• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अंदाज़

'उसके सिर में जुएं पड़ गई थीं । वह समझती थी कि जिसके सिर में जुएं पड़ जाएं, वह मालदार हो जाता है । वह छत पर बैठकर मालदार होने का सपना देखती हुई जुएं निकाल रही थी। तभी वह रुपयों का बैग आन गिरा और वह समझी कि मालदार हो गई।'

नौजवान डॉली को संदेह भरी नजरों से देखता रहा।

डॉली ने थोड़ा-सा शरमाकर कहा 'तुमने मेरा नाम तो पूछ लिया । अपना नाम नहीं बताया ।'

'मेरा नाम जानकर क्या करोगी तुम?'

'यह जानना चाहती हूं कि तुम्हारा नाम भी वही है?'

'क्या मतलब?'

डॉली ने चेहरे पर और ज्यादा शर्म पैदा की और बोली-'मैं बचपन से सपने देखती थी-सफेद घोड़े पर सवार एक बांका-सजीला नौजवान, जो बिल्कुल तुम्हारा हमशक्ल था, दूर से हाथ में तलवार लिए आता है। 'मुझे बड़ी-बड़ी मूंछों वाले बदमाशों ने पकड़ रखा है । वह उनसे छुड़ाकर मुझे घोड़े पर बिठा लेता है और कहीं दूर ले जाता है।

'हुं। और आज वह नौजवान तुम्हें पुलिस के गुण्डों से बचाकर घोड़े की जगह म्मेंटरसाइकिल पर उड़ाकर ले आया।'

__ 'सपने तो पुराने जमाने के होते है जब मोटरसाइकिलें नहीं होती थी।'

'तुमने कहां तक पढ़ा है?'

'बी० कॉम. फाइनल कर लिया है । अभी रिजल्ट नहीं निकली।'

'हूं...और कौन-कौन से आर्ट जानती हो?'

'जूडो, कराटे, कुंग-फू...बाक्सिंग...!'

'तुम्हारे आश्रम की सब लड्कियां जानती हैं?'

'सब लड़कियां ! आंटी ने हम सबको खूब ट्रेड किया है।'

'तो यह कहो आंटी ही तुम्हारे गैंग की लीडर है।'

'नहीं, लीडर तो मैं हूं । आंटी सिर्फ संरक्षिका हैं।'

___ 'यानी चोरी, डाके और फ्रॉड तुम्हारी लीडरशिप में होते हैं।'

डॉली ने आंखें फाड़कर कहा 'चोरी, डाके, फ्रॉड ? यह तुम क्या कह रहे हो?'

'तुमने सेठ गोपालदास के साथ जो फ्रॉड किया था ?'

'अरे, वह सब तो मैंने एक फिल्म में से सीखा था।'

'और मुरली मनोहर के यहां डाका?'

डॉली ने चौंककर उसे देखा और सोचा 'इसका मतलब है, यह अपना जुर्म मेरे सिर थोपना चाहता है।' _ 'खैर, कोई बात नहीं । मुझे तो इसे सुधारना 'यूं भी इसका अपराध मैं खुद ही अपने सिर लेने वाली थी।'

इतने में वेटर ने नाश्ता रख दिया और पर्दा बराबर करके चला गया ।

नौजवान ने कहा 'चलो, शुरू करो।'

'ऐसे नहीं।'

'फिर कैसे?'

'जब तक तुम्हारा नाम न मालूम हो जाए, मैं कैसे तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करू?'

'मेरा नाम राज है।'

डॉली ने खुशी से उछलकर कहा 'सच...?'

नौजवान ने उसे घूरकर कहा

'मेरा नाम राज है-इसमें इतना खुश होने की क्या बात है?'

'वह...उसका नाम भी राज ही था ।'

'किसका नाम...?'

'वह जो मेरे सपनों में राजकुमार बनकर आता था ।'

'अच्छा ...!'

'सच मानो...।'

'अगर मैं कहूं कि मैंने तुम्हें अपना नाम गलत बताया है । मेरा असली नाम तो आनंद है ।'

'हां, उसका पूरा नाम राज आनंद ही था ।'

'राज आनंद एम.एम.सी. !'

-

-

'हां, वह भी एम.एम.सी. ही था ।'

राज ने उसे घूरकर कहा

'हूं, जिस जमाने में मोटरसाइकिल नहीं होती थी, उस जमाने में एम.एम.सी. की डिग्रियां जरूरी होती थीं?'

डॉली चकराती हुई अपना सिर खुजाकर बोली-'शायद मैंने गलत सुना हो । वह 'ऐ मेरी डॉली' कह रहा हो । मैं एम.एस.सी. समझी हूं।'

'चलों, नाश्ता शुरू करो ।'

दोनों ने नाश्ता शुरू कर दिया और राज ने कहा-एक और एक कितने होते है?'

'ग्यारह!'

'अगर हम दोनों मिलकर काम करें?'

'कं...क...क्या...काम...?'

'वही, जो तुमने सेठ गोपालदास के साथ किया था ।'

'फ्रॉड!'

'हां, जाहिर है कि अब तुम अनाथ-आश्रम तो जा नहीं सकती । पुलिस ने वहां इंक्वायरी की होगी और अगर किसी और को नहीं पकड़ा होगा तो तुम्हारे लिए सादा लिबास वाले जरूर तैनात कर दिए होंगे।'
 
डॉली ने सोचा

'यह भी ठीक है। फिर यूं भी मुझे राज के साथ ही रहकर इसे सुधारना है...।' 'इसे सुधारने के लिए थोड़ा-सा बिगड़ना भी पड़ेगा...।'

राज उसे ध्यान से देखता रहा। फिर बोला 'इसमें सोचने की क्या बात है ?'

