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डॉली का मुंह बन गया था, और वह चुपचाप खाना खाने लगी, राज चुपचाप डॉली को खाना खाते हुए देख रहा था, उसने काकी की तरफ देखते हुए कहा ,काकी महारानी का कहना है कि मैं भी कथा सुनने चलू तू एक काम कर तू आकर मुझे यहीं सुना दिया कर ,, वहां पंडित तेरे को जो भी बताएगा ना अपुन यही सुन लेगा उसको ,
काकी चुपचाप दोनों के तमाशे देख रही थी पर काकी ने तो हमेशा डॉली का ही पक्ष लिया है ,उसने समझाया की डॉली सही कह रही है ,पहले वह भी नहीं जा रही थी ,लेकिन आज वह गई और उसको बहुत अच्छा लगा मैं तो कहती हूं एक-दो दिन तू भी चल ढावे से जरा बाहर निकल ,,स्कूल ना सही कम से कम कथा पुराण तो सुन ले,,
राज ने खाता खत्म किया और हाथ धोने के लिए बाहर चला गया, डॉली का भी खाना खत्म हो चुका था,उसने अपनी और राज की थाली उठाकर बाहर रखी ,और राज के आने से पहले ही अपने कमरे में चली गई राज वापस आया तो देखा कि डॉली वहां नहीं है, वह समझ गया कि डॉली उसकी बात पर गुस्सा हो गई है, पीछे पीछे उसके कमरे तक चला गया ,जब देखा तो डॉली चादर ओढ़ कर लेट गई थी ,राज ने तेज आवाज में बोलते हुए कहा, महारानी मुंह फुलाने की जरूरत
नहीं है ,देखता हूं अगर कल मुझे समय मिला तो मैं आ जाऊंगा थोड़ी देर के लिए ,और इतना कहकर कमरे से बाहर निकल गया ,डॉली चादर से मुंह ढक कर लेटी थी, राज की बात सुनकर उसके होठों पर हंसी आ जाती है,,,,
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दूसरे दिन भी डॉली के मन में कथा सुनने की ललक बहुत ज्यादा थी ,और उसने निश्चय कर लिया था कि वह आज भी शिवपुराण की कथा सुनने जरूर जाएगी ,वह जल्दी ही उठी घर के सारे काम किये ,बल्कि रात तक का खाना बनाकर उसने सुबह ही रख दिया था ,जिससे कि वह टाइम से पहले और पूरे टाइम तक कथा अच्छे से सुन पाए, डॉली टाइम से तैयार हो गई ,और आंगनबाड़ी जाते जाते एक बार फिर उसने राज को टाइम पर तैयार होने के लिए बोल दिया था सिवा ने उसकी तरफ देखा पर कोई जवाब नहीं दिया ,डॉली ने पर्स उठाया और आंगनवाड़ी चली गई ,आंगनबाड़ी में भी डॉली ने अच्छे से सारा काम कर लिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थी किस शिव पुराण सुनने में आंगनवाड़ी की किसी छूटे काम की वजह से उसका ठीक से मन ना लगे ,वह पुराणको पूरे एकाग्र चित्र के साथ सुनना चाहती थी ,शाम को ठीक 500 बजे डॉली घर आ चुकी थी ,आकर उसने जल्दी से हाथ मुंह धोया ,तब तक काकी ने चाय बना ली काकी चाय लेकर जैसे ही कमरे में आई तो देखा कि राज भी ढावे
से आ चुका है, तीनों ने चाय खत्म की और पुराण में जाने के लिए तैयार हो गए, डॉली आज और भी अच्छे से तैयार हुई थी ,जल्दी-जल्दी डॉली और काकी ने घर बंद किया , बाहर निकल कर ताला लगाते हुये चाबी पर्स में डाली ,और पुराण सुनने चल पड़ी, लेकिन तभी राज का फोन बज उठा और राज को याद आया कि आज कुछ लोग उसके ढाबे पर शहर से आ रहे हैं और ऐसे में राज का रुकना जरूरी था क्योंकि वह हाई-फाई लोग थे, और उनको अटेंशन देना जरूरी था , इसलिए चाहते हुए भी राज वहां नहीं जा सकता था
उसने डॉली की तरफ देखकर दोनों कान पकड़े और सॉरी बोलते हुए माफी मांगी महारानी तू तो समझती है कि अपुन के लिए काम से जरूरी कुछ नहीं है
अपुन नहीं चाहता कि कोई कस्टमर आकर अपुन के ढाबे पर लफड़ा करे,क्योंकि अपुन ने पहले ही उनसे वादा कर लिया था कि आ उनको पूरा अटेंशन देगा, तो सॉरी पर तू चिंता मत कर आज नहीं तो ना सही पर कल तेरे साथ जरूर चलेगा,,,
अब चूँकि राज का काम ही ऐसा था कि किसी भी समय करना पड़ जाए, इसलिए डॉली ने भी कुछ नहीं कहा, और डॉली काकी के साथ ही पुरान में चली गई
दोनों पुरान में आ चुकी थी,पंडित जी आज आगे की कथा का वर्णन सुनाने वाले थे जिसमें शिव के प्रति पार्वती के प्रेम की अनुभूति को दिखाया जाना था
डॉली कथा सुनने के लिए पूरी तरह से तैयार बैठी थी , कथा की शुरुआत आरती के साथ हुई ,और फिर पंडित
जी ने पुनः कथा का प्रारंभ किया ,कल कथा का समापन जहां पर हुआ था ,उससे आगे की कथा आज सुनाने वाले थे ,पंडित जी ने कथा सुनाना प्रारंभ किया ,,,,,,
//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svgओम नमः राजय //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg
जब सती का पूरा शरीर छत विक्षत होकर समाप्त हो गया, तब शिवजी घोर तपस्या में बैठ चुके थे ,और उसी बीच मां पार्वती का जन्म हिमालय पुत्री के यहां नैना देवी की कोख से हो चुका था ,नारद जी ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी, की पार्वती श्री शिव की धर्मपत्नी बनेंगी, और इन दोनों का विवाह निश्चित है ,लेकिन इस बात का भान ना तो शिव को था, ना ही पार्वती मैया को पर जैसे-जैसे मां गौरा बड़ी होती गई अपने आप ही शिव के लिए उनका प्रेम बढ़ता गया श्री शिव के लिए उनकी श्रद्धा और विश्वास अनंत थी ,जहां एक तरफ शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे ,वहीं दूसरी तरफ पार्वती धीरे-धीरे उनके प्रेम में डूबती जा रही थी, जब पार्वती को पूर्ण रूप से यह ज्ञान हो गया कि वह पूरे मन से शिवजी का वरन कर चुकी है ,श्री शिव के बिना उनका जीवन अधूरा है श्री शिव को पाना ही उनके जीवन का लक्ष्य और धर्म है, क्योंकि वह मन से पूर्ण रुप से शिव की हो चुकी है ,अतः वह सारे प्रयत्न करने लगी थी, कि वह शिव को पति के रूप में पा सकें ,लेकिन वहीं दूसरी तरफ तपस्या में बैठे लीन श्री शिव को अभी तक मां गौरा के प्रेम का कोई भान नहीं था ,क्योंकि वह पूरी तरह से अपनी तपस्या में लीन थे,
नर नारी ,देवता ,स्वर्ग लोक और पृथ्वीलोक के सभी बासी यही चाहते थे कि मां गौरा और शिव का विवाह हो ,लेकिन इस विवाह में जो सबसे बड़ी विडंबना थी, वह थी श्री शिव का तपस्या से जगाना जो सबसे असंभव कार्य था ,जब तक राज स्वयं इस तपस्या से नहीं उठ जाते ,तब तक यह किसी के बस की बात नहीं थी ,अतः शिव का इस तपस्या से जागना अत्यंत आवश्यक था,, पर पार्वती के साथ सभी का इसमें पूरा सहयोग था कि शिव तपस्या से जागृत हो, और माता पार्वती से विवाह रचाये, क्योंकि यही सृष्टि का नियम है ,कि एक स्त्री और पुरुष ऐसे दो लोग जिनमें सच्चा प्रेम हो ,जब वह अपने गृहस्थ जीवन को शुरू करते हैं ,तभी इस समाज का विकास संभव हो पाता है ,अतः अब माँ पार्वती का कर्तव्य था ,,कि कैसे भी विवाह के लिए उन्हें मनाये ,,, चाहे तपस्या करके या फिर किसी दूसरे उपाय से ,लेकिन यह परीक्षा मां पार्वती की ही थी ,कि उन्हें अपने प्रेम की शक्ति से शिव को आकर्षित करना ही होगा, और तभी यह संभव हो पाएगा कि वह श्री शिव को अपने वर के रूप में प्राप्त कर सके,,,,
और जब मां पार्वती इस बात को भलीभांति समझ चुकी, तो वह शिव को प्राप्त करने के जतन करने लगी, अब उनकी तपस्या तभी पूरी मानी जाती जब वह श्री शिव को अपने पति के रूप में वर लेती इसी के साथ आज की कथा समाप्त होती है, कल की कथा का श्रवण करने के लिए सभी बहन और भाई सही समय पर पंडाल में आ जाए ,,,इसके साथ आरती और प्रसाद
वितरण हुआ और सभी अपने अपने घर आ गए ,,,
