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Thriller नाइट क्लब

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कुल मिलाकर धीरे—धीरे हमारा हनीमून का सारा मजा अब किरकिरा होना शुरू हो गया था।

शुरू के कुछेक दिनों में हमने जो हनीमून का आनन्द ले लिया था, बस वह ले लिया था। अब तो अजीब—सी दहशत मुझे हर वक्त अपने इर्द—गिर्द मंडराती महसूस होती थी। इसके अलावा मेरा यह विश्वास भी दृढ़ होता जा रहा था कि सरदार करतार सिंह के कारण भी कुछ—न—कुछ गड़बड़ जरूर होगी।

वह सरदार हंगामा करके रहेगा।

इसी प्रकार दहशत के माहौल में हम दोनों के सिंगापुर में तीन दिन और गुजर गये।

मैंने तिलक राजकोटिया से किसी दूसरी लॉज में शिफ्ट होने का आग्रह भी किया, लेकिन इसके लिए वो तैयार न हुआ।

वह उसकी खास पसंदीदा लॉज थी।

उस लॉज में नये जोड़ों के मनोरंजन के लिए अक्सर नये—नये प्रोग्राम भी होते रहते थे।

ऐसे ही एक बार वहां एक ‘डांस पार्टी’ का आयोजन किया गया।

उस ‘डांस पार्टी’ में तिलक राजकोटिया और मैंने भी हिस्सा लिया।

एक बात कन्फर्म थी।

कम—से—कम तिलक राजकोटिया अब पूरी तरह चिन्तामुक्त था।

और फोन वाली बात तब तक वो शायद भुला चुका था।

हम दोनों डांसिंग फ्लोर पर एक—दूसरे की बांह—में—बांह डालकर अन्य जोड़ों के साथ थिरकने लगे।

“मैं तुमसे फिर कहूंगी तिलक!” मैं थिरकते हुए उसके कान में बहुत धीरे से फुसफुसाई—”हमें यह लॉज छोड़कर किसी दूसरी जगह शिफ्ट हो जाना चाहिए।”

“यह तुम्हें क्या हो गया है शिनाया!” तिलक राजकोटिया झुंझलाकर बोला—”पिछले तीन दिन से तुम यही एक बात कहे जा रही हो कि हमें यह लॉज छोड़ देनी चाहिए। आखिर तुम्हें यहां रहने में क्या परेशानी है, तमाम सुविधाएं तो इस लॉज में मौजूद हैं।”

“मैं जानती हूं, इस लॉज में काफी सुविधाएं हैं।” मैं बोली—”लेकिन अब यहां मेरा दिल घबराने लगा है।”

“क्यों?”

“म... मुझे लगता है,” मैं थोड़े भयभीत स्वर में बोली—”अगर हम यहां कुछ दिन और ठहरे, तो हमारे साथ जरूर कोई—न—कोई घटना घट जाएगी।”

तिलक राजकोटिया हंस पड़ा।

हंसते हुए ही उसने एक बांह मेरी कमर के गिर्द लपेट दी।

हम दोनों के कदम थिरकते रहे।

“तुम हंस क्यों रहे हो?” मैं बोली।

“माई डेलीशस डार्लिंग!” तिलक राजकोटिया ने मेरे गाल का पुनः प्रगाढ़ चुम्बन लिया—”तुम्हारी बातें ही ऐसी हैं। जरा सोचो- हिन्दुस्तान से इतनी दूर एक अंजान—सी जगह पर हमारे साथ क्या घटना घटेगी, यहां हमारा कौन दुश्मन हो सकता है।”

“मुझे उस सरदार से डर लगता है।”

“सरदार करतार सिंह से?”

“वही।”

“डार्लिंग- उस बेचारे से क्या डरना! वह तो खुद अपनी किस्मत के हाथों सताया हुआ है।”

“तुम कुछ भी कहो- मुझे तो वह कोई ढोंगी मालूम होता है।” मैं अपनी बात पर दृढ़ थी—”देखा नहीं, वह मुझे हरदम किस तरह घूरता रहता है। मानों मुझे आंखों—ही—आंखों में निगल जाएगा।”

“यह तो अच्छी बात है।” तिलक पुनः हंसा— “मुमकिन है कि वह तुम्हारा कोई पुराना आशिक हो।”

“बेकार की बात मत करो।” मैं गुर्रा उठी—”मैं साफ कहे देती हूं, मैं इस लॉज के अंदर अब और नहीं ठहरूंगी।”

“ओ.के. बाबा! कल हम कोई अच्छी—सी लॉज देखने चलेंगे।”

“रिअली?” मैं प्रफुल्लित हो उठी।

“रिअली।”

“ओह तिलक- तुम सचमुच कितने अच्छे हो।” मैं डांस करते—करते तिलक राजकोटिया से कसकर लिपट गयी।

वह मेरी बड़ी जीत थी।

आखिरकार मैंने तिलक राजकोटिया को वह लॉज छोड़ देने के लिए तैयार कर ही लिया था।

हम दोनों और भी काफी देर तक दूसरे जोड़ों के साथ वहां डांस करते रहे।

तभी एकाएक मेरी निगाह सरदार करतार सिंह पर पड़ी। उसने लगभग तभी उस डांसिंग हॉल में कदम रखा था।

सरदार को देखते ही मेरे शरीर में सरसराहट दौड़ गयी।

उस हरामजादे की निगाह डांसिंग हॉल में आने के बाद मेरी तलाश में ही इधर—उधर भटकनी शुरू हो गयी थी, फिर उसने जैसे ही मुझे देखा, उसकी निगाह फौरन मेरे ऊपर ही आकर ठहर गयी।

सबसे बड़ी बात ये थी कि आज वो ज्यादा शराब पिये हुए भी नहीं था।

उसके कदम भी नहीं लड़खड़ा रहे थे।

उसकी आंखों को देखकर आज मेरे मन में न जाने क्यों और भी ज्यादा दहशत पैदा हुई।

सरदार करतार सिंह की आंखों में आज मेरे लिये वो अजनबीपन नहीं था, जो हमेशा होता था।

उनमें आज विलक्षण चमक थी।

मुझे लगा- सरदार मेरी असलियत से वाफिक हो गया है। मैं डांस करना भूल गयी।

•••
 
अर्द्धरात्रि का समय था।

तिलक राजकोटिया उस वक्त बहुत गहरी नींद में था और कमरे के अंदर उसके मद्धिम खर्राटे गूंज रहे थे।

मैं मानो उसी मौके की तलाश में थी।

मैं बहुत धीरे से बिस्तर छोड़कर उठी।

बिल्कुल निःशब्द।

उस समय मेरी हालत एकदम चोरों जैसी थी।

मैंने एक नजर फिर तिलक राजकोटिया को देखा, जो दीन—दुनिया से बेखबर सोया हुआ था और फिर दबे पांव कमरे से बाहर निकल गयी।

सरदार करतार सिंह लॉज के दूसरे माले पर ठहरा था। मैं दूसरे माले की तरफ ही बढ़ी।

सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंची।

थोड़ी देर बाद ही मैं सरदार के कमरे के सामने खड़ी थी। इस बीच मैंने इस बात का खास ख्याल रखा था कि मैं किसी की नजरों में न आऊं।

मैंने दरवाजा खटखटाया।

“कौन है?” तुरंत मुझे अंदर से सरदार की भारी—भरकम आवाज सुनाई पड़ी।

उसके बाद सिटकनी गिरने और दरवाजा खुलने की आवाज आयी। अगले ही पल सरदार करतार सिंह मेरी नजरों के सामने खड़ा था। उसने चैक की लुंगी पहन रखी थी और बाजूदार बनियान पहना हुआ था। उसके लम्बे—लम्बे केश खुले हुए कंधों पर पड़े थे। उस वक्त वो टर्बन (पगड़ी) नहीं बांधे था।

मुझे देखकर वो बिल्कुल भी न चौंका।

“ओह शिनाया शर्मा।” करतार सिंह बोला—”आओ, अंदर आओ।”

मैं बड़ी स्तब्ध—सी मुद्रा में कमरे के अंदर दाखिल हुई।

इस बात ने मुझे काफी अचम्भित किया कि मेरे इतने रात में आने के बावजूद भी सरदार जरा विचलित नहीं था।

“मैं जानदा सी, तुसी आज रात यहां जरूर आओगी।” सरदार बोला—”सच तो ए है कि इस वक्त मैं जागकर त्वाडा ही इंतजार करदा पयासी।”

“मेरा इंतजार कर रहे थे?” मेरे दिल—दिमाग पर भीषण बिजली गड़गड़ाकर गिरी।

“हां।”

सरदार करतार सिंह ने आगे बढ़कर दरवाजा बंद किया और सिटकनी चढ़ाई।

फिर वो पलटा।

मैं अभी भी बेहद कौतुहल नजरों से उसे ही देख रही थी।

“क्या तुम्हें मालूम था कि मैं आज रात यहां आने वाली हूं?”

