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Romance हरसिंगार/रानु

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रजनी ने आगे बढ़कर खुरपी उठा ली। फिर दोनों लीन में, कोठी के पिछले भाग में, बारजे के समीप वाले कमरे की ओर बढ़ गए। कमरे की सीध में लीन के अंदर, कोठी की दीवार के समीप उन्होंने हरसिंगार की नींव डाली। चंद्रभाल ने अपने हाथों से गड्ढा खोदा, रजनी ने पौधे की जड़ रखी, फिर दोनों ने ही मिट्टी डालकर अपने भोले-भोले प्यार की याद मजबूत कर दी। उसके बाद रजनी प्रतिदिन ही हरसिंगार के पौधे में पानी देकर मानो अपने दिल की कली को पनप कर फूल बनाने लगी।

एक रात जब दोनों लीन के पिछले भाग में पत्थर की बेंच पर बैठे हुए थे तो चंद्रभाल ने उसे बताया जानती है रजनी, आज मेरा एक मित्र तेरे लिए क्या कह रहा था?

रजनी ने आश्चर्य - से देखा। उसकी चर्चा क्या कुंवर साहब के मित्रों में भी होने लगी है? परन्तु चंद्रभाल ने उसके दिल में उठते विचारों की चिन्ता नहीं की। उसने कहा, वह कह रहा था-यार तेरे माली की लड़की बहुत सुन्दर है। मैंने कहा-अरे, वह तो हमारे लीन का सबसे अधिक सुन्दर गुलाब का फूल है। उसने कहा, फूल सूंघने के लिए होता है, तुमने उसे सूंघा कभी? मैंने कहा-फूल कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए होता है, घर की शोभा बढ़ाने के लिए होता है, वह घर जिसमें मनुष्य को सारा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। मैंने उसे यह भी बताया कि फूल कोट के कॉलर में लगाने के लिए होता है, क्योंकि कॉलर के पास मनुष्य का दिल होता। फूल की समीपता से दिल को शांति मिलती है। फूल की सुगन्ध जब दिल की गहराई में उतर जाती है तो सोचने-समझने के ढंग में एक नशा-सा आ जाता है-मेरी बात सुनकर वह हंसने लगा। कहने लगा-जिस फूल की तुम बात कर रहे हो, वह फूल कोई और होगा। तुम्हारे माली की बेटी तो केवल सूंघने के लिए ह। क्षण भर के लिए उससे आनन्द उठाओ और फिर फेंक दो। बस इसी बात पर मुझे क्रोध आ गया तो मैंने उसे दे पटका। आज से हमारी मित्रता समाप्त हो गई।'

रजनी को एक हार्दिक प्रसन्नता, का आभास हुआ। चंन्द्रभाल उसका कितना अधिक ध्यान रखता था। परन्तु इसके साथ उसे दो मित्रों की मित्रता टूटने का भी दुःख हुआ। चंद्रभाल उसके लिए किस-किससे लड़ाई मोल लेता रहेगा और आखिर कब तक? परन्तु उस रात के बाद रजनी को अपनी सुन्दरता का पूरा-पूरा एहसास, हो गया। अगली सुबह से वह अपनी सुन्दरता की सुरक्षा करने लगी।

सुबह दर्पण के सामने बैठकर उसने स्वयं को घंटों संवारा। संवारकर स्वयं को देखा तो लजा गई। आखों में गुलाबी डोरे कांप गए। चंद्रभाल की बात याद करके, वह सोचने लगी कि क्या-वह वास्तव में लॉन का सर्वाधिक सुन्दर फूल है? कुंवर साहब कितनी प्यारी-प्यारी बातें करते हैं। अपनी बातों द्वारा पिछली रात तो उन्होंने उसका मन भी गुदगुदा दिया था। रजनी के सोचने-समझने के ढंग में बचपना था, अछूतापन था। उसके विचार बिल्कुल पवित्र थे।

20 94% 13:28 pm हरसिंगार उसी शाम रजनी लीन में लगे फूलों की क्यारियों के समीप खडी हुई थी। बहुत ध्यान से वह पौधों में लंगे गुलाबो को निहार रही थी, इस प्रकार मानो लॉन के सबसे सुन्दर फूल को तलाश करके उससे अपनी सुन्दरता की तुलना करना चाहती हो। क्या वह । वास्तव में इतनी सुन्दर है? कुंवर साहब की बातों में उसके प्रति कितना अधिक प्यार समाया हुआ था।

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लॉन के फूलों पर तितलियां लहरा रही थीं। भंवरे मंडरा रहे थे। शाम अभी तक नहीं गहराई थी। क्षितिजे में इधर-उधर छिटके बादलों के काले-सफेद टुकड़े डूबते सूर्य की लालिमा में बेढंगे तौर पर घुलने-मिलने के पश्चात् सुन्दर लग रहे थे। प्यार में हर वस्तु सुन्दर ही दिखाई पड़ती है। फूलों के झुंड में आखिर रजनी को एक गुलाब पसंद आ ही गया। वह कुछेक पग आगे बड़ी। हाथ बढ़ाती हुई एक पौधे पर झुकी। फिर कांटी से अपनी उंगलियां बचाती हुए उसने एक गुलाब तोड़ लिया-नन्हा-सा गुलाब, सुर्ख, उसी के समान सुन्दर, अधखिला। वह पीछे हटी। फूल को उसने दोबारा देखा, बहुत ध्यान से और फिर चंद्रभाल की बात याद करके वह मुस्करा पड़ी।

मुस्कराते हुए वह गुलाब के फूल को अपने नन्हे-नन्हे, नथुनों के समीप लाई। फूल की सुगंध उसकी सांसों को भीनी-भीनी सुगन्ध से टकराकर आपस में धुल-मिल गई। रजनी ने एक गहरी सांस ली। फूल तथा उसकी सांसों की सुगन्ध उसके दिल की गहराई में उतर आई। उस पर नशा-सा छा गया। उसने अपना मुखड़ा ऊपर उठाते हुए अपनी आखें बंद कर ली और अपने होंठों को खोला। उसने एक गहरी सांस ली। फिर उसी प्रकार कुछ क्षणों के लिए ठंडी आहे भरने लगी।

'क्या सोच रही है?' आवाज चंद्रभाल की थी।

रजनी चौंक गई, कुछ इस झटके के साथ कि उसके हाथ से फूल छूटकर नीचे गिर पड़ा। पलकें फड़फड़ाकर खुल गईं। उसके सामने कुंवर साहब खड़े थे। चंद्रभाल ने इस समय पीत-श्वेत मिश्रित रंग का सूट पहन रखा था, जिसमें उसका गोरा रंग और खिल उठा था। कुंवर साहब कब उसके पास चले आए, दबे पगों या वह प्यार के नशे में इस प्रकार डूबी हुई थी कि उसे उनके आने की आहट नहीं, मिली? रजनी इस प्रकार लजा गई, मानो उसके प्यार की चोरी पकड़ी गई हो।

