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Romance बन्धन

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"अच्छा बेटी चलो.... बाकी बातें घर पर होंगी।"

"चलिए, मैंने अभी तक खाना नहीं खाया है, बड़े जोर की भूख लगी है।"

गोविन्द ने हुक पर से जैकेट उतारा और रीता के साथ दरवाजे की ओर बढ़ गया।

मोहन बड़ी तेजी से दरवाजे के पास से हट गया। उसे लग रहा था कि उसका दिल आज अपनी सारी धड़कने पूरी कर लेगा। सारे बदन में बिजली की.सी लहरें दौड़ रही थीं.... तो यह रीता.... गुड़िया है..... उसके बचपन की दोस्त।

कुछ देर बाद रीता और गोविन्द मोहन के पास से गुजरे। मोहन एकदम तिरछा हो गया और रीता की निगाह उस पर पड़ गई। उसे देख कर वह एकदम चौंक पड़ी।

"अरे..... आप...?"

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मोहन के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई। लेकिन गोविन्द के चेहरे से लगा, जैसे कोई भूचाल आ गया हो।

रीता ने कहा, “आप यहां कैसे?"

लेकिन मोहन के कुछ कहने से पहले ही गोविन्द बोल पड़े, “बेटी, यह तो क्लब है.... कोई भी यहां आ सकता है..... लेकिन तुम इन्हें कैसे जानती हो?"

___ "आज ही इनसे मुलाकात हुई पापा.....। मेरी गाड़ी में पैट्रोल खत्म हो गया था। इन्होंने ही पैट्रोल दिया था।"

"ठीक है.... अब घर चलो. देर हो रही है।"

रीता ने मोहन की ओर देख कर "सी यू" कहा और गोविन्द के साथ चल दी। मोहन अवाक्.सा खड़ा रहा।

फिर जैसे उसके मस्तिष्क में कोई तूफान जाग उठा। वह तेजी से अपने कमरे में चला आया।

दरवाजा बंद कर के उसने व्हिस्की की बोतल निकाली और एक गिलास में उंडेलकर गिलास होंठों से लगा लिया। फिर खाली गिलास मेज़ पर रखकर सिगरेट के कश लेने लगा।

उसकी आंखों के आगे रह.रहकर गुड़िया का चेहरा उभर आता था, जो धीरे.धीरे रीता के चेहरे में परिवर्तित हो जाता था। गुड़िया, जिसके साथ उसके बचपन के कई साल बीते थे। जिसके लिए वह आम के पेड़ों पर चढ़कर कच्ची.कच्ची कैरियां तोड़ा करता था..... जिसके लिए उसने एक बिल्ली जान से मार डाली थी , क्योंकि उस बिल्ली ने रीता के हाथ पर पंजा मारा था... लेकिन मोहन को लगा था, जैसे बिल्ली ने रीता के हाथ पर नहीं, उसके अपने दिल पर पंजा मारा हो।

उसे लगा जैसे किसी ने उसका दिल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया हो। इतने सालों के बाद उसने रीता को देखा था...... लेकिन अंकल ने उसे रीता से मिलने क्यों नहीं दिया? ..... उन्होंने हम दोनों को बचपन में ही अलग क्यों किया? शायद उन्हें मालूम हो गया था कि वे दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे हैं। इसलिए उन्होंने रीता को इतनी दूर भेज दिया कि वह मोहन को देख न सके और न मोहन उसे देख पाए। और फिर आज भी उन्होंने उसे रीता से मिलने नहीं दिया। आखिर वह रीता से उसे दूर क्यों रखना चाहते हैं?..... और लगता है रीता भी

अपने बचपन के साथी मोनू को भूल गई है।

मोहन का दिल बुरी तरह से बेचैन हो उठा। उसने गिलास उठा कर एक बूंट भरा और फिर एक नई सिगरेट सुलगा कर पीने लगा।

तभी किसी ने चुपके से उसके कानों में कहा, "रीता जब तुझ से अलग हुई थी, तो बहुत छोटी थी। बचपन की यदें होश संभालने के बाद भूला दी जाती है। लेकिन उन्हें फिर से याद दिलाया जा सकता है। रीता के दिल में जरूर तेरे लिए उतनी ही जगह होगी।"

"लेकिन अंकल.....।"

मोहन की विचारधारा एकदम छिन्न भिन्न हो गई। उसने सिगरेट एश.ट्रे में डाल दी और उठकर खड़ा हो गया।

फिर उसने अपना ओवरकोट पहना, फैल्ट हैट सिर पर ओढ़ा और तेजी से बाहर निकल आया।

एस. पी. वर्मा ने गोविन्द राम का सिगार सुलगाया और फिर अपना पाइप सुलगाकर कश लेते हुए बोले, "मेरा इरादा है कि घुघरु को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज दूं। तुम्हें तो मालूम ही है कि वह मेरा इकलौता बेटा है। पुलिस की नौकरी में फंसा रहने के कारण मैं उसकी शिक्षा.दीक्षा पर ध्यान ही नहीं दे सका। इसीलिए उसका मानसिक विकास नहीं हो पाया। सोच रहा हूं, अमेरिका जाकर इसकी पाई भी हो जायगी और मानसिक विकास भी।"

"मैं भी यहीं चाहता हूं।" गोविन्द ने कहा, "मेरी इच्छा है कि शादी के बाद रीता

और धुंघरु को अमेरिका भेज दिया जाए...... ताकि तुम्हें विलायती बहू का डर न रहे।"

वर्मा साहब हँस पड़े, "मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है। मैं तो इस रिते के लिए बिल्कुल तैयार हूं।"

"बस कुछ दिन बाद रीता के ग्रेजुएट हो ने की खुशी में एक पार्टी होने वाली है, उसी पार्टी में दोनों की सगाई की घोषणा कर दी जाएगी और फिर अमेरिका जाने से पहले दोनों की शादी कर देंगे।"

"ठीक है।"

अचानक रीता झल्लाई हुई आई। घुघरु उसके पीछे था।

"देखिए अंकल," रीता ने झल्लाकर वर्मा से कहा, "यह घुघरु कैरम के खेल में बड़ी बेईमानी करता है।"

"हाय..... मैंने कब की बेईमानी?"

"बोर्ड जब शुरू हुआ, मेरी गोटियां काली थीं और घुघरु की सफेद लेकिन जब आधा बोर्ड हो गया और काली गोटियां तीन

और सफेद नौ की नौ रह गईं तो कहने लगा, काली गोटिया मेरी हैं और सफेद तुम्हारी।"

"क्यों घुघरु?" वर्मा ने पूछा।

'डैडी, मुझे अच्छी तरह याद है कि काली गोटियां मेरी थीं।"

"तुम्हारा यह आपसी झगड़ा है, खुद ही निबटाओ।" गोविन्द ने कहा।

"पापा, मैं अपनी सहेली कुसुम के घर जा रही हूं।"

"ठीक है जाओ, लेकिन जल्दी लौट आना।"

“आप पर जल्दी पहुंचिएगा। मैं तब तक खाना खाऊंगी, जब तक आप न पहुंच जायेंगे।"

"अच्छा, अच्छा, मैं जल्दी पहुंच जाऊंगा।"

रीता वर्मा को नमस्ते करके दरवाजे की ओर तेजी से बढ़ी तो घुघरु ने जल्दी से अपने पिता से कहा, "डैडी मुझे भी कुसुम से मिलना है मैं रीता के साथ जा रहा हूं।"

फिर वह दौड़कर बाहर चला गया।

रीता ने जैसे ही कार स्टार्ट की घुघरु भी जल्दी से आ बैठा। रीता ने झल्लाकर कहा, "यह क्या बेहूदगी है?"

