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‘‘वो ऐसा करना अफोर्ड नहीं कर सकता था। क्योंकि होश में आते ही चौहान को ये समझते देर नहीं लगती कि मंदिरा ने उसकी विस्की के साथ कोई छेड़खानी की थी। फिर मंदिरा के जरिए उसे डॉक्टर की खबर लग जाना क्या बड़ी बात थी। ऊपर से वो गायकवाड़ साहब को दुबई से दिल्ली बुला चुका था। वो एक ऐसा मौका था जो दोबारा चाहकर भी वो हासिल नहीं कर सकता था। ऐसे में उसने अपनी योजना को या तो उसी रोज अंजाम तक पहुंचाना था या फिर हमेशा के लिए सबकुछ भूल जाना था।‘‘
‘‘भूलना उसे गवारा नहीं था, लिहाजा अपने प्लान पर अमल करते हुए उसने मंदिरा की हत्या कुछ इस ढंग से कर दी ताकि वो किसी वहशी का काम लगे, किसी होमीसाइडल का काम लगे। कत्ल से पहले वो मंदिरा की गर्दन की कोई रग दबाकर उसे बेहोश कर चुका था, इसलिए उस काम में डॉक्टर को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। ऊपर से जरा लाश की हालत पर गौर करें आप लोग, जिस तरह की दुर्गति लाश की गई थी, वो कोई आदमखोर ही कर सकता था। किसी आम आदमी के वश की बात वो हरगिज नहीं थी। मगर किसी डॉक्टर के लिए इंसानी जिस्म की चीर-फाड़ रोजमर्रा का काम होता है, इसलिए वो उस काम को बेहिचक अंजाम दे पाया था।‘‘
‘‘आगे चलकर मकतूला की स्टडी से कुछ ऐसे सूत्र बरामद हुए जो ये बताते थे कि कत्ल किए जाने से पहले वो मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी हुई थी। ये वो खास बात थी जिसने चौहान की बेगुनाही का यकीन दिलाने में अहम रोल अदा किया था।‘‘
‘‘ऐसा भी क्या हाथ लग गया वहां से?‘‘ चौहान बोला।
‘‘मंदिरा की लाश से रूबरू होने और पुलिस के यहां पहुंचने के बाद जब मैं तुम्हारे फ्लैट पर पहुंचा तो मैंने तुम्हारी उस वक्त की हालत देखी थी। समझ लो बस सांस ही चल रही थी तुम्हारी, उसके अलावा तुम्हारे जिस्म में कोई हरकत नहीं थी - ऐसे में तुम्हारा कालकाजी से साकेत तक पहुंच पाना ही असंभव था, कत्ल करना तो दूर की बात थी - इसके बाद भी अगर तुम किसी तरह वहां पहुंचने में कामयाब हो गये तो - पीछे जो कुछ वो तुम्हारे साथ करके आई थी, उसके मद्देनजर तो उसने तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा ही नहीं खोलना था। तुम ज्यादा जोर लगाते तो यकीनन वो पुलिस को कॉल कर देती - क्या ये क्या मानने वाली बात थी कि उसने बेखौफ होकर तुम्हे अपनी स्टडी में रिसीव किया और अपनी चेयर पर बैठी तुमसे बातें करती रही। यहां तक कि तुम मेज का घेरा काटकर उसकी तरफ पहुंच गये और उसे तुम्हारी नीयत पर शक तक नहीं हुआ।‘‘
‘‘इसकी क्या गारंटी की तब वो मेज के पीछे अपनी ईजी चेयर पर ही बैठी थी?‘‘
‘‘गारंटी है - नीलम बोली - मंदिरा को यकीनन तब बेहोश किया गया जब वो स्टडी में मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी थी। क्योंकि बेहोश होकर जब वो आगे को गिरी तो उसका माथा मेज के किनारे से टकराकर घायल हो गया - वहां खून के निशान अभी भी मौजूद हैं - मेज और चेयर के बीच की दूरी ज्यादा होने की वजह से उसका बेहोश शरीर मेज पर टिके रहने की बजाय नीचे गिर गया। जिसे डॉक्टर ने दूसरी तरफ पहुंचकर घसीटकर बाहर निकाला था। ये बात भी स्टडी टेबल के निचले हिस्से के मुआयने से साबित हो चुकी है।‘‘
