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Romance हरसिंगार/रानु

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'हां।' गंगू ने कहा, 'जब भी होश में आते हैं, 'रजनी-रजनी' पुकार उठते हैं।' गंगू ने रजनी से विनम्र निवेदन करते हुए कहा, यदि तुम नहीं गईं बेटी, तो उस कुल का एकमात्र दीपक सदा के लिए बुझ जाएगा।' गंगू का स्वर भर आया। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा नहीं, होना चाहिए।' रजनी ने कांपकर मानो स्वयं से कहा। उसने अपने कुंवर साहब की स्थिति का अनुमान लगाया कि उसके कुंवर साहब उसके बिना कैसे रह सकते हैं! पिछली बार वह उसे कितने प्यार से लेने आए थे! काश, वह दुर्घटना नहीं होती तो आज...रजनी की आंखें छलक उठीं। आखिर कुंवर साहब के प्यार ने उन माता-पिता को अपनी इच्छा के आगे झुका ही लिया।

'यदि मालकिन को रजनी बिटिया की इतनी आवश्यकता थी तो रजनी को लेने वह स्वयं क्यों नहीं आई? क्या तुम भूल गए कि उन्होंने किस अपमान के साथ हमें अपनी कोठी से निकाला था?' बाबा ने जले दिल से पूछा।

'याद है, सब-कुछ याद है। इसीलिए तो वह नही आ सकीं।' गंगू ने कहा, 'कहने लगी कि मैं कैसे उन दोनों का सामना कर सकूँगी, जिनके साथ मैंने ऐसा दुर्व्यवहार किया है? इसके अतिरिक्त तुम्हीं सोचो, अपने बेटे को वह ऐसी स्थिति में कैसे छोड़ सकती हैं? मालिक भी हैं कि हर क्षण चिन्ता में डूबे रहते हैं।'

'बापू!' रजनी ने बड़ी आशा के साथ अपने पिता को देखा। उसने विनती की, 'क्या तुम मुझे केवल एक अवसर और नहीं दे सकते? केवल एक अवसर।'

हीरालाल सोच में पड़ गया। रजनी के लिए वह कुछेक घरों में बात कर चुका था। उसका विवाह भी कुछ ही दिनों में कर देना चाहता था। उसके विवाह की तैयारी भी उसने आरंभ कर दी थी। विवाह का जोड़ा तथा गहने भी बनवा लिए थे। इस तैयारी को होते देखकर रजनी ने कुछ भी नहीं कहा था। उसने प्रण कर रखा था कि बह विवाह करेगी तो केवल अपने कुंवर साहब से और किसी से भी नहीं। उसने सोच लिया था कि यदि उसके कुंवर साहब उसे लेने नहीं आए तो वह विवाह करने से पहले आत्महत्या कर लेगी। परन्तु हीरालाल अपनी बेटी के इस भयानक इरादे से अनभिज्ञ था। उसने सोचा, बेटी जब उसकी इच्छा पर विवाह करने को तैयार हो सकती है, तो वह भी क्यों न अपनी बेटी को उसकी इच्छा पूरी करने का एक अवसर और प्रदान करे? गंगू को वह भली-भांति जानता था। गंगू पर किसी प्रकार का संदेह करने के लिए वह कभी सोच भी नहीं सकता था। गंगू को स्वयं नहीं ज्ञात था कि वह क्या कर रहा है तो हीरालाल को कैसे ज्ञात होता? उसने रजनी के बाबा को देखा।

बाबा भी रजनी के पक्ष में ही सोच रहा था। कुछ भी हो, मालकिन ने उसके साझा जैसा भी व्यवहार किया था, परन्तु उसने उनका नमक खाया था-वर्षो नमक खाया था। अपनी संतान की घायल स्थिति देखकर किस मां का दिल नहीं तड़प उठेगा? उस घड़ी मालकिन तथा मालिक की आंखों में जो घृणा उसके तथा रजनी के प्रति समाई थी, वह स्वाभाविक ही थी। उसने चंद्रभाल को अपनी आंखों से फलते-फूलते देखा था। चंद्रभाल की स्थिति का अनुमान लगाकर उसका दिल भर आया था। उसने हीरालाल से कहा, 'मालकिन ने छोटे मालिक को अस्पताल ले जाते समय कहा था कि यदि उनके बेटे को कुछ हो गया तो वह जान दे देंगी।'

'बापू...।' रजनी को अपने बाबा से आशा बंधी तो उसने कहा, 'यदि तुमने मुझे कुंवर साहब के पास जाने नहीं दिया तो मैं कम्भो की सौगन्ध खाकर कहती हूं कि में आत्महत्या कर लूंगी।' घर में दो ही बहनें थीं। दोनों का एक-दूसरे को अत्यधिक प्यार करना स्वाभाविक ही था।

हीरालाल इस प्रकार चौंक गया, मानो कम्भो से अधिक प्रिय संसार में उसके लिए कोई वस्तु ही नहीं थी। कम्भो के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए उसने उसे अपने और समीप कर लिया। फिर बोला, 'ठीक है बेटी, जो भी तू कहती है, मैं मानने का तैयार हूं परन्तु इस बार बाबा नहीं, मैं तेरे साथ चलूंगा। यदि इस बार किसी ने तेरा अपमान किया तो मैं सहन नहीं करूंगा।'
 
रजनी मानो खड़े-खड़े प्रसन्नता से उछल गई वह तुरंत अपने घर के अन्दर लपकी। पीछे-पीछे हीरालाल तथा कम्मो भी चले आए। बाबा गंगू को बाहर जाड़े की उमड़ती धुप में एक चारपाई पर बिठाकर बातें करने लगा। गंगू से मानो एक युग बाद उसकी भेट हुई थी।

रजनी बन-संवरकर तैयार होने लगी तो उसके बाप ने उसके सामने उसके विवाह का जोड़ा रख दिया। सारे गहने भी रख दिए। बोला, 'ले बेटी, इन्हें पहन ले।'

रजनी ने अपने बापू को आश्चर्य से देखा।

हीरालाल ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। फिर बोला, 'जाने क्यों बेटी, मुझे विश्वास-सा हो चला है कि अब तू इस घर में कभी नहीं आएगी। इसीलिए तुझे दुल्हन बनाकर तेरे नये घर में भेज देना चाहता हूं। कुंवर साहब बीमार हैं ना? जब तुझे अपनी दुल्हन के रूप में देखेंगे तो उन्हें स्वस्थ होते जरा भी देर नहीं लगेगी।' हीरालाल की आंखें भर आईं।

रजनी ने अपने बापू का प्यार देखा तो उसकी भी आंखें छलक आई। उसने कहा, 'बापू इस बार जब मैं यहां आऊंगी तो अकेली नही आऊंगी। मेरे साथ वह भी होंगे। 'हां बेटी!' हीरालाल ने बेटी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। बोला, 'आती रहना। यह घर भी तेरा ही है। इसे कभी मत भूलना।'

हीरालाल ने उसका जोड़ा थमाया-सुर्ख साड़ी के साथ अन्य वस्त्रों का पूरा सेट1 गहने उसके सुपुर्द किए और फिर अपने आंसू पोंछता हुआ दूसरे कमरे में चला गया।