“हां- मैंन्नू मलूम सी।” सरदार रहस्य की बढ़ोत्तरी करता हुआ बोला—”दरअसल जिस तरह तुस्सी मेरी आंखा विच पढ़ लित्ता सी कि मैं त्वाडी असलियत नू जाण गया हूँ, उसी तरह अस्सी भी त्वाडी आंखा विच ऐ पढ़ लित्ता सी कि तुस्सी इस राज़ नू जाण गयी हो कि मैं त्वाडी असलियत नू जाण गया हूं। और ए पता लगने के बाद मैं जानता था कि तुसी मैनूं अकेले विच मिलने दी कोशिश करोगी। वैसे भी ऐसी खामोश मुलाकात के लिये रात से बढ़िया टाइम और क्या हो सकदा सी।”

“दैट्स गुड!” मैंने मुक्त कण्ठ से करतार सिंह की प्रशंसा की—”बहुत अच्छे! यानि शराब ने अभी तुम्हारे दिमाग के स्नायु तंत्रों को उतना नहीं घिस दिया है, जितना लोग समझते हैं। तुम्हारा दिमाग अभी भी पहले की तरह ही काफी पैना है और उसमें सोचने—समझने की अच्छी सलाहियतें मौजूद हैं।”

“इवे विच ते कोई शक ही नहीं कि मेरे दिमाग दा पैनापन बरकरार है।” करतार सिंह बोला—”अलबत्ता ज्यादा शराब पीने की वजह से मेरी याददाश्त कभी—कभी धुंधलाने लगदी है।”

“जैसे पिछले कुछ दिनों से धुंधला रही थी।”

“हां। बैठ जाओ।”

“नहीं।” मैंने बैठने का उपक्रम नहीं किया—”मैं ऐसे ही ठीक हूं।”

मेरी निगाहें पूरी तरह सरदार के चेहरे पर टिकी थीं।

“सबसे पहले तो तुस्सी अपने ब्याह दी मुबारका कबूल करो।” सरदार करतार सिंह अपने केशों का जूड़ा बांधता हुआ बोला—”चंगी आसामी तलाश कित्ती है। मुबारकां हो, बहोत—बहोत मुबारकां।”

“शटअप!” मैं गुर्रा उठी—”जरा तमीज से बात करो। तुम शायद भूल रहे हो, वह मेरे हसबैण्ड हैं और मुम्बई शहर के एक इज्जतदार आदमी हैं। रसूख वाले आदमी हैं।”

“इज्जत वाला बंदा ए- तभी तो मैं पा जी नू चंगी आसामी कह रहा हूं। वरना पा जी नू कौन पूछदा सी, कौन ऐनू घास डालदा सी?”

“करतार सिंह! तुम बड़ी अजीब ट्यून में बात कर रहे हो।” मेरी आवाज में नागवारी के चिन्ह थे—”मैंने तिलक राजकोटिया को कोई जबरदस्ती नहीं फांसा है। बल्कि हम दोनों ने प्रेम विवाह किया है। और प्रेम विवाह के मायने तो तुम अच्छी तरह समझते ही होओगे। प्रेम विवाह एक भावनात्मक सम्बन्ध है। जिसका जन्म दोनों तरफ की अण्डरस्टेंडिंग के बाद ही होता है।”

“दोनों तरफ की अण्डरस्टेंडिंग?”

“हां।”

“त्वाडी तिलक राजकोटिया नाल किस चीज दे प्रति अण्डरस्टेंडिंग थी? उसके रोकड़े नाल—नावे वाली?”

“मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझती।”

करतार सिंह सामने पड़ी एक कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठ गया।

“ठीक ए।” करतार सिंह गहरी सांस लेकर बोला—”तुसी मेरे दूजे सवाल दा जवाब दो।”

मैं खामोश रही।

“क्या तिलक राजकोटिया इस गल नू जानदा सी कि त्वाडा अतीत क्या है? तुसी ‘नाइट क्लब’ दी एक कॉलगर्ल रह चुकी हो?”

मेरे मुंह से शब्द न फूटा।

“क्या इस सवाल दा जवाब देना भी तुम जरूरी नहीं समझदीं?”

“वो इस रहस्य से वाकिफ नहीं है।” मैं फंसे—फंसे स्वर में बोली।

“फिर भी तुसी यह कहती हो,” करतार सिंह बोला—”कि वो त्वाडे वास्ते एक चंगी आसामी नहीं है, एक तगड़ी आसामी नहीं है।”

मैं कुछ न बोली।

सच तो ये है, मेरा दिमाग उस समय काफी तेज स्पीड से चल रहा था।

एकाएक सरदार करतार सिंह नाम की जो मुश्किल मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी थी, मैं उस मुश्किल का कोई हल सोच रही थी।

•••
 
सरदार करतार सिंह ने कुर्सी पर बैठे—बैठे सामने टेबिल पर रखी शराब की बोतल खोल डाली और फिर थोड़ी—सी शराब गिलास के अंदर पलटी।

उसके बाद फ्रीज में से निकालकर दो आइस क्यूब भी उसने गिलास में डाले।

पैग तैयार हो गया।

“क्या तुसी बी एक पैग लोगी?” करतार सिंह ने मेरी तरफ देखकर पूछा।

“नहीं।”

“क्यों- तुसी पहले तो खूब पीन्दी सी। पहले तो शराब त्वाडा सबसे चंगा शौक सी।”

“मेरी फिलहाल इच्छा नहीं है।”

“या फिर एक शरीफ बंदे दी बीवी बनने के साथ—साथ शराब नू पीना वी छोड़ दित्ता ए। इस तरह दे सारे नामुराद शौका नाल तौंबा कर ली है। एक—आध पैग ले लो, पुराने दोस्तां नाल कदो—कदो यादें ताजा कर लेनी चाहिए।”

करतार सिंह ने एक—दूसरे बड़े खूबसूरत कटिंग वाले गिलास में थोड़ी—सी शराब और पलट दी तथा उसमें एक आइस क्यूब भी डाल दिया।

“लो- चियर्स!”

“मैंने कहा न, मेरी इच्छा नहीं है।”

“ओ.के.।”

करतार सिंह ने ज्यादा बहस नहीं की।

उसने गिलास वापस वहीं टेबिल पर रख दिया।

फिर वो पहले की तरह कुर्सी की पुश्त से पीठ लगाकर बैठ गया और अपने गिलास में से शराब का एक घूंट चुसका।

“मैं त्वानु एक गल बहुत साफतौर पर बता देना चाहता हूं शिनाया शर्मा!” करतार सिंह बोला।

“क्या?”

“कम—से—कम मेरी वजह से त्वानु ज्यादा परेशान होने दी जरूरत नहीं है। मैं त्वाडे राज ते जरूर वाकिफ हूं, लेकिन ए राज हमेशा मेरे दिल विच ही रहेगा। ए गल कभी वी मेरी जुबान ते तिलक राजकोटिया नूं पता नहीं लगेगी।”

मैंने करतार सिंह की उन बातों की तरफ कोई खास ध्यान न दिया।

मेरी आंखें उसके कमरे का मुआयना करने में तल्लीन थीं।

वो काफी बड़ा कमरा था और हनीमून लॉज के बिल्कुल बैक साइड में बना हुआ था। सामने की तरफ एक छोटा—सा टैरेस था, जो एक बिल्कुल उजाड़ बियाबान इलाके की तरफ खुलता था और जहां दूर—दूर तक सन्नाटा था। मैं धीरे—धीरे टहलती हुई टैरेस पर पहुंची।

फिर मैंने बियाबान इलाके की तरफ देखा।

रात के समय उस उजाड़ बियाबान इलाके का सन्नाटा और भी गहरा दिखाई पड़ रहा था।

“क्या देख रही हो?” पीछे से करतार सिंह की आवाज मेरे कानों में पड़ी।

“कुछ नहीं।”

तभी सरदार करतार सिंह भी शराब का गिलास हाथ में पकड़े—पकड़े वहां टेरेस पर आ गया।

उसके मुंह से शराब के भभकारे छूट रहे थे।

“तुसी मेरी गल सुनी।” सरदार करतार सिंह पुनः बोला—”कम—से—कम मेरी वजह तों त्वानु ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है।”

“मैं जानती हूं, इस बात को बार—बार दोहराओ मत।”

“क्या जानती हो?”

