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Romance बन्धन

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शंकर ने उसे अपना घर का पता बताया और भरे.भरे मन से विदा कर दिया।

जेल के फाटक से बाहर आते ही गोविन्द को लगा, जैसे वह किसी नई दुनिया में आ गया है...सब कुछ वैसा ही था, जैसा वह छोड़ यगा था।

___ कमला ने फुलझड़ी जलाकर मोनू के हाथ में दे दी। मोनू ने फुलझड़ी को ले लिया

और हंसते हुए उसे घुमाने लगा।

मदन अपनी व्हील चेयर बढ़ा कर उसके पास आ गया और हर्ष भरे स्वर में बोला, "शाबाश बेटे...शाबाश...डरो नहीं, खूब जोर से घुमाओ।"

"मैं कहां डर रहा हूं डैडी!" मोनू ने कहा।

कमला और शम्भू तालियां बजाकर हंसने लगे।

अचानक मोनू के हाथ पर फुलझड़ी से झड़ते शोलों का एक हल्का सा छींटा आ पड़ा और वह फुलझड़ी फेंक कर मदन से लिपट गया।

"क्या हुआ मेरे बेटे को, देखू।" मदन ने जल्दी से मोनू का हाथ पकड़कर देखा।

शम्भू भी घबरा गया औरर कमला की तो जैसे जान ही निकल गई।

लेकिन मोनू जल्दी से हंसते हुए बोला, "कुछ नहीं हुआ...मुझे तो कुछ नहीं हुआ।"

"हे भगवान, तेरा लाख.लाख शुक्र है।" कमला ने इत्मीनान की सांस ली। “बस कीजिए, अब बहुत छूट चुकी आतिशबाजी...।"

"नहीं मम्मी, थोड़ी.सी और छोड़ेगे।"

"ठहरो बेटे, हम छुडायेंगे।" शम्भू ने आगे बढ़ते हुए कहा।

शम्भू ने कम्पाउन्ड के बीच में एक अनार रखकर उसमें आग लगा दी। शेलों के फब्वारे उबलकर चारों और फैलने लगे। कम्पाउन्ड में तेज रोशनी फैल गई।

और मोनू खुशी से उछल कर तालियां बजाने लगा।

गोविन्द राम के सीने पर सांप लोट गया। वह एक अंधेरे कोने से सब कुछ देख रहा था। व्हील चेयर पर बैठा मदन रह रहकर मोनू को चूम लेता था। कमला भी बार.बार बच्चे को लिपटाकर प्यार करने लगती थी।

मदन को इतना खुश और सुखी देखकर गोविन्द के मस्तिष्क में आंधियां मचल उठी...उसका समूचा बदन क्रोध से जल उठा।

"कितने सुख से रह रहा है यह कमीना...जिसने मेरी हरी.भरी दुनिया जला कर खाक कर दी...अगर आज मेरी शीला जिन्दा होती तो मेरा बेटा मेरे पास होता, और मैं भी इसी तरह दीवाली मना रहा होता।"

"क्या इसी को भगवान का न्याय कहते हैं? एक पापी को इतना सुख मिल रहा है

और मैं निरपराधी होकर ठोकरें खाता फिर रहा हूं।"

"मैं इस कुत्ते को जान से मार डालूंगा।"

गोविन्द राम ने होंठ भिंच गए, मुटिठयां कस गईं।

लेकिन तभी उसके कानों में शंकर के शब्द गूंज उठे।

"अपने प्रतिशोध की आग बुझा कर तुम फिर जेल में आ जाओगे।"

"संभव है, फिर सारी जिन्दगी इसी जेल में रहना पड़े। तब क्या तुम अपने बच्चे को खोज पाओगे? क्या तुम्हारी पत्नी की आत्मा को शान्ति मिल पाएगी?"

गोविन्द राम का समूचा बदन कांप उठा।

"तो मैं क्या करूं...मेरे सीने में धधकती यह आग किस तरह बुझेगी?"

"एक उपाय?"

"शंकर ने कहा था दुश्मन से बदला जरूर लो, लेकिन इस तरह कि उसकी जिन्दगी मौत से भी गई बीती बन जाए।"

और दूसरे ही क्षण गोविन्द राम आंखों में बिजली.सी कौंध गई।

"हां मैं ऐसा ही बदला लूंगा तुझसे मदन...तू जिन्दगी भर तड़पेगा...उसी तरह जिस तरह आज मैं अपने बेटे के लिए तड़प रहा हूं।"

रात का अंधेरा गहरा हो गया था। दीवाली के चिरागों की रोशनी मद्धिम पड़ गयी थी।

गोविन्द राम पेड़ से उतरा और कोठी के पिछवाड़े एक खिड़की के पास पहुंच कर रूक गया।

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वह इस कोठी के चप्पे.चप्पे से परिचित था। अनेक बार इस कोठी में आया था। उसने धीरे से खिड़की के पट अंदर की ओर धकेले...खिड़की खुल गई। उसने धीरे से खिड़की के पट अंदर की ओर

धकेले...खिड़की खुल गई। उसने झांककर देखा। सामने एक डबल बैड था जिस पर एक ओर कमला सो रही थी; दूसरी ओर मदन और बीच में मोनू सोया पड़ा था। मदन और कमला एक.एक हाथ मोनू के ऊपर रखा हुआ था।

गोविन्द खिड़की से कमरे में कूद गया। बैड के पास पहुंचकर उसने कमला के हाथ में नाखून चुभोया और जल्दी से नीचे बैठ गया। कमला ने हाथ झटक कर करवट बदल ली। फिर गोविन्द ने मदन के हाथ में नाखून चुभोया। उसने भी जल्दी से मोनू के ऊपर रखा हाथ हटा लिया।

गोविन्द उठकर खड़ा हो गया। कुछ देर खड़ा वह उन दोनों को देखता रहा। फिर उसने बहुत धीरे से एक हाथ मोनू के मुंह पर रखा और दूसरे हाथ से मोनू उठा लिया।

और फिर उसे कंधे से लगा कर खिड़की से बाहर कूद गया।

उसके कंधे से लगा मोनू गहरी नींद सोया हुआ था।

कमरे से निकलकर गोविन्द ने कम्पाउन्ड की दीवार भी पार कर ली और तेजी से एक ओर चल दिया।
 
कुछ दूर जा कर उसने एक टैक्सी ली और एक.ओर चल दिया।

कमला ने करवट बदली और अपना हाथ मोनू के ऊपर रखना चाहा। लेकिन उसका हाथ बिस्तर पर आ गिरा। झटका लगने से उसकी आंखें खुल गईं। कुछ देर तक नींद से बोझिल आंखों से मोनू की

खाली जगह को देखती रही। फिर हड़बड़ाकर उठ बैठी।

"हाय राम...!"

उसने घबड़ाकर मदन को झंझोड़ डाला।

"सुनिए...सुनिए...मेरा लाल कहां गया?"

"मोनू..." मदन हड़बड़ा कर उठ बैठा, "यहीं तो था...कहां चला गया?"

"हाय राम, मेरा लाल कहां गया?"