‘‘मंदिरा और सुनीता की हत्या में एक और खास बात थी, जो दोनों लाशों की हालत एक जैसी होने के बावजूद भी ये साबित करती थी कि दोनों हत्याओं के दौरान कातिल की मानसिकता जुदा थी - मैं वार्तालाप का सूत्र दोबारा अपने हाथ लेता हुआ बोला - पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का कहना था कि मंदिरा की बॉडी को बहुत नपे-तुले अंदाज में नोंचा-खसोटा गया था, जबकि सुनीता गायकवाड़ के शरीर पर पूरी बर्बरता के साथ वार किये गये थी। उसकी वजह जरूर ये रही होगी कि मंदिरा को लेकर डॉक्टर के मन में कोई फीलिंग नहीं थी, जबकि दूसरी हत्या करते वक्त उसकी नफरत, उसके भीतर का जुनून उभरकर सामने आ गया था, इसलिए वहां पर उसने पूरी हैवानियत दिखाई थी।‘‘
‘‘बहरहाल मंदिरा की हत्या के बाद डॉक्टर ने चौहान की वर्दी में लगी नेम प्लेट उसकी मुट्ठी में दबाकर अपनी ओर खींचा तो वो फटकर मंदिरा की मुट्ठी में दबा रह गया। इसके बाद डॉक्टर ने वहां चौहान के जूते पहनकर - जो कि वो चौहान के घर से ही पहनकर आया हो तो कोई बड़ी बात नहीं थी - कुछ निशान छोड़े, जूतों के तले में जानबूझकर खून लगाया फिर यूनीफार्म को भी सामने की तरफ से मंदिरा के खून से रंगा। इसके बाद उसने पुलिस जांच में फक्चर डालने के लिए गोल्ड फ्लैक के दो सिगरेट सुलगाये, एक मकतूला के होठों के बीच लगाकर उसपर लिपस्टिक के दाग कायम किये, उसके बाद दोनों सिगरेट उसने खुद पिये और अधजले टुकड़े फेंककर वहां से चलता बना। जरूर उस वक्त वो हाथों में दस्ताने पहने था जिसकी वजह से घटनास्थल पर कहीं भी उसके फिंगरप्रिंट बरामद नहीं हुए।‘‘
‘‘वहां से डॉक्टर सीधा कालकाजी पहुंचा। तब या तो गायकवाड़ साहब के फ्लैट का दरवाजा इत्तेफाकन खुला था या फिर उसने बेल बजाकर दरवाजा खुलवाया और जबरन भीतर दाखिल हो गया। वहां भी उसने मकतूला को पहले कोई नपा-तुला वार करके बेहोश कर दिया फिर किसी दरिंदे की तरह उसे नोंचना-खसोटना शुरू कर दिया। उस काम से फारिग होकर उसने वहां भी चौहान की वर्दी को मकतूला के खून से रंगा और बाहर निकलकर चौहान के फ्लैट में दाखिल हो गया। जहां चौहान के कपड़े उतारकर उसे खून से रंगी वर्दी पहनाई और इमारत से बाहर निकलकर कहीं छिपकर खड़ा हो गया।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘अब उसे इंतजार था गायकवाड़ साहब के वहां पहुंचने का जिनके बारे में वो निश्चिंत था कि छह बजे से पहले ये वहां नहीं पहुंचने वाले। आखिरकार ये पूर्व निर्धारित वक्त पर वहां पहुंचे तो वो मोटरसाइकिल पर सवार होकर एक पीसीओ पर पहुंचा, जहां से उसने इन्हें फोन किया और इनके मुंह से घटना की बाबत जाना। फिर डॉक्टर ने सलाह दी कि इन्हें फौरन घटनास्थल से कूच कर जाना चाहिए वो भी बिना किसी सामान के ताकि वहां से निकलते वक्त किसी की निगाह इनपर ना पड़े जो कि सूटकेस के साथ खिसकने में पड़कर रहनी थी। इन्होंने बगैर आगा-पीछा सोचे उसकी सलाह पर अमल किया और जाकर एक होटल में बुक हो गये। आगे पुलिस ने जब इनको दुबई के इनके ऑफिस में फोन किया तो ऑपरेटर ने इनके निर्देशानुसार वो कॉल इनके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी जिसपर बात करते वक्त इन्होंने यही जाहिर किया कि ये तब दुबई में थे।‘‘
