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Thriller नाइट क्लब

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वह खाने की एक काफी बड़ी ट्रॉली थी- जिसे पहियों पर धकेलती हुई मैं थोड़ी देर बाद पुनः बृन्दा के शयनकक्ष में लेकर दाखिल हुई।

ट्रॉली पर प्लेटें, चम्मच और डिश वगैरह रखे हुए थे।

“आज क्या बनाया है?” बृन्दा ने पूछा।

वह उस समय बैड की पुश्त से पीठ लगाये बैठी थी और खूब तरोताजा नजर आ रही थी।

“तुम्हारे लिए मूंग की दाल की खिचड़ी और दही है।” मैं बोली—”जबकि मैंने अपने और तिलक साहब के लिए शाही पनीर बनाया था। वैसे तुम भी थोड़ा—सा शाही पनीर खाना चाहो, तो खा सकती हो।”

“ओह- शाही पनीर!” बृन्दा चहकी—”थोड़ा—सा तो जरूर खाऊंगी। वैसे भी मुझे खूब याद है, तुम शाही पनीर काफी अच्छा बनाती हो।”

मैं हंसी।

“पुरानी सारी बातें तुम्हें आज भी याद हैं।”

“मैं कभी कुछ नहीं भूलती।”

तब तक खाने की ट्रॉली को मैंने उसके बैड के बिल्कुल बराबर में ले जाकर खड़ा कर दिया था। उस ट्रॉली के निचले हिस्से में एक छोटी—सी फोल्डिंग टेबल रखी हुई थी—जिसके पाये मुश्किल से छः इंच लंबे थे और उन्हें गोल कुंदे में अटकाकर खोल दिया जाता था। मैंने टेबल के पाये खोले और फिर उस टेबल को अच्छी तरह बृन्दा की गोद में टिका दिया। अब वह बड़ी सहूलियत के साथ उस पर खाना खा सकती थी।

उसके बाद मैंने प्लेटें और डिश उस टेबल पर सजाने शुरू किये।

“टी.वी. और शुरू कर दो।” बृन्दा बोली—”आज टी.वी. देखे हुए भी कई दिन हो गए हैं।”

मैंने आगे बढ़कर टी.वी. भी ऑन कर दिया।

‘एम टी.वी.’ पर उस समय फिल्मी गानों का एक काउण्ट डाउन शो आ रहा था, मैंने टी.वी. वहीं लगाया।

टी.वी. पर तुरन्त ‘छइयां—छइयां’ गाने की मधुर पंक्तियां गूंजने लगीं।

इस बीच बृन्दा ने शाही पनीर की थोड़ी—सी सब्जी एक प्लेट में निकाल ली थी और फिर खाना भी शुरू कर दिया।

“सब्जी कैसी बनी है?”

“सचमुच लाजवाब!” बृन्दा ने बहुत चमकती आंखों से मेरी तरफ देखा—”तुम तो खाना बनाने में अब पहले से भी ज्यादा एक्सपर्ट हो गयी हो शिनाया!”

“थैंक्यू फ़ॉर द कॉप्लीमेण्ट!”

“अंग्रेजी में भी पहले से सुधार हुआ है।” वो बात कहकर बृन्दा हंसी।

“सब पढे़—लिख ग्राहकों के साथ सैर—सपाटा करने का नतीजा है। वरना तू तो जानती है, मैं क्या हूं- अंगूठा छाप!”

“और मैं ही कौन—सा बेरिस्टर हू, मैं भी तेरी तरह अंगूठा छाप हूं।”

हम दोनों हंस पड़े।

तभी जोर से बिजली कड़कड़ाई।

“मौसम शायद आज कुछ ठीक मालूम नहीं होता।” बृन्दा ने संजीदगी के साथ कहा।

“हां।” मैं बोली—”बाहर हल्की बूंदा—बांदी हो रही है।”

बृन्दा खाना खाती रही।

उसने अब मूंग की दाल की खिचड़ी और दही भी अपनी प्लेट में निकाल ली थी।

“मैं तुझसे एक बात कहूं शिनाया?”

“क्या?” मैं बृन्दा के नजदीक ही बैठ गयी।

“तुझे अब उस ‘नाइट क्लब’ की झिलमिलाती दुनिया में कभी वापस नहीं लौटना चाहिए। अगर तू जिन्दगी के इस मोड़ पर आकर भी उस दुनिया में वापस गयी, तो फिर शायद ही कभी उस गदंगी से बाहर निकल सके। फिर तो तेरा हाल भी तेरी मां जैसा ही होगा।”

“न... नहीं।” मैं कांप उठी, मेरे शरीर का एक—एक रोआं खड़ा हो गया—”प्लीज बृन्दा- ऐसे शब्द भी अपनी जबान से मत निकालो।”

“मैं जानती हूं, तू अपनी मां की मौत को अभी भी नहीं भुला पायी है। इसीलिए कहती हूं- तू भी तिलक राजकोटिया जैसा कोई आदमी देखकर जल्द—से—जल्द शादी कर डाल।”

“मैं वही कोशिश तो कर रही हूं।”

“क्या मतलब?”

“मेरा मतलब है,” मैं जल्दी से बात सम्भालकर बोली—”मैं वही कोशिश तो कर रही थी, जो केअरटेकर की नौकरी करने यहां आ पहुंची। अब मुझे यह थोड़े ही मालूम था कि यहां मेरी तुझसे मुलाकात हो जाएगी।”

“ओह- सचमुच तेरे साथ काफी बुरा हुआ।” बृन्दा अफसोस के साथ बोली—”लेकिन मुम्बई शहर में तिलक राजकोटिया के अलावा और भी तो ढेरों लड़के हैं।”

“यह तो है।”

शीघ्र ही उसने खाना खा लिया।

मैंने सारे बर्तन समेटकर वापस ट्रॉली पर रखे।

रात के उस समय दस बज रहे थे- जब मैंने बृन्दा को सोने से पहले दो टेबलेट खाने के लिए दीं। परन्तु उस रात बृन्दा को दी जाने वाली उन दो टेबलेट में-से एक ‘डायनिल’ थी।

डायनिल!

खतरे की घण्टी!

