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'हां।' गंगू ने कहा, 'जब भी होश में आते हैं, 'रजनी-रजनी' पुकार उठते हैं।' गंगू ने रजनी से विनम्र निवेदन करते हुए कहा, यदि तुम नहीं गईं बेटी, तो उस कुल का एकमात्र दीपक सदा के लिए बुझ जाएगा।' गंगू का स्वर भर आया। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा नहीं, होना चाहिए।' रजनी ने कांपकर मानो स्वयं से कहा। उसने अपने कुंवर साहब की स्थिति का अनुमान लगाया कि उसके कुंवर साहब उसके बिना कैसे रह सकते हैं! पिछली बार वह उसे कितने प्यार से लेने आए थे! काश, वह दुर्घटना नहीं होती तो आज...रजनी की आंखें छलक उठीं। आखिर कुंवर साहब के प्यार ने उन माता-पिता को अपनी इच्छा के आगे झुका ही लिया।
'यदि मालकिन को रजनी बिटिया की इतनी आवश्यकता थी तो रजनी को लेने वह स्वयं क्यों नहीं आई? क्या तुम भूल गए कि उन्होंने किस अपमान के साथ हमें अपनी कोठी से निकाला था?' बाबा ने जले दिल से पूछा।
'याद है, सब-कुछ याद है। इसीलिए तो वह नही आ सकीं।' गंगू ने कहा, 'कहने लगी कि मैं कैसे उन दोनों का सामना कर सकूँगी, जिनके साथ मैंने ऐसा दुर्व्यवहार किया है? इसके अतिरिक्त तुम्हीं सोचो, अपने बेटे को वह ऐसी स्थिति में कैसे छोड़ सकती हैं? मालिक भी हैं कि हर क्षण चिन्ता में डूबे रहते हैं।'
'बापू!' रजनी ने बड़ी आशा के साथ अपने पिता को देखा। उसने विनती की, 'क्या तुम मुझे केवल एक अवसर और नहीं दे सकते? केवल एक अवसर।'
हीरालाल सोच में पड़ गया। रजनी के लिए वह कुछेक घरों में बात कर चुका था। उसका विवाह भी कुछ ही दिनों में कर देना चाहता था। उसके विवाह की तैयारी भी उसने आरंभ कर दी थी। विवाह का जोड़ा तथा गहने भी बनवा लिए थे। इस तैयारी को होते देखकर रजनी ने कुछ भी नहीं कहा था। उसने प्रण कर रखा था कि बह विवाह करेगी तो केवल अपने कुंवर साहब से और किसी से भी नहीं। उसने सोच लिया था कि यदि उसके कुंवर साहब उसे लेने नहीं आए तो वह विवाह करने से पहले आत्महत्या कर लेगी। परन्तु हीरालाल अपनी बेटी के इस भयानक इरादे से अनभिज्ञ था। उसने सोचा, बेटी जब उसकी इच्छा पर विवाह करने को तैयार हो सकती है, तो वह भी क्यों न अपनी बेटी को उसकी इच्छा पूरी करने का एक अवसर और प्रदान करे? गंगू को वह भली-भांति जानता था। गंगू पर किसी प्रकार का संदेह करने के लिए वह कभी सोच भी नहीं सकता था। गंगू को स्वयं नहीं ज्ञात था कि वह क्या कर रहा है तो हीरालाल को कैसे ज्ञात होता? उसने रजनी के बाबा को देखा।
बाबा भी रजनी के पक्ष में ही सोच रहा था। कुछ भी हो, मालकिन ने उसके साझा जैसा भी व्यवहार किया था, परन्तु उसने उनका नमक खाया था-वर्षो नमक खाया था। अपनी संतान की घायल स्थिति देखकर किस मां का दिल नहीं तड़प उठेगा? उस घड़ी मालकिन तथा मालिक की आंखों में जो घृणा उसके तथा रजनी के प्रति समाई थी, वह स्वाभाविक ही थी। उसने चंद्रभाल को अपनी आंखों से फलते-फूलते देखा था। चंद्रभाल की स्थिति का अनुमान लगाकर उसका दिल भर आया था। उसने हीरालाल से कहा, 'मालकिन ने छोटे मालिक को अस्पताल ले जाते समय कहा था कि यदि उनके बेटे को कुछ हो गया तो वह जान दे देंगी।'
'बापू...।' रजनी को अपने बाबा से आशा बंधी तो उसने कहा, 'यदि तुमने मुझे कुंवर साहब के पास जाने नहीं दिया तो मैं कम्भो की सौगन्ध खाकर कहती हूं कि में आत्महत्या कर लूंगी।' घर में दो ही बहनें थीं। दोनों का एक-दूसरे को अत्यधिक प्यार करना स्वाभाविक ही था।