‘‘अंकुर रोहिल्ला के कत्ल की नौबत क्योंकर आई?‘‘
‘‘बताया तो था, उसने डॉक्टर को मंदिरा के फ्लैट में दाखिल होते देख लिया था, लिहाजा बाद में वो पुलिस को डॉक्टर के बारे में बता सकता था। भले ही वो डॉक्टर को बाई नेम नहीं पहचानता था मगर उसका हुलिया तो बयान कर ही सकता था। बाद में जब पुलिस कत्ल से संबंधित लोगों से उसका आमना-सामना कराती तो उसने डॉक्टर को झट से पहचान लेना था।‘‘
‘‘अगर ऐसा था तो डॉक्टर ने फौरन उसका कोई इंतजाम क्यों नहीं कर दिया। उसका कत्ल तो दो दिन बाद हुआ था, इतने वफ्ते में तो वो सौ बार पुलिस को कातिल के बारे में बता सकता था।‘‘
‘‘इस बारे में मेरा अपना अंदाजा ये है कि डॉक्टर को अंकुर रोहिल्ला तक पहुंच बनाने में इतना वक्त लग गया। डॉक्टर के घर की तलाशी लेने पर मुझे वहां से एक बंगले का नक्शा मिला था, जो मेरा दावा है कि अंकुर रोहिल्ला के बंगले का था। लिहाजा वो नक्शा उसने एमसीडी के दफ्तर से या किसी और सोर्स के जरिये हांसिल किया हो सकता है। उस काम में भी उसे वक्त लगा होगा। फिर डॉक्टर के लिए फौरन उसका कत्ल कर देना भी जरूरी नहीं था क्योंकि वो जानता था कि अंकुर रोहिल्ला को नहीं पता था कि वो कौन था। लिहाजा उसके बताये हुलिए के आधार पर अगर पुलिस किसी को गिरफ्तार करती तो वो गायकवाड़ साहब थे, क्योंकि उस वक्त वो एक ऐसी बिग लगाये हुए था जिसके बाल तांबें की रंगत के थे जो कि इस केस से संबंधित लोगों में इनके अलावा किसी के नहीं हैं, ऊपर से कद-काठ के लिहाज से भी ये डॉक्टर के बराबर ही दिखाई देते हैं।‘‘
‘‘फिर भी, अंकुर क्यों अपनी जुबान बंद किये था।‘‘
‘‘इसकी दो वजह हो सकती है, पहली ये कि उसे एहसास तक नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने मंदिरा के फ्लैट में घुसते देखा था वो मंदिरा का हत्यारा हो सकता था। दूसरी वजह ये थी कि वो किसी भी हाल में खुद का नाम मंदिरा के साथ जुड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता था। जरा उसकी स्थिति पर गौर करो, वो ना सिर्फ मंदिरा का रजिस्टर्ड पति था बल्कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का बाप भी था और दूसरी तरफ वो एक करोड़पति बिजनेस मैन की बेटी से शादी का ख्वाब देख रहा था। ऐसे में अगर वो पुलिस की नजरों में आ जाता तो पुलिस उसका आगा-पीछा टटोले बिना नहीं रहती और तब उन्हें ये पता लग जाना कि अंकुर रोहिल्ला मंदिरा का कानूनी पति था, महज वक्त की बात होती। ऐसे में उसकी शादी तो खटाई में पड़ जानी थी। लिहाजा उस बाबत उसने चुप्पी अख्तियार करने में ही भलाई समझी। ऊपर से मंदिरा उसके रास्ते का वो कांटा थी जो भविष्य में उसे बहुत डैमेज कर सकती थी, वो अपनी शादी का हवाला देकर उसे ब्लैकमेल तक कर सकती थी। ऐसे में मंदिरा का चैप्टर क्लोज हो जाना तो उसके लिए किसी खुदाई मदद की तरह था। फिर वो क्यों अपनी हालत आ बैल मुझे मार वाली बनाता! लिहाजा उसने अपनी जुबान बंद रखी।‘‘
