S
StoryPublisher
Guest
मोहन की निगाहें अचानक गोविन्द राम की ओर उठ गईं। उसे लगा, गोविन्द राम आंखों.ही.आंखों में उसे खा जायेंगे। उसके चेहरे पर दृढ़ता भरी मुस्कान दौड़ गई। उसने अपना हाथ रीता के हाथ में दे दिया। रीता मोहन का हाथ थामे आगे बढ़ी..... वर्मा साहब आश्चर्य से उन दोनों की ओर देख रहे थे।
गोविन्द राम की ओर देख कर वर्मा साहब ने धीरे.से कहा .
"गोविन्द.....!"
"हूं...!'' गोविन्द चौंक पड़े।
"यह लड़का कौन?"
"मेरे क्लब का मैनेजर है..... मोहन कुमार।"
"रीता से गहरी मित्रता है इसकी।"
"हां, दोनों अच्छे मित्र है।"
वर्मा साहब की आंखों में संदेह जाग उठा।
घुघरु लपक कर मोहन के पास पहुंच गया, "हैलो मि. पेट्रोल....!"
"हैलो मि. पेट्रोल ...!"
"हैलो मि. धक्का मार...!" मोहन मुस्कराया।
रीता ने कहकहा लगाया। घुघरु भी उस कहकहे में शामिल हो गया। फिर वह रीता के पास खिसककर धीरे.से बोला, “ऐ रीता! यह क्या कर रही हो?"
"क्या?" रीता ने आश्चर्य से पूछा।
-
-
"मेरी मंगेतर होकर तुमने मोहन का हाथ क्यों पकड़ रखा है?"
इससे पहले कि रीता उत्तर देती, गोविन्द राम बड़ी मेज़ा के पास गए और हाथ उठाकर मेहमानों को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से बोले .
"आदरणीय सज्जनो....! सुनिए..... सुनिए....!"
सारे मेहमान गोविन्द राम की ओर देखने लगे!
गोविन्द राम ने ऊंची आवाज़ में कहा, "आप लोगों को यह सुनकर प्रसन्नता होगी कि आज की पार्टी केवल रीता के पास होने की खुशी में ही नहीं, बल्कि रीता की सगाई की खुशी में भी दी जा रही है।... आज मैं अपनी बेटी रीता और अपने मित्र एस. पी. वर्मा के सुपुत्र घुघरु चंद वर्मा की सगाई की घोषणा करता हूं।"
सबसे पहले घुघरु ने तालियां बजाईं। और फिर सारा हाल तालियों से गूंज उठा। लेकिन मोहन और रीता शान्त भाव से खड़े
थे।
गोविन्द राम ने जेब से एक डिबिया निकाली और रीता को देते हुए बोले, “लो
बेटी, अपने मंगेतर की उंगली में अंगूठी पहना दो।"
रीता ने डिबिया खोलकर अंगूठी निकाली। घुघरु ने भी जल्दी से अंगूठी निकाल ली और रीता की ओर खाली उंगली बढ़ाकर जल्दी से बोला, "लो रीता, जल्दी से पहना दो।"
रीता ने अंगूठी लिए मुस्कराकर घुघरु की ओर देखा, फिर वह मोहन की ओर मुड़ी
और अंगूठी उसकी उंगली में पहना दी।
सब लोग हक्के.बक्के रह गए।
घुघरु जल्दी से बोला, "अरे रीता, मेरी अंगुली इधर है.... वह तो मि. पेट्रोल की उंगली है।"
गोविन्द राम का सार बदन क्रोध से जल उठा। सारे मेहमान सन्नाटे में रह गए।
वर्मा साहब ने कहा, "गोविन्द! क्या तुमने हमें अपमानित करने के लिए बुलाया था?"
गोविन्द राम झटके से रीता के पास पहुंचकर गुस्से से बोले, “यह क्या बेहूदगी है रीता?"
