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Thriller RISKI LOVE

रिस्की लव - 11

अंजन अपने कमरे में आराम कर रहा था। लेकिन उसके मन में वही एक सवाल घूम रहा था।
क्या पंकज और तरुण उस पर हुए हमले के ज़िम्मेदार हैं ?
अगर ऐसा है तो ऐसी क्या वजह है कि दोनों उस पर हमला कर उसे मारना चाहते थे। अंजन उस वजह के बारे में सोचने लगा।
पंकज सुर्वे को वह तबसे जानता था जब उसकी उम्र केवल सोलह साल थी।
वह उत्तर प्रदेश के अपने गांव से भागकर मुंबई आ गया था। उसकी माँ कावेरी के मरने के बाद उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। ना तो उसने अपनी नई माँ को स्वीकार किया और ना ही नई माँ ने उसे। घर में रहना मुश्किल हो गया। वह मुंबई आ गया।
साथ में जो पैसे लेकर आया था वह उसी तरह चुक गए जैसे चिलचिलाती धूप में पत्ते पर पड़ी पानी की चंद बूंदें। घर से भागते हुए उसने कुछ सोचा नहीं था। लेकिन अब उसके सामने पेट पालने की समस्या खड़ी हो गई थी। उसने हाथ पैर मारकर किसी तरह एक ढाबे में नौकरी हासिल कर ली थी।
ढाबे पर उसे दो वक्त का खाना, रात में सोने की जगह और कुछ पैसे मिलने की बात हुई थी। इसके लिए उसे सुबह से देर रात तक काम करना पड़ता था। कोई चारा नहीं था इसलिए वह चुपचाप काम कर रहा था। एक महीना बीतने पर अंजन ने मालिक से अपना पैसा मांगा। पैसे की बात सुनते ही मालिक मुकर गया। उसने कहा कि उसे ढाबे पर दो वक्त खाना मिलता है। रात में सोने की जगह। फिर पैसे किस बात के।
मालिक के इस तरह मुकर जाने पर अंजन भी अकड़ गया कि बात पैसों की भी हुई थी। उसे उसके पैसे चाहिए। उस समय ढाबे में कई लोग मौजूद थे। मालिक को उसका इस तरह अकड़ना अच्छा नहीं लगा। उसने अंजन को थप्पड़ मार दिया। गालियां देते हुए ढाबे से निकल जाने को कहा। यह बात अंजन को बुरी लगी। वह दुबला पतला था। पर उसमें ताकत और हिम्मत की कमी नहीं थी। उसने भी मालिक पर हाथ उठा दिया।
मामला बढ़ गया। मालिक ने ढाबे पर काम करने वाले अपने आदमियों से अंजन को धक्के मार कर बाहर फिंकवा दिया। अपमान और गुस्से में भरा अंजन ढाबे के बाहर सड़क पर बैठा था। तभी एक लड़के ने उसके पास आकर कहा,
"दम है तुम्हारे अंदर। ढाबे के मालिक को अच्छा झापड़ मारा।"
अंजन ने सर उठाकर देखा। उसने उस लड़के को ढाबे पर खाना खाते हुए देखा था। अंजन उस समय कुछ कहने सुनने के मूड में नहीं था। वह चुप रहा। उस लड़के ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। अंजन उसे पकड़ कर खड़ा हो गया। उस लड़के ने कहा,
"पंकज सुर्वे नाम है मेरा। अपना गैंग है। तुम्हारे जैसे हिम्मत वाले लड़के मेरे साथ काम करते हैं। तुम भी काम करोगे ?"
अंजन ने अचरज से उसकी तरफ देखा। पंकज उम्र में उससे साल दो साल ही बड़ा होगा। कुछ मोटा सा था। पंकज उसके मन की बात समझ गया। उसने कहा,
"दो लड़के हैं मेरे साथ। अच्छा कमाते हैं। ऐश करते हैं।"
अंजन ने पूँछा,
"काम क्या करते हो ?"
"बड़े हुनर का काम है। कुछ दिन सीखने में लगते हैं। पर तुम जल्दी सीख लोगे।"
अंजन कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसने कहा,
"साफ साफ बताओ।"
"पॉकेट मारने का काम...."
उसकी बात सुनकर अंजन ने पीछे हटते हुए कहा,
"ना...ना.... मैं ईमानदारी से काम करूँगा।"
उसकी बात सुनकर पंकज हंसकर बोला,
"तुम्हारी मर्जी। देख तो लिया ईमानदारी से काम करके। सिर्फ यह ढाबेवाला ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं। फिर भी तुम्हारा मन सड़क पर भटकने का है तो भटको।"
अपनी बात कहकर पंकज चला गया।
अंजन ने दोबारा कोशिश शुरू की। कई जगह काम किया। पर हर जगह सबने दबाने की कोशिश की। अंजन को पंकज की बात याद आई कि इस दुनिया में ज्यादातर लोग उस ढाबे के मालिक जैसे ही हैं। लोगों की ज्यादतियों ने उसके मन में गुस्सा भर दिया। वह सोचने लगा कि उस दिन पंकज की बात मान लेता तो अच्छा होता।
ढाबे वाली घटना को दो महीने बीत चुके थे। किस्मत उसे दोबारा पंकज से मिलवाना चाहती थी। एक दिन वह चौपाटी पर एक ठेले पर खड़ा भेलपुरी खा रहा था। तभी पंकज दो लड़कों के साथ वहाँ आया। बड़े स्टाइल से भेलपुरी वाले से बोला,
"मेरे लड़कों के लिए स्पेशल बनाओ।"
उसे देखकर अंजन उसके पास जाकर बोला,
"पंकज भाई...पहचाना ?"
पंकज ने एक उचटती सी नज़र डालकर कहा,
"कौन हो ?"
अंजन ने याद दिलाया।
"भाई वो ढाबे के मालिक से मेरा झगड़ा हुआ था। मैंने भी उसे थप्पड़ मार दिया था। तब ढाबे के बाहर आप मिले थे। आपने कहा था कि आप मुझे अपने गैंग में मिला लेंगे। तब मैंने मना कर दिया था।"
पंकज ने एक बार फिर उसकी तरफ देखा। फिर बोला,
"तो अब क्या चाहते हो ?"
"भाई उस समय गलती हो गई थी। अब मैं आपके साथ काम करूँगा।"
"तमाशा है क्या ? अपनी मर्जी हुई मना कर दिया। अपनी मर्जी हुई तो हाँ।"
कहकर पंकज अपने लड़कों के पास चला गया। उनसे कुछ बातें करने लगा। अंजन इससे हतोत्साहित नहीं हुआ। वह उसके पास जाकर बोला,
"भाई सुनिए...."
पंकज ने उसे अनसुना कर दिया। अंजन ने एक बार फिर कहा,
"भाई मन लगाकर काम करूँगा।"
पंकज के साथ बात कर रहा एक लड़का उसकी तरफ घूम कर तैश में बोला,
"भाई को परेशान क्यों कर रहा है बे.."
पंकज ने उस लड़के को रोकते हुए अंजन से कहा,
"ईमानदारी का भूत उतर गया तुम्हारा। लेकिन अब मुश्किल है। काम सीखने में समय लगता है।"
"भाई यकीन मानिए। मैं अधिक समय नहीं लूँगा। बस अपने साथ रख लीजिए। आपने सही कहा था कि दुनिया अच्छी नहीं है। सब फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।"
पंकज कुछ देर सोचकर बोला,
"ठीक है...पर जब तक सीख नहीं जाते अपना खर्च खुद उठाना।"
अंजन कुछ सोचकर बोला,
"मेरे पास इस समय ना पैसे हैं ना काम। पर भाई मैं जल्दी ही सीख लूँगा। इस बीच खाने पर जो खर्च होगा, बाद में कमाई से उतार दूँगा।"
पंकज ने उसे वहीं रुकने को कहा। अपने साथियों को एक तरफ ले जाकर कुछ बात की। उसके बाद आकर बोला,
"ठीक है...कल सुबह यहीं मिलना। कल से तुम्हारी ट्रेनिंग शुरू।"

जल्दी ही अंजन पॉकेट मारने में उस्ताद हो गया। उसकी महारत इतनी थी कि उसने पंकज और दोनों लड़कों को भी इसमें पीछे छोड़ दिया था। लेकिन एक बार उनके साथियों में से एक पॉकेट मारते हुए पकड़ा गया। कुछ दिनों के लिए पॉकेट मारने का काम बंद हो गया।
जुर्म के रास्ते में कदम रख चुका अंजन अब कुछ बड़ा करना चाहता था। ऐसा कुछ जिससे लोगों पर अपना रौब जमा सके। उसकी दोस्ती राजन के गैंग के एक लड़के से हो गईं थी। वह लड़का राजन के लिए रेड़ी खोमचे वालों से वसूली करता था। अंजन ने उसे वसूली करते देखा था। तब सब उसे सलाम करते थे। सत्रह साल के अंजन के लिए यह बड़ी शान की बात थी। उसने अपने दोस्त से कहा कि राजन भाई से उसकी सिफारिश कर दे।
पंकज ने अंजन की मदद की थी इसलिए वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था। राजन के गैंग में शामिल होते समय उसने पंकज की भी सिफारिश की। उस समय राजन को नकली शराब की बोतलें एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए लड़कों की ज़रूरत थी। अंजन की बातचीत से उसे यकीन हो गया कि वह उसके काम आ सकता है।
धीरे धीरे अंजन ने तरक्की कर ली। अब वह वसूली करने व लोगों को धमकाने का काम करता था। पंकज अब उसके पीछे सपोर्ट के लिए रहता था।
जब अंजन राजन के गैंग को छोड़कर रघुनाथ परिकर के लिए काम करने लगा तो वह पंकज को भी अपने साथ ले आया था। अब स्थिति पलट चुकी थी। उन दोनों में अंजन लीडर की भूमिका में था। पंकज उसे भाई कहने लगा था।
मानवी से शादी करने के बाद अंजन जब रघुनाथ परिकर के बिज़नेस का मालिक बन गया तो उसने भी सफेदपोश बिज़नेस मैन का चोला पहन लिया। पंकज को सिक्योरिटी के नाम पर अपने साथ रखता था। पर उससे अपने काले धंधों के काम लेता था।
समय के साथ वह पंकज पर कम भरोसा करने लगा था। बहुत से काम ऐसे थे जिनसे उसने उसे दूर रखा था।

चाहे वह रघुनाथ परिकर और उसके भाई का एक्सीडेंट कराने का काम हो या फिर मानवी को रास्ते से हटाने का काम।
इन दोनों कामों में उसने तरुण काला की सहायता ली थी।

पंकज को दूर रखने के पीछे कारण यह था अंजन अपने सारे राज़ एक ही आदमी को नहीं बताना चाहता था। वह समझ चुका था कि ऐसा करना उसके लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। पंकज ने उसके साथ ही सफर शुरू किया था। लेकिन अपनी सूझबूझ से वह तो आगे बढ़ गया था जबकी पंकज वहीं रह गया था।
अंजन को लगता था कि पंकज को अपने मामलों से दूर रखकर वह अपने लिए पैदा होने वाले खतरे को दूर कर रहा है।
पर अब उसे लग रहा था कि उससे चूक हो गई। उसे पंकज को अपने मामलों से दूर रखना चाहिए था पर अपनी नज़रों से दूर नहीं होने देना चाहिए था। अपनी जीत के नशे में डूबा हुआ वह लापरवाह हो गया। उसने पंकज पर ध्यान देना ही छोड़ दिया।
अब उसका ध्यान इस बात पर जा रहा था। उस दिन शिमरिंग स्टार्स जाते हुए अंजन ने पंकज को मना किया था कि वह अकेला चला जाएगा। पर पंकज ने कहा कि वह अपने दो आदमियों के साथ दूसरी गाड़ी में साथ साथ चलेगा। उसके साथ उसकी गाड़ी में नहीं बैठेगा। उसने कहा था कि वह उसे और मीरा को अकेले रहने देना चाहता है।
अंजन सोच रहा था कि क्या उसने ही हमलावर को बताया होगा कि वह अपने बीच हाउस जा रहा है। वह उसके साथ केवल इसलिए गया होगा ताकी बाद में कोई उस पर उंगली ना उठाए।
अंजन सही बात जानने के लिए परेशान हो उठा।

....
 
रिस्की लव - 12

तरुण काला फिश एक्सपोर्ट के बिज़नेस में इस समय एक माना हुआ नाम बन गया था। बिज़नेस तरुण काला के नाम पर था लेकिन उसमें पैसा अंजन ने लगाया था।
रघुनाथ परिकर की तरह अंजन भी उन लोगों पर नज़र रखता था जो उसके काम आ सकते थे। जब उसने तरुण के बारे में सुना तो उसे अपने लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई।
एक पार्टी में तरुण की किसी से बहस हो गई थी। बहस इतनी बढ़ गई कि गुस्से में तरुण ने एक ज़ोरदार मुक्का उसकी नाक पर मार दिया। वह लड़का गंभीर रूप से घायल हो गया। पुलिस केस बन गया। उस पर गैर इरादतन हत्या के प्रयास का मामला दर्ज़ किया गया। तीन सालों की सजा हो गई।
तरुण जेल से तो जल्दी छूट गया पर उसका शूटिंग का करियर रुक गया। जब वह हादसा हुआ था उसका चयन राष्ट्रीय टीम के लिए होने की पूरी संभावना थी। लेकिन उसके जेल चले जाने से यह मौका उससे छिन गया। केस के दौरान उसके वकील ने कई बार दलील दी थी कि झगड़ा बढ़ाने में तरुण से अधिक उस दूसरे लड़के का हाथ था। वही तरुण को उकसा रहा था। पर तरुण ने जिस पर वार किया था वह एक ‌अमीर और रसूखदार घर का लड़का था। तरुण के वकील की बात नहीं सुनी गई। तरुण को सजा हो गई।
जेल से बाहर आने के बाद उसका सबकुछ बदल चुका था। रिश्तेदार और दोस्तों ने मुंह फेर लिया था। जो कुछ उसके साथ हुआ उससे उसे समझ आ गया था कि पैसों की क्या अहमियत है। उस समय वह बहुत हताश था।
अंजन ने शुरू से ही उसके केस को फॉलो किया था। उसके जेल से छूटने के बाद उस पर निगरानी रखनी शुरू कर दी। तरुण की हताशा का फायदा उठाकर उसे एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। उसने उसे मिलने के लिए बुलाया। पैसों के लिए तरुण उसके हाथ की कठपुतली बन गया।
हाईवे पर रघुनाथ परिकर की कार को रोककर पहले दोनों भाइयों और ड्राइवर को गोली मारी। उसके बाद खड़ी हुई कार को ट्रक से कुचल दिया।
अंजन चाहता था कि रघुनाथ परिकर और उसके भाई का बचना नामुमकिन हो जाए। इसलिए गोलियों से मरवाने के बाद हादसे का रूप देने के लिए ट्रक से कुचलवा दिया। अंजन ने अपनी पैठ दूर तक बना रखी थी। इसलिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट उसके अनुकूल आई। सबकुछ जल्दी जल्दी हुआ और दोनों भाइयों और ड्राइवर का दाह संस्कार भी कर दिया गया।

तरुण ने बड़ी सफाई से अंजन का काम किया था। उसकी काबिलियत समझकर अंजन ने उसका दूसरा उपयोग भी सोच लिया।
अंजन ने उसके नाम पर फिश एक्सपोर्ट बिज़नेस में पैसा लगाया। फिश एक्सपोर्ट बिज़नेस के पीछे मानव तस्करी का कारोबार चल रहा था। मछलियों के साथ इंसानों को खाड़ी देशों में पहुँचाया जाता था।

