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Horror दहशत

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दहशत

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पहली घटना के ठीक एक साल पहले

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पहली घटना के ठीक 1 साल बाद

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अंतहीन सफ़र
 
1: पहली घटना के ठीक एक साल पहले

कार की स्पीड लगभग 80 से 90 प्रति/घंटा रही होगी। कार की स्थिति कुछ ज्यादा ठीक नहीं लग रही थी। जंगल के बीचों-बीच बने उस संकरे से रोड पर वह शख्स अपनी कार को जाने क्यों इतनी स्पीड से भगा रहा था। जंगल के चारों तरफ घना अंधेरा छाया हुआ था। तेजी से भागती हुई कार की एक हेडलाइट ही जल रही थी। सड़क पर जैसे अचानक धूल का गुब्बारा सा उमड़ने लगा था।

"मैं जानता हूँ, यह सब मेरी आँखों का धोखा है। म... मैं यहाँ से बचकर आराम से निकल जाऊँगा। मुझे कुछ नहीं होगा। म... मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं होगा!" वह शख्स न जाने क्या-क्या खुद में ही बड़बड़ाये जा रहा था। उसके माथे से पसीना टपक रहा था। वह लगातार खुद से ही बातें किया जा रहा था। उसका ध्यान कार की स्टेयरिंग और सामने सड़क की तरफ़ ही था।

उस शख्स की उम्र लगभग 28-30 साल की लग रही थी। उसने सूट-बूट पहना हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी पार्टी से लौट रहा हो। उस शख्स ने कार की दराज में कुछ ढूढना शुरू कर दिया था, लेकिन उसका एक हाथ अब भी स्टेयरिंग को सँभाले हुए था। कार की स्पीड काफी तेज थी। इस बात की पूरी संभावना थी कि कार के सामने इस समय कोई भी आने वाला शख्स आसानी से कुचल जाने वाला था। पायल की छन-छन आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कार की छत पर कोई था।

छन छन छन छन...।

पायल की बढ़ती हुई आवाज़ को सुनकर वह शख्स पागलों की तरह चिल्ला रहा था – “चले जाओ यहाँ से...।”

"पता नहीं, मैंने कहाँ रख दिया। कम ऑन, कम ऑन! हाउ कैन यू डू दिस टू मी?"

तभी अचानक उसकी कार अनबैलेंस हुई और सड़क के किनारे एक पेड़ से ज़ोर से टकरा गई।

"आह…!" अगले ही पल वह शख्स कराहते हुए कार से बाहर आने की कोशिश करने लगा। उसने महसूस किया कि बाहर का माहौल बहुत ही डरावना था।

"डैम इट! तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मुझे कुछ नहीं होगा। मैं जानता हूँ। ये सब बस एक वहम है।" उसने दबी सहमी आवाज़ में कहा और अपने गले से टाई को निकालकर फेंक दिया।

"तुम इस जंगल से बचकर कहाँ भागना चाहते हो?"

तभी एक आवाज़ उसके कानों में गूँजी। आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी शैतान की गुर्राहट हो। वह एक ऐसी भयानक आवाज़ थी जिसे सुनकर अच्छे अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते। बावजूद इसके वह शख्स अपने आप को संभालने की नाकाम कोशिश कर रहा था

घबराकर उसने आवाज़ की दिशा में घूमकर देखा तो उसके होश उड़ गए। दो चमकती हुई आँखें एक परछाई के साथ हवा में झूल रही थी उसके हाथ में एक चमकती हुई कुल्हाड़ी नजर आ रही थी। जिसकी चमक उस भयानक काली रात में भी साफ-साफ दिखाई दे रही थी। वह बहुत ही खौफनाक और दिल दहला देने वाला मंजर था।

"नहीं! त… तुम सच नहीं हो सकते। मैं इतनी आसानी से हाथ नहीं आने वाला हूँ।" कहकर वह शख्स सड़क से दूर जंगलों की ओर भागने लगा।

वह शख्स एक पैर से लंगड़ा रहा था। लग रहा था जैसे इस एक्सीडेंट में उसका एक पैर ज़ख्मी हो चुका था।

"हा... हा... हा...। भागो और भागो!"

सुखी पत्तियों पर उसके कदमों के पड़ते ही चरमराहट की आवाज़ें जैसे घुप्प सन्नाटे को तोड़ रही थी। उसके हाँफने की गति तेज़ होते जा रही थी। वह जंगल में काफी अंदर आ चुका था।

"मेरा पीछा करना बंद करो! तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते! मैं जानता हूँ, मेरे डर ने तुम्हें बढ़ावा दिया है। लेकिन मैं जानता हूँ, तुम असल में कुछ भी नहीं हो। तुम सिर्फ एक छलावा हो! मेरा वहम हो!"
 
