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Thriller नाइट क्लब

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डॉक्टर अय्यर के चेहरे पर उदासी के भाव छाये हुए थे।

उस वक्त वह पैंथ हाउस के ड्रांइग होल में बैठा था। मैं और तिलक उसके सामने बैठे थे।

“मालूम नहीं- मुरुगन (मद्रासियों के अराध्य देव) की क्या इच्छा है?” वह बड़े अफसोसनाक लहजे में बोला—”क्या चाहता है मुरुगन?”

“क्यों?” तिलक सस्पैंसफुल लहजे में बोला—”क्या हो गया?”

“ऐन्ना- एक बड़ी दुःखद खबर मैंने आप लोगों को सुनानी है।”

“क्या?”

डॉक्टर अय्यर ने अपना चश्मा उतारकर उसका ग्लास रुमाल से साफ किया और फिर उसे वापस आंखों पर चढ़ाया।

“बृन्दा की ब्लड रिपोर्ट आज आ गयी है।”

“ब्लड रिपोर्ट आ गयी है।” तिलक राजकोटिया चैंका—”और आपने अभी तक रिपोर्ट के बारे में कुछ बताया नहीं।”

“दरअसल रिपोर्ट कुछ उत्साहजनक नहीं है राजकोटिया साहब! बल्कि...।”

“बल्कि क्या?”

“बल्कि उस रिपोर्ट ने पिछली वाली रिपोर्ट की ही पुष्टि की है।”

“आपने जो कहना है, साफ—साफ कहिये। खुलकर कहिये।”

“तीन महीने!” डॉक्टर अयर बोला—”बृन्दा की जिन्दगी के ज्यादा—से—ज्यादा तीन महीने बाकि है। अब वो तीन महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह सकती।”

तिलक राजकोटिया कुर्सी पर बिल्कुल इस तरह पसर गया- मानो किसी ने उसके शरीर की सारी शक्ति खींच ली हो।

वह एकाएक वर्षों का बीमार नजर आने लगा।

जबकि मेरे दिल—दिमाग में तो विस्फोट होते चले गये थे।

“हू कैन फाइट अगेंस्ट फेट राजकोटिया साहब!” डॉक्टर अय्यर बोला—”मुरुगन पर विश्वास रखिये। हो सकता है- मुरुगन उनकी जिन्दगी का कोई और जरिया निकाल दे। कोई और ऐसा रास्ता पैदा कर दे, जो वह बच जायें।”

तिलक राजकोटिया कुछ न बोला।

“अब आप मुझे इजाजत दें।” डॉक्टर अय्यर बोला—”अभी मैंने हॉस्पिटल में एक पेंशेन्ट को भी देखते हुए जाना है।”

डॉक्टर अय्यर चला गया।

उसके जाने के काफी देर बाद तक भी तिलक राजकोटिया उसी कुर्सी पर पत्थर के बुत की तरह बैठा रहा।

फिर उसने दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढांप लिया ओर सुबक उठा।

“धीरज रखिये!” मैं तिलक राजकोटिया के नजदीक पहुंची।

“मैंने बृन्दा से बहुत प्यार किया था शिनाया!” तिलक राजकोटिया तड़पते हुए बोला—”बहुत प्यार किया था।”

“मैं आपकी व्यथा समझ सकती हूं।”

“सच तो ये है, मैं उस दिन के बारे में सोच—सोचकर कांप जाता हूं, जिस दिन बृन्दा की मौत होगी। जिस दिन वो मुझे छोड़कर जायेगी।”

मेरी आंखों के सामने भी अंधेरा—सा घिरने लगा।

•••
 
तीन महीने!

बृन्दा सिर्फ तीन महीने की मेहमान है।

यकीन मानिये- उस बात ने मेरे दिलो—दिमाग में अजीब—सी हलचल पैदा करके रख दी थी।

मैं समझ नहीं पा रही थी- उस खबर की मेरे ऊपर क्या प्रतिक्रया होनी चाहिये। जिस उद्देश्य को लेकर मैं वहां आयी थी, उस उद्देश्य के ऐतबार से वह मेरे लिये एक निहायत ही खुशी से भरी खबर थी, क्योंकि मेरे रास्ते का कांटा इतनी जल्दी खुद—ब—खुद साफ होने जा रहा था।

परन्तु क्या सचमुच बृन्दा मेरे रास्ते का कांटा थी?

मैं उस बारे में जितना सोच रही थी—उतना ही खुद को दुविधा में घिरा पा रही थी। इस बात ने भी मुझे काफी डराया कि बृन्दा की उस मौजूदा बीमारी की जिम्मेदारी भी कामोबेश उसकी कॉलगर्ल वाली जिन्दगी ही थी।

उस दिन सोने से पहले जब मैं बृन्दा को दवाई पिलाने उसके शयनकक्ष में पहुंची, तो मैंने उसके चेहरे पर बड़ी आध्यात्मिक—सी शांति देखी।

उसका चेहरा सुता हुआ था।

ऐसा लग रहा था- मानो उसे अपनी मौत की जानकारी थी।

“दवाई खा लो।” मैं जग में-से एक गिलास में पानी पलटते हुए बोली।

“तुमने तो काफी जल्दी अपना चार्ज सम्भाल लिया।” बृन्दा बहुत धीरे से मुस्कुराई।

फिर वो बहुत थके—थके अन्दाज में उठकर बैठी।

“शायद अभी तुम्हें भी यह बात समझाने की जरूरत है डार्लिंग!” मैंने उसके गाल पर चंचल अन्दाज में चिकोटी काटी—”कि मैं सिर्फ तुम्हारी केअरटेकर ही नहीं बल्कि तुम्हारी सहेली भी हूं।”

वो हंसी।

तभी एकाएक मेरी दृष्टि बृन्दा के वक्षस्थलों पर जाकर ठहर गयी।

उसने काफी मोटा गाउन पहना हुआ था।

लेकिन उस गाउन में भी उसके तने हुए वक्ष अलग से नुमाया हो रहे थे। खासतौर पर उसके रबड़ जैसे कठोर निप्पलों का दबाव तो गाउन के मोटे कपड़े पर इस तरह पड़ रहा था, जैसे वो अभी गाउन को फाड़कर बाहर निकलने को आतुर हों।

“क्या देख रही हो?” बृन्दा चंचल भाव से बोली।

“देख रही हूं- बीमारी का तुम्हारी सेहत पर जरूर फर्क पड़ा है, लेकिन इन रसभरे प्यालों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।”

बृन्दा खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“कम—से—कम यही एक चीज तो मेरे पास ऐसी थी।” बृन्दा ठण्डी सांस लेकर बोली—”जिससे मैं तुम्हें मात देती थी।”

“इसमें कोई शक नहीं। तुम्हारा मुझसे दो नम्बर साइज बड़ा था न?”

