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Romance फिर बाजी पाजेब

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राजेश ने सेठ दौलतराम के सामने 'फोटोज' वाला लिफाफा रखा तो सेठ दौलतराम ने आश्चर्य से कहा-"यह क्या है?"

"वह फोटो और उनके नैगेटिव जिन द्वारा आपको पिछले दस बरसों से ब्लैकमेल किया जा रहा है।"

.

सेठ दौलतराम उछल पड़े। उन्होंने जल्दी से लिफाफा खोला तो उनके चेहरे का रंग खुशी से लाल हो गया। उन्होंने जल्दी से सारी तस्वीरें देखीं और कंपकंपाती आवाज में बोले

"य...यह सचमुच वही...वही फोटो और नैगेटिव हैं।"

"सेठजी! सब कुछ यही है-अब उस ब्लैकमेलर के पास आपके खिलाफ कुछ भी नहीं रहा है।"

"तुम...तुम...सच कह रहे हो?"

"जी हां, सेठजी...अब वह आगे आपको ब्लैकमेल करने का साहस भी नहीं कर सकता ।"

"मगर वह ब्लैकमेलर है कौन?"

"जिस पर मैंने पहले सन्देह किया था आपका मैनेजर प्रेम।"

"नहीं...! “सेठ दौलतराम उछला पड़े।

"सेठजी ! मुझे इसलिए विश्वास था कि जिस कारण से आपको ब्लैकमेल किया गया उसकी बुनियाद में सिवा प्रेम के और कोई शामिल नहीं था।

"तुम सच कहते हो।" और अचानक सेठ दौलमराम को गुस्सा आ गया और वह बोले-“मैं...मैं उस कमीने को अभी नौकरी से निकालता हूं।"

"नहीं सेठजी, आप ऐसा नहीं करेंगे।"

"क्यों?"

"क्योंकि आप इस तरह प्रेम के विरूद्ध कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकेगे। प्रेम अपनी जानकारी के अनुसार इस बात को चैक कर रहा है कि मैं अपने पिता की नाजायज सजा का आपसे बदला लेना चाहता हूं. इसीलिए मैं आपका दुश्मन बन गया हूं।"

"अच्छा ...!"

"मैं पहले सुनीता से मुहब्बत करके मास्टर जी के बंगले का मालिक बनूंगा और प्रेम अपने फाइनेंस

से वहां पन्द्रह माले की बिल्डिंग और शॉपिंग कम्पलैक्स बनवाएगा।

"बहुत खूब!"

"आपने यह तो पूछा ही नहीं कि प्रेम बिना कारण आपका दुश्मन क्यों बन बैठा है?"

"क्यों?"

"उसका कहना है कि कन्स्ट्रक्शन के कारोबार में उसके और आपके पिता फिफ्टी-फिफ्टी के पार्टनर थे लेकिन आपके पिताजी ने उसके पिता को धोखा देकर सारे कारोबार पर कब्जा कर लिया था।"

"आहो!"

"उसके पिता का हार्टफेल हो गया था और वे लोग फुटपाथ पर आ गए थे। उसकी मां ने बहुत दुःख झेले हैं।"

"बकवास...हमारा कारोबार पुरखों का चला आ रहा है हम लोग खानदानी दौलतमंद हैं...किसी से पार्टनरशिप का सवाल ही नहीं-मेरे पिताजी अकेले कम्पनी के मालिक थे।"

"तो प्रेम ने मुझे बहकाने के लिए कहानी गढ़ी है।"

"अब तुम क्या करोगे?"

"देखते जाइए. मैं क्या करता हूं-आप इन फोटोज

को फाड़कर फेंक दीजिए...या जला दीजिए।"

"राजेश! मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूंगा।"

"नहीं मालिक! मैं अपने बाबूजी को दिया हुआ वचन पूरा कर रहा हूं।"

"तुम बहुत अच्छे और साफदिल के हो।"

"सेठजी ! जिस सन्तान की मां अच्छी होती है वह अच्छे ही निकलते हैं-बच्चे के अच्छे-बुरे चरित्र की जिम्मेदार मां होती है और मुझे तो आपकी छत्रछाया में एक मां नहीं दो मांओ का शिक्षाश्रय प्राप्त हुआ है...बड़ी मालकिन ने मुझे इस योग्य बनाया है कि ड्राइवर का बेटा होते हुए इंजीनियर बना दिया है...जगमोहन मेरा बहुत प्यारा छोट भाई है, वह मुझे बड़ा भाई मानता है।

अच्छा सेठजी , अब मुझे इजाजत दें। सबसे पहले मुझे उस बंगले पर कब्जा करने का प्लान बनाना

है जिसके लिए आपको खन से हाथ रंगने पडे

और मेरे पिता को जेल जाना पड़ा।"

फिर उसने सेठ दौलतराम के चरण छुए. उन्होंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कहा

"जीते रहो बेटे...तुम्हारी मां अब सर्वेन्ट क्वार्टर में नहीं रहेंगी...बंगले ही के एक कमरे में रहेंगी...तुम इसकी चिन्ता मत करना ।"

"धन्यवाद सेठजी...जैसे ही बंगले पर मेरा कब्जा होगा, मैं कंस्ट्रक्शन कम्पनी खोलने के बहाने सारी रकम अपने नाम ट्रांसफर करा लूंगा जो उसने आपसे ठगी है और बाद में वह रकम और बंगला सब आप ही के होंगे।"

"शाबाश बेटा, तुम्हारी रगों में सचमुच पुरखों की वफादारी का लहू है।"

