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Thriller इंसाफ

वो मुझे भीतर एक सुसज्जित ड्राईंगरूम में लेकर आयी । उसके कहने मैं एक सोफाचेयर पर ‘सिट डाउन’ हुआ, वो मेरे सामने बैठी, फिर बोली - “क्या पूछताछ करनी है ?”

“चंद सवाल हैं ।”

“पड़ोस में हुए कत्ल के बारे में ही न !”

“हां ।”

“बेचारी । भरी जवानी में भगवान को प्यारी हो गयी । अच्छी लड़की थी...”

साहबान, अच्छे लोग भगवान को जल्दी प्यारे हो जाते हैं, ये एक सबक है जो खाकसार की राय में बच्चों को बुरा बनने के लिये प्रेरित करता है ।

“...ये कोई उम्र होती है इस दुनिया से चल देने की ! जुल्म हुआ बेचारी के साथ ! रक्षक ही भक्षक बन गया । फांसी लगे कम्बख्त को तो बेचारी का इंसाफ हो, उसकी आत्मा चैन पाये ।”

मैं उसे न टोकता तो मकतूला का फातिहा वो अभी और पढती ।

“बाई दि वे आप कमला ओसवाल ही हैं न !”

“लो ! और क्या मैं मेड हूं ! कुक हूं । आया हूं ?”

“यानी कि हैं ?”

“हां, भई । पुलिस से हो तो तुम्हें मालूम होना चाहिये...”

“सीआईडी से । पहले भी बोला । हमारा केस से अभी वास्ता पड़ा है । अब तक आप से जो पूछताछ हुई थी, थाने से हुई थी । स्पैशलाइज्ड पूछताछ यूं समझिये कि अब शुरू हो रही है जो कि सीआईडी करती है । फालोड ?”

“य.. यस ।”

“लाउड एण्ड क्लियर ?”

“यस ।”

अब मेरा रौब - फर्जी - उस पर गालिब हो रहा था, अब उसके कर्कश लहजे में तब्दीली आ रही थी ।

“भगवान की हर जगह नजर होती है लेकिन फिर भी कई बार, कई जगहों से नजर चूक जाती है । जैसे पिछले महीने आपके पड़ोस से चूक गयी क्योंकि उसकी तवज्जो कहीं और थी, वो किसी और केस की फाइल देखने में मशगूल था । इसलिये पड़ोस में वो जुल्मी वारदात हो गयी ।”

“वही तो ! यही तो मैं कह रही थी जब...”

“मैंने टोक दिया था ?” - मैंने फिर उसे घूरा ।

“नहीं, नहीं ।” - वो हड़बड़ाई ।

“तो” - मैं बदले स्वर में बोला - “आपको यकीन है कि पति कातिल है ?”

“पूरा ।” - वो दृढता से बोली - “वन हण्डर्ड परसेंट । मैंने तो पहली बार ही जब देखा था तो एक निगाह में भांप लिया था कि नालायक था, मतलबी था, हरकती था, उस भली, बड़े घर की लड़की के काबिल तो हरगिज नहीं था । देखो तो, अपने मुल्क में एलिजिबल ग्रूम्स की कमी है जो बेचारी ने नेपाली से माथा फोड़ा...”

“नाता जोड़ा ।”

“समझा ऐसा लेकिन जो हुआ उससे साफ हुआ कि न हुआ कि माथा फोड़ा !”

“ठीक ।”

“पता नहीं सरकार इन लोगों पर कोई सख्ती क्यों नहीं करती, इनकी आमद पर कोई अंकुश क्यों नहीं बरतती ! फिर भी आते हैं तो औकात में रहें । चौकीदारी करें, डोमेस्टिक सर्वेंट बनें, आके बराबरी करने लग जाने का क्या मतलब ? मेरे को तो इसी बात की कुढ़न थी कि पड़ोस में नेपाली आ बसा था और बतौर पड़ोसी मेरे से ईक्वल लैवल पर पेश आने की हिम्मत करता था ।”

“लगता है वसुधैव कुटम्बकम् में आपकी कोई आस्था नहीं है । बहुत संकुचित दृष्टिकोण है आपका !”

“भई, इस मामले में तो है, भले ही कोई मुझे बुरा कहे ।”

“आप नेपालियों के खिलाफ हैं ?”

“बिल्कुल नहीं । नेपाल में रहें तो काहे की खिलाफत !”

क्या औरत थी ! सार्थक बराल के खिलाफ इसलिये नहीं थी क्योंकि वो कातिल था, बल्कि इसलिये थी क्योंकि वो नेपाली था ।

“लड़की तो नादान थी” - वो कह रही थी - “हैरानी है कि अमरनाथ जी ने भी उस बेमेल शादी में कोई दखल न दिया ।”

“आप अमरनाथ परमार से वाकिफ हैं ?”

“लो ! ये कोठी हमने उन्हीं से तो खरीदी थी !”

“हम !”

“मैं और मेरे पति - भगवान उन्हें जनतनशीन करे ।”

“वो इस दुनिया में नहीं हैं ?”

“नहीं हैं न ! पांच साल पहले मुझे अकेला छोड़ गये मदन ओसवाल । मासिव हार्ट अटैक हुआ । अगली सांस न आयी ।”

“ओह ! आई एम सॉरी ।”

उसने एक फरमायशी आह भरी और खुश्क आंखों पर यूं बाएं की पुश्त फिराई जैसे छलक आयी हों ।

त्रिया चरित्रम् !

“श्यामला से अच्छी तरह से वाकिफ थीं ?” - मैंने सवाल किया ।

“हां, खुद अच्छी तरह से । पड़ोसी पड़ोसी से वाकिफ होता ही है । ऐसे ही तो नहीं कहा गया कि हमसाया मांजाया ।”

“वैरी वैल सैड । बहुत उच्च विचार हैं आपके बतौर पड़ोसी !”

“बहुत अच्छी लड़की थी ?” - वो आह भरकर बोली - “मेरे पास अक्सर आती जाती थी चाय वगैरह पीने या... या कुछ भी करने ?”

“आप भी उधर जाती थीं ?”

“हां, लेकिन ज्यादा नहीं । वो ज्यादा आती थी ।”

कमबख्त साफ हिंट दे रही थी कि पड़ोसन खिदमत कराती ज्यादा थी, करती कम थी ।

“हसबैंड से कोई मेल मुलाकात नहीं थीं आपकी ?”

“लो ! मुझे उस गोरखे का मेरे करीब खड़ा होना गंवारा नहीं था, मैं उसे अपने घर में घुसने देती !”

“ओह !”

“उस एक नेपाली के यहां का बसने से पड़ोस में तो नेपालियों के यूं फेरे लगते थे जैसे वो प्राइवेट रेजीडेंस न हो, नेपालियों का क्लब हो ।”

“काफी आते थे ?”

“आते ही थे ? दिखते ही रहते थे अक्सर आते जाते ।”

“यहां से ?”

“और कहां से ?”

“फासले से दिख जाते थे कि नेपाली थे ?”

“हां । फिर अक्सर नेपाली ड्रैस में भी तो आते थे !”

“नेपाली ड्रैस ?”

“वो क्रास्ड खुखरियों के बिल्ले वाली नेपाली टोपी, बन्द कालर वाला घुटनों से ऊंचा कुर्ता, चूड़ीदार पाजामा, कोट, दि वर्क्स !”

“आई सी । होते कौन थे ?”

“कौन होंगे । श्यामला के तो कुछ लगते होंगे नहीं ! हसबैंड के दोस्त या रिश्तेदार होने के अलावा और कौन होंगे !”

“सब सार्थक के ही मिलने वाले होते थे ?”

उसने कुछ क्षण उस सवाल पर विचार किया ।

“नहीं ।” - फिर बोली - “मेरे खयाल से कोई कोई श्यामला से भी मिलने आता था ।”

“अच्छा !”

“हां, जब सार्थक घर नहीं होता था, खाली श्यामला घर होती थी तो तब कोई वैसा शख्स आता था तो आ कर किससे मिलता था ? श्यामला से ही तो !”

“यानी श्यामला को नेपालियों से कोई विरक्ति नहीं थी ?”

“नहीं ही थी । होती तो नेपाली से शादी करती ?”

“उस आवाजाही की बाबत - सार्थक की हाजिरी में या गैरहाजिरी में - आपने कभी श्यामला से सवाल किया ?”

“भई, वो उनका निजी मामला था, मेरा कहां बनता था कोई सवाल करना !”

“वो आपके यहां आती जाती थी, आपके साथ चाय-नाश्ता-पानी शेयर करती थी यानी कि सखी थी ! सखी से बनता तो है सवाल करना !”

“मैंने नहीं किया था कभी । बोला न, वो उनका निजी मामला था ।”

“चलिये, ऐसे ही सही लेकिन उस इतनी आवाजाही के बारे में खुद आपने कुछ सोचा तो होगा कि क्यों था ऐसा ! कोई राय तो कायम की होगी कि क्यों इतने नेपाली पड़ोस में विजिट करते थे !”

“नई, राय तो कायम की मैंने ?”

“क्या ?”

“बोलना मुनासिब होगा ?”

“मेरे सामने बोलना मुनासिब होगा । ये न भूलिये कि मैं खास पूछताछ के लिये ही यहां आया हूं ।”

“हूं ।”

“एण्ड आई एम ए डिटेक्टिव । रिमैम्बर ?”

“ओके, तुम कहते हो तो...”

“मैं कहता हूं ।”

“...बोलती हूं ।” - वो सोफे पर आगे को सरक आयी और मेरी तरफ झुक कर राजदाराना लहजे से बोली - “लेकिन इसलिये बोलती हूं क्योंकि तुम इसरार कर रहे हो । मेरा निजी खयाल ये है कि वो सब नशेड़ी थे जो पड़ोस में आते थे ।”

“जी !”

“ड्रग एडिक्ट्स थे । ड्रग्स की तलाश उन्हें यहां लाती थी । कौन नहीं जानता कि नेपाल नॉरकॉटिक्स समगलिंग का बड़ा अड्डा है । पाकिस्तान, अफगानिस्तान से ओरीजिनेट होने वाले ड्रग्स का इन्डिया तक रूट वाया नेपाल है । वो लड़का जरूर कोई ड्रग समगलर था - ड्रग समगलर नहीं था तो किसी समगलर का एजेंट जरूर था, उसका डीलर जरूर था और पड़ोस में फैली नेपालीज की मुतवातर आवाजाही ड्रग्स की वजह से थी ।”

“ये बड़ा इलजाम है । आपके पास ऐसा सोचने की कोई बुनियाद है ?”

“कोई बुनियाद नहीं । जो मेरे मन में आया, मैंने बोल दिया । उस आवाजाही की जो वजह मुझे सूझी, वो मैंने बयान कर दी ।”

“वो गलत भी हो सकती है !”

“हो सकती है । मैंने कब दावा किया कि नहीं हो सकती ! लेकिन सही भी हो सकती है ।”

“आवाजाही इक्का दुक्का होती थी या ग्रुप में ?”

