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"अच्छा बेटी चलो.... बाकी बातें घर पर होंगी।"
"चलिए, मैंने अभी तक खाना नहीं खाया है, बड़े जोर की भूख लगी है।"
गोविन्द ने हुक पर से जैकेट उतारा और रीता के साथ दरवाजे की ओर बढ़ गया।
मोहन बड़ी तेजी से दरवाजे के पास से हट गया। उसे लग रहा था कि उसका दिल आज अपनी सारी धड़कने पूरी कर लेगा। सारे बदन में बिजली की.सी लहरें दौड़ रही थीं.... तो यह रीता.... गुड़िया है..... उसके बचपन की दोस्त।
कुछ देर बाद रीता और गोविन्द मोहन के पास से गुजरे। मोहन एकदम तिरछा हो गया और रीता की निगाह उस पर पड़ गई। उसे देख कर वह एकदम चौंक पड़ी।
"अरे..... आप...?"
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मोहन के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। लेकिन गोविन्द के चेहरे से लगा, जैसे कोई भूचाल आ गया हो।
रीता ने कहा, “आप यहां कैसे?"
लेकिन मोहन के कुछ कहने से पहले ही गोविन्द बोल पड़े, “बेटी, यह तो क्लब है.... कोई भी यहां आ सकता है..... लेकिन तुम इन्हें कैसे जानती हो?"
___ "आज ही इनसे मुलाकात हुई पापा.....। मेरी गाड़ी में पैट्रोल खत्म हो गया था। इन्होंने ही पैट्रोल दिया था।"
"ठीक है.... अब घर चलो. देर हो रही है।"
रीता ने मोहन की ओर देख कर "सी यू" कहा और गोविन्द के साथ चल दी। मोहन अवाक्.सा खड़ा रहा।
फिर जैसे उसके मस्तिष्क में कोई तूफान जाग उठा। वह तेजी से अपने कमरे में चला आया।
दरवाजा बंद कर के उसने व्हिस्की की बोतल निकाली और एक गिलास में उंडेलकर गिलास होंठों से लगा लिया। फिर खाली गिलास मेज़ पर रखकर सिगरेट के कश लेने लगा।
उसकी आंखों के आगे रह.रहकर गुड़िया का चेहरा उभर आता था, जो धीरे.धीरे रीता के चेहरे में परिवर्तित हो जाता था। गुड़िया, जिसके साथ उसके बचपन के कई साल बीते थे। जिसके लिए वह आम के पेड़ों पर चढ़कर कच्ची.कच्ची कैरियां तोड़ा करता था..... जिसके लिए उसने एक बिल्ली जान से मार डाली थी , क्योंकि उस बिल्ली ने रीता के हाथ पर पंजा मारा था... लेकिन मोहन को लगा था, जैसे बिल्ली ने रीता के हाथ पर नहीं, उसके अपने दिल पर पंजा मारा हो।
उसे लगा जैसे किसी ने उसका दिल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया हो। इतने सालों के बाद उसने रीता को देखा था...... लेकिन अंकल ने उसे रीता से मिलने क्यों नहीं दिया? ..... उन्होंने हम दोनों को बचपन में ही अलग क्यों किया? शायद उन्हें मालूम हो गया था कि वे दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे हैं। इसलिए उन्होंने रीता को इतनी दूर भेज दिया कि वह मोहन को देख न सके और न मोहन उसे देख पाए। और फिर आज भी उन्होंने उसे रीता से मिलने नहीं दिया। आखिर वह रीता से उसे दूर क्यों रखना चाहते हैं?..... और लगता है रीता भी
अपने बचपन के साथी मोनू को भूल गई है।
मोहन का दिल बुरी तरह से बेचैन हो उठा। उसने गिलास उठा कर एक बूंट भरा और फिर एक नई सिगरेट सुलगा कर पीने लगा।
तभी किसी ने चुपके से उसके कानों में कहा, "रीता जब तुझ से अलग हुई थी, तो बहुत छोटी थी। बचपन की यदें होश संभालने के बाद भूला दी जाती है। लेकिन उन्हें फिर से याद दिलाया जा सकता है। रीता के दिल में जरूर तेरे लिए उतनी ही जगह होगी।"