“यही कि तुम भले आदमी हो।” मैं उसकी आंखों में झांकते हुए बोली—”शरीफ आदमी हो। तुम्हारे कारण मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। लेकिन फिर भी एक भयंकर गलती तो तुमसे हो ही चुकी है करतार सिंह।”

“क्या?”

“यही कि तुम मुझे पहचान चुके हो। अगर शराब ने तुम्हारे दिमाग को वाकई घिस दिया होता, तो तुम्हारे हक में बहुत अच्छा रहता। तब शायद तुम्हारे ऊपर वह आफत न आती, जो अब आने वाली है। मैं जानती हूं, तुम अपनी जबान के पक्के हो। लेकिन फिर भी मैं कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती।”

“की मतलब?”

“दरअसल तिलक राजकोटिया को मैंने बड़ी मुश्किल से हासिल किया है करतार सिंह!” मैं धीरे—धीरे उसकी तरफ बढ़ी—”इसमें कोई शक नहीं कि मैंने दौलत की खातिर ही उससे शादी की। मैं नाइट क्लब की जिंदगी से तंग आ चुकी थी, मुझे दौलत चाहिए थी, ढेर सारी दौलत! और वह दौलत मुझे तिलक के पास दिखाई दी। करतार सिंह,तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं, उसे तथा उसकी दौलत को हासिल करने के लिए मैं एक खून कर चुकी हूं।”

“दाता! तुसी एक खून वी कर चुकी हो?”

“हां।” मैं बहुत दृढ़ शब्दों में बोली—”एक खून! जरा सोचो, जिस आदमी को हासिल करने के लिए मैं एक खून कर सकती हूं, तो वह सदा मेरी मुट्ठी में रहे,इसके लिए मैं एक खून और नहीं कर सकती।”

“क... की कहना चांदी हो तुम?”

मैं एकदम चीते की भांति सरदार करतार सिंह की तरफ झपट पड़ी।

इससे पहले कि करतार सिंह को मेरे खतरनाक इरादों की जरा भी भनक मिल पाती, मैंने नीचे झुककर करतार सिंह के दोनों पैर पकड़ लिये और फिर अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसे टैरेस से पीछे की तरफ उछाल दिया।

करतार सिंह की अत्यन्त हृदयग्राही चीख गूंज उठी।

वह हवा में कलाबाजी खाता चला गया और फिर कई मंजिल नीचे धड़ाम् से नुकीले पत्थरों पर जाकर गिरा। नीचे गिरते ही उसका सिर बिल्कुल किसी तरबूज की तरह दो हिस्सों में फट पड़ा। वह जिंदा बचा होगा, इस बात का तो अब प्रश्न ही नहीं था।

मैं टैरेस से वापस कमरे में पहुंची।

मेरी सतर्क निगाहें इधर—उधर घूमीं।

शराब का वह दूसरा गिलास अभी भी टेबिल पर रखा था, जिसे करतार सिंह ने मेरे लिए तैयार किया था और जिसमें एक पैग शराब थी।

मैं एक ही घूंट में उस शराब को पी गयी और फिर गिलास धोकर वापस यथास्थान रखा।

फिर मैं बिल्कुल चोरों की भांति कमरे से बाहर निकली।

लॉज में पूर्व की भांति गहन सन्नाटा व्याप्त था। शायद सरदार करतार सिंह की हृदयग्राही चीख किसी के कानों में नहीं पड़ी थी।

मैं तेज—तेज कदमों से सीढ़ियों की तरफ बढ़ती चली गयी।

•••
 
सुबह तिलक ने मुझे झंझोड़कर जगाया।

तब नौ बज रहे थे।

“क्या हो गया?” मैं हड़बड़ाई।

“सरदार मारा गया।” तिलक इस तरह बोला, जैसे कोई बम छोड़ रहा हो।

“सरदार! कौन सरदार?”

“वही जो हमेशा नशे में धुत रहता था। जिसके घूरने से तुम परेशान थीं।”

“माई गॉड!” मैं एकदम बिस्तर से उठी—”वो सरदार कैसे मारा गया?”

“यह अभी पता नहीं चला। अलबत्ता उसकी लाश लॉज के पिछले हिस्से में पड़ी पाई गयी है।”

मैं, तिलक राजकोटिया के साथ—साथ अपने कमरे से बाहर निकली।

लॉज में बड़ा जबरदस्त भूकंप आया हुआ था। पुलिस वहां पहुंच चुकी थी और फिलहाल लॉज के मैनेजर से पूछताछ की जा रही थी। लॉज में ठहरे तमाम ‘हनीमून कपल्स’ अपने—अपने कमरों से बाहर निकल आये थे और उनके चेहरों से प्रकट हो रहा था कि सरदार करतार सिंह की मौत का उन सभी को बहुत अफसोस है।

एक बात की मुझे जरूर हैरानी थी।

रात सरदार की हत्या करके आने के बाद मुझे इतनी गहरी नींद कैसे आ गयी? क्या किसी की जान ले लेना मेरे लिए इतना सहज हो चुका था?

“लाश कहां है?” मैं पूरी तरह अंजान बनते हुए बोली।

“वो शायद अभी भी पिछली तरफ ही है।”

हम दोनों लॉज के पिछले हिस्से की तरफ बढ़े।

•••

सरदार करतार सिंह की लाश अभी भी वहां पत्थरों पर ही पड़ी थी और खून के छींटे दूर—दूर तक बिखरे थे।

साफ जाहिर था, करतार सिंह को बड़ी खौफनाक मौत हासिल हुई थी।

फिलहाल पुलिस ने उसकी लाश के ऊपर चादर डाली हुई थी। इसलिए उसकी लाश की दुर्दशा नजर नहीं आ रही थी। वहां आसपास पुलिस घेरा डाले थी और वहीं कुछ हनीमून कपल्स भी खड़े थे। तभी मेरी निगाह उस कांच के गिलास की किर्चियों पर भी पड़ी, जो गिलास रात करतार सिंह के हाथ में था।

इस समय सिंगापुर पुलिस का एक हैड कांस्टेबिल नोकदार चिमटी से पकड़—पकड़कर उन किर्चियों को उठा रहा था।

“किर्चियां बहुत सावधानी के साथ उठाना।” उसी क्षण इंस्पेक्टर ने आदेश दनदनाया—”कहीं कांच के ऊपर से फिंगर प्रिण्ट न मिट जाएं।”

“बेफिक्र रहिए सर,मैं इसी तरह उठा रहा हूं।”

फिर इंस्पेक्टर ने दूसरे पुलिसकर्मियों की तरफ एबाउट—टर्न लिया।

“यहां आसपास से कोई और सामान मिला?”

“नहीं सर- कुछ नहीं मिला।” एक थोड़ा ठिगने कद का कांस्टेबिल बोला—”हम यहां का चम्पा—चम्पा छान चुके हैं।”

“उस कमरे में से कोई संदेहजनक वस्तु मिली हो, जिसमें यह सरदार ठहरा था?”

“नहीं सर- वहां से भी कुछ नहीं मिला।”

इंस्पेक्टर अब पत्थरों पर चहलकदमी करते हुए खुद वहां किसी संदेहजनक वस्तु की खोज करने लगा।

परन्तु काफी देर चहलकदमी करने के बाद भी उसे कोई खास वस्तु न दिखाई पड़ी।

“इंस्पेक्टर साहब!” तभी एक नौजवान से आदमी ने इंस्पेक्टर से प्रश्न किया—”क्या यह हत्या का मामला है?”

“अभी तक जो बातें सामने आयी हैं,” इंस्पेक्टर विचारपूर्ण मुद्रा में बोला—”उससे तो यह हत्या का मामला नहीं लगता। उससे तो यह दुर्घटना का मामला ज्यादा दिखाई देता है।”

“दुर्घटना!”