यात्रा लम्बी थी, फिर भी रजनी ने स्वयं को अपने प्रीतम के लिए अभी से ही दुल्हन की तरह सजा लिया। चांदी का जोड़ा पहनकर जब वह दर्पण के सामने खड़ी हुई तो उसका मुरझाया हुआ मुखडा लाल गुलाब के समान एक बार फिर खिल उठा। उसने आंखों में काजल लगाया, मस्तक पर बिंदिया, फिर उसने गहने पहने। फिर जब पूर्णतया बन-संवरकर उसने अपना प्रतिबिम्ब शीशे में देखा तो आंखों में गुलाबी डोरे कांप गए। एक सपना-सा देख लिया था उसने कि इस प्रकार तो उसकी सुन्दरता को केवल कुंवर साहब ही देखेंगे और जब देखेंगे तो क्या होगा? लाज के मारे वह उनके सामने अपनी पलकें भी नहीं उठा सकेगी। वह लजा गई।
 
यात्रा लम्बी थी, फिर भी रजनी ने स्वयं को अपने प्रीतम के लिए अभी से ही दुल्हन की तरह सजा लिया। चांदी का जोड़ा पहनकर जब वह दर्पण के सामने खड़ी हुई तो उसका मुरझाया हुआ मुखडा लाल गुलाब के समान एक बार फिर खिल उठा। उसने आंखों में काजल लगाया, मस्तक पर बिंदिया, फिर उसने गहने पहने। फिर जब पूर्णतया बन-संवरकर उसने अपना प्रतिबिम्ब शीशे में देखा तो आंखों में गुलाबी डोरे कांप गए। एक सपना-सा देख लिया था उसने कि इस प्रकार तो उसकी सुन्दरता को केवल कुंवर साहब ही देखेंगे और जब देखेंगे तो क्या होगा? लाज के मारे वह उनके सामने अपनी पलकें भी नहीं उठा सकेगी। वह लजा गई।

जब वह घर छोड़ने से पहले अपने बाबा से मिली तो वह उसे छाती से लगाकर रो पड़ा। जितना आशीर्वाद वह निकलना चाहा, परन्तु तभी उसे सामने के केमरे में ऊपर की मंजिलों पर जाने वाली सीढ़ियां दिखाई दे गई। वह तुरन्त कमरे में प्रविष्ट हो गई। अन्दर से उसने द्वार बंद कर लिया। रजनी को दे सकता था, दे दिया। रजनी को छोड़ने का मन नहीं कर रहा था। रजनी भी अपने बाबा से बिछड़ते हुए रो पड़ी। रजनी कम्भो से भी मिली। गले लगाकर रोई, आंसू बहाए। गांव वाले वहां एकत्र होते जा रहे थे। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि विवाह कब हो गया, जो इस समय विदाई हो रही थी-कौन दूल्हा था? परन्तु रजनी के घर वालों ने किसी की भी चिन्ता नहीं की। बाबा ने हर बात रजनी के जाने के बाद ही गांव वालों को बताने के लिए रख छोड़ी थी। फिर रजनी के जीवन का कारवां चला, जीवन की नई डगर की ओर। सपनों की मंजिल पर सपनों का महल था।

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कार चली जा रही थी। कार में हीरालाल रजनी के साथ पीछे बैठा था। गंगू कार चालक के साथ आगे बैठा था। गंगू- बहुत प्रसन्न था। रजनी को सब्जबाग दिखाकर स्वयं भी सब्जबाग देख रहा था, परन्तु जागीरदार साहब का नाम उसने एक बार भी नहीं लिया था। पूरी सावधानी बरतते हुए जागीरदार निर्भय सिंह ने ही उसे समझाकर ऐसा आदेश दिया था। ऐसा न हो कि उनका नाम सुनकर बाबा रजनी को आने से मना कर दे। आखिर उन्हीं की लड़की से ही तो चंद्रभाल की मंगनी तय हुई थी। गंगू ने रास्ते में रजनी तथा हीरालाल की खूब खातिर करनी चाही, परन्तु उन दोनों को चंद्रभाल की कोठी पहुंचने की जल्दी थी। थोड़ा बहुत खा-पीकर गुजारा कर लिया। फिर यात्रा में दोपहर हुई, दिन ढला और फिर रात का अंधकार छाकर एक भेद भरा वातावरण बनने लगा। अंधकार भी घना हो गया। दिल्ली अब अधिक दूर नहीं थी। रजनी का मन अपने कुंवर साहब के पास पहुंचने के लिए और व्याकुल हो गया। अचानक कार चालक ने कार सड़क से उतारकर एक कच्ची सड़क पर मोड़ दी। वृक्षों के मध्य घने अंधकार को कार की हैडलाइट ने चीर दिया। रजनी का दिल बहुत जोर से धड़का। हीरालाल तथा गंगू भी चौक गए।

'इधर कहां ले जा रहे हो?' गंगू ने पूछा।

'जहां तेरी मंजिल है।' चालक ने बिना उसकी ओर देखे लापरवाही से उत्तर दिया और फिर कच्ची सड़क से भी नीचे उतारी तो कार की लाइट में एक कार वहां पहले से खड़ी दिखाई दी। चालक ने कार उसी कार के समीप ले जाकर कार की बाहरी बत्ती बुझा दीं और फिर अंदर की बत्ती जलाई। कार के अंदर धुंधला प्रकाश झलक गया।

गंगू कुछ समझा नहीं। रजनी का दिल कांपने लगा। हीरालाल सतर्क हो गया। उसने कुछ पूछना चाहा कि तभी वहां कुछेक बदमाश आ गए-हाथों में छुरे लिए हुए। आते ही उन्होंने कार को घेर लिया।

गंगू गुंडों तथा बदमाशों को देखकर बौखला गया, परन्तु फिर उसने तुरंत ही घटना की वास्तविकता समझ ली1 उसने कार-चालक से कहा, 'नीच, कमीने...।' परन्तु इससे अधिक गंगू को कहने का अवसर नहीं मिला। कार चालक पहले से ही सतर्क बैठा था। उसने बगल से एक लम्बी छुरी निकालकर गंगू के पेट में घोंप दी। गंगू इसके लिए तैयार नहीं था।

'आह!' उसके होंठों से निकला। फटी-फटी आखों से वह चालक को देखता ही रह गया आश्चर्य तथा घृणा की मिली-जुली दृष्टि से।

रजनी कांपकर चीख पड़ी। चीखकर अपने बापू से लिपट गई।

'चुपचाप बैठी रह, वरना तेरे बाप का भी यही हस्त्र होगा।' चालक ने उसे सख्ती से डांट दिया।

रजनी थर-थर कांपने लगी।

कार के बाहर खड़े एक बदमाश ने गंगू की ओर का द्दार खोला और उसे बाहर खींचा। गंगू अपने दोनों हाथों से पेट दबाकर निकलते रक्त को रोकने का प्रयत्न कर रहा था। बाहर निकलते-निकलते उसने तड़पकर दांत पीसते हुए कहा, 'जागीरदार का बच्चा...।' परन्तु तभी उसका स्वर रुक गया। एक लाश बनकर गिरता हुआ वह कार के बाहर देर हो गया।

