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Romance हरसिंगार/रानु

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'अंशु कोठी आई थी। आने पर मुझसे मिली थी, परन्तु तुरंत ही वापस चली गई।' सहसा चंद्रभाल की मां ने कहा, जह तो चंद्रमाल से मिली भी नहीं।'

'जी?' निर्भय सिंह कुछ समझा नहीं।

'जाने क्या बात थी! कुछ परेशान-सी थी।' चंद्रभाल की मां ने चिन्ता प्रकट की'मैंने पूछा तब भी कुछ नहीं बताया।

निर्भय सिंह चिन्तित हो उठे। परन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं।, उन्हें सब से काम लेकर अंशु की प्रतीक्षा करनी थी, इसलिए वह उसकी प्रतीक्षा,करने लगे।

मंगनी की रस्म अदा हो गई, पार्टी भी आरंभ हो गई, परन्तु अंशु नहीं आई तो निर्भय सिंह की चिन्ता बढ़ने लगी। जब कुछ और समय बीत गया तो निर्भय सिंह ने अपनी कोठी में फोन किया। ऐसा तो नहीं कि अंशु अपनी कोठी वापस चली गई हो? कोठी में फोन की घंटी बजती रही। फिर किसी ने फोन उठाया।

आवाज आईआवाज अंशु की ही थी।

निर्भय सिंह ने स्वर पहचाना तो चैन की सांस ली। बोले, अंशु बेटी, तुम कोठी क्यों चली आई? पार्टी में क्यों नहीं आईं?'

'डैडी, मैं...मैं' दर्द में डूबा हुआ अंशु का स्वर काप रहा था। वह मानो रो पड़ना चाहती थी।

'क्या बात है बेटी? तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है ना?' निर्भय सिंह की चिन्ता बड़ी।

उनके समीप ही मार्तण्ड सिंह भी खड़े थे।

अंशु को कोठी मे सुरक्षित जानकर वह संतुष्ट हो गए थे, परन्तु जैसे ही उन्होंने निर्भय सिह को चिन्तित देखा, वह भी चिन्तित हो उठे।

_ 'डैडी...डैडी...मै बहुत परेशान हूं। मुझे चंद्रभाल ने धोखा दिया है।' अंशु की सिसकी निकल गई।

चंद्रभाल के नाम पर निर्भय सिंह ने तुरन्त रिसीवर अपने कान से पूर्णतया सटा लिया था।

चंद्रभाल से ही तो उनकी सारी आशाएं बंधी थीं। उन्होंने मार्तण्ड सिंह को देखा। उन्होंने फोन की बात नहीं सुनी थी। सुन लेते तो उनके संबंध में परिवर्तन आ सकता था। चंद्रभाल ने अंशु को जाने किस सिलागले में धोखा दिया था? उन्होंने फोन पर कहा,'तुम परेशान मत हो। मैं आता हूं।' निर्भय सिंह ने बात न बढ़ाकर फोन रख दिया और कुछ सोचते हुए एक गहरी सांस ली।

'क्या कोई खास बात हो गई है?' मार्तण्ड सिंह ने चिन्तित होकर पूछा।

___ 'उसकी तबियत ठीक नहीं है।' निर्भय सिंह ने झूठ का सहारा लिया। चंद्रभाल के विषय में पूरी वास्तविकता जाने बिना वह कैसे कुछ कह सकते थे?

'हम भी साथ चलें?' मार्तण्ड सिंह ने सहानुभूति प्रकट की।

'कोई ऐसी बात होगी तो मैं स्वयं फोन कर दूंगा।' निर्भय सिंह ने अंशु से पहले एकांत में सब कुछ जान लेना आवश्यक समझा।

'चंद्रमाल को साथ लेते जाओ।' मार्तण्ड सिंह ने अपना समझकर राय दी।
 
निर्भव सिंह चंद्रभाल को कैस ले जाते सकते थे? उन्होंने तुरंत बात बनाई। बोले,उसकी भी आवश्यकता नहीं। कोई विशेष बात होती तो मैं उसे स्वयं साथ ले जाता। उसके मित्र की यह पार्टी है, इसलिए उसकी शाम नष्ट करना उचित नहीं।'

'खैर, तुम्हारी इच्छा, परन्तु ध्यान रखना।' मार्तण्ड सिंह ने उन्हें याद दिलाया, अंशु हमारी बेटी है। हमारे कुल की लक्ष्मी है वह। कोई खास बात हो तो हमें तुरंत सूचित कर देना।'

'यह बात मैं कभी भूल सकता हूं?' निर्भय सिंह ने कहा, उन्होंने मिलकर अतिथेय से जाने की आज्ञा ली और फिर मार्तण्ड सिंह से हाथ मिलाया। उन्होंने चंद्रभाल से मिलने की आवश्यकता नहीं समझी। यूं भी चंद्रभाल अपने मित्रों में व्यस्त था। वह पार्टी से निकलकर सड़क पर आए। टैक्सी की और फिर अपनी कोठी की ओर चल पड़े। सोचते रहे कि आखिर चंद्रभाल ने अंशु को किस संबंध में धोखा दिया है।

ठाकुर निर्भय सिंह अपनी कोठी पहुंचे। टैक्सी वाले को पैसे देने के बाद जैसे ही अंशु के कमरे में पहुंचे, अंशु उनकी छाती से लिपट गई। फूट-फूटकर वह फिर से रो पड़ी। निर्भय सिंह की छाती छलनी हो गई। जीवन में पहली बार बेटी की आखों में आंसू देखे तो मन हुआ कि अपनी लाड़ली को रुलाने वाले का गला घोंट दें। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसे प्यार से समझाते हुए तसल्ली दी। उसे पलंग पर अपने साथ बिठाया। उससे पूछा तो अंशु ने आंसुओं को पोंछते हुए उन्हें वे सारी बातें बता दी, जो उसने चंद्रभाल की कोठी पर पहुंचने के बाद देखी थीं। उसने अपने पिता को वे भी बातें बताई, जो चंद्रमाल की पार्टी में रजनी के साथ घटी थीं।

हर बात को बहुत ध्यान से सुनते हुए निर्भय सिंह गंभीर हो गए थे। वह सोच रहे थे कि चंद्रमाल पर तो उनकी बेटी का भविष्य निर्भर करता है। साथ ही उनकी अपनी भी बहुत-सी आशाएं जुडी हुई है। यदि चंद्रभाल ने विवाह से इंकार कर दिया तो उनकी बेटी की जो । बदनामी होगी, सो होगी ही, परन्तु उन दोनों के भविष्य का क्या होगा, जिसे सुरक्षित रखने की आशा में उन्होंने इतना बड़ा कर्ज ले रखा है! रिश्ता टूटते ही साहूकार उन पर चील-कौवों के समान झपट पड़ेंगे। क्षण भर में ही उनकी कोठी नीलाम हो जाएगी। वह कहीं के नहीं रहेंगे। बेटी का जीवन अलग अंधकार में डूब जाएगा। सारी मान-मर्यादा मिट्टी में मिल जाएगी। उन्होंने अंशु के सिर पर प्यार से हाथ रखकर समझाया। दृढ़ स्वर में बोले, 'घबरा मत बेटी, चंद्रभाल का विवाह होगा तो केवल तुमसे और किसी से कभी नहीं हो सकता।'

