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Romance बन्धन

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गोविन्द और मुनीम जी ने चौंक कर कहा शीला की ओर देखा।

मुनीम जी ने जल्दी से कहा, "मालकिन, साख बनाने के लिए कभी.कभी भी लेना पड़ता है।

"कर्ज वह लेते हैं, जिनके पास कुछ नहीं होता।" शीला मुस्कराई, “हमारे पास तो इतना है कि किसी के आगे हाथ फैलाये बिना हम अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।"

"लेकिन मालकिन हमारे पास तो कुल इक्कीस हजार रूपए हैं।"

"लगभग बीस हजार रूपए के गहने हैं मेरे पास। और साठ.सत्तर हजार की यह कोठी।"

"शीला...!" गोविन्द ने आश्चर्य से कहा।

"मालकिन," मुनीम जी आश्चर्य से बोले, “आप अपने गहने बेचेंगी? और कोठी बेच देंगी, तो रहेंगी कहां?"

___ "मुनीम जी, "शीला मुस्कराई, “ये गहने और कोठी इस कारोबार से ही तो मिले थे। जब कोठी नहीं थी, तब भी तो हम कहीं न कहीं रहते ही थे। और गहने...। नारी का सच्चा गहना उसका पति होता है। कारोबार शुरू हो गया, तो फिर बन जायेंगें।"

"लेकिन शीला...।"



"जिद न कीजिए, हम लोग किसी किराए के मकान में दिन काट लेंगे। जब भगवान देगा तो कोठी भी बन जायगी और गहने भी। मुनीम जी आप इंतजार कीजिए। सब ठीक हो जाएगा।"

"मगर मालकिन...!"

"आप मेरे पिता के समान हैं मुनीम जी, अगर आप मेरा पक्ष ने लेंगे, तो मुझे दु:ख होगा।"

.

.

.

"मालकिन...! आप महान हैं...जिस आदमी की पत्नी इतनी महान हो, उसके जीवन में दु:ख की छाया कभी नहीं पड़ सकती।"

"मुनीम जी, आप जाइए और इंतजाम कीजिए।" ‘

"जा रहा हूं मालकिन। आपने मुझे पिता कहा है, इसलिए आपको भी मेरी एक विनती माननी पड़ेगी। मैं आपका नौकर हूं, एक मामली आदमी हूं। मेरा छोटा.सा घर है, जिसमें मैं अकेला ही रहता हूं जब तक आप लोगों को भगवान बंगला बनवाने के योग्य बनाए, तब तक आपको मेरी झोंपड़ी में रहना पड़ेगा। शायद इसी तरह मेरे मन पर पड़ा यह बोझ कुछ हलका होगा कि मैं ही अपने मालिक की बर्बादी का जिम्मेदार हूं।"

मुनीम जी ने जल्दी.जल्दी अपने उमझते आंसू पोंछे और तेजी से बाहर निकल गए।

गोविन्द ने शीला की ओर देखा। शीला मुस्कराकर कहा.

“क्या सोच रहे हैं आप ?"

गोविन्द ने शीला की ओर बढ़ते हुए कहा, “शीला, मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था कि मेरी इतनी बड़ी समस्या इतनी आसानी से हल हो जायेगी। सचमुच, मैं बहुत ही भाग्यशाली हूं शीला कि भगवान ने तुम जैसी पत्नी दी है।"

__ "मैं भी तो कम भाग्यशाली नहीं हूं," शीला ने गोविन्द के कंधे से लगकर कहा, "जिसे भगवान ने आप जैसा पति दिया है। न जाने मेरे किन पूर्व.जन्मों के सत्कर्म थे कि भगवान ने पति के रूप में आपको दिया। भगवान से मेरी प्रार्थना है कि वह अगले जन्मों में भी आपको ही मुझे पति के रूप में दें।"

कहते.कहते शीला की आवाज भर्रा गई।

गोविन्द ने उसे सीने से लिपटाते हुए कहा, "रोती हो पगली, भगवान ने चाहा, तो हजारों जन्मों तक हम.तुम साथ रहेंगे। संभव है, पिछले जन्मों में भी साथ रहे हों। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि हमारा साथ जन्म.जन्म का है। अगर तुम मुझे न मिल पातीं तो शायद मैं जिन्दा न रह पाता।"

शीला ने जल्दी से गोविन्द के मुंह पर हाथ रख दिया.

"भगवान के लिए ऐसा न कहिए। भगवान आपको हजारों साल की उम्र दें। मेरी उम्र भी आपको लग जाए।"

__ "नहीं शीला, हमारे होने वाले बच्चे को हम दोनों की जरूरत होगी" गोविन्द सहसा विचारों में खो गया, “क्या.क्या सपने देखे थे मैने। लेकिन सब मिट्टी में मिल गए।"

" भगवान ने चाहा तो हमारी हालत फिर वैसी ही हो जायेगी। आप चिन्ता क्यों करते हैं?"

और गोविन्द ने शीला को अपनी बाहों में भर लिया।

___ कमला को ऐसा लग रहा था जैसे उसके कानों में कोई पिघला हुआ सीसा उड़ेल रहा हो। हॉल से स्त्री.पुरूषों मिले.जुले कहकहे

और पश्चिमी संगीत की आवाजें उभरकर चारों ओर गूंज रही थीं।

अचानक क्लाक ने ग्यारह के घंटे बजाए। कमला ने चौंककर क्लाक की ओर देखा।

तभी कमरे के दरवाजे पर शम्भू की आवाज सुनाई दी. मालकिन?"

कमला जल्दी.जल्दी आंसू पोंछने लगी।

शम्भू ने पास आकर कहा, “मालकिन ग्यारह बज चुके हैं। आखिर आप कब तक भूखी बैठी रहेंगी?"

"काबा, जब तक वह खाना न खा लें, मैं कैसे खा सकती हूँ।"

___"मालकिन, जिस आदमी का शराब से ही पेट भरता हो, उसके लिए खाना जरूरी थोड़े ही है।...आप कब तक इस नियम में बंधी रहेंगी। उन्हें आपकी रत्ती भर भी परवाह नहीं। जब से आए हैं, आपसे एक बार भी सीधे मुंह बात नहीं की है। घर की लक्ष्मी को ठुकराकर फिरंगिन के साथ रात भर रंगरेलियां मनाते हैं। सुना है, उससे शादी

करने वाले हैं।"

कमला आंखें फाडकर शम्भू की ओर देखने लगी।

"इसीलिए तो उस फिरंगिन को लिए रात.रात शोर मचाते हैं। क्योंकि आपके होते हुए दूसरी शादी नहीं कर सकते, इसीलिए आपसे किसी.न.किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहते हैं।"

तभी शम्भू की कमर पर एक जोरदार लात पड़ी और वह कराह कर कमला के पैरों के पास जा गिरा।

कमला के हलक से चीख निकल गई.

"काका...!"