“हां। मेरा अड़तीस—तुम्हारा छत्तीस!”

“माई ग़ॉड!” मैंने हैरानीपूर्वक अपने मुंह पर हाथ रखा—”तुम्हें तो मेरा साइज आज भी याद है।”

“आखिर मैं इस एक बात को कैसे भूल सकती थी?”

“जरूर तिलक राजकोटिया तुम्हारे इन वक्षस्थलों को देखकर ही तुम्हारा मुरीद बना होगा।”

बृन्दा के गालों पर लाज की लालिमा दौड़ गयी।

पिछले एक वर्ष में बृन्दा के अन्दर जो परिवर्तन हुए थे, यह उनमें से एक परिवर्तन था। वह अब शर्माने भी लगी थी।

“क्यों!” मैंने उसके कोहनी मारी—”मैंने कुछ गलत कहा?”

“नहीं। यह सच बात है। सबसे पहले इन्होंने मेरे इन प्यालों की ही तारीफ की थी।”

“और उसके बाद किस चीज की तारीफ की?”

“पीछे हट!” वह और लजा गयी—”फिर शरारत करने लगी।”

“क्यों?” मैंने बृन्दा की आंखों में झांका—”क्या मैंने कोई गलत सवाल पूछ लिया?”

“बेकार की बात मत कर!” उसने अपने होंठ चुभलाये—”तू अब बहुत शैतान हो गयी है।”

“इसमें शैतान होने की क्या बात है?”

“अच्छा अब रहने दे।”

“बतायेगी नहीं?” मैंने पुनः उसके कोहनी मारी।

“सच बताऊं?”

“हां।”

“इन्हें ‘उसकी’ तारीफ करने का तो मौका ही नहीं मिला।” बृन्दा ने मेरी आंखों में झांका—”उसे देखने के बाद तो यह मेरे ऊपर इस तरह टूटकर गिरे, जैसे आंधी में कोई सूखा पत्ता टूटकर गिरता है।”

मेरी हंसी छूट गयी।

बृन्दा ने वह बात कही ही कुछ ऐसे अन्दाज में थी।

आंधी में सूखा पत्ता!

अच्छी मिसाल थी।

बृन्दा भी खिलखिलाकर हंस रही थी।

उस क्षण उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह लड़की इतनी जल्दी मरने वाली है।

या फिर उसे कोई गम्भीर बीमारी भी है।

“एक बात कहूं?” मैं हसरत भरी निगाहों से बृन्दा की हंसी को देखते हुए बोली।

“क्या?”

“तू सचमुच बहुत किस्मत वाली है।” मैंने बृंदा को अपने बाहुपोश में समेट लिया—”जो तुझे तिलक राजकोटिया जैसा हसबैण्ड मिला।”

“हां।” उसने गहरी सांस छोड़ी—”किस्मत वाली तो मैं हूं- बहुत किस्मत वाली।”

लेकिन उस क्षण मुझे अहसास हुआ कि मेरी जबान से कोई गलत शब्द निकल गया था। जिस लड़की का देहावसान मात्र ३ महीने बाद होने वाला हो, वह किस्मत वाली कैसे हो सकती थी?

मैंने बृन्दा को दवाई पिलाई और फिर रात के उस सन्नाटे में चुपचाप बाहर निकल आयी।

रात बड़ी खामोशी के साथ गुजरी।

अलबत्ता अगले दिन मेरे साथ पैंथ हाउस में एक ऐसा हंगामाखेज वाक्या घटा, जिसने मेरे विचारो को एक नई दिशा दे दी।

•••
 
सुबह का समय था।

मैं तिलक राजकोटिया के शयनकक्ष की सफाई कर रही थी।

तभी अकस्मात् मेरी निगाह एक फोटो एलबम पर पड़ी। मैंने एलबम खोलकर देखी। उसमें तिलक राजकोटिया और बृन्दा की शादी के फोटोग्राफ्स थे।

मैं बड़ी दिलचस्प निगाहों से उस एलबम को देखने लगी। बृन्दा सचमुच शादी के जोड़े में काफी सुन्दर नजर आ रही थी। शादी के फोटोग्राफ्स के अलावा उस एलबम में तिलक राजकोटिया के कुछ पर्सनल फोटो भी थे। अलग—अलग पार्टियों के फोटोग्राफ्स! जिनमें से कुछेक में उसका बर्थडे सेलीब्रेट किया गया था। वह बड़े—बड़े समारोह के फोटो थे।

जिनमें वह फिल्मी हस्तियों के साथ खड़ा था।

बड़े—बड़े क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ।

और मुम्बई शहर की गणमान्य हस्तियों के साथ।

इसके अलावा कुछेक फोटो उसके लड़कियों के साथ भी थे।

तिलक राजकोटिया के लड़कियों के साथ फोटोग्राफ्स देखकर मेरे अन्तर्मन में द्वन्द-सा छिड़ गया। मैं उन दिनों की कल्पना करने लगी, जब बृन्दा का देहावसान हो जायेगा। जब तिलक की जिन्दगी में कोई लड़की नहीं होगी। तब क्या ऐसा हो सकता था कि उस जैसा रिचिरीच आदमी अपनी सारी उम्र यूँ ही बृन्दा की याद में गुजार दे।

इम्पॉसिबल- मतलब ही नहीं था।

मैं समझती हूं कि ऐसा सोचना भी मेरा पागलपन था।

आखिर क्या खूबी नहीं थी तिलक राजकोटिया में। हैण्डसम था। स्मार्ट था। सोसायटी में रुतबे वाला था। पैसे वाला था।

सभी कुछ तो था तिलक राजकोटिया के पास।

ऐेसे लड़कों के पीछे तो लड़कियां मक्खियों की तरह भिनभिनाती हुई घूमती हैं।

बृन्दा के आंख मूंदने की देर थी, फौरन लड़कियों की एक लम्बी कतार तिलक राजकोटिया के सामने लग जानी थी।

फिर मैं अपने बारे में सोचने लगी।

और क्या मिलना था मुझे?