हीरालाल इस प्रकार चौंक गया, मानो कम्भो से अधिक प्रिय संसार में उसके लिए कोई वस्तु ही नहीं थी। कम्भो के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए उसने उसे अपने और समीप कर लिया। फिर बोला, 'ठीक है बेटी, जो भी तू कहती है, मैं मानने का तैयार हूं परन्तु इस बार बाबा नहीं, मैं तेरे साथ चलूंगा। यदि इस बार किसी ने तेरा अपमान किया तो मैं सहन नहीं करूंगा।'
'यदि मालकिन को रजनी बिटिया की इतनी आवश्यकता थी तो रजनी को लेने वह स्वयं क्यों नहीं आई? क्या तुम भूल गए कि उन्होंने किस अपमान के साथ हमें अपनी कोठी से निकाला था?' बाबा ने जले दिल से पूछा।
'याद है, सब-कुछ याद है। इसीलिए तो वह नही आ सकीं।' गंगू ने कहा, 'कहने लगी कि मैं कैसे उन दोनों का सामना कर सकूँगी, जिनके साथ मैंने ऐसा दुर्व्यवहार किया है? इसके अतिरिक्त तुम्हीं सोचो, अपने बेटे को वह ऐसी स्थिति में कैसे छोड़ सकती हैं? मालिक भी हैं कि हर क्षण चिन्ता में डूबे रहते हैं।'
'बापू!' रजनी ने बड़ी आशा के साथ अपने पिता को देखा। उसने विनती की, 'क्या तुम मुझे केवल एक अवसर और नहीं दे सकते? केवल एक अवसर।'
हीरालाल सोच में पड़ गया। रजनी के लिए वह कुछेक घरों में बात कर चुका था। उसका विवाह भी कुछ ही दिनों में कर देना चाहता था। उसके विवाह की तैयारी भी उसने आरंभ कर दी थी। विवाह का जोड़ा तथा गहने भी बनवा लिए थे। इस तैयारी को होते देखकर रजनी ने कुछ भी नहीं कहा था। उसने प्रण कर रखा था कि बह विवाह करेगी तो केवल अपने कुंवर साहब से और किसी से भी नहीं। उसने सोच लिया था कि यदि उसके कुंवर साहब उसे लेने नहीं आए तो वह विवाह करने से पहले आत्महत्या कर लेगी। परन्तु हीरालाल अपनी बेटी के इस भयानक इरादे से अनभिज्ञ था। उसने सोचा, बेटी जब उसकी इच्छा पर विवाह करने को तैयार हो सकती है, तो वह भी क्यों न अपनी बेटी को उसकी इच्छा पूरी करने का एक अवसर और प्रदान करे? गंगू को वह भली-भांति जानता था। गंगू पर किसी प्रकार का संदेह करने के लिए वह कभी सोच भी नहीं सकता था। गंगू को स्वयं नहीं ज्ञात था कि वह क्या कर रहा है तो हीरालाल को कैसे ज्ञात होता? उसने रजनी के बाबा को देखा।
बाबा भी रजनी के पक्ष में ही सोच रहा था। कुछ भी हो, मालकिन ने उसके साझा जैसा भी व्यवहार किया था, परन्तु उसने उनका नमक खाया था-वर्षो नमक खाया था। अपनी संतान की घायल स्थिति देखकर किस मां का दिल नहीं तड़प उठेगा? उस घड़ी मालकिन तथा मालिक की आंखों में जो घृणा उसके तथा रजनी के प्रति समाई थी, वह स्वाभाविक ही थी। उसने चंद्रभाल को अपनी आंखों से फलते-फूलते देखा था। चंद्रभाल की स्थिति का अनुमान लगाकर उसका दिल भर आया था। उसने हीरालाल से कहा, 'मालकिन ने छोटे मालिक को अस्पताल ले जाते समय कहा था कि यदि उनके बेटे को कुछ हो गया तो वह जान दे देंगी।'
'बापू...।' रजनी को अपने बाबा से आशा बंधी तो उसने कहा, 'यदि तुमने मुझे कुंवर साहब के पास जाने नहीं दिया तो मैं कम्भो की सौगन्ध खाकर कहती हूं कि में आत्महत्या कर लूंगी।' घर में दो ही बहनें थीं। दोनों का एक-दूसरे को अत्यधिक प्यार करना स्वाभाविक ही था।
हीरालाल इस प्रकार चौंक गया, मानो कम्भो से अधिक प्रिय संसार में उसके लिए कोई वस्तु ही नहीं थी। कम्भो के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए उसने उसे अपने और समीप कर लिया। फिर बोला, 'ठीक है बेटी, जो भी तू कहती है, मैं मानने का तैयार हूं परन्तु इस बार बाबा नहीं, मैं तेरे साथ चलूंगा। यदि इस बार किसी ने तेरा अपमान किया तो मैं सहन नहीं करूंगा।'