"जल्दी से देखों, यहीं कहीं होगा।"

हड़बड़ाहट में मदन ने झपटकर खड़े होने की कोशिश की, लेकिन औंधे मुंह फर्श पर जा गिरा। कमला ने झपटकर उसे उठाया और व्हील चेयर पर बैठा दिया और चीखती हुई भागी।

"मोनू...मोनू...मेरे लाल...कहां हो तुम?"

"क्या हुआ मालकिन...क्या हुआ।" शम्भू दौड़ता हुआ आ गया।

"काका, मेरा मोनू कमरे में नहीं है।"

"कमरे में नहीं है...?" शम्भू सन्नाटे में रह गया।

"भगवान के लिए, मोनू को खोजो काका...मेरे मोनू को खोजो।"

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थोडी ही देर मे कमला और शम्भू ने कोठी छान मारी, लेकिन मोनू का कहीं पता न चला।

कमला बिलबिलाकर रो पड़ी।

"मोनू...मेरे लाल...तू कहां गया मेरे बेटे...!"

मदन सन्नाटे में डूबा व्हील चेयर पर बैठा था। उसकी आंखों में आंसू थे।

शम्भू की आंखों में भय की छाया थी। उसने लंबी सांस लेकर कहा,

"अब क्या होगा मालिक?"

"जल्दी से पुलिस को फोन करो काका। शहर के सभी पुलिस स्टेशनों को खबर कर दो। शहर में ढिंढोरा पिटवा दो। जो कोई मेरे बच्चे को ढूंढकर लाएगा, उसे मैं अपनी सारी दौलत उसे दे दूंगा। काका...मुझे मेरा मोनू चाहिए...वही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।"

और फिर मदन हाथों में मुंह छिपाकर रोने लगा।

एक गली में पहुंचते.पहुंचते मोनू कसमसाया और उनींदी आवाज में पुकारने लगा.

"मम्मी...! मम्मी...!!"

गोविन्द ने जल्दी से मोनू का मुंह बंद कर दिया। मोनू बिलबिला उठा।

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गोविन्द ने कठोर स्वर में कहा.“खबरदार, मुंह से आवाज निकाली तो गला घोंट दूंगा।"

डर के मारे मोनू की आवाज गले में ही घुटकर रह गई।

कुछ देर बाद गोविन्द गली पारकर सड़क पर आ गया।

आधे घंटे बाद वह एक कोठी के कम्पाउन्ड में पहुंच गया। कम्पाउन्ड में सन्नाटा छाया हुआ था। बरामदे में रोशनी हो रही थी। गोविन्द ने मोनू को बरामदे में खड़ा

कर दिया और अपनी सांस संभालने लगा। मोनू बरामदे के एक खम्भे से टिककर खड़ा हो गया। उसके दोनों हाथों की मुटिठयां सीने पर बंधी हुई थीं। और वह भयभीत निगाहों से गोविन्द की ओर देख रहा था।

गोविन्द को लग रहा था, जैसे मोनू की मासूम निगाहें बड़ी तेजी से उसके दिन में उतरती चली जा रही हैं। एक अनजानी शक्ति उसके हृदय को मोनू की ओर खींच रही थी। मन में प्यार और ममता का एक तूफान उमड़ आया था।

"आप...आप कौन हैं?" मोनू ने कांपते हुए भोलेपन से पूछा, "मेरे डैडी...और मम्मी...कहाँ हैं?"

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__ अचानक गोविन्द ने किसी अज्ञात शक्ति से प्रेरित होकर मोनू को खींच कर अपने । सीने से लगा लिया।

"घबराओ मत बेटे, हम तुम्हारे अंकल हैं। तुम्हारे डैडी और मम्मी ने हीं तुम्हें हमारे पास भेजा है।"

"डैडी.मम्मी के पास ले चलिए मुझे।"

"सुबह तुम्हे तुम्हारे डैडी.मम्मी के पास ले चलेंगे। यहां तुम्हारी आंटी रहती हैं, हम उनसे मिलने आए हैं।"

"सुबह जरूर ले चलेंगे न अंकल?"

"हा.हां बेटे...जरूर ले चलेंगे।"

गोविन्द ने मोनू को गोद में उठा लिया और कॉल.बैल का बटन दबाने लगा। अंदर घंटी बजने की आवाज आई। लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

गोविन्द ने घंटी फिर बजाई। लेकिन बेकार।

दरवाजा अंदर से बंद था। गोविन्द कुछ देर खड़ा.खड़ा सोचता रहा। फिर बड़बड़ाया, "जरूर कोई गड़बड़ है।"

+
 
"अंकल...आंटी दरवाजा क्यों नहीं खोल रहीं?

___ "बेटे, उनकी तबियत खराब मालूम होती है।"

गोविन्द ने दरवाजे के ऊपर की ओर देखा और मोनू से बोला. लो बेटे, तुम मेरे कंधे पर खड़े होकर अन्दर की चटकनी खोल दो।"

गोविन्द ने मोनू को अपने कंधे पर खड़ा कर लिया। मोनू ने अन्दर हाथ डाल कर चटकनी टटोली और फिर खोल दी।

"शाबाश बेटे...!"

बन्धन गोविन्द ने दरवाजे को धक्का दिया और मोनू को गोद में लिए हुए अंदर चला गया।

अचानक अंदर किसी कमरे में किसी मासूम बच्चे के रोने की आवाज आई। गोविन्द चौंक पड़ा।

मोनू ने कहा.

"अंकल...अंकल...यह किसका बच्चा रो रहा है?"

“बेटे, यह तुम्हारी आंटी का बच्चा है।"

"मैं खिलाऊंगा इसे।"

गोविन्द मोनू को लिए आवाज की दिशा में बढ़ता रहा। फिर एक कमरे के दरवाजे पर ठिठक कर रूक गया। कमरे में बिस्तर पर एक औरत बैठी गहरी सांसे ले रही थी। और उसके पैरों के पास एक नन्ही.सी बच्ची बिलख.बिलख कर रो रही थी।

गोविन्द सन्नाटे में खड़ा रह गया।

मोनू ने जल्दी से कहा.अंकल...अंकल...देखिए आंटी कैसे रो रहीं हैं...बेबी भी रो रही है।"

गोविन्द ने मोनू को उतार दिया और औरत की ओर बढ़ा। उसने औरत का माथा छूकर देखा। वह तेज बुखार में तप रही थी। मोनू बच्ची को बहलाने की कोशिश करने लगा।

गोविन्द ने मोनू से कहा.

"बेटे, तुम्हारी आंटी की तबियत बहुत खराब है। मैं डाक्टर को बुलाने जा रहा हूं। तुम यहीं रहना और बेबी को बहलाना।"

"अच्छा अंकल।"

गोविन्द तेजी से बाहर चला गया।

मोनू बच्ची को बहलाने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब बच्ची चुप न हुई तो, उसने बच्ची की उठाकर गोद में लिया

और बहलाने की कोशिश करने लगा।

___डॉक्टर ने शंकर की पत्नी की नब्ज देखी, आंखें, दिल की धड़कनें और सांसे देखीं और फिर निराशा भरे स्वर में गोविन्द से बोला." मुझे अफसोस है...इनको समय पर मैडिकल.एड नहीं मिली, इसलिए इनकी डैथ हो गई।"

"डैथ हो गई?"

