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मार्तण्ड सिंह के दिल की बात उनके चेहरे से प्रकट हो गई तो निर्भय सिंह ने कहा, 'अरे भई, कभी क्या हम जवान नहीं थे? क्या अपनी जागीर की सुन्दरियों को देखकर हमारे दिल नहीं मचल जाते थे? आखिर कैसे मालूम हो कि वह एक ठाकुर की संतान है।'
'ओ हो-हो-हा-हा-हा-हा!' मार्तण्ड सिंह का दिल निर्भय सिंह ने अपनी बातों द्वारा जीत लिया था। अपना युग याद करके मार्तण्ड सिंह बहुत जोर से ठहाका लगा उठे, 'हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा! आखिर भरी जवानी में किसका दिल किसी सुन्दरी को देखकर नहीं मचल जाता?
मार्तण्ड सिंह चले गए तो निर्भय सिंह बरामदे में रबड़े-खड़े गंभीर होकर सोचने लगे, जवानी में उनका दिल सुन्दरी को देखकर कहां मचलता था? उनका दिल तो भड़क उठता था-वाराना के शोले बनकर। फिर इन शोलों को बुझाने के लिए उन्हें उसी सुन्दरी की आवश्यकता पड़ जाती थी, जिसके कारण ये शोले भड़के होते थे। उनकी आखों के सामने रजनी का मुखडा घुम गया। उन्होंने अपने गंदे विचारों द्वारा रजनी के यौवन की रूप-रेखा देखी, उसकी चाल को याद किया तो होंठों पर एक बार फिर लार टपक आई। दिल के अंदर वासना के शोले भड़क गए। काश, इन शोलों को बुझाने का उनके पास कोई उपाय होता! काश, आज जागीरदारी वाला वही युग होता तो रंजनी को उनकी बांहों की शोभा बनने से कोई नहीं रोक सकता था। अचानक उस जमाने को याद करके उनकी आखों के सामने बेला का मुखड़ा चला आया। निर्भय सिंह कांप गए। कांपकर गभीर हो गए। क्या उस मरने वाली लड़की की तड़प तथा आह कभी व्यर्थ जाएगी? क्या उनके पापों का दण्ड उन्हें कभी नहीं मिलेगा?
दस-बारह दिन बीत गए। चंदभाल का दिल सूना हो गया। लॉन का वातावरण मानो पतझड़ की लपेट में आ गया था। यद्यपि मार्तण्ड सिंह ने कोठी में एक नया माली रख लिया था, फिर भी चंद्रभाल को ऐसा लगता, मानो लॉन में पहले जैसी हरियाली नहीं है, फूलों की मुस्कान उदासीनता में परिवर्तित हो चुकी है, सुगन्ध मिट चुकी है। सब-कुछ सुनसान था।
चंद्रभाल के पास अंशु भी आती थी। घंटों उसके पास बैठती उससे बातें करती। कुछ पूछती, फिर स्वयं उत्तर भी दे देती। वह मुस्कराती-चंद्रभाल के लिए। चंद्रभाल की अंशु बनकर वह उसे रजनी के अंधकार से दूर ले जाना चाहती थी, परन्तु जब ऐसा करने में वह असफल रहती तो चंद्रभाल की उदासीनता में सम्मिलित होकर स्वयं भी उदास हो जाती। परन्तु उसे विश्वास था एक दिन वह अवश्य अपने प्रयत्न में सफल हो जाएगी, चंद्राशु! बनकर उस पर छा जाएगी। वह चंद्रभाल की मुस्कान बन जाएगी।
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अंशु ने कभी चंद्रभाल से किसी प्रकार की शिकायत नहीं की कुछ मांगा भी नहीं। फिर भी चंद्रभाल को अंशु के दिल की स्थिति ज्ञात थी। अंशु को अपने प्यार पर पूरा विश्वास है, इसीलिए वह उसकी तथा रजनी की वास्तविकता से भिड़ा होने के बावजूद यहां आती है, ताकि उसका मन जीत ले। अपने भविष्य की चिन्ता न करते हुए उसने अब भी उससे अपनी अशाएं बांध रखी हैं। वह उससे आशा रखे भी क्यों नहीं? अपनी संगति के तीन बहुमूल्य वर्ष अंशु ने केवल उसी को तो दिए हैं और वह भी लंदन के सर्वाधिक रोमांचकारी क्लबों में। यही कारण था कि उसने कभी अंशु से मिलने से इंकार नही किया। लंदन में जब उसे संगति की आवश्यकता थी तो अंशु ने ही साथ दिया था। अब अंशु की संगति की आवश्यकता नहीं थी तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उसे आने से मना कर दे। अंशु भी एक लड़की थी। उसके पास भी एक दिल था-नन्हा सा दिल, जो केवल चंद्रभाल के लिए ही धड़कता था। चंद्रमाल किस प्रकार उसका दिल तोड़ने का साहस करता। कोई किसी से प्यार करे न करे, परन्तु किसी को अपने से प्यार करने से मना तो नहीं कर सकता है।
