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Thriller कांटा

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अगले रोज सुबह उठते ही उसने सबसे पहले काम यह किया कि फिर आलोका का नम्बर ट्राई किया। मगर वह तब भी स्विच्ड ऑफ था। वह तो होना ही था। दिल्ली के तकरीबन व्यावसायिक प्रतिष्ठान दस-ग्यारह बजे के लगभग खुला करते थे। कुछ दोपहर बारह बजे के बाद भी खुलते थे। तभी शायद वह नम्बर चालू होने वाला था। वह चंचल तितली सचमुच उसके साथ शरारत कर गई थी।

फिर भी उसने आलोका का नम्बर लगाना बंद नहीं किया। ग्यारह बजे के लगभग उसका बताया मोबाइल नम्बर पर ऑन हो गया और उस पर घंटी जाने लगी।

अजय का दिल जोर-जोर से धड़क उठा। वह दूसरी ओर से फोन उठाये जाने का इंतजार करने लगा। यह सोचकर वह बुरी तरह आशंकित था कि अगर वह नंबर सचमुच किसी शोरूम का निकला तो क्या होगा? मन ही मन वह अपने बनाने वाले से दुआ कर रहा था कि ऐसा न हो। आलोका ने इस मामले में उससे झूठ बोला हो, वह आलोका का अपना नम्बर ही निकले।

लेकिन उसकी दुआ कबूल न हुई। उधर से कॉल रिसीव हुई और दूसरी तरफ से एक भारी-भरकम पुरुष स्वर मोबाइल पर सुनाई दिया “कौन?"

अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी। वह फुलझड़ी सचमुच शरारत कर गई थी। वह यकीनन किसी शोरूम का ही नम्बर था।

अजय का चेहरा मायूसी से भर गया। उसने धीरे से फोन डिस्कनेक्ट कर दिया और खीझकर मोबाइल एक ओर उछाल दिया था।

तभी उसका मोबाइल बजना शुरू हो गया। उसने देखा उसी नम्बर से कॉल बैक आ रही थी, जिस पर उसने कॉल लगाई थी। एक बार उसका मन हुआ कि फोन डिस्कनेक्ट कर दे। लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन रिसीव कर लिया।

अगले ही पल बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से एक मधुर, जनाना खिलखिलाहट उसके मोबाइल पर उभरी, जो अचानक अजय

के कानों में शहद घोलती चली गई।

वह निश्चित रूप से आलोका की ही हंसी थी, जिसे पहचानने में वह भूल नहीं कर सकता था।

"हल्लो जेंटलमैन।” फिर वह अपनी खिलखिलाहट रोककर शोखी से बोला “देखा मेरा कमाल। कैसे डरा दिया न?"

"अ..आलोका...।” अजय अपनी खुशी को दबाता, हर्ष मिश्रित अविश्वास से बोला “यह तो तुम्हारा नम्बर है। इसका मतलब तुमने झूठ कहा था? यह तुम्हारा अपना नम्बर ही है?"

“क्या इसमें अब भी तुम्हें कोई संदेह है?"

“नहीं है, लेकिन अभी जब मैंने इस पर फोन लगाया था तो कौन बोल रहा था?"

“वह भी मैं ही थी बुद्धू।" वह चहकती हुई बोली। जैसे कि उसे परेशान करके उस कमबख्त को मजा आ रहा था।

"लेकिन वह आवाज...?" यह विस्मित हो उठा था।

“वह आवाज भी मेरी ही थी जेंटलमैन । मुझे मिमिक्री आती है, किसी की भी आवाज की हूबहू नकल उतार सकती हूं। बताओ तो तुम्हारी आवाज की नकल उतारकर दिखा दूं।"

वह आखिरी अल्फाज आलोका ने एकदम अजय के स्वर में कहे थे। अजय अवाक् सा हो गया। उसके मुंह से बोल न फूट सका।

“हल्लो जेटलमैन।” तभी आलोका का शरारत भरा व्यग्र स्वर उसके कानों में पड़ा “तुम लाइन पर हो?"

“हां।” अजय ने कहा “लेकिन तुम्हारा फोन सुबह से ऑफ क्यों जा रहा था?"

"सुबह से नहीं रात से ऑफ जा रहा होगा।" आलोका ने बताया “तुम शायद भूल गए, मेरा फोन रात बस में ही रह गया था, और वह बस मेरे घर में नहीं खड़ी होती। रात को मेरी सहेली मेरा बैग अपने साथ ले गई थी जो कि अभी मेरे हाथ लगा है। और जानते हो?"

"क्या?"

“मैंने अभी जैसे ही अपने मोबाइल का स्विच ऑन किया, उसे ऑन करते ही तुम्हारा फोन आ गया और मेरा मन तुमसे शरारत करने का हो गया। जनाबेआली, कहीं तुम सुबह से यही एक काम तो नहीं कर रहे थे?"

"क...कौन सा काम?"

“मेरा फोन ट्राई करने का! काश...।" एकाएक उसने ठंडी आह भरी फिर बोली “अगर मैंने अपने फोन पर मिस्ड काल अलर्ट की सुविधा ले रखी होती तो इस मामले में तुम्हारा झूठ नहीं चलने वाला था।"

“अरे मैंने अभी कुछ बोला ही कहां है, जो झूठ-सच का सवाल उठा रही हो।"

“यानि कि तुम सचमुच सुबह से मेरा फोन बजाने के प्रोगाम पर लगे थे?"

“यही बात है।” अजय ने झिझकते हुए स्वीकार किया, फिर संजीदा होकर बोला “तुम नहीं जानती आलोका, इस वक्त मेरी क्या हालत है। मैं खुद हैरान हूं कि कोई अजनबी किस तरह चुपके से किसी इंसान की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। तुम मेरी हालत को कभी नहीं समझ सकती आलोका।"

“अरे जेंटलमैन ।” उसने फौरन प्रतिवाद किया “औरत पर इल्जाम लगा रहे हो। एक आदमी के दिल की हालत औरत से ज्यादा दूसरा कोई नहीं समझ सकता।"

"तो फिर बताओ, मिलने कब आ रही हो?"
 
“आज मेरी छुट्टी है। जब तुम कहो आ जाऊंगी।” उसका वह जवाब तो अजय के लिए कतई प्रत्याशित था। मगर वह उन दोनों के आइंदा सिलसिले की शुरूआत का पहला कदम था। और उस वक्त तो खुद आलोका भी नहीं जानती थी कि उसका अजय की तरफ बढ़ा वह पहला कदम उसे भी अजय की दीवानी बना देगा और वह अजय से कहीं ज्यादा टूटकर उसे चाहने लगेगी। बस अजय ही उसका मकसद बन जाएगा।

फिर वही हुआ था। शहर के आसमान पर दिन-रात दोनों के प्यार के अफसाने लिखे जाने लगे थे। उन दिनों के सच्चे पवित्र प्यार को देखकर सारा शहर जैसे मुस्करा रहा था। वह केवल होनी थी जो चाहकर भी मुस्करा नहीं सकी थी। क्योंकि केवल वही जानती थी कि उन दोनों नादानों के प्यार का अंजाम क्या होने वाला था।

तभी एकाएक अजय के मोबाइल की घंटी बजने लगी, जिसने उसका ध्यान भंग कर दिया। उसकी विचार शृंखलाएं एक झटके से बिखर गईं। अतीत की एक छोटी सी दौड़ लगाकर वह वापस अपने वर्तमान में लौट आया।

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इंस्पेक्टर मदारी ने बारीकी से कमरे के हर कोने-खुदरे का मुआयना किया। संजना की लाश बिस्तर पर चारों खाने चित्त पड़ी थी और फटी हुई पथराई आंखों से ऊपर लिंटर को घूर रही थी। उसके बाएं वक्ष में मौजूद गोली के सुराख से ढेर सारा खून बहकर उसके कपड़ों तथा बिस्तर पर फैला हुआ था। उसका मिनी पिस्टल एक कोने में छिटका पड़ा था।

बिस्तर पर संजना की लाश के करीब ही टेलीविजन का रिमोट लावारिस सा पड़ा था। टेलीविजन की स्क्रीन ऑफ थी लेकिन नीचे रखा डीवीडी प्लेयर ऑफ नहीं था। उसके समूचे फ्रंट पर झिलमिलाती नीली लाइट और उसके डिस्प्ले पर बदलते अंकों ने मदारी को सहज ही बता दिया था कि उसके अंदर डीवीडी कैसेट मौजूद थी और उस वारदात से ठीक पहले मकतूल और वहां मौजूद जतिन टीवी पर कोई फिल्म देख रहे थे।

"कौन सी फिल्म ?"