तरुण को अंजन ने एक और महत्वपूर्ण कार्य सौंपा। मानवी को रास्ते से हटाने का।

अपने दोनों भाइयों की मौत के सदमे से मानवी एकदम चुप हो गई थी। कहीं आना जाना छोड़कर उसने अपने आप को घर में कैद कर लिया था। पहले अंजन से अक्सर झगड़ा करती थी। लेकिन अब ‌अंजन को पता भी नहीं चलता था कि वह उसके साथ उसी घर में रहती है। अंजन इस स्थिति से बहुत खुश था।
पैसा आ गया था। उसके साथ साथ एक क्लास भी आ गया था। अब वह मंहगे डिज़ाइनर कपड़े पहनता था। बड़ी बड़ी पार्टियों में जाता था। जहाँ कई लड़कियां उसका साथ पाने के लिए उसके आगे पीछे तितली की तरह मंडराती थीं। अंजन का कई लड़कियों के साथ अफेयर था। पर किसी के साथ भी रिश्ते को लेकर वह गंभीर नहीं था।
मानवी तो अब उसके लिए घर में पड़े सामान से अधिक हैसियत नहीं रखती थी।

मानवी का स्कूल के समय का एक दोस्त था निर्भय वाधवा। अपना कॉलेज पूरा करने के बाद उसने अपने फैमिली बिज़नेस की एक ब्रांच सिंगापुर में खोली थी। लेकिन वहाँ खास सफलता नहीं मिल पाई थी। इसलिए वह सब समेट कर वापस भारत आ गया था। भारत में मुंबई में उसने एक नई शुरुआत की।
निर्भय का स्कूल के समय मानवी पर क्रश था। पर जल्दी ही समझ गया कि उसकी दाल नहीं गलने वाली है। वह पीछे हट गया। बहुत समय तक वह मानवी के संपर्क में रहा। फिर उसके साथ टच छूट गया।
भारत आने के बाद उसने मानवी की खोज खबर ली। उसके बारे में पता करके उससे मिला। निर्भय के मन में अभी भी मानवी के लिए भावना थी। मानवी को उस हाल में देखकर उसे दुख हुआ। उसने उसे दुख से बाहर निकालने की कोशिश शुरू कर दी।
अंजन से मिले धोखे, अपने भाइयों के अचानक चले जाने से मानवी एक तरह के अवसाद में चली गई थी। वह प्यार और अपनेपन के लिए तरस रही थी। निर्भय की दोस्ती में उसे वह सब मिला। धीरे धीरे वह खुलने लगी। उसके साथ घूमने जाती, पार्टी करती थी। वह फिर खुश रहने लगी थी।
अपनी ज़िंदगी में वापस आने के बाद मानवी ने अंजन की हरकतों पर ध्यान देना शुरू किया। उसे गुस्सा आता था कि जो कुछ उसके भाइयों के बाद उसे मिलना था उस पर अंजन ने कब्ज़ा कर लिया है। अब उसकी उपेक्षा करके उसकी दौलत पर ऐश कर रहा है।
मानवी अपना हक पाने के लिए बेचैन हो उठी।
अंजन ने सोचा था कि बिना कोशिश किए ही मानवी नाम का कांटा उसकी राह से हट गया है। मानवी अब सारी ज़िंदगी अपने दुख में घुलती रहेगी और एक दिन इस दुनिया से चली जाएगी। लेकिन मानवी ना सिर्फ अपने दुख से बाहर निकल कर आई बल्की नागिन की तरह फुंफकार कर उससे अपना हक मांग रही थी।
वह रघुनाथ परिकर की वसीयत को आधार बनाकर उससे अपना अधिकार वापस मांग रही थी। वसीयत के अनुसार अगर रघुनाथ परिकर की मृत्यु हो जाती है तो उसकी सारी संपत्ति उसके छोटे भाई यदुनाथ परिकर और बहन मानवी परिकर को बराबरी से मिलेगी। यदुनाथ परिकर की मृत्यु होने पर उसका हिस्सा भी मानवी को ही मिलेगा।
एक क्लॉज़ यह भी था कि यदि मानवी शादी कर लेती है और अगर वह जायदाद की ज़िम्मेदारी अपने पति को देना चाहे तो वह ऐसा कर सकती है।

अंजन को अंतिम बात अपने फायदे की लगी। उसने मानवी की स्थिति का लाभ उठाकर उन कागज़ों पर दस्तखत ले लिए थे जिनके मुताबिक उसने सबकुछ अंजन की देखरेख में छोड़ दिया था।
अब अंजन ने मानवी को भी राह से हटाने का फैसला कर लिया।

मानवी और निर्भय घूमने के लिए लोनावला गए थे। वहाँ उनका कैंपिंग का कार्यक्रम था। उनके पीछे पीछे तरुण भी लोनावला पहुँच गया। तरुण ने सही मौका देखकर दोनों की हत्या कर दी और उनकी लाश इंद्रायणी नदी में बहा दी।
लोगों के पूँछने पर उसने बता दिया कि उन दोनों की पटी नहीं इसलिए वह सबकुछ छोड़कर चली गई।

तरुण के साथ काम करते हुए अंजन समझ गया था कि उसमें इतनी हिम्मत नहीं है कि उसके राज़ का फायदा उठाने की कोशिश करे। उसने अपने तरीके से कई बार तरुण को एहसास दिला दिया था कि उसने अगर कभी भी कोई हिमाकत की तो अंजाम ठीक नहीं होगा।
लेकिन पंकज और तरुण के एकसाथ आने की खबर ने उसे परेशान कर दिया था।

तरुण काला को अब पूरा यकीन हो गया था कि पंकज उसके साथ होने की बात तो कर रहा है, लेकिन वह अपनी एक अलग खिचड़ी पका रहा है। उस दिन बीच हाउस में जो घटा उसके बारे में वह उसे पूरी बात नहीं बता रहा है।
अंजन के खिलाफ साजिश रचने के लिए पंकज‌ खुद तरूण के पास आया था। उसका कहना था कि अंजन ‌ने उसका इस्तेमाल किया है। अब काम निकल जाने पर उसे पीछे ढकेल दिया है। वह इस ज्यादिती का बदला लेना चाहता है।
पंकज यह भी जानता था कि तरुण भी अंजन से नाखुश है। अंजन उसके ज़रिए कबूतरबाज़ी करवा रहा था। सारा खतरा केवल तरुण का था क्योंकी कागज़ों पर कहीं भी अंजन का नाम नहीं था। लेकिन जो भी आमदनी होती थी उसका बहुत छोटा सा हिस्सा ही तरुण को मिल पाता था।
तरुण नाखुश तो था पर अंजन से सीधे टकराने की हिम्मत उसके भीतर नहीं थी। वह अंजन की ताकत को जानता था। इसलिए जब पंकज आकर उससे मिला तो उसे इस बात का हौसला मिला कि दोनों मिलकर अंजन से बदला ले सकते हैं।
पंकज और तरुण आपस में मिल गए। दोनों अभी इस बात पर विचार कर रहे थे कि क्या करें तभी अंजन के बीच हाउस शिमरिंग स्टार्स में किसी ने उस पर हमला कर दिया।
हमले के बाद पंकज और तरुण उस टूटे से मकान में मिले। दोनों को ही आश्चर्य हो रहा था कि उन दोनों के अलावा अंजन का तीसरा दुश्मन कौन हो सकता है।
तरुण को पंकज की उस बात पर यकीन नहीं हुआ था कि जब वह मीरा को लेकर जा रहा था तो किसी ने उस पर हमला कर उसे बेहोश कर दिया। वह मीरा को लेकर कहीं चला गया।
आज पंकज के चेहरे के भाव देखकर उसे पूरा यकीन हो गया था कि कुछ ऐसा है जो पंकज उससे छुपाकर कर रहा है।
तरुण ने शुरू से ही पंकज पर पूरा भरोसा नहीं किया था। इसलिए अंजन के जो राज़ उसके पास थे उसे नहीं बताए थे। वह देखना चाहता था कि पंकज अंजन को रास्ते से हटाने की क्या योजना बनाता है। उसका प्लान था कि पहले पंकज के साथ मिलकर अंजन को कमज़ोर करे। उसके बाद उसके राज़ के ज़रिए ब्लैकमेल करे।
तरुण सोच रहा था कि जिसने भी अंजन पर हमला किया है उसने उसका काम आसान कर दिया है। अंजन हमले में बच तो गया है लेकिन कमज़ोर हो गया है। तरुण अब अपना खेल शुरू कर सकता है।
तरुण के पास अंजन के दो महत्वपूर्ण राज़ थे। उसकी इस कमज़ोर हालत का फायदा उठाकर वह अपने सारे नुकसान को पूरा कर सकता है।
वह योजना बनाने लगा कि किस तरह से अंजन को ब्लैकमेल किया जाए।

....
 
रिस्की लव - 13

विनोद के सारे खबरी कुछ भी पता लगाने में नाकाम रहे थे। नफीस ने उससे कहा था कि वह दिल्ली से वापस आ जाए। कल रात ही वह दिल्ली से लौटकर आया था।
इस समय वह नफीस के ऑफिस में बैठा था।‌ उसने नफीस को अपने दिल्ली के अनुभव के बारे में बताते हुए कहा,
"सर मुकेश का कुछ भी पता नहीं चला। मेरे सबसे अच्छे खबरी भी कुछ पता नहीं लगा पाए। ना जाने मुकेश दिल्ली में कहाँ खो गया ?"
नफीस भी इसी प्रश्न पर विचार कर रहा था। उसके मन में एक बात आ रही थी। उसने विनोद से कहा,
"विनोद....अब मुझे लग रहा है कि शायद मुकेश दिल्ली गया ही नहीं।"
उसकी बात सुनकर विनोद ने कहा,
"आपका मतलब है कि उसके दिल्ली की ट्रेन में चढ़ने की बात गलत थी।"
"नहीं... मुझे लगता है कि वह अपने परिवार के साथ मुंबई से दिल्ली के रास्ते में ही कहीं उतर गया।"
विनोद को उसकी बात में दम तो लगा पर उसके मन में एक सवाल था। उसने पूँछा,
"एक बात समझ नहीं आ रही है सर कि अगर वह दिल्ली आने वाली ट्रेन में चढ़ा था तो बीच रास्ते में क्यों उतर गया ?"
नफीस ने सोचकर कहा,
"मुझे लगता है कि उसे इस बात का पता चल गया था कि दिल्ली की ट्रेन में चढ़ते हुए उसे देख लिया गया है। ऐसे में उसे पूरी उम्मीद थी कि दिल्ली में उसे खतरा हो सकता है। इसलिए बीच में ही उतर गया।"
"हाँ सर यह हो सकता है।"
नफीस ने एक और संभावना जताई,
"ऐसा भी हो सकता है कि पहले भागने की जल्दी में दिल्ली की ट्रेन में चढ़ गया हो। पर जब ट्रेन में इत्मीनान से सोचा हो तो दिल्ली जाना ठीक ना लगा हो। इसलिए रास्ते में किसी स्टेशन पर उतर कर कहीं और चला गया हो।"
विनोद नफीस की बात पर विचार करने लगा। उसे दोनों ही बातें सही समझ आ रही थीं। उसने कहा,
"सर मुकेश किसी बड़ी मुश्किल में है। तभी अचानक अपने परिवार को लेकर भागा है।"
"इसमें तो किसी तरह के शक की बात ही नहीं है विनोद। लेकिन मैं सोच रहा हूँ कि अचानक उस पर इतना बड़ा खतरा कैसे आ गया। वह अंजन को हॉस्पिटल ले गया था। तब तक किसी ने उसे कुछ नहीं कहा। तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसे अपनी और अपने परिवार की जान बचाने के लिए भागना पड़ा। अंजन के ऊपर हुआ हमला बहुत उलझा हुआ है। ना जाने क्यों अब मुझे पंकज पर शक हो रहा है।"
"सर किस बात का शक हो रहा है आपको ?"
नफीस कुछ देर बड़ी गंभीरता से सोचता रहा। विनोद उत्सुक था कि वह क्या कहना चाहता है। नफीस ने कहा,
"यही कि हमला करवाने में पंकज‌ का हाथ ही है ? सोचो उस दिन हमलावरों को कैसे पता चला होगा कि अंजन मीरा को लेकर अपने बीच हाउस गया है। हम अंदाजा लगा रहे थे कि अंजन के कहने पर पंकज मीरा को लेकर वहाँ से भाग गया। पर ऐसा भी हो सकता है कि मीरा को हमलावर ले गया हो। पंकज पहले ही वहाँ से भाग गया हो।"
"हाँ....सर या फिर जैसा हमने सोचा था मीरा पंकज के पास हो। किसी खास मकसद से उसने मीरा को अपने कब्जे में रखा हो।"
"हो सकता है विनोद। मुझे तो लगता है कि दिल्ली तक की दौड़ बेकार ही की। हमें पंकज पर नज़र रखनी चाहिए थी।"
नफीस एक बार फिर रुका। कुछ देर मन में सोचने के बाद बोला,
"जो हुआ उसे भूलकर अब ऐसा करो कि पंकज के बारे में पता करो। दूसरी बात उस वार्ड ब्वॉय के ज़रिए पता करो कि अब अंजन का क्या हाल है ?"
"ठीक है सर। आपको पता चला कि तरुण कौन है ?"
नफीस ने तरुण के बारे में जो पता किया था सब विनोद को बता दिया। उसने आगे कहा,
"अगर पंकज के बारे में पता चलेगा तो उसके और तरुण के संबंध के बारे में भी पता चल जाएगा। तुम अब पंकज के बारे में पता करो। यह भी पता करो कि अंजन क्या अभी भी हॉस्पिटल में है।"
विनोद यह कहकर चला गया कि जल्दी ही सब पता करके मिलता है।

नर्स ने अंजन की ड्रेसिंग करने के बाद उसे दवा खिलाते हुए कहा,
"सर आपका घाव अब बहुत हद तक भर गया है। दो चार दिन में पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। डॉक्टर भी कह रहे थे कि आपकी सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं।"
दवा खिलाकर नर्स चली गई। अंजन भी अब अच्छा महसूस कर रहा था। इसलिए वह जल्दी ही पहले जैसे अपने काम पर जाने को बेताब था। उस पर किसने हमला किया था यह जानने के लिए वह छटपटा रहा था।
इससे भी ऊपर एक सवाल उसके मन को अशांत किए हुए था।
'मीरा को कौन ले गया ?'
मीरा को लेकर उसका मन व्याकुल था। मानवी को उसने सिर्फ सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया था। लेकिन मीरा से उसने सच्चा प्यार किया था।
अंजन ने अफेयर्स तो कई किए थे लेकिन किसी के साथ भी वह रिश्ते को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखता था। अपने मन बहलाव तक ही उसका हर अफेयर सीमित था। जैसे ही उसका मन भर जाता वह आगे बढ़ जाता था। पिछले कई सालों से यही चल रहा था। पर अब अंजन को महसूस होने लगा था कि उसे रिश्ते में एक ठहराव चाहिए।
मीरा की तरफ भी वह महज़ उसकी खूबसूरती देखकर आकर्षित हुआ था। धीरे धीरे जब उसने मीरा को जानना शुरू किया तो पाया कि जिस ठहराव के बारे में वह सोच रहा था वह मीरा में ही मिल सकता है। मीरा के साथ अपने रिश्ते को लेकर वह गंभीर हो गया। उसने मीरा से अपने दिल की बात भी कह दी। वह राज़ी भी हो गई थी।‌
वह अपने रिश्ते को पक्का करने के लिए उसे अंगूठी पहना रहा था उसी समय गोली चली और फिर सब गड़बड़ हो गया।