तिलक राजकोटिया ने तो अंत—पंत दूसरी शादी कर ही कर लेनी थी, जबकि मैंने वापस ‘नाइट क्लब’ में पहुंच जाना था, फिर रात—रात बिकने के लिये।

या फिर किसी खतरनाक बीमारी का शिकार होकर तड़प—तड़पकर मर जाने के लिये।

“नहीं! नहीं!!” मेरे शरीर में सिहरन दौड़ी—”मैं ‘नाइट क्लब’ में वापस नहीं जाऊंगी।”

अगर तिलक राजकोटिया की जिन्दगी में दूसरी लड़की आनी ही थी, तो वह लड़की मैं ही क्यों नहीं हो सकती थी?

मेरे में ही क्या बुराई थी?

मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि मैं जिस उद्देश्य को लेकर वहां आयी थी, उस उद्देश्य को पूरा करके रहूंगी।

तिलक राजकोटिया को अपने प्रेमजाल में फांसकर रहूंगी।

वह निःसंदेह मेरा एक महत्वपूर्ण फैसला था।

महत्वपूर्ण भी और हौंसले से भरा भी।

अलबत्ता उस एक फैसले ने मेरी जिन्दगी में आगे चलकर बड़ा हड़कम्प मचाया।

•••
 
रात के समय मैंने तिलक राजकोटिया को नशे में बुरी तरह धुत्त होकर पैंथ हाउस में आते देखा।

गार्ड उसे पकड़कर ला रहा था। अपने शयनकक्ष में पहुंचते ही तिलक राजकोटिया बार काउण्टर वाली सीट पर ढेर हो गया तथा वहां बैठकर और शराब पीने लगा।

बृन्दा की मौत वाली खबर ने उसे झिंझोड़ा हुआ था।

वह सदमें में था।

कुछ देर मैं ग्लास विण्डो पर उसकी परछाई को देखती रही।

फिर मैं दबे पांव उसके शयनकक्ष में दाखिल हुई।

उसकी पीठ मेरी तरफ थी।

“तिलक साहब!”

तिलक राजकोटिया ने आहिस्ता से चौंककर गर्दन घुमाई और मेरी तरफ देखा।

“यह आपको क्या हो गया है?”

उसकी आंखे कबूतर की भांति लाल—लाल हो रही थीं।

“क्यों आप इस तरह खुद को बर्बाद करने पर तुले हैं?”

“बर्बाद- हुंह!” तिलक राजकोटिया धीरे से हंसा और फिर वो व्हिस्की का पूरा गिलास एक ही सांस में खाली कर गया—”अब इस जिन्दगी में बर्बादी के सिवा बचा भी क्या है शिनाया! हर तरफ अंधेरा—ही—अंधेरा है।”

“मैं जानती हूं तिलक साहब- जिन्दगी ने आपके साथ बड़ा भारी मजाक किया है।” मैं धीरे—धीरे चलती हुई तिलक राजकोटिया के नजदीक पहुंची—”लेकिन जिन्दगी यहीं खत्म तो नहीं हो जाती। इन्सान के साथ जिंदगी में बड़े—बड़े हादसे पेश आते हैं—मगर जिन्दगी फिर भी चलती रहती है।”

“शायद तुम ठीक कह रही हो। जिन्दगी चलती रहती है।”

तिलक राजकोटिया की जबान लड़खड़ाई।

उसने पारदर्शी कांच के काउण्टर पर रखी पीटर स्कॉच व्हिस्की की बोतल उठाई तथा फिर ढेर सारी व्हिस्की अपने गिलास में पलटनी चाही।

“यह आप क्या कर रहे हैं?” मैंने फौरन व्हिस्की की बोतल पकड़ी।

“मुझे पीने दो।”

“लेकिन आप पहले ही काफी नशे में है तिलक साहब!”

“मैं और ज्यादा नशे में होना चाहता हूं। मैं भूल जाना चाहता हूं कि मैं कौन हूं?”

“आप बहक रहे हैं।”

“हां-हां, मैं बहक रहा हूं।” तिलक राजकोटिया चीखता हुआ कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया—”लेकिन तुम कौन होती हो मुझे रोकने वाली? किस अधिकार के साथ रोक रही हो मुझे?”

“तिलक साहब!” मेरे मुंह से सिसकारी छुट गयी।

जबकि तिलक राजकोटिया की रुलाई छूट पड़ी थी।

उसने अपना सिर मेरे कन्धे पर रख लिया और सुबक उठा।

मैंने अनुभव किया—उसका जिस्म तप रहा था।

मैं गारण्टी के साथ कह सकती थी कि वो औरत का पिछले कई दिन से भूखा था। आखिर यही एक फील्ड तो ऐसा था—जिसमें मुझे महारथ हासिल थी।

“मुझे लगता है- मैं पागल हो जाऊंगा।” उसका जिस्म हौले—हौले कांप रहा था—”मैं पागल हो जाऊंगा।”

“आप धैर्य रखें। कुछ नहीं होगा आपको।”

उस क्षण मेरी हालत भी बुरी थी।

मेरा दिल हथौड़े की तरह मेरी पसलियों से टकरा था।

हांलिक मुझे भी पिछले कई दिन से पुरुष का संसर्ग हासिल नहीं हुआ था। लेकिन मैं जब्त किये हुए थे। खुद को रोके हुए थी। बचपन से ही मुझे सिखाया गया था कि कभी पुरुष के सामने आसानी से समर्पण नहीं करना चाहिये।

औरत की जीत तभी है, जब पुरुष उसके सामने बिस्तर पर घुटनों के बल झुककर उसका हाथ मांगे।

उसी क्षण नशे में या न जाने कैसे उसका हाथ मेरे वक्ष को छू गया।

मेरे तन—बदन में आग लग गयी।

“बृन्दा!” उसके हाथ मेरी गोलाइयों को जुगराफिया नापने लगे—”बृन्दा!”