"यह बेहूदगी नहीं है पापा, यह मेरा निर्णय है।"
"बको मत, मैंने धुंघरु के साथ तुम्हारी सगाई की है।"
"घुघरु को मैंने नहीं अपने पसन्द किया था पापा।"
"हाय..... यानी मैं तुम्हें पसन्द नहीं हूं?" घुघरु जल्दी से बोला।
"नहीं मि. घुघरु, अगर मैंने तुम्हें जीवन साथी के रूप में नहीं चुना तो इसका यह अर्थ नहीं कि तुम मुझे पसन्द नहीं हो। तुम आज भी मेरे उतने ही गहरे मित्र हो और भविष्य में भी रहोगे। एक मित्र के नाते मैं तुम्हें पसन्द करती हूं, लेकिन जीवन साथी के नाते मोहन बाबू को।"
___"रीता...!" गोविन्द राम गुस्से से चीख पड़े।
___ "पापा! भगवान के लिए नाराज़ न होइए। ठंडे दिल से सोचिए। आपने मुझे पिता का ही नहीं मां का भी प्यार दिया है।.... मैं मोहन को प्यार करती हूं और अपने जीवन साथी के रूप में इन्हें चुन चुकी हूं..... ऐसी दशा में क्या आप अपनी बेटी का दिल तोड़ना पसन्द करेंगे?"
गोविन्द राम होंठ भींचे खड़े रहे।
रीता शान्त स्वर में फिर बोली. "विवाह जीवन भर का साथ होता है पापा, मैं मोहन बाबू को प्यार करती हूं। इनके साथ मेरा पूरा जीवन सुख शान्ति से बीत जाएगा। अगर
आपके कहने से मैं घुघरु से विवाह कर लूं तो भी मोहन बाबू को दिल से निकाल न सकूँगी।"
फिर वह वर्मा साहब की ओर देख कर बोली, "अंकल, आप ही सोचिए.... क्या आप ऐसी बहू को घर में ले जाना पसन्द करेंगे, जो पत्नी तो आपके बेटे की कहलाए, लेकिन प्यार किसी और को करे!"
"नही," वर्मा साहब ने धीरे से कहा।
"मैंने आपको, पापा को या घुघरु को कोई धोखा नहीं दिया है। मेरी स्पष्टवादिता को अपना अपमान न समझिए। सोचिए, अगर मैं आपकी बेटी होती तो ऐसी स्थिति में आप क्या करते? क्या आप मेरी अनिच्छा से विवाह कर देते?"
"नहीं बेटी, कभी नहीं।" वर्मा साहब आगे बढ़े और रीता के सिर पर हाथ्ज्ञ फेरते हुए बोले, "मुझे बड़ी खुशी हुई बेटी कि तुमने मुझे भविष्य की एक बहुत बड़ी उलझन से बचा लिया। तुम पढ़ी.लिखी समझदार हो, बालिग हो, तुम्हें अपना जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है। तुमने वही किया है जो हर समझदार लड़की को करना चाहिए।"
फिर वर्मा साहब ने गोविन्द राम से कहा, "गोविन्द राम, रीता ने जो कुछ किया है, ठीक किया है। मुझे उसका रत्ती भर भी दुख नहीं है। अब तुम गुस्सा छोड़ रीता और मोहन को आशीर्वाद दो, वरना मुझे बहुत दुख होगा।"
___ गोविन्द रात ने बड़ी कठिनाई से अपने
आपको संभाला और जबरदस्ती मुस्कराते हुए रीता के सिर पर हाथ फेरकर बोला, "तेरी खुशी ही मेरी खुशी है.... बेटी भगवान तुम दोनों को सुखी रखे।"
"पापा....!" रीता गोविन्द राम के सीने से लिपट गई।
मोहन इस तरह खड़ा था, जैसे कोई सपना देख रहा हो।
गोविन्द राम ने रीता से कहा, "तुम पार्टी जारी रखो, मैं अभी आता हूं।"
गोविन्द राम ऊपर चले गए
रीता मोहन की ओर मुड़ी।
धुंघरु पत्थर की तरह दोनों हाथ लटकाए खड़ा शून्य में न जाने किसे घूर रहा था।
मोहन ने अपनी अंगूठी उतारकर रीता की उंगली में पहना दी।
सबसे पहले वर्मा साहब ने तालियां बजाईं और फिर सारे मेहमान तालियां बजाने लगे। रीता और मोहन को आंखें खुशी से छलक उठीं।
रीता ने धीरे से कहा, "मोहन बाबू.... मैंने आपके प्यार की लाज रख ली।"
"तुम सचमुच महान हो रीता।"
और फिर तालियों के शोर में अचानक धुंघरु के जोर.जोर से रोने की आवाज उभरी
और सब लोग घुघरु की ओर देखने लगे। वर्मा साहब ने बौखलाकर इधर.उधर देखा
और फिर घुघरु की बांह पकड़ ली।
"यह क्या बदतमीजी है..... ईडियट कहीं के।"
और उसे घ्झसीटते हुए बाहर चले गए।
गोविन्द राम की ओर देख कर वर्मा साहब ने धीरे.से कहा .