“हां- दुर्घटना!” इंस्पेक्टर बोला—”मैं समझता हूं, हमेशा की तरह सरदार करतार सिंह रात भी अपनी बीवी के गम में नशे में धुत्त था। और किसी प्रकार टहलता—टहलता अपने कमरे के टेरेस तक पहुंच गया था। फिर नशे की पिनक में ही वो किसी तरह धड़ाम् से यहां नीचे गिर पड़ा और गिरते ही मर गया।”

“जरूर यही हुआ है।” उस नौजवान ने कहा—”वैसे भी इस बेचारे भले आदमी से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है, जो कोई इसकी हत्या करेगा।”

“ठीक बात है।”

उन दोनों का वार्तालाप सुनकर मैं मन—ही—मन मुस्करा उठी।

•••
 
लॉज में वह दिन बहुत सन्नाटे में डूबा हुआ था। पुलिस सरदार करतार सिंह की लाश का पंचनामा भरकर और उसे सीलबंद करके वहां से ले गयी थी। पुलिस ने अंतिम तौर पर उसे दुर्घटना का मामला ही माना था।

दोपहर के उस समय बारह बज रहे थे, तिलक राजकोटिया ने और मैंने नाश्ते की जगह सिर्फ एक—एक कप प्याली चाय पी। सरदार करतार सिंह की मौत का तिलक को भी बड़ा दुःख था और वह चुप—चुप था।

“मैं समझता हूं,” तिलक चाय की चुस्की भरता हुआ बोला—”सरदार की मौत से कम—से—कम एक समस्या तो हल हो गयी है।”

“क्या?”

“तुम अब लॉज बदलने की जिद् नहीं करोगी।”

मैं खामोश बैठी रही।

“या अभी भी तुम इस लॉज में नहीं ठहरना चाहती?”

“नहीं!” मैंने अपनी नजरें झुका लीं—”अब ऐसी कोई बात नहीं है।”

“चलो- शुक्र है। कम—से—कम एक समस्या तो निपट ही गयी।”

मैं चाय चुसकती रही।

मुझे अभी भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि मैं तिलक राजकोटिया की दौलत पर सदा काबिज बने रहने के लिए एक हत्या और कर चुकी थी।

वो भी सरदार करतार सिंह जैसे बेहद भले व्यक्ति की हत्या!

उस दिन हमने सारा दिन हनीमून लॉज में ही आराम करते हुए गुजारा। मैंने सारा दिन अपने पसंदीदा लेखक ‘अमित खान’ का जासूसी उपन्यास पढ़ा था, जबकि तिलक राजकोटिया टेलीविजन पर स्पोर्ट्स के अलग—अलग प्रोग्राम देखता रहा।

दूसरे जोड़े भी अपना मनोरंजन करने के लिए आज कहीं बाहर नहीं गये थे।

फिर एक घण्टी घटना घटी।

रात के दस बज रहे थे, जब हनीमून लॉज के बैल ब्वाय ने तिलक राजकोटिया को आकर बताया, उसके लिए मुम्बई से फोन है।

तिलक तुरन्त उठकर खड़ा हो गया।

“लगता है,” तिलक राजकोटिया बोला—”होटल के मैनेजर का ही फोन है। मैं अभी फोन सुनकर आता हूं।”

तिलक राजकोटिया चला गया।

मैं चिंतित हो उठी।

क्या माजरा था?

क्यों होटल का मैनेजर तिलक को वहां बार—बार टेलीफोन कर रहा था?

मैंने तिलक का मोबाइल फ़ोन चेक किया, नेटवर्क प्रॉब्लम अभी भी थी।

मेरे दिल की धड़कनें तेज होने लगीं।

•••

बहरहाल तिलक राजकोटिया जब फोन सुनकर कमरे में वापस लौटा, तो वह आज हद से ज्यादा परेशान दिखाई पड़ रहा था।

कमरे में आते ही वो धड़ाम् से कुर्सी पर बैठ गया और बुरी तरह हांफने लगा।

उसका चेहरा छिपकली की मानिंद बिल्कुल पीला जर्द पड़ा हुआ था।

“क्या बात है तिलक?” मैं तुरंत तिलक राजकोटिया के नजदीक पहुंची और बेहद विचलित स्वर में बोली—”क्या कोई बुरी खबर है?”

“हां।” तिलक ने अपने शुष्क अधरों पर जबान फिराई—”सावन्त भाई ने गड़बड़ कर रखी है।”

सावन्त भाई!

मेरे हाथ—पैरों में सन्नाटा दौड़ गया।

सावन्त भाई का नाम मैंने बखूबी सुना था।

सावत भाई मुम्बई शहर का एक बड़ा दादा था। बड़ा गैंगस्टर था। तस्करी से लेकर जुएखाने, शराबखाने और नारकाटिक्स तक उसका व्यापक बिजनेस था। छोटे—मोटे गुण्डे तो सावन्त भाई के नाम से वैसे ही थर्रा उठते थे।

“सावन्त भाई!” मैं आंदोलित लहजे में बोली—”सावन्त भाई ने क्या गड़बड़ कर रखी है?”

“तुम उस कहानी को नहीं समझोगी। लेकिन इस वक्त मेरा फौरन मुम्बई पहुंचना जरूरी है। आई एम सॉरी शिनाया, मुझे अफसोस है कि मेरे कारण तुम्हारे हनीमून का सारा मजा किरकिरा हो गया है और मुझे बीच में ही यह टूर कैंसिल करना होगा।”

“कोई बात नहीं तिलक!” मैं बोली—”अगर कोई आफत सामने आयी है, तो पहले उस आफत से निपटना जरूरी है। वैसे भी हनीमून तो हम मना ही चुके हैं।”

“ओह डार्लिंग!” तिलक राजकोटिया एकाएक कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया और उसने कसकर मुझे अपनी बांहों में समेट लिया—”तुम सचमुच कितनी समझदार हो। तुमसे मुझे ऐसे ही किसी जवाब की उम्मीद थी।”

मैं तिलक राजकोटिया के सीने से लगी उसकी आंखों में झांकती रही।

“हमें हिन्दुस्तान वापस कब जाना होगा?”

“कल सुबह ही हम सिंगापुर छोड़ देंगे।” तिलक बोला—”बल्कि अपने सामान की पैकिंग भी हमने अभी करनी है। क्योंकि कल सुबह हमारे पास ज्यादा समय नहीं होगा।”

मैं चकित थी।

मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि सिंगापुर से इतनी जल्दी हमारी वापसी हो जाएगी।

हालात वाकई बहुत जल्दी नये—नये मोड ले रहे थे।

तिलक और मैं रात को ही सामान की पैकिंग करने में जुट गए।

“लेकिन तुम्हारे सामने मुश्किल क्या है तिलक!” मैं अटैची में अपने कपड़े रखते हुए बोली—”आखिर मुझे भी तो कुछ बताओ?”

“कुछ कारोबार से सम्बन्धित ही मुश्किल है।” तिलक राजकोटिया बोला—”तुम बेफिक्र रहो, मैं सब सम्भाल लूंगा।”

लेकिन मेरा दिल धड़क—धड़क जा रहा था।

सावन्त भाई!

मेरे रोंगटे खड़े करने के लिए बस वही एक नाम काफी था।
 
9

जबरदस्त टेंशन

बहरहाल अगले दिन सुबह ही हम दोनों ने सिंगापुर छोड़ दिया।

हमारे दस बजे वाली फ्लाइट के टिकिट बुक हुए।

तिलक राजकोटिया तो सुबह आठ वाली फ्लाइट ही पकड़ना चाहता था। परन्तु उस फ्लाइट के हमें टिकिट नहीं मिले, वो पहले ही फुल थी।

इसलिए मजबूरन हमें उससे दो घण्टे बाद वाली फ्लाइट ही पकड़नी पड़ी।

तिलक राजकोटिया सारे रास्ते परेशान दिखाई देता रहा।

किसी मैगजीन या अखबार पढ़ने में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

मुझसे भी वो बहुत कम बात कर रहा था।

“तिलक!” मैं सीट पर बैठे—बैठे बोली—”मैं समझती हूं, मुश्किल उतनी सहज नहीं है, जितनी तुम शो कर रहे हो।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मुश्किल सहज होती, तो तुम इतना परेशान हर्गिज न दिखाई पड़ते।”

“मैं कहां बहुत ज्यादा परेशान हूं।” तिलक धीरे से मुस्कराया।

मैं बड़ी पैनी निगाहों से उसकी तरफ देखने लगी।

“इस तरह क्या देख रही हो?”