"बेहूदगी नहीं रीता, एकता है। हमें एक साथ जिन्दगी बितानी है इसलिए हर काम में एक.दूसरे का साथ देना चाहिए।"

रीता ने झल्लाकर कार स्टार्ट कर दी।

सड़क पर पहुंचकर घुघरु बोला, “एक सलाह दूं रीता?"

"क्या?" रीता ने झटके से पूछा।

"क्यो न हम, कुसुम के यहां जाने के बजाय जुहू चलें?"

"किस खुशी में?"

"इस खुशी में कि हम दोनों की शादी होने वाली है। पिछले छः महीने से हम एक.दूसरे के मंगेतर कहलाते है। लेकिन आज तक एक भी रोमांटिक सीन नहीं हुआ।"

रीता भिन्न उठी, "तुम्हारे साथ और रोमांटिक सीन!"

"शादी के बाद तो हजारों होंगे। शादी से पहले एक हो जाए।"

__“अच्छी बात है, आज यही सही।" रीता ने दांत भींच कर रहा और फिर उसने कार जुहू की ओर मोड़ दी।
 
जुहू की रेत पर पहुंचकर कार रुक गई। रीता और धुंघरु कार से उतर आये। धुंघरु ने बड़े मूड में रीता का हाथ पकड़ने की कोशिश की। लेकिन रीता ने झटके से हाथ छुड़ा लिया, "व्हाट इज दिस नानसेन्स.... अभी हमारा पहला रोमांटिक सीन कहां हुआ है?"

"फिर कैसे होगा?"

"मार्डन एज मे पहला रोमांटिक सीन इस तरह होता है कि मुहूर्त के लिए हीरोईन नारियल तोड़कर समुद्र में फेंकती है और हीरो उसे उठाकर लाता है। फिर दोनों उसे खाते हैं।"

"वाह वाह!" घुघरु खुशी से झूम उठा, "तो फिर शुरू करो।"

"मैं नारियल खरीदकर लाती हूं, तब तक तुम कपड़े उतारो।"

"हाय, कपड़े क्यों उतारूं?"

"अरे तो क्या कपड़े पहने.पहने समुद्र में घुसोगे?..... फिर गीले कपड़े पहन कर घर जाओगे क्या?"

"अरे तो क्या कपड़े पहने.पहने समुद्र में घुसोगे?..... फिर गीले कपड़े पहन कर घर जाओगे क्या?"

"अरे, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। ठीक है, तुम नारियल खरीदो मैं कपड़े उतारता हूं।"

घुघरु जल्दी.जल्दी कपड़े उतारने लगा।

रीता नारियल खरीद लाई।

"सिर झुकाओ।"

"हाय..... क्यों?"

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"अरे नारियल तोडूंगी और क्यों? हर हीरोइन हीरो के सिर पर ही नारियल तोड़ती है।"

"अरे बाप रे....!" घुघरु अपना सिर टटोलने लगा।

"बस इतने ही दम पर आशिक बने फिरते हो?"

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"रीता..... क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम नारियल पत्थ्ज्ञर पर फोड़ लो।"

"चलो यही सही..... लेकिन ऐसा करने से प्यार अधूरा ही रहेगा। क्योंकि मुहूर्त ही गलत हो रहा है।"

"परवाह नहीं, शादी के बाद पूरा हो जायेगा।"

"जैसी तुम्हारी मर्जी।"

रीता ने नारियल पत्थर पर फोड़ा। जैसी ही उसमें से पानी निकलने लगा, घुघरु ने

ओक लगा दी।

रीता बोली, "अरे अरे..... यह मय करते हो?"

"बहुत मीठा पानी होता है, इसे रेत पर नहीं गिराना चाहिए!"

रीता ने घुमाकर नारियल समुद्र में फेंक दिया।

"जाओ, जल्दी से ले आओ!"

"अरे बाप रे..... पानी ठंडा तो नहीं होगा?"

प्रेमी ठंडे और गर्म पानी की परवाह नहीं किया करते।"

घुघरु ने दो तीन बैठकें लगाई और फिर पानी में घुस गया।

रीता ने घुघरु के कपड़े उठाए और कार में जा बैठी। उसने कार स्टार्ट करने की

कोशिश की, लेकिन कार स्टार्ट नहीं हुई। रीता कार से निकल आई और तेजी से खजूरों के झुरमुट की ओर भाग गई। वह घबरा.घबराकर पीछे की ओर देखती जा रही थी। अचानक उसे किसी की टांगों की ठोकर लगी और वह हल्की.सी चीख के साथ तिरछी होकर रेत पर जा गिरी। जिसकी टांगों से वह टकराई थी, उसने जल्दी से उसे उठा लिया।

रीता हड़बराकर उसकी बाहों से निकल आई। और फिर जैसे ही अनजान व्यक्ति ने फैल्ट उतारा, रीता चौंक पड़ी। और फिर हल्के से आश्चर्य के साथ मुस्कुराती हुई

बोली, "आप?"

"मोहन .... मेरा नाम मोहन है।"

"आश्चर्य की बात है। इतने बड़े शहर में इतने थोड़े.से समय में आपसे यह तीसरी मुलाकात है।"

"लेकिन मुझे बिलकुल भी आश्चर्य नहीं है।" मोहन ने ठंडी सांस लेकर धीरे से कहा।

"क्यों?" रीता को आश्चर्य हुआ।

"इस क्यों के उत्तर पर शायद आपको विश्वास नहीं होगा।"

"विश्वास न होने की क्या बात है?

भला आप झूठ थोड़े ही बोलेंगे।"

"संभव है, आप मेरी बात झूठ समझें।"

"इसका निर्णय तो बात सुनने के बाद ही किया जा सकता।"

"क्या आप विश्वास करेंगी कि मैं यहां बैठा आप ही के बारे में सोच रहा था?"

"वह क्यों?" रीता चौंक पड़ी।

"इस क्यों का उत्तर आप अपने दिल से पूछिए।"

"यह क्या बात हुई। मेरे प्रश्न का उत्तर मेरा दिल कैसे देगा?"

"जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं, अब हम अपने प्रश्न का उत्तर दूसरे से चाहते हैं, लेकिन हमारे उस प्रश्न का उत्तर हमारे ही पास होता है।"

रीता विचित्र.सी नजरों से कुछ क्षण मोहन की ओर देखती रही।

"कहीं आपके दिमाग का कोई पेच ढीला तो नहीं हो गया?"

मोहन के होंठों पर एक मीठी मुस्कान फैल गई। उसने धीरे से कहा, "यह कोई नई बात नहीं है। हर प्यार करने वाले को शुरू में अपनी प्रेमिका से ऐसी ही बातें सुननी पड़ती है।"

"व्हाट.....?" रीता हड़बड़ा कर खड़ी हो गई, "आप मुझसे प्यार करते हैं?"

"हां," गंभीर और धीमे स्वर में मोहन बोला, "अरे आज से नहीं, सदियों से..... जन्म.जन्मान्तर से....।"
 
रीता आश्चर्य से मोहन को देखती रही। मोहन ने एक ठंडी सांस भरी और फिर फैल्ट उठाकर खड़ा हो गया और रीता की आंखों में देखता हुआ बोला, "संभव है, आप भी मुझे प्यार करती हों। अपना दिल और दिमाग टटोल कर देखिये.... शायद किसी कोने में मेरे प्यार की खुशबू मिल जाएं"

फिर वह बड़े इत्मीनान से एक ओर चल पड़ा।

रीता हक्की.बक्की.सी उसे देखती रही। लेकिन मोहन ने पलटकर नहीं देखा। वह एक कार की ओर बढ़ रहा था, जो खजूरों के झुरमुट से बहुत आगे खड़ी हुई थी।

अचानक रीता के कानों से घुघरु की आवाज़ टकराई।

"रीता..... रीता.... कहां हो तुम?.... आओ हमारे प्यार का मुहूर्त हो गया।"

रीता के चेहरे पर उकताहट नाच उठी और एकदम मोहन के पीछे दौड़ गई।

मोहन कार के पास पहुंच गया था। भागती हुई रीता भी वहां पहुंच गई। धुंघरु की आवाज़ पास आती जा रही थी। वह जल्दी से मोहन की कार में घुस गई।

मोहन रीता की ओर देखने लगा। तभी घुघ/ उसके पास पहुंचा और उसके कंधे पर हाथ मार कर बोला, “ऐ मिस्टर..... आपने इधर किसी लड़की की आते देखा है?"

मोहन घुघरु की ओर मुड़ा। घुघरु के बदन पर केवल नेकर था, जो भीगा हुआ था। उसके हाथ में नारियल था।

मोहन का चेहरा देखते ही घुघरु उछल पड़ा।

"अरे बाप रे..... मिस्टर पेट्रोल.... यानी कि आपने ही उस समय मेरी और रीता की मदद की थी।"

"जी हां।"

"अब आप मेरी मंगेतर को खोजने में मेरी मदद कीजिये। मैं आप का अहसान ज़िन्दगी भर नहीं भूलूंगा।"

"जरूर।" मोहन मुस्कराकर ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।

"हाय.... यह क्या कर रहे हैं आप?"

"आपकी मदद कर रहा हूं। मोहन ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

"मदद कहां कर रहे है? आप तो जा

"जी नहीं, ममद कर रहा हूं।"

फिर उसने कार आगे बढ़ा दी और घुघरु हक्का.बक्का.सा खड़ा रह गया।

कार सड़क पर लाकर मोहन ने ब्रेक लगाए और रीता की ओर देख कर बोला, "अब आप उस पागल की पहुंच से दूर

"बहुत.बहुत धन्यवाद, आपने उस पागल से मेरा पीछा छुड़ा दिया, वरना वह मुझे बोर करके आत्महत्या कर लेने पर मजबूर कर

देता।"

"बुरी बात है। अपने मंगेतर के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए।

"मंगेतर..... यू," रीता ने बुरा.सा मुंह बनाया, "जिस अहमक का साक्ष घड़ी भर भी बर्दाश्त नहीं होता, उसके साथी पूरी जिन्दगी कैसे बिताई जा सकती है।"

"आप को कहां छोडूं?"

"उस ओर मेरी कार खड़ी है। मुझे मेरी कार तक छोड़ दीजिए।"

मोहन ने कार आगे बढ़ाइ। लेकिन जैसे ही उसकी कार रीता की कार के पास पहुंची उसे घुघरु खड़ा दिखाई दिया, जो आंखों पर हाथ की ओट किए इधर.उधर देख रहा था।

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___ "अरे बाप रे...... यह बोर तो यहां खड़ा है।'' रीता घबड़ाकर बोली।

"फिर क्या आज्ञा है?" मोहन ने पूछा।

"सीधे चलिए।.... चाबी कार में ही है। यह खुद पहुंच जाएगा।"

मोहन ने कार सड़क पर डाल दी।

रीता अभी तक सीट के नीचे ही बैठी हुई थी। मोहन ने कहा .

"अब आप बहुत दूर आ गयी हैं। सीट पर बैठ जाइए।"

"क्या आपको मेरा गाड़ी में बैठना अच्छा नहीं लगा?"

"अगर आप जिन्दगी भर यहां बैठी रहें, तब भी बुरा न लगेगा।"

“धन्यवाद, मुझे चिल्ड्रन पार्क के पास उतार दीजिएगा।"

"अच्छी बात है।"

फिर खामोशी छा गई।

कुछ देर बाद कार चिल्ड्रन पार्क पहुंच कर रुक गई।

रीता दरवाज़ा खोलकर नीचे उतर आई।

"आपका बहुत.बहुत धन्यवाद।"

मोहन ने गोयर बोर्ड पर हाथ खा ही था कि रीता ड्राइविंग.सीट की खिड़की के पास पहुंचकर बोली, “सुनिए।"

"जो फर्माइए," मोहन ने कहा।

"आप कुछ देर तक रुक नहीं सकते?"

मोहन मुस्करा उठा।

"आप कहें, तो मैं भगवान से प्रार्थना करके इस घूमती हुई पृथ्वी को भी रोक

लूं।"

रीता की आंखों में फिर विचित्र से भाव नाच उठे। मोहन इंजन बंद करके बाहर आ गया। दोनो पार्क में चले गए। रीता ने

इधर.उधर देखकर एकान्त कोने की ओर इशारा करके कहा, "चलिए, वहां बैठे।"

दोनों उस कोने में जा बैठे।

रीता ने मोहन की ओर ध्यान से देखते हुए कहा, “एक बात बताइएगा?"

"पूछिए।"

"आप हैं कौन?"



"मोहन।"

"यह तो आपका नाम है।"

"नाम के अतिरिक्त आदमी और होता ही क्या है? लोग नाम से ही उसे पहचानते

"क्या आप मुझे पहले से जानते हैं?"