तेजी से दौड़ता हुआ वह शख्स जंगल के काफी अंदर पहुँच चुका था। आज फिर अमावस की रात थी। चारों तरफ फैला हुआ घना काला जंगल उस अमावस की काली रात की भयानकता को बढ़ा रहे थे। भागते-भागते वह बुरी तरह से हाँफ रहा था। उसकी साँसें फूलने लगी थी। वह पसीने से बुरी तरह से भींग चुका था। तभी अचानक उसका पैर फिसला और उसे महसूस हुआ कि वहाँ पर कोई एक गहरा सा गड्ढा था। इससे पहले कि वह खुद को संभाल पाता, वह उस गड्ढे के अंदर गिर पड़ा।

उसने उस गड्ढे से बाहर निकलने की काफी कोशिश की, लेकिन उसकी सारी कोशिशें नाकाम होती गईं।

"नो, नो! यह सब इस भयानक जंगल और इस अंधेरी रात का छलावा है। आई एम फाइन! मुझे कुछ नहीं होगा! सुबह होगी और मैं आराम से निकल जाऊँगा! यह सब... यह सब बस मेरे मन का वहम है।" उस शख्स ने अपने माथे पर आये पसीने को पोंछते हुए कहा।

उसने आस-पास के माहौल को देखा तो उसे महसूस हुआ चारों तरफ घुप्प अंधेरा छाया हुआ है। डर के मारे वह पसीने से पूरी तरह भींग चुका था। उसका शरीर बुरी तरह से थका हुआ था।

तभी उसे महसूस हुआ कि उसका पीछा करती हुई वह परछाई अब उसके काफी करीब आ चुकी थी। जंगल के सन्नाटे को तोड़ते हुए एक तेज गुर्राहट की आवाज़ गूँजने लगी।

तभी उसने गड्ढे के ऊपर उस परछाई को महसूस किया जिसमें उसे आग के शोलों की तरह धधकती हुई एक जोड़ी आँखें नजर आई! उस परछाई के हाथ में वह चमकती हुई कुल्हाड़ी भी नज़र आ रही थी।

“ईईई...!”

अगले ही पल उस शख्स की भयानक चीख ने उस जंगल के शांति माहौल को भंग कर दिया। लेकिन उसकी उस चीख को सुनने के लिए कोई इंसान वहाँ मौजूद नहीं था।

कहते हैं अमावस की रात बड़ी भयानक और काली रात मानी जाती है। माना जाता है अमावस की रात अपने साथ कई काली शक्तियों और शैतान चक्रों को उजागर करती है।

आज की रात भी ऐसी ही एक भयानक रात थी।

*** *** *** *** *** ***
 
2: पहली घटना के ठीक 1 साल बाद

दृ श्य:01

समय रात्रि 11: 41 मिनट

पूरा दिन घूमने फिरने के बाद, उस रात मेरे पास दो ऑप्शन थे। या तो मैं अपने घर में ही पार्टी दे सकता था या फिर अपने कजिन्स और दोस्तों के साथ अपने अंकल के फार्म हाउस जा सकता था। लेकिन अंकल के फार्म हाउस जाने वाला आइडिया मुझे ज्यादा पसंद आया। क्योंकि न सिर्फ वहाँ पर काफी मज़ा आने वाला था, बल्कि मम्मी-पापा के रिस्ट्रिक्शन से बचने के भी फुल चांसेस थे। आखिर जन्मदिन बार-बार थोड़ी आता है।

यही सोचकर मैंने सभी को मेरे अंकल के फार्म हाउस जाने के लिए कन्वींस कर लिया। थके-मांदे हम घर पहुँचकर बस आराम करना चाहते थे। सही मायने में अगर ये प्री-प्लान्ड होता तो हम शाम तक ही निकल चुके होते। लेकिन प्लान बना ही तब जब लगभग रात के 10 बज चुके थे।

वह रात कुछ अजीब सी लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि बादलों में अंधेरा बाकी की रातों से काफी गहरा था। वह कहते हैं न, रात का अंधेरा अपने आप में एक अजीब सा संसार बसाये रहता है। मानो तो ये सिर्फ एक रात है, न मानो तो इससे भयानक कुछ नहीं हो सकता। इस कहानी की शुरुआत भी एक ऐसी ही रात से हुई थी।

