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उसी रात एक घटना घटी।

ऐसी घटना- जिसने पूरे पैंथ हाउस में हलचल पैदा करके रख दी।

रात के कोई दो या ढाई बज रहे थे। सही वक्त मुझे इसलिए याद नहीं है, क्योंकि कमरे में उस समय मात्र जीरो वाट का बल्ब जल रहा था और वैसे भी सारा सिलसिला एकदम इतने रोमांचकारी ढंग से शुरू हुआ कि वॉल क्लॉक की तरफ मेरी निगाह ही नहीं गयी।

मैं और तिलक एक ही बिस्तर पर थे।

गहरी नींद में थे।

तभी एकाएक हल्की—सी आहट सुनकर मेरी आँखें खुली।

वैसे भी मैं काफी कच्ची नींद में सोती हूं।

आंख खुलते ही मेरे कान चौकस हो उठे।

पैंथ हाउस के गलियारे में—से हल्की—हल्की आवाज आ रही थी।

वह ऐसी आवाज थी- जैसे कोई चल रहा हो।

कौन था?

कौन था पैंथ हाउस में?

मैं एकदम झटके से बिस्तर छोड़कर उठ बैठी।

मैंने ध्यान से आवाज को सुना- लेकिन वास्तव में ही गलियारे में कोई था।

“तिलक!” मैंने जोर से अपने बराबर में सोते तिलक को झंझोड़ा—”तिलक!”

तिलक राजकोटिया को काफी देर झंझोड़ने के बाद आंख खुली।

“क्या हो गया?” वह उठ बैठा।

“लगता है- पैंथ हाउस के अन्दर कोई है।”

तिलक की नींद एकदम भक्क् से गायब हो गयी।

“क्या कह रही हो?” वह आतंकित हो उठा।

“ध्यान से सुनो, गलियारे में—से आवाज आ रही है।”

तिलक ने भी ध्यान से सुना।

उसे भी गलियार में-से किसी के चलने की आवाज आयी।

“यह तो सच में ही कोई है।” तिलक बोला—”लेकिन कोई पैंथ हाउस में कैसे घुस आया?”

“मालूम नहीं, कैसे घुस आया! मुझे खुद आश्चर्य हो रहा है।”

“तुमने मेन गेट का दरवाजा तो अच्छी तरह से बंद कर लिया था?”

“हां- लेटने से पहले मैंने खुद सिटकनी चढ़ाई थी।” मैं बोली।

कोई बहुत धीरे—धीरे चलता हुआ अब उसी तरफ आ रहा था।

“कौन है?” तिलक एकाएक गला फाड़कर चिल्ला उठा—”कौन है बाहर?”

गलियारे में अकस्मात् सन्नाटा छा गया।

खामोशी!

तिलक ने अब झपटकर अपने तकिये के नीचे रखी स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर निकाल ली। जबसे डॉक्टर अय्यर को कैद किया था, तब से वह रिवॉल्वर हमेशा अपने तकिये के नीचे रखकर सोता था।

रिवॉल्वर हाथ में आते ही वो बिस्तर से नीचे उतर गया।

स्लीपर पहने।

फिर दौड़कर शयनकक्ष का दरवाजा खोला और गलियारे में पहुंच गया।

उसके पीछे—पीछे मैं भी दौड़ती हुई गलियारे में पहुंची।

“कौन है?” तिलक रिवॉल्वर अपने से कोई दो फुट आगे तानता हुआ पुनः चीखा—”कौन है यहां, सामने आओ।”

खामोशी!

पहले की तरह गहरी खामोशी!

वह मानो अपनी सांस तक रोके हुए था।

ऐसा लग रहा था, वह हमारे आसपास ही है।

मैं दौड़ती हुई पैंथ हाउस के मैन गेट के नजदीक पहुंची। मैन गेट का दरवाजा पहले की तरह बंद था और उसकी सिटकनी चढ़ी हुई थी।

“क्या हुआ?”

“बड़े आश्चर्य की बात है- मैन गेट का दरवाजा तो अंदर से बंद है।”

“फिर कोई अंदर कैसे घुसा?”

“समझ नहीं आता।”

हम दोनों की कौतुहलता अब बढ़ने लगी।

तिलक रिवॉल्वर हाथ में ताने—ताने उल्टे पैर दौड़ता हुआ मैन गेट के नजदीक पहुंचा।

फिर उसे न जाने क्या सूझा, उसने अपने रेशमी गाउन की जेब से चाबी निकालकर दरवाजे का बिल्ट—इन लॉक लगा दिया।

“यह ताला क्यों लगाया?” मैं बोली।

“ताकि पैंथ हाउस के अंदर जो कोई भी है, वह चुपचाप यहां से फरार न हो सके।”

“ओह!”

•••
 
गलियारे में पहले की तरह गहरा सन्नाटा व्याप्त था।

सबसे बड़ी बात ये है कि सत्तर कमरों के उस अत्यन्त विशाल पैंथ हाउस में किसी को भी तलाशना कोई आसान काम न था। पूरे पैंथ हाउस में काफी चौड़े-चौड़े कई सारे गलियारे थे, जो इधर—उधर फटते थे और सब गलियारे एक—दूसरे के साथ जुड़े थे। इसलिए कोई उन गलियारों में दौड़ता हुआ कहीं—से—कहीं भी पहुंच सकता था।

तिलक राजकोटिया और मैं उस आततायी को तलाशते हुए गलियारे में काफी आगे आ गये।

हम दो मोड़ भी मुडे़।

“कौन है?” मैं भी गलियारे में सावधानी के साथ आगे बढ़ते हुए चीखी—”कौन है यहां?”