फिर राजेश कॉटेज से बाहर निकल आया तो सेठ

दौलतराम के होंठों पर एक भयानक मुस्कराहट फैट गई। उन्होंने हड़बड़ाने के ढ़ग में जैसे अपने आपसे कुछ कहा-" बेटे, जिस दिन तुम यह सब कर लोगे, उस दिन तुमको भी हरी झंडी दिखा दी जाएगी। सेठ दौलतराम एक छोटी-से उद्देण्डता को सहन नहीं करता और तुमने तो हमारे साथ बहुत अधिक गुस्ताखी की है। अब तुम उस समय का इन्तजार करो जब तुम अपनी मां के साथ फुटपाथ पर पहुंच जाओगे और हम तुम्हें नौकरी भी नहीं मिलने देंगे।"



फिर वह फोटोज के नैगेटिव जलाने लगा।
 
राजेश के शरीर पर सस्ती-सी पतलून कमीज थी-कंधे पर पुराना सस्ता बैग लटक रहा था जिसमें दो-चार कपड़े थे-वह बस स्टॉप से उतरकर उस बस्ती की ओर बढ़ा जो बंगले से ज्यादा दूर नहीं थी। अचानक ही उसके कानों में एक ललकरा-सी आवाज गूंजी

.

.

"ठहर जाओ...हीरो।"

राजेश ठिठककर रूक गया। दूसरे ही क्षण उसने छगन दादा को देखा जो अपने चारों साथियों के साथ एम्बेसडर के पास खड़ा बोतल से मुंह लगाए शराब पी रहा था।

राजेश बड़े नम्र स्वभाव से आगे बढ़ता हुआ मुस्कराकर छगन दादा से बोला-“छगन दादा! बड़ा अच्छा हुआ कि आपसे भेंट हो गई।"

"छगन दादा को भी तुमसे मिलकर खुशी हुई।"

."

"अच्छा ...!"

"हां हीरो! तुम्हारा एक पुराना कर्जा चुकाना है ना"

"अरे, छोड़ो भी दादा-दस दुनिया में लेन-देन तो होता ही रहता है।

"अभी मेरी तरफ से तो केवल लेन हुआ था-देन का समय ही नहीं मिला आज सौभाग्य से देन का भी अवसर मिल गया।" यह कहकर छगन दादा ने एक जोरदार घूसा राजेश के सीने पर जड़ दिया।

राजेश लड़खड़ाकर पीछे हट गया और संभलकर बोला

"इस देन का मतलब तो समझा दो दादा।"

"भूल गए हीरो? उस दिन एक लड़की की खातिर जरा-सी देर में तूने क्या किया था?"

"लड़की की खातिर..अरे तब तो मैं जरूर उस लड़की की नजरों में हीरो बनना चाहता हूंगा...अब जाने भी दो दादा।"

"जाने कैसे दूं. मेरा पूरा पचास हजार का नुकसान करा दिया था उस दिन तुमने।"

"सिर्फ पचास हजार...बस इतनी-सी रकम? इस छोटी-सी बात पर झगड़ा?"

"यह इतनी-सी बात है।

"अगर मैं तुम्हारे पचास हजार दे दूं तो?"

"फिर हमारा कोई झगड़ा नहीं ।"

राजेश ने जेब में हाथ डालकर कहा-"तो यह लो...यह कौन-सी बड़ी बात है।" उसने दस रूपए का एक नोट निकालकर दादा की ओर बढ़ा दिया तो छगन गुस्से से बोला

"इसका मतलब?"

"तुम्हारे कर्जे का भुगतान शुरू...अभी यही है-बाकी उनन्चास हजार नौ सौ रूपए मैं नौकरी मिलने पर चुका दूंगा।"

"खूब! तो तुम बेरोजगार भी हो।"

"इस समय..मगर घबराओ मत...मुझे बहुम जल्दी नौकरी मिल जाएगी।

"अभी तो तुम धरती का बोझ हो...उसे कम करना चाहिए।"

"कार में बैठ जाऊं?"

"नहीं-परलोक जाओ।" दादा ने फिर चूंसा मारा-राजेश लड़खड़ाकर पीछे हटा-उसके होंठों के कोनों से खून निकल आया उसने आस्तीन से लहू पोंछा और बोला-"क्यों मजाक करते हो दादा?

अब बस भी करो।"

"क्यों? आज वह हीरोपन किधर गया?"

"यार! उस रोज लड़की का मामला था।"

"और आज क्या कोई लड़की सामने नहीं है?"

"और क्या?

"चलो...आज तुम जीरो ही बन जाओ सदा के लिए।" दादा ने फिर उसके सीने पर सिर मारा।

राजेश ने झुकाई दी तो छगन पूरा घूम गया-पीछे से राजेश ने उसे लात मारी और वह एम्बेसडर के बोनट से टकराया।

राजेश ने कहा-"मान जाओ दादा! दोस्ती कर लो तो फायदे में रहोगे।"

छगन ने चिल्लाकर साथियों से कहा-"मारो साले को।"

"अरे! मेरी कोई बहन नहीं तो साला कैसे बन गया?"

छगन के साथ उसके साथी भी राजेश पर टूट पड़े। राजेश ने बैग संभाला और उसे झुला झुलाकर वह उन लोगों की पिटाई करने लगा। अचानक पीछे से एक चीख भरी आवाज गूंजी-"राजेश बाबू!"

राजेश ने मुड़कर देखा..और दूसरे ही क्षण पीछे से उसके सिर पर बोतल की चोट पड़ी-राजेश लड़खड़ा गया और उसकी आंखों में अंधेरा-सा छा गया और कई तरफ से लोग उस पर टुट पड़े।

वही चिल्लाने की आवाज आई-"राजेश बाबू...राजेश बाबू!"

