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Romance बन्धन

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मोहन की निगाहें अचानक गोविन्द राम की ओर उठ गईं। उसे लगा, गोविन्द राम आंखों.ही.आंखों में उसे खा जायेंगे। उसके चेहरे पर दृढ़ता भरी मुस्कान दौड़ गई। उसने अपना हाथ रीता के हाथ में दे दिया। रीता मोहन का हाथ थामे आगे बढ़ी..... वर्मा साहब आश्चर्य से उन दोनों की ओर देख रहे थे।

गोविन्द राम की ओर देख कर वर्मा साहब ने धीरे.से कहा .

"गोविन्द.....!"

"हूं...!'' गोविन्द चौंक पड़े।

"यह लड़का कौन?"

"मेरे क्लब का मैनेजर है..... मोहन कुमार।"

"रीता से गहरी मित्रता है इसकी।"

"हां, दोनों अच्छे मित्र है।"

वर्मा साहब की आंखों में संदेह जाग उठा।

घुघरु लपक कर मोहन के पास पहुंच गया, "हैलो मि. पेट्रोल....!"

"हैलो मि. पेट्रोल ...!"

"हैलो मि. धक्का मार...!" मोहन मुस्कराया।

रीता ने कहकहा लगाया। घुघरु भी उस कहकहे में शामिल हो गया। फिर वह रीता के पास खिसककर धीरे.से बोला, “ऐ रीता! यह क्या कर रही हो?"

"क्या?" रीता ने आश्चर्य से पूछा।

-

-

"मेरी मंगेतर होकर तुमने मोहन का हाथ क्यों पकड़ रखा है?"

इससे पहले कि रीता उत्तर देती, गोविन्द राम बड़ी मेज़ा के पास गए और हाथ उठाकर मेहमानों को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से बोले .

"आदरणीय सज्जनो....! सुनिए..... सुनिए....!"

सारे मेहमान गोविन्द राम की ओर देखने लगे!

गोविन्द राम ने ऊंची आवाज़ में कहा, "आप लोगों को यह सुनकर प्रसन्नता होगी कि आज की पार्टी केवल रीता के पास होने की खुशी में ही नहीं, बल्कि रीता की सगाई की खुशी में भी दी जा रही है।... आज मैं अपनी बेटी रीता और अपने मित्र एस. पी. वर्मा के सुपुत्र घुघरु चंद वर्मा की सगाई की घोषणा करता हूं।"

सबसे पहले घुघरु ने तालियां बजाईं। और फिर सारा हाल तालियों से गूंज उठा। लेकिन मोहन और रीता शान्त भाव से खड़े

थे।

गोविन्द राम ने जेब से एक डिबिया निकाली और रीता को देते हुए बोले, “लो

बेटी, अपने मंगेतर की उंगली में अंगूठी पहना दो।"

रीता ने डिबिया खोलकर अंगूठी निकाली। घुघरु ने भी जल्दी से अंगूठी निकाल ली और रीता की ओर खाली उंगली बढ़ाकर जल्दी से बोला, "लो रीता, जल्दी से पहना दो।"

रीता ने अंगूठी लिए मुस्कराकर घुघरु की ओर देखा, फिर वह मोहन की ओर मुड़ी

और अंगूठी उसकी उंगली में पहना दी।

सब लोग हक्के.बक्के रह गए।

घुघरु जल्दी से बोला, "अरे रीता, मेरी अंगुली इधर है.... वह तो मि. पेट्रोल की उंगली है।"

गोविन्द राम का सार बदन क्रोध से जल उठा। सारे मेहमान सन्नाटे में रह गए।

वर्मा साहब ने कहा, "गोविन्द! क्या तुमने हमें अपमानित करने के लिए बुलाया था?"

गोविन्द राम झटके से रीता के पास पहुंचकर गुस्से से बोले, “यह क्या बेहूदगी है रीता?"

"यह बेहूदगी नहीं है पापा, यह मेरा निर्णय है।"

"बको मत, मैंने धुंघरु के साथ तुम्हारी सगाई की है।"

"घुघरु को मैंने नहीं अपने पसन्द किया था पापा।"

"हाय..... यानी मैं तुम्हें पसन्द नहीं हूं?" घुघरु जल्दी से बोला।

"नहीं मि. घुघरु, अगर मैंने तुम्हें जीवन साथी के रूप में नहीं चुना तो इसका यह अर्थ नहीं कि तुम मुझे पसन्द नहीं हो। तुम आज भी मेरे उतने ही गहरे मित्र हो और भविष्य में भी रहोगे। एक मित्र के नाते मैं तुम्हें पसन्द करती हूं, लेकिन जीवन साथी के नाते मोहन बाबू को।"

___"रीता...!" गोविन्द राम गुस्से से चीख पड़े।

___ "पापा! भगवान के लिए नाराज़ न होइए। ठंडे दिल से सोचिए। आपने मुझे पिता का ही नहीं मां का भी प्यार दिया है।.... मैं मोहन को प्यार करती हूं और अपने जीवन साथी के रूप में इन्हें चुन चुकी हूं..... ऐसी दशा में क्या आप अपनी बेटी का दिल तोड़ना पसन्द करेंगे?"

गोविन्द राम होंठ भींचे खड़े रहे।

रीता शान्त स्वर में फिर बोली. "विवाह जीवन भर का साथ होता है पापा, मैं मोहन बाबू को प्यार करती हूं। इनके साथ मेरा पूरा जीवन सुख शान्ति से बीत जाएगा। अगर

आपके कहने से मैं घुघरु से विवाह कर लूं तो भी मोहन बाबू को दिल से निकाल न सकूँगी।"

फिर वह वर्मा साहब की ओर देख कर बोली, "अंकल, आप ही सोचिए.... क्या आप ऐसी बहू को घर में ले जाना पसन्द करेंगे, जो पत्नी तो आपके बेटे की कहलाए, लेकिन प्यार किसी और को करे!"