न जाने क्यों मेरा दिल बुरी तरह घबरा रहा था।

उसमें अजीब—सी बेचैनी थी।

मालूम नहीं कौन पैंथ हाउस में घुस आया था।

कोई चोर?

कोई डाकू?

कोई कातिल?

या कोई और?

जितना मैं उस अजनबी आदमी के बारे में सोच रही थी, उतनी मेरी बेचैनी बढ़ने लगी।

तभी हमें पीछे से दरवाजा बुरी तरह भड़भड़ाये जाने की आवाज सुनाई पड़ने लगी। शायद जिस आततायी को हम ढूंढ रहे थे, वह आततायी बहुत निःशब्द ढंग से चलता हुआ मैन गेट के पास पहुंच गया था और अब जबरदस्ती जोर—जोर से ठोकर मारकर उसे खोलने की कोशिश कर रहा था।

“शायद वो मैन गेट पर है।” तिलक चीखा।

आवाज सुनने की देर थी- मैं फौरन पलटी और द्रुतगति के साथ वापस मैन गेट की तरफ भागी।

मेरे साथ—साथ तिलक भी उसी तरफ झपटा।

उसी क्षण मैन गेट पर ठोकर मारने की आवाज आनी बंद हो गयी और किसी के ताबड़तोड़ भागने की आवाज आयी।

जब तक हम मैन गेट पर पहुंचे, तब तक वो वहां से भाग चुका था।

मैन गेट पहले की तरह बंद था।

लेकिन इस बार हड़बड़ाहट में आततायी से एक गलती हुई। भागते समय उसका एक जूता वहीं रह गया।

मैंने आगे बढ़कर वो जूता उठाया और उसे ध्यानपूर्वक देखा।

“जूते को इस तरह क्या देख रही हो?” तिलक बोला।

“तुम इस जूते को पहचानते हो?”

तिलक ने भी अब उसे ध्यान से देखा।

“नहीं तो।”

“यह डॉक्टर अय्यर का जूता है।” मैंने मानो भीषण विस्फोट कर दिया था।

“क... क्या कह रही हो तुम?”

“मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूं, यह उसी का जूता है।”

“डॉक्टर अय्यर!” तिलक सकपकाकर बोला—”लेकिन डॉक्टर अय्यर अपने कमरे में—से बाहर कैसे निकला?”

“हमें यही देखना है।”
 
हम दोनों तत्काल दौड़ते हुए अब उस कमरे के नजदीक पहुंचे, जिसमें हमने डॉक्टर अय्यर को कैद करके रखा था।

कमरे का पहले की तरह ही बाहर से कुण्डा लगा हुआ था, अलबत्ता एक खिड़की खुली थी।

हम कुण्डा खोलकर दनदनाते हुए कमरे में घुसे।

डॉक्टर अय्यर वाकई कुर्सी से नदारद था। नायलोन की रस्सी खुली हुई वहीं कुर्सी के पास नीचे पड़ी थी और उसके सामने जो एक टेबिल रखी थी, वह अब लुढ़की हुई थी।

“ओह माई गॉड- यह तो डॉक्टर अय्यर ही है।”

“जरूर उसने किसी तरह अपने बंधन ढीले कर लिये होंगे।” मैं बोली—”और फिर रस्सी खोलकर यहां से भाग निकला।”

“हमें जल्दी से उसे ढूंढना चाहिए- जल्दी!”

हम दोनों वापस कमरे से बाहर निकल आये।

तिलक के हाथ में उस समय भी स्मिथ एण्ड वेसन रिवॉल्वर थी और वह किसी भी खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तत्पर था।

अलबत्ता इतना बड़ा पैंथ हाउस उस वक्त हमें काट खाने को दौड़ रहा था।

उसके एक—एक गलियारे और एक—एक कमरे की तलाशी लेना कोई आसान काम न था।

न जाने कहां छुपा होगा वह डॉक्टर?

किस कमरे में?

अगले एक घण्टे के दौरान हमने दौड़—दौड़कर उस पैंथ हाउस के तमाम कमरे खंगाल डाले।

तमाम गलियारों में घूम गये।

परन्तु वो कहीं न मिला।

“हैरानी है!” तिलक बोला—”वह कहां गायब हो गया?”

“जरूर वो यहीं कहीं छुपा है।” मैं फुंफकारकर बोली—”वो बहुत चालाक आदमी है। मैं समझती हूं, जरूर वो हमारी एक—एक एक्टीविटी पर नजर रखे हैं और हमारे अनुरूप ही वो पल—पल अपने छुपने की जगह चेंज करता जा रहा है। मुझे एक बात बताओ।”

“पूछो।”

“मैन गेट के अलावा पैंथ हाउस से बाहर निकलने का कोई और रास्ता तो नहीं है?”