आज घर आकर डॉली ने काकी से कोई भी सवाल नहीं किया था ,उसकी समझ में आ चुका था किसी की पार्वती मैया ने शिवजी से ही सच्चा प्रेम किया ,उन्हें इस बात का एहसास हो गया था ,और इसीलिए उन्हें प्राप्त करने के लिए वह सभी जतन करने लगी थी, कि चाहे कुछ भी हो शिव जी को पाना ही उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया था डॉली को एक बात अच्छी तरह से समझ आ गई थी ,कि जब दो लोगों के बीच प्रेम होता है और वह प्रेम की सच्ची अनुभूति को समझ जाते हैं ,तो फिर उसे पाना गलत नहीं होता उसे शिव पार्वती की कथा बहुत पसंद आई थी ,अभी तक डॉली सिर्फ पढ़ाई ,घर के काम और आंगन बाड़ी में ही व्यस्त रहती थी
पर शिव पार्वती की कथा सुनकर उसने जाना कि हर इंसान के जीवन में एक प्रेम का अध्याय भी होता है ,जिसे वह कभी ना कभी जरूर महसूस करता है, चाहे वह त्रिलोकनाथ शिव और गौरी मैया ही क्यों ना हो ,राधा कृष्णा ,सीताराम ,यह सभी अनूठे प्रेम के उदाहरण है, डॉली के मन में प्रेम का अंकुर फूट चुका था ,उसे कुछ ऐसी चीजें महसूस हो रही थी ,जो वह ठीक से समझ नहीं पा रही थी, लेकिन कहीं ना कहीं वह सारी बाते उसे कुछ सोचने पर मजबूर तो कर रही थी ,डॉली शिव पार्वती की कथा सोच सोच कर बहुत अच्छा महसूस कर रही थी मां गौरा मैया के असीम प्रेम को देखकर सोच रही थी ,कि क्या सबके जीवन में
कुछ पल ऐसे जरूर आते है ,जब वह किसी से प्रेम करता है ,और क्या मेरे जीवन में भी ऐसा कोई पल आएगा ,जब मैं किसी से प्रेम करूंगी ,अपनी बात पर सोच कर डॉली को हंसी आ गई थी ,कि क्या उसे भी मां पार्वती की तरह ही किसी को पाने के लिए जतन करने होंगे, या फिर उसके शिवजी खुद ही उसके पास आ जाएंगे, तभी काकी की आवाज से डॉली की तंद्रा टूटी ,,
जैसे ही राज घर आया तो काकी ने राज को सुनाते हुए कहा ,,,
राज तू भी ना किसी औघड़ से कम नहीं है जैसा तेरा नाम है राज, वैसा ही तेरा काम जहां एक तरफ भगवान शिव अपनी धूनी में रम जाते थे ,तू बिलकुल उसी तरह ढावे में रम जाता है ,ना तुझे दुनियादारी से कोई मतलब ,ना अपने जीवन से ,,
भगवान शिव तपस्या में लीन रहते है और तू भी यह कहते कहते काफी जोर से हंस दी थी डॉली काकी की बात को बहुत ध्यान से सुन रही थी ,डॉली ने काकी के पास जाकर पूछा काकी आपने ऐसा क्यों कहा,
कहा कि राज भी भगवान शिव के जैसे है काकी ने हंसते हुए कहा ,,,,
और नहीं तो क्या, तू देखती नहीं है उसको जैसे शिवजी अपनी धूनी में रहते थे, वह अपने ढावे में रमा रहता है, उसके दिल में तुझे दूर दूर तक प्रेम दिखता है क्या
बस अपनी दुनिया से मतलब है उसे ,अरे मैं तो कहते-कहते थक गई हूं ,कि अपने लिए कोई लड़की
देख कर घर बसा ले ,लेकिन उसे तो इन सब बातों से कोई मतलब ही नहीं अरे क्या पूरी जिंदगी क्वांरा ही रहेगा
उमर हो गई है घर बसा कर एक दो बच्चे पैदा कर ले ,तो मैं भी सुख से मर सकूं,, जैसे शिवजी को अपने जीवन की कोई चिंता नहीं थी ,सच कहती हूं डॉली अगर पार्वती मैया आकर शिव की तपस्या भंग ना करती
और पति के रूप में उन्हें पाने की जिद ना करती तो शिव जन्म जन्मांतर तक अपनी धूनी में ही रमे रहते ,जब मां पार्वती ने आकर उनकी तपस्या की उनको पाने की ज़िद की और सब ने उनका साथ दिया, तब कहीं जाकर वह शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त कर पाई, में भगवान से यही प्रार्थना करती हूं ,कि उन्होंने मेरे राज के लिए भी कहीं कोई पार्वती मैया जन्मी हो ,जो आकर इसकी तपस्या भी भंग करें और इसे अपना पति बनाये, तभी इसकी शादी हो पाएगी नहीं तो मुझे नहीं लगता कि यह कभी किसी लड़की से कुछ कहेगा ,तब तक राज हाथ धोकर खाना खाने आ चुका था ,काकी अंदर रसोई में थालियां लगा रही थी ,और डॉली ने चटाई बिछाकर पानी रखा सलाद रखा और अंदर खाना परसने में मदद करवाने लगी काकी के कहे हुए शब्द डॉली के दिमाग में बार-बार आ रहे थे ,कि राज भी भगवान शिव की तरह ही है, डॉली काकी की बात सोच कर मुस्कुरा रही थी, सच में राज की आदतें तो बिल्कुल वैसी ही थी ,
बस राज के बारे में ही सोच रही थी ,जब थाली देख लेकर आई और राज को देने लगी तो वह उसे देखे जा रही थी
राज ने डॉली के हाथ से थाली लेते हुए कहा ओ सहजादी मुझे थाली देगी भी ,या फिर ऐसे ही पकड़ के खड़ी रहेगी
और थाली लेकर खाना शुरू कर दिया
तब तक डॉली और काकी भी अपनी
थालिया लेकर आ चुकी थी
और तीनों एक साथ खाना खाने लगे राज खाना खाते हुए बोला,,,,
काकी अपूण तेरे साथ नहीं आ पाया तू बता ना क्या हुआ था वहां
काकी ने कहा तेरी तो सब समझ से परे है लेकिन आज शिवजी और पार्वती मैया के प्रेम की कथा का वर्णन किया था पंडित जी ने ,अरे तू तो इन सब बातों से कोसों दूर है तुझे क्या समझ आएगा ,तभी तो कहा था तू भी 4 शब्द सुन लेता,
काकी जब तेरे पास टाइम होगा ना तू अपन को सुना देना,,,
डॉली खाना खाते हुए बीच-बीच में राज को देखती जा रही थी, उसे सच में काकी की कही बात सही लग रही थी, कि किस तरह से राज में शिव जी के जैसा रूप ही है काकी ने ये बात मजाक में कही थी ,लेकिन डॉली ने बहुत बार सोचा और उसे राज का एक अलग ही रूप दिखा,,,,,
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डॉली और काकी हर रोज कथा सुनने जाती थी ,कथा पूरे 8 दिनों तक चलने वाली थी और अभी 5 दिन निकल भी चुके थे, लेकिन रोज कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता जिससे राज वहां जाने से रह जाता ,अब तक शिव पार्वती के विवाह का वर्णन भी हो चुका था आज कथा का छठवां दिन था, ढाबे पर कोई खास काम भी नहीं था ,राज फ्री था तो उसने आज कथा में जाने का पक्का इरादा कर लिया था ,डॉली और काकी रोज की तरह तैयार होकर कथा के लिए निकल गई राज भी बस धावे पर कुछ काम समझा कर कथा में जाने के लिए तैयार ही हो रहा था
15 मिनट में राज काम से फ्री होकर ढाबे पर सारा काम समझा कर कथा सुनने के लिए निकल गया , वैसे राज के लिए यह बिल्कुल नई बात थी ,क्योंकि वो भंडारे कथा पूजा से बहुत दूर रहता था ,इन सब का व्यवहार काकी ही निभाती थी, लेकिन अभी काकी और डॉली रोज कथा सुनकर आती और राज को समझाती, तो सुन सुन के उसका भी मन हो गया था कि आखिर एक बार जाकर सुनु कि पंडित ऐसा बोलता
क्या है, कि सब लोग वहां जाकर अपना अपना टाइम खोटी करते हैं, राज मजाक के मूड में ही सही ,पर कथा सुनने पंडाल में आ चुका था ,पीछे पड़ी हुई कुर्सियों में सबसे पीछे वाली कुर्सी राज को खाली दिखी ,और वह वही जाकर चुपचाप बैठ गया, तब तक आरती संपन्न हो चुकी थी , और पंडित जी कथा का प्रारंभ करने ही वाले थे ,
आज समुद्र मंथन से संबंधित सारी बातें कथा में बताने वाले थे पंडित जी ने,,,,
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के साथ ही कथा सुनाना प्रारंभ किया
जब समुद्र मंथन प्रारंभ हुआ तो समुद्र में से एक से एक दुर्लभ अमूल्य और आश्चर्यजनक वस्तुएं निकलना प्रारंभ हो गई, कुछ वस्तुएं बहुत ही सुंदर थी, कुछ अमूल्य थी, समुद्र मंथन में मां लक्ष्मी जी निकली, जिन्हें श्री विष्णु को सौंपा गया ,कभी ना मुरझाने वाली कमल फूल की माला ,जिसे इंद्र के सुपुर्द कर दिया गया, एरावत हाथी ,उच्चेश्रेवा घोड़ा इस तरह एक से एक अमूल्य वस्तुये समुद्र मंथन से निकलती गई, और इनमें देवता और दानवों में बंटवारा होता गया ,उसके बाद अमृत से भरा कलश जिसको देवताओं ने दानवों को धोखे में रखकर खुद ही ग्रहण कर लिया, क्योंकि यह पृथ्वी के हित में था, और जब हलाहल विष से भरा घड़ा निकला तो सारे देवताओं के शरीर जलने लगे ,विष
के प्रभाव से हाहाकार मच गया, पर देवों के देव महादेव ने उस हलाहल विष को अपने कंठ में रखा ,और सब को निश्चिंत किया,