“ग्रुप में नहीं । बड़े ग्रुप में तो बिल्कुल नहीं । अमूमन जो आता था, अकेला आता था, कभी कभार दो आते थे, लेकिन एक टाइम में दो से ज्यादा कभी नहीं ।”

“आप मुतवातर निगाह रखती थी ?”

“निगाह नहीं रखती थी” - उसने तुरन्त विरोध किया - “निगाह पड़ जाती थी मेरी । आजू बाजू में जो हो रहा हो, उससे आंखें बन्द तो नहीं कर सकती मैं !”

“ठीक । आने वाले हर बार नये होते थे या चन्द लोग ही बार बार आते थे ?”
 
“ये बात मेरे ध्यान में नहीं आयी थी ।”

शुकर ! कोई बात तो थी जो उसके ध्यान में नहीं आयी थी वर्ना मैं तो सोच रहा था कि उसे ये भी मालूम था कि किस आगंतुक के दांत नकली थे, कौन बाल रंगता था या किसके कान के पीछे काला तिल था ।

“पुलिस को” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “अपने बयान में आपने कहा था...”

तभी कालबैल बनी ।

“एक्सक्यूज मी ।” - वो उठती हुई बोली ।

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

वो उठ कर दरवाजे पर चली गयी ।

थोड़ी देर बाद वो वापिस लौटी तो उसके हाथ में एक शीशी थी जो उसने अपनी सोफाचेयर के बाजू में साइड टेबल पर रख दी ।

मैं भी समकोण पर लगी सोफाचेयर पर उस साइड टेबल के करीब ही बैठा हुआ था इसलिये शीशी पर लगे लेबल पर से जोल्पीडम -10 एमजी (ZOLPIDEM-10mg) पढ़ने में मुझे कोई दिक्कत न हुई ।

“हां तो” - वो बोली - “तुम कह रहे थे !”

“पुलिस को अपने बयान में आपने कहा था” - मैं बोला - “कि कत्ल की रात को आपने सार्थक को घर से निकल कर कहीं के लिये रवाना होते देखा था !”

“हां । शाम आठ बजे जब मैं परचेजिंग के लिये घर से निकली थी तो मैंने सार्थक को भी घर से बाहर कदम रखते देखा था । मेरी उधर, उनकी कोठी की तरफ तवज्जो इसलिये थी कि तभी पति पत्नी में भीषण तकरार हो के हटी थी जिसकी आवाजें मैं यहां बैठे बिना कोशिश के साफ सुन सकती थी । वो कोई नयी बात भी नहीं थी । उन दिनों वो अक्सर ऐसे लड़ते-झगड़ते थे ।”

“उस रोज किस बात पर झगड़ रहे थे ?”

“ये तो मुझे मालूम नहीं !”

“लेकिन जब आप कहती हैं कि यहां सब कुछ सुनायी देता था...”

“आवाजें आती थी लेकिन मैं हमेशा ही तो उनकी तरफ तवज्जो नहीं देती थी ! एक ही तो काम नहीं होता था मुझे ! कभी कोई बात कान में पड़ती थी, कभी नहीं पड़ती थी, कभी पड़ती भी थी तो मेरे अपने कामों में मसरूफ होने की वजह से माइन्ड रजिस्टर नहीं करता था । तुम समझे मेरी बात ?”

“जी हां, समझा । आपने सार्थक को घर से निकलकर जाते देखा था, तब आप कहां थीं ?”

“सड़क पर थी । बिग बाजार की तरफ रवाना हो रही थी । भुनभुनाता सा सार्थक मेरे सामने से गुजर कर जाकर अपनी कार में बैठा था । पीछे भीतर कोठी में श्यामला तब भी चीख चिल्ला रही थी ।”

“सार्थक से कोई बात की थी ? तब कोई औपचारिक हल्लो वगैरह हुई थी आप दोनों में ?”

“न ! न उसने कोई कोशिश की थी, न मैंने परवाह की थी ।”

“बहरहाल ये जाहिर है कि तब वो श्यामला को पीछे जिन्दा छोड़कर गया था ?”

“हां । उस सिलसिले में जो हुआ था, वो दूसरे राउन्ड में हुआ था, जबकि वो वापिस लौटा था ।”

“कब ?”

“दस बजे । ठीक दस बजे ।”

“आपने उसे लौटते देखा था ?”

“सुना था ।”

“जी !”

“टुन्न लौटता था तो अक्सर अपनी कोठी का गेट भूल जाता था । मेरी कालबैल बजाने लगता था । उस रात भी ऐसा ही हुआ था लेकिन तब कदरन जल्दी उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था । कालबैल के जवाब में मैंने खिड़की के शीशे से बाहर झांका था तो मेरे गेट पर तब कोई नहीं था लेकिन बगल के गेट से भीतर यार्ड में एक साया दाखिल हो रहा था जो कि सार्थक ही हो सकता था । बाद में जो हुआ था, उससे कनफर्म हुआ था कि सार्थक ही था ।”

“तब झगड़े-तकरार की आवाजें फिर सुनाई दी थीं आपको ?”

“नहीं । तब तो वो यूं समझो कि उल्टे पांव वापिस लौट गया था ।”

“उल्टे पांव !”

“तकरीबन । बीवी को मार गिरा के, ड्रैस चेंज करके, निकल लेने में टाइम ही कितना लगता था ?”

मैं सम्भल कर बैठा ।

“ड्रैस चेंज करके ?” - मैं बोला ।

“हां ।”

“मैं समझा नहीं ।”

“क्या नहीं समझे ? क्यों नहीं समझे ? कोई फारसी तो बोली नहीं मैंने !”

“आप ये कहना चाहती हैं कि घर से बाहर निकलने से पहले उसने ड्रैस चेंज कर ली थी ?”

“हां । जब मैंने उसे पहले देखा था तो जींस, जैकेट पहने था, दूसरी बार देखा था तो नेपाली ड्रैस पहने था ।”

“वजह ?”

“समझना इतना मुश्किल तो नहीं ! खून किया था उसने । खून के छींटे पड़ गये होंगे कपड़ों पर !”

“मुमकिन है । लेकिन तब चेंज के लिये नेपाली ड्रैस क्यों ?”

“उस घड़ी वही हाथ आयी होगी !”

“ठीक । खून के छींटों वाली ड्रैस पीछे छोड़ के गया ? पुलिस के लिये सबूत पीछे छोड़ के गया ?”

“पुलिस के आने से पहले खून के छींटे साफ कर दिये होंगे । पुलिस को फोन किया ही तब होगा जब कि ये काम कर चुका होगा । खून के छींटे साफ किये, ड्रैस बदली फिर फोन किया ।”

“ड्रैस फिर बदली ?”

“भई, जब वो गिरफ्तार हुआ था, तब वो अपनी नेपाली ड्रेस में नहीं था तो बदली ही !”

“आई सी ।”

“तब सामने की कोठी वाले दर्शन सक्सेना ने भी तो उसे देखा था ! उन्होंने तो उसे मेरे डस्टबिन में मर्डर वैपन डालते भी देखा था । ये उनका पुख्ता, हल्फिया बयान है जो उन्होंने पुलिस को दिया है । तुम्हें उस बयान की खबर होनी चाहिये ।”

“है ।”

“तो फिर ?”

“कुछ नहीं । बहरहाल रात दस बजे सार्थक कोठी में लौटा, बस जरा सी देर वहां ठहरा और वापिस निकल लिया ?”

“हां । अगर कत्ल का इरादा पहले से मजबूत किया हो तो ‘जरा सी देर’ काफी होती हैं । जरूर वो ये सोच के ही घर लौटा था कि जाते ही बीवी पर टूट पड़ना था, उसे मार देना था । वो घर में घुसा, बीवी के रूबरू हुआ, करीब पड़ी वो चारभुजी नेपाली मूर्ति उठाई जो कि मर्डर वैपन साबित हुई है और उससे पूरी ताकत से बीवी के सिर पर मार कर दिया । बीवी को पता भी न लगा कि उसके साथ क्या बीती थी कि वो ढेर । आई कम, आई हिट, आई गो ।”

“लाइक जूलियस सीजर ?”

“आफकोर्स । वो गोरखा उस वक्त क्या खुद को जूलियस सीजर से कम सूरमा समझ रहा होगा !”

“नशा किसी को भी आसमान पर पहुंचा सकता है । गीदड़ को शेर बना सकता है ।”

“यू सैड इट ।”

“आप अपनी शापिंग से कब लौटी थीं ?”

“दस बजे ।”

“इतना लेट !”

“सोमवार था न । भोलेनाथ के मन्दिर भी चली गयी थी ।”

“आई सी । कोई और बात जो आप बताना चाहती हों ?”

“कोई और बात जो तुम पूछना चाहते हो ?”

“है तो ? सही एक बात !”

“कौन सी ?”

“निसंकोच कहूं ?”

“हां ।”

“बुरा तो नहीं मानेंगी ?”

“अरे नहीं, भई ।”

“बुरा लगे तो खफा न होना, भुला देना ।”

“अच्छा ।”

“तो दिल की बात बेखटके कहने के लिये मुझे अभयदान है ?”

“हां, बेखटके कहो ।”

“आप घर में अकेली हैं इसलिये झिझक रहा हूं ।”

उसकी आंखों में रंगीन डोरे तैर गये ।

“मत झिझको । कहो ।”

“देखिये, मैं...”

“अरे, अब कह भी चुको ।”

“टायलेट कहां है ?”

“क्या !” - वो जैसे आसमान से गिरी, आंखों से रंगीन डोरे यूं गायब हुए जैसे स्विच आफ करने पर बिजली गायब होती है ।

“एक नम्बर की लगी है ।” - मैं बोला ।

वो उठ के खड़ी हुई और उखड़ कर बोली - “सड़क के दायें बाजू मोड़ के करीब कहीं पब्लिक क्न्वीनियंसिज का बोर्ड लगा देखना ।”

“थैंक्यू, मैम । थैंक्यू फार युअर वैलुएबल हैल्प ।”

“अब तो मुझे तुम्हारे सीआईडी डिटेक्टिव होने पर भी शक है । अपना आई-कार्ड जरा फिर दिखाओ मुझे ।”

“सॉरी !” - मैं भी उठ खड़ा हुआ - “ऐसा नियम नहीं है ।”

“क्या बोला ?”

“सरकारी नियम के मुताबिक एक सरकारी आइटम एक औरत को एक कैलेंडर डेट में दो बार नहीं दिखाई जा सकती ।”

“ओ, शट अप । अब मैं जानती हूं तुम सीआईडी-वीआईडी कुछ नहीं हो । कौन हो तुम ?”

“खूब पहचान लो राज हूं मैं, जिंसेउल्फत का फकीर हूं मैं ।”

वो मुंह बाये मेरा मुंह देखने लगी ।

“जयहिन्द ।” - मैंने अपने तर्जनी उंगली से पेशानी को छुआ - “जय भारत ! जय मोदी !”