रजनी कांपकर रो पड़ी। अपने बापू से वह और लिपट गई। हीरालाल को इस समय अपनी तथा रजनी की जान बचाने की चिन्ता पड़ी हुई थी। उसे विश्वास था कि रजनी खामोश रहे न रहे, वे लोग उसका अंत भी गंगू के समान ही करेंगे। उसके द्वार के बाहर एक बदमाश खड़ा हुआ था।

उसने तुरन्त द्वार की मुट्ठियां दबाई। फिर एक झटके से द्वार इस प्रकार खोला कि बाहर खड़ा व्यक्ति धक्का खाकर छिटक जाए। उसने रजनी को खींचकर बाहर निकल जाना चाहा।
 
वह बाहर निकलने में सफल हो गया, परन्तु रजनी नहीं निकल सकी थी कि तभी उस पर भी छुरी का एक वार हो गया। उसने रजनी को छोड़कर स्वयं को बचाने का प्रयत्न किया, परन्तु स्वयं को बचाने के प्रयत्न में वह इतना ही सफल हो सका कि छुरी उसकी छाती के बजाय कंधे में जा धंसी। रजनी तड़पकर चीख पड़ी। उसने चीख-चीखकर शोर मचा देना चाहा कि तभी चालाक के छुरे की मुट्ठियों का बार उसकी कनपटी पर ऐसा पड़ा कि उसकी आंखों के सामने अंधकार छा गया। वह अचेत होकर कार में ढुलक गई। हीरालाल चीख पड़ा। उसने रजनी की ओर लपकना चाहा, परन्तु इसके साथ उसे स्वयं की भी रक्षा करनी थी, ताकि रजनी को भी बचा सके। इसलिए उसने आक्रमणकारियों का डटकर मुकाबला करना चाहा, परन्तु इसी बीच कार में रजनी के पास एक बदमाश और जा बैठा।

चालक ने कार स्टार्ट की और रजनी को ले उड़ा। कार की हैडलाइट्स में हीरालाल ने जब बदमाशों की गिनती तथा शक्ति का अनुमान किया तो उसने अपनी जान बचाना आवश्यक समझा। घायल वह पहले ही हो चुका था। रक्त निकल रहा था। शक्ति जवाब दे रही थी। वह अंधकार की ओर भागा-पूरी शक्ति से। बदमाशों ने उसका पीछा करना चाहा, परन्तु अंधकार के घनेपन ने उन्हें असफल बना दिया। उन्होंने अपनी कार की हैडलाइट्स जलाईं,

परन्तु तब तक हीरालाल प्रकाश की सीध छोड़कर एक ओर मुड़ चुका था। वह एक ओर भागता ही गया, भागता ही गया और जब थक गया तो एक वृक्ष की आड़ में खड़ा होकर हांफता हुआ सुस्ताने लगा।

। उसने अपने कंधे के घाव पर हथेली रखकर दबा दी, ताकि रक्त का बहना बंद हो जाए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि राह अचानक क्या हो गया। अचानक उसने परिस्थिति को समझने का प्रयत्न किया। पिछली बार जब रजनी बाबा के साथ दिल्ली के लिए चली थी तो भी उस पर अपहरणकर्ताओं ने आक्रमण किया था। इस बार भी बदमाशों ने आक्रमण किया। पिछली बार बदमाश असफल हो गए थे, इस बार सफल हो गए। पिछले आक्रमण के विषय में बाबा ने सारी बातें हीरालाल को बताई थी। उसे रजनी के अपहरण का कारण समझ में आने लगा। अपनी समझ के अनुसार निश्चय ही इस अपहरण के पीछे मार्तण्ड सिंह का हाथ है। वह नहीं चाहते कि किसी भी स्थिति में रजनी तथा कुंवर साहब का मेल हो।

उन्होंने रजनी का अपहरण पहली बार कराने का प्रयत्न किया था क्योंकि उन्हें ज्ञात हो गया होगा कि उनका बेटा कार लेकर कहां गया है। अब भी कुंवर साहब रजनी को अपनाने के लिए अवश्य तुले बैठे हैं और इससे पहले कि वह स्वस्थ होकर रजनी के पास पहुंचते, मार्तण्ड सिंह ने रजनी का अपहरण करा दिया अपने निजी कार चालक गंगू के द्वारा, गंगू को भ्रम में रखकर कि वह रजनी को ले आए तो वह उसे स्वीकार कर लेंगे। वह जानते थे कि गंगू के साथ रजनी अवश्य चली जाएगी और अब गंगू की हत्या कराकर वह अपना भेद छिपा लेना चाहते थे। परन्तु ऐसा नहीं हो सका। गंगू मर गया, परन्तु वह जीवित है। हीरालाल ने जब ऐसा सोचा तो उसका दिल मार्तण्ड सिंह के विरुद्ध क्रोध की आग में भड़क उठा। मुट्ठियां भिंच गई।

__गंगू ने मरते समय दांत पीसकर कहा था-जागीरदार का बच्चा! मार्तण्ड सिंह भी अपने जमाने का जागीरदार था। हीरालाल की धृणा तथा उसका क्रोध । बदला लेने के लिए भड़क उठा। यदि उसकी बेटी को कुछ हो गया तो वह मार्तण्ड सिंह को जीवित नहीं छोड़ेगा। अपनी बेटी को बचाने के लिए चलने से पहले उसने आहट ली। कहीं वे बदमाश उसका पीछा तो नहीं कर रहे हैं? निश्चय ही गंगू के समान वे उसका भी अंत करने की ताक में होंगे। परन्तु कहीं कोई आहट नहीं मिली तो हीरालाल मुख्य सड़क की ओर छिपता-छिपता चल पड़ा। सड़क पर आने के बाद हीरालाल ने एक बस को रोका। फिर वह सीधा मार्तण्ड सिंह की कोठी पहुंचने के लिए रवाना हो गया।
 
निर्भय-सिंह की कोठी का वातावरण, कोठी का तहखाना। एक युग के बाद निर्भय सिंह ने इसे साफ कराकर अपना रंग महल बनाने का प्रयत्न किया था, परन्तु पहले के समान इसमें एक प्रतिशत भी महलों वाली बात नहीं आ सकी थी। पुराने जमाने के फर्नीचर, पुरानी तस्वीरें, सफेदी को तरसती दीवारें। तहखाने का वातावरण घुटा-घुटा-सा था, फिर भी वातावरण में फूलों की सुगन्ध थी। रजनी के स्वागत में निर्भय सिंह ने फूल ही फूल बिछा रखे थे, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि रजनी को फूलों से प्यार है। रजनी स्वयं भी तो एक फूल थी। फूल के समान ही अपनी टहनी अए टूटकर रजनी विवाह के जोड़े में इस समय निर्भय के पलंग पर पड़ी हुई थी, उसी प्रकार बेहोश जैसे वह यहां लाई गई थी-कुछ ही क्षण पहले।

