S
StoryPublisher
Guest
“ठीक है।”–जुगल फुर्ती से उठा और फिर कुर्सी पर ऐसे बैठ गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। प्रीति की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समय इतनी ऐक्टिंग की ज़रूरत क्या है।
“नौकर अंकल खिलाओ।”–जुगल किशोर से बोला।
“जी भैया जी।” और कहता भी क्या किशोर।
“नौकर अंकल हम आज रात को खाना नहीं खाएँगे।”–जुगल बोला।
“क्यों भैया जी ?”–किशोर ने पूछा।
“आज कुछ गड़बड़ लग रही है पेट में। ढुम ढुम की आवाज़ आ रही है। अब जब तक आवाज़ आएगी हम नहीं खाएँगे।”–जुगल, किशोर की आँख में झाँकता हुआ बोला।
किशोर की आँखें पल भर को सिकुड़ी फिर सामान्य हो गईं।
“बता देना नौकर अंकल नम्बर दो को कि कल लंच में मुर्गा बनाए। हम तंदूरी मुर्गा अब कल खायेंगे।”
“मुर्गा कल खा लेना। पर अभी तो ये खा लो।”–किशोर उसकी तरफ़ प्लेट सरकाता हुआ बोला।
“ये सब नहीं चाहिए। हमारे लिए आइसक्रीम लाओ।”
“लाता हूँ भैया जी।”–किशोर मन ही मन उसे गालियाँ बकता फ्रिज की तरफ़ बढ़ गया।
*********************
राज और डॉली फार्म हाउस के ड्राइंग रूम में बैठे थे। आरिफ ऊपर उस कमरे में बैठा था जहाँ उसकी साइबर टीम अपने काम में लगी थी। रणविजय और उसके अधिकतर लोगों के फोन कॉल, नेटबैंकिंग और इंटरनेट एक्टिविटी पर पैनी नज़र रखी जा रही थी।
“यार सर बोरियत होने लगी अब तो। कब बोलेंगे धावा उस पर ?”–डॉली उकताये स्वर में बोली।
“धावे का तो अपने भैया से पूछो। मेरे पास तो बोरियत का इलाज है।”–राज अर्थपूर्ण स्वर में बोला।
“तुम कहो ना भैया से। हम दोनों को वहाँ जाने दें।”–डॉली ने उसकी बात पे कोई ध्यान नहीं दिया।
“कहा तो था। जवाब मिला था कि पहले अंदर की ख़बर आने दो तब जाना।”
“कर्नल साहब भी दिल्ली चले गए। वह होते तो उनसे कुछ क़िस्से सुनते। कुछ टाइम ही पास होता।”
“टाइम तो हम भी बढ़िया पास करा सकते हैं। पर हमारी किसी को कद्र ही नहीं है।”–राज नाटकीय स्वर में बोला।
“सर जी मैं पिछली बार ही समझ गई थी आपका तुच्छ इशारा।”
“पर कोई जवाब तो नहीं दिया था।”
“सर जी आपका नाम राज है, तो इसका मतलब ये तो नहीं कि चिड़िया की आँख के अतिरिक्त और कुछ देखो ही नहीं।”
“चिड़िया की आँख। भई वाह क्या उदाहरण दिया है।”– राज ज़ोर से हँसा।
“बकवास मत करो सर।”–डॉली के गाल लाल हो गए।
“डॉली जी ये जो सर कहा जाता है ना, वह सम्मान देने के लिए होता है। मुझे लगता है तुम्हारे लिए सर बंशी, रामू या गिरधारी की तरह एक नाम है बस।”
“मतलब ?”
“मतलब या तो पूरे वाक्य में सम्मान दो, या फिर सर कहना भी छोड़ो। ये यार सर, मिस्टर सर, बकवास मत कर सर, बेटा सर ये सब क्या है ?”