“लगता है- तुम मेरे ऊपर विश्वास नहीं करते हो तिलक!”

“ऐसी कोई बात नहीं है।”

“नहीं- ऐसी ही बात है।” मैं दृढ़तापूर्वक बोली— “अगर तुम मेरे ऊपर विश्वास करते, तो तुम मुझे सब कुछ बताते। मुझसे कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं थी।”

“मैंने कहा न- कुछ कारोबार से सम्बन्धित मुश्किलें हैं। अब मैं तुम्हें उनकी क्या डिटेल समझाऊं!”

मैं फिर खामोश हो गयी।

सच बात तो ये है, तिलक राजकोटिया अब मुझे बदला—बदला नजर आ रहा था।

शादी के पहले वाले तिलक में और आज के तिलक में जमीन—आसमान का फर्क था।

मुझे मालूम था- अगर मर्द, औरत से कुछ भी छुपाने लगे, तो औरत को फौरन समझ जाना चाहिए कि मर्द पूरी तरह उसकी मुट्ठी में नहीं है।

और इस वक्त ऐसा ही कुछ अहसास मुझे हो रहा था।

आप समझ सकते हैं, यह अहसास मेरे लिए कितना कष्टदायक था।

कितना दहला देने वाला था।

जल्द ही हमारे प्लेन ने मुम्बई एयरपोर्ट पर लैण्ड किया।

उस दिन मैंने एक नई बात और नोट की। होटल का मैनेजर खुद तिलक राजकोटिया को रिसीव करने बीएमडब्ल्यू लेकर वहां आया था।

तिलक को देखते ही वह तुरन्त उसके पास पहुंचा।

उसने हाथ जोड़कर हम दोनों का अभिवादन किया।

मैनेजर भी चिंतित दिखाई दे रहा था।

“सब कुछ ठीक है?” तिलक ने पूछा।

“यस सर- फिलहाल तो सबकुछ ठीक ही है। आइए।”

वह हमें लेकर गाड़ी के नजदीक पहुंचा।

तिलक राजकोटिया ने मुझे कार की फ्रण्ट सीट पर बैठा दिया।

कार दौड़ पड़ी।

सारे रास्ते वह दोनों बहुत धीमी आवाज में न जाने क्या—क्या बातें करते रहे।

उनकी कोई बात मुझे नहीं सुनाई दे रही थी।

मेरी व्यग्रता बढ़ने लगी।

•••

सुबह तिलक राजकोटिया नहा—धोकर काफी जल्दी तैयार हो गया था। मोबाइल पर न जाने किन—किन लोगों से बातें करता रहा था और दिन निकलते ही वो फिर तैयार था।

तभी डॉक्टर अय्यर के पैंथ हाउस में कदम पड़े।

डॉक्टर अय्यर का उस क्षण वहां आगमन बिल्कुल अप्रत्याशित था।

“आओ डॉक्टर!” तिलक अपनी टाई की नॉट कसता हुआ बोला—”आज काफी दिन बाद दिखाई दे रहे हो।”

“ऐन्ना- मैं तो दिखाई भी दे रहा हूं। लेकिन आप लोग तो मुझे बिल्कुल ही भूल गये थे।” डॉक्टर अय्यर बोला-“आखिर मुरुगन की कृपा से इतना बड़ा प्रोग्राम कर डाला। शादी बना डाली। और इस डॉक्टर को पता तक नहीं लगने दी, खबर तक नहीं भेजी।”

तिलक राजकोटिया के साथ—साथ मैं भी चौंकी।

वाकई!

यह गलती तो हमसे हुई थी।

मुझे फौरन ध्यान आया- सचमुच हम डॉक्टर अय्यर को शादी की पार्टी में बुलाना भूल गये थे।

“सॉरी डॉक्टर!” तिलक ने आगे बढ़कर डॉक्टर अय्यर का हाथ अपने हाथों में ले लिया—”रिअली वैरी सॉरी! सचमुच यह हमसे बहुत भारी भूल हुई है।”

“दरअसल सारा प्रोग्राम इतनी तेजी से बना!” मैंने भी सफाई दी—”कि हम अपने बहुत से परिचितों को बुलाने में चूक गये।”

डॉक्टर अय्यर के होठों पर बड़ी शातिराना मुस्कान दौड़ गयी।

वह मुस्कान ऐसी थी, जो किसी बहुत खतरनाक आदमी के होठों पर ही आती है।

“कोई बात नहीं ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर बोला—”आप लोग मुझे एक बार भूले हो, लेकिन अब शायद जिन्दगी भर नहीं भुला पाओगे।”

“क्या मतलब?” तिलक राजकोटिया चौंका।

“बैठो तिलक साहब, मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।”

“लेकिन फिलहाल मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। मुझे जल्दी कहीं पहुंचना है।”

“समय तो वाकई आपके पास बहुत ज्यादा नहीं है।” डॉक्टर अय्यर अर्थपूर्ण लहजे में बोला—”खासतौर पर मेरी बात सुनने के बाद तो आपको यह अहसास और भी ज्यादा अच्छी तरह होगा। फिलहाल बैठ जाओ- मुझे आपसे बृन्दा के बारे में बात करनी है और वो बहुत जरूरी बातें हैं।”

बृन्दा!

मेरे जिस्म का एक—एक रोंगटा खड़ा हो गया।

और बृन्दा का नाम सुनकर यही हाल तिलक राजकोटिया का हुआ।

•••
 
मैं तिलक राजकोटिया और डॉक्टर अय्यर, हम तीनों उस समय अलग—अलग कुर्सियों पर आमने—सामने बैठे थे।

खासतौर पर मेरी और तिलक की तो अजीब हालत थी।

जिस बृन्दा के चैप्टर को हम बिल्कुल खत्म हुआ समझ बैठे थे, उसी चैप्टर को डॉक्टर अय्यर ने इतने ड्रामेटिक अंदाज में आकर खोला था कि हम अंदर तक हिल गये।

“क्या कहना चाहते हो तुम बृन्दा के बारे में?” तिलक, डॉक्टर अय्यर की तरफ देखता हुआ बोला।

“उसके बारे में कहने को अब बचा ही क्या है?” डॉक्टर अय्यर हंसा।

उसकी हंसी फिर बड़ी अजीब थी।

“मतलब?”

“ऐन्ना- अगर आप ऐसा सोचते हो,” डॉक्टर अय्यर एक—एक शब्द चबाता हुआ बोला—”कि इंसान के मरने के साथ ही उससे जुड़ी तमाम बातें भी खत्म हो जाती हैं, तब तो मैं यही कहूंगा कि मुझे आपकी अक्ल पर तरस आता है।”

“क्यों- इसमें तरस आने की क्या बात है?”

“क्योंकि कभी—कभी जिंदा इंसान भी इतना हंगामें नहीं करता तिलक साहब, जितना उसकी लाश करती है। और अब ऐसा ही कुछ बृन्दा के साथ हो रहा है, उसकी लाश ने हंगामा बरपा करके रख दिया है।”

“कैसा हंगामा?” मेरे गले में काटे से उगे।

मेरे दिल की रफ्तार तेज होने लगी।

“दरअसल पूरे एक महीने तक बृन्दा का शव विभिन्न कैमिकलों के बीच ‘मैडीकल रिसर्च सोसायटी’ के मोर्ग में रखा रहा था।” डॉक्टर अय्यर ने बताना शुरू किया—”फिर कोई एक सप्ताह पहले उस शव पर रिसर्च करने के लिए एक कमेटी गठित की गयी। बृन्दा को चूंकि ‘मेलीगेंट ब्लड डिसक्रेसिया’ जैसी गम्भीर बीमारी थी, इसलिए उसी बीमारी को आधार बनाकर जांच का काम चुना गया। ताकि उस बीमारी की बेसिक बातों का पता लगाया जा सके और फिर उस बीमारी पर पूरी तरह कंट्रोल करने की दवाइयां बने। मेरे अण्डर में जांच का यह कार्य शुरू हुआ। आपको सुनकर आश्चर्य होगा राजकोटिया साहब- जब हम बृन्दा के आमाशय की जांच कर रहे थे, तभी कुछ धमाकाखेज तथ्य मेरे सामने उजागर हुए।”

“कैसे धमाकाखेज तथ्य?”