राजेश ने लड़खड़ाकर कहा-"सुना दादा, लड़की की आवाज।"

फिर अचानक जैसे राजेश के अंदर कोई भूत समा गया हो। उसने बैग घुमा-घुमाकर बिजली की तरह चलाया-कराहों की आवाजें आती रहीं साथ ही चीखें भी।

फिर छगन ने चिल्लाकर कहा-"चलो, पुलिस आ रही है।
 
कुछ देर बाद सारे बदमाश एम्बेसडर में थे और एम्बेसडर सड़क पर दौड़ रही थी।

-

"भाग गए साले ।“ राजेश ने मुस्कराकर कहा और उसके पीछे दौड़ने लगा...सुनीता के संभालते-संभालते वह जमीन पर लेट चुका था।

पता नहीं कितनी देर बाद राजेश की बेहोशी टूटी तो उसके कानों में विद्यादेवी की आवाज आई-"हाय राम! यह तो वही लड़का है।"

.

"राजेश बाबू!"

"हां, इसी ने तो मुझे बचाया था छगन दाद से।"

हां मां...।"

"मगर इसे हो क्या गया?"

"छगन दादा ने शायद बदला लेने के लिए इन्हें घेर लिया था-मगर यह अकेले सबसे मुकाबला करते रहे थे।"

"अच्छा !"

"अगर मै इन्हें पीछे से चिल्लाकर न पुकारती तो छगन दादा की बोतल इनके सिर पर पड़ती।"

"हे भगवान!"

"यह भी बड़ी बहादुरी की बात है कि इन्होंने सबको भगा दिया, तब बेहोश हुए।"

"कहां रहता है?"

"बस्ती के पास स्टॉप से थोड़ा इधर ही।"

"यहां क्या करने आ रहा था?"

"शायद हम ही से मिलने आ रहे थे।"

"और यह बैग?"

"शायद कपड़े हैं-शेव बढ़ा हुआ है-जरूर कोई परेशानी की बात हुई है इसके साथ ।"

राजेश, जो बेहोश बना उनकी बातें सुन रहा था उसने आंखें बंद किए हौले से करवट लेने की कोशिश की...और मुंह से कराह-सी निकल गई। सुनीता चौंककर बोली-" होश में आ रहा है।"





"तू जल्दी से दूध गरम करके ले आ..हल्दी डालकर।"

अचानक राजेश ने आंखें खोल दी...पलकें झपकराई

और अपने आप बड़बड़या-"मैं कहां हूं?"

सुनीता ने कहा-"आप घबराएं नहीं..सुरक्षित जगह पर हैं।"

.

राजेश हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ..इधर-उधर देखकर हैरानी से बोला

"कौन लाया मुझे यहां?"

"मैं कुछ बस्ती वालों की मदद से लाई हूं।"

सुनीता ने कहा-"आपके ऊपर छगन दादा हमला कर दिया था।"

"छगन दादा।" राजेश चोट सहलाता हुआ बोला-"ओह! अब याद आया। अचानक उधर से पुलिस की गाड़ी आते देखकर वह भाग निकले।"

राजेश उठता हुआ बोला-"अच्छा सुनीता जी..मांजी आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया।"

सुनीता हड़बड़ाकर बोली-"अरे...अरे...आप क्या कर रहे हैं आपके सिर में चोट लगी है।"

राजेश ने सिर पर हाथ फेरकर कहा-"और यह आपने पट्टी बांधी है?"

“मगर मैं आपको इस तरह नहीं जाने दूंगी।"

“मुझे बहुत काम करना है सुनीता जी ।"

विद्यादेवी ने कहा-"तुम बैठो तो बेटे।" और उसने सुनीता से कहा-"जा, जल्दी से हल्दी डालकर गरम-गरम दूध देकर आ..हल्दी डालकर पीने से अंदर की चोट जल्दी ठीक होती है...पीड़ा भी कम होती है।"
 
राजेश मुस्कराकर बोला-"मांजी ! मैं कोई दूध पीता बच्चा हूं-हां सुनीता जी...अगर चाय का एक गरम कप मिल जाए तो मेहरबानी होगी।"

सुनीता चली गई तो विद्यादेवी ने कहा-"तुम लेट जाओ बेटा।"

"क्यों मांजी?"

"तुम्हें आराम की जरूरत है।"

"अरे मांजी...मर्दो को और फिर जवान मर्दो को ज्यादा आराम शोभा नहीं देता...जीवन आराम से नहीं चलता ।"

इतने में सुनीता चाय लेकर आ गई। राजेश ने प्यालर लेकर चाय सिप करते हुए कहा-“वाह! मजा आ गया एक ही चूंट ने जैसे शरीर में नई जान फूंक दी हो।"

सुनीता ने पूछा-"आप कंधे पर बैग लटकाए कहां घूम रहे हैं?"

"बंजारो का भी कोई ठौर-ठिकाना होता है?"

"क्या मतलब ?"

"आप बंजारे का भी मतलब नहीं समझते।"

"आप पहले कहां रहते थे?"

"एक सेठ से क्वार्टर में मां के साथ ।"

“और आपकी मां?"

"वह गांव गई हैं...सेठ ने हम दोनों को निकाल दिया है।"

"क्यों ?"

"पिताजी थे नहीं...मां किचन संभालती थीं-सफाई इत्यादि करती थीं-मैं माली की काम करता था और पढ़ता भी था...मुझे इंजीनियरिंग की डिग्री मिल गई...मैने कहा अब मां सेठ से घर नौकरी नहीं करेगी और न मैं माली का काम करूंगा...सेठ ने मुझे इंजीनियर की नौकरी देने से इंकार कर दिया इसलिए मैंने मां को गांव भिजवा दिया और स्वंय नौकर ढूंदूंगा। पता चला था, इस बस्ती में कुछ लोग पेइंग गेस्ट रख लेते हैं...बस इसी खोज में था।

"तो आपको रहने की जगह चाहिए, जिसके लिए आप भटक रहे हैं?"

"और क्या करूं?"