तभी तो श्री शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है, विश्व जगत के भले के लिए उन्होंने खुद के कंठ में विष को रख लिया पंडित जी इस कथा का पर्याय समझाने लगे कि श्री शिव तो महा शंभू थे तो उन्होंने विष से भरा हुआ घड़ा अपने कंठ में उड़ेल लिया लेकिन आज के मनुष्य में इतनी शक्ति नहीं है पर अगर हमारा मन अच्छा हो ,हम दूसरों के लिए निस्वार्थ रूप से मन में अच्छे भाव रखते हो ,तो उसके लिए कुछ अच्छा सोच सकते हैं ,अगर किसी मनुष्य से सच्चा प्रेम करता है, तो स्वार्थ से परे होकर उसके भले के बारे में सोच सकता है, अपना स्वार्थ ना देखते हुए उस इंसान के साथ हम क्या अच्छा कर सकते हैं ,कलयुग में अगर हमने इतना कर लिया, या इतना सोच लिया तो हमारे लिए यही श्री महा शिव का आशीर्वाद होगा ,और अगर कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने स्वार्थ से परे होकर किसी और के भले के बारे में सोच सकता है ,तो कलयुग में उसे भी भगवान शिव का ही रूप मान सकते हैं ,पर आजकल ऐसे मनुष्य होते ही कहां है जो किसी और का भला सोच पाए
आजकल तो सब अपने ही स्वार्थ में लिप्त होते हैं ,,परम धर्म वही है ,सच्चा प्रेम वही है जब हम किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में और उसके भविष्य के बारे में कुछ अच्छा करने का सोचते हैं ,और इसी के साथ
आज की कथा समाप्त हो चुकी थी,,,,,
भीड़ भाड़ में तो पता नहीं चला पर रास्ते में काकी और डॉली को वहां से लौटते हुए राज दिख गया था ,और काकी बहुत खुश थी, कि आखिर राज एक दिन कथा सुनने आ ही गया ,घर आकर जब काकी ने काम करते हुए राज से पूछा ,,,राज तू कथा में टाइम से तो पहुंच गया था ना
हां काकी अपुन टाइम से पहुंच गया था लेकिन मुझे तो तू कहीं नहीं दिखा ,,,
अरे काकी बह सबसे पीछे वाली कुर्सी खाली पड़ी हुई थी ,तो मैं वहीं बैठ गया था ,पीछे से तुझे कुछ सुनाई भी दिया या फिर ऐसे ही बैठा रहा ,,,,,अरे काकी अपुन ने सुना था ना वह पंडित बता रहा था ,,
कि जो पहले का विलेन होता था ,और दूसरी तरफ से सभी भगवान होते थे, ऐसा कुछ बताया था ना ,अमृत तो मिल बांट के पी लिया ,लेकिन जब साला पॉइजन की बात आई तो अपने भोलेनाथ को पकड़ा दिया
अपुन पूछता है कि उनने पिया कायको
काकी ने समझाया बेटा ऐसे नहीं कहते वह तो त्रिलोकनाथ है, उन्होंने विष दुनिया के भले के लिए पिया था ,अगर वह अपने हलक में इसे न उतारते तो दुनिया का उसी क्षण नाश हो जाता, इसलिए उन्होंने खुद का सुख न देखते हुए दूसरों का सुख देखा ,वह चाहते तो विषपान न करते, अमृत भी पी सकते थे लेकिन वह दुनिया जहां से प्रेम करते थे उसका अच्छा
चाहते थे, इसलिए उन्होंने खुद ही विष पी लिया, और सब को संकट से बचा लिया ,,,,,
हां काकी तू शायद सच्ची कह रही है यह साला आज का आदमी है ना सिर्फ अपना ही अपना स्वार्थ देखता है, कि कैसे भी हो, कुछ भी हो ,उसके साथ सब कुछ अच्छा हो जाना चाहिए ,, दुनिया को आग लगती है तो लग जाए ,,,पर काकी एक बात मेरी समझ में आ गई ,कि जहां हम स्वार्थ नहीं देखते ,और जिससे प्रेम करते हैं ,उसके बारे में सब कुछ अच्छा होता हुआ देखना चाहते हैं, कि बस वह सुखी रहे, और उसकी जिंदगी में सब कुछ अच्छा हो ,काकी भी राज की बातों पर हंसते हुए बोली, बेटा यह तूने बिल्कुल सही बात कही ,पंडित जी की कथा का सार तो यही था,कि इस कलयुग में अगर हम किसी एक इंसान का भी भला पर कर पाए तो हमारा इस पृथ्वी पर जन्म लेना सिद्ध हो जाता है, हां काकी वैसे अपुन को अच्छा लगा कथा सुनकर ,,,,
डॉली बहुत ध्यान से राज के चेहरे की तरफ देख रही थी, क्योंकि उसने 5 सालों में पहली बार राज के मुंह से भगवान का नाम सुना था ,,ऐसा नहीं है कि वह मंदिर ना जाता हो पर बात मंदिर जाने पर ही खत्म हो जाती थी अगर काकी कभी कहती तो उनके साथ मंदिर जाता, और हाथ जोड़कर वापस आ जाता ,बाकी चीजों की गहराई में कभी नहीं उतरा था ,धीरे धीरे 8 दिनों बाद शिव पुराण पूरा हो चुका था, राज बड़ी मुश्किल से एक ही दिन कथा सुनने जा पाया था, और उसकी
समझ में बस इतना ही आया कि हमें खुद के लिए नहीं जीवन दूसरों के लिए जीना चाहिए और अगर हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो निस्वार्थ भाव से ही करना चाहिए जहां स्वार्थ हो ,वहां प्रेम नहीं हो सकता और जहां प्रेम हो वहां स्वार्थ नहीं, क्योंकि इससे आगे पीछे की कथा तो राज ने सुनी ही नहीं थी लेकिन डॉली ने जो कथा सुनी थी उसमें वह शिव और पार्वती के प्रेम की अनुभूति को अच्छी तरह से समझ गई थी, उसने समझ लिया था किस शिव में कौन-कौन सी खूबियां थी, और क्यों गौरी मैया ने उन्हें पाने के लिए तपस्या की थी ,क्योंकि वह शिव को जान चुकी थी, एक ही कथा से डॉली ने कुछ और सीखा था, और राज की छाप उसके मन पर कुछ और ही पड़ी थी ,,,,,
डॉली जब भी राज को कुछ अच्छा करता हुआ देखती उसे हमेशा पंडित जी की कथा की याद आ जाती ,राज का शुरू से ही नियम था कि उसके ढाबे के बाहर से कोई भूखा नहीं गुजर सकता था, रोज 5,,7 लोगों को भरपेट खाना वह फ्री में ही खिलाता था अगर किसी बच्चे के स्कूल की फीस रह गई तो, चुपचाप जाकर उसे जमा कर देता, किसी गरीब के पास चप्पल नहीं है तो फटाफट खरीद कर उसके हाथ में पकड़ा देता , पर राज ने इन सब बातों के बदले कभी कोई उम्मीद किसी से नहीं की थी
वह जुबान का चाहे जितना ही कड़वा हो पर उसका मन बिल्कुल आईने की तरह साफ था डॉली जब भी राज की ऐसी बातों को देखती तो उसके मन में राज के
लिए इज्जत और बढ़ जाती, कथा पुराण हुए दो-तीन महीने बीत चुके थे, इन दो-तीन महीनों में डॉली ने कितनी बार महसूस किया था, की राज के अलावा ऐसा कोई नहीं है जिसकी डॉली पूरे दिल से इज्जत करती हो ,उसको राज की हर बात में शिव जी का ही रूप दिखने लगा था ,लेकिन अभी भी वह समझ नहीं पा रही थी, कि आखिर ऐसी कौन सी बात है ऐसा क्या हुआ है ,जो कुछ दिनों से उसे राज की हर बात आकर्षित कर रही थी, राज जब ढाबे पर काम करता या ,अपनी गाड़ी साफ करता ,या बगीचे में लगी सब्जियों में पानी देता ,तो डॉली एकटक उसे ऐसा करते हुए देखती रहती, और इसी बीच अगर राज की नजर उस पर पड़ती तो शर्मा जाती , उसे अकेले में ही इन बातों पर हंसी आ जाती थी और फिर कभी कभी खुद से ही सवाल करती , यह सब क्या है ,वह क्यों ऐसी हरकतें कर रही है,,,,
एक बार तो बाजार जाते हुए उसको राज की अच्छी खासी डांट भी खानी पड़ी थी डॉली राज के साथ बाजार जा रही थी, और वह उसके साथ ही आगे की सीट पर बैठी थी राज पूरी मस्ती में गुनगुनाते हुए गाड़ी चला रहा था ,और डॉली उसे देखे जा रही थी
जब राज की नजर डॉली पर पड़ी तो उसने आंखें चढ़ाते हुए कहा ,,,,महारानी तू अपुन को घूरती कायको रहती है ,देख अपुन ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिए तू अपुन को डांट लगाए,,,, इसलिए यह बड़ी-बड़ी आंखें अपने पास ही रख,,
उसके बाद भी डॉली राज को देखे जा रही थी ,,,,और उसने अचानक राज से पूछा आपने शादी के बारे में कभी कुछ सोचा है क्या
राज ने अचानक गाड़ी को ब्रेक मारा और डॉली की तरफ देखते हुए बोला, तू अपन से क्या बोली एक बार फिर बोल ,डॉली ने फिर मासूमियत से कहा मैंने बस यही पूछा क्या आपने शादी के बारे में कुछ सोचा है
इस बात पर राज जोर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ा था,,, क्यों तू भी काकी का रोल प्ले कर रही है, क्या एक काकी कम थी जो अब तू भी मुझे मेरी शादी
के लिए टोकने लगी ,,,,सुन तू बच्ची है मेरी काकी बनने की कोशिश मत कर ,,,,,
हां शादी के बारे में तो जरूर सोचा है पर अपुन की नहीं ,तेरी!