“जैसे बृन्दा के आमाशय में कुछ ऐसी टेबलेट के बहुत सूक्ष्म कण पाये गये, जो नींद की टेबलेट थीं। इसके अलावा ‘डायनिल’ टेबलेट के भी बहुत सूक्ष्म कण मैंने बृन्दा के अमाशय में देखे। उन कणों को देखकर मैं चौंक उठा। क्योंकि मैंने बृन्दा को न तो कभी नींद की गोलियां ही खाने के लिए दी थीं। और ‘डायनिल’ उन्हें देने का तो प्रश्न ही कोई नहीं था। क्योंकि ‘डायनिल’ तो सिर्फ शुगर के पेशेण्ट को दी जाती है ऐन्ना- जबकि बृन्दा को तो शूगर दूर—दूर तक नहीं थी।”

मेरे पसीने छूट पड़े।

उस घांघ डॉक्टर की जबान से ‘डायनिल’ और नींद की टेबलेट का नाम सुनकर मेरी बुरी हालत हो गयी।

“इसके अलावा एक बात और थी ऐन्ना!”

“क्या?”

“उन दोनों टेबलेट के कण बृन्दा के आमाशय में भारी तादाद में थे। ऐसा मालूम पड़ता था- जैसे किसी ने वह काफी सारी टेबलेट उन्हें एक साथ खिला दी थीं। जानते हो, इसका क्या मतलब होता है?”

“क... क्या मतलब होता है?” तिलक राजकोटिया की आवाज बुरी तरह कंपकंपाई।

उसकी हालत ऐसी थी, मानों किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथ पकड़ लिया हो।

“इसका सिर्फ एक ही मतलब है।” डॉक्टर अय्यर बोला—”बृन्दा की मौत स्वाभावित मौत नहीं थी। वह एक फुलप्रूफ मर्डर था। किसी ने बहुत प्लान के साथ, बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से बृन्दा की हत्या की थी।”

“हत्या!”

पूरे कमरे में धमाके—पर—धमाके होते चले गये।

जोरदार धमाके!

•••

मेरी आंखों में दहशत नाच उठी।

मैंने सोचा भी न था- जिस बृन्दा की हत्या हमने इतने योजनाबद्ध ढंग से की है, उस हत्या के ऊपर से इस तरह भी पर्दा उठेगा।

वाकई वो हैरतअंगेज मामला था।

जबरदस्त हैरतअंगेज!

“हत्या!” मैं सख्त अचम्भित लहजे में बोली—”लेकिन बृन्दा की हत्या कौन करेगा डॉक्टर?”

डॉक्टर अय्यर के होठों पर पुनः बड़ी वेधक मुस्कान उभरी।

“क्या इस सवाल का जवाब भी मुझे ही देना होगा?”

मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी।

उफ्!

वह साफ—साफ मेरे ऊपर शक कर रहा था।

और सबसे बड़ी बात ये थी, अपने शक को छुपा भी नहीं रहा था कम्बख्त!

“बृन्दा का हत्यारा वही है शिनाया जी!” डॉक्टर अय्यर बोला—”जिसे उसकी मौत से सबसे बड़ा फायदा मिला हो। अब आप खुद मुझे सोचकर बताइए कि उनकी मौत से सबसे बड़ा फायदा किसे पहुंचा है?”

मैं दायें—बायें बगले झांकने लगी।

“इसके अलावा जिसने बृन्दा की हत्या की है, उसे एक सहूलियत और हासिल थी।”

“क... क्या?”

“वो उन्हें टेबलेट भी खिला सकता था?”

मेरे रहे—सहे कस—बस भी ढीले पड़ गये।

“शिनाया जी, अब आप खुद ही मुझे यह सोचकर बता दीजिए कि यहां ऐसा कौन आदमी है।” डॉक्टर अय्यर बोला—”जिसे यह दोनों सहूलियतें हासिल हों। जिससे यह दोनों बातें मैच करती हों।”

“आप कहना क्या चाहते हैं।” तिलक राजकोटिया एकाएक मेरे पक्ष में गुर्राया—”क्या आपके कहने का मतलब है कि शिनाया ने बृन्दा की हत्या की है? शिनाया अपराधी है?”

“मैं तो कुछ भी नहीं कहना चाहता ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर बोला—”मेरा क्या मजाल, जो मैं साहब लोगों के खिलाफ कुछ कहूं। मैं तो सिर्फ गुजरे हुए हालातों की तस्वीर आपके सामने पेश कर रहा हूं। कुछेक क्लू आप लोगों के सामने रख रहा हूं,जो मेरे हाथ लगे हैं। किसी को अपराधी साबित करना या न करना मेरा काम थोड़े ही हैं, यह तो पुलिस का काम है। पुलिस खुद करेगी।”

“पुलिस!”

मेरी रूह फनां हो गयी।

“तुम पुलिस के पास जाओगे?” तिलक राजकोटिया एकदम से बोला।

“जाना ही पड़ेगा। पुलिस के पास जाये बिना बात भी तो नहीं बनती दिखाई पड़ती।”

तिलक राजकोटिया भी अब साफ—साफ भयभीत नजर आने लगा।

हालात एकाएक खराब होने शुरू हो गये थे।

“वह तो इस पूरे प्रकरण में मुरुगन की एक बहुत बड़ी कृपा हुई है तिलक साहब!” डॉक्टर अय्यर बोला।

“क्या?”

“यही कि बृन्दा ने मरने से पहले चिट्ठी लिखकर अपना शव मैडिकल रिसर्च सोसायटी को दान दे दिया। वरना जरा सोचिये- अगर तभी बृन्दा के शव का दाह—संस्कार हो जाता, वो अग्नि की भेंट चढ़ जाता, तब तो कुछ भी पता न चलता। तब तो इन रहस्यों के ऊपर से पर्दा उठने का प्रश्न ही कुछ नहीं था।”

“लेकिन अभी यह बात पूरी तरह साबित थोड़े ही हुई है।” मैं शुष्क स्वर में बोली—”कि बृन्दा के आमाशय में जो सूक्ष्म कण मिले हैं, वो ‘डायनिल’ तथा नींद की गोलियों के ही हैं।”

“ठीक कहा तुमने।” डॉक्टर अय्यर बोला—”अभी यह बात पूरी तरह साबित नहीं हुई। अभी मैंने उन सूक्ष्म कणों की जो खुद प्रारम्भिक जांच की है, उन्हीं से यह रिजल्ट निकलकर सामने आया है। फिलहाल मैंने उन कणों को उच्चस्तरीय जांच के लिए पैथोलोजी लैब में भेजा हुआ है और वहां से रिपोर्ट आते ही सबकुछ साबित हो जाएगा। वैसे मुझे इस बात की उम्मीद कम ही नजर आती है कि मेरी रिपोर्ट और पैथोलोजी लैब की रिपोर्ट में कोई फर्क होगा।”

“लैब से रिपोर्ट कब आएगी?”

“दो—तीन दिन में ही आ जाएगी।”

•••
 
तिलक राजकोटिया अब इस बात को बिल्कुल भूल चुका था कि उसने कहीं जाना भी है।

इस समय उसका सारा ध्यान डॉक्टर अय्यर की तरफ था।

उसके माथे पर पसीने की ढेर सारी बूंदें चुहचुहा आयीं, जिसे उसने रूमाल से साफ किया।

यही हाल मेरा था।

मेरा तो पूरा शरीर पसीने में लथपथ था।

और मैं तो उस घाघ डॉक्टर से अपने पसीनों को छुपाने का भी प्रयास नहीं कर रही थी। आखिर मैं जानती थी, चूहा—बिल्ली का यह खेल खेलने से अब कोई फायदा नहीं है।

डॉक्टर अय्यर हमारी ‘योजना’ के बारे में सब कुछ जान चुका है।

सब कुछ!

तिलक राजकोटिया कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया। उसने सिगरेट सुलगा ली। फिर वो बेचैनीपूर्वक इधर—से—उधर टहलने लगा।

मैं आज उसे दूसरी मर्तबा सिगरेट पीते देख रही थी।

“क्या सोच रहे हैं ऐन्ना?” डॉक्टर अय्यर मुस्कराया।

“कुछ नहीं।”

“कुछ तो?”

“मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं डॉक्टर!”

“क्या?”

“देखो।” तिलक राजकोटिया टहलते—टहलते ठिठका और उसने सिगरेट का एक छोटा—सा कश लगाया—”मेरी बात ध्यान से सुनो। जहां तक मैं समझता हूं, अभी यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि बृन्दा की हत्या ही हुई है और वह स्वाभाविक मौत नहीं मरी। इसके अलावा अभी यह भी हण्ड्रेड परसेन्ट साबित नहीं हुआ है कि बृन्दा के आमाशय से जिन टेबलेट के सूक्ष्म कण बरामद हुए, वह ‘डायनिल’ और ‘नींद’ की टेबलेट ही थी। पैथोलोजी लैब की रिपोर्ट आने के बाद ही कहीं कुछ साबित हो पाएगा कि असली मामला क्या है।”

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“मैं तुमसे सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं।”

“क्या?”

डॉक्टर अय्यर गौर से तिलक राजकोटिया की सूरत देखने लगा।

और!

मेरी निगाह भी उसी की तरफ थी।

मैं नहीं जानती थी, तिलक क्या कहने जा रहा है।

“मैं चाहता हूं डॉक्टर- जब तक पैथोलोजी लैब की रिपोर्ट न आ जाए और जब तक यह पूरी तरह साबित न हो जाए कि बृन्दा की वास्तव में ही हत्या की गयी है, तब तक यह मामला ज्यादा उछलना नहीं चाहिए।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं ऐसा चाहता हूं।” तिलक की आवाज दृढ़ हो उठी—”जरो सोचो, अगर यह मामला पहले—से—पहले ही उछल गया और बाद में कहीं जाकर यह साबित हुआ कि बृन्दा की हत्या नहीं हुई थी, वह स्वाभाविक मौत मरी थी, तब तो तुम्हारी अच्छी—खासी छीछालेदारी हो जाएगी।”

डॉक्टर अय्यर के होठों पर पुनः हल्की—सी मुस्कान तैरी।

वह धीरे—धीरे स्वीकृति में गर्दन हिलाने लगा।

“मेरी आपको काफी फिक्र है तिलक साहब!”

“तुम कुछ भी समझ सकते हो।”

“ठीक है ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर बोला—”जब तक पैथोलोजी लैब की रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक मैं पुलिस के पास नहीं जाऊंगा। तब तक यह मामला बिल्कुल नहीं उछलेगा।”

“थैंक्यू- थैंक्यू वैरी मच! मेरे एक सवाल का जवाब और दो।”

“पूछो।”

“तुम्हारे अलावा यह बात और कौन—कौन जानता है?”

“कोई भी नहीं जानता। सिर्फ एक मेरा बहुत खास आदमी है ऐन्ना- जिसे मैंने जानबूझकर इस मामले में अपना राजदार बनाया है। इतना ही नहीं- मैं इस वक्त यहां भी आया हूं, तो उसे इस बात की भी जानकारी है कि मैं यहां हूं।”

“क्यों- तुमने उसे अपना राजदार क्यों बनाया?”

डॉक्टर अय्यर हंसा।

“आप भी कभी—कभी बिल्कुल बच्चों जैसी बात करते हैं तिलक साहब!”

“इसमें बच्चों जैसी क्या बात है?”

“दरअसल जब कोई समझदार आदमी भूखे भेड़ियों की गुफा में हाथ डालता है, तो वह अपनी सुरक्षा के तमाम इंतजाम करके रखता है। मेरा मानना है, जो आदमी अपने फायदे के लिए एक खून कर सकते हैं, उनके लिए दूसरा खून कर देना भी कोई बड़ी बात नहीं।”

मैं सन्न रह गयी।

सचमुच वो मद्रासी बहुत चालाक था।

बहुत ज्यादा शातिर!

“एक बात मैं आप लोगों को और बता दूं।” डॉक्टर अय्यर बोला।

“क्या?”

“अगर मैं एक घण्टे के अंदर—अंदर पैंथ हाउस से बाहर न निकला, तो मेरा जो राजदार है, वो पुलिस के पास पहुंच जाएगा। वो पुलिस के सामने पहुंचकर बृन्दा की मौत का सारा भांडा फोड़ देगा।”

“ओह!”

“मुझे अब चलना चाहिए।” फिर डॉक्टर अय्यर अपनी रिस्टवाच देखता हुआ बोला—”मुझे यहां आये हुए पचास मिनट हो चुके हैं। अगर कहीं मुझे ज्यादा देर हो गयी, तो गड़बड़ हो जाएगी।”

डॉक्टर अय्यर अपनी कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया।

फिर दरवाजे की तरफ बढ़ते—बढ़ते वो एकाएक ठिठका।

उसके ठिठकने का अंदाज ऐसा था, मानों एकाएक उसे कुछ याद आया हो।

“ऐन्ना- मुझे आपसे कहना तो नहीं चाहिए।” वह तिलक राजकोटिया की तरफ देखता हुआ बोला—”लेकिन एकाएक जरूरत ऐसी आन पड़ी है कि मुझे बहुत मजबूरी में आपसे कहना पड़ रहा है।”

“क्या कहना चाहते हो?”

“दरअसल मैंने कोई साल भर पहले एक पजेरों कार किश्तों पर ली थी।” डॉक्टर अय्यर बोला—”आज ही मैंने उस कार की किश्त फाइनेंस कंपनी में जमा करनी है, जबकि किश्त देने को मेरे पास बिल्कुल भी रुपये नहीं हैं। अगर आप मुझे किश्त के रुपये उधार दे दें, तो आपकी बहुत—बहुत मेहरबानी होगी।”

हम दोनों के दिल—दिमाग पर भीषण बिजली गड़गड़ाकर गिरी। वह हमें साफ—साफ ब्लैकमेल कर रहा था।

“आप लोग इत्मीनान रखें।” फिर वो जल्दी से बोला—”जैसे ही मेरे पास रुपयों का इंतजाम होगा, मैं सबसे पहले आपकी रकम लौटाऊंगा।”

“कितनी किश्त देनी है।”

“सिर्फ तीन लाख!” उस दुष्ट ने खींसे—सी निपौरी—”आपके लिये बिल्कुल भी ज्यादा नहीं है ऐन्ना, बस हाथों का मैल है। दरअसल पिछली किश्तें भी नहीं गयी थीं।”

“ठीक है- तुम रुको, मैं अभी तीन लाख रुपये लाकर देता हूं।”

“और जरा जल्दी लेकर आना। एक घण्टा पूरा होने से पहले मैंने पैथ हाउस से बाहर भी निकलना है।”

•••
 
तिलक राजकोटिया और मैं अलग—अलग कुर्सियों पर बिल्कुल सन्न बैठे थे।

इस तरह!

जैसे कोई रोडरोलर गड़गड़ाता हुआ हम दोनों के ऊपर से गुजर गया हो।

जैसे हम जिंदा लाश में बदल गये हो।

डॉक्टर अय्यर तीन लाख रुपये लेकर पैंथ हाउस से जा चुका था, परन्तु उसने अपने पीछे जो खौफनाक सन्नाटा छोड़ा था, वो अभी भी बरकरार था।

“मैं आपसे क्या कहती थी।” आखिरकार मैंने ही उस सन्नाटे को भंग किया—”कि यह बहुत हर्राट डॉक्टर है। इसके कारण कभी—न—कभी हंगामा जरूर होगा और इसने हंगामा कर ही दिया।”

“ठीक कहा तुमने।” तिलक ने सिगरेट का टोटा एश—ट्रे में रगड़कर बुझाया और गहरी सांस ली—”वाकई मैं सोच भी नहीं सकता था कि यह मद्रासी भी ऐसी हरकत करेगा। मैं इसे बेइन्तहां शरीफ आदमी समझता था।”

“ऐसे शरीफ आदमी ही आस्तीन के सांप होते हैं। ऐसे आदमी ही झंझटों को जन्म देते हैं।”

तिलक राजकोटिया शान्त रहा।

उसके चेहरे पर गहन चिन्ता के भाव थे।

“और सच तो ये है तिलक- इस हंगामें की सबसे बड़ी वजह बृन्दा है।”

“बृन्दा!”