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"राजेश बाबू! आपने दो बार मेरी इज्जत बचाई है और जान भी-इतन बड़ा उपकार किया है आपने...क्या हम लोग इतनी भी मदद नहीं कर सकते...इतना बड़ा बंगला है।"

"यह आप क्या कह रही हैं?"

विद्यादेवी ने कहा-"हां बेटा, इतना बड़ा बंगला है हम मां-बेटी ही रहते हैं...कभी-कभी छगन दादा भी तंग करता रहता है...तुम यहां रहोगे तो हम भी खुद को सुरक्षित अनुभव करेंगे।"

सुनीता ने कहा-"जब तक आपको नौकरी नहीं मिलती, आप हमारी क्लास के बच्चों को पढ़ा

सकते हैं-खाना जो रूखा-सूखा हम खाते हैं आप भी हमारे साथ खा लिया कीजिएगा।"

राजेश ने हल्की सांस लेकर कहा-"अब आप इतनी अपनेपन के साथ कह रही हैं तो एक सजेशन मेरी भी है।"

"हां जरूर।"

"मैंने माली का काम भी सीख लिया है...क्यों न चारदीवारी के अंदर एक खूबसूरत बगीचा लगवा लें...कुछ क्यारियां सब्जी की भी लग सकती हैं... अगर आपको कोई आपत्ति न हो।"

"इससे अच्छर कोई बात भी नहीं...बच्चों को भी शिक्षा मिलेगी। फिर उन्होंने सुनीता से कहा

"राजेश को उनका कमरा दिखा दो।"
 
सुनीता राजेश को लेकर ऐसे कमरे में ले गई जो पिछले कम्पाउंड की तरफ था-कम्पाउंड वाल कोई खास ऊंची नहीं थी-बरामदे से आगे क्यारियां बनी थीं..थोड़ी दूर पर समूद्र पर समुद्र की लहरें नजर आ रही थीं-बड़ा सुहाना दृश्य था। राजेश ने कहा

"यहां तो किसी राजमहल का-सा आनंद मिल रहा है। बड़ा भाग्यशाली हं जो आप लोगों से भेंट हो गई।

"आपसे ज्यादा हम भाग्यशाली हैं।"

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"सुनीता जी! आप मुझे झाड़ पर चढ़ा रही हैं...और झाड़ मेरा बोझ नहीं संभाल सकेगा और मैं गिर पडूंगा।"

सुनीता हंसकर रह गई। राजेश का दिल धड़क उठा...उसके कानों में जैसे घंटियां-सी बज उठी थीं। अचानक किसी बच्चे के रोने के साथ किसी औरत की भी आवाज आई जो शायद रुआंसी होकर विद्यादेवी को पुकार रही थी।

सुनीता रूककर बाहर आई..राजेश भी उसके पीछे आया। विद्यादेवी बरामदे में पहुंच चुकी थीं। एक बदसूरत मैले-कुचैले कपड़ों वाली औरत बुरी तरह रो रही थी-उसकी गोद में बच्चा था और उसके सिर से खून बह रहा था। विद्यादेवी ने घबराकर पूछा

"क्या हुआ सकीना ?"

"मांजी! मेरे बच्चे को कोई कार वाला टक्कर मारकर चला गया है...घर में खाने को भी कुछ नहीं-मेरा मर्द मजदूरी करने गया है, एक हफ्ते से।

सुनीता ने जल्दी से जेब से कुछ रूपए निकाले । राजेश ध्यान से देख रहा था-सुनीता दौड़कर अंदर चली गई-विद्यादेवी ने बिना किसी झिझक के बच्चे को सकीना से लेकर सीने से चिमटा लिया। कुछ देर बाद सुनीता रूपए लेकर आ गई और विद्यादेवी ने कहा

"जल्दी से बाहर दौड़कर टैक्सी रोक ले।"

सुनीता बाहर दौड़ी तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर कहा

"मांजी, बच्चा मुझे दीजिए, यहां टैक्सी मुश्किल से मिलती है...मैं बच्चे को लेकर जाता हूं सुनीता जी

के साथ।

"तो...।"

"हां मांजी।"

राजेश ने बच्चे को ले लिया तो सकीना बोली

"खुदा तुम्हारा भला करे भैया।"

बच्चे के शरीर और कपड़ों से बदबू आ रही थी। राजेश को कराहट महसूस हुई, लेकिन वह बच्चे को लेकर दौड़ता चला गया। संयोग से बाहर सुनीता को टैक्सी मिल गई जिसे उसने रूकवा लिया। सकीना भी अंदर आ गई कुछ देर बाद तीनों टैक्सी में थे-बच्चा राजेश ही की गोद में था

और टैक्सी दौड़ रही थी।

राजेश ने मोबाइल से नम्बर मिलाकर इंस्ट्रूमेंट कान से लगा लिया-कुछ देर बाद आवाज आई-"हां राजेश बोलो।"

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"प्रेम साहब, मैं मास्टरजी के बंगले पहुंच गया हूं।"

"फाइल, कोई प्रोग्रेस?"

"रहने को जगह मिल गई है...खाने को मिल गया है...एक दिन में और क्या प्रोग्रेस हो सकती है।"

.

"नाइस...अब बात आगे बढ़े तो खबर करना ।"

"जरूर।"

राजेश ने सम्पर्क काटकर सेठजी से सम्पर्क साधा और रिसीवर कान से लगा लिया।

सेठ दौलतराम ने नम्बर देखे-फिर रिसीवर कान से लगाकर बोले

"हां बोलो।"

“सेठजी मैं कामयाब हो गया हूं।"

"किस हद तक?"

.

"बंगले में रहने की जगह मिल गई है-खाना मिलने लगा है...और मास्टर जी की बेटी भी मेहरबान है।"

"वैरी गुड...पूरी कामयाबी मिलने पर खबर करना।"





"जी..सेठ जी!"

