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__'ठीक है।' मार्तण्ड सिंह ने खड़े होते हुए सख्ती से कहा, तुम जा सकते हो उस लड़की के पास, जाकर अपना मुंह काला कर सकते हो, परन्तु एक बात याद रखना, तुम उसके पास जाने के बाद मेरा मुंह कभी नहीं देखोगे।' 'आपका ही नहीं, यह मेरा मुंह भी नहीं देखेगा।' 'मां धृणा से कह रही थी, डससे पहले कि आप पर कोई उंगली उठाए, कुल की मान-मर्यादा सदा के लिए मिट्टी में मिले, मैं जहर खा लूंगी।' मार्तण्ड सिह की पत्नी की बातों में दृढ़ निश्चय था।
'मां ... चंद्रभाल मां का निश्चय सुनकर कांप उठा। पिता की बात सुनकर उसे पहले ही झटका लग चुका था। 'मत ले अपने इन होंठों से मेरा नाम, जिन पर केवल उस पापिन कां ही नाम लिखा हुआ है।'
मां ने उसकी बात काटते हुए उसे टोक दिया, 'यदि मुझे मां कहना है तो मेरी ममता का भी पूरा-पूरा आदर करना होगा। तुझे रजनी को सदा के लिए अपने दिल से निकालना होगा।' मां की ममता ने अपने बेटे को मानो एक चुनौती दी थी। मार्तण्ड सिंह की पत्नी ने अपनी बात समाप्त की और कमरे से बाहर निकल गईं।
___ मार्तण्ड सिंह ने बेटे को क्रोध से देखा, जिसने अपनी मां को इतनी बड़ी चोट पहुंचाई थी। वह भी अपनी धर्मपत्नी के पीछे चले गए। चंद्रभाल सन्त रह गया। यह क्या हो गया, उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उसके माता-पिता उसके सामने ऐसी भी शर्त रख देंगे।
नौकरों ने अपने छोटे मालिक को चिन्तामग्न देखा तो कमरे से बाहर निकल गए।
जानते थे कि छोटे मालिक को एकांत की आवश्यकता है। छोटे मालिक को ऐसी स्थिति में अकेले ही छोड़ देना अच्छा था।
चंद्रभाल के सिर का चक्कर बढ़ने लगा तो वह वहीं पलंग पर लेट गया। दूसरी ओर करवट लेकर वह अपनी मजबूरियों पर ध्यान देने लगा। वह रजनी को लेने नहीं गया तो क्या वह उसकी प्रतीक्षा में तड़प-तड़पकर अपनी जान नहीं दे देगी? चंद्रभाल के बिना क्या रजनी का जीवन सूना और अंधकारमय नहीं बन जाएगा? अपने चंद्रभाल के बिना उसका दामन क्या आंसुओं से तर नहीं होता रहेगा?
चंद्रभाल उसी प्रकार आंखें बंद किए पड़ा रहा और रजनी के लिए सोचता रहा, अपनी मजबूरियों पर आंसू बहाता रहा और अन्दर-ही-अन्दर तड़पता रहा। उसे इस प्रकार पड़े-पड़े काफी समय हो गया। शाम होने को आ गई। कमरे में अंधकार की हल्की धुंध फैल गई, परन्तु उसे किसी भी बात की खबर नहीं थी। उसके मन और मस्तिष्क पर केवल रजनी छाई हुई थी-जीवन का अंधकार बनकर। इस अंधकार में उसे कुछ भी नहीं दिखाई देता था। केवल रजनी ही थी-चारों ओर।
सहसा चंद्रभाल ने अपनी आंखें खोलीं। आखें खोले वह उसी प्रकार पड़ा रहा, परन्तु तभी वह चौंक गया। कमरे की धुंध में उसके सामने अंशु बैठी हुई थी-बहुत खामोश। जाने कब वह चली आई थी और उसे आहट तक नहीं मिली, अपने विचारों में चंद्रभाल इतना तल्लीन था कि उसे अंशु के आने का पता ही नहीं चला था।
मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी के चले जाने के कुछ देर बाद ही अंशु अस्पताल में पहुंची थी तो बरामदे में चिन्तित खड़े नौकरों ने उन्हें पहले ही बता दिया कि कुछ देर पहले कमरे के अंदर बड़े मालिक, मालकिन तथा छोटे मालिक के बीच क्या घटना घटी थी।