पंकज अपनी कार में नेशनल हाईवे 17 पर था। वह मुंबई से कोलाड की तरफ जा रहा था। अब उसे अंजन से डर लगने लगा था। अगर उसे उसकी साजिश का पता चल गया तो दिक्कत हो जाएगी। अंजन की हर एक चीज़ पर कब्ज़ा कर लेने की उसकी चाहत धूल में मिल जाएगी। वह बर्बाद हो जाएगा।
अंजन को लेकर उसके मन में गुस्से का एक ज्वालामुखी दहक रहा था। जिस तरह से अंजन उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ गया था उसके कारण वह मन ही मन उससे जलने लगा था। उसे लगता था कि वही था जिसके कारण ढाबे पर काम करने वाला अंजन आज मुंबई का सफेदपोश बिज़नेस मैन बनकर बैठा था। सब उसकी इज्ज़त करते थे। यह बात उसकी बर्दाश्त की सीमा से बाहर होती जा रही थी।
उसने तय कर लिया था कि अब और नहीं सहेगा।‌ जो कुछ अंजन ने पाया है उसमें उसकी भी मेहनत है। उसे भी उसका हिस्सा मिलना चाहिए था। लेकिन अगर अंजन ने उसे उसका हक नहीं दिया तो अब वह उससे उसका हक भी छीन लेगा। उसकी हर एक चीज़ पर कब्ज़ा कर लेगा।
वह बिना यह जाने आगे बढ़ रहा था कि कोई मुंबई से ही उसके पीछे लगा है।

अंजन के हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने की खबर नफीस को मिल गई थी। अंजन पर हुए हमले की खबर मीडिया तक नहीं पहुँची थी। यह भी अपने आप में एक आश्चर्यजनक बात थी। नफीस सोच रहा था कि आखिर ऐसा हुआ कैसे और क्यों ?
हमला अचानक हुआ था। अंजन ज़िंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा था। फिर कौन था जिसने इस खबर को बाहर जाने से रोका ?
आज मीडिया में सनसनीखेज न्यूज़ ब्रेक करने की होड़ है। फिर ऐसा कैसे संभव हुआ कि यह खबर किसी मीडिया हाउस के पास नहीं पहुँच पाई। जबकी ऐसी खबरों के लिए कई रिपोर्टर अपने आँख कान हमेशा खोलकर रखते हैं। उसे खुग इस हमले की खबर मिल गई थी। लेकिन उसका इरादा इस खबर को ब्रेक करने का नहीं था।
इसका एक ही कारण हो सकता था कि मीडिया को यह खबर ब्रेक करने से रोका गया। ऐसा करने वाला कौन था और उसने ऐसा क्यों किया ?
ऐसा करने वाले की पहुँच अच्छी खासी हो सकती थी।‌ पंकज इस स्थिति में हो ऐसा संभव नहीं था।
अंजन के चरित्र ने अब तक नफीस को बहुत आश्चर्यचकित किया था। एक मामूली से गुंडे से मुंबई की मानी हुई हस्तियों में से एक होने का सफर किसी फिल्मी कहानी सा दिलचस्प था।
पर उस पर हुए इस हमले ने तो उसे उलझा कर रख दिया था। उसे लग रहा था कि अंजन की कहानी के कुछ और दिलचस्प पन्ने हैं जो उसकी नज़र में नहीं आए थे।
उन पन्नों को पलटने की उसकी इच्छा तीव्र हो उठी।

पंकज की कार एक मकान के सामने जाकर रुकी। कार से उतर कर उसने इधर उधर देखा। गली में कोई दिखाई नहीं पड़ा। उसने मकान का दरवाज़ा खटखटाया।‌ दरवाज़ा खुला और पंकज अंदर चला गया। उसके अंदर जाते ही दरवाज़ा बंद हो गया।
पंकज आंगन में खड़ा किसी से कुछ बात कर रहा था। कुछ देर बात करने के बाद वह आदमी आंगन में बनी सीढ़ियों से उसे ऊपर ले गया। एक कमरे के दरवाज़े पर ताला लगा था। उस आदमी ने ताला खोल दिया। उसके बाद ताला चाभी लेकर सीढ़ियों से नीचे उतर गया।
पंकज ने दरवाज़े की कुंडी खोली और दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
पंकज का पीछा करने वाले ने अपनी कार एक गली पहले ही छोड़ दी थी। उसके बाद ढूंढ़ते हुए उस गली में आ गया था जहाँ पंकज की कार खड़ी थी। उसने एक बार उस मकान को ध्यान से देखा उसके बाद अपना फोन निकाल कर अंजन को फोन किया।

विनोद गली के मोड़ पर खड़ा उस पीछा करने वाले को देख रहा था। पंकज के पीछे उस आदमी के अलावा विनोद भी आया था। विनोद ने नफीस को फोन करके बताया कि पंकज का पीछा कोई और भी कर रहा है। उसने संभावना जताई कि शायद वह यह काम अंजन के लिए कर रहा है।

....
 
रिस्की लव - 14

पंकज जिस कमरे में घुसा था उसमें मीरा कैद थी। उसे देखते ही मीरा गुस्से से उबलने लगी। लेकिन वह कुछ कर नहीं सकती थी। वह फर्श पर बैठी हुई थी। उसके हाथ पैर बंधे हुए थे। मुंह पर भी पट्टी बंधी हुई थी। वह बस अपनी विवशता में छटपटा रही थी।
पंकज अंदर गया। एक कुर्सी लेकर मीरा के सामने बैठ गया। उसने मीरा के चेहरे पर हाथ फेरा। मीरा ने गुस्से से अपना सर झटका और कुछ पीछे खिसक गई। उसकी इस दशा पर पंकज हंसने लगा। वह उठकर खड़ा हो गया। कमरे में इधर से उधर टहलने लगा। उसके बाद आकर फिर कुर्सी पर बैठ गया। इस बार मीरा के बाल पकड़ कर बोला,
"अंजन जिसे भी अपना समझता है उस पर मैं अपना अधिकार कर लूँगा। शुरुआत तुम्हें उससे छीनकर कर दी है। कुछ दिनों में तुम्हें अपना भी बना लूँगा।"
उसकी बात सुनकर मीरा ने उसकी तरफ गुस्से से देखा। पंकज एक बार फिर उसकी विवशता को देखकर हंसा। वह उठा और कमरे से बाहर आ गया। पहले की तरह दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगा दी।
नीचे आंगन में आकर उस आदमी से बोला,
"इसे यहाँ से हटाने का इंतज़ाम जल्दी करो। अंजन हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर अपने घर आ गया है। मैं उससे मिला था। मुझे लगता है कि उसे मुझ पर कुछ शक है।"
उसके साथी ने कहा,
"इंतज़ाम हो गया है। आज रात को ही पूना के लिए रवाना कर दूँगा। आप फिक्र ना करें।"
"मैं तब तक यहीं ठहरूँगा। खाने की व्यवस्था करो।"
"ठीक है भाई...."
यह कहकर वह कमरे के दरवाज़े पर ताला लगाने चला गया।

खाना खाकर पंकज उसी मकान के एक कमरे में आराम करने लगा। यह मकान पंकज का ही था। अंजन इस मकान के बारे में जानता था। इसलिए पंकज मीरा को पूना के एक मकान में भिजवा रहा था। वह मकान उसने कुछ ही दिनों पहले खरीदा था। इसकी जानकारी अंजन को नहीं थी।
पंकज लेटे हुए हमले वाले दिन को याद करने लगा। उस दिन अंजन ने दिन में अपने रिज़ार्ट की ज़मीन का भूमिपूजन किया था। बहुत से लोगों को बुलाया था। मीरा को खासतौर पर लंदन से बुलवाया था। उन लोगों को भी बुलवाया था जो बस कुछ दिनों पहले ही अंजन से जुड़े थे। लेकिन जिसके साथ वह फुटपाथ से उठकर महल तक पहुँचा था उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था।
अंजन के लिए पंकज की गिनती अब उसके लिए काम करने वाले आदमियों में होती थी। उस दिन पंकज को बहुत बुरा लगा था। रिज़ार्ट की ज़मीन हासिल करने में उसकी भी मेहनत थी। उस दिन भूमिपूजन के समय वह नौकरों की तरह आने वाले मेहमानों की आवभगत कर रहा था।
शाम को अंजन ने उसे आदेश दिया कि वह मीरा को शिमरिंग स्टार्स ले जाना चाहता है। केयर टेकर से कहकर वहाँ कुछ इंतजाम करा दे। मीरा शराब नहीं पीती है। इसलिए उसके लिए नॉन अल्कोहॉलिक शैंपेन की व्यवस्था करवा दे।
पंकज सारी व्यवस्था करते हुए अंदर ही अंदर सुलग रहा था। वह जानता था कि मीरा को लेकर अंजन गंभीर है। वह उसे प्यार करता है। मीरा के उसके जीवन में आने के बाद से वह बहुत खुश रहने लगा था। पंकज के मन में कई बार आया था कि वह मीरा को उससे अलग कर दे।
उस दिन अंजन ने मीरा से कहा था कि वह वहीं से उसे एयरपोर्ट छोड़ देगा। इसलिए मीरा ने अपना बैग अंजन की गाड़ी में रखवा दिया था। अंजन का प्लान था कि वह और मीरा बीच हाउस में देर रात तक बातें करेंगे। फ्लाइट का समय होने से पहले वह उसे एयरपोर्ट ले जाकर फ्लाइट में बैठा देगा।
पंकज ने वो सारे इंतज़ाम तो किए ही थे जो अंजन ने कहे थे पर उसने अपनी तरफ से भी कुछ इंतज़ाम किया था। वह बहुत दिनों से ऐसे मौके की तलाश में था जब अंजन को नुक्सान पहुँचाया जा सके। इसलिए वह तरुण से भी मिला था। लेकिन उस दिन अचानक एक अच्छा मौका उसे मिल गया।
अंजन मीरा को लेकर अपने बीच हाउस जा रहा था। इस बात की जानकारी किसी को नहीं थी सिवाय पंकज के। उसने अपना दिमाग दौड़ाना शुरू किया। अपने दो खास आदमियों के साथ वह यह सोचकर बीच हाउस गया था कि अंजन तो मीरा के साथ मस्त रहेगा। वह लापरवाह होगा। बीच हाउस पर उसके दोनों साथियों के अलावा केयर टेकर और मुकेश होंगे।
उसने सोचा था कि बारह बजे के आसपास जब अंजन और मीरा निश्चिंत होकर आराम कर रहे होंगे तो वह केयर टेकर और मुकेश को ठिकाने लगा देगा। उसके बाद अपने दोनों साथियों के साथ अंजन को खत्म कर देगा।
मीरा को खत्म करने का उसका इरादा नहीं था। वह अंजन की बाकी चीज़ों की तरह मीरा पर भी अपना हक जमाना चाहता था।
इस योजना के अन्तर्गत वह अपने दोनों साथियों के साथ बाहर बैठा शराब पी रहा था। तीनों इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कुछ देर में जब अंजन और मीरा आराम करने लगेंगे तो अपनी कार्यवाही शुरू करेंगे।
लेकिन अभी दस बजकर बीस मिनट हुए थे कि किसी ने अचानक बीच हाउस पर हमला कर दिया। उसके दोनों साथी तो मारे गए पर पंकज भागकर बीच हाउस के पिछले हिस्से में चला गया। वह किसी भी कीमत पर मीरा को पाना चाहता था। उसने सोचा कि अंदर जाकर वह अंजन को मारकर मीरा को पिछले हिस्से से निकाल कर ले जाएगा।
पिछले हिस्से में अंदर जाने के लिए एक दरवाज़ा था। वहाँ पहुँच कर उसने गोली चलाकर उसका लॉक तोड़ दिया। दरवाज़ा तोड़कर जब वह अंदर आया तो केयर टेकर एक कोने में दुबका हुआ था। जाते हुए उसने केयर टेकर को गोली मार दी। वह अंजन के पास गया। अंजन ने उसे मीरा को सुरक्षित ले जाने को कहा।
पंकज को लगा कि इस हालत में अंजन का मरना तो तय है। वह मीरा को उसे सौंप रहा है। इसलिए अंजन को छोड़कर वह मीरा का हाथ पकड़कर पिछले हिस्से की तरफ भागा।
दोनों कारें बीच हाउस के पिछले हिस्से में खड़ी थीं। मीरा को अपनी कार में बैठा दिया। उसने अंजन की कार में झांककर देखा पर मुकेश नहीं था। जल्दबाजी में उसने मुकेश पर अधिक ध्यान नहीं दिया। मीरा को लेकर निकल गया।
वह निश्चिंत था कि अंजन अब बचेगा नहीं। मीरा को लेकर वह कोलाड आ गया। उसे इसी मकान में छिपा दिया। किसी को शक ना हो इसलिए फौरन वापस मुंबई लौट गया। मुंबई पहुँच कर वह यह देखने के लिए अंजन के बंगले पर गया कि कहीं बचकर वह वहाँ तो नहीं पहुँच गया। अंजन बंगले पर नहीं था। लेकिन डॉक्टर मेहरा ने फोन कर उसे बताया कि मुकेश सही समय पर अंजन को हॉस्पिटल ले आया था। अंजन का ऑपरेशन सफल हो गया है।
उस वक्त पंकज को लगा कि मुकेश को भी खोजकर मार देना चाहिए था।

अचानक किसी ने मकान के दरवाज़े पर दस्तक दी। पंकज फौरन उठकर अपने कमरे से बाहर आ गया। उसका साथी भी आंगन में था। पंकज ने उससे पूँछा,
"कौन हो सकता है ?"
"भाई पता नहीं। यहाँ तो कोई आता नहीं है।"
उसके साथी ने अचरज से कहा। एक और बार दरवाज़े पर दस्तक हुई। पंकज और उसका साथी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। पंकज के साथी ने उसकी तरफ देखा। पंकज ने अपनी गन निकाल ली। उसने कहा,
"मैं तैयार हूँ। तुम जाकर देखो। जो भी हो उसे टालने की कोशिश करो।"
उसका साथी सहमता हुआ दरवाज़े तक गया। उसने एक बार पंकज की तरफ देखा। पंकज ने इशारे से उसे आश्वस्त कर दिया। उसने दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर बाहर झांका। उसे कोई नहीं दिखा। उसने दरवाज़ा खोला और बाहर गली में झांकने लगा। किसी ने फुर्ती से उसकी कनपटी पर गन रख दी। एक दूसरा आदमी दरवाज़े से अंदर दाखिल हुआ।
पंकज ने गोली चलाई पर उसने फुर्ती से खुद को अलग कर लिया। गोली उसे नहीं लगी। उसने एक गोली चलाई जो पंकज के हाथ में लगी। उसकी गन छूटकर गिर गई। उस आदमी ने दौड़कर पंकज की गर्दन दबोच ली।
बाहर खड़े आदमी ने पंकज के साथी को मार दिया। फिर वह अंदर आया। उसे देखते ही पंकज पहचान गया। वह अंजन का आदमी था। उस आदमी ने कहा,
"मीरा कहाँ है ?"
पंकज कुछ नहीं बोला। जिसने उसकी गर्दन दबोच रखी थी वह बोला,
"नहीं बताओगे तो मीरा को तो हम ढूंढ़ ही लेंगे पर तुम जान से हाथ धो बैठोगे।"
पंकज ने अपने हाथ से सीढ़ी की तरफ इशारा किया। दूसरा आदमी भागकर ऊपर चला गया। उसने देखा कि ऊपर कमरे के दरवाज़े पर ताला लगा है। उसने गोली से ताला तोड़ दिया। दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
गोली की आवाज़ सुनकर मीरा डर से कांप रही थी। उस आदमी ने आगे बढ़कर उसका मुंह खोल दिया। मीरा चिल्लाई,
"कौन हो तुम ? क्या चाहते हो ?"
"घबराइए नहीं... मैं अंजन सर का आदमी हूँ। आपको छुड़ाने आया हूँ।"
उस आदमी ने मीरा के बंधन खोले और उसे लेकर नीचे आ गया। नीचे पंकज को देखते ही वह चिल्ला उठी,
"धोखेबाज़, मक्कार उस दिन मैं तुम्हारे साथ यह सोचकर चली आई थी कि तुम मेरी हिफाज़त के लिए यहाँ ला रहे हो। पर तुमने मुझे यहाँ लाकर कैद कर दिया। अब तुम्हारी खैर नहीं है।"

मकान के बाहर एक वैन खड़ी थी। मीरा और पंकज को उसमें बैठाकर दोनों लोग वहाँ से चल दिए।
पंकज समझ गया था कि अब उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। अंजन कभी भी उसे उसकी गुस्ताखी के लिए माफ नहीं करेगा। उसके सपने बस कुछ ही देर में खत्म हो जाएंगे।
मीरा अंजन के उस रूप को याद कर रही थी जिसे उसने पहली बार बीच हाउस पर देखा था। उस दिन वह समझ गई थी कि कंस्ट्रक्शन बिज़नेस महज़ एक पर्दा है। अंजन की असलियत कुछ और ही है। वह अंजन से नाराज़ थी कि उसने अपना सच छिपाया था।
एक बात उस दिन से ही उसके मन में थी। जो उस दिन से लगातार अंजन को लेकर उठ रही थी।
हमले में अंजन का क्या हुआ ?
लेकिन अब उसे विश्वास हो गया था कि अंजन ठीक है। उसने अपने आदमियों को उसे छुड़ाने के लिए भेजा है।

....
 
