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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

आज दिन भर इतना कुछ हो चुका था कि मैं थक भी गया था।

फिर मोबाइल निकाला और मीनल की वीडियो और फ़ोटो देखने लगा।

"क्या देख के मुस्कुरा रहा है मेरा बेटा;"पापा की आवाज़ आयी।

"पापा. मैं मीनल की फ़ोटो देख रहा हूँ. " मैं शरमा गया था, हम कितने भी खुले विचारों वाले थे लेकिन पापा से थोड़ी शरम आ ही जाती है।

"पापा ने मेरे हाथ से मोबाइल लिया और फ़ोटो देखीं ,पहले थोड़ा गंभीर हुए फिर मुस्कुरा के बोले. मेरी बेटी को खूब खुशियां देना. हमेशा, चाहे उस के साथ रहना चाहे दूर. और अपने गुस्से को थोड़ा काबू में रखना सीख बेटा।"

पापा ने ऐसा क्या देख लिया. आज तो लगातार 3 बार एक से बढ़ कर एक हादसे हुए.

"आप किस बारे में कह रहे हैं पापा. " मैं डर गया कहीं नव्या को घर आए तो नहीं देख लिया।

"मैंने; नव्या से तेरी बहस होते देखा. " जो डर था वोही हुआ, लेकिन ये अच्छा था कि वो घर आए आयी ,ये बात नहीं पता चली पापा को।

लड़की चाहे कैसी भी हो, उसके चरित्र के बारे में बुरा कहना मुझे पसंद नहीं, और अगर आज की बात खुली तो निश्चित ही उसे गलत ठहराया जाएगा। जो मैं नहीं चाहता।

"पापा मैं बस उसे समझाना चाहता था कि मैं उस शादी नहीं कर सकता, वो थोड़ी ज़िद्दी है. वक़्त के साथ सम्हल जाएगी।"

"हम्म्म्म. चलो अच्छा है वो समझ जाएं तो. मुझे मेरे घर मे सिर्फ़ मीनल चाहिए" पापा हंस के बोले।

"पापा एक बात बताऊँ!! मैंने एक गलत काम किया. "

" अच्छा!! मैं भी तो जानू ऐसा क्या गलत किया.."

मैने पापा को मीनल की वीडियो दिखाई. पापा खूब हंसे पहले. " फिर बोले, मेरी बच्ची का मज़ाक बनाता है शैतान!!" मैं भी मुस्कुरा दिया ,जनता था अब क्या होने वाला है। पापा ने वीडियो डिलीट कर दी और मेरा सिर सहला के बोले.

" जब कोई मन मे बसा हो तो वीडियो की ज़रूरत नहीं"

मैंने पापा को मीनल की अगले दिन टैन्ट हटवाने वाली बात बताई तो पापा बोले वो करवा देंगे, हम आराम से घूमे।

मैं उनके गले लग गया।

पापा गुड नाईट बोल कर चले गए और मैं कपड़े बदल के

सोने की कोशिश करने लगा।

मीनल के साथ घूमने जाने का सोच के ही पेट मे तितलियां उड़ रही थीं. कल का दिन मीनल के लिए बहुत खुशियों भरा हो, और मुझे कुछ नहीं चाहिए था।

वो घर पे क्या बोल के आएगी, उसकी दादी कुछ हंगामा न कर दे इस बात का भी डर था।

सोचते सोचते कब नींद आयी पता नहीं.

मैंने देखा मैं और मीनल किसी बहुत ऊंची जगह पे हाथ पकड़े बैठे हैं. चारों तरफ नीली हरी पहाड़ियां दिख रही हैं, उनके पीछे सफेद संगेमरमर से भी ज्यादा सफेद हिमालय की चोटियां धूप में चमक रही हैं।

मैं मीनल की कमर पे हाथ रख कर उसे अपने बेहद करीब बिठा लेता हूँ. वो मेरे कंधे पे सिर टिका लेती है. कोई शरम, कोई झिझक अब बाकी नहीं हमारे बीच।

उसकी खुशबू से मदहोश हो कर मैं उसके माथे को चूम लेता हूँ और वो आंखें बंद कर के स्वीकृति दे देती है। मैं बैठे बैठे उसे बाहों में भर लेता हूँ फ़िर कुछ देर में अलग होता हूँ, अपनी आंखें बंद कर के मैं फिर उसे चूमने के लिए आगे झुकता हूँ और मीनल भी आँखें बंद कर लेती है लेकिन मेरे होंठ उसे छू नहीं पाते।

मुझे किसी और के होने का आभास होता है, मैं आंखें खोल के देखता हूँ मीनल अब भी आँखें बंद किये बैठी है और उस के बगल में नव्या बैठी मुस्कुरा रही है. मैं जब तक कुछ समझ पाता वो मीनल को धक्का दे देती है।

मैं हाथ बढ़ाता के चिल्लाता हूँ लेकिन मीनल मेरी आँखों से ओझल हो गयी.

मैं डर के उठ गया. कितना भयानक सपना था. टाइम देखा तो पौने 5 बज गए थे। ऐसे सपने ना जाने मुझे क्यों आने लगे थे, ये किसी अनहोनी का अंदेशा थे या मेरे मन का डर मात्र।।

सुबह का सपना सच होता है मम्मी कहती हैं, एक अनजाना सा डर मुझे सताने लगा।
 
मन बेचैन था, खिड़की पे खड़ा हो के बाहर देखने लगा नव्या कुछ भी गलत करे मेरे साथ करे, मीनल को कुछ नहीं होना चहिये।

उसका भाई इतना सीधा सादा है तो ये ऐसी क्यों हुई, इसे कोई बहका तो नहीं रहा कहीं. कुछ तो है, पहले तो ये डरी सी थी तो अचानक ऐसे बेहवे क्यों करने लगी।

मुझे थोड़ा सावधान रहना होगा मीनल का एडमिशन करवा दूँ तो आधा रास्ता साफ, फिर परसों मैं चला जाऊंगा तो नव्या भी अपनी जिंदगी में वापस उलझ जाएगी। मेरे मन में आज घूमने जाने का सारा प्लान तैयार हो रहा था। प्यार में लोग छुप के मिलते हैं और मैं यहां सामने मिल रहा हूँ साथ ही शतरंज खेल रहा हूँ।

सोचते हुए सिर भारी हो गया तो आज जॉगिंग पर न जाने की सोची, लेकिन फ़िर मीनल से कैसे मिलूंगा। इसी उहापोह में वक़्त निकल गया और मैं निकलने में थोड़ा लेट हो गया। लेकिन कहते हैं ना भगवान जो करते हैं अच्छे के लिए ही करते हैं।

घर से निकला ही था कि नव्या अपनी दो खास चमचियो के साथ आगे जाते दिखी. मैं कुछ दूरी बना के चलता गया, देखूं तो क्या चल रहा है आखिर।

इतना मुझे उनकी चाल से समझ आ गया था कि वो मुझे खोज रही हैं लेकिन उन्हें नहीं पता था कि आज मैं देरी से आया।

दूर मीनल आती दिखी, मैं फटाफट से फुटपाथ के किनारे के पेड़ों के पीछे हो लिया, और मीनल अपनी ही धुन में आगे निकल गयी। वो नव्या और चमचियो से भी आगे निकल गयी तो तीनों आपस मे कुछ इशारा करती दिखीं। मैंने कोई ऐसी जगह चाही की उनकी बातें सुन सकू।

वो तीनो आगे बढ़ के गेट के पास तक पहुँच गयी और चारों तरफ मुझे खोजने लगी, लेकिन मैं तो दूसरी जगह से होता हुआ उनके पास के पेड़ों के पीछे खड़ा हो गया।

"यार तू क्यों उस के पीछे पड़ी है, शादी कोई मज़ाक नहीं. ऐसी वैसी कोई हरकत मत करना" एक बोली।

"तू रहने दे अपने उपदेश. सिद्धि तू देख न निशांत कहाँ है, अब तक तो साथ आना चाहिए था मीनल के; बस एक बार दोनों को साथ पकड़ लू. फिर तो बाकी काम उसकी दादी से करवाउंगी"।

"यार इसमे मीनल का क्या दोष है, तू बेचारी को क्यों परेशान कर रही है. मेरे पापा को पता चलेगा तो मुझे घर से निकाल देंगे"।

" तू जा ना फिर यहां से, सिद्धि तू सही कह रही थी ये फट्टू है, एक तू है क्या आईडिया दिया और एक ये है, डरा रही है।"

ओह तो सिध्दि जी हैं जिन्होंने आग लगने में सिद्धि हासिल की है. लेकिन सिद्धि अब क्या होगा तुम्हारा!! दूसरी वाली नाम याद नहीं लेकिन आज उसके लिए मन श्रद्धा से भर गया। रावण की टीम में ये विभीषण थी.

खैर मेरा काम हो गया था, तो मैं पीछे से जॉगिंग के बहाने आगे आया।।।।

"हे..हाई गर्ल्स! मैं अंजान बना रहा; तीनों को मुझे पीछे देख के झटका लगा और चेहरे की हवाइयां उड़ गई।

"तुम यहाँ क्या कर रहे हो;"

"ये तो मुझे पूछना चाहिए, छुप छुप के गेट के बाहर क्या देख रहे हो। मैं तो रोज़ ही आता हूँ" मैं मुस्कुराया।

"वो एक्चुअली. मैं तुमसे सॉरी बोलना चाहती थी. " नव्या ने कहा।

"गेट के पास खड़े हो के? ऐसा लग रहा है मुझसे नहीं किसी और से कहना है, देखू तो ज़रा;ओह!! इस मीनल को क्यों देख रहे हो??"

"न. नहीं. ऐसा कुछ नहीं.."

इतने में मीनल अंदर आ गयी और तीनों के प्लान पे पानी फिर गया, और सिद्धि और नव्या का मुँह बन गया।

" क्या हुआ अरमानों पे पानी फिर गया।" मैंने प्यार से पूछा.

और तीनों की अपनी चोरी पकड़े जाने पर हवाइयां उड़ने लगी।

यार मैंने पहले ही कहा था ये सब मत करो, वो बोली और चली गयी।

" नव्या भाई को कहना रेडी रहे मैं आधे घंटे में आता हूँ , " कह के मैं भी निकल लिया और पीछे छोड़ गया कई सारे सवाल और डर।

मीनल से बात न हो पाने का दुःख भी रहा, लेकिन जो हुआ अच्छा ही हुआ। वो सीधे पांडाल की तरफ गयी , 1 आदमी वहां पहले से मौजूद था। मीनल ने उसे कुछ समझाया तब तक मैं भी पास पहुँच गया था।

"मीनल तुम जाओ तैयारी करो, बाकी पापा करवा देंगे। तुम मुझे 10 बजे गेट के बाहर मिलना. "।

वो बिना मेरे तरफ देखे ही मुस्कुरायी और बोली " अंकल ने ही भेजा है इन्हें, मैं तो इन्हे काम समझा रही थी. अब तुम जाओ..वर्ना मुश्किल हो जाएगी।"

मैं उसका आर्डर मिलते ही घर भागा, और अंदर जाते ही न्यूज़ पेपर पढ़ते पापा को पीछे से ही गले लगाया और थैंक यू बोल के अपने कमरे में आ गया।

मुझे नव्या के घर जाने की जल्दी थी, मन मे शांति भी थी और नव्या के लिए सांत्वना भी आ गयी।

तैयार हो कि मैं नव्या के घर जाने तो मम्मी ने नाश्ते के लिए कहा, मैने कहा कि जल्दी आ जाऊंगा तब खाऊंगा और निकल गया।

नव्या को अंदाजा भी नहीं था उस के साथ क्या होने वाला है लेकिन जो भी था ज़रूरी था।

दरवाज़ा नव्या के भाई के ही खोला, मैंने उसे आधे घण्टे पढ़ाया फिर उस से पूछा " आंटी अंकल कहाँ हैं? प्लीज बुला दो कुछ बात करनी है"

वो दोंनो को बुला के लाया, मुझे उन्हें देख के बहुत तरस आया, माता पिता बच्चे की परवरिश के लिए कितने कष्ट उठाते हैं। बच्चा अच्छा निकले तो कुछ नहीं लेकिन अगर खराब निकले तो सारा दोष परवरिश और संस्कारों पे चला जाता है।

खैर!! मैंने न चाहते हुए भी कहना शुरू किया।

"अंकल आंटी मैं जो भी बताऊंगा अब उसे आप ठंडे दिमाग से सुनियेगा और समझियेगा"