जाहिर था कि उसकी डीवीडी तब भी प्लेयर के अंदर मौजूद थी। जतिन हक्का-बक्का सा एक तरफ खड़ा था। दो सिपाही उसके दाएं-बाएं मुस्तैदी से खड़े थे। साफ प्रतीत हो रहा था कि वह पुलिस की गिरफ्त में था। होता भी क्यों नहीं, इंस्पेक्टर मदारी जिस वक्त वहां पहुंचा था लगभग उसी समय जतिन भागता हुआ फ्लैट से बाहर निकला था। अगर मदारी को वहां पहुंचने में एक पल की भी देरी हो जाती तो जतिन वहां से फरार हो जाने वाला था। इसके बावजूद बौखलाए जतिन ने सिपाहियों को ढकेल कर वहां से फरार हो जाने की कोशिश की थी, मगर वह कामयाब न हो सका था।

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इंस्पेक्टर मदारी को एक गुमनाम फोनकर्ता ने वहां उस फ्लैट में होने वाली वारदात की खबर दी थी, जिसके बाद फिर मदारी एक पल भी बैठा न रह सका था। वह अपनी पुलिस टीम को साथ लेकर हवा से बातें करता हुआ वहां पहुंचा था,

और जैसे ही उसकी पुलिस जिप्सी संजना के फ्लैट की इमारत के सामने पहुंचकर रुकी थी, ठीक उसी वक्त जतिन भागता हुआ सीढ़ियों से नीचे उतरा था। वह उस वक्त बुरी तरह बदहवास हालत में था, और एकाएक वहां पहुंची पुलिस को देखकर और ज्यादा बदहवास हो गया था और बिना कुछ सोचे-समझे ही वहां से भाग खड़ा हुआ था। मगर जिसे मदारी के इशारे पर उसके सिपाहियों ने कामयाब नहीं होने दिया था।

इंस्पेक्टर मदारी को समझते देर नहीं लगी थी कि जरूर अंदर कोई गड़बड़ थी। गुमनाम फोनकर्ता ने उसे गलत खबर नहीं दी थी।

उसकी आंखें सोचने वाले अंदाज में सिकुड़ गई थीं। अपना डमरू बजाता हुआ फ्लैट में अंदर पहुंचा था और फिर वहां का नजारा देखकर उसके साथ-साथ सभी हक्के-बक्के रह गए थे।

मदारी के साथ तीन सिपाही और एक सब इंस्पेक्टर भी आए थे। सब-इंस्पेक्टर का नाम भूषण शर्मा था।

मदारी के साथ-साथ उसने भी खुर्दबीनी से संजना की लाश का मुआयना किया था, फिर वह आग्नेय नेत्रों से वहां मौजूद जतिन को घूरने लगा था।

पहले से ही बुरी तरह हलकान जतिन की सांसें हलक में फंसने लगी थीं। उसने बड़ी मुश्किल से थूक गटककर अपने सूख गए हलक को तर किया था।

“क्या नाम बताया था तूने अपना?” शर्मा जतिन को कहर भरी नजरों से घूरता हुआ बोला।

सहमे जतिन ने उसे अपना नाम बताया।

“क्यों मारा तूने इसे?” उसने पूर्ववत कहर भरी नजरों से उसे घूरते हुए संजना की तरफ इशारा किया।

“म...मैंने इसे नहीं मारा।"

“ठहर जा रस्साले।” शर्मा लाल कपड़ा दिखाए सांड की तरह भड़का “जुर्म करके भागता हुआ रंगे हाथों पकड़ा गया है, फिर

भी झूठ बोलता है।”

"म...मैं सच कह रहा हूं।” जतिन का दम खुश्क होने लगा था। फिर भी वह हौसला जुटाकर पुरजोर विरोधपूर्ण स्वर में बोला “मैंने इसका कत्ल नहीं किया?"

"फिर झूठ।” शर्मा ने अपनी सुर्ख आंखें निकाली। उसका क्रोध बढ़ गया था “खाल खींच लूंगा चमड़ी उधेड़ दूंगा।"

“अरे शर्मा जजमान...।” तभी इंस्पेक्टर मदारी बीच में दखलअंदाज हुआ, जो अपना फौरी मुआयना मुकम्मल कर

चुका था। वह जतिन की तरफदारी करता हुआ बोला “क्यों बच्चे को हलकान कर रहे हो। दोनों एक ही बात होती है।"

“ज...जी।” शर्मा ने चिहुंककर मदारी को देखा। फिर उलझकर पूछा “आपने क्या कहा सर?"

“मैंने कहा कि खाल खींचना और चमड़ी उधेड़ना एक ही बात होती है।"

शर्मा हड़बड़ाया।

“यही मुजरिम है सर।" फिर वह आवेश से बोला “यह रंगे हाथों पकड़ा गया है। मर्डर वैपन भी यहीं मौजूद है। फिर भी

झूठ बोलने की हिमाकत दिखा रहा है।"

“मर्डर वैपन।” मदारी के चेहरे पर असमंजस के भाव आए “मर्डर वैपन यहां कहां मौजूद है जजमान।"

“यही तो है।” उसने कोने में छिटके पड़े संजना के मिनी पिस्टल की तरफ इशारा किया “यहीं तो पड़ा है। यह

देखिए।"

"ये...ये...।” जतिन ने उत्तेजित होकर कहना चाहा। लेकिन मदारी ने हाथ उठाकर उसे बोलने से रोक दिया।

“यह मर्डर वैपन नहीं है शर्मा कीर्तिमान।” मदारी इत्मिनान से बोला “अगर निकल आए तो मैं रिजाइन कर दूंगा।"

शर्मा के चेहरे पर सख्त हैरानी के भाव आए।

“यह आप कैसे कह सकते हैं सर?” उसने चकित होकर पूछा।

“अगर तुमने लाश के जख्म पर जरा भी गौर किया होता तो तुम भी कह सकते थे।"

“जी?"

"तुम जरा एक बार फिर लाश का मुआयना करो और उसके जिस्म पर मौजूद गोली के सुराख को गौर से देखो। वह

अड़तीस कैलीबर से कहीं ज्यादा भारी कैलीबर के रिवॉल्वर से चलाई गई है। जबकि यहां पड़ा वह मिनी पिस्टल बाईस कैलीबर का भी नहीं है।"

“ओह।” बात फौरन शर्मा के भेजे में घुसी। उसके मुंह से स्वतः निकला “ओह ।”
 
“ऊपर से इस मिनी पिस्टल में साइलेंसर नहीं लगा है। जबकि जिस रिवॉल्वर से घातक गोली चली है, उस पर निश्चित रूप से साइलेंसर लगा था।" मदारी ने कहा “अगर नहीं लगा होता तो गोली के धमाके की आवाज यहां आस-पास जरूर गूंजी होती। जबकि मैं दावे से कह सकता हूं यहां कोई धमाका नहीं गूंजा। फिर भी तुम चाहो तो जाकर आजू-बाजू तस्दीक कर सकते हो।"

“उसकी ज...जरूरत नहीं है सर।” शर्मा सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला “मुझे आपके टेलेंट और तजुर्बे पर पूरा विश्वास है। लेकिन..अगर यह मर्डर वैपन नहीं है तो फिर यह पिस्टल किसकी है? यह यहां आखिर क्यों पड़ी है और...और

मर्डर वैपन आखिर कहां है?"