'परन्तु...।' अंशु ने कहना चाहा कि चंद्रभाल से विवाह करके वह करेगी भी क्या! जिस तरह वह रजनी को प्यार करता था, वह तो उसके प्यार का खुला अपमान था1

__'बेटी!' निर्भय सिंह ने कहा, चंद्रभाल एक ठाकुर की संतान है। वह कभी ऐसा काम नहीं कर सकता जिससे उसके इतने बड़े खानदान का अपमान हो। रजनी से वह केवल अपना दिल बहला रहा होगा। उसे वह कभी प्यार नहीं कर सकता। भला एक माली की नातिन का उससे क्या मेल?'

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'परन्तु डैडी...।' अंशु ने फिर कहना चाहा कि वह यह हर्गिज स्वीकारने को तैयार नहीं कि जिसे वह प्यार करती है, वह किसी और लड़की में रुचि ले।

'कल से वह उस लड़की से कभी नहीं मिलेगा। मेरा विश्वास करो बेटी!' निर्भय सिंह ने मानो बेटी के दिल की बात का अनुमान लगाते हुए उसकी बात काटी। बोले, मैं कल ही मार्तण्ड सिंह से मिलूंगा। कल के बाद वह लड़की दिल्ली में कभी नजर नहीं आएगी।' निर्भय सिंह ने तय कर लिया कि वह अगले दिन ही मार्तण्ड सिंह की कोठी पहुंचकर उन्हें सबकुछ बता देंगे।

निर्भय सिंह को पूरा विश्वास था कि मार्तण्ड सिंह अपनी पुरखों से चली आई मान-मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए अब एक क्षण भी रजनी को अपनी कोठी में रखना पसंद नहीं करेंगे। अंशु को वह अपनी बहू स्वीकार कर चुके हैं। अपने कुल की लक्ष्मी मान चुके हैं।

___अंशु चुप हो गई। ठंडे मन से उसने विचार किया कि वह चंद्रभाल को क्षमा कर देगी। उसे अपना बनाएगी। उसको इतना अधिक प्यार करेगी तथा उसका मन इस प्रकार जीतेगी कि उसे किसी पराई लड़की के विषय में सोचने का समय ही नहीं मिलेगा। मनुष्य को इस जीवन में क्या चाहिए? केवल प्यार और वह भी सच्चा तथा निःस्वार्थ प्यार चाहिए।

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अगले दिल सुबह लगभग दस बजे निर्भय सिंह स्वयं मार्तण्ड सिंह की कोठी पहुंचे। कार उन्होंने पोर्टिको में खड़ी की। फिर जैसे ही कार से बाहर निकले, एक सुन्दरी को देखते ही चौंक पड़े। सुन्दरी कोठी के सामने से होकर जा रही थी। निर्भय सिंह की दृष्टि उस पर चिपक गई। दिल उछलकर जवानी की अंगड़ाई ले उठा। होंठों के ऊपर उन्होंने कुत्ते के समान जुबान फेरी। अनगिनत सुन्दरियां उनकी वासना की भेंट चढ़ चुकी थीं, परन्तु इस जैसी सुन्दरी उन्हें यहां देखने को आज तक नहीं मिली थी। सुन्दरी क्या थी, मानो संगमरमर की तराशी हुई सुफेद मूर्ति थी। निर्भय सिंह दिल थामकर रह गए।

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'क्या देख रहे हो भई?' मार्तण्ड सिंह पूछ रह थे। वह उनकी कार की आवाज सुनकर चले आए थे।

निर्भय सिंह बौखला गए, इस प्रकार, मानो उनकी चोरी पकड़ी गई हो। स्वयं पर काबू पाते हुए वह बरामदे पर चढ़े और फिर कोने की ओर संकेत करते हुए पूछा, 'कौन थी वह लड़की?'

सुन्दरी कोठी के मोड़ से आगे जाने के बाद दृष्टि से ओझल हो चुकी थी, परन्तु ओझल होने से पहले बरामदे पर आकर मार्तण्ड सिंह उसे देख चुके थे। उन्होंने उत्तर दिया, 'रजनी! फिर पूछा, 'क्यों?

रजनी के नाम पर निर्भय सिंह का मुखड़ा तुरंत गंभीर हो गया। उन्होंने सोचा, यदि यही रजनी है तो इसकी सुन्दरता पर चंद्रभाल का रीझ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। वह जिस ढंग से रजनी में खो गए थे, उसका कारण बतलाने का भी उन्हें झूठा बहाना मिल गया।

उन्होंने कहा, 'इसे मैं देखते ही समझ गया था कि यह वही लड़की हो सकती है।'

_ 'मैं कुछ समझा नहीं!' मार्तण्ड सिंह ने कहा।

'बताता हूं, सब कुछ बताता हूं। इसी के लिए तो मुझे यहां आना पड़ा है।' निर्भय सिंह ने कहा।

_ 'इसी के लिए यहां आना पडा?' मार्तण्ड सिंह तब भी कुछ नहीं समझे। निर्भय सिंह का मुखड़ा उन्होंने ध्यान से देखा। बोले, तुम कुछ परेशान से हो। बाहर क्यों खड़े हो? अन्दर आओ।' मार्तण्ड सिंह कमरे के द्वार में प्रविष्ट हुए।

निर्भय सिंह उनके साथ हो लिए।

मार्तण्ड सिंह ने निर्भय सिंह को अपने साथ सोफे पर बिठाया ही था कि वहां उनकी धर्मपत्नी भी चली आई। नमस्ते करके वह भी एक सोफे पर बैठ गई। उन्होंने अंशु के स्वास्थ्य के विषय में पूछा तो उनकी बात का उत्तर देने के बजाय निर्भय सिंह ने उन्हें पिछली शाम अंशु की परेशानी का कारण बता दिया।

मार्तण्ड सिंह तथा उनकी पत्नी ने सुना तो कानों पर विश्वास नहीं हुआ। सारे संसार की सुन्दरियां देखने के पश्चात् चंद्रमाल के लिए क्या एक छोटी जाति की अशिक्षित लड़की को प्यार करना संभव हो सकता है? निर्भय सिंह ने कहा, 'इससे पहले भी जब इस कोठी में पार्टी थी तो अंशु की उपस्थिति में रजनी तथा चंद्रभाल का जो मिलन हुआ था, वह साधारण मिलन नहीं था, एक प्रेमी-प्रेमिका का मिलन था।'

_ 'हु!' मार्तण्ड ने एक गहरी सांस ली और सोच में पड़ गए।

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'मेरी बात पर विश्वास न हो तो चंद्रभाल से इस बात की पुष्टि कर लो कि आखिर कल शाम इस कोठी में तथा उसके बाद पार्टी में जब उसकी भेंट अंशु से नहीं, हुई तो उसने उससे भेंट करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया? कम-से-कम वह उससे फोन द्वारा तो बात कर ही सकता था?

