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Guest
पापा ने जैसे ही ये कहा मेरे सामने फ़िर एक बार मीनल आ गयी, क्या मीनल ही है जिसे मैं तलाश रहा था. लेकिन वो तो बिल्कुल भी वैसी नहीं जैसी लड़की के लिये मैं सब से कहता हूँ; इनफैक्ट वो तो सब से अलग है. उसकी हंसी में अब भी किसी मासूम बच्चे की झलक, दिखती है, और इतनी सहनशक्ति तो मैंने किसी मे नहीं देखी; मुझे पता नहीं क्यों वो अब नव्या से कहीं ज्यादा सुंदर लगने लगी थी;।
"क्या सोचने लगा. ? देख ले बेटा. हो सकता है तेरे आस पास कोई हो..तेरे जैसा..ऐसा न हो कि देर हो जाये और तूझे पछताना पड़े"
"पापा आप ही कुछ हेल्प कीजए न. मुझे कुछ, समझ नहीं आ रहा" मैं मायूस था।
" हम्म्म्म. नव्या से बात चलाऊ फ़िर.. वो बिल्कुल तेरे टाइप की है. जैसी तुझे पसंद हैं वैसी; " पापा मेरे साथ खेल खेलने लगे।
" पापा नहीं? बिल्कुल नहीं. मैं सोफे से उठ के हाथ जोड़ते हुए बोला" और पापा मुस्कुरा दिए।
"हम्म्म्म. फ़िर तो और कोई है नहीं यहां;मीनल जैसी तुझे चलेगी नहीं.. तेरे स्टैण्डर्ड की कहाँ वो.." पापा ने अपने चेहरे पे सोचने न नाटक करते हुए कहा।
"नहीं पापा . मीनल बहुत अच्छी है" मैं कुछ ज्यादा ही चहक के बोला. औऱ पापा हंस पड़े।
" ठीक से सोच ले बेटा. उस टाइप की लड़की खोजी तो तू शादी नहीं कर पायेगा; तू ही बता तू क्या मीनल के साथ पूरी जिंदगी बिता सकेगा. नहीं ना!!"
" क्यों नहीं पापा; उसके साथ तो मैं पूरी लाइफ ऐसे ही राह सकता हूँ. वो मेरे साथ होती है ना तो सब अच्छा लगता है, और जब वो नहीं दिखती ना तो मुझे बहुत बेचैनी हो जाती है"
जो बात मैं खुद को समझा नहीं पा रहा था, पापा ने बड़े आराम से उगलवा ली।
" तू कहना क्या चाहता है; मीनल से शादी कर लेगा . नहीं बेटा .. वो तेरे टाइप की नहीं. और वो तेरी नहीं हो सकती. तू अगर चाहे भी तो" पापा इस बात चिंता जताते हुए बोले।
" पापा वो मेरी नहीं हो सकती, मैं तो उसका हो सकता हूँ ना. मुझे उसकी खुशी चाहिए; जब वो उदास दिखती है ना. तो मैं तड़प जाता हूँ. मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है"
"क्यों कि तू उसे पसंद करता है. बोल कर सकेगा उस से शादी.. सब कुछ जान के भी"
मेरी धड़कने बहुत तेज़ हो गयी, मीनल को अपनी जीवनसंगिनी के रूप में देख के,; जिसको एक बार छू लेने पर मेरी हालत खराब हो गयी थी, क्या उस के साथ जीवन यापन हो पायेगा. उस के साथ रहना भी था , और शादी का सोच कर घबराहट भी हुई;
"मीनल बहुत प्यारी है बेटा. उसे कभी तकलीफ मत देना. तेरे पास दो दिन हैं अभी सोचने के लिए. कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं". मैं चुप हो कि सुनता रहा फिर याद आने पर पूछा।
"पापा मीनल के दादाजी. क्या हुआ उनके साथ??. वो आज खुद को उनकी हालत का जिम्मेदार ठहरा रही थी. मुझे बताइये न पापा ऐसी क्या तकलीफ है उसकी जिंदगी में. "