"जाहिर सी बात है जजमान कि वह मर्डर करने वाले के पास ही होगा।"

“वह तो सामने खड़ा है।” शर्मा पुनः जतिन की ओर घूमा और उसे आग्नेय नेत्रों से घूरता हुआ बोला।

“म...मैंने कहा न कि मैंने कल नहीं किया है?” जतिन ने फिर प्रतिरोध किया।

"फिर झूठ बोला।” शर्मा ने बिफरकर उसे देखा “खाल खींच लूंगा।"

"शांत जजमान शांत।" मदारी ने उसे शांत रहने का इशारा किया “मैं उसकी तलाशी ले चुका हूं। अगर वह वैपन इसके पास होता तो बरामद हो गया होता। इसमें सचमुच कुछ भेद मालूम होता है। यह सच बोलता हो सकता है। तुम जरा मुझे इससे बातें करने दो।”

शर्मा कसमसाया। उसके चेहरे पर गहन अप्रसन्नता के भाव आए, जैसे कि जतिन का मुजरिम न निकलना उसे हरगिज भी गंवारा नहीं था। और अगर ऐसा हो जाता तो उसे गहरा सदमा पहुंचने वाला था।

“जय भोलेनाथ ।” मदारी जतिन के करीब पहुंचा और उसकी आंखों में देखता हुआ नारा लगाकर बोला “तो श्रीमान अब आपका क्या इरादा है?"

“इ...इरादा से तुम्हारा क्या मतलब है इंस्पेक्टर?” जतिन ने आशंकित भाव से उसे देखा।

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“मैं कैसे विश्वास करूं कि तुम निर्दोष हो तुमने इस हसीन गुड़िया का कत्ल नहीं किया?"

“ज...जी। वह...।"

“कौन है ये हसीन गुड़िया? तुमसे इसका कौन सा भौतिक या रासायनिक संबंध है? वारदात के वक्त तुम यहां इसके बियावान फ्लैट पर क्या कर रहे थे? अगर अपने आपसे जरा सी भी हमदर्दी रखते हो तो कामा-विराम का ख्याल किए। बिना सब कुछ सच-सच बताते चले जाओ?”

मदारी जो कुछ भी पूछ रहा था, उसे बताने में जतिन को कोई ऐतराज नहीं था। सच तो यह था कि उसे अभी तक अपनी सफाई में बोलने का मौका ही नहीं दिया गया था। उसे तो पकड़ते ही बस संजना का कातिल ठहरा दिया गया था।

उसके हौसले को बल मिला। उसने अपने शुष्क होंठों पर जुबान फिराई, फिर उसने ईमानदारी से मदारी को सबकुछ सच-सच बता दिया।

वह जानता था कि पुलिस बाल में खाल निकालने में माहिर होती थी। लिहाजा ऐसे मामलों में उससे कुछ भी छुपाना अपना नुकसान करना ही होता था। इसलिए उसने कुछ भी नहीं छुपाया। अपने और संजना के नाजुक रिश्ते की शुरूआत से लेकर, संजना के किरदार पर शक होने से शुरू होकर उसकी जासूसी और फिर स्पाई कैमरे द्वारा उस तमाम नजारे की रिकार्डिंग, जो कुछ संजना तथा सहगल के बीच थोड़ी देर पहले उस कमरे में हुआ था, उसने मदारी को सबकुछ सच-सच बता दिया।

उसने यह तक मदारी से नहीं छुपाया कि संजना का नंगा सच उजागर हो जाने के बाद वह किस कदर जुनूनी हो गया था और उसने सचमच संजना को खत्म कर डालने का इरादा बना लिया था। इसीलिए उस वक्त उसके फ्लैट पर वहां पहुंचा था। केवल इतना ही नहीं, उसने संजना का गला घोंट डालना भी चाहा था। लेकिन फिर किस तरह संजना ने पासा पलट दिया था और वह उल्टा उसकी जान लेने पर आमादा हो गई थी उस मिनी पिस्टल से, जिसे कि वह कमबख्त शर्मा संजना का मर्डर वैपन साबित करने पर तुला था।

कुछ भी तो नहीं छुपाया था जतिन ने मदारी से। वह खामोश हुआ तो मदारी हक्का-बक्का सा होकर उसका मुंह देखने लगा।

शर्मा की हालत भी उससे जुदा नहीं थी।

“मेरा विश्वास करो इंस्पेक्टर ।” जतिन ने बारी-बारी से दोनों के चेहरों पर निगाह डाली, फिर अंत में वह बोला “मैं निर्दोष हूं। यह सच है कि इस जलील औरत की बेवफाई और इसके ऐसे वहशी सच को मैं बर्दाश्त नहीं कर सका था, और आवेग के हवाले हुआ मैं इसकी जान लेने यहां तक आ पहुंचा था। लेकिन मैं अपने उस इरादे में कामयाब नहीं हो सका था। उल्टा मेरी अपनी जान पर आ बनी थी। अगर ठीक उसी । वक्त वह बेआवाज गोली आकर संजना को न लगीं होती तो इस..." उसने बिस्तर पर पडी संजना की लाश को देखा और नफरत से बोला “जलील औरत ने मुझे ही खत्म कर दिया होता।"

मदारी और शर्मा की निगाहें आपस में मिलीं।

“जय भोलेनाथ ।” फिर मदारी ने अपने डमरू को हिलाया, तो वातावरण में एक बार फिर नगाड़े की आवाज जोर से बुलंद हुई। फिर वह अपना डमरू वाला हाथ नीचे करता हुआ जतिन से बोला “यह तो सचमुच किसी मिस्ट्री फिल्म की कहानी मालूम होती है जजमान। आपकी आंखों के सामने ही श्रीमती की छाती में सुराख बनाया गया और आप दावा कर रहे हैं कि आपने सुराख बनाने वाले नेकबख्त को नहीं देखा।"

“यह सच है इंस्पेक्टर। उस वक्त मेरी उस तरफ पीठ थी, जिधर से गोली चली थी। जबकि संजना का उधर मुंह था।"

"तब तो उसके लिए आपको शूट करना ज्यादा आसान था। फिर भी उसने आसान काम न किया और आपकी जगह पर

श्रीमती को शूट करने का कठिन काम करने का जोखिम उठाया। क्या आप बता सकते हैं श्रीमान कि उसने ऐसा क्यों किया?"

“म..मैं इस बात पर खुद हैरान हूं इंस्पेक्टर?"

“लेकिन मैं बिल्कुल भी हैरान नहीं हूं। वह नेकबख जरूर आपका कोई भयंकर शुभचिंतक होगा, जबकि श्रीमती का घोर शत्रु।" उसने शर्मा की ओर देखा फिर बोला “एम आई राइट शर्मा जजमान?"
 
“यह लड़का झूठ बोल रहा है सर।” शर्मा ने सख्ती से विरोध जताया “बकवास कर रहा है हमें गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। इसने खुद कबूल किया कि यह इस लड़की को कत्ल करने का इरादा बनाकर यहां आया था और इसने गला दबाकर लड़की को मारने की भी कोशिश की थी। इसका कहा हर लफ्ज सच हो सकता है, बस झूठ केवल यह है कि इसने संजना को कत्ल नहीं किया।"

“सच और झूठ का पता अभी चल जाएगा शर्मा कीर्तिमान।" मदारी संजीदगी से सहमति में अपना सिर हिलाता हुआ बोला। फिर वह जतिन से मुखातिब हुआ और अपने एक-एक शब्द पर बल देता हुआ बोला “आपने कहा श्रीमान कि आपने यहां श्रीमती की जासूसी के लिए खफिया कैमरे लगाए थे। कब लगाए थे आपने यहां वह खुफिया कैमरे?"



