• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

पापा ने जैसे ही ये कहा मेरे सामने फ़िर एक बार मीनल आ गयी, क्या मीनल ही है जिसे मैं तलाश रहा था. लेकिन वो तो बिल्कुल भी वैसी नहीं जैसी लड़की के लिये मैं सब से कहता हूँ; इनफैक्ट वो तो सब से अलग है. उसकी हंसी में अब भी किसी मासूम बच्चे की झलक, दिखती है, और इतनी सहनशक्ति तो मैंने किसी मे नहीं देखी; मुझे पता नहीं क्यों वो अब नव्या से कहीं ज्यादा सुंदर लगने लगी थी;।

"क्या सोचने लगा. ? देख ले बेटा. हो सकता है तेरे आस पास कोई हो..तेरे जैसा..ऐसा न हो कि देर हो जाये और तूझे पछताना पड़े"

"पापा आप ही कुछ हेल्प कीजए न. मुझे कुछ, समझ नहीं आ रहा" मैं मायूस था।

" हम्म्म्म. नव्या से बात चलाऊ फ़िर.. वो बिल्कुल तेरे टाइप की है. जैसी तुझे पसंद हैं वैसी; " पापा मेरे साथ खेल खेलने लगे।

" पापा नहीं? बिल्कुल नहीं. मैं सोफे से उठ के हाथ जोड़ते हुए बोला" और पापा मुस्कुरा दिए।

"हम्म्म्म. फ़िर तो और कोई है नहीं यहां;मीनल जैसी तुझे चलेगी नहीं.. तेरे स्टैण्डर्ड की कहाँ वो.." पापा ने अपने चेहरे पे सोचने न नाटक करते हुए कहा।

"नहीं पापा . मीनल बहुत अच्छी है" मैं कुछ ज्यादा ही चहक के बोला. औऱ पापा हंस पड़े।

" ठीक से सोच ले बेटा. उस टाइप की लड़की खोजी तो तू शादी नहीं कर पायेगा; तू ही बता तू क्या मीनल के साथ पूरी जिंदगी बिता सकेगा. नहीं ना!!"

" क्यों नहीं पापा; उसके साथ तो मैं पूरी लाइफ ऐसे ही राह सकता हूँ. वो मेरे साथ होती है ना तो सब अच्छा लगता है, और जब वो नहीं दिखती ना तो मुझे बहुत बेचैनी हो जाती है"

जो बात मैं खुद को समझा नहीं पा रहा था, पापा ने बड़े आराम से उगलवा ली।

" तू कहना क्या चाहता है; मीनल से शादी कर लेगा . नहीं बेटा .. वो तेरे टाइप की नहीं. और वो तेरी नहीं हो सकती. तू अगर चाहे भी तो" पापा इस बात चिंता जताते हुए बोले।

" पापा वो मेरी नहीं हो सकती, मैं तो उसका हो सकता हूँ ना. मुझे उसकी खुशी चाहिए; जब वो उदास दिखती है ना. तो मैं तड़प जाता हूँ. मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है"

"क्यों कि तू उसे पसंद करता है. बोल कर सकेगा उस से शादी.. सब कुछ जान के भी"

मेरी धड़कने बहुत तेज़ हो गयी, मीनल को अपनी जीवनसंगिनी के रूप में देख के,; जिसको एक बार छू लेने पर मेरी हालत खराब हो गयी थी, क्या उस के साथ जीवन यापन हो पायेगा. उस के साथ रहना भी था , और शादी का सोच कर घबराहट भी हुई;

"मीनल बहुत प्यारी है बेटा. उसे कभी तकलीफ मत देना. तेरे पास दो दिन हैं अभी सोचने के लिए. कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं". मैं चुप हो कि सुनता रहा फिर याद आने पर पूछा।

"पापा मीनल के दादाजी. क्या हुआ उनके साथ??. वो आज खुद को उनकी हालत का जिम्मेदार ठहरा रही थी. मुझे बताइये न पापा ऐसी क्या तकलीफ है उसकी जिंदगी में. "

" ज़रूर बताऊंगा, लेकिन सही वक्त आने पर. मैं नहीं चाहता कि मेरी बच्ची को कोई भी तरस खा कर पसंद करे या अपनाए. जो उसे पसंद करेगा वो उसे हर हाल में स्वीकारेगा. तुम अभी जितना कहा उतना ही करो. खुद को पहचानो"

मैंने हामी भरी फिर उन्हें बताया कि मीनल के साथ घूमने जाने का प्लान है उनकी कार उधार चाहिए।

पापा ने मेरा माथा चूम के हामी भरी और मीनल के साथ कुछ भी गलत न करने की हिदायत भी दी।

मैं कमरे में आ के कपडे बदल के लेट गया।

पापा की कही बातें, मीनल के साथ बिताया पल सब याद आने लगा; इतना मैं समझ गया था कि मीनल मेरे लिए बहुत ही खास हो गयी है , लेकिन प्यार और शादी का सोच कर अब भी अंदेशे में ही था।

आंखें बंद की तो मीनल मुस्कुराती दिखी, मैंने अनजाने में ही उसे छू लेने के लिए हाथ बढ़ा दिए. और फ़िर उसकी छुअन को महसूस कर के तड़प उठा।

कैसी विषम स्थिति थी मेरी, मुझे हर जगह मीनल दिखती, उसे महसूस करना चाहता, उस के साथ रहना चाहता.. लेकिन वो तो बस खयालों में थी मेरी भवनाओं से परे. अपने ही ग़म में सीमित. उस परिधि से बाहर निकलने के लिए हम दोनों को इस पवित्र प्रेम की अनुभूति होना ज़रूरी था।

मैं तड़प के अपने बिस्तर पे करवटें लेता रहा, जैसे एक क्षण भी मीनल के बिना जीवन व्यर्थ हो, कभी सीने की टीस को दबाता, कभी सिहरन होने पर अपने पेट पे हाथ फेरता..

लहंगे में भागती मीनल दिखती तो अपने हाथों से घेरा बना के उसे जकड़ लेता कि वो गिर न जाये और अगले ही पल उसकी छुअन महसूस होते ही सिहर उठता।

मैंने अपना मोबाइल निकाल लिया और उसकी वीडियो देखी एक बार, दो बार, तीन बार; न जाने कितनी बार. हर बार मुझे वो और प्यारी. और प्यारी लगती रही।

उसकी फोटो याद आयी तो देखने लगा. जब वो मुझे देख रही है, और जब पलकें झुकी हुई हैं; शरम से सुर्ख गाल. इतनी सुंदर वो अब हुई या मेरी नज़रों को सुंदरता के मायने ही नहीं पता थे।

" क्या सच मे तुम मेरे साथ पूरे जीवन भर रहने के लिए बनी हो मीनल; क्या तुम्हें भी ऐसा एहसास होता है, ऐसी तड़प होती है मेरे साथ हो कर या मुझसे दूर रह कर; बोलो न मीनल" मैं उसकी फोटो से नज़रें मिला के बात कर रहा था।

न जाने किस प्रेरणा वश मैं उसकी फोटो को चूमने को उतावला हुआ, अपने होठों को उस की फ़ोटो के होठों के करीब लाया और रुक गया; ऐसा लगा जैसे वो सामने ही हो, मैं काँपने लगा, धड़कनों की रफ्तार बढ़ चुकी थी; और मैं पीछे हट गया।

"आई एम सॉरी मीनल "; इतना गंदा खयाल मुझे आया भी कैसे. खुद पर शर्मिंदगी होने लगी मुझे;इस मौसम में भी पसीना पसीना हो गया। जब कुछ समझ नहीं आया तो बाथरूम में शावर के नीछे खड़ा हो गया।

मुझे मेरी बीमारी अब थोड़ी समझ आने लगी थी. लेकिन मैं इसे प्यार मानने को तैयार नहीं था. सच कहूं तो कभी प्रेम का ऐसा एहसास हुआ नहीं था तो समझता भी कैसे।

किसी तरह मैं सोया. इस खुशी में कि कल मीनल के घर जाऊंगा।

सुबह उठा तो थोड़ा ठीक महसूस किया और रोज़ की ही तरह जॉगिंग पे निकल पड़ा। नज़रें मीनल को खोज रही थीं। आज मैंने महसूस किया कि दो औरतें मुझे देख कर इशारे में कुछ बोल रही हैं, उनके हाव भाव से तारीफ तो नहीं लगी।

मुझे अच्छा नहीं लगा लेकिन मैं आगे बढ़ता गया।
 
समय अपने गर्त में कुछ न कुछ छुपा के रखता है फ़िर चाहे वो अच्छा हो या बुरा. हमे उस समय से गुज़रना ही होता है. मेरे लिए क्या छुपा था इस बात से अनजान मैं अपने आज को संवार रहा था।

आज मीनल का कुत्ता गेट के अंदर होने के कारण मेरे साथ दौड़ने लगा, मुझे भी उस के साथ मज़ा आ रहा था। मैं जैसे जैसे भागता वो मेरा पीछा करता और उछल कर मेरे पास आना चाहता।

मुझे मीनल आती दिखी तो रात की सब बातें याद आ गयी और मैं असहज हो गया। खुद को सामान्य दिखाने के लिए मैं कुत्ते के साथ खेलने का नाटक करता रहा, समझ नही आ रहा था कि मीनल से सामना कैसे करूँगा। मीनल ने आते ही नए साल की बधाई दी, मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की और उसे बधाई दी। मेरा बदल व्यवहार उसे अजीब लगा।

" आज तुम ऐसे क्यों वर्ताव कर रहे हो. "

"नहीं कुछ भी तो नहीं. मैंने उस से नज़रें चुराई"; उसे देख कर कोई भी ऐसी गलती नहीं करना चाहता था जिस से वो मुझे गलत समझे।

" अरे मेरा बच्चा; आज मज़े में हैं. क्या खाना है, रोटी? या बिस्कुट. चल अब बाहर चलते हैं; ज्यादा देर तू यहां रहा न तो सोसाइटी वाले हंगामा कर देंगे"