उसने जल्दी से शम्भू को उठाया। दरवाजे में खड़ा मदन उन दोनों की ओर खूखार

नजरों से देख रहा था। कमला कांप उठी।

“कमीने...कुत्ते...," मदन फुफकारा, "हमारे टुकड़ों पर पलकर हमारे ही ऊपर भौंकता है...हम इस घर के मालिक हैं, जो चाहेंगे, करेंगे। हमें रोकने वाला कौन है? हम अपनी पसन्द से शादी कर रहे हैं। जूली । हमारी होने वाली पत्नी है। इस अनपढ़, गँवार को डैडी जबरदस्ती हमारे सिर मढ़ गये थे। अब हम आजाद हैं। हमने सोचा था कि यह अनाज्ञ है, इसलिए इसे घर में पड़ा रहने देंगे। मगर अब हमारे घर में इसके लिए कोई जगह नहीं है।"
 
"नाथ...!" कमला कांप उठी।

"निकल जाओ, तुम दोनों इसी समय यहां से निकल जाओ। हम आस्तीन में सांप नहीं पाल सकते।"

"मालिक...मैं तो नौकर हूं, निकल जाऊंगा, लेकिन मालकिन तो आपकी पत्नी है।"

"बको मत, हमारा इस अनपढ़ गंवार से कोई सम्बन्ध नहीं। निकल जाओ यहां से। वरना दोनों को मार.मारकर निकाल दूंगा।"

"नहीं नहीं, मैं नहीं जाऊँगी।" कमला पीछे हटती हुई बोली।

__ “जायेगी कैसे नहीं...तेरे तो फरिश्ते भी जायेंगे" मदन आगे बढ़ा।

“भगवान के लिए मुझे अपने चरणों से दूर मत कीजिए,” कमला गिड़गिड़ाई, "मैं आपके किसी काम में दखल नहीं दूंगी...मैं आपकी दासी बनकर रहूंगी...भगवान के लिए मुझे मत निकालिए।"

"नहीं, तेरे लिए अब इस घर में कोई जगह नहीं है।"

मदन कमला को खींचने लगा। कमला रोती गिड़गिड़ाती रही। मदन उसे खींचकर सदर दरवाजे पर ले आया और उसे बाहर धकेल दिया। कमला लड़खड़ाकर बाहर बरामदे में जा गिरी।

शम्भू चीख उठा.

"मालकिन...।"

कमला दरवाजा खुलने के स्थान पर अंदर से कहकहे और संगीत सुनाई दिया।

"यह क्या हो गया काका!...अब क्या होगा?...मैं कहां जाऊंगी?"

"बेटी," शम्भू ने भर्राई आवाज में कहा."तुम इस दुनिया में अकेली नहीं हो बेटी, मैंने वर्षों इस घर का नमक खाया है। और इस घर के सम्मान की रक्षा की है।"

"काका...!"

कमला बिलख.बिलखकर रोने लगी।

शम्भू ने उसके सिर पर हाथ फेरकर तसल्ली देते हुए कहा, “मत रो बेटी, मत रो...चल, इस जहर भरी हवा में सांस लेना भी पाप है।"

कमला शम्भू के पीछे.पीछे चल दी।

अंदर मदन और जूली के कहकहे गूंज रहे थे।

टैक्सी एक छोटे.से मकान के सामने जा रूकी। मुनीम जी ने उतरकर किराया चुकाया।

और शीला और गोविन्द को लेकर मकान के अंदर चला गया। मुनीम जी के चेहरे पर प्रसन्नता फूटी पड़ रही थी। उसने हाथ जोड़कर कहा."मालिक, यही गरीब की झोंपड़ी है। यहां आपको वह आराम तो नहीं मिलेगा, जो कोठी मे मिलता था, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि भगवान ने आपकी सेवा का अवसर देकर मुझे स्वर्ग दे दिया है।"

"मुनीम जी, "गोविन्द ने मुनीम जी के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुए कहा, "यह झोंपड़ी तो हमारे लिए महल से बढ़कर

मुनीम जी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “अच्छा मालिक, अब आप लोग आराम कीजिए, मैं आपका सामान ले आऊं।"

मुनीम के जाने के बाद गोविन्द की ओर देखकर शीला ने मुस्कराते हुए कहा, “आप क्या सोचने लगे?"

__ "सोच रहा हूं, भाग्य की कैसी विडम्बना है। जब तुम्हें अच्छी जगह और आराम की जरूरत थी, हमें यहां आना पड़ा है।"

ऐसी बातें न सोचिये, सभी स्थान भगवान के बनाए हुए हैं। और फिर संसार में ऐसे कितने लोग हैं, जो कोठियों और बंगलों में रहते हैं? बात ही कितने दिनों की है?

आपका काराबोर शुरू होने भर की देर है, इस बार पहले से भी शानदार कोठी बन जाएगी।"

"शीला, तुम में कितना धैर्य और सहनशीलता है। "गोविन्द ने शीला के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा।

"अब आप ये सब अपने दिमाग से निकालकर मुस्करा दीजिए।"

गोविन्द के होंठों पर एक प्यार.भरी मुस्कराहट थिरक उठी। और फिर दोनों एक साथ हँस पड़े। ऐसी हँसी जो आंसुओं से गीली थी।

अचानक शीला की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। वह घबराकर जल्दी से पलंग पर बैठ गई। उसका दिमाग तेजी से घूम रहा था। वह जल्दी से बिस्तर पर ले गई।

अचानक गोविन्द ने कमरे में आते हुए पुकारा.

"शीला...कहां हो तुम?"

शीला ने उठने की कोशिश की, लेकिन उठ न सकी।

गोविन्द ने उसके पास आकर मुस्कराते हुए कहा, “खुश खबरी सुनो शीला। मुनीमजी की कोशिशों से सारे काम बनते जा रहें हैं। हमार कारोबार अब जल्द ही शुरू हो जायेगा। एक छोटी.सी फैक्टरी का सौदा हो गया है। अगले हफ्ते खरीद ली जायेगी।"

"सच?" शीला की आवाज खुशी से कांप उठी थी।

___ उसके दोनों हाथ उठे। गोविन्द ने उसके दोनों हाथ थाम लिए और फिर एक पल बाद चौंक कर बोला."अरे, तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है।"

"बुखार नहीं है मेरे देवता, आपकी अमानत आपको सुपुर्द करने का समय आ गया है।"

"सच कह रही हो शीला?" प्रसन्नता से गोविन्द की आवाज कांप उठी।

__ "हां, मुझे जल्दी से अस्पताल ले चहिए।"

गोविन्द मुनीमजी के पास जाकर बोला "मुनीमजी, जल्दी शीला को अस्पताल ले चलने का इंतजाम कर दीजिए।"

“सच?" खुशी से मुनीमजी उछल पड़े। और फिर दौड़ते हुए बाहर निकल गए।

गोविन्द बेचैनी से बरामदे में टहल रहा था। उसकी निगाहें बार.बार उस वार्ड की ओर उठ जाती थीं, जिसमें शीला भर्ती थी। कभी उसके चेहरे पर घबराहट छा जाती तो कभी उसका चेहरा खुशी से चमक उठता था।
 
कुछ देर बाद वार्ड के अंदर से धीमी.धीमी चीखें सुनाई दीं। गोविन्द का दिल बुरी तरह धड़कने लगा। सांस तेज हो गयी

और बदन में ठंडी.ठंडी लहरें दौड़ने लगीं। बेचैन होकर वह वार्ड के दरवाजे की ओर बढ़ा।

तभी वार्ड का दरवाजा खुला औ एक नर्स बाहर आई।

"मुबारक हो मिस्टर गोविन्द राम, भगवान ने तुम्हें बेटा दिया है।"

"जच्चा.बच्चा ठीक तो हैं न सिस्टर?" गोविन्द राम ने हर्ष विभोर स्वर में पूछा।

“चिन्ता न कीजिए, दोनों ठीक हैं, बच्चा बहुत ही सुन्दर और तन्दुरूस्त है।" नर्स ने मुस्कराकर कहा।

"सिस्टर ...मैं...मेरा मतलब है...?"