'आं...!'

डॉली चौक पड़ी।

राज ने कहा

'मैं कह रहा हूं, तुम अनाथ-आश्रम तो जा नहीं सकती। पुलिस चप्पे-चप्पे पर तुम्हें ढूंढ रही होगी । इसलिए तुम अब कोई काम भी किसी की मदद के बिना नहीं कर सकती।'

डॉली ने ठंडी सांस ली और बोली 'और मैं कहीं और रह भी नहीं सकती । मेरा कोई दूसरा ठिकाना नहीं है।'

'उसकी चिन्ता मत करो । अगर तुम्हें मेरे साथ काम करना स्वीकार है तो फिर सब-कुछ मुझ पर छोड़ दो । मैं सब-कुछ संभाल लूंगा । बस, जैसे मैं कहता जाऊं, वैसे करती जाओ ।'

'मझे स्वीकार है।'

'तो फिर मिलाओ हाथ ।' राज ने हाथ बढ़ाया।

डॉली थोड़ी-सी झिझकी । फिर उसने हाथ बढ़ा दिया । राज से हाथ मिलते ही डॉली के शरीर में सनसनी-सी दौड़ गई।

रेस्टोरेंट से निकलकर जैसे ही वे लोग टैक्सी में बैठने लगे, अचानक एक ऊंची आवाज ने उन्हें संबोधित करके कहा

'ठहरो...!'

डॉली ने जैसे ही गर्दन घुमाई, उसके पैरों तले से जमीन निकलते-निकलते बची क्योंकि सामने ही एक पुलिस इंस्पेक्टर मोटरसाइकिल खड़ी करके उतर रहा था।

डॉली ने इंस्पेक्टर की छाती पर लगी उसके नाम की छोटी-सी प्लेट देखी, जिस पर लिखा था : इंस्पेक्टर चंद्रनाथ कोहली।

इंस्पेक्टर जैसे ही उसके समीप आया । डॉली ने चेहरे पर असीम प्रसन्नता के भाव पैदा किए और दोनों हाथ बढ़ाकर उसकी तरफ बढ़ती हुई खुशी भरे स्वर में बोली 'हाय चंद्र भैया!'

फिर वह सचमुच इंस्पेक्टर की छाती से एक बहन की तरह लग गई। फिर खुशी भरी सिसकी के साथ बोली 'धन्य हो, भगवान । इतने वर्षों बाद मुझे मेरे भैया के दर्शन तो हुए ।'

-

-

राज चुपचाप खड़ा था । इंस्पेक्टर भी हैरान-हैरान था।

यह शायद भूल गया था कि उसने उन दोनों को क्यों रोका है?

कुछ पल ठहकर इंस्पेक्टर ने कहा

'क्षमा कीजिए । मैंने आपको पहचाना नहीं ?'

डॉली ने उसकी छाती से अलग होकर आंसु पोंछे और रुधे गले से बोली

'यह तुम क्या कह रहे हो, भैया? तुमने मुझे नहीं पहचाना, अपनी बहन को?'

'मेरी तो एक ही बहन थी, जो बहुत छोटी-सी थी । तब उसे कुछ गुण्डे उठाकर ले गए थे।'

डॉली ने आंसू पोंछकर भारी आवाज में कहा 'मैं तुम्हारी वही बहन हूं, भैया सुरेखा!'

'मगर मेरी बहन का नाम तो रेखा था

'उन गुण्डों ने रेखा से सुरेखा बना दिया था । वे लोग मुझसे बहुत बुरे-बुरे काम लेते थे । एक दिन उन्होंने मुझे इस शरीफ आदमी के पीछे लगा दिया ।'

डॉली ने राज की तरफ इशारा करके आगे कहा 'और मुझसे कहा-'ये स्टेट डमडम डीगा डीगा के प्रिंस हैं। इन्हें अपने जाल में फांसकर इनसे शादी करो। फिर इनके बाप-दादों के एक करोड़ के हीरे उड़ाकर ले आओ ।'

'ओहो..!'

डॉली ने आंसू पोंछकर कहा 'मैंने इन्हें जाल में फांस लिया और इन्होंने मुझे अपने जाल में फांस लिया ।'

'क्या मतलब?'

'मेरा मतलब है, अपनी शराफत के जाल में ।'

'समझा...!'

'बस, जिस दिन हमारी शादी हुई । मुझे ऐसा लगा जैसे मैं इतने पवित्र रिश्ते के साथ फ्रॉड कर रही हूं और मैंने इन्हें सुहाग-मंडप में सब-कुछ बता दिया ।

_'इन्होंने मुझे अपनी छाती से लगाकर कहा-'घबराओ मत डॉली । अब हम दोनों मिलकर इन गुण्डों को पकड़वाएंगे।'

'क्या कहा...डॉली..?'

राज ने झट बात बनाई

'वह...मैंने शादी के बाद इनका नाम बदल दिया था । प्यार से डॉली कहने लगा था । जैसे वे गुण्डे-बदमाश रेखा से सुरेखा कहने लगे थे।

'फिर नाम बदलना जरूरी भी तो था, वरना उस नाम से तो बहुत सारे पुलिस वाले परिचित होंगे।'

'ओह, आप सच कह रहे हैं।'

फिर इंस्पेक्टर ने डॉली के कंधे पकड़कर भावुक स्वर में कहा-'कितना बड़ा अनर्थ होते-होते रह गया । मैं अपनी बहन को पच्चीस लाख की चोरी और पचास हजार के फ्रॉड की अप-राधिन समझकर पकड़ने ही वाला था ।'

'भैया...!'