रिस्की लव - 15

विनोद ने मुंबई लौट कर नफीस को सारी बात बताई। विनोद को लग रहा था कि सारा खेल पंकज का रचाया हुआ था। लेकिन नफीस को अभी भी लग रहा था कि अंजन पर हमला पंकज ने नहीं करवाया था। उसने अपना तर्क देते हुए कहा,
"विनोद अगर हमला पंकज ने करवाया होता तो वह बिना इस बात की पूरी तसल्ली किए कि अंजन मर गया है बीच हाउस से ना जाता। यह हमला किसी और ने करवाया है। उसकी अंजन से बहुत गहरी दुश्मनी है। उसने अंजन पर हमला करवाया और इसकी खबर भी बाहर नहीं आने दी।"
विनोद ने अपना तर्क रखा,
"सर फिर उसने बिना तसल्ली किए अंजन को क्यों छोड़ दिया ?"
"उसने अपना काम पक्का किया था। अंजन का बच जाना सिर्फ उसकी किस्मत है। उस हमलावर को नहीं पता था कि अंजन का ड्राइवर मुकेश भी वहाँ है। उसने अंजन के सीने पर गोली चलाई। उसका बचना असंभव जानकर चला गया।‌ बाद में मुकेश ने अंजन को हॉस्पिटल पहुँचा दिया। सोचो अगर पंकज ने हमला कराया होता तो वह मुकेश को छोड़ता नहीं। इसका मतलब हमला अचानक हुआ। वह मीरा को लेकर भाग गया। शायद वह मीरा को अपना बनाना चाहता होगा। इसलिए उसे कैद करके रखा होगा।"
विनोद को उसका तर्क ठीक लगा। वह कुछ सोचकर बोला,
"सर घूम फिरकर बात फिर मुकेश पर आ गई है। ज़रूर वह हमलावर के डर से ही भागा है। वह जानता होगा कि अंजन पर हमला किसने काराया था।"
नफीस भी किसी विचार में मग्न था। वह सोच रहा था कि मुकेश आखिर दिल्ली ना जाकर कहाँ चला गया होगा।

वैन अंजन के नए बन रहे रिज़ार्ट पर आकर रुकी। पंकज और मीरा को एक आधी बनी हुई बिल्डिंग में ले जाया गया। एक बहुत बड़ा सा हॉल था। उसके एक कोने में अंजन एक कुर्सी पर बैठा था। उसे देखते ही मीरा भागकर उसके पास गई। उसकी आँखों में आंसू थे।‌
अंजन ने एक ढीली सी शर्ट पहन रखी थी। उसकी छाती का घाव अभी पूरी तरह से नहीं भरा था। मीरा ने आगे बढ़कर धीरे से उस जगह हाथ रखा जहाँ घाव था। वह बोली,
"मुझे तुम्हारे आदमी ने बताया कि दिल के पास गोली लगी थी। अब कैसे हो ?"
अंजन ने उसके हाथ को चूमते हुए कहा,
"मैं ठीक हूँ.... तुम बताओ इस हरामखोर ने तुम्हारे साथ कोई ज्यादती तो नहीं की।"
अंजन पंकज की तरफ खूनी निगाहों से घूर रहा था। मीरा ने कहा,
"मंसूबे तो इसने बहुत पाल रखे थे। लेकिन तुमने होने नहीं दिया।"
कहकर वह उसके कंधे पर सर रखकर रोने लगी। अंजन ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरकर कहा,
"तुम बंगले पर जाकर आराम करो। मैं इससे निपट कर आता हूँ।"
अंजन ने अपने आदमी को इशारा किया। वह मीरा को लेकर चला गया। उसके जाने के बाद अंजन अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गया। उसके आदमी ने पंकज को धक्का दिया तो वह उसके कदमों पर जाकर गिरा। वह गिड़गिड़ाते हुए बोला,
"भाई मुझे माफ कर दो। कितने सालों का साथ है हमारा। मुझसे गलती हो गई।"
अंजन कुछ देर तक उसे गुस्से से घूरता रहा। उसके बाद उसे एक लात खींचकर मारी। इससे उसके ज़ख्म पर भी दर्द हुआ। पर उसे सहते हुए उसने कहा,
"इतने सालों का साथ अब याद आ रहा है। जब मीरा पर गंदी नज़र डाली तब याद नहीं था। जब मुझ पर हमला करवाया तब याद नहीं था।"
पंकज ने रोते हुए कहा,
"भाई भाभी पर बुरी नज़र डालकर पाप किया है लेकिन आप पर हमला नहीं करवाया है।"
"तुमने नहीं तो किसने करवाया है ?"
पंकज ने उसे उस दिन के अपने प्लान और जो कुछ घटा उसके बारे में सब बताया। उसे सुनने के बाद अंजन ने कहा,
"मुकेश कहाँ है ?"
"मुझे नहीं पता है भाई। मुझे बस इतना पता चला था कि वह मुंबई से दिल्ली जाने वाली ट्रेन पर चढ़ा था।‌ इसलिए मैंने अपने आदमी यह सोचकर दिल्ली भेजे थे कि उसे ढूंढ़कर असली हमलावर के बारे में पूँछूँगा। शायद उसे कुछ पता हो। पर मेरे आदमियों को वह दिल्ली में बहुत तलाशने पर भी नहीं मिला।"
अंजन ने पूँछा,
"मुकेश को दिल्ली की ट्रेन में चढ़ते तुम्हारे आदमियों ने देखा था।"
"नहीं भाई उन्होंने मुकेश के एक साथी से सुना था कि जब वह किसी को दिल्ली की गाड़ी में बैठाने के लिए गया था, तो उसने मुकेश को अपने परिवार के साथ गाड़ी पर चढ़ते देखा था। लेकिन जब तक वह कुछ कहता ट्रेन चलने लगी। इसलिए उसने आवाज़ नहीं दी।"
"मुकेश के किस साथी ने यह सूचना दी थी ?"
पंकज ने दिमाग पर ज़ोर डालते हुए कहा,
"यह तो मैंने पूँछा नहीं था।"
अंजन के चेहरे पर तंज़ भरी मुस्कान खिल गई। उसने कहा,
"तुम सोचते हो कि तुम मेरी बराबरी कर सकते हो। इसलिए मुझे रास्ते से हटाना चाहते थे। पर देख लो तुम कितने होशियार हो। जो खबर तुम्हें मिली उसकी सच्चाई भी नहीं परख पाए। यह भी नहीं पता कि खबर देने वाला था कौन।"
पंकज चुपचाप सिर झुकाए बैठा था। इस समय वह कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। अंजन ने अपनी गन उसकी ओर तान दी। पंकज समझ गया कि अब उसका अंत आ गया। वह कुछ नहीं बोला।
एक गोली ने उसके माथे के बीच सुराख बना दिया।‌
अंजन ने एक बार फर्श पर पड़ी पंकज की लाश को देखा। फिर अपने साथी को निर्देश दिया कि ‌लाश को ठिकाने लगा दे।
अपने बंगले की तरफ जाते हुए अंजन ने एंथनी जैकब से बात की। उसे मुकेश का पता लगाने को कहा।

मीरा कई दिनों के बाद नहाई थी। उसे बहुत अच्छा लग रहा था। इसलिए बाथरोब में ही अपने बेड पर लेट गई। आँखें बंद कर वह कुछ सोच रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। नौकर ने बाहर से कहा,
"मैम आपके लिए खाना लगा दिया है।"
"ठीक है जाओ.... मैं आती हूँ।"
मीरा उठी। वार्डरोब में उसके लिए कुछ नए कपड़े सही तरह से लगाए गए थे। वह यह सोचकर मुस्कुराई कि अंजन को उसका इंतज़ार था। तभी उसके लिए कपड़े मंगाकर करीने से वार्डरोब में सजा दिए थे। उसने उनमें से एक ड्रेस चुनी। उसे पहन कर डाइनिंग टेबल पर आई। नौकर उसके लिए प्लेट लगा रहा था तभी अंजन भी आ गया। उसने मीरा को देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। मीरा भी मुस्कुरा दी। वह उसके पास बैठने जा रहा था कि तभी डॉक्टर मेहरा का फोन आ गया। उसने फोन उठा लिया। डॉक्टर मेहरा ने बताया कि नर्स का फोन आया था। उसने बताया कि वह मना करने के बावजूद भी बाहर चला गया है। उन्होंने कुछ सख्त लहज़े में उसे समझाया कि अभी वह पूरी तरह ठीक नहीं है। अतः उसे सावधानी बरतनी होगी।
अंजन के ज़ख्म में लात मारते समय खिंचाव आ गया था। इसलिए दर्द हो रहा था। उसने मीरा से कहा कि वह खाना खाकर अपने कमरे में आराम करे। वह कुछ देर में उसके पास आएगा।

मीरा के मिल जाने से अंजन बहुत खुश था। वह उसके बारे में ही सोच रहा था। नर्स अंजन की ड्रेसिंग कर रही थी। इतने दिनों में वह कुछ खुल गई थी। इसलिए बोली,
"सर आपने मेरी बात नहीं मानी। बाहर चले गए। अभी घाव भरने में कुछ समय और है।"
कोई और समय होता तो शायद अंजन उसे घूर कर देखता। पर आज उसका मूड अच्छा था। उसने कहा,
"ज़रूरी ना होता तो बात मान लेता।"
नर्स ने ड्रेसिंग पूरी की और उससे कहा कि वह खाना खा ले। उसके बाद वह उसे दवा खिलाएगी। अंजन ने उससे कहा कि वह घर जाए। दवा उसे दे दे। वह अपने आप खा लेगा।

अंजन ने मीरा के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। मीरा ने उठकर दरवाज़ा खोल दिया। अंजन अंदर जाकर बैठ गया। मीरा ने कहा,
"थैंक्यू...."
अंजन ने कहा,
"किस बात के लिए ?"
मीरा ने बैठते हुए कहा,
"मेरे आराम का खयाल रखने के लिए। बहुत खूबसूरत ड्रेसेज़ हैं।"
अंजन उठकर उसके पास आ गया। उसका हाथ पकड़ कर बोला,
"मुझे मौका दो। मैं तुम्हें दुनिया की हर खुशी दूँगा।"
मीरा ने अपना हाथ छुड़ा लिया। उसके इस व्यवहार पर अंजन ने कहा,
"क्या बात है ? नाराज़ हो मुझसे ?"
मीरा ने बेरुखी दिखाते हुए कहा,
"क्यों... नहीं होना चाहिए क्या ?"
अंजन वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ गया। मीरा ने कहा,
"मुझसे छिपाया क्यों ?"
अंजन ने कहा,
"क्या छिपाया है मैंने ?"
"अपनी असलियत।"
उसकी बात पर अंजन चुप हो गया। मीरा ने कहा,
"तुम्हारा कंस्ट्रक्शन्स का बिज़नेस महज़ एक पर्दा है। तुम उसके पीछे क्या क्या करते हो बताओ।"
अंजन अभी भी कुछ नहीं बोला। मीरा उस पर बताने के लिए ज़ोर डालने लगी। अंजन को अच्छा नहीं लग रहा था। वह खीझकर बोला,
"कितने मन से तुम्हारे पास आया था कि उस दिन जो नहीं कह सका वह आज कहूँगा। तुम यह सब लेकर बैठ गईं।"
मीरा ने भी गुस्से से कहा,
"मेरे साथ ज़िंदगी बिताने की बात करते हो। लेकिन सच नहीं बोल सकते हो। जहाँ इतना किया है एक काम और कर दो। मेरे लंदन जाने का इंतज़ाम कर दो।"
उसकी बात सुनकर अंजन कुछ देर चुप बैठा रहा। उसके बाद उठकर दरवाज़े तक गया। बाहर जाने से पहले मीरा से बोला,
"इंतज़ाम होते ही खबर कर दूँगा।"
दरवाज़ा खोलकर वह चला गया। मीरा कुछ पल खड़ी रही। उसके बाद अपने बिस्तर पर लेट गई।
अंजन गुस्से में भरा अपने कमरे में पहुँचा। इतने दिनों के बाद मीरा उसे मिली थी। वह उसके साथ प्यार भरी बातें करना चाहता था। लेकिन मीरा ने उसके काम के बारे में पूँछकर उसका मूड खराब कर दिया था।
वह गुस्से से भरा हुआ था। उसकी कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। उसने अपनी अलमारी खोली। उसमें पीने का सामान रखा था। उसने बोतल उठाई और मुंह लगाकर पीने लगा।

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रिस्की लव - 16

तरुण पंकज से संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन उसकी कोई खबर नहीं लग रही थी। उसका माथा ठनक रहा था। एक खौफ उसके मन को परेशान कर रहा था। कहीं अंजन को पंकज और उसके संबंध का पता तो नहीं चल गया। अंजन ने पंकज को मार तो नहीं दिया।
यह बात मन में आते ही वह भय से कांप उठा। वह जानता था कि अगला नंबर उसका होगा। उसने अंजन को ब्लैकमेल करने का प्लान बनाया था। लेकिन अब डर कर उसे स्थगित कर दिया। वह एक ऐसा रास्ता तलाश करने लगा जिससे वह अंजन के राज़ का फायदा उठा सके।