"लेकिन अंकल.....।"
मोहन की विचारधारा एकदम छिन्न भिन्न हो गई। उसने सिगरेट एश.ट्रे में डाल दी और उठकर खड़ा हो गया।
फिर उसने अपना ओवरकोट पहना, फैल्ट हैट सिर पर ओढ़ा और तेजी से बाहर निकल आया।
एस. पी. वर्मा ने गोविन्द राम का सिगार सुलगाया और फिर अपना पाइप सुलगाकर कश लेते हुए बोले, "मेरा इरादा है कि घुघरु को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज दूं। तुम्हें तो मालूम ही है कि वह मेरा इकलौता बेटा है। पुलिस की नौकरी में फंसा रहने के कारण मैं उसकी शिक्षा.दीक्षा पर ध्यान ही नहीं दे सका। इसीलिए उसका मानसिक विकास नहीं हो पाया। सोच रहा हूं, अमेरिका जाकर इसकी पाई भी हो जायगी और मानसिक विकास भी।"
"मैं भी यहीं चाहता हूं।" गोविन्द ने कहा, "मेरी इच्छा है कि शादी के बाद रीता
और धुंघरु को अमेरिका भेज दिया जाए...... ताकि तुम्हें विलायती बहू का डर न रहे।"
वर्मा साहब हँस पड़े, "मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है। मैं तो इस रिते के लिए बिल्कुल तैयार हूं।"
"बस कुछ दिन बाद रीता के ग्रेजुएट हो ने की खुशी में एक पार्टी होने वाली है, उसी पार्टी में दोनों की सगाई की घोषणा कर दी जाएगी और फिर अमेरिका जाने से पहले दोनों की शादी कर देंगे।"
"ठीक है।"
अचानक रीता झल्लाई हुई आई। घुघरु उसके पीछे था।
"देखिए अंकल," रीता ने झल्लाकर वर्मा से कहा, "यह घुघरु कैरम के खेल में बड़ी बेईमानी करता है।"
"हाय..... मैंने कब की बेईमानी?"
"बोर्ड जब शुरू हुआ, मेरी गोटियां काली थीं और घुघरु की सफेद लेकिन जब आधा बोर्ड हो गया और काली गोटियां तीन
और सफेद नौ की नौ रह गईं तो कहने लगा, काली गोटिया मेरी हैं और सफेद तुम्हारी।"
"क्यों घुघरु?" वर्मा ने पूछा।
'डैडी, मुझे अच्छी तरह याद है कि काली गोटियां मेरी थीं।"
"तुम्हारा यह आपसी झगड़ा है, खुद ही निबटाओ।" गोविन्द ने कहा।
"पापा, मैं अपनी सहेली कुसुम के घर जा रही हूं।"
"ठीक है जाओ, लेकिन जल्दी लौट आना।"
“आप पर जल्दी पहुंचिएगा। मैं तब तक खाना खाऊंगी, जब तक आप न पहुंच जायेंगे।"
"अच्छा, अच्छा, मैं जल्दी पहुंच जाऊंगा।"
रीता वर्मा को नमस्ते करके दरवाजे की ओर तेजी से बढ़ी तो घुघरु ने जल्दी से अपने पिता से कहा, "डैडी मुझे भी कुसुम से मिलना है मैं रीता के साथ जा रहा हूं।"
फिर वह दौड़कर बाहर चला गया।
रीता ने जैसे ही कार स्टार्ट की घुघरु भी जल्दी से आ बैठा। रीता ने झल्लाकर कहा, "यह क्या बेहूदगी है?"
"बेहूदगी नहीं रीता, एकता है। हमें एक साथ जिन्दगी बितानी है इसलिए हर काम में एक.दूसरे का साथ देना चाहिए।"
रीता ने झल्लाकर कार स्टार्ट कर दी।
सड़क पर पहुंचकर घुघरु बोला, “एक सलाह दूं रीता?"
"क्या?" रीता ने झटके से पूछा।
"क्यो न हम, कुसुम के यहां जाने के बजाय जुहू चलें?"
"किस खुशी में?"
"इस खुशी में कि हम दोनों की शादी होने वाली है। पिछले छः महीने से हम एक.दूसरे के मंगेतर कहलाते है। लेकिन आज तक एक भी रोमांटिक सीन नहीं हुआ।"
रीता भिन्न उठी, "तुम्हारे साथ और रोमांटिक सीन!"
