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"अच्छा ! आपने स्कूल बनाने को लिखा है या बंगला हजम करने को ?"
"क्या ?"
“सेठजी !" देवीदयाल ने फाइल देखकर कहा-"मैं जानता हूं, धनवान का धर्म केवल पैसा होता है-और आप धनवान हैं।"
"यह क्या बकवास है ?"
"यह बकवास नहीं...सच्चाई है।"
"तो आपका धर्म बनावटी, पाखंड नहीं ?"
"ईश्वर के प्रकोप से डरिए-झूठ फरेब से जायदाद हटाने का अंत क्या होगा ?"
"मेरे दस लाख रूपए हजम करने पर भी आप संतुष्ट नहीं हुए।"
देवीदयाल ने व्यंग्य से मुस्कराकर कहा-"आ गए न अपनी औकात पर।"
"क्या बकवास कर रहे हो ?"
.
.
"दस लाख रूपए का चैक खुद तुमने मेरे नाम से कैश करा लिया था।"
.
"खूब ! मुझे मालूम है तुमने यही आरोप लगाया था दस लाख रूपए हज्म करने के बाद ।"
"किसने आरोप लगाया था...उसका हुलिया तो भगवान के पास है न।
।
"भगवान के पास तो जाओगे देर में पहले जेल जाना पड़ेगा।
"अच्छे उद्देश्य के लिए जेल में कोई हर्ज नहीं..मगर तुम धोखाधड़ी से सादा और भोले
आदमियों को कब तक लूटोगे ?"
"तुम मुझे बेइमान समझते हो।"
“समझता नहीं...आप हैं।"
"ठीक है...समझते रहना...पहले इस फाइल पर दस्तखत करो।"
।
"इन कागजों पर तो मर जाऊं तो भी अपने हस्ताक्षर नहीं करूंगा...वह बंगला मेरे पुरखों का है-वह तो दस करोड़ में भी नहीं दूंगा...और तुम जैसे आदमी को तो किसी मूल्य पर नहीं दूंगा।" फिर वह झटके से उठा।
सेठ दौलतराम भी झटके से खड़ा हो गया और गुस्से से बोला-"ठहरो मास्टर।"
"अब तो एक पल ठहरना भी हराम है।"
"तुम अपनी मर्जी से यहां से नहीं जा सकते।"
।
"मैं भगवान की मर्जी से जा रहा हूं।"
"यह कॉटेज सेठ दौलतराम का है-तुम्हारे भगवान का नहीं।"
"भगवान के प्रकोप से डरो सेठ...खाक हो जाओगे।"
“पहले तुम मौत से डरो।"
अचानक सेठ दौलतराम ने रिवाल्वर निकाल लिया और देवीदयाल पर तानकर बोला-"वह सामने फाइल पड़ी है उस पर हस्ताक्षर करो।"
“फाइल पर तो तुम्हारे फरिश्ते भी अब मेरे हस्ताक्षर नहीं करा सकते।"
-
सेठ ने फाइल उठाकर देवीदयाल की ओर बढ़ाकर कहा-“चलो ! साइन करो वरना जिन्दगी से हाथ धो बैठोगे।"
देवीदयाल ने फाइल की ओर हाथ बढ़ाया, फिर अचानक उसने दौलतराम के रिवाल्वर पर झपट्टा मारा...मास्टर जी पर भी हल्का-सा नशा था इसलिए उसका जरा भी डर नहीं लगा...दोनों आपस में गुत्थमगुत्था हो गए, दौलतराम को अपनी जिन्दगी खतरे में नजर आने लगी-उन्हें लगा देवीदयाल पर जुनून सवार है...उनकी कोशिश अब यही थी कि देवीदयाल के सीने में गोली उतर ही जानी चाहिए, चाहे इसका परिणाम कुछ भी हो।
वह यह नहीं जानते थे कि पीछे से प्रेम यह सब देख रहा है...उसके पास कैमरा भी है। वास्तव में प्रेम ने यह इन्तजाम पहले ही कर रखा था, क्योंकि वह सेठ दौलतराम की ऐयाशियों का राजदार था-कॉटेज के बारे में उसे पूरी जानकारी थी-कॉटेज की एक चाबी उसके पास रहती थी।