मीनल ने मुझे अपनी थाली पकड़ाई और कुत्ते को गोदी में लिए गेट के बाहर चल दी. और मैं परछाईं सा उस के पीछे हो लिया।

आज उसने मुझसे गाय को रोटी खिलाने को कहां. मैं थोड़ा डरता हुआ उसे रोटी खिलाने लगा तो वो हंस पड़ी;" गाय से कौन डरता है" मैंने एक नज़र उसे देख के दिल भरा और नज़रें नीची कर के बोला.. " लग रहा है तो क्या करूँ"

उसने झट से मेरा हाथ पकड़ा और गाय की पीठ के रखवा दिया. उसे तो पता भी नहीं था कि उस के छू लेने भर से मेरे अंदर बिजली आई कौंध जाती है; मैं मुँह खोले उसे देखने लगा. गाय के ऊपर अपने हाथ होने का आभास ही नहीं था तो डर भी कैसे लगता। इस पल तो शेर भी होता तो शायद मुझे नहीं दिखता; मेरी आँखों मे बदली भवनाएं शायद झलकने लगी थी. मीनल ने मुझे खुद को इस तरह देखते हुए नज़रें झुका ली। फ़िर मैं जाती हूँ अब कह के चली गयी; मैं गधों की तरह वहीं खड़ा रहा गाय की पीठ पे हाथ रखे।

होश तब आया जब गाय ने "अम्मा;" कहते हुए मेरे हाथ पे अपनी जीभ फेर ली; और मैं डर पीछे की तरफ कूद गया।

मेरी धड़कने फ़िर बढ़ गयी लेकिन इन बार गाय को देख के.

मैं वापस अंदर भागा;" मीनल ऐसे बिना बताए क्यों चली गयी??. लेकिन वो गयी कब. ?" मुझे ये याद ही न रहा तो सवालों के जवाब खोजते हुए घर आ गया।

कल सिगरेट नहीं पी पाया था तो आज पापा के साथ बैठ के चाय पीने लगा।

" क्या बात है पुत्तर.. तुझे तो सुबह ये सब पीने की आदत नहीं. आज क्या हुआ" मम्मी बोली।

" बस ऐसे ही मम्मी. " उन्हें क्या बताऊँ की बुरी लत लग गयी है.. हालांकि मै एक सीमा में ही पीता था,लेकिन गलत चीज़ तो गलत ही हुई।

" सुन पुत्तर. वो तेरे लिए 3 फ़ोटो आयी हैं लड़कियों की, 2 से कुंडली मैच हो गयी है. तू दोनो का बायोडाटा देख के बता. मैं आगे बात बढाऊंगी फ़िर"

सुबह सुबह ऐसी बातों से मन खराब हो गया. मुझे किसी को देखना नहीं था अब, और मीनल के सिवा जंचती भी कोई नहीं. लेकिन शादी के लिए मैं तैयार नहीं था।

"मम्मी प्लीज आप सुबह ही शुरू हो गए; मुझे नहीं करनी किसी से शादी"

" तो क्या सन्यास लेगा अब!!" मम्मी गुर्राई और पापा हंस दिए।

" बेटा अपनी मम्मी की खुशी के लिए देख लो.. क्या पता कोई पसंद आ जाये. " पापा बोले।।

" पापा मुझे सिर्फ मि. " मैं बोलते बोलते रुक गया; ये क्या कहने जा रहा था मैं; अपने सिर पे एक हाथ रख लिया मैंने, हो क्या गया है मुझे आखिर।

"क्या मुझे सिर्फ मि. इसका क्या मतलब?. तू जब से यहां आया है तेरे सारे लक्षण ही बदल गए हैं. मैं देख रही हूँ"

मैं चुप रहा , पापा ने मम्मी को भी इशारे से चुप होने के लिए कहा।

" ये फ़ोटो और बायोडाटा साथ लेते जाओ कमरे में और देख के पढ़ के सोच लो. मैंने तुम्हें कल रात ही समझाया था, अब बाकी तुम्हारी मर्ज़ी।"

मैं कमरे में आ गया. लिफाफा खोल के दोनों फ़ोटो देखी. एक फोटो नव्या की निकली. मुझे गुस्सा आ गया और फ़ोटो एक तरफ फेंक दी। " मेरी शादी कहीं सच मे उस से ना हो जाये. " सोच के मन खराब हो गया।

दूसरी फ़ोटो वाली लड़की को मैं नहीं जानता था. उसका बायोडाटा देखा जो बिल्कुल मेरी सोच से मिलता जुलता। लड़की भी बंगलोर में जॉब कर रही थी। मुझे खुशी हुई और दूसरे ही पल मायूसी. मेरा दिमाग कुछ और कहता दिल कुछ और। मोबाइल निकाल कर मैं मीनल को देखने लगा. फिर उस लड़की की फ़ोटो. दिमाग कहता फ़ोटो वाली मेरे टाइप की है दिल कहता मीनल के सिवाय कोई नहीं।

मैं नहाने चला गया, जब तैयार हो कि नीचे गया तो मम्मी नव्या के घर चलने को कहने लगी, न चाहते हुए भी मम्मी के आगे झुकना पड़ा।

नव्या के घर जाते ही माहौल ऐसा लगा जैसे मैं नए साल पे नहीं अपनी शादी तय करने आया हूँ, " ये खाइये न हमारी नव्या ने बनाया, चाय पीजिए नव्या ने बनाई, घर सजा के रखती है बहुत शौकीन है और नव्या तिरछी नज़रों से मुझे देख के शरमा जाती।

नव्या जाओ, निशांत को घर दिखा के लाओ, वैसे तो पहले आये हो तुम लेकिन घर नहीं देखा होगा।"

मैंने मम्मी को शिकायती लहज़े में घूरा, लेकिन मेरी मम्मी को मेरे साथ अत्याचार करने में अलग मज़ा आता है. " हाँ हाँ, जाओ बेटा घूम लो।" मरता क्या ना करता; नव्या ने शरमाते हुए घर दिखाना शुरू किया और आखिर में अपने कमरे में ले गयी, मैं दरवाज़े पे ही खड़ा रहा।

" अंदर आइये न,. "

"नहीं नव्या. अच्छा रूम है तुम्हारा..प्लीज नीचे चलो" मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था वहां। नव्या हाथ पकड़ के अंदर ले जाने लगी मुझे, "आप मुझसे इतना क्यों भागते हैं; "

"देखो नव्या. मैं वैसा नहीं जैसा तुम सोचती हो!"

"तो कैसे हैं आप. नव्या मेरी आँखों मे एक मदहोशी से झांकते हुए बोली। मैं असहज हो गया और उस से दो कदम पीछे हट गया।

"मैं आपको कई सालों से पसंद करती हूँ,. आप ने कभी मेरी तरफ देखा भी नहीं. इस बार जब आप आये तो एक उम्मीद जगी, लेकिन आप को मुझ में पता नही क्या कमी दिखती है"

मैं ये सुन कर सकते में आ गया. क्या मैं इस के साथ गलत कर रहा हूँ. नहीं.. मैं इस के साथ अपना भविष्य नहीं सोच सकता फिर चाहे जो भी हो।

"नव्या मुझे नीचे जाना है. प्लीज ये सब बातें बंद करो" मैं पहली बार किसी लड़की से घबरा रहा था, मैं पलट के जाने लगा लेकिन इतने में नव्या पीछे से ही मुझसे लिपट गयी। "आई लव यू निशांत"

मैंने आज तक किसी लड़की को अपने करीब नहीं आने दिया और ये इस तरह मुझसे चिपकी है. मेरे सामने मीनल का चेहरा घूमने लगा।

"छोड़ो मुझे..". मैं उसका हाथ अपने सीने से हटाते हुए बोला "दूर रह कर बात करो. अपनी सीमा में रह कर" मैं गुस्से में था लेकिन उस से ज्यादा घबराया हुआ था।

"सिर्फ एक बार मेरी बात सुन लीजिए निशांत.. प्लीज" उसने अपनी पकड़ मजबूत करनी चाही।

"सुनने के लिए चिपकना ज़रूरी नहीं नव्या हटो" इतना कह के मैंने कड़क हाथों से उसे एक तरफ कर दिया।।

" तुम प्यार करती हो मुझसे?? प्यार!!;हुह. ऐसा होता है प्यार??; प्यार करती तो मेरी भावनाओं की कदर करती तुम. प्यार बिना छुए भी हो सकता है। क्योंकि ये हवस नहीं, एक एहसास है. जाओ पहले प्यार को समझो फिर प्यार जताना" मैंने गुस्से में दीवार पे हाथ, दे मारा और नीचे गया, मम्मी कुछ कहती उस के पहले ही मैं उस के घर से निकल चुका था।

घर आते ही मैं अपने कमरे में भागा और गुस्से से मेज़ का सारा सामान नीचे फेंक दिया। घर पे कोई नहीं था इस लिए सिगरेट निकाल के पीने लगा। मेरे हाथ कांप रहे थे, मोबाइल निकाल कर मीनल की फ़ोटो देखने लगा।

"मुझे वो पहले चिढ़ाती हुई दिखी, फिर लगा कि गुस्से में चीख के कह रही हो " मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ होती है". मैंने उसी पल सिगरेट फेंक दी, और सिर पे हाथ रखे ज़मीन पे बैठ के मीनल को देखने लगा। आंखों से आंसू बह चले, और मेरे मन साफ होता चला गया।

मुझे अपना रास्ता और मंज़िल दोनो ही पता चल चुके थे; " थैंक यू नव्या" मैंने कहा और आंसू पोछ के उठ गया।
 
जैसे बारिश हो जाने के बाद सारी वादियां धूल जाती हैं, और सब कुछ साफ दिखने लगता है ठीक उसी तरह मेरी ज़िंदगी मे भी संदेह के बादल बरस चुके थे, और सब कुछ साफ कर चुका था. मुझे मेरी मंज़िल साफ दिख रही थी।

ज़िन्दगी में सब कुछ मिला था मुझे, अब सिर्फ मीनल की खुशी चाहिए थी। मैं अब पूरी तरह से उसका हो चुका था। मीनल को हर खुशी देना अब मेरा मकसद था लेकिन सब से पहले उस के कैरियर की गाड़ी को पटरी पे लाना ज़रूरी था ताकि वो ज़िन्दगी जीने की बात करे न कि सिर्फ गुज़ार लेने की।

"निशू!!.…निशू. " मम्मी की आवाज़ आयी, सिगरेट की तो सिर्फ एक कश ली थी फिर भी च्विंग गम चबा खुद को आश्वस्त कर चुका था.. इस लिए आवाज़ आते ही नीचे भागा।

"निशू. क्या हुआ वहां..क्या कहा तूने नव्या से. ऐसे क्यों चला आया . बता पुत्तर?"

