपू अन्दर आए। दोनों अपने शानदार लिबास के कारण बहुत ही स्मार्ट दिखाई दे रहे थे। डॉली अपनी मां की तरह खूबसूरत नजर आ रही थी। लोगों की निगाहें अपने आप उन दोनों की ओर उठ गईं।

सुषमा का चेहरा खुशी से दमक उठा। वह जोर से हाथ हिलाकर बोली-

“हाय डॉली, हाय दीपू-!”

फिर सब लोगों ने आश्चर्य से देखा। सुषमा ने आगे बढ़कर दोनों बच्चों के सिरों पर हाथ फेरा। उनका माथा चूमा और बोली-

“बच्चों, तुम्हारी यही सबसे बड़ी चाह थी कि तुम सब लोगों के सामने मुझे मम्मी कहकर पुकार सको।”

“हां मम्मी!” दोनों बच्चों ने कहा।

“तो फिर आज सब लोगों के सामने अपनी मम्मी को मम्मी कहकर पुकारो।”

“मम्मी डार्लिंग!’ दोनों ने एक साथ कहा और फिर सुषमा से लिपट गए।

“क्या ये मिस सुषमा के बच्चे हैं?” कुछ लोगों ने आश्चर्य से कहा।

“इतने बड़े-बड़े बच्चे?”

“क्या मिस सुषमा वर्मा की उम्र पचास वर्ष है?”

“इन बच्चों का पिता कौन है?”

“मिस वर्मा ने शादी की थी या नहीं?”

घनश्याम को पसीना आ गया था। चेहरे से ऐसा लगता था जैसे उसके दिल की धड़कनें रुकी जा रही हों। उसने सुषमा से धीरे-से कहा-

“सुषमा, यह क्या किया तुमने?”

सुषमा गम्भीर स्वर में बोली-

“बॉस, मैंने आपको इतनी बेतकल्लुफी की इजाजत कभी नहीं दी।”

“म-म-मेरा मतलब है, इन बच्चों को यहां बुलाने की क्या जरूरत थी?”

“इन बच्चों के लिए ही मैंने आज यह प्रेस कान्फ्रेंस बुलाई है। “सुषमा ने सबकी ओर देखते हुए कहा, “लेडीज एन्ड जेन्टिलमेन! अभी-अभी मेरे सामने बहुत सारे सवाल आए थे। आज मैं आपको उनके जवाब देना चाहती हूं। मॉडल गर्ल बनना न मेरी हाबी थी न अपने आपको पर्दे पर देखने की लालसा। मेरी परिस्थितियों ने मुझे मॉडल गर्ल बनने पर विवश किया था। लेकिन मैंने मॉडल गर्ल के व्यवसाय पर पन्द्रह-सोलह वर्ष काम करने के बाद भी कभी दाग नहीं लगने दिया।

“एक लड़की के लिए शादी की जो उम्र होती है मैंने उस उम्र में शादी भी कर ली थी, लेकिन एक विवाहित लड़की की इमेज पर्दे पर देखने वालों के लिए खराब हो जाता है इसलिए मैंने अपनी शादी की बात गोपनीय ही रखी और बच्चों की पैदाइश भी अमेरिका जाने के बहाने गोपनीय ही रखी। खेद है कि मैंने दूसरे बच्चे के जन्म लेने से पहले ही इनके पिता को खो दिया। मेरी विवशता थी कि मेरे बच्चे आज तक मुझे मां कहकर न पुकार सके। और यह बात मेरे दिल और दिमाग में कांटे की तरह खटकती थी।”

“बच्चों की एक खास उम्र होती है जहां से वे अपने मां-बाप की अच्छाइयों को भी गलत समझ सकते हैं। और बुराइयों को अच्छाई समझकर अपना सकते हैं। मैंने अपने बच्चों को अपने व्यवसाय से दूर रखा। लेकिन मैं डरती थी मेरे बच्चे मुझे मां नहीं कह पाते, इस बात का इनके दिमाग पर बुरा असर न पड़े।

“और आज इसीलिए मैंने यह प्रेस कान्फ्रेंस बुलाई है। मैं अब अपने व्यवसाय से अवकाश ग्रहण करके अपनी बाकी जिन्दगी अपने बच्चों के साथ बिताऊंगी।”

“क्या?” घनश्याम चीख पड़ा, “तुम अवकाश ग्रहण कर रही हो।”

“जी हां,” सुषमा ने गम्भीरता से कहा, “मिस्टर घनश्याम, मैंने कितनी बार कहा कि मैंने आपको इतनी बेतकल्लुफी की इजाजत कभी नहीं दी।”

“आई एम सॉरी, मिस वर्मा।”

“नो, श्रीमती सुषमा।”

“श्रीमती सुषमा, हमारे कान्ट्रेक्ट का पीरियड अभी तीन महीने बाकी है।”

“मिस्टर घनश्याम, अगर तेरह वर्ष की लड़की और दस वर्ष के लड़के की मां के खुले बदन को देखकर टेल्काम पाउडर के खरीदारों की वृद्धि हो सके तो जरूर ऐसा कीजिए। आप भूल रहे हैं, कान्ट्रेक्ट की एक शर्त यह भी है कि जब पब्लिक मुझे नापसन्द करने लगेगी तो आप मुझे रिटायर कर देंगे। और जब मैं महसूस करने लगूंगी कि अब मुझे काम नहीं करना चाहिए तो मैं खुद रिटायर हो जाऊंगी। और इन दोनों शर्तों के अनुसार हम दोनों कोई क्लेम नहीं करेंगे। आपने यह शर्त अपने लाभ के लिए रखवाई थी। क्योंकि आपको आशंका थी कि शायद पैंतीस वर्ष के बाद मैं अपने शरीर को संभालकर न रख सकूंगी। लेकिन आज इक्तालीस वर्ष की उम्र में भी मैं वैसी हूं, जैसी तीस वर्ष की उम्र में थी। इसलिए आप शर्तें भूल गए।”

“मैं बर्बाद हो जाऊंगा।”

सुषमा ने डॉली और दीपू के हाथ थाम कर कहा-

“आओ बच्चो, घर चलें।”

कैमरामैनों के फ्लेशों के से आंखें चौंधियाने लगी।

लोग चलते-चलते भी सुषमा से सवाल करते जा रहे थे। सुषमा उन्हें बड़ी गम्भीरता से उत्तर देती जा रही थी।

थोड़ी देर के बाद सुषमा बच्चों के साथ कार में जा बैठी। बच्चों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे।

“मम्मी, अब हम आपके साथ घूमने फिरने जा सकेंगे?”

“हां, मेरे बच्चो। तुम लोग जहां भी चाहोगे, मेरे साथ जा सकोगे। और सब के सामने मुझे मम्मी कहकर बुला सकोगे।”

“दोनों बच्चों ने खुश होकर मां को चूम लिया।

सुषमा की आंखें खुशी से भीग गई।

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महेश ने दरवाजे के पास रुककर कहा-

“मैं अन्दर आ सकता हूं?”

“बिल्कुल नहीं!” सुषमा ने गम्भीरता से उत्तर दिया।

“क्यों?”

“इसलिए कि तुमने अनुमति मांगी है।”

महेश हंसकर अंदर चला गया। उसने बैग मेज पर रख दिया और फिर उसे खोलते हुए बोला- “सुषमा, जरा ‘डॉली दीप’ फर्म की लोकप्रियता और बिजनेस का चार्ट देखो।”

सुषमा हाथ उठाकर बोली- “रहने दो, यह तुम्हारा डिपार्टमेंट है। आज मैं तुम्हें एक चीज़ दिखाना चाहती हूं।”

“लगता है, तुम मुझे बेईमान बना दोगी, सुषमा।”

“क्यों?”

“जब तुम मुझसे कभी हिसाब किताब न लोगी तो मेरे दिल में कभी-न-कभी बेईमानी जरूर आ जायेगी। अगर एक झोपड़ी में रहने वाले के हाथों में करोड़ों रुपए आ जायें तो हो सकता है उसके दिल में बेईमानी भी आ जाए।”

“या तो लेकर भाग जायेगा या पागल हो जायेगा। लेकिन तुम्हारे साथ इनमें से एक भी दुर्घटना नहीं होगी। इसलिए बैग बंद कर दो और इधर आओ।”

महेश ने बैग बंद करके कहा- “हां, बताओ।”

सुषमा ने मेज पर फैले हुए एक बड़े से नक्शे की ओर इशारा करके कहा- “जरा, इसे देखो।”

“क्या है वह?”

“तुम कॉन्ट्रेक्टर होकर भी नहीं पहचान सकते?”

“पहचान तो रहा हूं। यह तो किसी बंगले का नक्शा है।”

हां, तुम यह बंगला जल्द-से-जल्द तैयार करा दो।”

“लेकिन यह बंगला तो किसी राजमहल जैसा दिखाई दे रहा है। इतने बड़े बंगले का तुम क्या करोगी? तुम्हारे लिए तो एक छोटा-सा बंगला ही काफी है।”

“नहीं महेश, यह मेरा सपना है,” सुषमा सपनीले स्वर में बोली, “यह देखो- यह बंगले की कम्पाउण्ड वॉल है। यह मेन गेट है, जहां एक चौकीदार रहा करेगा। यह चौकीदार के रहने के लिए छोटा-सा कमरा। बायीं ओर स्विमिंग पूल। दायीं और छोटा-सा खूबसूरत गार्डन जिसमें शाम को बैठने के अलावा बच्चों के खेलकूद का सामान भी होगा और पिछले हिस्से में सर्वेन्ट क्वार्टर्स। उसके बराबर-बराबर छः गैरेज जिनमें हर एक में कम-से-कम दो कारें आ सकें।”

“यह देखो-फाटक से लाल बजरी ही रॉबिश पोर्टिको तक जायेगी। यहां एक बड़ा-सा बरामदा होगा जहां मिलने वालों के लिए एक सोफासेट पड़ा रहेगा। और एक फ्रिज, गिलास वगैरह भी रखे रहेंगे।”

“अब अंदर चलो- यह हॉल में जाने का दरवाजा है। हॉल में कम-से-कम पचास आदमियों के बैठने की जगह होगी। यह दायीं ओर का दरवाजा उस विशिष्ट ड्राइंग-रूम में जायेगा जिसमें विशिष्ट व्यक्तियों से मिलने की व्यवस्था होगी। इसी से लगा यह रोस्टरूम। जिसमें टॉयलेट भी होगा।”

“अब बाहर आओ। दरवाजे के बायीं ओर गैलरी, इसी गैलरी में बड़ा-सा किचन। किचन के बराबर ही स्टोर-रूम।”

“अब फिर हाल में आ जाओ। यह सामने कॉरीडोर होगा। इसके दायें-बायें तीन-तीन कमरे होंगे। सब में टॉयलेट होंगे। दायीं ओर के तीनों कमरे संध्या दीदी, उनके हस्बेंड और बच्चों के लिए हैं। बायीं ओर के कमरे रजनी, उनके हस्बेंड और उनके बच्चों के लिए हैं। इसी तरह इन कमरों के बाद यह सामने तीन कमरे होंगे जिनमें, प्रदीप और उसके बाल-बच्चे रहा करेंगे।”

“सुषमा-!” महेश की आवाज कांप गई।

“प्लीज महेश, सुनते रहो!” सुषमा बोली, “अब बाहर आ जाओ। यह दायीं ओर बायीं ओर से दो जीने जायेंगे जो ऊपर पहुंचकर मिल जायेंगे। यहां बीच में एक कॉरीडोर होगा। जिसमें दायीं ओर तीन और बायीं ओर भी तीन कमरे होंगे। एक ओर के कमरे डॉली और उसके पति तथा बच्चों के लिए और दूसरी ओर के दीपू, उसकी पत्नी और उसके बच्चों के लिए।”

“लेकिन सुषमा, डॉली तो बेटी है दूसरे की अमानत।”

“महेश, मैं डॉली की शादी किसी ऐसे गरीब लेकिन बुद्धिमान, समझदार और बेसहारा लड़के से करूंगी जिसका दुनिया में कोई न हो। इस तरह वह हमारे साथ ही रहेगा। डॉली हमारी आंखों के समाने रहेगी।”

“लेकिन-!”