___ चंद्रभाल ने भेद-भरी दृष्टि से रजनी को देखा। फिर झुककर फूल नीचे से उठा लिया। सीधे खड़े होते हुए उसने फूल को बहुत ध्यान से देखा। फूल को बहुत आहिस्ता से अपने नथुनों के समीप लाया, सुंघा। फूल की नहीं, मानो रजनी की सांसों की सुगन्ध उसके दिल की गहराइयों में उतर गई। फूल को नथुनों से अलग करते हुए उसने एक ओर अपने कंधे पर गर्दन झुकाई। रजनी को देखा। फिर मुस्करा दिया। लाज के कारण रजनी के कपोल गुलाबी हो गए। चंद्रमाल ने कहा, मैं जानता हूं तू इस फूल को लेकर क्या सोच रही थी।'

'हाय राम! रजनी का दिल धड़क उठा। कुंवर साहब को उसके दिल की बात कैसे ज्ञात हो गई? कुंवर साहब की बातें सुनने के लिए उसका दिल अधीर हो गया।

'तू सोच रही थी कि इस फूल को मुझे कैसे भेंट करे, ताकि यह मेरे कोट के कॉलर की शान बनकर मेरे दिल के समीप रहे। इसकी सुगन्ध द्वारा तू मेरे दिल की गहराई में उतर जाए। मुझ पर तेरा पूरा नशा छाया रहे। अरे पगली, तेरा नशा तो मुझ पर दिन-रात छाया रहता है। चंद्रभाल ने रजनी की आखों में झांका।

___ रजनी हल्के से मुस्करा दी। कुंवर साहब उसके दिल की बात पढ़ने में मात खा गए थे। उसने तो ऐसा नहीं सोचा था। फिर भी उसे चंद्रभाल की बात अच्छी लगी। यदि ऐसा हो जाए तो कितनी अच्छी बात होगी! उसने चंद्रभाल के कोट के कॉलर की ओर देखा।

चंद्रभाल ने उसकी दृष्टि का अर्थ समझा। वह मुस्कराया, फूल को देखा। फिर फूल को उसने अपने कोट के कॉलर में टांक लिया-अपने दिल के समीप। गुलाब के फूल से उसके बालपन की शोभा बढ़ गई। उसके बालपन से नन्हे फूल की भी शोभा बढ़ गई। उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। फिर बोला,'मौं तो तुझसे केवल दो मिनट के लिए मिलने आया हूं। सोचा था कि तू मिल जाएगी तो बता दूंगा कि घर वालों के साथ मुझे एक पार्टी में जाना है और अच्छा हुआ कि तू मुझे मिल गई। आज मैं बहुत देर सेलौदूंगा। तू मेरी प्रतीक्षा मत करना। अच्छा, मैं चल रहा हूं। चंद्रभाल ने एक बार फिर अपने कॉलर में लगे फूल को देखा। फिर मुस्कराता हुआ चला गया।

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उस दिन के बाद रजनी ने चंद्रभाल को प्रतिदिन एक सुन्दर फूल भेंट करना अपनी आदत में। सम्मिलित कर लिया। चंद्रभाल को वह अपने समान ही अधखिला फूल भेंट करती। यदि चंद्रमाल को कहीं जाना होता तो वह उसे एक दिन पहले ही बता देता ताकि वह उसके लिए फूल चुनकर रख सके। फिर जाने से पहले वह रजनी से फूल लेकर स्वयं ही चला जाता था।

इसी प्रकार एक दिन जब रजनी ने चंद्रभाल को फूल भेंट किया तो वह फूल को देखते हुए कुछ खो-सा गया। फिर उसने शरारत भरी दृष्टि से,रजनी को देखा। रजनी कुछ समझी नहीं। चंद्रभाल ने इधर-उधर देखा। अवसर अच्छा था। उसने तुरंत फूल को चूम लिया-रजनी की आखों में झांकते हुए। रजेनी के होंठ कांप गए। उसे ऐसा लगा, मानो चंद्रभाल ने फूल की पंखुड़ियों को नहीं, उसके होंठों की कलियों को चूम लिया हो। लाज के मारे उसके गाल गुलाबी हो गए। आखों में खुमार छा गया तो वह वहां से भाग गई। क्वार्टर में पहुंचकर दर्पण के सामने वह अपने होंठों को इस प्रकार देखने लगी, मानो चंद्रभाल ने वास्तव में इन्हें प्यार किया हो। अपने ही आपसे वह दृष्टि नहीं मिला सकी तो मुखड़ा हथेली में छिपा लिया। सारा शरीर मानो एक विचित्र-सी मिठास लिए गुदगुदा गया था।

दिन बीत रहे थे। समय पंख लगाकर उड़ रहा था। एक रात चंद्रभाल ने रजनी, को बताया कि वह सीनियर कैम्बिज पास करते ही चार वर्ष के लिए लंदन चला जाएगा। चंद्रभाल सीनियर कैम्ब्रिज की अंतिम परीक्षा दे रहा था। चंद्रभाल की बात सुनकर रजनी का फूल-सा मुखड़ा मुरझा गया। उसे ऐसा लगा, मानो वह आकाश में झूला झूल रही थी कि रस्सी टूट गई और वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ी हो। अनेक शंकाएं उसके मन में घर करने लगीं। लंदन जाकर चंद्रभाल उसे भूल तो नहीं जाएगा?

चंद्रभाल जल्द-से-जल्द लंदन जाने के लिए उत्सुक था। प्रसन्न भी बहुत था। रजनी का खामोश देखकर उसने पूछा, लूँ चुप क्यों है? क्या तू मेरे लंदन जाने से प्रसन्न नहीं है

'नही-नहीं, ऐसी बात नहीं।, रजनी ने मुस्कराने का प्रयत्न किया, परन्तु वह मुस्करा नहीं सकी। वृक्ष के नीचे रात का अंधकार बना था, इसलिए चंद्रभाल उसके मुखड़े की उदासी नहीं समझ सका। रजनी ने कहा, मैं तो बहुत प्रसन्न हूं। भला मुझे प्रसन्नता नहीं मिलेगी तो किसे मिलेगी?'