वह शायद नशे में मुझे बृन्दा समझ रहा था।

उसने कसकर मुझे अपने आलिंगन में समेट लिया।

एक क्षण के लिये तो मुझे लगा—मानो मेरे संयम का बांध छूट जायेगा।

लेकिन मेरे संयम का बांध टूटता, उसके पहले ही उसका शरीर मेरे ऊपर लुढ़क गया।

“तिलक साहब!” मैंने उसे झंझोड़ा।

उसका शरीर सिर्फ हिलकर रह गया।

उसके खर्राटे गूंजने लगे।

मैंने आहिस्ता से उसे बिस्तर पर लिटा दिया।

मैंने उसकी तरफ देखा।

वो गहरी नींद में भी साक्षात् कामदेव का अवतार नजर आ रहा था। आज तक सैंकड़ों पुरुषों के साथ मैं मौज—मस्ती कर चुकी थी, मगर उनमें तिलक राजकोटिया जैसा कोई न था। उसे देखते—देखते मुझे उसके ऊपर प्यार आने लगा। वह एक अजीब—सा अहसास था, जो मुझे पहली बार हो रहा था।

मैंने उसके शूज उतारे।

सॉक्स उतारे।

टाई की नॉट ढीली की।

फिर मैं एअरकण्डीशन चालू करके खामोशी के साथ उसके शयनकक्ष से बाहर निकल आयी।

परन्तु तिलक राजकोटिया की तस्वीर फिर आसानी से मेरे मानस—पटल के ऊपर से न धुली।

•••
 
पैंथ हाउस का डायनिंग हॉल काफी खूबसूरती के साथ डेकोरेट किया गया था। यूं तो पैंथ हाउस की हर चीज भव्य थी। परन्तु ऐसा लगता था, डायनिंग हॉल की साज—सज्जा के ऊपर कुछ ज्यादा ही ध्यान दिया गया था।

तिलक राजकोटिया की नजरें झुकी हुई थीं।

सुबह का समय था। वो डायनिंग हॉल में बैठा था और मैं उसके सामने नाश्ता लगा रही थी।

“मैं कुछ कहना चाहता हूं।” वो धीमें स्वर में बोला।

रात जो कुछ हुआ था, उसके कारण उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो मेरे सामने नजर उठाये।

“क्या?”

“रात नशे में अगर मुझसे कोई गुस्ताखी हो गयी हो,” वह नजरें झुकाये—झुकाये बोला—”तो मैं उसके लिये माफी चाहता हूं।”

मैं धीरे से मुस्कुरा दी।

वह सचमुच सज्जन आदमी था। भला।

“मैं अपनी हरकत के लिये शर्मिंदा हूं।” तिलक राजकोटिया पुनः बोला।

“रात आपने ऐसा कुछ नहीं किया था तिलक साहब, जो आपको शर्मिंदा होना पड़े।”

“फिर भी मुझे रात तुम्हारे साथ इस तरह पेश नहीं आना चाहिये था। आइ बैग योअर पार्डन!”

“दैट्स ऑल राइट! आप नाश्ता कीजिये।”

“बट...।”

“तिलक साहब!” मैंने एक—एक शब्द चबाया—”अगर सचमुच आपको रात वाली घटना का अफसोस है, तो आप बस मेरा एक कहा मान लीजिये।”

“क्या?”

तिलक राजकोटिया की नजरें मेरी तरफ उठीं।

उसने तब पहली मर्तबा मेरी तरफ देखा।

“आप वादा कीजिये कि फिर कभी इस तरह शराब पीकर पैंथ हाउस में नहीं आयेंगे।”

तिलक राजकोटिया की आंखों में हैरानी के भाव नमूदार हुए।

उसे शायद यकीन नहीं था, मैं उससे इस तरह की बात भी कह सकती हूं।

“ठीक है।” वो बोला—”मैं वादा करता हूं। प्रोमिस।”

मेरे होठों पर मुस्कान खिल उठी।

उस दिन रात को जब तिलक राजकोटिया बिना शराब पीये पैंथ हाउस में आया, तो वह मेरी पहली बड़ी कामयाबी थी।

मुझे लगा- जैसे मैंने कारून का कोई बहुत बड़ा खजाना हासिल कर लिया हो।
 
4

प्यार की शुरूआत

होटल में आधी रात के करीब एक बहुत भव्य पार्टी का आयोजन किया गया था।

वह पार्टी तिलक राजकोटिया की तरफ से थी।

उसका एक नया शॉपिंग कॉम्पलैक्स बनना शुरू हुआ था और कॉम्पलैक्स की खुशी में ही उसने वो पार्टी दी थी। बहरहाल उस पार्टी की सबसे अहम् बात ये थी कि तिलक राजकोटिया ने मुझे भी उस पार्टी में निमंत्रित किया।

हालांकि मैं पार्टी में जाते हुए डर रही थी, क्योंकि मैं अतीत में ‘नाइट क्लब’ की एक हाई प्राइज्ड कॉलगर्ल रह चुकी थी।

अगर पार्टी में किसी ने मुझे पहचान लिया तो?

तो क्या होगा?

मैं डर गयी।

लेकिन फिर मैंने अपने अंदर हौसला इकट्ठा किया।

यह खतरा तो अब मैंने उठाना ही था।

अगर किसी ने मुझे पहचान लिया, तो उसका भी कोई—न—कोई समाधान निकलेगा। अब ऐसा तो नहीं हो सकता था कि मैं उस डर की वजह से पार्टी में ही शामिल न होती।

उस रात मैंने एक बड़ा खूबसूरत भूरे रंग का कफ्तान पहना और अपने बालों को जूड़े की शक्ल में कुछ इस तरह गूंथा, जो मेरी सुन्दरता में चार चांद लग गये।

पार्टी में शहर के बड़े—बड़े गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। हर कोई बृन्दा के बारे में सवाल कर रहा था। मुझे न जाने क्यों उस क्षण बृन्दा से जलन होने लगी।

“मेरे साथ आओ।”

पार्टी चलते आधा घण्टा हो गया होगा, तभी तिलक राजकोटिया मेरे नजदीक आया और मेरा हाथ पकड़कर मुझे ले जाने लगा।

“कहां ले जा रहे हो?” मैं चौंकी।

“आओ तो!”