"नही," वर्मा साहब ने धीरे से कहा।

"मैंने आपको, पापा को या घुघरु को कोई धोखा नहीं दिया है। मेरी स्पष्टवादिता को अपना अपमान न समझिए। सोचिए, अगर मैं आपकी बेटी होती तो ऐसी स्थिति में आप क्या करते? क्या आप मेरी अनिच्छा से विवाह कर देते?"

"नहीं बेटी, कभी नहीं।" वर्मा साहब आगे बढ़े और रीता के सिर पर हाथ्ज्ञ फेरते हुए बोले, "मुझे बड़ी खुशी हुई बेटी कि तुमने मुझे भविष्य की एक बहुत बड़ी उलझन से बचा लिया। तुम पढ़ी.लिखी समझदार हो, बालिग हो, तुम्हें अपना जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है। तुमने वही किया है जो हर समझदार लड़की को करना चाहिए।"

फिर वर्मा साहब ने गोविन्द राम से कहा, "गोविन्द राम, रीता ने जो कुछ किया है, ठीक किया है। मुझे उसका रत्ती भर भी दुख नहीं है। अब तुम गुस्सा छोड़ रीता और मोहन को आशीर्वाद दो, वरना मुझे बहुत दुख होगा।"

___ गोविन्द रात ने बड़ी कठिनाई से अपने

आपको संभाला और जबरदस्ती मुस्कराते हुए रीता के सिर पर हाथ फेरकर बोला, "तेरी खुशी ही मेरी खुशी है.... बेटी भगवान तुम दोनों को सुखी रखे।"

"पापा....!" रीता गोविन्द राम के सीने से लिपट गई।

मोहन इस तरह खड़ा था, जैसे कोई सपना देख रहा हो।

गोविन्द राम ने रीता से कहा, "तुम पार्टी जारी रखो, मैं अभी आता हूं।"

गोविन्द राम ऊपर चले गए

रीता मोहन की ओर मुड़ी।

धुंघरु पत्थर की तरह दोनों हाथ लटकाए खड़ा शून्य में न जाने किसे घूर रहा था।

मोहन ने अपनी अंगूठी उतारकर रीता की उंगली में पहना दी।

सबसे पहले वर्मा साहब ने तालियां बजाईं और फिर सारे मेहमान तालियां बजाने लगे। रीता और मोहन को आंखें खुशी से छलक उठीं।

रीता ने धीरे से कहा, "मोहन बाबू.... मैंने आपके प्यार की लाज रख ली।"

"तुम सचमुच महान हो रीता।"

और फिर तालियों के शोर में अचानक धुंघरु के जोर.जोर से रोने की आवाज उभरी

और सब लोग घुघरु की ओर देखने लगे। वर्मा साहब ने बौखलाकर इधर.उधर देखा

और फिर घुघरु की बांह पकड़ ली।

"यह क्या बदतमीजी है..... ईडियट कहीं के।"

और उसे घ्झसीटते हुए बाहर चले गए।
 
रीता मोहन को छोड़ने बरामदें तक आई।

मोहन ने धीरे से कहा, “अच्छा रीता, विदा।"

"जाइए।"

मोहन जैसे ही मुड़ा, रीता ने उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों एक पल एक.दूसरे की

आंखों में देखते रहे।

अचानक रीता मोहन के सीने से लिपट गई।

"रीता..... मेरी जिन्दगी...।"

"न जाने क्यों आपसे अलग होने को जी नहीं चाह रहा है।"

"मंजिल पास आ जाए, तो आदमी धीरज खो बैठता है" रीता के बालों में हाथ फेरते हुए मोहन ने कहा, "तुमने थोड़ी.सी देर में ही जो मोर्चा जीता है, मैं उसे वर्षों में भी न जीत पाता। मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम मेरा प्रूार ही नहीं मेरी शक्ति भी हो। मेरा सर्वस्व तुम्ही हो रीता।"

"मोहन....!"

"रात बहुत हो गई रीता, जाओ आराम करो।"

"अब हम कब मिलेंगे?"

"कल शाम ठीक पांच बजे जुहू पर..... वहीं जहां हमारे प्यार की पहली कोंपल फूटी थी।"

“आज की रात और कल का दिन कैसे बीतेगा मोहन?"

"पगली," मोहन ने रीता का चेहरा दोनों हाथों में लेकर काह, "बताऊं कैसे बिताओगी?"

"बताइए।"

मोहन ने झुककर रीता के होंठ चूम लिए।

"यह हमारे प्यार की प्रथम निशानी है। इसकी अनुभूति में डूबी कल शाम तक का

समय आराम से बिता लोगी।"

फिर वह रीता को अलग करके अपनी कार की ओर बढ़ गया। कार स्टार्ट करके उसने हाथ हिलाया। रीता ने भी प्रत्युत्तर में हाथ हिलाया। मोहन को गोविन्द राम की एक झलक दिखाई दी, जो बालकनी में खड़े देख रहे थे। जैसे ही मोहन ने उनकी ओर हाथ हिलाया वे जल्दी से आड़ में हो गए।

फिर मोहन ने कार फाटक की ओर बढ़ा दी।

कार फाटक से निकलकर थोड़ी ही दूर गई होगी कि कार की रोशनी में उसे सड़क पर दो आदमी खड़े दिखाई दिए। एक आदमी ने दूसरे का गला पकड़ रखा था और दूसरा अपना गला छुड़ाने की कोशिश करता हुए मचल रहा था।

मोहन ने एकदम ब्रेक लगाए और इंजन बंद किए बिना दरवाज़ा खोलकर तेज़ी से नीचे उतरे हुए चीखा, "कौन है?.... यह

क्या हो रहा है?"

