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Romance फिर बाजी पाजेब

"अच्छा ! आपने स्कूल बनाने को लिखा है या बंगला हजम करने को ?"

"क्या ?"

“सेठजी !" देवीदयाल ने फाइल देखकर कहा-"मैं जानता हूं, धनवान का धर्म केवल पैसा होता है-और आप धनवान हैं।"

"यह क्या बकवास है ?"

"यह बकवास नहीं...सच्चाई है।"

"तो आपका धर्म बनावटी, पाखंड नहीं ?"

"ईश्वर के प्रकोप से डरिए-झूठ फरेब से जायदाद हटाने का अंत क्या होगा ?"

"मेरे दस लाख रूपए हजम करने पर भी आप संतुष्ट नहीं हुए।"

देवीदयाल ने व्यंग्य से मुस्कराकर कहा-"आ गए न अपनी औकात पर।"

"क्या बकवास कर रहे हो ?"

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"दस लाख रूपए का चैक खुद तुमने मेरे नाम से कैश करा लिया था।"

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"खूब ! मुझे मालूम है तुमने यही आरोप लगाया था दस लाख रूपए हज्म करने के बाद ।"

"किसने आरोप लगाया था...उसका हुलिया तो भगवान के पास है न।



"भगवान के पास तो जाओगे देर में पहले जेल जाना पड़ेगा।

"अच्छे उद्देश्य के लिए जेल में कोई हर्ज नहीं..मगर तुम धोखाधड़ी से सादा और भोले

आदमियों को कब तक लूटोगे ?"

"तुम मुझे बेइमान समझते हो।"

“समझता नहीं...आप हैं।"

"ठीक है...समझते रहना...पहले इस फाइल पर दस्तखत करो।"



"इन कागजों पर तो मर जाऊं तो भी अपने हस्ताक्षर नहीं करूंगा...वह बंगला मेरे पुरखों का है-वह तो दस करोड़ में भी नहीं दूंगा...और तुम जैसे आदमी को तो किसी मूल्य पर नहीं दूंगा।" फिर वह झटके से उठा।

सेठ दौलतराम भी झटके से खड़ा हो गया और गुस्से से बोला-"ठहरो मास्टर।"

"अब तो एक पल ठहरना भी हराम है।"

"तुम अपनी मर्जी से यहां से नहीं जा सकते।"



"मैं भगवान की मर्जी से जा रहा हूं।"

"यह कॉटेज सेठ दौलतराम का है-तुम्हारे भगवान का नहीं।"

"भगवान के प्रकोप से डरो सेठ...खाक हो जाओगे।"

“पहले तुम मौत से डरो।"

अचानक सेठ दौलतराम ने रिवाल्वर निकाल लिया और देवीदयाल पर तानकर बोला-"वह सामने फाइल पड़ी है उस पर हस्ताक्षर करो।"

“फाइल पर तो तुम्हारे फरिश्ते भी अब मेरे हस्ताक्षर नहीं करा सकते।"

-

सेठ ने फाइल उठाकर देवीदयाल की ओर बढ़ाकर कहा-“चलो ! साइन करो वरना जिन्दगी से हाथ धो बैठोगे।"

देवीदयाल ने फाइल की ओर हाथ बढ़ाया, फिर अचानक उसने दौलतराम के रिवाल्वर पर झपट्टा मारा...मास्टर जी पर भी हल्का-सा नशा था इसलिए उसका जरा भी डर नहीं लगा...दोनों आपस में गुत्थमगुत्था हो गए, दौलतराम को अपनी जिन्दगी खतरे में नजर आने लगी-उन्हें लगा देवीदयाल पर जुनून सवार है...उनकी कोशिश अब यही थी कि देवीदयाल के सीने में गोली उतर ही जानी चाहिए, चाहे इसका परिणाम कुछ भी हो।

वह यह नहीं जानते थे कि पीछे से प्रेम यह सब देख रहा है...उसके पास कैमरा भी है। वास्तव में प्रेम ने यह इन्तजाम पहले ही कर रखा था, क्योंकि वह सेठ दौलतराम की ऐयाशियों का राजदार था-कॉटेज के बारे में उसे पूरी जानकारी थी-कॉटेज की एक चाबी उसके पास रहती थी।

कॉटेज के पिछले साऊंड प्रूफ कमरे के टायलेट का एक दरवाजा पिछवाड़े खुलता था जहां से सफाई वाला कर्मचारी आता था वैसे आमतौर पर यह दरवाजा बंद रहता था।

प्रेम देवीदयाल जी को अंदर पहुंचाकर कार दूर खड़ी करके पिछवाड़े के दरवाजे से टायलेट में आकर साउंड प्रूफ कमरे में आ गया था और दरवाजे में झिरी बनाकर यह दृश्य देख रहा था...उसका कैमरा फोटो खींचने के लिए तैयार था।

एक बार देवीदयाल सेठ दौलतराम पर पूरी तरह छा गया। सेठ के पांच उखड़ गए-देवीदयाल उन्हें रगेदता हुआ पीछे ले जाने लगा..इस हालत में रिवाल्वर की नाल उनकी छाती की तरफ हो गया और एक जगह सेठ दौलतराम को पीछे से ठोकर लगी तो उनके हाथ में दबे रिवाल्वर का ट्रिगर दब गया...प्रेम ने इस बात का खास ध्यान रखा था कि गोली की आवाज दूर तक न जाए.इसलिए रिवाल्वर में सायलेंसर फिट था।

गोली देवीदयाल के सीने में उतर गई-उनके गले से भिंची-भिंची-सी चीख निकली-साथ ही प्रेम ने कैमरे का बटन दबा दिया और फोटो खिंच गई।

देवीदयाल लड़खड़ाकर पीछे गिर गए-उनके सीने से खून का फव्वारा-सा उबल पड़ा था और सेठ दौलतराम का रिवाल्वर अब भी उसकी ओर तना हुआ था। उसकी सांस फूल रही थी...प्रेम ने कैमरा क्लिक किया और दूसरा फोटो भी खिंच गया।

सेठ दौलतराम का नशा हिरण हो चुका था-उनके सामने मास्टर देवीदयाल की लाश पड़ी थी और हाथ में रिवाल्वर था..मोटे कालीन पर खून के छींटे और स्वंय उनके कपड़ों पर खून । देवीदयाल की आंखों में फांसी का फंदा घूम गया...उन्होंने झुरझुरी-सी ली और भयभीत ढंग से बड़बड़ाए-"नहीं...!"
 
ठीक उसी समय किसी ने बाहर से घंटी बजाई और उनके हाथ से रिवाल्वर छूटकर गिर पड़ा। प्रेम दरवाजे की झिरी से सबकुछ देख रहा था-दौलतराम के चेहरे से गहरी डर की परछाइयां झलकने लगीं।

घंटी की आवाज फिर गूंजी...उन्होंने हड़बड़ाकर इधर-उधर देखा...उनके पास इतना समय नहीं था कि वह लाश को खींचकर कहीं छिपा दें...कहीं नहीं तो सोफे के पीछे डाल देते-मगर खून जो कालीन पर सामने दिखाई दे रहा था, उसका क्या हो सकता था।

घंटी फिर बजी और उन्होंने लड़खड़ाते कदम बढ़ाए-दरवाजे के पास पहुंचकर उनहोंने सोचा, प्रेम होगा और वह तो अपना ही आदमी हे-खुद प्रेम ही ने कहा था कि जरूरत पड़ी तो रिवाल्वर से काम लिया जाएगा-इस कॉटेज के बारे में केवल प्रेम ही को ज्ञान है...वह जरूर मेरी मदद करेगा...कांपते होंठों से उन्होंने पूछा-"क...क....कौन

.

बाहर से आवाज आई-“मालिक ! मैं हूं कैलाश।"

-

सेठ दौलतराम के मस्तिष्क में एक जोरदार छनाका-सा हुआ–“यह तो कैलाश है।" उन्होंने सोचा-"कैलाश तो भरोसे का आदमी है-कैलाश तो खानदानी नमकहलाल आदमी है...हां हां, कैलाश जरूर मेरी मदद करेगा।"

सेठ दौलतराम ने जल्दी से दरवाजा खोल दिया। कैलाश न उनका बिगड़ा हुआ हुलिया देखा तो

आश्चर्य से बोला-"क्या हुआ मालिक ?"