इस समय रात के लगभग नौ बज रहे थे। निर्भय सिह ने रजनी के साथ अपनी रात बिताने के लिए नर्म गद्दा तथा मखमली चादर बिछाई थी। निर्भय सिंह वहीं खड़े जाम के बूंट पीते हुए वासना भरी दृष्टि से रजनी को देख रहे थे। रजनी को देखने से उनका मन ही नहीं भरता था। अनेक बार वह रजनी के समीप बैठ चुके थे। उसके कपोलों पर गलियां फेर चुके थे। उसकी लटें उलझा चुके थे। बस, अब देर थी तो रजनी के होश में आने की ताकि वह उसे अपनी बांहों में समा लें, प्यार करके अपने होंठों की वह प्यास बुझा लें, जो उन्हें मानो एक युग से तड़पा रही थी। शराब पीकर वह बार-बार जिस प्रकार अपने होठ पर जुबान फेरते हुए रजनी को देख रहे थे, उससे उनके दिल की गंदी तड़प का स्पष्ट अंनुमान लगाया जा सकता था। उनके वश मे होता तो वह इस रात को कभी टलने नहीं देते। समय को थामकर रोक लेते।

अंशु इस समय मार्तण्ड सिंह की कोठी में थी। अपने ऊपर किसी प्रकार का संदेह न लाने के लिए निर्भय सिंह मार्तण्ड सिंह के यहां अपनी हाजिरी दे आए थे। अंशु इस समय होती भी तो निर्भय सिंह को कोई अंतर नहीं पड़ता। अंशु का कमरा इस तहखाने से दूर था। यूं भी इस तहखाने से आवाज का बाहर जाना असंभव था।

अंशु मार्तण्ड सिंह की कोठी में चंद्रभाल के ही कमरे में थी। चंद्रभाल का स्वास्थ्य आज बिल्कुल ठीक था। माता-पिता का व्यवहार अपने पक्ष में देखकर चंद्रभाल को स्वस्थ होने में जरा भी समय नहीं लगा था। परन्तु अंशु सोच रही थी कि चंद्रभाल ने उसके कारण एक बार फिर जीना सीख लिया है। रजनी को वह कभी याद नहीं करेगा। यदि करेगा तो वह उसकी उदासी पर अंशु बनकर छा जाएगी। तब उसके लिए उसे मुस्कराना ही होगा।

___ और चंद्रभाल सोच रहा था कि रजनी के प्रति मां की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद अब और अधिक उसे अंशु को भ्रम में नहीं रखना चाहिए, परन्तु अंशु का दिल तोड़ने का उसको साहस नहीं हो रहा था। अंशु उसको प्राप्त करने के विश्वास में इतनी प्रसन्न थी कि एक झटके के साथ उसका विश्वास तोड़ देना अंशु पर अत्याचार करना होता। आखिर उसी ने तो अंशु को दोबारा आशा दिलाई थी। अंशु को उसके पास बैठे काफी देर हो गई थी, दुनिया भर की बातें हो चुकी थीं, परन्तु एक वही बात नहीं हुई थी जो चंद्रभाल कहना चाहता था। आखिर उसने अंशु से हर बात स्पष्ट कर देने का साहस एकत्र कर ही लिया। वह अंशु को लेकर खिड़की पर आया। हरसिंगार के फूल खिलकर रजनी का महत्व बढ़ा रहे थे।

चंद्रभाल ने फूलों को देखा, इस प्रकार मानो वह अपने जीवन में इन फूलों का महत्व दिखाकर अंशु को समझा देना चाहता हो कि वह उसके दिल में रजनी का स्थान कभी प्राप्त नहीं कर सकती। उसने अंशु से कहने के लिए उसे देखा, परन्तु अंशु की दृष्टि सामने क्षितिज पर बिछी हुई थी, जहां चंद्रमा मुस्करा रहा था। अंशु अपने चन्द्रमा में खोई हुई थी। चंद्रभाल को अंशु पर दया आई। परन्तु उसे कहना था, अंशु को भ्रम में नहीं रखना था। उसने डरते-डरते कहा, अंशु!'

परन्तु तभी कोठी के सामने वाले लॉन में एक चीख बुलन्द हुई -बहुत तेज। चीख बुलन्द होकर पीछे के लॉन में आते हुए चंद्रभाल तथा अंशु के कानों से टकरा गई थी। कोई कह रहा था-'मार्तण्ड सिंह-मार्तण्ड सिंह बाहर निकलो!'

चंद्रभाल तथा अंशु चौंक गए। इस प्रकार उसकी कोठी पर आकर चिल्लाने का साहस किसने किया? चंद्रभाल पलटा तथा तेज पगों से कोठी के सामने वाले भाग की ओर लपक गया। उसके पीछे-पीछे अंशु भी दौड़ पड़ी। कोठी के नौकर-चाकर भी उस ओर दौड़ पड़े थे। कोठी के नौकरों के बीच गंगू के भेद भरे ढंग से गुम हो जाने के, कारण पहले ही एक चिंता बनी हुई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे परेशान थे। गंगू बिना बताए कहां चला गया? सब यही समझ रहे थे कि वह कोठी में कार रखने के बाद ही गया है।

चंद्रभाल अपने पिता के कुछ पीछे ही सामने के बरामदे में पहुंचा तो एक व्यक्ति पोर्टिकों के पास हल्के अंधकार में खड़ा चीखकर उसके पिता से पूछ रहा था, 'कहां है मेरी बच्ची? कहां है मेरी बच्ची? याद रखना, अगर मेरी बच्ची को कुछ हुआ तो...।'

क्या बकते हो?' मार्तण्ड सिंह क्रोध में चीख पड़े।'मैं तुम जागीरदारों को अच्छी तरह जानता हूं।' वह व्यक्ति क्रोध में चीखता हुआ सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में आ गया। उसने कुछ कहना चाहा कि तभी उसे देखकर सब चौक गए।

'तुम मार्तण्ड सिंह ने उसे पहचाना तो पूछा।

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'रजनी के बापू-तुम और यहां?' चंद्रभाल आगे बढ़कर उसके पास आया। हीरालाल की घायल स्थिति देखी तो कुछ समझा नहीं।

___ 'छोटे मालिक, छोटे मालिक...।' हीरालाल ने क्रोध में लगभग रोते हुए कहा, 'इस व्यक्ति ने मेरी रजनी का अपहरण करा दिया है। उसने मार्तण्ड सिंह की ओर इशारा किया।

'क्या?' चंद्रभाल की छाती पर मानो किसी ने बम फोड़ दिया। अंशु भी ऊपर से नीचे तक कांप गई।

'बकवास बंद करो, वरना मैं तुम्हें अभी पुलिस के हवाले कर दूंगा।' मार्तण्ड सिंह ने क्रोध में भड़ककर कहा।छोटे मालिक।' हीरालाल ने कहा, 'आप ही सोचिए यदि आपके पिता का हाथ रजनी के अपहरण में नही है तो रजनी को धोखे से लेने गंगू हमारे घर क्यों आता? मरते समय उसने इनका नाम क्यों लिया होता?'