PIL 89%14:29 pm हरसिंगार अंशु आती है तो चंद्रभाल का ध्यान भी बहुत रखती। चन्द्रभाल जब कभी खाना नहीं खाता तो वह उसे खाने पर विवश करती। चंद्रभाल जब कभी शेव नहीं करता, उसकी दाढी काले कांटों समान दिखाई पड़ने लगती तो अंशु उसे शेव करने पर विवश कर देती। चंद्रभाल भी उसकी बात मानने से इंकार नहीं कर पाता। उसके मित्र उससे मिलने आते ही रहते थे। यदि वह उनके सामने दीवानों-सी सूरत बनाए रहता तो उन्हें हंसने का पूरा अवसर मिलता। मित्रों से मिलना उसने कम कर दिया था। मित्र उसे कहीं ले जाना चाहते तो वह अस्वस्थ होने का बहाना कर जाता। उसकी वास्ताविकता कोई नहीं जानता, केवल उसके घर वाले तथा अंशु के घर वाले जानते थे। यही कारण था कि वह अंशु से न मिलने का बहाना कभी नहीं बना सका। अंशु से मानो उसने एक खामोश समझौता कर रखा था कि वह उसे जीत सकती है तो जीत ले।
इस बीच चंद्रभाल से उसके पिता की एक भी बात नहीं हुई। मार्तण्ड सिंह मानो अपनी जिद पर अड़े थे कि जब तक उनका बेटा रजनी का विचार छोड़कर अंशु को अपनाने के लिए तैयार नहीं होगा, वह उससे बात नहीं करेंगे 1 मार्तण्ड सिह अंशु को अपना प्रस्ताव स्वीकार कराकर इस प्रकार फंस चुके थे कि उनके लिए अब रजनी के पक्ष में सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चंद्रभाल अपने पिताजी के विचारों से अनभिज्ञ था। उसने भी अपने पिताजी की चिन्ता नहीं की। उसकी बातें केवल मां से ही हुआ करती थी। मां से जब भी भेंट होती वह बड़ी आशा से मां की आखों में झांकता। शायद मां ने अपने पति से रजनी का विषय छेड़ा हो, शायद उसके पिताजी मान गए हों, परन्तु जब उसे निराशा मिलती तो उसका दिल डूब जाता। फिर भी उसे अपनी मां पर विश्वास था। वह जानता था कि उसके पिताजी रजनी को इतनी आसानी से अपने कुल की लक्ष्मी बनाने के लिए तैयार नहीं होंगे। चंद्रभाल को पूरा विश्वास था कि उसके प्यार के साकार होने में देर अवश्य है, परंतु अंधेर नहीं।
उधर अंशु भी अपनी कोठी में पलंग पर लेटी देर तक करवटें बदलती रहती। वह हर पल चंद्रभाल के लिए ही सोचती। प्राय: उसके अंदर डर समाने लगता कि यदि वह चंद्रभाल का दिल नहीं जीत सकी तो उसके प्यार का क्या परिणाम होगा?परन्तु प्यार करने वाले भविष्य का चिन्ता नहीं करते।इसके अतिरिक्त उसे चंद्रभाल के माता-पिता का बहुत बड़ा सहारा था। चंद्रभाल के पिता ने उससे वायदा किया था कि वह उसे ही अपनी बहू बनाएंगे। हर स्थिति में। यही सब सोचकर अंशु अपना भय दूर कर लेती थी और अगले दिन चंद्रभाल का दिल जीतने की फिर आशा कर बैठती थी। उसे मानो चंद्रभाल का दिल जीतने की एक चुनौती मिली थी, अपने प्यार को साकार बनाने की चुनौती मिली थी, अपने प्यार के कारण चंद्रभाल को रजनी के अंधकार से निकालने की चुनौती मिली थी, जिसे वह स्वीकार कर चुकी थी। इसीलिए अपनो प्रयत्न जारी रखने के लिए वह अपना साहस बनाए रखने में सफल हो जाती थी।
'ओ हो-हो-हा-हा-हा-हा!' मार्तण्ड सिंह का दिल निर्भय सिंह ने अपनी बातों द्वारा जीत लिया था। अपना युग याद करके मार्तण्ड सिंह बहुत जोर से ठहाका लगा उठे, 'हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा! आखिर भरी जवानी में किसका दिल किसी सुन्दरी को देखकर नहीं मचल जाता?