“उफ्फोह, सुनो तो सही!” सुषमा बोली, “मुझे पूरा प्लान समझाने दो। इसके बाद तुम कुछ कहना।”

“अच्छा बोला।”

“इन पहले जीनों से ही दायीं और बायीं ओर से दूसरी मंजिल तक जीने जायेंगे। दूसरी मंजिल पर दो हिस्से होंगे। दोनों ओर दो बड़े-बड़े शानदार कमरे। जिनमें बाथरूम इत्यादि भी होगा, ड्रेस-रूम और सब कुछ।”

“सिर्फ दो-दो कमरे? ये किसके लिए होंगे?”

“तुम्हारे और मेरे लिए,” सुषमा ने कहा, “पूरे बंगले में हम दोनों ही तो अकेले होंगे।

महेश के मस्तिष्क को हल्का-सा झटका लगा। चेहरे पर कई रंग आए और चले गए। वह खामोशी से सुषमा की ओर देखता रहा। उसकी खामोश आंखें जैसे पूछ रही थीं।

“सुषमा, क्या वह सिन्दूर सारी जिन्दगी डिबिया में ही बंद रहेगा?”

सुषमा ने उसकी ओर देखा। शायद वह उसकी खामोश आंखों में मचलते प्रश्न को जान गई थी। उसने धीरे से कहा-

“महेश, अब तक हम दोनों उस मोड़ से बहुत आगे बढ़ चुके हैं जहां एक मर्द एक औरत की मांग में सिन्दूर भरता है तो दोनों जिस्मों में मन्दिर की पवित्र घंटियां बज उठती हैं। निर्मल झरने गुनगुना उठते हैं। अनदेखे रंगबिरंगे फूल खिल उठते हैं।

महेश ने ठंडी सांस लेकर कहा-

“अगर मुझे गलत न समझो तो एक बात कहूं सुषमा?”

“कहो।”

“मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं। कोई ऐसा सपना मत देखना जो पूरा न हो सके और तुम्हारे दिल को धक्का लगे। सच मानो, अब तुम्हारा जरा-सा भी दुःख मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। तुमने सुख में रहकर भी कितने दुःख उठाए हैं, मैं जानता हूं।”

“तुम ठीक कहते हो महेश। दुःख सहन करने की शक्ति तो अब मुझमें भी नहीं रही है। मुझे भी ऐसा लगता है कि कोई एक छोटा-सा झटका भी मेरे दिल की धड़कनें बन्द कर देगा। लेकिन मैं क्या करूं? दुनिया मुझे समझ ही नहीं पाई। अब वह जो कुछ समझती है समझती रहे। मेरे बारे में सोचती है, सोचती रहे। मैं तो यही सपना देखती हूं जिस तरह कभी बाबूजी के साए में हम सब भाई-बहन साथ-साथ रहते थे। उसी तरह एक बार सिर्फ एक बार हम सब इकट्ठे हो जायें।”

“लेकिन वे लोग तुमसे अत्यधिक घृणा करते हैं और तुम्हें अपनाने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे।”

“मैं जानती हूं महेश, लेकिन सपने देखने पर तो कोई पाबन्दी नहीं है। और सपनों पर किसी का जोर भी नहीं होता।”

बोलते-बोलते उसकी आवाज भर्रा गई। आंखों में आंसू छलक आए। महेश का हाथ एकदम सुषमा के चेहरे की ओर बढ़ा। जी चाहा उन आंसुओं को पोंछ दे। लेकिन उसका हाथ इस तरह रुक गया जैसे बीच में कोई अदृश्य व्यवधान आ गया हो। उसने हाथ धीरे से गिरा लिया और ठंडी सांस लेकर बोला-

“सुषमा, तुम ऑफिस क्यों नहीं आया करती?”

“क्या करूंगी वहां आकर?”

“बच्चे स्कूल चले जाते हैं। तुम अकेली यहां पड़ी रहती हो। जाने क्या-क्या सोचती रहती हो। इस तरह तुम्हारे दिमाग पर गलत असर पड़ सकता है।”

सुषमा एक ठंडी सांस लेकर बोली-

“महेश, मैं बहुत भीड़-भाड़ में रह चुकी हूं। अब तो बस जी यही चाहता है कि अपनों के अलावा किसी पराए की आवाज तक मेरे कानों में न आने पाए।- खैर, यह बताओ यह बंगला कितने दिनों में तैयार करा दोगे?”

“छः महीने से पहले पहले।” महेश ने ठंडी सांस ली, “शायद तुमने अभी तक शाम की चाय भी नहीं पी होगी।”

“तुम तो जानते ही हो, जब तक तुम और बच्चे नहीं आ जाते, मैं चाय नहीं पीती।”

तभी बाहर दो गाड़ियों के रुकने की आवाज आई। एक कार की और एक स्कूटर की। फिर कुछ देर बाद डॉली और दीपू दौड़ते हुए अन्दर आ गए।

“हाय मम्मी।”

“हाय अंकल।”

दोनों ने सुषमा और महेश को प्यार किया।

महेश ने दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-

“तुम दोनों मुझे इतना प्यार करते हो कि मुझे डर लगने लगा है।”

“डर कैसा अंकल?” डॉली ने पूछा।

“अगर कभी तुम्हारी मम्मी ने नाराज होकर मुझे नौकरी से निकाल दिया तो मैं तुम दोनों के बिना कैसे जिन्दा रह सकूंगा?”

“यह कभी हो ही नहीं सकता।” दीपू ने दृढ़ता से कहा।

“क्यों?”

“हम भूख हड़ताल कर देंगे। भूख हड़ताल हमारा जन्म सिद्धि अधिकार है और अपना अधिकार प्राप्त करने का यह सबसे कारगर हथियार है।”

सब लोग हंस पड़े।

डॉली ने महेश के गले में बांहें डालकर कहा-

“अंकल, आप हमारे डैडी के मित्र हैं ना। हमें अपने डैडी की तो याद भी नहीं है। लेकिन हम सोचते हैं कि जब आप हमें इतना प्यार करते हैं तो डैडी हमें कितना प्यार करते और अंकल, कभी-कभी तो मैं यह भी सोचने लगती हूं कि अगर आप ही हमारे डैडी होते तो कितना अच्छा होता।”

महेश के मस्तिष्क को एक ठोकर-सी लगी। सुषमा के चेहरे का रंग बदल गया।

महेश से जल्दी से डॉली का गाल थपकते हुए कहा-

“बेटी, बिना सोचे समझे ऐसी बात नहीं कहा करते। अच्छा चलो, अब हम सब चाय पियें।”

“बस एक मिनट अंकल। हम लोग हाथ-मुंह धोकर अभी आते हैं।”

दोनों बच्चे दौड़ते हुए अन्दर चले गए।

महेश ने सुषमा की ओर देखा। सुषमा भी महेश की ओर देखने लगी। दोनों की नजरें मिलीं और फिर झुक गईं।

महेश ने धीरे से कहा-

“सुषमा, मैं कई दिन से एक बात सोच रहा हूं।”

“क्या?”

“अपने रहने की व्यवस्था कहीं और कर लूं।”

“क्यों?”

“बच्चों को मैं सीमा से अधिक प्यार करने लगा हूं। मुझे वास्तव में वह डर लगने लगा है कि अगर कभी अलग होने की नौबत आ गई तो मैं जिन्दा न रह सकूंगा। क्योंकि पहली बार कोई अपना घर जैसा घर मिला है। अपने जैसे बच्चे मिले हैं, ‘लेकिन यह सब जैसे ही तो है, अपने तो नहीं हैं।”

“अगर बच्चे अनुमति दे दें तो जरूर चले जाना।”

महेश सुषमा का चेहरा देखता रह गया।

26

कृष्ण ने जेल के फाटक की निचली खिड़की से निकल कर खुली हवा में गहरी-गहरी सांसें लीं। फिर कान पर से बीड़ी उतारकर पहरे पर तैनात हवलदार से माचिस मांग कर सुलगाई। और चुटकी से राख झाड़ते हुए आगे बढ़ गया।

उसके बदन पर मैली सी पतलून और कमीज थी। सिर के बाल झाड़-झखाड़। दाढ़ी बढ़ी हुई। रंगत सांवली पड़ गई थी। हाथ खुरदरे और सख्त हो गए थे। उसके होंठों पर जहरीली-सी मुस्कराहट थी।

चलते-चलते उसने अपने हाथों को देखा और सोचने लगा कि रूबी का गला घोंटने में जरा-सी देर लगी थी। लेकिन अब तो ये हाथ और सख्त हो गए हैं। सुषमा की नाजुक गर्दन दबाने में तो अब और भी कम समय लगेगा। अब की बार इस तरह काम करूंगा कि कोई पकड़ ही न सके। बस काम करने के फौरन बाद बम्बई छोड़कर दूर चला जाऊंगा।

न जाने वह कब तक पैदल चलता रहा।

काफी देर के बाद उसे सुषमा का फ्लैट दिखाई देने लगा। वही चार कमरों और छोटे से कम्पाउण्ड वाला फ्लैट। अब तो उसकी शान निराली हो गई थी। कार भी बदल गई थी। बल्कि तीन-तीन कारें खड़ी थीं।

कृष्ण ने चुटकी से बीड़ी की राख झाड़ी और बड़बड़ाने लगा-

“हरामजादी, आज तू सारी शान-शौकत छोड़कर परलोक सिधार जाएगी।”

अचानक तभी कम्पाउण्ड में से एक छोटी-सी स्पोर्टस कार में एक खूबसूरत मर्द और उससे काफी मिलती-जुलती लड़की निकली। कार के पीछे दस-ग्यारह साल का एक लड़का स्कूटर पर निकला। दोनों कहकहे लगा रहे थे।

कृष्ण का दिल जोर-जोर से धड़क उठा। उसके मस्तिष्क में एक ही शब्द गूंज उठा- “बेटी डॉली, वह डॉली ही थी।”

“और वह लड़का, शायद डॉली का भाई था।”

“जब सुषमा ने मुझसे तलाक किया था तो वह मां बनने वाली थी।”

“दोनों बच्चे अब इतने बड़े हो गए हैं।”

“बाप जेल काटकर निकला है और बच्चे गाड़ियों में घूम रहे हैं।”

“किसकी वजह से? उसी कमीनी की वजह से।”

अचानक वह चौंक पड़ा। एक फिएट कार और बाहर निकली। उस कार की ड्राइविंग-सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, उसे देखकर कृष्ण को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर हथौड़ा दे मारा हो।

“महेश!”

“महेश!”

“महेश!”

“हां, यह वही हरामजादा है जिसने सुषमा को आत्महत्या से बचाकर उसकी मांग में सिन्दूर भरना चाहा था।”

“आज वही हरामजादा इस घर का मालिक बना बैठा है।”

“जरूर सुषमा ने उससे शादी कर ली होगी।”

“दोनों बच्चे महेश को ही अपना बाप समझते होंगे।”

“लेकिन मैं इतनी आसानी से तुम लोगों को चैन से नहीं रहने दूंगा।”

“सुषमा, मैंने दस वर्ष जेल में काटे हैं और तूने दस वर्ष अपने यार के साथ ऐश किया है।”

“लेकिन आज तुझे और तेरे यार को दस वर्ष का हिसाब चुकाना होगा।”

“आज तू और तेरा यार वहां पहुंच जायेंगे, जहां से कल का सूरज नजर नहीं आएगा।”

“मैं तुम दोनों को मौत की मीठी नींद सुला दूंगा।”

उसने बीड़ी तोड़-मरोड़कर फेंक दी और धीरे-धीरे चलता हुआ फ्लैट के गेट तक पहुंच गया। गेट पर वर्दी पहने एक हट्टा-कट्टा दरबान खड़ा था। उसके हाथ में बन्दूक भी थी। चारदीवारी ऊंची करा दी गई थी। उस पर कंटीले तारों का जाल भी बिछा हुआ था। मुंडेर में नुकीले शीशे गढ़े हुए थे।

गेट के पास पहुंचकर कृष्ण अचानक बुरी तरह खांसने लगा। जैसे उसे खांसी का दौरा पड़ गया हो। और फिर खांसते-खांसते वहीं बैठ गया।

दरबान ने चौंककर बंदूक उठाई और कड़ककर बोल-

“अबे, कौन है तू?”