"बेटा नव्या की बात का बुरा मत मानना, उसे समझ नहीं है" उसकी माँ घबरायी हुई बोली, मुझे उनपे बहुत तरस आया।

"आंटी नव्या को बुलाइये, और वादा कीजिये आप लोग तैश में आ के कुछ नहीं करेंगे"

नव्या को बुलाया गया, उसके बाद मैंने सबको बिठा के वीडियो दिखाई, जो मैंने आज सुबह ही बना ली थी।

नव्या और उसकी प्यारी सिद्धि की पोल पट्टी सबके सामने थी, नव्या डर से रोने लगी और उसके मा बाप में शर्म से नज़रें झुका ली।

"आई एम सॉरी पापा. वो रॉते हुए बोली लेकिन तब तक एक तमाचा उस के गाल पे पड़ चुका था।

मैंने उसके पापा को बिठाया और बोला " अंकल मैंने ये वीडियो किसी को भी नहीं दिखाई, मेरे घर पे तो यही पता है कि मैं पढ़ाने आया हूँ।

नव्या मैं चाहता तो जो तमाशा तुम करने जा रही थी वो मैं कर देता। लेकिन उस से मुझे क्या मिलता. कहीं न कहीं उस मासूम सी लड़की पे बात आती।

तुम्हारी जो भी प्रॉब्लम है मुझसे है उनमें मीनल का क्या कसूर है मुझे बताओ?; मेरे पापा उसे बेटी मानते हैं, अगर मैं अपने पापा की ही तरह उस से अच्छा व्यवहार करता हूँ तो तुम्हे जलन क्यों नव्या।

मीनल की ज़िंदगी शायद ही किसी से छुपी हो यहां. लेकिन मैंने आज तक उसे किसी के लिए, यहां तक की अपनी दादी के लिए भी बुरा कहते नहीं सुना।

तुम्हे तो हमउम्र होने के कारण दोस्त बन के उसे सपोर्ट करना चाहिए था। तुम्हे मेरे साथ कुछ भी गलत करना हो कर लेना. लेकिन अगर;अगर मीनल पे आंच भी आई तो मैं फिर सारे लिहाज भूल जाऊंगा।

अंकल-आंटी मुझे माफ़ किजेगा मैंने जो भी कहा या किया; आप दोनों नव्या को प्यार से समझाइए. वो अपने माता पिता की इज़्ज़त के लिए ज़रूर सोचेगी; चलता हूँ अब बहुत काम हैं. और ये बात यहीं की यही दफन कर के जा रहा हूँ. कहीं भी इसका जिक्र नहीं होगा;"

मैं अपना काम कर चुका था, सच कहूँ तो नव्या की बेवकूफी पे गुस्से के साथ साथ तरस भी आ रहा था लेकिन मीनल के लिए मुझे ये करना ज़रूरी था।

मैं घर आया और नाश्ता किया , मुझे आज बहुत नाज़ था कि मेरे माता पिता मेरे साथ दोस्त जैसे थे, जिस कारण मैं उन्हें सब बात बता सकता था; और इस तरह मैं गलत रास्ते जाने से बचता रहा।

मैं तैयार होने अपने कमरे में चला गया और एक बार खिड़की से मीनल के घर को देखा। वो ही अजीब सी शांति छाई थी, मैं भगवान से आज का दिन अच्छा गुज़रने की दुआ करता रहा। फ़िर मैंने कुछ ज़रूरी फ़ोन किये और तैयार होने लगा।

आज मैंने गहरे नीले रंग की टी शर्ट पहनी, नीचे काले रंग की जींस और साथ मे काले जूते। कलाइ में अपनी वॉच. मम्मी कहती हैं नीला रंग खिलता है मुझपे. आज मैं अपना धूप का चश्मा लेना नहीं भूला, ये मीनल के साथ रहने पर पहनना ज़रूरी था.. उसे निहार सकूंगा ना अच्छे से. इतना सोचते ही चेहरा खिल गया मेरा।
 
10 बजने में 10 मिनट पहले मैं पापा की कार के साथ बाहर गेट पे खड़ा था, घर से निकलते ही हॉर्न बजा दिया था मैंने ताकि मीनल समझ जाएं। लेकिन लड़कियां कभी टाइम पे आती हैं भला; पूरे 5 मिनेट लेट आयी मैडम।

मेरे लिए वक़्त की बहुत कीमत है एक मिनट लेट मतलब भी लेट ही होता है, लेकिन उस के आने की खुशी उस के लेट होने के गुस्से पे हावी हो गयी।

मैं कार का सहारा ले के दोनो हाथ बांधे इस तरह से खड़ा था कि मीनल को लगे मैं कहीं और देख रहा हूँ जबकि तिरछी आंखों से मैं उसे घूर रहा था. धूप का चश्मा अपना कमाल दिख रहा था।

मीनल ने साधारण लेकिन अच्छे कपड़े पहने थे। ग्रे कुर्ती जिसके गले पे महरून रंग की कढ़ाई थी, महरून पैंट और दुपट्टा। यही उस का मेकअप था; लेकिन मुझे वो हर हाल में पसंद थी सिवाए उस की टाइट चोटी के।

जब तक वो मेरे पास आई मैं तब तक उसे घूरता रहा. आज मैंने पहली बार उसे ऊपर से नीचे तक अच्छे से निहारा। वो पास आ के हाई बोली तो मैंने पूरा अनजान बनने का नाटक किया। " ओह मीनल! कब आयी तुम. सॉरी मेरा ध्यान नही रहा", लेकिन चेहरे से मुस्कान टपक-टपक के मेरे झूठ को बयान कर रही थी।

दिल की पतंग मीनल के साथ अकेले होने के खयाल से ही उड़े जा रही थी। मैंने जल्दी से गाड़ी का दरवाजा खोल कर उसे बिठाया और भाग कर, ड्राइविंग सीट पे गया।

"मीनल सीट बेल्ट लगा लो. " वो मेरा मुह देखने लगी तो मैं समझ गया और खुद ही उसकी बेल्ट लगाई, मैंने उसके करीब रहने पर वो ही खुशबू महसूस की जो सपने में थी. पता नहीं क्यों दिल मे उथल पुथल हो गयी,लेकिन इसका भी अपना ही मज़ा है।

मीनल के इतना करीब रह के उस के लिए ये सब करने में सुकून था, जैसे वो मेरी हो हमेशा के लिए।मैंने भगवान का नाम ले के कार चलानी शुरू कर दी।

" घर पे क्या बता के आयी हो मीनल?"

"इंटरव्यू!!" उसने मेरी तरफ देख के कहा और मै मुस्कुराये बिना ना राह सका।

" मीनल आराम से बैठो, तुम घबरा क्यों रही हो. मैं क्या तुम्हें किडनैप कर के ले जाऊंगा;" मैं उसकी घबराहट बिना देखे महसूस कर चुका था।

" वो;पापा'-मम्मी के जाने के बाद मैं ऐसे किसी के साथ घूमी नहीं तो थोड़ा;" उस्की आवाज़ कह रही थी कि अपने माता पिता को कितना याद करती है। मैं किसी भी हाल में इस दिन को ऐसे बर्बाद नहीं कर सकता था।

" मुझे कहाँ घुमाओगी मीनल" मैंने बात बदली.

"मुझे कोई आईडिया नहीं बचपन में एक दो बार पापा मम्मी के साथ कांकरिया झील गयी थी।

मैं जितनी भी बात घुमा रहा था अब उसके अतीत पे जा के अटक क्यों जा रही थी क्या करूँ.

"चलो पहले हम लॉन्ग ड्राइव पे चलें. फिर वापस आते वक्त किसी जगह चल लेंगे. " मैंने एक नज़र उसे देख के दिल भरते हुए कहा, वो अब भी ठीक से नहीं बैठ पायी थी।

वो खुश हो गयी. " मैं ना आज तक कभी लांग ड्राइव पे नहीं गयी. टीवी पे देखा था और सिर्फ़ सुना था. " इतना चहकते हुए उसे देखने मे मुझे मज़ा आ रहा था फ़िर मैंने एक जगह कार किनारे कर के रोक दी बाहर निकलने लगा।

"क्या हुआ. कहाँ जा रहे हो. वो फिर घबरायी.

मैंने कुछ नहीं कहा बस घूम कर उसकी तरफ का दरवाजा खोला।

"क्या हुआ ;यहां क्यों रोकी गाड़ी.. मेरी तरफ क्यों आये. ब्लाह ब्लाह.. लड़कियां इतना कैसे बोल लेती हैं वो भी बिना सोचे समझे। मैंने उसके होठों वे अपनी उंगली रख दी. " थोड़ी देर चुप रहो मीनल" वो चुप हो के मुझे देखने लगी।

मैंने उसकि सीट थोड़ी पीछे कर के झुकाई, फ़िर उस के पैर सीधे किए ताकी उसे आराम रहे, सीट बेल्ट भी ठीक की. इन सब मे मैं उसकी घबरायी हुई साँसों को महसूस कर चुका था।

सच कहूँ तो मुझे उसके करीब रहना बहुत अच्छा लगा रहा था, एक बात और जो मुझे लगी वो ये कि मीनल को भी मेरा साथ, मेरा उस के करीब रहना कहीं न कहीं पसंद आ रहा था।

" अब आराम से हो?" मैंने एक हाथ से दरवाज़ा सम्हाल के और दूसरा हाथ उसकी सीट पे रख के बोला। उसने मेरी तरफ देखा भी नहीं, मेरी सकुचाई सी मीनल नज़रें नीची कर के ही ठीक है बोली।

उसे ऐसे देख के आज सीने में फिर वो ही टीस महसूस हुई, फर्क सिर्फ़ इतना था कि अब मैं जानता था मेरे साथ ऐसा क्यों होता है। मै दरवाज़ा लगा कर ड्राइविंग सीट पे आ गया.

"चलें!! " मैंने पूछा, वो मेरी तरफ देख के हाँ बोली फिर नज़रें झुका ली. बार बार किसी बहाने से वो मुझे देखती थी, मैं समझ गया था, मुझे और चाहिए भी क्या था.. कार चलाने के पहले मुझे फ़िर कुछ याद आया.

"मीनल!!"

"ह्म्म्म"

" ये चिपकू चोटी खोल दो प्लीज"

उसने चिरपरिचित अंदाज़ में भौहें उचका के मुझे देखा फिर इनकार कर के सामने देखने लगी।

"तुम मेरी बात नहीं मानोगी मतलब. " मैंने थोड़ी कड़ाई से पुछा

"बिल्कुल नहीं. " आज जवाब भी टक्कर का था लेकिन मुझे अपनी मनमर्जी करना अच्छे से आता है।

मैंने अपनी सीट बेल्ट फिर खोली और मीनल की तरफ झुका, वो डर गई और खुद भी दरवाज़े की तरफ झुक गयी, मैंने उसकी बांह पकड़ के बड़े आराम से उसे अपनी तरफ कर लिया, बेचारी मुझसे कितना लड़ पाएगी सोच कर ही मेरी बत्तीसी झांकने लगी. वो मुझे ऐसे हंसता देख के चिढ़ गयी और मुह टेढ़ा कर लिया।

" ऐसी हरकतें शोभा देती हैं क्या तुम्हें" वो डर में भी अपनी आवाज़ पूरी कड़क रखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी कंपन कैसे भी छुप न सकी।

"बिल्कुल; मुझपे ही तो जंचती हैं ऐसी हरकतें. " मैंने जवाब देते देते उसके दोनों हाथों को अपने एक हाथ की गिरफ्त में ले लिया. और वो हाथ छुड़ाने की कोशिश के साथ पैर भी पटकने लगी।

मुझे उसे छेड़ने में मज़ा आ रहा था। " मैं चोटी में ही जाउंगी क्या कर लोगे". इतना गुस्सा. वो इसमे भी जच रही थी।

"मैं क्या कर लूंगा!!" मैं हंसा " खुद देख लो " कहते हुए मैंने दूसरे हाथ से उसके बालों का बैंड निकाल दिया और उसके बालों को एक तरफ कर दिया। वो ग़ुस्से में लाल हो कर आंखें बंद कर चुकी थी मैंने उसे एक नज़र प्यार से देखा फिर उसका हाथ छोड़ के अपनी सीट बेल्ट लगाई और उसका बैंड अपने गियर में फंसा के गाड़ी स्टार्ट कर दी।