'इस समय वह अपने मित्रों के साथ 'मार्निंग शो' में फिल्म देखने गया है।' मार्तण्ड सिंह ने उत्तर दिया।

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_ 'हमें उससे पूछने की कोई आवश्यकता भी नहीं।' सहसा मार्तण्ड सिंह की पत्नी ने कहा, 'हमें आपकी बात पर पूरा विश्वास है। अब मेरी समझ में आ गया है कि चंद्रभाल के इतने दिनों बाद लंदन से आते ही रजनी भी क्यों यहां आ धमकी है। कम्बख्त मेरे भोले-भोले लड़के पर डोरे डालकर इस घर की लक्ष्मी बन जाना चाहती है।' उन्होंने रजनी पर दांस पीसे। बात उन्होंने जारी रखी। अपने पति से बोलीं, 'आप उस चुडैल के साथ उसके बाबा को भी कोठी से निकाल बाहर कीजिए। लगता है, नाना और नातिन दोनों ही इस साजिश में शामिल हैं 1'

'हां, वही कर रहा हूं।' मार्तण्ड सिंह ने गंभीरतापूर्वक कहा। इस रामय चंद्रभाल कोठी में नहीं था। माली तथा रजनी को कोठी से निकाल बाहर करने का यह समय उन्हें बहुत उचित लगा। उन्होंने खड़े होते हुए एक नौकर द्वारा माली को बैठक में तुरंत उपस्थित होने की आज्ञा भेजी। फिर अंदर के कमरे की ओर बढ़ गए। कुछ क्षणों बाद जब वह वापस आए तो उनके हाथ में नोटों की एक गड्डी थी। उनकी पत्नी कुछ समझ नहीं सकीं, परन्तुं वह जानती थीं कि उनके पति जो भी करेंगे, बहुत समझदारी से करेंगे, इसीलिए वह चुप ही रहीं। मन ही मन वह रजनी को कोसने लगीं। यदि उन्हें ज्ञात होता कि एक तुच्छ नौकर की संतान उनकी बराबरी करने का सपना देखने लगेगी तो वह उसे बचपन से ही इस कोठी में नहीं फटकने देतीं।

बाबा मार्तण्ड सिंह के सामने उपस्थित हुआ तो तीन गंभीर चेहरों की घूरती दृष्टि देखकर सहम गया। फिर भी उसने प्रणाम के लिए हाथ उठा लिए, परन्तु उसके प्रणाम का उत्तर किसी ने नहीं दिया। उल्टे घूरती निगाहों में शोले भड़क गए। बाबा का दिल कांप गया।

_ 'यह लो!' सहसा मार्तण्ड सिंह ने धृणा तथा क्रोध से झिड़ककर बाबा की ओर नोटों की गड्डी फेंकी। फिर बोले, 'इस गड्डी में तुम्हारी मजदूरी से कहीं अधिक रुपये हैं। आज से तुम्हारा काम बंद। तुम इसी समय कौठी छोड़कर चले जाओ और भविष्य में इस ओर आने का कभी साहस भी नहीं करना।'

बाबा को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। यह आज मालिक को बैठे-बिठाए क्या हो गया? फटी-फटी आखों से उसने तीनों मूर्तियों को देखा। फिर साहस करके उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, 'मालिक, मैंने वर्षो आपका नमक खाया है। मैं आपकी आज्ञा को कभी नहीं टाल सकता। परन्तु इससे पहले कि मैं इस कोठी को छोड़कर जाऊं मेरा दोष तो मुझे बता दीजिए।'

'अगर तुमको अपना दोष नहीं ज्ञात है तो जाकर अपनी नातिन से पूछो, जो अपनी औकात भूलकर इस कोठी का महारानी बनने का सपना देख रही है।' मातंण्ड सिंह क्रोध में और भड़क उठे।'

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बाबा को अपने कानों पर फिर विश्वास नहीं हुआ। क्या उसकी बिटिया कभी ऐसा भी सोच सकती है? उसकी आंखों में वह दृश्य घूम गया, जब कुंवर साहब की पार्टी की शाम रजनी ने अपने-आपको विशेष रूप से सजाया-संवारा था। तब उसने रजनी को उस दिन टोका भी था। उस दिन तो रजनी उसका पत्र पाकर आई थी। रजनी उसे अस्वस्थ समझकर नहीं, वरन् कुंवर साहब से मिलने आई थी। उसके अंदर क्रोध की आग भड़क उठी। उसकी बच्ची उसी से चाल चलने लगी। उसने अपने पगों के समीप पड़ी हुई नोटों की गड्डी देखी। उसने गड्डी को झुककर उठा लिया। फिर उसे एक ओर मेज पर रखा। बोला, 'मालिक, आपकी कृपा यूं भी हम पर कम नहीं रही है। अब और अधिक मुझ पर दया मत कीजिए। बिना इसके भी मैं आपकी आज्ञा का पालन तुरंत करूंगा।' बाबा ने कहा। वह पलटा और फिर तेजी के साथ बैठक से बाहर निकल गया।

'हूंह!' मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी ने घृणा से मुंह बनाया। बोली, 'अपनी वफादारी का सबूत देकर मालिकों का दिल जीतना तो कोई इन मक्कारों से सीखे।'
 
रजनी अपने क्वार्टर में चारपाई, पर निश्चिन्त बैठी चावल बीन रही थी। पिछली रात अपने कुंवर साहब की कहीं बातें याद करके वह मन-ही-मन खिले उठती थी। प्रसन्नता जब संभलती नहीं तो होंठों पर मुस्कान बनकर छलक आती है। आंखों में एक स्वप्न था, जिसके पूरा होने का दिल को अब पूरा विश्वास था।

सहसा कमरे में बाबा प्रविष्ट हुआ। क्रोध से उसका बुढा शरीर कांप रहा था। आंखों में क्रोध के साथ आंसू भी थे, इसलिए नहीं कि जिस कोठी की उसने इतने दिन सेवा की, उसे छोड़कर जाना पड़ रहा था, वरन् इसलिए कि जिस बच्ची को उसने छाती से लगाकर पाला-पोसा था,

उसके कारण उसे लज्जित होना पड़ा था। रजनी के सामने जाकर वह खड़ा हो गया। रजनी ने उसके मुख की ओर दृष्टि उठाए बिना ही पूछा, 'क्यों बुलाया था मालिक ने बाबा?' चावल वह उसी प्रकार बीनती रही।