कृष्ण ने हाथ हिलाया और बुरी तरह खांसता रहा। खांसते-खांसते उसकी आंखों से पानी और मुंह से राल बहने लगी।

दरबान ने पास आकर पूछा- “क्या बात है?”

कृष्ण ने अपना सीना मसलते हुए कहा- “बीमार हूं, दमा है, मुझे चलते-चलते दौरा-पड़ जाता है।”

“तो इलाज क्यों नहीं कराते?”

“इलाज!” कृष्ण हांफते हुए फीकी-सी मुस्कराहट के साथ बोला, “यहां पेट भरने को तो मिलता नहीं इलाज कहां से कराऊं। दो बच्चे-एक बीवी का बोझ है। इस हालत में कोई नौकरी भी नहीं देता। मजदूरी करता हूं तो चार दिन बाद ही निकाल दिया जाता हूं।”

“ओहो, बड़ी दुख-भरी कहानी है तुम्हारी।”

“क्या बताऊं भैया, बस मौत की दुआएं मांगता रहता हूं। किसी तरह इस जिन्दगी से पीछा छूट जाए।”

“नहीं भाई, भगवान की ओर से निराश होना पाप है। मैं तुम्हें ऐसी जगह बता देता हूं जहां तुम्हें मजदूरी भी मिल जाएगी और तुम्हारी बीमारी के कारण कोई तुम्हें निकालेगा भी नहीं। और जब बिल्डिंग पूरी बन जाएगी तो तुम्हें रहने के लिए एक पक्की खोली भी मिल जाएगी।”

“कहां भैया? जल्दी से बताओ।”

“हो सकता है, मैनेजर साहब से मुलाकात हो जाए और वह तुम्हारा इलाज भी करा दें। मालिक और मैनेजर दोनों ही भगवान का अवतार हैं।”

“तो जल्दी बता दो भैया।”

“नेहरू नगर में ‘डॉली दीप बिल्डर्स’ का दफ्तर है।”

“डॉली-दीप-बिल्डर्स!” कृष्ण चौंक पड़ा।

“हां, यह फ्लैट मालिकों का है। मालकिन कभी बहुत मशहूर मॉडल गर्ल थीं। बच्चों के बड़े होने के बाद उन्होंने यह काम छोड़ दिया और बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर दिया। कम्पनी का नाम बच्चों के नाम पर रखा है। डॉली बेटी का नाम है और दीप बेटे का।”

“ओह-वही तो नहीं जो अभी-अभी लाल गाड़ी और स्कूटर पर गए थे?”

“हां वही दोनों, स्कूल गए हैं।”

“कौन-से स्कूल में पढ़ते हैं?”

चौकीदार ने स्कूलों के नाम बताए। कृष्ण ने दोनों नाम याद कर लिए।

“और शायद मालिक वह थे जो फिएट कार में गए थे?”

“नहीं। वह तो मैनेजर हैं।”

“तो वह मालकिन के पति नहीं है?”

“नहीं। मालकिन के पति के कोई पुराने दोस्त हैं।”

“ओहो, और मालिक?”

“सुना है, वह तो जब बड़ी बेबी सवा तीन साल की थी, तभी चल बसे थे।”

“च-च-च-अच्छा, यह मैनेजर साहब कहां रहते हैं?”

“यहीं रहते हैं एक कमरे में।”

कृष्ण के दिमाग पर दूसरा हथौड़ा पड़ा। हरामजादी ने अपने यार को मेरा दोस्त बनाकर रखा है घर में। ऐश करती होगी छिप-छिपकर।

चौकीदार ने कहा-

“तुम थोड़ी देर पहले आ गए होते तो मैं ही तुम्हें मिला देता, मैनेजर साहब देवता है देवता। शायद तुम्हें अपनी कार में ही साथ ले जाते।”

“तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद, भैया। क्या पता बताया तुमने ऑफिस का नेहरू नगर?”

“हां-हां, नेहरू नगर।”

“ठीक है। मैं किसी-न-किसी तरह पहुंच ही जाऊंगा।”

कृष्ण खांसने की ऐक्टिंग करता हुआ उठ ही रहा था कि अचानक उसकी नजरें बरामदे की ओर उठ गई। उसकी आंखों में बिजली-सी कौंध गई। वह सुषमा थी। दस वर्षों में उसमें कोई भी अन्तर नहीं आया था। वही रंगरूप वही तीखापन। कृष्ण के बदन में चींटियां-सी रेंगने लगीं।

सुषमा ने जोर से पुकारा-

“चौकीदार-!”

“जी मेम साहब-!”

“कौन है फाटक पर?”

“जी, दमे का एक मरीज है। खांसी का दौरा पड़ गया था।”

कृष्ण खांसता हुआ जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गया। उसने अपनी कमर थोड़ी-सी झुका ली थी। सुषमा फाटक तक आई। उसने चौकीदार से कहा, “तुम्हें मैंने अच्छी तरह समझा दिया था कि कोई ऐरा-गैरा अन्दर झांकने भी न पाए। और तुमने एक अनजान आदमी को यहां बैठा लिया।”

“माफी चाहता हूं, मेम साब।”

“कोई बात नहीं। लेकिन आइन्दा ख्याल रखना।”

“जी, बिल्कुल ख्याल रखूंगा।”

कृष्ण ज्यादा दूर नहीं गया था। उसने सुषमा की सारी बातें सुन ली थीं। वह सोचने लगा, हरामजादी, मेरी वजह से डर रही है। सोचती होगी दस साल पूरे हो चुके हैं। कृष्ण जेल से निकलने ही वाला होगा। इसे वह धमकी याद होगी। यह दस हजार पहरों में भी रहे, फिर भी मैं इसे जिन्दा नहीं छोड़ूंगा।”

सहसा उसकी आंखों के आगे डॉली और दीप के चेहरे घूम गए।

“डॉली और दीपू मेरी औलाद हैं।”

“सुषमा को मारने के बाद मुझे जिन्दगी भर कानून से छिपकर रहना पड़ेगा।”

“उसे मारने में ज्यादा लाभ है या जिन्दा रखने में?”

“डॉली और दीपू को अगर यह विश्वास दिला दिया जाए कि मैं उनका बाप हूं?”

“फिर तो मैं खुद ही डॉली दीप बिल्डर्स का मालिक बन जाऊंगा।”

“तलाक तो मुझसे सुषमा ने ले लिया है।”

“उसके तलाक लेने से मेरे बच्चे पराए थोड़े ही हो जायेंगे।”

“अगर मैं बच्चों के दिलों में अपने लिए प्यार और सहानुभूति पैदा कर लूं तो शायद कानूनी रूप से मैं उन्हें छीन सकता हूं।”

“लेकिन सुषमा बच्चों को कभी अलग करने पर तैयार नहीं होगी।”

“और मुझे भी अपने साथ रखने पर मजबूर हो जाएगी।”

“मैं फिर ऐश की जिन्दगी गुजार सकता हूं।”

“महेश को तो बच्चों से ही निकलवा सकता हूं।”

“बच्चों के दिल में मैं बड़ी आसानी से बात बैठा सकता हूं कि उनकी मां आवारा थी। और महेश के साथ उसके अनुचित सम्बन्ध हैं।”

“बच्चे महेश से घृणा करने लगेंगे।”

“हां, यही स्कीम ठीक है।”

“दस साल जेल में रहकर जो दुख भोगे हैं उनके बदले सुख मिल जाएगा। सुषमा के फ्लैट में रहकर।”

“फिर वही कारें होंगी, वहीं ऐशो-आराम।”

उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आंखों के आगे डॉली और दीपू के चेहरे घूम रहे थे।

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पता नहीं क्यों, सुषमा का दिल जोर-जोर के धड़क रहा था। वह काफी देर तक टहलती रही। फिर उसने बरामदे में रुककर पुकारा- “चौकीदार-!”

“जी मेम साहब-।”

“इधर आओ।”

चौकीदार लपककर बरामदे में पहुंच गया।

सुषमा ने जोर से कहा, “फाटक में ताला लगाकर आओ।”

“जी मेम साहब-।”

चौकीदार दौड़कर गया और फाटक में ताला लगाकर सुषमा के सामने आ खड़ा हुआ।

सुषमा ने पूछा, “अभी-अभी जो आदमी फाटक के सामने रुका था, क्या वह बीमार था?”

“जी मेम साहब, उसे दमे की बीमारी थी।”

“उसे फाटक के समाने ही खांसी का दौरा क्यों पड़ा?”

“मेम साहब, यह तो संजोग की बात है।”

“उसने पानी मांगा था बाद में?”

“जी नहीं।”

“हालांकि खांसी के दौरे के बाद हलक सूख जाता है।”

“मैं क्या कह सकता हूं, मेम साहब।”

“तुम उसका हुलिया बता सकते हो? मेरा मतलब नाक नक्श-।”

चौकीदार कुछ सोचता रहा फिर बोला, “बड़ी-बड़ी गोल आंखें थीं। पतलून का रंग नीला था।”

“लम्बी सुतवा नाक?” सुषमा की आवाज कांप उठी।

“जी हां, मेम साहब।”

“वही था, सेन्ट-परसेन्ट वही था।”

“कौन मेम साहब?”

“जिसके लिए तुम्हें यहां रखा गया है। अगर वह अब कभी दिखाई तो देखते ही गोली मार देना।”

“गोली मार दूं?”

“हां, वरना वह मुझे मार डालेगा।”

“क्यों मार डालेगा?”

“वह आदमी मेरा जानी दुश्मन है।”

“लेकिन मेम साहब, किसी को गोली मारना अपराध है। मैं पकड़ा जाऊंगा। हां, अगर वह कोई गड़बड़ करे तो ऐसा हो सकता है।”

“ठीक कहते हो तुम। लेकिन तुम उस पर हमला तो कर ही सकते हो। मैं पुलिस को बता दूंगी कि वह मुझ पर हमला करने की कोशिश कर रहा था। मेरे चौकीदार ने उसे घायल कर दिया। फिर उसे पकड़वा दिया जायेगा।”

“जी, मेम साहब।”

“जो मैं कह रही हूं, वही करना।”

“मेम साहब, आपको गलतफहमी भी तो हो सकती है।”

“तुम्हें इससे सरोकार नहीं। तुम अपनी ड्यूटी का ध्यान रखो।”

“ठीक है, मेम साब।”

चौकीदार के जाने के बाद सुषमा जल्दी-से अंदर चली गई। वह बड़ी देर तक कुछ सोचती रही फिर उसने डायरेक्टरी में कोई नम्बर तलाश किया और रिसीवर उठाकर नम्बर डायल करने लगी।

“यस, सेन्ट्रल जेल!”

“देखिए आज कृष्ण कुमार सक्सेना नाम का एक कैदी रिहा हो रहा है जिसने दस साल पहले रूबी नाम की एक औरत की हत्या की थी?”

“जी हां! लेकिन आप कौन है?”