1 दिन अपन से काकी ने भी कहा था कि अब तू शादी के लायक हो गई है, तेरे लिए एक अच्छा सा लड़का ढूंढना पड़ेगा मेरे को,,,
क्या डॉली इस बात पर मुंह फुला कर बैठ जाती है ,मेरी शादी कहां बीच में आ गई मुझे नहीं करनी कोई शादी-वादी ,और दूसरी तरफ देखने लगती है ,राज ने दोबारा गाड़ी स्टार्ट की और डॉली से कहा अरे महारानी इसमें गुस्सा होने वाली कौन सी बात है काकी कहती है कि लड़कियों को तो 1 दिन शादी करके अपने घर जाना ही होता है, अरे सारी लड़कियां जाती हैं ,तो तू भी जाएगी मुंह क्यों फुला रही है ,फिर मैं आज ही थोड़ी ना तेरी शादी करने जा रहा हूं,,,,,,
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गाड़ी अपनी रफ्तार पर थी ,शहर बस आने ही वाला था ,डॉली और राज कई महीनों बाद शहर आ रहे थे ,तो उन्हें शहर में काफी काम थे ,अब डॉली अधिकतर ऑनलाइन सामान ही मंगा लेती , तो शहर आना जाना कम ही होता था ,कुछ ही देर में दोनों शहर आ चुके थे ,और आकर ही खरीदारी करने में लग गए ,एक के बाद एक सामान खरीदते हुए गाड़ी में रखते जा रहे थे, कुछ डॉली के आंगनबाड़ी का सामान था ,जो उसे लेकर जाना था ,कुछ राज के ढाबे का ,और कुछ घर का भी सामान था ,चूँकि डॉली भी काम में व्यस्त रहती ,और राज भी तो इस वजह से दोनों का शहर आना जाना कम ही होता था ,खरीदारी करते हुए रात हो चुकी थी लेकिन शहर सिर्फ 2 घंटे की दूरी पर था
तो कोई चिंता की बात नहीं थी, फिर रोड भी काफी चालू था ,सारी खरीदारी खत्म करने के बाद दोनों गांव के लिए निकल पड़े लेकिन जैसे ही शहर को क्रॉस किया कि अचानक मौसम में बदलाव आने लगा
हल्की बूंदों के साथ तेज आंधी और तूफान अचानक से शुरू हो गया , राज ने जल्दी से उतर कर गाड़ी में
रखी हुई बड़ी सी पॉलिथीन से सामान को तो कवर कर दिया
लेकिन राज की जीप खुली हुई थी, तो तूफान और पानी की बौछार से इन दोनों का गाड़ी में बैठना मुश्किल हो रहा था ,यही कोई 1015 मिनट गाड़ी ड्राइव करके वह दोनों एक गांव में रुक गए, गांव में किसी के घर के बाहर बनी हुए दालान के नीचे दोनों खड़े हो गए, कि पानी कुछ कम हो तो वहां से निकले ,लेकिन पानी कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था ,तूफान की तेजी भी कम नहीं हुई थी ,दोनों को यहां खड़े हुए लगभग आधे घंटे से ज्यादा बीत चुका था तभी अंदर का दरवाजा खुला ,और एक बूढ़ी अम्मा बाहर निकली, बारिश की वजह से लाइट जा चुकी थी ,और घुप अंधेरा था
पहले तो वह थोड़ा डर गई ,लेकिन जब डॉली ने समझ लिया कि उन्हें कुछ सही नहीं लग रहा है, तो डॉली ने आगे बढ़ते हुए उन्हें आवाज लगाई ,,अम्मा आप डरिये मत बारिश की बजह से हम यहाँ रुके हुए है आपके घर के बाहर जगह दिखी ,तो बस कुछ देर के यहां रुक गए, हमारा गांव यहां से पास ही है, डॉली की कुछ बातें शायद उनके कान में पड़ चुकी थी, थोड़ी ही देर बाद वह हाथ में लानटेन लेकर बाहर निकली
और लानटेन को ऊपर करते हुए उन्होंने डॉली और राज को देखा, तो दोनों बहुत ही भले लगे ,उनके बाहर की दालान (बरामदा) काफी बड़ी थी, उन्होंने राज से दालान के अंदर जीप लगाने के लिए कहा ,और दोनों
को अंदर बुला लिया ,डॉली को पहले तो अंदर जाने में कुछ संकोच लगा, पर राज उसके साथ था ,डॉली और राज दोनों अम्मा के घर के अंदर चले गए ,क्योंकि इस समय सच में उन्हें किसी के सहारे की जरूरत थी बाहर तेज बारिश ,और ठंडी हवा से डॉली कांपने लगी थी, उसके कपड़े भी कुछ कुछ भीग गए थे, डॉली जैसे ही अंदर आई तो सामने ही अम्मा के घर में चूल्हा जल रहा था जिसकी गर्माहट की डॉली को शख्त जरूरत थी,वह जाकर चूल्हे के सामने बैठ गई,और आग तापने लगी,,,
उन्होंने लानटेन की रोशनी थोड़ी और बढ़ा दी, जिससे वह एक दूसरे को अच्छे से देख पाए ,काम करते हुए वह बोलती जा रही थी बेटा लग रहा कि तुम दोनों को बहुत ठंड लग रही है, मैं तुम लोगों के लिए चाय बनाती हूं डॉली ने आगे बढ़ते हुए कहा! अम्मा आप परेशान मत होइए ,बस हम थोड़ी देर आपके यहां बैठना चाहते हैं ,जैसे ही बारिश रुकेगी तो हम यहां से चले जाएंगे, पर उन्होंने डॉली की बात को ना सुनते हुए चाय चढ़ाई और उसमें शक्कर पत्ती डालने लगी, वह बोलती ही जा रही थी,,, बेटा इस बुड़िया के घर में आता ही कौन है, भगवान तो मेहमान का रूप होते हैं, महीनों बाद कभी ऐसा होता है कि कोई इस बुढ़िया के यहां आए ,और मुझे कुछ करने का मौका मिले, वह सभी चीजो को टटोलते हुए शक्कर, पत्ती ,और दूध चाय में डालती जा रही थी, और बोले जा रही थी कुछ देर में डॉली की समझ मे आ गया कि शायद वह न के बराबर ही सुन पा
रही थी राज कमरे के अंदर इधर उधर देखता हुआ जायका ले रहा था कि अम्मा के यहां और कौन-कौन है ,,,,चाय बन चुकी थी ,अम्मा ने तीन स्टील के ग्लास में चाय छानी, डॉली और राज को देकर खुद भी चाय पीने लगी चाय पीते पीते ही पूछा ,बेटा भूख तो तुम लोगों को जरूर लगी होगी, मैं बस अभी खाने के लिए कुछ बनाती हूं, यह बात तो सच थी की डॉली को बहुत तेज भूख लग रही थी ,और राज को भी ,इस बार डॉली ने उन्हें मना नहीं किया ,,,,,पर इतना जरूर कह दिया,,,,कि सच बात तो यह है, कि मुझे सच में बहुत तेज भूख लग रही है, पर आप चिंता मत कीजिए, मैं आपके साथ खाना बनवा लूँगी, इतना सुनकर अम्मा के चेहरे पर खुशी आ गई थी ,उन्होंने चूल्हे के पीछे रखी हुई डलिया में से बड़े-बड़े दो बैगन ,और कुछ टमाटर लेकर चूल्हे की जलती हुई आग में डाल दिए, और और पास ही रखे कनस्तर से एक बर्तन में आटा निकाल कर डॉली को दे दिया ,,,बेटा तू यह आटा माँढ़ (गूँथ) दे तब तक मैं यह बैगन और टमाटर भून के इसकी चटनी बना लेती हूं ,अभी तो डॉली को अगर नमक और रोटी भी मिल जाती तो उसमें भी उसकी आत्मा तृप्त हो जाती, फिर अम्मा जब इतने प्यार से उसके लिए बैंगन टमाटर की चटनी ,और रोटियां बना रही थी ,तो डॉली के मुंह में अभी से पानी आने लगा था डॉली ने जल्दी से आटा गूंथा और मिट्टी का तवा चूल्हे पर चढ़ाते हुई रोटियां सेकने लगी तब तक अम्मा के बैंगन और टमाटर भुन चुके थे ,उनको छीलकर सिलबट्टी पर रखा उसमें
दो-तीन बड़ी नमक की डाली डाली और तीन-चार हरी मिर्ची और हरा धनिया डालकर चटनी भी बनकर तैयार हो गई थी राज सामने ही बैठा यह सब कुछ देख रहा था ,गरम गरम रोटी कि खुशबू से राज की भूख और भी बढ़ गई थी ,जैसे ही पहली रोटी सिकी अम्मा ने एक बड़ी सी थाली में चटनी रखकर डॉली को देते हुए कहा ले बिटिया इसमें रोटी रख और अपने आदमी को यह थाली पकड़ा दे ,जब तक वह खाएगा तब तक हमारी रोटियां सिक जाएंगी ,और फिर हम दोनों खा लेंगे ,इस बात पर राज डॉली की तरफ देखने लगा ,,
और राज ने कहा,, अम्मा अपुन इसका कोई आदमी नहीं है,,, अम्मा शायद ऊंचा सुनती थी ,वह कोई भी बात सुने बिना ही लगातार बोले जा रही थी,,,
काकी चुपचाप दोनों के तमाशे देख रही थी पर काकी ने तो हमेशा डॉली का ही पक्ष लिया है ,उसने समझाया की डॉली सही कह रही है ,पहले वह भी नहीं जा रही थी ,लेकिन आज वह गई और उसको बहुत अच्छा लगा मैं तो कहती हूं एक-दो दिन तू भी चल ढावे से जरा बाहर निकल ,,स्कूल ना सही कम से कम कथा पुराण तो सुन ले,,