“नहीं- कोई और रास्ता नहीं है।”

“फिर ठीक है। फिर वो हमसे बचकर कहीं नहीं भाग सकेगा।”

तभी हमें फिर बहुत हल्की—सी आवाज सुनाई पड़ी।

“देखो!” तिलक आंदोलित होकर बोला—”देखो, वह फिर कहीं चल रहा है।”

आवाज बहुत हल्की थी।

वह भरपूर कोशिश कर रहा था कि उसके चलने के कारण आवाज न हो, लेकिन फिर भी आवाज हो रही थी।

हमारी सांसें थम गयीं।

हमने बहुत गौर से उस आवाज को सुना।

वह सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज थी।

कुछ देर सीढ़ियों पर चढ़ने की वह आवाज आती रही और फिर कोई भारी—भरकम सरकण्डा सरकने की आवाज हुई तथा उसके बाद लोहे का कोई दरवाजा सरसराकर खुलता चला गया।

“वह इस समय छत पर है।” तिलक चिल्ला उठा—”पेंथ हाउस की छत पर है।”

हम दोनों तत्काल छत पर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ झपटे।

तभी हमें छत पर डॉक्टर अय्यर के भागने की भी आवाज सुनाई पड़ी। शायद वो भांप गया था कि हम उसके पीछे ही आ रहे हैं।

हम दोनों जल्दी—जल्दी सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर छत पर पहुंचे।

•••
 
तिलक राजकोटिया ने अब रिवॉल्वर और भी ज्यादा मजबूती के साथ अपने हाथों में पकड़ ली थी।

वो भांप गया था, दुश्मन अब उससे कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं है।

छत पर पहुंचते ही हमारी निगाहें इधर—उधर घूमीं।

पूरी छत बिल्कुल सुनसान पड़ी थी।

दूर—दूर तक रात की गहन नीरवता व्याप्त थी। छत पर पानी की बड़ी—बड़ी काली सिंटेक्स टंकियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था।

“जरूर वो इस समय किसी पानी की टंकी के पीछे छुपा है।” मैं बहुत धीमी आवाज में फुसफुसाई।

“ठीक कहती हो तुम!”

फिर हम धीरे—धीरे पानी की टंकियों की तरफ बढ़े।

हम हर चंद यह कोशिश कर रहे थे कि हमारे चलने के कारण आवाज उत्पन्न न हो। लेकिन छत पर इस कदर सन्नाटा था कि अगर कोई सांस भी लेता, तो उसकी भी आवाज सुनाई पड़ती।

“डॉक्टर!” मैं टंकियों के नजदीक पहुंचकर चिल्लाई—”हम जानते हैं- तुम टंकियों के पीछे छिपे हो। अगर अपनी खैरियत चाहते हो, तो खामोशी के साथ बाहर निकल आओ। वरना तुम कुत्ते से भी ज्यादा बद्तर मौत मरोगे।”

डॉक्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।

छत पर पुनः सन्नाटा व्याप्त हो गया।

उसकी सांसों की आवाज तक हमें सुनाई नहीं पड़ रही थी।

ऐसा लग रहा था- मानो वह अपने दिल की धड़कन तक पर काबू किये हुए था।

“डॉक्टर!” तिलक भी रिवॉल्वर टंकियों की तरफ तानकर चीखा—”बाहर निकल आओ, यह हमारी तरफ से तुम्हें आखिरी चेतावनी है।”

फिर कोई जवाब नहीं।

अब हमारे दिल में एक नई शंका घर बनाने लगी। कहीं ऐसा तो नहीं था- वह मद्रासी डॉक्टर पानी की टंकियों के पीछे भी न हो।

हम धीरे—धीरे टंकियों के थोड़ा और नजदीक पहुंचे।

तभी एकाएक डॉक्टर बहुत जबरदस्त झटके के साथ टंकी के पीछे से बाहर निकला और चीते की तरह हमारे ऊपर झपट पड़ा।

वह बड़े रौद्र रूप में था और उसके हाथ में लोहे की एक लम्बी रॉड थी। एकदम प्रकट होते ही उसकी रॉड धड़ाक् से घूमी और सीधे मेरी टांग पर पड़ी।

मेरे हलक से अत्यन्त मर्मभेदी चीख निकल गयी।

मैं दहाड़ते हुए पीछे गिरी।

मुझे ऐसा लगा- जैसे मेरी टांग की हड्डी में अंदर तक सनसनाहट दौड़ गयी हो।

तिलक ने फौरन उसका निशाना लेकर रिवॉल्वर का ट्रेगर दबाना चाहा। लेकिन डॉक्टर अय्यर में न जाने कहां से बेपनाह फुर्ती आ चुकी थी। मेरे ऊपर लोहे की रॉड का प्रहार करते ही वह एकदम बिजली जैसी फुर्ती के साथ तिलक की तरफ घूम गया और फिर रॉड भड़ाक से उसके भी पड़ी।

तिलक भैंसे की तरह डकरा उठा।

रॉड सीधे उसके कंधे पर पड़ी थी।

उसने फिर बहुत जोर से घुमकर एक बार और रॉड तिलक के जड़ी।

“ऐन्ना- तुम क्या समझते हो!” वह अर्द्धविक्षिप्तों की भांति दहाड़कर बोला—”तुम मुझे पकड़ लोगे, बृन्दा की तरह मार डालोगे मुझे? नहीं- मुरुगन की शपथ, अब मैंने तुम दोनों को नरक पहुंचा देना है।”

गुस्से के कारण उसके जिस्म का एक—एक पुर्जा कांप रहा था।

वह साक्षात् दरिन्दा नजर आ रहा था।

खूनी दरिन्दा!