सुषमा ने जल्दी-सी रिसीवर रख दिया।

उसकी आंखों के आगे अंधेरा-सा छा गया था।

कुछ देर में उसने अपने आपको संभाल लिया और फिर रिसीवर उठाकर कोई नम्बर डायल करने लगी।

“डॉली दीप बिल्डर्स?”

“महेश, मैं सुषमा बोल रही हूं।”

“क्या हुआ? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?”

“वह छूट गया है।”

“कौन-?”

“कृष्ण, वह अभी-अभी फ्लैट के सामने से गुजरा है। खांसी के दौरे के बहाने वह काफी देर तक फाटक पर बैठा रहा था और चौकीदार से बातें करता रहा था।”

“ओह! फिर?”

“फिर मुझे देखकर जल्दी से चला गया।”

“तुम्हें गलतफहमी तो नहीं हुई?”

“नहीं महेश, मैंने चौकीदार से उसका पूरा हुलिया पूछ लिया है। जेल में फोन करके भी पूछ लिया है। वह जेल से आज ही छूटा है।”

“ओह!”

“मेरा दिल बैठा जा रहा है महेश। वह मुझे मारने की कोशिश जरूर करेगा।”

“घबराओ मत, सुषमा। भगवान पर भरोसा रखो। मैं अभी आ रहा हूं।”

“जल्दी आओ महेश, वरना मुझे दौरा पड़ जायेगा। मैंने अपने जीवन में इतना डर कभी महसूस नहीं किया जितना आज महसूस कर रही हूं।”

“डरो मत। दिन का समय है। बन्दूक लिए चौकीदार दरवाजे पर मौजूद है। इस समय उसकी इतनी हिम्मत नहीं पड़ सकती। मैं आ रहा हूं। सबसे पहले पुलिस स्टेशन चलकर रिपोर्ट लिखवायेंगे। और वहां से रात दिन पहरे के लिए कॉन्स्टेबल मांग लेंगे।”

“आते समय बच्चों को भी साथ लेते आना।”

“क्यों? बच्चों को वह क्या पहचानेगा। और उसे क्या पता कि बच्चे कहां पढ़ने जाते हैं।”

“महेश, तुम नहीं जानते वह बहुत ही चालाक आदमी है। उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं। अगर वह बच्चों तक पहुंच गया तो पता नहीं उनसे क्या कहे। पता नहीं उसकी बातों का बच्चों पर क्या असर पड़े।”

“ठीक है, मैं बच्चों को लेता आऊंगा। तुम बिल्कुल मत घबराओ। भगवान पर भरोसा रखो और चौकीदार को अलर्ट कर दो।”

महेश ने रिसीवर रख दिया।

सुषमा रिसीवर रखकर सोफे पर इस तरह जा बैठा जैसे उसकी टांगों का दम ही निकल गया हो। वह सोच रही थी कि वह इतनी बुजदिल क्यों हो गई।

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महेश की कार फर्राटे भरती हुई स्कूल के कम्पाउण्ड में पहुंची। उसने पार्किंग में कार रोकी और तेज-तेज चलता हुआ दीपू के क्लास में चला गया।

क्लास में टीचर नहीं थे, इसलिए बच्चे शोर मचा रहे थे। कोई तबला बजा रहा था। कोई बोर्ड पर कार्टून बना रहा था। कोई टीचर की तरह मेज पर हाथ मार-मार कर खामोश खामोश चिल्ला रहा था।

महेश ने इधर-उधर नजरें दौड़ाई लेकिन उसे दीपू कहीं दिखाई नहीं दिया।

एक लड़के ने महेश से पूछा-

“किसे ढूंढ रहे हैं, अंकल?”

“बेटे, यहां दीपू पढ़ता है ना?”

“हां अंकल। उसे प्रिंसिपल साहब ने अपने ऑफिस में बुलाया है।”

“क्यों?”

“यह तो पता नहीं।”

महेश तेजी से उस क्लास की ओर चल दिया जिसमें डॉली पढ़ती थी। लेकिन डॉली भी वहां मौजूद नहीं थी। उसकी एक क्लास-फैलो लड़की ने बताया कि उसे प्रिंसिपल साहब ने अपने ऑफिस में बुलाया है।

महेश का माथा ठनक उठा। प्रिंसिपल साहब ने दोनों बच्चों को अपने ऑफिस में क्यों बुलाया है?

वह तेजी से प्रिंसिपल के कमरे की ओर चल दिया।

लेकिन जैसे ही वह ऑफिस के निकट पहुंचा उसके पांवों तले से जमीन खिसक गई। दीपू और डॉली प्रिंसिपल की कुर्सी के पीछे खड़े थे और कृष्ण प्रिंसिपल की मेज के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था-

“आओ बच्चो, मेरे पास आओ। मैं तुम्हारा बाप हूं।”

“नहीं-नहीं। हमारे डैडी तो मर चुके हैं।” डॉली कांप कर बोली।

प्रिंसिपल ने कृष्ण से बिगड़कर कहा-

“ऐ मिस्टर, कितनी बार आपसे कह चुका हूं कि यहां से चले जाओ। बेकार बच्चों को क्यों डरा रहे हो।”

कृष्ण ने रुआंसी आवाज में कहा-

“प्रिंसिपल साहब, कुछ तो दया कीजिए। एक बाप पर रहम खाइए।

आपके भी तो बच्चे होंगे। मैं दस साल से अपने बच्चों को कलेजे से लगाने के लिए तड़प रहा हूं। तब डॉली बहुत छोटी थी और दीपू तो पैदा ही नहीं हुआ था। जब हम पति-पत्नी में झगड़ा हुआ था और मैं घर छोड़ कर चला गया था।”

“तो फिर आप की पत्नी ने बच्चों को यह क्यों बताया कि आप मर चुके हैं?”

“क्या बताऊं प्रिंसिपल साहब, मुझे शर्म आती है ऐसी बात जुबान पर लाते हुए और वह भी बच्चों के सामने। लेकिन!”

इससे पहले कि कृष्ण कुछ कह पाता महेश ने तेजी से आगे बढ़कर कहा- “कृष्ण, अपनी जुबान को लगाम दो।”

डॉली और दीपू महेश को देखकर चीख उठे, “अंकल!”

दोनों बच्चे दौड़ कर महेश से लिपट गए।

“अंकल, पता नहीं यह आदमी कौन है। कहता है, मैं तुम्हारा डैडी हूं।”

“प्रिंसिपल साहब, आपने इस आदमी को बच्चों से मिलने की इजाजत क्यों दी?”

“इसने अपना नाम कृष्ण कुमार सक्सेना बताया और कहा कि मैं डॉली और दीपू का बाप हूं। मैंने बच्चों को बुलवा लिया। बच्चे इसे नहीं पहचान रहे। मैं इससे बार-बार कह रहा हूं कि यह चला जाए।”

अचानक कृष्ण के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। उसने प्रिंसिपल से कहा- “प्रिंसिपल साहब, यह बात तो स्पष्ट हो गई कि मैं ही कृष्ण कुमार सक्सेना हूं, आपके सामने ही बच्चों के अंकल मिस्टर महेश ने मुझे कृष्ण कह कर पुकारा है।”

“यह तो सच है। और मिस्टर महेश, यह आपका नाम भी जानते है।”

महेश का चेहरा उतर गया। उसके होंठ सिर्फ हिलकर रह गये।

कृष्ण ने डॉली और दीपू की ओर देख कर भर्राई आवाज में कहा-

“मेरे बच्चो, अब तो तुम्हारे महेश अंकल भी आ गए हैं। इनसे कहो कि यह तुम्हारी मां की सौगन्ध खाकर यह कह दें कि मैं तुम्हारा बाप नहीं हूं। अगर तुम्हारे अंकल सौगंध खाकर यह कह देंगे तो मैं चुपचाप यहां से चला जाऊंगा।”

महेश को ऐसा लग रहा था जैसे उसके पैरों तले से जमीन खिसकती चली जा रही है। उसके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया था।

प्रिंसिपल ने महेश की ओर देखकर पूछा-

“मिस्टर महेश- यह क्या चक्कर है?”

“महेश बाबू, मेरी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है। और न मैं आपको झूठ बोलने पर मजबूर कर रहा हूं। सच बोलकर एक बाप को उसके बच्चों से मिला दीजिए। आप उसी की सौगन्ध खा लीजिए जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।”

“अंकल!” डॉली ने आश्चर्य से कहा, “सच-सच बताइए ना।”

“बताइए अंकल, क्या आप इन्हीं के दोस्त हैं? क्या यह हमारे डैडी है?” दीपू ने कहा।

महेश ने बड़ी कठिनाई से कहा-

“हां बच्चो, यही तुम्हारे पिता है।”

“धन्य हो महेश बाबू। आप आदमी नहीं, देवता हैं।” कृष्ण ने रोते हुए कहा और दोनों हाथ फैलाकर कहा- “आओ मेरे बच्चों, अब तो मेरे गले से लग जाओ।”

डॉली और दीपू धीरे-धीरे कृष्ण की ओर बढ़े ही थे कि महेश ने हाथ उठाकर कहा- “ठहरो डॉली, ठहरो दीपू!

दोनों बच्चे ठिठककर रुक गए।

कृष्ण गिड़गिड़ाया-

“अब इन्हें क्यों रोक रहे हो, महेश बाबू।”

“इसलिए कि इन बच्चों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि सुषमा देवी तुमसे तलाक ले चुकी हैं।”

“महेश बाबू, पत्नी के तलाक ले लेने पर क्या बच्चों के बदन में दौड़ता लहू बदल जाता है। डॉली और दीपू मेरा ही खून हैं। तलाक मुझसे मेरी पत्नी ने लिया था लेकिन उसके तलाक लेने से मेरे बच्चों के साथ मेरा सम्बन्ध नहीं टूट गया।”

“लेकिन कानून के अनुसार जब तक बच्चे बालिग नहीं हो जाते इन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं हो सकता। बालिग हो जाने के बाद वह बच्चों की इच्छा पर निर्भर होगा कि वे बाप के साथ रहें या मां के साथ। अभी इन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।”

“मैं इन पर अपना अधिकार कब जता रहा हूं। मैंने कब कहा कि मैं इनको अपने साथ ले जाऊंगा। मेरे पास तो रहने के लिए झोपड़ी तक नहीं है। पेट भरने को फूट कौड़ी तक नहीं है। मैं इन्हें कहां से खिलाऊंगा? कहां रखूंगा? कहां से पढ़ाऊंगा-लिखाऊंगा? यह सब-कुछ तो इनकी मां ही कर सकती है। जो पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं जिसकी एक झलक देखने के लिए लोग पागल हो जाते हैं। जिसने लाखों रुपए लगाकर, ‘डॉली दीप बिल्डर्स’ के नाम से फर्म खोलकर अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की योजना बनाई है, लेकिन महेश बाबू, कानून से नहीं, क्या इंसानियत के नाते मुझे इतना भी अधिकार नहीं है कि मैं अपने बच्चों की अपने गले से लगाकर एक बार प्यार कर सकूं? क्या गरीबी खून के रिश्ते को तोड़ देती है? आज ये बच्चे अपनी मां से केवल इसलिए प्यार करते है कि वह बस उसी को पहचानते हैं, क्योंकि वह उन्हें हर तरह का सुख देती है। और बाप को इन्हें प्यार करने का अधिकार इसलिए नहीं है कि बाप इन्हें एक वक्त की रोटी देने के भी काबिल नहीं है।”

प्रिंसिपल कृष्ण की बातों से बहुत प्रभावित दिखाई दे रहे। उन्होंने महेश से कहा-

“मिस्टर महेश, मेरा ख्याल है, कानून के नाते न सही, इंसानियत के नाते एक बाप को इतना अधिकार देना भला काम है। अगर एक बाप अपने बच्चों से मिलता है तो इसमें हर्ज क्या है?”