राज ने खाता खत्म किया और हाथ धोने के लिए बाहर चला गया, डॉली का भी खाना खत्म हो चुका था,उसने अपनी और राज की थाली उठाकर बाहर रखी ,और राज के आने से पहले ही अपने कमरे में चली गई राज वापस आया तो देखा कि डॉली वहां नहीं है, वह समझ गया कि डॉली उसकी बात पर गुस्सा हो गई है, पीछे पीछे उसके कमरे तक चला गया ,जब देखा तो डॉली चादर ओढ़ कर लेट गई थी ,राज ने तेज आवाज में बोलते हुए कहा, महारानी मुंह फुलाने की जरूरत
नहीं है ,देखता हूं अगर कल मुझे समय मिला तो मैं आ जाऊंगा थोड़ी देर के लिए ,और इतना कहकर कमरे से बाहर निकल गया ,डॉली चादर से मुंह ढक कर लेटी थी, राज की बात सुनकर उसके होठों पर हंसी आ जाती है,,,,
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दूसरे दिन भी डॉली के मन में कथा सुनने की ललक बहुत ज्यादा थी ,और उसने निश्चय कर लिया था कि वह आज भी शिवपुराण की कथा सुनने जरूर जाएगी ,वह जल्दी ही उठी घर के सारे काम किये ,बल्कि रात तक का खाना बनाकर उसने सुबह ही रख दिया था ,जिससे कि वह टाइम से पहले और पूरे टाइम तक कथा अच्छे से सुन पाए, डॉली टाइम से तैयार हो गई ,और आंगनबाड़ी जाते जाते एक बार फिर उसने राज को टाइम पर तैयार होने के लिए बोल दिया था सिवा ने उसकी तरफ देखा पर कोई जवाब नहीं दिया ,डॉली ने पर्स उठाया और आंगनवाड़ी चली गई ,आंगनबाड़ी में भी डॉली ने अच्छे से सारा काम कर लिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थी किस शिव पुराण सुनने में आंगनवाड़ी की किसी छूटे काम की वजह से उसका ठीक से मन ना लगे ,वह पुराणको पूरे एकाग्र चित्र के साथ सुनना चाहती थी ,शाम को ठीक 500 बजे डॉली घर आ चुकी थी ,आकर उसने जल्दी से हाथ मुंह धोया ,तब तक काकी ने चाय बना ली काकी चाय लेकर जैसे ही कमरे में आई तो देखा कि राज भी ढावे
से आ चुका है, तीनों ने चाय खत्म की और पुराण में जाने के लिए तैयार हो गए, डॉली आज और भी अच्छे से तैयार हुई थी ,जल्दी-जल्दी डॉली और काकी ने घर बंद किया , बाहर निकल कर ताला लगाते हुये चाबी पर्स में डाली ,और पुराण सुनने चल पड़ी, लेकिन तभी राज का फोन बज उठा और राज को याद आया कि आज कुछ लोग उसके ढाबे पर शहर से आ रहे हैं और ऐसे में राज का रुकना जरूरी था क्योंकि वह हाई-फाई लोग थे, और उनको अटेंशन देना जरूरी था , इसलिए चाहते हुए भी राज वहां नहीं जा सकता था
उसने डॉली की तरफ देखकर दोनों कान पकड़े और सॉरी बोलते हुए माफी मांगी महारानी तू तो समझती है कि अपुन के लिए काम से जरूरी कुछ नहीं है
अपुन नहीं चाहता कि कोई कस्टमर आकर अपुन के ढाबे पर लफड़ा करे,क्योंकि अपुन ने पहले ही उनसे वादा कर लिया था कि आ उनको पूरा अटेंशन देगा, तो सॉरी पर तू चिंता मत कर आज नहीं तो ना सही पर कल तेरे साथ जरूर चलेगा,,,
अब चूँकि राज का काम ही ऐसा था कि किसी भी समय करना पड़ जाए, इसलिए डॉली ने भी कुछ नहीं कहा, और डॉली काकी के साथ ही पुरान में चली गई
दोनों पुरान में आ चुकी थी,पंडित जी आज आगे की कथा का वर्णन सुनाने वाले थे जिसमें शिव के प्रति पार्वती के प्रेम की अनुभूति को दिखाया जाना था
डॉली कथा सुनने के लिए पूरी तरह से तैयार बैठी थी , कथा की शुरुआत आरती के साथ हुई ,और फिर पंडित
जी ने पुनः कथा का प्रारंभ किया ,कल कथा का समापन जहां पर हुआ था ,उससे आगे की कथा आज सुनाने वाले थे ,पंडित जी ने कथा सुनाना प्रारंभ किया ,,,,,,
//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svgओम नमः राजय //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f490.svg
जब सती का पूरा शरीर छत विक्षत होकर समाप्त हो गया, तब शिवजी घोर तपस्या में बैठ चुके थे ,और उसी बीच मां पार्वती का जन्म हिमालय पुत्री के यहां नैना देवी की कोख से हो चुका था ,नारद जी ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी, की पार्वती श्री शिव की धर्मपत्नी बनेंगी, और इन दोनों का विवाह निश्चित है ,लेकिन इस बात का भान ना तो शिव को था, ना ही पार्वती मैया को पर जैसे-जैसे मां गौरा बड़ी होती गई अपने आप ही शिव के लिए उनका प्रेम बढ़ता गया श्री शिव के लिए उनकी श्रद्धा और विश्वास अनंत थी ,जहां एक तरफ शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे ,वहीं दूसरी तरफ पार्वती धीरे-धीरे उनके प्रेम में डूबती जा रही थी, जब पार्वती को पूर्ण रूप से यह ज्ञान हो गया कि वह पूरे मन से शिवजी का वरन कर चुकी है ,श्री शिव के बिना उनका जीवन अधूरा है श्री शिव को पाना ही उनके जीवन का लक्ष्य और धर्म है, क्योंकि वह मन से पूर्ण रुप से शिव की हो चुकी है ,अतः वह सारे प्रयत्न करने लगी थी, कि वह शिव को पति के रूप में पा सकें ,लेकिन वहीं दूसरी तरफ तपस्या में बैठे लीन श्री शिव को अभी तक मां गौरा के प्रेम का कोई भान नहीं था ,क्योंकि वह पूरी तरह से अपनी तपस्या में लीन थे,
नर नारी ,देवता ,स्वर्ग लोक और पृथ्वीलोक के सभी बासी यही चाहते थे कि मां गौरा और शिव का विवाह हो ,लेकिन इस विवाह में जो सबसे बड़ी विडंबना थी, वह थी श्री शिव का तपस्या से जगाना जो सबसे असंभव कार्य था ,जब तक राज स्वयं इस तपस्या से नहीं उठ जाते ,तब तक यह किसी के बस की बात नहीं थी ,अतः शिव का इस तपस्या से जागना अत्यंत आवश्यक था,, पर पार्वती के साथ सभी का इसमें पूरा सहयोग था कि शिव तपस्या से जागृत हो, और माता पार्वती से विवाह रचाये, क्योंकि यही सृष्टि का नियम है ,कि एक स्त्री और पुरुष ऐसे दो लोग जिनमें सच्चा प्रेम हो ,जब वह अपने गृहस्थ जीवन को शुरू करते हैं ,तभी इस समाज का विकास संभव हो पाता है ,अतः अब माँ पार्वती का कर्तव्य था ,,कि कैसे भी विवाह के लिए उन्हें मनाये ,,, चाहे तपस्या करके या फिर किसी दूसरे उपाय से ,लेकिन यह परीक्षा मां पार्वती की ही थी ,कि उन्हें अपने प्रेम की शक्ति से शिव को आकर्षित करना ही होगा, और तभी यह संभव हो पाएगा कि वह श्री शिव को अपने वर के रूप में प्राप्त कर सके,,,,
और जब मां पार्वती इस बात को भलीभांति समझ चुकी, तो वह शिव को प्राप्त करने के जतन करने लगी, अब उनकी तपस्या तभी पूरी मानी जाती जब वह श्री शिव को अपने पति के रूप में वर लेती इसी के साथ आज की कथा समाप्त होती है, कल की कथा का श्रवण करने के लिए सभी बहन और भाई सही समय पर पंडाल में आ जाए ,,,इसके साथ आरती और प्रसाद
वितरण हुआ और सभी अपने अपने घर आ गए ,,,
आज घर आकर डॉली ने काकी से कोई भी सवाल नहीं किया था ,उसकी समझ में आ चुका था किसी की पार्वती मैया ने शिवजी से ही सच्चा प्रेम किया ,उन्हें इस बात का एहसास हो गया था ,और इसीलिए उन्हें प्राप्त करने के लिए वह सभी जतन करने लगी थी, कि चाहे कुछ भी हो शिव जी को पाना ही उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया था डॉली को एक बात अच्छी तरह से समझ आ गई थी ,कि जब दो लोगों के बीच प्रेम होता है और वह प्रेम की सच्ची अनुभूति को समझ जाते हैं ,तो फिर उसे पाना गलत नहीं होता उसे शिव पार्वती की कथा बहुत पसंद आई थी ,अभी तक डॉली सिर्फ पढ़ाई ,घर के काम और आंगन बाड़ी में ही व्यस्त रहती थी