कॉटेज के पिछले साऊंड प्रूफ कमरे के टायलेट का एक दरवाजा पिछवाड़े खुलता था जहां से सफाई वाला कर्मचारी आता था वैसे आमतौर पर यह दरवाजा बंद रहता था।
प्रेम देवीदयाल जी को अंदर पहुंचाकर कार दूर खड़ी करके पिछवाड़े के दरवाजे से टायलेट में आकर साउंड प्रूफ कमरे में आ गया था और दरवाजे में झिरी बनाकर यह दृश्य देख रहा था...उसका कैमरा फोटो खींचने के लिए तैयार था।
एक बार देवीदयाल सेठ दौलतराम पर पूरी तरह छा गया। सेठ के पांच उखड़ गए-देवीदयाल उन्हें रगेदता हुआ पीछे ले जाने लगा..इस हालत में रिवाल्वर की नाल उनकी छाती की तरफ हो गया और एक जगह सेठ दौलतराम को पीछे से ठोकर लगी तो उनके हाथ में दबे रिवाल्वर का ट्रिगर दब गया...प्रेम ने इस बात का खास ध्यान रखा था कि गोली की आवाज दूर तक न जाए.इसलिए रिवाल्वर में सायलेंसर फिट था।
गोली देवीदयाल के सीने में उतर गई-उनके गले से भिंची-भिंची-सी चीख निकली-साथ ही प्रेम ने कैमरे का बटन दबा दिया और फोटो खिंच गई।
देवीदयाल लड़खड़ाकर पीछे गिर गए-उनके सीने से खून का फव्वारा-सा उबल पड़ा था और सेठ दौलतराम का रिवाल्वर अब भी उसकी ओर तना हुआ था। उसकी सांस फूल रही थी...प्रेम ने कैमरा क्लिक किया और दूसरा फोटो भी खिंच गया।
सेठ दौलतराम का नशा हिरण हो चुका था-उनके सामने मास्टर देवीदयाल की लाश पड़ी थी और हाथ में रिवाल्वर था..मोटे कालीन पर खून के छींटे और स्वंय उनके कपड़ों पर खून । देवीदयाल की आंखों में फांसी का फंदा घूम गया...उन्होंने झुरझुरी-सी ली और भयभीत ढंग से बड़बड़ाए-"नहीं...!"
"क्या ?"
“सेठजी !" देवीदयाल ने फाइल देखकर कहा-"मैं जानता हूं, धनवान का धर्म केवल पैसा होता है-और आप धनवान हैं।"
"यह क्या बकवास है ?"
"यह बकवास नहीं...सच्चाई है।"
"तो आपका धर्म बनावटी, पाखंड नहीं ?"
"ईश्वर के प्रकोप से डरिए-झूठ फरेब से जायदाद हटाने का अंत क्या होगा ?"
"मेरे दस लाख रूपए हजम करने पर भी आप संतुष्ट नहीं हुए।"
देवीदयाल ने व्यंग्य से मुस्कराकर कहा-"आ गए न अपनी औकात पर।"
"क्या बकवास कर रहे हो ?"
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"दस लाख रूपए का चैक खुद तुमने मेरे नाम से कैश करा लिया था।"
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"खूब ! मुझे मालूम है तुमने यही आरोप लगाया था दस लाख रूपए हज्म करने के बाद ।"
"किसने आरोप लगाया था...उसका हुलिया तो भगवान के पास है न।
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"भगवान के पास तो जाओगे देर में पहले जेल जाना पड़ेगा।
"अच्छे उद्देश्य के लिए जेल में कोई हर्ज नहीं..मगर तुम धोखाधड़ी से सादा और भोले
आदमियों को कब तक लूटोगे ?"