गोविन्द हड़बड़ाकर पीछे हट गया।

डाक्टर ने गोविन्द के कंधे पर हाथ रखकर थपकी दी और बैग उठाकर बाहर चला गया।

मोनू बच्ची की गोद में लिए बैठा हुआ था और आंखें फाड़.फाड़कर कभी गोविन्द की ओर और कभी उस औरत की ओर देखने लगता था।

"अंकल...क्या आंटी मर गईं?"

"अब गुड़िया को दूध कौन पिलाएगा अंकल?"

गोविन्द की आंखों के सामने अपनी मृत पत्नी शीला और अपने मासूम बच्चे का चेहरा घूम गया। उसने गुड़िया को उठाकर सीने से लगा लिया। और फिर उसकी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई।

___ शंकर की पत्नी की लाश हाल में रखी थी। उसके पास ही गोविन्द गुड़िया को गोद में लिए खड़ा था। उसके सामने चार आदमी सिर झुकाए खड़े थे।

एक आदमी ने आगे बढ़कर कहा, "अर्थी उठाने का प्रबन्ध किया जाए?"

गोविन्द ने उसकी ओर देखा और क्रुद्ध स्वर में बोला, “अब अर्थी उठाने का प्रबन्ध करने आए हो, तब से कहां थे तुम लोग?"

__वह आदमी हड़बड़ा कर पीछे हट गया और बड़े ध्यान से गोविन्द को देखने लगा।

अन्य तीनों भी गोविन्द को बडे आश्चर्य से देख रहे थे।

गोविन्द ने एक पल रूक कर कहा, "शंकर के जेल जाने के बाद तुम लोगों ने कभी यह भी सोचा कि तुम्हारा एक साथी जेल में जाने के बाद तुम लोगों ने कभी यह भी सोचा कि तुम्हारा एक साथी जेल में है

और उसकी पत्नी अकेली है। मां बनने वाली है। तुमने कभी उसकी खैर खबर ली? अगर उसे समय पर मैडिकल.एड मिल जाती तो आज इस मासूम बच्ची को दूध के लिए तड़पना न पड़ता।"

उन चारों ने गोविन्द की ओर देखा। आंखों आंखों में कुछ इशारे हुए। फिर एक ने आगे बढ़कर कहा.

"हमें क्षमा कर दीजिए बॉस।"

"बॉस...!" गोविन्द बडबडाया।
 
"हम आपको पहचान गए हैं बॉस। हमारे गिरोह में केवल बॉस को ही मामूली से

मामूली आदमी की चिन्ता रहती है। अपने नौकरों के साथ भी हमदर्दी का व्यवहार करते हैं।"

"आप हमारे बॉस ही हैं, वरना शंकर की पत्नी को इस हालत में पाकर, आप यहां कभी न आते। शंकर साथी था, दोस्त था। लेकिन उसने हमें अपने घर आने का कभी मौका ही नहीं दिया था। वह कहता था कि उसकी पत्नी रत्ती भर भी सन्हेह नहीं होना चाहिए कि वह स्मगलर है। हम उसका बहुत सम्मान करते थे। इसलिए हम लोगों ने उसके घर आने की कभी कोशिश नहीं की।"

"जेल जाते समय शंकर ने हमें संदेश भेजा था कि हम टेलीफोन पर उसके मित्र के रूप में उसकी पत्नी का हाल.चाल मालूम करते रहें आज जब हमने टेलीफोन किया तो अपने इस दुर्घटना की सूचना दी इसलिए हम लोग यहां चले आये गोविन्द कुछ नहीं बोला उसका मस्तिष्क तेजी से काम कर रहा था। कुछ देर बाद उस आदमी ने फिर कहा.

"हमें क्षमा कर दीजिए बस...! अब आज्ञा दीजिए कि शंकर की पत्नी के क्रिया कर्म का प्रबन्ध करें।"

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"अच्छी बात है...प्रबन्ध करो। और एक आय की भी प्रबन्ध करो, जो इस मासूम बच्ची को पाल सके।"

"बहुत अच्छा बस।"

उन चारों के जाने के बाद गोविन्द ने

एक ठंडी सांस लेकर मोनू की ओर देखा, जो दीवार से टेक लगाए सहम हुआ खड़ा था। गोविन्द को अपने ओर देखकर उसने सहमी हुई आवाज में कहा. “अंकल...अंटी मर गई?"

"हां बेटे...आंटी मर गई"

"मुझे डर लग रहा है अंकल मैं अपनी मम्मी.डेडी के पास जाऊंगा।"

"घबराओ नहीं जल्दी ही पहुंचा देंगे मोनू चुप हो गया।

गुडिया के रोने की आवाज सुनकर मोनू बेचैन हो गया। उसने जल्दी से हाथ का प्याला रख दिया और कुर्सी से उतरकर पालने के पास पहुंच गया। उसने गुडिया को पालने से निकालने की कोशिश की तो वह

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बन्धन पालने समेत लुढ़क गया। गुडिया पूरी तरह से रो उठी।

गोविन्द ने चीककर कहा."यह क्या हो रहा है?"

मोनू सहम गया। गोविन्द ने झपटकर गुडिया को उठा लिया और गुस्से से मोनू को घूरते हुए बोला." पालने पर इतना जोर देते हैं? मासूम बच्ची है...न जाने कितनी चोट लगी होगी!"

"गुडिया रो रही थी अंकल...मैं उसे चुप कराने के लिए गोद मैं ले रहा था।"

"आया कहां मर गई?"

"आई मालिक!" आया दौड़ती हुई आई।

"बच्ची को इस तरह छोड़कर जाते हैं...तुम्हें यहां रखा किस लिए है?"

..

"मालिक, मैं जरा बाथरूम तक गई थी।"

"लो संभालो इसे...खबरदार जो आइन्दा इसे अकेली छोड़ा।"

आया ने जल्दी से गुड़िया को गोद में लिया और बाहर चली गई। तभी पीछे से एक आवाज सुनाई दी.

"बॉस...!"

"ओह, जयकिशन...क्या बात है?"

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"बहुत बुरी खबर है बॉस।...शंकर पुलिस की गोली से मारा गया।"

"व्हाट...!" गोविन्द बुरी तरह उछल पड़ा।

"जी हां बॉस। भाभी की मृत्यु और गुड़िया के पैदा होने की खबर सुनकर जेल से फरार होने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने गोली चला दी और शंकर जेल की ऊंची दीवार से गिर पड़ा।...हस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।"

"गोविन्द सन्नाटे में खड़ा रहा। जयकिशन न जाने क्या.क्या कहता रहा, लेकिन गोविन्द ने एक शब्द भी नहीं सुना। उसकी आंखों के आगे शंकर और मासूम गुडिया के चेहरे घूमते रहे।

"अच्छा बॉस, अब मैं चलूं?"