पर शिव पार्वती की कथा सुनकर उसने जाना कि हर इंसान के जीवन में एक प्रेम का अध्याय भी होता है ,जिसे वह कभी ना कभी जरूर महसूस करता है, चाहे वह त्रिलोकनाथ शिव और गौरी मैया ही क्यों ना हो ,राधा कृष्णा ,सीताराम ,यह सभी अनूठे प्रेम के उदाहरण है, डॉली के मन में प्रेम का अंकुर फूट चुका था ,उसे कुछ ऐसी चीजें महसूस हो रही थी ,जो वह ठीक से समझ नहीं पा रही थी, लेकिन कहीं ना कहीं वह सारी बाते उसे कुछ सोचने पर मजबूर तो कर रही थी ,डॉली शिव पार्वती की कथा सोच सोच कर बहुत अच्छा महसूस कर रही थी मां गौरा मैया के असीम प्रेम को देखकर सोच रही थी ,कि क्या सबके जीवन में
कुछ पल ऐसे जरूर आते है ,जब वह किसी से प्रेम करता है ,और क्या मेरे जीवन में भी ऐसा कोई पल आएगा ,जब मैं किसी से प्रेम करूंगी ,अपनी बात पर सोच कर डॉली को हंसी आ गई थी ,कि क्या उसे भी मां पार्वती की तरह ही किसी को पाने के लिए जतन करने होंगे, या फिर उसके शिवजी खुद ही उसके पास आ जाएंगे, तभी काकी की आवाज से डॉली की तंद्रा टूटी ,,
जैसे ही राज घर आया तो काकी ने राज को सुनाते हुए कहा ,,,
राज तू भी ना किसी औघड़ से कम नहीं है जैसा तेरा नाम है राज, वैसा ही तेरा काम जहां एक तरफ भगवान शिव अपनी धूनी में रम जाते थे ,तू बिलकुल उसी तरह ढावे में रम जाता है ,ना तुझे दुनियादारी से कोई मतलब ,ना अपने जीवन से ,,
भगवान शिव तपस्या में लीन रहते है और तू भी यह कहते कहते काफी जोर से हंस दी थी डॉली काकी की बात को बहुत ध्यान से सुन रही थी ,डॉली ने काकी के पास जाकर पूछा काकी आपने ऐसा क्यों कहा,
कहा कि राज भी भगवान शिव के जैसे है काकी ने हंसते हुए कहा ,,,,
और नहीं तो क्या, तू देखती नहीं है उसको जैसे शिवजी अपनी धूनी में रहते थे, वह अपने ढावे में रमा रहता है, उसके दिल में तुझे दूर दूर तक प्रेम दिखता है क्या
बस अपनी दुनिया से मतलब है उसे ,अरे मैं तो कहते-कहते थक गई हूं ,कि अपने लिए कोई लड़की
देख कर घर बसा ले ,लेकिन उसे तो इन सब बातों से कोई मतलब ही नहीं अरे क्या पूरी जिंदगी क्वांरा ही रहेगा
उमर हो गई है घर बसा कर एक दो बच्चे पैदा कर ले ,तो मैं भी सुख से मर सकूं,, जैसे शिवजी को अपने जीवन की कोई चिंता नहीं थी ,सच कहती हूं डॉली अगर पार्वती मैया आकर शिव की तपस्या भंग ना करती
और पति के रूप में उन्हें पाने की जिद ना करती तो शिव जन्म जन्मांतर तक अपनी धूनी में ही रमे रहते ,जब मां पार्वती ने आकर उनकी तपस्या की उनको पाने की ज़िद की और सब ने उनका साथ दिया, तब कहीं जाकर वह शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त कर पाई, में भगवान से यही प्रार्थना करती हूं ,कि उन्होंने मेरे राज के लिए भी कहीं कोई पार्वती मैया जन्मी हो ,जो आकर इसकी तपस्या भी भंग करें और इसे अपना पति बनाये, तभी इसकी शादी हो पाएगी नहीं तो मुझे नहीं लगता कि यह कभी किसी लड़की से कुछ कहेगा ,तब तक राज हाथ धोकर खाना खाने आ चुका था ,काकी अंदर रसोई में थालियां लगा रही थी ,और डॉली ने चटाई बिछाकर पानी रखा सलाद रखा और अंदर खाना परसने में मदद करवाने लगी काकी के कहे हुए शब्द डॉली के दिमाग में बार-बार आ रहे थे ,कि राज भी भगवान शिव की तरह ही है, डॉली काकी की बात सोच कर मुस्कुरा रही थी, सच में राज की आदतें तो बिल्कुल वैसी ही थी ,
बस राज के बारे में ही सोच रही थी ,जब थाली देख लेकर आई और राज को देने लगी तो वह उसे देखे जा रही थी
राज ने डॉली के हाथ से थाली लेते हुए कहा ओ सहजादी मुझे थाली देगी भी ,या फिर ऐसे ही पकड़ के खड़ी रहेगी
और थाली लेकर खाना शुरू कर दिया
तब तक डॉली और काकी भी अपनी
थालिया लेकर आ चुकी थी
और तीनों एक साथ खाना खाने लगे राज खाना खाते हुए बोला,,,,
काकी अपूण तेरे साथ नहीं आ पाया तू बता ना क्या हुआ था वहां
काकी ने कहा तेरी तो सब समझ से परे है लेकिन आज शिवजी और पार्वती मैया के प्रेम की कथा का वर्णन किया था पंडित जी ने ,अरे तू तो इन सब बातों से कोसों दूर है तुझे क्या समझ आएगा ,तभी तो कहा था तू भी 4 शब्द सुन लेता,
काकी जब तेरे पास टाइम होगा ना तू अपन को सुना देना,,,
डॉली खाना खाते हुए बीच-बीच में राज को देखती जा रही थी, उसे सच में काकी की कही बात सही लग रही थी, कि किस तरह से राज में शिव जी के जैसा रूप ही है काकी ने ये बात मजाक में कही थी ,लेकिन डॉली ने बहुत बार सोचा और उसे राज का एक अलग ही रूप दिखा,,,,,
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डॉली और काकी हर रोज कथा सुनने जाती थी ,कथा पूरे 8 दिनों तक चलने वाली थी और अभी 5 दिन निकल भी चुके थे, लेकिन रोज कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता जिससे राज वहां जाने से रह जाता ,अब तक शिव पार्वती के विवाह का वर्णन भी हो चुका था आज कथा का छठवां दिन था, ढाबे पर कोई खास काम भी नहीं था ,राज फ्री था तो उसने आज कथा में जाने का पक्का इरादा कर लिया था ,डॉली और काकी रोज की तरह तैयार होकर कथा के लिए निकल गई राज भी बस धावे पर कुछ काम समझा कर कथा में जाने के लिए तैयार ही हो रहा था
15 मिनट में राज काम से फ्री होकर ढाबे पर सारा काम समझा कर कथा सुनने के लिए निकल गया , वैसे राज के लिए यह बिल्कुल नई बात थी ,क्योंकि वो भंडारे कथा पूजा से बहुत दूर रहता था ,इन सब का व्यवहार काकी ही निभाती थी, लेकिन अभी काकी और डॉली रोज कथा सुनकर आती और राज को समझाती, तो सुन सुन के उसका भी मन हो गया था कि आखिर एक बार जाकर सुनु कि पंडित ऐसा बोलता
क्या है, कि सब लोग वहां जाकर अपना अपना टाइम खोटी करते हैं, राज मजाक के मूड में ही सही ,पर कथा सुनने पंडाल में आ चुका था ,पीछे पड़ी हुई कुर्सियों में सबसे पीछे वाली कुर्सी राज को खाली दिखी ,और वह वही जाकर चुपचाप बैठ गया, तब तक आरती संपन्न हो चुकी थी , और पंडित जी कथा का प्रारंभ करने ही वाले थे ,
आज समुद्र मंथन से संबंधित सारी बातें कथा में बताने वाले थे पंडित जी ने,,,,
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के साथ ही कथा सुनाना प्रारंभ किया
जब समुद्र मंथन प्रारंभ हुआ तो समुद्र में से एक से एक दुर्लभ अमूल्य और आश्चर्यजनक वस्तुएं निकलना प्रारंभ हो गई, कुछ वस्तुएं बहुत ही सुंदर थी, कुछ अमूल्य थी, समुद्र मंथन में मां लक्ष्मी जी निकली, जिन्हें श्री विष्णु को सौंपा गया ,कभी ना मुरझाने वाली कमल फूल की माला ,जिसे इंद्र के सुपुर्द कर दिया गया, एरावत हाथी ,उच्चेश्रेवा घोड़ा इस तरह एक से एक अमूल्य वस्तुये समुद्र मंथन से निकलती गई, और इनमें देवता और दानवों में बंटवारा होता गया ,उसके बाद अमृत से भरा कलश जिसको देवताओं ने दानवों को धोखे में रखकर खुद ही ग्रहण कर लिया, क्योंकि यह पृथ्वी के हित में था, और जब हलाहल विष से भरा घड़ा निकला तो सारे देवताओं के शरीर जलने लगे ,विष
के प्रभाव से हाहाकार मच गया, पर देवों के देव महादेव ने उस हलाहल विष को अपने कंठ में रखा ,और सब को निश्चिंत किया,
