• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller नाइट क्लब

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
तिलक राजकोटिया जब मोबाइल रखकर मेरी तरफ घूमा, तो उस क्षण तक वह पसीनों में बुरी तरह लथपथ हो चुका था।

उसका दिल जोर—जोर से पसलियों को कूट रहा था।

उसकी ऐसी हालत थी- मानों किसी ने उसके जिस्म का सारा खून मिक्सी में डालकर निचोड़ डाला हो।

“क्या हुआ?” मैंने तिलक राजकोटिया के थोड़ा और निकट आकर पूछा।

“डॉक्टर अय्यर का फोन था।”

“वह तो मैं समझ चुकी हूं, लेकिन क्या कह रहा था वो दुष्ट आदमी?”

“हमारे लिए खबर कोई अच्छी नहीं है शिनाया!” तिलक ने बड़े विचलित अंदाज में मेरी तरफ देखा।

“लेकिन कुछ हुआ भी?”

“दरअसल पैथोलोजी लैब से रिपोर्ट आ गयी है। यह अब पूरी तरह साबित हो चुका है कि बृन्दा के आमाशय में जो सूक्ष्म कण पाये गये, वो ‘डायनिल’ और नींद की गोलियों के ही थे। इतना ही नहीं- उस हरामजादे को अब यह भी पता चल चुका है कि उस रात हमने बृन्दा की हत्या करने के लिए उसे जो टेबलेट दीं, उसकी कुल संख्या बीस थी।”

“ओह!”

मेरे जिस्म के रौंगड़े खड़े हो गये।

मैं भी थर्रा उठी।

सचमुच वो एक खतरनाक खबर थी।

“यह तो वाकई ठीक नहीं हुआ है तिलक!” मैं आहत मुद्रा में बोली—”उस शैतान को टेबलेट की सही—सही संख्या भी मालूम हो जाना वाकई आश्चर्यजनक है। अब क्या कह रहा है वो?”

“फिलहाल पुलिस के पास जाने की धमकी दे रहा था।” तिलक बोला—”मैंने बड़ी मुश्किल से उसे रोका है।”

“किस तरह रुका वो?”

तिलक राजकोटिया ने नजरें नीचे झुका लीं।

“कुछ मुझे बताओ तो।”

“उसने बीस लाख रुपये की डिमांड और की है।”

मैं चौंकी।

“बीस लाख!”

“हां।”

“और तुमने उसकी वह डिमांड मंजूर कर ली?”

“करनी ही पड़ी।” तिलक राजकोटिया बेबसीपूर्ण लहजे में बोला—”इसके अलावा मेरे सामने दूसरा रास्ता ही क्या था। वरना वो अभी पुलिस के पास जाने की धमकी दे रहा था।”

“उफ्!”

मैं और भी अधिक आतंकित हो उठी।

ब्लैकमेलिंग के ऐसे बहुत सारे किस्से मैं जासूसी उपन्यासों में पढ़ चुकी थी।

मैं जानती थी- इस तरह के किस्सों का अंत क्या होता है।

“तुम शायद अनुमान नहीं लगा सकते तिलक!” मैं धीमीं आवाज में बोली—”यह एक बहुत खतरनाक सिलसिले की शुरूआत हो गयी है। वह दुष्ट आदमी अब बिल्कुल साफ—साफ ब्लैकमेलिंग पर उतर आया है।”

“मैं भी सब कुछ महसूस कर रहा हूं।” तिलक बोला—”सच तो ये है शिनाया, अगर मुझे पहले से मालूम होता कि मैं बृन्दा की हत्या करके इतने बड़े संकट में फंस जाऊंगा, तो मैं कभी उसकी हत्या न करता। वैसे ही मैं आजकल काफी उलझनों में घिरा हुआ हूं।”

“क्या तुम मुझसे शादी करके पछता रहे हो तिलक?”

“नहीं- ऐसी कोई बात नहीं है।”

लेकिन मुझे भली—भांति महसूस हुआ, तिलक आजकल कोई ज्यादा खुश नहीं है।

मुझसे भी वो कुछ कटा—कटा रहने लगा था।

“आओ।” मैंने पुनः उसे अपनी मखमली बांहों में समेट लिया—”थोड़ी देर के लिए सबकुछ भूल जाओ! हम अपने पहले वाले खेल को ही आगे बढ़ाते हैं।”

“नहीं- मेरी अब इच्छा नहीं है शिनाया! तुम सो जाओ।” तिलक ने मेरी बांहें अपने जिस्म से अलग कर दीं।

मैं सन्न रह गयी।

चकित!

यह मेरी जिन्दगी का पहला वाक्या था, जब कोई मर्द मुझसे इतनी बेरुखी के साथ पेश आ रहा था।

वरना मर्द तो मेरी कंचन—सी काया को देखकर हमेशा मेरे ऊपर भूखे कुत्तों की तरह झपटते थे।

उस रात मैं सैक्स की तृषाग्नि में जलती हुई खामोशी के साथ बिस्तर पर लेट गयी। यह बड़ी अजीब बात है, जिस नाइट क्लब की कल्पना से ही मुझे खौफ सताने लगता था, उस रात मुझे उसी नाइट क्लब की बड़ी शिद्दत के साथ याद आयी। मेरी इच्छा हुई कि मैं अभी दौड़कर वहां पहुंचूं और अपना कोई पुराना मुरीद, कोई पुराना एडमायरर पकड़कर उससे अपने शरीर की प्यास बुझा लूं। अपनी उस खतरनाक इच्छा का मैं उस रात बड़ी मुश्किल से दमन कर सकी।

•••
 
फिर अगले दिन सुबह ही डॉक्टर अय्यर पैंथ हाउस में आया था और वो अपनी बीस लाख रुपये की रकम ले गया।

बीस लाख रुपये भी वो इस तरह ठोक—बजाकर ले गया, मानों उस रकम को लेकर भी वो हम दोनों पर ही बड़ा भारी अहसान कर रहा था।

मानो उसने वो रकम हाथ उधार दी हुई थी, जिसे अब हम लौटा रहे थे।

ऐसी सुअर नस्ल वाला आदमी था डॉक्टर अय्यर!

फिर कई दिन गुजरे।

ब्लैकमेलिंग का वो सिलसिला एक बार शुरू हुआ, तो उसके बाद उसने रुकने का नाम ही नहीं लिया।

पहले बीस लाख।

फिर तीस।

फिर चालीस।

उसके बाद सीधे पचास लाख।

डॉक्टर अय्यर के मुंह अब खून लगा चुका था।

गन्दा खून!

•••

तिलक राजकोटिया भी अब काफी अपसेट रहने लगा था।

शाम के समय वो अपने शयनकक्ष के बार काउंटर पर बैठा शराब पी रहा था और मौजूदा सिलसिले के कारण काफी परेशान था।

फिलहाल वो आधी से ज्यादा बोतल खाली कर चुका था।

उसके पुराने अवगुण दोबारा सिर उठाने लगे थे।

“अब बस भी करो तिलक!” मैं उसके नजदीक पहुंचकर बोली—”और कितनी देर तक पीते रहोगे।”

“मेरे कुछ समझ नहीं आ रहा है।” तिलक ने गुस्से में झुंझलाकर जोर से टेबिल पर घूंसा मारा—”कि मैं क्या करूं? कैसे करूं?”