जो उस क्षण किसी की भी जान ले सकता था।

उसने फिर अपनी भरपूर शक्ति के साथ घुमाकर लोहे की रॉड तिलक के जड़नी चाही।

तिलक फौरन छत पर कलाबाजी खा गया।

रॉड टन्न् की जोरदार आवाज के साथ लैंटर पर जाकर लगी।

उसके बाद डॉक्टर अय्यर वहां नहीं रुका।

सैकेण्डों में अपना रौद्र रूप दिखाने के बाद वह वापस छत से नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ झपटा।

तिलक ने भी इस बीच असीमित फुर्ती का परिचय दिया। वह बड़ी तेजी के साथ न सिर्फ छत से उठकर खड़ा हो गया, बल्कि उसने रिवॉल्वर भी उसकी तरफ तान दी।

डॉक्टर अय्यर द्रुतगति के साथ सीढ़ियों की तरफ दौड़ा जा रहा था।

रॉड अभी भी उसके हाथ में थी।

“डॉक्टर!” तिलक कहर भरे स्वर में चिल्लाया—”रुक जाओ, वरना मैं गोली चला दूंगा।”

भागते—भागते डॉक्टर अय्यर ने पलटकर देखा।

एकाएक उसकी आंखों में आतंक के भाव तैर गये।

“पागल मत बनो डॉक्टर!” तिलक दोबारा चीखा—”मौत तुम्हारे बिल्कुल सिर पर खड़ी है।”

मगर वो रुका फिर भी नहीं।

तब तक वो दौड़ता—दौड़ता सीढ़ियों के पास तक पहुंच गया था। तभी उसने पहली सीढ़ी पर कदम रखा।

लेकिन वो पहली सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर कदम नहीं रख पाया।

उससे पहले ही तिलक ने गोली चला दी।

डॉक्टर अत्यन्त हृदयग्राही ढंग से चिल्ला उठा। उसके चीखने की आवाज ऐसी थी- जैसे कोई बकरा जिबह किया गया हो। फिर भी वो कुछेक सीढ़ियां काफी जल्दी—जल्दी उतरा। उसके बाद उसका पैर फिसलने की आवाज हुई और धड़ाधड़ सीढ़ियों पर गिरने की आवाज हुई।

हम दोनों उसके पीछे—पीछे दौड़ते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरे।

नीचे पहुंचकर हमने देखा- वह बिल्कुल आख़िरी सीढ़ी पर औंधे मुंह पड़ा हुआ था। उसकी टांगें पीछे को थीं और हाथ आगे को फैले हुए थे।

गोली ठीक उसकी गर्दन की हड्डी को तोड़ती चली गयी थी तथा अब वहां से थुलथुल करके खून निकल रहा था।

इतना ही नहीं, दहशत के कारण उसकी आंखें भी बड़े खौफनाक अंदाज में फटी—की—फटी रह गयी थीं।

सबसे पहले मैंने डॉक्टर अय्यर के नजदीक पहुंचकर उसका मुआयना किया।

“क्या हुआ?” मेरे पीछे—पीछे तिलक राजकोटिया भी दौड़ता हुआ उसके पास पहुंचा—”क्या यह मर गया?”

“हां- यह मर चुका है।”

“माई गॉड!”

आतंक और बढ़ गया।

•••
 
मैं अब वहीं लाश से थोड़ा ऊपर सीढ़ियों पर बैठी हुई थी और मैंने दोनों हाथों से अपना सिर कसकर पकड़ रखा था।

दौलत के लिए यह तीसरा कत्ल था।

तीसरी हत्या!

“यह ठीक नहीं हुआ तिलक!” मैं धीमी जबान में बोली।

“क्यों?” तिलक ने रिवॉल्वर अपनी जेब में रखी और वहीं मेरे पास आकर बैठा—”ठीक क्यों नहीं हुआ? इसकी हत्या तो आखिरकार हमने करनी ही थी।”

“हां- करनी थी।” मैं बोली—”लेकिन हमारी योजना थी, हम इसकी हत्या पैंथ हाउस में नहीं करेंगे, बल्कि पैंथ हाउस से कहीं बाहर ले जाकर करेंगे। हम इसके चेहरे पर पहले थोड़ा—सा मेकअप करते और फिर इसे यह कहकर बाहर ले जाते कि हम इसे आजाद कर रहे हैं। फिर बाहर किसी वीरान इलाके में ले जाकर हमने इसे गोली मार देनी थी। हमारी यही योजना थी और इस बारे में मैंने तुम्हें भी बताया था। जबकि अब पैंथ हाउस के अंदर ही उसकी हत्या होने से तुम नहीं जानते हो कि हमारे सामने कितना बड़ा संकट आ गया है।”

“कैसा संकट?”

“जरा सोचो तिलक!” मैं बोली—”अब हम इसकी लाश किस तरह ठिकाने लगाएंगे?”

तिलक भी सोच में डूब गया।

“लाश ठिकाने लगाने के लिए जरूरी है।” मैंने आगे कहा—”कि हम पहले इसकी लाश को लेकर नीचे जाएं तथा इस तरह लेकर जाएं, जो लाश किसी की निगाह में भी न आ सके। जबकि मैं समझती हूं कि ऐसा नहीं हो सकता। अगर हम लाश पैंथ हाउस से लेकर एक मंजिल भी नीचे उतरे, तो वह किसी—न—किसी की निगाह में जरूर आएगी।”

“यह तो है।”

“फिर लाश किस तरह ठिकाने लगाई जाएगी?”

