मेरी ज़िंदगी न जाने मुझे किस दिशा में ले जा रही थी, प्यार के लिए भी कितने मापदंड तैयार किये थे मैंने. लेकिन जब हुआ तो कोई मापदंड काम न आया. मैं इस एहसास की गहराई नापते हुए न जाने कब इसमे डूब गया;
मीनल. एक ऐसा नाम था जो मेरे मापदंडों के बिल्कुल विपरीत था.. और मेरी सारी अपक्षाओं को दरकिनार कर मेरी ज़िंदगी बन चुका था।
बंगलोर पहुँच कर खुद को ही धकेलता हुआ अपने फ्लैट पहुँचा, रात काफी हो चुकी थी इसलिए कौस्तुभ को जगाना ठीक न समझ के लॉक खोल के अंदर गया। अंदर कौस्तुभ को कुर्सी पे बैठे अपना इंतेज़ार करते पाया।
"तू सोया नहीं मोटू. " मैंने थकी आवाज़ में पूछा। वो बिना कुछ बोले ही मेरे पास आया मुझे गले लगा लिया, मैं समझ नहीं सका कि उसे हुआ क्या। "क्या हो गया. ?" मैंने गले लगे ही पूछा।
"कुछ नहीं. तू फ्रेश हो जा फिर साथ खाना खाएंगे.." आज वो कुछ ज्यादा ही गंभीर था।
"तूने खाना नहीं खाया अब तक. तू पागल है मोटू..तुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती. मैं आता हूँ 5 मिनेट में"..जितना जल्दी हो सका मैं फ्रेश हो कि आया।
खाना खाते हुए मैने कोइ बात नहीं कि, कल से आज तक जो भी हुआ सब दिमाग मे घूम रहा था; कौस्तुभ भी पता नहीं क्यों चुप था.
सोते समय वो मेरे पास आया और मेरा सिर सहला के बोला, "तू सच्चा है ना निशांत. देर सवेर तेरे साथ सब अच्छा होगा देखना. " मैं उसे देखता रहा, मुझे वो निशांत तभी बुलाता था जब वो दुःखी या परेशान हो।
"जिसके पास तेरे जैसे दोस्त हो न वो कभी दुःखी नहीं हो सकता।"
मैं बहुत थका था लेकिन मन बहुत बेचैन भी था, मोटू मेरा सिर सहलाता रहा और मैं ना जाने कब सो गया।मोटू कब वहां से गया मुझे कुछ याद नहीं।
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कौस्तुभ ने आज मुझे बिठा के जबरन मेरी शेव बनाई, साथ ही न जाने कौन कौन सी दार्शनिक बातों से मुझे समझाता रहा।
कम शब्दों में कहूँ तो वो मुझे मीनल को मुक्त रखने और उसे सोचने समझने का पूरा समय देने के लिए कह रहा था। बात उसकी सही भी थी, तो मैंने अमल करने का फैसला कर लिया।
दिन कटने भी लगे, पहले बहुत उदास, फिर उदास, फ़िर ठीक ठाक और अंत मे अच्छे भी; इंसान का मन उसे हर परिस्थिति में आगे बढ़ना सिखा ही देता है।
मीनल रोज़ फोन कर के अपने बारे में बताती, मुझे सुन कर सुकून मिल जाता. मैं केवल उसे प्रोत्साहित करता, अपने बारे में बातें बंद कर दी।इसी तरह 6 महीने बीत गए।
मेरा ऑफिस फेस्ट नज़दीक था, मेरा नाम जबरन गाने के लिए गया, जिग्नेश से बात हुई तो उस ने बताया कि मीनल बहुत मेहनत कर रही है और उसकी अंग्रेज़ी में भी सुधार है,उस के इंस्टीट्यूट में उसकी तारीफ हो रही थी। मन बहुत खुश था मीनल के लिए।
ऑफिस में आद्या अब ठीक रहने लगी थी, फेस्ट के 3-4 दिन पहले ही उसने ऑफिस के बाहर चाय पीने के लिए पूछा और मैं चला गया। बाहर चाय पीते वक़्त अचानक से एक लड़का आ कर चिल्लाने लगा ,अगल बगल देखने पर पता चला वो मुझे और आद्या को सुना रहा था। "क्या प्रॉब्लम है भाई..!!" मैंने पूछा।