सारी बातें सुनने के बाद निर्भय सिंह ने ऐसी सांस ली थी, मानो उनके सिर पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। वह जानते थे कि चंद्रभाल ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसके कारण उसके माता-पिता संसार को मुंह न दिखाने के लिए अपनी जान दे दें। अब ।
चंद्रभाल को अंशु का बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। चंद्रभाल रजनी से अलग रहकर कुछ दिन तड़पेगा, रोएगा, एकांत में आंसू भी बहाएगा, परन्तु धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
मनुष्य को परिस्थितियों से मेल करना ही पड़ता है। न करे तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाए। रजनी को भूलने के बाद चंद्रभाल को एक नया जीवन स्वीकारना ही पड़ेगा। तब उसे प्यार की आवश्यकता पड़ेगी और यह प्यार उसे केवल अंशु ही दे सकती हैं-उनकी बेटी! आखिर मार्मण्त सिंह ने अपना वचन निभाने में कोई कमी नहीं रखी। उनकी धर्मपत्नी ने भी अंशु के प्रति अपना प्यार सिद्ध कर दिखाया। अब रजनी को चंद्रभाल से दूर करने के लिए चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं थी। जिस काम को करने के लिए वह परेशान रहा करते थे, उसे चंद्रभाल के माता-पिता ने कर दिखाया था -अपना एक ही निर्णय देकर, एक ही शर्त रखकर। रजनी के अपहरण का जोखिम उठाने की अब उन्हें कोई आवश्यकता नहीं थी 1 रजनी का अपहरण चंद्रभाल के कुसुम्पटी पहुचने से पहले ही वह कैसे करते, वह स्वयं नहीं जानते थे। वह तो केवल अब तक उपाय ही सोच रहे थे। रजनी का अपहरण उसी के गांव जाकर करना आसान नहीं था, परन्तु अब उन्हें उसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। हां, उन्हें अफसोस अवश्य हुआ कि किसी बहाने रजनी का अपहरण हो जाता तो वह उसके द्वारा अपनी वासना की उस प्यारा को अवश्य बुझा लेते, जो उसे पहली ही बार देखने के बाद उनके अंदर उत्पन्न हो गई थी।
'मां ... चंद्रभाल मां का निश्चय सुनकर कांप उठा। पिता की बात सुनकर उसे पहले ही झटका लग चुका था। 'मत ले अपने इन होंठों से मेरा नाम, जिन पर केवल उस पापिन कां ही नाम लिखा हुआ है।'
मां ने उसकी बात काटते हुए उसे टोक दिया, 'यदि मुझे मां कहना है तो मेरी ममता का भी पूरा-पूरा आदर करना होगा। तुझे रजनी को सदा के लिए अपने दिल से निकालना होगा।' मां की ममता ने अपने बेटे को मानो एक चुनौती दी थी। मार्तण्ड सिंह की पत्नी ने अपनी बात समाप्त की और कमरे से बाहर निकल गईं।
___ मार्तण्ड सिंह ने बेटे को क्रोध से देखा, जिसने अपनी मां को इतनी बड़ी चोट पहुंचाई थी। वह भी अपनी धर्मपत्नी के पीछे चले गए। चंद्रभाल सन्त रह गया। यह क्या हो गया, उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उसके माता-पिता उसके सामने ऐसी भी शर्त रख देंगे।
नौकरों ने अपने छोटे मालिक को चिन्तामग्न देखा तो कमरे से बाहर निकल गए।
जानते थे कि छोटे मालिक को एकांत की आवश्यकता है। छोटे मालिक को ऐसी स्थिति में अकेले ही छोड़ देना अच्छा था।
चंद्रभाल के सिर का चक्कर बढ़ने लगा तो वह वहीं पलंग पर लेट गया। दूसरी ओर करवट लेकर वह अपनी मजबूरियों पर ध्यान देने लगा। वह रजनी को लेने नहीं गया तो क्या वह उसकी प्रतीक्षा में तड़प-तड़पकर अपनी जान नहीं दे देगी? चंद्रभाल के बिना क्या रजनी का जीवन सूना और अंधकारमय नहीं बन जाएगा? अपने चंद्रभाल के बिना उसका दामन क्या आंसुओं से तर नहीं होता रहेगा?