"कोई परेशानी तो नहीं?"

"जी नहीं।"

"ओके!" सेठ दौलतराम ने फोन बंद करके हैंडपीस वापस रख लिया और कमरे से निकलकर वह डाइनिंग हॉल में आए जहां डाइनिंग टेबन पर जगमोहन मुंह लटकाए बैठा था और पारो खाना परोस रही थी। सेठजी ने अपनी घृणा और गुस्से को दबाया और कुर्सी खींचकर बैठते हुए जगमोहन को देखकर बोले

"क्या बात है भई...हमारे प्रिंस का मुंह क्यों लटका हुआ है?"

"राजेश की वजह से दुःखी है-कहां भेज दिया है उसे आपने ?"

"अरे! एक बहुत बड़ा सौदा करने भेजा है उसे ।'

"सौदा...!"

"हां पारो...एक बहुत ही अच्छी जगह एक बहुत बड़ा प्लाट है-जिसकी मालकिन आधी पागल है...बेचने को राजी नहीं-हम उसे काफी रकम और दो फ्लैट तक देने को तैयार हैं।"



"यह उसकी इच्छा है...जबरदस्ती थोड़े है।"

"अरे! वह बूढ़ी है...मर जाएगी तो प्लाट पर ऐरे-गैरे कब्जा कर लेंगे। वह प्लाट मिल गया तो करोड़ों को फायदा होगा-और हम सग की उम्र आराम से कट जाएगी।"

"और राजेश यह काम कर लेगा?"

"हमें उसकी बुद्धिमानी पर पूरा भरोसा है-इसीहिए हमने यह काम उसे सौंपा है।"

.
 
"यह जोखिम का काम तो नहीं?"

"बिल्कुल नहीं-बस, बुढ़िया के दिल में जगह बनानी है।

"मगर यह तो फ्राड हो गया।"

"जिस फ्राड से किसी को नुकसान की जगह फायदा पहुंच रहा हो, उसे फ्राड नहीं कहते ।"

"मगर राजेश कामयाब हो गया तो?"

"तो क्या? वह कामयाब होगा। हम उसे कम्पनी में इंजीनियर की जगह दे ही चुके हैं। उसकी तनख्वाह भी चालू है।"

"अच्छा !"

"हमने उसकी योग्यता को पहचान लिया है...हम चाहते हैं कि उसे और अन्नति मिले...वैसे भी जब हम बिल्कुल बूढ़े हो जाएंगे और जगमोहन को हमारी कुर्सी संभालनी होगी तो उसे राजेश जैसे ही हमदर्द दोस्त की जरूरत होगी।"

"मगर सौदे में ज्यादा देर न लग जाए-राजेश की जुदाई में घुटकर आपके बेटे की खुराक आधी रह गई है।"

"इसलिए अब जगमोहन के अकेलेपन को दूर करने का इन्तजाम करना जरूरी हो गया है।"

"मैं भी तो यही चाहती हूं कि दोनों के सिरों पर साथ-साथ सेहरा बंधे।"

जगमोहन ने शरमाकर सिर झुका लिया-पारो और कमला हंसने लगीं।

"क्यों बेटे...कोई लड़की पसंद की है?"

जगमोहन ने लड़कियों की तरह दोनों हाथों से मुंह छुपा लिया। पारो ने हंसकर कहा-"इसका मतलब है लड़की पसंद है।"

जगमोहन ने बड़ी मुश्किल से कहा-"जी-हां।"

अचानक सेठ दौलतराम को याद आया कि उन्होंने जगमोहन की कार में सुनीता को देखा था-वह बहुत बेचैन हो गए, क्योंकि सुनीता पर डोरे डालने तो उन्होंने राजेश को भेजा था।

"कौन है वह लड़की?" उन्होंने जगमोहन से सीधा पूछा।

जगमोहन ने शरमाकर कहा-"मालूम नहीं।"

"बहुत शर्म आती है...चलो बता दो न।"

"जी अनीता।

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"अनीता।"

.

"कुछ ऐसा ही नाम था...हमारी क्लासमेट थी।"

दौलतराम ने आराम की सांस ली और बोले-“पता लगाकर बताओ तो तुम्हारी बात पक्की कर सकें।"

"जी-बजाऊंगा।" जगमोहन फिर शरमा गया।

कई दिनों तक सड़को पर भटकने के बाद एक दिन जगमोहन ने सुनीता को एक बस स्टॉप पर देखा तो खुशी से उसका दिल खिल उठा। जल्दी से कार रोककर उसने अंदर बैठे पुकारा

"सुनीता जी...सुनीता जी...!"

सुनीता जगमोहन को देखकर चौंक पड़ी और जल्दी से उसके पास आकर बोली-"अरे जगमोहन जी...आप!"

"हम तो कई दिनों से आपको ढूंढ़ रहे थे।"

"क्यों?"

"वो...क्या है कि हमारे डैडी...हमारी शादी करना चाहते हैं।" कहते-कहते-जगमोहन शरमा गया। सुनीता ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकी और मुस्कराकर कहा

"तो...मैं क्या मदद कर सकती हूं?"