‘‘वो बिना सिक्योरिटी गार्ड की निगाहों में आये, अंकुर रोहिल्ला के बंगले में घुसने में कैसे कामयाब हो गया।‘‘
‘‘सॉरी, इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।‘‘
‘‘भूलना उसे गवारा नहीं था, लिहाजा अपने प्लान पर अमल करते हुए उसने मंदिरा की हत्या कुछ इस ढंग से कर दी ताकि वो किसी वहशी का काम लगे, किसी होमीसाइडल का काम लगे। कत्ल से पहले वो मंदिरा की गर्दन की कोई रग दबाकर उसे बेहोश कर चुका था, इसलिए उस काम में डॉक्टर को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। ऊपर से जरा लाश की हालत पर गौर करें आप लोग, जिस तरह की दुर्गति लाश की गई थी, वो कोई आदमखोर ही कर सकता था। किसी आम आदमी के वश की बात वो हरगिज नहीं थी। मगर किसी डॉक्टर के लिए इंसानी जिस्म की चीर-फाड़ रोजमर्रा का काम होता है, इसलिए वो उस काम को बेहिचक अंजाम दे पाया था।‘‘
‘‘आगे चलकर मकतूला की स्टडी से कुछ ऐसे सूत्र बरामद हुए जो ये बताते थे कि कत्ल किए जाने से पहले वो मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी हुई थी। ये वो खास बात थी जिसने चौहान की बेगुनाही का यकीन दिलाने में अहम रोल अदा किया था।‘‘
‘‘ऐसा भी क्या हाथ लग गया वहां से?‘‘ चौहान बोला।
‘‘मंदिरा की लाश से रूबरू होने और पुलिस के यहां पहुंचने के बाद जब मैं तुम्हारे फ्लैट पर पहुंचा तो मैंने तुम्हारी उस वक्त की हालत देखी थी। समझ लो बस सांस ही चल रही थी तुम्हारी, उसके अलावा तुम्हारे जिस्म में कोई हरकत नहीं थी - ऐसे में तुम्हारा कालकाजी से साकेत तक पहुंच पाना ही असंभव था, कत्ल करना तो दूर की बात थी - इसके बाद भी अगर तुम किसी तरह वहां पहुंचने में कामयाब हो गये तो - पीछे जो कुछ वो तुम्हारे साथ करके आई थी, उसके मद्देनजर तो उसने तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा ही नहीं खोलना था। तुम ज्यादा जोर लगाते तो यकीनन वो पुलिस को कॉल कर देती - क्या ये क्या मानने वाली बात थी कि उसने बेखौफ होकर तुम्हे अपनी स्टडी में रिसीव किया और अपनी चेयर पर बैठी तुमसे बातें करती रही। यहां तक कि तुम मेज का घेरा काटकर उसकी तरफ पहुंच गये और उसे तुम्हारी नीयत पर शक तक नहीं हुआ।‘‘
‘‘इसकी क्या गारंटी की तब वो मेज के पीछे अपनी ईजी चेयर पर ही बैठी थी?‘‘
‘‘गारंटी है - नीलम बोली - मंदिरा को यकीनन तब बेहोश किया गया जब वो स्टडी में मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी थी। क्योंकि बेहोश होकर जब वो आगे को गिरी तो उसका माथा मेज के किनारे से टकराकर घायल हो गया - वहां खून के निशान अभी भी मौजूद हैं - मेज और चेयर के बीच की दूरी ज्यादा होने की वजह से उसका बेहोश शरीर मेज पर टिके रहने की बजाय नीचे गिर गया। जिसे डॉक्टर ने दूसरी तरफ पहुंचकर घसीटकर बाहर निकाला था। ये बात भी स्टडी टेबल के निचले हिस्से के मुआयने से साबित हो चुकी है।‘‘