लेकिन गला घोंटने वाले आदमी पर मोहन की आवाज़ का कोई असर न हुआ।

मोहन उसकी ओर झपटता हुआ चीखा, “खबरदार.... अलग हट जाओ।"

लेकिन वह जैसे ही उन दोनों के पास पहुंचा, किसी ने पीछे से उसके सिर पर वार किया। मोहन के हलक से एक तेज़ चीख निकली और वह दोनों हाथों से सिार थामकर

औंधे मुंह सड़क पर जा गिरा।

लड़ने वाले दोनों आदमी फुर्ती से मोहन पर झपट पड़े। दो आदमी और आ गए और चारों ने मिल कर मोहन को उठाकर अपनी कार की पिछली सीट पर डाल दिया। फिर चारों कार में जा बैठे।

कार स्टार्ट हुई और बड़ी तेज़ी से एक ओर चली गई।

रीता बुरी तरह उछल पड़ी। उसने मोहन की चीख साफ सुनी थी।

"मोहन बाबू....!" वह पागलों की तरह बड़बड़ाई।

फिर वह फाटक की ओर दौड़ती हुई ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी "मोहन बाबू... मोहन बाबू..!"

उधर से गोविन्द राम चिल्लाए, "रीता बेटी.... यह क्या पागलपन है?"
 
रीता ने फाटक के पास पहुंचकर चीखकर कहा, “पापा .... पापा ... मैंने अभी.अभी मोहन बाबू की चीख सुनी थी।"

"ठहर जाओ, बाहर मत जाना..... मैं आ रहा हूं।"

लेकिन रीता ने उनकी बात अनसुनी कर दी। वह दौड़ती हुई फाटक से बाहर निकली। थोड़ी दूर पर ही सड़क के बीचों.बीच मोहन की गाड़ी खड़ी थी।

रीता फिर चिल्लाई, "मोहन बाबू.....! क्या हुआ मोहन बाबू?"

लेकिन उत्तर मिलने की बजाय कार गुर्राई और तेजी से आगे चली गई।

रीता कार के पीछे दौड़ती हुई चीखी, "मोहन बाबू.... मोहन बाबू...!"

पीछे से गोविन्द राम की चीख सुनाई दी, "रीता....! ठहर जाओ....!"

रीता ठिठककर रुक गई।

गोविन्द राम तेज़ी से चलते हुए रीता के पास पहुंचकर बोले, "यह क्या पागलपन है रीता! पड़ोसी सुनेंगे, तो क्या कहेंगे!"

रीता ने हांफते हुए रुआंसे स्वर में कहा, "मैंने मोहन बाबू की चीख साफ सुनी है। उसके साथ जरूर कोई दुर्घटना घटी है।"

___ "तुम्हें भ्रम हुआ है बेटी, अभी.अभी तो वह अच्छा.खास निकला था। भला उसके साथ क्या दुर्घटना हो सकती है?"

"नहीं पापा, मैंने उनकी आवाज़ पहचान ली थी। लगता था, जैसे किसी ने उन पर हमला किया हो।"

"लेकिन वह तो कार में था?"

"कार तो यहां सड़क पर खडी थी।

उनके साथ कोई दुर्घटना नहीं हुई थी, तो मेरे पुकारते ही उन्होंने कार क्यों भगा

ली? रुके क्यों नहीं?"

"तुम्हें वहम हुआ है बेटी।"

"नहीं पापा, उनके साथ कोई दुर्घटना जरूर हुई है। आप अपनी कार लेकर

चलिए।"

"बको मत।" गोविन्द राम ने गुस्से से कहा।

"पापा.....!" रीता कांप उठी।

"तुम्हारा पागलपन हद से बढ़ता जा रहा है। मैंने बहुत बर्दाश्त कर लिया और अब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गा है।.... चलो

अन्दर चलो।"

"पापा .... मोहन बाबू...!"

"मैं कहता हूं। अंदर चलो।" गोविन्द राम ने गुस्से से चीखकर कहा। और फिर रीता की बांह पकड़कर उसे खींचते हुए अंदर चले गये।

"जाओ, जाकर आराम करो.... अभी तक तुमने मेरा प्यार देखा है, गुस्सा नहीं।"

फिर उन्होंने रीता को उसके बैडरूम में धकेल दिया और क्रोध से पैर पटकते हुए अपने बैडरूम में चले गए।

रीता ने गोविन्द राम को पहली बार इस प्रकार का व्यवहार करते देखा था। वह अभी तक इस व्यवहार का कारण नहीं समझ पा रही थी।

वह परेशान होकर अपने बिस्तर पर गिर पड़ी और फूट.फूट कर रोने लगी।

रोते.रोते न जाने कितना समय बीत गया। अचानक टेलीफोन की घंटी बजी। वह चौंककर उठ बैठी।

कुछ देर तक वह आंखें फाड़े दरवाज़े की ओर देखती रही, फिर नंगे पैर ही दरवाजे की ओर दौड़ी।

दरवाज़े से बाहर निकलते ही वह ठिठककर रुक गई। फोन गोविन्द राम के

कमरे में था। गोविन्द राम की आवाज़ सुनाई दे रही थी .

"हैलो... गोविन्द राम स्पीकिंग।"

दूसरी ओर से न जाने क्या कहा गया।

फिर गोविन्द राम ने पूछज्ञ .

"उसे होशा आया या नहीं?"