"मैं आपका मतलब समझ गई," नर्स मुस्कराई, “अभी आपको कुछ देर और ठहरना होगा।"

नर्स ने कहा और फिर अंदर चली गई।

गोविन्द ने सिगरेट का एक गहरा कश लिया ही था कि नर्स ने आकर कहा, "मि0 गोविन्द राम, अब आप अन्दर जा सकते हैं।"

गोविन्द ने जल्दी से सिगरेट फेंक दी और तेजी से वार्ड की ओर बढ़ गया।

सामने ही बिस्तर पर शीला लेटी हुई थी। उसकी बगल में नन्हा मुन्ना बच्चा लेटा हुआ

था।

गोविन्द को देखते ही शीला के होंठों पर एक विचित्र.सी शान्ति छा गई। उसने धीरे से कहा, मेरे देवता...!"

__ "शीला...." गोविन्द पलंग पर बैठते हुए पूछने लगा, “कैसी तबियत है तुम्हारी?"

फिर तुरन्त ही गोविन्द की निगाहें बच्चे के चेहरे पर जा टिकीं। गोल.मटोल, सुर्ख.सफेद रंग का नन्हा सा गुडा। उसकी दोनों आंखें मुंदी हुई थीं। माथे पर बल पड़े हुए थे। नन्हे.नन्हे होंठ भिंचे हुए थे। गोविन्द के हृदय में ममता का सागर हिलोरे लेने लगा। जी चाहा कि बच्चे को उठाकर सीने से चिपटा ले।

गोविन्द ने जल्दी से झुक कर बच्चे का माथा चूम लिया। बच्चे की आंखें और अधिक भिंच गईं, माथे के बल और अधिक गहरे हो गए।

गोविन्द ने शीला की ओर देखा। शीला के लिए उसके हृदय में अपार स्नेह उमड़ आया। जी चाहा कि शीला को बाहों में भर ले। कितनी सुन्दर लग रही थी शीला।

गोविन्द ने शीला की ओर देखा। शीला के लिए उसके हृदय में अपार स्नेह उमड़ आया। जी चाहा कि शीला को बाहों में भर ले। कितनी सुन्दर लग रही थी शीला।

गोविन्द ने शीला के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और भर्राई हुई आवाज में कहा, “शीला, तुमने मुझे वह दौलत दी है, जिसके बदले में मैं जीवन भर तुम्हें कुछ न

दे पाऊंगा।"

शीला ने हल्की.सी मुस्काराहट के साथ कहा, “आप मुझे इस दौलत के बदले में बहुत कुछ दे सकते हैं।"

"शीला, अगर मैं अपनी जिन्दगी भी तुम्हें दे दूं तो कम होगी।"

"नहीं, आपकी जिन्दगी अब मेरी नहीं, इस मासूम की है। और अब...अब यह मासूम आपके पास मेरी अमानत है।"

"तुम्हारी ही नहीं, हम दोनों की शीला।"

"आज मैं बहुत खुश हूं मेरे देवता, आज पहले मुझे इतनी खुशी कभी नहीं मिली।

आज मैं आपकी अमानत आपको सौंप रही हूं... और मैं...!"

शीला की आवाज एकदम जैसे घुट गई थी।

गोविन्द ने घबराकर कहा, “यह तुम क्या कह रही हो शीला..?"

___ "अपनी आत्मा पर से एक बोझ हटा रही हूं..एक ऐसा बोझ, जिसे अपने मन में रखकर कोई भी नारी सुख की सांस नहीं ले सकती।"

"शीला..!"

"हां, नाथ, मैं आपकी हूं...मेरी आत्मा आपकी है...मेरा तन मन आपका है, लेकिन जिस रात तूफान आया था... गोदाम में आग लगी थी, आपके मित्र मदन ने मेरे शरीर ही नहीं आत्मा को भी दूषित और कलंकित कर दिया था, लेकिन आपकी अमानत की रक्षा के लिए मैंने निश्चय कर लिया था कि इस पापी शरीर को तब तक बनाए रखूगी, जब तक कि आपकी अमानत आपको न सौंप रही हूं
 
शीला की सांसे तेज हो गईं, दांत भिंच गए। गोविन्द को ऐसा लग रहा था जैसे ऊंचाई से किसी गहरी खाई में फेंक दिया गया हो।

“मैं आपके योग्य नहीं रही...नाथा...मैंने आज आपकी अमानत आपको सौंप दी है...अब मैं जा रही हूं...!"

.

शीला के दोनों हाथ उठे और फिर कांपकर गिर पड़े।

गोविन्द एकदम चीख पड़ा.

"शीला..."

और फिर शीला के ऊपर गिर कर बच्चों की तरह बिलख.बिलख कर रोने लगा। शीला की बंद मुट्ठी कुछ देर बाद खुली और जहर की एक छोटी.सी शीशी उसकी मुट्ठी से निकलकर फर्श पर जा गिरी।

चिता की लपटें धीरे.धीरे बढ़ती जा रही थीं। उनकी रोशनी दूर.दूर तक फैलती चली जा रही थी।

चिता से कुछ दूर बच्चे को गोद में लिए गोविन्द खड़ा था। उसकी फटी.फटी आंखें चिता पर टिकी हुई थीं। लगता था, जैसे वह अपने होशो.हवास सब कुछ खो बैठा हो।

मुनीमजी ने अपनी आंखों से बहते आंसू पोंछे और आगे बढ़कर धीरे से गोविन्द के कंधे पर हाथ रखा। और फिर भर्राई आवाज में बोले, "चलिए मालिक, अब यहां रूकने से क्या लाभ!"

गोविन्द ने कोई जवाब नहीं दिया। मुनीमजी ने उसके चेहरे पर निगाह डाली, तो वह कांप उठे। और धीरे से पीछे हटकर एक पत्थर पर जा बैठे। उनका मन रह.रहकर भर आता था। उन्होंने दोनों हाथों में मुंह छिपा लिया और धीर.धीरे सिसकियां भरने लगे।

लड़कियों के चटकने की आवाजे वायुमंडल में गूंजती रहीं। उन आवाजों में मुनीमजी की सिसकियां भी शामिल थीं। काफी देर बाद उन्होंने नजर उठाकर देखा लेकिन गोविन्द वहां न था।

वह हड़बड़ा कर खड़े हो गए। उन्होंने चारों ओर नजरें दौड़ाई। लेकिन गोविन्द का कहीं पता न था।

मुनीमजी जोर से चिल्लाए.

"मालिक...!"

लेकिन उनकी आवाज गूंजकर रह गई। कहीं से कोई उत्तर न मिला।

गोविन्द ट्रेन से उतरकर स्टेशन के गेट से बाहर निकल आया। बच्चा अभी तक उसकी छाती से चिपटा हुआ था। गोविन्द को देखकर लगता था, जैसे वह पागल हो गया

कुछ दूर चलते.चलते अचानक उसे ठोकर लगी और वह लड़खड़ा कर गिरने लगा। लेकिन ठोकर लगते ही उसके होशो.हवास लौट आए। उसने अपने. आपको

संभाल लिया।

ठोकर से झटका खाकर बच्चे की नींद टूट गई और वह रोने लगा। गोविन्द ने बच्चे को छाती से लगा लिया और उसे थपथपाकर चुप कराने की कोशिश करने लगा। लेकिन बच्चा चुप होने का नाम ही न ले रहा था। गोविन्द ने बच्चे का चेहर देखा। उसके नन्हे.नन्हे होंठ सूख रहे थे। रोने की आवाज की गले की खुश्की के काराण भिंची जा रही थी। बच्चे के चेहरे को देखते.देखते गोविन्द की आंखों के आगे शीला की सूरत नाच उठी। और फिर उसे एक आवाज सुनाई दी, "यह मेरी अमानत है स्वामी, इसे संभालकर रखना...अरे तुम देख नहीं रहे, मेरा लाल भूखा है।"