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दौलतराम ने कैलाश को बांह पकड़कर अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर लिया साथ ही कैलाश की नजरें देवीदयाल की खून से लथपथ लाश पर पड़ीं और वह बूरी तरह हड़बड़ाकर पीछे हटता हुआ बोला-“हे भगवान ! यह सब क्या है

सेठ दौलतराम ने हकलाकर कहा-“म...म...मैं मारना नहीं चाहता था।"

"त...त...तो...आपने...।"

"नहीं...नहीं...कैलाश, मैं सौगन्ध खाता हूं...मेरा इरादा इन्हें मारने का नहीं था...देवीदयाल ने ही मेरे ऊपर हमला किया था।"

"मगर बात क्या थी मालिक ?"

"वह...मास्टर जी...बेईमान थे..मेरे...पूरे दस लाख रूपए हजम कर गए थे।"

“यह आप क्या कहते हैं मालिक ? मास्टर जी तो...जन सेवा...।"

"दुनिया उन्हें यही समझती थी...मगर उनकी असलियत मैं पहचान गया था।"

"हे भगवान !"

“क्या तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं कैलाश ?"

"यह आप क्या कह रहे हैं मालिक, भला मैं आप पर विश्वास नहीं करूंगा।"

"तो...फिर...मुझे बचा लो कैलाश।" अचानक दौलतराम ने गिड़गिड़ाकर कैलाश के पांव पकड़ने चाहे तो कैलाश जल्दी से पीछे हट गया।

"यह आप क्या कर रहे हैं मालिक ? मैंने आपका नमक खाया है...आपको बचाने के लिए मैं अपनी जान भी दे सकता हूं।"

प्रेम अंदर से दोनों की बातें 'टेप' कर रहा था।

सेठ दौलतराम ने गिड़गिड़ाकर कहा-"कैलाश–मेरी जान बहुत कीमती है...तुम किसी तरह मेरी जान बचा लो...कानून से तुम्हें बचाने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा दूंगा।"

"मालिक ! मुझे शर्मिंदा मत कीजिए...आप अपने ऊपर काबू रखने की कोशिश कीजिए...सब ठीक हो जाएगा।"

"चलो...जल्दी करनी है। कहीं प्रेम न आ जाए।"

"आप जल्दी से यह कपड़े उतारकर दूसरा लिबास पहन लें..मैं यह कपड़े धो डालूंगा–बाथरूम में ही इन्हें कहीं छुपा दीजिए।

" कैलाश ! मैं तुम्हार उपकार सात जन्मों तक नहीं भूलूंगा।"

"जल्दी कीजिए मालिक।"

प्रेम बिजली की फुर्ती से कैमरा और फाइल सतेत...जो उसने पहले ही अंदर सरका ली थी, टायलेट में घुसकर पिछले रास्ते से निकला और दरवाजा मिलाकर भेड़ दिया। सेठ दौलतराम जब तक बाथरूम में पहुंचा, प्रेम जा चुका था।

कैलाश ने जल्दी से रिवाल्वर पर से उंगलियों के निशान मिटाए और उसे अपनी जेब में रख लिया अब रिवाल्वर पर उसकी उंगलियों के निशान बन गए थे...फिर उसने दरवाजा खोला अन्दर की बत्ती बुझाकर कार की डिक्की खाली और अंदर से देवीदयाल की लाश को कार की डिक्की में रख दिया, फिर वापस काटेज में आकर दरवाजा बंद करते उसने रोशनी कर ली-कालीन पर से खून के धब्बे साफ किए जिसके लिए उसे पैट्रोल का भी प्रयोग करना पड़ा.. तब तक सेठ दौलतराम नहाकर दूसरे लिबास में आ गए थे।

"लाश कहां गई ?" उन्होंने आते ही पूछा।

"कार की डिक्की में।"

"नहीं...!"

"घबराइए मत, डिक्की कोई खोलकर नहीं देखेगा।"

"मगर "

"मैं पहले आपका लिबास धो डालूंगा, कालीन तो मैंने साफ कर दिया है...फिर लाश ठिकाने लगाने ले जाऊंगा।"

"तुम...बहुत अच्छे...वफादार हो कैलाश।"

.

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"मालिक ! मैं तो आपका सेवक और नमकहलाल हूं।"

फिर कैलाश बाथरूम में कपड़े धाने चला गया। इधर प्रेम अब बाहर वाले कम्पाउंड में आकर कैलाश को डिक्की में लाश भी रखते देख चुका था और उसकी बातें भी सुन चुका था। उसने सोचा-'चलो यह भी अच्छा हुआ, जो काम मुझे करना था वह कैलाश कर रहा है। फिर उसने सोचा-'लेकिन कैलाश सेठ साहब का खानदानी नौकर है...आगे चलकर मुझे उन तस्वीरों से बहुत काम लेना पड़ेगा। अगर कैलाश सेठजी की ढाल बन गया तो हो सकता है वह मेरे काम में रूकावट बने...बेहतर है कि कैलाश को रास्ते से हटा दिया जाए-बड़ा आसान तरीका है...कैलाश तो दीनदयाल की लाश ठिकाने लगाएगा...अगर पुलिस कैलाश को लाश ठिकाने लगाते पकड़ ले तो कैलाश कभी यह नहीं कहेगा कि 'कत्ल सेठजी ने किया है-मास्टर जी की हत्या का आरोप अपने सिर ले लेगा-हां, मुझे यही करना चाहिए...यही करना चाहिए।
 
प्रेम बड़ी तेजी से बाहर आ गया। कुछ देर बार उसकी कार सड़क पर दौड़ रही थी। फिर एक पब्लिक टेलीफोन बूथ के सामने रूककर बूथ में घुसकर उसने इलाके के पुलिस स्टेशन का नम्बर घुमाया।

“यस ! अंधरी पुलिस स्टेशन ।'

प्रेम ने माउथ पीस पर रूमाल डालकर अपनी आवाज बदलते हुए बोला-“देखिए, एक आदमी एक लाश ठिकाने लगाने जा रहा है।"

"आप कौन बोल रहे हैं ?"

"आपको इससे गुरेज नहीं होनी चाहिए, क्योंकि मैं जिसके बारे में खबर दे रहा हूं वह मेरी जान का दुश्मन भी बन सकता है।

"आप कहां से बोल रहे हैं ?"

"मैं अंधेरी ही के इलाके में हूं..लाश वरसोवा के इलाके ही में ठिकाने लगाई जाएगी...आप गाड़ी का माडल और नम्बर नोट कर लीजिए।" और प्रेम ने गाड़ी का माडल, रंग और नम्बर नोट करा दिए और आखिर में बोला-

"जल्दी से इन्तजाम कीजिए।"

"हम अभी ‘गश्ती स्क्वाड' को वायरलेस करते हैं।"

प्रेम ने झट डिस्कनेक्ट करके डायल घुमा दिया।

-

फिर वह जल्दी से बाहर आकर कार में सवार हुआ और इंजन स्टार्ट करके कार को 'यू' टर्न देने लगा। चंद क्षण बाद ही पुलिस की पैट्रोल कार हरकत में आ गई।

प्रेम धीरे-धीरे कार ड्राइव करने लगा...उसे खुशी थी कि वह अपनी स्कीम में कामयाब हो गया है।

कैलाशनाथ कपड़े धोकर बाहर आया तो उसने देखा सेठ दौलतराम हिस्की के बूंट ले रहा है। कैलाश को देखकर उसने जल्दी से पूछा

"क्या हुआ कैलाश ?"

"मालिक लिबास पूरी तरह धो दिया है।"

"भगवान के लिए लाश जल्दी से यहां से ले जाओ-कहीं मुझे अटैक न हो जाए।"

"आप सन्तुष्ट रहिए..आपके ऊपर कोई बात नहीं आएगी।" और बोला-"आप दरवाजा अंदर से बंद कर लें और सावधान रहिए।"

कैलाश बाहर आ गया-कुछ देर बाद वह कार कम्पाउंड से बाहर निकाल रहा था फिर कुछ ही दूर कार चली होगी कि पीछे से पुलिस की पैट्रोलिंग कार का सायरन गूंजा।

कैलाश के हाथ-पांव फूल गए-उसने सोचा, हो सकता है कहीं कोई रेड पड़ रही हो...उसने पैट्रोलिंग की कार को रास्ता दे दिया और कार रोक ली। पुलिस की गाड़ी से कई सिपाही कूदे और उन्होंने कार को चारों तरफ से घेर लिए...इंस्पेक्टर ने कैलाश से कहा

"नीचे उतरो।"

कैलाश के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं, लेकिन वह अपने आपको शांत रखने की कोशिश करता हुआ दरवाजा खोलकर उतर आया और थूक निगलकर फंसी-फंसी आवाज में बोला

"क...क...क्या बात है साहब ?"