"स्साले मेरी गर्लफ्रैंड के साथ घूम रहा है और पूछ रहा है प्रॉब्लम क्या है. वो मेरी तरफ कॉलर पड़कने के लिए बढ़ा;
उसे देख कर मुझे हँसी आ गयी, कम से कम खुद को देख तो लेता; पतला दुबला लड़का, जिसे मेरा जैसा हाथ भी लगा दे तो छटक के दूर जा गिरे. हुआ भी कुछ ऐसा ही, उसके कुछ कर पाने के पहले वो मेरी गिरफ्त में था;
उसके हाथ अच्छे से मरोड़ के मैं बोला "जब भरोसा ही नहीं तो गर्लफ्रैंड क्यों बनाता है. और मुझ जैसे से उलझने के लिए पहले उस लेवल का बन. "
उसे झटक के मैं अकेले ही ऑफिस वापस आ गया और आद्या से दूरी बना के रखने का सोच लिया. पता नहीं किस तरह का प्यार होता है आज कल;आद्या ने बाद में सॉरी कहा और बताया कि उसकी शादी होने वाली है उस लड़के से;मैंने कोई जवाब नहीं दिया.. और उस दिन के बाद से उस से बच के रहने लगा।
मीनल से बात होती रही लेकिन कभी मुझे ऐसा नहीं लगा कि वो हिम्मत करेगी हम दोनों के लिए, समाज की नज़र में प्यार कर लेना ही अपराध है; मेरा मन उदास हो जाता उस से बात कर के.
फेस्ट वाले दिन आद्या काफी उदास और रोई हुई लगी, पूछने पे बताया उस के बॉयफ्रेंड ने उस से मार पीट की थी. मुझे उस पे तरस आ गया, उसे काफी समझाया और सांत्वना दी मैंने; लेकिन ये सांत्वना मेरे लिए बहुत बड़ी मुसीबत लाने वाला था जिसका मुझे अंदाज़ा भी नहीं था।
फेस्ट में मॉडलिंग, ग्रुप डांस, कपल डांस, गाने सबकी व्यवस्था थी, डांस देख कर, मीनल की याद ताजा हो उठी;उसके साथ किया डांस, उसके साथ बिताए पल मेरी आँखों के आगे घूम रहे थे.…मैंने पर्स निकाल के उसका बैंड अपने हाथ में लिया, लगा मीनल साथ ही है. मेरी बारी आ चुकी थी..मैं बैंड को हाथ मे लिए ही स्टेज पे गया. और उसे देखते हुए ही गाना शुरू किया.
हम्म;ह्म्म्म. हम्म्म्म. हम्म.
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कोई किसी को चाहे, तो क्यों गुनाह समझते है लोग
कोई किसी की खातिर तड़पे अगर तो हँसते हैं लोग
बेगाना आलम है सारा,यहाँ तो कोई हमारा दर्द नहीं पहचाने है।
पत्ता पत्ता, बूटा बूटा, हाल हमारा जाने है
जाने ना जाने, गुल ही ना जाने, बाग़ तो सारा जाने है.
इसके आगे मैं गा नहीं सका. वन्स मोर, वंस मोर. की गूंज के बाद भी मैं स्टेज से नीचे आ चुका था और सीधे वाशरूम भागा।
बहुत दिनों बाद मुझे रोना आया था आज. खुद को ठीक कर के मैं बाहर निकला और थोड़ी देर में घर के लिए वापस निकल गया।
आद्या से थोड़ी बहुत बात होती थी अब, वैसे भी मैं काम के वक़्त सिर्फ काम करता हूँ.
एक दिन काम का ज्यादा लोड होने के कारण मैं थक गया तो बीच मे ही चाय पीने के लिए चला गया। देखा तो मेरा मोबाइल साथ नहीं था, बहुत खोजने के बाद मेरी सीट पे ही मिला। ये बात मुझे बहुत खटकी. लेकिन फिर लगा कि मैं भूल गया शायद.
अगले दिन मुझे ऑफिक की मैनेजमेंट टीम ने बुलाया जहां मुझे बताया गया कि मेरे खिलाफ इन्क्वायरी बैठाई गयी है, मोलेस्टेशन केस में.