गोविन्द ने हड़बड़ाकर बच्चे को सीने से चिपटा लिया।

और फिर उसके कदम एक दुकान की ओर बढ़ गए।

ठंडी हवा के झोंकों ने गोविन्द की आंखों में मिर्चे.सी भर दीं। उसने जल्दी से अपना सिर झटका और बच्चे को देखने लगा। बच्चा निपिल से दूध पीते.पीते सो गया था। दूध की बोतल आधी खाली हो गई थी।

___ गोविन्द ने धीरे.से निपिल बच्चे के मुंह से निकाल ली। बच्चा एक पल कसमसाया और फिर सो गया। गोविन्द ने बच्चे को अच्छी तरह तौलिये से लपेट कर बैंच पर सुला दिया।

___ फिर गोविन्द ने इधर.उधर नजरें दौड़ाईं। उसे जोर की प्यास लगी थी। काफी दूर पानी का नल दिखाई दिया। गोविन्द धीरे से उठा और नल की ओर चल दिया।

नल पर पहुंचकर उसने भर पेट पानी पिया और पानी पीते.पीते ही उसे चक्कर आ गया। वह धम्म से नीचे बैठ गया। उसका दिमाग बुरी तरह चकरा रहा था।

अचानक उसके कानों में एक तेज कहकहे की आवाज टकराई। वह चौंक पड़ा

और आंखें फाड़.फाड़कर इधर.उधर देखने लगा।
 
मर्करी लैम्प की दूधिया रोशनी में उसे दो साए दिखाई दिए। दोनों बैंच के पास एक.दूसरे की कमर में हाथ डाले लिपटे खड़े थे। गोविन्द सन्नाटे में डूबा उन्हें देखने लगा। उसे लगा जैसे वह स्त्री शीला हो और उसके साथ खड़ा पुरूष वह स्वयं हो।

अचानक उस स्त्री ने अंग्रेजी में कहा, "चलो डार्लिंग, रात बहुत हो गई।"

"ऊंह होने दो...रात अपनी ही तो है डार्लिंग।" पुरूष ने लापरवाही से कहा।

गोविन्द को पुरूष का स्वर परिचित.सा लगा। उसने घूरकर देखा और फिर एकदम उठ खड़ा हुआ। ‘



स्त्री ने अंग्रेजी में कहा, “अब देर काहे की है, डार्लिंग...अब तुम से अलग रहना बर्दाश्त से बाहर हो गया है।"

"चिन्ता न करो, मैंने वकील से सारी बातें कर ली हैं। जैसे ही कमला से सेप्रेशन मिली, तुमने शादी कर लूँगा।" पुरूष ने कहा।

दोनों ने हल्का.सा कहकहा लगाया और फिर दोनों एक दूसरे से लिपटे लड़खड़ाते हुए पार्क के गेट की ओर बढ़ने लगे।



यह आवाज मदन की थी...मदन...शीला का हत्यारा मदन...उसकी बर्बादी का जिम्मेदार मदन। और गोविन्द बच्चे को भूल, उसके पीछे.पीछे चल दिया।

शम्भू उस समय तक मदन और जूली को देखता रहा, जब तक कि वे दोनों फाटक से बाहर न निकल गए।

"हे भगवान,” शम्भू ने एक लम्बी सांस लेकर कहा, “तेरे घर देर है, लेकिन अंधेर नहीं है। एक न एक दिन मालिक की आंखें जरूर खुलेंगी...कमला बिटिया को एक न एक दिन उसका अधिकार मिलकर रहेगा।"

फिर वह धीर.धीरे फाटक की ओर बढ़ने लगा।

अचानक उसके कानों से किसी मासूम बच्चे के रोने की आवाज टकराई...दूध पीता बच्चा...! वह चौंककर इधर.उधर देखने लगा।

"हे भगवान, यह बच्चे के रोने की आवाज कहां से आ रही है?" वह अपने आप में बड़बड़ाया।

बच्चे के रोने की आवाज लगातार बढ़ती जा रही थी। शम्भू ने नजरें इधर.उधर दौड़ाई।

अचानक उसे एक बैंच पर एक तौलिये में लिपटा एक बच्चा दिखाई दिया, जो बिलख.बिलख कर रो रहा था। वह तेजी से उस बैंच की ओर बढ़ गया। उसने झपट कर बच्चे को उठाकर सीने से चिपटा लिया और फिर इधर.उधर देखने लगा।

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रात काफी बीत चुकी थी...पार्क में सन्नाटा छाया हुआ था। शम्भू इधर.उधर देखकर बड़बड़ाया।

"हे भगवान् न जाने कौन निर्दयी इस नन्ही.सी जान को इस तरह यहां डाल गया है, फिर वह जोर से चिल्लाया, "यह किसका बच्चा है?"

शम्भू ने बच्चे के चेहरे पर एक नजर डाली और फिर बड़बड़ाया, "समझा, तू किसी के प्यार की भूल है...कैसे पत्थर दिल होते हैं लोग, जिन्हें ऐसे मासूम बच्चों पर भी दया नहीं आती।"

शम्भू ने बच्चे को सीने से चिपटा लिया और पार्क के दूसरे फाटक की ओर चल दिया।

गोविन्द का समूचा बदन प्रतिशोध की आग से जल रहा था। उसकी मुट्ठियां भिंची हुई थीं। आंखों से अंगारे बरस रहे थे।

मदन और जूली पार्क से निकलकर एक कार के पास पहुंच कर रूक गए। कार एक इलैक्ट्रिक पोल के नीचे खड़ी थी। बिजली की रोशनी जब मदन के चेहरे पर पड़ी तो गोविन्द ने उसे अच्छी तरह पहचान लिया। मदन की आंखें शराब से लाल हो रहीं थीं। वह लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ा और डाइविंग सीट की ओर का दरवाजा खोलने लगा।

अचानक गोविन्द ने आगे बढ़कर उसके कोट का कालर पकड़ लिया और उसे पीछे की ओर खींच लिया। मदन अरे.अरे करता हुआ पीछे की ओर मुड़ा। जूली घबड़ा कर दूर जा खड़ी हुई।

___ जैसे ही मदन की निगाह गोविन्द पर पड़ी, वह उसे पहचान गया। उसने मुस्कराते हुए कहा, “अरे गोविन्द...तुम...तुम यहां कहां?"

"तुम्हारी बदौलत ही मुझे यहां आना पड़ा मदन।" गोविन्द ने नथुने फुलाकर कहा।

"ओहो, तुम मुझसे मिलने आए हो...? कब आए?" मदन ने मुस्कराते हुए कहा, "अमां यार, कालर तो छोड़ो...तुम्हारी यह मजाक की आदत अभी तक नहीं गई।"

"यह मजाक की दावत भी तुमने ही दी है मदन। तुमने मेरी जिन्दगी के साथ जो मजाक किया है, उसे मैं कभी न भूल पाऊंगा औरन उसके लिए तुम्हें कभी क्षमा करूंगा।"

"कैसी बातें कर रहे हो यार, मैंने ऐसा कौन.सा मजाक किया है?"

"तुमने ऐसा मजाक किया है मदन! जिसने शीला की जान ले ली।"

"श...श...शीला की जान ले ली?"
 
मदन के मस्तिष्क को एक जोरदार झटका लगा। और फिर उसके चेहरे का रंग उड़ गया। आंखों से बदहवासी झांकने लगी।

उसने सूखे होंठों पर जबान फेरकर बड़ी कठिनाई से कहा..." यार, कैसी बातें कर रहे हो तुम?"