“देखो- इसमें कोई शक नहीं।” मैं उसके करीब बार काउंटर के दूसरे स्टूल पर बैठते हुए बोली—”कि अगर जल्दी ही उस मद्रासी डॉक्टर का कुछ इलाज न किया गया, तो उसकी डिमांड बढ़ती चली जाएगी। और डिमांड बढ़ते—बढ़ते एक ऐसी स्टेज पर भी पहुंच सकती है—जिसे फिर शायद पूरा करना तुम्हारे लिए नामुमकिन होगा। इसलिए हमें जल्द ही किसी प्रकार इस समस्या से निपटना चाहिए।”

“लेकिन सवाल तो ये है शिनाया!” तिलक फुंफकारा—”कि इस समस्या से किस तरह निपट सकते हैं?”

“एक तरीका है।” मेरी आवाज एकाएक काफी रहस्यमयी हो उठी—”जिसके बलबूते पर हम इस समस्या से निपट सकते हैं।”

तिलक राजकोटिया चौंक उठा।

“तरीका!”

“हां।”

“क्या तरीका?” उसने विस्मित निगाहों से मेरी तरफ देखा।

वो शराब पीना भूल गया।

“हमें डॉक्टर अय्यर को भी बृन्दा के पास ही पहुंचाना होगा।”

“यानि एक और हत्या!” तिलक के मुंह से तेज सिसकारी छूट पड़ी।

उसके चेहरे पर जबरदस्त आतंक के भाव दौड़े।

“हां।”

“नहीं-नहीं।” तिलक राजकोटिया की गर्दन इंकार की सूरत में हिली—”हत्या के एक मामले को छुपाने के लिए हम दूसरी हत्या नहीं करेंगे शिनाया।”

“सोच लो तिलक!” मेरी आवाज में दृढ़ता थी—”इस समस्या से निपटने का इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। फिर आखिर तुम कब तक उसकी डिमांड पूरी करोगे- कब तक?”

“लेकिन तुम एक बात नजरअंदाज कर रही हो शिनाया।”

तिलक साफ—साफ विचलित नजर आ रहा था।

एक और हत्या की बात ने उसे झकझोर डाला था।

“कौन—सी बात?”

“यही कि उस दुष्ट आदमी ने अपना एक राजदार भी बनाया हुआ है, जो इस पूरे प्रकरण से वाकिफ है।”

“यह सब बेकार की बात है।” मैं बोली—”इस तरह के लालची लोग कभी अपना कोई राजदार नहीं बनाते तिलक! क्योंकि राजदार बनाने का मतलब है, उसे भी हिस्सा देना होगा। उसे भी फिफ्टी परसेंट का पार्टनर बनाना होगा। तुम्हें क्या लगता है, डॉक्टर अय्यर जैसा पाई—पाई के लिए जान छिड़कने वाला आदमी किसी के साथ रकम का बंटवारा कर सकता है?”

तिलक कुछ न बोला।

उसने सिर्फ शराब का एक घूंट भरा।

“जवाब दो मेरी बात का तिलक?”

“लगता तो नहीं?” तिलक राजकोटिया हिचकिचाये स्वर में बोला—”कि वो रकम का किसी के साथ बंटवारा कर सकता है। लेकिन अगर वो यह बात कह रहा है, तो उसमें कुछ—न—कुछ सच्चाई तो जरूर होगी।”

“कोई सच्चाई नहीं है। वो यह बात हमें सिर्फ डराने के लिए कह रहा है।” मैं बोली—”हमारे ऊपर अपना रौब गालिब करने के लिए कह रहा है, ताकि हम उसके खिलाफ कोई गलत कदम न उठा सकें। ताकि हम कोई ऐसा षड्यंत्र न रच सकें, जैसा षड्यंत्र रचने की हम फिलहाल कोशिश कर रहे हैं।”

“लेकिन अगर सच में ही उसका कोई राजदार हुआ तो?”

“मैंने कहा न!” मैं पुनः पूरी दृढ़ता के साथ बोली—”नहीं है।”

“लेकिन अगर उसका कोई राजदार हुआ, तब क्या होगा?” तिलक आशंकित स्वर में बोला—”तब तो हम एक और नये झंझट में फंस जाएंगे। और उसके बाद यह भी पता नहीं है कि हम उस झंझट से कभी निकल भी पाएं या नहीं।”

मैं सोचने लगी।

कुछ भी था- आखिर अपनी जगह यह सम्भावना तो थी ही कि डॉक्टर अय्यर ने अपना कोई राजदार भी बनाया हो सकता था।

मैं सोचती रही।

“इसका भी एक तरीका है।” आखिरकार मैं बोली।

“क्या?”

मैंने तिलक को तरीका बताया।

तरीका सुनकर उसकी उम्मीद कुछ बंधी।

उसकी आंखों में हल्की चमक पैदा हुई।

•••
 
लेकिन तिलक राजकोटिया अब डरा हुआ बहुत था।

खासतौर पर हत्या के नाम से तो वह बार—बार कांप जा रहा था।

वह हत्या के बारे में सोचता भी तो उसके पूरे शरीर में सनसनाहट दौड़ जाती।

“शिनाया!” उस रात तिलक राजकोटिया ने मुझे अपनी बांहों में भरकर सवाल किया—”क्या इस समस्या का कोई और समाधान नहीं है? क्या किसी और तरह से हम उस मद्रासी डॉक्टर से पीछा नहीं छुड़ा सकते?”

“मेरी निगाह में तो कोई और तरीका नहीं है।” मैंने अपने धधकते होंठ तिलक के होठों पर रखे—”अगर कोई और तरीका होता माई डियर- तो मैं तुम्हें सबसे पहले वही तरीका सुझाती। आखिर मैं भी तो नहीं चाहती कि किसी के खून से हाथ रंगे जाएं।”

तिलक की शरारती उंगलियां मेरे उरोजों पर फिरने लगीं।

मेरे पूरे शरीर में करण्ट—सा दौड़ा।

“फिर भी सोचकर देखो डार्लिंग- शायद कोई तरीका सूझ जाए।”

“मैं काफी सोच चुकी हूं तिलक!” मैं बोली—”सच तो ये है- जिस दिन डॉक्टर अय्यर ने तुमसे तीन लाख रुपये की पहली किश्त ली थी, मैं उसी दिन से इस पूरे सिलसिले पर गौर कर रही हूं। लेकिन मुझे इसके अलावा दूसरा कोई तरीका नहीं सूझा।”

तिलक की शरारती उंगलियां अब मेरी जांघों तक पहुंच गयी थीं।

मेरे होंठों से मादक सिसकारियां फूट पड़ीं।

“लेकिन एक और हत्या करने में रिस्क तो है शिनाया।”

“बिल्कुल है।” मैंने उसे कसकर अपनी बांहों में जकड़ लिया—”लेकिन अगर हमने अपनी जान बचानी है,तो हमें यह रिस्क तो अब उठाना ही होगा।”

काश!