मेरे पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी, जहां मैं लड़कियों से बहुत लिमिट में बात करता था. आज मेरे खिलाफ इन्क्वायरी शुरू हो गयी थी।
पूछने पर पता चला कि मैंने आद्या को अश्लील मैसेज किये थे. मेरी पूरी दुनिया घूम चुकी थी ये सोच कर. मैसेज और उसको भेजने का वक़्त देख के मैं समझ गया था कि मेरा फ़ोन कैसे नहीं मिल रहा था;लेकिन मैं फंस चुका था.
ऑफिस में मेरी बेइज़्ज़ती की कोई कसर नही छूटी, कुछ लोग अब भी थे जो मेरे साथ थे लेकिन उन से कुछ होना नहीं था.
मेरी सीट अलग कर दी गयी. और मैंने भी अपना काम शुरू कर दिया..
कौस्तुभ को सारी बात बताई तो वो भी सकते में आ गया. मैंने मीनल से भी उस दिन बात नहीं की, मुझे बहुत गहरा आघात लगा था।
मैं और कौस्तुभ बैठ के चर्चा करते रहे, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था कि किस का हाथ है इनमे. या तो आद्या ने खुद किया था या किसी से करवाया था.
उस दिन क्या क्या हुआ , सारी बातें कौस्तुभ बिंदुओं में लिखता गया. आखिर में निष्कर्ष निकला कि उस दिन जो सहकर्मी मेरे पास कुछ काम से आया था वो मेरे मोबाइल गायब होने में सम्मिलित है। अब उसने ऐसा क्यों किया ये पता लगाना ज़रूरी था।
मेरी इज़्ज़त, मेरी जॉब सब कुछ अब इसी पे निर्भर था; पूरी रात मैं करवटें बदलता रह गया।
मैंने इन्क्वायरी टीम को अगले दिन सारी जानकारी दी, जिस वक्त मैसेज गए हैं उस वक़्त की सीसीटीवी फुटेज चेक करने को कहा.. मैं उस वक़्त चाय पीता नज़र आया, और फ़िर भागता हुआ. लेकिन टीम ने मेरी दलीलें ये कह कर खारिज कर दी कि मैं मैसेज कर के चाय पीने गया होऊंगा, नेटवर्क के कारण मैसेज देरी से मिले।
आद्या मुझे नफरत की निगाह से देखने लगी थी ,
. दिन गुज़र रहे थे और मेरे पास वक़्त बहुत कम था. फिर मैंने मजबूरी में आद्या से मदद मांगी; आद्या ने साफ इंकार कर दिया और मुझे जेल भिजवाने तक की बात कर डाली।
मेरी जिंदगी में ऐसा दिन भी आएगा मैंने नहीं सोचा था;
मेरे पास कोई सबूत नहीं था. आखिरकार मुझे जॉब से निकाल दिया गया, ये मेरी पहली गलती थी और मेरा काम हमेशा परफेक्ट रहा था इस लिए बात पुलिस तक नहीं पहुँची।
मैं बिना अपराध के सज़ा भुगतने लगा. ऑफिस में मेरे सामने ही तरह तरह की बातें होती रहीं और मैं सब सुनता रहा. सारे पेपर का काम निपटा कर मुझे शाम तक ऑफिस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
मुझे सब धुंधला दिख रहा था , चक्कर आ रहे थे. सब कुछ छिन गया मेरे हाथ से.. मैं अपना सिर पकड़ के कार से सट के बैठ गया और रोने लगा. इस वक़्त पार्किंग में कोई देखने वाला नहीं होगा ये सोच, कर. लेकिन मैं गलत था. मैंने 2 लोगों को खुद पे हंसता पाया. देखा तो आद्या का बॉयफ्रेंड औऱ मेरा वो ही सहकर्मी था; मैं उन्हें देखता रहा. सब कुछ अब मेरे सामने था लेकिन मैं लाचार था। वो दोनो मेरी मज़ाक बना कर और मुझे न जाने कौन कौन आई धमकियां दे कर चले गए।
अपनी बर्बाद जिंदगी का नज़ारा देख कर जीने की इच्छा भी नहीं रह गयी। मैंने कौस्तुभ को फ़ोन किया और ऑफिस के बाहर मिलने को कह कर गाड़ी स्टार्ट की।