कुछ देर बाद वह बोले, "ठीक है, उस पर कड़ी निगरानी रखो।

मैं कुछ देर बाद पहुंच रहा हूं। मैं देखूगा कि वह किस तरह रीता के साथ विवाह करने के योग्य रहता है।"

फिर उन्होंने रिसीवर पटक दिया।

रीता को लगा, जैसे किसी ने उसके सिर पर वम दे मारा हो। उसने गोविन्द राम के पैरों की आहट सुनी, जो दरवाज़े की ओर आ रही थी। वह जल्दी से आड़ में हो गई। गोविन्द राम अपने कमरे से निकलकर ड्रेसिंग . रूम में चले गये।
 
रीता का पूरा बदन थर.थर कांप रहा था। वह तेज़ी से दबे पांव कमरे से निकली और हाल में पहुंच गई। उसने धीरे.से सदर दरवाज़ा खोला और फिर बाहर निकलकर दरवाज़ भेड़ दिया।

फिर वह दौड़ती हुई गोविन्द राम की कार के पास पहुंची और डिग्गी को खोलकर उसमें घुस गई। डर के मारे उसका बदन थर.थर कांप रहा था। बदन से पसीने की बूंदें कीड़ों की तरह रेंगे रही थीं।

कुछ देर बाद गोविन्द राम के क़दमों की आवाज़ सुनाई दी। फिर कार का दरवाज़ा खुला.... फिर बंदें हुए और कार स्टार्ट होकर एक ओर चल दी।

मोहन की चेतना धीरे.धीरे लौट रही थी। और कुछ देर बाद वह पूरी तरह होश में आ गया। उसने महसूस किया कि वह नंगे फर्श पर औंधा पड़ा है।

धीरे.धीरे उसे रात की बीती घटनाएं एक.एक कर याद आने लगी और फिर वह हड़बड़ाकर उठ बैठा।

उसने अपने चारों ओर नज़र डाली। वह कुछ आदमियों के घेरे में था। उन आदमियों में जयकिशन भी था, उसके हाथ्ज्ञ में रिवाल्वर था।

मोहन ने बड़े इत्मीनान से अपनी जेब की ओर हाथ बढ़ाया। लेकिन जयकिशन ने घुड़ककर कहा, “खबरदार.... हाज्ञ बाहर रखों"

मोहन ने मुस्कराकर धीरे से कहा, "सिगरेट ने की आज्ञा भी नहीं है?"

"हूं.... सिगरेट पी सकते हो।"

मोहन ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर उसमें से सिगरेट निकाला। फिर

जेब टटोलकर धीरे से उठते हुए कहा, "मेरे पास माचिस नहीं है।'

"रॉकी, इसकी सिगरेट जला दो।" जयकिशन ने कहा।

रॉकी ने आगे बढ़कर माचिस निकाली और मोहन की सिगरेट जलाने लगा। मोहन ने सिगरेट सुलगाते.सुलगाते अचानक पैंतरा बदला

और रॉकी को ज़ोर से जयकिशन पर धकेल दिया। राकी जयकिशन से टकराया और दोनों फ़र्श पर गिरे। जयकिशन के हाथ से रिवाल्वर निकलकर दूर जा गिरा।

जयकिशन जोर से चिल्लाया, “खबरदार, जाने न पाए।"

बाकी दो आदमी मोहन पर टूट पड़े। मोहन ने एक को उठा कर दूसरे पर फेंक दिया। तब तक रॉकी और जयकिशन संभल गए और मोहन पर टूट पड़े। मोहन ने दोनों

की गर्दने बगल में दबाकर एक दूसरे के सिर टकरा दिए।

अचानक पीछे से किसी ने मोहन का कालर पकड़कर खंच लिया। मोहन ने पलट कर घूसा उठाया लेकिन उसका हाथ उठा ही रह गया।

"अंकल....! आप.....?!"

गोविन्द राम ने पूरी ताक़त से मोहन की ठोडी पर चूंसा मारा। मोहन लड़खड़ा कर कई कदम पीछे हट गया। गोविन्द राम लगातार मोहन के मुंह पर चूंसे मारते रहे। लेकिन मोहन का हाथ न उठ सका। ठोडी और नाक से खून बहने लगा।

गोविन्द राम ने उसका गला पकड़कर झंझोड़ते हुए कहा .

"कमीने, अहसान फरामोश.... मैंने तुझे छह साल की उम्र से पालकर इतना बड़ा किया.... और तू आज मुझे ही डसने चला है।"

मोहन ने भारी आवाज़ में कहा, "अंकल, मैं आपके इन घूसों का उत्तर दे सकता हूं, लेकिन न जाने क्यों मेरा हाथ नहीं उठता.... न जाने कौन.सी शक्ति है, जो मुझे

हाथ उठाने से रोक देती है।"

"मेरे टुकड़ों पर पले हाथ भला मुझ पर क्या उठेंगे?"

"लेकिन अंकल, इन हाथों ने आपको लाखों कमाकर दिए हैं। मैंने हराम का नहीं खाया.... स्मगलिंग की..... पुलिस से टक्कर ली... और वह सब कुछ किया जो एक नमक हलाल.गुलाम ही कर सकता है।"

"और आज तूने मेरे नमक को हराम कर दिया।" गोविन्द राम चीख उठे।

"नहीं अंकल, मैंने नमकहरामी नहीं की।"

"कमीने, इससे बढ़कर नमकहरामी और क्या होगी कि तूने अपनी औकात और मेरे अहसान भूल कर मेरी बेटी पर ही डोरे डाले।"

"इसे नमकहरामी न कहिए, प्रेम राजा और रंक में भेदभाव नहीं करता। प्यार करना कोई अपराध नहीं है। आपने मुझे और रीता को बचपन से पाला है। मैं नहीं जानता, मेरे मन में रीता के लिए इतना गहरा प्यारे क्यों है। इतने दिनों तक दूर रहने के बाद जैसे ही

रीता सामने आई, सोया प्यार फिर जाग उठा।"