'हा, यह हुई न बात सं चंद्रभाल ने कहा, ,बस, अब जल्दी से मेरी परीक्षा समाप्त हो जाएं तो यहां से भाग निकलूं। लंदन के वातावरण में जो रंगीनी है, वह यहां कहां मिलेगी? और फिर यहां तो में पिताजी की उपस्थिति से डरता हूं वहां जो स्वतंत्रता प्राप्त होगी, उसकी बात ही अलग है। क्यों, ठीक है ना?,

__रजनी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे ऐसा लगा, मानो चंद्रभाल ने उसकी बचपन से की हुई तपस्या को भंग कर दिया हो। उसका दिल टूट गया। उसने अपनी वास्तविकता पहचानी। अपनी वास्तविकता भूलकर वह प्यार के पथ पर कुछ आगे निकल आई थी। चंद्रभाल के मित्र ने ठीक ही कहा था, फूल सूंघने के लिए है, सूंघकर आनन्द उठाओ और फेंक दो। चंद्रभाल के मित्र की बात का गहरा अर्थ समझे बिना रजनी ने ऐसा ही सोचा। चंद्रमाल के लिए वह एक फूल थी। चंद्रभाल उसकी संगति का आनन्द उठा चुका था और अब उसमें उससे बिछुड़ने का कोई गम नहीं झलक रहा था, वरन् उसे लंदन जाने की जल्दी थी। रजनी का मन हुआ, वह रो पड़े, परन्तु फिर उसने सब्र कर लिया।
 
सामने के लॉन में सहसा चौकीदार ने खंकार लगाई। दोनों उठ खड़े हुए।' फिर जुदा हो गए। लॉन में दोनों उस समय तक बैठते थे, जब तक कि चौकीदार के चौकीदारी करने का समय नहीं हो जाता था। पीछे के लीन में तो चौकीदार बहुत कम आता था, क्योंकि इसमें नौकरों के क्याटर थे। इस ओर से उसे किसी बात का कम ही भय था।

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उस रात रजनी पलंग पर पड़े-पड़े सिसकती रही, रोती रही और अपनी वास्तविकता का ध्यान कर अपने दुर्भाग्य को कोसती रही। उसने सोच लिया था कि वह चंद्रभाल से अब कभी नहीं मिलेगी। कुंवर साहब इस कोठी के छोटे मालिक हैं। यदि उन्होंने उसे कोई आइघ दी तो वह उसका पालन अवश्य करेगी, परन्तु उनसे कोई आशा नही रखेगी। रजनी प्यार के विषय में कोई निर्णय नहीं कर सकी।

परन्तु रजनी चंद्रमाल से स्वयं को मिलने से भी नहीं रोक सकी। अगले ही शाम वह क्यारियों के समीप खड़ी फूलों को देखती हुई उन पर तरस खा रही थी कि वहां चंद्रभाल चला आया। वह कहीं जाने की तैयारी में था। रजनी ने उसके कोट का कॉलर सूना देखा तो एक फूल तोड़कर उसे भेंट कर ही दिया। दिल ही नहीं माना ऐसा न करने के लिए। चंद्रभाल ने फूल लेकर दूसरों की दृष्टि बचाते हुए उसको चूमा तो रजनी और दिनों के समाज लजा नहीं सकी, परन्तु हल्के से मुस्करा दी अपने हॉल पर। यह भी कैसा प्यार है, जिसका परिणाम वह जानती है, फिर भी परिणाम से निश्चित है। क्या वास्तविक प्यार इसी को तो नहीं कहते? अंजाम से खबरदार होकर भी बेखबर?

'मैं आज एक बारात में जा रहा हूं। देर से लौटूंगा। प्रतीक्षा मत करना।' चंद्रभाल ने कहा और चला गया।

रजनी खामोश खड़ी रही। उसने सोच रखा था कि वह वैसे भी चंद्रभाल से रात में नहीं मिलेगी। अब वह सयानी हो चली है। तेरहवां वर्ष पार कर चुकी है। किसी ने देख लिया तो क्या होगा?

परन्तु, रात जैसे ही आई, उसे चंद्रमाल की प्रतीक्षा फिर रहने लगी, यह जानते हुए भी कि वह नहीं आएगा। लगभग दस बजे तक वह किताब पढ़ने के बहाने खिड़की पर बैठी रही, उसके बाद ही अपनी चारपाई पर जाकर लेटी। नींद तो मानो अब सदा के लिए उड़ चुकी थी। अगली रातों में वह जब चंद्रभाल से मिली, सदा खामोश रही। चंद्रभाल से उसने कोई गिला भी नहीं किया। अपने-आपको उसने ऐसे पथ पर छोड़ दिया था, जिसकी मंजिल नहीं थी। फिर भी वह चली जा रही थी, आशा के विरुद्ध आशा किए, क्योंकि उसके दिल को चंद्रभाल की समीपता प्राप्त हो रही थी। अभी तो उसने पूर्णतया जवानी में पग भी नहीं रखा था इसलिए परिणाम जानने के बावजूद परिणाम की ओर से वह निश्चित थी।

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फिर एक दिन वह भी आ गया जब रजनीने चंद्रमाल को अंतिम फूल भेंट करने के लिए तोड़ा। फूल लिए वह अपने क्वार्टर के द्वार पर खड़ी हुई थी। चंद्रभाल का सामान पोर्टिको के नीचे खड़ी कार में रखा जा चुका था। कोठी के सभी नौकर चंद्रभाल को विदा करने के लिए कार के समीप खडे हए थे, परन्तु रजनी वहां नहीं जा सकी थी। जाती भी कैसे? पिछली रात वह चंद्रभाल के लिए घंटों अपने क्वार्टर में चुपचाप लू! बहाती रही थी। पिछली रात उसने सोचा था कि जब चंद्रभाल आएगा तो वह उससे खुलकर बातें करने का प्रयत्न करेगी। उससे स्पष्ट शब्दों में पूछेगी कि वह उसे लंदन जाकर भूल तो नहीं जाएगा? ऐसा वह कई बार सोच चुकी थी, परन्तु पूछने का साहस कभी नहीं कर सकी थी। चंद्रभाल के माली की नातिन होकर उसे ऐसी बातें उससे पूछने का अधिकार भी क्या था?

चंद्रभाल आया तो रजनी ने उसे देखकर मुस्कराने का प्रयत्न किया, परन्तु वह मुस्करा - न सकी। दिल के अंदर मानो नासूर बह रहा था। उसने फूल चंद्रभाल की ओर बढ़ा दिया। चंद्रभाल ने फूल लेकर देखा। फिर रजनी की गंभीरता पर ध्यान दिया। हल्के से मुस्कराया फिर बोला'तुम उदास हो --यह फूल भी उदास हो गया है, क्या मुस्कराकर मुझे विदा नहीं करोगी?'
 