•••
 
“ओह डार्लिंग- तुम सचमुच खूबसूरत हो, बेहद खूबसूरत।”

तिलक राजकोटिया के नाक के नथुनों से उस क्षण भभकारे छूट रहे थे।

वह दीवाना बना हुआ था।

सहसा उसने मेरी कलाई कसकर अपने हाथ में पकड़ी और मुझे अपनी तरफ खींच लिया।

मैं सीधे उसकी गोद में गिरी।

अगले पल उसने अपने जलते हुए होंठ मेरे नाजुक और सुर्ख होंठों पर रख दिये।

मुझे ऐसा लगा- जैसे मेरे होंठों से कोई दहकता अंगारा आ चिपका हो।

उस समय तिलक राजकोटिया और मैं दोनों बिस्तर पर थे।

दोनों को एक—दूसरे की जरूरत थी।

“क्या तुमने उसे ‘डायनिल’ दे दी है?” तिलक राजकोटिया बेहद दीवानावार आलम में अपने होंठ मेरे होठों पर रगड़ता हुआ बोला।

“हां- मैं उसे आज की खुराक दे चुकी हूं।”

“यानि एक डायनिल!”

“हां- एक डायनिल! अब सिर्फ उसका परिणाम देखना बाकी है। मैं समझती हूं, थोड़ी—बहुत देर में उसका परिणाम भी सामने आ ही जाना चाहिए।”

उसी क्षण तिलक राजकोटिया मुझे अपनी बाहों में भींचे—भींचे बिस्तर पर कलाबाजी खा गया।

फिर वो मेरी शॉर्टीज के बटन खोलने लगा।

शीघ्र ही मेरी शॉर्टीज उतरकर एक तरफ जा पड़ी।

नीचे मैं ब्रेसरी पहने थी।

उसके बाद तिलक राजकोटिया की उंगलियां सरसराती हुई ब्रेसरी के हुक की तरफ बढ़ीं।

रात के उस समय दो बज रहे थे।

“क्या तुम्हें ऐसा नहीं लग रहा डार्लिंग!” तिलक राजकोटिया मेरा प्रगाढ़ चुम्बन लेता हुआ बोला—”कि टेबलेट का रिजल्ट सामने आने में जरूरत से कुछ ज्यादा देर हो रही है?”

“चिंता मत करो।” मेरे जिस्म में अजीब—सी सनसनाहट गर्दिश कर रही थी—”रिजल्ट जरूर निकलेगा। आखिर टेबलेट को अपना असर दिखाने में भी तो वक्त चाहिए।”

इस बीच वो ब्रेसरी का हुक खोल चुका था।

ब्रेसरी का हुक खुलते ही उसके स्ट्रेप कंधों से फिसलकर बाहों पर आ गये।

आनन्द की अधिकता से मेरी पलकें बंद होती चली गयीं।

मेरी उंगलियां भी अब तिलक राजकोटिया की पीठ पर रेंगने लगी थीं।

हम दोनों अपनी मंजिल पर पहुंचते, उससे पहले ही घटना घटी।

“नहीं!”

एकाएक बहुत हृदय—विदारक चीख की आवाज पूरे पैंथहाउस को थर्राती चली गयी।

हम दोनों उछल पड़े।

चीख की आवाज बहुत वीभत्स थी।

“य... यह तो बृन्दा के चीखने की आवाज है।” मेरे जिस्म का एक—एक रोआं खड़ा हो गया।

“हां- उसी की आवाज है।”

तिलक राजकोटिया के शरीर में भी झुरझुरी दौड़ी।

हमने आनन—फानन कपड़े पहने और एकदम उसके बैडरूम की तरफ झपट पड़े।

•••
 
हम दोनों दनदनाते हुए बृन्दा के बैडरूम में दाखिल हुए थे।

कहने की आवश्यकता नहीं- उन चंद सैकेण्ड में ही हमारा बुरा हाल हो चुका था।

सांस धौंकनी की तरह चलने लगी थी।

और!

बैडरूम में दाखिल होते ही हमारे होश और भी ज्यादा उड़ गये।

बृन्दा बिल्कुल निढाल—सी अवस्था में अपने बिस्तर पर पड़ी थी। उसके हाथ—पैर फैले हुए थे और गर्दन लुढ़की हुई थी।

“इसे क्या हुआ?” तिलक राजकोटिया आतंकित मुद्रा में बोला—”कहीं यह मर तो नहीं गयी?”

मर गयी!

मेरे भी होश गुम।

मैं भी दंग!

बृन्दा जिस अंदाज में बिस्तर पर पड़ी थी। वह सचमुच दिल में हौल पैदा कर देने वाला दृश्य था।

“बृन्दा! बृन्दा!!” मैंने आगे बढ़कर बृन्दा के दोनों कंधे पकड़े और उसे बुरी तरह झंझोड़ डाला।

बृन्दा पर कोई प्रतिक्रिया न हुई।

उसका पूरा जिस्म सिर्फ हिलकर रह गया।

“बृन्दा!”

मैंने बृन्दा का शरीर और बुरी तरह झंझोड़ा।

उसका शरीर पुनः निर्जीव देह की तरह हिला।

“माई गॉड!” तिलक राजकोटिया विचलित हो उठा—”यह तो एक ही टेबलेट से मर गयी दिखती है।”

उस बात ने मेरे भी हाथ—पांव फुलाये।

हत्या करना हम दोनों का उद्देश्य था। परन्तु इतनी जल्दी उसे मार डालने की बात हमने सोची भी न थी।

पहले हमने बृन्दा की एक—दो बार तबीयत खराब करनी थी, फिर कहीं ‘डायनिल’ की हाईडोज देकर उसे मार डालना था।

“अगर यह मर गयी- तो बहुत बुरा होगा।” मैं बोली—”फिर तो यूं समझो, हमारी सारी योजना फेल हो जाएगी।”

•••

एकाएक तिलक राजकोटिया को कुछ सूझा।

उसने आगे बढ़कर बृन्दा की हार्टबीट चैक की।

तत्काल उसके चेहरे पर उम्मीद जागी।

“क्या हुआ?”

“हार्टबीट चल रही है- उसमें कंपन्न है।”

“थैंक ग़ॉड!”