मैं लम्बे डग भरता वहां से बाहर निकल गया ।

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मैंने दर्शन सक्सेना की कोठी की कालबैल बजाई ।

पहले मार्केट में जा के एक कैमिस्ट शाप से मैंने मालूम किया था कि जोल्पीडम नींद की गोलियां थीं और दस मिलीग्राम हैवी डोज माना जाता था ।

दिन की उस घड़ी उसके घर होने की मुझे कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी लेकिन न सिर्फ वो घर था, घंटी के जवाब में खुद गेट पर प्रकट हुआ ।

उसने अपलक मेरा मुआयना किया ।

मैंने भी उसका वैसा ही मुआयना किया ।

वो पचास के पेटे में पहुंचता, अच्छी तन्दुरुस्ती वाला चुस्त दुरुस्त व्यक्ति था । वो क्लीनशेव्ड था और उसके सिर के बाल इतने घने और व्यवस्थित थे कि मुझे शक हुआ कि विग लगाता था । वो पाउच पॉकेट्स वाली आधुनिक हाफ पैंट्स और गोल गले की काली टी-शर्ट पहने था ।

“यस ?” - वो बोला ।

“सक्सेना साहब ?” - मैंने पूछा - “दर्शन सक्सेना साहब ?”

“हां । कौन हो ? क्या चाहते हो ?”

मुझे लगा कि परिचय के मामले में वहां पीछे चली ट्रिक नहीं चलने वाली थी, लिहाजा मैं विनयशील स्वर में बोला - “मेरा नाम राज शर्मा है । प्राइवेट डिटेक्टिव हूं । पिछले महीने वो सामने वाली कोठी में हुई वारदात के बारे में आपसे बात करना चाहता हूं ।”

“प्राइवेट डिटेक्टिव ?” - उसकी भवें उठी ।

“जी हां ।” - ने उसे अपना आई-कार्ड दिखाया जिसकी तरफ उसने कोई तवज्जो न दी ।

“ऐसे होते हैं ?”

“और भी कई शेप और साइज के होते हैं लेकिन ऐसे भी होते हैं ?”

“हूं । किसके लिये प्राइवेट डिटेक्टिंग कर रहे हो ?”

“हसबैंड के लिये । जो गिरफ्तार है ।”

“तुम समझते हो तुम्हारी डिटेक्टिंग सार्थक को बेगुनाह साबित कर देगी ?”

“कोशिश तो है ऐसी !”

“नहीं कर पाओगे । कुछ हाथ नहीं आयेगा ।”

“कुछ तो हाथ आ चुका है ।”

“क्या ?”

“फीस । जो मैं एडवांस में चार्ज करता हूं ।”

“ओह ! तो यूं कहो कि डिटेक्टिंग नहीं, डिटेक्टिं करने का ड्रामा कर रहे हो ताकि फीस को जस्टीफाई कर सको ।”

“है तो नहीं ऐसा लेकिन आप ऐसा समझते हैं तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है ।”

“सो नाइस आफ यू । ठीक है, करो । करो अपनी डिटेक्टिंग ।”

“वो उधर मूनीसिपल मार्केट में मैंने आती बार एक रेस्टोरेंट देखा था । अच्छा जान पड़ता था । वहां चलें तो कैसा रहे ? जरा आराम से, इत्मीनान से, बैठ कर बातचीत हो जायेगी । बिल मैं भरूंगा ।”

वो तनिक हड़बड़ाया, उसके होंठों पर एक क्षीण मुस्कराहट प्रकट हुई और गायब हुई ।

“वैरी स्मार्ट !” - फिर बोला - “यू श्योर नो हाउ टु ड्राप ए हिंट ।”

मैं खामोश रहा ।

“आओ ।” - वो गेट खोलता बोला ।

“थैंक्यू ।”

मैंने भीतर कदम रखा ।

वो कोठी यूं बनी हुई थी कि वो यार्ड के फर्श से कोई चार फुट ऊंचाई पर थी । नीचे दीवार में रोशनदान दिखाई दे रहे थे जिन से लगता था कि उसमें - सारे में नहीं तो कम से कम फ्रंट में - तहखाना था । टैरेस तक पहुंचने के लिये पांच-छ: सीढ़ियां चढनी पड़ती थीं जिन्हें तय करके मैं उसके साथ अग्रभाग में बने ड्राईंगरूम में पहुंचा । ड्राईंगरूम के फ्रंट में विशाल फ्रेंच विंडोज थीं, हाइट पर होने की वजह से जिनके शीशों में से बाहर के माहौल का नजारा बेहतर तरीके से किया जा सकता था ।

ड्राइंगरूम में हम दोनों आमने सामने बैठ गये तो उसने मुझे सिग्रेट आफर किया । पैकेट डनहिल का था इसलिये कृतज्ञताज्ञापन करते मैंने एक सिगरेट ले लिया । उसने भी सिग्रेट लिया और लाइटर से बारी बारी दोनों सिग्रेट सुलगाये ।

“हाउसकीपर कहीं गयी हुई है ।” - वो बोला - “देर से लौटेगी, इसलिये तुम्हारी कोई और खिदमत मैं नहीं कर सकता ।”

“और खिदमत दरकार भी नहीं है । आपने मेरे से बात करना कुबूल किया, यही बड़ी खिदमत है मेरी । थैंक्यू ।”

उसने सिर हिला कर थैंक्यू कबूल किया और सिग्रेट का कश लगाया ।

“क्या खयाल है आपका केस के बारे में ?” - मैंने पूछा ।

“वही जो सबका है ।”

“हसबैंड कातिल है ?”

“यकीनन । फांसी पर झूलेगा कमीना । जिंदगी बर्बाद कर दी फूल सी लड़की की । इतने बड़े, हैसियत वाले बाप की बेटी और पसन्द आया तो कौन ! एक नेपाली छोकरा ! साला न घर का न घाट का ! खुल्ला बार्डर है । इन्डिया आ जाते हैं हमारी छाती पर मूंग दलने के लिये और ऐसे गुल खिलाते हैं ।”

“आप नापसंद करते हैं नेपालियों को ?”

“अरे, नहीं, भई । बढिया, संस्कारी लोग होते हैं नेपाली । एक ही तो हिन्दू राष्ट्र है सारी दुनिया में ! भारत को होना चाहिये था लेकिन भला हो हमारे आजादी के वक्त के नेताओं का, न हो सका । अपने घर में रहें तो मेरे को क्या प्राब्लम है नेपालियों से ! लेकिन जब बंगलादेशियों की तरह झुण्ड के झुण्ड इन्डिया में घुस आते हैं तो ...होती है प्राब्लम ।”

“आप काम क्या करते हैं ? अपना बिजनेस है या जॉब करते हैं ?”

“जॉब करता हूं । इलैक्ट्रिकल इंजीनियर हूं मैटल बाक्स कार्पोरेशन में । फरीदाबाद डेली अप एण्ड डाउन करता हूं ।”

“आज नहीं गये ?”

“आज तबीयत जरा नासाज थी, इसलिये छुट्टी की ।”

“आई सी । वारदात की रात को आप घर पर थे ?”

“और कहां होता ! इतनी ठण्ड के मौसम में रात को और कहां होता !”

“ठीक ! वारदात का वक्त रात दस बजे का बताया जाता है, उस वक्त आप कोठी में कहां थे ?”

“यहीं था ।”

“वहीं, जहां इस वक्त बिराजे हैं ?”

“नहीं । उधर फ्रेंच विंडोज के पास ।”

“पुलिस की रिपोर्ट कहती है कि उस रात को वारदात के वक्त के आसपास आपने हसबैंड को - सार्थक बराल को - अपनी कोठी से निकलते देखा था !”

“ठीक कहती है ।”

“ऐसा इसलिये मुमकिन हुआ क्योंकि तब आप इत्तफाक से वहां, उन फ्रेंच विंडोज के करीब थे और उनसे बाहर देख रहे थे ?”

“हां ।”

“सार्थक को साफ देखा था ?”

“हां ।”

“फिर तो ये भी साफ देखा होगा कि तब वो क्या पहने था !”

“अपनी नेपाली ड्रैस पहने था ।”

“अक्सर पहनता था ?”

“अक्सर तो नहीं लेकिन पहनता ही था । मुझे बाद में पता चला था कि उस रोज उनका कोई नेशनल फेस्टीवल था । शायद विवाह पंचमी नाम था त्योहार का । ऐसा मौका हो तो वो अपने फैलो कंट्रीमैन के साथ लेट नाइट जश्न के लिये अपनी नेपाली ड्रैस में निकलता था ।”

“बीवी का कत्ल और जश्न दोनों एक साथ !”

“अब मैं क्या बोलूं ?”

“शायद जब वो कोठी से निकला था, तब अभी कत्ल नहीं हुआ था !”

“नानसेंस ! जब पुलिस उसे यकीनी तौर पर कातिल ठहरा रही है तो ऐसा कैसे हो सकता था !”

“बात कुछ और हो रही थी । तो आपने सार्थक को साफ देखा था । और क्या देखा था ?”

“और क्या देखा था ! और ये देखा था कि वो दौड़ता हुआ निकल कर सड़क पर आया था और मेरी आंखों के सामने उसने बाजू की कोठी के - कमला ओसवाल की कोठी के - गेट के करीब के डस्टबिन में कोई चीज डाली थी जो कि बाद में उजागर हुआ था कि एक पीतल की चारभुजी मूर्ति थी जो कि अलायकत्ल साबित हुई थी । फिर वो सड़क पर खड़ी अपनी सान्त्रो में सवार हुआ था और यूं आंधी की तरह कार वहां से दौड़ाई थी कि आगे खड़ी मेरी स्विफ्ट की टेललाइट ठोक गया था ।”

“आप कार सड़क पर खड़ी करते हैं ?”

“सभी करते हैं । इधर कोठियां छोटी छोटी हैं - दो-दो सौ गज में भी - गैराज नहीं हैं ।”

“आपकी स्विफ्ट के पीछे सार्थक की सान्त्रो खड़ी थी ?”

“हां ।”

“उसकी अपनी तरफ क्यों नहीं ?”

“तब इधर जल बोर्ड की खुदाई हो रही थी, पुरानी जंग लगी पानी की पाइपलाइन बदली जा रही थीं, तब उधर पाकिंग के लिये जगह नहीं थी ।”

“आई सी । रात दस बजे आपने सार्थक को कोठी से निकलते देखा था ?”

“हां ।”

“निकलते देखा था, दाखिल होते नहीं देखा था ?”
 
“कमला ओसवाल ने देखा था न ! वो गवाह है न कि जब वो लौटा था तो मुश्किल से पांच मिनट के लिये कोठी के भीतर ठहरा था और फिर बगूले की तरह वहां से निकल लिया था ।”

“बहरहाल बजातेखुद आप सिर्फ उसकी वहां से यकायक हुई रवानगी के गवाह हैं, उससे पहले की वापिसी के नहीं !”

“यही समझ लो ।”

“उसने आपकी टेल लाइट ठोकी, आपका नुकसान किया...”

“मेरी स्विफ्ट नयी है, उसकी आउटडेटिड सान्त्रो जैसी खटारा नहीं जो उसने सैकंडहैण्ड खरीदी थी - और वो भी किस्तों पर - पता नहीं किस्त भरता भी था या नहीं !”