इंस्पेक्टर ने कड़े स्वर में कहा-"डिक्की खोलकर दिखाओ।"

"स...स...साहब !"

"जल्दी करो।"

कैलाश ने कांपते हाथों से 'इग्नीशन' से चाबियां निकालकर डिक्की का लॉक खोला-एक पुलिसमैन

ने ढक्कन उठाया और दूसरे ने टार्च की रोशनी अंदर डाली। कैलाश का चेहरा पीला पड़ गया।

"सूचना सच्ची थी साहब ।“ कांस्टेबल ने कहा

"लाश डिक्की में मौजूद है।"

इंस्पेक्अर ने कहा-“गिरफ्तार कर लो।"

कैलाश के हाथों में हथकड़ियां पड़ गई-एक कांस्टेबल ने उसकी जेब टटोली और बोला-"रिवॉल्वर भी मौजूद है। उसने रूमाल से पकड़कर रिवाल्वर भी निकाला और इंस्पेक्टर को दे दिया।

इंस्पेक्टर ने कहा-"हूं ! तो इसी रिवाल्वर से खून किया है तुमने ?'

"ज...ज...जी !"

"और लाश ठिकाने लगाने ले जा रहे थे।"

"ज...ज...जी हां।"

"किसके ड्राइवर हो ?"

"स...स....सेठ दौलतरामजी का।"

"क्या दौलत बिल्डर्स वाले ?"

"ज...ज...जी हां।"

"और-लाश किसकी है ?"

“जी...म...म...मास्टर देवीदयाल शर्मा की।"

इंस्पेक्टर उछलकर बोला-"देवीदयाल शर्मा...वह स्वतंत्रता सेनानी?"

"ज...ज...जी हां।"

"मगर उनसे तुम्हारी क्या दुश्मनी थी ?"

"ज...ज...जी वह...वह मेरे मालिक को जान से मारना चाहते थे।"

"क्यों ?"

"उनके बंगले का कोई चक्कर था।"

अचानक पीछे से प्रेम की कार की हैडलाइट्स पड़ी और कार रूक गई-वे लोग देखने लगे तो कार में से उतरता हुआ प्रेम बोला-"अरे कैलाश, क्या हुआ है ?" फिर वह डिक्की में रोशनी देखकर चौंक पड़ा-“यह रोशनी कैसी है ?"

"आप कौन हैं ?" इंस्पेक्टर ने प्रेम को घूरकर पूछा।

"जी-मैं प्रेम कुमार शर्मा ।"

"इस ड्राइवर को कैसे जानते हैं ?"

"आफिसर ! जिस बिल्डर के यहां यह कैलाश ड्राइवर है उन्हीं के यहां मैं असिस्टैंट मैनेजर हूं।"

"ओहो !"

"मगर यह लाश किसकी है ? कैलाश इसे कहां ले जा रहा था ?"

"ठिकाने लगाने...यह मास्टर देवीदयाल की लाश है।"

प्रेम जैसे अनायास उछल पड़ा हो। कैलाश ! तुमने मास्टरजी को मार डाला?"

कैलाश का चेहरा और भी ज्यादा सुत गया। इंस्पेक्टर ने प्रेम से कहा

"मास्टर जी तो महात्मा थे।"

"महात्मा !" प्रेम ने आंखे बनाकर कहा-"अरे, महात्मा के मुखौटे में असल शैतान।"

" व्हाट !"

"अजी साहब..मैं गवाह हूं इस बात का।"

"वह कैसे ?"

 
"इनका बंगला बहुत मशहूर है न....यह बंगले में स्कूल बनाने का नाटक कर रहे थे-दरअसल यह अपना बंगला किसी बिल्डर को मुंहमांगे दामों पर बेचना चाहते थे–मैं गवाह हूं कि मास्टर जी ने बंगले का सौदा पच्चीस लाख में किया था, हमारे मालिक से और वकील से इस बात के कागजात भी तैयार करा लिए गए थे-उन्होंने दस लाख रूपए बिना लिखा-पढ़ी के बेयरर चैक द्वारा पेशगी भी दे दिए थे-उन्हें विश्वास था कि इतने महान स्वतंत्रता सेनानी झूठ भी बोल सकते हैं-वह दस लाख रूपए उन्होंने कैश करवा लिए...और जब मैं फाइनल कागजों पर उनके हस्ताक्षर लेने गया तो वह साफ मुकर गए कि मैंने उन्हें कोई चैक दिया ही नहीं।"

इंस्पेक्टर ने कहा-"यह अदालत का मामला है...इससे हमें कुछ नहीं लेना-देना..मास्टर देवीदयाल का कत्ल हुआ है लाश और रिवॉल्वर मिल गई है...ड्राईवर कैलाश का बयान है कि अपने मालिक को बचाते हुए मकतूल से रिवाल्वर छीनते हुए छीना-झपटी में गोली चल गई...और रिवाल्वर की नाल चूंकि मास्टरजी की तरफ हो गयी थी...गोली उन्हें लग गई और वह मर गए।"

प्रेम ने कहा-"एग्रीमेंट की फाइलें मेरे पास हैं-मैंने ही उन दोनों की मुलाकात का इन्तजाम किया था।"

इंस्पेक्टर ने कहा-"ड्राइवर बेगुनाह है या नहीं, इसका फैसला तो अदालत ही करेगी.मामला कुछ गहरा लगता है पूरी तफतीश होगी-रिवाल्वर किसका था और इस ड्राइवर के पास कैसे आया ?"

प्रेम ने कहा-"रिवाल्वर कहां है ?"

इंस्पेक्टर ने रूमाल में लिपटा हुआ रिवाल्वर उसे दिखाया।

प्रेम ने झट कहा-"यह रिवाल्वर सेठ साहब का नहीं..मास्टर जी ही कहीं से लाए होंगे...उनकी नीयत ठीक नहीं थी।"

पुलिस इंस्पेक्टर ने कोई राय जाहिर नहीं की और हवलदार से बोला-"अपराधी को पुलिस स्टेशन लेकर चलो-एम्बूलेंस के आने पर मैं लाश जरूरी कार्यवाही के लिए सरकारी हस्पताल में पहुंचकार आऊंगा। और कॉटेज पर पुलिस बिठा दी जाए।"

कैलाश चुपचाप पुलिस वैन में बैठ गया। प्रेम ने कैलाश से कहा-"घबराओ मत-तुम्हें सजा नहीं होगी...होगी भी बहुत कम-मैं सेठजी से कहकर बहुत बड़े वकील का इन्तजाम करता हूं...जमानत की पूरी कोशिश की जाएगी, और प्रेम जीप में बैठकर कॉटेज की तरफ चल पड़ा।

सेठ दौलतराम ने जैसे ही घंटी की आवाज सुनी-उनके हाथ से गिलास गिरते-गिरते बचा। दरवाजे के पास जाकर उन्होंने फंसी-फंसी आवाज में पूछा

"कौन है ?"

"मैं—प्रेम।"

सेठ दौलतराम ने जल्दी से गिलास खाली करके रख दिया और दरवाजा खोला। प्रेम अंदर आया

तो सेठ पीछे हट गया। प्रेम ने दरवाजा बंद करते हुए पूछा

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"यह क्या हो गया सेठजी ?"
 
सेठ दौलतराम ने जल्दी से गिलास खाली करके रख दिया और दरवाजा खोला। प्रेम अंदर आया तो सेठ पीछे हट गया। प्रेम ने दरवाजा बंद करते हुए पूछा

.

"यह क्या हो गया सेठजी ?"

"क्या..?"

"मास्टर जी का खून कैसे हो गया ?"

सेठ का चेहरा पीला पड़ गया उन्होंने कहा-"तुम्हें कैसे मालूम हुआ ?"