डॉली पुन: उसकी छाती से लग गई। इंस्पेक्टर उसे थपकते हुए भारी आवाज में बोला 'घबराओ मत, रेखा । अब न तो गुण्डे तुम्हारा कुछ बिगाड़ सकते हैं और न ही पुलिस तुम्हें पकड़ेगी

'भैया...!'

'तुम लोग कहां रहते हो? मैं तुम्हारी भाभी को लेकर तुम दोनों को बुलाने आऊंगा।'

राज ने झट कहा

'वैसे तो हम लोग आजकल अमेरिका में हैं। लेकिन रेखा को अपने भाई की बहुत याद आ रही थी | इसलिए मैं इसे पिछले सप्ताह ही लेकर भारत आया था ।'

'अच्छा, हमारी बहन अमेरिका में रहती है?'

'हां, भैया! तुमने व्हाइट-हाऊस का नाम सुना है ना?'

'व्हाइट-हाऊस?'

.

राज ने फिर से झट से बात बनाई

'हां, वह अमेरिका का राष्ट्रपति का महल है ना व्हाइट-हाऊस-हमारे अपार्टमेंट से साफ नजर आता है, इतने करीब रहते है।'

'वेरी गुड...यहां कहां ठहरे हो?'

'ताजमहल होटल में! ओबेराय शेरटन में भी एक रूमबुक कर रखा है। उधर से दिल घबरा जाता है तो इधर आ जाते हैं । इधर से दिल घबराता है तो उधर चले जाते हैं।'

'कौन-से रुम नम्बर में ?'

'रूम नम्बर तीन सौ तेरह । किसी से भी कहिएगा प्रिंस आनंद-मैनेजर खुद आपको लिफ्ट से पहुंचाने के लिए हमारे कमरे तक आएगा ।'

इतनी देर में पुलिस की एक गाड़ी रुकती नजर आई और डॉली ने झट कहा

'अच्छा, भैया । आज्ञा दो ।'

फिर उसने सिर ढंककर इंस्पेक्टर के पांव छुए । राज ने भी पांव हुए और यह सब रुकने वाली पुलिस की गाड़ी के पुलिसियों ने देखा । जब वे लोग चरण-स्पर्श करके टैक्सी की तरफ बड़े तो पुलिस वाले उन्हें हैरत से देख रहे थे।

दोनों टैक्सी में सवार हुए और टैक्सी चल पड़ी तो इंस्पेक्टर चंद्र ने अपने आंसू पोंछे ।

फिर सब पुलिस अफसरों से बोला

'घेर लो रेस्टोरेंट को । वे दोनों बदमाश इसी में बैठे हैं, मुखबिर ने सुचना दी थी।'

सब-इंस्पेक्टर ने हैरतसे कहा 'सर! वे दोनों तो आपके सामने से चले भी गए ।'

'कौन दोनों...?'

'जिन्होंने आपके चरण छूए थे ।'

'क्या बकते हो । वह मेरी छोटी बहन थी, जिसे चार वर्ष की उम्र में कुछ गुण्डे उठाकर ले गए थे | आज संयोग से अपने पति प्रिंस आनंद के साथ मिल गई।'

'सर! जब वह चार वर्ष की थी तो आप कितने बड़े होंगे?'

'सात वर्ष का, क्यों?'

'सर, इतनी छोटी-सी उम्र में खोने वाली बहन ने आपको इस उम्र में और इस हुलिये में पहचान कैसे लिया ?'
 
-

'इसी को तो कहते हैं । अरे, खून को देखकर खून जोश मारता है।'

'सर! वह लड़की फ्रॉड है । उसने आपके नाम की प्लेट पढ़कर आपका नाम जान लिया होगा

और यह नाटक रचा होगा वरना इतनी छोटी उम्र वाले बच्चों के चेहरे इस उम्र में बिल्कुल बदल जाते हैं ।

____ 'मैं दावे के साथ कह सकता हूं, उसके साथ कोई प्रिंस आनंद नहीं । यह वही बदमाश था, जो उसे मोटरसाइकिल पर लेकर भागा था ।'

"अरे बाप रे!'

'सर! आपने उन दोनों के हुलिये नहीं देखे? वहीं हैं, जो उस लड़की और मोटरसाइकिल वाले के हुलिये थे ।'

'अरे पकड़ो...जल्दी करो...'

फिर इंस्पेक्टर ने जल्दी से मोटरसाइकिल स्टार्ट की और बाकी पुलिस वाले गाड़ी में सवार हो गए । गाड़ी और मोटरसाइकिल सड़क पर फर्राटे भरने लगी।

00 ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

राज ने टैक्सी ड्राइव करते हुए कनरियों से डॉली को देख और बोला 'सचमुच तुम एक्टिंग अच्छी कर लेती हो ।'

डॉली ने ठंडी सांस ली और बोली

'आपने सुना होगा, आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है । आवश्यकता सब-कुछ सिखा देती है।'

'यह तो सच है । अगर तुम इतना अच्छा अभिनय न करती तो आज हम लोग पकड़ लिए जाते

अचानक पुलिस गाड़ी के सायरन की आवाज सुनकर दोनों उछल पड़े।

राज ने बैक-व्यू मिरर में देखा तो झट से बोला __ 'अरे! यह तो वही तुम्हारा भाई पीछा कर रहा है, पुलिस-वैन के साथ ।'

'इतनी जल्दी राखी का बंधन टूट गया।'

'अरे! ये साले पुलिसवाले अपने सगे बाप को नहीं छोड़ते।'

'अब क्या होगा ?'