मीरा लंदन वापस चली गई थी। उसके चले जाने से अंजन को बहुत दुख हुआ था। कुछ दिनों तक तो वह अपने दुख में डूबा रहा। लेकिन कठिनाइयों से लड़ने के आदी अंजन ने खुद को उस दुख में डूबने नहीं दिया। धीरे धीरे दुख ने गुस्से का रूप धारण कर लिया। यह गुस्सा मीरा पर नहीं था। गुस्सा उस हमला करने वाले के लिए था। उसकी वजह से ही उस दिन बनती हुई बात बिगड़ गई थी।
अंजन अब हर हाल में उस आदमी का पता लगाना चाहता था जो उस पर हमला करवा सकता था। उसने बहुत सोचा था। उसके मन में नाम तो कई ऐसे आए जो उसे पसंद नहीं करते थे। लेकिन उनमें से कोई भी ऐसा नहीं लग रहा था जो इतनी हिम्मत कर पाता।
उस दिन होश खोने से पहले उसने किसी की झलक देखी थी। वह पंकज को कवर देने के लिए मेन डोर की तरफ बढ़ रहा था। तभी एक नकाबपोश सामने आया। उसने उसके सीने पर गोली चलाई। वह फर्श पर गिर पड़ा। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। वह होश खो रहा था। उसी समय उसने किसी की धुंधली सी आकृति देखी थी।
बहुत याद करने पर भी वह पहचान नहीं पा रहा था कि वह कौन था। इससे उसकी छटपटाहट और बढ़ रही थी।

महाराष्ट्र और गुजरात के बार्डर पर स्थित नवापुर में मुकेश अपने परिवार के साथ ठहरा हुआ था। उसकी पत्नी राजेश्वरी बहुत परेशान थी। जो थोड़े बहुत पैसे लेकर वह लोग जान बचाने के लिए भागे थे वह खत्म हो गए थे।‌ अभी कितने दिन और इस तरह छिप कर रहना है बताना कठिन था।
नवापुर में राजेश्वरी का ममेरा भाई ललित रहता था। अपनी जान बचाने के लिए मुकेश अपनी पत्नी राजेश्वरी और बेटी माधवी को लेकर यहाँ आ गया था।
उसका प्लान दिल्ली जाने का था। वहाँ मुकेश का एक रिश्तेदार रहता था। वह वहाँ किसी बिज़नेस मैन का ड्राइवर था। उसकी दिल्ली में जान पहचान भी थी। मुकेश ने सोचा था कि वह अपने रिश्तेदार की मदद से कोई काम तलाश लेगा। लेकिन जब वह दिल्ली की ट्रेन में चढ़ रहा था तब उसके एक साथी ने उसे ट्रेन पर चढ़ते देख लिया था।
मुकेश बहुत घबराया हुआ था। ट्रेन में बैठकर उसने सोचा कि अब दिल्ली में रहना उसके लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए ट्रेन जब जलगांव स्टेशन पर रुकी तो वह राजेश्वरी और माधवी के साथ उतर गया। वहाँ एक दिन एक छोटे से होटल में ठहरने के बाद उन्होंने नवापुर आने का फैसला किया।
राजेश्वरी बेचैनी से बार बार दरवाज़े पर देख रही थी। मुकेश उसके भाई ललित के साथ गया हुआ था। ललित एक ठेकेदार के साथ काम करता था। मुकेश कुछ पढ़ा लिखा था। ललित उसे कोई काम मिल जाए इस उम्मीद से ठेकेदार के पास ले गया था। राजेश्वरी मुकेश को लेकर चिंतित रहती थी। पर मजबूरी थी। पेट पालने के लिए कुछ करना था। इसलिए मुकेश ने उसे समझाया कि उसे जाने दे।

खाना खाने के बाद मुकेश और राजेश्वरी लेटे हुए थे। उन दोनों के बीच माधवी लेटी थी। मुकेश ने सोती हुई माधवी के सर पर हाथ फेरा। वह बार बार उससे पूँछती थी कि हम लोग घर कब जाएंगे। वह अपने स्कूल जाना चाहती थी। चॉल के दोस्तों के साथ खेलना चाहती थी। राजेश्वरी ने मुकेश से कहा,
"क्या अब हम मुंबई वापस नहीं जाएंगे‌ ?"
मुकेश ने कहा,
"तुम भी माधवी की तरह बात कर रही हो। मैं क्या बताऊँ तुम्हें ?'"
"मैं माधवी की तरह नहीं माधवी के लिए बात कर रही हूँ। क्या माधवी की पढ़ाई छुड़वा दोगे। हम लोग तो कहीं के नहीं रहे। कब तक ऐसे चलेगा ?"
"राजेश्वरी तुमको क्या लगता है कि मुझे माधवी की चिंता नहीं है। पर क्या करूँ। अभी कुछ समझ ही नहीं आ रहा है। लेकिन मैं कोई ना कोई व्यवस्था करूँगा। कहीं ऐसी जगह चलकर बस जाएंगे जहाँ चैन से रह सकें। फिलहाल तो यहाँ ठेकेदार की गाड़ी चलाने का काम मिल गया है।"
राजेश्वरी ने कहा,
"यहीं क्यों नहीं बस जाते हैं ? माधवी का कहीं एडमीशन करवा देते हैं।"
"राजेश्वरी मैं खुद बहुत परेशान हूँ। मुझे कुछ समय दो। सब ठीक कर दूँगा।"
राजेश्वरी ने करवट बदल ली। मुकेश उसके गुस्से को समझ रहा था। वह अपनी तकलीफों की वजह से गुस्से में नहीं थी। वह परेशान थी माधवी के भाविष्य को लेकर। उसे मुकेश की चिंता थी। उन लोगों ने मेहनत करके मुंबई में जो कुछ भी बनाया था सब छूट गया था। अब एक नई जगह पर दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। ‌
राजेश्वरी कई बार उससे कह चुकी थी कि तुमने अपने मालिक की मदद करके अपने लिए मुसीबत मोल ले ली। लेकिन उस दिन वह उस शख्स को मरते हुए नहीं छोड़ सकता था जिसके कारण इतने सालों से उसकी रोज़ी रोटी चल रही थी।
वह बीच हाउस की उस रात को याद करने लगा।

अंजन और मीरा को लेकर वह बीच हाउस पहुँचा।‌ अंदर जाते हुए अंजन ने उससे कहा कि मीरा को यहीं से एयरपोर्ट जाना है। तड़के सुबह फ्लाइट है। निकलने से पहले वह फोन करेगा तब वह चलने के लिए तैयार हो जाए। तब तक जाकर आराम करे।‌
अंजन और मीरा अंदर चले गए। वह बीच पर टहलने के लिए चला गया। बहुत देर तक वह चट्टान पर बैठ कर समुद्र की लहरों को देखता रहा।‌ वहाँ बैठे हुए वह राजेश्वरी को याद कर रहा था। बहुत दिनों से वह उससे कह रही थी कि उसे और माधवी को कहीं घुमाने ले चले। उसने सोचा था कि मीरा को एयरपोर्ट छोड़कर लौटते हुए वह अंजन से कुछ दिनों की छुट्टी के लिए बात करेगा।
कुछ वक्त बीच पर बिताने के बाद वह आराम करने के इरादे से लौटकर आ गया। पंकज अपने दोनों साथियों के साथ बाहर महफिल जमाए बैठा था। मुकेश बीच हाउस के पिछले हिस्से में चला गया। वहाँ दोनों कार खड़ी थीं। यहीं पर केयर टेकर का क्वार्टर था। वह अक्सर अंजन के साथ यहाँ आता था। बीच हाउस के केयर टेकर से उसकी अच्छी दोस्ती थी। वह उसके क्वार्टर में चला गया। केयर टेकर तब अंजन और मीरा की सेवा के लिए उनके पास जा रहा था। उसने कहा कि मुकेश उसके क्वार्टर में आराम से सो जाए। केयर टेकर के जाने के बाद मुकेश लेट गया। उसे नींद आ गई।
गोलियां चलने की आवाज़ सुनकर उसकी नींद टूटी। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था कि अचानक गोलियां क्यों चलने लगीं ? किसने बीच हाउस पर हमला कर दिया है ?

डर कर वह अपने बेड के नीचे छिप गया। कुछ देर बाद गोलीबारी की आवाज़ आना बंद हो गई। तब वह धीरे से बेड के नीचे से निकला। क्वार्टर के बाहर आया। पंकज की गाड़ी गायब थी। वह सावधानी से पाम के पेड़ों के पीछे छिपता हुआ आगे आया। उसने देखा कि पंकज के दोनों आदमी मरे पड़े थे। वह भागकर बीच पर पहुँचा तो देखा कि दो लोग एक मोटरबोट की तरफ भाग रहे हैं। उनमें से एक ने मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर मास्क था। मुकेश डर कर रुक गया। उस आदमी ने अपनी उंगली उसकी तरफ उठाई। उसके बाद भागकर मोटरबोट पर चढ़ गया। मोटरबोट दोनों लोगों को लेकर चली गई।
वह वापस बीच हाउस आया। भागकर अंदर गया। अंजन फर्श पर पड़ा था। उसके सीने में गोली लगी थी। मीरा वहाँ नहीं थी। वह डर गया। उसने भागने के लिए कदम बढ़ाए पर उसके मन से आवाज़ आई कि अंजन को ऐसे छोड़कर ना जाए। वह फौरन कार बीच हाउस के अगले हिस्से में लेकर आया। खून से लथपथ अंजन को बड़ी मुश्किल से उठाकर कार तक लाया। उसे पिछली सीट पर लिटाया और कावेरी हॉस्पिटल की तरफ चल दिया।
एक बार माधवी जब बीमार पड़ी थी तब उसका इलाज कावेरी हॉस्पिटल में हुआ था। मुकेश के पास डॉक्टर मेहरा का नंबर था। उसने रास्ते से ही फोन करके उन्हें सारी बात बता दी। जब वह अंजन को लेकर अस्पताल पहुंँचा तो डॉक्टर मेहरा सारी तैयारी कर चुके थे। उसके पहुँचते ही अंजन को ऑपरेशन के लिए ले जाया गया।
ऑपरेशन के लिए ले जाते हुए डॉक्टर मेहरा ने बताया कि वह अंजन का ऑपरेशन कर उसकी जान बचाने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन अभी वह कुछ कह नहीं सकते हैं। उसने अंजन को हॉस्पिटल लाकर अच्छा काम किया है। अगर वह उसे सही समय पर लेकर ना आया होता तो अंजन का बचना नामुमकिन था।
डॉक्टर ऑपरेशन कर रहे थे। मुकेश को हॉस्पिटल में रुकने का कोई मतलब समझ नहीं आया।‌ रात के डेढ़ बज रहे थे। वह अपने घर चला गया।
घर पहुँच कर उसने राजेश्वरी को सारी बात बताई। सब सुनकर राजेश्वरी चिंतित हो गई। उसने आशंका जताई कि कहीं हमला करने वाले उसकी जान के पीछे ना पड़ जाएं। उसे खुद भी इस बात का डर था। पर उसने राजेश्वरी को समझाया कि वह बेकार की चिंता कर रही है। हमला करने वालों को क्या पता चलेगा कि अंजन को किसने हॉस्पिटल पहुँचाया।
राजेश्वरी को तसल्ली देकर वह आराम करने के लिए लेटा था। राजेश्वरी की चिंता उसे परेशान कर रही थी। उस आदमी ने भागते हुए रुक कर उसे देखा था। उसकी तरफ उंगली उठाकर इशारा भी किया था। उसका मतलब यह भी हो सकता था कि वह उसे पहचान गया है।
वह हॉस्पिटल से इसी लिए चला आया था। अब वह सोच रहा था कि क्या करे। उसने तय किया कि सुबह पुलिस स्टेशन जाकर सारी बात की जानकारी दे देगा।
वह आँखें बंद करके सोने की कोशिश कर रहा था कि उसे एक फोन आया। कॉल अंजान नंबर से था। उसने फोन उठा लिया। दूसरी तरफ से एक आदमी ने धमकी भरे अंदाज में कहा कि उसने अंजन को हॉस्पिटल पहुँचा कर ठीक नहीं किया है। अब उसकी खैर नहीं है।
मुकेश घबरा गया।

....
 
रिस्की लव - 17

फोन आने के बाद मुकेश की नींद उड़ गई। वह डर गया था। उसे अपने से अधिक राजेश्वरी और माधवी की फ़िक्र थी। उसके मन में पहली बात यही आई कि उसे मुंबई से कहीं दूर चले जाना चाहिए। वह सोचने लगा कि कहाँ जा सकता है। उसे दिल्ली में रहने वाले अपने रिश्ते के चाचा की याद आई। उस समय घबराहट में और अधिक सोच नहीं पा रहा था। उसने भागकर दिल्ली जाने का फैसला कर लिया।‌
उसने राजेश्वरी को उठाकर सारी बात बताई। उससे कहा कि जितनी जल्दी हो सके निकलने की तैयारी करे। राजेश्वरी ने तीनों के कुछ कपड़े और कुछ पैसे रख लिए। मुकेश ने एटीएम कार्ड और ज़रूरी दस्तावेज़ रख लिए। माधवी को उठाकर तैयार किया और तीनों घर से निकल गए।
ट्रेन में बैठकर मुकेश को लगा कि उसके दोस्त ने दिल्ली की ट्रेन पर चढ़ते हुए देख लिया था। इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है। उसने जलगांव में उतर कर एक सस्ते से होटल में रहकर सोचा कि कहाँ जाना है। कोई उसका पता ना कर सके इसके लिए उसने अपने मोबाइल से ज़रूरी चीज़ें डिलीट कर दीं। सिम कार्ड निकाल कर तोड़ दिया। मोबाइल को तोड़ कर फेंक दिया।
राजेश्वरी ने सुझाव दिया कि वो लोग नवापुर चलें।‌ वह दोनों को लेकर यहाँ आ गया। ललित ने उन्हें एक छोटा सा घर रहने के लिए दिलवा दिया। घर से तो बहुत कम पैसे लेकर चले थे। जिस अकाउंट का एटीएम था उसमें भी अधिक पैसे नहीं थे।‌ मकान लेने और ज़रुरी सामान खरीदने में बहुत सा पैसा लग गया। मुकेश को एक फोन और सिम कार्ड भी लेना पड़ा।
इसलिए आज वह ललित के साथ उसके ठेकेदार से मिलने गया था। उसे ठेकेदार की गाड़ी चलाने का काम मिल गया। कुछ हद तक मुकेश को तसल्ली मिली थी। लेकिन वह भी उन सवालों से परेशान था जो राजेश्वरी उठा रही थी।
उसने इतने सालों की मेहनत से अपनी गृहस्थी बनाई थी। केशव चॉल में अपनी खोली ले ली थी। अपनी बेटी माधवी को वह बहुत चाहता था। उसको लेकर उसके मन में कई सपने थे। वह चाहता था कि माधवी खूब पढ़े। पढ़ लिख कर उसका और राजेश्वरी का नाम रौशन करे। इसलिए उसे पढ़ा रहा था। लेकिन अब माधवी की पढ़ाई भी छूट गई थी। इस बात का उसे सबसे अधिक दुख था।
वह सोच रहा था कि आखिर कब तक ऐसे चलेगा। उसे कुछ तो करना ही पड़ेगा। मुंबई की उसे कोई खबर नहीं थी। वह नहीं जानता था कि अंजन की जान बची या नहीं। उसने डर की वजह से मुंबई में किसी से संपर्क नहीं किया था।
वह यह भी नहीं जानता था कि अंजन पर हमला करने वाला कौन था। वह यह सोचकर डर गया था कि उसे फोन करने वाले को यह पता था कि वह अंजन को हॉस्पिटल ले गया था। उसके पास उसका नंबर भी था। इसलिए घबराहट में मुकेश ने जल्दी से मुंबई छोड़ दी थी।