मैंने सोचा- तिलक राजकोटिया जानता होता कि वह एक और हत्या करते हुए कांप रहा है, जबकि मैं तो एक और हत्या कर भी चुकी थी।

सचमुच अपराध एक अनवरत् और बहुत भयानक दलदल की तरह है, जिसमें मनुष्य अगर एक बार धंसना शुरू होता है, तो फिर धंसता ही चला जाता है।

गहरा!

और गहरा!

तिलक मुझे अपनी बांहों में भरे सोचता रहा कि उसे अब अगला कदम क्या उठाना चाहिए?

“ठीक है।” आखिरकार वो मुझसे थोड़ा दूर हटकर बहुत सख्ती के साथ बोला—”अगर यह बात है शिनाया, तो हम एक और हत्या करेंगे।”

“यानि डॉक्टर अय्यर की मौत अब निश्चित है।”

“बिल्कुल।”

परन्तु उस क्षण तिलक राजकोटिया के चेहरे से साफ लग रहा था, उसने वो फैसला बहुत मजबूरी में, बहुत दिल कठोर करके किया है।
 
11

एक और मर्डर प्लानिंग

दिन निकलते ही डॉक्टर अय्यर की हत्या के पत्ते फैलने शुरू हो गये।

एक और हत्या की योजना का ताना—बाना बुना जाने लगा।

तिलक ने सबसे पहले डॉक्टर अय्यर को लेंडलाइन से फ़ोन किया। मैंने उस ‘कॉन्फ्रेंस फोन’ का स्पीकर वाला बटन दबा दिया था, ताकि दोनों तरफ का वार्तालाप मैं आसानी के साथ सुन सकूं।

इसके अलावा तिलक राजकोटिया ने डॉक्टर अय्यर से क्या कहना है, यह सब मैं उसे समझा चुकी थी।

“हैलो!” दूसरी तरफ से आवाज आयी।

“कौन- डॉक्टर अय्यर?” तिलक बोला।

“यस आई एम स्पीकिंग।”

“मैं तिलक बोल रहा हूं डॉक्टर।”

“ओह!” डॉक्टर अय्यर हंसा।

उसकी हंसी में साफ—साफ व्यंग्य का पुट झलक रहा था।

लेकिन तिलक राजकोटिया और मैं उसकी उस हंसी से जरा भी विचलित न हुए।

उससे इस तरह की हरकत हमें पहले से ही अपेक्षित थी।

“ऐन्ना!” वह बोला—”आज इस डॉक्टर की याद कैसे आ गयी? आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया?”

तिलक ने योजना के मुताबिक अपनी आवाज में भारी संजीदगी के भाव पैदा किए।

“डॉक्टर!” तिलक बोला—”मैं तुमसे बहुत जरूरी बात करना चाहता हूं।”

“तो फिर करो ऐन्ना- मना किसने किया है!”

“दरअसल मैं पिछली कई रातों से ढंग से सो नहीं पाया हूं डॉक्टर!”

“तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं?” डॉक्टर अय्यर पुनः हंसा—”आपकी इस बेचैनी का मेरे पास कौन—सा इंलाज है?”

“इलाज तुम्हारे ही पास है।”

“क्या?”

“दरअसल नींद न आने की वजह तुम हो डॉक्टर... तुम!” तिलक राजकोटिया आंदोलित लहजे में बोला—”तुम्हारे खतरे की जो तलवार हर समय मेरे सिर पर लटकी रहती है- उसने मुझसे मेरा सकून छीन लिया है।”

“इसके लिए मुझे दोष मत दो।” डॉक्टर अय्यर बोला—”इसकी जड़ में तुम खुद हो। तुम्हारी अपनी करतूतें हैं। ऐन्ना, अगर तुमने बृन्दा का मर्डर न किया होता, तो जरा सोचो- मेरी क्या मजाल थी, जो मैं खतरे की तलवार तुम्हारे सिर पर लटकाता। तुम्हें ब्लैकमेल करता।”

“मैं कबूल करता हूं, मुझसे गलती हुई है।”

“गलती नहीं ऐन्ना- बहुत बड़ी गलती।”

मैं वह पूरा वार्तालाप ‘कांफ्रेंस फोन’ के स्पीकर पर सुन रही थी।

अभी तक एक—एक बात मेरी ‘योजना’ के अनुरूप हो रही थी।

“देखो डॉक्टर!” तिलक ने ‘असली चाल’ चली—”अभी तक जो हुआ... हुआ, लेकिन अब मैं चाहता हूँ कि इस मामले का हमेशा—हमेशा के लिए पटाक्षेप हो जाये। हमेशा—हमेशा के लिए यह झंझट खत्म हो।”

“कैसे?”

“उसका भी एक तरीका मैंने सोचा है।” तिलक बोला—”अगर तुम्हें ऐतराज न हो, तो मैं तुम्हें ब्लैकमेलिंग की एकमुश्त रकम देना चाहता हूं,ताकि तुम मुझे बार—बार आकर तंग न करो और फिर हमेशा के लिए इस बात को भूल जाओ कि बृन्दा की हत्या भी हुई थी।”

“मुझे भला क्या ऐतराज हो सकता है ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर प्रफुल्लित मुद्रा में बोला—”मेरे को तो बस रोकड़े से मतलब है। नगदऊ से मतलब है। बल्कि यह तो मेरे लिए और भी अच्छा है कि सारा रोकड़ा मुझे एकमुश्त मिल जाएगा।”

“यानि तुम ब्लैकमेलिंग की इस कहानी का पटाक्षेप करने के लिए तैयार हो?”

“बिल्कुल तैयार हूं ऐन्ना! बस मेरी दो शर्तें हैं।”

“क्या?”

“पहली शर्त- रोकड़े की रकम जरा भारी—भरकम हो, जो सारा काम एकमुश्त निपटाते हुए अच्छा लगे। दूसरी शर्त, सारा रोकड़ा हाथ—के—हाथ मिलना चाहिए।”

“दोनों ही शर्तें मुझे कबूल हैं।”

“फिर क्या बात है ऐन्ना! फिर तो आप मेरे को बस यह बताइए कि नगदऊ गिनने के वास्ते मुझे आपके पास कब आना होगा?”

तिलक ने अब मेरी तरफ देखा।

मैंने उसकी तरफ उंगली से कुछ इशारा किया और हथेली पर उंगली से ही कुछ अंक बनाए।

“ठीक है।” तिलक बोला—”तुम आज रात सही बारह बजे पैंथ हाउस में पहुंचो,तभी बैठकर बात करते हैं।”

“बारह बजे!”

डॉक्टर अय्यर सकपकाया।

“हां।”

“ऐन्ना- क्या बात है।” वो सशंकित स्वर में बोला—”इतनी रात को मुझे पैंथ हाउस में बुलाकर क्या करना है?”

“चिंता मत करो- बस बातें ही करनी हैं।”

“बारह बजे? आधी रात को??”