मैंने राहत की सांस ली।

मैंने बृन्दा की नब्ज टटोली।

नब्ज भी चालू थी।

“यह जिन्दा है- अभी जिन्दा है।”

“लगता है- टेबलेट के असर से सिर्फ बेहोश ही हुई है।”

“दरअसल एक ‘डायनिल’में इतनी ताकत होती है,” मैं बोली—”कि अगर वह किसी ऐसे तन्दरूस्त आदमी को खिला दी जाए, जो ‘शुगर’का पेशेण्ट न हो- तो वह तन्दरूस्त आदमी भी फौरन ही चक्कर खाकर नीचे गिर पड़ेगा। बृन्दा तो फिर भी बहुत बीमार है, इसीलिए यह बेहोश हो गयी।”

तिलक राजकोटिया ने फौरन ही बृन्दा के चेहरे पर काफी सारे पानी के छींटे दिये।

मैं उसके पैरों के पास पहुंची।

फिर उसके पैरों के तलुए काफी जोर—जोर से रगड़ने लगी।

हथेली रगड़ी।

“थोड़ी जोर—जोर से रगड़ो।” तिलक राजकोटिया बोला।

मैंने उसकी हथेली और पैरों के तलुए कुछ और जोर—जोर से रगड़े।

तिलक राजकोटिया भी तलुए रगड़ने में मेरी मदद करने लगा।

हमारी थोड़ी देर की कोशिशों के बाद ही बृन्दा होश में आ गयी।

उसने कंपकंपाते हुए धीरे—धीरे आंख खोली।

उसका चेहरा सुता हुआ था।

बिल्कुल सफेद झक्क् कागज की तरह।

वह बड़ी हैरान निगाहों से कभी मुझे, तो कभी तिलक राजकोटिया को देखने लगी।

“क... क्या हो गया था मुझे?” बृन्दा ने कंपकंपाये स्वर में पूछा।

“कुछ नहीं।” तिलक राजकोटिया बोला—”कुछ नहीं हुआ था तुम्हें।”

“लेकिन...।”

“तुम सो जाओ। फिलहाल तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है।”

बृन्दा ने बड़ी सशंकित निगाहों से मेरी तरफ देखा।

“शिनाया- तुम बताओ, क्या हुआ था मुझे?”

मैंने प्रश्नसूचक नेत्रों से तिलक राजकोटिया की तरफ देखा।

मानो कुछ भी बताने से पहले उसकी परमिशन लेना चाहती होऊं।

तिलक राजकोटिया कुछ न बोला।

वह सिर्फ बैडरूम से चला गया।

मैं बृन्दा के नजदीक जाकर बैठी।
 
सस्पैंस के मारे तब तक बृन्दा का बुरा हाल हो चुका था।

उसने पीठ के बल बैठने का प्रयास किया।

“नहीं।” मैंने उसका हाथ पकड़ा—”तुम लेटी रहो- तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है।”

अंतिम शब्द मैंने पुनः काफी जोर देकर कहे।

एक ही झटके में वो बेहद कमजोर दिखाई पड़ रही थी।

मानो किसी ने उसके जिस्म की सारी शक्ति को निचोड़ लिया हो।

“दरअसल तुम्हारी बहुत जोर से चीख निकली थी।” मैंने उसे बताया—”तुम्हारी चीख सुनकर हम दोनों यहां दौड़ते हुए आये, तो तुम्हें बेहोश पड़े देखा।”

“बेहोश!”

“हां। क्या हो गया था तुम्हें?”

बृन्दा के चेहरे पर असमंजसपूर्ण भाव दिखाई दिये।

“मुझे खुद कुछ नहीं मालूम।” बृन्दा बोली।

“फिर भी कुछ तो महसूस हुआ होगा?”

“बस ऐसा लगा था, मानो मेरे पेट में गोला—सा छूटा हो। उसके बाद मेरे साथ क्या हुआ- मुझे नहीं पता।”

बृन्दा अब साफ—साफ फिक्रमंद दिखाई पड़ने लगी।

•••

मैं, डॉक्टर अय्यर और तिलक राजकोटिया, तीनों सुबह के वक्त ड्राइंग हॉल में बैठे थे और धीरे—धीरे चाय चुस्क रहे थे।

तीनों चिंतत थे।

डॉक्टर अय्यर को तिलक राजकोटिया ने ही फोन करके पैंथ हाउस में बुलाया था।

“ऐन्ना- मामला मेरे कुछ समझ नहीं आ रहा है।” डॉक्टर अय्यर बोला।

“क्यों?”

“पहले तो बृन्दा के साथ इस प्रकार की कभी कोई घटना नहीं घटी थी। यह बेहोश होने का पहला मामला है। फिर सबसे उलझनभरी बात ये है- बेहोश होने की वजह भी मालूम नहीं चल पा रही है। क्योंकि इस मर्तबा जिस तरह की ब्लड रिपोर्ट आयी थी- उस हिसाब से तो बृन्दा की तबीयत में सुधार होना चाहिए था। जबकि यहां तो मामला और बिगड़ गया है- और उलझ गया है।”

“यह तो है।” तिलक राजकोटिया बोला—”इसी बात ने तो हमें भी हिलाकर रख दिया है डॉक्टर!”

तीनों धीरे—धीरे चाय चुसकते रहे।

“रात यह घटना अन्दाजन किस वक्त घटी?”

“कोई दो बज रहे थे।”

“और आप कह रहे हैं,” डॉक्टर अय्यर गरमजोशी के साथ बोला—”कि पहले आपने चीखने की आवाज सुनी थी।”

“बिल्कुल।” इस मर्तबा वह शब्द मेरी जुबान से निकले—”चीखने की आवाज सुनकर ही तो हमारी आंख खुली थी- वरना हम तो उस वक्त गहरी नींद में थे। मैं अपने शयनकक्ष से बाहर निकली—तिलक साहब अपने शयनकक्ष से बाहर निकले। उसके बाद दौड़ते हुए बृन्दा के पास पहुंचे।”

“फिर?”

“फिर क्या- जब हम वहां पहुंचे, तो वह बेहोश पड़ी हुई थीं।”

“बल्कि शुरू में तो हम यह सोचकर डर ही गये थे डॉक्टर!” तिलक राजकोटिया बोला—”कि कहीं बृन्दा मर न गयी हो।”

“फिर आपको यह कैसे पता चला कि वो सिर्फ बेहोश है?”

“मैंने हार्ट बीट चैक की।”

“हार्ट बीट!”

“यस।”

डॉक्टर अय्यर चाय का घूंट भरता—भरता ठिठक गया।

वह अब बहुत गौर से हम दोनों की शक्ल देखने लगा।

जैसे कोई बहुत खास बात नोट करने की कोशिश कर रहा हो।

“हार्ट बीट चैक करने की बात आप दोनों में से सबसे पहले किसे सूझी?”

“मुझे सूझी।” तिलक राजकोटिया ने बताया।

“हूं।”

डॉक्टर अय्यर ने चाय का घूंट भरा तथा फिर कप खाली करके टेबिल पर रखा।

उसके बाद वह कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया था।

फिर वो बेचैनीपूर्वक इधर—से—उधर टहलने लगा।

वह जिस तरह सवाल—जवाब कर रहा था, उसके कारण मेरे मन में भय पैदा हुआ। मैं तुरन्त भांप गयी, शक्ल—सूरत से बहुत सज्जन—सा दिखाई पड़ने वाला वह व्यक्ति कभी भी खतरनाक साबित हो सकता है।

“ऐन्ना- कुछ बातें मुझे बड़ी उलझन में डाल रही हैं।” डॉक्टर अय्यर बोला।

“कैसी बातें?”