तिलक राजकोटिया भी अब चिंतित दिखाई पड़ने लगा।

स्थिति वाकई जटिल थी।

बेहद मुश्किल!

“कोई—न—कोई तरीका तो हमें सोचना ही होगा।” तिलक बोला।

“हां- यह तो है।” मैंने कहा—”तरीका तो हमें वाकई सोचना होगा। क्योंकि तरीका सोचे बिना अब हमारी गति नहीं है।”

•••
 
थोड़ी देर बाद ही डॉक्टर अय्यर की लाश उठाकर हम उसी कमरे में ले आये थे, जिस कमरे में हमने उसे कैद करके रखा था।

फिर तिलक और मैं, दोनों ने सीढ़ियों पर पड़ा हुआ खून अच्छी तरह साफ किया।

एक—एक धब्बा पौंछा।

सीढ़ियां पहले की तरह चमकने लगीं।

उसके बाद कमरा बंद करके हम दोनों पैंथ हाउस के ड्राइंग हॉल में आ बैठे।

मुझे खूब अच्छी तरह याद है, घुप्प अंधेरा तब भी चारों तरफ फैला हुआ था और वह आधी रात का समय था। आधी रात के वक्त ही मैंने कॉफ़ी बनायी थी- ताकि दिमाग कुछ फ्रैश हो सके और हम लाश ठिकाने लगाने की कोई बेहतर योजना सोच सकें।

हम दोनों के शरीर के उन—उन हिस्सों में अब भी भीषण दर्द हो रहा था, जहां—जहां लोहे की रॉड पड़ी थी।

वाकई उसने बहुत जमकर प्रहार किये थे।

जैसे धोबी कपड़ों को कूटता है।

मेरे सिर में तो हल्का—सा दर्द भी था।

बहरहाल हम दोनों ड्राइंग हॉल में बैठे धीरे—धीरे कॉफ़ी पीते रहे।

“एक तरीका है।” तिलक काफी देर बाद बोला।

“क्या?”

मैं कॉफी पीते—पीते ठिठक गयी।

मैंने तिलक राजकोटिया की तरफ देखा।

“अगर हम डॉक्टर अय्यर की लाश के कई सारे टुकड़े कर दें!” तिलक ने कहा—”तो हमारा काम आसान हो सकता है। क्योंकि फिर हम लाश के उन टुकड़ों को किसी चीज में भरकर कहीं फेंक आएंगे। फिर कोई लाश को ले जाते हुए देखेगा भी नहीं।”

“लाश के टुकड़े! नहीं-नहीं।” मेरे शरीर में खौफ की बड़ी जबरदस्त सिहरन दौड़ गयी—”इतना दरिन्दगी से भरा काम मुझसे नहीं होगा तिलक!”

“परन्तु इसके अलावा लाश ठिकाने लगाने का दूसरा कोई तरीका नहीं है।”

•••

आखिरकार हमें उस लाश के टुकड़े करने ही पड़े।

क्योंकि काफी सोचने—विचारने के बाद भी हमें लाश ठिकाने लगाने का दूसरा कोई तरीका नहीं सुझाई दिया था।

सच बात तो ये है- दूसरा कोई तरीका था ही नहीं।

तिलक राजकोटिया एक काफी लम्बा चाकू निकालकर ले आया था, जिसकी धार बेहद तेज थी। हम दोनों ने मिलकर उस चाकू से डॉक्टर अय्यर के जिस्म के कई टुकड़े कर डाले। वह अत्यन्त थर्रा देने वाला दृश्य था और उस काम को करने के लिए हम दोनों को ही अपने दिल काफी मजबूत करने पड़े थे।

हमने डॉक्टर अय्यर के शरीर से उसकी दोनों टांगें अलग कर दीं।

धड़ अलग कर दिया।

सिर और हाथ अलग कर डाले।

वह टुकड़ों—टुकड़ों में बंट गया।

फिर हमने तीन बड़ी—बड़ी अटैचियों में उसके शरीर के टुकड़े भर दिये तथा उसके बाद हम दिन निकलने पर अटैचियों को कार में रखकर वर्सोवा बीच के एक बेहद निर्जन इलाके में ले गये।

वहां पहुंचकर हमने उन अटैचियों में बड़े—बड़े पत्थर और भरे।

फिर हमेशा—हमेशा के लिए उन तीनों अटैचियों को अथाह समुद्र की गहराइयों में उछाल दिया।

अब किसी को पता नहीं लगना था, डॉक्टर अय्यर कहां गया?

किधर गया?