__ रजनी के होंठ कांपे। फिर भी वह मुस्कराने में सफल नहीं हो सकी। इच्छा हुई कि दिल की बातें पूछ ले, प्यार की पुष्टि कर ले, परन्तु होंठों पर मानो ताला पड़ गया।, मालिक तथा नौकर के मध्य फिर वही संकोच की दीवार र खड़ी हो गई। उसने अपनी पलकें झका लीं।'

'मेरे जाने के बाद मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना?' चंद्रभाल ने पूछा।

रजनी ने पलकें उठाकर चंद्रभाल को देखा। कितनी आशाएं बंधी थीं देखने के इस अंदाज में! नजरों ही नजरों में उसने कितने सारे वायदे भी किए। वह भला अपने कुंवर को कैसे मूल सकती थी? उसके नन्हे-से कुंबारे दिल में कुंवर साहब की ही तस्वीर तो समाई हुई थी। उसकी आखें छलक आई। होंठों ने अपने प्यार का इकरार करना चाहा तो होंठ कांप गए।

सहसा कोठी के पोर्टिको में कार का हान-बजा। चंद्रभाल के लिए बुलावा था। चंद्रभाल ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। फिर रजनी से बोला, 'मैं चल रहा हूं। देर हो रही है।' चंद्रभाल ने गुलाब को अपने होंठों से लगाया, प्यार किया मुस्कराया, फिर पलटकर तेजी के साथ कोठी की ओर चला गया।



रजनी द्वार पर उसी प्रकार खड़ी रह गई। परन्तु चंद्रमाल ने अपने दिल की बात पूछते हुए मानो उसके दिल की बात का भी उत्तर दे दिया था। कुंवर साहब स्वयं उसे नहीं भूल सकेंगे। भूल सकते तो भला उससे ऐसा प्रश्न ही क्यों करते? रजनी भी कोठी की ओर बद गई-अपने कुंवर साहब के अंतिम दर्शन करने के लिए, वह कोठी के एक कोने पर खड़ी हो गई। चंद्रमाल कार में बैठ चुका था। जागीरदार मार्तण्ड सिंह अपनी पत्नी के साथ बैठे हुए थे। चंद्रमाल ने नौकरों को बखााईश दी। नौकर सलामी में झुक-झुक पडे। फिर चालक ने कार स्टार्ट कर दी। कार जब मुख्य द्वार से बाहर निकली तो रजनी अपनी आखों से निकलते आसुओं की झड़ी नहीं रोक सकी। वह पलटी और अपने क्वार्टर की ओर लौट पड़ी।

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चंद्रभाल चला गया तो रजनी का दिल सूना हो गया। दिल सूना हो तो हर वस्तु भी सुनी दिखाई पड़ती है।

कोठी उजाड़ हो गई। हरे-भरे लीन को पतझड़ की हवा लग गई। सारे ही फूल मानो कुम्हला गए-रजनी के मुखड़े के समान। रजनी को कुछ भी अच्छा नहीं लगता। परन्तु उसकी परीक्षाओं के दिन समीप आ रहे थे। परिस्थिति से समझौता करके उराने स्वयं को संभाल लिया। अपना ध्यान उसे पढ़ाई की ओर समेटना पड़ा। उसने सोचा, चार वर्ष के अंदर पढ़-लिखकर वह किसी योग्य बन जाएगी तो चंद्रभाल के वापस आने के बाद वह उससे बातें करते समय पहले के समान हीन-भावना की शिकार नहीं हो सकेगी। उसकी इस इच्छा के पीछे कितनी सारी अज्ञात आशाएं छिपी हुई थीं, भोली-माली रजनी स्वयं नहीं जानती थी।

एक दिन वह किताब पड़ रही थी कि अचानक कमरे में उसके बाबा के साथ उसका बापू भी चला आया। साथ में एक छोटी-सी बच्ची भी थी। आयु लगभग नौ वर्ष की होगी। उसे देखते ही रजनी का दिल धड़क गया। समझते देर नहीं लगी कि यही कम्भो है। कम्भो भी उसे बडे ध्यान से देख रही थी। उसकी बहन क्या इतनी सुन्दर हैं? अपनी सुन्दरता के कारण रजनी किसी भी स्थिति में कम्मो की बहन नहीं लगती थी। रजनी उठ खड़ी हुई। दिल ने जोर मारा तो उसने लाकर कम्भो को अपनी छाती से लगा लिया। आज छ: वर्ष बाद वह अपनी बहन से मिली थी। क्या हुआ वह सौतेली थी, परन्तु थी तो उसकी बहन ही। कम्भो स्वयं भी तो उससे मिलने की इच्छुक रहा करती थी। उसने जब कम्मो को अपनी छाती से लगाया तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी। रजनी ने सोचा, बहन इतने दिनों बाद मिल रही है, शायद इसीलिए से रही है। उसे उस पर दया आई। प्यार भी आया। उसकी भी आखेंद छलक आई। परन्तु जब उसने अपने बापू तथा बाबा की आखों में भी औसू देखे तो कुछ समझ नहीं सकी। आश्चर्य से वह कभी अपने बाबा को तो कभी बापू को देखने लगी।

'बेटी।' बाबा रजनी के समीप आए। कम्भो के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए उन्होंने रजनी से कहा, यह बच्ची भी तेरे समान बिना मां की हो गई है।'

रजनी ने चौंककर बाबा को देखा। फिर अपने बापू को भी। बाबा की बात पर उसे विश्वास नहीं हुआ।

__'हां बेटी !, उसके बापू ने बाबा की बात की पुष्टि की। -भीगे स्वर में उसने कहा, वह ऐसी बीमार पड़ी कि बच ही नहीं सकी। परन्तु जब अपनी मृत्यु से । कुछ समय पहले उसे ज्ञात हुआ कि उसके जीवन के दिन पूरे हो चुके हैं, तो वह तेरे लिए बहुत रोई, बहुत तडपी। वह तुझसे क्षमा मांगना चाहती थी। कहती थी कि उसने तुझे अपने से अलग करके तुझसे जो अन्याय किया है, उसी का दंड भगवान उसे दे रहा है। उसके बापू के होंठों पर एक सिसकी आ गई।

रजनी का नन्हा-सा दिल अपने बापू के औसू देखकर पिघल गया। उसे उस पर दया आई। कम्मो से भी उसे सहानुभूति हो गई। मां की मृत्यु का भी उसे दुःख हुआ।

क्या हुआ, वह सौतेली थी, परन्तु सात वर्ष की आयु तक तो उसी ने उसका लालन-पोषण किया था। गुमसुम-सी वह अपने घर वालों के दुःख में सम्मिलित हो गई।

'दीदी!, सहसा कुछ देर बाद अपने आओ को पोंछते हुए कम्पो ने कहा, हम तुम्हें लेने आए हैं। चलोगी ना हमारे साथ?'
 