__ "और तू उस पर में अपने कर्तव्य को भूल गया। तूने अपने माता.पिता के हत्यारे को छोड़ दिया।.... तुझे मालूम नहीं, मदन ने तेरी मां के साथ बलात्कार किया। जिसके कारण तेरी मां ने आत्महत्या की। फिर मदन ने तेरे बाप ने मरते समय अन्तिम इच्छठा प्रकट की थी कि जवासन होकर तू मदन से अपन मा.बाप की हत्या का बदला ले।"

"उस समय वे प्रतिशोध से पागल हो रहे होंगे। अगर उन्हें थोडी देर सोचने को मौका मिल जाता तो वह ऐसी बात कभी न कहते। उन्हें यह सोचने का मौका मिल जाता कि अगर उनके बेटे ने मदन खन्ना से बदला लिया, तो वह भी बच न सकेगा और उसे फांसी हो जायेगी..... और फिर उनकी आत्मा

को कभी भी शान्ति न मिल सकेगी। कोई भी बाप अपने बेटे की बर्बादी और उसकी मृत्यु पर खुश नहीं हो सकता और न उसे इसकी प्रेरणा ही दे सकता है!"

"याद रख, तू मेरे जीते जी रीता को नहीं पा सकता। और तुझे भी तब तक इस कैद से छुटकारा नहीं मिलेगा, जब तक तू मदन खन्ना को मौत के घाट न उतार देगा।"

"यह आपकी भूल है अंकल," मोहन ने फीकी.सी मुस्कराहट के साथ कहा, "मैं अगर मदन खन्ना को मार डालता, तो शादी जीवन भर चैन की सांस न ले पाता। क्यों कि मदन खन्ना के साथ एक ऐसी देवी थी, जो स्नेह और ममता की साकार मूर्ति थी। उसके स्पर्श से मुझे लगा था, जैसे वह किसी स्त्री का स्पर्श नहीं मेरी सगी मां का स्पर्श है। अगर मैं उस देवी का सुहाग उजाड़ देता, तो मुझे मरने के बाद भी शान्ति न मिलती। और रीता को मैंने पहली और अन्तिम बार प्यार किया है। रीता के प्यार ने ही मुझे सिखाया है कि मनुष्य को किसी की हत्या करने का कोई अधिकार नहीं है। प्यार मान को जीवनदान का संदेश देता है। जीवन छीनने का नहीं। प्रतिशोध की आग मनुष्य के अस्तित्व और उसकी आत्मा को जलाकर खाक कर देती है। इसी में मैं वर्षों से जलता रहा हूं। लेकिन रीता के प्यार को फुहार ने अब यह आग बुझा दी है। भगवान उन्हीं के साथ न्याय करते हैं, जो भगवान के न्याय को हाथ में नहीं लेते। न जाने क्यों आप मुझ पर मदन खन्ना को मार डालने के लिए दबाव डाल रहे है? अगर मेरी जगह आपका बेटा होता, तो क्या आप उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करते?"

गोविन्द को लगा, जैसे मोहन ने उनके दिमाग पर हथौड़ा दे मारा हो। अगर मेरा बेटा होता, तो वह भी इतना ही बड़ा होता। ऐसा ही जवान होता। लेकिन दुर्भाग्य ने मेरी पत्नी के साथ मेरे बेटे को भी मुझसे छीन लिया और मेरे इस दुर्भाग्य का कारा है मदन.... मैं उसे जिन्दा नहीं रहने दूंगा।

फिर गोविन्द राम ने चीख कर कहा, "कुछ भी हो, मैं मदन को जिन्दा नहीं छोडूंगा..... कभी नहीं छोडूंगा।"

मोहन हक्का.बक्का सा उनकी ओर देखता रह गया।

गोविन्द राम ने कहा, "याद रखो मोहन, यह काम तुझे अपने ही हाथ से करना पड़ेगा...... मदन खन्ना तेरे हाथ से ही मारा जायेगा।"

"यह कभी नहीं होगा अंकल..... अब ये हाथ कोई भी गैर कानूनी काम नहीं करेंगे।"

"जरूर करेगें वरना मेरे रिवाल्व की गोली तेरे सीने से पार हो जायगी।"

"कोई चिन्ता नहीं।"

"मोहन!" गोविन्द राम बुरी तरह दहाड़े और फिर जयकिशन से बोले, "बांध दो इसके दोनों हाथ। देखता हूं, यह कब तक मेरी आज्ञा का पालन नहीं करता।"

मोहन ने फीकी मुस्कान के साथ कहा

"आप अपनी यह हसरत भी निकाल लीजिए अंकल।"

और जयकिशन तथा रॉकी ने मोहन के दोनों हाथ उसकी पीठ पर कसकर बांध दिए।

रीता को लगा, जैसे वह कोई भयानक सपना देख रही है। उसका दिल उछलकर मुंह तक आ गया।

"हे भगवान, मोहन को कैसे बचाऊं? पापा तो सचमुच पागल हो गए हैं।"

अचानक उसे कुछ सूझा और वह तेजी से दौड़ती हुई तहखाने की सीढ़ियां चढ़ने लगी। सीढीयां गोविन्द राम के दफ्तर में निकलीं। यह क्लब का दफ्तर था। जिस की अलमारी में तहखाने को जाने वाली सीढ़ियां थीं। कमरे में पहुंचकर रीता ने इधर.उधर देखा और फिर टेलीफोन का रिसीवर उठा लिया। उसने कांपते हाथों से नम्बर डायल किए और रिसीवर कान से लगा लिया।

कुछ देर बाद दूसरी ओर से आवाज़ आई

"हैलो...!"

"कौन ? एस. पी. वर्मा....?"

"मैं ही बोल रहा हूं.... आप कौन हैं?"