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"यह बात आप क्यों पूछ रही है?.... शायद इसलिए कि मैं तीसरी मुलाकात में ही प्रेम.प्रदर्शन कर बैठा हूं। रीता जी, हर आदमी एक दूसरे को सदियों से जानता है। उसके बीच अपरिचय की दीवारों तो होती हैं लेकिन एक बार की मुलाकात उन तमाम दीवारों को तोड़ देती है। लेकिन हमारी तो यह तीसरी मुलाकात है।"

"लेकिन एक अपिरिचत लड़की से कोई भी तीसरी मुलाकात में प्रेम प्रदर्शन नहीं कर बैठता।"

"क्या यह आपको अच्छा नहीं लगा?"

"इसी बात पर तो मुझे आश्चर्य हो रहा है। कालेज में एक बार मेरे एक क्लास फैलो ने एक प्रेम पत्र लिखकर एक किताब में रख कर मुझे दे दिया था। मैंने एक साल के लिए उसे कालेज से निकलवा दिया था। धुंघरु मुझे अपनी मंगेतर कहकर मेरे पीछे लगा रहता है। मुझे बहुत बुरा लगता है। लेकिन

आपने तीसरी बार ही मिलने पर जब अपना प्रेम प्रदर्शित किया, तो न जाने क्यों मुझे बुरा नहीं लगा।"

"क्या यह बात आपके प्रश्न का उत्तर नहीं है?"

"नहीं यह बात तो मेरे दिमाग में और अधिक उलझन पैदा कर रही है। आखिर आप में ऐसी क्या बात है कि आपकी बात मुझे बुरी नहीं लगी। सच बताइए, क्या बात मुझे पहले से नहीं जानते?"
 
"नहीं यह बात तो मेरे दिमाग में और अधिक उलझन पैदा कर रही है। आखिर आप में ऐसी क्या बात है कि आपकी बात मुझे बुरी नहीं लगी। सच बताइए, क्या बात मुझे पहले से नहीं जानते?"

"संभव है, हम दोनों ही एक दूसरे को पहले से जानते हों।"

"आज के आणविक युग में जन्म.जन्मान्तर और पुनर्जन्म पर कौन विश्वास करता है। और अगर यह सच भी है, तो भी मुझे पता नहीं है कि मैं भी आपको प्यार करती हूं।"

___ "आपने अपना दिल टटोल कर देखा है?"

"देख रही हूं, लेकिन मुझे ऐसा महसूस नहीं होता।"

"भूली बातें सहज याद नहीं आतीं।..... इसलिए जल्दी कोई निर्णय न कीजिए। आप

भी इसी शहर में रहती हैं और मैं भी। इत्मीनान से मेरे बारे में सोचिएगा। और जब कभी..... भले ही सालों क्यों न बीत जाएं.....

आप मुझे बुलायेंगी, मैं आपके पास पहुंच जाऊगा और तब आप मुझे मेरे सवाल का जवाब दे दीजिएगा।"

मोहन खड़ा हो गया और फिर बोला, "मैं जानता हूं कि आपका निर्णय मेरे ही पक्ष में होगा।"

"इस विश्वास का कारण है?"

"मेरा विश्वास, मेरी भावना और मेरा प्यार, जो मेरे हृदय तक ही नहीं बल्कि मेरी

आत्मा तक में सीमित है।"

"रीता अवाक् खड़ी रह गई। और जब मोहन बाहर की ओर चल पड़ा, तो उसके पीछे लपकी, “सुनिए।"

"फर्माइए," मोहन ने मुड़कर कहा।

"क्या आप मुझे मेरे घर तक पहुंचा देंगे?"

"आपके किसी काम आ सकू, इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और क्या होगा?"

दोनों कार में जा बैठे और कार रीता की कोठी की ओर बढ़ गई।

कोठी के फाटक पर पहुंचकर कार रुक गई। विचारों में डूबी रीता चौंक पड़ी और फिर हड़बड़ा कर इधर.उधर देखती हुई बोली, "अरे यह तो मेरी ही कोठी है।"

"जी हां आप ही की कोठी है।" मोहन ने कहा।

"लेकिन आपको कैसे मालूम हुआ कि मैं यहां रहती हं?"

__ "आपको याद है, हम दूसरी बात क्लब में मिले थे..... और उस क्लब के मालिक गोविन्द राम जी हैं.... जिनकी आप सुपुत्री हैं।"

"तो आप पापा को जानते हैं?"

"बहुत अच्छी

तरह।"

"वह कैसे?"

"क्या आप हर प्रश्न का उत्तर इसी मुलाकात में चाहती है?"

"नहीं...... आज से ठीक चार रोज़ बाद शाम की पांच बजे जुहू पर मिलिएगा।"

"धन्यवाद..... सन एन सैंड के सामने रेत पर मैं आप का इंतजार करूंगा।"

रीता कार से उतर गई। मोहन ने एक ठंडी सांस ली और कार आगे बढ़ा दी।

रीता अंदर पहुंची तो उसे पोर्टिको में अपनी कार खड़ी दिखाई दी। वह समझ गई कि घुघरु पहुंच चुका है। वह आगे बढ़ी तो उसे ऊपर बाल्कनी में गोविन्द राम खड़े दिखाई दिए, जो चिन्तित मुद्रा में उसी की ओर देख रहे थे।

रीता ने मुस्कराकर हाथ हिलाते.हुए ऊंची आवाज में कहा “पापा..... आप आ गए?"

"हां बेटी, तुम्हारी गाड़ी अभी.अभी घुघरु छोड़कर गया है।"

रीता हाल में पहुंची, तो गोविन्द राम अंदर की बालकनी में आ चुके थे। उन्होंने पूछा, "तुम कहां रह गई थी बेटी?"

"पापा, यह घुघरु बहुत बोर करता है। बहुत मुश्किल से उससे पीछा छुड़ाया है।"

"बेटी, वह तुम्हारा होने वाला पति है। उसके बारे में तुम्हें इस तरह नहीं कहना चाहिएं।"

"मैंने अभी इस बारे में कोई निर्णय नहीं किया है पापा।"

"खैर, यहां तक तुम आईं कैसे?"

"मोहन बाबू की कार से.... वही, जिन्होंने उस दिन पेट्रोल दिया था।"

गोविन्द राम धीरे.धीरे नीचे उतर आए। उन्होंने पूछा, “मोहन तुम्हें कहां मिला था?"

"जुहू पर।"

"उसने तुम्हें खुद लिफ्ट दी थी?"

"नहीं, मैंने मांगी थी।"

"रास्ते में उसने तुमसे बातें भी की होंगी?"

"बातें क्यों न करते? क्यों हम लोग गूंगे.बहर थे?"

"उसने यह भी बताया कि वह कौन है?"

__ "नहीं...... लेकिन आप तो जानते हैं उन्हें।"

"नौकर अगर मालिक को न जानेगा, तो कौन जानेगा।"

"क्या मतलब?"