“ये बेटा सर कब कहा मैंने ?”–उसने राज को घूरा।
“चलो ये ना भी कहा हो, पर बाकी सब तो कहा है।”
“वह तो वैसे ही किसी बात पर मेरे मुँह से निकल गया होगा।”–डॉली लापरवाही से बोली।
“चलो छोड़ो ये सब बातें। चलो फार्म हाउस घूम कर आते हैं।”
“तीरंदाज़ी दिखाने के बहुत मौके आएँगे सर जी, शांत बैठे रहो।”
“उस्ताद हो, सब समझती हो।”–राज उसे तिरछी निगाहों से देखता हुआ बोला।
“इसमें समझना क्या है ? सब के सब मर्द खुद को राज ही समझते हैं…धनुर्धारी।” अभी राज कोई जवाब देता कि आहना और आरिफ अंदर दाखिल हुए।
“आज हमें रुकना होगा। अंदर से खबर है कि ऑपरेशन आज की जगह कल किया जाए।”–आरिफ गंभीर स्वर में बोला।
“क्या हुआ भाई ?”–डॉली उत्सुक भाव से बोली।
“शायद मुर्गे को जुगल पर शक हो गया है। जुगल ने ही इशारा किया है कि आज कुछ ना किया जाए।”
“लेकिन सर हमें जिस तरीके से ऑपरेशन करना है, उससे क्या फर्क पड़ता है मुर्गे को शक होने, न होने से ? हमें तो बस उसे दबोच कर हॉस्पिटल में भर्ती कर देना है। उसके बाद उसकी किसी से बात होगी ही नहीं।”–आहना बोली।
“हमें केवल वही पता है, जो हमें करना है। मुर्गे ने क्या क्या इंतज़ाम कर रखे हैं, वो नहीं मालूम न। हम किसी भी कीमत पर मुठभेड़ नहीं कर सकते और ना ही खुलेआम सामने आ सकते हैं। चाहे ऑपरेशन हो या ना हो।”–आरिफ विवशता भरे स्वर में बोला।
“कोई नहीं सर। अमित सर हैं ना अंदर। वह कोई ना कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेंगे।”–आहना विश्वास भरे स्वर में बोली।
“हमारे पास समय नहीं है आहना । मुझे खबर मिली है कि हमें कभी भी दिल्ली से ऑपरेशन छोड़ कर वापसी का फरमान सुनाया जा सकता है। सरकार इस समय कोई भी बखेड़ा नहीं चाहती है।”
“एक बात और है सर, आई०बी० को ख़बर मिली है कि मुर्गा किसी भी वक्त अपनी पार्टी छोड़कर ‘डैमोक्रेटिक फ्रंट’ में शामिल हो सकता है। उसने राकेश कटियार के ज़रिए एप्रोच लगाई है।”
“नौकर अंकल खिलाओ।”–जुगल किशोर से बोला।
“जी भैया जी।” और कहता भी क्या किशोर।
“नौकर अंकल हम आज रात को खाना नहीं खाएँगे।”–जुगल बोला।
“क्यों भैया जी ?”–किशोर ने पूछा।
“आज कुछ गड़बड़ लग रही है पेट में। ढुम ढुम की आवाज़ आ रही है। अब जब तक आवाज़ आएगी हम नहीं खाएँगे।”–जुगल, किशोर की आँख में झाँकता हुआ बोला।
किशोर की आँखें पल भर को सिकुड़ी फिर सामान्य हो गईं।
“बता देना नौकर अंकल नम्बर दो को कि कल लंच में मुर्गा बनाए। हम तंदूरी मुर्गा अब कल खायेंगे।”
“मुर्गा कल खा लेना। पर अभी तो ये खा लो।”–किशोर उसकी तरफ़ प्लेट सरकाता हुआ बोला।
“ये सब नहीं चाहिए। हमारे लिए आइसक्रीम लाओ।”
“लाता हूँ भैया जी।”–किशोर मन ही मन उसे गालियाँ बकता फ्रिज की तरफ़ बढ़ गया।
*********************
राज और डॉली फार्म हाउस के ड्राइंग रूम में बैठे थे। आरिफ ऊपर उस कमरे में बैठा था जहाँ उसकी साइबर टीम अपने काम में लगी थी। रणविजय और उसके अधिकतर लोगों के फोन कॉल, नेटबैंकिंग और इंटरनेट एक्टिविटी पर पैनी नज़र रखी जा रही थी।
“यार सर बोरियत होने लगी अब तो। कब बोलेंगे धावा उस पर ?”–डॉली उकताये स्वर में बोली।