" ज़रूर बताऊंगा, लेकिन सही वक्त आने पर. मैं नहीं चाहता कि मेरी बच्ची को कोई भी तरस खा कर पसंद करे या अपनाए. जो उसे पसंद करेगा वो उसे हर हाल में स्वीकारेगा. तुम अभी जितना कहा उतना ही करो. खुद को पहचानो"
मैंने हामी भरी फिर उन्हें बताया कि मीनल के साथ घूमने जाने का प्लान है उनकी कार उधार चाहिए।
पापा ने मेरा माथा चूम के हामी भरी और मीनल के साथ कुछ भी गलत न करने की हिदायत भी दी।
मैं कमरे में आ के कपडे बदल के लेट गया।
पापा की कही बातें, मीनल के साथ बिताया पल सब याद आने लगा; इतना मैं समझ गया था कि मीनल मेरे लिए बहुत ही खास हो गयी है , लेकिन प्यार और शादी का सोच कर अब भी अंदेशे में ही था।
आंखें बंद की तो मीनल मुस्कुराती दिखी, मैंने अनजाने में ही उसे छू लेने के लिए हाथ बढ़ा दिए. और फ़िर उसकी छुअन को महसूस कर के तड़प उठा।
कैसी विषम स्थिति थी मेरी, मुझे हर जगह मीनल दिखती, उसे महसूस करना चाहता, उस के साथ रहना चाहता.. लेकिन वो तो बस खयालों में थी मेरी भवनाओं से परे. अपने ही ग़म में सीमित. उस परिधि से बाहर निकलने के लिए हम दोनों को इस पवित्र प्रेम की अनुभूति होना ज़रूरी था।
मैं तड़प के अपने बिस्तर पे करवटें लेता रहा, जैसे एक क्षण भी मीनल के बिना जीवन व्यर्थ हो, कभी सीने की टीस को दबाता, कभी सिहरन होने पर अपने पेट पे हाथ फेरता..
लहंगे में भागती मीनल दिखती तो अपने हाथों से घेरा बना के उसे जकड़ लेता कि वो गिर न जाये और अगले ही पल उसकी छुअन महसूस होते ही सिहर उठता।
मैंने अपना मोबाइल निकाल लिया और उसकी वीडियो देखी एक बार, दो बार, तीन बार; न जाने कितनी बार. हर बार मुझे वो और प्यारी. और प्यारी लगती रही।
उसकी फोटो याद आयी तो देखने लगा. जब वो मुझे देख रही है, और जब पलकें झुकी हुई हैं; शरम से सुर्ख गाल. इतनी सुंदर वो अब हुई या मेरी नज़रों को सुंदरता के मायने ही नहीं पता थे।
" क्या सच मे तुम मेरे साथ पूरे जीवन भर रहने के लिए बनी हो मीनल; क्या तुम्हें भी ऐसा एहसास होता है, ऐसी तड़प होती है मेरे साथ हो कर या मुझसे दूर रह कर; बोलो न मीनल" मैं उसकी फोटो से नज़रें मिला के बात कर रहा था।
न जाने किस प्रेरणा वश मैं उसकी फोटो को चूमने को उतावला हुआ, अपने होठों को उस की फ़ोटो के होठों के करीब लाया और रुक गया; ऐसा लगा जैसे वो सामने ही हो, मैं काँपने लगा, धड़कनों की रफ्तार बढ़ चुकी थी; और मैं पीछे हट गया।
"आई एम सॉरी मीनल "; इतना गंदा खयाल मुझे आया भी कैसे. खुद पर शर्मिंदगी होने लगी मुझे;इस मौसम में भी पसीना पसीना हो गया। जब कुछ समझ नहीं आया तो बाथरूम में शावर के नीछे खड़ा हो गया।
मुझे मेरी बीमारी अब थोड़ी समझ आने लगी थी. लेकिन मैं इसे प्यार मानने को तैयार नहीं था. सच कहूं तो कभी प्रेम का ऐसा एहसास हुआ नहीं था तो समझता भी कैसे।
किसी तरह मैं सोया. इस खुशी में कि कल मीनल के घर जाऊंगा।