"कैलाश कार में लाश ले जाता पकड़ा गया है।''

"नहीं।"

सेठ लड़खड़ाकर पीछे हटकर धम्म से सोफे पर बैठ गया-प्रेम ने जल्दी से कहा-"अपने आपको संभालिए सेठजी।"

"क...क...कैलाश ।"

"घबराइए मत सेठ जी-कैलाश ने कुछ नहीं कहा।"

"क्या मतलब ?"

"उसने आपका 'इल्जाम' अपने सिर ले लिया है।"

"ओहो !"

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"यह तो अच्छा हुआ कि मैं ठीक समय पर वहां पहुंच गया।"

"मगर तुम्हें कैसे मालूम कि कैलाश ने मेरा अपराध अपने सिर ले लिया ?"

"सर ! वह रिवाल्वर आपके लिए लेकर रखा था जिससे आपने गोली चलाई और वह रिवाल्वर कैलाश के पास से पुलिस को मिल गया है।"

“मगर मैंने खून नहीं किया।"

"फिर किसने किया है ?"

"पहले तुम बताओ...तुम कहां रह गए थे ?"

"सर ! मैं तो एक खूबसूरत सोसाइटी गर्ल की तलाश में गया था-एक लड़की का इन्तजार था...जब बहुत देर हो गई तो मैंन सोचा, इधर कोई गड़बड़ न हो जाए इसलिए लौट आया....रास्ते में कैलाश को पुलिस के साथ देखा...आपकी गाड़ी जो कैलाश ले जा रहा था-साइड में खड़ी थी...और लाश अभी तक डिक्की में रखी थी।"

"कैलाश ने बड़ी वफादारी और कुर्बानी की है मेरे लिए-मगर...।"

"मगर क्या ?"

"मुझे डर है कि मौत के डर से और अपनी पत्नी और बच्चे के भविष्य का विचार उसे पुलिस स्टेशन पर पहुंचकर अपना बयान बदल न दे।"

"मेरा विचार है कैलाश ऐसा नहीं करेगा।"

"तुम किसी तरह उस तक यह खबर पहुंचा दो कि मैं उसकी पत्नी और बेटे की पूरी देखभाल करूंगा।"

"वह तो मैं कर ही दूंगा, मगर मैं आपकी जबान से विस्तार से सुनना चाहता है।"

सेठ दौलतराम ने वही सब बताया जो हुआ था...आखिर में कहा-"मैं लाश ठिकाने के लिए तुम्हारा इन्तजार कर रहा था कि कैलाश आ गया और उसने सब कुछ कर दिया। मैं तो समझा था उसने लाश को ठिकाने लगा दिया होगा।"

"खैर-जो कुछ हुआ अच्छा हुआ। कैलाश लाश के साथ पकड़ा गया-अगर न पकड़ा जाता और लाश किसी गटर में फेंक देता और लाश पुलिस को मिल जाती...सी. आई. डी. इन्क्वायरी करती तो मास्टरजी के घरवालों द्वारा बात आप तक जरूर पहुंचती और आपकी पोजीशन सन्देहजनक हो जाती।"

“तुम ठीक कहते हो-मगर कैलाश का बचना भी जरूरी है-हमारा पुरखों से चला आ रहा विश्वसनीय नौकर है।"

"उसे मौत की सजा तो हो नहीं सकती, क्योंकि उसके लिए तीन साक्षियों की जरूरत होती है और यहां केवल मास्टरजी, आप और कैलाश ही थे...आप भी कैलाश के बयान का समर्थन ही करेंगे।"

"नि:संदेह।"

"वैसे भी कैलाश का कोई निजी बैर तो था नहीं-फिर वह उन्हें क्यों मारता।"

"तुम ठीक कहते हो।"

"इसके अलावा कैलाश की सफाई के लिए आप बड़े से बड़ा वकील कर लें।"

"उसका बन्दोबस्त कल ही हो जाएगा।"

"बस तो आप निश्चिन्त होकर बैठिए।"

सेठ दौलतराम अपने लिए फिर ह्विस्की का गिलास भरने लगा।

विद्यादेवी ने पुराने वाल-क्लाक के घंटे सुने, रात के ग्यारह बज रहे थे....उनके चेहरे से चिन्ता झलकने लगी...उन्होंने सुनीता की ओर देखा जो बड़े ध्यान से होमवर्क कर रही थी। उन्होंने सुनीता को पुकारकर कहा-"देख तो बेटी...अभी तक तेरे बाबूजी लौटकर नहीं आए।"

"कहां गए थे ?"

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"सेठ दौलराम के यहां।"

"हे भगवान !"

"जरा अशोक को तो बुला ला।"

"अशोक भैया इस समय कहां जाएंगे ?"

"मैं उससे सेठजी के यहां फोन कराऊंगी।"

“फोन नम्बर है आपके पास ?"

“फोन नम्बर तो वह जाते ही मुझे दे गए थे मेरा मन तो पहले ही खटका था-मैंने रोकना चाहा...मगर न जाते तो उनपर दस लाख रूपयों की बेईमानी का दोष मढ़ दिया जाता।"

"मैं अभी अशोक भैया को बुलाकर लाती हूं।" सुनीता जल्दी से कापी बंद करके बाहर आई।
 
बरामदे में पहुंची ही थी कि फाटक पर एक कार रूकी..रोशनी का झमाका भी हुआ तो वह ठिठककर रूक गई-पीछे से विद्यादेवी आ गईं।

"किसकी कार है ?"

"शायद बाबूजी आए हों टैक्सी में।"

इतने में प्रेम कार से उतरकर फाटकर खोलने लगा तो विद्यादेवी समाने आकर बोलीं-"हे भगवान ! यह तो सेठजी का आदमी है।"

प्रेम उनके पास आ गया और हाथ जोड़कर बड़ी मुश्किल से भारी आवाज में बोला-"नमस्ते भाभी जी।"

"नमस्ते भइया ! मास्टरजी नहीं आए।"

"मैं आपके पास इसीलिए आया हूं-इतनी रात गए।"

"क्या मतलब !"

"देखिए भाभीजी, मैं आपको मां समान समझता हूं और सुनीता को अपनी बेटी समान।"

"भगवान के लिए...बताइए न।"

"भाभीजी, कभी-कभी सीने पर पत्थर भी रख लेना पड़ता है, क्योंकि 'होनी' को कोई नहीं टाल सकता।"

सुनीता और विद्यादेवी के कलेजे दहल गए... विद्यादेवी ने जल्दी से कहा-"बात क्या है ? कहां हैं मास्टरजी ?"

"मास्टर जी...हम सबसे अच्छी जगह हैं।"

"क...क...क्या मतलब ?"

प्रेम ने झूठमूठ के आंसू पोंछते हुए भारी आवाज में कहा



"मास्टरजी परलोक सिधार गए हैं।"

"नहीं.!" विद्यादेवी लड़खड़ाकर पीछे हट गईं-उनकी आंखों में जैसे अंधेरा-सा छा गया। सुनीता के गले से चीख निकली

"बाबूजी..मेरे बाबूजी कहां हैं ?"

"बेटी-बेटी-।" प्रेम जल्दी से बोला।

अचानक विद्यादेवी ने अपनी चूड़ियां तोड़ डाली...माथे की बिन्दिया नोचकर फूट-फूटकर रोने लगी...अचानक अशोक की आवाज आई

"मौसी-सुनीता...क्या हुआ ?"

"भैया...बाबूजी...!"

.

.

अशोक जल्दी से पास आता हुआ बोला-"मास्टर जी-क्या हुआ उनको।

प्रेम ने मगरमच्छ के-से आंसू पोंछते हुए भारी आवाज में कहा

"मास्टर जी का खून हो गया है।"

"हां अशोक ।" और सुनीता अशोक से लिपटकर रोने लगी।

प्रेम ने आंसू पोंछकर रूंधे गले से कहा

"सेठ दौलतराम मेरे मालिक सही...लेकिन मालिक की बुराइयों पर पर्दा डालना भी पाप है...वह किसी भी हालत में यह बंगला लेना चाहते...फाइव स्टार होटल के लिए।

"जब आपको मालूम था। विद्यादेवी ने कहा

"तो फिर आपने इनकी मुलाकात सेठ साहब के साथ रखवाई ही क्यों ?"