तिरछी नज़रों से देखने पर वो अपनी मुस्कुराहट छुपाने की कोशिश करती दिखी, हम्म तो मीनल जी भी एन्जॉय कर रही थीं।

मैंने कार शहर के बाहर हाई वे की तरफ घुमा दी. और, रफ्तार बढ़ा दी। मैंने अपने पसंद के सारे रोमांटिक गाने चला दिए।

रास्ता जब सूनसान हुआ और पेड़ों की छांव से सड़क ढकने लगी तब मैंने मीनल से खिड़की खोलने को कहा " अब तुम जितना चाहे एन्जॉय कर सकती हो; बोलो क्या करना है. बस एक आज का दिन है मीनल. समझती हो न. फिर हम कब मिलें पता नहीं. " ये कहते हुए मेरी आँखें भीग गयी थी लेकिन मीनल को दिखती कैसे मेरी आँखों पर तो चश्मा था।

मीनल भी मुझे कुछ उदास दिखी. फिर बोली "जो तुम्हे अच्छा लगे..मुझे समझ नहीं आ रहा. मैंने उसे सीट बेल्ट खोलने को कहा. और कार का सनरूफ खोल दिया. "मीनल खड़े हो जाओ..बहुत मज़ा आएगा.." ऐसा लगा जैसे उसके दिल की मुराद पूरी कर दी हो. वो झट से खड़ी हो कर बाहर के नजारे महसूस करने लगी।

मैंने कार की गति बहुत धीमी कर के गाना बदल दिया।

अज्ज दिन चढ़ेया

तेरे रंग वरगा

फूल सा है खिला आज दिन

रब्बा मेरे दिन ये ना ढले

वो जो मुझे खवाब में मिले

उसे तू लगा दे अब गले

तेनू दिल दा वास्ता

रब्बा आया दर पे यार के

सारा जहाँ छोड़ छाड़ के

मेरे सपने संवार दे

तेंनु दिल दा वास्ता

जीती रही सलतनत तेरी

जीती रहे आशिक़ी मेरी

देदे मुझे ज़िंदगी मेरी

तेनू दिल दा वास्ता

मैं भी साथ मे मीनल को देख देख के ये गाने लगा. काश वो समझ पाती. मैं अभी के अभी शादी कर लेता उस से;

"अच्छा गाते हो तुम" वो वापस बैठते हुए बोली

. इतना कुछ गाने के साथ गाया वो नहीं दिखा, अच्छा गाते हो दिख रहा है. उफ़्फ़ ये लड़की.

"थैंक्स. " मैंने मुँह बनाया. "तुम नहीं गाती?"

"नहीं, मेरी आवाज़ अच्छी नहीं"

" आवाज़ से गाने न गाने का क्या रिश्ता.. चलो गाना सुनाओ एक..मैं म्यूजिक बंद कर के बोला।

लेकिन जो एक बार मे प्यार से मान जाये वो मीनल कहाँ. काफी मनाने, धमकाने ,डराने के बाद उसने गाना शुरू किया।

"हमको मन की शक्ति देना

मन विजय करे.

दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें;

पहले तो रोमांटिक लांग ड्राइव पे ऐसे गाने कौन गाता है भाई!!; बाकी आवाज़ के क्या कहने. अगर मेरे सामने मोटू यानी कि कौस्तुभ होता तो मैं हंस लेता..लेकिन यहाँ हंसू भी तो कैसे। मैं बता नहीं सकता कि मैंने कैसे अपनी हंसी रोकी, बेचारी सही कह रही थी उसकी आवाज़ बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी।
 
वो चुप हुई और मुझे देखा.. मेरी बत्तीसी छुपाए नहीं छुप रही थी। मौसम भी उस के गाने पे रो पड़ा और हल्की रिमझिम शुरू हो गयी।

वो समझ गयी तो उसका चेहरा उतर गया.

"मीनल. अपनी हॉबी बताओ.. मैंने बात पलटी.. जो मैंने घर पे देखा उसके अलावा बताओ!!"

"वो काफ़ी सोच के बोली; मुझे डांस करना बहुत पसंद था बचपन में, डुएट डांस मेरा पसंदीदा रहा है"

"वाओ. चलो कुछ तो मैचिंग है हम में" मैं चहक के बोला।

"मतलब?? तुम भी डांस करते हो!!"

"हाँ. करोगी मेरे साथ. ? प्लीज मना मत करना"

"हाँ कभी मौका मिला तो करेंगे;" वो शांत हो गयी इतना कह के।

मैंने गाड़ी मेन रोड से हट खुले मैदान की तरफ कर ली. वैसे तो ये जगह उजाड़, जंगल सी थी लेकिन रिमझिम बारिश में मीनल के साथ स्वर्ग ही लगी।

मीनल कुछ समझ नहीं पायी वो डर से कभी मैदान तो कभी मुझे देखने लगी।

" तुम गाड़ी कहाँ ले जा रहे हो निशांत?"

मैंने उसे अब जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा. "निशांत..!! कहाँ जा रहे हो. " वो काफी डर चुकी थी।

"निशांत गाड़ी रोको ,मुझे नहीं जाना कहीं;" मैं जवाब नहीं दे रहा था,मैं तो कहीं खोया था।

"निशांत गाड़ी रोको वर्ना;" वो चिल्लाई।

"वर्ना. क्या मतलब है तुम्हारा. मैंने गाड़ी पे तेज़ ब्रेक लगाए जिस से दोनो को झटका लगा, मीनल मेरे बारे में कुछ गलत ही सोच रही थी ये तो तय था। मुझे उसकी सोच से जो तकलीफ हुई उस के लिए शब्द नहीं थे।

"बोलो मीनल!! मैं उसकी तरफ देख के चिल्लाया;मुझसे अब ये सहन नहीं हो पा रहा था कि मीनल की सोच मेरे लिए ऐसी भी हो सकती है।

" तुम इस सूनसान जगह पे क्यो लाये मुझे. " मीनल ने सीधा सवाल किया।

मुझे मेरा गुस्सा सम्हालना अब मुश्किल हो चला , मैंने अपना चश्मा उतार के एक तरफ फेंक दिया , सीट बेल्ट खोली अपनी भी और मीनल की भी. और मीनल को अपनी तरफ खींच के उसकी दोंनो बाज़ुओं को कस के पकड़ लिया फ़िर उसकी आँखों मे झांक के बोला "अकेले में तुम्हारा फायदा उठाने के लिए मीनल. " मेरी आँखों से गरम आँसू मेरे गालों के नीचे तक लुढ़क आये थे। "यही सुनना चाहती थी तुम न. तुम्हारी सोच इतनी गिरी हुई होगी मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।"

"उतर जाओ कार से अभी के अभी.!!. " मैने उसे कहा और उसकी बाज़ुओं को छोड़ दिया।

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आज का भाग कैसा लगा ज़रूर बताएं। आगे की कहानी जानने के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

मीनल बिना कुछ कहे मुझे देखे जा रही थी। मैंने अपने दोंनो हाथों से अपना चेहरा पोछा और लंबी सांस ली. फिर मीनल को बिन देखे बोला " तुम उतरी नहीं अब तक!!" मेरी आवाज में गुस्सा न हो कि सिर्फ पीड़ा थी।

"निशांत.." मीनल ने कुछ बोलना चाहा. लेकिन मेरे पास सुनने सुनाने को कुछ नहीं था अब. . चाह के भी गुस्सा और पीड़ा कम नहीं हो पा रही थी।

मीनल ने एक बार फिर कहा "निशांत.."

मैंने कोई जवाब नहीं दिया जो समझे ही न उसे क्या समझाता तो हॉर्न बजाना शुरू कर दिया लगातार , बार बार। अब मीनल भी समझ चुकी थी, उसने गाड़ी का दरवाजा खोला और उतर गयी। बाहर अब भी बूंदाबांदी चल रही थी.

मैंने गाड़ी मोड़ी और आगे बढ़ गया, वो वहीं जड़वत खड़ी देखती रह गयी।

मेरे दिमाग मे सब घूमने लगा; पापा की बातें, नव्या की हरकतें, मीनल की दादी. सबकी बातें बारी बारी से दिमाग मे घूम रही थी, आंखें आंसुओं से धुंधली हो चली थी रास्ता ठीक से दिख नहीं रहा था; जब हम सोच में होते हैं तब सारे गुज़रे हुए वाकये, हादसे कुछ ही सेकेंडों में दोहराए जाते हैं वो भी ठीक उसी तरह जिस तरह से वो हुए।

मेरे साथ भी यही हुआ, मेन रोड तक पहुचने से पहले ही सब कुछ दोबारा मेरी आँखों के सामने से गुज़र चुका था। "मीनल को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए, मेरे कलेजे का टुकड़ा है वो" . बेटा गुस्सा ज़रा कम किया कर". पापा की बातें गूंजती रही जब तक के मैंने फ़िर से ब्रेक नहीं मारे। शीशे में देखा तो मीनल उसी जगह पे मूर्तिवत दिखी;

जिस लड़की के माता पिता उसे छोड़ के जा चुके थे उसे मैं भी इस तरह छोड़ के चला जा रहा था;किस हक़ से?? उसको अपने साथ लाया. किस हक़ से?? वो मेरे साथ बिना सवाल किए यहां तक आगयी. और उस के डर का मैंने ये सिला दिया; मैं खुद पे भरोसा करता हूँ. मीनल से प्यार करता हूँ. लेकिन वो मुझपे भरोसा क्यों करे. उसकी तरफ से मेरे लिए क्या सोच क्या रिश्ता है कुछ भी तो नहीं;

मैं गाड़ी से उतर के पीछे भागा और उसके बिल्कुल सामने खड़ा हो गया, साँसे तेज़ हो गयी थीं. वो अब भी वैसे ही खड़ी थी मेरे सामने.. भावहींन. आंखें पता नहीं कहाँ खोयी थी, मुझे देख कर भी नहीं देख रही थी; ये कैसा पाप हो गया मेरे हाथों.

जिसे प्यार करते हैं क्या उस के साथ ऐसा किया जाता है मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही थी।

उसे छू भी तो नहीं सकता. पता नहीं और क्या सोच ले मेरे बारे में.

"वापस चलो मीनल. मैं यहाँ गाड़ी सिर्फ़ तुम्हारे साथ डांस करने के लिए लाया था. यहाँ हमे कोई देख नहीं पता इस लिए;मैं तुम्हारे साथ कुछ भी गलत करने का सपने में भी नहीं सोच सकता।" मैंने जितना हो सका सफाई दी ताकी उसके दिल मे मेरे लिए कोई मैल न रहे।

वो कुछ नहीं बोली, उसकी ये चुप्पी दिल को चीर रही थी. मैं उसके और करीब खड़ा हो गया. " मीनल, चलो.. मैं तुम्हे घर छोड़ देता हूँ.. तुम्हे मुझ पे भरोसा नहीं तो " मैं उस से नज़रें मिला पाने के काबिल भी नहीं था उस वक़्त।

मीनल अब भी उसी तरह खड़ी थी, मैं आत्मग्लानि से मरा जा रहा था। हिम्मत कर के मैंने उसकी हथेली पकड़ी.. और मुड़ के कदम आगे बढ़ा दिए.. और कोई तरीका नहीं था उसे वापस कार में बिठाने का. अगर बारिश तेज़ हो गयी तो वो पूरी भीग सकती थी।

मेरे हाथों को झटका लगा..क्यों कि मीनल आगे नहीं बढ़ रही थी। मैंने पीछे देखा. इस बार मीनल गीली आंखों से मुझे देख रही थी।

मैं मुड़ के उस के करीब गया, वो मेरी आँखों मे देख रही थी तो मैंने शर्मिंदगी से नज़रें झुका ली और उसका हाथ छोड़ दिया आखिर किस हक़ से उसे कहता चलने को, मैं नज़रे झुका के उसके सामने खड़ा हो गया।

मीनल तेजी से मेरे सीने से लग गयी और रोने लगी. उनका रोना सुन के मेरा दिल दहल गया।

उसे बाहों में भर के मैं भी रो लेना चाहता था लेकिन उसे छूने में भी डर लग रहा था। उसने मेरी टी शर्ट दोनो हाथों से कस के पकड़ी थी ,मैं पीछे हटता भी तो कैसे; दिल पिघलता गया और साथ ही पिघल गया मेरे उसूलों का आडंबर. जब प्यार आ जाये तो और कुछ बचता ही नहीं।