तभी तो श्री शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है, विश्व जगत के भले के लिए उन्होंने खुद के कंठ में विष को रख लिया पंडित जी इस कथा का पर्याय समझाने लगे कि श्री शिव तो महा शंभू थे तो उन्होंने विष से भरा हुआ घड़ा अपने कंठ में उड़ेल लिया लेकिन आज के मनुष्य में इतनी शक्ति नहीं है पर अगर हमारा मन अच्छा हो ,हम दूसरों के लिए निस्वार्थ रूप से मन में अच्छे भाव रखते हो ,तो उसके लिए कुछ अच्छा सोच सकते हैं ,अगर किसी मनुष्य से सच्चा प्रेम करता है, तो स्वार्थ से परे होकर उसके भले के बारे में सोच सकता है, अपना स्वार्थ ना देखते हुए उस इंसान के साथ हम क्या अच्छा कर सकते हैं ,कलयुग में अगर हमने इतना कर लिया, या इतना सोच लिया तो हमारे लिए यही श्री महा शिव का आशीर्वाद होगा ,और अगर कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने स्वार्थ से परे होकर किसी और के भले के बारे में सोच सकता है ,तो कलयुग में उसे भी भगवान शिव का ही रूप मान सकते हैं ,पर आजकल ऐसे मनुष्य होते ही कहां है जो किसी और का भला सोच पाए
आजकल तो सब अपने ही स्वार्थ में लिप्त होते हैं ,,परम धर्म वही है ,सच्चा प्रेम वही है जब हम किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में और उसके भविष्य के बारे में कुछ अच्छा करने का सोचते हैं ,और इसी के साथ
आज की कथा समाप्त हो चुकी थी,,,,,
भीड़ भाड़ में तो पता नहीं चला पर रास्ते में काकी और डॉली को वहां से लौटते हुए राज दिख गया था ,और काकी बहुत खुश थी, कि आखिर राज एक दिन कथा सुनने आ ही गया ,घर आकर जब काकी ने काम करते हुए राज से पूछा ,,,राज तू कथा में टाइम से तो पहुंच गया था ना
हां काकी अपुन टाइम से पहुंच गया था लेकिन मुझे तो तू कहीं नहीं दिखा ,,,
अरे काकी बह सबसे पीछे वाली कुर्सी खाली पड़ी हुई थी ,तो मैं वहीं बैठ गया था ,पीछे से तुझे कुछ सुनाई भी दिया या फिर ऐसे ही बैठा रहा ,,,,,अरे काकी अपुन ने सुना था ना वह पंडित बता रहा था ,,
कि जो पहले का विलेन होता था ,और दूसरी तरफ से सभी भगवान होते थे, ऐसा कुछ बताया था ना ,अमृत तो मिल बांट के पी लिया ,लेकिन जब साला पॉइजन की बात आई तो अपने भोलेनाथ को पकड़ा दिया
अपुन पूछता है कि उनने पिया कायको
काकी ने समझाया बेटा ऐसे नहीं कहते वह तो त्रिलोकनाथ है, उन्होंने विष दुनिया के भले के लिए पिया था ,अगर वह अपने हलक में इसे न उतारते तो दुनिया का उसी क्षण नाश हो जाता, इसलिए उन्होंने खुद का सुख न देखते हुए दूसरों का सुख देखा ,वह चाहते तो विषपान न करते, अमृत भी पी सकते थे लेकिन वह दुनिया जहां से प्रेम करते थे उसका अच्छा
चाहते थे, इसलिए उन्होंने खुद ही विष पी लिया, और सब को संकट से बचा लिया ,,,,,
हां काकी तू शायद सच्ची कह रही है यह साला आज का आदमी है ना सिर्फ अपना ही अपना स्वार्थ देखता है, कि कैसे भी हो, कुछ भी हो ,उसके साथ सब कुछ अच्छा हो जाना चाहिए ,, दुनिया को आग लगती है तो लग जाए ,,,पर काकी एक बात मेरी समझ में आ गई ,कि जहां हम स्वार्थ नहीं देखते ,और जिससे प्रेम करते हैं ,उसके बारे में सब कुछ अच्छा होता हुआ देखना चाहते हैं, कि बस वह सुखी रहे, और उसकी जिंदगी में सब कुछ अच्छा हो ,काकी भी राज की बातों पर हंसते हुए बोली, बेटा यह तूने बिल्कुल सही बात कही ,पंडित जी की कथा का सार तो यही था,कि इस कलयुग में अगर हम किसी एक इंसान का भी भला पर कर पाए तो हमारा इस पृथ्वी पर जन्म लेना सिद्ध हो जाता है, हां काकी वैसे अपुन को अच्छा लगा कथा सुनकर ,,,,
डॉली बहुत ध्यान से राज के चेहरे की तरफ देख रही थी, क्योंकि उसने 5 सालों में पहली बार राज के मुंह से भगवान का नाम सुना था ,,ऐसा नहीं है कि वह मंदिर ना जाता हो पर बात मंदिर जाने पर ही खत्म हो जाती थी अगर काकी कभी कहती तो उनके साथ मंदिर जाता, और हाथ जोड़कर वापस आ जाता ,बाकी चीजों की गहराई में कभी नहीं उतरा था ,धीरे धीरे 8 दिनों बाद शिव पुराण पूरा हो चुका था, राज बड़ी मुश्किल से एक ही दिन कथा सुनने जा पाया था, और उसकी
समझ में बस इतना ही आया कि हमें खुद के लिए नहीं जीवन दूसरों के लिए जीना चाहिए और अगर हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो निस्वार्थ भाव से ही करना चाहिए जहां स्वार्थ हो ,वहां प्रेम नहीं हो सकता और जहां प्रेम हो वहां स्वार्थ नहीं, क्योंकि इससे आगे पीछे की कथा तो राज ने सुनी ही नहीं थी लेकिन डॉली ने जो कथा सुनी थी उसमें वह शिव और पार्वती के प्रेम की अनुभूति को अच्छी तरह से समझ गई थी, उसने समझ लिया था किस शिव में कौन-कौन सी खूबियां थी, और क्यों गौरी मैया ने उन्हें पाने के लिए तपस्या की थी ,क्योंकि वह शिव को जान चुकी थी, एक ही कथा से डॉली ने कुछ और सीखा था, और राज की छाप उसके मन पर कुछ और ही पड़ी थी ,,,,,
डॉली जब भी राज को कुछ अच्छा करता हुआ देखती उसे हमेशा पंडित जी की कथा की याद आ जाती ,राज का शुरू से ही नियम था कि उसके ढाबे के बाहर से कोई भूखा नहीं गुजर सकता था, रोज 5,,7 लोगों को भरपेट खाना वह फ्री में ही खिलाता था अगर किसी बच्चे के स्कूल की फीस रह गई तो, चुपचाप जाकर उसे जमा कर देता, किसी गरीब के पास चप्पल नहीं है तो फटाफट खरीद कर उसके हाथ में पकड़ा देता , पर राज ने इन सब बातों के बदले कभी कोई उम्मीद किसी से नहीं की थी
वह जुबान का चाहे जितना ही कड़वा हो पर उसका मन बिल्कुल आईने की तरह साफ था डॉली जब भी राज की ऐसी बातों को देखती तो उसके मन में राज के
लिए इज्जत और बढ़ जाती, कथा पुराण हुए दो-तीन महीने बीत चुके थे, इन दो-तीन महीनों में डॉली ने कितनी बार महसूस किया था, की राज के अलावा ऐसा कोई नहीं है जिसकी डॉली पूरे दिल से इज्जत करती हो ,उसको राज की हर बात में शिव जी का ही रूप दिखने लगा था ,लेकिन अभी भी वह समझ नहीं पा रही थी, कि आखिर ऐसी कौन सी बात है ऐसा क्या हुआ है ,जो कुछ दिनों से उसे राज की हर बात आकर्षित कर रही थी, राज जब ढाबे पर काम करता या ,अपनी गाड़ी साफ करता ,या बगीचे में लगी सब्जियों में पानी देता ,तो डॉली एकटक उसे ऐसा करते हुए देखती रहती, और इसी बीच अगर राज की नजर उस पर पड़ती तो शर्मा जाती , उसे अकेले में ही इन बातों पर हंसी आ जाती थी और फिर कभी कभी खुद से ही सवाल करती , यह सब क्या है ,वह क्यों ऐसी हरकतें कर रही है,,,,
एक बार तो बाजार जाते हुए उसको राज की अच्छी खासी डांट भी खानी पड़ी थी डॉली राज के साथ बाजार जा रही थी, और वह उसके साथ ही आगे की सीट पर बैठी थी राज पूरी मस्ती में गुनगुनाते हुए गाड़ी चला रहा था ,और डॉली उसे देखे जा रही थी
जब राज की नजर डॉली पर पड़ी तो उसने आंखें चढ़ाते हुए कहा ,,,,महारानी तू अपुन को घूरती कायको रहती है ,देख अपुन ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिए तू अपुन को डांट लगाए,,,, इसलिए यह बड़ी-बड़ी आंखें अपने पास ही रख,,
उसके बाद भी डॉली राज को देखे जा रही थी ,,,,और उसने अचानक राज से पूछा आपने शादी के बारे में कभी कुछ सोचा है क्या
राज ने अचानक गाड़ी को ब्रेक मारा और डॉली की तरफ देखते हुए बोला, तू अपन से क्या बोली एक बार फिर बोल ,डॉली ने फिर मासूमियत से कहा मैंने बस यही पूछा क्या आपने शादी के बारे में कुछ सोचा है
इस बात पर राज जोर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ा था,,, क्यों तू भी काकी का रोल प्ले कर रही है, क्या एक काकी कम थी जो अब तू भी मुझे मेरी शादी
के लिए टोकने लगी ,,,,सुन तू बच्ची है मेरी काकी बनने की कोशिश मत कर ,,,,,
हां शादी के बारे में तो जरूर सोचा है पर अपुन की नहीं ,तेरी!