“जैसे मैंने ‘मेलीगनेंट ब्लड डिसक्रेसिया’ केस का जो रिकॉर्ड आज तक स्टडी किया है, उसमें किसी पेशेण्ट के साथ आज से पहले इस तरह का कोई वाकया पेश नहीं आया- जैसा वाकया रात बृन्दा के साथ पेश आया है। जहां तक मेरी बुद्धि कहती है, इसके पीछे बस दो ही कारण हो सकते हैं।”

“क्या?”

“या तो यह बिल्कुल अलग तरह का मामला है तिलक साहब या फिर यह ‘मेलीगनेंट ब्लड डिसक्रेसिया’की कोई हायर कैटेगिरी है। बहरहाल वजह चाहे जो भी है- मैं फिलहाल बृन्दा से मिलना चाहता हूं।”

“चलो।”

तब तक मैं और तिलक राजकोटिया भी अपने—अपने चाय के कप खाली करके टेबिल पर रख चुके थे।

•••
 
हम तीनों बृन्दा के शयनकक्ष में दाखिल हुए।

डॉक्टर अय्यर फिलहाल बहुत गम्भीर नजर आ रहा था।

और!

उसकी यही गम्भीरता मुझे बार—बार डरा रही थी।

बृन्दा के पास पहुंचते ही डॉक्टर अय्यर ने सबसे पहले उसका ब्लड प्रेशर चैंक किया तथा फिर पैंसिल टॉर्च से उसकी आंखों को देखा।

“शिनाया।” वह मेरी तरफ घूमा—”तुम इन्हें दवाई तो बिल्कुल ठीक वक्त पर खिला रही हो?”

“हां।”

“कोई खुराक बीच में छूटी तो नहीं?”

“नहीं।”

डॉक्टर अय्यर अब दवाई वाली ट्राली के नजदीक जाकर खड़ा हो गया तथा फिर बहुत गौर से ट्राली में रखी दवाईयों पर दृष्टि दौड़ाने लगा।

मैंने जोर से गले का थूक सटका।

सचमुच वह बहुत हर्राट व्यक्ति था।

मैंने मन—ही—मन परमात्मा का शुक्रिया अदा किया कि रात ही मैंने वह टेबलेट भी ट्रॉली में से निकालकर अपने पास रख ली थी। वरना वो हर्राट डॉक्टर उसी क्षण असलियत की तह तक पहुंच जाता।

वो तभी भांप जाता, रात एक टेबलेट खिलाने में कहीं—न—कहीं कुछ गड़बड़ हुई है।

“बृन्दा!” डॉक्टर अय्यर, बृन्दा की तरफ घूमा—”रात आपने किस टाइम दवाई खाई थी?”

“रात के उस समय यही कोई दस बज रहे थे।” मैंने जवाब दिया।

“मैं तुमसे नहीं बृन्दा से सवाल कर रहा हूं।” डॉक्टर अय्यर एकाएक मेरी तरफ देखता हुआ गुर्रा उठा—”जो सवाल तुमसे किया जाए, सिर्फ उसका जवाब तुम देना।”

मैंने अपने शुष्क अधरों पर जबान फिराई।

डॉक्टर अय्यर का वह एक बिल्कुल नया रूप मैं देख रही थी।

“शिनाया ठीक ही कह रही है डॉक्टर।” बृन्दा धीमे स्वर में बोली—”कोई दस बजे का ही समय रहा होगा, जब रात मैंने दवाई खाई थी।”

“दस बजे!”

“हां। यह बात मैं दृढ़तापूर्वक इसलिए भी कह सकती हूं,” बृन्दा बोली—”क्योंकि ‘एम टी.वी.’ पर तभी फिल्मी गानों का काउण्ट डाउन शो खत्म हुआ था, जो कि दस बजे ही खत्म होता है।”

“दवाई में आपने क्या—क्या लिया?”

“वही जो रूटीन के मुताबिक लेती हूं।”

“क्या?”

“दो टेबलेट और एक चम्मच सीरप।”

“उसके बाद?”

“उसके बाद कुछ नहीं हुआ। दवाई खाने के बाद मैं बस लेट गयी थी।” बृन्दा बोली—”और सोने की कोशिश करने लगी थी। थोड़ी बहुत देर बाद मुझे नींद भी आ गयी।”

“दवाई खाने के बाद शरीर में किसी तरह की बेचैनी हुई हो, हरकत हुई हो?”

“नहीं- कुछ नहीं हुआ।”

“यानि सब कुछ सामान्य था।”

“हां। बस जिस वक्त मेरे मुंह से चीख निकली, उस वक्त मुझे अपने पेट में गोला—सा छूटता अनुभव हुआ था। फिर मुझे नहीं मालूम- उसके बाद मेरे साथ क्या हुआ।”

“और अब कैसा महसूस कर रही हो?”

“शरीर में कुछ कमजोरी अनुभव हो रही है।” बृन्दा बोली—”बाकी सब कुछ सामान्य है।”

डॉक्टर अय्यर के माथे पर ढेर सारी लकीरें उभर आयीं।

वो अभी भी काफी बेचैन था।

“तिलक साहब!” डॉक्टर अय्यर, तिलक राजकोटिया की तरफ घूमा—”मैं कल ठीक इसी वक्त आप लोगों से फिर आकर मिलता हूं।”

“क्या यह मालूम हुआ कि रात बृन्दा के साथ इस तरह की घटना क्यों घटी थी?”

“मैं दरअसल यही जानने की कोशिश कर रहा हूं। मुझे उम्मीद है- मैं कल तक किसी—न—किसी नतीजे पर जरूर पहुंच जाऊंगा।”

फिर डॉक्टर अय्यर पैंथ हाउस से चला गया।

•••
 
सारा दिन व्यस्तता से भरा रहा।

शाम के समय तिलक राजकोटिया खुद मेरे रूम में आया। अब हम दोनों के बीच में बॉस और सर्वेण्ट जैसा रिश्ता बिल्कुल खत्म हो चुका था और मौहब्बत भरे एक ऐसे आलीशान रिश्ते की आधारशिला रखी गयी, जो सिर्फ औरत तथा मर्द के बीच ही कायम हो सकती है।

“तिलक साहब- मुझे इस डॉक्टर से खतरा महसूस हो रहा है।” मैंने वह शब्द तिलक राजकोटिया के कंधे पर सिर रखकर अनुरागपूर्ण ढंग से कहे।

हालांकि मैं डरी हुई तब भी थी।

बार—बार उस मद्रासी डॉक्टर का चेहरा मेरी नजरों के सामने घूम जाता।

“कैसा खतरा?”