मैं बड़ी असमंजसतापूर्ण मुद्रा में उसके साथ—साथ चली।

तिलक राजकोटिया मुझे लेकर उस मंच की तरफ बढ़ा, जहां आर्केस्ट्रा बज रहा था।

“वहां किसलिये ले जा रहे हो?” मेरी हैरानी बढ़ी।

“चिन्ता मत करो।” तिलक राजकोटिया के होठों पर मुस्कान थी।

जबकि मैं समझ नहीं पा रही थी, तिलक राजकोटिया का अगला कदम क्या होने वाला है?

मंच पर पहुंचकर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया।

फिर वो माइक की तरफ बढ़ा। मैं हाथ बांधे उसके बिल्कुल बराबर में खड़ी थी।

“लेडिस एण्ड जैण्टलमैन!”

तिलक राजकोटिया की आवाज पूरे हॉल में गूंजी।

सब लोग ठिठक गये। सब तिलक राजकोटिया की तरफ देखने लगे।

“फ्रेण्ड्स! मैं आज आपका परिचय अपने एक बहुत खास मेहमान से कराने जा रहा हूं।”

“य—यह आप क्या कर रहे हो?” मेरे चेहरे पर घबराहट के भाव तैर गये।

“तुम चुप रहो।” वह फुसफुसाया, फिर पहले की तरह माइक की तरफ मुंह करके बुलन्द आवाज में बोला—”इनसें मिलिये-यह है शिनाया शर्मा! बृन्दा की हरदिल अजीज दोस्त! और आज इन्हीं के कारण मुझे बृन्दा की देखभाल करने में आसानी हो रही है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं फ्रेन्ड्स- अगर आज यह न होतीं, तो मैं बुरी तरह टूट गया होता। बिखर गया होता। यह मेरे साथ हैं, तो मेरे पास हिम्मत है, ताकत है। मैं चाहता हूं कि आप सब लोग मिलकर इनके लिये तालियां बजायें।”

फौरन वह पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

मुझे वह सब कुछ काफी अज़ीब लगा।

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि उस तरह का सम्मान मुझे जिन्दगी में पहली मर्तबा मिल रहा था। वरना आज तक तो मर्दो ने मुझे सिर्फ नंगी—बुच्ची औरत के तौर पर ही देखा था।

“थैंक्यू!” तिलक राजकोटिया की आवाज माइक पर पुनः गूंजी—”मैं इन तालियों के लिये आप लोगों का बहुत—बहुत शुक्रगुज़ार हूं। अब मेरी आप लोगों से एक रिक्वेस्ट और है।”

“तुसी बेधड़क बोलो तिलक शाह जी!” मंच के नजदीक ही खड़ा एक पगड़ीधारी सरदार बोला—”तुसी क्या रिक्वेस्ट है?”

“मैं चाहता हूं- आप लोग यहां से जाकर अपने—अपने इष्टदेव से बृन्दा की जिन्दगी के लिये मन्नत जरूर मांगें। हो सकता है- उसकी बीमारी में जो काम दवाई न कर रही हो, वह आप लोगों की दुआ कर जाये।”

“ओह- तुसी ग्रेट हो शाह जी, ग्रेट!” सरदार भावुक हो उठा—”तुसी फिक्र न करो बादशाहो, असी आज ही गुरुद्वारे में नानक साहब के सामने जाकर मत्था टेकेगा। आज ही रब से मन्नत मांगेगा।”

“धन्यवाद!”

तिलक राजकोटिया फिर मुझे अपने साथ लेकर जिस तरह मंच पर बढ़ा था, उसी तरह नीचे उतर गया।

मैंने एक सरसरी—सी निगाह तमाम लोगों पर दौड़ाई—शुक्र था, जो फिलहाल किसी ने मुझे नहीं पहचाना था।

अलबत्ता किसी बड़े आदमी के साथ रहने में कैसी गर्वोक्ति होती है, इसका अहसास भी मुझे पहली बार ही हुआ।

मैंने तिलक राजकोटिया की तरफ देखा।

वह बड़ी अनुरागपूर्ण नजरों से मेरी तरफ देख रहा था।

मैं मर्दों की फितरत की अच्छी जानकार थी। मैं खूब समझती थी- उस निगाह का क्या मतलब है? उस समय वह शत—प्रतिशत मेरे हवाले हो जाने को पूर्णतया तैयार था। उसकी आंखों में उम्मीद की चमक थी। उसकी आंखों में प्यार का सैलाब उमड़ रहा था। उस समय अगर मैं चाहती- तो बिल्कुल मदारी की तरह उसे अपनी डुगडुगी पर नचा सकती थी।

बिल्कुल शेरनी की तरह उसके ऊपर सवार हो सकती थी।

लेकिन मैंने सब्र किया।

अलबत्ता मेरा तिलक राजकोटिया से शादी करने का निश्चय अब और भी ज्यादा दृढ़ हो गया।

•••
 
सुबह का समय था और मैं उस क्षण बृन्दा के पास थी।

बृन्दा के गले में मैंने नेपकिन लपेटा हुआ था और खुद अपने हाथ से उसे धीरे—धीरे सूप पिला रही थी।

फिलहाल उसकी तबीयत और भी ज्यादा निढाल थी।

“कैसी तबीयत हो रही है?” मैंने पूछा।

“तबीयत कुछ ठीक नहीं है।” वह धीमी आवाज में बोली—”जरा भी हिलने—डुलने को दिल नहीं चाह रहा।”

“अगर ज्यादा बेचैनी महसूस कर रही हो, तो डॉक्टर को बुलाऊं?”