रजनी चौंक गई। वह ऐसी बात के लिए तैयार नहीं थी। उसने तो मानो वहां जीवन भर रहने का सपना देखा था-इस कोठी की चहारदीवारी के अन्दर-जहां उसके दिल में प्यार की कली उत्पन्न हुई थी तथा फूल बनने की प्रतीक्षा कर रही थी। वह यहां से कैसे जा सकती थी, जहां लॉन के फूल उसकी सांसों की सुगन्ध पर निर्भर करते थे? उसकी सांसों की ताजगी के साथ चंद्रभाल के होंठों के स्पर्श को भी तरस रहे थे। उसके चले जाने से क्या इन फूलों की आस नहीं टूट जाएगी? अपने प्यार का चमन छोड़ने के लिए वह किसी भी स्थिति में तैयार नहीं थी।

उसने कहा, लेकिन...।'

'बेटी !' सहसा उसके बापू ने उसकी बात काटी। ऐसा न हो कि बेटी इंकार कर दे। उसने कहा, यदि तू हमारे साथ वापस नहीं जाएगी तो कम्मो की मां की आत्मा यही समझेगी कि लूने उसे क्षमा नहीं किया। फिर उसकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी।'

क्षमा? रजनी का मासूम दिल सोच में पड़ गया। क्या उसने मां को क्षमा नहीं किया है? वह मां, जिसने उसे सात वर्ष की आयु तक अपनी शरण में रखा? कैसे रखा? मां के समीप रहते हुए वह बात नहीं जान सकी थी। मां से बिछुड़ने के बाद ही उसने उसके व्यवहार में अंतर महसूस किया था, वह भी यह जानने के बाद कि वह उसकी सौतेली मां थी। क्या ऐसी स्थिति में उसे मां की आत्मा की शांति छीनने का कारण बनना चाहिए? क्या यह पाप नहीं है? पाप? रजनी का नन्हा सा दिल पाप के नाम से ही कांप गया।

'बेटी' उसके बाप ने फिर कहा, मरने के बाद तो लोग अपने शत्रु को भी क्षमा कर देते हैं, फिर वह तो तेरी मां थी। भले ही सौतेली मां थी परन्तु मां तो थी ही।'

'दीदी!, सहसा कम्मो ने भी उसका हाथ पकड़कर कहा,'चलो न हमारे साथ...चलो ना!'

रजनी ने अपने बाबा को देखा। इतने वर्ष बाबा के साथ व्यतीत करने के बाद भी क्या उसे चले जाना चाहिए? आड़े समय तो बाबा ने ही उसका साथ दिया था।

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'वेटी।, उसके बापू ने उसकी नजरों का मतलब समझकर फिर कहा, हमारे साथ चल बेटी! मैं तेरी हर इच्छा पूरी करूंगा। तुझे पढ़ाऊंगा, लिखाऊंगा। बेटी, तूं जब चाहे छुट्टियों में बाबा के पास भी आ जाना। मैं तुझे कभी मना नहीं करूंगा, परन्तु इस समय तू अपनी मां की आत्मा की शांति के लिए अपना पुराना घर स्वीकार कर ही ले।'

रजनी को उसके बाबा ने भी समझाया। वह आ हो चुका है। आखिर कब तक वह उसका साथ दे सकेगा?

एक दिन तो उसे अपने घर जाना ही है। रजना न अपन जाने की स्वीकृति देकर सिर झुका लिया। उसके संतोष के लिए यह बहुत था कि उसके बापू ने उसे यहां हर छुट्टी में आने की आज्ञा दे दी थी। छोटी-सी लड़की अपने पिता की इच्छा से बगावत करती भी कैसे?
 
रजनी कुसुम्पटी आ गई-अपने बापू के घर। वह अपने बापू के घर क्या पहुंची मानो कुसुम्पटी की धरती पर चन्द्रमा उतर आया। गांव वाले उसकी सुन्दरता देखते तो देखते ही रह जाते। सभी जानते थे कि वह हीरालाल की पहली संतान है। अभी से ही उसके रिश्ते आने लगे। परन्तु रजनी को शिक्षा प्राप्त करने की धुन थी, इसीलिए हीरालाल ने उसकी इच्छा का निरादर नहीं किया। शिक्षा के बहाने वह कुंवर साहब की प्रतीक्षा में चार वर्ष बिता देना चाहती थी। रात के एकांत में उसके कानों में वह वाक्य गूंज जाता, जो चंद्रभाल ने लंदन जाने के लिए उससे विदा होते समय कहा था-मेरे जाने के बाद मुझे भूल तो नहीं जाओगी न? तब रजनी मन-ही-मन मुस्करा देती। वह भला अपने कुंवर साहब को कुऐसे भुला सकती है?

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कुंवर साहब से मिलने के लिए उसकी इच्छा दिन पर दिन जोर पकड़ती जा रही थी। परन्तु समय के साथ जैसे-जैसे उसके दिल की कली फूल बनने लगी, उसे इस इच्छा का वास्तविक कारण भी समझ में आने लगा। उसके दिल को चंद्रभाल से मिलने की केवल इच्छा ही नहीं है, दीवानगी की सीमा तक प्यार है। क्या सच्चा प्यार इसी को कहते हैं? किसी के प्रति सोचते-सोचते खो जाना, स्वयं से लजाना, मुस्कराना! प्यार! कितना प्यारा शब्द है! रजनी सोचती तो लाज के कारण कभी-कभी उसके कपोल गुलाबी हो जाते। आखों में गुलाबी डोरे कांप जाते। चंद्रभाल के अंतिम वाक्य से उसे कितनी सारी आशाएं बंध गई थीं। दिल के अंदर उससे मिलने की कितनी अधिक तड़प थी। यह तड़प बढ़ती ही जा रही थी-जैसे-जैसे चंद्रभाल के वापस लौटने का समय समीप आता जा रहा था।

अब तो चंद्रमाल को गए लगभग चार वर्ष पूरे भी हो चले थे। रजनी सत्रह वर्ष की हो गई थी। उसका रंग-रूप और निखर आया था। उसका अंग-अंग फूटकर सुन्दरता की सीमा फलांगता हुआ अंगड़ाई लेने लगा था, परन्तु उसके स्वभाव में जरा भी अंतर नहीं आया। वही गंभीरता, वही खामोशी थी उसके अंदर जो पहले थी। घर में कोई मेहमान आता तो वह उससे मिलती नहीं, मिलती तो बातें नहीं करती, बातें करती तो बहुत कम, नहीं के बराबर। उसने घर के गन में गुलाब के पौधे लगा रखा थे। गुलाब के फूलों की सुन्दरता देखती तो उसके कानों में चंद्रमाल के वे शब्द गूंज जाते, जो उसने फूलों से उसकी तुलना करते समय कहे थे। उन - शब्दों की वास्तविक मिठास का एहसास उसे इस आयु में हो रहा था।