“प्रिंसिपल साहब, बच्चों के बाप मिस्टर कृष्ण हैं। मां श्रीमती सुषमा हैं। मैं तो इनका केवल बिजनेस मैनेजर हूं। मुझे न तो बच्चों को बाप से मिलने से रोकने का अधिकार है और न मिलने की अनुमति देने का। पर मुझे इतना विश्वास जरूर है कि बच्चों की मां इस बात को कभी भी पसंद नहीं करेंगी।”

“लेकिन क्यों?”

“प्रिंसिपल साहब, कुछ ऐसी व्यक्तिगत बातें होती हैं जो हर एक के सामने नहीं कही जा सकतीं। इन मासूम बच्चों के सामने भी नहीं।”

“क्या मैं मिसेज सुषमा से टेलीफोन पर इजाजत लेकर देखूं?”

“देख लीजिए। मुझे मिस्टर कृष्ण से कोई दुश्मनी नहीं है।”

प्रिंसिपल ने रिसीवर उठाकर नम्बर डायल किए और रिसीवर कान से लगा लिया।

“हैलो।” दूसरी ओर से आवाज आई, “कौन महेश?”

“जी नहीं। मैं स्कूल का प्रिंसिपल बोल रहा हूं।”

“ओह, क्या महेश बाबू वहां पहुंच गए?”

“जी हां।”

“वह बच्चों को स्कूल से लेकर चल दिए हैं या नहीं?”

“जी, अभी नहीं।”

“क्यों?”

“श्रीमती सुषमा जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं, इंसानियत के नाते।”

“जी कहिए।”

“इस समय मेरे ऑफिस में मिस्टर महेश, डॉली, और दीपू के अलावा बच्चों पिता मिस्टर कृष्ण भी मौजूद हैं।”

“क्या?” सुषमा चीख पड़ी।

“वह बच्चों को गले लगाने के लिए बहुत तड़प रहे हैं।”

“नहीं-नहीं, प्रिंसिपल साहब! यह कभी नहीं हो सकता। बच्चे आपकी जिम्मेदारी पर स्कूल जाते हैं। आपने कृष्ण को उन तक पहुंचने की इजाजत कैसे दे दी?”

“इसलिए कि रजिस्टर में इनका नाम बच्चों के बाप की हैसियत से लिखा हुआ है। इस बात की पुष्टि मिस्टर महेश ने भी की है। आप लोगों के निजी झगड़े क्या है, मुझे पता नहीं।”

“प्रिंसिपल साहब, मैं कृष्ण को बच्चों के सिर पर तक हाथ फेरने की इजाजत नहीं दे सकती। और यह आपकी जिम्मेदारी है कि जब तक मेरे बच्चे आपके स्कूल में रहते हैं, उनसे मेरे और महेश के अलावा और कोई नहीं मिल सकता।”

“जी, लेकिन!”

प्रिंसिपल साहब-प्लीज!

“ओ. के. मैडम।”

फिर उन्होंने रिसीवर रखकर कृष्ण से कहा-

“मुझे अफसोस है, मिस्टर कृष्ण। मां की आज्ञा के बिना आप बच्चों से नहीं मिल सकते।”

कृष्ण इस तरह भरभराकर रो पड़ा, जैसे उसे आशा के विपरीत फांसी की सजा सुनाई गई हो। प्रिंसिपल के चेहरे पर दुख और सहानुभूति के भाव थे। डॉली और दीपू सहमे हुए थे।

कृष्ण ने डॉली और दीपू की ओर देखकर भर्राई हुई आवाज में कहा-

“मेरे जिगर के टुकड़ों, तुम्हारी मां तो कठोर हो ही गई है। मैं जानता हूं, उसने शुरू से ही तुम्हारे दिलों में अपने बाप के लिए घृणा कूट-कूटकर भर दी होगी। लेकिन मेरे बच्चों, क्या तुमने अपने जीवन में कभी बाप के प्यार की कमी महसूस नहीं की? क्या दूसरे बापों को अपने बच्चों को प्यार करते देखकर तुम्हारे दिलों में कभी यह ख्याल पैदा नहीं हुआ कि काश, तुम्हारा भी बाप होता जो प्यार से तुम्हारे सिर पर हाथ फेरता। जिसकी उंगली पकड़कर तुम घूम करते। जिसकी पीठ पर चढ़कर घोड़े का खेल खेला करते। बोलो मेरे जिगर टुकड़ों। चुप क्यों हो। अपने बाप की फरियाद का उत्तर क्यों नहीं देते?”

डॉली और दीपू के चेहरे पर कई रंग आ-जा रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वे किसी आन्तरिक उलझन में फंस गए हों। उनके अंदर संघर्ष हो रहा हो।

कृष्ण ने हाथ फैलाकर गिड़गिड़ाते हुए कहा-

“बोलो मेरे बच्चों, वरना मेरा कलेजा फट जाएगा।”

डॉली और दीपू के होंठ कांप उठे और उनके मुंह से एक साथ निकला- “डैडी!”

“मेरे बच्चों।”

डॉली और दीपू आगे बढ़े और कृष्ण के सीने से लिपट गए। वह रोते हुए दोनों बच्चों को चूमने लगा।

महेश को पूरा कमरा घूमता हुआ महसूस हो रहा था। बच्चों को किस कानून से रोका जा सकता था। उन पर किसका आदेश चल सकता था? प्रिंसिपल कृष्ण की बातों से इतना प्रभावित हो गया था कि उसकी आंखें भीग गई थीं।

अचानक टेलीफोन की घंटी बज उठी।

प्रिंसिपल ने रिसीवर उठाकर कहा-

“यस, प्रिंसिपल स्पीकिंग।”

“प्रिंसिपल साहब, क्या मिस्टर महेश बच्चों को ले गए?”

“जी, बस अभी-!”

“क्या अभी तक वह वहीं रुके हुए हैं?”

“जी, वह-!”

“मैं कहती हूं उन्हें बच्चों के साथ फौरन भेज दीजिए।”

“जी, अभी भेजता हूं।”

प्रिंसिपल ने रिसीवर रखकर महेश से कहा-

“मिस्टर महेश, मैडम का फोन था। आप बच्चों को लेकर फौरन चले जाइए। वह नाराज हो रही है।”

यह सुनकर कृष्ण ने और जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया।

27

रात को डाइनिंग टेबल पर अजीब-सा सन्नाटा छाया हुआ था। डॉली और दीपू बड़ी खामोशी से थोड़ा-थोड़ा खा रहे थे। सुषमा बहुत ही चिन्तित और परेशान दिखाई दे रही थी। वह बार-बार बड़े ध्यान से दोनों बच्चों को देखने लगती थी। महेश भी बहुत चिन्तित था।

थोड़ा-सा खाने के बाद जब डॉली नेपकिन से हाथ पोंछने लगी तो सुषमा ने बेचैन होकर पूछा-

“क्या बात है डॉली, तुमने पेट भरकर खाना नहीं खाया।”

“मुझे भूख नहीं है।” डॉली ने सपाट लहजे में कहा।

दीपू भी उठने लगा तो सुषमा ने कहा-

“दीपू, तुम भी!”

‘हां मम्मी, मुझे भी भूख नहीं है।”

“क्या हो गया है तुम दोनों को?” सुषमा की आवाज भारी थी।

“मम्मी!” डॉली ने गम्भीर स्वर में कहा, “डैडी जिन्दा थे तो आपने यह क्यों कहा कि वह मर चुके हैं?”

“और अंकल, आप तो डैडी के पुराने दोस्त थे। आपने भी हम लोगों को सच-सच नहीं बताया।” दीपू बोला।

“चुप रहो बदतमीज!” सुषमा झटके से खड़ी हो गई और कांपती हुई आवाज में बोली- “तुम लोग अब इतने बड़े हो गए कि जबान चलाने लगे।”

डॉली और दीपू ने कोई उत्तर नहीं दिया। दोनों तेजी से बाहर चले गए।

सुषमा के होंठ हिलते रह गए।

महेश ने धीरे से कहा-

“यह तुमने क्या किया, सुषमा? जिन बच्चों को, कभी फूल भी नहीं छुआया उन्हें आज तुमने इस तरह क्यों डांट दिया?”

सुषमा दोनों हाथों से मुंह छिपाकर रो पड़ी।

“मैं क्या करूं भगवान! मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा।”

महेश का हाथ उसे तसल्ली देने के लिए बढ़ा लेकिन फिर इस तरह रुक गया जैसे कोई चीज बीच में आ गई हो उसने धीरे से कहा-

“सुषमा, यह तुम्हारी जिन्दगी का बहुत ही नाजुक मोड़ है। जितनी सावधानी बरत सकती हो और बरतनी पड़ेगी। तुम्हारी जिन्दगी है। दोनों उम्र के उस मोड़ पर है जहां से उनके मस्तिष्क मोड़े जा सकते हैं। कृष्ण ने जो जाल फैलाया है उसे दुनिया का सबसे ज्यादा चालाक आदमी ही फैला सकता है। उसने कभी रूबी की तरह तुम्हें मार डालने की धमकी दी थी। लेकिन अब शायद उसने अपनी स्कीम बदल दी है। अब वह बच्चों को प्यार के जाल में फंसा रहा है। क्योंकि तुमने बच्चों के भविष्य के लिए उससे तलाक लिया था और तुम बच्चों के बिना जिन्दा नहीं रह सकतीं। इस बात को वह अच्छी तरह जानता है। अगर उसे बच्चों को अपने जाल में फंसाने में सफलता मिल गई तो!”

“मैं क्या करूं महेश? क्या मेरे भाग्य में कांटे ही लिखे हैं।”

“नहीं सुषमा, हर रात की सुबह जरूर होती है। भगवान तुम्हें कब तक दुखी कर सकता है। कितना दुःख है उसके खजाने में जो उसने केवल तुम्हारे ही नाम लिख दिया है। नहीं सुषमा, तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हारे साथ हूं।”

सुषमा धीरे-धीरे सिसकियां भर कर रोती रहीं।

महेश का जी चाह रहा था कि सुषमा को सीने से लगाकर तसल्ली दे लेकिन उन दोनों के बीच एक ऐसी दीवार ऐसी थी जिसे वह पार नहीं कर सकता था।

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सुबह जब डॉली और दीपू स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे सुषमा परेशान-सी महेश के कमरे में पहुंची।

“महेश, वे दोनों स्कूल जा रहे हैं।”

“तो क्या हुआ? जाने दो।”

“मेरा विचार है, आज से तुम इन्हें साथ ले जाया करो और वापसी में साथ ही ले आया करो। या फिर पुलिस की व्यवस्था कर दो।”

“सुषमा, अब यह सारे इन्तजाम बेकार हैं। इस तरह की पाबन्दियां बच्चों को गलत रास्ते पर, ले जा सकती हैं।”

“फिर कृष्ण तो उनसे मिले बिना मानेगा, नहीं।”

“तुम बच्चों को उससे जितना दूर रखोगी, बच्चों के मन में उसके लिए उतना ही ज्यादा लगाव पैदा होगा।”

“फिर क्यों न हम बम्बई छोड़ दें।”

“बम्बई छोड़ दें?” महेश ने फीकी-सी मुस्कराहट के साथ कहा, “डॉली दीप बिल्डर्स का इतना लम्बा-चौड़ा कारोबार खत्म कर दें? और क्या तुम यह समझती हो कि अगर हम बम्बई छोड़ देंगे तो कृष्ण हमारा पीछा छोड़ देगा?”

“फिर एक काम करो। मुझे एक उपाय सूझा हैं।”

“वह क्या?”