'तुम आराम से बैठी रहो।'

राज की टैक्सी फर्राटे से दौड़ती रही और वह दूसरी गाड़ियों को ओवरटेक करता रहा । लेकिन पुलिस की गाड़ी और मोटरसाइकिल ने पीछा नहीं छोड़ा।

00 ……………………………………
 
कुछ देर बाद टैक्सी एक होटल के भीतर वाले फांटक में प्रवेश करती हुई बाहर निकलने वाले फाटक से बाहर निकल आई।

पुलिस की गाड़ी और मोटरसाइकिल एक दूसरी टैक्सी को साइड में रुकते देखकर उसकी तरफ बढ़कर रुक गई थी।

राज ने टैक्सी बड़ी फुर्ती से घुमाई और उसने होटल के बाहरी गेट से मोटरसाइकिल और पुलिस की गाड़ी निकलते देखी।

फिर वह टैक्सी उसी होटल के अंदर ले गया । एक जगह टैक्सी रोक्कर वे दोनो उतरे तो उनके लिबास पर नजर डालकर दरबान उन्हें हैरत से देखता रह गया।

राज ने दरबान से कहा

'दरबान ! इस टैक्सी पर नजर रखना । इसका ड्राइवर हमारा कई करोड़ का सामान लेकर टैक्सी छोड़कर भाग गया है । हमने इस होटल मे रूम बुक कराया था। यहां से पुलिस को खबर करनी है।'

'जी साहब !'

राज और डॉली अंदर आए, काउंटर पर खड़े हुए । काउंटर क्लर्क ने उन दोनों को देखकर दांत निकालते हुए बड़े आदर के साथ पूछा

'फरमाइए श्रीमान!'

राज ने कहा

'अरे, हमने रूम बुक कराया था एयरपोर्ट से टेलीफोन करके ।'

'अच्छा...अच्छा, मिस्टर एंड मिसेज बेंजामिन गैलानी ?'

'हां...।'

'यह आपके रूम की चाबी ।' उसने चाबी देकर कहा-'रुम नंबर तीन सौ तेरह ।'

दोनों ने चौंककर एक-दूसरे को देखा । फिर झटपट चाबी लेकर चलने लगे तो तुरंत काउंटर-क्लर्क ने पूछा

'सर! आपका सामान?'

राज ने कहा 'पीछे आ रहा है । रूम में भेज देना।'

ठीक उसी समय एक वेटर एक अटैची, एक शोल्डर बैग और एक ब्रीफकेस उठाकर लाया तो काउंटर क्लर्क ने उससे कहा--

'रूम नम्बर तीन सौ तेरह !'

'वेटर इत्मीनान से सिर हिलाकर लिफ्ट की तरफ बढ़ गया । सामान वाले मर्द-औरत काउंटर पर पहुंचे तो मर्द ने पूछा

'हमारा सामान लेकर वेटर कहां गया?'

'आपके रूम में ।'

'हमारे रूम की चाबी?'

'चोर गुड नेम, प्लीज!'

'मिस्टर एंड मिसेज शैलजा वर्मा । हमने एयरपोर्ट से रूम बुक कराया था ।'

काउंटर-क्लर्क ने की-बोर्ड पर नाम का कार्ड देखा और चाबी उतारकर मर्द को देते हुए बोला

'रूम नम्बर तीन सौ बारह ।'

'वे लोग लिफ्ट की तरफ बढ़ गए और काउंटर-क्लर्क फिर से रजिस्टर पर झुक गया ।

अचानक यही पुलिस-इंस्पेक्टर एक सब-इंस्पेक्टर के साथ आया और काउंटर पर डंडा मारकर बोला

'ऐ मिस्टर !'

काउंटर-क्लर्क ने बड़ी नम्रता के साथ कहा

'यस, प्लीज!'

'अभी-अभी यहां दो बदमाश आए हैं।'

'अभी-अभी तो आप ही दोनों आए हैं ।'

'शटअप! वे दोनों एक चोरी की टैक्सी में आए हैं।'

'मगर हमारे होटल में टैक्सियां अंदर लाने का रिवाज नहीं है।'

'ईडियट! टैक्सी बाहर खड़ी है । बदमाश अन्दर आए है।'

काउंटर-कलर्क ने बिगड़कर कहा

'गाली क्यों देते है, श्रीमान ? मैं फाइव-स्टार का काउंटर क्लर्क हूं, कोई टटपूंजिया पुलिस इंस्पेक्टर नहीं हूं।'

'व्हाट ?' आई एम टटपूंजिया ?'

इंस्पेक्टर ने काउंटर-क्लर्क का गिरेहबान पकड़ लिया और झिंझोड़ डाला ।

हंगामा सुनकर वेटर जमा हो गए और असिस्टेंट मैनेजर भी दौड़ता हुआ आ गया।

00 ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
जैसे ही किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, राज और डॉली उछल पड़े । राज ने छेद से झांककर देखा और ठंडी सांस लेकर बोला

'वेटर ।'

फिर उसने दरवाजा खोल दिया । वेटर सामान लेकर अंदर आता हुआ बोला

'सर! आपका समान !'