गंगू की मृत्यु की सूचना सुनते ही नौकरों में तहलका मच गया। गंगू की पत्नी भी वहीं थी। उसके पैरों तले से तो धरती ही निकल गई।

'क्या? गंगू मर गया?' मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी भी वहां आ गई थीं।

__'जी हां, उसकी हत्या कर दी गई। हीरालाल ने घृणा से मार्तण्ड सिंह को देखा।

हत्या के नाम पर सब नौकरों के दिल कांप गए। गंगू की पत्नी छाती पीट-पीटकर रोने लगी।

'क्या कहा था गंगू ने मरते समय?' मार्तण्ड सिंह ने सोचते हुए सख्ती से पूछा।

'जागीरदार का बच्चा!' हीरालाल ने कहा, 'और इसके बाद उसके प्राण निकल गए थे।'

___ 'जागीरदार का बच्चा चंद्रभाल ने मानो स्वयं से कहते हुए अंशु को देखा। मार्तण्ड सिंह तथा उनकी पत्नी ने भी अंशु को संदेह की दृष्टि से देखा1 रजनी के अपहरण से किसका लाभ हो सकता है? निर्भय सिंह का पिछले दिन यहां से अपनी गाड़ी को खराब बताकर कोठी की गाड़ी द्वारा जाना। गंगू ड्राइवर ही निर्भय सिंह को छोड़ने गया था। उसके बाद उसका किसी को दिखाई न देना एक अर्थ रखता था। पता नहीं कोठी में कार वही रखने आया था या कोई और? गंगू ने अंतिम सांसों में जगीरदार का बच्चा क्यों कहा था? गंगू और किसी जागीरदार को तो जानता नहीं था। सब बातें सभी की समझ में आ गई।

'आओ मेरे साथ।' मार्तण्ड सिंह ने सख्ती के साथ हीरालाल को आज्ञा दी।

'नीच, पापिन...!' चंद्रभाल को निर्भय सिंह के साथ अंशु पर भी संदेह हो गया था। वह घृणा से दांत पीसकर कहते हुए अंशु की ओर बढ़ा।

'नहीं- नहीं चंद्रभाल अंशु ने कांपकर पीछे हटते हुए कहा, 'ऐसा मत कहो। मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर...।

परन्तु तभी चंद्रभाल का हाथ हवा में लहरा गया। उसने पूरी शक्ति से अंशु के गाल पर एक थप्पड़ मारा। अंशु का स्वर उसके होंटों के अंदर घुट गया। वह लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बची। उफ! उसकी सेवाओं का यह परिणाम! उसके निःस्वार्थ प्यार की यह दुर्दशा? अंशु की आखें छलक आई।

'जैसा बाप, वैसी बेटी!' चंद्रभाल ने घृणा से अंशु को धिक्कारा। क्रोध में उसने बात जारी रखी। बोला, 'यदि रजनी को कुछ हो गया तो याद रखना, में तुझे कभी क्षमा नहीं करूंगा।' चंद्रभाल पलटा। मार्तण्ड सिंह हीरालाल को पीछे बिठाने के बाद कार स्टार्ट कर चुके थे। कार की ओर लपकते हुए उसने कहा, 'ठहरिए पिताजी, मैं भी चल रहा हूं।' कार के पास पहुंचकर उसने तुरंत अगला द्वार खोला और अंदर बैठ गया। कार तेजी के साथ आगे बढ़ गई।'

अंशु ने आंसू भरी दृष्टि से चंद्रभाल की मां को देखा। शायद वह उसकी कुछ सहायता करें, शायद उन्हें उसकी निर्दोषता पर विश्वास हो, परन्तु चंद्रभाल की मां ने मस्तक पर बल डाला। फिर घृणा से गर्दन झटककर वह कोठी के अंदर चली गई।
 
अंशु ने आंसू भरी दृष्टि से चंद्रभाल की मां को देखा। शायद वह उसकी कुछ सहायता करें, शायद उन्हें उसकी निर्दोषता पर विश्वास हो, परन्तु चंद्रभाल की मां ने मस्तक पर बल डाला। फिर घृणा से गर्दन झटककर वह कोठी के अंदर चली गई।

अंशु ने नौकरों को देखा। सब उसी को घूर रहे थे। सबकी आंखों में उसके प्रति घोर घृणा थी। इतना तिरस्कार अंशु सहन नहीं कर सकी। वह तुरंत अपनी कार में जा बैठी और पूरी गति के साथ कार लिए घर की ओर जाने वाली सड़क की ओर बढ़ गई। अंशु का दिल टूट चुका था। आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इन आंसुओ को पोंछने के लिए हवा का दामन भी छोटा पड़ गया। क्या वास्तव में वह इतने नीच व्यक्ति की संतान है? उसका मन करता था कि वह अपनी जान दे दे, कार किसी ट्रक से दे मारे, परन्तु ऐसा करने से पहले वह अपने संदेह की पुष्टि कर लेना चाहती थी।

यदि यह सत्य होगा तो अपने पिता को अपने जीवन की सौगन्ध देकर रजनी को वापस लेगी और फिर अपने हाथों से वह उसे चंद्रभाल के हवाले कर देगी। उसके पिता ने रजनी को कोठी में न सही, कहीं और तो छिपाया ही होगा। अपने पिता से मिलकर वह रजनी के विषय में पूरी जांच करेगी। अंशु को इस बात का जरा भी संदेह नहीं हुआ कि उसके पिता का इस अपहरण के पीछे रजनी की लाज लूटने का भी लक्ष्य हो सकता है। सहसा उसे याद आया, उसके पिता रजनी को कोठी के तहखाने में भी छिपा सकते हैं। इससे अच्छा स्थान उन्हें कहां मिल सकता है? अंशु की कार से सौ सवा सौ गज आगे मार्तण्ड सिंह की कार जा रही थी। कार के अंदर तीनों ही खामोश बैठे थे। हीरालाल इसलिए खामोश था, क्योंकि उसे विश्वास हो चला था कि उसने मार्तण्ड सिंह पर दोष लगाकर भूल की है। जब तक इस घटना की वास्तविकता खुल नहीं जाती, कुछ कहना उचित नहीं है।

मार्तण्ड सिंह निर्भय सिंह की चालाकियों पर ध्यान करके सोच रहे थे कि आज उनके कारण एक तुच्छ व्यक्ति ने सबके सामने उनका अपमान करने का साहस किया है। वह इस व्यक्ति को जो सजा देनी होगी, देंगे ही, परन्तु पहले इसे निर्भय सिंह के पास रजनी को दिखाकर इसके भ्रम की पुष्टि करा दें। जो व्यक्ति उनकी दृष्टि में तुच्छ था तथा जिसे वह उसकी गलती पर सजा देने का निश्चय कर चुके थे, उससे बात करने का उनके लिए प्रश्न ही नहीं उठता था।