चंद्रभाल उसी प्रकार आंखें बंद किए पड़ा रहा और रजनी के लिए सोचता रहा, अपनी मजबूरियों पर आंसू बहाता रहा और अन्दर-ही-अन्दर तड़पता रहा। उसे इस प्रकार पड़े-पड़े काफी समय हो गया। शाम होने को आ गई। कमरे में अंधकार की हल्की धुंध फैल गई, परन्तु उसे किसी भी बात की खबर नहीं थी। उसके मन और मस्तिष्क पर केवल रजनी छाई हुई थी-जीवन का अंधकार बनकर। इस अंधकार में उसे कुछ भी नहीं दिखाई देता था। केवल रजनी ही थी-चारों ओर।
सहसा चंद्रभाल ने अपनी आंखें खोलीं। आखें खोले वह उसी प्रकार पड़ा रहा, परन्तु तभी वह चौंक गया। कमरे की धुंध में उसके सामने अंशु बैठी हुई थी-बहुत खामोश। जाने कब वह चली आई थी और उसे आहट तक नहीं मिली, अपने विचारों में चंद्रभाल इतना तल्लीन था कि उसे अंशु के आने का पता ही नहीं चला था।
मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी के चले जाने के कुछ देर बाद ही अंशु अस्पताल में पहुंची थी तो बरामदे में चिन्तित खड़े नौकरों ने उन्हें पहले ही बता दिया कि कुछ देर पहले कमरे के अंदर बड़े मालिक, मालकिन तथा छोटे मालिक के बीच क्या घटना घटी थी।
सारी बातें सुनने के बाद निर्भय सिंह ने ऐसी सांस ली थी, मानो उनके सिर पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। वह जानते थे कि चंद्रभाल ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसके कारण उसके माता-पिता संसार को मुंह न दिखाने के लिए अपनी जान दे दें। अब ।
चंद्रभाल को अंशु का बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। चंद्रभाल रजनी से अलग रहकर कुछ दिन तड़पेगा, रोएगा, एकांत में आंसू भी बहाएगा, परन्तु धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
मनुष्य को परिस्थितियों से मेल करना ही पड़ता है। न करे तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाए। रजनी को भूलने के बाद चंद्रभाल को एक नया जीवन स्वीकारना ही पड़ेगा। तब उसे प्यार की आवश्यकता पड़ेगी और यह प्यार उसे केवल अंशु ही दे सकती हैं-उनकी बेटी! आखिर मार्मण्त सिंह ने अपना वचन निभाने में कोई कमी नहीं रखी। उनकी धर्मपत्नी ने भी अंशु के प्रति अपना प्यार सिद्ध कर दिखाया। अब रजनी को चंद्रभाल से दूर करने के लिए चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं थी। जिस काम को करने के लिए वह परेशान रहा करते थे, उसे चंद्रभाल के माता-पिता ने कर दिखाया था -अपना एक ही निर्णय देकर, एक ही शर्त रखकर। रजनी के अपहरण का जोखिम उठाने की अब उन्हें कोई आवश्यकता नहीं थी 1 रजनी का अपहरण चंद्रभाल के कुसुम्पटी पहुचने से पहले ही वह कैसे करते, वह स्वयं नहीं जानते थे। वह तो केवल अब तक उपाय ही सोच रहे थे। रजनी का अपहरण उसी के गांव जाकर करना आसान नहीं था, परन्तु अब उन्हें उसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। हां, उन्हें अफसोस अवश्य हुआ कि किसी बहाने रजनी का अपहरण हो जाता तो वह उसके द्वारा अपनी वासना की उस प्यारा को अवश्य बुझा लेते, जो उसे पहली ही बार देखने के बाद उनके अंदर उत्पन्न हो गई थी।