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"जो कुछ कह रहा हूं, सच कह रहा हूं। तुमने मेरी सीता जैसी पवित्र और पतिव्रता पत्नी की आबरू लूटकर उसे मर जाने पर मजबूर कर दिया। इस बात को तुम दोनों के अतिरिक्त तीसरा कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था। वह चाहती तो इस भेद को जीवन भर छिपाए रखती। लेकिन उसकी आत्मा इस बोझ को सहन न कर पाई और उसने अपनी जान दे दी...और अब मैं तुम्हारी जान लेकर उसकी आत्महत्या का बदला लूंगा।...तुम्हें किसी भी कीमत पर नहीं छोडूगा।"



मदन कांप उठा...उसने घबरा कर भयभीत स्वर में कहा, "नहीं नहीं, यह झूठ है...बिल्कुल झूठ है...।"

"तू समझता है कि मैं तेरी चिकनी.चुपड़ी बातों में आकर तुझे छोड़ दूंगा...मेरे सीने में प्रतिशोध की जो आग धधक रही है, वह तभी ठंडी होगी। जब तेरी आखिरी सांस तक तेरे शरीर का साथ छोड़ देगी।"

और फिर गोविन्द के हाथ मदन की गर्दन पर पहुँच गए।

मदन जोर से चीख उठा।

"बचाओ...बचाओ...!!"

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वह चीखता चला गया।...उसने बड़ी कठिनाई से अपनी गर्दन गोविन्द के हाथों से छुड़ाई और चीखता हुआ सड़क पर भागा।

"बचाओ...बचाओ...।"

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"कमीने, भागकर कहां जाएगा...आज मैं तेरी जान लिए बिना न छोडूंगा।" गोविन्द उसके पीछे दौड़ता हुआ चिल्लाया।

दोनों आगे पीछे भागने लगे। मदन को लग रहा था, जैसे उसके पीछे गोविन्द नहीं मौत भागी चली आ रही है। वह जी तोड़कर भाग रहा था और अपनी पूरी ताकत से चीखता भी जा रहा था।

अचानक एक मोड़ पर मुड़ती हुई एक गाड़ी की हैड लाईट मदन के चेहरे पर पड़ी

और मदन गाड़ी के बम्पर से जा टकराया। गाड़ी एकदम रूक गई।

मदन बुरी तरह चिल्लाया..

"बचाओ...बचाओ...!"

दूसरे ही पल गोविन्द ने उसे धर दबोचा...और दांत किटकिटा कर चीखा, "कमीने...मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा।"

वह पुलिस की गाड़ी थी। एक इंस्पेक्टर और कुछ कांस्टेबल उससे उतरकर नीचे आ गए।

इंस्पेक्टर ने चीखकर कहा..."क्या हो रहा है यह?"

"बचाओ...मुझे बचाओ।" मदन बिलबिलाकर चीखा।

इंस्पेक्टर और कांस्टेबल एक साथ उन दोनों पर झपटे। गोविन्द पागलों की तरह चीख रहा था.

"नहीं छोडूंगा...नहीं छोडूंगा...कमीने, तेरी जान ले लूंगा मैं।"

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इंस्पेक्टर और कांस्टेबलों ने बड़ी कठिनाई से गोविन्द को खींचकर मदन से अलग किया। गोविन्द अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए चीखा..."मुझे छोड़ दीजिये...मैं इस कमीने को जिन्दा न छोडूंगा...इस पापी ने मेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी...मेरी पत्नी को आत्महत्या करने पर विवश किया...मैं इसे न छोडूंगा।"

"दारोगा जी, इसे पकड़ लीजिये।" मदन दारोगा की ओर झपटते हुए चिल्लाया, "वरना...यह मुझे मार डालेगा..."
 
गोविन्द चीखता ही रहा...कांस्टेबलों ने गोविन्द को खींचकर जबर्दस्ती जीप में ठूस दिया।

___ इंस्पेक्टर ने कांस्टेबलों से कहा..." इसे पुलिस स्टेशन ले जाओ...मैं आ रहा हूं।"

जीप चल पड़ी।

गोविन्द कांस्टेबलों की पकड़ से अपने आपको छुड़ाने की कोशिश करते हुए चीखा।

"मुझे छोड़ दो...मैं इस कमीने की जान लेकर रहूंगा...मैं इसे जान से मार डालूंगा...।

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"मुझे छोड़ दो...मैं इस कमीने की जान लेकर रहूंगा...मैं इसे जान से मार डालूंगा...।"

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धीरे.धीरे गोविन्द की आवाज दूर होती चली गई।

मदन ने इंस्पेक्टर की ओर देखकर अपनी गर्दन सहलाते हुए कहा, “सुन लिया दारोगा जी आपने...अगर आप समय पर न पहुंच जाते तो यह पागल सचमुच मुझे जान से मार डालता।"

"आप मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलकर अपना बयान लिखवाइये।" इंस्पेक्टर ने मदन को तसल्ली देते हुए कहा।

फिर वे दोनों उस कार की ओर बढ़ गए, जिसे जूली ड्राइव करती हुई उनकी ओर ला रही थी।

अचानक कमला के कानों से किसी दुधमुंहे बच्चे के बिलख.बिलखकर रोने की आवाज टकराई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसने घबड़ाकर इधर.उधर देखा।

तभी दरवाजा खटखटाने के साथ शम्भू की आवाज सुनाई दी," कमला बेटी, दरवाजा खोलो...।"

"कमला ने जल्दी से बढ़कर दरवाजा खोल दिया। रोते हुए बच्चे की सीने से चिपटाए शम्भू अंदर आ गया।

कमला हड़बड़ाकर पीछे हट गई।

"काका...यह बच्चा...?"

"जल्दी से इसे दूध पिला बेटी...न जाने कब से भूखा है...रोते.रोते इसका गला सूख गया है।"

कमला ने जल्दी से बच्चे को लेकर अपने सीने से चिपटा लिया। और हैरानी भरे स्वर में बोली, "लेकिन काका...यह बच्चा है किसका?"

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"फिर पूछना बेटी.पहले मैं इसके लिए दूध ले आऊं।"

शम्भू उलटे पांव दरवाजे से बाहर चला गया। कमला बच्चे को सीने से चिपटा कर उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी। और फिर बच्चा धीरे.धीरे चुप होता चला गया...और थोड़ी देर बाद बिल्कुल चुप हो गया।...केवल उसकी धीमी.सी सिसकियां ही शेष रह गईं।

कमला को लग रहा था, जैसे उसके अंदर का मातृत्व सहसा जाग उठा है। उसके हृदय में ममता, स्नेह और वात्सल्य के झरने फूट चले।

__ और उसने बच्चे को सीने से लिपटाकर अपनी आंखें मूंद लीं।

अदालत के सन्नाटे में जज का गम्भीर स्वर गूंज उठा...।

"मुकदमे की सारी कार्रवाई, गवाहों के बयान और खुद मुलजिम के बयान सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि मुलजिम गोविन्द राम ने सचमुच मदनकुमार खन्ना पर कातिलाना हमला किया। मुलजिम के बयान के अनुसार मदनकुमार खन्ना ने उसकी पत्नी शीला देवी के साथ बलात्कार किया और शीला देवी ने आत्महत्या कर ली।

लेकिन मुलजिम के पास इस बात का न कोई सबूत है, न गवाह। न इस सिलसिले में रिपोर्ट ही उसने पुलिस में लिखवाई है अगर मुलजिम के इस बयान को सच मान भी लिया जाय, तो उसे मदनकुमार खन्ना को दंड देने का कोई अधिकार नहीं था। उसने कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करके बहुत अपराध किया है। इसलिए अदालत उसे सात वर्ष सपरिश्रम कारावास का दंड देती