जयकिशन के जाने के बाद भी गोविन्द यूं ही खड़ा रहा।

अचानक मोनू उसकी टांगों से लिपट गया। गोविन्द एकदम चौंक पडा."अंकल, मुझे मम्मी.डैडी के पास ले चलिए।"

"मम्मी.डैडी। "गोविन्द ने ठंडी सांस लेकर कहा, “बेटे, अब तुम अपने डैडी.मम्मी के पास कभी नहीं जा सकते।"
 
"अंकल...!"

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"हां बेटे, तुम्हारे डैडी और मम्मी को उनके एक दुश्मन ने मार डाला...अब तो तुम्हें मेरे साथ ही रहना पड़ेगा।"

"नहीं अंकल, मैं मम्मी.डैडी के पास जाऊंगा। “मीनू ने रोते हुए कहा।

"बको मत, तुम उनके पास कभी नहीं जा सकते। “गोविन्द गुस्से से बोला।

मोनू सहमकर पीछे हट गया। और गोविन्द तेजी से दूसरे कमरे में चला गया।

बेबी ने कार से उतरते ही दीवार पर बैठी बिल्ली को देखा। उसकी आंखे चमक उठीं। उसने जल्दी से किताबें एक आर रख दी और ने पांव दबाकर दीवार के पास पहुंच गई। उसने बिल्ली को पकड़ने के लिए झपट्टा मारा, लेकिन बिल्ली की दुम ही उसके हाथ में आ सकी। बिल्ली गुर्रा कर पलटी और उसने बेबी के हाथ पर पंजा मार दिया। बेबी चीखकर पीछे हट गई। उसके हाथ से खून निकल आया।

"बेबी...! “पीछे से मोनू चीखता हुआ झपटा।

उसने जल्दी से बेबी का हाथ पकड़कर मसलते हुए कहा."क्या हुआ बेबी...क्या हुआ?"

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"बिल्ली...बिल्ली ने पंजा मार दिया।" बेबी सिसककर बोली।

__ “बिल्ली ने" मोनू की आंखें गुस्से से लाल हो गईं, “इस को मैं जिन्दा नहीं छोडूंगा जान से मार डालूंगा।"

मोनू ने ईंट के टुकड़े उठाए और दीवार पर बैठी बिल्ली का निशाना लेकर पूरी ताकत से ईंट फेंकी। पहला निशाना बिल्ली

के सिर पर पड़ा और बिल्ली चीखकर दीवार के पीछे जा गिरी।

तभी पीछे से गोविन्द की आवाज सुनाई

"मोनू...!”

मोनू घबराकर मुडा।

गोविन्द ने उसके पास आकर कहा." यह क्या बदतमीजी है, तुमने बिल्ली को क्यों मारा?"

"अंकल, इस बिल्ली ने बेबी को पंजा मारकर खून निकाल दिया था। मैं इसे जिन्दा नहीं छोडूंगा...इसे जान से मार डालूंगा।"

गोविन्द आश्चर्य से मोनू को देखने लगा। मोनू की आंखों मे बिल्ली के लिए घृणा और क्रोध था।

बेबी ने जल्दी से कहा."हां पापा, उसने मेरे पंजा मारा था...यह देखिए...इसलिए मोनू ने इसे मारा है...आप मोनू को मारिएगा नहीं।"

गोविन्द को बेबी की आंखों में मोनू के लिए गहरा प्यार दिखाई दिया। वह कुछ देर तक विचारों में डूबा चिन्तित मुद्रा में उन दोनों को देखता रहा। फिर अंदर की ओर चल दिया। कार के पास खड़ा जयकिशन भी उनके पीछे.पीछे अंदर चला गया।

अंदर पहुंचकर गोविन्द ने जयकिशन से कहा..."जयकिशन...अब बेबी काफी बड़ी हो गई है।"

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“जी हां बॉस...आपने उसे कितने प्यार से पाला है। उसे कभी भी शंकर की कमी महसूस नहीं होने दी।"

"इसके भविष्य की जिम्मेदारी मुझ पर है जयकिशन...तुम आज ही इसे कान्वेन्ट में एडमिट कराने का इन्तजाम करो।"

"लेकिन बॉस, वह यहां रह कर भी पढ़ सकती है।"

"नहीं जयकिशन, हमारी इच्छा है कि वह कान्वेन्ट में रह कर ही पढे। ताकि अच्छी शिक्षा मिल सके।"

"जैसी आपकी इच्छा बॉस।"

जयकिशन के जाने के बाद गोविन्द फिर विचारों में डूब गया।

बेबी का सामान कार में रख दिया गया। बेबी ने सिसकियां भरते मोनू की ओर देखा। मोनू की आंखें भी गीली थीं।

गोविन्द ने बेबी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा." जाओ बेबी, हम तुमसे मिलने आते रहेंगे।"

"पापा, मोनू को भी लाया करेंगे ना?"

"हां बेटी...!"

बेबी कार में जा बैठी और खिड़की से झांक कर मोनू को देखने लगी। मोनू की।

आंखों से आंसू बह चले। बेबी ने अपने आंसू पोंछते हुए हाथ हिलाया और जयकिशन ने

कार स्टार्ट कर दी।

मोनू का हाथ भी धीरे से हिला और कार फाटक से निकल गई। और फिर मोनू दोनों हाथों से मुंह छिपा कर रो पड़ा।

गोविन्द मोनू के पास आया। उसने मोनू के कंधे पर हाथ रखा। मोनू चौंककर जल्दी.जल्दी आंसू पोंछने लगा।

गोविन्द ने मोनू से कहा."मोहन, तुम मर्द हो और मर्द की आंखों में आंसू नहीं आने चाहिएं। रोना तो औरतों का काम है। अब तुम बच्चे नहीं रहे तुम्हें मालूम नहीं, भगवान ने तुम पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी डाली है।...मेरे साथ आओ।"
 
गोविन्द मोनू का हाथ पकड़कर उसे अंदर ले गया। उसने एक अल्मारी खोलकर उसमें से एक एलबम निकाला और एक फोटो पर उंगली रखकर बोला."जानते हो, यह कौन है?"

मोनू ने न के इशारे में सिर हिला दिया।

गोविन्द ने कहा."इस आदमी का नाम है मदन खन्ना...यही आदमी तुम्हारे डैडी और

मम्मी का हत्यारा है।...इसी जालिम ने मेरे दोस्त और तुम्हारे पिता की हत्या की थी।

और मेरे दोस्त ने मरते समय कहा। था...गोविन्द, मेरे बच्चे की जिम्मेदारी अब तुम पर है। जब मेरा बेटा बड़ा हो जाए, तो

उससे कहना कि वह अपने मां.बाप के हत्यारे से उनकी मौत का बदला जरूर ले।"

मोनू की आंखें फैली हुई थीं। क्रोध से उसके होंठ भिंचे हुए थे। नथुने फूले हुए थे। उसने मदन खन्ना के फोटो को दोनों मुटिठयों में कस रखा था।

उसने दृढ़ता भरे स्वर में कहा." भगवान की सौगन्ध, मैं अपने डैडी और मम्मी के हत्यारे से बदला लूंगा। उसे कभी क्षमा नहीं करूंगा।"