"वह उस क्लब का मैनेजर है. जिसकी तुम मालिक हो।"

"लेकिन मोहन बाबू ने तो मुझे यह बात बताई नहीं।"
 
"बता देने से क्या उसकी हैसियत तुम्हारे बराबर हो जाती। तुम सेठ गोविन्द राम की बेटी हो। तुम्हें कुछ दिन बाद पता चलेगा कि तुम्हें पापा की क्या हैसियत है। .... बेटी, मैं

आजकल के नौजवानों को अच्छी तरह समझता हूं। मोहन जानता है कि तुम एक करोड़पति बाप की बेटी हो।"

“आप क्या कहना चाहते हैं पापा?"

"यही कि मुझे उससे तुम्हारा मेल.जोल पसंद नहीं है। लोग तुम्हें उसके साथ देखेंगे, तो क्या सोचेंगे?"

रीता कुछ नहीं बोली। गोविन्द राम ने ध्यान से रीता को दाते हुए कहा, क्या मैं आशा करूं कि मेरी बेटी अपने बाप की बनाई हुई इज्जत मिट्टी में नहीं मिलाएगी?"

“आप मेरे बारे में ऐसा क्यों सोचते हैं?"

"मुझे विश्वास है कि मेरी बेटी मेरे सम्मान पर आंच न आने देगी। लड़कियों के बारे में मोहन नेक आदमी नहीं है।"

रीता कुछ नहीं बोली, तभी एक नौकर ने आकर कहा, "मालिक, खाना तैयार है।"

“आओ बेटी, हाथ धोकर जल्दी से आ जाओ। मुझे बहुत भूख लगी है।"

रीता सोच में डूबी हुई बाथरूम की ओर बढ़ गई।

घड़ियाल ने रात के बारह के घंटे बजाए। रीता ने करवट बदल कर घड़ियाल की ओर देखा फिर कसकर आंखें भींच लीं। आंखें भींचते ही उसके सामने मोहन का चेहरा उभर आया। उसने जल्दी से आंखें खोल दीं।

"हे भगवान," रीता धीरे से बड़बड़ाई "यह क्या हो गया मुझे?"

किसी ने चुपके से कहा, "तू अनजाने में मोहन को प्यार करती है।

"यह झूठ है। भला मैं उसे कैसे प्यार कर सकती हूं, जिसे मैंने कल ही देखा है।"

"संभव है, जन्म.जन्मान्तर का प्यार हो.....!"

"यह बकवास है। मैं ऐसी बातों को नहीं मानती।"

"फिर उसके बारे में क्यों सोच रही हो?"

"न जाने क्यों?"

"इसी अनजानी भावना को प्यार कहते हैं पगली।"

"मैं उसे प्यार नहीं कर सकती, मेरे पापा उसे पसन्द नहीं करते।"

"प्यार किसी के अधिकार में नहीं होता.... इस पर कोई बन्धन नहीं लगाया जा सकता।"

"लेकिन मेरा मन मेरे वश में है। मैं अपने पापा की इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती।"

"तू अपने आप को बहला रही है। तू मोहन से मिलने जरूर जाएगी।"

"मैं उससे मिलने नहीं जाऊंगी। पापा कहते हैं, वह अच्छा आदमी नहीं है।"

"क्या तुझे मोहन में कोई बुराई दिखाई दी है?'

"नहीं।"

"तेरे साथ कोई अनुचित व्यवहार किया उसने?"

"नहीं।"

"फिर तूने कैसे विश्वास कर लिया कि वह अच्छा आदमी नहीं है?"

"पापा झूठ नहीं बोल सकते।"

"पगली, बड़े.बूढ़े समाज के नियमों को बनाए रखने के लिए ऐसे झूठ अक्सर बोल दिया करते है। वरना तीसरी बार ही तुझे

मोहन के साथ देखते ही यह बात न कहते।"

"मेरी समझ में कुछ नहीं आता?"

रीता ने करवट बदलकर तकिए में मुंह छिपा लिया। आंखें कसकर मूंद लीं। मोहन

का निर्दोष फिर उसके सामने आ गया। उसके होंठ हिले .

"मैं तुमको प्यार करता हूं।"

"सदियों से।"

"जन्म.जन्मान्तर से।"

"मैं तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा करूंगा।"

रीता हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसने एक गिलास पानी पिया और फिर झटके से रजाई ऊपर खींच ली।

पियानो के सुर रुक गए। लेकिन मोहन की उंगलियां सुरों पर ही रखी रहीं। उसने पलटकर नहीं देखा। लेकिन उसे पता चल गया कि उसके पीछे आकर खड़ा होने वाला व्यक्ति गोविन्द राम है।

कुछ देर खामोशी रही.... फिर मोहन ने धीरे से कहा .

"आप मुझसे कुछ कहना चाहते है?"

"हां, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं।"

"कहिए।"

"तुम्हें मालूम है कि रीता मेरी बेटी है?"

"मुझे यह भी मालूम है कि मैंने रीता के साथ बचपन का एक अहम् हिस्सा बिताया है।"

"तब तो शायद तुम्हें यह भी याद होगा कि मैंने रीता को बाहर पढ़ने क्यों भेजा था?"

"याद है, मेरी आंखों में रीता के प्रति झलकते प्यार को देखकर।"
 
रीता ने एक बड़ा.सा पत्थर उठाकर समुद्र की सतह पर फेंक दिया। लहरों में हलचल जाग उठी। रीता ने कलाई की घड़ी देखी। साढ़े पांच बज चुके थे, लेकिन मोहन का कहीं पता न था। वह बेचैनी से इधर.उधर देखने लगी।

रीता निराश हो उठी और सन एन्ड सैंड की ओर चल दी। थोड़ी दूर ही उसे एक पत्थर पर बैठा मोहन दिखाई दिया।

रीता का चेहरा चमक उठा। वह जल्दी से मोहन की ओर बढ़ी। मोहन के पास पहुंच कर वह ठिठककर रुक गई। मोहन विचारों में डूबा समुद्र की उठती गिरती लहरों को देख रहा था।

रीता ने धीरे से पुकारा, "मोहन बाबू.....!"

"तुम....!" मोहन ने उसकी ओर देखे बिना कहा।

"आप कब आए?"

"ठीक पांच बजे।"

"मैं पौने पांच बजे से आपकी राह देख रही हूं। आप मेरे पास क्यों नहीं आए?"

मोहन ने एक ठंडी सांस लेकर धीरे से कहा, "इतनी देर तक मैं यह सोचता रहा कि वह बात आपसे कैसे कहूं, जो मैं कहने आया हूं।"

"आपने मेरी बात तो सुनी नहीं, जो मैं कहने आयी हूं।

"मैं जानता हूं, आप जो कहने आयी

"नहीं आप नहीं जानते।"

"आप यही बताने आई हैं न कि आपके पापा ने आपको मेरी गाड़ी से उतरते देख लिया था और वे नहीं चाहते कि आप मुझसे मिलें।"

रीता हक्की.बक्की.सी रह गई।

मोहन ने मुस्कराकर कहा, "आप हैरान क्यों हैं? वास्तविकता जितनी कटु होती है, उतनी स्पष्ट भी होती है।"

"आप मुझ से क्या कहने आए थे?"