मैंने मीनल को अपनी बाहों में जकड़ लिया, एक हाथ से उसके सिर को सहलाने लगा, मीनल ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली. दोंनो की धड़कने आपस मे मिल चुकी थी, मैंने भी मीनल को कस लिया;मैं उसे खुद में समा लेना चाहता था; मीनल रोती रही ; मेरे पास कुछ कहने को नहीं था।

जब मीनल थोड़ा शांत हुई तो मैंने उसे पूछा "चलें मीनल!!" उसने मेरे सीने से लगे हुए ही न में सिर हिला दिया। मेरा मन भी उसी तरह ज़िन्दगी गुज़ार देने का था, लेकिन मीनल भीग जाती तो फ़िर कहीं आना जाना नहीं हो पाता. और मैं खुद भी असहज हो जाता।

मैंने दोनों हाथों से उसका चेहरा थाम के पीछे किया ताकि वो मेरी आँखों मे देख सके, उसने जब देखा तो मैंने कहा " मेरे रहते तुम को कभी कोई छू भी नहीं सकता मीनल. मुझ पे भरोसा करो मीनल. तुम मेरे लिए क्या हो ये तुम नहीं जानती..". वो मुझे एकटक देखती रही; जैसे कह रही हो कि वो मेरी ही है.. सिर्फ मेरी"

न जाने किस प्रेरणावश मैं नीचे झुका और उसका माथा चूम लिया, वो सिहर गयी और उसकि हल्की सी सिसकी मेरे कानों में गूंज उठी. उसकि आंखें बंद हो गयी और शरीर मे अजब कंपन का आभास होने लगा। उसका एहसास मेरे सीने को फ़िर एक टीस दे गया. मैं उस एहसास को खुद में भर लेना चाहता था जैसे जीने का एकमात्र वोही सहारा बचा हो।
 
मेरा मस्तिष्क अब वापस चलने की सलाह देने लगा था. लेकिन मीनल टस से मस नहीं हो रही थी, हार कर मैंने मीनल को गोदी में उठा लिया और कार की तरफ बढ़ चला। मैं अपनी धड़कनों के साथ घुली हुई उसकि धड़कनों को महसूस कर रहा था. इस दर्द में भी अजीब सा सुकून था। मीनल ने अब भी मेरी टी शर्ट पकड़ी थी और शायद अपने उसी हाथ को देख रही थी।

कार के दरवाज़े के पास पहुँच के मैंने उसे नीचे उतारा और दरवाज़ा खोल कर उस बैठने का इशारा किया. उसने हल्की मुस्कान के साथ इनकार कर दिया; नज़रें उस की अब भी नीचे ही थी. "अब भी भरोसा नहीं मीनल. ?" मैंने पुछा।

"मेरे साथ डांस नहीं करोगे??" उसने इतनी देर में पहली बार मुझसे नज़रें मिलायी और मैं उसे देखता रह गया;

सच कहूं तो अब मेरा मन नहीं था. मीनल से इतनी करीबी बेचैन कर देती लेकिन उसकी खुशी के लिए मैं तैयार हो गया और इतना सब हो जाने के बाद वापस फिर उसी तरह हो पाने में मुझे वक़्त लगना था। खैर!! मीनल की खातिर मैंने गाड़ी में गाना सेट किया अपनी पसंद का और मीनल की तरफ हाथ बढ़ाया-

जब तक तेरी आंच में बूँद बूँद मैं जल न लूँ।

जब तक तेरे साथ मे चांद तक मैं चल न लूँ।

हाँ मेरे पास तुम रहो जाने की बात न करो

मीनल डांस में खुल के मेरा साथ दे रही थी, इस तरह के डांस में अपने साथी पर पूरा भरोसा दिखाया जाता है तभी इसकी सुंदरता दिखती है। मीनल ये बखूबी समझती थी, जिस तरह में खुद को मेरे हाथों में सौंप रही थी वो अंदाज़ काबिले तारीफ था,.काश वो इतना ही भरोसा मुझ पर हमेशा दिखा पाती। खुला मैदान और बारिश में भीग कर डांस करते हम दोनों खो से गए8 Full stop मीनल मेरी आंखों में झांक के नाच रही थी जैसे कुछ खोज रही हो और मैं उस से नज़रें चुरा रहा था जैसे सब छुपा के रखना हो.

मीनल की इतनी क़रीबी से मैं किसी तरह से भी बहकना नहीं चाहता था तो आखिर में उसे अपने हाथों से घूमा कर थाम लिया।

"बस मीनल..!! अब नहीं.. " मेरी आवाज कांप रही थी। उसकी तरफ का दरवाजा खोल कर मैं ड्राइविंग सीट पर आ गया, हम दोनों थोड़ा बहुत भीग चुके थे। कार के कैबिनेट से एक छोटा तौलिया निकाल कर मीनल को दिया खुद को पोछने के लिए।

"मैं तुम्हे घर छोड़ देता हूँ अब मीनल. मेरी हंसी अब भी फीकी थी, सच तो ये था की मैं अब भी दुःखी था।

मीनल ने कुछ नहीं कहा वो सीट से लग के मुझे देखती रही. मैंने कार मेन सड़क पे ला कर वापस शहर की तरफ़ मोड़ दी।

मैं कुछ नहीं कहना चाहता था, आज के बहुत सपने थे दिन भर मीनल के साथ रहने के लेकिन भगवान को शायद मंज़ूर नहीं था. जो वो करते हैं अच्छा ही करते हैं, इसमे भी कुछ अच्छा छुपा हो शायद. हाँ लेकिन उस के कैरियर के लिए मुझे बात करनी ही थी घर पहुचने से पहले। मैं खयालों में गुम कार चलाता रहा, मीनल की नजरें महसूस कर के भी उस की तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं थी मुझमे।

"जानते हो निशांत. मेरे माँ बाप बहुत जल्दी ही मुझे छोड़ गए, मैं बहुत छोटी थी तब. " मीनल ने चुप्पी तोड़ी और मैं उस पे नज़र डालें बिना न रह सका।

उसने बोलना जारी रखा " घर चलाने के लिए और दादाजी के इलाज के लिए रुपये खर्च होते गए, मुझे स्कूल के दिनों से ही छोटी मोटी पार्ट टाइम जॉब, ट्यूशन पढ़ाना सब करना पड़ा. उस उम्र में पता ही नहीं होता कि कौन सही है, किस पे भरोसा करना है किस वे नहीं.

जब लोगो को पता हो आप अनाथ हो , आपके आगे पीछे कोई, नहीं; उस वक़्त आप सिर्फ खिलौना बन जाते हो लोगो के खेलने का;" मीनल का गला भर आया इतना कहते कहते; कितना दर्द समेटे बैठी है ये अपने अंदर।

मैंने उस के सिर वे हाथ फेरा ताकि वो अपने दिल का गुबार निकाल सके।

" आज जब तुम मुझे उस सूनसान जगह वे ले जाने लगे तो कुछ याद आ गया. एक हादसा जो होते होते रह गया. जब भरोसा टूट जाता है ना सब तरफ़ से. तब कोई कितना भी अपना हो; मन से डर नही जा पाता. मैं आज अगर किसी पे भरोसा करती हूँ तो वो तुम्हारे पापा हैं; "

मीनल ने आंखें बंद कर ली;उसे देख के ये आसानी से पता लग सकता था कि ये बात कहने में उसे कितनी तकलीफ, हुई. मैं फिर आज की हरकत से आत्मग्लानि से घिर गया;

क्या यही है हमारा समाज कि जब मौका मिले किसी मासूम की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर लो। जिस उम्र में उसे खेलना कूदना चाहिये था, वो अपनी दादी की गलियां सुन सुन के घर चला रही थी। लोगों को उसकी मदद करनी चाहिए थी लेकिन वो अपनी ही मदद करने लगे।

"मुझे माफ़ कर दो मीनल. मैंने आज जो भी किया उस के लिए शर्मिंदा हूँ;तुम्हारे साथ पहले जो भी हुआ मैं उसे बदल नहीं सकता . लेकिन एक वादा करता हूँ तुमसे; मेरे रहते अब कोई तुम्हारे साथ गलत नहीं कर सकेगा; इस से ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा मीनल. " मैं चुप हो गया।

"मैं तुमसे नाराज़ नहीं निशांत. तुम से मैं कभी नाराज़ नहीं रह सकती;"

फिर एक घोर चुप्पी छा गयी..इस बार भी मीनल ने पहल की. " निशांत, मुझे घूमाने लाये हो तो क्या वापस भूखा ही ले जाओगे. सुबह से कुछ नहीं खाया है मैंने. कल तुम चले जाओगे फिर तो अकेले ही खाना है;"

(तुम एक बार कह दो, पूरी ज़िंदगी अपने हाथों से खिलाऊंगा खाना) ये कहना चाहता था लेकिन .

" भूख लगी है!! बताया क्यों नहीं. चलो कोई ढाबा दिखता है तो रोकता हूँ"।

थोड़ी देर में हम एक ढाबे पे थे. बारिश थम चुकी थी और हल्की धूप आ चुकी थी. जो हमे अच्छे से सुखाने के लिए काफी थी। हमारे अलावा एक ही परिवार था वहां जो पहले से खा रहा था. मैंने मीनल के लिए खाना आने से पहले चाय मंगाई। उसने मुझसे भी चाय पीने के लिए कहा तो मैंने जेब से सिगरेट निकाल के दिखाई और कहा कि मैं ये पीता हूँ।

मीनल ने चिढ़ कर मुझे घूरा, और मेरे दिल को सुकून मिल गया। खाना आया तो मीनल ने पहला निवाला मेरी तरफ किया. मैं थोड़ा असहज हुआ उसकी इस हरकत से. " देखना नहीं है खाओ" वो मुस्कुरा के बोली.." कल नहीं खिलाया था न तो आज खिला देती हूँ, फ़िर शिकायत मत करना.." इस बार मेरी बत्तीसी खुल के बाहर आ गयी और वो मुझे देखती ही रह गयी. मैं सच मे शरमा गया।

"मुझे ऐसे मत देखो मीनल. " वो ये सुन के हंस पड़ी. फ़िर मुझे खिलाने लगी. मैंने भी मौके का फायदा उठाया औऱ उसे अपने हाथों से खिलाने लगा।

"मुझे फोन करोगी न मीनल..मैं उसे खिलाते हुए बोला;" वो चुप हो गयी आज भी। " मैं परेशान नहीं करूंगा तुम्हे..कभी बात तो कर ही सकते हैं ना" मैंने फ़िर कोशिश की.

"मेरे पास मोबाइल नहीं.." वो बोलते हुए झेंप रही थी।

"व्हाट? . डोंट जोक मीनल"

"मेरे पास सच मे नहीं है. अंकल से पूछ लेना. " मैं आगे कुछ नहीं बोला। बिल भरने के बाद मैंने मीनल को वाशरूम दिखाया तो वो चली गयी, उसके जाते ही मैने 2 जगह फ़ोन किया।

थोड़ी देर में हम फिर कार में थे. " अब कहाँ घुमाओगे. मुझे घर नहीं जाना अभी. आज खुल के जीना चाहती हूं" मैं खूश हो गया मन की मुराद पूरी हो गयी।

ऐसा लगता था कि एक दिन की ज़िन्दगी मिली हो, सारे सपने केवल कुछ घंटों में पूरे करने हो. "लोथल चलोगी ??"