राज ने उसे दस रुपये टिप दी और वेटर खुश होकर चला गया।

___ दरवाजा अंदर से बंद करके राज ने जल्दी-जल्दी सामान टटोला । फिर अटैची को इतनी जोर से बैड पर मारा कि उसका लॉक टूट गया और कपड़े निकलकर फैल गए।

राज ने झटपट एक काला सूट अपने लिए और शानदार कपड़े निकाले और डॉली से बोला

'जल्दी करो । कपड़े बदल लो । वेटर किसी और का सामान दे गया है।'

डॉली और राज एक साथ झपटकर बाथरूम में घुसे और राज दरवाजा बंद करने लगा तो डॉली चीख पड़ी । राज बौखलाकर दरवाजा खोलता हुआ बोला-'ओ...आई एम सॉरी ।

मैं बाहर बदलता हूं।' __

'डॉली का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । उसने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और अंदर से दरवाजे पर दस्तक दी।

राज भी काला सूट पहन चुका था । उसने जल्दी से दरवाजे के पास जाकर छेद से बाहर झांका । लेकिन वहां कोई नहीं था।

राज ने दरवाजा खोलकर इधर-उधर देखा । उसी दौरान फिर से दस्तक हुई । राज ने मुड़कर बाथरूम के दरवाजे की तरफ देखा और अंदर से डॉली की आवाज आई

'मैं बाहर आ जाऊं?'

'आ जाओ!'

डॉली ने चुपके से दरवाजा खोलकर बाहर झांका । फिर इत्मीनान का सांस लेकर बाथरुम से निकल आई।

उस समय वह गहरी नीली कीमती रुपहली बार्डर वाली साड़ी में बहुत सुन्दर नजर आ रही थी ।

राज ने उसे एक नजर देखा । फिर ब्रीफकेस उठाकर जोर से दीवार पर मारा । उसका भी लॉक खुल गया और उसमें से बहुत सारे नोट निकल पड़े।

राज ने जल्दी से उनमें से एक गड्डी उठाकर जेब में रखी और बोला

'चलो, जल्दी निकल चलें ।'

दोनों बाहर निकल आए तो बराबर के कमरे के सामने एक मर्द, एक औरत खड़े एक वेटर पर बिगड़ रहे थे।

'काउंटर-क्लर्क ने कहा था, वेटर हमारा सामान ऊपर ले गया है।'

राज ने उनसे पूछा

'क्या बात है साहब?'

'अरे, साहब । ऐसी अंधेरगर्दी है । यह फाइव-स्टार होटल हैया ढाबा । काउंटर-क्लर्क कहता है कि सामान कमरे में भिजवा दिया । वेटर कहता है कि वह सामान लाया ही नहीं ।'

'श्रीमान ! हर बड़े होटल का यही हाल है । मैं तो अपना होटल अलग खोलने की स्कीम बना रहा हूं अगली बार बूढ़े गांव से अमेरिका आएं तो मेरे होटल में ठहरियेगा।'

'श्रीमान ! मैं बूढ़े गांव से नहीं अमेरिका से आया हूं।'

'अच्छा...अच्छा, वापस जाएं तो राष्ट्रपति क्लिंटन से मेरा सलाम बोलिएगा।

फिर वे दोनों हाथ में हाथ डालकर लिफ्ट की तरफ आए । उसी समय लिफ्ट ऊपर आई और उसमें से इंस्पेक्टर चंद्र बहुत गुस्से में बाहर निकला | डॉली का ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया ।

+

इंस्पेक्टर चंद्र ने गस्से से कहा 'यह होटल नहीं, चोरों-बदमाशों का बड़ा बन गया है।'

राज ने कहा 'आप ठीक कहते हैं यह शिकायत उन सज्जन को भी है।'

उसने तीन सौ बारह नम्बर वाले ग्राहकों की तरफ इशारा किया और बोला

'एक्सक्यूज मी, प्लीज...!'

इंस्पेक्टर चंद्र बाहर निकल आया ।

राज और डॉली ने भीतर प्रवेश किया । लिफ्ट की ग्रिल और दरवाजा बंद करके ग्राउंड-फ्लोर का बटन दबा दिया । लिस्ट-नीचे चली तो डॉली ने अपने माथे से पसीना पोंछकर कहा

'मैं तो डर गई थी।'

_ 'पुलिसवालों को भैया बनाने का यही लाभ है | वर्दी पहनकर अपने सगे-संबंधियों को भी नहीं पहचानते । तुमने तो भाई बनाया था ।'

वे लोग लिफ्ट से निकले तो काउंटर पुर अभी तक हंगामा हो रहा था । जो पुलिस वाले गाड़ी में आए थें-वें असिस्टेंट मैनेजर और काउंटर-क्लर्क से उलझे हुए थे।

राज और डॉली बड़े आराम से हाथ में हाथ डाले बाहर निकले तो बाहर गेट के पास ही एक लाल रंग की मारुति कार खड़ी थी।

दरबान ने आदरपूर्वक पूछा

'सर ! आपने ही तीन सौ बारह नंबर से प्राइवेट टैक्सी के लिए आर्डर बुक किया था ?'

'हां ! यही है...?'

'यस, सर | चाबियां अंदर हैं।'

दरबान ने सादर दरवाजा खोला । डॉली के बैठने के बाद उसने दरवाजा बंद कर दिया।

राज ने दूसरी तरफ से अंदर बैठकर स्टेयरिंग संभाला । कार कुछ देर बाद बाहर निकलकर सड़क पर दौड़ रही थी।

एक पेंटर की दुकान के सामने कार रोककर राज नीचे उतरा । पहले जेबें टटोलीं ।

फिर खिड़की में झुककर जोर से बोला

'डार्लिंग ! आर. टी. ओ. से हमारी गाड़ी के लिए कौन-से नए नम्बर इश्यू हुए है ?'

डॉली ने इत्मीनान से जवाब दिया 'एम आर जैड...फोरन नाइन फोर नाइन....!'