1 दिन अपन से काकी ने भी कहा था कि अब तू शादी के लायक हो गई है, तेरे लिए एक अच्छा सा लड़का ढूंढना पड़ेगा मेरे को,,,
क्या डॉली इस बात पर मुंह फुला कर बैठ जाती है ,मेरी शादी कहां बीच में आ गई मुझे नहीं करनी कोई शादी-वादी ,और दूसरी तरफ देखने लगती है ,राज ने दोबारा गाड़ी स्टार्ट की और डॉली से कहा अरे महारानी इसमें गुस्सा होने वाली कौन सी बात है काकी कहती है कि लड़कियों को तो 1 दिन शादी करके अपने घर जाना ही होता है, अरे सारी लड़कियां जाती हैं ,तो तू भी जाएगी मुंह क्यों फुला रही है ,फिर मैं आज ही थोड़ी ना तेरी शादी करने जा रहा हूं,,,,,,
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गाड़ी अपनी रफ्तार पर थी ,शहर बस आने ही वाला था ,डॉली और राज कई महीनों बाद शहर आ रहे थे ,तो उन्हें शहर में काफी काम थे ,अब डॉली अधिकतर ऑनलाइन सामान ही मंगा लेती , तो शहर आना जाना कम ही होता था ,कुछ ही देर में दोनों शहर आ चुके थे ,और आकर ही खरीदारी करने में लग गए ,एक के बाद एक सामान खरीदते हुए गाड़ी में रखते जा रहे थे, कुछ डॉली के आंगनबाड़ी का सामान था ,जो उसे लेकर जाना था ,कुछ राज के ढाबे का ,और कुछ घर का भी सामान था ,चूँकि डॉली भी काम में व्यस्त रहती ,और राज भी तो इस वजह से दोनों का शहर आना जाना कम ही होता था ,खरीदारी करते हुए रात हो चुकी थी लेकिन शहर सिर्फ 2 घंटे की दूरी पर था
तो कोई चिंता की बात नहीं थी, फिर रोड भी काफी चालू था ,सारी खरीदारी खत्म करने के बाद दोनों गांव के लिए निकल पड़े लेकिन जैसे ही शहर को क्रॉस किया कि अचानक मौसम में बदलाव आने लगा
हल्की बूंदों के साथ तेज आंधी और तूफान अचानक से शुरू हो गया , राज ने जल्दी से उतर कर गाड़ी में
रखी हुई बड़ी सी पॉलिथीन से सामान को तो कवर कर दिया
लेकिन राज की जीप खुली हुई थी, तो तूफान और पानी की बौछार से इन दोनों का गाड़ी में बैठना मुश्किल हो रहा था ,यही कोई 1015 मिनट गाड़ी ड्राइव करके वह दोनों एक गांव में रुक गए, गांव में किसी के घर के बाहर बनी हुए दालान के नीचे दोनों खड़े हो गए, कि पानी कुछ कम हो तो वहां से निकले ,लेकिन पानी कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था ,तूफान की तेजी भी कम नहीं हुई थी ,दोनों को यहां खड़े हुए लगभग आधे घंटे से ज्यादा बीत चुका था तभी अंदर का दरवाजा खुला ,और एक बूढ़ी अम्मा बाहर निकली, बारिश की वजह से लाइट जा चुकी थी ,और घुप अंधेरा था
पहले तो वह थोड़ा डर गई ,लेकिन जब डॉली ने समझ लिया कि उन्हें कुछ सही नहीं लग रहा है, तो डॉली ने आगे बढ़ते हुए उन्हें आवाज लगाई ,,अम्मा आप डरिये मत बारिश की बजह से हम यहाँ रुके हुए है आपके घर के बाहर जगह दिखी ,तो बस कुछ देर के यहां रुक गए, हमारा गांव यहां से पास ही है, डॉली की कुछ बातें शायद उनके कान में पड़ चुकी थी, थोड़ी ही देर बाद वह हाथ में लानटेन लेकर बाहर निकली
और लानटेन को ऊपर करते हुए उन्होंने डॉली और राज को देखा, तो दोनों बहुत ही भले लगे ,उनके बाहर की दालान (बरामदा) काफी बड़ी थी, उन्होंने राज से दालान के अंदर जीप लगाने के लिए कहा ,और दोनों
को अंदर बुला लिया ,डॉली को पहले तो अंदर जाने में कुछ संकोच लगा, पर राज उसके साथ था ,डॉली और राज दोनों अम्मा के घर के अंदर चले गए ,क्योंकि इस समय सच में उन्हें किसी के सहारे की जरूरत थी बाहर तेज बारिश ,और ठंडी हवा से डॉली कांपने लगी थी, उसके कपड़े भी कुछ कुछ भीग गए थे, डॉली जैसे ही अंदर आई तो सामने ही अम्मा के घर में चूल्हा जल रहा था जिसकी गर्माहट की डॉली को शख्त जरूरत थी,वह जाकर चूल्हे के सामने बैठ गई,और आग तापने लगी,,,
उन्होंने लानटेन की रोशनी थोड़ी और बढ़ा दी, जिससे वह एक दूसरे को अच्छे से देख पाए ,काम करते हुए वह बोलती जा रही थी बेटा लग रहा कि तुम दोनों को बहुत ठंड लग रही है, मैं तुम लोगों के लिए चाय बनाती हूं डॉली ने आगे बढ़ते हुए कहा! अम्मा आप परेशान मत होइए ,बस हम थोड़ी देर आपके यहां बैठना चाहते हैं ,जैसे ही बारिश रुकेगी तो हम यहां से चले जाएंगे, पर उन्होंने डॉली की बात को ना सुनते हुए चाय चढ़ाई और उसमें शक्कर पत्ती डालने लगी, वह बोलती ही जा रही थी,,, बेटा इस बुड़िया के घर में आता ही कौन है, भगवान तो मेहमान का रूप होते हैं, महीनों बाद कभी ऐसा होता है कि कोई इस बुढ़िया के यहां आए ,और मुझे कुछ करने का मौका मिले, वह सभी चीजो को टटोलते हुए शक्कर, पत्ती ,और दूध चाय में डालती जा रही थी, और बोले जा रही थी कुछ देर में डॉली की समझ मे आ गया कि शायद वह न के बराबर ही सुन पा
रही थी राज कमरे के अंदर इधर उधर देखता हुआ जायका ले रहा था कि अम्मा के यहां और कौन-कौन है ,,,,चाय बन चुकी थी ,अम्मा ने तीन स्टील के ग्लास में चाय छानी, डॉली और राज को देकर खुद भी चाय पीने लगी चाय पीते पीते ही पूछा ,बेटा भूख तो तुम लोगों को जरूर लगी होगी, मैं बस अभी खाने के लिए कुछ बनाती हूं, यह बात तो सच थी की डॉली को बहुत तेज भूख लग रही थी ,और राज को भी ,इस बार डॉली ने उन्हें मना नहीं किया ,,,,,पर इतना जरूर कह दिया,,,,कि सच बात तो यह है, कि मुझे सच में बहुत तेज भूख लग रही है, पर आप चिंता मत कीजिए, मैं आपके साथ खाना बनवा लूँगी, इतना सुनकर अम्मा के चेहरे पर खुशी आ गई थी ,उन्होंने चूल्हे के पीछे रखी हुई डलिया में से बड़े-बड़े दो बैगन ,और कुछ टमाटर लेकर चूल्हे की जलती हुई आग में डाल दिए, और और पास ही रखे कनस्तर से एक बर्तन में आटा निकाल कर डॉली को दे दिया ,,,बेटा तू यह आटा माँढ़ (गूँथ) दे तब तक मैं यह बैगन और टमाटर भून के इसकी चटनी बना लेती हूं ,अभी तो डॉली को अगर नमक और रोटी भी मिल जाती तो उसमें भी उसकी आत्मा तृप्त हो जाती, फिर अम्मा जब इतने प्यार से उसके लिए बैंगन टमाटर की चटनी ,और रोटियां बना रही थी ,तो डॉली के मुंह में अभी से पानी आने लगा था डॉली ने जल्दी से आटा गूंथा और मिट्टी का तवा चूल्हे पर चढ़ाते हुई रोटियां सेकने लगी तब तक अम्मा के बैंगन और टमाटर भुन चुके थे ,उनको छीलकर सिलबट्टी पर रखा उसमें
दो-तीन बड़ी नमक की डाली डाली और तीन-चार हरी मिर्ची और हरा धनिया डालकर चटनी भी बनकर तैयार हो गई थी राज सामने ही बैठा यह सब कुछ देख रहा था ,गरम गरम रोटी कि खुशबू से राज की भूख और भी बढ़ गई थी ,जैसे ही पहली रोटी सिकी अम्मा ने एक बड़ी सी थाली में चटनी रखकर डॉली को देते हुए कहा ले बिटिया इसमें रोटी रख और अपने आदमी को यह थाली पकड़ा दे ,जब तक वह खाएगा तब तक हमारी रोटियां सिक जाएंगी ,और फिर हम दोनों खा लेंगे ,इस बात पर राज डॉली की तरफ देखने लगा ,,
और राज ने कहा,, अम्मा अपुन इसका कोई आदमी नहीं है,,, अम्मा शायद ऊंचा सुनती थी ,वह कोई भी बात सुने बिना ही लगातार बोले जा रही थी,,,