"तुम मुझे बेइमान समझते हो।"
“समझता नहीं...आप हैं।"
"ठीक है...समझते रहना...पहले इस फाइल पर दस्तखत करो।"
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"इन कागजों पर तो मर जाऊं तो भी अपने हस्ताक्षर नहीं करूंगा...वह बंगला मेरे पुरखों का है-वह तो दस करोड़ में भी नहीं दूंगा...और तुम जैसे आदमी को तो किसी मूल्य पर नहीं दूंगा।" फिर वह झटके से उठा।
सेठ दौलतराम भी झटके से खड़ा हो गया और गुस्से से बोला-"ठहरो मास्टर।"
"अब तो एक पल ठहरना भी हराम है।"
"तुम अपनी मर्जी से यहां से नहीं जा सकते।"
।
"मैं भगवान की मर्जी से जा रहा हूं।"
"यह कॉटेज सेठ दौलतराम का है-तुम्हारे भगवान का नहीं।"
"भगवान के प्रकोप से डरो सेठ...खाक हो जाओगे।"
“पहले तुम मौत से डरो।"
अचानक सेठ दौलतराम ने रिवाल्वर निकाल लिया और देवीदयाल पर तानकर बोला-"वह सामने फाइल पड़ी है उस पर हस्ताक्षर करो।"
“फाइल पर तो तुम्हारे फरिश्ते भी अब मेरे हस्ताक्षर नहीं करा सकते।"
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सेठ ने फाइल उठाकर देवीदयाल की ओर बढ़ाकर कहा-“चलो ! साइन करो वरना जिन्दगी से हाथ धो बैठोगे।"
देवीदयाल ने फाइल की ओर हाथ बढ़ाया, फिर अचानक उसने दौलतराम के रिवाल्वर पर झपट्टा मारा...मास्टर जी पर भी हल्का-सा नशा था इसलिए उसका जरा भी डर नहीं लगा...दोनों आपस में गुत्थमगुत्था हो गए, दौलतराम को अपनी जिन्दगी खतरे में नजर आने लगी-उन्हें लगा देवीदयाल पर जुनून सवार है...उनकी कोशिश अब यही थी कि देवीदयाल के सीने में गोली उतर ही जानी चाहिए, चाहे इसका परिणाम कुछ भी हो।
वह यह नहीं जानते थे कि पीछे से प्रेम यह सब देख रहा है...उसके पास कैमरा भी है। वास्तव में प्रेम ने यह इन्तजाम पहले ही कर रखा था, क्योंकि वह सेठ दौलतराम की ऐयाशियों का राजदार था-कॉटेज के बारे में उसे पूरी जानकारी थी-कॉटेज की एक चाबी उसके पास रहती थी।
कॉटेज के पिछले साऊंड प्रूफ कमरे के टायलेट का एक दरवाजा पिछवाड़े खुलता था जहां से सफाई वाला कर्मचारी आता था वैसे आमतौर पर यह दरवाजा बंद रहता था।
प्रेम देवीदयाल जी को अंदर पहुंचाकर कार दूर खड़ी करके पिछवाड़े के दरवाजे से टायलेट में आकर साउंड प्रूफ कमरे में आ गया था और दरवाजे में झिरी बनाकर यह दृश्य देख रहा था...उसका कैमरा फोटो खींचने के लिए तैयार था।
एक बार देवीदयाल सेठ दौलतराम पर पूरी तरह छा गया। सेठ के पांच उखड़ गए-देवीदयाल उन्हें रगेदता हुआ पीछे ले जाने लगा..इस हालत में रिवाल्वर की नाल उनकी छाती की तरफ हो गया और एक जगह सेठ दौलतराम को पीछे से ठोकर लगी तो उनके हाथ में दबे रिवाल्वर का ट्रिगर दब गया...प्रेम ने इस बात का खास ध्यान रखा था कि गोली की आवाज दूर तक न जाए.इसलिए रिवाल्वर में सायलेंसर फिट था।
गोली देवीदयाल के सीने में उतर गई-उनके गले से भिंची-भिंची-सी चीख निकली-साथ ही प्रेम ने कैमरे का बटन दबा दिया और फोटो खिंच गई।
देवीदयाल लड़खड़ाकर पीछे गिर गए-उनके सीने से खून का फव्वारा-सा उबल पड़ा था और सेठ दौलतराम का रिवाल्वर अब भी उसकी ओर तना हुआ था। उसकी सांस फूल रही थी...प्रेम ने कैमरा क्लिक किया और दूसरा फोटो भी खिंच गया।
सेठ दौलतराम का नशा हिरण हो चुका था-उनके सामने मास्टर देवीदयाल की लाश पड़ी थी और हाथ में रिवाल्वर था..मोटे कालीन पर खून के छींटे और स्वंय उनके कपड़ों पर खून । देवीदयाल की आंखों में फांसी का फंदा घूम गया...उन्होंने झुरझुरी-सी ली और भयभीत ढंग से बड़बड़ाए-"नहीं...!"