"अंकल .... मैं रीता बोल रहूं।"

"रीता बेटी, कय बात है? तुम इनती घबड़ाई क्यों हो?"

.

"मैं बहुत परेशान हूं अंकल। मोहन बाबू की जिन्दगी खतरे में है! उन्हें केवल आप ही बचा सकते हैं।"

"तुम कहां से बोल रही हो बेटी?"

"पापा के क्लब से।"

"क्या मोहन वहीं है?"

"हां अंकल, पापा ने मोहन को बांध रखा है और उसे मारने पर तुले बैठे हैं।"

+

"यह क्या कह रही हो? उन्होंने तो उसके साथ तुम्हारी सगाई की है?"

"पता नहीं क्या बात है। वह चाहते है कि मोहन अपने हाथ से मदन खन्ना नाम के किसी आदमी को मार डाले।"

"क्या?"

"हां अंकल, और मोहन बाबू किसी की हत्या करने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए पापा अब मोहन बाबू को मार डालने पर तुल गए हैं।"

"गोविन्द राम कहीं पागल तो नहीं हो गए?"

"शायद पागल ही हो गए हैं। और अंकल, आज मुझे मालूम हुआ कि पापा बहुत बड़े स्मगलर हैं।"

"हाट.....!"

"हां अंकल, भगवान के लिए फौरन आइए वरना ये लोग मोहन बाबू को मार डालेंगे।"

"मैं आ रहा हूं बेटी, तुम चिन्ता न करो।"

"मोहन और पापा तहखाने में है। इस तहखाने का रास्ता क्लब के उस कमरे की

अलमारी में से है, जिसमें पापा का आफिस है। यह अलमारी दाहिनी ओर की दीवार में

फिर रीता ने रिसवीर रख दिया और अलमारी में घुसकर दौड़ती हुई सीढ़ियों से उतरने लगी।

अचानक एक सीढ़ी पर उसका पांव फिसला और एक तेज चीख के साथ

लुढ़कती हुई वह नीचे जा गिरी।
 
रीता की चीख सुनकर गोविन्द राम चौंक पड़े। दरवाजे की ओर आश्चर्य से देखते हुए उन्होंने जयकिशन से कहा, "देखो.... कौन है?"

जयकिशन दौड़ता हुआ बाहर गया। कुछ देर बाद जब वह लौटा तो उसके साथ रीता थी।

रीता को देखते ही गोविन्द राम चौंक पड़े, "तुम यहां कैसे आ गईं रीता?"

रीता ने मोहन की ओर देखा। मोहन ने आश्चर्य से कहा, "रीता, तुम यहां?"

"मोहन बाबू...!"

रीता रोती हुई मोहन की ओर लपकी और मोहन से लिपट गई।

गोविन्द राम गुस्से से चीख उठे, “रीता, हट जाओ इसके सामने से।"

"नहीं हटूंगी," रती ने दोनों हाथ फैला दिए, “आप मोहन को मार नहीं सकते।"

"मैं कहता हूं, हट जाओ।"

"नहीं हटूंगी, आप हंटर मेरे ऊपर चलाइए।"

"रीता की बच्ची, मैं कहता हूं मेरे रास्ते से हट जाओ।"

"मैं अपने होने वाले सुहाग की आखिरी सांस तक रक्षा करूंगी... मेरे जीते जी आप इन्हें छू भी नहीं सकते, मैं सब कुछ सुन

चुकी हूं। में तो आपको देवता समझ करती थी। मुझे मालूम न था कि आपके अंदर इतना ज़हर भरा हुआ है। आप स्मगलिग करते हैं। आज ही मुझे यह बात मालूम हुई कि मोहन मेरे बचपन का साथी मोनू है। और

आपने मोनू को इसलिए पाला था कि बड़ा होकर यह मदन खन्ना की हत्या करे और फांसी पर चढ़ जाए। क्या यही इंसानियत

और शराफत है आपकी?"

गोविन्द राम की आंखें क्रोध से जल उठीं। उन्होंने दांत भींच लिए।

"पागल लड़की, मैं नहीं चाहता था कि तेरा भरम टूटे, लेकिन आज तू मेरे रास्ते में रुकावट बन रही है, इसलिए सुन.... तू मेरी बेटी नहीं है। मोहन की तरह मैंने तुझे भी पाला है। तू एक मुजरिम शंकर की बेटी है। जो जेल से फरार होते हुए मारा गया था।"

"नहीं पापा, यह झूठ है।"

"अगर मैं तेरा बाप होता, तो तू मेरे रास्ते में कभी भी रुकावट न बनती। अब मैं तेरे ही द्वारा अपने प्रतिशोध की आग बुझाऊंगा।"

"पापा....!"

गोविन्द राम ने मोहन से कहा, "मोहन, यह तुम्हारी बचपन की साथी रीता है। तुम्हारी प्रेमिका है। मैं अपने प्रतिशोध की आग बुझाने के लिए तुमसे एक सौदा करता हूं..... अगर तुम रीता का जीवन बचाना चाहते हो, तो मदन खन्ना को मार डालो।"

मोहन सन्न रह गया।

गोविन्द राम ने कड़वी मुस्कराहट के साथ कहा, "बोलो, सौदा मजूर है?"

"नहीं मोहन बाबू.... मेरे लिए अपने हाथ खून से न रंगना।"

गोविन्द राम ने जेब से रिवाल्वर निकाल लिया।

"बोलो मोहन...... क्या जवाब है

तुम्हारा?"