“मुझे लग रहा है, इस डॉक्टर के कारण कहीं—न—कहीं कुछ गड़बड़ जरूर होगी। इसकी आज की गतिविधियों से साबित हो गया है- यह उतना सीधा हर्गिज नहीं है, जितना मैं इसे आज तक समझती थी।”

तिलक राजकोटिया ने ध्यानपूर्वक मेरी तरफ देखा।

“लेकिन यह कैसी गड़बड़ कर सकता है?”

“जैसे अगर इसे यही मालूम हो गया,” मैं कंपकंपाये स्वर में बोली—”कि हमने बृन्दा को ‘डायनिल’ खिलाई थी- तो उसी से हमारी ‘हत्या’ की पूरी योजना का बेड़ा गर्क हो जाएगा। फिर बोलकर भी गया है, मैं कल तक किसी—न—किसी नतीजे पर जरूर पहुंच जाऊंगा।”

“यह बात कहना बहुत आसान है शिनाया।” तिलक राजकोटिया बोला—”परन्तु इस काम को कर दिखाना उतना ही कठिन है। सोचो- वह कैसे इस बात का पता लगायेगा कि रात हमने बृन्दा को ‘डायनिल’ दी थी या फिर हमारा उद्देश्य उसकी हत्या करना है।”

“शायद वो किसी तरह पता लगा ले।”

“लेकिन कैसे?”

मुझे एकाएक कोई जवाब न सूझा।

लेकिन मेरा दिल बार—बार किसी अंजानी आशंका से धड़क-धड़क जा रहा था।

डॉक्टर का डर मेरे मन से निकलने के लिए तैयार न था।

“तुम उस डॉक्टर के बारे में सोचना भी छोड़ दो डार्लिंग।” तिलक राजकोटिया ने मेरे बालों में स्नेह से उंगलियां फिराईं—”उस मद्रासी डॉक्टर को मैं तुमसे काफी पहले से जानता हूं। मुझे मालूम है, कम—से—कम उसके कारण कुछ गड़बड़ नहीं होगी।”

मैं शांत रही।

“फिलहाल तुम बस यह सोचो!” तिलक राजकोटिया बोला—”कि तुमने हत्या की दिशा में अब अगला कदम क्या उठाना है। कम—से—कम इस पूरे प्रकरण में एक बात तो साबित हो चुकी है।”

“क्या?”

“तुमने हत्या करने के लिए ‘डायनिल’ वाला जो फार्मूला सोचा है- वह बिल्कुल सही है। रात एक ‘डायनिल’ खाते ही बृन्दा का जो हश्र हुआ, वह चौंका देने वाला है।”

“आज रात मैं बृन्दा को दो डायनिल दूंगी।”

“दो डायनिल!”

“हां।”

तिलक राजकोटिया के चेहरे पर परेशानी के भाव उभरे।

“दो डायनिल कहीं भारी न पड़ जाएं, एक ही टेबलेट ने अच्छा—खासा तहलका मचा दिया था।”

“कुछ नहीं होगा। उन दो टेबलेट्स की पावर इतनी नहीं होती, जो कोई आदमी मौत के गर्त में समा जाए।”

“यह सोचना तुम्हारा काम है।” तिलक राजकोटिया बोला—”मैं तो अब बस उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं, जिस दिन बृन्दा की मौत होगी और तुम मेरी वाइफ बनोगी। सचमुच वह मेरे लिए बहुत खुशी से भरा दिन होगा।”

“वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं है तिलक साहब!” मैं, तिलक राजकोटिया से थोड़ा और कसकर लिपट गयी—”ज्यादा दूर नहीं है। बस थोड़े दिन की ही और बात है। फिर हमारा हर सपना पूरा होगा- हर सपना!”

तभी एकाएक कमरे में जोर—जोर से तालियां बजने की आवाज गूंज उठी।

“वैरी गुड!” एक बिल्कुल नया स्वर कमरे में गूंजा—”वैरी गुड! काफी अच्छी योजना के पत्ते बिछाये जा रहे हैं। यह शब्द शायद तुम्हारे ही थे कि बिल्ली भी दो घर छोड़कर शिकार करती है- मगर दौलत की भूख ने शायद तुम्हारे तमाम आदर्शों पर पानी फेर डाला है।”

•••
 
मेरे दिल—दिमाग पर भीषण वज्रपात हुआ।

और!

तिलक राजकोटिया तो बिल्कुल इस तरह चौंका, मानो उस आवाज ने उसका हार्टफेल ही कर डाला हो।

हम दोनों तत्काल एक—दूसरे से अलग हुए।

आवाज की दिशा में देखा।

सामने बृन्दा खड़ी थी।

बृन्दा!

जो अपने सम्पूर्ण रौद्र रूप में नजर आ रही थी।

वह बीमार है- ऐसा उस वक्त तो उसके चेहरे से बिल्कुल भी प्रकट नहीं हो रहा था।

“तुम!” बृन्दा को देखते ही तिलक राजकोटिया के चेहरे की रंगत बिल्कुल सफेद झक्क् पड़ गयी—”तुम बैड छोड़कर क्यों खड़ी हो गयीं, डॉक्टर ने तो तुम्हें पूरी तरह आराम करने की हिदायत दी हुई है।”

“आराम करने की हिदायत!” फिर वो धीरे—धीरे कदम रखती हुई अंदर शयनकक्ष में दाखिल हुई—”और शायद मेरी इसी हिदायत से तुम्हे खुलकर रंगरलियां मनाने का मौका मिल गया है। गुलछर्रे उड़ाने का मौका मिल गया है। पति होने का अच्छा कर्तव्य निभा रहे हो तिलक साहब!” बृन्दा गुर्रायी—”पत्नी बीमार पड़ गयी—तो एक नई सहेली बना ली! इतना ही नहीं- पत्नी को रास्ते से हटाने की योजना भी बना बैठे। वैरी गुड! अगर तुम्हारे जैसे अहसानफरामोश पति इस सारी दुनिया में हो जाएं, तो औरतें शायद शादी जैसे पवित्र रिश्ते पर यकीन करना ही बंद कर देंगी।”

बृन्दा ने एक बार फिर उसका मखौल उड़ाते हुए जोर—जोर से ताली बजायी।

तिलक राजकोटिया की गर्दन झुक गयी।

जबकि!