“म...मैं जब पिछली बार यहां आया था।” जतिन ने जवाब दिया “उस वक्त मेरे साथ जो सूटकेस था, उसमें वह स्पाई कैमरे मौजूद थे। जब संजना नहाने के लिए बाथरूम में चली गई थी तो मैंने चुपके से वह स्पाई कैमरे यहां संजना के बैडरूम और ड्राइंग रूम में लगा दिए थे।"

“खाली कैमरे कोई रिकार्डिंग कैसे कर सकते हैं? उससे तुम यहां की डीवीडी कैसे तैयार कर सकते हो?"

“रिकार्डिंग का सामान मेरी कार में मौजूद था। यहां मौजूद छिपाये स्पाई कैमरे की रेंज तीन किलोमीटर से ज्यादा थी।

और इस रेंज के अंदर रहकर मैं आसानी से सारी रिकार्डिंग कर सकता था। आज भी वह रिकार्डिंग मैंने इस रेंज के अंदर रहकर की थी और अपनी कार में ही बैठे-बैठे उसकी पूरी डीवीडी तैयार कर ली थी।"

"तब तो वह स्पाई कैमरे अभी यहां, मेरा मतलब है इस कमरे में मौजूद होंगे?"

“क्यों नहीं इंस्पेक्टर ।” जतिन तपाक से बोला। फिर उसने बैड के सिरहाने रखे नाइट लैंप की तरफ इशारा किया “पहला कैमरा इस नाइट लैंप में छिपा हुआ है, जिसका फोकस मैंने सीधा इस बेड पर सेट कर रखा है। आप कहें तो मैं अभी उसे निकालकर आपको...।”

“नहीं श्रीमान...।" मदारी उसकी बात बीच में काटकर सख्ती से बोला “यह गलती मत करना, नुकसान में रहोगे।"

“क्यों इंस्पेक्टर?" जतिन के चेहरे पर आश्चर्य के भाव प्रकट हुए। “क्योंकि तब उस कैमरे पर मौजूद फिंगर प्रिंट्स मिट जाएंगे और तुम्हारी बेगुनाही साबित करने वाला एक सबूत कम हो जाएगा।”

“ओह।" उसके चेहरे पर समझने वाले भाव आए।

"स्पाई कैमरों का रिसीवर और रिकार्डिंग में काम आने वाला बाकी सामान कहां है?" मदारी ने पूछा।

“मेरी कार में मौजूद है।” जतिन ने बताया।

“और आपकी कार कहां है श्रीमान?"

“बाहर। संजना के फ्लैट से थोड़ा फासले पर मौजूद है।"

“फ....फासले पर क्यों मौजूद है श्रीमान? फ्लैट के ठीक बाहर क्यों नहीं है?"

“व....वह ...।” जतिन हिचकिचाया फिर बोला “मैं बता ही चुका हू कि मैं बेहद खतरनाक इरादे के साथ यहां आया था। कार को यहां संजना के फ्लैट के सामने खड़ा करने में जोखिम था। कोई उसका नम्बर नोट कर सकता था।"

"बहुत खूब।” वह वापस शर्मा की ओर घूमा और बोला “शर्मा जजमान।"

“यस सर।” शर्मा सतर्क हुआ था।

"फौरन जाकर उस कार को अपने कब्जे में करो। इस बात का खास ख्याल रखना कि कार के अंदर के किसी भी सामान से फिंगर प्रिंट मिटना नहीं चाहिए।"

“यस सर।” शर्मा ने तत्परता से सहमति में सिर हिलाया। फिर वह अपने साथ एक सिपाही को लेकर वहां से चला

गया।

“और वह डीवीडी कैसेट कहां है श्रीमान?” मदारी पुनः जतिन से मुखातिब हुआ। अब जतिन के लिए उसके चेहरे पर पहली वाली कठोरता गायब हो गई थी। जाहिर था कि जतिन को लेकर उसके नजरिये में फर्क आ गया था। उसने पूछा “कहीं इस डीवीडी प्लेयर के अंदर तो नहीं घूम रही है?" उसका इशारा डीवीडी प्लेयर की ओर था, जो तब भी पहले की तरह ऑन था और उसके डिस्प्ले पर नम्बर आगे बढ़ रहे थे।

“तुमने ठीक समझा इंस्पेक्टर।” जतिन झट से बोला “वह डीवीडी इसी प्लेयर में मौजूद है। तुम केवल एक बार उसे देख लो सारा सच खुद ही तुम्हारे सामने आ जाएगा।"

“स...सारा सच सामने आ जाएगा।” मदारी की भवें उठीं। उसने जतिन को देखा “क्या श्रीमती के कत्ल के अलावा भी कोई और सच है श्रीमान जो सामने आ जाएगा?"

“हां...। इंस्पेक्टर।” जतिन पुख्ता स्वर में बोला “वह सच मेरे बॉस जानकी लाल के कत्ल से ताल्लुक रखता है।"

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"क्या कहा श्रीमान?" मदारी चौंक उठा था। उसके कान खरगोश की तरह खड़े हो गए थे। वह इस तरह बोला जैसे कि उसे अपने कानों पर यकीन न आया हो “वह सच श्री-श्री के कत्ल से ताल्लुक रखता है?"
 
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“यह सच है इंस्पेक्टर। जानकी लाल सेठ के कत्ल में संजना के इसी सजायाफ्ता आशिक का हाथ है। एक कांट्रेक्ट किलर को दस लाख रुपये सुपारी देकर उसने जानकी लाल का कत्ल करवाया है और संजना ने इस काम में उसका पूरा सहयोग किया है।"

“क..क्या सहयोग किया है?" मदारी ने उछल कर पूछा।

“सुपारी की रकम दो किश्तों में उस किलर को पहुंचाई गई थी और दोनों ही बार वह रकम लेकर यही संजना किलर के पास गई थी।"

“और वह सुपारी किलर कौन है?"

“मुझे उसका नाम नहीं पता। उसके बारे में बस इतना ही बता सकता हूं कि वह भी हाल ही में जेल से छूटकर आया है।”

“स..संजना के यार की तरह?"

"हां। लेकिन उसे सहगल से ज्यादा लम्बी सजा हुई थी। वह शायद उम्र कैद की सजा काटकर बाहर आया है।"

“जय गोविंदम् जय गोपालम् ।” मदारी के मुंह से अनायास ही निकला।

“क...क्या?" जतिन चकराया।

“वह जरूर गोपाल होगा। वही उम्रकैद की सजा काटकर अभी बाहर आया है। लेकिन...।” मदारी जबरदस्त पशोपेश में पड़ गया था “वह गोपाल भला क्यों श्री-श्री की सुपारी कबूल करने लगा। वह तो श्री-श्री का चड्ढिया यार था।"

“त...तुम क्या कह रहे हो इंस्पेक्टर, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा।” जतिन बुरी तरह उलझकर बोला।

“और शायद आएगा भी नहीं। उसे छोड़ो कीर्तिमान, और जरा श्रीमती के उस यार का नाम दोबारा से लो?"

जतिन कोई जवाब देता, उससे पहले ही एकाएक मदारी का मोबाइल बजा।

"ऊँ।" मदारी ने बुरा सा मुंह बनाया जैसे कि उस वक्त उसके मोबाइल का बजना उसे तुरंत नागवार गुजरा था लेकिन फिर उसने तुरंत ही काल रिसीव किया, फिर उधर से जो कुछ भी बताया गया उसे सुनकर मदारी के चेहरे पर चौंकने के भाव आए।

"कोई खास बात है इंस्पेक्टर?" उसने जैसे ही कॉल डिस्कनेक्ट किया जतिन ने उसे देखकर सशंक भाव से पूछा।

“है तो सही।” मदारी ने बताया “एक डॉक्टर फुनिया रहा था।"

"कौन डॉक्टर?"