"ये क्या है" मैं मुस्कुराये बिना न रह सका।

"ये इंडस वैली साइट है. लगभग 4500 साल पुरानी सभयता. 1954 में इस जगह को खोजा गया था. यहां भीड़ कम होगी..लेकिन वापस लौटने में कम से कम 7 बज ही जायेंगे।

"कोई ऐसी जगह जहां जल्दी पहुँच जाएं और आराम से वक़्त बिता सके" उसने कहा।

" ह्म्म्म. अदलज स्टेप वेल या भद्रा फोर्ट; एक काम करते हैं फोर्ट चलते हैं" उसने हामी भरी और मैंने कार की स्पीड बढ़ा दी।

गियर बदलते वक्त अचानक मीनल ने मेरे हाथ पे अपना हाथ रखा.. मैंने उस को एक नज़र देखा और मुस्कुराया।

"निशांत. आज जो भी हुआ उस के लिए सॉरी. " अब मैंने अपने हाथ उस के ऊपर रख दिये3, Full stopऔर गियर बदलते करते हुए बोला " आज तो बहुत कुछ हुआ मीनल. क्या सब के लिए शर्मिंदा हो; अगर हो तो ये मेरे लिए पूरी ज़िंदगी भर का मलाल बन के रह जाएगा"

मीनल चुप हो गयी , उसका हाथ अब भी मेरे हाथ के नीचे था. "नहीं सब के लिए नहीं. लेकिन उस के बाद जो हुआ. मेरा मतलब. " मीनल बोलने में झिझक रही थी. और मुझे पता नहीं क्यों बहुत अच्छा लग रहा था।

"वो; मैं तुम्हारे. मैं जानती हूँ तुम मेरे गले नहीं लगना चाहते थे. पता नहीं मुझसे ऐसा क्योँ हो गया।" मैं उस कुछ पल के लिए देखता रह गया फ़िर सड़क की तरफ देखते हुए बोला "तुम ज्यादा सोचती हो,. तुम नहीं जानती के ये वक्त कितना कीमती है मेरे लिए. तुम ने जो भी किया वो मुझ पे एहसान है तुम्हारा मीनल. "

मैं चुप हो गया, क्या बोलने जा रहा था, मेरे दिमाग ने मुझे फटकारा. इतनी जल्दी में क्यों है. उसे लगेगा कि अपने स्वार्थ के लिए सब कर रहा हूँ मैं. नहीं नहीं मैं कुछ नहीं बताऊंगा कभी. " मीनल के हाथ की गर्माहट अब भी महसूस हो रही थी.. मैंने अपना हाथ हटा लिया और सॉरी कहा।
 
हम फोर्ट पहुँच चुके थे;काश मैं वक़्त को रोक सकता. लेकिन उसे जितना रोकना चाहो उतनी ही तेजी से वो फिसलने लगता है।

हम अंदर गए. मीनल बहुत खुश थी. कभी वो दौड़ती , कभी रुक कर चारो तरफ़ देखने लगी, मैं किसी अभिभावक की तरह उसे सम्हालते हुए बढ़ रहा था।

आज मुझे दुनिया की हर खुशी अपने क़दमो में महसूस हो रही थी। जब मीनल खिखिलाती तो लगता फूल बरस रहे हैं; मैंने मन ही मन भगवान से उसके सारे कष्टों को दूर करने की प्रार्थना की, बीच मे मैं मीनल को कुछ न कुछ खिलाना पिलाना नहीं भूला.

आखिर में हम एक जगह बैठ गए; किले की दीवारें नक्काशी सब वहां से बहुत भव्य प्रतीत होता था. न जाने क्यों मुझे मेरे सपना याद आ गया और नव्या का चेहरा मन मे डर पैदा कर गया।

मुझे पता नहीं चला कि मैंने इस डर में मीनल का हाथ कस के पकड़ लिया था. जब होश आया तो उसे खुद को देखता पाया, उसकी मासूमियत पे मुझे बहुत प्यार आया लेकिन मैं अपनी हरकतों से बार बार शर्मिंदा हो रहा था। सॉरी कह के मैंने अपना हाथ हटा लिया और दूसरी तरफ देखने लगा।

मीनल ने मेरी बाजू को अपने दोनों हाथोँ से पकड़ लिया और मेरे कंधे पर सिर रख के आंखें बंद कर ली. मेरी धड़कने बढ़ गयी. सीने से होते हुए एक चुभन पेट तक पहुँच गयी, लेकिन मैं चुप चाप वैसे ही बैठा रहा।

क्या मीनल भी मुझसे प्यार करती है, मेरे इतना करीब क्यों है वो…ये सिर्फ़ भरोसा तो नहीं लगता. मैं उन से पूछने की हिम्मत भी नहीं रखता. कल इन वक़्त तक मैं यहां से चला जाऊंगा; कैसे दिन गुज़रेंगे बिना मीनल के. कैसे जी पाउँगा मैं. इतने कम वक्त में मीनल मेरी जिंदगी बन गयी और मैं ठगा सा देखता रह गया; वो मेरी होगी भी या नहीं.. हमारा तो साथ भी कितना है नहीं पता. मेरी आँखें बहने लगी. उस से बिछड़ने का दर्द बहुत बड़ा होने वाला था मेरे लिए।

मीनल को मेरे रोने का अंदाजा हो गया; अपने दुपट्टे से मेरी आँखें पोछते हुए वो बोली " कोई मेरे लिए भी इतना कष्ट सह सकता है? मैं क्या हूँ तुम्हारे आगे निशांत. मुझे इतनी इज़्ज़त मत दो. इस लायक. " मैंने अपने हाथ उसके होठों पे रख दिये; और उसए देखता रहा. मेरी बहती आंखें उसे बता रही थी कि वो क्या है मेरे लिए।

अपने जज़्बातों को काबू कर के मैंने उसे वापस चलने के लिए कहा और उठ गया. " निशांत !! मीनल ने आवाज़ दी तो मैं पलटा; और वो आ के मेरे गले लग गयी; मैंने खुद को काबू में ही रखा. "मुझसे फिर मिलने आओगे न. मैं पूरी ज़िंदगी इंतेज़ार करूँगी. " मीनल अपने दिल की बात कह चुकी थी।

मैंने उस के सिर पे हाथ रखा. और उसकी आंखों में देख के बोला. "तुम जिस दिन कह दोगी उस दिन मैं तुम्हारे सामने रहूंगा; बस मुझपे अपना भरोसा मत खोना मीनल. "

बिना इकरार ,बिना स्वीकृति के हम एक दूसरे के हो चुके थे;हमेशा के लिए।।

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दोस्तों आज का भाग कैसा लगा ज़रूर बताएं, आगे की कहानी के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

धन्यवाद
 
मैं मीनल का हाथ थामे उसे बाहर लाया, उसका हाथ पकड़ने का अधिकार मुझे मिल गया था इस से ज्यादा मुझे केवल उसके भरोसे की चाह थी।

"अब घर जाएंगे" उसने पूछा।

"नहीं मीनल. आज का सब से ज़रूरी काम अभी बाकी है"

"वो क्या ?.."

"थोड़ी देर में पता चल जाएगा. " मैं मुस्कुराते हुए बोला।

थोड़ी ही देर में हम एक अच्छे से रेस्टोरेंट में थे;मीनल के हाव भाव से मैं ये जान गया था कि ऐसे रेस्टोरेंट में कभी नहीं गयी या देखा ही नहीं।

उसकी असहजता देख कर में उसे एक केबिन में गया जहां बहुत कम लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। मैंने कुर्सी सरका के मीनल को बिठाया फ़िर उसके सामने वाली कुर्सी पे बैठ गया। मीनल के लिए कॉफ़ी आर्डर की. और कुछ स्नैक्स. वो थोड़ी घबरायी सी चारो तरफ देख रही थी।

"मीनल अब मेरी बात ध्यान से सुनो, समझो और जवाब दो. ठीक है!!" मैं उसका ध्यान अपनी तरफ कर के बोला।

"हम्म्म्म" वो सहमी सी बोली।

"देखो तुम्हारा डेकोरेशन का काम मैंने देखा है, और तुम्हारी सारी क्रिएटिविटी तुम्हारे रूम में छिपी है। तुम जिस तरह के कार्टून बनाती हो, चरित्र चित्रण करती हो. वो फैब्युलस है; अब तुम मुझे बताओ कि इवेन्ट मैनेजमेंट करना चाहोगी या एनीमेशन कोर्स।"

"निशांत मैं नहीं कर सकती, मेरे पास रुपये नहीं और मैं किसी से लुंगी भी नहीं. उस से भी बड़ी बात..मेरी दादी मुझे कुछ करने देंगी भी नहीं" मीनल सपाट शब्दों में बोली।

" अभी मैंने सिर्फ कोर्स पूछा. इसमे दादी और रुपये कहाँ से आये??" मैं थोड़ा कड़क अंदाज़ में बोला " जितना पूछा जाए सिर्फ़ उतना बताओ मीनल।

" एनीमेशन. " उसने धीमी आवाज़ में कहा। "लेकिन. "

"हाँ लेकिन पैसे किसी से नही लोगी, दादी मानेगी नहीं" मैं उस की तरफ थोड़ा झुक के बोला।

"हाई निशांत" पीछे से आवाज़ आयी। " हे हाई जिग्नेश.. कोई प्रॉब्लम तो नहीं हुई यहां आने में?"मैंने पूछा।

"कैसी बात करते हो भाई. आप कहीं भी बुलाओ मैं आऊंगा. " वो मेरे बगल की कुर्सी वे बैठते हुए बोला, और अपना सामान मेज़ पे रख दिया।

मैंने मीनल का परिचय जिग्नेश से करवाया, वो थोड़ी असहज लगी तो जिग्नेश बोला " परेशान नहीं होने का मीनल बेन. निशांत भाई ने कहा है तो आपका सारा काम हो जाएगा, आप बस खुश रहो" मीनल इस वक़्त कुछ समझ नहीं पा रही थी।

मैं जिग्नेश से एनीमेशन इंस्टीटूट, कोर्स टाइम, फीस हर चीज़ के बारे में बात करने लगा।

"मैं नहीं कर सकती निशांत समझो प्लीज. , दादी से क्या कहूंगी?" मीनल ने टोका।

"शशशशशश. बड़ों के बीच नहीं बोलते". मैं उसे चुप करते हुए बोला. "अभी तुम चुप हो के बैठो हमे बात करने दो। मीनल को थोड़ा बुरा लगा", लेकिन चुप कराना भी ज़रूरी था।

"मीनल तुम इस हफ्ते जा के अपना एडमिशन कराओगी, जिग्नेश तुम्हारे साथ होगा; ठीक है ना"

"निशांत तुम जबरदस्ती क्यों कर रहे हो. जब मैंने कह दिया कि नहीं कर सकती. मेरी लाइफ जैसी चल रही है चलने दो"

"क्यों चलने दूं. " मैं गुस्से से बोला.." चुपचाप जितना कहा उतना करो. और हां!! मैं या कोई और रुपये नहीं दे रहा. लोन मिलेगा तुम्हे जो कि जॉब लगने के बाद किश्तों में लौटाना होगा. आई होप.. अब तुम बकबक बंद करोगी;"

मीनल मेरा मुँह देखने लगी. मेरे बदलते व्यवहार से शायद आहत थी, लेकिन मेरे लिए सिर्फ़ उसका कैरियर ज़रूरी था और कुछ भी नहीं।

" देखो मल्होत्रा अंकल के ऑफिक का प्रोजेक्ट जो आप कर रहे हो, उस के सिलसिले में ही मैं आपसे एनीमेशन के लिए कहूंगा, अगर वो नहीं किया तो ये प्रोजेक्ट भी हाथ से जाएगा और बाकी प्रोजेक्ट भी हाथ से जाएंगे. ये बात तो आपकी दादी समझेंगी न!" इस बार जिग्नेश ने समझाया।

"अगर जॉब नही मिली तो लोन कैसे भरूँगी;"मीनल चिंता में थी।

" किसने कहा जॉब नही लगेगी. तुम अपना टैलेंट जानती भी हो" मैं मुस्कुराया।

इतने में जिग्नेश ने बैग से मोबाइल निकाला " दोंनो नंबर सेव है इसमें.."

"मीनल. देखो.." मैं उसे फ़ोन के इस्तेमाल का साधारण तरीका समझाने लगा। मीनल को ये सब अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन मैं मीनल के भविष्य के लिए सजग था।

"मैं ये सब जान के क्या करूँगी. "

"अभी शांत रहो मीनल. "

फिर जिग्नेश ने लैपटॉप निकाला. " सब कुछ, रेडी है, ऑन कर के दिखा सकते हो.."

"थैंक्स जिग्नेश.." मैं खुशी से बोला और मीनल को लैपटॉप ऑन करना सिखाया। " बाकी तुम्हे जिग्नेश सिखाएगा. समझी मीनल. "

मीनल ने चिढ़ के ना में सिर हिलाया. मैं और जिग्नेश उसे देख के हंस पड़े।

"मीनल, तुम्हे कभी भी किसी भी चीज़ की ज़रूरत जो उसी वक़्त जिग्नेश को फ़ोन करना. मैं बंगलोर रहूंगा. किसी भी केस में आने में वक़्त लगेगा; तुम समझ रही हो ना"

"निशांत क्यों कर रहे हो इतना. मुझे अच्छा नहीं लग रहा. " मीनल उदास हो गयी, मैंने इशारा किया तो जिग्नेश बाहर चला गया।

"मैंने मीनल का हाथ पकड़ा और कहा. मैं क्यों कर रहा हूँ तुम्हारे लिए ,इसका जवाब तुम दो मुझे मीनल. " उसने नज़रें झुका ली।

". मैं सिर्फ तुम्हे रास्ता दिखा रहा हूँ. मंजिल तुम्हे खुद पानी है; जो जिंदगी तुम जी रही हो वो तुम्हारी नहीं है; तुम्हे बहुत आगे जाना है मीनल. यकीन मानो मैं अपना फायदा नहीं देख रहा इसमे" मीनल भावुक हो गयी. वो जानती थी उस के सपनों को, जो खो गए थे।

"तुम जब जॉब करना तब मुझे सूद समेत लौटा देना. "मैंने अब भी उसका हाथ पकड़ा था.