चंद्रभाल अपने पिता की गंभीर खामोशी का कारण समझ रहा था। हीरालाल को बिना कोई वास्तविकता जाने उसके पिता पर ऐसे दोष नहीं लगाने चाहिए थे। पिता हीरालाल को अवश्य दंड देंगे। यही कारण था कि चंद्रभाल भी खामोश ही रहा। रजनी का विषय लेकर भी यदि वह हीरालाल से बात करके उसमें रुचि प्रकट करता तो उसके पिताजी क्रोध में भड़क उठते, इसलिए वह भी खामोश रहा। चंद्रभाल के मन में अनेक बिचार उठ रहे थे। यदि निर्भय सिंह ने रजनी की लाज लूटने का प्रयत्न किया तो क्या होगा? जो व्यक्ति अपहरण जैसा नीच काम कर सकता है, अपना भेद गुम रखने के लिए गंगू की हत्या करा सकता है, वह और क्या गंदा काम नहीं कर सकता? सोच-सोचकर चंद्रभाल का दिल कांप उठता था। यदि रजनी के साथ किसी प्रकार की ज्यादती हुई तो वह निर्भय सिंह को जीवित नहीं छोड़ेगा। चंद्रभाल ने इस बात का दृढ़-निश्चय कर लिया था।



कार निर्भय सिंह की कोठी के सामने रुकी। तीनों जैसे ही कार से बाहर उतरे, अंशु की कार भी वहां आ लगी। चंद्रभाल ने अंशु को देखा, परन्तु अंशु ने उसकी क्या किसी की भी परवाह नहीं की। कार से उतरकर वह सीधी कोठी के अंदर प्रविष्ट हुई तो पीछे-पीछे मार्तण्ड सिंह तथा चंद्रभाल भ । हीरालाल भी बढ़ गया। अंशु बैठक में न रुककर तहखाने की ओर बढ़ने लगी तो अन्य लोगों ने भी उसके पीछे जाना चाहा। अंशु के तेवर बता रहे थे कि वह कुछ कर दिखाना चाहती थी। तभी मार्तण्ड सिंह के सामने एक नौकर ने आकर कहा, मालिक कोठी में नहीं हैं।'

'तुमने किसने पूछा है?' अंशु ने पलटते हुए भड़ककर नौकर को डांटा।

'परन्तु...।' नौकर ने मेहमानों को तहखाने के रास्ते जाने देना उचित नहीं समझा।

_ 'शटअप!' अंशु ने नौकर को डांट दिया। नौकर अनिच्छा से किनारे हट गया। अंशु आगे बढ़ गई। प्रकट था कि अंशु मेहमानों को अपने पीछे आने की आज्ञा दे रही थी। सब पीछे-पिछे चल पड़े, दिल में एक अज्ञात भय लिए। अंशु के पीछे-पीछे सबने अनेक कमरे पार किए। फिर एक दरवाजा मिला-अंदर से बंद। द्वार के समीप स्टूल पर बैठकर पहरा देता एक व्यक्ति शराब के नशे में धुत था। नीचे फर्श पर एक बोतल रखी थी। हाथ में गिलास था1 अंशु तथा अन्य व्यक्तियों को देखकर उसका आधा नशा तुरन्त उतर गया। खड़े होकर उसने अंशु को सलाम मारा तो लड़खड़ा गया।
 
'दरवाजा खोलो1' अंशु ने उसे आज्ञा दी।

'जी।, दरवाजा तो अंदर से बंद है।'

'अन्दर कौन है?' अंशु ने सख्ती से पूछा

'जी...।' पहरेदार को मानो एक झपकी-सी आई, परन्तु फिर उसने संभलकर कहा, 'जी, अंदर तो कोई भी नहीं है।, 'तो फिर दरवाजा अंदर से क्यों बंद है?'

'जी वह...जी वह...।' पहरेदार अपना सिर खुजाने लगा। उसने होश में आने का प्रयत्न किया।

अंशु ने उसकी बात की प्रतीक्षा नहीं की। वह चंद्रभाल से संबोधित हुई बोली, 'तुम दरवाजा तोड़ सकते हो।, उसने मानो चंद्रभाल को द्वार तोड़ने की आज्ञा दी।

चंद्रभाल ने एक क्षण सोचा, परन्तु एक क्षण भी उसके लिए देर सिद्ध हो सकता था। घायल स्थिति होते हुए भी उसने पूरी ताकत से अपना कंधा द्वार पर दे मारा। तुरंत उसका साथ हीरालाल ने भी दिया,परन्तु द्वार पर कोई प्रभाव नही पड़ा। अचानक मार्तण्ड सिंह ने भी द्वार खोलने में अपनी पूरी शक्ति का साथ दिया तो द्वार के कब्जे निकल पड़े। द्वार अंदर को गिर पड़ा। अंशु तथा मेहमान बिजली की-सी तेजी से तहखाने में प्रविष्ट होकर नीचे जाने वाली सीढ़ियां उतर गए। अंशु ने जिस स्थिति में अपने पिता को देखा, उससे उसका मन हुआ कि वह दीवार से अपना सिर फोड़कर वहीं अपनी जान दे दे।

निर्भय सिंह भौंचक्के से खड़े थे तथा उनसे कुछ दूर रजनी पलंग के पास बेहाल-सी खड़ी थी। कुछ ही क्षण पहले उसे होश आया था, तब निर्भय सिंह को स्वयं पर झुका देखकर उसकी जान ही निकल गई थी। विश्वास नहीं होता था कि निर्भय सिंह इतना नीच भी हो सकता था! अपनी लाज बचाने के लिए उसने इधर से उधर भागकर क्या प्रयत्न नहीं किया! उसकी लाज मानो लुटते-लुटते रह गई थी। विवाह के जोड़े में भी वह एक जीवित लाश लग रही थी। आखों में औसू थे। लटें उलझी, साड़ी अधखुली, ब्लाउज के बटन टूट चुके थे।

चंद्रभाल ने रजनी को देखा तो उसका दिल छलनी हो गया। उसने लपककर रजनी को अपने गले लगा लेना चाहा, परन्तु रजनी की दृष्टि सबसे पहले अपने बापू पर पड़ चुकी थी। 'बापू!' रजनी चीखी और चीखकर दौड़ती हुई अपने बापू से लिपट गई। बापू से लिपटकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

हीरालाल ने बेटी को छाती से लगाकर दांत पीसते हुए उसके लुटेरे को देखा-पहली बार। वह उसके लुटेरे का गला घोंट देना चाहता था कि तभी उसे पहचानते हुए चौंक पड़ा। बोला, 'तुम?' निर्भय सिंह के पुराने व्यक्तित्व में अधिक अंतर नहीं आया था।

निर्भय सिंह कुछ समझ नहीं पाए। उन्होंने ध्यान सेहीरालाल को देखा।

अचानक हीरालाल के मुख पर एक विचित्र रौनक आ गई-एक भयानक रौनक। वह रजनी को पकड़े-पकड़े निर्भय सिंह की ओर बढ़ा। क्रोध तथा धृणा से उसने कहा, 'नीच, पापी, कुत्ते! हां, तू कुत्ता ही तो है। तुम क्या जाने मनुष्य की पहचान! ले लूट..ले लूट लड़की की लाज! मैं स्वय तुझे इसकी लाज लूटने की आज्ञा देता हूं।'