"शादी के बाद तो हजारों होंगे। शादी से पहले एक हो जाए।"
__“अच्छी बात है, आज यही सही।" रीता ने दांत भींच कर रहा और फिर उसने कार जुहू की ओर मोड़ दी।
"अच्छा बेटी चलो.... बाकी बातें घर पर होंगी।"
"चलिए, मैंने अभी तक खाना नहीं खाया है, बड़े जोर की भूख लगी है।"
गोविन्द ने हुक पर से जैकेट उतारा और रीता के साथ दरवाजे की ओर बढ़ गया।
मोहन बड़ी तेजी से दरवाजे के पास से हट गया। उसे लग रहा था कि उसका दिल आज अपनी सारी धड़कने पूरी कर लेगा। सारे बदन में बिजली की.सी लहरें दौड़ रही थीं.... तो यह रीता.... गुड़िया है..... उसके बचपन की दोस्त।
कुछ देर बाद रीता और गोविन्द मोहन के पास से गुजरे। मोहन एकदम तिरछा हो गया और रीता की निगाह उस पर पड़ गई। उसे देख कर वह एकदम चौंक पड़ी।
"अरे..... आप...?"
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मोहन के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। लेकिन गोविन्द के चेहरे से लगा, जैसे कोई भूचाल आ गया हो।
रीता ने कहा, “आप यहां कैसे?"
लेकिन मोहन के कुछ कहने से पहले ही गोविन्द बोल पड़े, “बेटी, यह तो क्लब है.... कोई भी यहां आ सकता है..... लेकिन तुम इन्हें कैसे जानती हो?"
___ "आज ही इनसे मुलाकात हुई पापा.....। मेरी गाड़ी में पैट्रोल खत्म हो गया था। इन्होंने ही पैट्रोल दिया था।"
"ठीक है.... अब घर चलो. देर हो रही है।"
रीता ने मोहन की ओर देख कर "सी यू" कहा और गोविन्द के साथ चल दी। मोहन अवाक्.सा खड़ा रहा।
फिर जैसे उसके मस्तिष्क में कोई तूफान जाग उठा। वह तेजी से अपने कमरे में चला आया।
दरवाजा बंद कर के उसने व्हिस्की की बोतल निकाली और एक गिलास में उंडेलकर गिलास होंठों से लगा लिया। फिर खाली गिलास मेज़ पर रखकर सिगरेट के कश लेने लगा।
उसकी आंखों के आगे रह.रहकर गुड़िया का चेहरा उभर आता था, जो धीरे.धीरे रीता के चेहरे में परिवर्तित हो जाता था। गुड़िया, जिसके साथ उसके बचपन के कई साल बीते थे। जिसके लिए वह आम के पेड़ों पर चढ़कर कच्ची.कच्ची कैरियां तोड़ा करता था..... जिसके लिए उसने एक बिल्ली जान से मार डाली थी , क्योंकि उस बिल्ली ने रीता के हाथ पर पंजा मारा था... लेकिन मोहन को लगा था, जैसे बिल्ली ने रीता के हाथ पर नहीं, उसके अपने दिल पर पंजा मारा हो।
उसे लगा जैसे किसी ने उसका दिल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया हो। इतने सालों के बाद उसने रीता को देखा था...... लेकिन अंकल ने उसे रीता से मिलने क्यों नहीं दिया? ..... उन्होंने हम दोनों को बचपन में ही अलग क्यों किया? शायद उन्हें मालूम हो गया था कि वे दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे हैं। इसलिए उन्होंने रीता को इतनी दूर भेज दिया कि वह मोहन को देख न सके और न मोहन उसे देख पाए। और फिर आज भी उन्होंने उसे रीता से मिलने नहीं दिया। आखिर वह रीता से उसे दूर क्यों रखना चाहते हैं?..... और लगता है रीता भी
अपने बचपन के साथी मोनू को भूल गई है।
मोहन का दिल बुरी तरह से बेचैन हो उठा। उसने गिलास उठा कर एक बूंट भरा और फिर एक नई सिगरेट सुलगा कर पीने लगा।
तभी किसी ने चुपके से उसके कानों में कहा, "रीता जब तुझ से अलग हुई थी, तो बहुत छोटी थी। बचपन की यदें होश संभालने के बाद भूला दी जाती है। लेकिन उन्हें फिर से याद दिलाया जा सकता है। रीता के दिल में जरूर तेरे लिए उतनी ही जगह होगी।"