रजनी इस समय दसवीं कक्षा में थी। शिक्षा उसकी देर से आरंभ हुई थी तथा बाबा के यहां से अचानक कुसुम्पटी आने पर ही उसका एक वर्ष नष्ट हो गया था। समय की यह लम्बाई उसके भाग्य के पक्ष में ही सिद्ध हुई, क्योंकि सत्रह वर्ष की आयु में दसवीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते चंद्रमाल के भारत लौटने का समय हो गया था। हाईस्कूल करने के बाद उसे आगे पढ़ने का अवसर मिलता न मिलता, कौन जानता था। उसकी आयु देखकर उसका बापू उसका विवाह कर देता तो वह क्या करती? उसके बाद उसके बापू को अपनी छोटी बेटी का विवाह भी तो करना था। हाईस्कूल करने के बाद रजनी अपने विवाह से इंकार करने का कारण किसी को बताती तो उल्टे उसका मजाक बन जाता। कौन विश्वास करता कि जागीरदार मार्तण्ड सिंह का बेटा अपने मन में माली की नातिनी का प्यार बसाए ही भारत लौट रहा है?

एक दिन रजनी को बाबा का पत्र प्राप्त हुआ। टुटी-फूटी हिन्दी में बाबा का पत्र आता ही रहता था। वह स्वयं भी बाबा को बहुत स्नेह से पत्र लिखती थी। इसी बीच बाबा उससे कई बार मिलने भी आया था। वह स्वयं भी दिल्ली जाना चाहती थी, परन्तु मां के न होने के कारण घर का सारा काम उसी पर आ पड़ा था। पढ़ाई के साथ उसे घर भी संभालना था। कम्मो छोटी थी। बाप को अपने काम से ही समय नहीं मिलता था। रजनी ने पत्र पढ़ा। बाबा ने लिखा था कि कुंवर साहब लंदन से आ गए हैं। रजनी का दिल उछल पड़ा, कुछ इस प्रकार कि उसे अपनी प्रसन्नता पर काबू पाना कठिन हो गया। मुखड़ा गुलाबी हो गया। आखो के सामने वे सारे ही क्षण बहुत तेजी के साथ थिरक आए, जो उसने कुंवर साहब की संगति में बिताए थे। पंख लगाकर उड़ते हुए तुरंत ही वह कुंवर साहब के सामने पहुंचने को अधीर हो उठी।

__बापू उस समय काम पर गया हुआ था। घर में केवल कम्मो थी। उसने एक योजना बनाई। उसने पत्र को फाड़कर फेंक दिया। फिर कम्मो को बताया कि बाबा का पत्र आया था। वह बीमार हैं। वह उन्हें देखने जा रही है। चलने को उसके साथ कम्भो भी चल सकती थी, परन्तु रजनी ने उसे पहले ही समझा दिया कि हममें से एक का बापू के पास रहना आवश्यक है। रजनी अकेली ही जाने के लिए तैयार हो गई। सम्भवत: यह सूचना पाकर उसका बापू भी कम्मो को लेकर दिल्ली पहुंच सकता था, परन्तु कल अभी बहुत दूर थी। अपनी दीवानगी के कारण उसने कल की चिंता नहीं की। बापू पहुंच जाएगा तो वह उसे विश्वास दिला देगी कि वह बाबा के पत्र में स्वस्थ की जगह अस्वस्थ पढ़ गई होगी। बाबा की टूटी-फूटी हिन्दी यूं भी आसानी से नहीं पड़ी जाती थी।

भोली-माली रजनी प्यार की दीवानगी में अब कितनी आसानी से झूठ बोलने को तैयार हो गई थी। प्यार जो न सिखाए थोड़ा है। प्यार एक तपस्या है-मानव के पवित्र बंधन का सबसे बड़ा सहारा। फिर भी प्यार को साकार बनाने के लिए अनेक पापों का सहारा लेना पड़ता है। उनमें से एक पाप है झूठ। अपने प्यार को छिपाने के लिए बच्चों को अपने माता-पिता या समाज से झूठ बोलना ही पड़ता है।
 
रजनी को बाबा के यहां आते-जाते रहने के कारण बसों का समय ज्ञात था। उसने तुरंत अपने जाने का प्रबंध किया और फिर जब वह दिल्ली के लिए चल पड़ी तो उसका दिल चंद्रमाल से मिलने की उत्सुकता में बुरी तरह धड़क रहा था। इन चार वर्षों में कुंवर साहब कितना बदल गए होंगे! अब तो वह बिल्कुल ही जवान हो गए होंगे! उसे भूल तो नहीं गए होंगे? उसे पहचानेंगे भी या नहीं? पहचानेंगे तो पहले के समान ही उससे बातें करेंगे या नहीं? अनेक विचार रजनी के मन में उठ रहे थे, परन्तु उसे अपने प्यार पर तिश्वास था। उस तपस्या पर विश्वास था, जो उसके कुंवारे दिल ने धड़क-धड़ककर अब तक की थी।

__रजनी जब आज मार्तण्डसिंह की कोठी पहुंची थी तो शाम गहराचुकी थी। रात की धुंध ने अपना चल फैलाना आरंभ कर दिया था। कोठी के मुख्य द्वार के बाहर अनगिनत कारों की पंक्तियां देखकर वह समझ गई थी कि कोठी में कोई जश्न चल रहा है। वह कोठी के मुख्य द्वार में प्रविष्ट हुई-हाथ में अपना छोटा-सा सूटकेस लटकाए। आर्केस्ट्रा की मीठी धुन वातावरण में तैर रही थी। सामने का लॉन कहीं-कहीं मरकरी बल्व का झाग लिए मखमली चादर के समान चमक रहा था। फूल मानो उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। रजनी की सांसों की सुगन्ध का एहसास करते ही फूल मानो मुस्करा उठे। कोठी के लॉन में कहीं-कहीं अंधकार की ओट लिए कुछ एक जवान जोड़े खड़े वातावरण का आनन्द उठा रहे थे। अपने बाबा के क्वार्टर में पहुंचने के लिए रजनी कोठी की बगल से होकर निकली-स्वयं को मानो छिपाते हुए। ऐसा न हो कि उस पर चंद्रभाल की दृष्टि पड़ जाए। चंद्रभाल के सामने आने के लिए वह बन-संवरकर लॉन का सर्वाधिक सुन्दर फूल बन जाना चाहती थी।