"शाबाश!" गोविन्द की आंखें चमक उठीं, “तुम सचमुच अपने माता.पिता की योग्य संतान हो। जब तुम उनके हत्यारे से उनकी मृत्यु का बदला ले लोगे, तभी उनकी आत्मा की शान्ति मिलेगी।

"मुझे इस आदमी का पता बताइए अंकल।"

"अभी नहीं, अभी तुम बच्चे हो। अभी तुम्हें ट्रेनिंग भी लेनी है।"

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गोविन्द ने मोनू के हाथ से फोटो ले कर रख दिया और दीवार से एक एयरगन उतार

कर मोनू को देते हुए कहा."लो संभालो इसे...मुझे विश्वास है कि तुम अच्छे निशानेबाज बन सकते हो।"

मोनू ने एयरगन ले ली। उसने आंख लगाकर इधर.उधर देखा। स्काई लाइट में उसे बिल्ली दिखाई दी। हल्की.सी ट्रिच की

आवाज हुई और बिल्ली तड़पकर फर्श पर आ गिरी।

मोनू ने इत्मीनान की सांस ली और एयरगन फिर 1 से लगा ली।

मोहन ने रिवाल्वर से निशाना लगाया और ट्रिगर दबा दिया। एक धमाका हुआ और मोहन की कार का पीछा करती हुई पुलिस

की जीप का एक टायर फट गया। जीप लहराकर रुक गई। जीप से कई फायर हुए, लेकिन मोहन ने कार को लहराकर बचा लिया।

कुछ देर बाद उसकी कार पुलिस की रेंज से निकल चुकी थी। मोहन ने रिवाल्वर को चूमा और इत्मीनान से ब में रख लिया। फिर वह स्अयरिंग पकड़े.पकड़े दूसरे हाथ से सिगरेट निकालने लगा।

फिर वह बड़े इत्मीनान से सिगरेट के कश लेता हुआ कार ड्राइव कर रहा था। दूर शहर की बत्तियां दिखाई देने लगी थीं। मोहन के होंठों पर संतोषपूर्ण मुस्कान नाच उठी।

फिर जैसे ही मोहन की कार शहर के नाके पर पहुंची। उसकी कार पर अचानक

चारों ओर से सर्चलाइट पड़ी। मोहन ने ठिठककर ब्रेक लगाए।

सड़क के दोनों ओर खड़ी गाड़ियों ने उसका रास्ता रोक रखा था। मोहन ने पलट कर पिछली खिड़की से देखा। पीछे भी गाड़ियां थीं। मोहन ने एक ठंडी सांस लेकर धीरे से कार आगे बढ़ाई।

अचानक एक तेज़ आवाज माइक पर गूंजी . “गाड़ी रोको, और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दो। वरना तुम्हारा बदन गोलियों से छलनी कर दिया जायेगा।"

मोहन के होंठों पर फिर मुस्कराहट उभर आई। उसकी गाड़ी धीरे.धीरे रेंगती रही।

अगली गाड़ियों के पास पहुंचते ही मोहन ने एक्सीलेटर दबा दिया और उसकी गाड़ी झन्नाटे से दायीं ओर उतर गई। कई फायर हुए। लेकिन मोहन की गाड़ी सुरक्षित रही

और ढलान में उछलती.कूदती दौड़ती चली गई। पुलिस की गाड़ियां भी उसके पीछे लग गईं।

पीछे से लगातार फायरिंग हो रही थी।

मोहन ने पलटकर देखा। एक गाड़ी उछलती.उछलती पलट कर जा गिरी। कई चीखें एक साथ गूंज उठीं। मोहन के होंठों पर जहरीली मुस्कराहट फैल गई।

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शेष गाड़ियां मोहन का पीछा करने लगीं।

मोहन ने रिवाल्व निकाला..... उसे चूमा ...... और फिर खिड़की से हाथ निकाल कर

फायर करने लगा। पिछली गाड़ियों की दो रोशनियां गायब हो गईं और गाड़ियों के एक.दूसरे से टकराने की आवाजें गूंज उठीं।

मोहन ने हल्का.सा कहकहा लगाकर स्पीड बढ़ा दी।

कुछ देर बाद मोहन की गाड़ी दूसरी सड़क पर पहुंचाकर शहर की ओर जा रही थी। वह स्पीड बढ़ाता चला गया...... अब उसकी गाढ़ी के पीछे कोई गाड़ी न थी।
 
सड़क पर पहुंचाकर मोहन ने गाड़ी रोक दी...... गाड़ी में बैठे.बैठे ही उसने अपना ओवरकोट उलट कर पहना, फेल्ट हैट उल्टा करके ओढ़ा और होंठो पर लगी मूंछे उतारकर ऊपरी जेब में रखीं। फिर गाड़ी से उतरा। उसकी नंबर प्लेटें सीधी की और सिगरेट सुलगाने लगा। अचानक उसके पीछे से तेज रोशनी पड़ी और साथ ही हार्न की तेज आवाज सुनाई दी।

मोहन ने तीली हवा में उछालकर पलट कर देख। एक गाड़ी उसके पास आकर रुकी। उसकी बत्तियां एक मिनट जल कर बुझ गईं। फिर गाड़ी की खिड़की से एक लड़की ने झांककर जोर से कहा .

"ऐ मिस्टर.... आप बहरे हैं क्या?"

" जो नहीं, लेकिन अगर कुछ देर आप की कृपा और रहती तो जरूर बहरा हो जाता।"

"सामने से हटिए।"

मोहन धीरे से एक ओर हट गया। गाड़ी रेंगती हुई उसके पास पहुंची और रुक गई।

गाड़ी के पीछे से उसे किसी के हांफने की आवाज सुनाई दी। मोहन ने गर्दन घुमाईं..... गाड़ी के पीछे एक नौजवान झुका हुआ । धक्का लगा रहा था। उसके दोनों हाथ पांव बराबर चल रहे थे....... लेकिन गाड़ी एक इंच भी नहीं चल रही थी।

मोहन के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई।

लड़की ने गर्दन निकालकर झल्लाए हुए स्वर में कहा .

"अरे ओ घोंचू...... जोर से धक्का लगाओ।"

नौजवान ने एक झटका लिया और दौड़कर खिड़की की के पास आकर बोला . "क्या कहा .....? घोंचू......? मैंने कितनी बार कहा है कि मेरा नाम घुघरु चंद है, घोंचू

नहीं।"

"घुघरु चंद के बच्चे .... मैं कहती हूं धक्का लगाओ।"

.

.

"रीता ..... शादी से पहले मैं तुम्हें गाली गलोज की अनुमति नहीं दे सकता।" घुघरु ने बुरा मान कर कहा,, “शादी के बाद पति को गाली देना पत्नी का सामाजिक अधिकार बन जाता है"

"नानसेन्स ..... मै कहती हूं धक्का लगाओ।" रीता ने दांत किटकिटाकर कहा।

"मुझसे नहीं लगाया जाता धक्का," घुघरु हांफ कर बोला, "दो मील से धक्का लगाता आ रहा हूं।"

"अरे, तो हय गाड़ी पेट्रोल पम्प तक कैसे पहुंचेगी?"