___ मदन ने इत्मीनान की सांस लेकर गोविन्द की ओर देखा, जो कटघरे में खड़ा खूखार नजरों से उसे घूर रहा था।

अदालत का निर्णय सुनते ही गोविन्द चिल्लाकर बोला, “जज साहब, आपने मुझे सजा देकर बहुत बड़ा न्याय किया है। क्योंकि आपने कानून में मदन जैसे अपराधी के लिए कोई दंड नहीं है, जिसने मेरी पत्नी की हत्या की है। अदालत भले ही मुझे कितनी ही लम्बी सजा क्यों न दे दे, मैं इस कमीने को जिन्दा नहीं छोडूंगा। मेरी आत्मा को तभी शान्ति मिलेगी, जब मैं इस कुत्ते से अपनी पत्नी की मृत्यु का बदला ले लूंगा।"

"आर्डर...आर्डर...!" जज ने मेज पर हथोड़ा मारा।

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"यहां न कोई व्यवस्था है और न न्याय...।" गोविन्द राम ने चीख कर कहा।

लेकिन पुलिस कांस्टेबल उसे खींचकर अदालत से बाहर ले गए।

अदालत के एक कोने में खड़े मुनीमजी ने अपने मालिक की ओर देखा और उनकी उमड़ती हुई आंखें बरसने लगीं।

दरवाजे की सलाखों के पास पहुंचकर गोविन्द रूक गया। मुनीम जी जल्दी से सलाखों के पास पहुंचे और कांपते स्वर में बोले, “यह क्या हो गया मालिक!...यह क्या हो गया?"

"कुछ नहीं मुनीम जी, इस दुनिया का दस्तूर ही यही है। भले लोगों को दुनिया चैन से नहीं जीने देती। लेकिन जिन्दगी इतनी छोटी नहीं कि सब कुछ भुलाया जा सके। जेल से आने के बाद मैं इस कमीने को जान से मार डालूंगा।"

__ "मालिक..." मुनीमजी का गला रूंध गया।

"मैं तुम्हारा बहुत अहसानमन्द हूं मुनीमजी, तुमने मेरे केस की पैरवी की...मुझे छुड़ाने की कोशिश की।"

“मैंने तो अपना कर्तव्य निभाया है मालिक। आप ही का तो पैसा था। अगर वह न होता, तो मैं इतना भी न कर पाता। लेकिन मुझे इसी बात का दुःख है कि इतना सब करने के बाद भी मैं आपको छुड़ा न सका।"

"मुझे जेल जाने का रत्ती भर भी दुःख नहीं है मुनीमजी। मुझे तो बस अपने बच्चे के खो जाने का दुःख है। मैं शीला की धरोहर की रक्षा न कर सका।"

"बच्चे को खोजने की मैंने बहुत कोशिश की मालिक और आगे भी करता रहूंगा।"

"मुझे उम्मीद है मुनीमजी, एक न एक दिन मेरा लाल मुझे जरूर मिलेगा। तुम उसे तलाश करते रहना। जब मिल जाए, मुझे सूचना दे देना।"

"भगवान करे वह मिल जाए।...मैं उसे अपने कजेले के टुकड़े की तरह रखूगा।"

तभी एक संतरी ने जाकर कहा, "मुलाकात का समय खत्म हो गया।"

"अच्छा मालिक, मैं फिर आऊंगा।" मुनीमजी ने गोविन्द के दोनों हाथ थामते हुए कहा।

फिर वह अपने आंसू पोंछते हुए बाहर चले गए। गोविन्द सलाखों के पीछे खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रहा।

मदन ने शराब का आखिरी चूंट भरा और गिलास फर्श पर उछाल दिया । फिर लड़खड़ाते हुए बिस्तर की ओर बढ़ा। अचानक उसकी निगाह आईने पर पड़ी और वह ठिठक कर रूक गया। उसे आइने में अपनी जगह गोविन्द राम की सूरत दिखाई दी। गोविन्द राम ने दांत भीच कर कहा.

"मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा...कमीने, मैं तेरी जान ले लूंगा।"

"खामोश...।" मदन हलक फाड़कर चिल्लाया।

फिर उसने एक फूलदान उठाकर आईने पर दे मारा। आईना झनझनाकर टूट गया, साथ ही नौकर से दौड़कर आते कदमों की आवाज सुनाई दी। मदन उछलकर भयभीत नजरों से दरवाजे की ओर देखने लगा।

"क्या हुआ मालिक?" नौकर ने घबराए स्वर में पूछा।

"भाग जाओ," मदन चिल्लाया, "मुझे कोई नहीं मार सकता...मुझे कोई नहीं मार सकता।"

नौकर भयभीत होकर भाग गया।

मदन ने दरवाजा बंद कर लिया। फिर खिड़की के पट टटोल कर देखे। खिड़की बंद थी। फिर वह लड़खड़ाया हुआ बिस्तर पर आ गिरा और कुछ देर बाद गहरी नींद सो गया।

__ खिड़की के पट धीर.धीरे खड़खड़ाए और उनकी आवाज कमरे में गूंज उठी। मदन की आंख खुल गई और वह भयभीत होकर खिड़की की ओर देखने लगा। अचानक चटकनी के दो टुकड़े हो गए और खिड़की के पट इधर.उधर फैल गए। और खिड़की में से हाथ खुला चाकू लिए गोविन्द राम अन्दर कूदा। उसकी आंखों से शोले निकल रहे थे। होंठ भिंचे हुए थे। वह धीरे.धीरे मदन की ओर बढ़ने लगा।
 
मदन को लगा जैसे उसके हाथ.पाव बेजान हो गए हों। और उसमें हिलने की भी ताकत न रह गई हो।

अचानक गोविन्द का हाथ उठा...और मदन के हलक में से एक चीख निकल गई।

और मदन हड़बड़ाकर बिस्तर से नीचे आ गिरा। खिड़की बंद थी। लेकिन मदन को लग रहा था जैसे खिड़की की चटकनी काटी जा रही हो।

"बचाओ," मदन जोर से चिल्लाया।

फिर वह चीखता हुआ दरवाजे की ओर दौड़ा और दरवाजा खोल कर सीढ़ियों की

ओर भागा।

सीढ़ियों के पास पहुँचते ही उसे जोर की ठोकर लगी और वह सीढ़ियों पर लुढ़कता चला गया। उसकी चीखें रात के सन्नाटे में

गूंज उठीं, जिन्हें सुनकर नौकर सीढ़ियों की ओर दौड़ पड़े।

सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ मदन फर्श पर आ गिरा। उसके घुटनों से खून बह रहा था। उसने दोनों हाथ टेककर उठने की कोशिश की, लेकिन वह उठ न सका और धम से औंधे मुंह जा गिरा।

वह बेहोश हो गया। नौकरों से उसे चारों ओर घेर लिया।

अस्पताल के बरामदे में जूली बेचैनी से टहल रही थी। उसकी निगाहें बार.बार उस बार्ड के दरवाजे की ओर उठ जाती थीं, जिसमें मदन एडमिट था...अचानक वार्ड का दरवाजा खुला और एक डाक्टर...अब मि0 मदन का क्या हाल है?"

डाक्टर ने हल्की.सी सांस लेकर जूली को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, "मिस जूली...हमें मि0 मदन के प्राण बचाने में तो सफलता मिल गई, लेकिन...!"

"लेकिन क्या...?"