“मेरा सवाल ये था कि क्या तब अपने नुकसान की बाबत आपने पुलिस को फोन किया था ?”

“नहीं ।”

“वजह ?”

“वो कोई बड़ा डैमेज नहीं था । छोकरा अपनी करतूत से मुकर तो सकता नहीं था, सुबह मैं उससे बात करता और नुकसान की भरपाई की मांग करता । भरपाई से इंकार करता तो सोचता रपट लिखाने की बाबत । लेकिन नौबत ही न आयी । पहले ही वो कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया गया, इतनी बड़ी वारदात में कार ठोकने की वो घटना आई गयी हो गयी ।”

“बतौर पड़ोसी आपका उससे कभी कोई वास्ता पड़ता था ? उससे या मकतूला श्यामला से लोकाचार में, कर्टसी में, कभी कोई बातचीत होती थी ?”

“बहुत कम । न होने के बराबर ।”

“आपकी बीवी की ?”

“बीवी नहीं है ।”

“ओह ! है नहीं या कभी हुई ही नहीं ?”

उसने जवाब न दिया ।

मालिक था पट्ठा अपनी मर्जी का । उस महकमे में मेरा क्या जोर था उस पर !

जरूर बीवी उसकी कोई दुखती रग थी जिसे छेड़ा जाना उसे गंवारा नहीं था ।

“कमला ओसवाल का कहना है” - मैंने नया सवाल किया - “कि उन लोगों के घर में नेपाली तबके की बहुत आवाजाही थी । आपने भी कभी ऐसा कुछ नोट किया ?”

“नहीं । मेरे को ऐसी बातों की फुरसत नहीं लेकिन कमला ओसवाल अगर ऐसा कहती है तो नाहक तो न कहती होगी !”

“जिसके पास कि ऐसी बातों की फुरसत है ?”

वो सकपकाया, उसकी भवें सिकुड़ी, महज इतने से ही उसकी आकस्मिक अप्रसन्नता उजागर होने लगी ।

“सिग्रेट लो ।” - फिर बोला ।

“जी नहीं, बस । एक काफी है । शुक्रिया ।”

उसने दरवाजे की तरफ देखा ।

मैंने उसका इशारा समझा जो कि मुझे ‘फूट ले’ कह रहा था । अक्लमन्द को इशारा काफी होता था और दिल्ली और आसपास खासोआम को मालूम था कि मैं रजिस्टर्ड अक्लमन्द था । लिहाजा तब मेरा उठ खड़ा होना ही बनता था ।

“जा रहे हो ?” - वो बोला ।

“भेजा जा रहा हूं ।” - मैं बोला ।

उसकी आंखों में एक धूर्त चमक आयी और लुप्त हुई ।

फिर वो आउटर गेट तक मेरे साथ आया । उसने मेरे लिये गेट खोला ।

मेरा अभिवादन में हाथ उठा, मैंने आगे कदम बढ़ाया, ठिठका और फिर बोला - “एक छोटा सा सवाल और ।”

“पूछो वो भी ।” - वो तनिक उतावले स्वर में बोला ।

“कत्ल की रात कैसी थी ? अन्धेरी या रौशन ?”

वो सकपकाया, फिर उसकी सूरत से यूं लगा जैसे याद करने के लिये दिमाग पर जोर डाल रहा हो ।

“भई, जहां तक मुझे याद पड़ता है” - फिर बोला - “घुप्प अन्धेरी तो नहीं थी ! होती तो मुझे सामने की कोठी से निकलता एक साया ही दिखाई दिया होता, मैं उसे पहचान न पाया होता कि वो सार्थक था, जान न पाया होता कि उसके हाथ में कोई चीज थी जो कि उसने कमला ओसवाल के डस्टबिन में डाली थी, देख न पाया होता कि वो अपनी नेशनल ड्रैस पहने था ।”

“यानी उस रात अमावस नहीं थी तो पूर्णमासी भी नहीं थी !”

“यही समझ लो । वैसे चान्द की घट बढ़ तारीख से जानी जा सकती है ।”

“जरूरत नहीं । आपने जो जवाब दिया है, मेरे लिये वही काफी है ।”

“हूं ।”

“स्ट्रीट लाइट्स की क्या पोजीशन थी ?”

“दायें बायें दो करीबी स्ट्रीट लाइट्स हैं । दोनों के बल्ब तब भी फ्यूज थे, आज भी फ्यूज हैं ।”

“यानी विजीबलिटी के मामले में नेचुरल लाइट का ही आसरा था ?”

“हां ।”

“शुक्रिया, जनाब । नाचीज को टाइम देने का शुक्रिया ।”

उसने सहमति में सिर हिला कर मेरा शुक्रिया कुबूल किया और मेरे पीछे गेट बन्द किया ।

******************************************************************
 
मैं पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचा ।

वहां मेरा दोस्त (!) इन्स्पेक्टर देवेन्द्र सिंह यादव बिराजता था । वो फ्लाइंग स्कवायड के उस स्पैशल दस्ते से सम्बद्ध था जो राजथानी में हुए केवल कत्ल के केसों की तफ्तीश के लिये सक्रिय होता था । इस लिहाज से श्यामला के कत्ल की उसे पूरी वाकफियत होना लाजमी था ।

मैं उसके आफिस में पहुंचा । मुझे देखते ही उसकी बाछें खिल गयी, होंठ मुस्कराहट में एक कान से दूसरे कान तक खिंच गये ।

मुझे सख्त हैरानी हुई ।

मुझे देखते ही आदतन त्योरी चढ़ा लेने वाला इन्स्पेक्टर यादव यूं पेश आ रहा था जैसे सीधे कमिश्नर की कुर्सी हासिल हो गयी हो ।

“शर्मा !” - वो चहकता सा बोला - “आ बैठ ।”

“नमस्ते ।”

“अरे होती है नमस्ते । पहले बैठ तो सही !”

“इन्स्पेक्टर साहब, क्या बात है ?”

“बैठ । बैठ । होती है मालूम बात । बैठ ।”

मैं एक विजिटर्स चेयर पर ढ़ेर हुआ ।

उसने मेज के दराज से मिठाई का डिब्बा निकाला - उस पर ‘कलेवा’ लिखा होने की वजह से मैंने पहचाना कि वो मिठाई का डिब्बा था - और उसे खोल कर मेरे सामने रखा ।

भीतर जो मिठाई थी वो मेरी पहचानी हुई थी । वो अंजीर की बर्फी थी जो बारह सौ रुपये किलो आती थी ।

“ले ।” - वो दमकता सा बोला - “मुंह मीठा कर ।”

“किस खुशी में ?” - मैंने पूछा ।

“काफी भी मंगवाता हूं पहले मुंह मीठा कर ।”

“अरे, हाकिम साहब” - बर्फी की एक टुकड़ी उठाता मैं बोला - “किस खुशी में ?”

“लड़का हुआ है ?”

“अरे ! हुआ आखिर ?”

“हां । आखिर भोलेनाथ की कृपा हुई ।”

“कब ?”

“कल । शिवेन्द्र सिंह यादव सन आफ देवेन्द्र सिंह यादव, इन्स्पेक्टर दिल्ली पुलिस ।”

“नाम रख भी लिया ?”

“अरे, नाम तो तब से रखा हुआ था जबकि शादी हुई थी लेकिन क्या करूं, हर बार लड़की हो जाती थी ।”

इन्स्पेक्टर साहब की छ: बेटियां थीं । आखिर बेटे की कामना पूर्ण हुई थी ।

“बधाई ! बधाई ! भाभी साहिबा को भी । सारे परिवार को ।”

“कबूल ।”

“जच्चा बच्चा स्वस्थ हैं ?”

“हां । बिल्कुल ।”

“किस पर गया है छोटा इंस्पेक्टर ?”

“अरे, डीसीपी लगेगा सीधा । देखना ।”

“किस पर गया है ?”

“पता नहीं ।”

“पता नहीं ?”

“अभी मैंने शक्ल कहां देखी है !” - वो हंसा - “अभी तो बस...”

मैं हकबकाया ।

“मजाक कर रहे हो ?” - फिर बोला ।

“हां ।”

“अब बोलो तो सही, किस पर गया है ?”

उसने बड़े फरमाइशी अन्दाज से अपनी मूंछ पर हाथ फेरा और फिर हंसा ।

“ये नहीं ठीक हुआ ।”

उसकी हंसी को ब्रेक लगी । वो हड़बड़ाया - “क्या बोला ?”

“बीवी पर जाता तो ज्यादा खूबसूरत होता ।”

“अबे, मैं बद्सूरत हूं ?”

“नहीं । मैंने कहा । ज्यादा... ज्यादा खूबसूरत होता ।”

“अरे, अभी तो एक दिन का है । अभी तो रोज रंग बदलेगा ।

“वो तो है !”

“बाद में देखेंगे ।”

“ठीक ।”

उसने घंटी बजा कर एक सिपाही को बुलाया और उसे काफी लाने को बोला ।
 
मुझे संतोष था कि अपने मौजूदा मिजाज के हवाले वो मेरे से हुज्जत से, बेरुखी से पेश नहीं आने वाला था वर्ना कलपा हो - जो कि पुलिस की नौकरी में क्या बड़ी बात थी - तो जले पर नमक छिड़कने को राजी नहीं होता था ।

काफी सर्व हुई ।

“कैसे आया ?” - उसने पूछा ।

“अंजीर की मिठाई खाने आया ।” - मैं बोला ।

“अरे, वो तो तू जम जम खा, डिब्बा साथ ले जा, वैसे कैसे आया ?”

मैंने बताया ।

“उस केस में कुछ नहीं रखा, शर्मा ।” - मेरे खामोश होते ही वो बोला - “बिल्कुल ओपन एण्ड शट केस है । टाइम ही जाया करेगा अपना ।”

“मोटी फीस एडवांस में मिली है, मैं टाइम जाया करना अफोर्ड कर सकता हूं ।”

“फिर तो मर्जी तेरी ।”

“तो पुलिस को गारन्टी है कि सार्थक बराल कातिल है, उसने अपनी बीवी श्यामला का कत्ल किया है ?”

“सौ फीसदी ।”

“बेटी बेवक्त मौत मर गयी, बाप चैस टूर्नामेंट कराता है !”

“अरे, मरने वाले के साथ कोई नहीं मर जाता, दुनियादारी के काम नहीं रुकते । वो कहते नहीं हैं कि शो मस्ट गो आन !”

“हां, कहते तो हैं !”

“फिर लड़की अभी कल तो नहीं मरी ! तीन हफ्ते होने को आ रहे हैं उसे मरे । फिर चैस टूर्नामेंट की तैयारियां तो उसकी लाइफ में ही शुरू हो गयी थीं । कैसे उन्हें इस बिना पर रोका जा सकता था कि आर्गेनाइजर की बेटी मर गयी थी ! फिर वो अकेला ही तो नहीं टूर्नामेंट कंडक्ट करने वाला ! उसकी क्लब है, रूलिंग पार्टी का एक नेता है, एक होटल है, एक बैंक है, और भी हैं कई ईवेंट पार्टनर ।”

“तुम्हें तो टूर्नामेंट की काफी जानकारी है !”