"हम आप ही से शादी करना चाहते हैं।"

सुनीता के मस्तिष्क में छनाका-सा हुआ-उसे मालूम था कि जगमोहन बहुत सीधा-सा आदमी है-वह उसका दिल भी दुखाना नहीं चाहती थी इसलिए उसने कहा

"यह तो बड़ी खुशनसीबी है।"

"तो फिर जल्दी से अपना पता बताइए, हम अपने घर बता दें।"

सुनीता ने अपनी एक सहेली जिसका नाम अनीता था, उसका पता बता दिया। जगमोहन ने पता नोट कर लिया और बोला

"अब डैडी आपके घर मां और मौसी के साथ आएंगे।" इतना कहकर जल्दी से गाड़ी बढ़ी दी...फिर झट कुछ सोचकर रूक गया और रिवर्स करके स्टॉप पर आया-सुनीता पास आ गई तो बोला-"हमसे भूल हो गई..हमारे दोस्त ने एक बार हमें डांटा था जब हमने आपको स्टॉप पर छोड़ दिया था...चलिए, आपको घर पहुंचा दूं।"



 
"धन्यवाद ! मैं इस समय बहुत जरूरी काम से कहीं जा रही हूं..वैसे भी आपके डैडी ने देख लिया तो समझेंगे कितनी निर्लज लड़की है।"

"अच्छी बात है, मगर आप हमसे शादी तो करेंगी न?"

"अरे! आप जैसे अच्छे देवता सरीखे नौजवान से कौन लड़की शादी नहीं करना चाहंगी?"

जगमोहन खुश-खुश कार बढ़ा ले गया। सुनीता ने संतोष की सांस ली-फिर बस की ओर देखने लगी और अचानक ही उसने राजेश को देखा जो कुछ सामान लिए हुए स्टॉप की ओर आ रहा था।

सुनीता का चेहरा खिल उठा...आंखों मे चमका आ गई-वह जल्दी से आगे बढ़कर उससे बोली-"राजेश बाबू!"

राजेश ने चौंककर देखा और पास आकर मुस्कराता हुआ बोला-"अरे आप!"

"मैं जरा एक सहेली के यहां गई थी।"

"मैं नौकरी ढूंढ़ने निकला था-मांजी ने कुछ सामान लिखकर दिया था। वही लेकर आ रहा हूं।"

फिर वह सुनीता के साथ लाइन में लगने लगा तो पीछे से आवाजें आईं-“ऐ,क्या करते हो? पीछे

आकर लगो।"

दोनों लाइन से निकल आए...राजेश ने कहा

"यह मुम्बई है यहां के लोग किसी की इज्जत करना नहीं जानते ।

इतने में पता चला कि बसों की हड़ताल हो गई है-कुछ यात्रियों ने कंडक्टर और ड्राइवर को पीट दिया था, इसलिए जो बस जहां थी वहीं खड़ी हो गई।

"अग क्या होगा? " सुनीता ने घबराकर कहा।

"आटो पकड़ते हैं-पर मेरे पास तो...।"

"मगर मेरे पास हैं।"

दोनों ने दाएं-बाएं देखा, लेकिन कोई ऑटो नहीं मिला...मजबूरन दोनों पैदल चलने लगे-राजेश ने कहा

“लाइए न अपना पर्स मुझे दे दीजिए।"

"क्यों?"

"अरे! मर्द हूं...कोई महिला साथ चले तो अच्छा नहीं लगता ।"

सुनीता हंस पड़ी और बोली-“मेरे पर्स में गृहस्थी का सामान नहीं-केवल बस का किराया है और एक छोटा-से रूमाल ।"

"फिर भी बोझ तो है।"

सुनीता ने हंसकर कहा-“आप कब तक यह बोझ उठाएंगे?"

"जब तक आपका हुक्म हो।"

अचानक सुनीता गंभीर होकर बोली-"अगर मैं कहूं, तमाम उम्र तो?"

राजेश ने चौंककर उसकी ओर देखी और बोला-"क्या आप मुझे इस योग्य समझती हैं?"

"यही सवाल अगर मैं आपसे करूं?"

-

राजेश ने उसे ध्यान से देखा और मद्धिम-सी मुस्कराहट के साथ बोला-“ऐसा बोझ तो मैं सात जन्मों तक उठा सकता हूं।"

"धन्य हो भगवान! मैं समझती थी , अगर मैंने कभी आपसे दिल की बात कह दी तो पता नहीं क्या जवाब देंगे।"

"कमाल है...जो बात मैं इतने दिनों से सोच रहा हूं वही बात आप भी सोच रही हैं।"

"आप भी यही सोचते रहे थे?"

"आप नहीं , तुम..तुम कहिए।"

.

"तुम भी तुम कहो, आप मत कहो।"

फिर दोनों हंसने लगे और उन्होंने एक-दूसरे के हाथ में हाथ डाल लिया।

राजेश ने कहा-"मुहब्बत भी अजीब भाव या भावना है-किसी नटखट बच्चे के समान दिल के किसी कोने में छुपकर बैठ जाती है। पता भी नहीं चलता और उभरती है तो आकाश और समुद्र पार कर जाती है-कभी तारों का झुरमुट कभी लहरों की तरंग।"

सुनीता का चेहरा लाल हो रहा था..किसी अंदर के भाव से।

सेठ दौलतराम ने ढूं-टूं की आवाज सुनी और बटन दबा दिया...फिर हैंडपीस कान से लगाकर बोले

-

"हां...बोलो राजेश।"

“सर! मुझे एक और सफलता मिली।"

"अच्छा ! क्या?"

"सुनीता मुझसे मुहब्बत करने लगी है।"

"बहुत खूब।"

"अगर इजाजत हो तो यह खुशखबरी अपने दोस्त जगमोहन को सुना दूं।"

"अरे! पहले उसकी खुशखबरी पूरी होने दो...फिर एक-दूसरे को सुनाना।"

"क्या मतलब?"

"वह गधा भी एक अकलमंदी कर बैठा था-अनीता नाम की एक लड़की से मुहब्बत करने लगा था।"

"वही...उसकी क्लासमेट?"

"हां...तुम जानते हो उसे?"

"उसी ने मुझे बताया था।"

"आज मैं उस लड़की से उसकी बात पक्की करने जा रहा हूं।"

"वैरी गुड सर! मेरी ओर से बधाई।"

"उसी को देना.और तुम्हारी ओर से कोई विशेष प्रोग्रेस?"