"गोविन्द.....!"
"हूं...!'' गोविन्द चौंक पड़े।
"यह लड़का कौन?"
"मेरे क्लब का मैनेजर है..... मोहन कुमार।"
"रीता से गहरी मित्रता है इसकी।"
"हां, दोनों अच्छे मित्र है।"
वर्मा साहब की आंखों में संदेह जाग उठा।
घुघरु लपक कर मोहन के पास पहुंच गया, "हैलो मि. पेट्रोल....!"
"हैलो मि. पेट्रोल ...!"
"हैलो मि. धक्का मार...!" मोहन मुस्कराया।
रीता ने कहकहा लगाया। घुघरु भी उस कहकहे में शामिल हो गया। फिर वह रीता के पास खिसककर धीरे.से बोला, “ऐ रीता! यह क्या कर रही हो?"
"क्या?" रीता ने आश्चर्य से पूछा।
-
-
"मेरी मंगेतर होकर तुमने मोहन का हाथ क्यों पकड़ रखा है?"
इससे पहले कि रीता उत्तर देती, गोविन्द राम बड़ी मेज़ा के पास गए और हाथ उठाकर मेहमानों को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से बोले .
"आदरणीय सज्जनो....! सुनिए..... सुनिए....!"
सारे मेहमान गोविन्द राम की ओर देखने लगे!
गोविन्द राम ने ऊंची आवाज़ में कहा, "आप लोगों को यह सुनकर प्रसन्नता होगी कि आज की पार्टी केवल रीता के पास होने की खुशी में ही नहीं, बल्कि रीता की सगाई की खुशी में भी दी जा रही है।... आज मैं अपनी बेटी रीता और अपने मित्र एस. पी. वर्मा के सुपुत्र घुघरु चंद वर्मा की सगाई की घोषणा करता हूं।"
सबसे पहले घुघरु ने तालियां बजाईं। और फिर सारा हाल तालियों से गूंज उठा। लेकिन मोहन और रीता शान्त भाव से खड़े
थे।
गोविन्द राम ने जेब से एक डिबिया निकाली और रीता को देते हुए बोले, “लो
बेटी, अपने मंगेतर की उंगली में अंगूठी पहना दो।"
रीता ने डिबिया खोलकर अंगूठी निकाली। घुघरु ने भी जल्दी से अंगूठी निकाल ली और रीता की ओर खाली उंगली बढ़ाकर जल्दी से बोला, "लो रीता, जल्दी से पहना दो।"
रीता ने अंगूठी लिए मुस्कराकर घुघरु की ओर देखा, फिर वह मोहन की ओर मुड़ी
और अंगूठी उसकी उंगली में पहना दी।
सब लोग हक्के.बक्के रह गए।
घुघरु जल्दी से बोला, "अरे रीता, मेरी अंगुली इधर है.... वह तो मि. पेट्रोल की उंगली है।"
गोविन्द राम का सार बदन क्रोध से जल उठा। सारे मेहमान सन्नाटे में रह गए।
वर्मा साहब ने कहा, "गोविन्द! क्या तुमने हमें अपमानित करने के लिए बुलाया था?"
गोविन्द राम झटके से रीता के पास पहुंचकर गुस्से से बोले, “यह क्या बेहूदगी है रीता?"
"यह बेहूदगी नहीं है पापा, यह मेरा निर्णय है।"
"बको मत, मैंने धुंघरु के साथ तुम्हारी सगाई की है।"
"घुघरु को मैंने नहीं अपने पसन्द किया था पापा।"
"हाय..... यानी मैं तुम्हें पसन्द नहीं हूं?" घुघरु जल्दी से बोला।
"नहीं मि. घुघरु, अगर मैंने तुम्हें जीवन साथी के रूप में नहीं चुना तो इसका यह अर्थ नहीं कि तुम मुझे पसन्द नहीं हो। तुम आज भी मेरे उतने ही गहरे मित्र हो और भविष्य में भी रहोगे। एक मित्र के नाते मैं तुम्हें पसन्द करती हूं, लेकिन जीवन साथी के नाते मोहन बाबू को।"
___"रीता...!" गोविन्द राम गुस्से से चीख पड़े।
___ "पापा! भगवान के लिए नाराज़ न होइए। ठंडे दिल से सोचिए। आपने मुझे पिता का ही नहीं मां का भी प्यार दिया है।.... मैं मोहन को प्यार करती हूं और अपने जीवन साथी के रूप में इन्हें चुन चुकी हूं..... ऐसी दशा में क्या आप अपनी बेटी का दिल तोड़ना पसन्द करेंगे?"
