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Guest
मुझे इंतेज़ार था आज रात का. टाइम कम ही था लेकिन जब कुछ ज़रूरी काम हो यो घड़ी अचानक से ही धीमी पड़ जाती है।
टाइम काटने के लिए मैने कुछ देर सोने का निश्चय किया और लेट गया, लेकिन बड़ी अजीब बात थी मैं सो नहीं पा रहा था। फिर उठ के खिड़की से बाहर मीनल के घर की तरफ देखने लगा।मुझे खुद में आये इस बदलाव का एहसास तक नहीं था।
खैर!! जैसे तैसे वक़्त गुज़रा. घर मे पूजा के बाद हम बाहर इकट्ठा हुए। मैंने आज महरून कुर्ता पजामा और उस पे हलके सुनहरे रंग का नेहरू जैकेट डाला। मौसी और मम्मी ने बाहर निकलने से पहले तक ना जाने कितनी बार मेरी बलाएं ली, मेरे कान के पीछे काजल भी लगा दिया, ओह गॉड!!
मेरी नज़रें आज सिर्फ और सिर्फ मीनल को खोज रही थीं, ऐसी बेचैनी सी होने लगी जी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी; मैं अच्छी तरह समझ गया कि मेरी तबियत ठीक नहीं।
" पीछे की तरफ सब चेक करने गयी है, अभी आती ही होगी" पापा ने अचानक से मेरे पीछे खड़े हो कर बोला।
" क्या पापा डरा दिया आपने. " मैं चिढ़ कर बोला;" और आप किस की बात कर रहे हैं. " मैं सच मे नही जानता था कि पापा क्या कहना चाह रहे थे।
" मीनल. !!. अभी आ जायेगी"
अपनी पूरी ज़िंदगी मे इतना हैरान परेशान मैं कभी नहीं हुआ, जितना आज पापा की बात सुन कर हुआ।
" पापा. आपको कैसे पता??"
पापा मुस्कुराये और मेरा गाल छुआ " तेरा बाप हूँ मैं बेटा"
" पापा मुझे न कुछ अच्छा नहीं लग रहा, मुझे लगता है मेरी तबियत खराब हो रही है, बार बार चेस्ट की तरफ पेन से फील हो रहा है"
पापा ये सुन कर हंसने लगे;" मेरी तबियत खराब है और आप हंस रहे हैं. दिस इज़ नॉट फेयर!!"
"बेटा अभी आराम हो जाएगा खुद से बस दो मिनेट इंतेज़ार करो" इतना कह कर पापा अपने ग्रुप के साथ गप्पें मारने चले गए।
" मैं इधर उधर देखता रहा. लेकिन न तबियत ठीक हुई न मीनल, दिखी।" तभी आरती के लिए घोषणा हुई और मेरी नज़र स्टेज की तरफ चली गयी, देखा तो मीनल पण्डित जी के बगल में खड़ी थी हाथ में आरती की थाली सजा के पंडित जी को पकड़ा कर नीचे आ गई।
मेरे मन को एक सुकून मिला, और पापा की बात सच हुई, मेरी तबीयत भी ठीक लगने लगी अचानक ही, सीने में दर्द भी नहीं था।
मुझसे कुछ दूरी पर वो खड़ी हो कि आरती गया रही थी और मैं उसे देख रहा था, मीनल ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा तो मैं उदास हो गया।
कुछ आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो ध्यान दिया " हाय कितना हैंडसम है, "
"तमीज़ से बात कर तेरे जीजू हैं"
"आये हए बड़ी आयी जिज्जु. हुह!!"