"सुनिए," मोहन ने रीता से कहा, "क्या आपको इन साहब से किसी तरह की दुश्मनी है?"

"क्या मतलब?" रीता भिन्नाकर बोली।

"मुझे तो ऐसा ही मालूम होता है।"

"वह कैसे मिस्टर?" घुघरु ने मोहन को घूरकर पूछा।

___ "अरे, तो क्या आप यह समझते हैं कि पेट्रोल पम्प तक धक्का लगाते.लगाते आप जिन्दा रह जाएंगे? जरा अपनी हालत तो देखिए..... जानते हैं यहां से पेट्रोल पम्प कितनी दूर है।"

"कितनी दूर है?"

"लगभग दो मील और होगा।"

"अरे बाप रे!" घुघरु पेट पकड़कर कराहने लगा।

रीता ने भिन्नाकर दरवाजा खोला और नीचे उतरकर मोहन से पूछा . “ऐ मिस्टर.....

आप कौन हैं?"

"मैं एक राहगीर हूं।"

"मैं पूछती हूं हम दोनों के बीच दखल देने वाले आप कौन होते हैं?"

"हां, यह तो मैं भूल ही गया था।" घुघरु ने जोशीले स्वर में कहा, 'क्योंजी, आपने हम दोनों के मामले में दखल क्यों

दिया?"

"इसलिए कि मैं नहीं चाहता कि आपकी मंगेतर विवाह से पहले ही विधवा हो जाए।" मोहन ने मुस्कराकर कहा।

"दिमाग तो नहीं खराब हो गया आपका।" रीता ने भिन्नाकर कहा।

"दिमाग तो जरूरत खराब हो गया है वरना मैं यह क्यों सोचता कि आप लोगों की इस परेशानी में सहायता करनी चाहिए।"

"क्या सहायता कर सकते हैं आप?"

"धक्का लगवा देता गाड़ी में।"

“ए मिस्टर, मेरे होते हुए आप कौन होते हैं धक्का लगाने वाले? मैं रीता का मंगेतर

__ "तुम चुप रहो," रीता ने घुघरु को डांटा

और फिर मोहन से बोली, "अगर आप सहायता कर सके हैं, तो कीजिए।"

"आपकी गाड़ी में क्या खराबी है?"

"पेट्रोल खत्म हो गया।"

*

"ठहरिए मैं आपको इतना पेट्रोल दिए देता हूं कि आप पेट्रोल पम्प तक पहुंच जाएं।"

"बहुत.बहुत धन्यवाद......।"

.

.
 
मोहन ने अपनी कार की डिग्गी खोली...... पहले बारह बोल्ट की एक बैटरी को टटोलकर देखा और फिर पेट्रोल का एक टिन निकाल कर रीता के पास आ गया।

"इस टिन में पांच लीटर पेट्रोल है। आप ले लीजिए। लेकिन मेरी एक शर्त है।"

"कैसी शर्त? अगर आप चाहें, तो इसकी कीमत ले लीजिए।" रीता ने कहा।

.

.

.

"हां हां कीमत दे दूंगी..... नहीं नहीं दे दूंगा।" घुघरु जल्दी से बोला।

"जी नहीं मुझे कीमत नहीं चाहिए..... अच्छा रहने दीजिए..... मेरी कोई शर्त नहीं है।"

"नहीं नहीं, आप बताइए।"

"आप अपनी टंकी का लॉक खोलिए।"

रीता ने विचित्र.सी नजरों से मोहन को देखा और टंकी का लॉक खोल दिया। मोहन ने उसमें पेट्रोल डाल दिया।

“अब आप जा सकती है।" मोहन ने मुस्कराकर कहा।

"धन्यवाद, अगर आप पेट्रोल पम्प तक चलें, तो मैं आपको पेट्रोल खरीदकर दे दूंगी।"

"जी नहीं, धन्यवाद।" रीता ने फिर विचित्र.सी नजरों से मोहन को देखा और गाड़ी में जा बैठी। चूंघरु भी झपटकर उसके बराबर जा बैठा। मोहन ने रीता की गाड़ी की डिग्गी खोली और अपनी गाड़ी की डिग्गी में से बैटरी निकाल कर रीता की गाड़ी की डिग्गी में रख दी। डिग्गी के बंद होते.होते रीता की गाड़ी फर्राटे भरती हुई दूर चली गई।

मोहन ने इत्मीनान से अपने दोनों हाथ झाड़े और अपनी गाड़ी में आ बैठा। कुछ देर के बाद उसकी गाड़ी फिर दौड़ रही थी। वह रीता से विपरीत दिशा में जा रहा था। उसने रीता की गाड़ी के नम्बर अच्छी तरह याद कर लिए थे।

अगले नाके पर पहुंचते.पहुंचते मोहन की गाड़ी को पुलिस की एक पेट्रोल कार ने रुकने का इशारा किया। मोहन ने गाड़ी रोक दी। और दूसरे ही पल एक इंस्पेक्टर ने कुछ कांस्टेबलों के साथ मोहन की गाड़ी घेर ली। इंस्पेक्टर के हाथ में रिवाल्वर था।

___ उसने गाड़ी का निरीक्षण करते हुए कहा

"वही रंग...... वही माडल ......!"

"क्या बात है इंस्पेक्टर साहब?" मोहन ने बड़े शान्त भाव से पूछा।

"आप जरा नीचे उतरिए।"

मोहन बड़े इत्मीनान से नीचे उतर आया। इंस्पेक्टर मोहन को घूर कर देखने लगा।

मोहन ने मुस्करा कर कहा .

"कोई विशेष बात?"

इंस्पेक्टर ने कांस्टेबलों से कहा . "तलाशी लो।"

कांस्टेबल मोहन की गाड़ी की तलाशी लेने लगे। इंस्पेक्टर गाड़ी की नम्बर प्लेट देखने लगा।

मोहन ने सिगरेट केस निकालकर इंस्पेक्टर की ओर बढ़ा दिया।

"आपको शायद किसी अपराधी की तलाश है..... सिगरेट.....!"

.

.

"धन्यवाद..... मैं सिगरेट नहीं पीता।", इंस्पेक्टर ने रूखे स्वर में कहा।

मोहन ने सिगरेट सुलगा ली।

कांस्टेबल गाड़ी की तलाशी ले चुके थे। एक कांस्टेबल ने कहा .

"इसमें तो कुछ भी नहीं है साहब।"

"आश्चर्य है।" इंस्पेक्टर मोहन को घूरकर बड़बड़ाया।

"किस बात का आश्चर्य? मुझे भी तो कुछ बताइए।" मोहन मुस्कराकर बोला।

"आप कहां से आ रहे है?"

"रामनगर से।"

"यहां कहां रहते है?"

"जुबली क्लब।"

"जुबली क्लब .... लेकनि वह तो होटल नहीं क्लब है?'' इंस्पेक्टर ने चौंककर कहा।

"जी हां क्लब ही है.... मैं उस क्लब का मैनेजर हूं.... मुझे मोहन कुमार कहते

"जुबली क्लब तो.....?"