“दरअसल मैं नहीं चाहता,” तिलक ने सफाई दी—”कि तुम्हें पैंथ हाउस में ज्यादा लोग आते—जाते देखें, इसलिए मैंने अर्द्धरात्रि का समय चुना है, जोकि बहुत मुनासिब है। वैसे भी पिछले कुछेक दिनों में तुम्हारे काफी चक्कर पैंथ हाउस के लग चुके हैं। अगर तुम्हारे और ज्यादा चक्कर लगेंगे- तो लोगों को शक होगा कि पेंथ हाउस में कोई बीमार भी नहीं है, फिर भी डॉक्टर यहां इतना क्यों आता है।”

डॉक्टर अय्यर सोच में डूब गया।

मैं भांप गयी, वो सही—गलत परिस्थिति का आंकलन करने की कोशिश कर रहा है।

मैंने तुरन्त तिलक को फिर कुछ इशारा किया।

“देखो!” तिलक उसे ज्यादा सोचने की मोहलत दिये बिना बोला—”अगर तुम्हें कुछ शक हो रहा है, तो तुम दिन में भी किसी वक्त आ सकते हो। मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही यह सब कह रहा हूं।”

“नहीं- नहीं, शक वाली कोई बात नहीं है।” डॉक्टर अय्यर बोला—”ठीक है ऐन्ना, मैं आज रात सही बारह बजे पैंथ हाउस पहुंच जाऊंगा।”

“और कोशिश करना कि ज्यादा लोगों की निगाह तुम्हारे ऊपर न पड़े।”

“मुरुगन की कृपा रही- तो ऐसा ही होगा।”

“गुड बॉय!”

“गुड बॉय!”

तिलक राजकोटिया ने रिसीवर रख दिया।

•••
 
वो एक काफी खूबसूरत सोफा चेयर थी, जिस पर तिलक बहुत गहरी सांस लेकर ढेर हो गया। दोनों टांगें उसने सामने फैला लीं और हाथ सिर के नीचे रख लिये।

“बारह बजे!” वो शुष्क स्वर में बोला—”डॉक्टर आज रात ठीक बारह बजे यहां पहुंच रहा है शिनाया!”

“चिंता मत करो।” मैं बोली—”अगर भगवान ने चाहा, तो सब कुछ ठीक ही होगा।”

“भगवान!” उसकी आवाज कुपित हो उठी—”कितनी अजीब बात है, हम एक खून करने जा रहे हैं और उसमें भी हम यह चाहते हैं कि भगवान हमारा साथ दे!”

मेरे जिस्म का एक—एक रोआं खड़ा हो गया।

तिलक जिस प्रकार आध्यात्मिक बातें कर रहा था, उससे मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ।

कहीं हत्या के दौरान वह कुछ कमजोर न पड़ जाए?

कहीं उससे कुछ गड़बड़ न हो जाए?

“अगर तुम्हें इस काम को सही तरह से निपटाना है तिलक!” मैं बोली—”तो तुम्हें अपने आपको मजबूत बनाना होगा।”

“मैं मजबूत ही हूं।”

“नहीं- तुम मजबूत नहीं हो।” मैं सख्ती के साथ बोली—”मजबूत और दृढ़ इरादों वाले आदमी इस प्रकार की बातें नहीं किया करते।”

तिलक कुछ न बोला।

लेकिन लग रहा था, वह अपने आपको इस काम के लिए तैयार कर रहा है।

“तुमने हथियार का इंतजाम तो कर लिया है न तिलक?”

“हां।” तिलक ने अपनी जेब से एक 32 कैलीबर की स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर निकालकर मुझे दिखाई—”हथियार का इंतजाम मेरे पास पहले से ही है।”

“गुड!”

मैंने तिलक के हाथ से वो रिवॉल्वर ले ली और उसे उलट—पलटकर देखने लगी।

रिवॉल्वर वाकई बहुत खूबसूरत थी।

खासतौर पर उसका ट्रेगर पानी के धारे की तरह चलता था।

उस रिवॉल्वर को हैण्डिल करना बहुत आसान था।

इतना आसान!

जरूरत पड़ने पर उसे मैं भी चला सकती थी।

•••

वह पैंथ हाउस का सबसे अंदरूनी ‘सत्तर नम्बर’ कमरा था, जहां रात के समय तिलक और मैं बैठे हुए बड़ी बेसब्री से डॉक्टर अय्यर के आने का इंतजार कर रहे थे।

मौसम आज शाम से ही काफी खराब हो चुका था। पहले हल्की—फुल्की बूंदा—बांदी शुरू हुई और फिर तेज मूसलाधार बारिश होने लगी।

रह—रहकर आसमान का सीना चाक करके बिजली कड़कड़ा उठती।

ऐसा लगता था- मानों मौसम की सारी बारिश उसी दिन होकर रहेगी।

“बारह बज चुके हैं।” मैंने वॉल क्लॉक पर दृष्टि दौड़ाई—”अभी तक नहीं आया डॉक्टर?”

“मुझे तो लगता है!” तिलक बोला—”वो आज आएगा भी नहीं।”

तभी फिर बहुत जोर से बिजली कड़कड़ाई।

“उफ्- मौसम कितना खराब है।”

“ऐसा नहीं हो सकता।” मेरे स्वर में यकीन था— “वह जरूर आएगा। वह लालची आदमी है और किसी लालची आदमी के सामने जब धन का इतना बड़ा प्रलोभन हो, तो वह कभी नहीं रुकता।”

समय बहुत धीमी गति से आगे सरकता रहा।

सवा बारह बज गये।

लेकिन डॉक्टर अय्यर फिर भी न आया।

अब मेरा यकीन भी हिलने लगा। मैं विचलित हो उठी।

“मुझे तो लगता है शिनाया!” तिलक बोला—”तुम्हारी योजना फेल हो चुकी है।”

“नहीं- नहीं।”

“यह सच है। हमने क्योंकि उसे इतनी रात को बुलाया था, इसी कारण उसे हमारे ऊपर शक हो गया है।”

मेरा दिल डूबने लगा।

क्या सचमुच मेरी योजना फेल हो चुकी थी?

क्या उस मद्रासी डॉक्टर को वाकई शक हो गया था, हम उसकी हत्या करने वाले हैं?