उसने जल समाधि ले ली।
 
13

दिल थाम लीजिए एक और झटका

उस पूरे घटनाक्रम के बाद मैं यह सोच रही थी कि सारा झंझट खत्म हो गया है और अब तिलक राजकोटिया की पूरी दौलत पर मेरा कब्जा है।

अब वो सारी दौलत मेरी है।

कहीं कोई अवरोध ही नहीं था।

बृन्दा रास्ते से हट चुकी थी और जिस डॉक्टर अय्यर से मुझे सबसे बड़ा खतरा था, वह भी अब इस दुनिया में नहीं था। सबसे बड़ी बात ये है कि प्रत्येक हत्या फुलप्रूफ ढंग से हुई थी और अभी तक किसी हत्या की वजह से कोई बड़ा फसाद पैदा नहीं हुआ था।

थोड़ा—बहुत फसाद बृन्दा की मौत से जरूर पैदा हुआ।

लेकिन डॉक्टर अय्यर की मौत के साथ ही वो भी खत्म हो गया।

फिलहाल सारे हालात नार्मल थे।

अखबारों में डॉक्टर की गुमशुदगी की खबरें अभी भी बड़े जोर—शोर के साथ छप रही थीं।

मुम्बई पुलिस उसे अपहरण का मामला समझ रही थी।

अलबत्ता पुलिस इस बात को लेकर हैरान जरूर थी कि अगर डॉक्टर अय्यर का अपहरण हुआ है, तो अपराधियों ने अभी तक फिरौती की डिमाण्ड क्यों नहीं की?

अपराधी अभी तक खामोश क्यों हैं?

यह बात तो मुम्बई पुलिस के ख्वाब में भी नहीं थी कि डॉक्टर अय्यर मारा जा चुका है।

इस बीच एक गलती मुझसे जरूर हुई। गलती ये हुई कि मैं सावन्त भाई वाले प्रकरण को बिल्कुल भूल चुकी थी। जबकि मुझे पहले दिन ही समझ जाना चाहिए था, वह भूलने लायक वाकया नहीं है।

बहरहाल फिर एक ऐसी घटना घटी, जिसने एक ही झटके में मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया और उसके बाद ही मैं अपने मौजूदा अंजाम तक पहुंची।

जेल की इस काल—कोठरी तक पहुंची।

जहां ‘फांसी’ अब मेरा मुकद्दर बन चुकी थी।

•••
 
सोमवार का दिन था।

तिलक को उस दिन हल्का—सा फीवर था और सिर में भी कुछ दर्द था।

इसलिए वो नीचे होटल के अपने ऑफिस में जाकर नहीं बैठा था।

सुबह से ही पैंथ हाउस में उसके टेलीफोन—पर—टेलीफोन आ रहे थे, जिन्हें वो अपने शयनकक्ष में बैठा सुन रहा था।

उस समय मैं ड्राइंग हॉल में थी।

ड्राइंग हॉल में भी एक पैरेलल फोन था।

दोपहर के वक्त टेलीफोन की घण्टी बजी। मुझे न जाने क्या सूझा, मैंने पैरेलल लाइन वाला वह फोन उठा लिया और फोन उठाना ही मेरे लिए गजब हुआ।

उसी क्षण से मेरे ऊपर मानो मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़े।

“तिलक साहब!”

मैंने वो आवाज बिल्कुल साफ पहचानी।

वो होटल के मैनेजर की आवाज थी।

“मैं बोल रहा हूं।” दूसरी तरफ से तिलक की आवाज आयी—”क्या बात है?”

“एक बहुत बुरी खबर है तिलक साहब!”

“क्या?”

“सावन्त भाई के आदमी आज भी मेरे पास आये थे।”

एकाएक ऐसा लगा, सावंत भाई का नाम सुनकर तिलक राजकोटिया के दिल—दिमाग पर बिजली—सी गिरी हो।

वह चौंका हो।

“क्या कह रहे थे वो?”

“वह अब बहुत बुरी तरह जोर डाल रहे हैं तिलक साहब!” मैनेजर बोला—”वह कह रहे हैं कि पैंथ हाउस और होटल का कब्जा जल्द—से—जल्द उन्हें दे दिया जाए।”

“पागल हो गये हैं वह लोग!” तिलक राजकोटिया विषधर की भांति फुंफकार उठा—”मैंने उन्हें पहले भी हजार मर्तबा मना कर दिया है कि मैं उन्हें कब्जा नहीं दूंगा, नहीं दूंगा। और यह मेरा आखिरी फैसला है।”

“तो फिर वह अपना रुपया मांग रहे हैं।” मैनेजर ने कहा—”आप समझने की कोशिश करें तिलक साहब, मामला बहुत संगीन मोड़ लेता जा रहा है। आप या तो सावंत भाई को उनका रुपया लौटा दें या फिर होटल और पेंथ हाउस का कब्जा उन्हें दे दें। दोनों में से एक कदम तो आपने उठाना ही होगा- वरना आप जानते हैं, वो गैंगस्टर आदमी है, वो कुछ भी कर सकता है।”

“देखो मैनेजर- तुमसे मेरे हालात बिल्कुल भी नहीं छुपे हैं।” तिलक बोला—”मेरे पास उसे देने को भी कुछ नहीं है।”

“तो फिर हम आखिर कब तक सावंत भाई के आदमियों को इस प्रकार वापस भेज सकते हैं- कब तक? किसी—न—किसी दिन तो वह हंगामा करेंगे ही?”