"गोविन्द राम जी का है.... आपके एस. पी. साहब के गहरे मित्र है गोविन्द राम जी

और वह मेरे अंकल है।"

"एक्सक्यूज़ मी मि. मोहन," इंस्पेक्टर ने क्षमा याचना करते हुए कहा, "असल में हमें एक मुजरिम की तलाश थी, जिसका संबंध स्मगलरों के एक बहुत बड़े गिरोह से है। थोड़ी देर पहले ही पुलिस से उसकी मुठभेड़ हुई थी। लेकिन वह भागने में सफल हो गया। शहर की ओर आया था। इसलिए गश्ती पुलिस को सावधान कर दिया गया था। उसके पास भी इसी माडल की गाड़ी थी।"

"इस माडल और इस रंग की गाड़ियां तो शहर में लगभग दो.तीन सौ होंगी।" मोहन मुस्कराया।

"मैं एक बार फिर इस कष्ट के लिए माफी चाहता हूं।"

"माफी की कोई बात नहीं इंस्पेक्टर साहब, आपने अपना कर्तव्य निभाया है। अब तो सिगरेट पी लीजिए। आपकी उंगलियां और होंठ बता रहे हैं कि आप सिगरेट पीते हैं।"

इंस्पेक्टर ने हँस कर सिगरेट ले ली।

मोहन ने उसका सिगरेट सुलगाकर तीली चुटकी से उछालते हुए कहा . “अब तो इजाजत है?"

"जरूर जनाब..... मैं एक बार फिर माफी चाहता हूं।"

मोहन कार में जा बैठा।

कुछ देर बाद उसकी कार सड़क पर तेजी से दौड़ रही थी।

रीता की गाड़ी पोर्टिको में पहुंच कर रुक गई। नौकर दौड़कर गाड़ी के पास आ गए। रीता गाड़ से उतर आई।

एक नौकर ने उसे सलाम किया।

"आप आ गईं मालकिन?"

" हां काका, डैडी कहां हैं?"

"वे तो क्लब में हैं मालकिन।"

“आज भी क्लब में ही है?" रीता ने गुस्से से कहा, "क्या उन्हें मालूम नहीं था कि मैं आ रही हूं?"

"मालूम तो था, लेकिन उन्हें कोई जरूरी काम निकल आया था। कुछ मिनट पहले ही गए है।"

"जल्दी से सामान उतरवाकर कार साफ करा दो..... मैं इसी समय क्लब जाऊंगी।"
 
"इतनी जल्दी क्या है बेबी। आप थकी हुई है। मालिक थोड़ी देर में आ ही जायेंगे।

आप आराम कीजिए।"

"नहीं काका, मैं इसी समय क्लब जाऊंगी।"

"जैसे आपकी इच्छा।'

नौकर सामान उतारने लगे।

मोहन ने सिगरेट होंठों के एक कोने में लगाया और आंख से निशाना लेकर स्टिक चलाई। बिलियर्ड बॉल दूसरी बॉल से टकराई

और दूसरी बाल लुढ़कती हुई एक खाने में चली गई।

"वैलडन..... वैलडन।" चारों ओर से तालियों का शोर उभरा।

मोहन ने स्टिक पर खरिया लगाई और निशाना लगाने लगा, तभी पीछे जयकिशन ने

उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

"क्या बात है जयकिशन?" मोहन ने

पूछा।

"आपको बॉस याद कर रहे है।"

"आता हूं।"

मोहन ने निशाना लगाया। गेंद खाने में चली गयी। मोहन ने स्टिक रख दी और एक

ओर चल दिया।

एक कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर मोहन ने सिगरेट गिराकर जूते की टोह से रगड़ दी

और दरवाजा नॉक किया।

अंदर से आवाज आई .

"आ जाओ।"

मोहन दरवाजा खोल कर अंदर चला गया। रिवाल्विंग चेयर पर बैठा गोविन्द राम सिगार पी रहा था।

मोहन ने पास जाकर कहा . “गुड ईवनिंग अंकल!"

"ईवनिंग.....," गोविन्द राम मुस्कराकर बोला, "थोड़ी देर पहले ही मुझे रॉकी से फोन पर सूचना मिली झी कि तुम पुलिस के घेराव में आ गये थे।"

"हां, आ तो गया था, लेकिन निकल गया..... मुझे पहले ही यह महसूस हो रहा ज्ञा कि आज जहां माल जा रहा है, वहां जरूर कोई.न.कोई झंझट सामने आयेगा। इसलिए मैंने रॉकी को स्पॉट से काफी दूर छोड़ दिया था, ताकि वह मुझ पर नज़र रखे और किसी तरह की आंच आने पर आपको सूचित कर दे।"

"मुझे विश्वास था कि तुम पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सकते। फिर भी चिन्ता तो थी ही इसलिए मैं यहां चला आया था।"

"अंकल, जब तक यह रिवाल्वर और

यह हाथ सलामत है, मुझ पर कोई हाथ नहीं डाल सकता।" मोहन ने रिवाल्वर निकालकर उसे चूमते हुए कहा।

___ "मुझे तुम पर पूरा.पूरा भरोसा है मोहन..... माल कहां है?"

"ऐसी दिशा में माल स्पॉट पर तो पहुंचाया नहीं जा सकता था और शहर में वापस लेकर जाना भी खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि हर नाके पर पुलिस के दस्ते मौजूद थे। एक नाके पर मुझे कार की तलाशी जी देनी पड़ी।"

"ओह ..... तो क्या माल.....?"

"नहीं अंकल।" मोहन मुस्कराया, "पुलिस की तलाशी लेने से पहले ही मैंने माल कार से हटा दिया था।"

“फिर माल कहां है? जानते हो, पूरे पचास लाख का माल है।"

"जानता हूं। माल जहां भी है, सुरक्षित

"क्या मतलब?"

"मैंने माल एक कार की डिग्गी में रख दिया था, जिसे एक लड़की ड्राइव कर रही

थी। वह मुझे माल रोड पर मिली थी। उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया था। उसने मुझसे पेट्रोल लिया था और तभी उसकी

आंख बचाकर मैंने माल उसकी गाड़ी की डिग्गी में रख दिया था।"

"लेकिन उस कार को हम ढूंढेंगे कहां?"

"मैंने उसका नम्बर याद कर लिया है, बड़ी आसानी से मिल जायेगी।"

-

-

"क्या नम्बर है?"

मोहन ने नम्बर बताया, तो गोविन्द राम एकदम उछल पड़ा।

"इस नम्बर की कार में माल रखा था तुमने?"

"जी हां, क्या आप उस लड़की को जानते हैं?"

'बहुत अच्छी तरह।"

"बस, फिर तो और भी ज्यादा आसानी हो गई। कौन है वह लड़की?"

"मेरे एक मित्र की बेटी है।"

"मुझे पता बता दीजिए, मैं माल ले आऊंगा।"

"नहीं तुम रहने दो, मैं मंगा लूंगा।..... और हां। तुम्हारी गोली से कोई मरा तो

नहीं?"