___ फिर भी कोठी की बगल से निकलते हुए उसकी दृष्टि बरामदे के खुले द्वार के अन्दर पहुंच ही गई। हॉल के अन्दर रंगीनी छाई हुई थी। निश्चित ठहाके आर्केस्टा की धुन में सम्मिलित हो रहे थे। मन हुआ, वह बरामदे में चलकर चंद्रभाल का दर्शन प्राप्त कर ले, परन्तु फिर उसने स्वयं को रोक लिया। वह आगे बढ़ गई। सहसा कोठी के पिछले भाग में पहुंचते ही एक नई सुगन्ध का झोंका उसके नथुनों में प्रविष्ट हुआ और दिल की गहराइयों में उतर गया। रजनी की दृष्टि आप ही आप एक ओर उठ गई। उसके पग धीमे पड़ गए। कोठी के पीछे लगा हरसिंगार बड़ा हो चुका था। उसकी टहनियां दूसरी मंजिल पर बारजे तथा बगल के कमरे की खिड़की तक पहुंच चुकी थी। कमरा बिजली से प्रकाशमान था। रजनी के दिल ने ही बता दिया कि कमरे में कोई रहता है। कौन? अनुमान लगाते हुए रजनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।



वह पेड़ के समीप आई। अनेक फूल उसके स्वागत में धरती पर गिरकर बिछे हुए थे। रजनी ने पेड़ के तने पर हाथ रखा। प्यार की इस यादगार में वह क्षण भर के लिए खो गई। मुस्कराई फिर अपने क्वार्टर की ओर बढ़ गई।

___ क्वार्टर में बाबा मौजूद था। रजनी को देखते ही चौंक गया। फिर खिल भी उठा। उसके इस प्रकार आने का कारण पूछा तो रजनी ने दिल का भेद छिपाते हुए तुरंत वही बहाना बना दिया, जो उसने अपने बापू के लिए सोचा था। उसके पत्र में वह शब्द स्वस्थ को अस्वस्थ समझकर चली आई है। नातिन के दिल में अपने प्रति इतनी चिन्ता तथा अपार स्नेह देखकर बाबा का दिल भर आया। बेटी उसके स्वास्थ्य का कितन्म अधिक ध्यान रखती है! बाबा इधर-उधर की बातें पूछने लगा। उसके बापू तथा कम्मो के स्वास्थ्य के विषय में पूछता रहा। रजनी भी अनमने मन से उत्तर देती रही, परन्तु उसका दिल कोठी में हो रहे जश्न की ओर ही लगा रहा। कानों में आती आर्केस्ट्रा की मद्धिम धुन मानो उसे अपनी ओर खींच रही थी। दिल था कि तुरंत कुवर साहब को देखने के लिए उतावला हुआ जा रहा था।

संक्षेप में उसने बातें समाप्त की। फिर नहाने-धोने के बाद आज उसने स्वयं को मानो एक युग के बाद विशेष रूप से संवारा, कुछ इस प्रकार की बाबा भी पूछे बिना नहीं रह सका था।

सादी वेशभूषा में उसका रंग-रूप निखरकर अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था। बाबा को टालकर वह कमरे के बाहर निकली थी और फिर उसने लॉन का सर्वाधिक सुन्दर गुलाब चुनकर तोड़ लिया था। फूल में उसने अपनी सांसों की सुगन्ध सम्मिलित की थी। पंखुड़ियों को चूमकर उनकी मुस्कान में मिठास भर दी थी और फिर वह फूल लिए कोठी के उस बरामदे की ओर बढ़ गई थी, जहां से वह आसानी के साथ कुंवर साहब का दर्शन कर सकती थी। उनसे भेंट होने पर उन्हें फूल दे सकती थी। कितनी सारी अभिलाषाएं थी उसके मन में! कितना विश्वास था उसे अपने प्यार पर!

वह बरामदे में पहुंची थी तो हॉल के अन्दर आर्केस्ट्रा की धुन पर विदेशी नृत्य आरंभ हो चुका था। हॉल के अंदर का निरीक्षण करने के लिए वह एक खिड़की पर चली आई थी। बांहों में बांहें डाले नृत्य करते जोड़ों को देखकर रजनी का दिल अचानक जाने क्यों एक अज्ञात भय से कांप गया। कुंवर साहब को तलाश करती दृष्टि हॉल के अंदर की चमक-दमक में भटककर खो-सी गई थी। कहां है उसके सपनों का राजा? कहां है कुंवर साहब? परन्तु तभी एक सुन्दर जोड़ा थिरकता हुआ उसकी दृष्टि में आया और खिड़की के समीप ठहर-सा गया।

जोड़े के युवक को रजनी एक ही दृष्टि में पहचान गई। पहचानती भी क्यों नहीं? दिल में प्यार की धड़कन समाए वह उसी के लिए तो यहां आई थी। इन चार वर्षों में चंद्रभाल कुछ भी तो नहीं बदला था। केवल लड़कपन बिछड़ गया था। स्वास्थ्य में मर्दानगी झलक आई थी परन्तु उसके साथ थिरकती लड़की को देखकर रजनी के दिल पर बिजली-सी गिर पड़ी थी। गला भी सूख चला था।

चंद्रभाल के साथ वह कुछ अधिक ही समीप होकर नृत्य कर रही थी-मुस्कराते हुए उसकी आखों में आखें डालकर। चंद्रभाल भी तो उसकी मुस्कान में बराबर का भागीदार था। कितने प्यार से वह भी तो उस सुन्दरी की आखों में औखें डाले हुए था! रजनी की उपस्थिति से अज्ञात वह इस प्रकार प्रसन्न था, मानो सपने में भी उसने रजनी को कभी याद नहीं किया था।

रजनी अपनी खिड़की पर बैठी सोच रही थी, अपने अतीत का ध्यान कर रही थी और कोठी के हॉल के अन्दर नृत्य हो रहा था। चंद्रभाल की बांहों में अंशु थिरक रही थी, परन्तु चंद्रभाल का मन कहीं और लगा हुआ था-रजनी में।
 
चार वर्ष पहले जब चंद्रभाल लंदन के लिए रवाना हुआ था तो उसे रजनी की जुदाई का एहसास उससे बिछड़ने के बाद कुछ अधिक ही हुआ था। लंदन में रहते हुए उसे माता-पिता की याद आना स्वाभाविक था, परन्तु रजनी की याद ने आरंभ में उसका पढ़ना-लिखना दूभर कर था। चढ़ती जवानी के दिन थे, इसलिए रजनी के प्यार का एहसास करके उसका दिल दीवाना हुआ जा रहा था।' परन्तु कुछ ही दिनों में जब उसकी भेंट अपने देश के विद्यार्थियों से हुई तथा उनकी संगति में उसने लंदन की रंगीन शामें देखनी आरंभ कर दी तो धीरे-धीरे उसका दिल बहलने लगा। परन्तु एक वर्ष बाद जब उसकी भेंट अंशु से हुई तथा उससे परिचय बढ़ा तो वह रजनी को भूल ही गया। तब अंशु तीन वर्ष के लिए भारत से आई थी-कॉलेज की नई छात्रा बनकर। अंशु भी सुन्दरता की प्रतिमा थी। ऊंचे समाज में उठना-बैठना तथा बढ़चढ़कर भाग लेना वह खूब जानती थी। अंशु से परिचय बढ़ने का एक विशेष कारण भी था। वह दिल्ली की ही रहने वाली थी।