तभी एकाएक उम्मीद की किरण रोशन हुई।

रात के सन्नाटे में पैंथ हाउस की डोरबेल बिल्कुल इस तरह चीखी- मानों मिल का कोई भोंपू बज उठा हो।

•••
 
मेरे शरीर में अद्तीय फुर्ती समां गयी।

मैंने दौड़कर दरवाजा खोला।

जब तक दरवाजा खोला- तब तक एक बार और डोरबेल चीख उठी थी।

सामने डॉक्टर अय्यर ही खड़ा था।

बारिश से बचने के लिए वो टखनों तक लम्बा रेनकोट पहने हुए था और सिर पर काले रंग का फेल्ट कैप लगाये था। पैरों में गम बूट थे। अलबत्ता फेल्ट कैप वो अपने चेहरे पर झुकाये हुए था। एकाएक मैं उसे पहचान न सकी। जब उसने कैप सिर से उतारा, तब मैं उसे पहचानी कि वो डॉक्टर अय्यर था।

“सॉरी मैडम!” वो खेदपूर्ण लहजे में बोला—”मैं पन्द्रह मिनट लेट हूं।”

“पन्द्रह नहीं- बीस मिनट।”

“ओह!” वह मुस्कराया—”शायद पांच मिनट मुझे नीचे से पैंथ हाउस तक आने में लग गये हैं। दरअसल इतनी देर भी मूसलाधार बारिश के कारण हो गयी। सड़क पर कई जगह घुटनों—घुटनों तक पानी भरा हुआ है, इसी कारण वाहनों के आवागमन में दिक्कत हो रही है।”

“कोई बात नहीं।” मैं दरवाजा छोड़कर एक तरफ हटी—”अंदर आओ।”

डॉक्टर अय्यर ने अंदर कदम रखा।

अंदर आते ही उसने अपना फेल्ट कैप हैंगर पर लटका दिया। फिर बारिश के पानी में बुरी तरह भीगा हुआ रेनकोट भी उतारकर उसी हैंगर पर लटकाया।

“बारिश भी आज काफी तेज है।” वह अपने जूते झाड़ता हुआ बोला—”ऐसा लगता है, जैसे सारी रात पानी बरसेगा। तिलक साहब कहां हैं?”

“वह अंदर तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

तब तक मैंने आगे बढ़कर पैंथ हाउस का मेन गेट वापस बंद कर दिया था।

“मेरे साथ आओ।” मैं अंदर की तरफ बढ़ी।

डॉक्टर अय्यर मेरे पीछे—पीछे चल पड़ा।

मैं सबसे अंदरूनी कमरे की तरफ बढ़ रही थी।

“क्या तिलक साहब अंदर हैं?”

“हां।”

“बड़े आश्चर्य की बात है ऐन्ना! पहले तो कभी मैंने उन्हें पैंथ आउस में इतना अंदर नहीं देखा था।”

“दरअसल जो सौदा आज रात होने वाला है,” मैं बोली—”उस सौदे को करने के लिए ही उन्होंने खासतौर पर उस कमरे का चयन किया है।”

डॉक्टर अय्यर के चेहरे पर कौतुहलता के भाव उभरे।

“सौदे को करने के लिए किसी खास कमरे का चयन करने की क्या जरूरत थी?”

“यह तो तुम्हें वहां पहुंचने के बाद ही मालूम होगा।”

•••

जल्द ही डॉक्टर अय्यर और मैं उस ‘सत्तर नम्बर’ कमरे में दाखिल हो गये।

उस पूरे कमरे में सिर्फ तीन कुर्सियां पड़ी हुई थीं और उन कुर्सियों के बीच में एक गोल टेबिल पड़ी थी। एक कुर्सी पर तिलक राजकोटिया विराजमान था।

न जाने क्यों कमरे में दाखिल होते ही डॉक्टर अय्यर के चेहरे पर संशय के भाव उभरे।

“वेलकम डॉक्टर- वेलकम!” तिलक राजकोटिया कुर्सी छोड़कर खड़ा हुआ—”काफी देर इंतजार कराया।”

“सॉरी! मुझे मालूम नहीं था- आप लोग इतनी बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहे हैं।”

डॉक्टर अय्यर व्यग्र निगाहों से इधर—उधर देखने लगा।

कमरा का माहौल उसे काफी संदेहजनक लगा।

“तुम्हें किसी ने ऊपर आते देखा तो नहीं?”

“नहीं- मैं काफी ऐहतियात के साथ आया हूं ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर बोला—”वैसे भी मूसलाधार बारिश के कारण पूरे होटल में सन्नाटा है।”

“गार्ड्स ने तो जरूर देखा होगा?”

“मालूम नहीं।”

तिलक चहलकदमी—सी करता हुआ अब डॉक्टर अय्यर के काफी नजदीक आ चुका था।

“मैंने यहां तक आने में पूरी ऐहतियात बरती है ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर कह रहा था—”यहां तक कि अपनी कार भी होटल की पार्किंग में खड़ी नहीं की।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं अपनी कार होटल की पार्किंग में खड़ी करता,” वह बोला—”तो वहां के गार्ड की निगाह में न आ जाता ऐन्ना! इसलिए मैं जानबूझकर अपनी कार पार्किंग से थोड़ा अलग हटकर एक इमारत के सामने खड़ी कर आया हूं। वैसे भी मैंने यहां कोई तीन—चार घण्टे थोड़े ही रुकना है।”

“वैरी गुड।” मैं प्रसन्नतापूर्वक बोली—”सचमुच तुमने काफी बुद्धिमानी का परिचय दिया है डॉक्टर!”

“बैठो।” तिलक बोला।

“नहीं- मैं ऐसे ही ठीक हूं।” डॉक्टर ने पुनः थोड़े विचलित अंदाज में कहा—”दरअसल आप लोगों ने सौदे के बारे में जो भी बात करनी है, थोड़ा जल्दी कर लो।”

“सौदे के बारे में भी बात करते हैं, शिनाया!” तिलक एकाएक सीधे मुझसे सम्बोधित हुआ—“ज़रा कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लो।”

“द... दरवाजा बंद करने की क्या जरूरत है?” डॉक्टर अय्यर सकपकाया।

“अभी मालूम हुआ जाता है- क्या जरूरत है।”

तिलक का हाथ बड़ी तेजी से अपनी जेब की तरफ रेंगा।

फिर इससे पहले कि उसका हाथ जेब से बाहर निकलता, डॉक्टर अय्यर खतरा भांप गया।

वह एकदम मुड़ा और कमान से छूटे तीर की भांति दरवाजे की तरफ भागा।

दरवाजे पर ऐसे ही किसी हालात का सामना करने के लिए मैं खड़ी थी।

अलबत्ता तब तक मैं दरवाजा बंद नहीं कर पायी थी।

मैंने फौरन बिजली जैसी फुर्ती के साथ वहीं एक कोने में रखी लोहे की रॉड उठा ली। फिर डॉक्टर अय्यर जैसे ही दरवाजे के नजदीक पहुंचा, मैंने अपनी पूरी शक्ति के साथ रॉड का वज्र प्रहार उसके ऊपर किया।

रॉड सीधे उसके मुंह पर पड़ी।

डॉक्टर अय्यर बिल्कुल इस तरह बिलबिला उठा, मानों कुत्ते की पूंछ किसी पहिये के नीचे आ गयी हो।

वह दहाड़ता हुआ नीचे फर्श पर गिरा।

वह सम्भलता- उससे पहले ही मैंने एक जोरदार ठोकर उसके पेट में जड़ी।

उसी क्षण तिलक ने उसे गले से कसकर पकड़ लिया तथा फिर झटके से उठाकर कुर्सी पर बिठाया। इतना ही नहीं, फौरन उसकी तरफ अपनी स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर भी तान दी।