"लेकिन अंकल.....।"
मोहन की विचारधारा एकदम छिन्न भिन्न हो गई। उसने सिगरेट एश.ट्रे में डाल दी और उठकर खड़ा हो गया।
फिर उसने अपना ओवरकोट पहना, फैल्ट हैट सिर पर ओढ़ा और तेजी से बाहर निकल आया।
एस. पी. वर्मा ने गोविन्द राम का सिगार सुलगाया और फिर अपना पाइप सुलगाकर कश लेते हुए बोले, "मेरा इरादा है कि घुघरु को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज दूं। तुम्हें तो मालूम ही है कि वह मेरा इकलौता बेटा है। पुलिस की नौकरी में फंसा रहने के कारण मैं उसकी शिक्षा.दीक्षा पर ध्यान ही नहीं दे सका। इसीलिए उसका मानसिक विकास नहीं हो पाया। सोच रहा हूं, अमेरिका जाकर इसकी पाई भी हो जायगी और मानसिक विकास भी।"
"मैं भी यहीं चाहता हूं।" गोविन्द ने कहा, "मेरी इच्छा है कि शादी के बाद रीता
और धुंघरु को अमेरिका भेज दिया जाए...... ताकि तुम्हें विलायती बहू का डर न रहे।"
वर्मा साहब हँस पड़े, "मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है। मैं तो इस रिते के लिए बिल्कुल तैयार हूं।"
"बस कुछ दिन बाद रीता के ग्रेजुएट हो ने की खुशी में एक पार्टी होने वाली है, उसी पार्टी में दोनों की सगाई की घोषणा कर दी जाएगी और फिर अमेरिका जाने से पहले दोनों की शादी कर देंगे।"
"ठीक है।"
अचानक रीता झल्लाई हुई आई। घुघरु उसके पीछे था।
"देखिए अंकल," रीता ने झल्लाकर वर्मा से कहा, "यह घुघरु कैरम के खेल में बड़ी बेईमानी करता है।"
"हाय..... मैंने कब की बेईमानी?"
"बोर्ड जब शुरू हुआ, मेरी गोटियां काली थीं और घुघरु की सफेद लेकिन जब आधा बोर्ड हो गया और काली गोटियां तीन
और सफेद नौ की नौ रह गईं तो कहने लगा, काली गोटिया मेरी हैं और सफेद तुम्हारी।"
"क्यों घुघरु?" वर्मा ने पूछा।
'डैडी, मुझे अच्छी तरह याद है कि काली गोटियां मेरी थीं।"
"तुम्हारा यह आपसी झगड़ा है, खुद ही निबटाओ।" गोविन्द ने कहा।
"पापा, मैं अपनी सहेली कुसुम के घर जा रही हूं।"
"ठीक है जाओ, लेकिन जल्दी लौट आना।"
“आप पर जल्दी पहुंचिएगा। मैं तब तक खाना खाऊंगी, जब तक आप न पहुंच जायेंगे।"
"अच्छा, अच्छा, मैं जल्दी पहुंच जाऊंगा।"
रीता वर्मा को नमस्ते करके दरवाजे की ओर तेजी से बढ़ी तो घुघरु ने जल्दी से अपने पिता से कहा, "डैडी मुझे भी कुसुम से मिलना है मैं रीता के साथ जा रहा हूं।"
फिर वह दौड़कर बाहर चला गया।
रीता ने जैसे ही कार स्टार्ट की घुघरु भी जल्दी से आ बैठा। रीता ने झल्लाकर कहा, "यह क्या बेहूदगी है?"
"बेहूदगी नहीं रीता, एकता है। हमें एक साथ जिन्दगी बितानी है इसलिए हर काम में एक.दूसरे का साथ देना चाहिए।"
रीता ने झल्लाकर कार स्टार्ट कर दी।
सड़क पर पहुंचकर घुघरु बोला, “एक सलाह दूं रीता?"
"क्या?" रीता ने झटके से पूछा।
"क्यो न हम, कुसुम के यहां जाने के बजाय जुहू चलें?"
"किस खुशी में?"
"इस खुशी में कि हम दोनों की शादी होने वाली है। पिछले छः महीने से हम एक.दूसरे के मंगेतर कहलाते है। लेकिन आज तक एक भी रोमांटिक सीन नहीं हुआ।"
रीता भिन्न उठी, "तुम्हारे साथ और रोमांटिक सीन!"
"शादी के बाद तो हजारों होंगे। शादी से पहले एक हो जाए।"
__“अच्छी बात है, आज यही सही।" रीता ने दांत भींच कर रहा और फिर उसने कार जुहू की ओर मोड़ दी।