बाबा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह उसी प्रकार खड़ा रहा तो रजनी ने दोबारा अपनी बात पूछने के लिए बाबा की ओर मुख उठाया परन्तु वह बाबा की स्थिति देखते ही चौंक गई। शब्द उसके होंठों में रह गए। दिल बहुत जोर से धड़क गया।

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'मूर्ख लड़की बाबा अचानक ही दांत पीसकर रजनी पर झपट पड़ा। रजनी कांप गई। चावल की थाली उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ी। दाने फर्श पर बिखर गए। अपना बचाव करने के बजाए उसने अपना मुख दूसरी ओर फेर लिया और बाबा की ओर पीठ करके चारपाई पर झुक गई। बाबा ने अपने बूढ़े तथा निर्बल हाथों से रजनी की पीठ तथा कंधे पर बुरी तरह मारना आरंभ कर दिया। वह मारता जा रहा था और कहता जा रहा था कि बड़ी होकर तू उनके बेट का दिल बहलाए? क्या तू इसीलिए यहां आई थी?

परन्तु रजनी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह बाबा के क्रोध का कारण समझ गई थी। अपने बचाव में उसने कुछ भी नहीं किया। वह मार खाती गई। 'मालूम होता कि तू बड़ी होकर हमारी इज्जत से खेलेगी तो बचपन में तेरा गला घोंट देता।'

इस मारधाड़ को सुनकर कुछेक नौकर-चाकर वहां आ गए। बाबा ने तब भी रजनी को मारना नहीं छोड़ा तो नौकरों को बीच-बचाव करना ही पड़ा। बाबा को उन्होंने पकड़ लिया। वे लोग वास्तविकता से अनभिज्ञ थे। रजनी तब भी उसी प्रकार दूसरी ओर मुख किए बैठी आंसू बहाती रही। बाबा को रजनी पर हाथ उठाने से समय मिला तो रजनी की एक सिसकी उसके कानों में पिघले सीसे के समान जा पड़ी। उसके दिल पर छाले पड़ गए। वह तड़प उठा। उसने वास्तविकता का आभास किया।

आह! यह उसने क्या किया? क्रोध में मारते समय उसने यह भी नहीं सोचा कि उसकी बिटिया फूल के समान है? आखिर क्या दोष है इस बच्ची का? ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। उसने ठंडे मन से सोचा तो उसके कानों में वे शब्द गूंज गए, जो चंद्रभाल ने लंदन से आने के बाद अगली सुबह उससे कहे थे--रजनी को पत्र लिखना तो सूचित कर देना कि मैं आ गया हूं। बाबा को उन बातों का महत्व अब पता चला। बाबा का दिल छलनी होने लगा। इच्छा हुई कि अपने इन हाथों को तोड़ डाले, जिनसे उसने अपनी निर्दोष बिटिया को मारा है। उसके हाथ कांपने लगे तो लज्जित-सा रजनी के पास आया। उसके समीप बैठते हुए उसने रजनी की पीठ पर हाथ रखा-बहुत प्यार से। बाबा ने रंधे गले से कहा, 'बेटी अपने बाबा को क्षमा...।'

रजनी और अधिक बाबा की बात नहीं सुन सकी। बाबा का प्यार मिला तो वह पलटकर बाबा की गोद में गिर पड़ी। फूट-फूटकर वह रो पड़ी। उसकी हिचकियों से उसका शरीर कांप-कांप जाता था। नौकरों ने यह स्थिति देखी तो उनका दिल भी भर आया।

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कुछ देर बाद जब बाबा तथा रजनी की स्थिति समझी तो बाबा ने नौकरों को बता दिया कि उसे नौकरी से हटा दिया गया है। क्वार्टर तुरंत छोड़ने की आज्ञा मिली है। किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। कारण? वह बहुत बुढा हो गया है। अब ठीक से काम नहीं होता। नौकरों को इसका दुःख हुआ। इतने पुराने । नौकर को एकदम से यूं नहीं निकालना चाहिए था। परन्तु रजनी जानती थी कि उसके बाबा को क्यों कोठी छोड़नी पड़ रही है। उसके प्यार का भेद खुल गया है। अंशु ने ही यह भेद जागीरदार साहब पर खोला होगा। उसी ने उनके प्यार की चोरी पकड़ी थी-पिछली शाम ही।
 
रजनी ने आशा की कि उसके कुंवर साहब उससे मिलने अवश्य आएंगें। उसके बाबा की चीखों का चंद्रभाल के कमरे तक पहुंचना स्वाभाविक था, परन्तु चंद्रभाल नहीं आया। उसके चलते-चलते भी चंद्रभाल नहीं आया तो रजनी का दिल टूट गया। उसका चांद अपनी रजनी को विदा होते क्यों,नहीं देखना चाहता? क्या यही है उसका प्यार? रजनी अपने हाथ में सूटकेस संभाले बाबा के साथ क्वार्टर से बाहर निकली तो उसने कोठी के पिछले भाग पर दृष्टि बिछा दी। कितनी अधिक अभिलाषाएं उसकी आखों में दम तोड़ रही थी। कहा है रजनी का चंद्रमा, जो जीवन भर उसका साथ देने के वायदे किया करता था? रजनी का चंद्रमा तो अपनी रजनी को विदा होते देखकर फीका पड़ जाता है। तारों के समान वह भी शबनम के आंसू बहाने लगता है। परन्तु आज रजनी के चंद्रमा ने तो उसे एक बार झांककर भी नहीं देखा। आखिर क्यों? कोठी के इस भाग से तो उसके जीवन की अमिट याद बंधी हुई है। यड़ हरा-भरा लॉन, फूल और फुलवारियां, दूसरी मंजिल का बारजा, चंद्रमाल के कमरे की खिड़की, खिड़की के द्वारा कमरे के अंदर झांकते हुए हरसिंगार को रजनी ने देखा, रात में खिलने वाले फूल इस समय पेड़ के कदमों में बिछे मुरझा रहे हैं। रजनी ने सोचा, क्या उसका जीवन भी उन फूलों के समान नहीं है?



00 ……………………..