रिवॉल्वर देखकर डॉक्टर अय्यर के शरीर में भीषण प्रकम्पन्न हुआ।

“अगर जरा भी हिले!” तिलक राजकोटिया आक्रोश में बोला—”तो गोली सीधे तुम्हारी खोपड़ी के आर—पार होगी- अभी इसी कुर्सी पर तुम्हारी लाश पड़ी होगी।”

डॉक्टर अय्यर आतंकित हो उठा।

“शिनाया इसकी तलाशी लो।”

मैंने फौरन आगे बढ़कर डॉक्टर अय्यर की तलाशी ली।

उसके पास से एक देसी पिस्तौल बरामद हुई, जो पेण्ट की बेल्ट में अंदर की तरफ खुंसी हुई थी।

अपनी पिस्तौल भी छिनते देखकर अय्यर के कस—बल बिल्कुल ढीले पड़ गये।

उसके चेहरे की रंगत सफेद हो गयी।

•••
 
“ल... लेकिन तुमने तो मुझे यहां सौदे के लिए बुलाया था ऐन्ना!” डॉक्टर अय्यर की आंखों में अब साक्षात् मौत ताण्डव नृत्य कर रही थी।

“हां- यह सौदा ही है।” तिलक गुर्राया—”एकमुश्त सौदा! तुम्हारे जैसे दुष्ट आदमी से सौदा करने का यही एक तरीका है कि तुम्हें सीधा जहन्नुम पहुंचा दिया जाए।”

“लेकिन तुम भूल रहे हो!” वो शुष्क स्वर में बोला—”अगर मैं एक घण्टे के अंदर—अंदर इस पैंथ हाउस से बाहर न निकला, तो मेरा राजदार पुलिस को जाकर सब कुछ बता देगा। वो तुम्हारे तमाम कुकर्मों का भांडा फोड़ देगा।”

“राजदार!” तिलक ने उसका गिरेहबान सख्ती के साथ पकड़ लिया और हंसा—”तुम क्या समझते हो मूर्ख आदमी! तुम्हारी इस झूठी कहानी के मायाजाल में हम अभी तक फंसे रहेंगे? हम अभी तक यह समझते रहेंगे कि तुम्हारा कोई राजदार भी है।”

“यह झूठी कहानी नहीं है।”

“यह झूठी ही कहानी है।” तिलक राजकोटिया बहुत बुलंद आवाज में चिंघाड़ा—”सच तो ये है, तुम्हारा कोई राजदार नहीं है। कोई साथी नहीं है और अगर तुम्हारा कोई राजदार है भी!” तिलक ने एक बिल्कुल नया रहस्योद्घाटन किया—”तो अब हमें उसकी भी कोई परवाह नहीं।”

डॉक्टर अय्यर चौंका।

उसके चेहरे पर विस्मयपूर्ण भाव उभरे।

“क्यों?” वह बोला—”तुम्हें अब उसकी परवाह क्यों नहीं ऐन्ना?”

“क्योंकि हम तुम्हारी हत्या अभी नहीं कर रहे हैं डॉक्टर!” तिलक ने उसे अपनी ‘योजना’ समझायी—”बल्कि पहले कुछ दिन हम तुम्हें पैंथ हाउस के इसी कमरे में बंधक बनाकर रखेंगे। फिर उसके बाद देखते हैं कि तुम्हारा कौन राजदार ‘बृन्दा मर्डर केस’ की इस पूरी स्टोरी को लेकर पुलिस तक पहुंचता है। अगर तुम्हारा कोई राजदार है—तो अब तुमसे पहले वो मरेगा। पहले वो जहन्नुम पहुंचेगा।”

“अ... और अगर नहीं है?”

“तो फिर चिंता किस बात की है।” तिलक बोला—”तुमने तो जहन्नुम पहुंचना—ही—पहुंचना है। लेकिन फिलहाल कुछ दिन के लिए तुम्हारी मौत टल गयी है—कुछ दिन तुमने इसी कमरे के अंदर बंद रहना है।”

डॉक्टर अय्यर काफी आंदोलित दिखाई पड़ने लगा।

वो खुद को बुरी तरह फंसा अनुभव कर रहा था।

तिलक ने स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर अभी भी उसकी तरफ तानी हुई थी।

“शिनाया—तुम वही रस्सी लेकर आओ, जिससे हमने बृन्दा को बांधा था।” तिलक राजकोटिया ने आखिरी शब्द जानबूझकर उस पर रौब गालिब करने के लिए कहे।

मैं कमरे से बाहर निकल गयी।

जल्द ही मैं नायलोन की रस्सी लेकर वापस कमरे में दाखिल हुई।

रस्सी को देखते ही डॉक्टर अय्यर एकदम झटके से कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया और वह बिना रिवॉल्वर का खौफ खाये एक बार फिर दरवाजे की तरफ भागा।

लेकिन उसके सामने मैं खड़ी थी।

मैंने नायलोन की रस्सी का गुच्छा जोर से उसके मुंह पर खींचकर मारा।

वो चीखा।

तभी तिलक राजकोटिया ने पीछे से रिवॉल्वर की बैरल का प्रचण्ड प्रहार उसकी खोपड़ी पर किया।

इस मर्तबा उसके हलक से बहुत घुटी—घुटी चीख निकली और वह अपनी खोपड़ी पकड़कर वहीं ढे़र होता चला गया।

तत्काल हम दोनों ने उसे सख्ती के साथ पकड़कर वापस कुर्सी पर बिठा दिया और रस्सी से उसके हाथ—पैर जकड़ने शुरू कर दिये।

फिर उसका मुंह भी जकड़ा।

•••

मेरे हौंसले इस बार बहुत बुलंद थे।

आखिर मैं दो—दो हत्यायें कर चुकी थी।

हम दोनों अब उस कमरे का कुण्डा लगाकर ड्राइंगहॉल में आ चुके थे। अलबत्ता कमरा छोड़ने से पहले मैंने डॉक्टर अय्यर की जेब से उसकी कार की चाबी भी बरामद कर ली।

मूसलाधार बारिश का क्रम अभी भी जारी था।

“सब कुछ तुम्हारी योजना के अनुसार हो रहा है शिनाया!” तिलक शुष्क स्वर में बोला—”लेकिन एक बात का मुझे अभी भी डर है।”

“किस बात का?”

“अगर वास्तव में ही इसका कोई राजदार निकल आया—तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी।”

“बेफिक्र रहो।” मेरे स्वर में यकीन कूट—कूटकर भरा था—”कोई गड़बड़ नहीं होने वाली है तिलक! अगर कोई करिश्मा ही हो जाए—तब बात अलग है। वरना उसका कोई राजदार नहीं निकलने वाला है।”

“कार की चाबी कहां है?”

“मेरे पास है।” मैंने अपनी जेब से कार की चाबी निकालकर तिलक को दिखाई।

“अब हमें सबसे पहले डॉक्टर अय्यर की कार को होटल के पास से हटाने का काम करना चाहिए। लाओ- चाबी मुझे दो। यह काम मैं करता हूं।”

“नहीं- तुम नहीं। यह काम मैं ही करूंगी।”

“तुम!”