“उसका नाम डॉक्टर गौतम है।” मदारी को फिर जैसे याद आया था “लेकिन आप बिल्कुल भी फिक्र न करें जजमान, इस मामले का आपसे कोई लेना-देना नहीं है। यह हमारा आपसी मामला है।"

लेकिन उसके जवाब से जतिन संतुष्ट न हो सका।

"हां तो मैंने क्या कहा था?"

मदारी वापस मुद्दे पर आता हुआ बोला “मैंने आपसे उस श्रीमती के यार का नाम लेने के लिए कहा था। क्या नाम लिया था आपने?"

“अभी नहीं लिया, उसका नाम सुमेश सहगल है।

मदारी के दिमाग की बत्ती एकाएक जली।

“यह सज्जन...।” वह अपने दिमाग पर जोर डालता हुआ बोला “कहीं श्री-श्री का भूतपूर्व मुलाजिम तो नहीं, जिसे फिर बाद में जेल की हवा खानी पड़ी थी।"

"तुमने ठीक कहा इंस्पेक्टर।” जतिन का सिर फौरन सहमति में हिला “यह यकीनन वही सुमेश सहगल है। जिसने जानकी लाल साहब को कत्ल करके अपनी उसी सजा का बदला लिया है।"

“उफ्फ!” मदारी के मुंह से एकाएक निकला। उसने झुंझलाकर अपनी हथेली पर दूसरे हाथ का मुक्का जोर से जमाया, फिर जैसे खुद पर ही खीझ उठा “इस नामाकूल बेईमान को मैं कैसे भूल गया। शायद इसीलिए कि उसे सात साल की सजा हुई थी और अभी वह वफ्फा पूरा नहीं हुआ है। कोई बात नहीं... अब वह इंस्पेक्टर मदारी के कहर से नहीं बच पाएगा।"

जतिन बेवकूफों की तरह मदारी को देखने लगा था। मदारी ने दूसरे ही पल खुद को सामान्य किया।

"बड़ी विस्फोटक बातें बता रहे हो कीर्तिमान। इन दावों का तुम्हारे पास क्या कोई सबूत है?” फिर उसने जतिन को देखकर पूछा।

“सबूत यह डीवीडी कैसेट है इंस्पेक्टर, जो इस प्लेयर में मौजूद है। टीवी ऑन करके इसे फिर से प्ले करो, सब कुछ तुम्हारे सामने आ जाएगा।” जतिन ने बताया।

"वह तो जरूर करूंगा। लेकिन फारेंसिक टीम के आने के बाद।”

“अ..और तब तक मैं क्या करूं?"

“इसमें क्या पूछना जजमान। जाहिर है कि वही करो, जो कर रहे हो। अपने दोनों पांव फर्श पर जमाकर इत्मिनान से खड़े रहो।"

"त..तो क्या अब भी तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं आया इंस्पेक्टर?" उसके चेहरे पर फिर से व्याकुलता के भाव आ गए थे। उसने कशमकश भरे स्वर में पूछा।

"थोड़ा इंतजार करो। यकीन बस आने ही वाला है।"

"लेकिन..."

"हलकान मत हो श्रीमान।” मदारी ने उसकी मनःस्थिति समझकर उसे भरोसा दिलाया “तुम किन हालात में पुलिस के हाथ लगे हो, तुम्हें शायद उसका अहसास तक नहीं है। फिर भी तुम गिरफ्तार नहीं हो। तुमने जो कुछ भी बताया, केवल एक बार उसकी तस्दीक हो जाने दो, फिर अगर तुम अपनी इच्छा से भी गिरफ्तार होना चाहोगे तो भी तुम्हें गिरफ्तार नहीं करूंगा और जबरदस्ती खदेड़कर यहां से भगा दूंगा। मगर तब तक वही रखो जिसका फल कहते हैं कि बहुत मीठा होता है।”

जतिन का सिर खुद-ब-खुद सहमति में हिला। तब पहली बार उसके चेहरे पर राहत के भाव आए थे।

तभी एक सिपाही ने मदारी के पास पहुंचकर उसे बताया कि फारेंसिक टीम का स्टाफ वहां आ गया था।

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टेलिविजन पर संजना की मौत की खबर सुनते ही संदीप हकबकाया। उसके हाथ से टीवी का रिमोट छूटकर गिर गया। वह थोड़ी देर पहले ही व्हिस्की का चूंट लगाकर आया था, उसका सारा नशा पलक झपकते ही गायब हो गया था और वह बिस्तर पर सीधा होकर बैठ गया।

उसकी निगाहें टेलिविजन पर चिपक कर रह गईं। वह पलकें तक झपकाना भूल गया।

संदीप महाजन उस वक्त जानकी लाल की राजमहल जैसी आलीशान कोठी के, कोठी से भी कहीं ज्यादा आलीशान ड्राइंगरूम में मौजूद था। जानकी लाल की मौत के बाद से ही संदीप रीनी के साथ आकर उसकी कोठी में रहने लगा था। जानकी लाल के बाद अब आखिर रीनी ही तो उसकी बेशुमार चल अचल सम्पत्ति की मालकिन थी और रीनी का पति होने के कारण उन तमाम चीजों पर संदीप का भी उतना ही हक था, जितना कि रीनी का। और अब उसके इस हक के रास्ते में कोई अवरोध नहीं था। जानकी लाल के साथ ही सारे अवरोध समाप्त हो गए थे और आखिरकार वह घड़ी आ ही गई थी जिसका कि संदीप को इतने अरसे से इंतजार था।

वह अभी थोड़ी देर पहले ही कोठी में आया था। उसका दिल तो कर रहा था कि वह भंगड़ा करता हुआ घर जाए, लेकिन वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता था। फिलहाल अपनी खुशी को छुपाकर रखना ही उसके हक में था, वरना पुलिस और दुनिया के साथ-साथ रीनी को भी उस पर शक हो । सकता था। इसीलिए व्हिस्की भी उसने चोरी से ही पी थी और इस बात का परा ख्याल रखा था किरीनी यह भांपने न पाए कि शराब पीकर घर आया था।

खाना खाकर संदीप सीधा ऊपर अपने बेडरूम में आ गया था। लेकिन अभी रीनी वहां नहीं आई थी इसलिए वक्त बिताने के लिए उसने टेलिविजन ऑन कर लिया था और चैनल बदलते ही एक न्यूज चैनल पर संजना का चेहरा देखते ही वह ठिठक गया था।

उस कयामत का चेहरा तो वह लाखों की भीड़ में भी पहचान सकता था। फिर जब उसने पूरी खबर सुनी तो वह सन्नाटे में आ गया।

फिर वह संभला। उसने रिमोट उठाकर टेलिविजन ऑफ कर दिया और फौरन सहगल के मोबाइल पर कॉल लगायी।

काफी लम्बी घंटी जाने के बाद दूसरी तरफ से फोन रिसीव हुआ और उसके कानों में सहगल का धीमा व आशंकित स्वर पड़ा "हैलो।"

“अरे सहगल।" संदीप व्यग्र भाव से बोला “कहां हो तुम?"

दूसरी तरफ खामोशी छा गई। सहगल ने कोई जवाब नहीं दिया था। “हल्लो।” संदीप उतावलेपन से बोला “तुम सुन रहे

हो न सहगल ।"

“सुन रहा हूं।"

"तो फिर जवाब क्यों नहीं देते?"

"नहीं बता सकता। समझ लो कि मैं अंडरग्राउंड हूं।"

"ओह। इसका मतलब जो कुछ टीवी पर दिखाया जा रहा है, सच है। संजना सचमुच मर चुकी है किसी ने उसका खून कर दिया।"

"हां। और अब पुलिस मेरे पीछे है।"

“त...तो क्या संजना को तुमने कत्ल किया है?”

"नहीं। लेकिन उस नामाकूल की गफलत के चलते पुलिस को जानकी लाल सेठ के कत्ल का सच मालूम हो चुका है। इंस्पेक्टर मदारी के हाथ मेरे खिलाफ सबूत भी लग गया है पुख्ता सबूत।"

"हे भगवान ।"

"लेकिन तुम घबराओ मत।” सहगल ने उसे दिलासा दिया “तुम सब पूरी तरह सुरक्षित हो। वह सबूत केवल मेरे, संजना के और उस कांट्रेक्ट किलर के ही खिलाफ है। तुम लोगों का उसमें कोई जिक्र नहीं है।"

"म...मगर यह सब कैसे हुआ ?”