दिन का लगभग एक बजना चाहता था। चंद्रभाल जब अपनी कोठी में प्रविष्ट हुआ तो उसके माता-पिता बैठक में बैठे हुए थे-बहुत खामोश। कार के आने की आवाज सुनते ही उन्होंने खामोशी धारण कर ली थी। निर्भय सिंह को एक घंटा हो गया था, परन्तु जाने से पहले उन्होंने अपने दिल का भय दूर करने के लिए अगले ही दिन अंशु तथा चंद्रमाल की मंगनी तय करा दी थी। मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी को अंशु इतनी अधिक प्यारी थी कि वे भी उसे चिन्तित न करने के लिए इस मंगनी पर तैयार हो गए थे 1 उनके विचार में चंद्रभाल उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई निर्णय नहीं ले सकता था 1

चंदभाल ने जब अपने माता-पिता को देखा तो उसे उनकी खामोशी बड़ी भेद-भरी लगी। उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। अपने कमरे की ओर बढ़ते उसके कदम सुस्त पड़ गए। मन हुआ, माता-पिता से पूछे कि अंशु तो नहीं आई थी, उसका कोई फोन तो नहीं आया, परन्तु उसने कुछ पूछना उचित नहीं समझा। कुछ बात होती तो वे स्वयं ही उसे बताते। उसके सुस्त कदमों में स्फूर्ति आ गई। वह आगे बढा और सीढ़ियां चढ़ता हुआ दूसरी मंजिल की ओर निकल गया। अपने कमरे में पहुंचकर कोट उतारता हुआ वह खिड़की पर आया। हरसिंगार की टहनियों के बीच में उसने रजनी के द्वार पर देखा। द्वार खुला हाआ था-खिड़की भी पूर्णतया खुली हुई थी। चारपाई तथा कुर्सी-मेज की उसे झलक दिखाई पड़ी। वह मुस्करा दिया, रजनी से रात में मिलने की प्रतीक्षा में। परन्तु जाने क्यों, दिल की धड़कनों को चैन नहीं मिल रहा था 1 उसे बाबा का क्वार्टर सूना-सा लग रहा था। उसने खिड़की से इधर-उधर देखा, न ही बाबा दिखाई दिया न रजनी। उसने कोट उतारकर पलंग पर फेंका। टाई उतारते हुए उसने अपने दिल की बेचैनी का भेद जानना चाहा। कुछ समझ में नहीं आया। उसने कुछ क्षण सोचा। फिर टाई एक ओर फेंककर वह रजनी के क्वार्टर की ओर बढ़ गया।

वह क्वार्टर के सामने पहुंचा। अन्दर झांक। क्यार्टर में किसी के उपस्थित होने की आहट तक नही मिली। क्वार्टर पूर्णतया खुला छोड़कर दोनों आखिर कहां चले गए?

सहसा बगल के क्वार्टर्स से गंगू ड्राइवर निकला। चन्द्रभाल को देखकर उसने प्रणाम किया। फिर पूछा, क्या आप किसी को ढूंढ रहे हैं मालिक?'

'यह..' चंद्रभाल रजनी के लिए पूछते-पूछते रह गया। बात बदलकर उसने पूछा, यह माली कहां चला गया?,

वह तो चला गया मालिक !' गंगू ने उत्तर दिया, उसे गए तो एक घंटे से भी ऊपर हो गया है।

'चला गया! कहां?' चंद्रभाल ने चौंकते हुए पूछा। दिल की घड़कन काबू से बाहर होने लगी।

'अपने गांव, अपने देश ही गया होगा मालिक!

'क्या मतलब? चंद्रभाल को विश्वास ही नहीं हुआ। आपको नहीं मालूम क्या?' गंगू ने उससे पूछा। फिर भेद-भरे ढंग से बोला, 'मालिक ने उसे निकाल दिया है। कोठी तुरंत-हीं खाली करने की आज्ञा दी थी, इसीलिए चला गया।'
 
चंद्रभाल क्षण भर के लिए सुन्न रह गया। अकारण ही उसके दिल की धड़कन तेज नहीं हुई थी। अकारण ही उसे आगाही नहीं हुई थी। प्यार में ऐसा ही होता है। निश्चय ही अंशु ने इस घर में कोई आग लगाई है। तभी उसके माता-पिता की खामोशी उसे इस समय भेद भरी लगी थी। उसका दिल रजनी के विषय में भी सब कुछ जान लेने को तड़प उठा। उसने पूछना चाहा और वह रजनी..' परन्तु इससे आगे वह कुछ नहीं कहा सका।

'वह भी अपने बाबा के साथ चली गई।' गंगू ने कहा, 'जाते समय बाबा ने उसे बहुत मारा था, पता नहीं, क्यों!' 'मारा था?' चंद्रभाल को वास्तविकता समझ में आने लगी।

'जी हां, मालिक, बहुत अधिक मारा था।' गंग ने फिर कहा।

चंद्रभाल की छाती में दर्द उठने लगा। उस फूल-सी लड़की ने निश्चय ही केवल उसी से प्यार करने के कारण मार खाई है। अंशु ने उसके प्यार का भांडा फोड़ ही दिया है। चंद्रभाल ने मन-ही-मन अंशु को धिक्कारा। सहसा उसकी मुट्ठियां कस गईं। मस्तक पर बल पड़ गए। उसने तय कर लिया, अब वह अपने पिता से खुलकर अपने दिल की बात कह ही देगा। उन्हें बता देगा कि वह रजनी से प्यार करता है, अंशु से नहीं। आज उन्हें उसके पक्ष में निर्णय लेना ही मड़ेगा। वह इस कुल का एकमात्र उत्तराधिकारी है। आखिर उसे भी तो अपनी इच्छाओं को पूरा करने का कोई अधिकार पहुंचता है। क्रोध में वह एक झटके के साथ पलटा और फिर तेज कदमो से कोठी की ओर बढ़ गया।

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वह बैठक में पहुंचा। उसके माता-पिता मानो उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। चंद्रभाल क्रोध से दीवाना हो रहा था। उसने गरजकर कहा, 'पिताजी!' परन्तु चंद्रभाल ने फिर स्वयं को संभाल लिया। उसने नम्रता से काम लिया। पूछा, 'पिताजी, क्या यह सच है कि आपने माली को निकाल दिया है?'

'यह बिल्कुल सच है।' मार्तण्ड सिंह ने कुछ सख्ती के साथ कहा, 'हम अपनी कोठी के पर्दो में टाट का पैबन्द कभी नहीं लगाते।'

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..

'लेकिन पिताजी... चंद्रभाल ने कहना चाहा।

'चंद्रभाल! सहसा उसकी माताजी ने कहा, 'तुम्हारे पिता ने जो भी किया है, बिल्कुल ठीक किया है।'

'लेकिन मां...।' चंद्रभाल ने तड़पकर मानो विनती करते हुए अपने प्यार का भेद खोला। बोला, 'मां, मैं रजनी से प्यार करता हूं।'

'खामोश!' मार्तण्ड सिंह ने अपने ही सामने अपने बेटे के मुख से रजनी के विषय में ऐसी बात सुनी तो भड़क उठे।'

'बेटे!' मां ने बेटे का साहस देखा तो उसे नम्रता से समझाया। बोलीं, 'जिसे तुम प्यार कह रहे हो वह एक बचपना है, मूर्खता है। इस बात का तुम्हें आज नहीं, बाद में ज्ञान होगा।'