सुबह उठा तो थोड़ा ठीक महसूस किया और रोज़ की ही तरह जॉगिंग पे निकल पड़ा। नज़रें मीनल को खोज रही थीं। आज मैंने महसूस किया कि दो औरतें मुझे देख कर इशारे में कुछ बोल रही हैं, उनके हाव भाव से तारीफ तो नहीं लगी।
मुझे अच्छा नहीं लगा लेकिन मैं आगे बढ़ता गया।
"क्या सोचने लगा. ? देख ले बेटा. हो सकता है तेरे आस पास कोई हो..तेरे जैसा..ऐसा न हो कि देर हो जाये और तूझे पछताना पड़े"
"पापा आप ही कुछ हेल्प कीजए न. मुझे कुछ, समझ नहीं आ रहा" मैं मायूस था।
" हम्म्म्म. नव्या से बात चलाऊ फ़िर.. वो बिल्कुल तेरे टाइप की है. जैसी तुझे पसंद हैं वैसी; " पापा मेरे साथ खेल खेलने लगे।
" पापा नहीं? बिल्कुल नहीं. मैं सोफे से उठ के हाथ जोड़ते हुए बोला" और पापा मुस्कुरा दिए।
"हम्म्म्म. फ़िर तो और कोई है नहीं यहां;मीनल जैसी तुझे चलेगी नहीं.. तेरे स्टैण्डर्ड की कहाँ वो.." पापा ने अपने चेहरे पे सोचने न नाटक करते हुए कहा।
"नहीं पापा . मीनल बहुत अच्छी है" मैं कुछ ज्यादा ही चहक के बोला. औऱ पापा हंस पड़े।
" ठीक से सोच ले बेटा. उस टाइप की लड़की खोजी तो तू शादी नहीं कर पायेगा; तू ही बता तू क्या मीनल के साथ पूरी जिंदगी बिता सकेगा. नहीं ना!!"
" क्यों नहीं पापा; उसके साथ तो मैं पूरी लाइफ ऐसे ही राह सकता हूँ. वो मेरे साथ होती है ना तो सब अच्छा लगता है, और जब वो नहीं दिखती ना तो मुझे बहुत बेचैनी हो जाती है"
जो बात मैं खुद को समझा नहीं पा रहा था, पापा ने बड़े आराम से उगलवा ली।
" तू कहना क्या चाहता है; मीनल से शादी कर लेगा . नहीं बेटा .. वो तेरे टाइप की नहीं. और वो तेरी नहीं हो सकती. तू अगर चाहे भी तो" पापा इस बात चिंता जताते हुए बोले।
" पापा वो मेरी नहीं हो सकती, मैं तो उसका हो सकता हूँ ना. मुझे उसकी खुशी चाहिए; जब वो उदास दिखती है ना. तो मैं तड़प जाता हूँ. मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है"
"क्यों कि तू उसे पसंद करता है. बोल कर सकेगा उस से शादी.. सब कुछ जान के भी"
मेरी धड़कने बहुत तेज़ हो गयी, मीनल को अपनी जीवनसंगिनी के रूप में देख के,; जिसको एक बार छू लेने पर मेरी हालत खराब हो गयी थी, क्या उस के साथ जीवन यापन हो पायेगा. उस के साथ रहना भी था , और शादी का सोच कर घबराहट भी हुई;
"मीनल बहुत प्यारी है बेटा. उसे कभी तकलीफ मत देना. तेरे पास दो दिन हैं अभी सोचने के लिए. कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं". मैं चुप हो कि सुनता रहा फिर याद आने पर पूछा।
"पापा मीनल के दादाजी. क्या हुआ उनके साथ??. वो आज खुद को उनकी हालत का जिम्मेदार ठहरा रही थी. मुझे बताइये न पापा ऐसी क्या तकलीफ है उसकी जिंदगी में. "
" ज़रूर बताऊंगा, लेकिन सही वक्त आने पर. मैं नहीं चाहता कि मेरी बच्ची को कोई भी तरस खा कर पसंद करे या अपनाए. जो उसे पसंद करेगा वो उसे हर हाल में स्वीकारेगा. तुम अभी जितना कहा उतना ही करो. खुद को पहचानो"