"यही कि मैंने अपने दिल में आपके लिए जो प्यार अनुभव किया था वह धोखा

था। मेरा जीवन प्यार जैसी चीज नाम के लिए भी नहीं है।"

रीता के चेहरे का रंग उतर गया। उसने ध्यान से मोहन का चेहरा देखा और कांपते स्वर में बोली, “आप झूठ बोल रहे हैं।"

"तब आप भी झूठ बोल रही है। सच बताइएँ? क्या आपके दिल में मेरे लिए प्यार छिप हुआ नहीं है?"

"हां यह सच है। मैं नहीं जानती कि मैं आपको कब से जानती हूं। लेकिन पिछले चार दिन से मुझे ऐसा लग रहा है कि जन्म.जन्मांतर से हम एक दूसरे से परिचित है..... एक दूसरे से प्यार करते हैं। और एक दूसरे के लिए जन्म लेते हैं। .... मैं नहीं । जानती कि हम दोनों के बीच कौन.सी डोर बंधी हुई है, जो हमें एक दूसरे की ओर खींचती रहती है। लगता है जैसे मैं सदियों से आपकी प्रतीक्षा करती रही हूं।"

रीता ने एक शान्ति भरी सांस ली। मोहन ने धीरे से रीता से अलग होकर कहा, "आत्मा को आत्मा ही पहचानती है.... प्यार को प्यार ही पहचानता है रीता जी!"

"यह सच है। अगर ऐसा न होता, तो मैं आज पापा की आज्ञा ठुकराकर आपसे मिलने न चली आती। पापा को हमारा मेल.जोल पसंद नहीं, आप पापा के नौकर हैं और आपसे मिलना.जुलना उनके लिए सम्माननीय नहीं है। उनका यह भी कहना है कि लड़कियों के संबन्ध में आप बहुत बदनाम हैं। और मुझसे पहले भी कई लड़कियों से आपका संबंध रह चुका है। लेकिन पापा की इन बातों पर न जाने क्यों, मैं विश्वास नहीं कर सकी। आपकी आंखों में झांकती सच्चाई और प्रेम की भावना ने मुझे इन बातों पर विश्वास नहीं करने दिया। लेकिन मोहन बाबू, पापा मुझे आपसे दूर क्यों रखना चाहते हैं?"

मोहन के होंठों पर एक हल्की.सी मुस्कान नाच उठी, "वे तुम्हें बहुत ही प्यार करतो हैं। मेरे ऊपर उनके बहुत.से अहसान हैं, इसलिए मैं भी उनका उतना ही सम्मान करता हूं, जो एक बेटे को पिता का करना चाहिए। मैं नहीं चाहता कि मेरा प्यार बाप.बेटी के बीच किसी प्रकार की गलतफहमी पैदा करे। तुम्हारे पापा ने झूठ बोलकर तुम्हें मेरे विरुद्ध करने की कोशिश की है, लेकिन इसमें उनकी कोई बुरी भावना नहीं है। मैं जानता हूं कि उन्हें ऐसा करने पर क्यों मजबूर होना पड़ा है। लेकिन वह बात मैं तुम्हें नहीं बता सकता।"

"क्या आपको मुझ पर विश्वास नहीं है?"

"प्रेम का दूसरा नाम ही विश्वास है रीता, लेकिन जीवन में कुछ ऐसे कटु यथार्थ भी होते हैं, जिन्हें कभी.कभी अपने आपसे भी छिपाना पड़ता है।"

रीता अपलक मोहन को देखती रही।

मोहन ने रीता के कंधों पर हाथ रख।
 
"मुझे गलत न समझना रीता। मेरे प्यार पर संदेह न करना। लेकिन मैं बहुत ही मज़बूर हूं। तुम्हें कुछ बता नहीं सकता। मैं बहुत ही भाग्यशाली हूं रीता कि तुम्हारा प्यार मुझे मिला। लेकिन मेरा जीवन जिस राह पर चल रहा है, उस राह पर तुम्हें लाकर मैं तुम्हारे जीवन को नष्ट नहीं करना चाहता।"

"यह आप क्या कह रहे है?"

"सच कह रहा हूं रीता.... जब दूसरी बार मैंने तुम्हें देखा, अगर उसी समय मेरे कर्तव्य ने मुझे चेता दिया होता, तो तुम पर अपना प्रेम कभी प्रकट न करता। लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। हम आज भी बड़ी आसानी से एक दूसरे से दूर हो सकते हैं। तुम अपने पापा की इच्छा के अनुसार घुघरू से विवाह कर सकती हो।"

"यह बात आप आज कह रहे हैं...! मेरे मन.मन्दिर में तो आपके अतिरिक्त और किसी की मूर्ति है ही नहीं। नारी जीवन में केवल एक बार ही किसी को प्यार करती है। मैं जीवन भर अब किसी दूसरे को अपन मन में कोई स्थान नहीं दे सकती। न आपको ही कभी भुला सकती हू।।" कहते.कहते रीता का गला भर आया।

"रीता....

"हां मोहन बाबू, मेरे पास होने की खुशी में पापा एक पार्टी दे रहे हैं। उस पार्टी में मेरी और घुघरु की सगाई की घोषणा की जायेगी। अगर आप मेरे प्यार की निर्भीकता देखना चाहते हैं, तो पार्टी में आइए।.... मैं परसों पार्टी में आपकी प्रतीक्षा करूंगी...... अगर आप न आए तो....!"

.

रीता ने वाक्य पूरा नहीं किया। वह मोहन की ओर देखने लगी। उसकी आंखों में जोश और विद्रोह की भावना भरी थी।

रीता तेज़ी से मुड़ी और अपनी कार की ओर चली गई।

मोहन चुपचाप खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।

टेलीफोन की घंटी की आवाज सुनकर मोहन चौंक पड़ा। उसने शराब का गिलास मेज़ पर रखकर बढ़े हुए शेव पर हाथ फेरा और फिर धीरे से रिसीवर उठा लिया। उसने लड़खड़ाते स्वर में कहा .

“यस?"

"मोहन?"

"स्पीकिंग।"

"मैं गोविन्द बोल रहा हूं।"

"ओह, अंकल.... फर्माइए।"

"तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है।"

"खुश खबरी और मेरे लिए?" मोहन के होंठों पर एक कड़वी मुस्कान फैल गई।

"हां, मोहन, कल सवेरे आठ बजे तुम्हारे माता.पिता का हत्यारा मदन खन्ना पांच साल बाद अमेरिका से लौट रहा है।.... तुम ठीक समय पर एयर पोर्ट पहुंचा और उस हत्यारे को अपने देश की धरती पर पांव रखने से पहले मौत के घाट उतार दो।"

मोहन के दिल की धड़कन बढ़ गई। आंखों से आग बरसने लगी। दूसरी ओर से गोविन्द राम ने कहा, "सुन रहे हो मोहन?"