मेरा पारा चढ़ चुका था, कैसी लड़कियां हैं पूजा करने आई हैं या अपनी शादी करने . बेशर्म. एक मीनल है, कितनी अच्छी है . मैं सब की तुलना मीनल से करने लगा था, सच तो ये था कि आज मेरा मन भी आरती में नहीं था।
आरती के बाद गरबा शुरू हुआ मैं कल की ही तरह एक कोने ओर बैठ गया, जहां से मीनल बैठी दिखे।
नव्या मेरे पास आ कर गरबे के लिए बोली, आज भी वो गज़ब की सुंदर लग रही थी, लेकिन मुझे उस मे कोई इंटरेस्ट नहीं रह गया था।
"सॉरी आई डोंट डांस"
"प्लीज;मेरे लिए. एक बार. "
" सॉरी नव्या. मैं अपने लिए भी नहीं करता डांस तो किसी और के लिए कैसे कर लूं.." वो उदास सी चली गयी।
और मैं मीनल को देखने लगा. आज वो थोड़ा तैयार हुई थी, मैं ये नहीं कहूंगा कि बहुत अच्छे से तैयार थी लेकिन शायद उस के हिसाब से वो अच्छी बन के आयी थी।
वो चारों तरफ सिर घुमा घुमा के गरबे करने वाले लोगों को देख रही थी, मैं उसे देख के मुसकुरा रहा था; कितना अच्छा था सब! अचानक उसकी नज़रे मुझ से टकराई और वो कुछ सेकण्ड्स के लिए देखती रही जैसे ये समझना चाह रही हो कि मैं किसे देख रहा हूँ। मैं अपने दांत दिखा के मुस्कुराया तो वो समझ गयी और गर्दन घूमा ली।
, स्टेज में आज कुछ परफॉर्मन्स शुरू हुई। बच्चे बड़े कुछ न कुछ टैलेंट दिखा रहे थे, हर परफॉरमेंस के बाद वो बहुत खुश हो कर ताली बजाती, और मुझे उसके आगे झुक कर ताली बजाने की स्टाइल पर हंसी आ जाती । एक परफॉरमेंस के बाद ताली बजाते हुए उस उसने मुझे देखा और मुझे खुद पर हँसता पाया तो अपनी भौहों को उठाने के साथ अपना मुंह भी टेढ़ा कर के बैठ गयी। मैं जोर से हंस पड़ा।
"निशांत मल्होत्रा, निशांत मल्होत्रा!!; मुझे गूंजती सी आवाज़ आयी, इतने में नव्या आ कर बोली आपका नाम अनाउंस हो रहा है जाइये।
मेरा नाम. मैं हैरान परेशान सा स्टेज की तरफ़ गया।
"निशांत जहां कहीं भी हो स्टेज पे आएं और अपनी मधुर आवाज में गाना सुनाए।"
मेरे पहुचने तक एक बार और नाम बोला जा चुका था। मैंने स्टेज पे पहुँचते ही गुस्से में पूछा
" किसने दिया मेरा नाम??"
"पहले गाना गा लो न भइया फिर ये सब करना", एक लड़का बोला।
"रुको सोचने दो कौन सा गाउँ" तब तक लड़कियां चिल्ला कर ताली बजाने लगी, मैंने भीड़ में मीनल को देखा जो बिना भाव के स्टेज निहार रही थी।
मेरे मुह से गाने के बोल खुद ही फुट पड़े
सुन ज़ालिमा
मेरे सानु कोई डर ना
की समझेगा ज़माना
ओह तू वि सी कमली, मैं वि सा कमला
इश्क दा रोग सयाना ,
सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर
की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर
जितनी हसीं ये मुलाकातें हैं उनसे भी प्यारी तेरी बातें हैं
बातों में तेरी जो खो जाते हैं आऊँ ना होश में मैं कभी
बाहों में है तेरी ज़िन्दगी हाय
नहीं था पता के तुझे मान लूँगा खुदा
की तेरी गललियों में इस कदर आऊंगा हर पहर
सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर रहूँगा बस वही उम्र भर हाय .
मुझे पता भी नहीं चला कि ये गाना मैंने क्यों गाया, या शायद दिल की आवाज़ समझ नहीं पा रहा था , दिमाग पे परफेक्शन का भूत जो सवार था।
जब तालियां बजी तो याद आया कि मैं स्टेज पे अपना गाना गा चुका हूँ, तेज़ी से उतर के मैं मेन गेट के बाहर भागा। पता नहीं किसी से नज़रें मिलने का मन नहीं था, मीनल से भी नहीं पूरा गाना उसे ही देख कर जो गाया।
क्या सोच रही होगी वो मेरे बारे में; खुद पे गुस्सा आने लगा था। सिगरेट ली और टहलने लगा, नज़र फ़िर गेट की तरफ़ गयी मीनल के आने का भी वक़्त हो चला था।
बिस्कुट लिए वो आती दिखी, इस बार उसे देखने के बाद सीने में बीच की तरफ एक टीस सी उठी और नीचे की तरफ़ जा के पेट मे हल्की गुदगुदी की। मैं परेशान हो गया और सिगरेट फेंक कर पेट पे हाथ रखा और सोचा कि डॉक्टर को दिखा लूंगा एक बार जाने से पहले।
मुझे सिगरेट फेंकते हुए मीनल ने देख लिया, और मुस्कुराने लगी लेकिन मैं ना जाने क्यों आज नहीं मुस्कुरा पाया, न ही आज उस के पास जा के कुत्तों वाली बातें सुनी। बस दूर खड़ा उसे देखता रहा बिना किसी भाव के।
मीनल ने हाथ से इशारा कर के बुलाया तो मैंने गर्दन घुमा के मना कर दिया। उस ने आओ न कहते हुए फिर बुलाया. और मैं किसी रोबोट की तरह उस के पास चला गया।
वो न जाने क्या क्या बोलती रही मैं कुछ सुन ही न सका, उसे देखता रहा;
टाइम काटने के लिए मैने कुछ देर सोने का निश्चय किया और लेट गया, लेकिन बड़ी अजीब बात थी मैं सो नहीं पा रहा था। फिर उठ के खिड़की से बाहर मीनल के घर की तरफ देखने लगा।मुझे खुद में आये इस बदलाव का एहसास तक नहीं था।
खैर!! जैसे तैसे वक़्त गुज़रा. घर मे पूजा के बाद हम बाहर इकट्ठा हुए। मैंने आज महरून कुर्ता पजामा और उस पे हलके सुनहरे रंग का नेहरू जैकेट डाला। मौसी और मम्मी ने बाहर निकलने से पहले तक ना जाने कितनी बार मेरी बलाएं ली, मेरे कान के पीछे काजल भी लगा दिया, ओह गॉड!!