“हां- फिलहाल तुम्हारा पैंथ हाउस के अंदर रहना ही ज्यादा मुनासिब है। फिर मुम्बई शहर में मेरे से ज्यादा लोग तुम्हें पहचानते हैं। तुम एक पॉपुलर पर्सनेलिटी हो। मैं नहीं चाहती कि कोई तुम्हें डॉक्टर अय्यर की कार में देखे।”

“लेकिन क्या तुम यह काम कर सकोगी?”

“चिंता मत करो।” मैं बोली—”इस काम को करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है तिलक!”

•••
 
पैंथ हाउस के दरवाजे के नजदीक पहुंचकर मैं ठिठकी।

वहां हैंगर पर अभी भी डॉक्टर अय्यर का रेनकोट और फेल्ट कैप टंगा हुआ था। मैंने वह दोनों चीजें ही पहन लीं। उसके गम बूट भी पहन लिये। एकाएक मेरा व्यक्तित्व काफी बदला हुआ नजर आने लगा।

अपने बाल मैंने जूड़े की शक्ल में लपेटकर फेल्ट कैप के अंदर कर लिये थे।

फेल्ट कैप मैंने चेहरे पर थोड़ा आगे को झुका लिया।

अब एकाएक यही मालूम नहीं हो रहा था कि मैं कौन हूं।

औरत!

या आदमी!

“वैरी गुड!” तिलक राजकोटिया मेरे उस रूप को देखकर मेरी तारीफ किये बिना न रह सका—”सचमुच अब तुम्हें कोई नहीं पहचान सकता। बल्कि अगर किसी ने डॉक्टर अय्यर को पैंथ हाउस में आते देखा भी होगा, तो वो यही समझेगा कि अब डॉक्टर अय्यर वापस जा रहा है। बस किसी की निगाह आसानी से अपने चेहरे पर मत पड़ने देना।”

“बेफिक्र रहो- मैं इस बात का खास ख्याल रखूंगी।”

“लो।” तिलक राजकोटिया ने स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर मेरी तरफ बढ़ाई—”इसे अपने पास रख लो।”

“नहीं- इसकी मेरे से ज्यादा जरूरत यहां तुम्हें है तिलक।”

“लेकिन...।”

“डोंट वरी! मुझे कुछ नहीं होने वाला है। वैसे भी मेरे पास डॉक्टर अय्यर की पिस्तौल है।”

मैंने अपनी वह जेब थपथपाई, जिसमें पिस्तौल रखी हुई थी।

फिर मैं पैंथ हाउस से बाहर निकल गयी।

•••

उस मद्रासी डॉक्टर की कार तलाशने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा था।

जैसाकि डॉक्टर अय्यर ने बताया था, उसकी कार पार्किंग से थोड़ा अलग हटकर एक इमारत के सामने खड़ी थी। वह व्हाइट कलर की पजेरो थी।

मैं लम्बे—लम्बे डग रखती हुई कार के नजदीक पहुंची।

मूसलाधार बारिश तब भी हो रही थी।

आसपास की इमारतों के पतनाले खूब भरकर चल रहे थे।

मैं कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ गयी। फिर मैंने कार के इग्नीशन में चाबी लगाकर घुमाई, तो इंजन बहुत जोर से घरघराकर जाग उठा। फिर मैंने क्लच दबाया, उसे गियर में डाला और उसके बाद स्टेयरिंग मजबूती से थाम लिया।

कार सड़क पर द्रुतगति से भागने लगी।

उसके वाइपर विण्ड स्क्रीन पर दायें—से—बायें घूम रहे थे।

मैं सोचने लगी।

मेरी जिन्दगी भी कुछ उसी कार की तरह थी।

दौड़ती हुई!

मंजिल की तलाश में भटकती हुई।

कितने नये—नये मोड़ काटे थे मेरी जिन्दगी ने, अगर कभी मैं उनके बारे में सोचने भी लगती हूं, तो शरीर में कंपकंपी—सी छूट जाती है। फारस रोड के एक बेहद गंदे और गलीज कोठे से शुरू हुई मेरी कहानी आज एक आलीशान पैंथ हाउस तक पहुंच चुकी थी। एक तरफ बदनामी थी- तो दूसरी तरफ रुतबा था, पोजीशन थी, इज्जत थी।

कितना फर्क होता है इंसान-इंसान में, इसका अहसास मुझे भली—भांति था।

एक आदमी, आदमी होते हुए भी जानवर से बद्तर जिन्दगी जीने पर मजबूर होता है, जबकि दूसरा दौलत के बल पर हर सुख खरीदता है। हर ऐश्वर्य को अपने चरणों का दास बनाकर रखता है। शायद दौलत की इसी असीमित चाह ने मुझे आज अपराध की एक खतरनाक डगर पर धकेल दिया था।

कार दौड़ती रही।

थोड़ी देर बाद ही मेरी कार ‘नाइट क्लब’ के सामने से गुजरी।

मैंने कुछ क्षण के लिए कार को वहां रोका।

‘नाइट क्लब’ में हमेशा की तरह भरपूर रौनक थी। वहां मूसलाधार बारिश के बावजूद खूब चहल—पहल दिखाई पड़ रही थी।

मुझे क्लब के ग्लास डोर के पास ही कई कॉलगर्ल खड़ी दिखाई दीं, जिनमें से लगभग सभी मेरी परिचित थीं और जो बड़ी सूनी निगाहों से अपने कस्ट्यूमर की राह तक रही थीं।

मैं जानती थीं- उनमें से कई लड़कियों की आज की रात ऐसे ही तन्हा गुजर जानी थी।

उनकी हालत पर मुझे दया आयी।

वह तरस खाने के काबिल लड़कियां थीं।

मैंने कार का फिर क्लच दबाया और कार आगे बढ़ा दी।

मैंने कार बिल्कुल डॉक्टर अय्यर के घर के सामने ले जाकर खड़ी कर दी थी।
 
12

मर्डर

तिलक राजकोटिया का और मेरा अगला पूरा दिन बड़े सस्पैंस के आलम में गुजरा।

हर पल हम दोनों को यह भय सताता रहा, अब पुलिस वहां आयी।

अब आयी।

हालांकि मैं ‘राजदार’ के अस्तित्व को शुरू से ही नकार रही थी, लेकिन मुझे भी यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि उस क्षण डरी हुई मैं भी कम नहीं थी। क्योंकि मैं वह जो बात कह रही थी, वह मेरा अनुमान ही तो था।

जबकि अनुमान गलत भी निकलते हैं।

और!

अगर अनुमान गलत निकल आया तो?

यही एक बात हमारे भय का कारण बनी हुई थी।

शाम हो गयी।

लेकिन पुलिस वहां न आयी।

अलबत्ता रात के समय तिलक के मोबाइल पर एक फोन जरूर आया।

“मैं डॉक्टर अय्यर का छोटा भाई बोल रहा हूं ऐन्ना!” वह आवाज काफी घबराई हुई थी।

“कहिये!” तिलक बोला।

“डॉक्टर साहब रात पैंथ हाउस में तो नहीं आये थे?”