थोड़ी देर में मैं और कौस्तुभ अपने फ्लैट पर थे, मैं कौस्तुभ से गले लग कर बहुत देर तक रोता रहा. ऐसा लगता था कि ये रोना मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया हो। जब शान्त हुआ तब कौस्तुभ को अब बताया. कौस्तुभ ने अब इस बात को अपने तरह से देखने की बात कही और मुझ से वादा किया कि मेरी दूसरी जॉब के पहले उन दोनों की जॉब भी जाएगी।
कौस्तुभ ने प्लान बनाया मेरे सहकर्मी से सच उगलवाने का. इस तरह के टेढ़े काम मे वो माहिर है. मैं मुंहफट हूँ इस लिए ऐसे में कुछ समझ नही आता।
ऑफिस के बाहर रोज़ चाय पीने के वक़्त कौस्तुभ उसे वहां मिलता.. और बात करता.. 3-4 दिन में वो अच्छे दोस्त बन चुके थे और कौस्तुभ उसे अपने ऑफिस में जॉब दिलवाने वाला था अच्छी सैलरी में।
कौस्तुभ ने एक दिन मुझे कहीं जाते हुए देख कर उस सहकर्मी को मुझ से दुश्मनी की बात कही; फिर दोनों ने मिल कर मेरी खूब बुराई की, और मुझे सबक सिखाने की भी बात हुई।
फिर एक दिन हमारे ही फ्लैट में दारू पार्टिनक आयोजन हुआ;उस दिन मैं बाहर ही रहा. और आखिरकार सच हमारे सामने था सबूत के साथ।
इस के लिए मैं कौस्तुभ के पैर भी पड़ता तो कम था. लेकिन दोस्त ये जानते भी नहीं कि अपने दोस्तों के लिए क्या क्या कर गए।
मेरा सहकर्मी, आद्या के बॉयफ्रेंड का दोस्त था जो मुझ पे नज़र रखता था. ऑफिस के बाहर हुई अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेने, और आद्या के मन मे डर पैदा करने के लिए उसने. मेरे सहकर्मी से मेरा मोबाइल उठवाया और आद्या को मैसेज किया। फ़िर बड़ी चालाकी से मोबाइल मेरी सीट पे वापस रखवा दिया;
कौस्तुभ और मैंने उन दोनों की सारी पोल पट्टी ऑफिस वालों के सामने रख दी. मुझे दोबारा जॉब ऑफर की गई लेकिन मुझे वहां रहना अब गवारा नहीं था।
कौस्तुभ भी मेरे साथ अब जगह बदलना चाहता था तो हमने इंटरव्यू की तैयारी की और पुणे की एक कंपनी में जॉब ले ली, कौस्तुभ को नोटिस पीरियड तक रुकना था इस लिए पहले मैं गया बाद में वो आया।
इतने दिनों में मैने मीनल से ठीक से बात भी नहीं की थी, अब पता नहीं मेरा मन भी नहीं होता था। वो भी मुझे ग़लत ही कहेगी ऐसा मेरा मानना था.
जब तक कौस्तुभ पुणे नही आया तब तक मेरी हालत ठीक नहीं रही। इस हादसे के बाद से मैं बहुत कम बोलने लगा था. अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता ऑफिस में भी अकेला रहता ,रात को मीनल को याद कर के रोता रहता, मैं जान चुका था अब वो मेरी नहीं होगी।
जब जिंदगी में कुछ सही न चल रहा हो तो हम हर चेवज़ में केवल नकारात्मकता खोजने लगते हैं, मैंने भी मीनल के साथ अपने रिश्ते में यही खोज कर दिल को तसल्ली दे दी।
कौस्तुभ जब आया तो मेरी हालत देख कर मुझे बहुत समझाया; मैं जब खाली होता तो मीनल की फ़ोटो और उसका बैंड देखता रहता. मेरी जिंदगी में भी एक खालीपन पसर गया था।
उसका एहसास लेना होता तो गाना चला लेता. और उसके साथ किये डांस को , उस को गले लगाने को, माथा चूमने को महसूस करता.
मीनल ने भी कभी अपनी तरफ से ऐसा कुछ नही जताया कि मेरे लिए वो भी तड़पती है, मुझसे मिलना चाहती है. मैं यही सोचता. काश कभी वो कहती कि मेरे बिना नहीं रह पा रही, मेरे पास आना चाहती है सब कुछ पीछे छोड़ कर;लेकिन ये केवल मेरे खयालों में ही होता. और मैं अपनी इन सोच पर छुप के आँसू बहा लेता.
मीनल फ़ोन पे पूछती रहती , मैं बिजी हूँ कह देता, कौस्तुभ सब समझता था लेकिन कुछ नहीं कहता.