मार्तण्ड सिंह चले गए तो निर्भय सिंह बरामदे में रबड़े-खड़े गंभीर होकर सोचने लगे, जवानी में उनका दिल सुन्दरी को देखकर कहां मचलता था? उनका दिल तो भड़क उठता था-वाराना के शोले बनकर। फिर इन शोलों को बुझाने के लिए उन्हें उसी सुन्दरी की आवश्यकता पड़ जाती थी, जिसके कारण ये शोले भड़के होते थे। उनकी आखों के सामने रजनी का मुखडा घुम गया। उन्होंने अपने गंदे विचारों द्वारा रजनी के यौवन की रूप-रेखा देखी, उसकी चाल को याद किया तो होंठों पर एक बार फिर लार टपक आई। दिल के अंदर वासना के शोले भड़क गए। काश, इन शोलों को बुझाने का उनके पास कोई उपाय होता! काश, आज जागीरदारी वाला वही युग होता तो रंजनी को उनकी बांहों की शोभा बनने से कोई नहीं रोक सकता था। अचानक उस जमाने को याद करके उनकी आखों के सामने बेला का मुखड़ा चला आया। निर्भय सिंह कांप गए। कांपकर गभीर हो गए। क्या उस मरने वाली लड़की की तड़प तथा आह कभी व्यर्थ जाएगी? क्या उनके पापों का दण्ड उन्हें कभी नहीं मिलेगा?
दस-बारह दिन बीत गए। चंदभाल का दिल सूना हो गया। लॉन का वातावरण मानो पतझड़ की लपेट में आ गया था। यद्यपि मार्तण्ड सिंह ने कोठी में एक नया माली रख लिया था, फिर भी चंद्रभाल को ऐसा लगता, मानो लॉन में पहले जैसी हरियाली नहीं है, फूलों की मुस्कान उदासीनता में परिवर्तित हो चुकी है, सुगन्ध मिट चुकी है। सब-कुछ सुनसान था।
चंद्रभाल के पास अंशु भी आती थी। घंटों उसके पास बैठती उससे बातें करती। कुछ पूछती, फिर स्वयं उत्तर भी दे देती। वह मुस्कराती-चंद्रभाल के लिए। चंद्रभाल की अंशु बनकर वह उसे रजनी के अंधकार से दूर ले जाना चाहती थी, परन्तु जब ऐसा करने में वह असफल रहती तो चंद्रभाल की उदासीनता में सम्मिलित होकर स्वयं भी उदास हो जाती। परन्तु उसे विश्वास था एक दिन वह अवश्य अपने प्रयत्न में सफल हो जाएगी, चंद्राशु! बनकर उस पर छा जाएगी। वह चंद्रभाल की मुस्कान बन जाएगी।
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अंशु ने कभी चंद्रभाल से किसी प्रकार की शिकायत नहीं की कुछ मांगा भी नहीं। फिर भी चंद्रभाल को अंशु के दिल की स्थिति ज्ञात थी। अंशु को अपने प्यार पर पूरा विश्वास है, इसीलिए वह उसकी तथा रजनी की वास्तविकता से भिड़ा होने के बावजूद यहां आती है, ताकि उसका मन जीत ले। अपने भविष्य की चिन्ता न करते हुए उसने अब भी उससे अपनी अशाएं बांध रखी हैं। वह उससे आशा रखे भी क्यों नहीं? अपनी संगति के तीन बहुमूल्य वर्ष अंशु ने केवल उसी को तो दिए हैं और वह भी लंदन के सर्वाधिक रोमांचकारी क्लबों में। यही कारण था कि उसने कभी अंशु से मिलने से इंकार नही किया। लंदन में जब उसे संगति की आवश्यकता थी तो अंशु ने ही साथ दिया था। अब अंशु की संगति की आवश्यकता नहीं थी तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उसे आने से मना कर दे। अंशु भी एक लड़की थी। उसके पास भी एक दिल था-नन्हा सा दिल, जो केवल चंद्रभाल के लिए ही धड़कता था। चंद्रमाल किस प्रकार उसका दिल तोड़ने का साहस करता। कोई किसी से प्यार करे न करे, परन्तु किसी को अपने से प्यार करने से मना तो नहीं कर सकता है।