'नहीं मां, नहीं...नहीं...।' चंद्रभाल ने मानो स्वयं से कहा। घर वालों को अपनी इच्छा के इतना अधिक विरुद्ध देखकर उसका स्वर भीग गया था। उसने बात जारी रखी। बोला, 'ऐसी बात नहीं है। दरअसल मेरा बचपन ही मेरे प्यार की नींव है। मैं रजनी के बिना नहीं रह सकता। मैं उसे प्यार करता हूं, केवल उसे। मैं...मैं उसे लेने जा रहा हूं।' चंद्रभाल जाने को पलटा।

'चंद्रभाल!' मार्तण्ड सिंह क्रोध में चीखकर खड़े हो। गए, यदि तुम रजनी के पास जा रहे हो तो उसे यहां लाने की कोई आवश्यकता नहीं। समझ लेना कि इस कोठी के दरवाजे तुम्हारे लिए सदा के लिए बंद हो चुके 'चंद्रभाल ने एक क्षण सोचा। फिर सिर झटककर आगे बढ गया-अपने माता-पिता की ओर बिना देखे ही।

'ठहरो बेटा!' चंद्रभाल की मां से नहीं रहा गया। उठकर वह चंद्रभाल की ओर बड़ी। उनके स्वर में ममता थी। चंद्रभाल रुक गया। मां चंद्रभाल के सामने आई। चंद्रभाल ने मां को बड़ी आशापूर्ण दृष्टि से देखा। मां ने मानो विनती की। बोलीं, इस प्रकार घर छोड़कर मत जाओ बेटे! अंशु के लिए हम निर्भय सिंह को वचन दे चुके हैं। कल अंशु के साथ तुम्हारी मंगनी भी निश्चित कर दी गई है।

'क्या?' चंद्रभाल को विश्वास ही नहीं हुआ। घरवालों ने उसे बताए बिना ही उसकी मंगनी निश्चित कर दी और वह भी उसकी पसन्द के विरुद्ध!

'हां बेटा!' मां ने उसे प्यार से कहा, 'निर्भय सिंह आज ही आए थे, इसी बात का निर्णय करने, मंगनी की तिथि निश्चित करने। आखिर वह भी तो मान-मर्यादा वाले हैं। आखिर किस आशा में वह अंशु को कुंवारी रखते हुए तेरी प्रतीक्षा करते?'
 
'हां बेटा!' मां ने उसे प्यार से कहा, 'निर्भय सिंह आज ही आए थे, इसी बात का निर्णय करने, मंगनी की तिथि निश्चित करने। आखिर वह भी तो मान-मर्यादा वाले हैं। आखिर किस आशा में वह अंशु को कुंवारी रखते हुए तेरी प्रतीक्षा करते?'

चंद्रभाल सोच में पड़ गया-तो यह अंशु नहीं, निर्भय सिंह थे जिन्होंने उसके घर में आग लगाई हैं तथा बाबा और रजनी को कोठी से निकलवाया है! निश्चय ही अंशु ने अपने पिता को उसकी तथा रजनी की सारी बातें बताई होंगी और इसीलिए निर्भय सिंह ने अपनी बेटी की खुशियों में आने वाले सारे कांटों को जड़ से उखाड़ फेंकना आवश्यक समझ लिया होगा।

'बेटा!' चंद्रभाल के विचारों से अनजान मां को बेटे से आशा बंधी। उन्होंने कहा, यदि मंगनी कल नहीं हुई तो हम निर्भय सिंह को अपना मुंह दिखाने योग्य नहीं रहेंगे। हम उन्हें तेरे लिए वचन दे चुके हैं।'

चंद्रभाल ने इंकार में सिर हिलाया, इस तरह, मानो वह मां की बातों से सहमत नहीं था। उसने कहा, मां, तुम्हें अपने दिए वचन की इतनी अधिक चिन्ता है, परन्तु तुमने कभी उस वचन के लिए सोचा, जो मैं रजनी को दे चुका हूं? यह मेरे जीवन का प्रश्न है। मुझे अपने जीवन के विषय में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। मुझे जाने दो मां! मुझे मत रोको।' चंद्रमाल पलटा और फिर तेजी के साथ द्वार से बाहर निकल गया।

'ठहरो बेटे!' मां चंद्रभाल की ओर लपकी, 'बेटे, तू इस प्रकार घर छोड़कर मत जा। जाने से पहले हमें कुछ सोचने-समझने का अवसर दे। मैं तेरे पिता को समझाने का प्रयत्न करूंगी, रहा मंगनी का प्रश्न, तो अभी हम इसे स्थगित करने खे बहाने टाल देंगे। अब तो तू संतुष्ट है ना?'

चंद्रभाल के होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। मां से उसे बहुत सारी आशाएं बंध गईं।

'मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तुमने उसे रोका क्यों?' अपने शयनकक्ष में मार्तण्ड सिंह खिसियाए-से अपनी धर्मपत्नी से कह रहे थे -अपने बेटे चंद्रभाल के लिए, 'यदि वह जा रहा था तो जाने देतीं। उसे जब हमारी इज्जत का ध्यान नहीं तो हम उसकी इच्छाओं का कैसे ध्यान रख सकते हैं?

मां ने कहा, 'कैसे जाने देती? क्या उसके बिना मेरी गोद सूनी नहीं हो जाती? उसके बिना क्या आपका दिल भी सूना नहीं हो जाता? क्या हमने उसे इसीलिए इतने लाड़-प्यार से पाला था कि वह हमें छोड़कर चला जाए?'

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'तुम कहना क्या चाहती हो?' मार्तण्ड सिंह ने कहा, क्या तुम यह चाहती तो कि उसकी मूर्खतापूर्ण इच्छा का आदर करते हुए हम एक दो कौड़ी की लड़की को अपनी बहू बना लें? अपने टुकड़ों पर पली हुई एक लड़की को इस वंश की लक्ष्मी बना लें?

'मैं यह नहीं कहती।' उनकी धर्मपत्नी ने कहा, 'मैं तो केवल यह चाहती हूं कि अभी बेटे की मंगनी स्थगित कर दीजिए, ताकि इस बहाने वह इस घर में रहे सके। रजनी जा चुकी है इसलिए जब वह उस लड़की से कुछ दिनों तक नहीं मिलेगा तो प्यार का भूत उसके सिर पर से स्वयं ही उतर जाएगा। इधर जब वह रजनी के न रहने से अंशु से मिलेगा तो अंशु में उसका दिल अवश्य लग जाएगा।'

मार्तण्ड सिंह कुछ क्षण सोचते रहे। दूरियां तथा नजदीकियां अपना-अपना रंग अवश्य दिखाती है। दूर रहकर मनुष्य को मनुष्य आसानी से भूल जाता है। पत्नी की बात से वह पूर्णतया सहमत थे।

मार्तण्ड सिंह ने निर्भय सिंह से फोन पर मंगनी स्थगित करने की बात छेड़ना उचित नहीं समझा। इसके लिए उन्हें ,आराम से समझाने की आवश्यकता थी।