कृष्ण बहुत ही लालची है। अगर दस-बीस लाख लेकर बच्चों का पीछा छोड़ दे तो उससे सौदा कर लो।”

“दस-बीस लाख? जिस आदमी के बच्चे करोड़पति हों, वह दस-बीस लाख लेकर चुप बैठ जायेगा? आज वह दस-बीस लाख लेकर चुप बैठ जाएगा लेकिन चार दिन बाद फिर आ जायेगा। क्योंकि उस जैसे आदमी के पास पैसा रुकता कहां है! ऐसे लोग हमेशा ऐसी जगहों पर नजर रखते हैं, जहां से रकम मिलती रहे।”

“फिर क्या करूं महेश?”

“समय की प्रतीक्षा करो। होनी को आज तक कोई नहीं टाल सका है।”

अचानक गाड़ियां स्टार्ट होने की आवाज आई। महेश और सुषमा जल्दी से बाहर की ओर झपटे। डॉली और दीपू की गाड़ियां आगे पीछे गेट से निकल रही थीं। यह पहला मौका था जब वे सुषमा से बिना मिले चले गए थे।

सुषमा दोनों हाथों में मुंह छिपाकर रो पड़ी।

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पीरियड खत्म होते ही डॉली और दीपू तेजी से फाटक की ओर चल दिए। वे फाटक पर खड़े काफी देर तक इधर-उधर देखते रहे। उन्हें कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिया। वे सुबह स्कूल आते समय भी कृष्ण को खोजते आए थे। वे निराश होकर वापस क्लास में लौट आए।

अगला पीरियड खाली था। वे दोनों बगीचे में एक पेड़ के तने से टेक लगाकर खड़े हो गए।

अचानक उन्होंने काले रंग की फियेट से रंजीत को उतरते देखा। वह नवीं क्लास में पढ़ता था। उसके साथ उसके माता-पिता भी उतरे थे। दोनों ने रंजीत को प्यार किया। पिता ने चाकलेट जेब से निकालकर उसे दी तो उसने अपनी मां से कहा-

“मम्मी, आप कुछ नहीं देंगी?”

“शैतान कहीं का!” मां ने हंसकर पांच रुपये का एक नोट निकालकर उसे देते हुए कहा, “बीच की छुट्टी में आइसक्रीम खा लेना।”

फिर वे उसके सिर पर हाथ फेरकर चले गए। और रंजीत चाकलेट खाता हुआ आगे बढ़ गया। लेकिन दीपू और डॉली उस जगह को इस तरह देख रहे थे जैसे अब भी वहां कोई गाड़ी खड़ी हो और उसमें से वे दोनों उतरे हों। उनके साथ मम्मी-डैडी भी उतरे हों। और उन्होंने उन दोनों को एक-एक चाकलेट दी हो। मम्मी ने उन्हें पांच-पांच रुपए के नोट दिए हों।

सहसा दोनों चौंक पड़े। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। दीपू ने कहा- “दीदी, जिस तरह रंजीत के मम्मी-डैडी आते हैं, हमारे मम्मी-डैडी क्यों नहीं आते? हमारे मम्मी-डैडी अलग-अलग क्यों रहते हैं?”

“मम्मी ने डैडी से तलाक ले लिया है।”

“यह तलाक क्या होता है?”

“जब मां और बाप हमेशा के लिए एक दूसरे से अलग हो जायें तो उसे तलाक कहते हैं।”

“लेकिन मां ने डैडी से तलाक क्यों लिया?”

“पता नहीं।”

“क्या अब वे कभी साथ-साथ नहीं रह सकते?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“यह तो पता नहीं। लेकिन मम्मी शायद डैडी से अब कभी नहीं मिलेंगी।”

“और डैडी?”

“डैडी तो कल कितना रो रहे थे।” डॉली ने ठंडी सांस ली।

कुछ देर तक वे सोच में डूबे खड़े रहे।

तभी घंटी बज उठी दोनों अपनी-अपनी क्लास में चले गए।

छुट्टी होने के बाद जब दीपू और डॉली की गाड़ियां आगे-पीछे स्कूल से निकलीं तो एक जगह भीड़ देखकर दोनों ने गाड़ियां रोक लीं। उनके कानों से एक आवाज टकराई-

“भगवान के नाम पर कुछ दे दो।”

“भगवान करे तुम्हारे माता-पिता का साया तुम्हारे सिरों पर बना रहे।”

किसी की आवाज आई- “मीनू- इस बेचारे को पचास पैसे दे दो।”

“क्यों?”

“अरे! तुम्हें मालूम नहीं। यह बेचारा डॉली और दीपू का बाप है।”

डॉली और दीपू को धक्का-सा लगा। दोनों भीड़ को चीरकर जल्दी से अंदर पहुंचे। फुटपाथ पर कृष्ण खड़ा हाथ फैलाए भीख मांग रहा था। बच्चे उसके हाथ पर सिक्के रख रहे थे।

दीपू जोर-से चीख उठा “डैडी-!”

“डैडी!” डॉली भी चिल्ला उठी।

“मेरे बच्चों!” कृष्ण चिल्लाया।

डॉली ने आगे बढ़कर कृष्ण के हाथ से सारे सिक्के छीनकर फेंक दिए और सबकी ओर देखकर गुस्से से कहा- “खबरदार जो किसी ने मेरे डैडी को भीख दी।”

“यह मांग रहे थे इसलिए हमने दी थी।”

दीपू ने कृष्ण से कहा-

“डैडी, आप भीख क्यों मांग रहे थे?”

कृष्ण ने आंसू पोंछते हुए कहा-

“बेटे, तुम्हारे डैडी के पास न तो सिर छिपाने के लिए जगह है, न पहनने के लिए कपड़े। कोई नौकरी भी नहीं देता। शरीर में इतनी शक्ति नहीं कि मेहनत-मजदूरी कर सकूं।”

“नहीं, डैडी, हमारे होते हुए आप भीख नहीं मांग सकते।”

“तुम कहां से पेट भरोगे अपने डैडी का?”

“हमें रोजाना जो जेब-खर्च मिलता है वह हम आपको दे दिया करेंगे।”

“लेकिन अगर तुम्हारी मम्मी को पता चल गया तो वह तुम लोगों को जेब खर्च देना बंद कर देंगी।”

डॉली और दीपू चुप रह गए।

कृष्ण ने उनके सिरों पर हाथ फेरते हुए भर्राई आवाज में कहा-

“जाओ बच्चों, अगर तुम्हारी मम्मी ने देख लिया कि तुम मुझसे बातें कर रहे थे तो वह बहुत नाराज होगी।”

“आप और मम्मी साथ-साथ क्यों नहीं रहते डैडी?”

“बच्चों।” कृष्ण ने ठंडी सांस लेकर कहा, “यह बात जब तुम बड़े हो जाओगे तब समझोगे।”

“आप हमें इतना नासमझ क्यों समझते हैं।”

“अब तुम्हें क्या बताऊं? अगर घर में रहता तो तुम्हें दिखा देता।”

“क्या दिखा देते?”

“ऐसी बातें जिसके बाद तुम लोग खुद समझ जाते कि तुम्हारी मम्मी मुझसे अलग क्यों रहती है।”

“लेकिन कुछ तो बताइए।”

“तुमने अपनी मम्मी को कब से मम्मी कहना शुरू किया है?”

“थोड़े दिन पहले से ही।”

“इसके पहले तुम सबके सामने उन्हें मम्मी नहीं कह सकते थे ना?”

“हां।”

“तुमने कभी इसकी वजह जानने की कोशिश की?”

“नहीं।”

“मैं तुम्हें वजह बताता हूं।”

फिर इससे पहले कि कृष्ण कुछ कहता उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा पड़ा और वह लड़खड़ा कर कई कदम पीछे हट गया।

महेश ने गुस्से से आंखें निकालकर कहा-

“कमीने, जलील-अगर एक शब्द भी तेरी गंदी जबान से निकला तो तेरी जबान काटकर फेंक दूंगा।”

“अंकल-!” दीपू और डॉली एक साथ चीख उठे।

“जाओ तुम लोग- फौरन चले जाओ यहां से।” महेश ने उनकी गाड़ियों की ओर हाथ उठाकर गुस्से से कहा।

डॉली और दीपू के होंठ कांपे लेकिन वे कुछ कह न सके। चुपचाप अपनी गाड़ियों में आकर बैठे और कार तेजी से घर की ओर चल दी।

महेश ने कृष्ण की ओर देखा। उसके होंठों से खून निकल रहा था लेकिन उस पर व्यंग्य-भरी मुस्कराहट थी।

महेश ने मुट्ठियां भींचकर कहा-

“मैं पूछता हूं, किसी के सुख-चैन में आग लगाकर तुझे क्या मिलेगा? इन मासूम बच्चों की जिन्दगी बर्बाद करना चाहता है? इन्हें अपनी देवी जैसी मां के विरुद्ध क्यों भड़का रहा है?”

“देवी जैसी मां!” कृष्ण ने व्यंग्य से कहा- “इस धरती पर दो ही अवतार हैं, एक देवी सुषमा और दूसरा देवता महेश जो बिना शादी किए ही इन बच्चों की सुन्दर मां के साथ ऐश कर रहा है।”

“कमीने-कुत्ते-जलील-!”

महेश पागलों की तरह उसे पीटने लगा। कृष्ण पिटता रहा, चीखता-चिल्लाता रहा। थोड़ी देर में ही वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो गई। स्कूल के चपरासी और और चौकीदार भी भागकर वहां पहुंच गए। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत न थी कि महेश को रोक पाता।

अचानक स्कूल के प्रिंसिपल भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़कर बोले- “यह क्या हो रहा है?”

फिर वह महेश और कृष्ण को देखकर चौंक पड़े। उन्होंने जल्दी से महेश का हाथ पकड़कर कहा-

“अरे-अरे, यह आप क्या कर रहे हैं, महेश बाबू!”

“छोड़ दीजिए, प्रिंसिपल साहब। मैं इसका गला घोंट दूंगा। जान से मार डालूंगा इसे।”

“लेकिन क्यों?” इसका अपराध क्या है?”

“आज इस कमीने ने एक देवी की पवित्रता पर कीचड़-उछाली है और वह भी उसके मासूम बच्चों के सामने।”

कृष्ण ने हंसते हुए कहा-

“हां, प्रिंसिपल साहब! सुषमा मेरी तलाकशुदा पत्नी है। भारत की सर्वाधिक सुन्दर और विख्यात मॉडल गर्ल। डॉली दीप बिल्डर्स की बुनियाद उसी ने बच्चों के नाम पर डाली है। और यह मिस्टर महेश उस देवी को कॉलेज के जमाने से जानते हैं। उसके बिजनेस मैनेजर हैं और बिना किराया दिये उसके घर में रहते हैं।”

महेश सन्नाटे में रह गया। उसे ऐसा लगा जैसे भरे बाजार में उसे किसी ने नंगा कर दिया हो।

कृष्ण के होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट थी। प्रिंसिपल ने कनखियों से महेश की ओर देखा और फिर भीड़ की ओर देखकर जोर-से चीखे-

“आप यहां क्यों खड़े हैं? क्या यहां कोई तमाशा हो रहा है। चलिए, अपना-अपना काम देखिए।”

लोग मुस्कराते हुए हट गए।

प्रिंसिपल ने महेश से कहा-

“मिस्टर महेश, आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। इस तरह जोश में आ जाने से क्या परिणाम निकलेगा? चार आदमी आपका मजाक उड़ायेंगे।”

फिर उसने कृष्ण की ओर देखकर गम्भीर स्वर में कहा- “मिस्टर कृष्ण, मुझे आपसे हमदर्दी जरूर हैं। उनके स्कूल के सामने आप भिखारी का ढोंग रचकर उनमें हीन भावना क्यों पैदा कर रहे हैं? और आप जो कुछ इन मासूम बच्चों से कहना चाहते थे वह कोई भी शरीफ और बच्चों की भलाई चाहने वाला बाप अपने बच्चों से हरगिज नहीं कह सकता। बच्चे मासूम होते हैं। अगर मां-बाप की ओर से उनके दिमाग पर कोई बुरा असर पड़ गया तो उनके भविष्य में उन्नति की ओर तेजी से दौड़ते हुए कदम वहीं जाम हो जायेंगे। मैं नहीं जानता कि आप उन्हें उनकी मां की ओर से क्यों बहका रहे हैं जबकि आप देखने में उन्हें बहुत ज्यादा प्यार करते हैं।”

फिर प्रिंसिपल पलटकर तेजी से फाटक के अंदर चले गए। कृष्ण ने होंठों का खून पोंछा और जहरीली मुस्कराहट के साथ महेश से बोला-

“मिस्टर महेश! इतना याद रखना, मैंने आखिर तक तुम्हारे एक भी चांटे का जवाब नहीं दिया है। ये सारे चांटे मुझ पर तुम्हारा कर्ज हैं। जो मौका आने पर ब्याज समेत चुकाऊंगा। लेकिन यह मत समझना कि मैं तुम्हें और सुषमा को ऐश करने के लिए यूं ही छोड़ दूंगा।”

महेश का खून लावे की तरह खौल रहा था, लेकिन वह केवल मुट्ठियां भींच कर रह गया। फिर वह तेजी से पलटा और अपनी कार की ओर बढ़ गया।

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सुषमा का चेहरा उतरा हुआ था। वह चुपचाप मेज पर रात का खाना लगा रही थी।

सुषमा ने दर्शन से पूछा- “महेश बाबू अभी तक नहीं आये?”