“धावे का तो अपने भैया से पूछो। मेरे पास तो बोरियत का इलाज है।”–राज अर्थपूर्ण स्वर में बोला।
“तुम कहो ना भैया से। हम दोनों को वहाँ जाने दें।”–डॉली ने उसकी बात पे कोई ध्यान नहीं दिया।
“कहा तो था। जवाब मिला था कि पहले अंदर की ख़बर आने दो तब जाना।”
“कर्नल साहब भी दिल्ली चले गए। वह होते तो उनसे कुछ क़िस्से सुनते। कुछ टाइम ही पास होता।”
“टाइम तो हम भी बढ़िया पास करा सकते हैं। पर हमारी किसी को कद्र ही नहीं है।”–राज नाटकीय स्वर में बोला।
“सर जी मैं पिछली बार ही समझ गई थी आपका तुच्छ इशारा।”
“पर कोई जवाब तो नहीं दिया था।”
“सर जी आपका नाम राज है, तो इसका मतलब ये तो नहीं कि चिड़िया की आँख के अतिरिक्त और कुछ देखो ही नहीं।”
“चिड़िया की आँख। भई वाह क्या उदाहरण दिया है।”– राज ज़ोर से हँसा।
“बकवास मत करो सर।”–डॉली के गाल लाल हो गए।
“डॉली जी ये जो सर कहा जाता है ना, वह सम्मान देने के लिए होता है। मुझे लगता है तुम्हारे लिए सर बंशी, रामू या गिरधारी की तरह एक नाम है बस।”
“मतलब ?”
“मतलब या तो पूरे वाक्य में सम्मान दो, या फिर सर कहना भी छोड़ो। ये यार सर, मिस्टर सर, बकवास मत कर सर, बेटा सर ये सब क्या है ?”
“ये बेटा सर कब कहा मैंने ?”–उसने राज को घूरा।
“चलो ये ना भी कहा हो, पर बाकी सब तो कहा है।”
“वह तो वैसे ही किसी बात पर मेरे मुँह से निकल गया होगा।”–डॉली लापरवाही से बोली।
“चलो छोड़ो ये सब बातें। चलो फार्म हाउस घूम कर आते हैं।”
“तीरंदाज़ी दिखाने के बहुत मौके आएँगे सर जी, शांत बैठे रहो।”
“उस्ताद हो, सब समझती हो।”–राज उसे तिरछी निगाहों से देखता हुआ बोला।
“इसमें समझना क्या है ? सब के सब मर्द खुद को राज ही समझते हैं…धनुर्धारी।” अभी राज कोई जवाब देता कि आहना और आरिफ अंदर दाखिल हुए।
“आज हमें रुकना होगा। अंदर से खबर है कि ऑपरेशन आज की जगह कल किया जाए।”–आरिफ गंभीर स्वर में बोला।
“क्या हुआ भाई ?”–डॉली उत्सुक भाव से बोली।
“शायद मुर्गे को जुगल पर शक हो गया है। जुगल ने ही इशारा किया है कि आज कुछ ना किया जाए।”
“लेकिन सर हमें जिस तरीके से ऑपरेशन करना है, उससे क्या फर्क पड़ता है मुर्गे को शक होने, न होने से ? हमें तो बस उसे दबोच कर हॉस्पिटल में भर्ती कर देना है। उसके बाद उसकी किसी से बात होगी ही नहीं।”–आहना बोली।
“हमें केवल वही पता है, जो हमें करना है। मुर्गे ने क्या क्या इंतज़ाम कर रखे हैं, वो नहीं मालूम न। हम किसी भी कीमत पर मुठभेड़ नहीं कर सकते और ना ही खुलेआम सामने आ सकते हैं। चाहे ऑपरेशन हो या ना हो।”–आरिफ विवशता भरे स्वर में बोला।
“कोई नहीं सर। अमित सर हैं ना अंदर। वह कोई ना कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेंगे।”–आहना विश्वास भरे स्वर में बोली।
“हमारे पास समय नहीं है आहना । मुझे खबर मिली है कि हमें कभी भी दिल्ली से ऑपरेशन छोड़ कर वापसी का फरमान सुनाया जा सकता है। सरकार इस समय कोई भी बखेड़ा नहीं चाहती है।”
“एक बात और है सर, आई०बी० को ख़बर मिली है कि मुर्गा किसी भी वक्त अपनी पार्टी छोड़कर ‘डैमोक्रेटिक फ्रंट’ में शामिल हो सकता है। उसने राकेश कटियार के ज़रिए एप्रोच लगाई है।”