मार्तण्ड सिंह शाहदरा में निर्भय सिंह की कोठी पर पहुंचे। वह बैठक में जाकर एक लम्बे सोफे पर बैठ गए। नौकर अंदर के कमरे में अंशु को उनके आने की सुचना देने चला गया।

क्षण भर में ही वहां अंशु आ गई-मुस्कराती हुई। अंशु का मुखड़ा खिला हुआ था। आखों में अभिलाषाओं की अगणित किरणें चमक रही थी। निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह रहे यहां से लौटकर जैसे ही अंशु को बताया था कि चंद्रभाल का रजनी के साथ कोई प्यार का चक्कर नही है, वह सब एक खेल था, तो अंशु की चिन्ता दूर हो गई थी। निर्भय सिंह ने जब यह भी यह बताया था कि कोठी में आने वाली बहू की प्रसन्नता का पूरा ध्यान रखकर रजनी को उसके बाबा सहित कोठी से तुरंत । निकालकर बाहर कर दिया गया है तो अंशु की सारी चिन्ता दूर हो गई थी और जब निर्भय सिंह ने अंशु को यह बताया था कि अपनी होने वाली बहू को किसी प्रकार के भ्रम में न रखने के लिए अगले ही दिन चंद्रभाल की मंगनी उसके साथ कर दी जाएगी तो अंशु का मुखड़ा चंद्राशु बनकर चमक उठा था। इस समय जब अंशु बैठक में प्रविष्ट हुई तो उसका तेजस्वी मुखड़ा देखकर मार्तण्ड सिंह सोचे बिना नहीं रह सके कि आखिर अंशु में क्या कमी है जो उनका बेटा अपने ही नौकर की नातिन के पीछे दीवाना हुआ जा रहा है? जागीरदारों की बात ही अलग होती है। खानदानी तेज मुख से ही चमकता है।
 
अंशु कहती हुई आगे बढ़ रही थी, 'पिताजी तो नहीं हैं अंकल परन्तु आपको उनके लिए अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। वह बस आते ही होंगे।' अंशु मार्तण्ड सिंह को अंकल ही कहा करती थी। उसने आगे बढ़कर मार्तण्ड सिंह के पांव छू लिए। मार्तण्ड सिह ने उसे आशीर्वाद दिया। उसे प्यार से अपने पास ही बिठा लिया। उसके सिर पर उन्होंने हाथ रखकर कहा, 'बेटी, इस बात का हमें बहुत दुःख है कि चंद्रभाल की मूर्खता के कारण कल पार्टी की तेरी शाम खराब हो गई। परन्तु अब ऐसा कभी नहीं होगा। तुझे तो हम पहले ही अपनी बहू स्वीकार कर चुके हैं। हमारे कुल की लक्ष्मी है तू। जब तू सदा के लिए हमारे घर की इज्जत बनकर आ जाएगी, तब चंद्रभाल को तेरा मूल्य पता चलेगा।' अंशु लजाकर अपने आने वाले दिनों के सपनों में खो गई।

सहसा मार्तण्ड सिंह को एक बात सुझी। मंगनी स्थगित करने के विषय में वह क्यों न अंशु से बात करें। अंशु आधूनिक लड़की है। वह उनकी विवशता समझने का पूरा प्रयत्न करेगी। वह लंदन में चंद्रभाल के साथ तीन वर्ष रही है। वह चंद्रभाल के स्वभाव से भी भली प्रकार परिचित है। अंशु को मंगनी की तिथि स्थगित होते जानकर दुःख होना स्वाभाविक था, परन्तु जिस प्रकार वह अंशु को समझा सकते थे उस प्रकार निर्भय सिंह को नहीं समझा सकते थे। अंशु उनकी बेटी के समान थी। उन्होंने उससे बहुत प्यार से पूछा, 'बेटी, तू मेरे बेटे को बहुत प्यार करती है ना?' मार्तण्ड सिंह के पूछने का ढंग भेद भरा था।

अंशु का दिल अचानक ही धड़क उठा। उसके प्यार में क्या कोई नया भेद उत्पन्न हो गया है? उसके मुख पर इस प्रकार गंभीरता छा गई, जैसे चंद्रांशु पर काली बदलियां छा जाने के बाद वातावरण में गंभीरता आ जाती है। उसने अपनी पलकें झुका ली। फिर खामोशी के साथ हां के संकेत पर सिर हिला दिया।

'और हम पति-पत्नी को भी अपने सास-ससुर के समान ही सम्मान देती है ना?' मार्तण्ड सिंह ने फिर पूछा।

__ अंशु ने दोबारा उसी प्रकार सिर झुकाए हां' के संकेत पर सिर हिला दिया। मार्तण्ड सिंह की बातें उसे पहेलियों के समान लग रही थीं।

मार्तण्ड सिंह ने अंशु का हाथ पकड़कर बहुत प्यार से अपनी दोनों हथेलियां के बीच रखा। फिर बोले, तो फिर बेटी, मेरी बात का भी विश्वास करना। जो तू चाहती है, वही हम भी चाहते हैं और करके भी दिखा देंगे-मेरा मतलब, तेरा और चंद्रभाल का विवाह ।' मार्तदण्ड सिंह ने कहा, 'बात दरअसल यह है कि मेरा मूर्ख लड़का अभी तक उइस नीच लड़की के चंगुल में फंसी हुआ है और रजनी के कोठी छोडने से पहले मंगनी से इंकार कर बैठा है। परन्तु बेटी तू घबरा मत, उसका यह इंकार केवल कुछ ही दिनों के लिए है। यदि तू चंद्रभाल को वास्तव में प्यार करती है और अगर तुझे विश्वास है कि तू केवल उसी के साथ सुखी रहेगी तो बेटा, तुझे सब से काम लेना पडेगा।' मार्तण्ड सिंह ने गहरी-गहरी सांस ली।

अशु ने सुना तो दिल धक्क से रह गया। आंखें भी छलक आई। यह कैसा प्यार है जो वह तो चंद्रभाल से कर रही है, परन्तु वह है कि उसके बजाए एक पराई लड़की को अपने दिल में बसाए हुए है, क्या यह उसके प्यार अपमान नहीं है? अंशु के आंसू उसकी आखों में से छलककर गालों पर बह आए। इन आंसुओं को देखकर मार्तण्ड सिंह तड़प उठे। उनके घर की लक्ष्मी बनने से पहले ही इस बच्ची की आखों से औसू बह रहे हैं? उनका मन हुआ, वह अंशु को तुरंत अपनी गाड़ी में बिठाकर अपनी कोठी ले जाएं और इसी समय उसका हाथ बेटे के हाथ में जबरदस्ती थमाकर उसे अपनी बहू बना लें, परन्तु जोश में आकर जल्दबाजी से काम बिगड़ सकता था। बोले, अंशु बेटी, जब चंद्रभाल के पास अपनी प्रसन्नताएं, अपना सुख और शांति लाने का कोई साधन नहीं रहेगा तथा जब तेरे पास लौटने का उसके पास कोई अधिकार नहीं रहेगा तो तू देख लेना बेटी, वह निराश होकर निश्चय ही आत्महत्या कर लेगा।'