“नहीं- उन्हें तो यहां आये हुए कई दिन हो गये। क्या बात है?”

“वह दरअसल रात से गायब हैं।” उस आदमी की हालत ऐसी थी, मानो वह अभी रो पड़ेगा—”हम उन्हें सब जगह ढूंढ चुके हैं ऐन्ना, लेकिन उनका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा। अब अन्य सम्भावित जगहों पर टेलीफोन कर—करके पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि शायद कहीं से कोई सुराग मिल जाए।”

“ओह- यह तो सचमुच बड़ी खतरनाक खबर है।” तिलक ने चिंतित लहजे में कहा—”उन्होंने घर पर कोई चिट्ठी—पत्री भी नहीं छोड़ी?”

“कुछ भी नहीं छोड़ा ऐन्ना, इसी बात ने तो हमें फिक्र में डाला हुआ है।”

“पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करायी?”

“हां, अभी—अभी करायी है।”

“पुलिस क्या कहती है?”

“वही कहती है, जो अमूमन ऐसे केसों में उसे कहना होता है। यही कि वो तलाश करेगी। जैसे ही उनके बारे में कोई खैर—खबर लगेगी, हमें इत्तला दी जाएगी।”

“मेरे लायक कोई सेवा हो, तो मुझे बे—हिचक बताना।”

“जरूर।”

“कुछ भी कहते हुए संकोच मत करना, बड़ा भाई ही समझना मुझे अपना।”

“जी- जरूर।” लाइन कट गयी।

मेरे होठों पर मुस्कान थिरक उठी।

तिलक राजकोटिया भी अब मुस्कुरा रहा था।

•••
 
सुबह के तमाम अखबारों में डॉक्टर अय्यर के आश्चर्यजनक ढंग से गायब होने की खबर मोटी—मोटी सुर्खियों में छपी थी और उनकी कार के घर के सामने से बरामदी का उल्लेख भी उन खबरों में था।

तिलक ने और मैंने बड़ी दिलचस्पी के साथ खबर को पढ़ा।

सुबह के नौ बज रहे थे, जब मैं गरमा—गरम चाय के साथ कुण्डा खोलकर उस कमरे में दाखिल हुई, जिसमें डॉक्टर अय्यर कैद था।

तिलक मेरे पीछे—पीछे कमरे में दाखिल हुआ।

उसके हाथ में उस दिन का अखबार था।

कमरे में पहुंचते ही मैंने चाय का कप टेबिल पर रख दिया, फिर डॉक्टर अय्यर के मुंह पर बंधी पट्टी खोली और उसका एक हाथ खोला। डॉक्टर अय्यर की हालत से साफ जाहिर हो रहा था, वह सारी रात सोया नहीं है।

“लो चाय पीओ!” मैंने चाय का कप टेबिल पर से उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया।

“मेरी इच्छा नहीं है।”

“पी लो- क्योंकि फिर दोपहर तक तुम्हें कुछ और मिलने वाला नहीं है।”

“मैंने कहां न!” वह गुर्राया—”मेरी इच्छा नहीं है।”

“पहले मैं तुम्हें आज के अखबार में छपी हुई एक खबर दिखाता हूं।” तिलक ने कहा—”शायद उस खबर को पढ़ने के बाद तुम्हारी चाय पीने की इच्छा होने लगे।”

फिर तिलक राजकोटिया ने अखबार खोलकर डॉक्टर अय्यर की गोद में रख दिया।

“इस खबर को पढ़ो और जरा ध्यान से पढ़ो।” तिलक ने अखबार पर एक जगह उंगली ठकठकाई।

डॉक्टर अय्यर ने खबर पढ़ी।

खबर पढ़ते ही उसके चेहरे का रहा—सहा खून भी निचुड़ गया।

“अब क्या कहते हो डॉक्टर!” तिलक राजकोटिया कुर्सी खींचकर वहीं उसके सामने बैठ गया—”अखबार में तुम्हारी गुमशुदगी की खबर छपी है और शहर में किसी को भी मालूम नहीं है कि तुम इस वक्त कहां हो? जबकि तुम्हारे हिसाब से तो अब तक हम दोनों को जेल में होना चाहिए था। बृन्दा की मौत कैसे हुई, इस बात के शहर भर में ढोल—नगाड़े बज जाने चाहिए थे। कहां गया अब तुम्हारा वह राजदार, जो मात्र एक घण्टे बाद ही हड़कम्प मचा देने वाला था? अब तो तुम्हें गायब हुए तीस घण्टे से भी ऊपर हो चुके हैं।”

डॉक्टर अय्यर ने अपने शुष्क अधरों पर जबान फिराई।

उससे कुछ कहते न बना।

“तुम चालाक तो हो डॉक्टर!” मैंने भी कटाक्ष किया—”परन्तु एक बहुत भयानक गलती तुम कर बैठे। तुम खुद को जरूरत से ज्यादा चालाक समझने लगे और इसीलिए चारों खाने चित्त जा गिरे।”

“मैं एक बात कहूं ऐन्ना!” वह थोड़े विचलित अंदाज में बोला।

“कहो।”

“अगर तुम लोग यह समझ रहे हो कि मेरा कोई राजदार नहीं है, तो यह तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है।”

“अच्छा! अगर तुम्हारा कोई राजदार है, तो फिर वो पुलिस के पास गया क्यों नहीं? उसे तो एक घण्टे बाद ही पुलिस के पास पहुंच जाना चाहिए था?”

“यह बात मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं ऐन्ना!” वह खोखले स्वर में बोला—”हो सकता है- उसने पुलिस तक पहुंचने वाली योजना में कुछ फेरबदल कर दिया हो।” वह एक नई बात सोचकर बोला।

“कैसा फेरबदल?”

“य... यह तो अब उसे ही मालूम होगा। या फिर मुरुगन जानता होगा, वह क्या लीला रच रहा है।”

“तुम अब यह किस्से—कहानी गढ़ना बंद कर दो डॉक्टर!” तिलक राजकोटिया ने दांत किटकिटाये—”सच तो ये है कि तुम्हारा अब अंत समय आ चुका है। बहुत जल्द तुम्हारे सीने में यह सांसें धड़कना बंद कर देंगी। लो- चाय पीओ।”

परन्तु डॉक्टर अय्यर ने चाय न पी।

सही बात तो यह है, चाय पीने की अब उसकी स्थिति ही नहीं थी। जिस आदमी को अपने सामने साक्षात् मौत खड़ी नजर आ रही हो, वह चाय क्या पीयेगा।

फिर अखबार में छपी उस खबर को देखकर तो उसका रहा—सहा आत्मविश्वास और भी ज्यादा बुरी तरह डोल गया था।

इसीलिए उसने अपनी जान बचाने के वास्ते नई—नई कहानियां गढ़नी शुरू कर दी थीं।

बहरहाल मैंने डॉक्टर अय्यर का हाथ और मुंह दोबारा कसकर बांध दिये और हम दोनों कमरे से वापस बाहर निकल आये।

दरवाजे का कुण्डा पहले की तरह ही लगा दिया गया।

•••
 
Back
Top