मेरी नज़रें आज सिर्फ और सिर्फ मीनल को खोज रही थीं, ऐसी बेचैनी सी होने लगी जी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी; मैं अच्छी तरह समझ गया कि मेरी तबियत ठीक नहीं।
" पीछे की तरफ सब चेक करने गयी है, अभी आती ही होगी" पापा ने अचानक से मेरे पीछे खड़े हो कर बोला।
" क्या पापा डरा दिया आपने. " मैं चिढ़ कर बोला;" और आप किस की बात कर रहे हैं. " मैं सच मे नही जानता था कि पापा क्या कहना चाह रहे थे।
" मीनल. !!. अभी आ जायेगी"
अपनी पूरी ज़िंदगी मे इतना हैरान परेशान मैं कभी नहीं हुआ, जितना आज पापा की बात सुन कर हुआ।
" पापा. आपको कैसे पता??"
पापा मुस्कुराये और मेरा गाल छुआ " तेरा बाप हूँ मैं बेटा"
" पापा मुझे न कुछ अच्छा नहीं लग रहा, मुझे लगता है मेरी तबियत खराब हो रही है, बार बार चेस्ट की तरफ पेन से फील हो रहा है"
पापा ये सुन कर हंसने लगे;" मेरी तबियत खराब है और आप हंस रहे हैं. दिस इज़ नॉट फेयर!!"
"बेटा अभी आराम हो जाएगा खुद से बस दो मिनेट इंतेज़ार करो" इतना कह कर पापा अपने ग्रुप के साथ गप्पें मारने चले गए।
" मैं इधर उधर देखता रहा. लेकिन न तबियत ठीक हुई न मीनल, दिखी।" तभी आरती के लिए घोषणा हुई और मेरी नज़र स्टेज की तरफ चली गयी, देखा तो मीनल पण्डित जी के बगल में खड़ी थी हाथ में आरती की थाली सजा के पंडित जी को पकड़ा कर नीचे आ गई।
मेरे मन को एक सुकून मिला, और पापा की बात सच हुई, मेरी तबीयत भी ठीक लगने लगी अचानक ही, सीने में दर्द भी नहीं था।
मुझसे कुछ दूरी पर वो खड़ी हो कि आरती गया रही थी और मैं उसे देख रहा था, मीनल ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा तो मैं उदास हो गया।
कुछ आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो ध्यान दिया " हाय कितना हैंडसम है, "
"तमीज़ से बात कर तेरे जीजू हैं"
"आये हए बड़ी आयी जिज्जु. हुह!!"