‘‘मंदिरा और सुनीता की हत्या में एक और खास बात थी, जो दोनों लाशों की हालत एक जैसी होने के बावजूद भी ये साबित करती थी कि दोनों हत्याओं के दौरान कातिल की मानसिकता जुदा थी - मैं वार्तालाप का सूत्र दोबारा अपने हाथ लेता हुआ बोला - पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का कहना था कि मंदिरा की बॉडी को बहुत नपे-तुले अंदाज में नोंचा-खसोटा गया था, जबकि सुनीता गायकवाड़ के शरीर पर पूरी बर्बरता के साथ वार किये गये थी। उसकी वजह जरूर ये रही होगी कि मंदिरा को लेकर डॉक्टर के मन में कोई फीलिंग नहीं थी, जबकि दूसरी हत्या करते वक्त उसकी नफरत, उसके भीतर का जुनून उभरकर सामने आ गया था, इसलिए वहां पर उसने पूरी हैवानियत दिखाई थी।‘‘
‘‘बहरहाल मंदिरा की हत्या के बाद डॉक्टर ने चौहान की वर्दी में लगी नेम प्लेट उसकी मुट्ठी में दबाकर अपनी ओर खींचा तो वो फटकर मंदिरा की मुट्ठी में दबा रह गया। इसके बाद डॉक्टर ने वहां चौहान के जूते पहनकर - जो कि वो चौहान के घर से ही पहनकर आया हो तो कोई बड़ी बात नहीं थी - कुछ निशान छोड़े, जूतों के तले में जानबूझकर खून लगाया फिर यूनीफार्म को भी सामने की तरफ से मंदिरा के खून से रंगा। इसके बाद उसने पुलिस जांच में फक्चर डालने के लिए गोल्ड फ्लैक के दो सिगरेट सुलगाये, एक मकतूला के होठों के बीच लगाकर उसपर लिपस्टिक के दाग कायम किये, उसके बाद दोनों सिगरेट उसने खुद पिये और अधजले टुकड़े फेंककर वहां से चलता बना। जरूर उस वक्त वो हाथों में दस्ताने पहने था जिसकी वजह से घटनास्थल पर कहीं भी उसके फिंगरप्रिंट बरामद नहीं हुए।‘‘
‘‘वहां से डॉक्टर सीधा कालकाजी पहुंचा। तब या तो गायकवाड़ साहब के फ्लैट का दरवाजा इत्तेफाकन खुला था या फिर उसने बेल बजाकर दरवाजा खुलवाया और जबरन भीतर दाखिल हो गया। वहां भी उसने मकतूला को पहले कोई नपा-तुला वार करके बेहोश कर दिया फिर किसी दरिंदे की तरह उसे नोंचना-खसोटना शुरू कर दिया। उस काम से फारिग होकर उसने वहां भी चौहान की वर्दी को मकतूला के खून से रंगा और बाहर निकलकर चौहान के फ्लैट में दाखिल हो गया। जहां चौहान के कपड़े उतारकर उसे खून से रंगी वर्दी पहनाई और इमारत से बाहर निकलकर कहीं छिपकर खड़ा हो गया।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘अब उसे इंतजार था गायकवाड़ साहब के वहां पहुंचने का जिनके बारे में वो निश्चिंत था कि छह बजे से पहले ये वहां नहीं पहुंचने वाले। आखिरकार ये पूर्व निर्धारित वक्त पर वहां पहुंचे तो वो मोटरसाइकिल पर सवार होकर एक पीसीओ पर पहुंचा, जहां से उसने इन्हें फोन किया और इनके मुंह से घटना की बाबत जाना। फिर डॉक्टर ने सलाह दी कि इन्हें फौरन घटनास्थल से कूच कर जाना चाहिए वो भी बिना किसी सामान के ताकि वहां से निकलते वक्त किसी की निगाह इनपर ना पड़े जो कि सूटकेस के साथ खिसकने में पड़कर रहनी थी। इन्होंने बगैर आगा-पीछा सोचे उसकी सलाह पर अमल किया और जाकर एक होटल में बुक हो गये। आगे पुलिस ने जब इनको दुबई के इनके ऑफिस में फोन किया तो ऑपरेटर ने इनके निर्देशानुसार वो कॉल इनके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी जिसपर बात करते वक्त इन्होंने यही जाहिर किया कि ये तब दुबई में थे।‘‘
‘‘अंकुर रोहिल्ला के कत्ल की नौबत क्योंकर आई?‘‘