मुकेश ने एक बार फिर माधवी के सर पर हाथ फेरा। उसे नींद नहीं आ रही थी। वह धीरे से उठा और दरवाज़ा खोलकर बाहर आ गया। मकान के बाहर एक नीम का पेड़ था। वह उसके नीचे जाकर बैठ गया।
वह पेड़ के नीचे बैठा था। उसके सामने कुछ कदम पर एक टूटी सी दीवार थी। अचानक उसे लगा जैसे कि दीवार के उस तरफ से कोई उसे घूर रहा है। उसने ध्यान से देखा तो सचमुच कोई था। वह बुरी तरह डर गया। उठकर अंदर की तरफ भागने लगा। उस आदमी ने चिल्लाकर कहा,
"रुको मुकेश..."
मुकेश डर कर वहीं रुक गया। वह आदमी उसके पास आकर बोला,
"मेरा नाम एंथनी जैकब है। अंजन सर ने तुम्हें तलाशने के लिए कहा था।"
अंजन का नाम सुनकर मुकेश कुछ शांत हुआ। उसने पूँछा,
"अंजन साहब बच गए ?"
"हाँ... तभी तो उन्होंने तुम्हें ढूंढ़ने के लिए कहा।"
मुकेश ने एंथनी की तरफ देखकर कहा,
"तुम्हें सचमुच अंजन साहब ने भेजा है। मैं कैसे यकीन करूँ ?"
एंथनी ने कहा,
"तुमको लगता है कि मैं उनका आदमी हो सकता हूँ जिनसे डर कर तुम भागे थे।"
मुकेश ने धीरे से कहा,
"हाँ...."
एंथनी ने जवाब देते हुए इधर उधर देखकर कहा,
"अगर ऐसा होता तो मैं इतनी देर तुमसे बात क्यों करता। तुम्हें मार देता। अंदर जाकर तुम्हारी बीवी और बेटी को भी मार देता।"
मुकेश को उसकी बात में दम लगा। एंथनी ने कहा,
"अंजन सर के कहने पर ही मैं तुम्हें ढूंढ़ता हुआ यहाँ आया हूँ।"
मुकेश ने आश्चर्य से कहा,
"तुम्हें मेरे यहाँ होने का पता कैसे चला ?"
एंथनी ने उसे घूर कर देखा। वह बोला,
"बताया ना एंथनी जैकब नाम है मेरा। माना हुआ जासूस हूँ।"
मुकेश ने भी उसे अच्छी तरह से देखा। उसके बाद बोला,
"फिर भी कुछ तो होगा जिसके सहारे तुम यहाँ तक आ गए।"
अपने सर की तरफ उंगली दिखाते हुए एंथनी बोला,
"अपने दिमाग के सहारे। कैसे वह बाद में बताऊँगा। मुझे प्यास लगी है। पानी पिला दो।"
मुकेश ने उससे कहा कि वह ठहरे। वह अंदर से पानी लेकर आता है। वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा ही था कि राजेश्वरी दरवाज़ा खोलकर बाहर आई। वह उससे कुछ कहने ही जा रही थी कि एंथनी को देखकर रुक गई। उसके चेहरे पर डर देखकर मुकेश ने आगे बढ़कर उसे सारी बात बताई। कुछ देर तक वह अविश्वास के साथ एंथनी की तरफ देखती रही। एंथनी ने कहा,
"आपके पति सही कह रहे हैं। मैं आप लोगों को नुकसान पहुँचाने नहीं बल्कि आप लोगों की मदद करने आया हूँ। मुझे प्यास लगी है। थोड़ा पानी पिला दीजिए।"
राजेश्वरी अंदर गई और एक गिलास पानी लेकर आई। एंथनी ने पानी पीकर उसे धन्यवाद दिया। मुकेश को एंथनी पर पूरा यकीन हो गया था। उसने राजेश्वरी से कहा कि वह एंथनी के लिए चाय बना दे। वह मान गई। उसने अंदर से बैठने के लिए प्लास्टिक के दो मोंढे़ लाकर दिए। एंथनी और मुकेश बैठ गए। मुकेश ने कहा,
"अब बताओ कि मुझे कैसे ढूंढ़ा ?"
एंथनी ने समझाया,
"तुम दिल्ली की ट्रेन पर चढ़े थे लेकिन दिल्ली नहीं पहुँचे। इसका मतलब था कि ट्रेन में चढ़ने के बाद तुमने इरादा बदल दिया था। मैंने अंदाजा लगाया कि तुम बीच में ही कहीं उतर गए होगे। ट्रेन स्टेशन से चलकर जलगांव में रुकती है। मैंने दिमाग लगाया कि अगर उतरे होंगे तो यहीं उतरे होगे। उसके बाद मैंने सोचा कि यहाँ उतर कर आगे क्या करना है सोचा होगा। इसके लिए आसपास ही किसी होटल में ठहरे होगे। मैंने तुम्हारी तस्वीर के साथ आसपास के होटलों में पूँछताछ की तो पता चला कि एक होटल में तुम परिवार के साथ ठहरे थे लेकिन अगले ही दिन चले गए।"
मुकेश एंथनी को ध्यान से देख रहा था। वह वैसा बिल्कुल भी नहीं था जैसा फिल्मों और टीवी में जासूस को दिखाया जाता था। वह बहुत ही साधारण सा दिखने वाला आदमी था। लेकिन जो वह बता रहा था उससे मुकेश उसकी बुद्धी का कायल हो गया था। उसने कहा,
"अब तक तो तुमने सब ठीक ही बताया है। लेकिन यह बताओ कि तुम्हें कैसे पता चला कि मैं अपने परिवार के साथ नवापुर आया हूँ ? मैं यहाँ रह रहा हूँ यह कैसे पता चला ?"
राजेश्वरी चाय बनाकर ले आई थी। साथ में कुछ बिस्कुट थे। एंथनी ने बिस्कुट की प्लेट और अपनी चाय पकड़ ली। एक बिस्कुट को चाय में डुबोकर खाया। फिर एक घूंट चाय पीकर बोला,
"बहुत अच्छी चाय बनाई है। बहुत मन था चाय पीने का।"
उसने राजेश्वरी की तरफ देखकर कहा,
"थैंक्यू....."
उसके बाद एक और बिस्कुट चाय में डुबोते हुए बोला,
"तुम होटल से चले गए तो मैंने अंदाजा लगाया कि ज़रूर जलगांव छोड़कर बाहर गए होगे। कहाँ और कैसे इस बात पर दिमाग लगाना शुरू किया। दिमाग में आया कि कहीं जाने के लिए ट्रेन ही पकड़ी होगी। स्टेशन पर आकर फिर पूँछताछ की। किस्मत अच्छी थी एक कुली ने तुम्हें नवापुर की गाड़ी में चढ़ते देखा था।"
एंथनी रुका उसने दो बिस्कुट चाय में डुबोकर खाए। फिर दो चार घूंट चाय पी। मुकेश अपनी चाय पीते हुए उसे बड़े ध्यान से देख रहा था। वह सोच रहा था कि एंथनी को इस तरह बिस्कुट खाते देखकर कौन उसे जासूस कह सकता है। लेकिन अंजन ऐसे वैसे को नहीं चुनता है। यह जैसी भी हरकत कर रहा हो पर दिमाग का तेज़ है। एंथनी ने पहले इत्मीनान से सारे बिस्कुट और चाय खत्म की। प्लेट और कप राजेश्वरी की तरफ बढ़ाते हुए उसे एक बार फिर धन्यवाद दिया। मुकेश ने भी अपना कप पकड़ाते हुए कहा,
"अब तुम जाकर आराम करो। मुझे कुछ बात करनी है।"
राजेश्वरी अंदर चली गई। मुकेश ने एंथनी की तरफ देखा। एंथनी बोला,
"नवापुर आने के बाद तुम्हें फिर तलाशना शुरू किया। कुछ पता नहीं चल रहा था। आज एक बार फिर किस्मत काम कर गई। एक चाय की दुकान पर खड़ा चाय पी रहा था। तभी तुम एक ठेकेदार के दफ्तर से किसी के साथ निकलते दिखे। जब तक कुछ समझकर तुम तक पहुँचता तुम उस आदमी की मोटरसाइकिल पर बैठ कर निकल गए थे। एक बार फिर दिमाग लगाया। घुस गया ठेकेदार के दफ्तर में। अपने आप को तुम्हारा रिश्तेदार बता कर पूँछताछ की। पता चला कि तुम किसी ललित के साथ काम मांगने आए थे।‌ ललित का पता लिया। यहाँ आया तुम्हारे बारे में पूँछा तो तुम्हारे घर का पता चल गया। मैं सोच रहा था कि तुम्हारे घर का दरवाज़ा खटखटाऊँ कि तुम खुद ही बाहर आकर पेड़ के नीचे बैठ गए।"

मुकेश को यह तो पता चल गया था कि एंथनी उस तक कैसे पहुँचा। पर अब उसके दिमाग में दूसरा सवाल था। अंजन ने उसे तलाशने के लिए एंथनी को क्यों भेजा। अंजन उससे क्या चाहता है। मुकेश ने अपने मन में उठ रहे सवाल का जवाब एंथनी से मांगा।
एंथनी ने जवाब के बदले उससे सवाल कर दिया,
"क्या तुम अंजन सर पर हमला करने वाले को जानते हो ?"
अब मुकेश को समझ आ गया था कि क्यों अंजन ने एंथनी को उसे ढूंढ़ने के लिए कहा था। उसने ना में सर हिला दिया।

.....
 
रिस्की लव - 18

मुकेश ने सर हिलाकर मना कर दिया कि उसे ‌अंजन के ऊपर हमला करने वालों के बारे में कुछ भी नहीं पता है। एंथनी बड़े आश्चर्य से उसकी तरफ देख रहा था। उसे इस तरह घूरते देखकर मुकेश ने कहा,
"मैं सचमुच नहीं जानता हूँ कि अंजन साहब पर हमला किसने किया था।"
एंथनी ने उसी तरह अविश्वास से कहा,
"तो फिर किससे डर कर भाग रहे थे ?"
मुकेश ने समझाया,
"मैं हमला करने वाले के डर से ही भाग रहा था पर वह कौन है मै नहीं जानता हूँ।"

उसकी बात सुनकर एंथनी ने हंसकर कहा,
"कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो। तुम उसे जानते नहीं हो फिर भी उससे डर कर भाग रहे हो।"
मुकेश को भी लगा कि वह अपनी बात ठीक से कह नहीं पाया है। उसने एंथनी को वह सब बता दिया जो उसके साथ हुआ। सब बताने के बाद वह बोला,
"अब समझ आया। भागते हुए उनमें से एक ने मेरी तरफ देखा था और अपनी उंगली मेरी तरफ दिखाई थी। फिर जब फोन आया तो मैं डर गया। मुंबई छोड़कर भाग आया।"
एंथनी अपने मोढ़े से उठा। उसने दोनों हाथ उठाकर अंगड़ाई ली। उसके बाद अपने पांव खोलने के लिए चहलकदमी करने लगा। टहलते हुए वह कुछ सोच रहा था। मुकेश समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वह क्या सोच रहा है। एंथनी वापस आकर अपने मोढ़े पर बैठ गया। उसने कहा,
"तुमने जिसे देखा था उसके चेहरे पर नकाब था। इसके अलावा कुछ और देखा था।"
"नहीं.... जो हुआ बस कुछ सेकेंड्स में हुआ। उस समय वैसे भी रात का समय था। चांदनी में जो दिखाई पड़ा वह बता दिया। दूसरे वाले की तो बस छाया जैसी दिखी थी।"
एंथनी एक बार फिर कुछ सोचकर बोला,
"जिसने फोन किया था उसकी आवाज़ से कुछ बता सकते हो।"
मुकेश ने आश्चर्य से कहा,
"भला आवाज़ से कैसे कुछ बता सकता हूँ। हाँ धमकी देने वाला एक मर्द था इतना कह सकता हूँ।"
एंथनी ने कहा,
"चलो... वो नंबर ही दे दो जिससे कॉल आई थी।"
मुकेश ने धीरे से कहा,
"बताया तो था कि डर की वजह से सिम और फोन तोड़कर फेंक दिया था।"
एंथनी एक बार फिर उठकर खड़ा हो गया। हवा में हाथ फेंकते हुए बोला,
"हाँ.... बताया था। मतलब उन लोगों तक पहुँचने की कोई राह नहीं है।"
मुकेश ने कहा,
"पर तुम तो जासूस हो। पता कर लोगे उनके बारे में।"
एंथनी ने उसकी तरफ देखकर कहा,
"बिल्कुल.... मैं तलाश भी कर लूँगा। इस समय अंजन सर को तुम्हारे बारे में नहीं बता सकता हूँ। बहुत रात हो गई है। कल सुबह उनसे बात करूँगा। फिलहाल मेरे सोने का कोई इंतजाम हो सकता है। नींद आ रही है।"
मुकेश सोच में पड़ गया। वह तो अपने परिवार के साथ फर्श पर दरी डाल कर सोता था। वह दरी भी ललित ने दी थी। एंथनी उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा,
"कोई बात नहीं है। इस पेड़ के नीचे लेट जाता हूँ।‌ वैसे भी सवेरा होने में वक्त ही कितना बचा है।"
मुकेश उठते हुए बोला,
"एक चटाई है लाकर दे देता हूँ।"

चटाई बिछाकर एंथनी पेड़ के नीचे लेट गया। लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। पहली बार था जब वह इस प्रकार पेड़ के नीचे लेटा हो। उसे आराम महसूस नहीं हो रहा था। उसने अपना दिमाग दूसरी तरफ लगा दिया। वह अब अंजन पर हमला करने वालों के बारे में सोच रहा था। उसने सोचा था कि शायद मुकेश उन्हें जानता होगा। नहीं तो कुछ ऐसा अवश्य बता देगा जिससे हमला करने वालों तक पहुँचने की राह मिल जाएगी। लेकिन मुकेश कुछ भी नहीं बता पाया। अब उसे खुद ही कोई सूत्र तलाश करना पड़ेगा। जिसे पकड़ कर वह आगे बढ़ सके।
एंथनी उसी विषय में सोच रहा था। लेकिन थकावट उस पर हावी हो गई। वह चटाई पर ही सो गया।

मुकेश अंदर पहुँचा तो राजेश्वरी जागी हुई थी। उसने मुकेश से कहा,
"इतनी देर तक क्या बातें कर रहे थे ?"
मुकेश दरी पर लेटते हुए बोला,
"एंथनी बता रहा था कि वह हमें खोजते हुए किस तरह यहाँ आया।"
राजेश्वरी को यह टालने वाला जवाब लगा। उसने कहा,
"वह तो कह रहा था कि जासूस है। उसने अंजन साहब पर हमला करने वाले के बारे में कुछ पता किया।"
"नहीं... उसे तो लग रहा था कि शायद मैं हमला करने वाले को जानता हूंँ।"
राजेश्वरी चिंतित हो गई। उसे लगा था कि एंथनी ने हमला करने वाले के बारे में कुछ बताया होगा। पर उसे तो कुछ पता ही नहीं था। वह बोली,
"अब जाने क्या होगा ? कब तक हम लोगों को अपने घर से दूर रहना पड़ेगा ?"
मुकेश को भी नींद आ रही थी। उसने कहा,
"परेशान ना हो। सुबह एंथनी अंजन साहब से बात करेगा। हो सकता है वह हमारे लिए कोई रास्ता निकाल दें। अब कुछ देर के लिए तुम भी सो जाओ।"
यह कहकर मुकेश ने करवट बदल ली।