"मैं अपने इस पाप से सात जन्मों तक मुक्ति नहीं पा सकता–भाभीजी-मैं न व्यापारी हूं, न धनवान, न मुझे चालाकी आती है-सेठ जी का ख्याल था कि मास्टर जी कुछ न कुछ लिहाज मेरा जरूर करने लगे हैं।" उसने हल्की सांस ली और बोला-"बस...सेठजी ने इसी बात का लाभ उठाया-उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि वह मास्टरजी के हाथों स्कूल बनवाएंगे-मैं उनकी बातों में आ गया-बस मुझसे यही भूल हो गई।'

सुनीता ने उसे ध्यान से देखकर कहा-"जब यह सब हुआ तो आप कहां थे?"

"मैं-मैं तो तब पहुंचा जब कैलाश मास्टरजी को मार चुका था।"

"कैलाश !" विद्यादेवी चौंककर बोलीं-"कौन है यह कैलाश ?"

“सेठजी का खानदानी चमचा...उनका ड्राइवर कैलाश...उसकी पीठ पर सेठजी का हाथ है-उसने सेठजी से कहा था कि वह मास्टर जी से कागजात पर दस्तखत कराके रहेगा।"

"फिर ?"

"वह बड़ा जालिम और निर्दयी आदमी है-उसने जरूर मास्टरजी पर जोर डाला होगा...लेकिन मैं जानता हूं सेठजी अपने इरादे के बड़े पक्के हैं...मास्टरजी ने इनकार कर दिया होगा और कैलाश ने उन्हें मार डाला।

"आप उस समय कहां थे?"

"मुझे सेठजी ने जुहू भेज दिया था। वह समझते थे कि मैं मास्टरजी के साथ कोई ज्यादती नहीं होने दूंगा।"

"फिर ?"

"मैं जुहू से वरसोवा आ रहा था, तब रास्ते में मैंने देखा कि कैलाश को लाश के साथ पकड़ लिया है।"

“पकड़ा गया..अच्छा है...भगवान करे कुत्ते को फांसी लग जाए।

“ऐसा तो संभव नहीं है बेटी।"

"क्यों ? क्या उसने खून नहीं किया ?"

"बेटी ! आजकल धन से सब कुछ हो सकता है-सेठजी कैलाश को इतनी बड़ी सजा से जरूर बचा लेंगे।"

विद्यादेवी ने कहा-“मास्टरजी ने कागजात पर हस्ताक्षर तो नहीं किए होंगे ?"

"नहीं...यह तो मैं जानता हूं।"

विद्यादेवी पूरे आत्मविश्वास व दृढ़ता से बोली-"अगर कर भी दिए हों तो कोई फर्क नहीं पड़ता...मेरी आखिरी सांस तक तो इस बंगले पर कोई इमारत या होटल नहीं बन सकता-अब तो इस बंगले पर स्कूल ही बनेगा, चाहे कभी भी बने-मेरे ससुरजी का सपना जरूर पूरा होगा।"

"भगवान आपकी जबान शुभ करें।" प्रेम ने कहा-"मैं आपको यही खबर करने आया था–मास्टरजी का शव पोस्टमार्टम के बाद सरकारी हस्पताल से मिलेगा।" फिर उसने उठते हुए कहा-"मास्टर जी ने मुझसे कहा था कि भगवान न करे उन्हें कुछ हो जाए तो मैं आपका और सुनीता बेटी का ध्यान रखू। आप मेरी मां समान हैं-किसी भी परेशानी के समय मुझे याद रखें।"

फिर उसने सुनीता के सिर पर हाथ फेरा और विद्यादेवी के चरण छूकर बाहर निकल गया।

राजेश जगमोहन के कमरे में उसके साथ टेबल लैम्प की रोशनी में स्टडी कर रहा था और साथ-साथ उसे समझाता भी जा रहा था। मगर बीच-बीच में वह चोरों की तरह दरवाजे की ओर भी देख लेता था। एकबार उसने दरवाजे की ओर देखा तो जगमोहन ने पूछा

"तुम बार-बार दरवाजे की तरफ क्यों देखते हो

"यार ! कहीं बड़े मालिक न आ जाएं।"

"अरे....वह दरवाजा अन्दर की ओर है, भला वह अंदर कैसे आ जाएंगे।"

तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई और दूसरे ही क्षण राजेश बैड के नीचे था। जगमोहन ने धीरे से पूछा-"क्या हुआ ?"

"अबे...सुनाई नहीं देता, किसी ने दरवाजा खटखटाया है।"

दस्तक फिर हुई और जगमोहन भी चौंक पड़ा और दरवाजा खोलकर बोला-"नहीं, यहां राजेश नहीं है।"

पारो ने अंदर आते हुए कहा-“चुप रहो गधे।"

राजेश बैड के नीचे से निकल आया । पारो ने चिन्तित स्वर में कहा

“राजेश बेटा, मेरा जी बहुत घबरा रहा है।"

"क्यों मालकिन ? कुशल तो है सब?'

"बेटा-आज चार बजे के गए हुए जगमोहन के डैडी अभी तक नहीं आए हैं।



"तो यह कोई नई बात है...बड़े मालिक तो कभी रात-रात भर नहीं आते-क्यों चिन्ता करती हैं ?"

"पता नहीं बेटा, पहले कभी इस तरह जी नहीं घबराया-ऐसा लगता है कि कोई अनहोनी बात हुई है।"
 
तभी अचानक कार के हार्न की आवाज आई और वे लोग उछल पड़े-राजेश ने तेज स्वर में कहा-“वह आ गए बड़े मालिक।" फिर वह झपटकर खिड़की पर चढ़ा और अंधेरे में गायब हो गया। पारो ने घबराकर जल्दी से कहा-"संभलकर बेटे।"

जगमोहन ने जल्दी से किताबें संभालीं और बैठ गया।

पारो नीचे आई-उन्होंने खुद दरवाजा खोला–सेठ दौलतराम ड्राइविंग सीट से उतर रहे थे...उनके चेहरे से थकन और परेशानी झलक रही थी। पारो ने आगे बढ़कर कहा-"धन्य हो भगवान ! मैं आज बहुत परेशान हो रही थी आपके लिए.आज इतनी देर क्यों हो गई ?"

दौलतराम ने कुछ नहीं कहा...वह अंदर आ गए-उनके पीछे-पीछे पारो भी अंदर आई। उनकी खामोशी और चेहरा देखकर उनके दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं...उन्होंने कहा-"आप बोलते क्यों नहीं ?"

सेठ दौलतराम काउंटर पर बैठकर पैग बनाने लगे तो पारो ने कहा

"यह कौन-सा समय है पीने का ?"

सेठ ने ह्विस्की बोती निकाले हुए कहा-"आज मैं बहुत परेशान हूं पारो।"

"वह तो मैं देख रही हूं-मगर कारण क्या है ?"

"बहुत गजब हो गया है पारो।" सेठ ने पैग से चूंट लेते हुए कहा।

पारो ने परेशान होकर कहा-"भगवान के लिए कुछ बताइए तो सही।"

"कैलाश गिरफ्तार हो गया है।"

पारो उछल पड़ी-"क्या ! कैलाश गिरफ्तार हो गया है. मगर क्यों ?"

"उसने मास्टर जी का खून कर दिया है।"

"कौन मास्टर जी ?"

"मास्टर जी...मशहूर स्वतंत्रता सेनानी देवीदयाल शर्मा ।"

"नहीं...!"

सेठ ने यूंट भरा और बोले-"मैंने प्रेम को उसके बचाव के लिए वकील करने भेजा है।"

“मगर उसने इतना खतरनाक कदम उठाया क्यों ? भला कैलाश की मास्टर जी से क्या दुश्मनी थी "

"मुझे नहीं मालूम-मैंने तो मास्टरजी को बुलाया था बंगले का सौदा करने के लिए. मगर...।"

“कहां बुलाया था ?"

“वारसोवा...अपने एक दोस्त के कॉटेज पर।"

"आफिस में क्यों नहीं बुला लिया ? अपने बंगले ही में बुला लेते।

सेठ ने झुंझलाकर कहा-"तुम तो बात की खाल निकालती हो।"

"भगवान के लिए सच-सच बताइए मुझे...मेरा दिल डूबा जा रहा है।"

“अब क्या मैं झूठ बोल रहा हूं।"

"मुझे बताइए क्या हुआ था ?"