“नहीं- ऐसी कोई बात नहीं।”

मैं उसे फिर सूप पिलाने लगी।

सूप पीने में भी उसका दिल नहीं था।

तभी तिलक राजकोटिया वहां आ गया।

वह नीला सूट पहने था। नीली फूलदार टाई लगाये था और टाई में लगा सोने का पिन अलग से जगमग—जगमग कर रहा था।

उस क्षण वह काफी स्मार्ट दिखाई पड़ रहा था।

“गुड मॉनिंग ऐवरीबड़ी!”

“गुड मॉर्निंग!”

मैं मन—ही—मन मुस्कुराई।

मेरा जादू धीरे—धीरे उस पर चल रहा था।

“आज तो लगता है कि तुम सुबह काफी जल्दी जाग गयी थीं?”

“हां- मेरी आँख आज थोड़ा जल्दी खुल गयी थी।” मैंने कहा।

तिलक राजकोटिया चहलकदमी—सी करता हुआ बृन्दा के बिल्कुल बराबर में आकर बैठ गया।

“डार्लिंग!” उसने बृन्दा के बालों में बड़े प्यार से उंगलियां फिराईं—”कभी—कभी सोचता हूं, तुम्हारी इस सहेली के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है।”

“कैसा अन्याय?”

“डार्लिंग- जरा सोचो!” तिलक राजकोटिया बोला—”आखिर तुम्हारे साथ—साथ इसे भी पैंथ हाउस में कैदियों जैसी जिन्दगी गुजारनी पड़ रही है।”

“नहीं- ऐसी कोई बात नहीं।” मैंने तुरन्त कहा—”आखिर मैं अपनी मर्जी से यहां आयी थी।”

“फिर भी तुम्हें थोड़ा बहुत घूंमना—फिरना भी चाहिये शिनाया, इससे मन बहलता है।”

मैं कुछ न बोली।

मैं सिर्फ बृन्दा को सूप पिलाती रही।

“तुम एक काम करो।” तिलक राजकोटिया ने पुनःकहा।

“क्या?”

“आज रात आजाद मैदान में विकलांगों की सहायतार्थ एक ‘फिल्म स्टार नाइट’ का आयोजन किया जा रहा है। मेरे पास भी उस नाइट के पास आये हुए है।”

“फिर?”

“हालांकि वहां जाने के लिये मेरा मन नहीं है।” तिलक राजकोटिया बोला—”लेकिन अगर तुम वहां जाना चाहो, तो मैं तुम्हारे साथ चलूंगा। इससे तुम्हारा दिल बहल जायेगा।”

मेरे चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे।

मैंने सोचा भी न था, तिलक राजकोटिया ऐसा कोई प्रस्ताव बृन्दा के सामने ही मेरे समक्ष रख देगा।

“क्या सोचने लगीं?”

“लेकिन हम दोनों के पीछे बृन्दा के पास कौन रहेगा?” मैंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।

“गार्ड रह लेगा। आखिर पहले भी तो वही रहता था।”

“मगर...।”

“डोट माइण्ड! बृन्दा- तुम्हीं इससे बोल दो। यह तुम्हारी परमिशन के बिना नहीं जायेगी।”

“हां—हां।” बृन्दा हकबकाकर बोली—”मैंने कब मना किया है!”

“लो।” तिलक राजकोटिया बोला—”अब तो तुम्हारी सहेली ने भी तुम्हें परमिशन दे दी।”

“लेकिन बृन्दा की तबीयत आज कुछ ठीक नहीं है तिलक साहब!”

“क्या हो गया बृन्दा को?” तिलक राजकोटिया ने बृन्दा की तरफ देखा।

बृन्दा ने तभी सूप का आखिरी घूंट भरा था, फिर वो गले में-से नेपकिन उतारकर धीरे—धीरे उससे अपना मुंह साफ करने लगी।

“बस मामूली थकान है।” बृन्दा ने आहिस्ता से कहा—”ऐसी थकान तो कभी भी हो जाती है, फिर तुम लोग दो—तीन घण्टे में तो लौट ही आओगे।”

“हां।”

“ठीक है- तुम जाओ।”

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

तिलक राजकोटिया के नजदीक आने के चांस मुझे अपने आप मिल रहे थे।

•••
 
रात के नौ बजे हम दोनों ‘आजाद मैदान’ में थे।

मैं मानो आकाश में उड़ रही थी।

मेरी उम्मीदों को पर लग गये थे।

हम दोनों एक साथ वी.आई.पी. गैलरी में जाकर बैठे। मैं खुद को बिल्कुल राजकुमारी जैसी फ़ील कर रही थी। पिछले चंद दिनों में जैसे तजुर्बे मुझे हुए थे, वह अविस्मरणीय थे।

मैं एक नई वैभव से भरी दुनिया से परिचित हो रही थी।

मैंने तब तक ख्वाब में भी नहीं सोचा था, दुनिया इस कदर रंगीन भी हो सकती है।

उस रात मैंने परदे पर झिलमिलाने वाले सितारों को अपने इतना करीब से देखा कि उन्हें हाथ बढ़ाकर छुआ जा सके।

रात के एक बजे का समय था- जब प्रोग्राम खत्म हुआ और हम दोनों वापस पैंथ हाउस में लौटे।

“क्या मेमसाहब सो गयीं?” मैंने लौटने के बाद गार्ड से सबसे पहला सवाल यही पूछा।

“नहीं- जाग रही हैं।”

मैं सन्न् रह गयी।

चकित्!

उस जवाब को सुनकर मेरे ऊपर घोर व्रजपात—सा हुआ था।

“लेकिन उन्हें तो अब तक सो जाना चाहिये था। क्या तुमने उन्हें सोने के लिये नहीं कहा?”

“कहा था मैडम!” गार्ड बोला—”लेकिन उन्होंने कहा, नींद ही नहीं आ रही है।”

मैं लम्बे—लम्बे डग रखती हुई बृन्दा के शयनकक्ष में दाखिल हुई।

वो तब भी जाग रही थी।

लाइट जली हुई थी।

उसकी आंखों में उस क्षण अजीब—सी बेचैनी थी। उसकी आंखों में उस तरह की बेचैनी मैंने तब भी देखी थी—जब ‘नाइट क्लब’ में आने वाले ग्राहक उसे छोड़कर मुझे बुक कर लेते थे।

“बड़ी देर में प्रोग्राम खत्म हुआ?” बृन्दा की निगाह वाल क्लॉक की तरफ दौड़ी।

“हां- हम थोड़े लेट हो गये।” मैं उसकी निगाह—से—निगाह मिलाकर बात नहीं कर पा रही थी—”लेकिन तुम्हें तो अब तक सो जाना चाहिये था।”

“बस नींद नहीं आ रही थी।”

“दवाई खाई?”