+

"नहीं अंकल, आपको तो याद होगा कि मैंने इस बात की कसम खाई है कि मेरी गोली से जिस पहले व्यक्ति की मृत्यु होगी, वह होगा मेरे माता.पिता का हत्यारा.... और उसके बाद शायद मैं कभी रिवाल्वर न चलाऊंगा..... आप मुझे उसका पता कब बतायेंगे?"

"जब समय आयेगा।"

"समय कब आयेगा अंकल?"

"बेटे, मैं स्वयं बड़ी बेचैनी से उस घड़ी का इंतजार कर रहा हूं। मदन खन्ना अपनी

आंखों का इलाज कराने अमेरिका गया हुआ है। जैसे ही वह आयेगा, मैं बता दूंगा।"

"अच्छी बात है अंकल।"

"अब तुम जा सकते हो, मैं भी आज यहां अधिक देर तक नहीं ठहर सकता। घर पर कुछ मेहमान आने वाले हैं।"

___ मोहन कमरे से निकल आया। वह हॉल के दरवाजे में पहुंचा था कि अचानक उसकी निगाहें सदर दरवाजे पर पड़ी..... रीता उस दरवाजे से अंदर आ रही थी। वह चौंक उठा। रीता एक बैरे को रोक कर कुछ पूछने लगी।
 
बैरे ने एक ओर हाथ उठाकर रीता को कुछ बताया। रीता उसी ओर बढ़ने लगी। मोहन जहां था, वहीं खड़ा रीता को देखता रहा। वह सोच रहा था कि रीता यहां क्यों आई है? क्या उसकी तलाश में आई है? नहीं, भला उसे क्या मालूम कि मेरा इस क्लब से किसी प्रकार का कोई संबंध है। संभव है, मन बहलाव के लिए आई हो।

रीता एक गैलरी में चली गई।

अचानक वह बैरा मोहन के पास से गुजरा, जिससे रीता ने कुछ पूछा था।

मोहन ने उसे पुकारकर रोक लिया।

"वह लड़की अभी तुमसे कुछ पूछ रही थी?"

"साहब, वह बॉस का आफिस पूछ रही थी।"

"बॉस का आफिस?"

मोहन के मस्तिष्क को एक झटका.सा लगा...... 'यह लड़की अंकल का आफिस क्यों पूछ रही है? कौन है यह लड़की?'

अचानक किसी अनजाने विचार से मोहन के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। वह दूसरी गैलरी से गोविन्द के आफिस की ओर चल दिया।

गैलरी में पहुंचते ही मोहन ने रीता को दरवाज़ा खोलकर गोविन्द के आफिस में जाते हुए देखा।

मोहन दबो पांव उस दरवाजे की ओर बढ़ा और उसके पास पहुंचकर एक ओर खड़ा हो गया।

__ दरवाजे में पांव रखते ही रीता ने गोविन्द को देखा। वह किसी सोच में डूबा सिगार के हल्के.हल्के कश ले रहा था।

रीता ने पुकारा, "पापा.....!"

गोविन्द बुरी तरह चौंक पड़ा और हड़बड़ाकर एकदम खड़ा हो गया।

"रीता बेटी, तुम.....?"

“पापा....!" रीता आगे बढ़कर गोविन्द से लिपट गई।

गोविन्द ने रीता का माथा चूमा और घबराई हुई मुद्रा में दरवाजे की ओर देखते हुए बोला .

-

"तुम यहां क्यों आई बेटी?"

"मैं इतने दिन बाद आई लेकिन आपने मेरा इंतजार भी नहीं किया। क्या आपको

अपनी बेटी से प्यार नहीं है?" शिकायत भरे स्वर में रीता बोली।

"यह तुम क्या कह रही हो बेटी? अपनी बेटी से किसे प्यार नहीं होता। कुछ जरूरी काम आ गया था, इसलिए मैं यहां चला आया, बस पहुंचने ही वाला था। लेकिन तुम यहां क्यों चली आईं?"

"आप घर पर नहीं मिले, इसलिए यहां चली आई। पिछले छः महीने से आपको देखा नहीं है। ..... लेकिन आप बार.बार यह क्यों पूछ रहे है?..... अगर मैं यहां चली आई, तो हुआ क्या?"

"कुछ नहीं बेटी...... मैं तो यूं ही पूछ रहा था।"

"नहीं पापा, सच.सच बताइए, आप मुझे अपने से दूर क्यों रखना चाहते हैं? छोटी.सी उम्र में ही आपने मुझे पढ़ने के लिए इतनी दूर भेज दिया और छः महीने में कुल एक बार मुझे देखने आते रहे। लेकिन मुझे छुट्टियों में भी घर आने नहीं दिया। एक.दो बार छुट्टियों में आई भी तो एक दो दिन भी यहां रहने नहीं दिया फौरन कभी काश्मीर भेज दिया और कभी नैनीताल..... आखिर आप मुझसे दूर.दूर क्यों रहते हैं पापा? क्या बेटी का इतना भी अधिकार नहीं कि अपने बाप के पास चार दिन रह सके। आप मुझ पर हज़ारों रुपए खर्च करे हैं, मेरे लिए आपने कार भी खरीद कर भेज दी। लेकिन इनसे मुझे वह सुख तो मिल नहीं सकता, जो आपके पास रहने से मिल सकता है।"

"यह तू क्या कह रही है बेटी? तेरे सिवाय इस भरी दुनिया में मेरा और है ही

कौन? मैं चाहता हूं कि तू खूब पढ़े लिखे...... मैं तो पढ़ाई के लिए तुझे योरोप भेजने वाला हूं।"

"नहीं पापा, मैंने बी.ए. कर लिया। हुत है। अब मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।"

रीता ने गोविन्द के गले में बांहें डाल दीं। गोविन्द ने उसका माथा चूमकर प्यार भरे स्वर में कहा, "अच्छा बेटा, न जाना..... लेकिन जब तेरी शादी घुघरु के साथ हो जायेगी, तब तो तुझे जाना ही पड़ेगा।"

"ओह पापा, आपने यह किस डफर को मेरे पीछे लगा दिया। जब से उसे यह मालूम हुआ कि आप उसके डैडी के मित्र हैं और

आप मेरी शादी उसके साथ करना चाहते हैं, वह सारे कॉलेज में गाता फिर रहा है कि मैं उसकी मंगेतर हूं। मुझे किसी लड़के से बात तक नहीं करने देता।"

"बेटी, घुघरु बहुत बड़े आदमी का बेटा है..... उसका बाप यहां का एस. पी. है। अच्छा खानदान है। इसीलिए मैंने उससे तुम्हारा रिश्ता.तय किया है। क्या वह तुम्हें पसन्द नहीं है?"

"पसन्द और नापसन्द का प्रश्न नहीं है पापा..... घुघरु तो एकदम आउट आफ आर्डर रहता है। आते समय मेरे सिर पड़ गया है कि कार से अकेले नहीं जाने दूंगा। मेरे साथ ही आया। यहां पहुंचते ही कहने लगा कि मैं पापा जी का आशीर्वाद लेकर ही अपने घर जाऊंगा। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे उसकी कोठी पर छोड़ा।'

गोविन्द हंस दिया।
 

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