मैंने हामी भरी फिर उन्हें बताया कि मीनल के साथ घूमने जाने का प्लान है उनकी कार उधार चाहिए।
पापा ने मेरा माथा चूम के हामी भरी और मीनल के साथ कुछ भी गलत न करने की हिदायत भी दी।
मैं कमरे में आ के कपडे बदल के लेट गया।
पापा की कही बातें, मीनल के साथ बिताया पल सब याद आने लगा; इतना मैं समझ गया था कि मीनल मेरे लिए बहुत ही खास हो गयी है , लेकिन प्यार और शादी का सोच कर अब भी अंदेशे में ही था।
आंखें बंद की तो मीनल मुस्कुराती दिखी, मैंने अनजाने में ही उसे छू लेने के लिए हाथ बढ़ा दिए. और फ़िर उसकी छुअन को महसूस कर के तड़प उठा।
कैसी विषम स्थिति थी मेरी, मुझे हर जगह मीनल दिखती, उसे महसूस करना चाहता, उस के साथ रहना चाहता.. लेकिन वो तो बस खयालों में थी मेरी भवनाओं से परे. अपने ही ग़म में सीमित. उस परिधि से बाहर निकलने के लिए हम दोनों को इस पवित्र प्रेम की अनुभूति होना ज़रूरी था।
मैं तड़प के अपने बिस्तर पे करवटें लेता रहा, जैसे एक क्षण भी मीनल के बिना जीवन व्यर्थ हो, कभी सीने की टीस को दबाता, कभी सिहरन होने पर अपने पेट पे हाथ फेरता..
लहंगे में भागती मीनल दिखती तो अपने हाथों से घेरा बना के उसे जकड़ लेता कि वो गिर न जाये और अगले ही पल उसकी छुअन महसूस होते ही सिहर उठता।
मैंने अपना मोबाइल निकाल लिया और उसकी वीडियो देखी एक बार, दो बार, तीन बार; न जाने कितनी बार. हर बार मुझे वो और प्यारी. और प्यारी लगती रही।
उसकी फोटो याद आयी तो देखने लगा. जब वो मुझे देख रही है, और जब पलकें झुकी हुई हैं; शरम से सुर्ख गाल. इतनी सुंदर वो अब हुई या मेरी नज़रों को सुंदरता के मायने ही नहीं पता थे।
" क्या सच मे तुम मेरे साथ पूरे जीवन भर रहने के लिए बनी हो मीनल; क्या तुम्हें भी ऐसा एहसास होता है, ऐसी तड़प होती है मेरे साथ हो कर या मुझसे दूर रह कर; बोलो न मीनल" मैं उसकी फोटो से नज़रें मिला के बात कर रहा था।
न जाने किस प्रेरणा वश मैं उसकी फोटो को चूमने को उतावला हुआ, अपने होठों को उस की फ़ोटो के होठों के करीब लाया और रुक गया; ऐसा लगा जैसे वो सामने ही हो, मैं काँपने लगा, धड़कनों की रफ्तार बढ़ चुकी थी; और मैं पीछे हट गया।
"आई एम सॉरी मीनल "; इतना गंदा खयाल मुझे आया भी कैसे. खुद पर शर्मिंदगी होने लगी मुझे;इस मौसम में भी पसीना पसीना हो गया। जब कुछ समझ नहीं आया तो बाथरूम में शावर के नीछे खड़ा हो गया।
मुझे मेरी बीमारी अब थोड़ी समझ आने लगी थी. लेकिन मैं इसे प्यार मानने को तैयार नहीं था. सच कहूं तो कभी प्रेम का ऐसा एहसास हुआ नहीं था तो समझता भी कैसे।
किसी तरह मैं सोया. इस खुशी में कि कल मीनल के घर जाऊंगा।
सुबह उठा तो थोड़ा ठीक महसूस किया और रोज़ की ही तरह जॉगिंग पे निकल पड़ा। नज़रें मीनल को खोज रही थीं। आज मैंने महसूस किया कि दो औरतें मुझे देख कर इशारे में कुछ बोल रही हैं, उनके हाव भाव से तारीफ तो नहीं लगी।
मुझे अच्छा नहीं लगा लेकिन मैं आगे बढ़ता गया।