“हां बृन्दा!” मैं बोली—”जरा सोचो, अगर वो अपनी लाश ‘मेडीकल रिसर्च सोसायटी’ को दान देकर न जाती, तो ऐसा कोई हंगामा न होता। लेकिन उसने अपनी लाश ‘मेडिकल रिसर्च सोसायटी’ को दान देकर एक बड़े झगड़े की आधारशिला रख दी। जब उसने सीलबंद लिफाफे में अपनी यह अंतिम इच्छा प्रकट की थी, तब मैंने सोचा था कि यह कोई खास बात नहीं है। लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि साधारण—सी नजर आने वाली वो बात वास्तव में कितनी असाधारण थी- उसकी वजह से कितना बड़ा हंगामा बरपा हो गया है।”

तिलक राजकोटिया साफ—साफ आतंकित नजर आने लगा।

उसने एक दूसरी सिगरेट और सुलगा ली।

“बृन्दा की तुम्हें वह बात याद है शिनाया!” तिलक बोला—”जो उसने मरते हुए कही थी।”

“कौन—सी बात?”

“यही कि हर चालाक अपराधी जुर्म करने से पहले यही समझता है कि कानून उसे कभी नहीं पकड़ पाएगा, वो कभी कानून के शिकंजे में नहीं फंसेगा। परन्तु होता इससे बिल्कुल उल्टा है। होता ये है कि इधर अपराधी, अपराध करता है और उधर कानून का फंदा उसके गले में आकर कस जाता है।” तिलक राजकोटिया ने गहरी सांस छोड़ी—”कितना सच कहा था बृन्दा ने।”

“यह सब बेकार की बातें हैं।”

“अगर यह बेकार की बात होती शिनाया!” तिलक बोला—”तो हम आज इस तरह फंसते नहीं। हत्या की इतनी फुलप्रूफ योजना बनाने के बाद भी वो मद्रासी डॉक्टर इस प्रकार हमारे ऊपर हावी न हो जाता।”

“मेरी बात सुनो।” मेरा दिमाग एकाएक सक्रिय हो उठा—”मैं समझती हूं कि हालात जरूर बिगडे हैं—लेकिन अभी भी वो पूरी तरह हमारे काबू से बाहर नहीं हो गये हैं।”

“कैसे?”

“उस मद्रासी डॉक्टर के बारे में कम—से—कम अब एक बात तो साबित हो ही चुकी है। वो लालची है, नोटों का भूखा है। अगर वो लालची न होता, तो वह हमारे पास हर्गिज न आता। तब वो सीधा पुलिस के पास पहुंचता। जो कहानी उसने हमें सुनाई, उसने वो कहानी सीधे पुलिस को जाकर सुनानी थी।”

“यह तो है।”

“बस अगर हम चाहें,” मैं उत्साहपूर्वक बोली—”तो हम उस मद्रासी डॉक्टर की इस कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं।”

“किस तरह?”

तिलक राजकोटिया सिगरेट का कश लगाते—लगाते ठिठका।

उसके नेत्र गोल दायरे में सिकुड़ गये।

“फिलहाल हमें यह देखना है कि वो मद्रासी हमारे खिलाफ अब अगला कदम क्या उठाएगा।” मैं बोली—”उसका अगला एक्शन क्या होगा। इसके बाद ही हम कोई निर्णय करेंगे।”

तिलक राजकोटिया ने सिगरेट का एक छोटा—सा कश लगाया।
 
10

रूप का जादू

दो दिन तक कोई विशेष घटना न घटी।

तीसरे दिन की बात है।

तिलक और मैं बिस्तर पर थे। अर्द्धरात्रि का समय था। हम दोनों धीरे—धीरे रतिक्रीड़ा की तैयारी में मग्न थे।

यह कोई कम बड़े आश्चर्य की बात नहीं है कि इतने झंझटों के दौरान भी मैं तिलक राजकोटिया को सैक्स के लिए तैयार कर ही लेती थी और बाकायदा दिल से तैयार करती।

अगर मैंने उसकी दौलत पर काबिज रहना था, तो यह मेरे लिए बहुत जरूरी था कि मेरे रूप का जादू उसके ऊपर चलता रहे।

फिलहाल तिलक नीचे था।

मैं ऊपर!

कुछ अजीब—सा पोज था।

मेरी बाहें अमरबेल की तरह उसके गले से लिपटी थीं।

मैंने थोड़ा उन्मादित होकर उसके होठों का चुम्बन ले लिया।

तिलक के होठों पर मुस्कान खिल उठी।

“तुम मेरी सारी थकान एक ही झटके में दूर कर देती हो शिनाया!”

“सच कह रहे हो?”

“हां।”

तिलक ने बड़े अनुरागपूर्ण ढंग से मुझे अपनी मजबूत बांहों में भींच लिया और फिर इतनी जोर से कसा कि मुझे ऐसा महसूस हुआ, मानों मेरे जिस्म की एक—एक हड्डी कड़कड़ा उठेगी।

फिर उसके हाथ मेरी मखमली बांहों पर फिसल आये।

मैं सिहर उठी।

उस क्षण मैं आंखें बंद करके प्यार के उन लम्हों का भरपूर लुत्फ उठा रही थी। उसकी रोमांसपूर्ण हरकतों ने मेरे जिस्म की धड़कनें बढ़ा दी थीं।

वह रह—रहकर मेरे अंगों पर होंठ रगड़कर जिस्म में सनसनाहट उत्पन्न करने लगा।

फिर उसने एक हरकत और की।

वह मुझे अपनी बांहों में दबोचकर बिस्तर पर कलाबाजी खा गया।

मैं अब उसी जगह आ गयी, जहां रतिक्रीडा के दौरान एक औरत को होना चाहिए।

तिलक मेरे ऊपर था।

हम धीरे—धीरे प्यार का खेल, खेल रहे थे।

रात यूं सरक रही थी- जैसे किसी दुल्हन के सिर से आहिस्ता—आहिस्ता सितारों ढंका सुरमई आंचल सरकता जा रहा हो।

हम रतिक्रीड़ा के चरम—बिन्दु पर पहुंचते, उससे पहले ही मोबाइल फ़ोन की बेल एकाएक बहुत जोर से बज उठी।

बेल की उस आवाज ने हमारी सारी तन्द्रा भंग करके रख दी।

•••

मोबाइल की बेल लगातार जोर—जोर से बज रही थी।

तिलक राजकोटिया मेरे ऊपर से हटा और उसने बिस्तर पर ही थोड़ा आगे को सरककर मोबाइल उठाया।

“हैलो!” तिलक राजकोटिया ने मोबाइल कान से लगाकर थोड़ी ऊंची आवाज में कहा।

दूसरी तरफ से कोई कुछ बोला।

“डॉक्टर अय्यर!” तिलक राजकोटिया के मुंह से एकाएक तेज सिसकारी छूटी।

मैं तुरंत भांप गयी- वह उसी दुष्ट मद्रासी डॉक्टर का फोन था।

मैं फौरन तिलक के करीब सिमट आयी और टेलीफोन पर होने वाला वार्तालाप सुनने की कोशिश करने लगी।

लेकिन दूसरी तरफ की कोई बात मुझे नहीं सुनाई पड़ रही थी।

“क्या कह रहे हो?” तिलक एकाएक बहुत भयभीत हो उठा—”नहीं- नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे डॉक्टर!”

दूसरी तरफ से मुझे सिर्फ डॉक्टर अय्यर के हंसने की आवाज सुनाई पड़ी।

फिर उसने कुछ कहा।

जैसे—जैसे वो बोल रहा था, ठीक उसी अनुपात में तिलक के चेहरे का रंग उड़ने लगा था।

वह हूं—हां करने लगा।

उसकी हालत बुरी होती जा रही थी।

“लेकिन यह तो बहुत ज्यादा है।” तिलक ने अपने शुष्क होठों पर जुबान फिराई—”कुछ कम नहीं हो सकते?”

डॉक्टर अय्यर ने फिर कुछ कहा।

तिलक के चेहरे पर दहशत साफ—साफ मंडराती दिखाई पड़ रही थी।

साफ जाहिर था- डॉक्टर जो कुछ बोल रहा है, वह कोई साधारण बात नहीं है।

वह कोई डेंजर बात है।

बहुत डेंजर!

“ठीक है।” तिलक ने दायें—बायें गर्दन हिलाई—”मैं कल दे दूंगा।”

डॉक्टर अय्यर ने फिर कुछ कहा।

“हां- फाइनल!” तिलक बोला।

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