सुबह एंथनी ने अंजन को फोन किया। उसने उसे मुकेश के बारे में बता दिया। यह भी बता दिया कि उसे अंजन पर हमला करने वालों के बारे में कुछ नहीं पता है। अंजन ने मुकेश से बात की। मुकेश ने उसे अपनी समस्या के बारे में बताया। उसकी समस्या सुनकर अंजन ने उसे गुजरात के संजन जाकर किसी दामोदर पारिख से मिलने को कहा। उसने कहा कि वह वहाँ तक जाने के लिए पैसे एंथनी से ले ले। वह एंथनी को वापस कर देगा। दामोदर पारिख से मिले वह उसके लिए उचित व्यवस्था कर देंगे।

एंथनी मछुआरों की बस्ती में था। वह अंजन पर हुए हमले के बारे में पूँछताछ करने के लिए गया था। मुकेश ने बताया था कि उसने हमलावरों को मोटरबोट पर जाते हुए देखा था। एंथनी ने अंदाजा लगाया कि ज़रूर वह मोटरबोट उन्होंने मछुआरों की बस्ती से ली होगी। इसलिए यहाँ आया था। वह बस्ती के मुखिया से मिलने गया था।
उसने बस्ती के मुखिया जनार्दन से कहा कि वह अपने लोगों से पूँछकर बताएं कि उनमें से किसी ने हमले वाले दिन अपनी मोटरबोट किसी को दी थी। जनार्दन ने उसे आश्वासन दिया कि उसे कुछ समय दे। वह इस बारे में जानकारी प्राप्त कर उसे बताता है।
एंथनी जनार्दन के घर पर इंतज़ार करने लगा। करीब एक घंटे बाद जनार्दन एक मछुआरे को लेकर उसके पास आया। उस मछुआरे का नाम विक्टर था। उसने बताया कि उस दिन एक आदमी उसके पास आया था। उसने कहा था कि कुछ समय के लिए उसकी मोटरबोट चाहिए। उसने उसके लिए अच्छे पैसे दिए थे। पैसों के लालच में उसने अपनी बोट दे दी।
विक्टर ने उस आदमी का हुलिया बताया। एंथनी एक अच्छा स्केच आर्टिस्ट भी था। वह जब भी किसी केस की पड़ताल के लिए जाता था तो अपने साथ अपनी स्केचबुक और पेंसिल लेकर जाता था। आवश्यकता पड़ने पर वह स्केच बना लेता था। विक्टर के बताए हुलिए के आधार पर उसने उस आदमी का स्केच बना लिया।
स्केच बनने के बाद उसने विक्टर को दिखाया। उसने स्केच को देखकर कहा कि वह आदमी ऐसा ही दिखता था। एंथनी ने उस स्केच को ध्यान से देखा। वह उस तस्वीर को अपनी आँखों में बसा लेना चाहता था।
स्केच के अनुसार उस आदमी का चेहरा लंबा था। लंबी नुकीली नाक थी। कंधे तक लंबे घुंघराले बाल थे। उसकी मूंछें और ठुड्ढी पर ट्रिम की गई दाढ़ी मिलकर एक गोला बना रही थीं।
विक्टर ने बताया था कि उसकी आँखें भूरे रंग की थीं। वह हिंदी बोल रहा था लेकिन बोलने के अंदाज़ से लगता था कि विदेश से आया है।

स्केच लेकर एंथनी अंजन से मिला। उसे स्केच दिखाकर वो बातें बताईं जो विक्टर ने बताई थीं। अंजन उस स्केच को ध्यान से देख रहा था। एंथनी उसके चेहरे पर आते हुए भावों को परखने का प्रयास कर रहा था। कुछ देर स्केच को देखने के बाद अंजन ने कहा,
"मुझे ऐसा तो नहीं लगता है कि मैं इसे जानता हूँ। मैं अभी अपने आदमी से कहता हूंँ कि इसकी एक कॉपी निकाल कर मुझे दे दे।"
"उसकी आवश्यकता नहीं है। आप इसे रख लीजिए।"
"फिर तुम इसे ढूंढ़ोगे कैसे ?"
अंजन ने अचरज से पूँछा। एंथनी हंसकर बोला,
"मेरी आँखों ने इसे स्कैन करके दिमाग में सेव कर दिया है। मैं तो इसे सिर्फ आपको दिखाने लाया था।"
एंथनी उठकर खड़ा हो गया। चलते हुए बोला,
"आप आराम से इस स्केच को देखकर याद करने की कोशिश करिएगा। शायद कुछ याद आ जाए।"
एंथनी चला गया। अंजन सोच रहा था कि यह आदमी भी कुछ अलग है। ऊपर से देखने में बेवकूफ जैसा लगता है। लेकिन इसमें कमाल की खूबियां हैं। सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इस पर यकीन किया जा सकता था। तभी तो अंजन अपने सीक्रेट काम उससे करवाता था। उसे पूरा यकीन था कि वह उस पर हमला करवाने वाले का पता कर लेगा।
उसने अपना ध्यान एंथनी से हटाकर स्केच पर लगा दिया।

जब अंजन स्केच देख रहा था तब एंथनी ने महसूस किया था कि जैसे कुछ है जिसे वह याद करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन उसे याद नहीं आ रहा था। वह स्केच उसके पास छोड़ आया था। उसे स्केच की आवश्यकता भी नहीं थी। जब भी वह चाहता तो अपने दिमाग के मॉनीटर पर उस तस्वीर को देख सकता था।
विक्टर ने बताया था कि उस आदमी के बोलने के तरीके से लग रहा था कि वह विदेश से आया है। एंथनी ने इस सूत्र को पकड़ कर आगे बढ़ने के बारे में सोचा। उसने सोचा कि वह जो भी होगा किसी होटल में ठहरा होगा। बीच हाउस से कुछ दूर एक फाइव स्टार होटल था। एंथनी ने अपनी जाँच की शुरुआत के लिए उसे ही चुना।

अंजन स्केच को ध्यान से देख रहा था। वह उलझन में था। कभी उसे लगता था कि वह इस आदमी को नहीं जानता है। पर जब वह इस बात के लिए अपना मन पक्का करने की कोशिश करता तो मन में आता कि एक बार और स्केच को देख ले।
कुछ था जिसके कारण उसे लगता था कि यह आदमी पहचाना हुआ है। पर उसे ऐसा क्यों लग रहा था वह बात वो पकड़ नहीं पा रहा था।
वह बहुत परेशान हो गया था। अभी तक वह होश खोने से पहले देखे गए व्यक्ति की झलक को लेकर उलझन में था। अब एक नई उलझन पैदा हो गई थी।

.....
 
रिस्की लव - 19

नफीस किसी काम से होटल सी शोर में गया था। होटल की लॉबी में उसने एंथनी को देखा। उसे पता था कि एंथनी एक जासूस है। एक बार एक केस में वह उसकी मदद ले चुका था। उसने एंथनी को रोका। उसे देखकर एंथनी बोला,
"नफीस भाई... कैसे हो ?"
"मैं ठीक हूँ। तुम्हारा काम आजकल बहुत अच्छा चल रहा है। तभी इस होटल में आए हो।"
नफीस ने मज़ाक किया। एंथनी बोला,
"मुझे तो इतने ऐशो आराम पसंद नहीं आते। मैं तो ढाबे में जाना पसंद करता हूँ। वैसे तुम्हारा क्राइम शो तो धूम मचा रहा है।"
"ऊपरवाले का शुक्र है। तुम बताओ यहाँ क्या करने आए थे ?"
"एक काम के सिलसिले में आया था। तुम बताओ क्या किसी के साथ लंच करने आए हो।"
"मिलना था किसी से। अब चलता हूँ वह वेट कर रहा होगा।"
"ठीक है फिर कभी ऐसे ही मिल जाएंगे।"
नफीस होटल के अंदर चला गया। एंथनी कुछ देर लॉबी में खड़ा कुछ सोचता रहा फिर बाहर निकल गया।
एंथनी होटल के सिक्योरिटी इंचार्ज को जानता था। उसने उस आदमी का हुलिया बताकर कहा था कि वह सीसीटीवी फुटेज देखकर बताए कि अंजन पर हमले की तारीख के आसपास वैसा कोई आदमी होटल में था। उसने उस आदमी का रूम नंबर भी पता करने को कहा था।
उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई ना कोई सफलता अवश्य मिलेगी।

दो दिनों के बाद सिक्योरिटी इंचार्ज ने उसे फोन करके बताया कि जिसके बारे में वह जानना चाहता है उसका पता चल गया है‌। अगर डीटेल चाहिए तो पाँच लाख रुपयों के साथ उसकी बताई जगह पर मिले।
एंथनी ने सारी बात अंजन को बताई। अंजन ने कहा कि वह उसकी मुंहमांगी रकम देने को तैयार है। लेकिन उसे उस आदमी की सारी फुटेज के साथ उसके बंगले पर आना होगा।

अंजन के बंगले में बने मीटिंग रूम में उसके सामने एंथनी और सिक्योरिटी इंचार्ज दर्शन वशिष्ठ बैठे थे। अंजन ने कहा,
"तुमने जो रकम मांगी है वह मिल जाएगी। पहले उस आदमी की सीसीटीवी फुटेज दिखाओ। जो भी उसके बारे में पता किया है सब बताओ।"
दर्शन ने अपने मोबाइल फोन को स्क्रीन प्रोजेक्टर से कनेक्ट किया। सामने स्क्रीन पर सीसीटीवी फुटेज चलने लगी। उस फुटेज में लंबे बालों वाला वैसा ही आदमी दिखाई पड़ रहा था जैसा स्केच में था। फुटेज को रोककर दर्शन ने कहा,
"यह फुटेज उस दिन की है जब इस आदमी ने होटल में चेक इन किया था। मैंने पता किया है इस आदमी का नाम नीतीश सक्सेना है। लंदन से आया था।"
अंजन स्क्रीन पर फ्रीज़ हो चुकी नीतीश की तस्वीर को ध्यान से देख रहा था। उस नाम ने तो कोई हलचल नहीं पैदा की थी पर तस्वीर अभी भी उसे जानी पहचानी लग रही थी। उसने कहा,
"आगे भी कोई फुटेज है। उसे दिखाओ।"
दर्शन ने फुटेज आगे प्ले की। यह लिफ्ट की थी। नीतीश ने बारहवीं मंज़िल पर जाने का बटन दबाया। कुछ देर बाद लिफ्ट से निकलता दिखाई पड़ा। यह कॉरिडोर का सीसीटीवी था। नीतीश एक कमरे के पास गया कार्ड से दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
उसके बाद कुछ और सीसीटीवी फुटेज थीं। उनमें कुछ खास नहीं था।
दर्शन ने हमले वाले दिन सुबह की सीसीटीवी फुटेज दिखाई। उस फुटेज में नीतीश एक औरत के साथ होटल की लॉबी में दिखाई पड़ता है। लेकिन उस औरत की शक्ल दिखाई नहीं पड़ रही थी। अंजन को उस औरत की चालढाल और देह की बनावट जानी पहचानी सी लगी।
अगली फुटेज लिफ्ट से निकलने की थी। इस फुटेज में उस औरत का चेहरा दिखाई पड़ रहा था। उसे देखते ही अंजन ने कहा,
"थोड़ा पीछे करके औरत के चेहरे पर रोको।"
दर्शन ने उसके कहे अनुसार औरत के चेहरे पर फ्रेम को रोक दिया। स्क्रीन पर चेहरे को देखकर अंजन की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने आप पर काबू किया। दर्शन से बोला,
"मुझे सारी सीसीटीवी फुटेज दे दो। अपना पैसा लो और जाओ।"
दर्शन ने सीसीटीवी फुटेज दे दी। अपने वादे के मुताबिक अंजन ने उसे पैसे दे दिए। दर्शन पैसे लेकर चला गया।
एंथनी समझ गया था कि अंजन का उस औरत से कोई संबंध है। वह इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि अंजन उससे कुछ कहे। अंजन अभी एंथनी से कोई बात नहीं करना चाहता था। उसने एंथनी से कहा कि अभी वह जाए। वह बाद में उसे बुलाकर बात करेगा। एंथनी बिना कुछ बोले चुपचाप चला गया।

नफीस अपने ऑफिस में बैठा था। वह अंजन के केस के बारे में ही सोच रहा था। अभी तक उसे इस केस में कोई भी सुराग नहीं मिल पाया था। उसे लगता था कि मुकेश इस केस की गुत्थी सुलझा सकता है। पर उसका कोई पता नहीं चल पाया था।
उसके केबिन के दरवाज़े पर नॉक हुई। उसके क्राइम शो का डायरेक्टर जॉन पीटर्स अंदर आया। नफीस ने अपनी कुर्सी से उठकर उसका स्वागत किया। जॉन ने बैठते हुए कहा,
"इस बार एक लेडी सुपारी किलर पर एपीसोड बनाने की सोच रहा था। यूपी की ललिता देवी पहले एक साधारण सी औरत थी। आज कॉन्ट्रैक्ट किलिंग में उसका नाम सफलता का दूसरा नाम बना हुआ है।"
नफीस ने अपना ध्यान अंजन से हटाकर जॉन की बात पर लगा दिया। उसने भी ललिता के बारे में बहुत कुछ सुना था। उनकी क्राइम सीरीज़ में अब तक किसी महिला अपराधी की कहानी नहीं दिखाई गई थी। उसे जॉन का आइडिया अच्छा लगा। उसने कहा,
"जॉन बहुत अच्छा सुझाव है तुम्हारा। मैं आज ही ललिता की कहानी पर काम करना शुरू कर देता हूँ।"
"मैं भी यही कहने आया था। अगला एपीसोड टेलिकास्ट के लिए तैयार है। उसके बाद वाले एपीसोड की थोड़ी सी शूटिंग बाकी रह गई है। तब तक तुम इस पर काम शुरू कर दो।"
जॉन उठकर चला गया। उसके जाने के कुछ ही क्षणों बाद विनोद नफीस के पास आया। उसकी शक्ल बता रही थी कि उसके पास बताने लायक कोई बात है। नफीस ने कहा,
"क्या बात है विनोद चेहरे पर चमक है तुम्हारे ?"
विनोद ने कहा,
"एक बात है। मुझे लगता है कि काम की साबित हो सकती है।"
नफीस अब जानने के लिए उत्सुक हो चुका था। उसने कहा,
"जो भी है बताओ। फिर देखते हैं कि बात काम की है या नहीं।"
"सर... आपको वह जासूस याद है। कुछ अजीब सा था। आपने एक केस में उसकी मदद ली थी।"
"एंथनी....उसका अंजन से क्या संबंध है ?"
"सर संबंध तो है। मैंने उसे एक आदमी के साथ अंजन के बंगले में घुसते देखा था।"
"जो आदमी उसके साथ था तुम उसे जानते हो ?"
"नहीं सर मैं उसे नहीं पहचानता हूँ। पर वह लंबा और तगड़े शरीर का था।"
विनोद की बात सुनकर नफीस अपना दिमाग दौड़ाने लगा। उसे सी शोर होटल में एंथनी के साथ हुई मुलाकात याद आई। उस दिन तो उसने ध्यान नहीं दिया। लेकिन आज उसे ऐसा लग रहा था जैसे एंथनी उस होटल में अंजन के किसी केस के सिलसिले में ही गया था। उसे लगा कि अंजन पर हमले से बड़ा कौन सा केस हो सकता है। कुछ सोचकर वह बोला,
"विनोद होटल सी शोर अंजन के बीच हाउस शिमरिंग स्टार्स के पास ही है ना ?"
"हाँ सर... यही कोई 2 किलोमीटर दूर होगा। पर आप यह क्यों पूछ रहे हैं ?"
नफीस ने उसे एंथनी के साथ होटल सी शोर में हुई मुलाकात के बारे में बताया।
"विनोद अगर एंथनी अंजन के लिए काम कर रहा है तो ज़रूर उस पर हमला किसने किया है इस बात की जांँच कर रहा होगा। उसी जांँच के सिलसिले में वह होटल गया होगा। इसका मतलब अंजन पर हमला करने वाला उसी होटल में ठहरा होगा।‌ हमला करने वाले आदमी से संबंधित कोई विशेष जानकारी देने के लिए ही एंथनी उस दूसरे आदमी को लेकर अंजन के बंगले पर गया होगा।"
नफीस की कही बात विनोद को एकदम सही लगी। उसने कहा,
"आप तो जीनियस हैं सर। मैंने एक बात बताई और आपने इतनी सारी बातों का अंदाज़ा लगा लिया।"
"क्राइम रिपोर्टर हूंँ विनोद। कई सारे केस इन्वेस्टिगेट किए हैं। इसी तरह कड़ी से कड़ी जोड़कर आगे बढ़ना पड़ता है।"
नफीस कुछ सोचकर बोला,
"होटल सी शोर में अपने कांटेक्ट से पता करके देखो कि अंजन के बंगले पर जाने वाले आदमी का जो हुलिया तुम बता रहे थे उससे मिलता जुलता कौन है जो होटल में काम करता है। अगर उसका पता चल जाए तो हम बहुत कुछ जान सकते हैं।"
"ठीक है सर फिर मैं जाकर पता करने की कोशिश करता हूँ।"
विनोद अपने काम के लिए निकल गया। नफीस एक बार फिर अंजन के केस के बारे में सोचने लगा।