फिर राज ने पेंटर से कहा

-

'लो, भई । हमारी गाड़ी पर नए नम्बर डाल दो । हमने इन नंबरों को लकी समझकर आर. टी. ओ, में अप्लाई किया और पहले ही से नंबर डलवा लिए । लेकिन बाद में पता चला कि ये नंबर किसी और गाड़ी को अलाट कर दिए गए है।'

पेंटर ने दांत निकालकर कहा

'जी, हां । वह गाड़ी भी बिल्कुल ऐसी थी, रंग भी लाल और उस पर नंबर भी मैंने ही डाले थे।'

राज शांतिपूर्वक खड़ा रहा।
 
राज शांतिपूर्वक खड़ा रहा।

पेंटर नम्बर प्लेट पर दूसरे नम्बर डालने लगा वह इतना अपने काम में लीन था कि उसने पुलिस की गाड़ी का ऐलान भी नहीं सुना, जिसके लाउडस्पीकर पर कहा जा रहा था

___जनता को सूचना दी जाती है । दो बहुत बड़े फ्रॉड होटल फाइव-लार की प्राइवेट टैक्सी और एक ग्राहक के कपड़े और दस हजार रुपये लेकर भागे है । वे दोनों पहले ही फ्रॉड और चोरी में वाटेंड है । जिस सज्जन को मारुति कार लाल रंग की रजिस्ट्रेशन नम्बर एम एम यू चार दो तीन कहीं नजर आए फौरन पुलिस को खबर करे ।

गाड़ी गुजर गई।

कुछ देर बाद दोनो प्लेटों पर नम्बर लिख गए । राज ने स्टेयरिंग संभाला । कार फिर से सड़क पर दौड़ने लगी।

डॉली ने पूछा

'अब हम कहा जा रहे है ।'

'यहां से बहुत दूर...क्षितिज के उस पार, जहां हम दोनों को पहचानने के लिए कोई पुलिस वाला न हो ।'

'ऐसी जगह कौन-सी है?'

'सबसे निकटवर्ती जगह तो पुणे है ।'

'पुणे...अरे बाप रे!'

'क्यों ? वहां क्या तुम्हारी पहली ससुराल है?'

'म...म्...मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई ।'

'फिर क्या बात है?'

'मैं...मैं कभी यशोदा आंटी और अपनी सहेलियों से इतनी दूर नही रही ।'

'तो वापस चलो । पुलिस वाले पकड़ लें तो शिकायत मत करना । तुम्हारा पूरा गैंग पकड़ लिया जाएगा।'

'म...म...मरा गैंग...।'

'मेरा मतलब है, आश्रम की सारी लड़कियां यशोदा आंटी के साथ ।'

'नही...नहीं, यशोदा आंटी एक दिन भी जेल में नहीं रह सकती।'

'इसका यही उपाय है कि हम पुणे चलें ।'

'लेकिन कब तक रहेंगे वहां?'

'जब तक मुम्बई की पुलिस थककर हमारी तलाश न बंद दे ।'

फिर उसने ठंडी सांस लेकर कहा

'किसी ने सच कहा है । शैतान का नाम जुबान पर लाओ और शैतान हाजिर..!'

सामने ही बैरियर पर बहुत सारे पुलिस वाले खड़े हुए गाड़ियां चैक कर रहे थे ।

राज ने गाड़ी पीछे लगा दी।

डॉली ने कसकर राज की भुजा पकड़ ली और थूक निगलकर कंपकंपाती आवाज में बोली

'अब क्या होगा?'

'वही होगा जो मंजूरे-खुदा होगा।'

पुलसिये गाड़ियों के नम्बर चैक कर रहे थे और गाड़ियां बैरियर से निकाल रहे थे ।

जब उनकी गाड़ी का नम्बर आया तो राज ने चैक करने वाले इंस्पेक्टर से कहा

'आपको लाल रंग की गाड़ी की तलाश है ना, जिसके नम्बर एम एम यू चार दो तीन चार हैं।'

'जी हां, आपको कैसे पता चला?'
 
'शहर में अनाउंसमेंट हो रहा था । आपको लाल गाड़ी की तलाश है तो ये दूसरे रंग की गाड़ियां आपने क्यों रोक रखी हैं? उनका समय अकारण बरबाद हो रहा है?'

_ 'ओहो, यह तो हमें ख्याल ही नहीं आया था

फिर इंस्पेक्टर ने जोर से कहा

'ऐ, सिर्फ लाल रंग की गाडियां रोको । बाकी गाड़ियां निकलने दो।'

राज ने कहा

'हमें तो जाने दीजिए।'

'ओं हां, हवलदार! बैरियर उठाओ।'

गाड़ी बैरियर से निकल आई तो डॉली ने इत्मीनान की सांस ली।

राज ने डॉली को कनखियों से देखा और बोला-'तुम इस साड़ी में बिल्कुल अपने घोड़े वाले राजकुंमार की राजकुमारी मालूम हो रही हो ।'

डॉली का दिल बहुत जोर से उछला । उसे कुछ भय महसूस हुआ।

लेकिन फिर उसने सोचा 'नही...कहने दो..राज यशोदा आंटी का बेटा है।' 'मुझे वैसे भी इससे झूठी मोहब्बत का नाटक करना था ।' __ 'अच्छा है, मोहब्बत की यही शुरुआत कर दे

"किसी तरह सुधरकर यह अच्छा आदमी बन जाए तो मैं आंटी को उनका बेटा दिलवा सकुँ।'

'उसके बाद मैं इसके सारे जुर्म स्वीकार करके जेल चली जाऊंगी।'

'आंटी को उनका बेटा तो मिल जाएगा।'

'उनकी तड़प तो खत्म हो जाएगी।'

तभी राज ने उसकी भुजा हिलाकर कहा

'ऐ कहां खो गई ?'