“यह बताने का अभी वक्त नहीं है।"

“मगर अब क्या होगा?" संदीप घबराकर बोला। एसी चलता होने के बावजूद उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई

थीं "हमारे तो सारे प्लान का बेड़ागर्क हो गया। अब तो हम चाहकर भी पुलिस को गुमराह नहीं कर पाएंगे।"

“इसीलिए तो मैंने अंडरग्राउंड होने का फैसला किया है। लेकिन तुम क्यों घबरा रहे हो। मेरे साथ चाहे कुछ भी होता रहे, मैं तुममें से किसी का भी नाम अपनी जुबान पर नहीं लाऊंगा।"

सहगल की उस बात से संदीप को कुछ राहत महसूस हुई।

“लेकिन बदले में तुम सबको भी कुछ करना होगा।"

-

-

“क...क्या करना होगा हमें?" संदीप की राहत तत्काल काफूर हो गई। उसके चेहरे पर आशंका के भाव आ गए।

“वक्त आने दो। बता दूंगा।"

“क...क्या अभी बताने का वक्त नहीं आया है?"

"नहीं।"

"लेकिन...।"

“हुज्जत का कोई मतलब नहीं महाजन।” सहगल का लहजा एकाएक सर्द हो गया था “हम सबके बीच यही कमिटमेंट हुआ था, हमें उस कमिटमेंट को निभाना होगा। अगर तुममें से किसी ने भी इस कमिटमेंट से मुकरने की कोशिश की तो उसका अंजाम समझ ही सकते हो। मैं अकेला नहीं डूबूंगा तुम सबको साथ देकर ही डूबूंगा।”

"क्यों इतना कड़ा बोल रहे हो बॉस । कम से कम मुझसे तुम्हें कोई शिकायत नहीं मिलेगी। बाकी लोगों की गारंटी मैं नहीं ले सकता।"

“शुक्रिया।” सहगल के लहजे में कडुआहट घुल गई थी “बाकी लोगों की गारंटी मैं तुमसे मांग भी नहीं रहा। अपने मोबाइल पर हमेशा उपलब्ध रहना। मैं तुम्हें कभी भी फोन कर सकता

"आलराइट।"

"एक बात और।"

“वह भी बोलो।"
 
टेलिविजन पर संजना की मौत की खबर सुनते ही संदीप हकबकाया। उसके हाथ से टीवी का रिमोट छूटकर गिर गया। वह थोड़ी देर पहले ही व्हिस्की का चूंट लगाकर आया था, उसका सारा नशा पलक झपकते ही गायब हो गया था और वह बिस्तर पर सीधा होकर बैठ गया।

उसकी निगाहें टेलिविजन पर चिपक कर रह गईं। वह पलकें तक झपकाना भूल गया।

संदीप महाजन उस वक्त जानकी लाल की राजमहल जैसी आलीशान कोठी के, कोठी से भी कहीं ज्यादा आलीशान ड्राइंगरूम में मौजूद था। जानकी लाल की मौत के बाद से ही संदीप रीनी के साथ आकर उसकी कोठी में रहने लगा था। जानकी लाल के बाद अब आखिर रीनी ही तो उसकी बेशुमार चल अचल सम्पत्ति की मालकिन थी और रीनी का पति होने के कारण उन तमाम चीजों पर संदीप का भी उतना ही हक था, जितना कि रीनी का। और अब उसके इस हक के रास्ते में कोई अवरोध नहीं था। जानकी लाल के साथ ही सारे अवरोध समाप्त हो गए थे और आखिरकार वह घड़ी आ ही गई थी जिसका कि संदीप को इतने अरसे से इंतजार था।

वह अभी थोड़ी देर पहले ही कोठी में आया था। उसका दिल तो कर रहा था कि वह भंगड़ा करता हुआ घर जाए, लेकिन वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता था। फिलहाल अपनी खुशी को छुपाकर रखना ही उसके हक में था, वरना पुलिस और दुनिया के साथ-साथ रीनी को भी उस पर शक हो । सकता था। इसीलिए व्हिस्की भी उसने चोरी से ही पी थी और इस बात का परा ख्याल रखा था किरीनी यह भांपने न पाए कि शराब पीकर घर आया था।

खाना खाकर संदीप सीधा ऊपर अपने बेडरूम में आ गया था। लेकिन अभी रीनी वहां नहीं आई थी इसलिए वक्त बिताने के लिए उसने टेलिविजन ऑन कर लिया था और चैनल बदलते ही एक न्यूज चैनल पर संजना का चेहरा देखते ही वह ठिठक गया था।

उस कयामत का चेहरा तो वह लाखों की भीड़ में भी पहचान सकता था। फिर जब उसने पूरी खबर सुनी तो वह सन्नाटे में आ गया।

फिर वह संभला। उसने रिमोट उठाकर टेलिविजन ऑफ कर दिया और फौरन सहगल के मोबाइल पर कॉल लगायी।

काफी लम्बी घंटी जाने के बाद दूसरी तरफ से फोन रिसीव हुआ और उसके कानों में सहगल का धीमा व आशंकित स्वर पड़ा "हैलो।"

“अरे सहगल।" संदीप व्यग्र भाव से बोला “कहां हो तुम?"

दूसरी तरफ खामोशी छा गई। सहगल ने कोई जवाब नहीं दिया था। “हल्लो।” संदीप उतावलेपन से बोला “तुम सुन रहे

हो न सहगल ।"

“सुन रहा हूं।"

"तो फिर जवाब क्यों नहीं देते?"

"नहीं बता सकता। समझ लो कि मैं अंडरग्राउंड हूं।"

"ओह। इसका मतलब जो कुछ टीवी पर दिखाया जा रहा है, सच है। संजना सचमुच मर चुकी है किसी ने उसका खून कर दिया।"

"हां। और अब पुलिस मेरे पीछे है।"

“त...तो क्या संजना को तुमने कत्ल किया है?”

"नहीं। लेकिन उस नामाकूल की गफलत के चलते पुलिस को जानकी लाल सेठ के कत्ल का सच मालूम हो चुका है। इंस्पेक्टर मदारी के हाथ मेरे खिलाफ सबूत भी लग गया है पुख्ता सबूत।"

"हे भगवान ।"

"लेकिन तुम घबराओ मत।” सहगल ने उसे दिलासा दिया “तुम सब पूरी तरह सुरक्षित हो। वह सबूत केवल मेरे, संजना के और उस कांट्रेक्ट किलर के ही खिलाफ है। तुम लोगों का उसमें कोई जिक्र नहीं है।"

"म...मगर यह सब कैसे हुआ ?”

“यह बताने का अभी वक्त नहीं है।"

“मगर अब क्या होगा?" संदीप घबराकर बोला। एसी चलता होने के बावजूद उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई

थीं "हमारे तो सारे प्लान का बेड़ागर्क हो गया। अब तो हम चाहकर भी पुलिस को गुमराह नहीं कर पाएंगे।"

“इसीलिए तो मैंने अंडरग्राउंड होने का फैसला किया है। लेकिन तुम क्यों घबरा रहे हो। मेरे साथ चाहे कुछ भी होता रहे, मैं तुममें से किसी का भी नाम अपनी जुबान पर नहीं लाऊंगा।"

सहगल की उस बात से संदीप को कुछ राहत महसूस हुई।

“लेकिन बदले में तुम सबको भी कुछ करना होगा।"

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“क...क्या करना होगा हमें?" संदीप की राहत तत्काल काफूर हो गई। उसके चेहरे पर आशंका के भाव आ गए।

“वक्त आने दो। बता दूंगा।"

“क...क्या अभी बताने का वक्त नहीं आया है?"