“जी नहीं।”

“आज उन्हें इतनी देर कैसे लग गई। वह तो चाय के समय आ जाते थे।

“पता नहीं।”

तभी जूली ने अंदर आकर कहा- “मेम साहब बेबी और बाबा कहते हैं, वे खाना नहीं खायेंगे।”

“क्यों?” सुषमा को झटका लगा।

“कहते हैं, भूख नहीं है।”

सुषमा कुछ पल ज्यों-की-त्यों खड़ी रही, फिर बाहर की ओर चल दी।

तभी कार के इंजन की आवाज सुनाई दी। और कुछ देर के बाद महेश अंदर आया। उसके चेहरे पर उसका मानसिक अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

सुषमा को देखते ही उसने अपने आपको संभाला और मुस्करा कर बोला- “हैलो सुषमा!”

“आज इतनी देर क्यों हो गई!”

“आज तुम्हारे सपने की बुनियाद डाल दी गई है।”

“बंगले की!”

“हां, इसीलिए देर हो गई।”

“हाथ-मुंह धोकर डाइनिंग-रूम में चलो।”

“नहीं, मुझे भूख नहीं है।”

“क्यों?...

“बस, यूं ही।”

“क्या हो गया है सबको?” सुषमा ने रुआंसी आवाज कहा- “क्या होने वाला है इस घर में। मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा।”

“क्यों, इसमें परेशान होने की क्या बात है?”

“मेरे लिए परेशानी के सिवा और रखा भी क्या है? जबसे डॉली और दीपू स्कूल से लौटे हैं, अपने कमरे में ही पड़े हैं। न चाय पीने के लिए बाहर निकले और न खाना खाने ही आ रहे हैं।”

महेश को झटका-सा लगा। वह धीरे-से बोला-

“क्या कहते हैं वे लोग?”

“कुछ भी नहीं। बस मुंह फुलाए बैठे हैं।”

“तुमने, पूछा?”

“पूछा था पर कुछ बताया ही नहीं।”

“तो फिर मुझसे सुन लो।”

महेश ने एक ठण्डी सांस ली और फिर धीरे-धीरे पूरी घटना सुना थी।

सुषमा की आंखें आश्चर्य से फटी रह गई। फिर वह भर्राई आवाज में बोली- “तो अब वह ऐसी ओछी हरकतों पर उतर आया है।”

“घायल सांप कुछ भी कर सकता है।”

“तो फिर ठीक है। आज इस बात का फैसला हो ही जाना चाहिए।

“किस से करोगी फैसला?”

“बच्चों को उसकी असलियत बताऊंगी। जूली से गवाही दिलाऊंगी। कम-से-कम डॉली तो इतनी समझदार है कि वह सारी बात समझ जाये और फिर दीपू को समझा देगी।”

“इसके बाद कृष्ण मेरे और तुम्हारे सम्बन्धों पर कीचड़ नहीं उछालेगा? क्या हमारे पास अपनी सफाई देने के लिए कोई प्रमाण है?”

“तो फिर क्या करूं? इस तूफान को किस तरह रोकूं?”

“मेरे साथ आओ।”

महेश सुषमा को लेकर बच्चों के कमरे की ओर चल दिया।

उन्होंने देखा दोनों बच्चे अपने-अपने बिस्तर पर औंधे लेटे हुए थे।

महेश ने पुकारा-

“डॉली, दीपू तुम लोग खाना नहीं खाओगे?”

“बच्चों, क्या तुम अपने अंकल को जवाब भी नहीं दोगे?”

“हम आपसे बात भी नहीं करना चाहते।” डॉली ने कहा।

सुषमा गुस्से कुछ कहने वाली थी लेकिन महेश ने हाथ के इशारे से रोक दिया। और डॉली के पास बैठकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोला- “आखिर क्यों?”

डॉली ने उसका हाथ झटक दिया।

महेश ने धीरे से पूछा-

“अगर हमें हमारा दोष नहीं बताओगी तो हम क्या समझेंगे?”

“आप हमारे अंकल हैं ना?”

“बिल्कुल हैं।”

“इसलिए कि आप डैडी के दोस्त थे।”

महेश को एक झटका लगा।

डॉली उठकर बैठ गई और महेश का हाथ झटककर बोली- “बताइये- मम्मी ने हमें यही बताया था?”

“बेटी, तुम्हारे डैडी ने गलती ही ऐसी की थी।”

“क्या गलती की थी?”

“वह तुम्हारे स्कूल के सामने भीख मांग रहे थे, जबकि तुम उस स्कूल में गाड़ियों में बैठ कर जाते हो।”

“उनके पास पेट भरने के लिए फूटी कौड़ी नहीं है। सिर छिपाने के लिए झोपड़ी तक नहीं। पहनने के कपड़े नहीं हैं। उन्हें कोई नौकरी नहीं देता। मजदूरी कर पाने की उनमें ताकत नहीं। हमारा जेब-खर्च इसलिए नहीं लेना चाहते कि मम्मी नाराज होगी। ऐसी हालत में वह भीख न मांगें तो क्या करें?”

“चलो बेटी, हम मान लेते हैं कि हमसे भूल हो गई। हमें माफ कर दो।”

“आपने हमें थोड़े ही मारा है जो हमसे माफी मांग रहे हैं।” दीपू बोला।

“आपने डैडी को मारा है। आपको उन्हीं से माफी मांगनी पड़ेगी।” डॉली ने कहा।

“डॉली!” सुषमा गुस्से से चीख उठी।

“तुम चुप रहो, महेश ने सुषमा को रोका और डॉली तथा दीपू के सिरों पर हाथ फेरकर बोला-

“अच्छा बच्चो, हमने तुम्हारे डैडी के साथ गुस्ताखी की थी। हम तुम्हारे डैडी से माफी मांग लेंगे। चलो, अब तो खाना खा लो।”

“नहीं हम खाना नहीं खायेंगे।”

“अब क्या बात है?”

“हमारे डैडी भूखे होंगे। पता नहीं उन्हें खाना मिला होगा या नहीं। जब तक हमारे डैडी को खाना नहीं मिलेगा, हम भी खाना नहीं खायेंगे।”

“तुम कब तक भूखे बैठे रहोगे?”

“जब तक डैडी हमारे सामने खाना नहीं खायेंगे।”

“लेकिन इतनी रात गये तुम्हारे डैडी को कहां ढूंढ़ते फिरेंगे।?”

“हम कुछ नहीं जानते।”

“क्या तुम लोगों को अपनी मम्मी और अंकल से बिल्कुल भी प्यार नहीं है?”

डॉली और दीपू ने दोनों को देखा और सिर झुकाकर धीरे से बोले- “है?”

“क्या तुम यह चाहते हो कि तुम्हारे साथ हम लोग भी भूखे रहें?”

“मैं तुमसे वायदा करता हूं कि कल तुम्हारे डैडी से माफी मांग लूंगा और कल तुम उन्हें खाना खाते हुए देख लोगे।”

“पक्का वायदा।”

“हां बच्चों।”

“हमारी दो शर्तें और भी हैं।”

“बोलो।”

“डैडी के पास रहने को जगह नहीं है। वह अब यही रहेंगे।”

सुषमा के चेहरे पर भूचाल-सा दिखाई दिया। वह कुछ कहने ही वाली थी कि महेश ने उसे रोककर बच्चों से कहा‒“चलो मंजूर है‒दूसरी शर्त?”

“दूसरी शर्त यह है-डैडी के पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं। उनके लिए बहुत सारे कपड़े भी सिलवाए जायेंगे।”

“मंजूर।”

“याद रखिए अंकल, अगर आपने वायदा पूरा न किया तो हम दोनों स्कूल से लौटकर नहीं आयेंगे। डैडी के साथ फुटपाथ पर ही रहा करेंगे।”

“फुटपाथ पर रहें तुम्हारे दुश्मन।”

थोड़ी देर बाद वे सब डाइनिंग टेबल पर खाना खा रहे थे।

सुषमा को ऐसा लगा रहा था जैसे वह खा न रही हो बल्कि जबरदस्ती निगल रही हो।

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सुषमा की आंखों से नींद गायब हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि वह अब जिन्दगी भर सो न सकेगी। उसका दिमाग भारी-भारी था। बार-बार आंखें भर आती थीं। कभी-कभी जी में आता कि आत्महत्या कर ले। लेकिन फिर सोचती कि उसके मर जाने के बाद बच्चों को कृष्ण के साथ रहना पड़ेगा। इनके भविष्य का क्या होगा? अचानक कपड़ों की सरसराहट सुनकर वह चौंक पड़ी।

उसने देखा खिड़की के पास महेश खड़ा था।

“तुम अभी तक जाग रही हो, सुषमा।”

“क्या करूं, नींद ही नहीं आ रही।”

“बेकार अपना दिमाग परेशान कर रही हो।”

“महेश, क्या कृष्ण सचमुच कल यहां आ जाएगा?”

“बच्चों की खुशी के लिए यह जहर पीना ही पड़ेगा।”

“जानते हो, उसके आने के बाद क्या होगा?”

महेश ने ठंडी सांस भरकर कहा-

“जो कुछ भी होगा उसे भुगतना ही पड़ेगा।”

“मैं उसे अच्छी तरह जानती हूं। वह जहरीला नाग है। तुमने उसे मेरे कारण मारा है। इस घर में आते ही वह पहला वार तुम ही पर करेगा।”

“मैं मर्द हूं सुषमा, उसका वार सह लूंगा। लेकिन मैंने तो अपनी जिन्दगी इस वार के लिए बचाकर रखी है जो वह तुम पर करेगा।”

“महेश!” सुषमा रो पड़ी।

महेश का हाथ फिर उसकी ओर तसल्ली देने के लिए बढ़ा। लेकिन सच में ही रुक गया।

उन दोनों को यह पता नहीं था कि खिड़की के पास ही डॉली और दीपू खड़े हैं और उन दोनों की बातें चुपके से सुन रहे हैं।

फिर जब महेश वहां से हट गया तो वे दोनों अपने बिस्तर पर जा लेटे। दोनों अभी तक इस खुशी में जाग रहे थे कि डैडी अब घर आ जायेंगे।

डॉली ने करवट बदलकर दीपू की ओर देखा। दीपू भी उसकी ओर देख रहा था।

“दीदी, डैडी के घर आने से मम्मी इतना क्यों डरती है?”

“पता नहीं।”

“और अंकल इतनी रात गए छिप-छिपकर मम्मी से बातें क्यों करते हैं?”