"निशांत कितने एहसान करोगे मुझ पे. मैं कैसे चुकाउंगी;

"

मैंने उसका हाथ कस के पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच के गुस्से में बोला "एहसान!! मैं तुम पे एहसान कर रहा हूँ मीनल, मेरी भावनाओ को ये नाम दिया तुमने.? ;कितनी बार समझाना पड़ेगा तुम्हे मीनल. " मीनल मेरी आँखों मे देखने लगी।

"तुम जैसा इंसान, मेरे जैसी लड़की के लिए कुछ करे तो वो एहसान ही लगेगा" वो बुदबुदाई।

"ओह कम ऑन मीनल. कैसी बेतुकी बातें करती हो. मेरे जैसा इंसान, तुम्हारे जैसा इंसान;तुम क्या हो तुम जानती भी हो?? मेरे जैसे 50 निशांत भी तुम्हारी जगह नहीं ले सकते; और एहसान की बात है तो मुझपे तुम भी एहसान कर दो ना ,मेरी बात मान के"

मीनल चुप हो गयी. उसकी आँखों मे मैंने पहली बार प्यार के साथ अपने लिए इज़्ज़त देखी. " अब आगे की बात करें या बचा हुआ टाइम हमे ऐसे ही खत्म करना है" ये सुनते ही वो मुस्कुरायी।

मैंने जिग्नेश को बुलाया..उस ने आ कर एक थैला और उस का बिल मीनल को दिया " इसमे ऑफिक के काम की चीजें हैं, घर जा के ये दिखाना और कहना कि ऑफिस से बुलाया गया था.. तो समान लिया. " जिग्नेश ने मीनल को समझाया।

मीनल हैरानी से जिग्नेश को और मुझे देखने लगी "ये सब पहले से प्लान किया था क्या??" तो हम दोनों हंसने लगे..

"हाँ निशांत ने पहले से बात की थी मुझसे, बस मोबाइल आज ही लिया. "

"मैं मोबाइल नहीं ले सकती निशांत समझो प्लीज"..

" तो फिर हमें ऑफिस के काम से बात करनी हो तो क्या हर बार घर आएंगे" जिग्नेश फिर हंसा।

"आप दोनों ही एक जैसे हैं. गंदे ,खड़ूस. " मीनल गुस्से में बोली।

"अरे वाह बड़े ही अच्छे नाम हैं,मुझे नाम पसंद आये. आप कौन सा अपने लिए रखने वाले हैं" जिग्नेश ने हंस के मुझसे बोला।

"मुझे तो खड़ूस नाम पहले ही मिल चुका. " और हम दोनों मीनल को देख के हंसने लगे, वो खा जाने वाली नज़रों से हमे देख रही थी।

अब जिग्नेश गंभीर हो कर बोला " देखो मीनल, आप मुझे नहीं जानती.. लेकिन निशांत भाई को जानती होंगी. मेरे लिए वो भाई से भी बढ़ कर हैं.. कभी मौका मिला तो बताऊंगा . अब आपको सिर्फ एक काम करना है और वो है अपना कोर्स दिल लगा के पूरा करना. बाकी सब आप हम पे छोड़ दीजिये।

और हां; रोज़ रात को आप मुझे और निशांत भाई को पूरे दिन की खबर देंगी;"

मीनल पूरी तरह असमंजस की स्थिति में थी तो सिर्फ हाँ में गर्दन हिलायी।

जिग्नेश से मिल के हम लोग आखिरकार घर की तरफ बढ़े. मीनल को निकलते निकलते एक बार फिर से सब समझाया हमने।

मीनल चुप हो कर मुझे देख रही थी. " क्या हुआ मीनल?" मैने कार चलाते हुए ही पूछा।

" निशांत मेरा घर जाने का मन नहीं. आज कई सालों के बाद खुल के जिया है, वर्ना तो मैं सिर्फ़ मशीन हूँ।"

"मैं हूँ ना मीनल. तुम्हें सारी खुशियां मिलेंगी.. वादा है मेरा.. बस तुम मेरा साथ दो. मैं तुम्हे तुम्हारे सपनों से मिलवाना चाहता हूँ. "

मैं मीनल को छोड़ के जाना नहीं चाहता था, लेकिन कुछ चीज़ें वक़्त पे छोड़ देनी चाहिए और मुझे भी यही करना था. मीनल जब अपने पंखों को वापस पा लेगी तब अगर उसकी मर्जी हुई तो वो मेरे पास आएगी मैं उसे छीनना चाहता था नहीं बल्कि उसकी जिंदगी में अपने लिए जगह चाहता था।
 
हम सोसाइटी के पास पहुँच गए तो मैंने गाड़ी रोक ली. और मीनल को देखने लगा " अब यहां से तुम्हे अकेले सफर करना होगा मीनल"

वो बहुत शांत थी मुझे देखती रही फिर बोली " जब तुम साथ हो तो सफर अकेला कैसा"

मेरे पास शब्द नहीं थे और मैं कमज़ोर पड़ता जा रहा था, रो कर उसे नहीं भेजना चाहता था। इस लिए जल्दी से कार से उतर के एक ऑटो लिया.. फ़िर उसमे मीनल का सारा सामान रखा। मीनल उदास नज़रों से कार में बैठी मुझे देख रही थी। मैंने दरवाज़ा खोल के उसे उतारा, उसने मेरा हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो मैंने रोक दिया। " नहीं मीनल. जगह और माहौल ठीक नहीं. " वो उदास सी ऑटो में बैठ गयी. मैंने उसके सिर वे हाथ फेर के कहा " अपना ख़याल रखना मीनल;" वो कुछ नहीं बोली एकटक मुझे देखती रही. मैंने ऑटो वाले से जाने को कहा फिर एक नज़र मीनल पर डाली;और ऑटो बढ़ गया।

मैं वहीं खड़ा देखता रहा; कैसी बेबसी थी. चाह कर भी मीनल को साथ नहीं ले जा सकता था, और रोते हुए उसे विदा नही करना चाहता था. आज सीने के दर्द बहुत तेज़ था. इतना कि अब खड़े रह पाना मुश्किल था. मैं कार में आ के बैठ गया. मीनल की सीट को देखता रहा. जैसे वो अब भी वहीं हो; मेरी आँखों ने मेरा साथ देना कब का छोड़ दिया था.. मैं, जो दूसरों के रोने पर हैरान होता था, चिढ़ता था. आज खुद पागलों की तरह रो रहा था।

जितनी बार आंखें पोछता..आंसू दुगनी रफ्तार से गिरने लगते;फिर मीनल की सीट पे देखता तो वो मुस्कुराती हुई दिखती.

मैंने हार के सिगरेट निकाल ली; एक कश लिया ही था कि मीनल बगल से बोली "मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ होती है. " मैं गुस्से में बोला "पीने दो मुझे , तुमसे दूरी सहन नहीं होती अब, तुम्हे समझ आता है कितना प्यार करता हूँ तुमसे. ये देखो आंसू भी नही रुक रहे. मैंने अपनी आँखों के आंसू दिखाते हुए कहा. वो मुस्कुराती रही. फिर मेरे मुँह से सिगरेट ले के खिड़की से बाहर फेंक दी।

मैने बाहर सिगरेट देखी और चिल्लाया..ये क्या किया..मीनल की तरफ देखा तो;सीट खाली थी, पहले जैसे ही।

मैं एक बार बाहर देखता तो एक बार मीनल की सीट पे;क्या हो गया था मुझे, शायद पागल हो रहा था।

मैं अपने सिर पे हाथ रख के खुद को कार की स्टेयरिंग पे टिका लिया।

लगभग आधे घंटे उसी तरह से रहने के बाद मैंने खुद को शीशे में देख के ठीक किया. इस हालत में मम्मी पापा देखते तो उन्हें दुख होता. फ़िर घर के लिये निकल गया।

गेट के अंदर जाते ही नव्या दिखी. उसे देख के लगता था कि वो भी बहुत रोई थी। हमारी नज़रें मिली, और उसने गुस्से से अपनी नज़रें फेर ली।

मैंने कार उस के बगल में रोक दी ,उसने देखा तो मैंने कहा "आज जो भी तुम्हारे साथ किया उस के लिए सॉरी नव्या. मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं. आई होप तुम भी सब भूल कर आगे बढोगी. "

"जिस दिन आप प्यार करेंगे, और वो ही इंसान सब भूल के आगे बढ़ने को कहेगा..उस दिन समझ आएगा आपको;" ये सुनते ही मेरे शरीर सारे रोंगटे खड़े हो गए.. ऐसा लगा जैसे मीनल ने मुझसे वोही बात कह दी, मैं चुप हो कर नव्या को देखने लगा और वो आगे बढ़ गयी।

मैं घर आया तो कोशिश थी कि हंसता रहूँ. लेकिन माँ से कोई कुछ छूपा सका है भला।

"पुत्तर!! अभी से इतना रोयेगा तो बैगलोर कैसे वापस जाएगा. " मैं मम्मी के गले लग गया. "मम्मी चाय पिला दीजिये. फिर आप लोगों से बात करूंगा. " मम्मी मेरा माथा चूम के किचन में चली गयी और पापा मेरे पास बैठ के मेरा सिर सहलाने लगे. "पापा. " मैं नज़रें झुका के बोला. " हांजी बेटा"

"मैं सिगरेट पीता हूँ पापा. आई एम सॉरी" मैं नीचे देखते हुए ही बोला।

पापा उदास हुए, फ़िर बोले. " अब क्या सोचा है, आज क्यों बता रहा है..कोई रीज़न??"

"ह्म्म्म. मीनल ने कहा था कि उसे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ होती है. अब मैं चाह के भी नहीं पी पा रहा;" मैं ग्लानि से बोला;" पापा इस के सिवा कोई बुरी आदत नहीं. मैंने आज तक ड्रिंक भी नहीं किया. और अब से मैं सिगरेट नहीं पियूँगा" इतना कहते ही मैंने सिगरेट का पैकेट पापा के हाथ मे थमा दिया।

पापा को बहुत दुःख हुआ, वो कुछ बोले नही. बस मुझे देखते रहे, मैंने एक बार उन्हें देखा फ़िर, ज़मीन पे नज़रें गड़ा ली।

मम्मी चाय ले के आयी तो पापा के हाथ में सिगरेट का पैकेट देख लिया। "ये क्या है!! आप सिगरेट कब से पीने लगे. बुढ़ापे में और कोई आदत नहीं मिली लगाने को. हे भगवान. अब आपको देख के ये नालायक भी पीना शुरू कर देगा. " मम्मी का टेप रिकॉर्डर चालू हो गया।

मैं हैरानी से पापा और मम्मी को देखने लगा. पापा मुस्कुरा रहे थे. "नीता बेबी!! ग़लती से आ गयी.. आप तो खामखां नाराज़ हो रही हैं;आप के होते हुए नशे की क्या ज़रूरत मुझे.

पापा कैसे इतनी आसानी से बात सम्हाल लेते हैं और एक मैं हूँ, गुस्से में आ जाता हूँ।

मैं चाय पी के कमरे में चला गया और कपड़े बदल के लेट गया। बहुत थक जाने के कारण नींद आ गयी जब उठा तो 7:45 हो गए थे। सामान भी पैक किया फिर एक बार खिड़की से मीनल का घर देखा;"कल से तुम्हे देख नहीं पाउँगा.. पता नहीं कब मिलेंगे फिर "मन बहुत बेचैन हो उठा तो नींचे चला गया।

पापा मम्मी आपस मे बात कर के हंस रहे थे, कितने अच्छे लगते थे दोनो साथ. क्या कभी मैं और मीनल भी ऐसे ही एक रहेंगे। मैं उन्हें देखते हुए सोच रहा था।

"पुत्तर. क्या सोच रहा है इधर आ. " मैं मम्मी के बगल में बैठ गया. " इतना उदास नहीं होते बेटा. "

"आप दोनों की बहुत याद आएगी पापा. "

"हमारी याद?? हां तभी 3 साल में आया ,उस के पहले सिर्फ़ एक दिन के लिए आया था" मम्मी ने टोंट किया।

मैं झेंप गया और पापा हंसने लगे. मेरे कमरे से फ़ोन की आवाज़ आयी।।

"किसका फोन आ गया मम्मी बोली"

" मोटू होगा और कौन" मैं वापस ऊपर भागा, देखा तो किसी अनजान नंबर से फोन था।

"हेलो!!"