तभी मैंने बहुत हल्की—सी आहट सुनी।

आहट मेरे पीछे से आयी थी।

मैं घबरा उठी और मैंने हड़बड़ाकर जल्दी से पैरेलल फोन का रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया।

मैं पलटी।

मेरे पीछे बिल्ली थी।

मेरे पलटते ही वो छलांग लगाते हुए भाग खड़ी हुई। मैं अब पसीनों में बुरी तरह लथपथ हो उठी।

मैं भांप गयी- तिलक राजकोटिया को जरूर मालूम हो गया होगा कि कोई पैरेलल फोन पर उसकी बात सुन रहा था।

•••
 
वही हुआ।

वही- जिसका मुझे डर था।

एक मिनट भी न गुजरा होगा, तभी तिलक दनदनाता हुआ ड्राइंग हॉल में आ पहुंचा।

वह बेहद गुस्से में था और उसकी आंखें दहकते अंगारों की भांति सुलग रही थीं।

“क्या पैरेलल लाइन पर तुम्हीं मेरी बात सुन रही थीं?” वह आते ही दहाड़ा।

मैं सन्न्!

मेरे होश गुम!

वह आगे बढ़ा और उसने तत्काल मेरे मुंह पर ऐसा झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ा कि मेरे हलक तक से चीख निकल गयी और मैं लहराते हुए पीछे सोफे पर जाकर गिरी।

“ब्लडी शिट!” तिलक गरजा—”मैंने सोचा भी न था कि तुम ऐसी घटिया हरकत करोगी।”

फिर तिलक राजकोटिया जिस तरह दनदनाता हुआ वहां आया था, उसी तरह वहां से चला गया।

मैं अचम्भित—सी सोफे पर पड़ी रही।

तिलक ने मुझे थप्पड़ मारा था, मैं अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रही थी। किसी मर्द के हाथों हुई वह मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी बेइज्जती थी।

मैं सकते जैसी हालत में थी।

आश्चर्यचकित!

सोफे पर पड़े—पड़े मुझे फिर ‘नाइट क्लब’ की याद आने लगी।

क्या इसीलिए मैं वो क्लब छोड़कर आयी थी?

इसी बेइज्जती के लिए?

इस ऐश्वर्यपूर्ण दुनिया से अच्छा तो वही क्लब था, वहां कम—से—कम मुझे कभी इस तरह की बेइज्जती का सामना तो नहीं करना पड़ा था। वहां हमेशा मर्द मेरे आगे—पीछे भूखे कुत्तों की तरह घूमते थे। लेकिन आज वैसा ही एक मर्द मेरे ऊपर हावी था।

और सिर्फ मेरे कारण!

मेरी दौलत की असीमित लालसा के कारण।

वरना तिलक की क्या मजाल थी, जो वह मुझे थप्पड़ मारता।

उस दिन मैं यह बात भली—भांति समझ गयी कि तिलक काफी बदल गया है और वह शादी कोई बहुत दिन तक चलने वाली नहीं है।

मुझे यह अहसास फिर बड़ी शिद्दत के साथ होने लगा कि एक दिन मुझे फिर ‘नाइट क्लब’ की उसी झिलमिलाती दुनिया में वापस लौटना पड़ेगा।

वहीं!

जहां मैं पैदा हुई थी।

जो मेरी अपनी दुनिया थी।

•••
 
मुझे थप्पड़ मारने के बाद तिलक राजकोटिया तभी पैंथ हाउस छोड़कर चला गया था। फिर रात को वह नशे में बुरी तरह धुत्त होकर वापस लौटा। गार्ड उसे पकड़कर ऊपर तक लाया था।

शयनकक्ष के सामने पहुंचकर वो ठिठका।

“ब... बस तुम वापस जाओ।” नशे के कारण तिलक की जबान बुरी तरह लड़खड़ा रही थी।

“मैं आपको कमरे के अंदर तक छोड़ देता हूं साहब जी!”

“मैंने कहा न।” तिलक थोड़ी सख्ती के साथ बोला—”तुम वापस जाओ।”

“ठ... ठीक है साहब जी!”

गार्ड उसे वहीं दरवाजे पर छोड़कर चला गया।

तिलक के कदम लड़खड़ाये।

उसने आज बहुत ज्यादा पी हुई थी।

उसके कदम दोबारा लड़खड़ाये, तो उसने दरवाजे की चौखट पकड़ ली और अंदर मेरी तरफ देखा।

मैं उस समय बिस्तर पर लेटी थी।

तिलक के बाल बिखरे हुए थे। कोट कंधे पर पड़ा था। टाई की नॉट खुली हुई थी और शर्ट आधी से ज्यादा बेल्ट से बाहर झूल रही थी। तिलक की ऐसी अस्त—व्यस्त हालत मैंने इससे पहले कभी नहीं देखी थी।

मैंने उसकी तरफ से गर्दन फेर ली।

“क्यों आये हो तुम यहां?”