मेरे शरीर में काटो तो खून नहीं।

बृन्दा इस प्रकार भी हम दोनों को रंगे हाथ पकड़ लेगी, मैंने सोचा भी न था।

“और तुम!” बृन्दा मेरी तरफ घूमी—”शिनाया शर्मा! सैंकड़ों दिलों की धड़कन! खूबसूरती का अज़ीमुशान नमूना! तुमने भी सहेली होने का बड़ा अच्छा फर्ज निभाया है। ‘डायनिल’ खिला—खिलाकर मार डालना चाहती थीं मुझे! सचमुच हत्या करने का बड़ा नायाब तरीका सोचा तुमने।”

“सॉरी!” मैं नजरें झुकाकर धीमीं आवाज में बोली—”सचमुच मुझसे भूल हुई है बृन्दा!”

मैं बुरी तरह डर गयी थी।

मुझे लग रहा था—कही बृन्दा गुस्से में मेरा कॉलगर्ल वाला राज न उगल दे।

“भूल नहीं।” बृन्दा दहाड़ी—”यह फितरत है तुम्हारी बद्जात लड़की- फितरत! शुरू से ही दूसरे के हक पर डाका डालने का शौक रहा है तुम्हें। तुम रण्डी हो- सिर्फ रण्डी!”

“बृन्दा!” मैं चिल्लाई।

“चीखो मत।” बृन्दा मुझसे कहीं ज्यादा बुलंद आवाज में चिंघाड़ी-“तुम्हारी करतूतों का चिट्ठा तुम्हारे चीखने से दब नहीं जाएगा। तुम्हारी हैसियत ‘नाइट क्लब’ की एक कॉलगर्ल से ज्यादा नहीं है। और एक बात तुम दोनों अच्छी तरह कान खोलकर सुन लो।”

माई गॉड।

उसने गुस्से में मेरी असलियत उगल ही दी थी।

लेकिन इस तरह उंगली थी, जो तिलक राजकोटिया कुछ भी न समझ पाया था।

बृन्दा उस समय साक्षात् रणचण्डी नजर आ रही थी।

बेहर खूंखार!

“अगर तुम दोनों यह सोचते हो!” बृन्दा ने खतरनाक लहजे में कहा—”कि तुम मुझे अपने रास्ते से हटाकर खुद शादी कर लोगे, तो यह तुम्हारी बहुत बड़ी गलतफहमी है। तुम्हारा यह सपना कभी पूरा होने वाला नहीं है। मैं अभी पुलिस को फोन करके तुम्हारी योजना के बारे में बताती हूं।”

“पुलिस!”

हम दोनों के हाथों से तोते उड़ गये।

“हां- पुलिस!”

“नहीं- नहीं।” तिलक राजकोटिया तुरन्त बृन्दा की तरफ बढ़ा—”तुम पुलिस को फोन नहीं करोगी।”

“पीछे हटो तिलक!” बृन्दा ने तिलक राजकोटिया को जोर से पीछे धक्का दिया—”तुम अपनी कोई भी बात मुझसे मनवाने का अधिकार खो चुके हो। अब पुलिस को फोन करने से मुझे दुनिया की कोई भी ताकत नहीं रोक सकती।”

हालातों ने सचमुच एकाएक बहुत खौफनाक रूप धारण कर लिया था।

मैं पलक झपकते ही भांप गयी, बृन्दा अब नहीं रुकेगी। थोड़ी ही देर पहले जो दृश्य बृन्दा ने देखा था, उसे देखकर कोई भी पत्नी भड़क सकती है।

और फिर वही हुआ- बृन्दा मुड़ी तथा फिर अदितीय फुर्ती के साथ पुलिस को टेलीफोन करने के लिए अपने शयनकक्ष की तरफ झपटी।

मेरे होश गुम!

“तिलक साहब!” मैं अपनी पूरी ताकत से चिल्ला उठी—”पकड़ो इसे- पकड़ो। अगर इसने पुलिस को फोन कर दिया, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे।”

तिलक राजकोटिया के साथ—साथ मैं भी बृन्दा को पकड़ने के लिये बिल्कुल आंधी—तूफान की तरह उसके पीछे झपटी।

•••
 
परन्तु!

बृन्दा में न जाने कहां से फुर्ती आ गयी थी।

उस वक्त उसकी चीते जैसी फुर्ती को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह इतनी बीमार भी है, जो डॉक्टर ने उसे बिस्तर तक से न हिलने की हिदायत दी हुई है।

“बृन्दा!” पीछे से तिलक राजकोटिया बदहवासों की तरह गला फाड़कर चिल्ला रहा था—”रुक जाओ बृन्दा।”

उसके पैरों में मानों पंख लगे हुए थे।

हम दोनों में—से कोई भी उसे पकड़ पाने में सफल होता, उससे पहले ही बृन्दा दनदनाती हुई अपने शयनकक्ष में दाखिल हो गयी।

“बेवकूफी मत करो बृन्दा!” तिलक राजकोटिया पुनः चीखा।

“बेवकूफी तो मैं कर चुकी हूं, तुम्हारे जैसे इंसान से शादी करके।”

बृन्दा मुड़ी।

फिर उसने अपने शयनकक्ष का दरवाजा भड़ाक की तेज आवाज के साथ बंद कर लेना चाहा।

मगर तभी झपटकर तिलक राजकोटिया ने अपनी टांग दरवाजे के दोनों पटों के बीच फंसा दी।

“पीछे हटो।”

बृन्दा ने वहीं रखा छोटा—सा मिट्टी का फ्लॉवर पॉट पूरी ताकत से तिलक राजकोटिया के मुंह पर खींच मारा।

तिलक राजकोटिया चीखता हुआ पीछे हटा।

उसी पल उसने भीषण आवाज के साथ दरवाजे के दोनों पट बंद कर लिये और अंदर से सांकल भी लगा ली।

•••

बृन्दा अब अपने शयनकक्ष में बंद थी। इसमें कोई शक नहीं- बृन्दा ने उस क्षण हमारे जबरदस्त तरह से होश उड़ाये हुए थे।

हाथ—पैर सन्न थे।

मानों किसी ने उन्हें डीप फ्रीजर में जमा दिया हो।

“बृन्दा!” तिलक राजकोटिया ने जोर—जोर से दरवाजा भड़भड़ाया—”प्लीज दरवाजा खोलो। पुलिस को टेलीफोन करने की बेवकूफी मत दिखाओ।”