“इत्तफाकन है । जब असल टूर्नामेंट शुरू होगा तो मेरा भी वहां आना जाना होगा ।”

“महकमे की तरफ से ?”

“अपनी तरफ से । मेरा एक भतीजा पार्टीसिपेट कर रहा है, उसकी खातिर ।”

“कमाल है ! मैं तो समझता था कि आज की नौजवान पीढ़ी शतरंज का नाम भी नहीं जानती थी !”

“गलत समझता था । दिमाग का खेल है । नौजवान पीढ़ी में दिमाग की कोई कमी नहीं । शतरंज के मामले में नौजवान पीडी ने ही सारी दुनिया में नाम रौशन किया है हिन्दोस्तान का । विश्वनाथ आनन्द को ही देख लो । आज सारी दुनिया...”

“ठीक ! ठीक ! बतौर कातिल वो किसी और का नाम ले रहा है...”

“अब ले रहा है । पहले मुंह में दही जमी हुई थी !

“लिहाजा तुमने उसकी बात की तरफ कोई तवज्जो न दी ! 0

“दी । बराबर दी । एक्ट भी किया ।”

“क्या किया ?”

“फौरन माधव धीमरे को यहां तलब किया ।

“क्या नतीजा निकला ?”

“यही कि मुलजिम का दिमाग हिल गया था । लम्बी गिरफ्तारी का उसके दिमाग पर असर हुआ था और वो पागलों की तरह प्रलाप करने लगा था । कुछ भी वाही तबाही बकने लगा था । माधव धीमरे को खिलाफ उसने वाही तबाही ही बकी थी ।”

“माधव धीमरे कातिल नहीं हो सकता ?”

“नहीं हो सकता । कातिल गिरफ्तार है, शर्मा, उसका पिछला रिकार्ड उसके खिलाफ खड़ा है जो कि अपनी कहानी खुद कहता है ।”

“कैसा रिकार्ड ? क्या कहता है ?”

“फसादी लड़का है । पंगेबाजी का पुराना आदी है । कई बार चौकी-थाने का मुंह दिखाने वाली हरकतें कर चुका है ।”

“मसलन ?”

“तीन बार रैश ड्राइविंग में थामा जा चुका है । दो बार रोड रेज में उसकी शिरकत उसे ओवरनाइट लॉक-अप में बन्द करा चुकी है । एक बार चोरी का इलजाम आ चुका है ।”

“चोरी का भी ?”

“हां । जब रोज़वुड क्लब में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी करता था तो एक बार एक मेम्बर ने अपना एक बैग उसे सौंपा था जो कि वो वापिसी में कलेक्ट करता । वापिसी का वक्त आया था तो उसने दावा किया था कि बैग की आउटर पॉकेट में एक लिफाफा था जिसमें दस हजार रुपये थे और जो लिफाफा जब बैग उसकी हिफाजत में था तो रिसैप्शनिस्ट ने - सार्थक बराल ने - निकाल लिया था । सार्थक ने उस बात से सरासर इंकार किया था और मेम्बर को झूठा करार देने तक से गुरेज नहीं किया था । बड़ी दिलेरी से क्लेम किया था कि रुपयों के बारे में मेम्बर गलतबयानी कर रहा था; या तो रकम का कोई वजूद ही नहीं था, या वो उसे कहीं और रख कर भूल गया था और समझ रहा था कि बैग की आउटर पॉकेट में रखी थी । क्लब ने स्टाफ की हिमायत की थी और वो सन्देहलाभ पा गया था ।”

“छोटी मोटी चोरी में और कत्ल में फर्क होता है । ट्रैफिक वायलेशन दिल्ली में आम बात है, छोटे बड़े सब का शगल है, रोड रेज भी रोजमर्रा की बात है ।”

“क्या कहने ! बोलने भी लगे उसके हक में !”

“मैंने महज एक नजरिया पेश किया है ।”

“अरे, कैजुअल बात हो तो कोई बात है, रिपीट ऑफेंडर कैसे किसी नजरिये से कवर किया जा सकता है ! शर्मा, ऐसी छोटी मोटी हरकतें ही मजबूती पकड़ती जाती हैं और फिर बड़े कारनामों को अंजाम देने की दिलेरी आती जाती है ।”

मैंने जबरन सहमति में सिर हिलाया ।

“फिर ड्रग्स के साथ पकड़ा जा चुका है । उसे तुम छोटी मोटी हरकत मानते हो ?”

“बतौर यूजर । एक ग्राम गांजा के साथ ।”

“उसके वकील ने कलाकारिता दिखाई । पुलिस के करप्ट किरदार को कैश किया । पकड़ी गयी मिकदार में हेराफेरी की गयी । मैं इस बारे में और कुछ नहीं कहना चाहता क्योंकि खुद मैं भी पुलिस वाला हूं । ज्यादा बोलूंगा तो खुद पर ही कीचड़ उछालूंगा ।”

“शहर में उसके लिये हमदर्दी की लहर है । हर कोई उसे बेकसूर ठहरा रहा है और उसकी गिरफ्तारी को पुलिसिया जुल्म करार दे रहा है । उसके लिये जुलूस निकाले जा रहे हैं, धरना प्रदर्शन किये जा रहे हैं, ‘साथक को इंसाफ दो’ के नारे लगाये जा रहे हैं, उसके डिफेंस के लिये चन्दा इकट्ठा किया जा रहा है, इस बाबत क्या कहते हो ?”

“जाकर पता करो कि ये सब कौन लोग कर रहे हैं ! ये सब करने वाले दिल्ली में बसे नेपाली हैं जो अपने नेपाली भाई के बचाव के लिये हाय तौबा मचा रहे हैं । चन्द दूसरे लोग उनमें शामिल हो जाते हैं क्योंकि अन्धे के पीछे अन्धा लगने की दिल्ली में रवायत है । परदेस में बसी किसी बाहरी कम्युनिटी का ऐसे किसी मसले में एकजुट हो जाना क्या बड़ी बात है ? ऐसे लोगों के लिये पुलिस हमेशा ही गलत है और उनकी दुश्मन है ।”

“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”

“बंगलादेशियो को देखो । कहीं भी झुग्गी डाल के बैठ जाते हैं । शिकायत होती है, कमेटी का डिमोलिशन स्क्वायड आता है, पुलिस आती है तो इकट्ठे होकर हाय तौबा मचाने लगते हैं; क्या औरतें, क्या मर्द, क्या बच्चे, छाती कूटते जुल्म की दुहाई देने लगते हैं । पुलिस पर ईंट पत्थर बरसाने लगते हैं । क्यों ? क्योंकि सरकारी जमीन पर काबिज होना उनका मौलिक अधिकार है, किसी भी सम्पन्न, सम्भ्रान्त इलाके में जाकर सड़ांध फैलाने लगने का वोट की राजनीति करने वाले नेताओं से उन्हें लाइसेंस हासिल है ।”

“ठीक ।”

“कोई उनसे सवाल नहीं कर सकता कि जहां झुग्गियां खड़ी कर ली थीं, वो जमीन क्या उनके बाप की थी ?”

“ठीक ।”

“पुरानी दिल्ली में जा, जमना पार ईस्ट दिल्ली में जा और किसी बंगलादेशी रिक्शावाले को छेड़के देख, किसी गार्बेज कलेक्टर से पंगा लेकर देख, और फिर देख कैसे मक्खियों की तरह भिनभिनाते सैकड़ों, बल्कि हजारों, उसके जोड़ीदार तेरे गिर्द इकट्ठे होते हैं और मरने मारने को उतारू होते हैं !”

“छोड़ो ये बद्मजा किस्सा, यादव साहब !”
 
“बहरहाल मैं ये कह रहा था कि सार्थक को लेकर शहर में जो कुछ हो रहा है, वो उसके नेपाली बिरादरीभाई कर रहे हैं, वो अपने अभियान को ‘निर्भया को इंसाफ दो’, ‘जेसिका को इंसाफ दो’ का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं जो कि हरगिज कामयाब नहीं होने वाली । दिल्ली के बाशिन्दे जज्बाती हैं लेकिन मूर्ख नहीं । वो शिकारी और शिकार में फर्क समझते हैं । निर्भया वहशी भेड़ियों की वहशत का शिकार थी, जेसिका लाल रसूख वाले बाप के दम खम पर ऐंठे हुए नौजवान की नाजायज ऐंठ का शिकार थी इसलिये संवेदनशील दिल्ली वाली की अन्तरात्मा को उन दो हाहाकारी वारदातों ने झकझोरा था और हमदर्दी की ऐसी लहर उमड़ी थी कि उसके सैलाब में वहशियों की वहशत और ऐंठे हुए की ऐंठ बह गयी थी । सार्थक के साथ ये सब कैसे होगा ? वो तो शिकारी है । हमदर्दी शिकार के साथ होती है, शिकारी के साथ नहीं ।”

“फिर भी हो रही है ।”

“गलत हो रही है नाजायज हो रही है, नेपाली तबका अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है । सार्थक कत्ल करके छुट्टा घूम रहा होता और लहर ‘श्यामला को इंसाफ दो’ की होती तो कोई बात भी थी ।”

“ठीक कह रहे हो । ये दस हजार रुपयों की चोरी वाली बात कब की है ?”

“डेढ़ साल पहले की ।”

“यानी कि तब का वाकया है जब कि वो शादीशुदा था ?”

“हां । शादी दो साल पहले हुई बताई जाती है ।”

“ससुरे ने कुछ किया होगा ?”

“क्या पता किया हो ! क्या पता मामला उसी ने रफादफा करवाया हो, लोकल थाने का केस था इसलिये इस मामले में मुझे ठीक से कुछ मालूम नहीं है ।”

“केस दर्ज हुआ था ?”

“नहीं । तभी तो बोला क्या पता मामला ससुरे ने रफादफा करवाया हो । मेम्बर ने पुलिस को बुलाया था लेकिन मामला एफआईआर दर्ज होने की स्टेज तक नहीं पहुंचा था ।”

“ससुरा तो लड़के को नापसंद करता बताया जाता है !”

“शादी ससुरे की रजामन्दी से नहीं हुई थी न !”

“तो ?”

“तो क्या ! छोकरे को नापसन्द करता था न, अपनी औलाद को, अपने खून को तो नापसन्द नहीं करता था ! बेटी के उसकी रजामन्दी के बगैर शादी कर लेने पर बाप ने बेटी को डिसओन तो नहीं कर दिया था न !”

“ओह !”

“अभी छोकरा क्या उस बड़े वकील की फीस भरने की हैसियत रखता है जिसका कि तुमने जिक्र किया ? तुम भी कोई चिकनफीड पर तो काम करते नहीं ! आखिर नामी पीडी हो । वो तुम्हारी फीस भर सकता है ?”

मैंने इंकार में सिर हिलाया ।

“मेरे से पूछो तो छोकरे के लिये वकील - सब - ससुरे ने ही सैट किया होगा !”

“अपनी बेटी के कातिल के लिये ?”