हीरालाल ने रजनी का ब्लाउज फाड़ना चाहा तो रजनी ने अपना शरीर छिपाते हुए अपनी पीठ निर्भय सिंह की ओर कर दी। अपने हाथ छाती पर बांध लिए।

हीरालाल ने तब भी रजनी का ब्लाउज गले से पकड़ते हुए एक झटके द्वारा जोर से खींचकर फाड़ दिया। ब्लाउज का टुकड़ा फटकर लटक गया। रजनी की पीठ नग्न हो गई। रजनी सिर झुकाती हुई स्वयं भी झुक गई। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उसके बापू को क्या हो गया है।

अंशु चंद्रभाल तथा मार्तण्ड सिंह भी कुछ समझ नहीं सके कि यह सब क्या है। हीरालाल पागल तो नहीं हो गया? अपनी ही बेटी को एक लुटेरे के सामने नग्न करने पर क्यों उतारू है? स्वयं लुटेरा निर्भय सिंह हीरालाल की बात सुनकर तो बिल्कुल ही पगला गया।

'लूट कुत्ते, लूट ले इस सुन्दरी को! तुझे सात जन्म में भी ऐसी सुन्दरी नहीं मिलेगी।' हीरालाल ने कहते हुए रजनी के ब्लाउज का फटा तथा लटका टुकड़ा खींचकर अलग करते हुए निर्भय सिंह के मुंह पर दे मारा। फिर अचानक जोश में आकर चीख पड़ा, 'लूट इस लड़की को मेरी आखों के सामने, ताकि मेरे दिल के अन्दर वर्षों से सुलगती आग ठंडी हो जाए, ताकि यह संसार देखे कि पापी को उसके पाप का दंड इसी जन्म में कैसे मिलता
 
सहसा रजनी ने अपनी छाती पर बंधा हाथ अलग कर दिया। ब्लाउज पीठ की ओर से पूर्णतया खुलकर ढीला हो गया। उसने आंसू भरी दृष्टि से अपने बापू को देखा। हीरालाल का दिल तड़प उठा। उसने रजनी को अपनी छाती से लगा लिया और रो पड़ा। उसके शरीर पर उसका आंचल लपेटा। बोला, 'काश बेटी! काश, मैंने तुझे एक पिता के समान प्यार नहीं किया होता! काश, मुझमें भी इस पापी के सामने साहस होता!' हीरालाल ने निर्भय सिंह की ओर इशारा किया। फिर उसने दांत पीसते हुए निर्भय सिंह ने कहा, 'कमीने, नीच, कुत्ते, पहचान मुझे, ध्यान से देख! मैं ही हूं वह । पन्नालाल, जिसकी बेला को तूने विवाह के मण्डप से उठा लिया था और उसकी कच्ची आयु में तूने उसे लुटकर मृत्यु के घाट उतार दिया था। याद है तुझे अपनी वह राजस्थान की जागीर?

हीरालाल कह रहा था और निर्भय सिंह को साफ-साफ याद आ रहा था। हां वह बेला, तेरह-चौदह वर्षीया बालिका ने किस प्रकार तड़प-तड़पकर उनकी वासना का शिकार होते हुए उनकी बांहों में दम तोड़ दिया था! तो क्या उसकी आत्मा अब तक इसीलिए उनके मन और मस्तिष्क में झांककर उन्हें झकझोर देती थी, ताकि उन्हें यह घड़ी देखना नसीब हो! जाने कितनी जवानियां उनकी वासना की आग बुझाते-बुझाते स्वयं जलकर राख हो गई थीं, जाने कितनी हत्याएं उनके सिर थीं, उन्हें कुछ भी याद नहीं था। अपनी एय्याशी में वह इतना खोए हुए थे कि उन्हें किसी बात का गम नहीं था। उनकी एय्याशी के कारण ही उनकी धर्मपत्नी भी कुढ़-कुढ़कर मर गई थी। वह उन्हें भी मानो भूल से गए थे। यदि कोई याद था तो वह थी बेला। अब उन्हें उसके याद आने का कारण साफ-साफ समझ में आ रहा था। किसी की आह बेकार नहीं जाती।

हीरालाल कह रहा था, 'तूने उसकी लाश नदी में फिकवा दी थी, परन्तु मैं जानता था कि बेला के अपहरण में तेरा हाथ है। मैं क्या, पूरी जागीर तेरे कुकर्मो से परिचित थी। मैंने तेरे विरुद्ध आवाज उठाई तो तूने मुझे वृक्ष से बांधकर इतने कोड़े मारे थे कि मैं खैराती अस्पताल में महीनों पड़ा रहा था। इसी बीच भारत स्वतंत्र हो गया। गांव वालों के डर से तू अपनी दौलत समेटकर कलकत्ता भाग गया, बरना तू अच्छी तरह जानता था कि स्वतंत्रता के बाद गांव वाले अपना अधिकार समझते ही तुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे। मैं जब स्वस्थ होकर अस्पताल से निकला तो प्रण कर चुका था कि तुझे जीवित नहीं छोडूंगा। तेरा पता लगाते मुझ गरीब को एक जमाना लग गया। इस बीच तेरा विवाह हो गया, दो बच्चियां भी उत्पन्न हो गई, परन्तु मेरे अंदर तुझसे बदला लेने की भावना जरा भी कम नहीं हो सकी। तेरा पता लगाकर मैं कलकत्ता पहुंचा, तेरी हत्या करने के इरादे से। किसी प्रकार तेरी कोठी में प्रविष्ट हुआ। आधी रात का समय था1 तू किसी के साथ रंगरेलियां मना रहा था। मैं तेरी हत्या करने के इरादे से छिप गया, परन्तु बगल के कमरे में तेरी दोनों सोती हुई बच्चियों पर मेरी दृष्टि पड़ी। एक की आयु तीन वर्ष होगी, दूसरी की डेढ़ वर्ष। मैंने सोचा, तेरी हत्या करने के बजाय क्यों न मैं तेरी दोनों बच्चियों को ले भागूं ताकि तू उनकी याद में जीवन भर तड़पे।

मैंने दोनों बच्चियों को उठाना चाहां तो बड़ी बच्ची जागकर रो पड़ी। मैंने उसका विचार छोड़कर छोटी बच्ची को ही संभाल लिया और उसे तेरी कोठी से लेकर निकल भागने में सफल हो गया। मैंने सोचा था कि उस बच्ची को वेश्या के कोठे पर दे दूंगा। ताकि जब वह बड़ी हो तो उसे तेरी वासना की भेंट चढ़ाने का प्रयत्न कर सकू, परन्तु मैं तुझ जैसा नीच नहीं बन सका। तेरी बेटी से मुझे प्यार हो गया। मैंने उसे अपनी बेटी बना लिया। तूने पुलिस द्वारा अपनी बच्ची की खोज की तो मैंने लटें और दाढ़ी बढ़ाकर अपना रूप बदल लिया।। पन्नालाल से हीरालाल बनकर मैं कलकत्ते से दूर कुसुम्पटी के एक गांव में जा बसा।'

_सहसा ही हीरालाल रजनी को छोड़कर चीखता हुआ निर्भय सिंह के समीप आया। रजनी की ओर इशारा करता हुआ बोला, 'पहचान इसे लड़की को! यह तेरा ही खून है, जिसकी तू लाज लूटना चाहता है। ले, लूट इसकी लाज और देख अपने कुकर्मो का तमाशा! आज दिखा दे इस

निर्भय सिंह ने सुना तो उनके मस्तिष्क का संतुलन डगमगा गया। अपनी एय्याशी में वह ऐसा डूबे कि उन्हें उस खोई हुई बच्ची का कभी ध्यान ही नहीं आया। उनके अंदर का रक्त जम गया। पत्थर की मूर्ति बने वह उसी प्रकार खड़े रहे। ऐसा लगता था, उनके शरीर में जान ही नहीं है। उनका मुख बिल्कुल सफेद पड़ गया था। प्रकृति के इतने बड़े न्याय पर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई। यह क्या हो गया? जो बात किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोची थी, वह निकल आई!
 