"मुझे दु:ख है मिस जूली...मि0 मदन का निचला धड़ बेकार हो गया।"

__व्हाट...?" जूली हड़बड़ाकर पीछे हट गई।

"अब आप उनसे मिल सकती हैं...वे पूरी तरह होश में हैं।"

डाक्टर चला गया। जूली आश्चर्य से उसे जाते देखती रही। फिर कुछ सोचती हुई वह धीमे कदमों से वार्ड के दरवाजे की ओर बढ़ गई।

बिस्तर पर मदन तकिये के सहारे बैठा हुआ था। उसके सिर पर पट्टी बंधी हुई थी, घुटनों तक रजाई ढकी हुई थी। उसके चेहरे का रंग पीला हो रहा था। आंखों के नीचे काले घेरे पड़े हुए थे।

जूली को देखते ही मदन के होंठों पर हल्की सी मुस्कराहट दौड़ गई।

"तुम आ गई जूली...मुझे मालूम था कि तुम जरूर आओगी।"

जूली ने जबर्दस्ती मुस्कराने की कोशिश की और आवाज में हमदर्दी पैदा करके बोली, "मुझे दु:ख है मदन कि तुम्हारे साथ इतनी भयानक दुर्घटना हुई।"

"जूली ! भगवान को जो मंजूर होता है, वही होता है। लेकिन मुझे अपने अपाहिज होने का कोई दुःख नहीं है। तुम जो मेरे साथ हो।"

"मि0 मदन," जूली ने आंखों चुराते हुए कहा, “मैं असल में तुमसे इस समय यही कहने आई थी कि...मैं...मैं...!"

"कहो न जूली, झिझक क्यों रही हो?" मदन चिन्तित हो उठा।

"मुझे अफसोस है मदन...मेरी मम्मी तुम्हारे साथ मेरी शादी करने के पक्ष में नहीं हैं।"

"व्हाट...?" मदन बुरी तरह उछल पड़ा।

"मैं पहले ही तुम्हें यह बात बताने वाली थी। लेकिन तुमने मौका ही न दिया...मम्मी चाहती हैं कि मेरी शादी मेरे पहले मंगेतर जोजफ से ही हो।"

मदन बड़े ध्यान से जूली के चेहरे को देखने लगा था। फिर उसके नथुने फूल गए

और वह क्रुध होकर बोला, “यह निर्णय तुम्हारी मम्मी का है या तुम्हारा?"

"क्या मतलब?" जूली ने भभककर पूछा।

"मैं तुम्हारी मम्मी के स्वभाव से भली भांति परिचित हूं।...मैं जानता हूं कि मुझसे शादी करने से अब तुम क्यों इन्कार कर रही हो...इसलिए कि अब मैं अपाहिज हो गया हूं।"

जूली के तेवर एकदम बदल गए...वह झटके से बोली, “अगर तुम यही समझते हो, तो यही सही। मैं अपाहिज आदमी से शादी करके अपनी जिन्दगी बर्बाद नहीं कर सकती...मैं तो क्या दुनिया की कोई भी लड़की ऐसी मूर्खता नहीं कर सकती।"

"बको मत, “मदन गुस्से से चीख पड़ा "तुम स्वार्थी हो, धोखेवाज हो। तुम्हारी खातिर मैंने अपनी पत्नी को धक्के देकर घर से निकाला। और आज तुम्हीं मुझे इस तरह धोखा देकर जा रही हो।"

"आंखें क्यों दिखाते हो, "जूली आंखें निकाल कर बोली, “मैंने तुम से नहीं कहा

था कि तुम अपनी पत्नी को धक्के देकर घर से निकाल दो...तुम ही उससे तंग आ चुके थे। क्योंकि वह अनपढ़ और गंवार थी। तुम स्वयं मेरे रूप और मेरी जवानी पर रीझे थे।

और स्वयं मेरी ओर बढ़े थे। अच्छा हुआ कि मेरी आंखें खुल गई...और फिर जब तुम

अपनी विवाहित पत्नी के ही कादार नहीं रहे, तो मेरे कब तक रह सकते थे?...कान खोलकर सुन लो... अब तो मुझे इस बात का भी पूरा.पूरा विश्वास हो गया है कि तुमने सचमुच अपने दोस्त गोविन्द राम की पत्नी के साथ बलात्कार किया था। भगवान ने तुम्हें उसी पाप की सजा दी है।"

"गेट आउट!" मदन गला फाड़ कर चीखा।

"शटअप!" जूली ने भी उसी तरह चीखकर कहा, "मैं तुम्हारी पत्नी की तरह नहीं हूं, जिसे धक्के मार कर तुमने निकाल दिया था।...खबरदार जो अब एक भी शब्द मुंह से निकाला।"
 
.

फिर वह पैर पटकती हुई दरवाजे से बाहर निकल गई। मदन की आंखों से आग बरस रही थी। उसके कानों में जूली के शब्द गूंज रहे थे।

"तुमने सचमुच अपने मित्र पत्नी के साथ बलात्कार किया है और भगवान ने उसी पाप का दंड तुम्हें दिया है।"

"जब तुम अपनी पत्नी के ही वफादार नहीं रहे तो मेरे वफादार कैसे रहोगे?"

मदन का पूरा बदन पसीने में डूब गया। और फिर वह दोनों हाथों में मुंह छिपा कर रोने लगा।

अचानक उसे अपने बालों में किसी की उंगलियों का स्पर्श अनुभव हुआ। उसने चौंककर आंखें खोल दी...और फिर वह भौचक्का.सा कमला की ओर देखने लगा, "तुम...तुम...कमला।"

"हा...मुझे शम्भू काका ने बताया था...।" और फिर कमला फूटफूट कर रोने लगी।

___"तुम मेरे घावों पर नमक छिड़कने आई हो?"

"नहीं...नहीं...ऐसा न कहिए, मैं तो आपकी दासी हूं।" कमला ने मदन के पैर पकड़ लिए।

"मैं तो अपाहिज हो गया हूं...क्या तुम अपाहिज के साथ जिन्दगी बिताना मसंद करोगी?"

“अपाहिज कहां हैं आप...आपका सहारा मैं जो हूं...।"

"कमला...।" मदन की आवाज कांप उठी, "मुझे क्षमा कर दो कमला...।" मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया था...तुम्हें धक्के मार कर घर से बाहर निकाला था।"

"मुझसे क्षमा मांगकर मुझे पाप का भागी न बनाइए मेरे देवता।"

"नहीं कमला, पापी तो मैं हूं, मैंने ऐसे.ऐसे पाप किए हैं, जिनके लिए भगवान मुझे कभी क्षमा न करेंगे।...मैंने अपने मित्र की पत्नी की आबरू लूटी, तुम जैसी देवी को एक बाजारू औरत के लिए धक्के देकर घर से निकाला।...शायद भगवान ने मुझे मेरे इन्हीं पापों का दंड दिया है कि मैं जीवन भर अपने पैरों पर खड़ा न हो सकूँ और तुम्हें वह खुशी न दे सकू, जो पत्नी के नाते तुम्हें मुझे देनी चाहिए।"

"मुझे कोई खुशी नहीं चाहिए। आपकी जीवन भर सेवा करते रहना ही मेरी सबसे बड़ी खुशी है।"

"तुम महान हो कमला...।"

मदन ने कमला को खींच कर अपने सीने से लगा लिया और फिर उसके बालों में सिर छिपा कर सिसक उठा। दरवाजे में खड़े

शम्भू की आंखों से आंसू बहने लगे।

"सच है भगवान...तेरे यहां देर है, अंधेर नहीं।"

अचानक शम्भू की गोद में सोया बच्चा जागकर रोने लगा। कमला जल्दी से मदन से अलग हो गई। उसने बढ़कर शम्भू की गोद से बच्चे को ले लिया। बच्च कमला के हाथों में आते ही चुप हो गया।

मदन ने आश्चर्य से पूछा, “यह बच्चा कहां से आया?"