सामने से कोई आवाज़ नहीं आयी. मैने फ़िर हेलो कहा..लेकिन फिर घोर चुप्पी.

मैंने फ़ोन की स्क्रीन फिर से देखी. और बोला "हेलो मीनल!!"

"वो;मैं;" आवाज़ सुन के मैं बहुत खुश हो गया।

"बोलो न मीनल;"मैं चाहता था कि वो बकबक करती रहे मैं सुनता रहूं, फ़ोन पे उसकी आवाज़ बहुत अच्छी लग रही थी।

"मैं चेक कर रही थी कि फोन कैसे करते हैं;" उसकी घबराहट फ़ोन में भी दिख रही थी मुझे, मेरे दांत बाहर झांक झांक के टूथपेस्ट का प्रचार करने लगे।

"आज अपने पप्पी को खाना नहीं खिलाया??" मैं उसे देखने के लिए तड़प उठा ऐसा लग रहा था जैसे कितने साल हो गए।

"आती हूँ" इतना कहते ही उसने फोन काट दिया। और मैं नींचे भागा.

"अरे किधर भागा जा रहा है;मम्मी चिल्लाई।

"आता हूँ. " मैं बिना रुके बोला।

गेट पे पहुँच के इंतेज़ार करने लगा;मीनल के कुत्ते से भी प्यार हो गया था तो उसे भी खिलाने लगा।

दूर से मीनल आती दिखी, उस ने अभी वो ही कैप्री पहनी थी जिसमे उसे पहले दिन देखा था, और तब की अपनी सोच पे मुझे हंसी आ गयी।

सब कितना बदल गया कुछ ही दिनों में; मीनल मेरे पास आई तो मैं कुत्ते से बोला।

"देख कौन आया है तू तो पहचानता है ना इस लड़ाकू लड़की को" मीनल मुस्कुरायी और कुत्ता उस के पास भाग गया।

"निशांत. थैंक यू" वो कुत्ते को खिलाती हुई बोली।

" अब ये किस लिए;" मैं हैरान हो कि बोला।

" तुम बहुत अच्छे हो निशांत. "

मैं कहाँ से अच्छा मीनल. अच्छा होता तो तुम्हे वहां अकेला छोड़ के जाने लगता क्या;मैं सोचता रहा।

" मीनल;!! मुझे याद करोगी न.. भूल तो नहीं जाओगी न" मेरा डर, अरमान सब जाग गए।

वो मुझे एकटक देखती रही; उसके ऐसे देखने से मैं झेंप गया।

"क्या हुआ मीनल. " मैं नज़रें नीची कर के बोला. लगा कि वो कहीं अब तक नाराज़ न हो।

" निशांत;मैंने भगवान को नहीं देखा, लेकिन लगता है कि उन्होंने तुम्हे मेरे लिए भेजा; या खुद तुम्हारे रूप में आगये।"

"मैं इस लायक नहीं मीनल. मुझे ऐसा दर्जा नहीं चाहिए. मुझे केवल तुम्हारी जिंदगी में. " मैं बोलते बोलते चुप हो गया, कहीं मीनल एहसान का बदला जैसा कुछ न समझ ले।
 
मुझे मीनल अपनी जीवनसंगिनी के रूप में चाहिए थी जिसमे मेरा दर्जा पती का हो. सुबह उठते ही उसे देखु. रात को उसे प्यार से अपनी बाहों में सुलाऊँ. जब भी वो अपने बाल बांधे मैं उन्हें खोल दूं। मैं खयालों में खोया उसे देखता रहा।

मीनल पता नहीं क्या सोच के बोली " अब तुम जाओ निशांत. हमे खुद को समझाना होगा।"

"मैं नहीं मीनल, तुम जाओ मैं यहीं खड़ा रहूंगा अभी. मैं तुम्हे छोड़ के अब कहीं नहीं जा सकता. "

मीनल ने आंखें भर के मुझे देखा फिर मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया और मैंने उसके हाथ के नीचे अपना हाथ रख दिया और उसे देख के मुस्कुरा दिया ताकि वो दुःखी न हो; कुछ देर मुझे देख के वो मुड़ गयी और आगे बढ़ गयी।

मैं अपना हाथ आगे किये वहीं खड़ा रहा जब तक कि वो ओझल नही हो गयी. उसके हर पल दूर जाते कदम मेरे दिल मे होने वाले दर्द को और बढ़ाते रहे।

मैं घर आया और कार से मीनल का बैंड निकाला; उसे पकड़ते ही मीनल का एहसास ताज़ा हो गया।

लोग जहां फ़ोटो रखते हैं, मैंने अपने पर्स में उस जगह मीनल का बैंड सजा दिया।

"अब तुम हर पल मेंरे साथ हो मीनल;" मैंने कहा और घर के अंदर चला गया।

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मन भी कितना बावरा होता है किसी हाल में खुश नहीं रहता, इसे हमेशा पहले से ज्यादा ही चाहिए होता है।

मीनल के साथ के लिए मेरा मन लालची हो गया था,काश आज भी पांडाल में कुछ होता. मैं फिर मीनल के साथ होता।

मैं खाना खा के पापा मम्मी के पास बैठा और उन्हें मीनल के एडमिशन के बारे में बताया, उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मीनल मान गयी।

मैंने पापा को सब अच्छे से समझाया कि उस की दादी को कैसे सम्हालना है ताकि वो मीनल को खुद से एनीमेशन कोर्स के लिए भेजे।

मम्मी हैरान थी "क्या हुआ मम्मी" मैंने पूछ ही लिया; "पुत्तर तू इतने कम दिन में इतना बदल कैसे गया. तू सच मे मीनल से ही शादी करेगा ना"

"मम्मी अगर मीनल चाहेगी तो. सिर्फ़ मेरे चाहने से नहीं होगा ना"

" कैसी बातें करता है पुत्तर, किसी की आंख फूटी होगी जो तुझे मना करेगी. मेरा बेटा जिससे भी शादी करेगा वो किस्मत वाली होगी" मम्मी ने फिर मेरी बालाएं ली।

"मीनल की भी जिस से शादी होगी वो भग्यशाली होगा नीता" पापा मीनल की तरफ से बोले।

"हांजी. आपको तो देख के लगता है कि निशू और मीनल की शादी में भी आप लड़की वाले बन के कन्यादान ही करेंगे।"

हम तीनों इस बात पे हंस पड़े, काफी देर तक बात करने के बाद मैं कमरे में आ गया और सोने की कोशिश करने लगा।

जब कुछ नहीं हुआ तो मोबाइल निकाल लिया फ़िर मीनल की फ़ोटो देखी. उस से बात करने का मन हुआ तो नंबर डायल किया लेकिन घंटी जाने के पहले ही काट दिया।

फिर आज के दिन की सारी घटनाएं याद करने लगा;और न जाने कब सो गया।

मैं सिगरेट के कश ले कर धुआं उड़ाता फिर उसी मैदान में था, जहां आज मीनल के साथ गया था। चारों तरफ बारिश से फैली हरियाली को देखते हुए मैं एक चट्टान से टिक के बैठा था, "सिगरेट छोड़ क्यों नहीं देते. " कहते हुए उसने मेरी सिगरेट फेंक दी।

मैं उसे देखता रह गया. बारिश में भीगी मीनल मुझे ही देख रही थी, उसके बालों से पानी की बूंदें टपक के मेरे चेहरे पे आ गिरी तो मेरी आँखें बंद हो गयी और मीनल खिलखिला के हंस पड़ी।

मैं उसे देखता रहा फिर झूठे गुस्से में बोला "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझ पे छींटे डालने की"।

"ऐसे.." कह के उसने अपने बाल झटक दिए और भाग गई, मैं उस के पीछे भागा. वो हँसती फ़िर पीछे मुड़ के देखती और मैं अपनी गति बढ़ा लेता।

आखिरकार मैं उसे पकड़ लेता हूँ. और अपनी तरफ खींच लेता हूँ. इस बार बालों के छीटें फिर गिरते हैं लेकिन मीनल मेरी गिरफ्त में है. वो मेरी बाहों से निकलने के लिए मचलती है लेकिन मेरी पकड़ और मजबूत हो जाती है।

दोनों बारिश में भीगते हुए एक दूसरे को देखते रहते हैं;मैं अपना होश खो बैठता हूँ. और उसे चूमने के लिये झुक जाता हूँ;लेकिन मीनल अचानक ही रेत बन के मेरे हाथ से फिसलने लगती है, मैं उसे रोकने की कोशिश करता हूँ, लेकिन मीनल पूरी तरह नदारद थी. मैंने नीचे बिछी रेत देखी8 Full stopऔर ज़ोर से चिल्लाया "मीनल".

और मेरी नींद खुल गयी, मैं ऐसे सपनों से अब परेशान हो गया था; चेहरे वे पसीने की बूंदें इन तरह फैली थीं जैसे सच में पानी के छींटे हो.

मैंने समय देखा 5 बजने वाले थे, फिर सुबह का सपना. मैंने भगवान से प्रार्थना के लिए हाथ जोड़ दिए।

मैं तैयार हो कर जॉगिंग पे निकल गया. गाना सुनते हुए अचानक कल वाला गाना फिर बज उठा. मैं फिर दौड़ न सका.

जब तक तेरी आंच में बूँद बूँद मैं जल न लूं।

जब तक तेरे साथ मे चांद तक मैं चल न लूँ

मेरे पास तुम रहो जाने की बात न करो

मेरे पास तुम रहो जाने की बात न करो

मेरी आँखें बंद हो गयी. मीनल के साथ डांस का एहसास फिर ताज़ा हो गया। इतना खो गया कि याद नहीं रहा कि सोसाइटी की सड़क पर हूँ। मैं सिर ऊपर किये, हाथ फैलाये मीनल के एहसास में डूब रहा था।

मैं रोज़ जॉगिंग के लिए निकलता था तब सड़क लगभग सूनसान रहती थी लेकिन आज जब मेरी बेइज़्ज़ती की बारी आई तो जैसे सारी सोसाइटी ही बाहर घूमने निकली थी।

गाना खत्म होने के बाद मैंने यथार्थ में कदम रखा और आंखें खोली, देखा तो आस पास कई लोग आंखे फैलाये देख रहे हैं, कुछ मुँह बना के खुसुर-पुसुर में लगे हैं, बेइज़्ज़ती की पराकाष्ठा तब हुई जब मेरे घुटनों तक भी मुश्किल से पहुँचने वाले बच्चे मेरी ही नकल करते नज़र आये। मैंने हेड फ़ोन निकाल के गले मे लटकाया तो कुछ फुफुसाहट भी कान में पड़ी।

"दिखने में तो सुंदर है ,फिर पागलो जैसी हरकतें क्यों कर रहा है. "

"मुझे तो लगता है कुछ ऊपरी साया है इस पे.." एक औरत मुँह और आँखें गोल कर के दूसरी से कह रही थी।

" बेचारे मल्होत्रा जी एक ही बेटा, वो भी;च च च. "

मुझे बिल्कुल, ऐसा लगा कि मैं किसी मदारी का बंदर हूँ और सब हतप्रभ हो कर मेरा नाच देख रहे हैं। करू तो आखिर क्या करूँ; इज़्ज़त बचानी बहुत ज़रूरी थी।

"हे!! हेलो एवरीवन;" मैंने हाथ हिलाया। और चारों तरफ से टेढ़े, आड़े तिरछे हुए मुँह से जय श्री कृष्णा का सामूहिक उदघोष हुआ. मुझे लगा किसी मंदिर में आ गया हूँ तो हाथ जोड़ लिए।

गुजराती लोग कहीं भी चले जाएं वो अपने संस्कार साथ ले के ही चलते हैं, फिर चाहे वो ढोकला ही क्यों न हो. और अभी तो हम गुजरात के अंदर ही थे. मेरा हाई हेलो कहाँ चलता यहां।

अब लोग मुझे देखने लगे कि मैं बताऊँ मुझे बीमारी क्या है, कहीं छूने से फैलने वाली तो नहीं आदि.