आत्महत्या! अंशु आत्महत्या के नाम पर ही कांप गई। जिस व्यक्ति को वह सच्चे मन से प्यार करती आई है, जिसकी उसने पूजा की है तथा जिसके साथ अपना स्वर्ग बनाने का सपना देखा है, वह आत्महत्या कर लेगा तो क्या उसकी अपनी भी अभिलाषाओं की हत्या नहीं हो जाएगी? चंद्रभाल के बिना उसका अपना जीवन नरक नहीं बन जाएगा? रजनी की वास्तविकता से अनभिज्ञ उसने निश्चित कर लिया कि वह चंद्रभाल की चंद्राशु बनकर उस पर छा जाएगी। अब उसके सच्चे प्यार की परीक्षा की घड़ी आ पहुंची है और वह इसमें निश्चय ही सफल होकर दिखा देगी।

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"बेटी... मार्तण्ड सिंह ने अंशु को विचारों में तल्लीन देखा तो पूछा, 'मैं तुमसे कुछ आशा रखू?'

अंशु ने मुख झुकाए अपने आंसू पोंछे। फिर हां' में सिर हिलाया।

'जीती रहो बेटी, जीती रहो! मार्तण्ड सिंह ने उसे एक पिता समान अपनो छाती से लगा लिया। ऐसी परिस्थितियों में पड़ने के बावजूद अंशु उनकी बडू बनने को तैयार थी, यह उनके लिए बड़े सौभाग्य की बात थी।
 
सहसा कोठी के अंदर कार के प्रविष्ट होने का स्वर सुनाई पड़ा। अंशु ठीक से बैठ गई। उसने अपनी आखों का रहा-सहा भीगापन अपनी साड़ी के आंचल से पोंछ डाला। अपनी स्थिति पर वह काबू पाने का प्रयत्न करने लगी। कुछ क्षण बाद बैठक में निर्भय सिंह प्रविष्ट हुए। पोर्टिको में मार्तण्ड सिंह की विदेशी गाड़ी देखकर वह चौंक गए थे। सुबह तो वह मार्तण्ड सिंह के साथ थे, फिर अभी उन्हें यहाँ आने की कैसे आवश्यकता पड़ी? ऐसा तो नहीं कि चंद्रभाल स्वयं ही यहां आकर मंगनी से इंकार कर देना चाहता है?

उनका दिल एक अज्ञात भय से धड़क उठा।

'आओ भई निर्भय सिंह को देखते ही मार्तण्ड सिंह ने चहककर कहा, 'मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।'

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'तुम्हारा इस समय यहां कैसे आना हो गया?' एक सोफे पर बैठते हुए निर्भय सिंह ने पूछा। उन्होंने अंशु का गंभीर मुख देखा तो उन्हें दाल में कुछ काला दिखाई पड़ा। 'भई...दरअसल बात यह है कि...।' मार्तण्ड सिंह को समझ में नहीं आया कि कैसे वह समझाएं। फिर भी उन्होंने कहा, 'कल यह मंगनी नहीं हो सकती।'

निर्भय सिंह के मस्तक पर बल पड़ गए। मन-ही-मन क्रोध में सोचा कि क्या यह गुड्डे-गुड़िया का खेल है कि जब चाहा तिथि निश्चित कर दी और जब चाहा स्थगित कर दी? उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा, 'क्यों?'

'चंद्रभाल अभी इसके लिए तैयार नहीं है।' मार्तण्ड सिंह ने कहा, वैसे मैंने अंशु बेटी पर अपनी विवशता प्रकट कर दी है और यह मंगनी की तिथि स्थगित करने पर पूर्णतया सहमत है।'

निर्भय सिंह ने अंशु को देखा। बात कुछ भी समझ में नहीं आई। मन ही मन वह बल खाकर मार्तण्ड सिंह पर दांत पीसने लगे। यदि उनके पास पहले जैसी शान-शौकत होती, यदि वह महाजनों तथा साहूकारों के कर्जदार नहीं होते तो आज अपनी बेटी तथा सम्मान के लिए मार्तण्ड सिंह को धक्के देकर कोठी से बाहर निकाल देते। परन्तु आज उनकी आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि वह कुछ भी न कर सकने पर विवश थे। उन्होंने कहा, 'ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा, परन्तु अधिक दिनों तक मंगनी नहीं टलनी चाहिए।' उन्होंने मानो अपनी मान-मर्यादा को स्थिर रखने के लिए सावधान किया।

'मैं जानता हूं इस समय तुम कैसा महसूस कर रहे हो।' मार्तण्ड सिंह ने चलने के लिए खड़े होते हुए कहा,

'परन्तु जिस प्रकार अंशु तुम्हारी बेटी है, उसी प्रकार मेरी भी बेटी है। जब यह मेरे घर की लक्ष्मी बनकर आ जाएगी तो तुम देख लेना, इसके दामन में मैं इतनी सारी प्रसन्नताए भर दूंगा कि इस लड़की से संभाले नहीं संभलेंगी।'

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निर्भय सिंह को और चाहिए भी क्या था! परन्तु वह अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के कारण खामोश ही रहे।

मार्तण्ड सिंह बरामदे की ओर बढ़े तो उनके साथ में निर्भय सिंह भी हो लिए। अंशु अंदर के कमरे में चली गई। बरामदे की सीरिया उतरने से पहले मार्तण्ड सिंह ने कहा, 'मंगनी की तिथि स्थगित करते हुए जिस शर्मिंदगी का एहसास मुझे हो रहा है, शायद तुम यह नहीं समझ सकते, लेकिन क्या करूं, मेरा बेटा ही ऐसा नालायक...।'

'देखा ठाकुर !' निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह की बात काटते हुए गंभीरता छोड़ना आवश्यक समझा। उनकी गंभीरता के कारण उनके तथा मार्तण्ड सिंह के संबंध में कहीं तनाव न उत्पन्न हो जाए। मार्तण्ड सिंह से हर स्थिति में उन्हें अच्छा संबंध बनाए रखना था। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 'आइन्दा तुमने मेरे दामाद को कभी नालायक कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।'

ऐं!' मार्तण्ड सिंह चौंक गए। उनका मुंह खिल उठा। उन्होंने प्रसन्नता भरी दृष्टि से निर्भय सिंह को देखा। वह सोचे बिना नहीं रह सके कि इस कुल मैं कितना अधिक अपनत्व है, कितना अधिक लगाव है उनके कुल से, कितने अच्छे हैं ये बाप-बेटी, कि इस आड़े समय में भी उनका साथ दे रहे हैं!
 
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