कुसुम्पटी में जा बसने के बाद हीरालाल ने रजनी को मां का प्यार देने के लिए माली की बेटी से विवाह भी कर लिया था। फिर कुछ वर्ष बाद पत्नी की मृत्यु हो जाने पर उसने दूसरा । विवाह कर लिया। समाज वालों के साथ उसने अपनी नई पत्नी को भी विश्वास दिला दिया था कि रजनी उसकी स्वर्गवासी पत्नी की संतान है। आरंभ में रजनी को उसकी नई मां ने पूरी ममता दी थी, परन्तु जब कुछेक वर्षों बाद । उसकी अपनी संतान हो गई तो वह रजनी के साथ बुरा व्यवहार करने लगी थी। यही कारण था, हीरालाल रजनी को सात वर्ष की आयु में अपने सुसर बाबा के पास दिल्ली छोड़ गया था और जब उसकी पत्नी मर गई थी तो वह दिल्ली जाकर रजनी को अपने साथ दोबारा कुसुम्पटी ले आया था। \

अंशु को इतनी बड़ी वास्तविकता का पता चला तो मानो उसके मस्तिष्क का भी संतुलन डगमगा गया। कुछ समझ में ही नहीं आया कि वह क्या करे। उसने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसके पिता का अतीत इतना भयानक तथा गंदा होगा। इससे तो अच्छा था कि बह पैदा संसार को कि दूसरे पर डाका डालने वाले का क्या परिणाम होता है। ले, लूट अपनी बेटी को, कर दे इसे नंगा सबके सामने! नीच..पापी..कुत्ते।' हीरालाल को इतने बड़े बाप के लिए नफरत भरे शब्दों की कमी पड़ने लगी तो वह चुप हो गया।

ही नहीं होती। ऐसे व्यक्ति की संतान कहलाने से तो अच्छा है कि वह अपनी जान दे दे। अंशु की नस-नस में अपने पिता के प्रति घृणा समा गई। उसे अपने-आपसे भी धृणा हो गई। इस संसार में वह मुंह दिखाने योग्य नहीं रह गई थी। उसे अपनी जान दे देनी चाहिए। अब वह जिएगी भी किसके लिए? चंद्रभाल रजनी को प्यार करता है। रजनी उसकी बहन है। वह सदैव रजनी तथा चंद्रभाल के प्यार के बीच बाधा बनी रही है, परन्तु अब ऐसा नहीं होना चाहिए। अब ऐसा हर्गिज नहीं होगा। इतना सारा दुःख उठाने के बाद रजनी को उसका प्यार मिलना ही चाहिए।

अंशु ने चंद्रभाल को देखा-अंतिम बार। उसकी आंखें छलक पड़ी। उसने रजनी को देखा-बहुत ध्यान से। कौन कह सकता था, रजनी उसकी बहन नहीं है? अंशु का मन हुआ, वह रजनी की छाती से लिपट जाए, ,परन्तु वह ऐसा न कर सकी। ऐसा कर देती तो उसका इरादा पूरा नहीं होता। कोई उसे मरने नहीं देता। वह चुपचाप दो पग पीछे हटी और फिर पलटकर सीढियां चढ़ती हुई तहखाने से निकल गई।

मार्तण्ड सिंह तथा चंद्रभाल भी प्रकृति के इस न्याय पर दंग रह गए थे। दोनों बहुत ध्यान से कभी रजनी को तो कभी निर्भय सिंह को देख रहे थे।

और रजनी खड़ी सोच रही थीं-क्या होने वाला था और क्या हो गया? अंशु उसकी बहन है और उसकी लाज को लूटने का प्रयत्न करने वाला यह लुटेरा उसका पिता है? नहीं-नहीं, अंशु उसकी बहन हो सकती है, परन्तु यह लुटेरा उसका पिता नहीं हो सकता। इस लुटेरे को उसका बाप हर्गिज नहीं होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति से उसने क्यों जन्म लिया? जिस बाप ने उसे बेटी बनकर पाला-पोसा, उसके घर उसने क्यों नहीं जन्म लिया? वह इस पापी बाप के रहते हुए कैसे जीवित रह सकती है? संसार को कैसे मुंह दिखा सकती है? नहीं-नहीं, उसे जीने का कोई अधिकार नहीं। उसे मर जाना चाहिए, उसे मर जाना चाहिए।

यह संसार उसके जीने योग्य स्थान नहीं है। उसकी मृत्यु ही उसे संसार की गंदी दृष्टि से बचा सकती है। उसकी मृत्यु? रजनी ने सोचा तो अंशु याद आ गईं-उसकी बहन। वह भी तो चंद्रभाल को प्यार करती है, उसे चाहती है। वह तो चंद्रभाल की अंशु है-चंद्राशु। अंशु बिना चंन्द्रमा का महत्व ही क्या है? उसे अंशु के रास्ते से हट जाना चाहिए। तभी उसकी बहन का प्यार साकार हो सकेगा।

वह सदा चंद्रभाल के घर में धृणा का पात्र रही है, परन्तु अंशु को तो चंद्रभाल के घर वाले आरंभ से ही बहुत चाहते आए हैं। रजनी ने एक इरादा कर लिया-एक बहुत भयानक इरादा-मृत्यु का। उसका दिल कांप गया। परन्तु उसके इस इरादे की पूर्ति में ही सबका भला था-अंशु का, दोनो एक-दूसरे के योग्य थे। उसका अपना भी भला था। मृत्यु के बाद कोई उसके मुंह पर नहीं कह सकता था कि यह वह लड़की है, जिसके बाप ने इसी की इज्जत लूटनी चाही थी।

मृत्यु स्वीकारने से पहले रजनी ने अपने कुंवर साहब को अंतिम बार देखना चाहा, परन्तु वह ऐसा नहीं कर सकी। देख लेती तो शायद अपने इरादे में वह सफल नहीं होती।

वह पलटी, फिर अचानक ही बहुत तेजी के साथ सीढ़ियां चढ़ती हुई कमरे से बाहर निकल गई। आखिर कहीं तो उसे आत्महत्या करने का स्थान मिलेगा ही।

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