‘‘बताया तो था, उसने डॉक्टर को मंदिरा के फ्लैट में दाखिल होते देख लिया था, लिहाजा बाद में वो पुलिस को डॉक्टर के बारे में बता सकता था। भले ही वो डॉक्टर को बाई नेम नहीं पहचानता था मगर उसका हुलिया तो बयान कर ही सकता था। बाद में जब पुलिस कत्ल से संबंधित लोगों से उसका आमना-सामना कराती तो उसने डॉक्टर को झट से पहचान लेना था।‘‘
‘‘अगर ऐसा था तो डॉक्टर ने फौरन उसका कोई इंतजाम क्यों नहीं कर दिया। उसका कत्ल तो दो दिन बाद हुआ था, इतने वफ्ते में तो वो सौ बार पुलिस को कातिल के बारे में बता सकता था।‘‘
‘‘इस बारे में मेरा अपना अंदाजा ये है कि डॉक्टर को अंकुर रोहिल्ला तक पहुंच बनाने में इतना वक्त लग गया। डॉक्टर के घर की तलाशी लेने पर मुझे वहां से एक बंगले का नक्शा मिला था, जो मेरा दावा है कि अंकुर रोहिल्ला के बंगले का था। लिहाजा वो नक्शा उसने एमसीडी के दफ्तर से या किसी और सोर्स के जरिये हांसिल किया हो सकता है। उस काम में भी उसे वक्त लगा होगा। फिर डॉक्टर के लिए फौरन उसका कत्ल कर देना भी जरूरी नहीं था क्योंकि वो जानता था कि अंकुर रोहिल्ला को नहीं पता था कि वो कौन था। लिहाजा उसके बताये हुलिए के आधार पर अगर पुलिस किसी को गिरफ्तार करती तो वो गायकवाड़ साहब थे, क्योंकि उस वक्त वो एक ऐसी बिग लगाये हुए था जिसके बाल तांबें की रंगत के थे जो कि इस केस से संबंधित लोगों में इनके अलावा किसी के नहीं हैं, ऊपर से कद-काठ के लिहाज से भी ये डॉक्टर के बराबर ही दिखाई देते हैं।‘‘
‘‘फिर भी, अंकुर क्यों अपनी जुबान बंद किये था।‘‘
‘‘इसकी दो वजह हो सकती है, पहली ये कि उसे एहसास तक नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने मंदिरा के फ्लैट में घुसते देखा था वो मंदिरा का हत्यारा हो सकता था। दूसरी वजह ये थी कि वो किसी भी हाल में खुद का नाम मंदिरा के साथ जुड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता था। जरा उसकी स्थिति पर गौर करो, वो ना सिर्फ मंदिरा का रजिस्टर्ड पति था बल्कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का बाप भी था और दूसरी तरफ वो एक करोड़पति बिजनेस मैन की बेटी से शादी का ख्वाब देख रहा था। ऐसे में अगर वो पुलिस की नजरों में आ जाता तो पुलिस उसका आगा-पीछा टटोले बिना नहीं रहती और तब उन्हें ये पता लग जाना कि अंकुर रोहिल्ला मंदिरा का कानूनी पति था, महज वक्त की बात होती। ऐसे में उसकी शादी तो खटाई में पड़ जानी थी। लिहाजा उस बाबत उसने चुप्पी अख्तियार करने में ही भलाई समझी। ऊपर से मंदिरा उसके रास्ते का वो कांटा थी जो भविष्य में उसे बहुत डैमेज कर सकती थी, वो अपनी शादी का हवाला देकर उसे ब्लैकमेल तक कर सकती थी। ऐसे में मंदिरा का चैप्टर क्लोज हो जाना तो उसके लिए किसी खुदाई मदद की तरह था। फिर वो क्यों अपनी हालत आ बैल मुझे मार वाली बनाता! लिहाजा उसने अपनी जुबान बंद रखी।‘‘
‘‘वो बिना सिक्योरिटी गार्ड की निगाहों में आये, अंकुर रोहिल्ला के बंगले में घुसने में कैसे कामयाब हो गया।‘‘
‘‘सॉरी, इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।‘‘