"नहीं।"

"लेकिन...।"

“हुज्जत का कोई मतलब नहीं महाजन।” सहगल का लहजा एकाएक सर्द हो गया था “हम सबके बीच यही कमिटमेंट हुआ था, हमें उस कमिटमेंट को निभाना होगा। अगर तुममें से किसी ने भी इस कमिटमेंट से मुकरने की कोशिश की तो उसका अंजाम समझ ही सकते हो। मैं अकेला नहीं डूबूंगा तुम सबको साथ देकर ही डूबूंगा।”

"क्यों इतना कड़ा बोल रहे हो बॉस । कम से कम मुझसे तुम्हें कोई शिकायत नहीं मिलेगी। बाकी लोगों की गारंटी मैं नहीं ले सकता।"

“शुक्रिया।” सहगल के लहजे में कडुआहट घुल गई थी “बाकी लोगों की गारंटी मैं तुमसे मांग भी नहीं रहा। अपने मोबाइल पर हमेशा उपलब्ध रहना। मैं तुम्हें कभी भी फोन कर सकता

"आलराइट।"

"एक बात और।"

“वह भी बोलो।"
 
“मुझे दोबारा फोन मत लगाना क्योंकि मैं अपना मोबाइल ऑफ करने जा रहा हूं। पुलिस ने मेरे मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया हो सकता है।"

-

“त...तो फिर तुमसे कांटेक्ट कैसे करूंगा?"

“मैं खुद तुमसे कांटेक्ट करूंगा।"

“ओह।”

फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

संदीप के होंठ एकाएक सख्ती से भिंच गए। चेहरे पर बेहद कठोर भाव आ गए थे। संजना की मौत का खौफ फिलहाल उसके दिलोदिमाग से बिल्कुल निकल गया था और उसके दिलोदिमाग में रह-रहकर सहगल का नाम टकराने लगा था। इसके साथ ही एक बेहद कठोर इरादा उसके अंदर घर करने लगा था।

उसने जतिन को फोन लगाया।

दूसरी तरफ से फौरन कॉल रिसीव हुई और जतिन का सशंक स्वर उसके कानों में पड़ा “हल्लो।"

“हल्लो जतिन ।” वह मोबाइल पर बोला “मैं संदीप, पहचाना?"

“पहचाना।” जतिन का शुष्क स्वर उसके कानों में पड़ा “बोलो क्या बात है?"

"मैं अभी इसी वक्त तुमसे मिलना चाहता हूं।"

"मुलाकात की वजह अगर संजना है तो उसके लिए मिलने की जरूरत नहीं है। फोन पर भी संवेदना प्रकट की जा सकती

“इतनी रुखाई क्यों दिखा रहे हो दोस्त। तुम्हारा दुश्मन मैं नहीं सहगल है।"

“हर वह इंसान मेरा दुश्मन है जो सहगल और उसकी टीम से जुड़ा है।"

“वह टीम केवल एक मकसद के लिए बनाई गई थी, जो कि पूरा हो चुका है। फिलहाल बस इतना ही जान लो कि इस वक्त सहगल अकेले तुम्हारा नहीं, मेरा भी दुश्मन है। वह हम सबका दुश्मन है। दुश्मन भी ऐसा खतरनाक है, जो हम सबको साथ लेकर डूबने पर आमादा है।"

"वक्त की मांग यह है कि हम सबको एक बार फिर इकट्ठा होना होगा, और एक बार फिर एक मिशन को अंजाम देना होगा।"

“अपने दुश्मनों के लिए मैं अकेला ही काफी हूं। उसके लिए मुझे अब किसी टीम की जरूरत नहीं है।"

“म..मैं तुम्हारे दिल की हालत समझ सकता हूं। लेकिन मैं फिर कहता हूं, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं। वैसे भी सहगल एक

खतरनाक आदमी है।"

“मुझे मालूम है। अगर कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ और न हो तो मैं फोन रख रहा हूं।"

"अपने फैसले पर एक बार फिर सोच लो जतिन। शायद तुम्हारा इरादा बदल जाए।"

प्रत्युत्तर में जतिन ने फोन डिस्कनेक्ट कर लिया।

संदीप ने असहाय भाव से सिर हिलाया, फिर उसने अजय को फोन लगाया। आखिर अजय भी जतिन, संजना और कोमल की तरह ही सहगल की टीम का एक हिस्सा था। अजय ने भी लगभग फौरन ही फोन उठाया।

"हल्लो अजय, मैं संदीप।” संदीप मोबाइल पर बोला।

“पहचान लिया।” अजय का सहज स्वर उसके कान में पड़ा “अगर संजना के बारे में बताने के लिए फोन किया है तो मुझे मालूम है। और हमारे सेनापति सहगल की वार्निंग भी मुझ तक पहुंच चुकी है।”

“सहगल की वजह से ही फोन किया है।" वह जल्दी ही बोला

“उसे लेकर तुमने क्या फैसला किया है?"

"कोई फैसला तो करना ही पड़ेगा। वरना वह सचमुच अकेला नहीं डूबेगा, अपने साथ हम सबको भी ले डूबेगा।"

“यही बात मैंने जतिन को समझाने की कोशिश की थी, मगर..।”

“जतिन इस वक्त कुछ भी समझने की हालत में नहीं है। वह नफरत से भरा हुआ है।"

"इसका मतलब तुमने भी उसे फोन किया था?"

"हां। मैंने उसे फोन किया था। सहगल इस वक्त उसका जानी दुश्मन है। हम सबसे कहीं बढ़कर वह सहगल की मौत

का तमन्नाई है।"

“फिर भी हमारे साथ आने से इंकार कर रहा है?"

"हां। क्योंकि टीम में काम करने का नतीजा हम सबके सामने है। माना कि टीम की ताकत जुदा होती है, मगर उसके नुकसान भी कम नहीं हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सहगल की मौत के साथ ही यह खूनी सिलसिला बंद हो जाएगा। हो सकता है कि सहगल के बाद एक बार फिर हालत पलटा खा जाएं और हमें फिर खुद को बचाने के लिए एक और सहगल को ठिकाने लगाना पड़े। जतिन भी तो यही कह रहा था।"

"और तुम क्या कह रहे हो?"

“मैं जतिन से पूरी तरह सहमत हूं।"

"ओह।” संदीप का चेहरा बुझ गया।

"गुड बॉय संदीप। दोबारा मुझे फोन मत करना।"

अजय ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

संदीप ने इस बार कोमल को फोन लगाया और धड़कते दिल से उसके फोन उठाये जाने का इंतजार करने लगा। दो-तीन बार बेल बजने के बाद कोमल ने कॉल रिसीव किया और वह पहली शख्स थी, जिसने संदीप का आवाज सुनकर नापसंदगी नहीं जाहिर की थी, न ही वह उसके साथ रुखाई से पेश आई थी। उसके विपरीत उसकी खुशी से चहकती आवाज संदीप के कानों में पड़ी थी “हाय संदीप। हाऊ आर यू।"

“फाइन।" संदीप के दिल की धड़कनों में इजाफा हो गया था। उसके दिल में एक लहर सी आकर चली गई थी। वह धीरे से बोला "तुम कैसी हो?"

“वैसी ही हूं जैसे तुम छोड़कर गए थे।” कोमल बोली “तुम्हारे जिस्म और दिल पर तो डाका पड़ चुका है, लेकिन जी चाहे तो यकीन कर लो, मेरा हसीन जिस्म और दिल पूरी तरह पवित्र है। उस पर मैंने कभी किसी का साया तक नहीं पड़ने दिया।"

"शिकायत कर रही हो?"
 
"शिकायत तो मैंने केवल अपनी किस्मत से ही की है संदीप। कितना चाहा था मैंने तुम्हें । मेरे प्यार में आखिर कहां कमी रह गई थी जिसकी मुझे इतनी भारी सजा मिली।” कोमल का लहजा भारी हो गया था।

"सजा तो मैंने अपने आपको दी है कोमल ।"

"अपनी सफाई पेश करने के लिए मुझे फोन किया है?"