“क्या पता उसे छोकरे की बेगुनाही पर यकीन आ भी चुका हो !”

“ऐसा !”

“अरे, सौ बार बोला तो झूठ भी सच हो जाता है ! इतने दिनों से ‘सार्थक को इंसाफ दो’ का ढोल पीटा जा रहा है, आवाज ससुरे के कानों तक नहीं पहुंची होगी ! उसे लगने लगा होगा कि छोकरा बेगुनाह था ।”

“छोकरे की खुशकिस्मती । अगर ऐसा है तो वो उसकी जमानत क्यों नहीं करवाता ?”

यादव को जवाब न सूझा ।

“दौलतमन्द आदमी है, बिल्डर है, कॉलोनाइजर है, बीस लाख की नकद जमानत जमा करवाना उसके लिये क्या बड़ी बात है ! वो बड़ा और रसूख वाला आदमी है, बतौर जमानती वो कोर्ट में पेश हो तो क्या पता जज नकद जमानत वाली शर्त ही वापिस ले ले !”

“बात तो ठीक है तुम्हारी !”

“ठीक है तो क्या कहते हो ससुरे के मिजाज के बारे में ?”

“भई, अब क्या कहूं ! सिवा इसके कि छोकरे के लिये उसके मिजाज की बाबत मेरा खयाल गलत हो सकता है ! हो सकता है अपनी बेटी की जिन्दगी में वो बेटी की गुस्ताख हरकत के बावजूद उससे थोड़ा भीगता हो, पसीजता हो लेकिन उसकी मौत के बाद...”

उसने अनमने भाव से इंकार में गर्दन हिलाई ।

“तो मानते हो लड़के का सपोर्टर ससुरा नहीं हो सकता ?”

“हां, यार, अब मानता हूं । तुम वकील से पूछो उसे किसने रिटेन किया है ?”

“वो कहता है ‘सार्थक को इंसाफ दो’ कमेटी ने ।”

“तो फिर यही बात होगी ! यानी बेगाने मुल्क में नेपाली नेपाली के काम आ रहे हैं ।”

“ठीक ! माधव धीमरे की बाबत कुछ और बताओ ।”

“क्या और बताऊं ?”

“सुना है वो भी नेपाली है !”

“ठीक सुना है ।”

“और ?”

“पढ़ा लिखा, स्मार्ट नौजवान है । उम्र पैंतीस के पेटे में है । मकतूला के भाई शरद परमार का दोस्त है इसलिये पिता अमरनाथ परमार की भी कृपादृष्टि प्राप्त है उसे । शरद अमरनाथ परमार का बड़ा लड़का है, मालूम ही होगा !”

“नहीं, नहीं मालूम था । ये मालूम है कि उसकी तीन औलाद हैं - सबसे छोटी श्यामला मरहूम, सबसे बड़ा शरद, बीच में एक लड़की और लेकिन उसका नाम नहीं मालूम ।”

“शेफाली । उम्र पच्चीस साल । उम्र के लिहाज से तीनों में चार-चार साल का वक्फा है ।”

“परमार फैमिली में कोई शतरंज का खिलाड़ी है ?”

“मंझली लड़की शेफाली है न !”

“मकतूला ? श्यामला ?”

“न, भई । वो तो सुना है रिलैक्स करने और खूबसूरत दिखने के अलावा कुछ भी नहीं करती थी ।”

“पिता ? भाई ?”

“न ।”

“तो माधव धीमरे कातिल नहीं हो सकता ?”

“हां । उसके पास कत्ल के वक्त के आसपास की बड़ी मजबूत एलीबाई है । मजबूत बोला मैंने, सार्थक की एलीबाई जैसी झोलझाल नहीं जो कि हाथ के हाथ ही फर्जी, गढ़ी हुई साबित हो गयी थी ।”

“क्या एलीबाई है ?”

“शरद परमार के साथ ड्रिंकिंग सैशन में था ।”

“कहां ? क्लब में ?”

“नहीं । लेकिन सैनिक फार्म के इलाके में ही । वहां ‘रॉक्स’ करके एक बार है, प्रोप्राइटर का नाम रॉक डिसिल्वा है ।”

“फारेनर है ?”

“नहीं, गोवानी है ।”

“क्लब से कोई रिश्ता ?”

“वहां का केटरिंग कांट्रेक्टर है ।”

“आई सी । कोई और सस्पैक्ट ?”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“प्राइम सस्पैस्ट न सही कोई दूर दराज का ही सही जिसे कि सार्थक की गिरफ्तारी की वजह से पुलिस ने नजरअंदाज कर दिया हो !”

“ऐसा तो है एक ।”

“कौन ?”

“सार्थक का बड़ा भाई शिखर बराल ।”

“कैसे ?”

“उसने सार्थक को एलीबाई देने की कोशिश की थी जो कि चली नहीं थी । चल जाती तो वो उसके लिये भी एलीबाई होती ।”

“मतलब ?”

“समझो । एलीबाई दोतरफा काम करती है । जब रमेश कहता है फलां वारदात के वक्त सुरेश उसके साथ था तो वो सुरेश को ही एलीबाई नहीं देता, खुद को भी एलीबाई देता है । जब सुरेश उसके साथ था तो वो सुरेश के साथ था । समझे ?”

“हां ।”

“एक कत्ल के दो कातिल नहीं हो सकते वर्ना शिखर भी अन्दर होता ।”

“ठीक । सार्थक माधव धीमरे का कर्जाई था । मालूम ?”

“अच्छा !”

“अस्सी हजार का देनदार था ।”

“मुझे नहीं मालूम था । कभी जिक्र ही न आया इस बात का । क्यों था कजाई ?”

“जुए की लत की वजह से । रेस खेलता था ।”

“इस बात की तो हमें खबर है लेकिन कर्ज ले के रेस खेलता था, ये नहीं मालूम था । कहीं कर्जे की वापिसी तो वजह नहीं बनी कत्ल की ?”

“कैसे होगा ? वो वजह तब बनती जब कत्ल सार्थक का हुआ होता ।”

“उस पर कर्जे की वापिसी का दबाव हो, उसने रकम बीवी से हासिल करने की कोशिश की हो, वही कोशिश तकरार की वजह बन गयी हो और नौबत कत्ल की आ गयी हो !”

“हो सकता है लेकिन फिर ये इरादतन किया गया कत्ल तो न हुआ, डेलीब्रेट मर्डर तो न हुआ !”

“तो वो कहे ऐसा । दावा करे ऐसा । कबूल करे ऐसा हुआ होना । ताकि कत्ल को हादसा करार दिये जाने की बाबत सोचा जाये । छोड़े अपने बेगुनाह होने की रट !”

“माधव धीमरे क्लब का एम्प्लाई है ?”

“मुझे मालूम नहीं । तवज्जो नहीं दी मैंने इस बाबत । लेकिन शरद का दोस्त भला और कैसे बना होगा !”

“रहता कहां है मालूम है ?”

“हां, मालूम है । पता है...”

उसने मुझे एक कागज पर पता लिख कर दिया ।

“अमरनाथ परमार की रिहायश भी सुना है सैनिक फार्म्स में ही है ?”

उसने कागज मेरे से वापिस लिया और उस पर एक और पता लिख कर लौटाया ।

“तुम्हारा इरादा इन लोगों से मिलने का जान पड़ता है !”

“है तो सही ।”

“मिलना बेशक लेकिन मेरे केस में फच्चर डालने की कोशिश मत करना । ताकीद है, शर्मा, अपनी फीस को जस्टीफाई करने के लिये मेरे केस का हुलिया बिगाड़ने की कोशिश मत करना ।”

“लेकिन जायज कोशिश...”

“ये फैसला मैं करूंगा कि कोशिश जायज है कि नाजायज । कुछ नया जान पाओ तो उसके साथ यहां आना । फिर हम दोनों डिसकस करेंगे और फैसला करेंगे कि क्या जायज है क्या नाजायज है । ताकीद है, मेरे पास उस छोकरे के खिलाफ ओपन एण्ड शट केस है । क्या है ?”

“ओपन एण्ड शट केस है ।”

“याद रहे ।”

“याद तो रहेगा हाकिम का हुक्म लेकिन तुम्हें भी तो याद रहना चाहिये कि गुजश्ता वक्त में कई बार मैंने तुम्हारे ओपन एण्ड शट केस की बुनियाद हिलाई है ।”

“इस बार भी हिलाना । इजाजत है । लेकिन पहले मशवरा मेरे साथ ।”

“ओके ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “बेटे का बाप बनने की लम्बी अभिलाषा की आखिर पूर्ति की फिर से बधाई ।”

“शुक्रिया ।”

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हासिल जानकारी के मुताबिक सार्थक की मां अहिल्या बराल अपने बड़े बेटे शिखर के पास देवली में रहती थी और वो जगह सैनिक फार्म्स से कोई ज्यादा दूर नहीं थी ।

देवली दिल्ली का पुराना गांव था जिसके पहलू में अब इसी नाम की नयी कॉलोनी बस रही थी । उस नये बसते इलाके में अहिल्या बराल का आवास था जो कि एक नया बना छोटा सा इन्डीपेंडेंट हाउस था ।

मैंने उसे अपना परिचय दिया तो मालूम हुआ कि बाजरिया एडवोकेट विवेक महाजन मेरी खबर उस तक पहुंच चुकी थी और वो सन्तुष्ट थी कि वकील साहब - और अब जासूस साहब - के हाथों में उसके छोटे बेटे का भविष्य सुरक्षित था ।

“लिहाजा” - मैं बोला - “आपके खयाल से सार्थक बेगुनाह है ।”

“मेरे यकीन से” - वृद्धा दृढ़ता से बोली - “सार्थक बेगुनाह है । दुनिया की कोई ताकत मेरे इस यकीन को नहीं हिला सकती । सार्थक अपनी पत्नी का खून नहीं कर सकता । वो बेगुनाह है ।”

“गुस्ताखी माफ, ये मां की ममता बोल रही है या एक नीरक्षीरविवेकी उम्रदराज महिला का बैटर जजमैंट ?”

उसने जवाब न दिया, उसके चेहरे पर उत्कंठा के भाव उभरे ।

“ये घर” - मैंने जुदा सवाल किया - “किराये का है ?”

“नहीं । सार्थक ने इसका इंतजाम किया था... समझो मां के लिये ।”

“कैसे ?”

“बाजरिया अमरनाथ परमार । उसने परमार साहब से कोई डील किया था जिसके नतीजे के तौर पर ये घर हमें हासिल हुआ था ।”

“क्या डील किया था ?”

“ये तो मुझे मालूम नहीं !”

“पूछा तो होगा ?”

“नहीं, नहीं पूछा था ।”

“आपका कोई अन्दाजा तो होगा कि क्या डील किया होगा ! परमार साहब बिल्डर हैं, कॉलोनाइजर हैं, परचेज किया होगा उनसे ?”

“हो सकता है, क्योंकि एक दिन यहां परमार साहब का फोन आया था और उन्होंने कहा था कि वो इस प्रापर्टी को वापिस खरीदना चाहते थे ।”

“अच्छा !”