मेरा पारा चढ़ चुका था, कैसी लड़कियां हैं पूजा करने आई हैं या अपनी शादी करने . बेशर्म. एक मीनल है, कितनी अच्छी है . मैं सब की तुलना मीनल से करने लगा था, सच तो ये था कि आज मेरा मन भी आरती में नहीं था।
आरती के बाद गरबा शुरू हुआ मैं कल की ही तरह एक कोने ओर बैठ गया, जहां से मीनल बैठी दिखे।
नव्या मेरे पास आ कर गरबे के लिए बोली, आज भी वो गज़ब की सुंदर लग रही थी, लेकिन मुझे उस मे कोई इंटरेस्ट नहीं रह गया था।
"सॉरी आई डोंट डांस"
"प्लीज;मेरे लिए. एक बार. "
" सॉरी नव्या. मैं अपने लिए भी नहीं करता डांस तो किसी और के लिए कैसे कर लूं.." वो उदास सी चली गयी।
और मैं मीनल को देखने लगा. आज वो थोड़ा तैयार हुई थी, मैं ये नहीं कहूंगा कि बहुत अच्छे से तैयार थी लेकिन शायद उस के हिसाब से वो अच्छी बन के आयी थी।
वो चारों तरफ सिर घुमा घुमा के गरबे करने वाले लोगों को देख रही थी, मैं उसे देख के मुसकुरा रहा था; कितना अच्छा था सब! अचानक उसकी नज़रे मुझ से टकराई और वो कुछ सेकण्ड्स के लिए देखती रही जैसे ये समझना चाह रही हो कि मैं किसे देख रहा हूँ। मैं अपने दांत दिखा के मुस्कुराया तो वो समझ गयी और गर्दन घूमा ली।
, स्टेज में आज कुछ परफॉर्मन्स शुरू हुई। बच्चे बड़े कुछ न कुछ टैलेंट दिखा रहे थे, हर परफॉरमेंस के बाद वो बहुत खुश हो कर ताली बजाती, और मुझे उसके आगे झुक कर ताली बजाने की स्टाइल पर हंसी आ जाती । एक परफॉरमेंस के बाद ताली बजाते हुए उस उसने मुझे देखा और मुझे खुद पर हँसता पाया तो अपनी भौहों को उठाने के साथ अपना मुंह भी टेढ़ा कर के बैठ गयी। मैं जोर से हंस पड़ा।
"निशांत मल्होत्रा, निशांत मल्होत्रा!!; मुझे गूंजती सी आवाज़ आयी, इतने में नव्या आ कर बोली आपका नाम अनाउंस हो रहा है जाइये।
मेरा नाम. मैं हैरान परेशान सा स्टेज की तरफ़ गया।
"निशांत जहां कहीं भी हो स्टेज पे आएं और अपनी मधुर आवाज में गाना सुनाए।"
मेरे पहुचने तक एक बार और नाम बोला जा चुका था। मैंने स्टेज पे पहुँचते ही गुस्से में पूछा
" किसने दिया मेरा नाम??"
"पहले गाना गा लो न भइया फिर ये सब करना", एक लड़का बोला।
"रुको सोचने दो कौन सा गाउँ" तब तक लड़कियां चिल्ला कर ताली बजाने लगी, मैंने भीड़ में मीनल को देखा जो बिना भाव के स्टेज निहार रही थी।
मेरे मुह से गाने के बोल खुद ही फुट पड़े
सुन ज़ालिमा
मेरे सानु कोई डर ना
की समझेगा ज़माना
ओह तू वि सी कमली, मैं वि सा कमला
इश्क दा रोग सयाना ,
सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर
की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर
जितनी हसीं ये मुलाकातें हैं उनसे भी प्यारी तेरी बातें हैं
बातों में तेरी जो खो जाते हैं आऊँ ना होश में मैं कभी
बाहों में है तेरी ज़िन्दगी हाय
नहीं था पता के तुझे मान लूँगा खुदा
की तेरी गललियों में इस कदर आऊंगा हर पहर
सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर रहूँगा बस वही उम्र भर हाय .
मुझे पता भी नहीं चला कि ये गाना मैंने क्यों गाया, या शायद दिल की आवाज़ समझ नहीं पा रहा था , दिमाग पे परफेक्शन का भूत जो सवार था।
जब तालियां बजी तो याद आया कि मैं स्टेज पे अपना गाना गा चुका हूँ, तेज़ी से उतर के मैं मेन गेट के बाहर भागा। पता नहीं किसी से नज़रें मिलने का मन नहीं था, मीनल से भी नहीं पूरा गाना उसे ही देख कर जो गाया।
क्या सोच रही होगी वो मेरे बारे में; खुद पे गुस्सा आने लगा था। सिगरेट ली और टहलने लगा, नज़र फ़िर गेट की तरफ़ गयी मीनल के आने का भी वक़्त हो चला था।
बिस्कुट लिए वो आती दिखी, इस बार उसे देखने के बाद सीने में बीच की तरफ एक टीस सी उठी और नीचे की तरफ़ जा के पेट मे हल्की गुदगुदी की। मैं परेशान हो गया और सिगरेट फेंक कर पेट पे हाथ रखा और सोचा कि डॉक्टर को दिखा लूंगा एक बार जाने से पहले।
मुझे सिगरेट फेंकते हुए मीनल ने देख लिया, और मुस्कुराने लगी लेकिन मैं ना जाने क्यों आज नहीं मुस्कुरा पाया, न ही आज उस के पास जा के कुत्तों वाली बातें सुनी। बस दूर खड़ा उसे देखता रहा बिना किसी भाव के।
मीनल ने हाथ से इशारा कर के बुलाया तो मैंने गर्दन घुमा के मना कर दिया। उस ने आओ न कहते हुए फिर बुलाया. और मैं किसी रोबोट की तरह उस के पास चला गया।
वो न जाने क्या क्या बोलती रही मैं कुछ सुन ही न सका, उसे देखता रहा;