"तुम तो जानती हो कि पुराने बंगले खरीदकर मैं बिल्डिंगें खड़ी करता हूं.. सिचुएशन अच्छी हो तो फाइव स्टार होटल।"

"हां।"

"मास्टर जी का बंगला पुराना भी था और सिचुएशन भी अच्छी थी। एक दिन अचानक मेरी नजर उस बंगले पर पड़ी-मैंने मास्टर जी से बात की तो उन्होंने बेचने से इंकार कर दिया। मैंने असिस्टैंट मैनेजर को भेजा तो वह पचास लाख पर राजी हो गए. मैंने दस लाख रूपए एडवांस मनी के चैक द्वारा भिजवा दिए। उन्होंने चैक तो कैश करा लिया। मगर बंगले का सौदा ज्यादा कीमत पर किसी दूसरे बिल्डर से कर लिया।"

"फिर?"

"मास्टर जी लोकप्रिय और जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी नेता हैं-मैंने सोचा कि अगर इनके साथ कानूनी कार्यवाही की गई तो धनवान और बिल्डर होने के नाते कोई मुझे सच्चा नहीं समझेगा। मैंने प्रेम द्वारा उन्हें समझाने और मामला निबटाने के लिए कॉटेज बुलाया था...सोचा था कुछ और भी दे दूंगा, मगर मास्टर जी अड़ गए कि मुझे आपके हाथ बंगला बेचना ही नहीं-उस वक्त कैलाश वहां मौजूद था-कुछ कहा-सुनी हुई। मास्टर जी ने रिवाल्वर निकाल लिया जो वह साथ लेकर आए थे।"

.

“क्या मास्टर जी रिवाल्वर साथ लेकर आए थे ?"

सेठ दौलतराम झल्लाकर बोला

"तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं..?"

पारो ने उन्हें कुछ शंका भरी नजरों से देखा और बोली-“मैं तो वैसे ही पूछ रही थी-फिर क्या हुआ

?"

"होता क्या ? कैलाश को गुस्सा आ गया-उसने मास्टर जी के हाथ से रिवाल्वर छीन लिया और मेरे देखते-देखते उनके सीने में गोली मार दी।"

"हे भगवान ! मास्टर जी तो महात्मा थे।"

“पारो ! कोई दूसरा चक्कर मालूम होता है, मास्टर जी से कैलाश ने कोई पुरानी दुश्मनी निकाली थी।"

"कैसी दुश्मनी ?"

"यह तो वही जाने।"

"फिर क्या हुआ ?"

"वह मास्टर जी की लाश ठिकाने लगाने ले जा रहा था कि रास्ते में पुलिस ने पकड़ लिया।"

"हे भगवान !"

"मैं उसे बड़ी सजा तो नहीं होने दूंगा, लेकिन आठ-दस साल से कम तो नहीं होगी।"

फिर राजेश और कमला का क्या होगा

"होगा क्या ? वे लोग हमारे खानदानी नौकर हैं-दोनों क्वार्टर में रहेंगे...राजेश को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दे दूंगा...वह कैलाश की जगह मेरा ड्राइवर बन जाएगा।"

पारो कुछ नहीं बोली..सेठ ने यूंट भरकर कहा-“अब एक काम तुम्हें करना है। कमला को अभी तक इस बात की खबर नहीं है-तुम किसी तरह जाकर कमला को यह खबर सुना दो।"

पारो के चेहरे पर एक भूचान-सा नजर आया तो सेठ ने उसे ध्यान से देखते हुए कहा-“तुम झिझक रही हो।"

"मैं सोच रही हूं...कैसे बताऊंगी यह दुःख भरी खबर।"

"अब यह तुम जानो।"

"ठीक है...मैं बताती हूं।"

"उसे समझाना कि बहुत चिनता की कोई बात नहीं-कैलाश को बस सजा होगी चंद बरस की...फांसी नहीं होगी और वह बेसहारा नहीं होगी।"

पारो कमरे से निकल गई।

"क्या बात है ?" राजेश से मां ने पूछा-"तू इतना घबराया हुआ क्यों है ?"

"वो...पाइप पकड़कर उतरकर आया हूं न।"

"तो क्या बड़े मालिक आ गए...तेरे बाबूजी क्यों नहीं आए ?"

"पता नहीं-सेठजी ने किसी काम में उलझा लिया होगा।

"चार तो कभी के बज गए-आज पता नहीं मेरा जी क्यों घबरा रहा है ?"

"तुम्हारा भी जी घबरा रहा है ? यही बात मालकिन भी कह रही थीं।"

"भगवान खैर करे।

.

.

"अरे मां...भ्रम मत किया करो।"

"आज सुबह ही से मेरी सीधी आंख फड़क रही थी।" कमला ने कहा।

राजेश हंस पड़ा और बोला-"कोई कीड़ा घुस गया होगा।

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई और राजेश ने कहा-"लो...आ गए बाबूजी।"

कमला ने बढ़कर दरवाजा खोला तो सामने खड़ी पारो को देखकर उसके दिल को धक्का-सा लगा।
 
"मालकिन आप ! इस समय ?"

राजेश भी जल्दी खड़ा हो गया..उसने सहमे हुए पूछा-"क्या मालिक को पता चल गया, मैं अब तक जगमोहन के कमरे में था ?"

"नहीं...।"

“फिर क्या बात है ?"

कमला ने कहा-"राजेश के बाबूजी कहां हैं क्या वह नहीं आए ?"

"आ जाएंगे...।" पारो के स्वर में कुछ जान नहीं थी। कमला ने उसे ध्यान से देखते हुए कहा-“मालकिन ! आप कुछ छिपा रही हैं।"

"नहीं तो-।"

"राजेश के सिर पर हाथ रखकर कहिए।"

"कमला !" पारो की आवाज भर्रा गई–कमला का दिल धड़क उठा-राजेश की धड़कनें भी बढ़ गईं।

"भगवान के लिए बताइए मालकिन ।' कमला ने फिर पूछा।

पारो ने कमला का हाथ पकड़कर थपकी दी और बोली

"घबराओ मत कमला, कैलाश भैया बिल्कुल ठीक हैं।"

राजेश ने कहा-"मगर बाबूजी हैं कहां?"

पारो ने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा-"बेटा ! इस समय अगर तुम्हें और कमला बहन को यह खबर मिलती कि भगवान न करे किसी का सुहाग उजड़ गया है तो क्या होता ?"

"ऐसी अशुभ बातें क्यों ला रही हैं जबान पर?" कमला ने कहा-"भगवान हर नारी का सुहाग बनाए रखे।"

"मगर आज ऐसा ही होने वाला था कमला।"

"नहीं-!"

'हां कमला, यह सच है-आज अगर कैलाश न होते तो तुम्हारे सामने मैं एक विधवा के रूप में खड़ी होती।"

"मालकिन...!" कमला ने असीम आश्चर्य से उसे देखा।

राजेश जल्दी से बोला-"क्या कह रही हैं मालकिन ?"

"हां बेटे ! आज कैलाश भैया ने तुम्हारी बड़ी मां को विधवा होने से बचा लिया है।"

"वह कैसे ?"

"भेड़ के रूप में एक भेड़िया रिवाल्वर लेकर आया था सेठजी की जान लेने लिए ?"

"हे भगवान !" कमला ने सीने पर हाथ रख लिया।"

राजेश ने पूछा-"फिर क्या हुआ ?"

"बेटा ! वह तो संयोग था कि वहां कैलाश भैया मौजूद थे...कैलाश ने उसके हाथ से रिवाल्वर छीन लिया और इससे पहले कि वह सेठजी को मारता कैलाश ने उसे ही जान से मार डाला।"

"नहीं...!" कमला लड़खड़ाकर पीछे हट गई। राजेश के दिल पर भी जोरदार धक्का लगा और उसने कहा-"और बाबूजी कहां हैं ?"

"वह गिरफ्तार हो गए-उन्हें पुलिस पकड़कर ले गई है।"

"त...त...तो क्या उन्हें...?"