"नव्या ने क्या कहा आप लोगो से मम्मी;"

" वो तो बस रोये जा रही थी, कह रही थी कि तेरे बिना नहीं जी सकती. बहुत पसंद करती है तुझे"

मैंने कुछ नहीं कहा तो मम्मी बोली " देख ले पुत्तर, अच्छी लड़की तो है. " मम्मी ने चिंता में कहा।

"नहीं मम्मी मैं उस से कभी शादी नही कर सकता; पहले मैं उस के बारे में सोचने लगा था लेकिन अब उसे जान लेने के बाद मैं पीछे हट गया. वो मेरे टाइप की नहीं मम्मी"

"ये तेरे टाइप की नहीं. वो तेरे टाइप की नहीं. थक गई हूं सुन सुन के , कहाँ से लाऊं तेरे टाइप की मैं!! तू बता है कोई तेरे टाइप की. " मम्मी दहाड़ते हुए बोली।

"मीनल;" बस मैं इतना ही कह सका। इतने में पापा ने भी घर में प्रवेश किया।

" ये क्या हो रहा है; नव्या, मीनल. !! मीनल शादी नहीं करेगी पुत्तर, वो नहीं कर सकती. और उसे नव्या के बारे में भनक भी लगी न तो वो उसी वक़्त पीछे हट जाएगी. तू समझ नहीं रहा"

"नीता हम मनाएंगे मीनल को , सबको समझाएंगे. " पापा बोले।

"ऐसा क्या है जो मीनल शादी नहीं करना चाहती. मैं कुछ भी करूँगा उसे मनाने के लिए "

" बेटा वो. उस की दादी;" पापा की बात पूरी नहीं हुई उस के पहले ही बाहर लोग नए साल में मिलने के लिए बुलाने लगे।

"अब ये सब बात बाद में करेंगे ,किसी के सामने इसका जिक्र भी नहीं होना चाहिए.. अब चलिए आप लोग" पापा बोले।

मैं सिर्फ मीनल का हो सकता हूँ उसका नहीं तो किसी और का भी नहीं. उसकी क्या सोच है मेरे बारे में, मैं तो ये भी नहीं जानता..लेकिन वो अब मेरी ज़िम्मेदारी है। मेरे दिल ने फैसला सुनाया।

हम कई लोगों के घर गए, मिलना जुलना हुआ. मुझे अच्छा भी लगा. कुछ देर के लिए ही सही मैं आज की नव्या की हरकत भूल गया।

आखिर में मैने पापा से कहा " हम लोग मीनल के घर कब जाएंगे?"

पापा मेरा मुँह देखने लगे फ़िर बोले "वैसे तो वहां सब जाने से कतराते हैं बेटा.. लेकिन तेरे लिए चल लेंगे हम"

"लेकिन उस ने तो कल बुलाया था मुझे. "

" तो फ़िर ज़रूर चलेंगे,.. तुम 5 मिनेट इंतेज़ार करो मैं घर से आया" फिर पापा मम्मी ने इशारों में न जाने क्या कहा और पापा चले गए।

उनके जाने के बाद मम्मी बोली "देख पुत्तर.. हम वहां जा रहे हैं ठीक है, लेकिन तू वहां कुछ भी हो चुप रहेगा. समझा न!"

"आप ऐसा क्यों कह रही हैं मम्मी. " मैं हैरान था।

"ये सब पता चल जाएगा, बस अभी जितना कहा जाए उतना करो. अंदर कुछ भी हो, कोई कुछ भी कहे. तुम चुप रहोगे, जो कहना करना होगा हम देखेंगे।"

पापा आ गए हाथ मे एक लिफ़ाफ़े के साथ, फिर से दोनों ने कुछ आंखों में बातें की. हम तीनों मीनल के घर चल दिये।

मेरे पेट मे तितलियां उड़ रही थी मीनल के घर जाने के बारे में सोच कर. उस के घर मे सब ठीक नहीं ये समझ गया था लेकिन मुझे तो मीनल को देखना थ. अपनी मीनल को. नहीं.. सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी मीनल को।

पापा ने घंटी बजाई तो उसकि दादी ने दरवाज़ा खोला और बहुत गंदा से मुँह बना के बोली " आप यहां किस लिए. " जैसे हमारे जाने से वो ख़ुश न हो।

" जी नए साल की बधाई देने और ये रुपये देने थे मीनल को एडवांस में" पापा पता नहीं क्या झूठ कह रहे थे।

उसकी दादी दरवाज़े पर ही लिफाफा लेने के लिए हाथ बढ़ाने लगी तो पापा ने मीनल से मिल कर कुछ राय मशवरे की बात कही, तब जा के वो बेशर्म औरत रास्ते से हटी और हमे अंदर आने को कहा, उनका व्यवहार मेरा दिल कचोट गया लेकिन ये तो अभी शुरुआत थी।

अंदर जाते ही मेरी नज़र चारों तरफ़ दौड़ी, एक विचित्र सी मनहूसियत फ़ैली थी वहां। दीवारों के रंग घर का साथ छोड़ रहे थे और अपने साथ सीमेंट की पपड़ी भी लिए जा रहे थे।

जर्जर हुए सोफ़े उन लोगों को किसी गरीब से भी गरीब बना रहे थे।

दीवार पे किसी आदमी की माला चढ़ी फ़ोटो जो शायद मीनल के पापा की रही होगी, लेकिन उस की मम्मी की तस्वीर कहीं नहीं थी।

पापा ने इशारे से मुझे बैठने के लिए कहा, मैं बहुत घबरा के सोफ़े पे बैठा.. ऐसा लगा कि वो बैठते ही टूट जाएगा;

"मीनल कहाँ है?" पापा ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। मम्मी अब तक चुप थी, उन्हें देख के लग रहा था कि मौका मिल जाये तो वो इस दादी को मार मार के ठीक कर दे।

"यहीं होगी. और कहाँ जाएगी. हमारी की छाती पे मूंग दलेगी मनहूस"। मुझे तो मानो काटो तो खून नहीं, इतनी मासूम, इतनी प्यारी लड़की के लिए ऐसे शब्द. मैंने पापा को लाचारी में देखा, लेकिन पापा ने नज़रें फेर ली।

"बुला दीजिये उसे.. मुझे और भी जगह जाना है, मीनल से डील फाइनल नहीं होगी तो किसी और से बात करनी होगी"।

"ऐसे कैसे फाइनल नहीं होगी. टांगे नहीं तोड़ दूँगी अगर नहीं करेगी काम तो" उसकी दादी जब मुँह खोल रही थी केवल ज़हर उगल रही थी, अब समझ आया कि मुझे चुप रहने को क्यों कहा गया। वर्ना आज एक मर्डर पक्का होता यहां, मेरा खून उबालें मारने लगा।

"ओ मीनल. जल्दी आ. बाहरी हो गयी क्या. मीनल!!"

हम तीनों चुप थे, पता नहीं मीनल बेचारी कैसे इस औरत को झेलती है। इतने में मीनल भाग के आयी. हमे देख के वो चकित रह गयी जैसे कोई उम्मीद ही न हो हमारे वहां जाने की।

"कैसी हो मीनल ,पापा ने पुछा;"

मीनल की ये दुर्दशा देख के मेरी आँखें गीली हो गयी.. तो मैंने खांसने का बहाना कर के किसी तरह उन्हें पोछ लिया।

"बैठो मीनल, मम्मी बोली. "

"ये हमारे साथ बैठेगी अब. आप को जो बात करनी है वो सीधे करो न" उस की दादी चिल्लाई।

ये उसकी अपनी दादी है या; इतनी घटिया औरतें भी होती हैं दुनिया मे? मुझे आज चाणक्य की बातें बिल्कुल सही लगने लगी थी.. औरतें ही औरतों की दुशमन होती हैं।

"हमारे व्यवसाय में काम करने वाले को इज़्ज़त दी जाती है, वर्ना लक्ष्मी रूठ जाती हैं. ठीक है मैं खड़ा हो जाता हूँ" इतना कह के पापा खड़े हो गए। उस दादी ने सुना तो मुँह टेढ़ा कर लिया।

"अंकल . मैं आपकी बेटी हूँ न " मीनल बात सम्हालते हुए बोली। उसने पापा का हाथ पकड़ के उन्हें उस सोफ़े पर बिठा दिया और खुद उनके पैरों के पास सोफ़े के हत्थे पे हाथ रख के ज़मीन पर बैठ गयी
 
जिस मीनल को मैं दुनिया की सारी खुशी देने के सपने देख रहा था वो आज ज़मीन वे बैठी थी क्यों कि वो अपनी दादी की बराबरी नहीं कर सकती। मेरा मन हुआ कि मीनल को उठा के इज़्ज़त से ऊपर बिठा लू, लेकिन मम्मी की नजरें लगातार मुझे उनकी कही बात याद दिला रही थीं। मैं उस मासूम को बेइज़्ज़त होते देखता रहा।

मेरे जैसा इंसान आज लाचार था, और अपनी लाचारी पे मुझे तरस आ रहा था।

पापा ने मीनल को लिफाफा दिया और कहा कि उसका काम बहुत पसंद आया तो अपने ऑफिक का डिज़ाइन बनवाना है।

मीनल ने आंखों में आँसू के साथ पापा को देखा तो पापा ने भी झट से अपनी आंखों के कोने पोछे।