"इससे बड़ी और क्या प्रोग्रेस हो सकती है-सर।"

"ओके-! फिर उन्होंने मोबाइल बंद कर दिया इतने में कार रूक गई तो उन्होंने चौंककर इधर-उधर देखा और बोले

"यह गाड़ी कहां ले आए ड्राइवर?"

"मालिक, यह पता आप ही ने बताया था।"
 
सेठ ने इधर-उधर देखा...वह 'चाल' की बस्ती थी...सेठ ने नाक भौंह सिकोड़कर कहा-"गधे ने लड़की भी पसंद की तो कहां की?"

"मालिक! चलूं?"

"ठहरो! उस लड़के की पसंद जरा देखें तो सही-वैसे एरिया बहुत अच्छा है अगर यह बस्ती हमारे कब्जे में आ जाए तो मजा आ जाए। तुम जरा मालूम तो करो...शंकर लाल कौन है?"

ड्राइवर उतरकर गंदी बस्ती में घुस गया...लगभग पन्द्रह मिनट बाद वह लौटा तो उसके साथ एक चौड़ी छाती वाला, लम्बे कद का, नेवले जैसी मूंछों वाला आदमी था जिसके हाथ में एक गांठो वाली मोटी-सी लाठी थी और बदन पर लुंगी और बनियान।

दोनों कार के पास आकर रूक गए...ड्राइवर ने कहा-"मालिक! यही हैं शंकर लाल जी।"

"ओहो!"

शंकर लाल ने मूंछों पर ताव देकर कहा-"क्या काम है सेठ? किसका खून कराना है?"

ड्राइवर ने कहा-“शंकर लाल जी ! मालिक आपकी बेटी अनीता के बारे में कुछ बात करने आए हैं।"

"क्या बोला?"

अचानक शंकर लाल ने ड्राइवर को गिरेबान से पकड़कर सिर से ऊंचा उठा लिया तो सेठ दौलतराम ने जल्दी से कहा

"अरे...अरे...सुनो तो शंकर।"

"सेठ! दफान हो जाओ यहां से...शंकर लाल इस बस्ती का मालिक है...दूसरों की बहू-बेटियों को अपनी बहू-बेटियों समझता है।"





"अरे भाई...हम अनीता को अपनी बहू बनाने ही तो आए हैं।"

शंकर लाल ने ड्राइवर को छोड़ दिया तो ड्राइवर कार से लगकर शिष्टता से खड़ा हो गया। दौलतराम ने कहा-“दादा! हमारा बेटा जगमोहन और तुम्हारी बेटी अनीता जो कॉलेज में एक ही क्लास में पढ़ते थे, आपस में मुहब्बत करने लगे हैं...हम अनीता को तुमसे मांगने आए हैं।"

"अरे! तो पहले क्यों नहीं बोला?"

"तो फिर हम यह रिश्ता पक्का समझें?"

"पहले अंदर तो आओ...मुंह तो मीठा करो।"

"फिर कभी.अभी हमें जरूरी काम से कोर्ट में जाना है।"

"मेरी ओर से रिश्ता पक्का...जब चाहें मुहूर्त निकलवा लें।"

कुछ देर बाद जब कार सड़क पर दौड़ रही थी तो ड्राइवर ने कहा

“ऐसे घटिया आदमी को समधी बनाएंगे मालिक।"

"बिजनेस...ड्राइवर! सह पूरी बस्ती शंकर लाल की है...जरा सोचो, अगर यह हमारी बन जाए तो कितना शानदार फइव स्टार होटल बन सकता है।"

"यह तो आप ठीक कहते हैं मालिक ।"

मगर जब घर जाकर सेठ दौलतराम ने बताया कि जगमोहन का रिश्ता अनीता से पक्का हो गया है तो जगमोहन रोने लगा।

"अरे! खुश होने की जगह रो रहे हो?"

"डैडी! मैं चाहता था यह खुशी सबसे पहले अपने दोस्त को सुनाऊं।"

"उसे भी सुना देना ।"

"मगर वह है कहां?"

"जहां भी है, कामयाब बिजनेस कर रहा है।" कहते-कहते सेठ की कल्पना में मास्टर जी का बंगला घूम गया।

राजेश क्यारियों में पानी दे रहा था कि एक टैक्सी आकर रूकी।

राजेश देखने लगा...सुनीता और विद्यादेवी भी उधर आकर्षित हो गईं। टैक्सी में से एक सुन्दर नौजवान बड़ी-सी अटैची संभाले हुए उतरा और अंदर आया। अटैची रखकर उसने पहले विद्यादेवी के चरण छुए और सुनीता के सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरा।

"क्षमा करना बेटा। विद्यादेवी ने कहा-"मैंने पहचाना नहीं।"

"मांजी! आपने अशोक को नहीं पहचाना?"

विद्यादेवी और सुनीता दोनों उछल पड़ी।

-

"क्या तुम अशोक भैया हो?"

"हां सुनीता! अब मैं दुबई में इंजीनियर हूं... चालीस हजार रूपए महीना तनख्वाह मिलती है।"

.

.

"हां मांजी! मैं एक अनाथ बेसहारा लड़का...अगर मास्टर जी मुझे शिक्षा न देते तो मैं आज भी बस्ती वालों की तरह फुटपाथ पर बूट पालिश करता या

ठेला चला रहा होता-यह बंगला मेरे जीवन का मोड़ है-मास्टर देवीदयालजी ने मुझे क्या से क्या बना दिया।"

राजेश आश्चर्य से देख रहा था और सुन रहा था।
 
अशोक ने कहा-"यह अटैची है, रख लें...आपके और सुनीता दीदी के लिए कपड़े हैं और कुछ जरूरत की चीजें, मेरी ओर से उपहार और एक लाख रूपए नकद |

"एक लाख!"