वह अमावस की एक मनहूस काली रात थी। चारों तरफ घुप्प अंधेरा फैला हुआ था। घुप्प अंधेरों के बीच हमारी कार एक वीरान सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थी। जहाँ दूर-दूर तक सिवाए हमारे अलावा और कोई नज़र नहीं आ रहा था।

वह सुनसान सड़क जो उन जंगलों से होकर गुजरती थी। जो दो छोटे-छोटे शहरों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। ये सड़क लगभग 21 किलोमीटर लंबी थी। सड़क के दोनों तरफ फैला हुआ घना काला जंगल था। यह वही जंगल था जिसके बारे में कई सारी भूतिया अफ़वाह फैलाई जाती थी। हालाँकि मैं इन भूतिया चीजों पर विश्वास नहीं करता था।

मेरे दादा जी कहते थे कि भूत-प्रेतों के ऊपर विश्वास दो तरह के लोग करते हैं। एक वह जो उन्हें मानते हैं और एक वह जो उन्हें देख लेते हैं। खैर, मैंने अपनी जिंदगी में अपने दादा जी की बातों को फॉलो करने की कोशिश करता रहा। जिनके मुताबिक न तो मैंने भूतों को कभी देखा था और न ही मैं उन्हें मानता था। सही मायने में कहूँ तो मुझे इस तरह की अंधविश्वासी बातों पर यकीन ही नहीं था।

लेकिन मेरी दादी कहा करती थी कि अमावस की रातों में भूत-प्रेत लोगों को अपने वश में कर लेते हैं और उन्हें मार डालते हैं। लेकिन अमावस को मैं एक प्राकृतिक घटना मानता था। जो अपने चक्र के अनुसार अमावस से लेकर पूर्णिमा के रूप में बदलती रहती थी। मैंने अपने दादा और दादी के साथ गाँव में अपने बचपन के 11 साल बिताए थे, तो इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनना और उन किस्सों को खुद से बुनकर लोगों को सुनाना मैं बखूबी जानता था। यह सिर्फ एक तरह का अंधविश्वास था जो एक इंसान से दूसरे इंसान को बस डराने के लिए सुनाया करते थे।

उस रात जंगल के बीचों-बीच हमारी कार सड़क पर तेजी से दौड़ रही थी। जंगल का वह हिस्सा उबड़-खाबड़ था, जो 8 से 9 किलोमीटर तक फैला हुआ था। हालाँकि उसके बाद का रास्ता इसके मुकाबले काफी सही था। उस रात हम पाँच लोग थे. मेरे कजिन्स जय और ज्योति, मेरे क्लासमेट रोनित, डॉली और मैं यानि राज शर्मा।

मेरे पिताजी अर्जुन शर्मा एक बिज़नेस मैन थे। जिनकी शहर में कपड़ों की दुकान थी। जिसे वह अपने छोटे भाई राजन शर्मा के साथ मिलकर चलाते थे। राजन शर्मा मेरे चाचा थे यानि ज्योति और जय के पिताजी। हम सभी जॉइंट् फॅमिली में ही रहते थे। मेरे पिताजी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने 30 वर्षों में अपने कपड़ों के बिज़नेस को काफी आगे बढ़ा लिया था।

मेरी कार के सामने सड़क पर दौड़ती नीले रंग की टाटा इंडिका को जय चला रहा था। ज्योति उसके बगल में बैठी हुई थी। साथ में रोनित उनके साथ बैक सीट पर बैठा हुआ था।

उनकी कार के पीछे ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ मैं अपनी वाइट कलर की ऑल्टो ड्राइव कर रहा था। मेरे बगल में डॉली बैठी हुई थी। वह काफी खुश दिख रही थी। काफी दिनों से वह मुझे कहीं बाहर ले जाने के लिए जिद कर रही थी और आज उसकी ये ख़्वाहिश पूरी होती नजर आ रही थी।
 
शहर से निकलते समय और कार में बैठते ही डॉली ने जो सबसे पहले शब्द मुझसे कहे थे, वह ये थे –

“जानते हो राज! मैं सोच रही थी जब हमारी शादी हो जाएगी न तो हम ऐसे ही कार से लॉन्ग ड्राइव पर जाया करेंगे। क्या कहते हो तुम?” डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा था।