"इधर दे लिफाफा. और जा के चाय नाश्ता ले के आ. चल जा यहां से"

मीनल ने उन्हें लिफाफा पकड़ाया और चली गई, इतनी देर में एक बार भी उसने मुझे नहीं देखा। मैं तड़प के रह गया और सोफ़े के हाथों को मजबूती से पकड़ लिया।

" माताजी, रुपयों के सिलसिले में आप से बात करनी है. " पापा ने पासा फेंका।

"है है है. है हाँ क्यों नहीं. आपको तो पता ही है जब से इस मनहूस ने हमारी जिंदगी में कदम रखा है सब खत्म ही गया हमारा।"

" आपका घर इसी मनहूस के कारण चलता है माताजी. रिशू तुम अंदर जाओ मीनल की मदद करो, और हां उस से कहना तुम्हे घर भी दिखा दे. तब तक ज़रा मैं और माताजी रुपयों की डील फाइनल कर ले; क्यों माता जी.. सही कहा न मैंने. बेटे के सामने आप भी ठीक से अपनी मांग रख नहीं पाएंगी. " पापा ने रुपयों की बात कर के उस दादी के चेहरे की चमक बढ़ा दी।।

"हाँ, हाँ. जाओ. देख आओ. " वो बोली और मैं बिना सेकंड गवाएं अंदर भागा, मुझे मीनल को देखना था, उस से दूरी असहनीय थी और अब डर बढ़ चुका था कि मीनल इस महौल से क्या कभी बाहर निकल पाएगी.. कैसे भी करके मुझे उसे बचाना है।

"किचन में चाय बनाती मीनल दिखी, किचन भी अपनी दुर्दशा के मामले में बाहर के कमरे से प्रतिस्पर्धा कर रहा था.. अगर ऐसी हालत मेरे किचन की होती तो मैं खाना खा ही नहीं पाता3 Full, stop किचन गंदा नही था लेकिन देख के लगता था कि बाबा आदम के ज़माने के बाद से ही उस की पुताई रंगाई नहीं हुई, अलमारी, स्लैब सब जर्जर अवस्था मे था। मीनल ऐसे कैसे रह लेती है, कहीं उसका रहन सहन सच मे ऐसा ही तो नहीं. नहीं. वो ख़ुद की इतनी कम कमाई से क्या क्या कर पायेगी. ऊपर से उसकी दादी;मेरे मन मे अंतर्द्वंद छिड़ गया।

"मीनल !!" मैंने आवाज़ दी, और वो आश्चर्यचकित हो के पलटी;" तू. तुम यहाँ. प्लीज बाहर जाओ. दादी ने देख लिया तो. " उसकी आंखें भर आयी।

मैं अपने सब उसूलों, नियम कानून को एक किनारे रख के उसके करीब चला गया और उसके आंसू पोछ के उसकी आँखों मे झांक कर बोला " तुम इतनी तकलीफ में हो और मैं तुम्हे अकेला छोड़ दूं. मैं तो पूरी ज़िंदगी तुम्हारे साथ हूँ मीनल.. तुम अकेली नहीं"।

वो खोयी हुई मुझे देख रही थी, मुझे होश नहीं था कि अभी क्या कहा। मैंने उस के सिर पे हाथ फिराया और कहा

" मीनल तुम्हे पता नहीं कि तुम कितनी खास हो. जिसने मेरी सोच बदल दी वो कोई साधारण इंसान नहीं हो सकता. "

"निशांत तुम जाओ अभी,; कल मिलेंगे न तो बात करेंगे" वो हकला कर बोली.।

" अभी नहीं.. अभी गैस बंद करो और चलो अपना घर दिखाओ. जब पापा और दादी की बात हो जाएगी वो खुद बुलाएंगे"

चलो अब. मैं उसका हाथ पकड़ के किचन से बाहर लाया, उसकी छुअन ने मुझे फिर से सम्मोहित सा कर दिया, उसने अपना हाथ मेरे हाथों से छुड़ा कर अपने पीछे आने को कहा।

सब से पहले वो नीचे के एक कमरे में ले गयी.. " ये कमरा दादा दादी का है, आओ दादाजी से मिलाऊँ" वो अंदर गई और मैं पीछे गया।

उस के दादा बेहद कमजोर दिखे , एक तरफ का मुँह और हाथ लकवे के कारण टेढ़े दिखे। मेरा मन उन्हें देख के घबरा गया. बुढ़ापा इंसान की क्या दशा कर देता है, अपना शरीर भी अपने साथ नहीं।

"दादू. देखिये ये निशांत है. बताया था न मैंने" मीनल बड़े प्यार से बोली तो उन्होंने आंखें खोल के मेरी ओर देखा और मैंने हाथ जोड़ के नमस्ते किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए एक हाथ आशीर्वाद के लिए उठाया।

फिर मीनल से लड़खड़ाती जुबान में गुजरती में कुछ बोले. हालांकि गुजराती मुझे काफी कुछ समझ आती थी लेकिन उनका कहा एक शब्द भी समझ नहीं पाया। मीनल उनकी बात सुन के मुस्कुरायी, और दादाजी जी की एक आंख से आंसू की बूंद गिर गयी। उन्होंने इशारे से मुझे पास बुलाया और मेरे सिर वे हाथ फेर के कुछ बोले. मैं उनका और मीनल का मुँह देखने लगा बात समझने के लिए; मीनल के चेहरा देख के ये तो लगा कि वो शरमा रही है लेकिन किस लिए ये उसने बताया ही नहीं।

"मीनल तुम्हारे दादाजी क्या बोले?" उसने मुस्कुरा के नज़रें नीची कर ली, और मुझे चलने को कहा। मैं दादाजी को फ़िर नमस्ते कह के उस के साथ बाहर निकल गया। वो घर दिखाते हुए मुझे ऊपर ले गयी, पता नहीं क्यों मुझे नव्या की हरकत याद आ गयी और मेरा मुह उतर गया।

एक बंद कमरे को देख के मैंने पूछा " ये किसका है?"

"मेरा है. उसने बिना भाव के बोला".. पता नहीं क्यों मुझे उस कमरे को देख के अंदर जाने की इच्छा हुई। मेरी मीनल जिस जगह रहती है, उठती बैठती है. उस जगह से लगाव हो गया बिना देखे ही।

" दिखाओगी नहीं. ?" मैं बड़ी उम्मीद से बोला।

वो चुप रही तो मैं समझ गया। कोई बात नहीं कह के मैं आगे बढ़ने लगा तो मीनल ने पीछे से हाथ पकड़ लिया. मेरे सारे अरमान फ़िर जाग गए, मन हुआ कि पलट के उसे अपने सीने के लगा लूँ। "चलो दिखाती हूँ अपना कमरा. " उसने कहा और मेरा हाथ छोड़ दिया, मैं पलट के खड़ा हो गया और उसमें खो गया।

वो कुछ कहते हुए आगे बढ़ी और दरवाज़े की कुंडी खोलते हुए पीछे देखा तो मैं जड़वत हुआ उसे निहारते हुए दिखा। वो झेंप गयी फ़िर दोबारा मुझे आवाज़ दे के बुलाया, इस बार मैंने सुन लिया और बिना कुछ कहे उस के कमरे में गया।

अंदर का नज़ारा देख के मैं अपने होश खो बैठा " ये तुम्हारा कमरा है!! ओह गौश;ये इसी घर का हिस्सा है?" मैं उस कमरे की हर चीज़ और सुंदरता को देखते हुए बोला।

मीनल हंस दी, हाँ मेरा है. पसंद आया? उसने मेरी तरफ़ देख के पूछा.

"मीनल ये वाल पेंटिंग्स, ये डेकोरेटिव चीजें. ये सब तुम कमरे में छुपा के क्यों रखती हो नीचे ड्राइंग रूम को क्यों नहीं सजाती" न चाहते हुए भी मेरे मुह से निकल गया।

"दादी को मेरी बनाई कोई चीज़ पसंद नहीं, इस लिये मैं ये सब कमरे में बंद रखती हूँ" मैंने मीनल क़ो अविश्वास से देखा।

मीनल मुस्कुरा के रह गयी.. उस ने एक डायरी दिखाई जिस में .. तरह तरह के कार्टून्स बनाये थे, बिल्कुक, अलग किस्म की कलाकृतियां थी उसमें।

मैं कूद पड़ा "मिल गया. हो गया डिसाइड"

"क्या. " उसने हैरानी से बोला.. मैं उसे देखता रह गया, कितनी प्यारी लग रही थी वो. मन हुआ कि उसे अपनी बाहों में भर लू और कभी भी खुद से अलग न करूं।

पापा ने आवाज़ दी तो हम नीचे गए. मैं पापा के साथ आ के बैठ गया और मीनल चाय नाश्ता लायी।

"तुम भी लो मीनल" मैं बिना कहे रह नहीं पाया और उस की दादी ने मुझे घूर कर देखा।

" जा यहां से अंदर ; उसकी माँ छोड़ के गयी थी क्या" मैं हाथ में एक ढोकला पकड़ा हुआ दादी को देखता फ़िर जाती हुई मीनल को. इस से ज्यादा मैं क्या सहता. इस लिए ढोकला वापस रख के मैं बाहर चला गया।

मम्मी पीछे भागती हुई आयी. घर मे घुसते ही मेरे सब्र का बांध टूट गया, " निशू. " मम्मी ने मेरे कंधे पे हाथ रख के कहा तो मैं उनके गले लग के रो पड़ा. " इतनी बेइज़्ज़ती कैसे सह लेती है वो मम्मी. फ़िर भी इतनी मासूम है"

" ना मेरा बच्चा;ऐसे नहीं रोते, हिम्मत रख. मम्मी मेरा सिर सहलाती हुई बोली। न जाने कब तक मैं उनकी गोदी में सिसकता रहा और सो गया।