___ अंशु ने बताया था कि राजस्थान में उसके पिता निर्भय सिंह कभी एक बहुत बड़े जागीरदार थे, परन्तु अब उनका एक व्यापार है-दिल्ली शाहदरा में। उसकी मां नहीं है। वह पिता की अकेली संतान है। इसलिए उसके पिता उसकी हर इच्छा पूरी करने में धरती-आकाश एक कर देते हैं। अंशु उसके जीवन में चंद्राश बनकर प्रविष्ट हुई तो चंद्रभाल यह भूल गया कि रजनी बिना उसकी चमक फीकी है, मुस्कान बेजान है। अंशु की संगति में उसने लंदन की अनेक रंगीन रातें देखीं, नृत्य में अर्धनग्नता के नाम पर सम्पूर्ण नग्नता देखी तो उन दोनों के मध्य रहा-सहा संकोच भी दूर हो गया। चढ़ती जवानी के दिन थे, दोनों एक-दूसरे के समीप आ गए। उधर अंशु ने अपने पिता को चंद्रभाल के विषय में लिखा, इधर चंद्रभाल ने अपने माता-पिता को। ज्ञात हुआ कि दोनों के पिता एक-दूसरे को पहले से ही जानते हैं, क्लबों में एक साथ उठने-बैठने के कारण। परन्तु संतानों के पत्रों ने उनका परिचय घनिष्ठ मित्रता में परिवर्तित कर दिया। दोनों ही पुराने जागीरदार थे, इसलिए दोनों की ही रुचि एक-दूसरे में हो गई। कोठियों में आना-जाना भी होने लगा। एक-दूसरे की दावतें भी होने लगी। दोनों को ही शराब पीने की आदत थी, इसलिए शराब पीकर जब दोनों एक साथ बैठते तो'आप' से'तुम' पर उतर आते और फिर अंशु तथा चंद्रमाल के रिश्ते की बातें भी करने लगते। उधर अंशु ने चंद्रभाल के साथ खींची हुई अपनी तस्वीरें अपने डैडी को भेज रखी थीं, इधर चंद्रमाल ने। तस्वीरों में दोनों एक-दूसरे के समीप इस प्रकार प्रसन्न थे, मानो अपना जोड़ा उन्होंने स्वयं ही बना लिया था।

शिक्षा समाप्त होने के बाद वह अंशु के साथ ही भारत लौटा तो हवाई अडुए पर उसके माता-पिता के साथ निर्भय सिंह भी अपनी बेटी की प्रतीक्षा कर रहे थे। पहली बार उसने निर्भय सिंह को देखा। लम्बा-चौड़ा कद, तेजस्वी मुख, सुर्ख औखें, बड़ी-बड़ी मूंछे। देखने में ही वह जागीरदार लगते थे, अंशु के साथ उन्होंने उसे भी गले से लगाकर आशीर्वाद दिया था। ऐसा ही मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी ने अंशु के साथ भी किया। अंशु ने तो एक ही दृष्टि में उनके दिल के अन्दर बहू का स्थान प्राप्त कर लिया था।

लंदन से वापस आने के बाद चंद्रभाल को पहले दिन तो गई रात तक मित्रों से समय नहीं मिला था। घर वालों से भी देर में फुरसत मिली। उसके बाद जब वह कोठी के पीछे बारजे के समीप वाले कमरे में प्रविष्ट हुआ तो हरसिंगार पर दृष्टि पड़ते ही उसे रजनी याद आ गई थी। रजनी के साथ व्यतीत किया एक-एक क्षण उसे गुदगुदा गया था। रजनी उससे मिलने, उसका स्वागत करने क्यों नहीं आई? पहले दिन कोठी में प्रवेश करने पर कोठी के सभी नौकर-चाकरों तथा अन्य लोगों ने उसका स्वागत किया था। उसका मन किया था कि वह रजनी के क्वार्टर में जाए, उससे भेंट करे, परन्तु रात बीत चकी थी, इसलिए उसने अगली सुबह उससे मिलने की सोची।

__ अगली सुबह वह बाबा से मिला तो उसे ज्ञात हुआ कि रजनी तीन वर्ष पहले ही इस कोठी को छोड्कर जा चुकी है-अपने बापू के पास।' चंद्रभाल को इसका बहुत दुःख ही नहीं हुआ, दिल में रजनी से मिलने की तड़प भी उत्पन्न हो गई थी। उसने कहा, उसे पत्र लिखना तो सूचित कर देना कि मैं आ गया

'आज ही लिख दूंगा मालिक!' बाबा ने तुरन्त उसकी आइघ का पालन करते हुए उत्तर दिया था-चंद्रभाल के दिल की स्थिति का अनुमान लगाए बिना।

ओर चंद्रभाल को संतोष हो गया था। रजनी को उससे प्यार होगा तो उसने उसकी प्रतीक्षा अवश्य की होगी। इस प्यार का एहसास चंद्रभाल को भारत वापस आने के बाद हुआ। हरसिंगार को देखकर तथा अपना बचपन याद करके रजनी की अनुपस्थिति ने उसे और तड़पा दिया था। उसे आश्चर्य था कि वह लंदन में रजनी को क्यों मूल गया था? क्या यह लंदन की रंगीनी का प्रभाव था या अंशु की संगति का असर था? शायद दोनों ही बातें थीं। शारीरिक दूरियां कभी-कभी दिल की दूरियां भी ले आती हैं।

लंदन से भारत आने के बाद जब तक रजनी दिल्ली नहीं आई, चंद्रभाल का तथा अंशु का खूब साथ रहा। अंशु की जिद पर उसने अंशु को अपनी फैक्टरी दिखाई तो नौकर-चाकर उसे सलाम करने दौड़ पड़े। अंशु जैसी सुन्दर लड़की को अपने छोटे मालिक के साथ देखकर नौकरों को समझने में देर नहीं लगी कि यही उनकी होने वाली मालकिन हैं। मित्रों की दी हुई पार्टियों में भी अंशु का साथ खूब रहा। मित्रों की कमी नहीं थी। जिस दिन पार्टी नहीं होती अंशु स्वयं चंद्रभाल को किसी अच्छे होटल या क्लब में शाम बिताने पर विवश कर देती।
 
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