पारो ने जल्दी से कहा-“नहीं...ऐसा नहीं होगा।"

"मगर मालकिन कत्ल की सजा तो मौत है...फांसी।"

पारो ने कहा-"कैलाश ने तो मालिक की जान बचाने के लिए गोली चलाई थी-फांसी की सजा तो उसे मिलती है जो बाकायदा साजिश बनाकर किसी को कल्त करे। हो सकता है वह छूट ही जाएं।"

“और अगर वह न छूटे तो... "

"तो भी घबराने की कोई बात नहीं।"

कमला ने कहा-“साफ-साफ बताइए मालकिन।"

"कुछ बरसों की सजा हो सकती है।"

"कितने बरस की ?"

.

"चार-पांच बरस की।"

"नहीं...!"

"हो सकता है सजा हो ही नहीं...कैलाश भैया के लिए कई बड़े-बड़े वकील किए गए हैं।"

"मगर वकील क्या उन्हें छुड़ा सकते हैं ?"

.

पारो ने कमला के कंधे पर हाथ रखा और कहा-“कमला बहन ! क्या तुम्हें अपने भगवान और हमारी नीयत पर भरोसा नहीं।"

"नहीं, नहीं मालकिन ! ऐसा मत कहिए।"

"बहन! कैलाश भइया ने जो उपकार मेरे ऊपर किया है...मैं तो उसका बदला सात जन्मों तक नहीं चुका सकती...लेकिन जो बड़ा पुण्य का काम कैलाश भइया ने किया है क्या भगवान उसकी ओर से आंखें बंद किए रहेगा ?"

“बहन, दुनिया में शायद ही किसी ने इतनी बड़ी कुर्बानी दी होगी–वरना कौन मौत के मुंह में कूदता है...अपनी जान हथेली पर लेकर अपने मालिक को बचाने के लिए। भगवान पर भरोसा रखो।

"मालकिन !"

"आज से तुम मेरी सगी बहन से भी ज्यादा हो और राजेश जगमोहन से भी ज्यादा ! तुम दोनों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी।"

कमला कुछ नहीं बोली...सिसकती रही। पारो ने कमला के कंधे पर थपकी दी और फिर बोली-"कैलाश भइया से मिलो तो ख्याल रखना...उन्हें ऐसा न महसूस होने पाए कि उनका इतना बड़ा बलिदान गलत था। फिर उसने राजेश के सिर पर हाथ फेरा और बाहर चली गई। कमला ने राजेश को लिपटा लिया और रोने लगी और राजेश रो नहीं रहा था...किसी सोच में डूबा हुआ था।
 
चिता की आग की लपटें जब आकाश को छूने लगीं तो अचानक सुनीता विद्यादेवी के कंधों पर सिर रखकर रोने लगी...विद्यादेवी सिसकी तक नहीं...उन्होंने बेटी के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और अशोक ने पीछे से उनके कंधे पर हाथ रख दिया।

उन दोनों के बिल्कुल पीछे प्रेम और उसका बेटा शक्ति खड़े हुए नजर आए-दूसरी ओर, चारों ओर एक खड़ा जन समुदाया जो जोर से नारे लगा रहा था।

"मास्टर देवीदयाल।"

"जिन्दाबाद।"

"मास्टरजी की जय।"

"मास्टजी अमर रहें।"

हम मास्टर जी की मौत का बदला लेकर रहेंगे।"

अचानक विद्यादेवी ने चिल्लाकर हाथ हिलाकर सबको सम्बोधित करते हुए कहा

"भाइयों ! ऐसे शब्द कहकर पूज्य मास्टरजी की आत्मा को क्यों दुःखी करते हो। पूज्य स्वर्गवासी मास्टरजी पक्के अहिंसावादी थे...वह कभी किसी से बदला लेने की बात सोचते भी नहीं थे...अगर आपको मास्टर जी से इतनी ही श्रद्धा है तो प्रण करो और मुझे वचन दो कि तुम सब मिलकर इस बंगले की रक्षा करोगे।"

चंद क्षण रूककर विद्यादेवी ने कहा-"जिन लोगों ने षड्यंत्र करके मेरे माननीय पति देवीदयाल जी की हत्या की है या करवाई है. वे किसी भी तरह से इस बंगले को हथियाने की कोशिश करेंगे...बंगले के किसी भी भाग पर वह कब्जा न करें..तुम लोग मास्टर जी की जलती चिता पर प्रतिज्ञा करो कि आप सब उस समय तक बंगले की रक्षा करोगे जब तक मैं इस बंगले को स्कूल में बदलकर स्वर्गीय मास्टरजी की ओट करके उनका सपना पूरा न कर लूं।"

अचानक पूरा मरघट गूंज उठा-"हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस बंगले की तरफ किसी दुश्मन की नजर भी नहीं उठने देंगे।"...यही आवाजें गूंजती रहीं।

एक तरफ कोने में प्रेम पीछे से चुपके-चुपके शक्ति से कहा रहा था

"अबे खड़ा-खड़ा मुंह क्या देख रहा है ?"

"मुंह कहां डैडी...सुनीता की तो पीठ दिखाई दे रही है।

"अबे पीठ के बच्चे, मैं सुनीता की बात नहीं कर रहा।"

"तो विद्यादेवी की ओर आप देखिए न।"

"अबे बुद्धू ! मैं बंगले की बात कर रहा हूं।"

.

"बंगला ! लेकिन यह तो श्मशान है।"

"अबे...बंगला तो तभी तुझे मिलेगा जब सुनीता तुझे मिल जाएगी और उसके पांवों की पाजेब हमारे घर-आंगन में गूंजेगी।"

"तो सुनीता मुझे नहीं मिलेगी ?"

"कैसे मिलेगी...तू उसके पास जा और झोंपड़पट्टी वालों के साथ मिलकर पूरे उत्साह से नारे लगा-इतने जोर और जोश के साथ कि लोग तुझे देखने लगें..सुनीता और उसकी मां की नजरों में तू आ जाए.थोड़ा डिप्लोमेसी से काम ले उन लोगों के करीब होने का उन्हें लगे कि तू सबसे बड़ा हमदर्द है उस परिवार का।"

शक्ति ने आगे बढ़कर गला फाड़कर नारा लगाया

"देवीदयाल जी का सपना हम पूरा करेंगे-चाहे प्राणों की आहुति देने पड़े–मास्टर देवीदयाल जी जिन्दाबाद।"

सुनीता ने अचानक मुड़कर उसे तीखी नजरों से देखा तो प्रेम ने दांत निकालकर कहा

.

"मेरा बेटा शक्ति..शक्ति शर्मा ।"

सुनीता दोनों पर तीखी नजर डालती हुई आगे बढ़ गई।

इस्तगासे का बयान, अपराधी का इकबालिया बयान और गवाहों के बयान सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि अपराधी कैलाशनाथ का कत्ल जान-बूझकर नहीं किया-यह खूर सेठ दौलतराम के बचाव के लिए अनजाने में हुआ है।

मगर इस घटना के आंखों देखे गवाह सेठ दौलतराम हैं और अपराधी कैलाशनाथ उनका खानदानी ड्राइवर है इसलिए गवाही एकतरफा भी हो सकती है...वैसे भी वह रिवाल्वर जिससे मास्टरजी का खून हुआ है किसका है ? यह जाहिर नहीं हो सका। मास्टर देवीदयाल शर्मा पर 'गुण्डागर्दी' का सन्देह भी नहीं किया जा सकता। अपराधी कैलाश का पहले का रिकार्ड भी बेदाग है-सेठ दौलतराम के पास अपना लायसेंस्ड रिवाल्वर है। इन हालात के बावजूद भी खून उसके हाथों हुआ है। इसलिए उसके साथ बहुत ज्यादा रियासत नहीं बरती जा सकती...उसने एक जाने-माने देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी की हत्या की है-इसके लिए अदालत अपराधी को बारह बरस की कैद-बा-मशक्कत की सजा सुनाती है।"

फैसला सुनते ही कमला सिसककर रो पड़ी, लेकिन राजेश ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की-पारो कमला के कंधे पर थपकी देने लगी और दौलतराम ने कहा-“शुक्र करो कमला, कैलाशनाथ से तुम और राजेश मिल सकोगे।"

कुछ देर बाद वे लोग बाहर आए तो कैलाश को हथकड़ियां डाले पुलिस लेकर आई। कैलाशनाथ की आंखें छलक पड़ीं। सेठ दौलतराम ने उससे कहा-“कैलाशनाथ ! तुमने हमारी जान बचाकर जो उपकार हम पर किया है उसका हम बदला तो नहीं चुका सकते, मगर हम वचन देते हैं कि तुम्हारे न होने से कमला और राजेश को कोई कष्ट नहीं होने देंगे।"