“जो कुछ हुआ है बृन्दा!” मैंने भी जोर—जोर से दरवाजा पीटा—”मैं उसके लिये तुमसे माफी मांगती हूं। मैं अभी यह पैंथ हाउस छोड़कर चली जाऊंगी।”

लेकिन बृन्दा ने दरवाजा न खोला।

तभी अंदर से कुछ खड़—खड़ की आवाज हुई।

“तिलक साहब- लगता है वो फोन कर रही है।” मैं बौखलाकर बोली—”जल्दी कुछ करो। कहीं वो फोन करने में कामयाब न हो जाये।”

तिलक राजकोटिया ने इधर—उधर देखा।

दरवाजा तोड़ना आसान न था।

वह मजबूत शीशम की लकड़ी का बना था।

फौरन उसकी दृष्टि कांच की एक काफी बड़ी खिड़की पर जा टिकी।

“बस एक ही तरीका है।” तिलक राजकोटिया बोला—”खिड़की का शीशा तोड़कर अंदर घुसा जाये!”

“तो फिर सोच क्या रहे हो।” मैं चिल्लाई—”जल्दी करो।”

तिलक राजकोटिया ने मिट्टी का वही फ्लॉवर पॉट उठा लिया—जिसे बृन्दा ने उसके ऊपर अपनी पूरी शक्ति से खींचकर मारा था।

उसने एक बार उस गमले को अपने हाथों में तोला।

वह काफी वजनी था और पक्की मिट्टी का बना था।

बृन्दा के उसके ऊपर खींचकर मारने के बावजूद वह बहुत ज्यादा टूटा नहीं था।

“एक तरफ हटो।”

मैं तुरन्त खिड़की से अलग हट गयी।

उसी क्षण तिलक राजकोटिया ने फ्लॉवर पॉट को अपनी पूरी ताकत के साथ खिड़की पर देकर मारा।

टन न न!

कांच टूटने की बहुत जोरदार आवाज हुई।

कांच की छोटी—छोटी किर्चियां उछलकर इधर—उधर जा गिरीं।

“जल्दी करो।”

तिलक राजकोटिया अब खिड़की की तरफ दौड़ा।

फिर उसने टूटे हुए कांच में हाथ देकर अंदर की तरफ से खिड़की की सिटकनी खोल डाली।

खिड़की के दोनों पट लहलहाकर खुलते चले गये।

तत्काल हम दोनों खिड़की के रास्ते छलांग लगाकर शयनकक्ष में दाखिल हुए।

बृन्दा सामने ही खड़ी थी।

सामने!!!! जहां एक छोटी—सी टेबिल पर टेलीफोन इंस्टूमेंट रखा रहता है।

•••
 
रिसीवर उस वक्त बृन्दा के हाथ में था।

वह जल्दी—जल्दी कोई नम्बर डायल कर रही थी। उसे नम्बर डायल करने में भी इसलिये इतनी देर हो गयी, क्योंकि उसने पहले डायरेक्ट्री में ‘पुलिस’ का टेलीफोन नम्बर तलाश किया था।

डायेरक्ट्री वहीं टेबिल पर खुली पड़ी थी।

मैंने तत्काल आगे बढ़कर बृन्दा के हाथ से रिसीवर झपट लिया और उसे जोर से क्रेडिल पर पटका।

“बद्जात!” बृन्दा का हाथ मेरी तरफ उठा—”मेरे घर में घुसकर मेरे साथ ही ऐसी हरकत करती हैं।”

लेकिन बृन्दा का हाथ मेरे गाल पर पड़ता, उससे पहले ही तिलक राजकोटिया ने उसके हाथ को पकड़ लिया था।

फिर तिलक राजकोटिया का एक बहुत झन्नाटेदार थप्पड़ बृन्दा के मुँह पर पड़ा।

बृन्दा की चीख निकल गयी।

उसकी आंखों के गिर्द रंग—बिरंगे तारे नाच उठे।

“पिछले एक साल में शायद तुम यह भूल गयी हो बृन्दा!” तिलक राजकोटिया गुस्से में बोला—”कि तुमसे कहीं पहले यह घर मेरा है।”

तिलक राजकोटिया ने वहीं दवाइयों की ट्राली पर रखा सब्जी काटने वाला चाकू उठा लिया।

चाकू देखते ही बृन्दा सूखे पत्ते की तरह कांपी।

“तिलक- य... यह तुम क्या कर रहे हो?” बृन्दा के जिस्म का एक—एक रोआं खड़ा हो गया।

“अभी शायद तुम कुछेक दिन और जिंदा रह जातीं।” तिलक राजकोटिया दांत किटकिटाता हुआ बोला—”लेकिन तुम्हारी आज की इस हरकत ने तुम्हें बिल्कुल मौत के दहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। तुम्हारा जिंदा रहना अब ठीक नहीं होगा बृन्दा, क्योंकि तुम हमारी योजना से वाकिफ हो गयी हो।”

बृन्दा का पूरा शरीर सफेद पड़ गया।

मैंने खुद उसकी आंखों में साफ—साफ मौत की छाया मंडराते देखी।

न जाने क्यों उस क्षण मुझे बृन्दा पर तरस आया।

शायद वो सहेली थी मेरी- इसीलिये मेरे अन्दर से वो भावनायें उपजी थीं। हालांकि उसकी मौत के बिना अब मेरी भी गति नहीं थी।

वह जितना तिलक राजकोटिया के लिये खतरा थी, उतना ही मेरे लिये थी।

फिर उसकी टेलीफोन वाली घटना से यह भी साबित हो गया था कि वह हम दोनों के खिलाफ किस हद तक जा सकती है।”

“न... नहीं।” बृन्दा गिड़गिड़ा उठी—”नहीं तिलक- मुझे मत मारो।”

“मरना तो तूने अब है।” तिलक राजकोटिया के बहुत दृढ़ता से भरे शब्द मेरे कानों में पड़े—”और आज की रात ही मरना है। क्योंकि अगर तू जिंदा रही तो फिर हम दोनों में—से कोई जिंदा नहीं बचेगा।”

“लेकिन... ।”

“अब कोई बहस नहीं।”

तिलक राजकोटिया का चाकू चाला हाथ एकाएक छत की तरफ उठा और बिजली की भांति लपलपाता हुआ बृन्दा की तरफ झपटा।

“नहीं तिलक साहब!” मुझे न जाने क्या हुआ, मैंने फौरन दौड़कर तिलक राजकोटिया का चाकू वाला हाथ पकड़ लिया—”नहीं! इसे मत मारो।”

तिलक राजकोटिया सख्त हैरानी से मेरी तरफ देखता रह गया।

•••

और!