“यही तो मैं भी सोच रही हूं।” डॉली ने कान के पीछे हाथ रखा और फिर कोहनी बिस्तर पर टिकाकर बोली, “डैडी भी तो कुछ ऐसी ही बात कह रहे थे कि मैं घर में होता तो तुम्हें दिखाता सब कुछ। और बस...... इतनी सी बात पर अंकल ने डैडी को मारना शुरू कर दिया था।”

“तो क्या दिखाते डैडी हमें?”

“यही जो हमने अभी-अभी देखा है।”

“लेकिन यह तो कोई खास बात नहीं थी।”

“तुम नहीं समझ सकोगे दीपू। तुम अभी बच्चे हों”

“मम्मी डैडी को जहरीला नाग क्यों कह रही थीं?”

“पता नहीं। अब सो जाओ। कल तो डैडी यहां आ ही जायेंगे।”

फिर वे दोनों आंखें मूंदकर सोने की कोशिश करने लगे। डैडी के कल घर आ जाने की खुशी से उनके बदन में खुशी की लहरें दौड़ रही थीं।

28

कृष्ण फ्लैट में आकर बहुत खुश था। दीपू और डॉली उसके दोनों हाथ पकड़े उसे फ्लैट दिखाते फिर रहे थे।

“यह देखिए डैडी, यह किचन है।”

“यह टॉयलेट है।”

“यह स्टोर-रूम है।”

“यह मेरा और दीपू का बेडरूम है।”

“भई वाह। बहुत सुन्दर सजा हुआ है तुम्हारा बेडरूम।”

“मम्मी ने खुद सजवाया है।”

“बहुत प्यार करती है तुम्हारी मम्मी तुम्हें।”

“हां, बहुत प्यार करती हैं।”

“हैं भी तो बहुत अच्छी। उन्हें तो सारा देश ही प्यार करता है।”

“क्या मतलब?”

“कुछ नहीं-कुछ नहीं! हां, तुम्हारी मम्मी का बेडरूम कहां है?”

वे लोग कृष्ण को कारीडोर में ले आए और फिर एक कमरे की ओर इशारा करके बोले- “वह रहा मम्मी का बेडरूम।”

“और उसके बराबर वाला कमरा?”

“वैसे तो यह गैस्ट-रूम है। लेकिन आजकल इसमें महेश अंकल रहते हैं।”

“वैरी गुड, अब हम तुम्हें एक सरप्राइज दें।”

“जरूर डैडी।”

“आज हमने तुम्हें खूब बुद्धू बनाया।” कृष्ण ने ताली बजाकर कहा।

“वह कैसे डैडी?”

“तुम जो फ्लैट हमें दिखा रहे हो इस फ्लैट में हम चार साल तक रह चुके हैं।”

“सच-?”

“हां बच्चो। और जिस कमरे में तुम्हारे अंकल रहते हैं यह हमारा बेडरूम था।”

“अच्छा-!”

“खैर जाने दो। अब तुम डैडी को ले तो आए। लेकिन डैडी रहेंगे कहा? रात को सोया कहां करेंगे?”

“आप हमारे कमरे में सोया कीजिएगा डैडी।”

“जब तुम डैडी को फुटपाथ पर से घर ला सकते हो तो यह नहीं कर सकते कि जिस बेडरूम में डैडी पहले सोया करते थे, उसी में सोया करें।”

“लेकिन इसमें तो अंकल रहते हैं।” डॉली बोली।

“कोई बात नहीं। हम ड्राइंग-रूम में सोफे पर सो जाया करेंगे।”

“वाह, यह कैसे हो सकता?” दीपू बोला।

“हां डैडी, आप अपने ही बेडरूम में सोयेंगे।”

“लेकिन क्या तुम्हारी मम्मी यह बात मान जायेंगी?”

“मानेंगी क्यों नहीं? उन्होंने हमारी बात मानकर ही तो आपको बुलवाया है।”

“ठीक है। कोशिश करके देख लो।”

डॉली ने जोर से पुकारा- “जूली-ऐ-जूली-!”

“आई बेबी।”

थोड़ी देर बाद जूली आ गई।

बीस, इक्कीस वर्ष की सुर्ख-सफेद और स्वस्थ जूली। जिसके होंठों से रस टपका पड़ रहा था।

उसे देखते ही कृष्ण के मुंह में पानी भर आया। वह होंठों पर मीठी-सी मुस्कराहट लाकर बोला- “अरे जूली, कितनी बड़ी हो गई है तू!”

“हां बड़ी भी हो गई हूं और तगड़ी भी,” जूली नथुने फुलाकर बोली, “उस दिन एक छोकरे ने सीटी बजा दी थी तो चार दांत तोड़कर उसके हाथ पर रख आई थी। समझे।”

“समझ गया, समझ गया।” कृष्ण जल्दी से बोला।

“आप जूली को जानते हैं डैडी?” डॉली ने आश्चर्य से पूछा।

“बेबी, तुम जरा और बड़ी होतीं तो तुम भी यह जानती होतीं कि तुम्हारे डैडी मुझे जानते हैं।”

“अरे जूली, तुझे तो अभी तक मजाक करने की आदत है।”

“बेबी, कम बोलो।” जूली ने झटके से कहा।

“जूली, जिस बेडरूम में अंकल रहते हैं आज से उसमें डैडी को सोया करेंगे।”

“व्हाट? और अंकल कहां रहेंगे?”

“अरे, यह तो अपनी मालकिन से पूछो। बच्चे कोई एडमिनिस्ट्रेटर होते हैं।” कृष्ण मुस्कराकर बोला।

जूली ने उसे खूंखार नजरों से देखा और फिर पलटकर चली गई।

वह उस कमरे में पहुंची जहां सुषमा बैठी हुई थी। उसका चेहरा इस तरह दिखाई दे रहा था जैसे उसे हत्या के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया हो और किसी भी समय उसे फांसी की सजा सुनाई जा सकती हो। वह जूली को देखकर उछल पड़ी और कांपती हुई आवाज में बोली-

“क्या हुआ जूली?”

“कुछ नहीं मेम साब। अब हम इधर काम नहीं करेगा।”

“वह बदमाश देखते ही बोला- ओह!, जूली, तू इतनी बड़ी हो गई है। मैंने भी सुनाकर कह दिया कि मैं सीटी बजाने वाले के भी चार दांत तोड़ देती हूं। मेम साब, हम लोग को उसकी सूरत से नफरत है। मैं और दर्शन कल चले जायेंगे।”

“नहीं, जूली। भगवान के लिए ऐसा न करना। तुम नहीं जानती, तुम्हारे और दर्शन के यहां होने से मुझे कितना सहारा मिलता हैं। घर में दिन भर न बच्चे रहेंगे और न महेश बाबू। घर इसके भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। और न मैं इसके साथ घर में अकेली रह सकती हूं। याद करो जूली, तुम्हारी इज्जत पर हाथ डालने के कारण ही मैंने इसे घर से निकाला था। क्या तुम आज मेरा साथ छोड़कर चली जाओगी?”

“सॉरी मेम साहब, मैं और दर्शन तो दस जन्मों तक आपका साथ नहीं छोड़ेंगे। हमें माफ कर दीजिए।” जूली ने रुंधे गले से कहा।

“तुम कितनी अच्छी हो जूली।”

“वह बदमाश एक नया लफड़ा फैला रहा है।”

“क्या?”

“उसने बेबी और बाबा पर न जाने क्या जादू कर दिया है। वे दोनों कह रहे हैं कि वह उस कमरे में सोयेगा जिसमें महेश बाबू सोते हैं।”

“व्हाट!” सुषमा क्रोध में तमतमा उठी, “और महेश बाबू कहां सोयेंगे?”

“वह कहता है यह बात मेम साब से पूछो। बच्चे कोई एडमिनिस्ट्रेटर थोड़े ही हैं।”

“तो उसने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी,” सुषमा दांत पीसकर बोली, “लेकिन यह असम्भव है। महेश बाबू को उस कमरे में से कोई नहीं निकाल सकता। जाकर बच्चों से कह दी कि उनकी बहुत बड़ी जिद पूरी हो गई है। अब और जिद न करें। अपने डैडी को अपने कमरे में सुला लें या फिर बाहर बरामदे में।”

जूली जाने ही लगी थी कि महेश ने आते हुए कहा-

“ठहरो जूली, न-न.... बच्चों से ऐसा मत कहना जिससे उन में जिद पैदा हो जाए। इस तरह तो कृष्ण की पकड़ उन पर और मजबूत होगी।”

“तो क्या तुम्हें बरामदे में सुला दूँ?”

“नहीं। मैं ड्राइंग-रूम में सो जाऊंगा।”

“और तुम्हारा सामान?”

“उसे जूली या दर्शन के कमरे में रखवा दो।”

“बाबूजी, हम यह नहीं देख सकते कि हम कमरे में सोयें और आप सोफे पर। मैं अपना कमरा आपके लिए खाली किए देती हूं। आपका सामान वहीं रख देती हूं।” जूली ने कहा।

“लेकिन फिर तू कहां सोयेगी?”

“मालकिन के कमरे में फर्श पर। अब मालकिन का अकेले सोना ठीक नहीं है। हमारे सामने जो कोई मालकिन की ओर आंख भी उठाकर देखेगा, मैं उसकी आंखें निकाल लूंगी।”

“तभी डॉली दौड़ती हुई आई। वह महेश को देखकर ठिठक गई। फिर संभलकर बोली, “अंकल, डैडी के लिए रेडीमेंट कपड़े और जूते खरीदने हैं। कुछ रुपए देंगे आप?’

महेश ने जल्दी से मुस्कराकर कहा, “हां-हां बेटी, क्यों नहीं। कितने रुपए चाहिए?”

“डैडी कह रहे थे दस हजार काफी रहेंगे।”

सुषमा ने कुछ कहना चाहा लेकिन महेश ने इशारे से रोक दिया और बटुए से दस हजार के नोट निकालकर डॉली को देकर कहा- “लो बेटी, खूब अच्छे-अच्छे कपड़े खरीदना अपने डैडी के लिए।”

फिर वह दरवाजे के पास ही कृष्ण को देखकर चौंक पड़ा।

सुषमा ने होंठ भींचकर पीठ फेर ली।

डॉली ने कृष्ण को रुपए देकर कहा, ‘यह लीजिए डैडी, चलिए शॉपिंग को।”

“जरूर जरूर-लेकिन क्या ये रुपए तुम्हारे अंकल ने अपनी जेब से दिए हैं?”

“हां। घर का सारा हिसाब-किताब उन्हीं के पास रहता है।”

“बहुत खूब- बहुत खूब- नौकर हो तो इतने भरोसे का।”

फिर वह हंसता हुआ डॉली के साथ चला गया।

सुषमा एक झटके के साथ मुड़ी और आंसू-भरी आंखों से महेश की ओर देखते हुए भारी आवाज में बोली- “बर्दाशत की भी एक सीमा होती है, महेश बाबू।”

“और क्या!” जूली ने गुस्से से कहा, “हरामी आपको नौकर कहता है, जिसने मेम साब को घर पर बैठा दिया और लाखों कमाकर देते हैं।”

“जूली, बुरी बात है। वह डॉली और दीपू का बाप है।”

“ऊंह।” जूली ने झटके से कहा और बाहर चली गई।

“मैंने तुमसे कहा था ना कि घर में आते ही इसका पहला वार तुम पर ही होगा।”

“तुम मेरी चिन्ता मत करो।” महेश मुस्कराकर बोला, “मैंने तो अपना जीवन उस दिन के लिए समर्पित कर रखा है जिस दिन वह तुम्हारे साथ कोई हरकत करेगा। वह दिन मेरी जिन्दगी का आखिरी दिन होगा।”

“महेश!” सुषमा की आवाज कांप उठी।

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