सपने में मैंने देखा - एक ख़ूबसूरत सी वादी है जिसमे धूप है लेकिन चुभती नहीं, हवा है जो केवल ताज़गी बिखेर रही है. वहीं एक पगडण्डी है जिसके दोनो तरफ़ हरी और सुनहरी घास लहरा रही है. हम हाथ थामे उस पगडण्डी पे चले जा रहे हैं. मीनल ने वही लहंगा पहना है. ठीक उसी रूप में जिस रूप में उसे देख के मैं गुस्सा हो उठा था. मैं उसे कमर से पकड़ कर रोक लेता हूँ और उसकी आँखों मे खो जाता हूँ।

उसकी आंखें खुश दिखती हैं फिर धीरे धीरे उनमे दुख और पीड़ा का समावेश होने लगता है; उसकी आँखों से आँसू गिर रहे हैं जो नींचे गिरते ही मोती बन जाते हैं और पगडण्डी के दोनों तरफ फैलते रहते हैं। मैं उस के दर्द पे तड़प कर उसे सीने से लगा लेता हूँ और अनायास ही मेरे हाथ उसकी पीठ को सहलाने लगते हैं, वो शांत होने लगती है..लेकिन आंधी आ जाती है. जो मुझे उस से अलग करना चाहती है. मैं अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा हूँ. अचानक देखा उस की दादी और सोसाइटी के लोग घेरा बनाये हम पे चिल्ला रहे हैं और हम सहमे हुए एक दूसरे से सटे खड़े हैं. घबरा कर मेरी नींद खुल गयी।

ये कैसी दुनिया थी जिसमे लोगों की संवेदनाएं मर चुकी थी, किसी को पीड़ा दे कर असीम सुख मिलता था. मैं ऐसी दुनिया मे नहीं रहना चाहता था. क्यों ईश्वर ने एक ही धरती पे किसी के लिए अथाह सुख और किसी के लिए केवल दुख का सागर बनाया। लेकिन मेरे सोचने और रोने मात्र से विधि का विधान बदला नहीं जा सकता था।

जब मैं उठा तो खुद को अब भी मम्मी की गोदी में सोफ़े पर लेटा पाया. पापा मम्मी आपस मे बातें कर रहे थे। मेरा सिर भारी हो गया था तो मम्मी चाय बनाने चली गयी।
 
आज का भाग आपको कैसा लगा..अपनी समीक्षा में जरूर बताये। आगे की कहानी के लिए अगले भाग का इंतेज़ार करें। धन्यवाद
 
आज पांडाल में खाने का आखिरी दिन था, लेकिन वहां जाने के पहले मैं पापा से सब जानना चाहता था।

मेरी ज़िंदगी की अभी ये हालत थी कि मुझे कुछ पता ही नही था क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है. मेरे लिए सब पहेली बनता जा रहा था।

चाय पी के मैंने पापा से सब सच बताने को कहा. तो उन्होंने बताना शुरू किया।

"मीनल के माता पिता ने शादी अपनी मर्ज़ी से, अभिभावकों की मर्ज़ी के खिलाफ की थी। मीनल के पिता एकलौती संतान होने के बाद भी अपने माता पिता को नहीं मना पाए.. और माँ के घर वाले इस लिए नहीं माने क्योंकि उन्होंने अपनी बिरादरी से नीचे घर मे शादी की।

दोनों अपनी जिंदगी में घर वालों के अभाव के दुःख के साथ ही जीने लगे। इस घर में वो तब आये जब मीनल 8वी में थी, तुम उस वक़्त होस्टल में रह के 12वी कर रहे थे। मीनल के दिल में छेद था, बस यही एक तकलीफ थी जो उसके माता पिता को खाये जा रही थी।

मीनल पढ़ाई लिखाई, खेल कूद, हर चीज़ में अव्वल थी, उस के बाद एक भाई भी था जो कि उस समय 4थी कक्षा में था। हंसता खेलता परिवार था, लेकिन शायद घर वालों की बद्दुआ लगी कि एक पल में सब खत्म हो गया।

बच्चों की छुट्टियों में सबका शिमला घूमने का प्लान बना. घूमने तो चारों गए लेकिन लौट के केवल मीनल आयी।

वहाँ भूस्खलन होने के कारण इनकी गाड़ी खाई में गिर गयी। मीनल के भाई और माँ की घटनास्थल पे ही मौत हो गयी, मीनल और उस के पिता गंभीर रूप से घायल थे, उन्हें तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया।

मीनल की जांच करने पर पता चला कि उसका लीवर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चका हूं और जल्द ही अगर प्रत्यारोपन नहीं किया गया तो उसकी जान जा सकती है। मीनल के पापा का बच पाना मुश्किल था। आखिरी वक्त में उनके माता पिता को बुलाया गया और पुत्र मोहवश वो भागे चले आये।

उसके पापा को थोड़ा होश आया तो उन्हें मीनल की स्थिति से अवगत कराया गया। उन्होंने अपना दिल और लीवर उसके नाम कर दिया और चल बसे।

अपने बेटे के ऐसे चले जाने की खबर से उनके पिता, यानी मीनल के दादाजी, जो कि ब्लड प्रेशर के रोगी थे, को ब्रेन हैमरेज हो गया. तुरंत सर्जरी हुई, वो ठीक तो हो गए लेकिन शरीर का कुछ हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। काफी समय तक उनकी फिसियोथैरेपी चली जिस के चलते वो चलने फिरने में समर्थ तो हो गए लेकिन मानसिक तनाव के चलते पूरी तरह ठीक न हो सके।

उसकी दादी इसकी जिम्मेदार भी मीनल को मानती हैं, जबकि असल में अपने पति की इस हालत की जिम्मेदार वो खुद हैं। इस तरह के रोगियों को अच्छा माहौल मिलना चाहिए लेकिन उसकी दादी ने सब बर्बाद कर लिया अपने हाथों।

मीनल की दादी ने एक ही पल में अपना सब गवां दिया, पागलों जैसी हालत हो गयी थी उनकी, लेकिन वो ये नहीं समझ पायी की एक मासूम की दुनिया उजड़ गयी।

जैसे तैसे वो मीनल और उस के दादा को ले कर यहां आयी।

लेकिन उन के मन मे नफरत भर चुकी थी, अपने बेटे की मौत की जिम्मेदार वो मीनल को समझने लगी। उनका मानना था कि मीनल की जान बचाने के लिए उनके बेटे ने अपनी जान दे दी। एक खुशमिजाज़ परी जैसी लड़की घर के कोने में पड़ी रहती. अपने मम्मी पापा को याद कर के रोती रहती और अपनी दादी की गालियां सुनती रहती। जिसे चाय बनानी तक नहीं आती थी वो उस उम्र में खाना बनाने लगी, उस के बाद भी पेट भर खाने को नहीं मिलता।"

पापा की आंखें जवाब दे गई थी इतना बताते ही, अब मुझे ये भी समझ आ गया था कि उस दिन मीनल घर पे इतने खुश हो कर क्यों खा रही थी और मम्मी उसे क्यों ज्यादा खिला रही थी।

"मीनल ने अपने पिता की सारी कमाई, सब जमापूंजी अपने दादा दादी को दे दी लेकिन अपनी पढ़ाई जारी रखी और इस परिस्थिति में भी बिना कोचिंग के मेडिकल का एग्जाम निकाला। सब मीनल की मदद के लिए आगे आये लेकिन न ही उस की दादी का दिल पिघला न ही मीनल ने किसी से मदद ली।

आज अगर नफरत के बदले प्यार होता तो मीनल डॉक्टर होती और अपने दादा दादी की सेवा बहुत अच्छे से कर पाती।

मीनल की दादी कभी नहीं चाहती कि मीनल किसी से भी मेल जोल बढ़ाये, उनके लिए मीनल एक मशीन है जो घर चला कर उनका कर्ज़ चुकायेगी। घर मे कोई कमाने वाला नहीं था तो मीनल पढ़ाई के साथ साथ छोटे मोटे काम कर के कमाने लगी।

उसकी दादी साफ कर चुकी है कि मीनल की शादी नहीं करेंगी।उनका कहना है कि उनके बेटे पे पूरी ज़िंदगी मीनल के साथ रहने का वादा लिया है. शादी का कहीं ज़िक्र ही नही हुआ।

मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की लेकिन उनकी ज़ुबान और दिल केवल गंदगी से भरा है। ये औरत ये भी भूल गयी इस इस मासूम के सीने में उनके ही बेटे का दिल धड़कता है। इतने साल हो गए उसकी दादी की नफरत कम न हो कर और, बढ़ती गयी। शायद उस के दादाजी ठीक होते तो मीनल की ये दुर्दशा न होती।"

पापा चुप हुए और घर मे एक अजीब सी शांति छा गयी.

मैं पूरी ज़िंदगी परफेक्ट परफेक्ट करता रहा औऱ आज दुनिया के सब से इम्पेरफेक्ट हालात में फंस गया।

"पापा मैं मीनल को इस ज़िन्दगी से मुक्ति दिलाना चाहता हूँ ,कैसे भी।"

मैं आज बहुत गंभीर था। अजीब बात है कि इतना सुन के भी आज मैं नही रोया, शायद मेरे मन के दृढ़ संकल्प के चलते ऐसा हुआ।

"चाहता मैं भी हूँ, लेकिन इतना आसान नहीं. जिस औरत ने अपने एकलौते बेटे से मुँह फेर लिया लव मैरिज करने पर, वो पोती को कभी उस माहौल से नहीं निकलने देगी।"

"मैं पहले मीनल को एहसास करवाना चाहता हूँ कि वो कितनी अनमोल है, उसका कैरियर बनाना चाहता हूँ. फिर मैं उसे शादी के लिए मनाऊंगा"

"और इस बीच अगर उसे कोई पसंद आ गया तो?" मम्मी बोली।

"तो वो मेरी किस्मत होगी मम्मी; लेकिन मैं मीनल के सिवा अब कुछ सोच नहीं सकता। हां मैं मीनल को ये ज़रूर एहसास दिलाऊंगा कि मैं उसे पसंद करता हूँ"

"लेकिन उस का कैरियर कैसे बनेगा, उसकी दादी नहीं करने देगी कुछ"