“परचेज प्राइस से ज्यादा रकम अदा करने को कह रहे थे और साथ ही जो खास बात उन्होंने कही थी, वो ये थी कि मुझे मूव भी नहीं करना पड़ेगा ।”

“मूव भी नहीं करना पड़ेगा ?”

“हां । मैं यहीं रहती रह सकती थी ।”

“कमाल है ! फिर वापिस परचेज क्यों करना चाहते थे ?”

“कहते थे किसी और महिला के हवाले करना चाहते थे ।”

“और महिला कौन ?”

“मालूम नहीं । इस बाबत उन्होंने कुछ नहीं बताया था । न कोई नाम लिया था । लेकिन फिर एक दिन उनका फोन आया था कि उस परचेज का खयाल उन्होंने बदल दिया था क्योंकि वो दूसरी महिला उन्हें अब आगे भरोसे के काबिल नहीं लगी थी ।”

“अब आगे क्या मतलब ? यानी अब तक भरोसा था, आइंदा के लिये नहीं रहा था ।”

“शायद ।”

“और भरोसा कैसा ?”

“मालूम नहीं । मेरे को तो उनकी हर बात गोलमोल ही लगी थी । फिर एक बार बोले कि मुझे ऐसे कोई और मकान अपने नाम करवाना कबूल हो तो मुझे कुछ आर्थिक लाभ भी हो सकता था ।”

“यानी चुपड़ी और दो दो !”

“अब क्या बोलूं !”

“आपने क्या जवाब दिया था ?”

“भई, इतनी महंगाई है, आते पैसे को कौन मना करता है ! मैंने ‘हां’ बोल दिया था ।”

“कमाल की बात है ! अब क्या पोजीशन है ? जो कुछ पिछले दिनों हुआ, उसकी रू में क्या आपको लगता है कि उनकी आफर स्टैण्ड करेगी ?”

“अब कहां करेगी ! शरेआम मेरे बेटे को कातिल करार दे रहे हैं, मां पर मेहरबान होंगे !”

मेरा सिर स्वयमेव इंकार में हिला ।

“मेरे खयाल से तो बदले की भावना से प्रेरित होकर वो मुझे इस घर से बेदखल करने की कोशिश करेंगे ।”

“कर पायेंगे ?”

“क्या पता ? मुझे उस डील की तो खबर नहीं जो कि सार्थक में और उनमें हुआ था । क्या पता सार्थक ने मकान किस्तों में हासिल किया हो और उसकी कई किस्तें चुकानी अभी बाकी हों !”

“आप सार्थक से क्यों नहीं पूछती ?”

“इस वक्त मैं उसकी जान की फिक्र करूं जो सूली पर टंगी है या इन बातों की फिक्र करूं ?”

“ठीक ! परमार साहब ने बताया नहीं कि वो क्यों चाहते थे कि ऐसे और मकान आपके नाम हों ?”

“नहीं । पूछा था तो बोले थे कि वक्त आने पर सब बता दिया जायेगा ।”

“यानी फिर गोलमोल, टालू बात ही की थी ?”

“हां ।”

“आपका बड़ा बेटा क्या काम करता है ?”

“कोई पक्की नौकरी शिखर को हासिल नहीं है । कैजुअल काम मिलते रहते हैं ।”

“आजकल क्या करता है ?”

“सैनिक फार्म्स की शॉपिंग माल में इलैक्ट्रॉनिक एपलायंसिज बनाने वाली एक विदेशी कम्पनी की पब्लिसिटी करता है । ग्राउन्ड फ्लोर पर लॉबी में ही उसका स्टाल है ‘टोक्यो एपलायंसिज’ के नाम से ।”

“इस वक्त वहां होगा ?”

“हां ।”

“ओके । चलता हूं । वक्त देने का शुक्रिया ।”

“सुनो ।” - वृद्धा व्यग्र भाव से बोली - “तुम सार्थक के लिये कुछ करोगे न ?”

“अगर वो बेगुनाह है तो सब कुछ करूंगा ।”

“वो बेगुनाह है ।”

“फिर क्या बात है ! फिर तो समझिये कि सच्चे का बोलबाला । नहीं ?”

“ह - हां ।”

“नमस्ते ।”

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मैं सैनिक फार्म्स और आगे वहां की शापिंग माल पहुंचा ।

टोक्यो एप्लायंसिज का स्टाल तलाशने में मुझे कोई दिक्कत न हुई । शिखर वहां मौजूद था और लोगों के एक छोटे से हुजूम को फूड प्रॉसेसर की डिमांस्ट्रेशन दे रहा था ।

वो ही शिखर बराल था, ये मैं उससे तसदीक किये बिना भी कह सकता था क्योंकि वो सार्थक का ओल्डर वर्शन ही जान पड़ता था ।

वो काफी बड़ा स्टाल था जिसके बायें दो तिहाई भाग में इलैक्ट्रानिक एपलायंसिज का डिस्पले था और डिमांस्ट्रेशन का इन्तजाम था और जहां कि उस घड़ी शिखर व्यस्त था । दायें एक तिहाई भाग की धज आफिस जैसी थी । वहां फ्रंट में एक रिसैप्शन बना हुआ था जहां एक नौजवान लड़की विराजमान थी जो खुले कालर वाली सफेद कमीज के साथ जनाना स्टाइल का काला कोट पहने थी और उस ड्रैस में बहुत आकर्षक लग रही थी । पृष्ठ भाग में एक एग्जीक्यूटिव कक्ष था जिस में बैठे सूटबूटधारी जापानी को एड़ियों पर उचक कर ग्लास विंडो के पार देखा जा सकता था ।

मैं रिसैप्शन डैस्क पर पहुंचा ।

युवती ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा, तत्काल उसके चेहरे पर मशीनी मुस्कराहट आयी ।

“मे आई हैल्प यू सर ।” - वो बोली ।

“यस ।” - मैं उसके सामने बैठता बोला - “प्लीज ।”

“हाउ कैन आई हैल्प यू सर ।”

“यहां किसी से मिलने का एक मामूली काम है मुझे लेकिन पहले मैं एक खास काम करना चाहता हूं ।”

“खास काम ! क्या ?”

“एक सवाल करना चाहता हूं ।”

“किससे ?”

“भई, जिसके रूबरू हूं उससे और किससे !”

“कीजिये ।”

“शाम को छुट्टी कितने बजे करती हो ?”

वो हड़बड़ाई, उसने सशंक भाव से मेरी तरफ देखा ।

मैंने अपनी गोल्डन जुबली, सिड्युसिंग, विनिंग मुस्कराहट पेश की ।

फिर एकाएक वो भी मुस्कराई ।

“कोई फिक्स टाइम नहीं” - और बोली - “जब हसबैंड लेने आ जाता है । कभी लेट भी हो जाती हूं उसके लेट हो जाने की वजह से । लेकिन अमूमन वक्त पर ही आता है ।”

“हसबैंड ?”

“हां ।”

“जो हंस के बैंड बजाता है ?”

“क्या बोला ?”

“मंगलसूत्र नहीं, सिन्दूर नहीं, टीका नहीं, शादी की अंगूठी नहीं.. स्वर्ग की सीढी चढ़ने का इरादा नहीं जान पड़ता !”

“क्या मतलब ?”

“भई, झूठे तो स्वर्ग में सीट के अधिकारी नहीं बन पाते न !”

वो हंसी, फिर बोली - “किससे मिलना है, सर ?”

“मेरी सैकण्ड चायस शिखर बराल है ।”

“सैकंड ?”

“हां । फर्स्ट ने तो झूठ बोल कर पल्ला झाड़ लिया !”

वो फिर हंसी ।

“लाइन मारने में डिप्लोमा प्राप्त मालूम होते हो !” - फिर बोली ।

“डिग्री । गोल्ड मैडेलिस्ट है बन्दा । इस महकमे में मेरे से आगे कोई दूसरा मिल जाये दिल्ली शहर में या आसपास चालीस कोस तक तो समझना करिश्मा हुआ ।”

“क्या कहने !”

“बचपन से दो ही ख्वाहिशे थीं - एक ताजमहल देखने की और दूसरी किसी ऐसी लड़की के रूबरू होने की जो कालर वाली सफेद कमीज पहनती हो, काला कोट पहनती हो, जिसके बाल स्टाइल से कटे हुए हों और जिसके जिस्म पर कहीं न कहीं काला तिल हो । ताजमहल मैं परसों देख आया था, दूसरी ख्वाहिश आज पूरी हो गयी ।”

“काला तिल दिखाई दे गया !”

“मैंने कहीं न कहीं बोला न ! तमाम जगह देखने का इत्तफाक अभी कहां हुआ है !”

“एक बात बोलूं ?”

“दो बोलो ।”

“एक ही काफी है ।

“बोलो ।”

“टॉप के हरामी जान पड़ते हो !”

“वो तो मैं हूं । फील्ड कोई भी हो, आदमी का बच्चा हो तो टॉप पर हो वर्ना न हो ।”

“विजिटिंग कार्ड रखते हो ?”

“हां ।”

“उस पर ये क्वालीफिकेशन दर्ज है ?”

“नहीं, ये सीक्रेट है । भांपनी पड़ता है । जैसे तुमने भांप ली ।”

“काफी फन्देबाज आदमी हो, लेकिन बस करो अब । शिखर अभी फ्री होता है ।”

“फिर बिजी हो जायेगा । डिमांस्ट्रेशन के ख्वाहिशमंदों का तांता तो लगा ही रहता होगा ?”

“बीच बीच में ब्रेक लेने का तरीका है, तुमसे मिलना चाहेगा तो ले लेगा । नाम बोलो अपना ।”

मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड उसके सामने रखा ।

“राज शर्मा ?” - उसने कार्ड पर से पढ़ा ।

“दि ओनली वन ।” - मैं शान से बोला ।

“प्राइवेट डिटेक्टिव ?”

“यूं समझो कि दशहरी आम ।”

“काफी खुशफहम आदमी हो !”

“वो तो मैं हूं बराबर ।”

“इस बात को ‘दशहरी आम’, ‘दि ओनली वन’ जैसा कोई फुन्दना नहीं लगाया ?”

“ये बात अपने आप में फुन्दना है । फुन्दने को फुन्दना लगाने का क्या मतलब ?”

“हूं ।”

वो उठी और मेज के पीछे से निकलकर दायें विंग की ओर बढ़ी । वो शिखर के पास पहुंची, उसने उसे मेरा कार्ड सौंपा और जुबानी कुछ कहा ।

शिखर ने घूमकर, सिर उठा कर मेरी तरफ निगाह दौड़ाई । फिर उसका सिर सहमति में हिला ।

युवती वापिस लौट आयी ।

“मेरी तो सारी जन्मकुण्डली बाच ली” - मैं बोला - “अब अपने बारे में भी तो कुछ बताओ ।”

“क्या बताऊं ?”

“कुछ भी ।”

“क्या कुछ भी ?”

“बल्कि सब कुछ ?”

“क्या सब कुछ ?”