"जी हां, सुन रहा हूं।"

"साइलेंसर लगा रिवाल्वर तुम्हारी मेज़ की दराज़ में रखा हुआ है। उस रिवाल्वर की एक गोली तुम्हारे माता.पिता की भटकती हुई आत्माओं को शान्ति प्रदान कर देगी।"

फिर फोन डिस्कनेक्ट हो गया। मोहन ने रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया। उसके समूचे बदन में सन्नाटा.सा दौड़ रहा था।

फिर उसने गिलास उठाया और एक ही सांस में खाली कर दिया।

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हवाई जहाज की आवाज़ वायुमंडल में गूंज उठी।

मोहन ने हवाई जहाज की ओर इस तरह देखा, जैसे उसके जीवन और मृत्यु से हवाई जहाज़ का गहरा संबंध हो। उसके माथे पर पसीने की बूंदें थर.थर्रा रही थीं खून लावे की तरह गर्म होकर तेजी से दौड़ रहा था।

हवाई जहाज रन.वे पर उतर आया और रुकने के लिए पोजीशन लेने लगा।

मोहन ने ओवर कोट की जेब में पड़े रिवाल्वर को मजबूती से पकड़ लिया। उसे लग रहा था, जैसे उसने किसी नाग का फन पकड़ रखा है और अगर उसकी पकढ़ ढीली हो गई तो यह नाग उसे ही डस लेगा। उसका गला सूखता जा रहा था और दिल की धड़कनें लगातार तेज़ होती जा रही थीं।

हवाई जहाज़ रुक गया..... सीढ़ियां लगा दी गईं..... और मोहन की निगाहें हवाई जहाज़ के दरवाजे पर जम गईं।

कछ देर बाद दरवाज़ा खुल गया और मुसाफिर सीढ़ियों से उतरने लगे।

फिर कुछ देर बाद मोहन को वह चेहरा दिखाई दिया, जो गोविन्द राम ने फोटो में दिखाया था। मदनकुमार खन्ना..... लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके साथ एक स्त्री भी थी। उस स्त्री के चेहरे से स्नेह और ममता की किरणें फूट रही थीं। आंखों में प्रसन्नता की चमक थी। लगता था वह साधारण स्त्री नहीं कोई देवी है।

दोनों धीरे.धीरे सीढ़ियों से उतरने लगे।

मोहन का रिवाल्वर वाला हाच थर.थर कांपने लगा।

अचानक उसे अपने पास ही प्रसन्नता से कांपती हुई एक बूढी अवाज़ सुनाई दी .

"मालिक....! मालिक....!"

.

.

मोहन चौंककर बूढ़े की ओर देखने लगा। बूढ़े की दाढ़ी और सिर के बाल दूध की तरह सफेद थे। वह मदन की ओर देखता हाथ हिला रहा थ। उसके रोम.रोम से प्रसन्नता फूट रही थी।

मदन और वह स्त्री भी बूढ़े की ओर देख कर हाथ हिलाते हुए धीरे.धीरे रेलिंग की ओर बढ़ रहे थे। मदन ने उस स्त्री के कंधे का सहारा ले रखा था।

"कितना खुश हो हा है तेरे माता.पिता का हत्यारा।"

"सोच क्या रहा है, निकाल रिवाल्वर.... चला दे गोली।"

"केवल एक गोली तेरे माता.पिता की भटकती हुई आत्माओं को शान्ति पहुंचा देगी।"

"हां मैं इसे मार डालूंगा.... इस खूखार भेड़िए को जिन्दा नहीं छोडूंगा।"

मदन अब उसके रिवाल्वर की रेंज में आ चुका था।

"केवल एक गोली...!"

मोहन की निगाहें मदन के चेहरे पर जमी हुई थी और उसका हाथ्ज्ञ जेब से निकलने के लिए बेचैन हो उठा था।

अचानक मोहन की निगाहों में रीता का चेहरा घूम गया।

"मैं तुमसे प्यार करती हूं मोहन।"

"अगर मेरे प्यार की निर्भीकता देखना चाहते हो, तो पार्टी में आना।"

"अगर तुम पार्टी में न आए तो....?"

एक चेलेंज..... एक धमकी....!

फायर की आवाज़.... मदन की लहराती हई चीख! मदन की साथी स्त्री का करुण भरा रुदन....!

हथकड़ियां... और फांसी का फंदा...!

फिर रीता का चेहरा! वीरान! सुनसान! निस्तेज!

"मैं भी तुम्हारे पास आ रही हूं मोहन।"

"तुमने मेरे प्यार को बदनाम कर दिया।"

"मेरा प्रेमी हत्यारा हो सकता है, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।"

"प्यार तो मान को सत्य की ज्योति दिखाता है। भगवान को पहचानने की प्रेरणा देता है।"

"लेकिन तुम भगवान को पाने की बजाए, शैतान बन गए।"

"मैंने तो तुम्हें देवता समझा था, तुमने इतना नीच कर्म कैसे किया?"

"क्या बिगाड़ा था मैं तुम्हारा?"

फिर जैसे मोहन का अन्त:करण बोल उठा।

"मैंने कोई पाप नहीं किया रीता...... मैंने अपने माता.पिता के हत्यारे से बदला लिया

"तुमने बदला क्यों लिया? क्या तुम्हें भगवान पर, कानून पर विश्वास नहीं था?"

"तुमने कानून अपने हाथ में क्यों लिया?"

और तभी पीछे से आवाज आई.

"मालिक....!"

मोहन बुरी तरह चौंक पड़ा।

मोहन ने देखा मदन और वह स्त्री उसके पास ही खड़े थे। वह स्त्री उस बूढ़े के पैर छू रही थी।

"अरे मालकिन, यह आप क्या कर रही है?"

"शम्भू काका," स्त्री ने भरे गले से कहा, "अपने कर्तव्य का पालन कर रही हूं शम्भू काका।"

"हां काका, तुम्ळारे इन चरणों के प्रताप से कमला दोबारा घर लौट कर आई और इसी की तपस्या ने मेरे पैरों को फिर से शक्ति प्रदान की है।" मदन ने कहा।

मोहन के मस्तिष्क में आंधियां चलने लगीं।

"मैं इस देवी का सुहाग उजाड़ने आया हूं.... हे भगवान, यह क्या हो रहा है।
 
मोहन के मस्तिष्क में अनगिनत छनाके गूंज उठे। वह हड़बड़ाकर वापस जाने के लिए मुड़ा। अचानक उसका कंधा कमरा से टकरा गया और कमला लड़खड़ाकर गिरने लगी। मोहन ने जल्दी से संभाला। कमला का हाथ मोहन के कंधे पर आ गया और मोहन

की बांह कमला की पीठ पर। कमला ने चौंककर मोहन की ओर देखा। मोहन कमला की ओर देख कर जैसे सब कुछ भूल गया। उन बूढी, प्यार और स्नेह भरी आंखों में न जाने कैसी आकर्षक चमक थी जो मोहन को बरबस अपनी ओर खींचे लिए जा रही थी।

कुछ देर बाद मोहन को होश आया। उसने कमला को छोड़ते हुए कहा, “क्षमा कीजिएगा माता जी।"

"कोई बात नहीं बेटे।"

"माताजी ..... बेटे.... मातजी.... बेटे...।"

उसके मुंह से यह शब्द क्यों निकला....? कितनी मिठास है, इस शब्द में।

और कमला के मुंह से निकले शब्द उसकी आत्मा की गहराइयों में उतरते चले गए।

शम्भू और मदन भी बड़े ध्यान से मोहन को देख रहे थे।

अचानक मोहन को अपनी अनजानी भूल अनुभव हुई और वह तेजी से आगे बढ़ गया।

वे तीनों उसे जाते देखते रहे।

फिर कमला बोली, “आपने देखा इस लड़के को?"