" वो अब मेरी ज़िम्मेदारी है पापा" मैं पूरे आत्मविश्वास से बोला।

"लेकिन इसमें मेरी बेटी और मेरा विश्वास नही टूटना चाहिए" पापा ने मुझे याद दिलाया और मैं उनके गले लग गया।

मुझे मीनल से पहले जैसा ही पेश आना था ताकि वो मेरे साथ असहज न हो।

हम सब तैयार हो कर बाहर गए.. आज भी गरबा चल रहा था, मैने रोज़ की ही तरह अपनी जगह पकड़ ली.. और मीनल का इंतेज़ार करने लगा; वो आयी लेकिन उदासी उस के चेहरों को निस्तेज कर रही थी।

उसने मुझे देखा और मैने उसको चिढ़ाने के लिए अपनी भौहें ऊपर करी तो वो मुस्कुराने लगी, जैसे ही वो मुस्कुरायी मैने उसी के अंदाज़ में मुँह टेढ़ा किया तो वो खिलखिला उठी।

सच कहूं तो मन मे किसी के लिए प्यार पनप जाने के बाद पहले ही कि तरह व्यवहार कर पाना आसान नहीं होता। लेकिन मेरे लिए फिलहाल यही एक मात्र रास्ता था मीनल को खुश रख पाने का।

मुझे इशारे करते नव्या ने देख लिया और मैंने भी ये देख लिया कि नव्या ने देखा हमें। वो गरबा करते करते रुक गयी और एक तरफ जा कर अपने आँसू पोछने लगी। नव्या कब और क्यों मुझे पसंद करने लगी थी मैं नहीं जानता था. स्कूल में जब तक यहां रहा सिर्फ़ लड़के ही मेरे दोस्त थे. कौस्तुभ मेरा सब से अच्छा दोस्त था तो मैं अक्सर उसी के घर चला जाता और पढ़ाई करता।

11वी से मैं होस्टल चला गया, फिर कोचिंग, इंजीनियरिंग जॉब. मैं तो बाहर का ही हो कि रह गया था।

मैं यहां कम आता था, क्यों कि मम्मी पापा घूमने के बहाने मुझसे मिलने चले आते। हम तीनों खूब मस्ती करते. नव्या ने कब देखा और मुझसे कब मिली, कभी बात भी हुई हमारे बीच या नहीं. मुझे ऐसा कुछ याद नहीं।

खैर. मेरे कारण वो रो रही थी तो कहीं न कहीं मुझे ये बात खल रही थी;वैसे तो मैंने कई लड़कियों के दिल तोड़े और कभी अफसोस नहीं किया..लेकिन मीनल से मिला तो लगा कि शायद उन सब के साथ अच्छा नहीं किया मैंने; अब फिलहाल नव्या को कैसे समझाऊँ ये ही चिंता सताने लगी.
 
मैंने मीनल को देखा.. वो अब भी मुझे देख ले रही थी बीच बीच मे. मैंने न चाहते हुए भी नव्या को इशारे से बुलाया, वो तो जैसे तैयार थी..भागी चली आयी।

"मैं जानती थी. आप ज़रूर समझेंगे. " वो मेरे बगल में खड़ी होते हुए बोली। आज अपने दुःख के वक़्त भी वो सजना नहीं भूली थी. डीप गले की चोली, पेट दिखता लहंगा, उस पे कवक नाम की चुनरी; एक मेरी मीनल है.. सोच के ही मैं मुस्कुरा उठा.. और नव्या को गलत सिग्नल मिल गए।

खैर!! बात को सम्हालते हुए मैं बोला "नव्या. तुम्हे मैं समझा चुका हूँ, प्लीज खुद को स्ट्रांग बनाओ. जो हम चाहते हैं वो हमेशा नहीं होता. तुम मुझे पसंद करती हो इसका ये मतलब तो नहीं कि मैं भी तुम्हे पसंद करू।"

"निशांत. शादी अगर उस से की जाए जो आपको प्यार करे तो जिंदगी बहुत अच्छी गुज़रती है. और मेरे जितना प्यार आपको कोई कर नहीं सकता"

मुझे अब खीझ होने लगी थी उसकी चुपड़ी बातों से..लेकिन मैंने लंबी सांस ले कर खुद को नियंत्रित रखा।

"मेरे लिए क्या कर सकती हो नव्या??"

"कुछ भी कर सकती हूँ. आप नहीं जानते मैंने बचपन से सिर्फ़ आपके की सपने देखे हैं; यहां कब कब आये.. कब क्या पहना था सब याद है मुझे. चाहे तो पूछ के देख लीजिए"

मैं क्या पूछूंगा उस से, मैंने कल क्या कपडे पहने थे वो तक तो ध्यान नहीं रहता3 Full, stopऔर मैडम कह रही हैं कि पूछ के देख लो. क्या बकवास है ये!!

"मेरे लिए मुझसे दूर रह सकती हो? मेरी खुशी के लिए मुझे छोड़ सकती हो नव्या. बोलो"

नव्या ने ऐसी बात की कल्पना भी शायद न की हो, वो तो फिल्मी दुनिया वाली थी. तुम्हारे लिए जान ले लुंगी ,जान दे दूँगी टाइप; लेकिन मैं प्रैक्टिकल इंसान हूँ. उस के जैसे बिना दिमाग की बातें मैं नहीं सोच सकता।

वो आंखें फाड़े मुझे देखे जा रही थी जैसे के मैं अभी हंसते हुए कहा दूंगा कि -मैं तो मज़ाक कर रहा था- और वो भी साथ मे हंस देगी। लेकिन मैंने नाही ऐसा कहा ना ही अपने भाव बदले।

"बोलो नव्या कर सकती हो मेरे लिए. मैं उसकि तरफ झुक कर उसकी आँखों मे झांक कर बोला. " पता नहीं क्यों उसकी आंखों में ये सुनने के बाद का डर मुझे अच्छा लग रहा था।

"न. निशांत. मैं आपसे प्यार करती हूं. आपके बिना जीने की सोच भी नहीं सकती. मैं जान दे दूँगी अगर आपसे दूर हुई"

मैं यो जनता ही था ये जान देने लेने के सिवाय कुछ कर नहीं सकती; आज मुझे उस से नकारात्मक तरंगे मिलने लगी थी, ये लड़की मेरे लिए घातक हो सकती है.. जितना बच के रहो उतना अच्छा।

"अगर जान दे दोगी तो प्यार कैसा. हुह!! "मैंने व्यंग किया तो उसने मेरे हाथ को कस के पकड़ लिया और बोली " क्या समझते हैं आप खुद को. वो मीनल.. उस जैसी लड़की से टाइम पास कर सकते हैं लेकिन मुझे खुद से दूर कर रहे हैं क्यों" वो इतना कह के रोने लगी और मेरे कंधे पे सिर टिका लिया।

दूर बैठी मीनल आंखें बड़ी कर के हमे देख रही थी, मेरी नज़र उस पे गयी तो मैंने गुस्से से भौहों को उचका के क्या है पूछा, वो मुस्कुरा के नीचे देखने लगी। अब मुझे मीनल पर भी गुस्सा आ गया. ये सारी लड़कियां लड़को को समझती क्या हैं आखिर.

" मुझसे ऐसे चिपकना बंद करो मीनल. " मैंने ऐसा कह के नव्या को झटक दिया।

" नव्या!! नव्या नाम है मेरा..". वो आंसू पोछते बोली और तब मुझे याद आया कि मैं उसे मीनल पुकार गया।

" व्हाट एवर!! मेरा तुम्हारा कोई भी फ्यूचर नहीं ये बात अपने दिमाग मे बैठा लो" मैं अपनी अंगुली उसके सिर पे रख के गुस्से में बोला। "और हां मीनल किस टाइप की है ये मुझे मत समझाओ. तुम बताओ तुम्हारा क्या टाइप है. " मैने आंखों से अंगारे उगलते हुए उसे घूरा। मैं मीनल के बारे में किसी और से कोई बात करना नहीं चाहता था।

"प्लीज निशू. मुझे समझो"

"निशू!! तुम मुझे सिर्फ़ निशांत कहो समझी!. "

"मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती हूँ. तुम एक बार भरोसा कर के देखो" वो दृढ़तापूर्वक बोली।

"अच्छा कुछ भी कर सकती हो??. ठीक है चलो" मेरा दिमाग अब पूरी तरह खराब हो चुका था।

" क. कहाँ"

" मेरे घर. अभी कोई भी नहीं वहां. देखते हैं तुम क्या क्या कर सकती हो" मुझे पूरा भरोसा था कि वो डर जाएगी और मना कर देगी, लेकिन उस ने चैलेंज ले लिया।

"और मुझे गुस्से में घूरती हुई मुझसे पहले मेरे घर मे जाने लगी. मैंने चारो तरफ देखा तो मीनल को छोड़ कर किसी का भी ध्यान हम पे नहीं था। मैंने अपना सिर पकड़ लिया और खुद को कोसने लगा कि किस मनहूस घड़ी में यहां आया।

मैं नव्या के पीछे घर मे भागा. दरवाज़ा खुला होने के कारण वो अंदर जा चुकी थी, मैं अंदर भागा लेकिन वो वहां नहीं थी. मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था, किसी अनहोनी के डर से।

मैं अपने कमरे की तरफ भागा तो नव्या को वहां खड़ा देखा। बहुत ही कुटिल मुस्कान थी उस के चेहरे पे, एक बार को मैं घबरा गया. ये मुझपे कोई इल्ज़ाम लगा कर खेल न खेल जाए।

"यहाँ क्या कर रही हो तुम" मैं हकलाया।

" तुम्हें ही देखना था न मैं क्या कर सकती हूं. वो मेरे करीब आने लगी।।

लोग कहते हैं लड़कियां सुरक्षित नहीं आज कल, मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि मेरे जैसे बेचारे लड़के भी असुरक्षित हैं. लड़की कुछ कर भी ले और इल्ज़ाम भी लगा दे, कसम से रोना आ रहा था अपनी बेवकूफी पे।

" द. देखो नव्या, बाहर निकलो मेरे कमरे से. घर से बाहर चलो.."