डॉली चौक पड़ी।

फिर तत्काल बलात् मुस्कराने की कोशिश करती हुई बोली 'सपनों में !'

'राजकुमार के सपनों में ?'

'और क्या किसी पुलिस वाले के सपने देखूगी ?'

'पुलिस वाले तो अब यूं भी तुम्हारे भाई बन गए है।'

अचानक राज ने गाड़ी को फुल-ब्रेक लगाए और डॉली का माथा विंड-शील्ड से टकरा गया । वह चीख पड़ी।

राज ने कहा 'आई एम सॉरी । ज्यादा तो नहीं लगी ?'

'तुमने यहां गाड़ी क्यों रोकी है? यह तो जंगल है

डॉली ने कुछ डरे-डरे अंदाज में इधर-उधर देखकर कहा ।

राज ने नीचे की तरफ इशारा किया और बोला 'वह देखो...।'

डॉली ने नीचे देखा तो चौंक पड़ी

ढलान में कुछ दूरी पर ही एक कार पत्थर से टकराई हुई थी, जिसका बोनट अंदर धंस गया था ।

चारों खिड़किया खुल गई थी। कुछ सामान नीचे पड़ा था।एक ब्राउन रंग के बंद गले का कोट और पतलून पहनें अधेड़ उम्र का आदमी, जिसके चेहरे पर भय व्याप्त था, ऊपर चढ़ने का यत्न कर रहा था।

डॉली ने सिहरकर कहा 'अरे, वह तो घायल मालूम होता है ।'

'और बहुत ज्यादा । शायद अकेला भी है। उसे हमारी मदद की जरूरत है।'

राज और डॉली तुरंत गाड़ी से उतर आए ।

अजनबी शायद साहस छोड़ चुका था । वह एक छोटे से पत्थर पर सिर टिकाए लेटा था । राज और डॉली जल्दी-जल्दी उसके समीप पहुंचे ।

राज ने उसकी भुजा धीरे-से पकड़कर हिलाते हुए पुकारा

'ऐ...मिस्टर...!'

अजनबी ने आंखें बहुत थोड़ी-सी खोली और बहुत कमजोर बैठी हुई-सी आवाज में बोला

'आ गए...यमराज...जल्दी से मेरे प्राण ले लो...मुझे परलोक ले चलो...'

. राज ने जोर से कहा

'ऐ मिस्टर ! मैं यमराज नहीं हूं।'
 
अजनबी ने उसे आंखें फाड़कर देखा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो । राज ने संभालकर उसे सीधा किया । फिर उसका सिर अपने घुटने पर रखकर इधर-उधर देखा । फिर एक तरफ इशारा करके वह डॉली से बोला-'वह वाटर-बॉटल पड़ी है । उसमें पानी होगा । जल्दी से लाओ।'

डॉली फटाफट जाकर वाटर-बॉटल में पानी ले आई । ढक्कन खोलकर थोड़ा-सा पानी अजनबी पिलाया और आंचल भिगोकर उसने अजनबी का चेहरा खून से साफ किया ।



अजनबी ने दोनों को आंखें फाड़कर देखा और कमजोर आवाज में बोला

'मैं सचमुच जिन्दा हूं।'

राज ने जवाब दिया

'जी, हां । आप बिल्कुल जिन्दा है। सिर्फ घायल है।'

'हे भगवान ! अब किस अपराध का दंड भोगने के लिए मुझे जिन्दा रखा है।'

'यह आप क्या कह रहे है ?'

'कुछ नहीं । बच्चो, तुम लोग कौन हो ?'

'हम लोग इधर से गुजर रहे थे । आपकी गाड़ी का एक्सीडेंट और आपको घायल देखकर रुक गए।'

'और...तुम लोग थोड़ी देर और न आते तो...मैं...मैं...शायद परलोक सिधार जाता ।'

"ऐसा क्यों कहते हैं, बाबा?' डॉली ने कहा 'ईश्वर जिसे जितना जीवन देता है, उससे कम या ज्यादा आदमी जी ही नहीं सकता ।'

'तुमने...तुमने मुझे बाबा? कहा, बेटी ।'

'आप मेरे पिता समान हैं।'

'नहीं, मैं पिता कहलाने योग्य नहीं हूं, बेटी ।'

राज ने कहा

'आपको अभी फौरन डाक्टरी सहायता की जरूरत है। आप बोलिए मत । हमारी गाड़ी ऊपर है | चलिए, मैं आपको लेकर चलता हूं।'

वह अजनबी को उठाने लगा तो अजनबी ने कहा गाड़ी में एक ब्रीफकेस है।'

राज ने डॉली से कहा

'देखो, तुम ब्रीफकेस लेकर आओ । कोई खास चीज हो, वह भी ले आओ।'

फिर वह अजनबी को लेकर ऊपर चल पड़ा।

डॉली ने गाड़ी में पिछली सीट पर रखा ब्रीफकेस उठाया । गाड़ी को देखा और कोई खास सामान न तो अंदर था, न ही बाहर ।

वह ब्रीफकेस लेकर ऊपर आ गई।

पिछली सीट पर डॉली बैठ गई । उसने अनजबी का सिर अपनी गोद में रख लिया । फिर राज ने स्टेयरिंग संभालते हुए पूछा

'आप कहां जा रहे थे ?'

अनजबी ने धीरे-से जवाब दिया

'पुणे...।'

'पुणे ही मैं भी जा रहा था ।' 'मगर एक्सीडेंट हुआ कैसे ?'