दरअसल मैं डॉली को पसंद करता था और डॉली भी मुझे पसंद करती थी। यह बात मेरे कजिन्स ज्योति और जय को भी पता थी और रोनित भी इस बात को अच्छे से जानता था। हालाँकि इस ट्रिप के लिए डॉली के माता-पिता को मनाना इतना आसान नहीं था। लेकिन मेरी बहन ज्योति की वजह से यह पॉसिबल हो पाया था क्योंकि डॉली मेरी गर्लफ़्रेंड थी और ज्योति की बेस्ट फ्रेंड। डॉली हमारे पड़ोस में ही रहती थी। वह ज्योति से उम्र में 3 साल बड़ी थी और बचपन से ही ज्योति को अपनी छोटी बहन की तरह प्यार करती थी। ज्योति भी उसे अपनी बड़ी बहन समझती थी।

डॉली और मुझे एक-दूसरे से प्यार स्कूल टाइम में ही हुआ था। जो समय के साथ परवान चढ़ चुका था।

"डॉली, मैं जानता हूँ कि तुम बहुत खुश हो और मैं इसलिए खुश हूँ क्योंकि तुम मेरे साथ हो।"

"वैसे हम तुम्हारे अंकल के यहाँ कब तक पहुँच जायेंगे। आई एम वेरी टायर्ड।"

"ज्यादा टाइम नहीं लगेगा। लेकिन लगभग डेढ़ से दो घंटे में हम वहाँ पहुँच जायेंगे।”

"डेढ़ से दो घंटे? लेकिन यह इतना बड़ा रास्ता तो नहीं था।"

"अरे बाबा, बीच में वह जंगल वाला रास्ता पड़ता है न? रात का समय है और वहाँ पर रास्ता थोड़ा उबड़-खाबड़ है तो गाड़ी संभाल कर चलाना पड़ता है।”

“यार, यह जंगल-वंगल से जाने से बेहतर है कि कोई दूसरा रास्ता ले लेते हैं। भले एक घंटा ज्यादा लगे।” डॉली ने अंगड़ाई लेते हुआ कहा था।

“मुझे तो कभी-कभी तुम्हारा समझ में नहीं आता। तुम्हें लॉन्ग ड्राइव भी करनी है और तुम्हें इतना कुछ सोचना भी है। अरे बाबा, तुम डरती बहुत हो। वैसे दूसरा कोई रास्ता है भी नहीं। होता तो मैं जरूर तुम्हारे लिए वह एक घंटे का सफर भी सह लेता।"

"तो हम जल्दी भी तो निकल सकते थे न। अब इतनी रात को निकल रहे हैं। वहाँ पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी। ये सेफ तो होगा न राज?"

"डोंट वरी हम वहाँ पर जल्दी पहुँच जायेंगे और वैसे भी दिन में उस रास्ते से काफी गाड़ियाँ गुजरती है रास्ता थोड़ा संकरा है तो काफी ट्रैफिक लग जाता है। वैसे भी रात में 10 बजे के बाद रास्ता लगभग खाली होता है।"

मैं हालाँकि इस वक्त ट्रेवल नहीं करना चाहता था, लेकिन जय का कहना था इस टाइम तो हम और जल्दी पहुँच सकते हैं। ये प्लान शायद कोई कैंसिल नहीं करना चाहता था।”

“देखो, अब मेरी टेंशन बढ़ रही है! 10:30 यहीं पर बजने वाले हैं।"

उस रात, मैं डॉली की टेंशन जानकर भी समझ नहीं पाया। लेकिन क्या करें, हमें उस रात अंकल के यहाँ पहुँचना ही था। बड़े दिनों के बाद हमें साथ में शहर से कहीं बाहर जाने का चांस मिला था। इस समय काफी कम लोग ही उस रास्ते से जाते हैं। ज्यादातर लोग दिन में ही उस रास्ते को पार करते हैं और इतना बड़ा शहर भी नहीं था कि रात में उस रास्ते से आना-जाना करते रहे। उसकी बात भी सही थी अब तक मुझे तो कोई गाड़ी भी नज़र नहीं आयी थी।

हालाँकि डॉली के डर के बारे में मैं अच्छे से जानता था और हम सभी ने उस जंगल और उस सड़क पर होने वाले हादसों के बारे में भी कई कहानियाँ पढ़ और सुन रखी थी। लेकिन उनका कोई भी पुख्ता सबूत अब तक सामने नहीं आया था। न ही कोई बड़ी घटना का कहीं कोई ज़िक्र था। तो मैं उन पर आँख बंद कर विश्वास नहीं करना चाहता था।
 

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