तब तक वो मुझसे आ के चिपक चुकी थी. और मैं कांप रहा था. " क्या सोचा था आपने मैं डर जाउंगी, मैंने कहा न कुछ भी कर सकती हूँ" वो मेरी आँखों मे आंखें डाल के बोली।

मैं उस से दूर हटना चाह रहा था लेकिन घबराहट में पैर जम गए, उसके हाथ मेरी पीठ को सहलाने लगे;

" नव्या हट जाओ. तुम सही नहीं कर रही हो. ये प्यार नहीं ये ज़िद है. " कैसे भी कर के उसे अलग कर के बोल।।

वो कुछ नहीं बोली बस मुझे देखती रही और अचानक से ही उसके होंठ मेरे गालों को छू गए; पता नहीं क्यों मीनल का चेहरा मेरे सामने आ गया और मुझे ताकत दे गया।

मैंने बिना पल गवाए नव्या को दूर किया और एक जोरदार थप्पड़ उस के गालों पे लगा दिया, थप्पड़ इतना तेज था कि वो गिरने लगी लेकिन दूसरे हाथ से मैंने उसे थाम लिया।

" तुम्हें प्यार न करना आता है ना ही निभाना. तुम मेरे प्यार तो क्या दोस्ती लायक भी नहीं. अभी के अभी यहां से चली जाओ वर्ना अच्छा नहीं होगा" मैंने उसे दरवाज़ा दिखाते हुए कहा।

वो रोती हुई वहां से भागी " आप पछतायेंगे एक दिन. देख लेना"

मैं वहीं दरवाज़े के पास सिर पकड़ के बैठ गया, मेरे हाथ पैर अब भी कांप रहे थे. अब सिर्फ एक सहारा था सिगरेट. मैंने कांपते हाथों से ही सिगरेट जलाई और, कश मारने लगा।

" मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ होती है" मीनल की आवाज़ गूंजी।

" तो मैं क्या करूँ होती है तो,; ऐसा ही हूँ मैं" मैं चिल्लाया और नीचे बैठे बैठे ही दरवाज़े पे लात दे मेरी।
 
सिगरेट पी के मैं नीचे गया और सोफ़े पे पीछे की तरफ सिर टिका के लेट गया;दिमाग साथ नहीं दे रहा था। बाहर गानों की आवाज़ से सिर फटने लगा।

" ऐसे डर के घर मे छुप जाना अच्छी बात नहीं. " दरवाज़े से आवाज़ आयी।

" मीनल!!; तुम यहाँ क्यों आयी..?"

" अंकल ने आपको बुलाया. वो दरवाज़े से ही बोली।"

" तुम मुझे गलत समझती होगी न मीनल. " मैं नज़रें चुरा के बोला और वो हंसने लगी. मैं उसका मुँह देखने लगा कि ऐसा कौन सा जोक मार दिया मैंने।

" तुम न. बहुत भोले हो निशांत. इसी लिए मुझे अच्छे लगते हो. " अपनी तारीफ सुनते ही मेरी बत्तीसी झट से बाहर झांकने लगी. " सब से खास बात तुम्हारी ये है कि तुम लड़कियों की तरह डरना और रोना भी जानते हो" वो खूब हंसी और मैं मुँह टेढ़ा कर के उसे घूरने लगा; वो हँसती रही और मेरा टेढ़ा मुँह पता नहीं कब खुश हो गया उसकी हंसी देख के।

जो लड़की हर वक़्त जिल्लत की ज़िंदगी जीती है वो इतनी जिंदादिली से बाहर घूमती है; इतने ग़म के बाद खुशी का मुखौटा पहने मुझे हंसा रही है। कोई लड़की ऐसी भी हो सकती है. मुझे खुद की पसंद पे नाज़ हो चला था।

" अब चलो भी, गेट के बाहर भी जाना है खाना भी खाना है.." वो अब भी दरवाज़े पे थी।

मैं मुस्कुरा के बाहर आ गया. नव्या कहीं नहीं थी. मैंने राहत की सांस ली।

मैं गेट के बाहर गया मीनल पीछे से बिस्कुट लाती दिखी, कितनी प्यारी लगती थी वो अपनी ही धुन में चलते हुए, कभी लाइटों को देखती, कभी पेड़ों के हिलते पत्तों को तो कभी ज़मीन के कंकड़ को पैर से सरका के आगे बढ़ जाती।

गेट के बाहर आते ही उसने मुझे खुद को घूरता पाया और अपनी भौहें उचकयी, मैं उसकी पहले की भौहों को याद कर के मुस्कुरा दिया फ़िर बदले में दो बार अपनी भौहें उचका दी .

" मेरी नकल कर के मज़ा आता है ना तुम्हे" वो मुस्कुरायी।

"बिल्कुल!! तुम्हारी हरकतें ही ऐसी हैं. तुम अजूबा हो.."

वो ये सुन के थोड़ा उदास हो गयी. "लेकिन मैं अच्छा हूँ न??"

"तुम.. हुह !!बड़े आये. बिल्कुल पागल हो. छुप के सिगरेट पीने वाले गंदे इंसान" वो तुनक के बोली।

"मैं अच्छा हूँ न ! तू बता न पुप्पी. ये तो जलती है मुझसे" अब की मैंने कुत्ते से पूछा और मीनल हंस पड़ी।

मैं उसकी हंसी में खो गया फिर खुद को सम्हालते हुए बोला " वैसे अच्छा याद दिलाया.. " और मैं जेब टटोलने लगा। सिगरेट की कोई तलब नहीं थी लेकिन मीनल की प्रतिक्रिया जननी थी।

वो मुझे घूरने लगी ,और मैंने उस पे बिना गौर किये सिगरेट जला ली, फ़िर एक कश ले कर उसे बोला. " ओह हाँ!! वातावरण पे प्रभाव पड़ेगा " और हंसने लगा।

उसने गुस्से से सिगरेट छीन के फेंक दी. और तो और पैरों से मसल दी। " हुह!! बड़े आये सिगरेट पीने वाले;तमीज़ नाम की चीज़ ही नहीं. उसकि बड़बड़ चालू थी; शादी के बाद इसकी और मम्मी की बहुत बनेगी;साथ ही टेप रिकॉर्डर बजेगा. सोच कर ही मैं हंस पड़ा. और वो पैर पटकती हुई अंदर चली गयी।
 
जैसे जैसे समय कट रहा था, मेरे अंदर एक डर समा रहा था मीनल से अलग होने का। काश मीनल भी बंगलोर होती, सब कुछ कितना अलग होता. अभी तो छुट्टियां भी नहीं बची.. ।

मेरे पास शायद कल का ही दिन है , इसी में मीनल को उस के कैरियर की राह देनी है और अपने लिए उस के दिल मे थोड़ी जगह बनांनी है।

मैं अंदर आया तो नव्या से सामना हो गया, उसे अपने सामने देख कर मैं घबरा गया और मैं रास्ता बदलने के लिए दाई तरफ चला लेकिन शायद वो मुझे आसानी से छोड़ देने के मूड में नहीं थी।

" मेरे साथ डांस नहीं करेंगे??" वो मुस्कुरायी. "

"मैं पहले ही कह चुका हूँ तुमसे नव्या; क्यो मेरे पीछे पड़ी हो"

"ठीक है मैं अभी सब को बताती हूँ कि आप मुझे अपने घर के अंदर क्यों ले गए. "

"जस्ट शट अप. " मैंने उसे उंगली दिखाई,और वो हंसने लगी। आज मुझे वो दुनिया की सब से बदसूरत लड़की लगी, शायद रामायण, महाभारत बना रहा होता मैं तो सूर्पनखा या या पूतना टाइप के रोल इसे ही देता।

"मुझे तुमसे घिन आने लगी है नव्या, पहले मैं तुम्हारे लिए सोच भी रहा था लेकिन अब खुश हूं कि तुमने अपना असली रंग दिखा दिया;" मैं उसे नफरत भरी निगाहों से घूर रहा था।

"मैंने सिर्फ़ डांस के लिए पूछा है. और हां मेरी दोस्तों ने तुम्हारे घर जाते देखा मुझे" उसने कुटिल मुस्कान दी।

अब हंसने की बारी मेरी थी "तुम लड़कियों से मैं बस इतने ही दिमाग की उम्मीद रखता हूँ; चलो मैं बताता हूँ सब को की तुम मेरे घर गयी, और ये भी के तुम पहले गयी. फर्क सिर्फ इतना होगा कि मैं सबको दिखाऊंगा. जानती हो क्या. सीसीटीवी की फुटेज. वाओ!! मज़ा आएगा न नव्या;"

नव्या मैडम की खुशी अब गायब हो चुकी थी;

मैं फिर बोला. " वैसे मैं किसी की लाइफ में कोई इंटरेस्ट नहीं रखता लेकिन फिर भी तुम्हे एक मुफ्त की सलाह देता हूँ. यु नो . इंसानियत के नाते; जो भी फालतू के टीवी सीरियल, और बी ग्रेड टाइप की मूवी देखती हो बंद कर दो. वर्ना ऐसे ही विलेन बन के रह जाओगी और किसी का भी प्यार न पा सकोगी; हटो अब मेरे रास्ते से" मैं उसके कंधे पे हाथ रख के उसे किनारे कर के आगे बढ़ गया।

मेरा गुस्सा बहुत बढ़ गया था तो मैं लंबी सांसें लेने लगा , सामने से मीनल ने आ के पूछ लिया "क्या हुआ हांफ क्यों रहे हो. आज तबियत फिर खराब हो गयी क्या?"