एंथनी के जाने के बाद अंजन ने एक बार फिर वह सीसीटीवी फुटेज चलाई। उस औरत के चेहरे को स्क्रीन पर फ्रीज़ कर दिया। पिछले कुछ मिनटों से वह उसे ताक रहा था। सीसीटीवी फुटेज में जो चेहरा दिख रहा था उसे देखने के बाद कुछ समय तक तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा सच हो सकता है। पर सच उसके सामने था।
उस चेहरे को देखकर उसे समझ आ गया था कि स्केच वाले आदमी का चेहरा जाना पहचाना क्यों लग रहा था। अब उसका नाम और चेहरा पूरी तरह उसे याद आ चुका था। हलांकी उस आदमी ने अपना नाम गलत बताया था और हुलिया बहुत हद तक बदल लिया था। खासकर नाक जो पहले इतनी नुकीली नहीं थी। किसी प्लास्टिक सर्जन का कमाल था।
उसने अपने दिमाग पर ज़ोर डाला और उस झलक को याद करने की कोशिश करने लगा जो होश खोने से पहले उसने देखी थी। अब उसे समझ आ रहा था कि शक्ल ना दिखने के बावजूद वह क्या था जो उसे पहचाना हुआ लग रहा था। वह थीं नकाब के पीछे से झांकती आँखें।

सब जानने के बाद अंजन गुस्से से उबलने लगा। उसने अपना फोन उठाया। फोन पर किसी को कुछ निर्देश दिए।
कुछ देर बाद वह अपने निर्माणाधीन रिज़ॉर्ट की तरफ जा रहा था।

.....
 
रिस्की लव - 20

अंजन अपने निर्माणाधीन रिज़ॉर्ट के उसी हॉल में बैठा था जहाँ उसने पंकज की हत्या की थी। उसकी आँखों से चिंगारियां निकल रही थीं।
तरुण काला उसके सामने खड़ा डरकर कांप रहा था। उसके हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे। वह सर झुकाए हुए था। अंजन उठा और उसके बाल पकड़ कर उसका चेहरा अपनी तरफ करके बोला,
"हरामखोर मेरे साथ धोखा किया तूने।"
तरुण को लग रहा था कि शायद उसके और पंकज के बीच जो दोस्ती हुई थी उसी के कारण अंजन के आदमी उसे उठाकर यहाँ ले आए हैं। अंजन के गुस्से को देखकर वह थर थर कांप रहा था। उसने कहा,
"मैंने कोई धोखा नहीं दिया है। वह पंकज खुद मेरे पास आया था। पर मैंने कभी आपका कोई राज़ उसे नहीं बताया।"
अंजन ने उसके पेट में ज़ोर से अपना घुटना मारा। तरुण बिलबिलाता हुआ ज़मीन पर गिर गया। अंजन ने उसे बाल पकड़कर उठाया। तरुण दर्द से तड़प रहा था। अंजन ने उसकी आँखों में देखकर कहा,
"पता है... क्योंकी ऐसा करने के बाद तू अब तक ज़िंदा ना होता।"
"तो आप किस धोखे की बात कर रहे हैं ?"
तरुण ने दर्द से कराहते हुए कहा। अंजन ने उसके बालों पर अपनी पकड़ कस दी। तरुण चीख पड़ा। अंजन ने कहा,
"सच सच बताना नहीं तो मारने से पहले इससे बहुत ज्यादा दर्द दूँगा।"
तरुण को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अंजन किस विषय में बात कर रहा है। पर वह मजबूर था। उसने गिड़गिड़ा कर कहा,
"बताइए तो बात क्या है ? मैंने क्या धोखा किया है आपके साथ ?"
अंजन वापस जाकर कुर्सी पर बैठ गया। उसकी तरफ गुस्से से देखकर बोला,
"मानवी और उसके यार का क्या किया था तूने ?"
यह सवाल सुनते ही तरुण दहशत में आ गया। उस दहशत में सारा दर्द भूल गया। बरसों से कब्र में दफ़न बात अचानक सामने आ गई थी।
अंजन उसके चेहरे के भावों को पढ़ रहा था। उसने कहा,
"अब सिर्फ सच बाहर निकलना चाहिए। नहीं तो तुम्हारी चीखें देर तक गूंजती रहेंगी। सच तो मैं तुम्हारे मुर्दा जिस्म से भी निकलवा लूँगा।"
अंजन की आँखों में जो हैवानियत दिख रही थी उससे तरुण की रुह कांप गई थी। वह जानता था कि उसकी मौत अब तय है। सच बता देने से शायद कम तकलीफदेह हो। कांपते हुए उसके मुंह से निकला,
"दोनों बचकर भाग गए थे।"
अंजन के सामने सीसीटीवी फुटेज का वह चेहरा घूम गया। वह मानवी का था। लंबे बालों वाला आदमी उसका प्रेमी निर्भय वाधवा था। वह एक बार फिर उठा। गुस्से से तरुण के मुंह पर मुक्का मार दिया। उसके मुंह से खून का फव्वारा फूट पड़ा। वह ज़मीन में पड़ा तड़प रहा था। अंजन अपने आदमियों पर चीखा,
"उठाओ इसे...."
उसके आदमियों ने तरुण को उठाया। वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। पैर से कुर्सी खिसकाते हुए अंजन बोला,
"इस पर बैठा दो।"
अंजन के आदमियों ने तरुण को कुर्सी पर बैठा दिया। तरुण बेहोशी की हालत में था‌। अंजन ने कहा,
"पानी डालो इस पर और होश में लाओ।"
तरुण पर पानी डालकर उसे होश में लाया गया। अंजन दूसरी कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया। तरुण खौफज़दा उसकी तरफ देख रहा था। अंजन उसे जिस तरह से घूर रहा था ऐसा लग रहा था कि उसकी आँखों से आग निकल कर तरुण को जला रही है। अंजन ने कहा,
"उस दिन जो हुआ सबकुछ सच सच बता दो। वरना ना मरने दूँगा और ना चैन से ज़िंदा रहने दूँगा।"
तरुण ने उस दिन जो घटा सब विस्तार से बताया।

तरुण, मानवी और उसके दोस्त निर्भय को मारने के इरादे से लोनावला पहुँचा। इंद्रयाणी नदी के किनारे कैंपिंग कर रहे मानवी और उसके दोस्त पर सारा दिन नज़र रखे रहा। उस समय वहाँ आसपास कुछ लोग थे। वह अंधेरा होने की राह देख रहा था।
शाम ढलने के बाद मानवी और निर्भय आग जलाकर उसके पास बैठे थे। दोनों शराब पी रहे थे। एक पेड़ के पीछे छिपा हुआ तरुण मानवी के सर पर निशाना लगाए हुए था। सही मौका देखकर तरुण ने ट्रिगर दबाया ही था कि ठीक उसी समय मानवी खड़ी हो गई। वह निर्भय की तरफ घूम गई। गोली उसके बाज़ू को छूकर निकल गई।
पहली बार तरुण की गोली निशाने पर नहीं लगी थी। दोबारा गोली चलाने से पहले ही निर्भय ने फुर्ती से मानवी का हाथ पकड़ा और जंगल में गायब हो गया। तरुण उनके पीछे भागा। जिस अंधेरे को वह अपना हथियार बनाना चाहता था वह अब उन दोनों के लिए सहायक हो रहा था। पर तरुण जानता था कि मानवी का एक बाज़ू घायल है। उससे खून निकल रहा है। उसका खून ही उसे खोजने में मदद करेगा।
टार्च की रौशनी में खून के निशान देखता वह आगे बढ़ रहा था। घायल मानवी के लिए बहुत दूर तक भाग पाना संभव नहीं था। खून के निशान देखते हुए वह एक जगह पहुँचा जहाँ मिट्टी का एक ढेर सा था। उसे लगा कि दोनों इसके पीछे ही छिपे होंगे। गन तानकर वह उस तरफ बढ़ा। तभी निर्भय ने पेड़ की टहनी से उस पर वार किया। वह गिर पड़ा। उसके हाथ से गन छिटक गई। निर्भय और वह दोनों गुत्थमगुत्था हो गए। दोनों ही गन उठाने की कोशिश कर रहे थे।
मानवी अपना घायल बाज़ू पकड़े हुए वहाँ आई। उसने वह गन उठा ली। पर उसके हाथ कांप रहे थे।
तरुण ने निर्भय को दूर ढकेला और तेज़ी से उठकर गन मानवी से छीन ली। अब दोनों तरुण की गन के निशाने पर थे। मानवी ने उससे पूँछा,
"तुम हमें क्यों मारना चाहते हो ?"
तरुण ने कहा,
"तुम्हारे पति अंजन का हुक्म है। उसके हुक्म पर ही मैंने तुम्हारे भाइयों को मारा था। अब तुम दोनों को मारूँगा।"
तरुण को लगा कि मानवी तो घायल है। कुछ कर नहीं पाएगी। लेकिन निर्भय अधिक खतरनाक है। उसने पहले निर्भय को मारने का निर्णय लिया।
पर वह गलत था। मानवी ने पास पड़ी टहनी उठाई और उस पर वार किया। हाथ हिल जाने से इस बार भी निशाना चूक गया। गोली निर्भय के कंधे पर लगी। गन दूर गिर गई। तरुण गन उठाने के लिए लपका।
अपना दर्द भूलकर निर्भय ने फिर मानवी का हाथ पकड़ा। दोनों फिर भाग निकले। तरुण गन छोड़कर उनके पीछे भागा। कुछ दूर जाने पर मानवी और निर्भय ऐसी जगह पहुँचे जहाँ नीचे इंद्रयाणी नदी बह रही थी। तरुण के सामने दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर नदी में कूद गए।

कुछ देर तक तरुण गुस्से में हाथ मलता रहा। उसके शिकार उससे बचकर भाग गए थे। बहुत देर तक वहीं बैठा वह सोचता रहा कि अंजन से क्या कहेगा। उसे लगा कि दोनों ही घायल थे। नदी के तेज़ बहाव में उनका बचना कठिन है।
तरुण ने आकर अंजन से कह दिया कि उसने दोनों को मारकर शव इंद्रयाणी नदी में बहा दिए। कुछ दिनों तक वह डरता रहा कि कहीं उन दोनों में से कोई ज़िंदा ना बच गया हो। लेकिन जब कोई नहीं आया तो उसे पूरा यकीन हो गया कि दोनों नदी में डूबकर मर गए।

सारी सच्चाई बताने के बाद तरुण अब उस पल के इंतज़ार में था जब अंजन झूठ बोलने के लिए उसे मार देगा। वह कल्पना कर डर रहा था कि उसकी मौत ना जाने कितनी दर्दनाक होगी।
सच्चाई जानकर अंजन कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। वह गुस्से से पागल हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी नसों में लावा बह रहा हो। वह वापस तरुण के पास आया। कुछ देर तक उसे घूरता रहा। तरुण को वह साक्षात यमराज नज़र आ रहा था।
अंजन ने तरुण का सर अपने हाथों में पकड़ लिया। ज़ोर से चिल्लाया और उसकी गर्दन तोड़ दी।
तरुण के मुर्दा जिस्म को घसीटते हुए अंजन के आदमी ठिकाने लगाने ले गए।

अपने घर के बार में बैठा अंजन शराब के नशे में चूर था। गुस्से में उसने आज बहुत अधिक पी ली थी।
मानवी और उसके प्रेमी ने मिलकर उस पर हमला किया। यह सोचकर वह अपने आप पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसे यह अपनी हार की तरह लग रहा था। हाथ में पकड़ा गिलास गुस्से में ज़मीन पर फेंकते हुए बोला,
"छोडू़ँगा नहीं तुम दोनों को। तुमने मुझसे टकराने की कोशिश की है। मुझे मारना चाहते थे। अब तुम दोनों को भागने के लिए दुनिया छोटी पड़ेगी।"
वह उठा और लड़खड़ाता हुआ अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गया। वह सोच रहा था कि उस दिन अगर मुकेश ने उसे सही समय पर हॉस्पिटल ना पहुँचाया तो उसका बचना मुश्किल हो जाता। वह मन ही मन मुकेश के लिए कृतज्ञता का भाव महसूस करने लगा।
मुकेश के बारे में सोचते हुए उसके मन में एक सवाल उठा। उस दिन उसके शिमरिंग स्टार्स जाने का प्रोग्राम पहले से तय नहीं था। वह तो उसने शाम को बनाया था। ऐसे में उसके बीच हाउस पर होने की खबर मानवी और निर्भय तक कैसे पहुँची थी ? कौन था जिसने यह खबर उन दोनों तक पहुंँचाई ?
यह सवाल उसके मन को परेशान करने लगे। पंकज ने मरने से पहले कहा था कि उसने हमला नहीं करवाया। पर ऐसा हो सकता था कि उसने तरुण को बताया हो कि वह बीच हाउस जा रहा है। तरुण ने इसकी सूचना दी हो।
पर मानवी और निर्भय के जीवित रहने की बात सुनकर जिस तरह वह चौंका था उससे नहीं लगता था कि उसे पहले से उनके जीवित होने के बारे में पता था। इस स्थिति में वह उन्हें सूचना कैसे दे सकता था।
वह व्यक्ति कौन था जिसने उसके बीच हाउस जाने की सूचना मानवी और निर्भय को दी होगी। यह प्रश्न अब उसके मन को मथ रहा था। वह जो भी था उसके आसपास रहकर उसके साथ गद्दारी कर रहा था।
यह सोचकर कि उसके आसपास पंकज, तरुण और मुखबिरी करने वाले उस शख्स जैसे गद्दार थे उसका खून खौल उठा। पंकज और तरुण को तो उसने उनके किए की सजा दे दी थी। अब वह उस मुखबिर को सजा देना चाहता था।
वह परेशान था। तभी उसके दिमाग में एक विचार आया। यदि वह मानवी और निर्भय तक पहुंँच जाए तो वह गद्दार अपने आप ही उसके सामने आ जाएगा।
उसने तय कर लिया कि वह जल्दी से जल्दी उन दोनों तक पहुँचेगा।

.......
 

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