गोविन्द राम होंठ भींचे खड़े रहे।
रीता शान्त स्वर में फिर बोली. "विवाह जीवन भर का साथ होता है पापा, मैं मोहन बाबू को प्यार करती हूं। इनके साथ मेरा पूरा जीवन सुख शान्ति से बीत जाएगा। अगर
आपके कहने से मैं घुघरु से विवाह कर लूं तो भी मोहन बाबू को दिल से निकाल न सकूँगी।"
फिर वह वर्मा साहब की ओर देख कर बोली, "अंकल, आप ही सोचिए.... क्या आप ऐसी बहू को घर में ले जाना पसन्द करेंगे, जो पत्नी तो आपके बेटे की कहलाए, लेकिन प्यार किसी और को करे!"
"नही," वर्मा साहब ने धीरे से कहा।
"मैंने आपको, पापा को या घुघरु को कोई धोखा नहीं दिया है। मेरी स्पष्टवादिता को अपना अपमान न समझिए। सोचिए, अगर मैं आपकी बेटी होती तो ऐसी स्थिति में आप क्या करते? क्या आप मेरी अनिच्छा से विवाह कर देते?"
"नहीं बेटी, कभी नहीं।" वर्मा साहब आगे बढ़े और रीता के सिर पर हाथ्ज्ञ फेरते हुए बोले, "मुझे बड़ी खुशी हुई बेटी कि तुमने मुझे भविष्य की एक बहुत बड़ी उलझन से बचा लिया। तुम पढ़ी.लिखी समझदार हो, बालिग हो, तुम्हें अपना जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है। तुमने वही किया है जो हर समझदार लड़की को करना चाहिए।"
फिर वर्मा साहब ने गोविन्द राम से कहा, "गोविन्द राम, रीता ने जो कुछ किया है, ठीक किया है। मुझे उसका रत्ती भर भी दुख नहीं है। अब तुम गुस्सा छोड़ रीता और मोहन को आशीर्वाद दो, वरना मुझे बहुत दुख होगा।"
___ गोविन्द रात ने बड़ी कठिनाई से अपने
आपको संभाला और जबरदस्ती मुस्कराते हुए रीता के सिर पर हाथ फेरकर बोला, "तेरी खुशी ही मेरी खुशी है.... बेटी भगवान तुम दोनों को सुखी रखे।"
"पापा....!" रीता गोविन्द राम के सीने से लिपट गई।
मोहन इस तरह खड़ा था, जैसे कोई सपना देख रहा हो।
गोविन्द राम ने रीता से कहा, "तुम पार्टी जारी रखो, मैं अभी आता हूं।"
गोविन्द राम ऊपर चले गए
रीता मोहन की ओर मुड़ी।
धुंघरु पत्थर की तरह दोनों हाथ लटकाए खड़ा शून्य में न जाने किसे घूर रहा था।
मोहन ने अपनी अंगूठी उतारकर रीता की उंगली में पहना दी।
सबसे पहले वर्मा साहब ने तालियां बजाईं और फिर सारे मेहमान तालियां बजाने लगे। रीता और मोहन को आंखें खुशी से छलक उठीं।
रीता ने धीरे से कहा, "मोहन बाबू.... मैंने आपके प्यार की लाज रख ली।"
"तुम सचमुच महान हो रीता।"
और फिर तालियों के शोर में अचानक धुंघरु के जोर.जोर से रोने की आवाज उभरी
और सब लोग घुघरु की ओर देखने लगे। वर्मा साहब ने बौखलाकर इधर.उधर देखा
और फिर घुघरु की बांह पकड़ ली।
"यह क्या बदतमीजी है..... ईडियट कहीं के।"
और उसे घ्झसीटते हुए बाहर चले गए।