मैंने उसे घूर के देखा और कहा " जब दिमाग है नहीं तो तुम लड़कियां इस्तेमाल क्यों करती हो. "

मीनल का मुँह बन गया. " मैं खाना खाने जा रही हूँ बाई. " और वो आगे जाने लगी, मैंने उसकी कलाई पकड़ ली और पीछे किया जिससे वो वापस मेरे सामने थी।

" हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ऐसे जाने की. मेरे सामने रहो तुम. समझी!! मेरी आँखों से इधर उधर भी मत हो जाना. "

" तुम किसी और का गुस्सा किसी और पे रोज़ ही निकालते हो या मेरे साथ ही ऐसा करते हो. " उसका मुँह लटक गया था। मेरा उबालें मरता दिमाग उसका उतरा चेहरा देख के थोड़ा ठंडा पड़ गया।

"मीनल.. अभी कुछ मत कहो.. बस ऐसे ही खड़ी रहो मेरे पास, मेरे सामने. और दुखी हो कि नहीं. मुस्कुरा कर. "

उस बुद्धू को क्या पता था कि उसे देखते ही मुझे सुकून मिलने लगता है. और मुझ बेवकूफ को प्यार से कहना आया नहीं तो बात बिगड़ गयी।

वो वहां से चली गयी और अपनी पसंदीदा दीवार पे जा के टिक गई. मैं वहीं खड़ा रहा उसे देखता रहा. वो शायद मेरी मनोदशा समझ रही थी।

वहीं से उसने खाने का इशारा किया तो मुझे याद आया. मैं मुस्कुरा कर खाना लेने चल दिया।

मैंने आज खूब सारा खाना मीनल के लिए लिया, और टिश्यू पेपर , पानी सब, 2 चम्मच. उस के लिए ये सब करने में अलग ही मज़ा था।

मैंने खाना ला कर दीवार पे रखा और उसे खाने के लिए कहा " इतना सारा खाना!! मैं कैसे खाऊँगी" उसने अपनी भौहों को उचका के बोला। ये कितनी प्यारी लगती है ऐसी हरकतों में भी. मैं उसे देख के मुस्कुराता रहा।

"तुम्हारा खाना कहाँ है??" अब उसका ध्यान मेरी ओर गया।

" वो क्या है ना!! यहां पे कुछ लोग हैं जो खाना छोड़ के भाग जाते हैं फिर मुझे दो दो प्लेट का खाना खत्म करना पड़ता है" मैं उसके चेहरे के पास, अपना चेहरा ले जा के धीरे से बोला।

"म. मतलब!!" वो असहज हो कर अपना चेहरा थोड़ा पीछे करते हुए बोली।

" मतलब ये कि आप खाइये, जब पेट भर जाए तो बता दीजिएगा . बाकी मैं खा लूंगा।"

" मैं अपना जूठा किसी को नहीं खिलाती. " वो घबरा के बोली।

" लेकिन मैंने तो आपका जूठा खाया है. देवी जी" मैंने उसके आगे हाथ जोड़ कर उसे छेड़ा।

"द. देखो. ये क्या हरकतें हैँ ; " वो अब डर भी गयी।

मैंने अब उस की बकबक और सवालों से बचने का रास्ता निकाल लिया और उसकी थाली से एक रोटी सब्जी का एक टुकड़ा उस के मुँह में डाल दिया। उसने आंखें बड़ी कर ली जैसे कह रही हो कि ये क्या तमीज़ है तो मैंने अपने होठों पे अपनी उंगली रख के उसे चुप चाप खाने का इशारा किया।

वो चुप हो कि खाने लगी मैं दोनों हाथ बांधे उसे देखता रहा। बेचारी ने कैसे भी कर के पूरा खाना खत्म किया।

" अब तो मैं चल भी नहीं पाऊँगी. तुम्हे बिल्कुल तमीज़ नहीं"

" थैंक यू तारीफ के लिए.. बोलो तो मैं घर तक उठा के ले चलता हूँ. सोच लो. किस्मत चमक जाएगी" मैंने बत्तीसी दिखाई और वो बुरी तरह झेंप कर ज़मीन देखने लगी।

" वैसे तुम कहो तो मैं भी खा लू?? मैं तो इस इंतेज़ार में था कि तुम भी मुझे खिलाओगी.. लेकिन तुमने तो . उफ़्फ़;"

"वो;म. मैं ले आती हूँ तुम्हारे लिए. "

"तुम यहीं बैठो मीनल. मैं ले के आता हूँ. जाना नहीं कहीं"

मैं खाना लाया तो मीनल को किसी सोच में परेशान पाया।

" मीनल!! किस सोच में डूबी हो?" मैं बिना पूछे न रह सका।

"कुछ नहीं. तुम खाना खाओ" वो उसी तरह बैठी रही।

मैं उसकी तरफ मुँह कर के बैठा और बोला

"अब भी मुझसे इतना क्यों कतराती हो मीनल;मुझे इस लायक भी नहीं समझती तुम कि कुछ बता सको. " मैं सच मे उदास हो चला था, होता भी कैसे न.. कितना कम टाइम बचा था साथ गुज़ारने को।

"मैं नव्या के लिए सोच रही थी. निशांत वो बुरी नहीं. तुमसे बहुत ज्यादा. आई मीन..तुम्हे पसंद करती है वो" मीनल को प्यार शब्द बोलने मे भी शरम आ रही थी. मतलब ये तो हद्द है।
 
मेरा निवाला मुँह के पास ही रुक गया था ये सुनके. मन हुआ कि खाने की थाली ही फेंक दूं कहीं। जिस से प्यार करता हूँ वो समझा रही है कि फलांना मुझे पसंद करती हैं।

गुस्सा मुझे कितना कम आता है ये तो अब तक सब जान ही गए होंगे।

"मीनल. क्या चाहती हो. खाना खाऊं या ये भी तुम्हे खिलाऊँ??" मेरे गुस्से से अब तक वो भी वाकिफ हो चुकी थी।

"मैं तो बस. मुझे उसे रोता देख बुरा लगा. " मीनल की इस बात से मेरा दिल तड़प गया , नव्या का दुःख दिख गया.. और मेरा क्या. मेरी आँखों मे कुछ नहीं दिख पाया इसे।

" और मेरी तकलीफ!!.. वो दिखती है तुम्हे. " मैंने एक हाथ से अपनी थाली सरकाई और दूसरे हाथ से उसकी कलाई कस के पकड़ ली. मैं जानता हूँ ये तरीका गलत है, लेकिन सही तरीके से लड़कियों ने न समझने की कसम जो खाई है।

न जाने क्यों मेरी आँखें भर आयी थी और मैं अपने सवाल का जवाब उसकी आँखों मे खोजने लगा। मीनल इस वर्ताव के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी और डर से कांप रही थी।

"निशांत मुझे जाना चाहिए. जो भी मैंने कहा उस के लिए माफी मांगती हूँ, मैं तुम्हारी तकलीफ़ समझती हूँ. " मेरे उसकी आँखों मे झांकने के कारण अब उसने आंखें नीची कर ली और हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी, लेकिन मैंने ना ही उसका हाथ छोड़ा ना ही उसके चेहरे से नज़रें हटाई।

"निशांत प्लीज खाना खा लो, मेरा हाथ छोड़ दो.." उसके शब्दों में दर्द भर आया था।

"क्यों दर्द हो रहा है? . मेरी तरफ देख के बात करो मीनल.." मैं गुर्राया। उसने एक बार मेरी गुस्से और तकलीफ़ से भरी आंखों के आंसुओं को देखा और फ़िर से नज़रें झुका ली।

"मुझे भी इतना ही दर्द हुआ मीनल. तुम्हारे तो सिर्फ़ हाथ मे है. मुझे सीने में हुआ.. कितना बेचैन रहा, कितना तड़पा, तुम क्या जानो. जानती तो ऐसा सोचती भी नहीं"

मेरे हाथों में उसके आँसू की बूंद आ गिरी. जैसे किसी तपते हुए रेगिस्तान में बारिश हो गयी हो. और सारी जलन, तपन मिट गई हो. मैं भी रेत की तरह भीगा था , वो बादल सी बरस गयी।

सारा गुस्सा, दुःख उस के आंसुओं में बह गया।

"आई एम सॉरी मीनल. मैंने उसका हाथ छोड़ दिया.

"प्लीज आंसू पोछ लो. तुम्हे ऐसे देख के मेरा दिल दहल जाता है. " मैं तड़प उठा।

"खाना खा लो, वो आंसू पोछते हुए बोली. और, मैं चुप चाप खाने लगा।

खाने के बाद मैं बोला " तुम नाराज़ हो?"

"मुझे कौन मनाने वाला है निशांत जो नाराज़ हो जाऊं" उसने फीकी हंसी दी।

"मीनल मैं हूँ न. खुद के लिए प्लीज कुछ ऐसा मत कहा करो; बोलो तो पैरों पे गिर के माफी मांग लू.." मैं झुकने लगा और वो कूद पड़ी।

"क्या कर रहे हो. मैं तुमसे गुस्सा नहीं। उल्टा तुम ही नाराज़ हो. जब से गेट से अंदर आये हो, ऐसी हरकतें कर रहे हो, कभी कभी लगता है कि तुम्हारा दिमाग ही खराब है. "

मैं अब मुस्कुरा पड़ा.. " मतलब पैरों के गिर के माफी मांगनी ही होगी मुझे; " वो भी मुस्कुरा दी. .. "खड़ूस.." और मैं हंस दिया..

" गुड नेम, आई लाइक इट" फिर मैं कुछ रुक के बोला..

." कल हम घूमने जा रहे हैं..याद है ना"

" लेकिन मॉर्निंग में टैन्ट हटवाना है..बहुत काम है. " उसने लाचारी दिखाई।

"काम हो जाएगा उसकी फिकर मत, करो. तुम बस मेरे साथ कल जा रही हो. समझी!!"

"ह्म्म्म"

"क्या हम्म"

"अरे बाबा समझ गयी. अब मैं घर जा रही हूँ"

"जाओ. मीनल!! "मैंने आवाज़ दी;"कल तुम. "

" हाँ अच्छे से तैयार हो कर आना यही न. " मेरी बात पूरी कर के वो मुस्कुरायी।

"नहीं. मैंने गर्दन हिलायी. " तुम जैसी हो वैसी ही आना. "

इतना कहते ही मैं तेज़ कदमों से घर की तरफ चला गया।

अपने कमरे में आते ही मैं बिस्तर पर लेट गया।
 
Back
Top