“नहीं।”

“हे भगवान!” मैं बोली—”तुम्हें क्या हो गया है बृन्दा! इसका मतलब डॉक्टर साहब ठीक ही कह रहे थे, तुम दवाई खाने में लापरवाह हो। तुम्हें अपनी जरा भी फिक्र नहीं।”

बृन्दा कुछ न बोली।

“चलो- अब सबसे पहले दवाई खाओ।”

मैंने बृन्दा की कमर के नीचे हाथ लगाया और उसे यूं आहिस्ता से उठाकर बिठाया, मानो वह सचमुच कांच की कोई नाजुक गुड़िया थी।

बृन्दा पीठ लगाकर बैठ गयी।

फिर मैंने उसे दवाई खिलाई।

“प्रोग्राम कैसा रहा?” बृन्दा ने धीमे स्वर में पूछा।

“अच्छा रहा।” मैं दवाई खिलाने के बाद बोली—”लेकिन हम दोनों का ध्यान तो तुम्हारे पास यहीं पड़ा रहा था। यह तो बार—बार तुम्हारे बारे में ही बात करने लगते थे।”

“वाकई?”

“ह—हां।” मुझे अपनी ही आवाज कपकंपाती अनुभव हुई—”सचमुच यह तुमसे बहुत प्यार करते हैं।”

बृन्दा ने कुछ न कहा।

मुझे ऐसा लगा- उसकी सशंकित दृष्टि मुझे ही घूर रही थी।

“अब तुम ज्यादा बात मत करो- बहुत रात हो चुकी है।”

मैंने बृन्दा को वापस बिस्तर पर लिटा दिया और उसके पायताने में रखा कम्बल खोलकर उसके कन्धों तक ओढ़ा दिया।

“अब तुम सो जाओ।” मैं बोली—”ज्यादा देर तक जागना तुम्हारी सेहत के लिये अच्छा नहीं है।”

बृन्दा कुछ न बोली।

उस क्षण उसकी वो खामोशी मुझे चुभती—सी लगी।

मैं लाइट बन्द करके उसके शयनकक्ष से बाहर निकल आयी। परन्तु हर क्षण मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था- मानो उसकी नजरें मेरी पीठ पर ही गड़ी हुई हैं।

मैं फैसला नहीं कर पा रही थी- मैं वह जो कुछ कर रही थी, वह सही है या गलत?

•••
 
उसी रात बृन्दा की किडनी में बहुत भीषण दर्द उठा।

दर्द इतना भीषण था- जैसे बृन्दा की अब जान निकली। अब निकली। वह दर्द से बुरी तरह छटपटा रही थी।

तड़प रही थी।

देखते—ही—देखते उसका पूरा शरीर पसीनों में लथपथ हो गया।

मैंने अपनी जिन्दगी में किसी के इतना तेज दर्द उठते नहीं देखा था।

“मैं डॉक्टर को बुलाता हूं।” तिलक राजकोटिया भी घबराहट में टेलीफोन की तरफ झपटा।

उसने डॉक्टर अय्यर को फोन किया।

पांच मिनट भी नहीं गुजरे, डॉक्टर अय्यर अपना किट—बैग लेकर दौड़ता हुआ वहां पहुंच गया। बृन्दा तब भी दर्द से छटपटा रही थी।

“हे मुरुगन!” बृन्दा की इतनी बुरी हालत देखकर डॉक्टर अय्यर के चेहरे पर आतंक के भाव दौड़े—”पहले तो कभी इनके इस तरह दर्द नहीं उठा था।”

“नहीं।” तिलक राजकोटिया बोला—”पहली बार दर्द उठ रहा है।”

डॉक्टर अय्यर ने अपना किट बैग एक तरफ रखा और बृन्दा के नजदीक पहुंचा।

“बृन्दा!” डॉक्टर अय्यर ने उसके दोनों कंधे पकड़कर झिंझोड़े—”बृन्दा!”

“ह—हां।” बृन्दा ने छटपटाते हुए आंखें खोलीं—”हां, डॉक्टर!”

वह पसीनों में नहा रही थी।

उसका बुरा हाल था।

“तुम्हारे किस जगह दर्द उठ रहा है?”

“क—किडनी में!” बृन्दा ने हांफते हुए कहा—”किडनी में!”

“क्या इस जगह?” डॉक्टर अय्यर ने उसके किडनी वाले हिस्से पर हाथ रखा और उसे धीरे से दबाया।

बृन्दा के हलक से वीभत्स चीख निकल गयी।

वह छटपटाई।

“क्या हुआ?”

“यहीं!” वह पीड़ाजनक मुद्रा में बोली—”यहीं दर्द उठ रहा है।”

“और यहां?”

डॉक्टर अय्यर ने उसके पेट पर एक अन्य जगह हाथ रखकर धीरे से दबाया।

बृन्दा की पुनः चीख निकली।

“यहां भी! यहां भी!! ऐसा लग रहा है—जैसे पेट में जगह—जगह आग के गोले उठ रहे हो।”

“ओह—काफी सीरियस मामला है।”

डॉक्टर अय्यर के माथे पर चिंता की ढेर सारी लकीरें उभर आयीं।

मैं भी वहीं बृन्दा के पास खड़ी उस सारे नजारे को देख रही थी।

अलबत्ता बृन्दा के जितनी बुरी तरह दर्द उठ रहा था—उसने हाथ—पैर मेरे भी फुलाकर रख दिये थे।

“अब क्या करोगे डॉक्टर?” तिलक राजकोटिया बोला।

“मैं एक इंजेक्शन लगा रहा हूँ—शायद उससे कुछ फर्क पड़े।”