"हां, देख रहा हूं।"

"इसका चेहरा अपने मोनू से कितना मिलता.जुलता है।"

"मैं भी यही सोच रहा हूं मालकिन।" शम्भू ने कहा।

"मेरा मन न जाने क्यों इसकी ओर खिंचा जा रहा है.... जब इसने मुझे संभाला तो मुझे लगा, मेरे अंदर छिपी ममता जाग उठी हो.... कहीं यह अपना मोनू ही तो नहीं है?" कमला ने कहा।

___"न जाने कहां होगा अपना मोनू।" मदन ने एक ठंडी सांस ली। और फिर वे लोग एरोड्रम आफिस की ओर बढ़ गए।

*** ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
गोविन्द राम ने कलाई की घड़ी देखी और बेचैनी से एक नम्बर डायल किया और फिर रिसीवर कान से लगा लिया।

थोड़ी देर में दूसरी ओर से आवाज आई, "हैलो!...."

"कौन...... जयकिशन?"

"यस बॉस!"

"मोहन आ गया?"

"जी, अभी तक नहीं आया।"

"तुमने उसे एयरपोर्ट पर देखा था?"

"मैं रॉकी के साथ उससे थोड़ी दूर पर ही खड़ा था। ताकि अगर उसे किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता पड़े, तो हम दोनों उसकी सहायता कर सकें। लेकिन उसने आपकी आज्ञा का पालन नहीं किया। और हमारे देखते.देखते न जाने कहां चला गया।"

"जैसे ही वह आए, हमें सूचना दो।"

"ओ. के. बॉस।"

"दैट्स आल।"

गोविन्द राम ने रिसीवर पटक दिया। उनके आंखें गुस्से से लाल हो गई। उन्होंने सिगार निकालकर उसका कोना इस तरह तोड़ा जैसे मोहन की गर्दन तोड़ी हो।

तभी एक नौकर भीतर आया।

"मालिक सारे मेहमान आ चुके है।"

"हूं चलो...... हम आते हैं।"

नौकर के जाने के बाद उन्होंने कई गहरे.गहरे कश लिए और फिर सिगार ऐश.ट्रे में रगड़कर बुझा दिया। और फिर उसे तोड़कर फेंकते हुए बाहर आ गए।

___ हाल की सीढ़ियों में पहुंचकर उन्होंने देखा, सारा हाल मेहमानों से भरा हुआ था। एक ओर एस. पी. वर्मा और घुघरु खड़े थे। रीता अपनी सहेलियों साथ अठखेलियां करती इधर.उधर घूम रही थी। बरबस ही उसकी निगाहें दरवाजे की ओर उठ जाती थीं, जैसे वह किसी का इंतजार कर रही हो।

अचानक वर्मा साहस की निगाहें गोविन्द राम की ओर उठ गईं। वह हाथ हिला कर मुस्कराए। गोविन्द राम ने अपने आपको संभाला और मुस्कराते हुए सीढ़यां उतरकर नीचे आ गये।

उन्हें देखते ही रीता उनकी ओर लपकी।

"ओह पापा..... सारे मेहमान आपको पूछ रहे थे..... आप क्या कर रहे थे?"

"एक जरूरी संदेश का इंतजार कर रहा था बेटी।"

फिर गोविन्द राम सुपरिटेन्डेंट आफ पुलिस मि. वर्मा की ओर बढ़े।

"हैलो वर्मा....!"

.

..

"हैलो," वर्मा ने हान मिलाते हुए मुस्कराकर पूछा, "कहां थे भई?"

घुघरु ने झुककर गोविन्द राम के पैर छुए।

"गुड ईवनिंग! माई वुड बी फादर इन लॉ।"

"जीते रहो।" गोविन्द राम ने उसके सिार पर हाथ फेरा।

वर्मा साहब हँस दिए।

"भई, धुंघरु तो आपसे इतना प्रभावित हो गया है कि मुझे डर लगने लगा है कि कहीं शादी के बाद मुझे भूल न जाए।"

दोनों ने कहकहा लगाया। घुघरु ने लजाकर उंगली दांतों में दवाई और रीता की

ओर बढ़ गया।

वर्मा ने गोविन्द राम के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "रीता की सफलता के लिए बधाई।"

"तुम्हें भी।" गोविन्द राम मुस्कराए।

"अब जल्दी से रीता को मुझे सौंप दो।"

"आज पार्टी में ही सगाई की घोषणा किए देता हूं। फिर मुहूर्त निकलवा कर जल्दी ही शादी कर दूंगा।"

"हां, बहू को घर में देखने के लिए आंखें तरस रही हैं। फिर मैं जल्दी ही इन दोनों को अमेरिका भेज देना चाहता हूं।"

रीता के पास पहुंचकर घुघरु बोला, "सुनो रीता...!"

रीता ने मुस्कराकर कहा, “फर्माइए।"

"चारों ओर कोयल की तरह कूकती फिर रही हो, एक.आध बोल अपने होने वाले पति की ओर भी फेंक दो।"

रीता ने हल्का.सा ठहाका लगाया और तभी उसकी निगाह दरवाज़े की ओर उठ गई।

दरवाजे में मोहन खड़ा था। चेहरे पर गहरी गंभीरता, आंखों में एक विचित्र.सा निश्चय और दृढ़ता लिए।

रीता की आंखें खुशी से चमक उठीं। उसने कनखियों से गोविन्द राम की ओर देखा। वह खा जाने वाली आंखों से मोहन को घूर रहे थे। उनकी आंखों से शोले बरस रहे थे।

रीता को एक जोरदार झटका लगा।

लेकिन फिर वह मुस्कराती हुई मोहन की ओर लपकी, "आप आ गए मोहन बाबू...... मुझे पूरा.पूरा विश्वास था कि आप ज़रूर आयेंगे।"

मोहन ने मुढकराते हुए धीरे से कहा, "अगर आज न आता तो शायद फिर कभी न आता।"

"फिर आप अपनी रीता को कभी न पाते।"

"इसलिए तो मैं आ गया रीता।"

रीता ने हाथ बढ़ा दिया, “आइए।"

मोहन की निगाहें अचानक
 

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