आश्चर्य की कड़कड़ाती हुई बिजली बृन्दा के दिलो—दिमाग पर भी गिरी।

“यह तुम क्या कह रही हो शिनाया!” तिलक राजकोटिया अचरजपूर्वक बोला—”शायद तुम जानती नहीं हो- अगर हमने आज रात इसे जिंदा छोड़ दिया, तो क्या होगा।”

“मैं अच्छी तरह जानती हूं कि क्या होगा। मैं इस जिंदा छोड़ने के लिये नहीं कह रही तिलक साहब।”

“क... क्या मतलब?”

मेरा रंग उस क्षण पल—पल बदल रहा था।

“तिलक साहब!” मैं चहलकदमी—सी करती हुई तिलक राजकोटिया के और बृन्दा के बीच में आ गयी—”आप शायद भूल रहे हैं, हमारी योजना क्या थी! मैं सिर्फ इसे चाकू से मारने के लिए मना कर रही हूं। क्योंकि अगर आपने इसकी चाकू से हत्या की- तो यह बेहद संगीन जुर्म होगा। कोल्ड ब्लाडिड मर्डर होगा। उस हालत में मुम्बई पुलिस आपको फौरन ही इसकी हत्या के इल्जाम में अरेस्ट कर लेगी। जबकि...।”

“जबकि क्या?”

तिलक राजकोटिया ने विस्फारित नेत्रों से मेरी तरफ देखा।

“जबकि अगर हम उसी योजना के तहत इसकी हत्या करेंगे, तो किसी को कानों—कान भी पता नहीं चल पायेगा कि इसकी हत्या हुई है।”

“ओह माई गॉड!” तिलक राजकोटिया के मुंह से सिसकारी छूटी—”मैं गुस्से में कितनी बड़ी बेवकूफी करने जा रहा था।”

“शुक्र है- जो गुस्से में आपने चाकू चला नहीं दिया।”

तिलक राजकोटिया ने फौरन चाकू वापस मेडिसिन की ट्राली पर इस तरह रखा, मानो उसके हाथ में कोई जिंदा सांप आ गया हो।

बृन्दा सिर से पांव तक पसीनों में लथपथ हो उठी।

“अब क्या करना है?” तिलक राजकोटिया बोला।

“सबसे पहले कोई मजबूत रस्सी ढूंढो और इसे किसी कुर्सी पर कसकर बांध दो।”

“मैं रस्सी अभी लेकर आता हूं।”

तिलक राजकोटिया तुरन्त रस्सी लाने के लिये शयनकक्ष से बाहर निकल गया।

“शिनाया!” बृन्दा गुर्रायी—”यह तुम ठीक नहीं कर रही हो।”

“इस बात का फैसला अब वक्त करेगा।” मैं हंसी—”कि क्या ठीक है और क्या गलत!”

तभी बृंदा चाकू की तरफ झपटी।

लेकिन वह चाकू को छू भी पाती, उससे पहले ही मेरी लात अपनी प्रचण्ड शक्ति के साथ उसके पेट में लगी।

वह बिलबिला उठी।

उसी पल मैंने उसके मुंह पर तीन—चार झन्नाटेदार तमाचे भी जड़ दिये।

वो चीखते हुए पीछे गिरी।

“तुम शायद भूल गयी हो बृन्दा!” मैं विषैले स्वर में बोली—”मैं हमेशा जीतती आयी हूं- हमेशा! और इस बार भी मैं ही जीतूंगी।”

तभी नायलोन की मजबूत रस्सी लेकर तिलक राजकोटिया वहां आ पहुंचा।

•••
 
जल्द ही बृन्दा के हाथ—पैर एक कुर्सी के साथ बहुत कसकर बांध दिये गये थे।

तिलक राजकोटिया ने उसके हाथ—पैर इतने ज्यादा कसकर बांधे थे, जो वह एक इंच भी इधर—से—उधर न सरक सके।

बृन्दा की अब बुरी हालत थी।

उसका पूरा शरीर पसीनों से तर—ब—तर हो रहा था और वह डर के मारे कांप—कांप जा रही थी।

उसकी आंखों में जबरदस्त खौफ था।

“त... तुम लोग क्या करने जा रहे हो?” वो भयभीत स्वर में बोली।

“देखती रहो, आज क्या होता है!”

“देखो- में फिर कहती हूं।” बृन्दा शुष्क स्वर में बोली—”यह सब तुम ठीक नहीं कर रहे हो। अगर तुमने मेरी हत्या की, तो तुम दोनों में—से भी कोई नहीं बचेगा। तुम्हारी सारी उम्र जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगी।”

“हमें कुछ नहीं होगा बृन्दा डार्लिंग।” तिलक राजकोटिया हंसा—”सच तो ये है- किसी को पता भी नहीं चलने वाला है कि तुम्हारी हत्या की गयी है। तुम एक सामान्य मौत मरोगी- बिल्कुल सामान्य मौत!”

“यह तुम्हारी भूल है।” बृन्दा दहाड़ी—”हर चालाक अपराधी जुर्म करने से पहले यही समझता है कि कानून उसे कभी नहीं पकड़ पायेगा- वो कभी कानून के शिकंजे में नहीं फंसेगा। मगर होता इससे बिल्कुल उल्टा है। होता ये है कि इधर अपराधी, अपराध करता है और उधर कानून का फंदा उसके गले में आकर कस जाता है।”

तिलक राजकोटिया धीरे से मुस्करा दिया।

उसकी मुस्कान बता रही थी, उसे मेरी योजना पर जरूरत से कुछ ज्यादा ही भरोसा था।

तभी मैं अपने शयनकक्ष से बीस ‘डायनिल’ टेबलेट और नींद की गोलियां ले आयी।

“यह बीस टेबलेट्स हैं बृन्दा डार्लिंग!” मैंने वह बीस टेबलेट्स बृन्दा को दिखाई—”लेकिन अब यही बीस टेबलेट्स तुम्हारी मौत का कारण बनेंगी।”

फिर मैं चहलकदमी—सी करती हुई मेडीसिन की ट्रोली की तरफ बढ़ी।

वहां पानी का जग और कांच का एक गिलास रखा था।

मैंने वह ट्वन्टी टेबलेट्स गिलास में डाल दीं और फिर उस गिलास को पानी से ऊपर तक लबालब भरा।

देखते—ही—देखते वह सभी गोलियां गिलास के पानी में अच्छी तरह घुल गयीं।

•••
 
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