कैलाशनाथ ने हाथ जोड़कर कहा-“मालिक मैंने जो कुछ किया है वह आपका नमक हलाल करने के लिए किया है-कोई उपकार नहीं किया-'फर्ज' पूरा किया है। फिर उसने राजेश से कहा-“बेटे ! मालिक अन्नदाता होता है और अन्नदाता के हाथों ही मनुष्य का पेट भरता है..हमारे पुरखों ने अपना कर्तव्य निभाना ही हमें सिखाया है..तुम भी

मुझे वचन दो कि मालिक के प्रति वफादार रहोगे...इस खानदानी चलन को पूरा करते रहोगे।"

राजेश ने कहा-"मैं आपको वचन देता हूं बाबूजी-आपके आदेश का पालन करूंगा।"

"शाबास बेटा-मां का ध्यान रखना।" फिर उसने कमला से भी दो बातें की और पुलिस के साथ पुलिस की गाड़ी में चला गया...थोड़ी देर बाद पुलिस वैन नजरों से ओझल हो गई तो पारो कमला को सांत्वना देने लगी।

राजेश स्कूल जाने के लिए तैयार हो गया नाश्ता करने के बाद जब वह बस्ता उठाए बाहर आया तो दौलतराम बाहर निकल रहे थे-नया ड्राइवर कार का दरवाजा खोले हुए खड़ा था...कार के पीस ही जगमोहन भी स्कूल हाने के लिए तैयार खड़ा था। दौलतराम राजेश को देखकर ठिठक गया और बोला-“कहां जा रहे हो ?'



'

"मालिक ! स्कूल जा रहा हूं।"

.

जगमोहन जल्दी से बाला-"तो आओ-गाड़ी में बैठ जाओ...हम छोड़ देंगे।"

दौलतराम ने जगमोहन को डांटकर कहा-"खामोश रहो।" जगमोहन ने जल्दी से होंठ बन्द कर लिए। सेठ ने राजेश से पूछा-"तुम पढ़-लिखकर क्या करोगे ?"

जगमोहन ने कहा-"डैडी ! आपकी तरह बड़ा आदमी बनेगा।"

दौलतराम ने फिर उसे डांटा-"तुम फिर बोले।"

जगमोहन ने जल्दी से मुंह बंद कर लिया और सेठ राजेश से बोले

"ड्राइवर के बेटे हो...अपनी औकात मत भूलो...पढ़-लिखकर तुम ज्यादा से ज्यादा क्लर्क बन सकते हो...फिर तुम्हें अपनी मां को भी झोंपड़ी में ले जाना पड़ेगा...क्या तैयार हो ?"

"मालिक...!"

"जाओ...यह किताबें अंदर रखकर कपड़े उतारो-गाड़ियां साफ करो–अभी तुम माली का काम संभाल लेना...बाद में हम तुम्हें ड्राइविंग सिखलवा देंगे...जब बड़े हो जाओगे तो ड्राइवर का लायसेंस दिलवा देंगे।"
 
फिर वह कार में चले गए। जगमोहन भी उनके साथ गया था। राजेश के नथुने गुस्से से फूले हुए थे-वह तेज-तेज चलता हुआ घर में आया तो कमला ने कहा

“क्या हुआ-तुम स्कूल नहीं गए?"

"नहीं...मैं गाड़ियां धोने जा रहा हूं...फिर माली का काम करूंगा।"

"राजेश ! क्या हो गया है तुझे ?"

"ड्राइवर का बेटा हूं, ड्राइवर ही बन सकता हूं...पढ़-लिखकर क्या मुझे भाड़ झोंकनी है।"

"राजेश...तुम्हें यह किसने कहा ?"

"मालिक ने हुक्म दिया है।"

"नहीं...!"

"बाबूजी ने तो मालिक की जान बचाने के लिए बारह बरस की कैद हंसी-खुशी मोल ले ली...और...यह मालिक...बड़े कृतघ्न निकले।"

"चुप रह नालायक।"

"नालायक की क्या बात है मां? अरे, इनको बचाने के लिए बाबूजी जेल चले गए।"

"बेटा-उन्होंने कोई उपकार नहीं किया..हमारे पुरखों ने भी इस खानदान का नमक खाया है।"

"क्या मुफ्त में खाया है...सेवा नहीं की है।"

"राजेश.!"

"चलो, उठो...जल्दी से सामान बांधो।"

"किसलिए?"

"अब हम यहां नहीं रहेंगे...ताजा-ताजा घाव पर, दौलत के पुजारी सेठ की इतनी जल्दी बेकार फटकार ने मेरे आत्मसम्मान को बड़ी चोट पहुंचाई है...अब हम यहां नहीं रह सकते।"

"कहां जाओगे ?"

"झोंपड़ी में-तुम आराम से रहना..मैं दिन भर मेहनत करूंगा-रात शिफ्ट में पढ़ा करूंगा-जब पढ़-लिखकर बड़ा बन जाऊंगा तो तुम्हें भी इससे बड़े बंगले में ले जाऊंगा।"

फिर राजेश खुद ही सामान समेटने लगा तो कमला ने कहा-"ठहर जा बेटे।"

"नहीं मां।"

"बेटा ! तू अपना वह वचन भूल गया जो तूने बाबूजी को दिया था। तेरे बाबूजी ने वचन लिया था कि हमेशा मालिक की सेवा करेगा ताकि तेरे पुरखों की आत्माएं शांत रहें।"

"मा...!"

"बेटा ! मैं तो तेरे साथ चलने को तैयार हूं, लेकिन तूने यह भी सोचा है कि जब तेरे बाबूजी को जेल में यह पता चलेगा तो उन पर क्या बीतेगी-भगवान के लिए ऐसे विचार छोड़। मालिक 'अन्नदाता' होते हैं...तू उनका नमक खाकर इतना बड़ा हुआ है।"

"मगर मां ! मैं ड्राइवर ही बनकर जिन्दगी नहीं गुजारना चाहता..मैं तुम्हें इस क्वार्टर में नहीं रहने देना चाहता हूं-मैं नहीं चाहता कि बाबूजी बारह साल जेल में रहकर फिर बैल की तरह जुटे रहें।"

"बेटा ! यह तेरी 'नेकनीयती' है भगवान देख रहा है...वह तेरे लिए कोई न कोई रास्ता तो निकालेगा ही।"

अचानक कमरे से आवाज आई-"भगवान ने तो बहुत पहले ही रास्ता निकाल दिया था।"

दोनों चौंककर मुड़े-राजेश ने कहा-"माल-किन!"

पारो झट अंदर आती हुई बोली-"आज से मुझे मालकिन नहीं, बड़ी मां कहा करो।"

"बड़ी मां !"

"हां बेटे ! तुम और जगमोहन गहरे दोस्त हो, इसलिए मेरे लिए तुम दोनों एक समान हो।"

"मालकिन !" कमला ने कहा।

"नहीं...मैंने सब सुन लिया है...मगर ऐसा नहीं होगा जैसा तुम्हारे मालिक ने कहा था।"

राजेश ने कहा-"फिर कैसा होगा ?"

"तुम जिस तरह पढ़ते हो, पढ़ते रहोगे...तुम कुछ बनना चाहते हो...उसके लिए मैं तुम्हारी बड़ी मां, तुम्हारी मदद करूंगी।"

“मगर कैसे ? बड़े मालिक तो...।"

"बड़े मालिक की कुछ नहीं चलेगी..राजेश का खर्चा मैं उठाऊंगी, पढ़ाई का भी।"

"और बड़े मालिक का हुक्म...वह तो राजेश टाल नहीं सकेगा।

"राजेश उस पर भी अमल करेगा...बड़े मालिक रात को आते हैं...सुबह राजेश उनके जाने के बाद जाया करेगा और वापस आकर वह काम कर लिया करेगा जो उन्होंने बताया है...कैलाश भइया को दिया हुआ वचन भी पूरा हो जाएगा...बाकी सब भी संभाल लूंगी मैं-तुम अब जाओ-जल्दी से चले जाओ...यह रूपए रखो टैक्सी से चले जाना।"
 
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