"नहीं, मोहन नहीं।" रीत चिल्लाई।

मैं सिर्फ पांच तक गिनूंगा। अगर तुमने अपना निर्णय न बदला तो मैं रीता को गोली मार दूंगा।"

गोविन्द राम ने रीता की ओर रिवाल्वर तान लिया।

रीता ने आंखें मूंद कर कहा, "गोली चलाइए पापा.... संसार के सामने एक उदाहरण रहेगा कि एक बाप ने अपनी बेटी को अने प्रतिशोध के लिए मार डाला.... आपके हाथों मरना मैं अपना सौभाग्य समझती हूं।"

"बको मत, तुम मेरी बेटी नहीं हो।"

"क्या मां.बाप वही होते हैं, जो जन्म देते हैं?..... नहीं पापा नहीं, वास्तविक मां.बाप तो वह होते हैं, जो पालते हैं। आप मुझे भले ही अपनी बेटी न समझें, लेकिन मैं मरते दम तक आपको अपना पिता ही मानती रहूंगी।"

"चुप रह लड़की, भावुकतापूर्ण बातों से तू मेरा निश्चय नहीं बदल सकती।"

फिर गोविन्द राम ने मोहन से पूछा, "बोलो मोहन.... क्या निर्णय है, तुम्हारा?"

"म..... म.... मैं।"

"एक.... दो.... तीन.... चार....।"

गोविन्द के रिवाल्वर की नाल उठी...।

मोहन एकदम चीख पड़ा।

"ठहरिए, मुझे आपका निर्णय स्वीकार

"मोहन बाबू....!" रीता चीख उठी।

"यह असंभव है रीता.... मैं अपनी आंखों के सामने तुम्हें मरते हुए नहीं देख सकता।"

"तुम्हारे बाद मैं जीकर क्या करूंगी मोहन बाबू?"

गोविन्द राम ने मुस्कराकर जयकिशन से कहा, "इस लड़की को यहां से हटा दो।"

जयकिशन ने रीता को खींचकर मोहन के सामने से हटा दिया।

गोविन्द राम ने रीता की पीठ पर रिवाल्वर लगाकर जयकिशन से कहा, "जाो, मेरे शिकरों को ले आओ।"

जयकिशन दूसरे कमरे में चला गया।

गोविन्द राम ने रॉकी से कहा, "मोहन का एक हाथ खोलकर रिवाल्वर पकड़ा दो।"

रॉकी ने मोहन का दायां हाथ खोलकर रिवाल्वर पकड़ा दिया।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और जयकिशन, मदन, कमला और शम्भू को लेकर अंदर आ गया। वे लोग मोहन को देखकर चौंक पड़े। फिर मदन की नज़रें गोविन्द राम पर पड़ीं। उसके चेहरे का रंग उड़ गया . “त.... त.... तुम.... गोविन्द राम...?"

"हां मदन, मैं गोविन्द राम ही हूं," गोविन्द राम ने कहकहा लगाया, "मुझे देखकर हैरान हो रहे हो। कमीने.... तुम समझते थे कि मैं तुम से बदला लिए बिना मर जाऊंगा।.... मैं अपनी बर्बादी की वहशत

आज तक नहीं भूल पाया, जब भयंकर तूफान आया हुआ था और तुमने मेरी पत्नी की आबरू लूटी थी। और वह भी उस समय..... जब वह मेरे पहले बच्चे की मां बनने वाली थी। तुम्हारे अत्यारचार को मेरी पत्नी ने तब तक के लिए ज़हर की तरह पी लिया, जब तक उसने अपने बेटे को जन्म दिया और फिर उसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली।

"मैं अपने मासूम बेटे को लेकर तुम से बदला लेने के लिए घर से निकल पड़ा। तुम्हें मैंने एक पार्क में एक लड़की के साथ देखा। मैंने बच्चे को पार्क में छोड़ा और तुम्हें मारने के लिए दौड़ा। लेकिन तुम बच गए मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।.... मेरा बच्चा मुझसे बिछुड़ गया और मुझे छह वर्ष जेल में बिताने पड़े।

“और छह साल जेल में बिताने के बाद जब मैं तुम तक पहुंचा, तो तुम अपने घर में अपनी पत्नी और अपने बेटे के साथ दिवाली की खुशियां मना रहे थे। मेरे सीने में आग धधक उठी। मैं चाहता तो तुम्हें उसी समय मार डालता, लेकिन क्यों मुझे अपने बच्चे को ढूंढना था, इसलिए मैंने तुम्हें मारने का इरादा छोड़ दिया और निश्चय किया कि जिस तरह मैं अपने बेटे के लिए तड़प रहा हूं, उसी तरह तुम्हें भी ज़िन्दगी भर अपने बेटे के लिए तड़पाऊं, इसलिए मैंने तुम्हारे बेटे को उड़ा लिया। उसे पाल.पोसकर बड़ा किया.... अपराधी बनाया..... और आज तुम्हारे उसी बेटे के हाथ से तुम्हें मरवाकर अपने सीने में धधकती प्रतिशोध की आग ठंडी करूंगा।"

"अंकल....!" मोहन आश्चर्य से चीख उठा।

"हां मोहन, मदन खन्ना तुम्हारा बाप है। और आज तुम्हें अपने हाथ से अपने बाप की हत्या करनी होगी। और अगर तुमने इनकार किया, तो मैं तुम सबको गोली से उड़ा दूंगा।"

कमला आश्चर्य से बड़बड़ाई .

"यह मेरा मोनू है!"

"मा.....!" मोहन रुंधे कंठ से बोला, "तुम मेरी मां हो..... मा।"

कमला दौड़कर मोहन से लिपट गई। मदन हक्का.बक्का सा खड़ा था।

अचानक रीता ने कहा, "मोहन बाबू, भगवान के लिए, मुझे मर जाने दो.... ताकि संसार यह न कहने पाए कि तुमने अपनी प्रेमिका के लिए अपने मा.बाप की जान ले ली।"

अचानक शम्भू ने एक बहुत जोर का कहकहा लगाया।

सब लोग चौंककर शम्भू की ओर देखने लगे। गोविन्द राम ने गुस्से से कहा, "ऐ बूढ़े.... तू पागल तो नहीं हो गया?"