“मसलन डिओडरेंट कौन सा इस्तेमाल करती हो, लिपस्टिक कौन सी लगाती हो, अंगिया कौन से साइज की पहनती हो...”

“ओ, शट अप !”

“...मर्द में कौन सी खूबी को जरूरी समझती हो ? करंट स्टेडी कौन है ? आगे वेकेंसी की क्या पोजीशन है...”

“आई सैड शट अप !”

“कहती हो तो हो जाता हूं ।”

“कहती हूं ।”

“ओके ।”

कुछ क्षण खामोशी रही ।
 
“यहां सिग्रेट पीना मुनासिब होगा ?” - फिर मैं बोला ।

“नहीं, नहीं मुनासिब होगा । मुझे सिग्रेट के धुंए से अलर्जी है ।”

“ओह !”

“ये बड़ी बोर नौकरी है इसलिये मैंने तुम्हें इतना कुछ कह लेने दिया जिसका कोई जुदा मतलब लगाना नादानी होगी । मैं मानती हूं कि तुम दिलचस्प आदमी हो, दिलचस्प बातें करते हो लेकिन अगर बस नहीं करोगे तो शिखर से मुलाकात का इंतजार कहीं और जा कर करोगे । तुम चाहते हो ऐसा ?”

“नहीं ।” - मैं बोला ।

“तो फिर खामोश बैठो ।”

“अभी । खाली एक बात और बता दो ।”

“क्या ?”

“तुम्हारा नाम क्या है ?”

“मेरा नाम उस राह जैसा है जिस पर तुमने नहीं जाना । क्या करोगे जान कर ! फिर वो कहते नहीं हैं कि रोज बाई एनी अदर नेम !”

“ओके । तो मेरे लिये तुम्हारा नाम रोज ! वैसे कुछ भी हो । कभी कहीं फिर मुलाकात हुई तो मैं तुम्हें रोज कहकर पुकारूंगा । कोई हर्ज ?”

“नहीं । पुकारना ।”

“और ये ।”

मैंने एक और विजिटिंग कार्ड निकाला और हाथ बढ़ा कर उसके सामने रखा ।

“ये किसलिये ?” - उसकी भवें उठीं - “कार्ड दे तो चुके हो !”

“ये तुम्हारे लिये ।”

“मैं क्या करूंगी ?”

“अरे, कभी ‘कच्चे धागे से बन्धे सरकार चले आयेंगे’ वाला मिजाज बना तो कैसे जानोगी कहां पहुंचना है !”

उसने कार्ड उठाया, उसके चार टुकड़े किये और डस्टबिन में डाल दिया ।

मैं मुंह बाये उसे देखने लगा ।

नैवर माइन्ड । - फिर खुद को तसल्ली दी - यू विन सम, यू लूज सम, दि लाइफ गोज आन ।

“मैं सच में शादीशुदा हूं ।” - वो शुष्क स्वर में बोली - “एक बेटी भी है ।”

“बेटी भी है !” - मैं हाहाकारी लहजे से बोला ।

“हां । और खबरदार जो फिर मुझे झूठा कहा !”

इससे पहले मैं कुछ कह पाता, एक हाथ मेरे कन्धे पर पड़ा । मैंने घूमकर देखा तो अपने पीछे शिखर को खड़ा पाया । मैं उठ खड़ा हुआ ।

“थैंक्यू मैडम मैरीड विद ए किड ।” - मैं युवती से बोला - “जो हुआ, उसका मुझे अफसोस है; जो न हो सका, उसका मुझे ज्यादा अफसोस है ।”

उसने मुंह बिचकाया ।

शिखर ने बाहर की तरफ इशारा किया । मैं उसके साथ हो लिया ।

दायें विंग के करीब से गुजरते वक्त मैंने देखा उसके काउंटर पर ‘क्लोज्ड’ की तख्ती लगी थी ।

वो मुझे एक करीबी कैफे में ले आया जहां उसने मुझे काफी पेश की । काफी के साथ हम दोनों स्टूल से जरा बड़ी एक मेज पर आमने सामने बैठ गये ।

“मैं तुम्हारे नाम और काम दोनों से वाकिफ हूं ।” - वो बोला ।

“कैसे ?” - मैंने सहज भाव से पूछा ।

“एडवोकेट विवेक महाजन ने बड़ा बखान किया न !”

“कब ! मेरे से मिल के आने के बाद ?”

“पहले ।”

“मैं असाइनमेंट से इंकार कर देता तो ?”

“उसे गारन्टी थी कि नहीं करने वाले थे ।”

“कमाल है !”

“बड़ा वकील है, ऐसे कमाल करता ही रहता है ।”

“वो समझता है मैं पता लगा लूंगा श्यामला का असली कातिल कौन है ?”

“हां ।”

“तुम्हें यकीन है तुम्हारा भाई बेगुनाह है ?”

“पूरा । वन हण्डर्ड पर्सेंट ।”

“सबको यकीन है । काश इतने टकसाली यकीन को भुना सकने का कोई तरीका होता । तुम्हारे यकीन को सलाम । अब अपना कोई अन्दाजा बोलो, कौन है कातिल ?”

“मुझे नहीं मालूम । लेकिन ये मालूम है कि कौन नहीं है कातिल । मेरा भाई नहीं है । मैं नहीं हूं ।”

“अपने बारे में तो तुम ऐसा कह सकते हो, भाई के बारे में इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?”

“वो मेरा भाई है । उसकी बात पर यकीन करना मेरा फर्ज है । वो कहता है वो कातिल नहीं है तो नहीं है, दुनिया भले ही कुछ भी कहे । इसी विश्वास के तहत मैंने उसे एलीबाई देने की कोशिश की थी, बोला था उस रात हम दोनों भाई इकट्ठे ड्रिंकिंग स्प्री पर निकले हुए थे । लेकिन...”

वो खामोश हो गया ।

“एलीबाई चली नहीं !” - मैं बोला - “जल्दी ही बैकफायर कर गयी ! हवा निकल गयी !”

उसने कठिन भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

“पुलिस को पता लग गया कि उस रात तुम ड्रिंकिंग स्प्री पर तो थे लेकिन अकेले थे ।”

“हां । हम निकले इकट्ठे थे लेकिन बीच में थोड़ा अरसा ऐसा हुआ था कि वो मेरे साथ नहीं था । पुलिस कहती है उसी अरसे में उसने कत्ल किया । वो तो झूठी गवाही के इलजाम में और कातिल का जोड़ीदार होने के इलजाम में मुझे भी थामने वाले थे लेकिन एडवोकेट महाजन के दखल पर छोड़ दिया । बदले में मुझे इकबालिया बयान दर्ज कराना पड़ा कि अपने भाई के हक में मेरी एलीबाई फर्जी थी, सार्थक उस रात हर घड़ी मेरे साथ नहीं था ।”

“उस रात तुम्हारा ड्रिंकिंग सैशन कहां चला था ?”

“’रॉक्स’ में । बार है सैनिक फार्म के इलाके में । मालिक रॉक डिसिल्वा के नाम पर नाम रखा गया है । उस रात वहां था मैं ।”

“तुम्हारा भाई रोज़वुड क्लब के मैनेजर माधव धीमरे को कातिल करार दे रहा है, तुम्हें इस बात की खबर है ?”

“है तो सही !”

“तुम्हारा क्या खयाल है इस बारे में ?”

“हो सकता है । उस रात माधव धीमरे भी ‘रॉक्स’ में था ।”

“अच्छा !”

“हां । नौ बजे तक मैंने उसे वहां देखा था, उसके बाद वहां मैं ही नहीं था इसलिये मुझे नहीं मालूम कि वो वहीं टिका था या” - वो अर्थपूर्ण स्वर में बोला - “कहीं चला गया था ।”

“कैसा आदमी है ?”

“चालू रकम है । काइयां है । अपना उल्लू सीधा करने में माहिर है ।”

“सार्थक उसका कर्जाई था ।”

“था तो सही !”

“अस्सी हजार खासी बड़ी रकम होती है । क्योंकर दे दी ?”

“राज की बात है ।”

“तो राज से करो ।”

“सूद पर पैसा देना उसका पार्ट टाइम कारोबार है । एक्स्ट्रा इंकम का जरिया है । औरों को भी देता है ढंके छुपे ढ़ण्ग से ।”

“वसूली कर लेता है ?”

“कर ही लेता है । क्योंकि फौजदारी में भी तो कम नहीं है !”

“ऐसा ?”

“हां ।”

“सार्थक से की फौजदारी ?”

“ट्रेलर तो दिखाया !”

“कैसे ?”

“उसको डराने धमकाने की गरज से उसकी सान्त्रो की एक हैडलाइट फोड़ दी ।”

“अरे ! तुमने देखा उसे ऐसा करते ?”

“मैंने नहीं देखा, लेकिन सुना ।”

“किससे ?”

“सार्थक से ।”

“उसने देखा ?”

“नहीं ।”

“तो उसे कैसे मालूम था कि वो हरकत माधव धीमरे की थी ?”

“ऐसे मालूम था कि और किसी की हो ही नहीं सकती थी ? । अपना कर्जा न लौटाने वालों को स्टैण्डर्ड वार्निंग जारी करता था कि डैमेज असाल्ट शुरू कर देगा । पहले वार्निंग के तौर पर कोई छोटा मोटा डैमेज करेगा, छोटी मोटी चोट पहुंचायेगा जो रकम की अदायगी न होने की सूरत में मुतवातर बड़ी होती चली जायेगी । यानी शुरू में ट्रेलर, आखिर में फुल फीचर फिल्म ।”

“कमाल है !”

“सार्थक को एक वर्बल वार्निंग भी जारी की थी उसने । बोलता था सार्थक फौरन उसका कर्जा नहीं चुकायेगा तो आइन्दा खामियाजा वो नहीं, उसकी बीवी भुगतेगी ।”

“बीवी भुगतेगी ?”

“यही बोलता था ।”

“क्या करता ? जो उसने किया ?”

“उससे बुरा करता ।”

“क्या ?”

शिखर ने काफी का मग नीचे रख दिया, बायें हाथ की तर्जनी उंगली और अंगूठे को मिला कर एक गोल दायरा बनाया और बड़े अर्थपूर्ण भाव से दूसरे हाथ की तर्जनी उंगली दायरे में आगे पीछे सरकाने लगा ।

“तौबा !” - मैं नेत्र फैलाता बोला ।

उसने अपना एक्शन बन्द कर दिया और मग उठा लिया ।

“सुना है उसकी शरद परमार से अच्छी यारी है !” - मैं बोला ।

“है तो सही !”

“जब कि शरद क्लब के प्रेसीडेंट का सुपुत्र है और धीमरे क्लब का मुलाजिम है !”

“दोस्ती होती है तो राजा और रंक में फर्क नहीं करती ।”

“मैं कुछ और कहने की कोशिश कर रहा हूं । कैसे कोई शख्स अपने दोस्त की बहन के साथ बलात्कार करने का चैलेंज उछाल सकता है ! मजाक में भी भला कैसे कोई अपने दोस्त की बहन की बाबत ऐसे फाश खयालात जाहिर कर सकता है !”
 
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