"हां, पूज्य मास्टर जी को श्रद्धांजलि..मैं चाहता हूं उनका सपना पूरा हो जाए-यह बंगला हाई स्कूल में बदल जाए जिसमें गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई, मुफ्त किताबें और दोपर के भोजन का प्रबंध हो सके..मेरे जैसे और भी अशोक पढ़-लिखकर मास्टर जी के सपने को पूरा करते रहें-मैं खुद हर दूसरे महीने की तनख्वाह से कुछ भेजा करूंगा...आप जब चाहें इस स्कूल का शिलान्यास रखवा दें।"

"बेटे! अबकी मास्टर जी की बरसी पर यह शुभ काम हो जाएगा। मगर तुम्हें भी शामिल होने पड़ेगा।"

"मैं जरूर आऊंगा मांजी।"

राजेश ने कहा-'भाई साहब! आपके पास इतनी दौलत है तो पास की बस्ती के गरीबों की झोंपड़ियों क्यों नहीं बनवा देते ?"

आशोक ने उसे देखा...विद्यादेवी के परिचय कराने पर अशोक ने कहा

"राजेश जी! इन लोगों की झोंपड़ियां बनवाने का मतलब है इन्हें भिखारी और मुहताज बनाना। इनमें शिक्षा और ज्ञान की रोशनी फैल जाए तो वह खुद अपने जीवन को बदलने की कोशिश करेंगे-किसी को भीख देने की बजाए उसे शिक्षित बनाना उसके साथ भलाई करना है।"

राजेश सन्नाटे में रह गया।

'इन लोगों की झोंपड़ियां बनवाने का मतलब है इन्हें भिखारी बनाना।

'इनमें शिक्षा और ज्ञान की रोशनी फैल जाए तो अपने घर और जीवन को बदलने की कोशिश करेंगे।

राजेश के कानों में अशोक की आवाज गूंज रही थी-वह सोच रहा था-'वह भी तो एक ड्राइवर का बेटा था...की रोशनी ने उसे इंजीनियर बना दिया...मुझे बड़ी मां संरक्षण मिल गया...लेकिन हर गरीब को बड़ी मां थोड़े ही मिलती हैं। हां मास्टर जी, मांजी और सुनीता जी बड़ी मांओं के बराबर तो हैं...यह बंगला अच्छा स्कूल बन जाए तो कितने ही गरीब बच्चे...इंजीनियर, डाक्टर और प्रोफेसर बनकर निकल सकते हैं।'

'और...सेठ दौलतराम और प्रेम इस बंगले की जगह बिल्डिंगों में बड़े लोग रहते हैं..शॉपिंग कम्पलैक्स में अमीर आदमी शॉपिंग करते हैं जो महंगी चीजें खरीदते हैं...यह मास्टर जी के साथ कठोर अन्याय है-और इस अन्याय में मैं उनका साथ दे रहा हूं..इस गरीब बच्चों का विकास जरूरी है-यही देश सेवा है...यही महान भक्ति है-मैं इस बंगले को सेठ के हाथों में नहीं जाने दूंगा।'

राजेश ने एक झरझरी-सी ली और अपने आप बड़बड़या

'नहीं...नहीं यह नहीं हो सकता ।'

'मैं सुनीता के प्यार को धोखा नहीं दे सकता।'

-

'मैं मुहब्बत में स्वार्थी नहीं बनूंगा।'

अचानक सुनीता की आवाज आई-"किससे बातें कर रहे हो राजेश?"

राजेश चौंककर मुड़ा और बोला-“एक बात बताओ सुनीता।"

"पूछो।"

"आज आशोक को बातों से मालूम हुआ कि मास्टर जी देवता थे, जनरक्षक थे।"

"क्या मतलब ?"

"पर सेठ दौलराम देवता स्वरूप मास्टरजी पर दस लाख स्पयों की बेईमानी का अभियोग क्यों लगा रहा है?"

सुनीता ने चौंककर कहा-“सेठ दौलतराम...दस लाख रूपए?"

"हां।"

"हर्गिज नहीं... सेठ दौलतराम ने जो बंगला रहन रखने के लिए जबरदस्ती चैक दिया था वो बाबूजी लौटाने गए तो उनके असिस्टैंट प्रेम ने लेकर रख लिया और जब बाबूजी सेठ से बात करने गए तो उनका खून हो गया।"

"यानी वह दस लाख...।"

"अगर हमारे पास होते तो बंगला स्कूल न बन चुका होता ,मगर तुम यह सब कैसे जानते हो?"

"इसलिए कि जिन ड्राइवर कैलाश के हाथों मास्टर जी का खून हुआ था वह मेरे पिता हैं।"

"नहीं...!" सुनीता हड़बड़ाकर पीछे हट गई।

"मैं तुमसे मुहब्बत का नाटक करने आया था सुनीता ताकि इस बंगले पर कब्जा करने सेठ दौलतराम को सौंप सकू, और अपने निर्दोष पिता के जेल जाने का बदला ले सकू।"

"निर्दोष..!"

"हां सुनीता, खून मेरे पिता ने नहीं किया था, बल्कि सेठजी के हाथों खून हुआ था...वह इस लाख जरूर प्रेम ही ने कैश करा लिए थे जिसका दोष मास्टर जी पर लगा और सेठ ने भी इन्हीं को बेईमान समझा।





"क्या प्रमाण है इसका तुम्हारे पास?"

"वह फोटो जो सेठ दौलतराम के हाथों मास्टर जी का खून होते प्रेम ने खींचकर सेठजी को दस बरस ब्लैकमेल किया था.मैंने उस फोटोज के नैगेटिव सेठ को दे दिए थे लेकिन एक-एक कापी अपने पास रख ली थी-आओ, तुम्हें दिखाऊं।"
 

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