"योगा.. ये योगा का नया तरीका है, स्ट्रेस को कम करने का;" मैंने दांत दिखाते हुए अपनी बात रखी।

"ऐसे सड़क पे.. हाथ ऊपर कर के??" एक ने सवालों की बंदूक दाग दी।

"एक्चुअली. !! ये आध्यात्मिक योग का भाग है. "

आध्यात्मिक योग?? अब ये क्या चिड़िया है..मेरे अंदर से आवाज़ आयी, और मैं फुसफुसाया. मुझे क्या पता..

"इसमे क्या होता है??" कितने प्रश्न पूछते हैं ये लोग उफ्फ्फ।

"इस योग में ईश्वर से संवाद किया जाता है. जब भी आप को लगें आप कमज़ोर पड़ रहे हैं, या कोई रास्ता नहीं मिल रहा तो ऐसा किया जाता है.." मुझे पता था कि और भी सवाल आएंगे अभी इस लिए अपना उपदेश चालू रखा।

" जब आप अपने हाथों को खड़े हो के ऐसे ऊपर नीचे करते हैं ना तब रक्त संचार बढ़ता है और मस्तिष्क तेज़ गति से काम करने लगता है. हम खुद को ईश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. "

मेरा ज्ञान समाप्त हो गया था और अगल बगक की आंखों में मेरे लिए श्रद्धा दिखने लगी थी।

तू जॉब छोड़ के ये ही सब कर ले न. बैठे बिठाए कमाई हो जाएगी. मीनल भी रोज़ दिखेगी.. मेरी अंतरात्मा भी मेरी बेइज़्ज़त्ति पे आमादा थी।

सबको देखते हुए पीछे खड़ी मीनल दिख गयी. जो अपनी हँसी रोकने की कोशिश में थी।

मीनल की बच्ची; सब इसी के कारण हो रहा है। मैंने उसे घूरा तो वो गेट की तरफ खिसक ली।

कुछ लोगों को अपने आध्यात्मिक योगा के स्टेप सिखा के मैं गेट की तरफ भागा।

"तुम्हें बहुत हंसी आ रही थी. " मैं गाय को रोटी खिलाती हुई मीनल से नाराजगी में बोला तो वो फिर हँसने लगी।

"अच्छा योगा था; क्या नाम था. आध्यात्मिक योगा. " मीनल फिर हँसने लगी।

"तुमने सब देखा??. तुम भीड़ में मेरे मज़े ले रही थी; हाऊ चीप" मैं कैसे भी अपनी इज़्ज़त बचाना चाह रहा था।

"तू भी सीख ले बेटा इनसे योगा. " वो हंसते हुए कुत्ते से बोली।

इस लड़की का दिमाग खराब है, कुत्ते के सामने भी मेरी इज़्ज़त खराब कर रही है. क्या सोचेगा वो मेरे बारे में.

कुत्ता तेरे बारे में क्या सोचेगा!! ; सोसाइटी में तमाशा बन के आया और चिंता कुत्ते की. हद है मैं खुद ही अपनी नहीं सुन रहा था तो मीनल क्या खाक सुनती।

"मीनल ऐसे हंसना बंद करो मुझपे. " मुझे चिढ़ होने लगी।

"वैसे तुम्हे हुआ क्या था, ये हरकतें क्यों कर रहे थे??"मीनल ये भी हंसते हुए बोली।

जिस को सोच के हर वक़्त पागल सा हो गया हूँ, वो पूछ रही है कि हुआ क्या है मुझे. मैंने चारों ओर देखा.. इतनी सुबह घनघोर शांति थी बाहर. मुझे और क्या चाहिए था मीनल को चुप कराने के लिए.
 
मैंने उसकी बाज़ू पकड़ के अपनी तरफ खींचा और उसकी आँखों मे देख के धीमे से बोला;" तुम्हें याद कर रहा था;तुम्हारे साथ किये डांस को फ़िर जी रहा था, तुम्हे छू के महसूस कर रहा था. बताऊँ कैसे!! तुम भी महसूस करना चाहोगी..??." मैं गुस्से में था लेकिन ये बोलते हुए मुझे अजीब सा एहसास हुआ और मीनल की हंसी तो क्या मुस्कुराहट भी गायब थी।

"व. वो; म;" मीनल की ज़ुबान कुछ कह नहीं पा रही थी।

"क ख ग पढ़ने के दिन गए मेरे; अब तो सिर्फ तुम्हें पढ़ रहा हूँ. और क्या पढ़ू बताओ. " मैंने उसे थोड़ा और पास खींचा।

"म. जाना है. " वो हक्लायी।

"कहाँ चले बताओ;" मैं उसकी आंखों में देख के मुअकुराया। " तुम्हें भी सीखना है आध्यात्मिक योगा?"

लेकिन अब बेचारी पे अत्याचार ज्यादा हो गया था इस से थोड़े से भी ज्यादा में वो रोने लगती जो मैं सह नहीं पाता।

" चलो जाओ माफ किया. " मैंने उसका हाथ छोड़ा और हंसा।

मीनल किसी 100 मीटर दौड़ की प्रतिभागी की तरह गेट के अंदर जा के गायब हो गयी। मैं अपनी बत्तीसी निकाले उसे देख के हंसता रहा। जाने के पहले ये होना भी शायद मेरे लिए एक अच्छी याद बन गया।

घर आया तो मम्मी पापा के साथ चाय पी, और कमरे में आ के नहा धो के तैयार हुआ और अपने बाकी सारे समान भी पैक कर लिए अपने योग वाले ज्ञान को याद कर के मुस्कुराता रहा।

नीचे जा कर नाश्ता करने बैठा ही था कि मौसी आ गयी और साथ मे सोसाइटी की खबरें भी बटोर के लायी।

"निशू पुत्तर मैंने सुना तू योगा क्लास दे रहा है आज कल"

हे भगवान ये दुनिया मेरे पीछे क्यों पड़ी है; मैंने अपना सिर पकड़ लिया।

पापा मम्मी मुझे घूर रहे थे जैसे पूछना चाह रहे हों के क्या रायता फैलाया मैंने।

"क्या हुआ चुप क्यों है. बता न!!"

"मौसी कुछ नहीं. मैंने कहीं पढ़ा था तो एक दो बुज़ुर्ग लोगों को बताया. कोई क्लास नहीं" मैं उनके पैर छूते हुए बोला।

" पुत्तर ये सब काम न किया कर, यहाँ कुछ औरतें कह रही थी कि तू सन्यास लेने वाला है.. ईश्वर से कहीं भी बात करने लगता है;" ये औरतें भी क्या चीज़ हैं. इनकी खबरों के आगे तो गूगल भी नतमस्तक हो जाये।

"कल तो तू शादी के सपने दिखा रहा था , आज सन्यास क्यों ले रहा है। देख ले निशू. ऐसी वैसी कोई भी हरकत की न तो मेरा मरा मुँह देखेगा;"

ओह नो!! टेप रिकॉर्डर. मैंने अपने सिर के बाल नोच लिए।

" मम्मी प्लीज. ; ऐसा कुछ नहीं!! और आप न ये औरतों वाले सीरियल देखना प्लीज बंद करो. " मैं हाथ जोड़ के बोला।

" लैह!! अब औरतें औरतों वाले सीरियल नहीं देखेंगी तो क्या कार्टून देखेंगी" मौसी ने दिमाग वाली बात कही।

पापा न्यूज़ पेपर के पीछे से मज़े ले रहे थे. ये तमाशा किसी सीरियल से कम था क्या।

"मैं यहां रुकू या अभी से निकल जाऊ एयरपोर्ट के लिए;" मैं चिढ़ के बोला।

"चुपचाप नाश्ता कर, बहुत ज़ुबान लड़ाता है" मम्मी का फरमान आया और मैं सबको खामोशी से खाता हुआ दिखने लगा।

"जीजू गुड न्यूज कब दे रहे हो?" मौसी ने उनसे पूछा। पापा मुस्कुराये और हां में सिर हिलाया।

" क्या सच्ची!!" चलो भगवान ने सुन ही ली आपकी।

"कौन सी गुड न्यूज़" मैने पूछा।

"तू और मीनल;" मौसी ने शरारती अंदाज़ में कहा, मुझे शरम आने लगी। नाश्ता मैं कर ही चुका था तो मेरा फोन बज रहा है बोल कर मैं कमरे में भागा।

कमरे में गया तो सच मे जिग्नेश का फ़ोन आने लगा मैने उठाया तो उसने मीनल के एडमिशन के लिए कुछ बात करनी है कह के मुझे बुलाया।

मैं नीचे गया और पापा को बताया, लेकिन पापा को किसी ज़रूरी काम से कहीं जाना था तो मैंने ऑटो से जाने की बात कही और निकल गया।

गेट के बाहर ऑटो खोजते वक़्त मुझे मीनल दिखी;" मीनल तुम यहाँ क्या कर रही हो??" मैं हैरानी से बोला तो उसने बताया कि जिग्नेश ने उसके सारे सर्टिफीकेट के साथ बुलाया है। " इधर आओ मीनल, मैं भी वही जा रहा हूँ साथ चलो।"

लेकिन वो हिचकिचा रही थी मेरे पास आने में. सुबह मैंने उसे डरा भी तो दिया था।

मैं खुद ही उसके पास जा के खड़ा हो गया तो वो थोड़ा दूर खिसक गई, मैं भी उस के पास खिसक के खड़ा हुआ और उसका हाथ पकड़ लिया। मीनल सिहर उठी, जिस तरह की भावनाएं मुझे महसूस होती थीं अब मीनल भी उस दौर से गुजरने लगी थी।

ऑटो आया तो मैंने उसे बिठाया और फ़िर खुद बैठा। जिग्नेश के ऑफिक जा के मीनल ने उसे सब सर्टिफिकेट दिखाए. मैंने उसे मुझे बुलाने का कारण पूछा तो वो बोला कि मीनल अभी उसे नहीं जानती तो साथ देने के लिए।

मैं गर्व से भर उठा, मेरे दोस्त सच मे हीरे थे; उसने बताया कि अगले हफ्ते से ही नया बैच शुरू हो जाएगा। मीनल को उस के पहले रोज़ लैपटॉप पे काम करना सीखना होगा।

" तुम कल से यहाँ आ जाओ ताकी क्लास में तुम्हे कोई दिक्कत न हो. " मीनल ने हॉं में सिर हिलाया।

जिग्नेश हम दोनों को अकेला छोड़ के बाहर जाने लगा. " आप दोनों फ़िर पता नहीं कब मिलो तो आज खुल के बात कर लो"

" जिग्नेश!! ", मैं हैरान था।

" भाई, मैं कल ही सब समझ गया था; आप चिन्ता मत कीजए, मीनल अब आपके साथ मेरी भी जिम्मेदारी है" इतना कह के वो चला गया।

मैं और मीनल अकेले थे आमने सामने; पता नहीं क्यों ऐसे में हम दोंनो ही असहज हो जाते थे।

"मीनल आज सुबह जो भी मैंने कहा वो सिर्फ तुम्हे डराने के लिए था, बुरा नहीं मानना" मैंने बात शुरू की।

मीनल कुछ नहीं बोली बस मेरे सामने सिर नीचे किये खड़ी रही।

"तुम्हे ठीक नहीं लग रहा तो बाहर चलते हैं; तुम परेशान मत हो" जाते जाते उसे अब परेशान करने का मन नही था. मैं बाहर की तरफ जाने के लिए मुड़ा तो मीनल ने मेरे कंधे पे हाथ रखा । मैंने पीछे देखा तो उसने ना में सिर हिलाया।

मैं पलटा और वो फिर सिर झुका के खड़ी हो गयी। मैं उसे जी भर के देखता रहा फिर उसकी ठुड्डी पे हाथ रख के उसका चेहरा ऊपर किया और कहा " तुम चिंता मत करना. सब अच्छा होगा, खुद पे भरोसा करो"

वो मेरे गले लगना चाहती थी ये मैं उसके हाव भाव से समझ गया तो मैंने उसे आवाज़ दे कर अपनी बाहें फैला दी। मीनल मुझे कुछ पल ऐसे ही देखती रही फ़िर दो कदम आगे आ के मेरी बहों में छुप गई।
 
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