“नहीं। मेरी सफाई तो तुम्हें आने वाला वक्त देगा कोमल । इस वक्त तो मैंने किसी और वजह से तुम्हें फोन लगाया है।"

“वह वजह कहीं सहगल तो नहीं है?"

“इसका मतलब तुम उससे बात कर चुकी हो?"

“संजना के बारे में मालूम होते ही मैंने तुरंत वहां उसे फोन लगाया था। सहगल के साथ सचमुच बुरा हुआ संदीप। मुझे उससे हमदर्दी है।”

“इ...इसका मतलब तुम उसके साथ हो?"

"ऐसी बात नहीं है। अब मैं किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहती, लेकिन न चाहते हुए भी पड़ना ही पड़ेगा। नहीं तो सहगल हम सबका बेड़ा गर्क कर देगा।"

"नहीं कोमल । भूलकर भी ऐसा मत करना।” सहगल तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।"

"मैं खुद भी कहां कुछ करना चाहती हूं संदीप, लेकिन मजबूरी में करना पड़ेगा। वह हमें नुकसान पहुंचा सकता है।”

"सहगल की जिंदगी आज की तारीख में इतनी लम्बी नहीं है कोमल।"

"यह तुम कैसे कह सकते हो?"

“जिनका बेड़ा वह गर्क कर सकता है, उन सबको अपनी फिक्र है। और इस बात के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे कि सहगल उनका बेड़ा गर्क करने न पाए।"

“उन लोगों में तुम भी तो शामिल हो?"

“इसीलिए तो इतनी मजबूती से यह दावा किया है।"

“मतलब साफ है, तुमने सहगल का कोई इंतजाम सोच लिया है?"

"हां।"

“क्या मुझे बताओगे कि तुमने उसका क्या इंतजाम सोचा है?"

“यह तुम क्यों जानना चाहती हो?"

“कोई खास वजह नहीं। अगर मुझ पर यकीन नहीं तो मत बताओ। आखिर अब मेरा तुमसे रिश्ता ही क्या है?"

“मेरा इम्तहान लेना चाहती हो?"

“ऐसी कोई बात नहीं है।" “फिर मुझे क्यों तड़पाती हो?"

मुझे हैरानी है कि तुम आज भी मेरे लिए तड़पते हो?"

“अब नहीं तड़पूंगा।"

"क्यों? अब ऐसा क्या होने वाला है जो तुम नहीं तड़पोगे।"

"क्योंकि अब वह वजह ही खत्म होने वाली है जो मुझे तुम्हारे लिए तड़पाती है।”

“और वह वजह क्या है?"

“उस वजह का नाम रीनी है।"

"तुम्हारी बीवी है?" कोमल चौंकी थी। उसके स्वर में हैरत उमड़ आई थी।

"हां।"

“और तुम कह रहे हो कि वह वजह खत्म होने वाली है। अर्थात् रीनी खत्म होने वाली है।"

“हां।”

"व्हॉट! यह तुम क्या बकवास कर रहे हो संदीप।” कोमल चिहुंककर सिसकारी भरती हुई बोली थी “रीनी क्यों खत्म होने वाली है?"

"क्योंकि अब मेरे लिए उसकी जरूरत खत्म हो गई है।"

संदीप निःसंकोच बोला “अब मेरी वह मजबूरी खत्म हो चुकी है, जिसके लिए मैंने उससे शादी की थी।"

“य...यह तुम क्या कह रहे हो संदीप? आखिर किस मजबूरी की बात कर रहे हो तुम? तुम्हारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो तुमने मुझे छोड़कर रीनी से शादी कर ली?"

"दिल के जख्मों को मत कुरेदो कोमल । मैं अपने दर्द को बाहर आने से रोक नहीं पाऊंगा।"

“इस दर्द को बाहर निकल जाने दो संदीप, चैन आएगा। तुम नहीं जानते हो, इस सवाल का जवाब पाने के लिए मैं कितना छटपटा रही हूं।"

“तो फिर सुनो कोमल, मेरी वह मजबूरी मेरे घर के हालात थे।”

“म...मतलब?”
 
“म...मतलब?”

“मेरे घराने के बारे में यह शहर जो कुछ भी जानता है, वह सब झूठ है कोमल ।” संदीप कुछ पलों की खामोशी के बाद बोला “मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति उतनी सुदृढ़ नहीं थी, जो नजर आती थी। मेरी फैक्ट्री इतने सालों से लगातार घाटे में चल रही थी। मेरे शेयर, मेरा बंगला, मेरी कारें, सब बाजार के पास गिरवी रखी थीं। मेरे पापा पर बैंकों का इतना मोटा कर्जा था, जिसे यदि नहीं चुकाया जाता तो सब कुछ नीलाम हो जाता और मेरे पापा को दिवालिया घोषित कर दिया जाता। मुझे उस वक्त सहारे की जरूरत थी कोमल बहुत मजबूत सहारे की। जिससे मैं अपनी क्राइसिस से उबर पाता। और उन हालात में मुझे ऐसा मजबूत सहारा केवल रीनी से ही हासिल हो सकता था सिर्फ रीनी से।”

“क...क्योंकि रीनी एक दौलतमंद बाप की बेटी थी।" कोमल का स्वर उभरा था।

"हां।” संदीप ने स्वीकार किया

"रीनी एक दौलतमंद बाप की इकलौती बेटी थी। और अगर वह मेरी बीवी बन जाती तो उसके बाप की सारी दौलत मेरी अपनी होती। और वह दौलत मुझे मेरे उस वक्त के विकट हालात से उबार लेती। सबसे बडी बात.रीनी मझ पर दिलोजान से फिदा थी। मेरी तम से शादी हो जाने के बावजूद वह मुझ पर फिदा थी। यह केवल मेरा दिल ही जानता है कोमल, वह मेरे लिए कैसे धर्मसंकट की घड़ी थी, जब अपने घराने की प्रतिष्ठा और तुममें से मुझे किसी एक को चुनना था।"

"और तुमने मुझे छोड़ने का फैसला कर लिया था?" कोमल का स्वर उसके कानों में पड़ा।

"और मैं क्या करता कोमल । इसके अलावा मेरे पास कोई और रास्ता भी तो नहीं था। मगर मैं फिर कहता हूं, यह केवल मेरा दिल ही जानता है कि उस वक्त यह फैसला लेते हुए मुझ पर क्या गुजरी थी।"

“म..मगर फिर भी तो रीनी की दौलत तुम्हें हासिल न हो सकी?” कोमल बोली।

“हां। क्योंकि मैं केवल रीनी की पसंद था। उसके बाप जानकी लाल ने मुझे कभी पसंद नहीं किया। कहते मेरा दिल लरजता है, उसने मुझे कभी अपना दामाद नहीं माना। उस वक्त भले ही वह अपनी बेटी की जिद के आगे झुक गया था, लेकिन मुझे अच्छी तरह मालूम था कि अगर वह जिंदा रहता तो रीनी और मेरा तलाक कराकर ही रहता।"

“इसीलिए तुम उसकी मौत के ख्वाहिशमंद थे और पहले भी उसकी जान लेने की कोशिश कर चुके थे।”

"और मैं क्या करता। लेकिन बूढ़ा बड़ा सख्तजान था। मेरी कोशिश केवल कोशिश बनकर ही रह गई। लेकिन आखिरकार तो हम कामयाब हो गए और ..।"

"अ...और क्या संदीप?"

“और अब उस खबीस बूढ़े की सारी दौलत मेरी है। उसके तमाम साम्राज्य और वैभव का मैं अकेला मालिक हूं।"

दूसरी तरफ घुप्प खामोशी छा गई।

“हल्लो।” संदीप व्यग्र भाव से बोला “तुम लाइन पर हो न कोमल ?"
 

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