"भगवान ने हमें दिया है।...इसके लालन.पालन की जिम्मेदारी हमें सौंपी है...काका को यह बच्चा पार्क में पड़ा हुआ मिला था।"

"देखू !" मदन ने उत्सुकता से कहा।

कमला ने बच्चे को मदन की गोद में दे दिया। मदन बड़े ध्यान से बच्चे को देखने लगा। उसके मन में बच्चे के लिए ममता

और प्यार जाग उठा। उसने बच्चे का माथा चूम लिया।

__ “अब मुझे पूरी तरह विश्वास हो गया कि भगवान के यहां अन्याय नहीं है। वह जानता था कि मैं कभी तुम्हारी गोद न भर सकूँगा। एक नारी की गोद खाली रहना उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। इसलिए भगवान ने तुम्हारी गोद भर दी...मेरे बुढ़ापे का सहारा दे दिया। मैं इसे कलेजे से लगा कर रखूगा।"

मदन ने बच्चे का माथा फिर चूम लिया। उसकी आंखें सहसा गीली हो उठीं।

गोविन्द राम की आंखें गीली थीं। वह घुटनों पर ठोढ़ी रखे चुपचाप एक कोने में बैठा था।

अचानक एक हाथ उसके कंधे पर गया। गोविन्द राम चौंक पड़ा। वह हाथ शंकर का था।

शंकर ने मुस्कराते हुए कहा, “अकेल बैठे क्या सोच रहे हो गोविन्द? बाहर चलो,

आज दीवाली है। सारे कैदी दीवाली मना रहे हैं। सेठ हृदयनाथ ने सब के लिए मिठाई

और आतिशबाजी भेजी है।"

"जिसके भाग्य में अकेलापन ही हो, वह दीवाली कैसे मनाए शंकर। मेरी दीवाली तो उस दिन अंधेरे में बदल गयी थी, जिस दिन मेरी शीला ने आत्महत्या की थी औ जिस दिन मेरा बच्चा मुझसे बिछड़ा था...न जाने मेरा लाल कहां और किस हाल में है...जिन्दा भी होगा या नहीं।"

___ “ऐसा न कहो गोविन्द...।" शंकर ने गोविन्द के मुंह पर हाथ रख दिया, “ऐसा न कहो, भगवान तुम्हारे बच्चे कोसही सलामत और खुशी रखे।...उसके यहां देर है अंधेर नहीं..."

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"मुझे तो यह भी मालूम नहीं कि अब वह कहां है...एक दिन वह मुझसे एक पार्क में बिछड़ गया। इस बात को पूरे छह साल हो गए...अब तो काफी बड़ा हो गया होगा...अब अगर मिल भी गया तो मैं उसे पहचान न सकूँगा।"

 
"ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं गोविन्द...तुम्हारा बच्चा तुम्हें जरूर मिलेगा...और तुम उसे पहचान भी लोगो...जी

छोटा न करो। आज पूरे छह साल बीत गए...थोड़े से दिन हैं, वे भी बीत जायेंगे।

आदमी को कभी निराश नहीं होना चाहिए।"

+

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"मैंने आस नहीं छोड़ी है शंकर। मैं जिन्दा हूं तो सिर्फ इसी आस पर कि जिस कमीने की वजह से मेरी जिन्दगी बर्बाद हुई है, उसे उसके अपराध का दंड दे सकू। जिस दिन मुझे इस कैद से रिहाई मिलेगी, बाहर निकलते ही उस कुत्ते को मार डालूंगा।...और तभी दीवाली मनाऊंगा।"

"उसे मार डालने के बाद दीवाली मनाने के लिए क्या कानून तुम्हें आजाद छोड़ देगा?" शंकर ने कड़वी हंसी के साथ कहा, "पागल हो गये हो तुम। प्रतिशोध ने तुम्हारी समझ पर पर्दा डाल दिया है। अगर तुमने उसे मार डाला तो, तुम्हें फिर इसी जेल में आना पड़ेगा। शायद फिर जिन्दगी ही जेलखाने में कटे। फिर क्या तुम अपने बच्चे को खोज पाओगे? क्या तुम अपनी पत्नी की आत्मा को शान्ति पहुंचा सकोगे?"

"शंकर।" गोविन्द की आवाज कांप गई।

"हां गोविन्द, कानून को अपने हाथ में लेने वाला कभी आजादी की सांस नहीं ले सकता। मुझे ही देखो...गरीबी और अभावों के कारण मैंने अपनी मां को खो दिया। अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए जब मुझे मेहनत और ईमानदारी से कुछ न मिला तो मैंने लोगों से जबर्दस्ती छीनना शुरू कर दिया। और आज मैं अपने जिले का सबसे स्मगलर हूं। मेरा एक बहुत बड़ा गैंग है...लेकिन मेरे साथी नहीं जानते कि मैं ही उनका बॉस हूं...क्योंकि मैं उनके साथ एक मामूली गुंडे के रूप में काम करता हूं... पिछले दिनों में माल के साथ पकड़ा गया। लेकिन कानून मुझसे यह न उगलवा सका कि मेरे गैंग का बॉस कौन है और गैंग में कितने लोग हैं। इसलिए मुझे इस एक मामूली

स्मगलर मानकर सिर्फ तीन साल की सजा दी गई। जिस दिन मैं पकड़ा गया था, मेरी पत्नी ने मुझे बताया था कि वह मां बनने वाली है। और अपने बच्चे के भविष्य को सुखद बनाने के लिए मैंने निश्चय कर लिया कि मैं अब कभी गलत धंधा नहीं करूंगा।...आज इस बात को छह महीने बीत चुके हैं... संभवतः मेरी पत्नी मां बन चुकी हो या बनने वाली हो। लेकिन मैं अब जेल में हूं...न अपनी पत्नी को देख पाऊंगा...न, अपने बच्चे को।"

कहते.कहते शंकर का गला रूंध गया।

तभी एक संतरी ने आकर गोविन्द से कहा." नम्बर सोलह, तुम्हें जेलर साहब बुला रहे हैं।"

गोविन्द राम उठकर संतरी के पीछे.पीछे चल दिया।

गोविन्द राम को देखकर जेलर ने मुस्कराते हुए कहा, "गोविन्द राम, तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि अच्छे चाल.चलन के कारण सरकार ने तुम्हारी बाकी सजा माफ कर दी है। आज दीवाली की खुशी में तुम्हें रिहा किया जा रहा है।"

गोविन्द राम को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह हक्का.बक्का.सा जेलर का मुंह ताकता रह गया।

गोविन्द जेल से बाहर जाने लगा तो शंकर ने उसे कहा, "मुझे खुशी है गोविन्द कि तुम्हें जेल से रिहाई मिल गई। मगर मेरी एक बात याद रखना, दुश्मन को कभी क्षमा नहीं करना चाहिए, उसे ऐसी सजा देनी चाहिए कि वह जिन्दा रहे, लेकिन उसकी जिन्दगी मौत से भी गई.बीती हो जाए।"

गोविन्द, शंकर की ओर देखने लगा।

शंकर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुए कहा, “जेल के ये दिन हमने दोस्त की तरह बिताए हैं। इसी नाते मैं तुम्हें एक काम सौंप रहा हूं। मैं अच्छी तरह जान गया हूं कि आप अच्छे घराने के अच्छे नेक

आदमी हो, इसीलिए मेरी प्रार्थना जरूर स्वीकार कर लोगे।"

"मुझे बताओ मेरे दोस्त...तुम जो भी कहोगे, मैं वह जरूर करूंगा।"

"बस इतना सा काम है गोविन्द...जब तक मैं जेल से रिहा होकर न आ जाऊं, मेरी पत्नी की देखभाल रखना। मेरे बच्चे को अपना बच्चा समझकर उसका पूरा.पूरा ध्यान रखना।"

"विश्वास करो शंकर...तुमने मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी है, इसे निभाने की मैं पूरी कोशिश करूंगा।"
 

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