डॉक्टर अय्यर ने किट बैग खोलकर इंजेक्शन निकाला और एक सीरिंज निकाली।

जल्द ही उसने इंजेक्शन तैयार कर लिया।

“ऐन्ना- अपना बाजू मोड़ लो।”

बृन्दा ने बाजू मोड़ा।

फौरन डॉक्टर अय्यर ने उसके इंजेक्शन लगा दिया।

“मैं समझता हूं- शीघ्र ही अब तुम्हें नींद आ जानी चाहिए।” डॉक्टर अय्यर, बृन्दा के बाजू को धीरे—धीरे उस स्थान से रगड़ता हुआ बोला—जहां उसने इंजेक्शन लगाया था।

रात के दो पैंतीस हो रहे थे।

मैं, डॉक्टर अय्यर और तिलक राजकोटिया- हम तीनों पैंथ हाउस के ही एक कमरे में बैठे थे।

इंजेक्शन ने जल्दी अपना असर दिखाया और मुश्किल से पांच मिनट बाद ही बृन्दा को नींद आ गयी।

अलबत्ता बृन्दा को नींद आने के बाद डॉक्टर अय्यर ने एक काम और किया था। उसने इंजेक्शन से बृन्दा का थोड़ा खून और निकाल लिया।

“यह आपने ब्लड सैम्पल क्यों लिया है?” मैंने आश्चर्यवश पूछा।

“मैं दरअसल बृन्दा का ब्लड एक बार फिर टेस्ट के लिये भेजना चाहता हूं।” डॉक्टर अय्यर कह रहा था—”मैं अब एक—एक पल की रिपोर्ट लेना चाहता हूं।”

“लेकिन आज बृन्दा के यह इतना भयंकर दर्द क्यों उठा है?” तिलक राजकोटिया बोला।

“ऐन्ना- यही बात मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसी बात ने मुझे चिंता में डाला हुआ है।” डॉक्टर अय्यर बोला—”दर्द उठना इत्तेफाक भी हो सकता है और ये भी सम्भव है- इसके पीछे कोई गम्भीर मामला जुड़ा हो।”

“अगर गम्भीर मामला हुआ, तब क्या होगा?”

“उसे भी देखा जाएगा- बहरहाल सब कुछ अब दूसरी ब्लड रिपोर्ट के ऊपर निर्भर है।”

फिर डॉक्टर अय्यर ने अपने किटबैग से कुछ कैप्सूल निकालकर मेरी तरफ बढ़ाये।

“इन्हें तुम अपने पास रख लो शिनाया!”

“इनका मैंने क्या करना है?”

“अगर बृन्दा के दोबारा किडनी में दर्द उठे- तो तुमने फौरन एक कैप्सूल उन्हें खाने के लिए देना है। यह कैप्सूल पेन किलर है।”

“ठीक है।”

मैंने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।

डॉक्टर अय्यर चला गया।

•••
 
बाकी सारी रात मुझे नींद नहीं आयी।

अलबत्ता मैं अपने बैडरूम में जाकर लेट गयी थी।

बृन्दा को मैं धीरे—धीरे मौत की तरफ बढ़ते देख रही थी। हर गुजरती हुई घटना के साथ यह पक्का होता जा रहा था, बृन्दा अब ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है।

वह बहुत जल्दी मर जाएगी।

और यह सब मेरे हक में अच्छा ही हो रहा था।

उसी रात एक घटना और घटी।

कोई साढ़े तीन का समय रहा होगा। तभी मेरे शयनकक्ष का दरवाजा किर्र—किर्र करता हुआ आहिस्ता से खुला और एक साये ने अंदर कदम रखा।

मैं बिल्कुल निश्चेष्ट पड़ी रही।

मानो गहरी नींद सो रही होऊं।

गहन अंधेरे में भी मैंने साये को साफ—साफ पहचाना, वह तिलक राजकोटिया था।

तिलक राजकोटिया बिल्कुल मेरे बिस्तर के करीब आकर खड़ा हो गया और अपलक मुझे निहारने लगा।

फिर वह थोड़ा—सा मेरी तरफ झुका।

उसकी गरम—गरम सांसें मेरे चेहरे से टकराने लगीं।

वह व्याकुल हो रहा था।

उन्मादित!

यही हालत मेरी थी।

मैं भी बेचैन हो रही थी।

आखिर मैं भी तो ‘भूखी’ थी।

लेकिन मैंने सब्र किया।

आखिर मैं एक औरत थी। वो भी अपने फन में पूरी तरह माहिर औरत!

“शिनाया!”

उसने मुझे धीरे से पुकारा।

मैंने कोई प्रतिक्रिया जाहिर न की।

मैं गहरी निद्रा का अभिनय किये लेटी रही। अलबत्ता उस क्षण मुझे अपनी भावनाओं पर अंकुश रखने में कितनी मशक्कत करनी पड़ रही थी, यह सिर्फ मैं जानती हूं।

“शिनाया!” उसकी आवाज इस बार थोड़ी तेज थी।

मेरी तरफ से फिर कुछ प्रतिक्रिया न हुई।

तिलक राजकोटिया मेरी तरफ थोड़ा और झुका।

उसकी सांसों की गर्मी के साथ—साथ उसके जिस्म की गर्मी भी अब मुझे अपने अंदर उतरती अनुभव होने लगी।

मुझे ऐसा लगा- अगर तिलक राजकोटिया कुछ देर और उसी मुद्रा में रहा, तो शायद मेरा संयम छूट जाएगा।

मेरे दिल में खलबली मच चुकी थी।

मेरे अंदर बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

मुझे ऐसा लगने लगा- तिलक राजकोटिया अभी अपने होंठ मेरे होंठों पर रख देगा।

अभी उसकी बाहों का शिकंजा मेरे शरीर के गिर्द कस जाएगा।

परन्तु वैसी नौबत न आयी।

तिलक राजकोटिया कुछ देर उसी मुद्रा में मेरे नजदीक खड़ा रहा।

फिर जब उसे इस बात का पूरा यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद सो रही हूं, तो वह पीछे हट गया तथा चुपचाप वहां से चला गया।

जाते—जाते वह मेरे शयनकक्ष का दरवाजा बंद करना नहीं भूला।
 
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