PIL 89%14:29 pm हरसिंगार अंशु आती है तो चंद्रभाल का ध्यान भी बहुत रखती। चन्द्रभाल जब कभी खाना नहीं खाता तो वह उसे खाने पर विवश करती। चंद्रभाल जब कभी शेव नहीं करता, उसकी दाढी काले कांटों समान दिखाई पड़ने लगती तो अंशु उसे शेव करने पर विवश कर देती। चंद्रभाल भी उसकी बात मानने से इंकार नहीं कर पाता। उसके मित्र उससे मिलने आते ही रहते थे। यदि वह उनके सामने दीवानों-सी सूरत बनाए रहता तो उन्हें हंसने का पूरा अवसर मिलता। मित्रों से मिलना उसने कम कर दिया था। मित्र उसे कहीं ले जाना चाहते तो वह अस्वस्थ होने का बहाना कर जाता। उसकी वास्ताविकता कोई नहीं जानता, केवल उसके घर वाले तथा अंशु के घर वाले जानते थे। यही कारण था कि वह अंशु से न मिलने का बहाना कभी नहीं बना सका। अंशु से मानो उसने एक खामोश समझौता कर रखा था कि वह उसे जीत सकती है तो जीत ले।
इस बीच चंद्रभाल से उसके पिता की एक भी बात नहीं हुई। मार्तण्ड सिंह मानो अपनी जिद पर अड़े थे कि जब तक उनका बेटा रजनी का विचार छोड़कर अंशु को अपनाने के लिए तैयार नहीं होगा, वह उससे बात नहीं करेंगे 1 मार्तण्ड सिह अंशु को अपना प्रस्ताव स्वीकार कराकर इस प्रकार फंस चुके थे कि उनके लिए अब रजनी के पक्ष में सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चंद्रभाल अपने पिताजी के विचारों से अनभिज्ञ था। उसने भी अपने पिताजी की चिन्ता नहीं की। उसकी बातें केवल मां से ही हुआ करती थी। मां से जब भी भेंट होती वह बड़ी आशा से मां की आखों में झांकता। शायद मां ने अपने पति से रजनी का विषय छेड़ा हो, शायद उसके पिताजी मान गए हों, परन्तु जब उसे निराशा मिलती तो उसका दिल डूब जाता। फिर भी उसे अपनी मां पर विश्वास था। वह जानता था कि उसके पिताजी रजनी को इतनी आसानी से अपने कुल की लक्ष्मी बनाने के लिए तैयार नहीं होंगे। चंद्रभाल को पूरा विश्वास था कि उसके प्यार के साकार होने में देर अवश्य है, परंतु अंधेर नहीं।
उधर अंशु भी अपनी कोठी में पलंग पर लेटी देर तक करवटें बदलती रहती। वह हर पल चंद्रभाल के लिए ही सोचती। प्राय: उसके अंदर डर समाने लगता कि यदि वह चंद्रभाल का दिल नहीं जीत सकी तो उसके प्यार का क्या परिणाम होगा?परन्तु प्यार करने वाले भविष्य का चिन्ता नहीं करते।इसके अतिरिक्त उसे चंद्रभाल के माता-पिता का बहुत बड़ा सहारा था। चंद्रभाल के पिता ने उससे वायदा किया था कि वह उसे ही अपनी बहू बनाएंगे। हर स्थिति में। यही सब सोचकर अंशु अपना भय दूर कर लेती थी और अगले दिन चंद्रभाल का दिल जीतने की फिर आशा कर बैठती थी। उसे मानो चंद्रभाल का दिल जीतने की एक चुनौती मिली थी, अपने प्यार को साकार बनाने की चुनौती मिली थी, अपने प्यार के कारण चंद्रभाल को रजनी के अंधकार से निकालने की चुनौती मिली थी, जिसे वह स्वीकार कर चुकी थी। इसीलिए अपनो प्रयत्न जारी रखने के लिए वह अपना साहस बनाए रखने में सफल हो जाती थी।