"हां गोविन्द राम, भगवान का न्याय देखकर मैं पागल हो गया हूं। कितना विचित्र न्याय है भगवान का...... मदन बाबू ने छः साल तक तुम्हारे बेटे को पाला.पोसा और

आज तुम अपने ही बेटे के हाथों मदन बाबू को मरवाकर उसे फांसी के तख्ते पर पहुंचाने जा रहे हो।"

यह कहकर शम्भू फिर कहकहे लगाने लगा।

"यह बकते हो?" गोविन्द राम चीख उठे।

"बक नहीं रहा, सच कह रहा हूं..... एक ऐसे रहस्य पर से पदा उठा रहा हूं, जिसे न तुम जानते हो, न मदन बाबू और न कमला बिटिया..... मोहन, मदन बाबू का बेटा नहीं बल्कि तुम्हारा बेटा है।"

"यह झूठ है।'' गोविन्द राम की आवाज़ कांप उठी।

"यह सच है गोविन्द राम, मोहन तुम्हारा ही बेटा है। तुम इसे जिस पार्क में छोड़कर चले गए थे, मैं भी उसी पार्क में था और मदन बाबू और जूली की बातें सुन रहा था। जब मदन बाबू और जूली पार्क से निकल गये तो, तुम भी अपने बच्चे को छोड़कर इनके पीछे.पीछे निकल गए। थोड़ी देर बाद बच्चा रोने लगा। मैं इसे उठाकर अने घर ले गया। उन दिनों कमला बेटी मेरे ही घर में थी। मैंने बच्चा उसे दे दिया।"

"यह झूठ है.... तू अपने मालिक को बचाने के लिए यह कहानी गढ़ रहा है।"

"गोविन्द राम अगर यह झूठ है, तो क्या यह भी झूठ है कि जब तुम अपने बच्चे को छोड़कर गए थे, तो उसके पास दूध की एक बोतल थी, जो आधी भरी हुई थी। और बच्चा लाल रंग के कपड़े पहने हुए था।"

गोविन्द राम के हाथ से रिवाल्वर छूटकर गिर पड़ा और वह कांपते स्वर में बोला .

"तो.... मोहन मेरा बेटा है.... मेरी शीला की अमानत?"

"हां गोविन्द राम.... यह तुम्हारा ही बेटा

"और मैंने इसे एक दुश्मन का बेटा समझकर घृणा से पाला पोसा। न इसे प्यार दिया और न ढंग से पढ़ाया.लिखाया, बल्कि स्मगलर और अपराधी बना दिया..... और आज इसे हत्यारा बनाकर फांसी के तख्ने रहा था।"

गोविन्द राम लड़खड़ाते हुए मोहन की ओर बढ़े।

मोहन के होंठ कांप उठे . "पिताजी......!"

"बेटा....!"

और गोविन्द राम मोहन से लिपट गया।

गोविन्द राम ने रोते हुए कहा, "मुझे क्षमा कर दे मेरे बेटे..... मैंने तेरे साथ बहुत

अन्याय किया है। अगर तूने मेरी बात मान ली होती, तो आज मैं तुझसे हमेशा.हमेशा के लिए हाथ धो बैठता।"

"नहीं गोविन्द राम," मदन ने भर्राई हुई आवाज में कहा, “अब तुम्हारा बेटा हत्यारा नहीं बनेगा। क्योंकि यह केवल तुम्हारा ही नहीं मेरा और कमला का भी बेटा। तुम्हारा अपराधी तो मैं हूं.... तुम अपने हाथों से मुझे मार डालो, अब मुझे मरते हुए रत्ती भर भी दु:ख न होगा।"

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मदन ने रिवाल्वर उठाकर गोविन्द राम की ओर बढ़ा दिया।

"तुम्हारे हाथ से मरकर मुझे खुशी होगी गोविन्द और मेरे मरने के बाद तुम से पुलिस एक भी शब्द नहीं कहेगी।"

"नहीं नहीं, मैं प्रतिशोध की आग में अंधा हो गया था मदन .... मुझे नहीं मालूम था कि प्रतिशोध मनुष्य को इतना गिरा देता है.... यह देखो, मेरे बेटे के शरीर से बहता लहू, जिसे मैंने अपने हाथ से बहाया है। यह शीला की अमानत का लहू है। अगर वह जिन्दा होती, तो इस खून को बहते देखकर अपनी जान दे देती। हे भगवान, मुझे क्षमा करना शीला की आत्मा, तुम भी मुझे क्षमा करना.... और मदन, मैं हृदय से तुम्हें क्षमा करता हूं।

गोविन्द राम ने मोहन को सीने से लिपटा लिया और फूट.फूट कर रोने लगे।

अचानक कदमों की आहटें हुईं और वर्मा साहब कुछ कांस्टेबलों के साथ तहखाने में

आ गए। उनके हाथ में रिवाल्वर था।

लेकिन तहखाने का दृश्य देखकर वह ठिठककर रुक गए।

.

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गोविन्द राम ने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए और कहा, "आओ वर्मा... मुझे गिरफ्तार कर लो...... मैं एक स्मगलर हूं। मैं अपने अपराधों का दंड पाने के लिए अपने आपको तुम्हारे हवाले करता हूं ताकि जेल से लौटने के बाद मैं अपने बेटे के साथ आराम की जिन्दगी बिता सकूँ।"

वर्मा साहब कुछ देर खड़े गोविन्द राम को देखते रहे और फिर उन्होंने एक लम्बी सांस लेकर उनके हाथों में हथकड़ियां डाल दीं।
 

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