तिलक कुछ न बोला।

शायद उसने मेरी बात सुनी ही नहीं थी।

मुझे उसके लड़खड़ाते कदमों की आवाज सुनाई पड़ी।

वह धीरे—धीरे मेरी तरफ बढ़ रहा था।

जबकि उस क्षण मुझे उस आदमी से नफरत हो रही थी, उसकी शक्ल से नफरत हो रही थी।

वह मेरे बैड के नजदीक आकर खड़ा हो गया।

इतना नजदीक कि मुझे उसकी उपस्थिति का आभास अच्छी तरह मिलने लगा।

“म... मैं जानता हूं शिनाया!” वह लड़खड़ाये स्वर में ही बोला—”मैंने तुम्हारे थप्पड़ मारा, इसीलिए तुम मुझसे नाराज हो- सख्त नाराज।”

मैं खामोश लेटी रही।

मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी खौल रहा था।

“मुझसे सचमुच गलती हुई है।” तिलक बोला—”दरअसल इन दिनों मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं है शिनाया! मैं जानता हूं- म... मैं क्या कर रहा हूं। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं- मैं पूरी तरह बर्बाद हो चुका हूं। मेरे पास अब कुछ भी मेरा अपना नहीं है।”

मैं चौंकी।

वह एक नई बात मुझे सुनने को मिल रही थी।

“य... यह पैंथ हाउस!” तिलक राजकोटिया लड़खड़ाये स्वर में बोला—”यह तमाम शानो—शौकत, बार, ऑफिस, आज कुछ भी मेरे पास नहीं बचा है। म... मैं पूरी तरह सड़क पर आ चुका हूं। स्थिति ये है कि मैं अब उस दिन के बारे में सोच—सोचकर डरने लगा हूं, जिस दिन मेरे सामने रोटियों तक की समस्या आ जाएगी।”

मेरी गर्दन एकदम झटके के साथ तिलक राजकोटिया की तरफ घूमी।

मुझे मानों अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ।

तिलक जैसा फिल्दी रिच और सड़क पर?

कंगाली की हालत में?

नहीं- नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

“यह तुम क्या कह रहे हो?” मेरे होठों से खुद—ब—खुद निकला।

“य... यह सच है शिनाया!”

“लेकिन...।”

“इसमें मेरी कोई गलती नहीं।” तिलक ने अपना कोट वहीं बिस्तर पर डाल दिया और एक कुर्सी पर बैठकर धमाके पर धमाके करता चला गया—”सब कुछ किस्मत की बदौलत हुआ- क... किस्मत ने मेरे साथ बड़ा भारी मजाक किया।”

“कैसा मजाक?”

मैं मानो कुछ क्षण के लिए थप्पड़ वाली बात बिल्कुल भूल चुकी थी।

“दरअसल मुझे एक के बाद एक कारोबार में बहुत भारी—भारी नुकसान उठाने पड़े।” तिलक राजकोटिया बोला—”म... मेरे तीन काफी बड़े—बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट थे, जो फ्लॉप हो गये। उन तीनों प्रोजेक्टों में मुझे करोड़ों रुपयों का नुकसान उठाना पड़ा। म... मेरी बुरी हालत हो गयी। अपने कारोबार को उभारने के लिए मैंने लोगों से बड़े पैमाने पर कर्जा लिया। अपना होटल, पैंथ हाउस, जो कुछ भी मेरे पास था- मैंने वह सब गिरवी रख डाला। यहां तक कि मैं सावंत भाई जैसे बड़े गैंगस्टर से भी सौ करोड़ रुपये का कर्ज लेने में नहीं हिचकिचाया।”

मेरे दिमाग में भी अब आश्चर्य के अनार छूटने लगे।

“सौ करोड़ का कर्ज!”

“हां।”

“सावंत भाई के पास तुमने क्या गिरवी रखा?” मैं बोल उठी।

“क,कुछ नहीं।” तिलक ने एक और रहस्योद्घाटन किया—”उस समय सावन्त भाई के और मेरे काफी अच्छे सम्बन्ध थे- इ... इसलिए सावन्त भाई ने बिना कुछ रखे ही मुझे वह कर्जा दे दिया। वैसे भी सावंत भाई जैसा आदमी कर्जा देते समय कभी कुछ गिरवी नहीं रखता। क्योंकि उसे मालूम है- जिस तरह वो कर्जा देना जानता है, उसी तरह अपना कर्जा सूद समेत किसी के हलक से वापस निकालना भी जानता है। बहरहाल मैंने बाजार से वह भारी—भरकम कर्जा उठाकर अपने दो काफी बड़े प्रोजेक्ट और शुरू किये, जिनसे मुझे शत—प्रतिशत मुनाफे की उम्मीद थी। ल... लेकिन किस्मत की मार देखो, मेरे वह दोनों प्रोजेक्ट भी फ्लॉप हो गये। मुझे उनमें भी भारी नुकसान उठाना पड़ा। उसके बाद मेरी कमर टूट गयी। आज स्थिति ये है, मेरे पास कुछ नहीं बचा है। यह पैंथ हाउस और होटल भी दूसरे साहूकारों के पास गिरवी पड़ा है, जिनसे मैंने पचास करोड़ का कर्जा लिया था। जिन साहूकारों के पास यह होटल और पैंथ हाउस गिरवी है, उन्हें अपने पैसे की कुछ चिंता नहीं है। अपने पैसे की असल चिंता सावंत भाई को है।”

“क्यों? सावंत भाई को अपने पैसे की चिंता क्यों है?”

“क... क्योंकि सावंत भाई अब इस बात को अच्छी तरह जान गया है,” तिलक बोला—”कि मेरे पास उसका कर्जा चुकाने को कुछ नहीं बचा है। वह अगर मेरे साथ जबरदस्ती भी करेगा, तब भी मैं उसका कर्जा कहां से चुकाऊंगा? और उसके सामने सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये है कि उसके पास गिरवी भी कुछ नहीं रखा हुआ।”

“ओह!”

स्थिति वाकई जटिल थी।

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