'स्टेयरिंग व्हील फ्री हो गया था ।'

'ओ...गॉड ! कितनी खैरियत हुई कि गाड़ी में आग नहीं लगी।'

_ 'संयोग था कि पेट्रोल खत्म हो गया था । मैं स्पेयर में रखा हुआ पेट्रोल डालने वाला था । ढलान पर गाड़ी लुढ़क रही थी। मैंने सोचा, रुक जाएगी तो डाल दूंगा।'
 
'शायद इस तरह आपकी जान बचनी थी।'

'बेटे! जान तो तुम लोगों ने बचाई है मेरी । ईश्वर करे! मेरी उम्र भी तुम दोनों को ही लग जाए । मुझे अब देखना ही क्या है ?'

'आप पुणे में कहां रहते हैं ?'

अजनबी ने पता बताकर कहा 'वहां स्प्रिंग-विला नामक बंगला है । जिससे मैं अकेला ही रहता हूं।'

डॉली अजनबी के कोट के कॉलर खड़े करने लगी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

'स्प्रिंग-विला' पहाड़ी के आंचल में अलग-थलग बहुत सुन्दर बंगला था । बिल्कुल सफेद रंग का बंगला, जो दूर से ही ताजमहल की तरह चमकता था।

बंगले के फाटक में ताला पड़ा था । अजनबी ने कुछ चाबियां निकालकर देते हुए कहा

'फाटक की भी चाबी है और अंदर की भी चाबियां ।'

फाटकका ताला खोलकर राज गाड़ी अंदर लाया । पोर्च में गाड़ी रोककर उसने उतरकर अंदर का ताला खोला । फिर दरवाजा खोलकर राज और डॉली अजनबी को संभालकर अंदर ले आए।

बड़ा सुसज्जित और वैभवशाली था अंदर से

राज ने बूढ़े को एक आरामदायक कुर्सी पर लिटाकर कहा

'अपने फेमिली डाक्टर का नम्बर बताइए । मैं उसे बुलाए देता हूं।'

बूढ़े ने जवाब दिया

'रहने दो, बेटे । मेरे सिर में मामूली चोट है । कमजोरी है ना बढ़ती उम्र की । इसलिए ज्यादा नर्वस से गया था। यहां के कमरे में फस्ट-एड बॉक्स होगा

राज बॉक्स लेने चला गया ।

डॉली ने इधर-उधर देखा और बोली 'बाबा! आप यहां अकेले रहते हैं।'

'नहीं बेटी।'

'फिर कौन रहता है यहां?'

'यादें-मेरे उस कड़वे अतीत की । जब मैंने दो प्यार भरे दिलों की पुकार सुनने से इंकार कर दिया था | जाने दो, बेटी । बहुत दिल दुखता है याद करके ।'

इतने में राज फर्स्ट-एड बॉक्स लेकर आ गया।

उसने डॉली से गर्म पानी लाने को कहा और बॉक्स से सामान निकालता हुआ बोला--

'यहां कोई चौकीदार भी नहीं।'

'एक चौकीदार रखा था । एक रात उसने मुझ पर कातिलाना हमला कर दिया, मैं घायल हो गया और वह दस हजार रुपये लेकर भाग गया ।'

'ओ गॉड! आजकल नौकरों के ईमान का भी तो कोई भरोसा नहीं रहा।'

डॉली गर्म पानी ले आई।
 
राज बूढ़े का घाव साफ करने लगा तो बूढ़े ने उन दोनों को देखते हुए पूछा

'तुम लोग पुणे में कहां रहते हो?'

राज ने जल्दी से कहा 'जी, रहते नहीं । हम लोग हनीमून मनाने आए हैं।'

'डॉली की छाती पर पुंसा-सा लगा |

बूढ़े ने मुस्कराकर कहा 'अच्छा, तुम लोगों की नई-नई शादी हुई है?'

'जी, हां...।'

'कौन-से होटल में निवास करते हो?'

'जी...वह...वह...।'

किसी तरह राज को एक होटल का नाम याद आया और उसने नाम बता दिया ।

बूढ़े ने मुस्कराकर उन दोनों को देखा और बोला-'अब तुम अपना होटल का रिजर्वेशन कैंसिल करा डालो।'

'क्यों...?'

'क्योंकि अब तुम दोनों इसी बंगले में रहोगे।'

डॉली ने हड़बड़ाकर कहा

'नहीं...नहीं, बाबा! आपको ख्वामख्वाह कष्ट होगा।'

'बेटी! मुझे कष्ट होगा कि आराम मिलेगा । मैं यहां अकेला हूं | इस दशा में कौन मेरी देख-रेख करेगा।'

'ज...ज...जी...मगर...'

'और फिर शायद इस तरह मेरी एक बहुत बड़ी भूल का प्रायश्चित भी हो जाए ।'

'कैसी भूल...?' राज ने पट्टी बांधते हुए पूछा

'बूढ़े ने ठंडी सांस ली और विचारपूर्ण स्वर में बोला

_ 'इस लड़की की ही उम्र की मेरी एक बेटी थी | मुम्बई में पढ़ती थी । जहां उसे एक गरीब टैक्सी-ड्राइवर से प्यार हो गया । मुझे अपनी दौलत और अमीरी का बहुत घमण्ड था। 'वह जानती थी कि मैं उन दोनों की शादी नहीं होने दूंगा । इसलिए मेरी बेटी ने एक मंदिर में जाकर उस टैक्सी ड्राइवर से चुपचाप शादी कर ली।'

'ओहो...!'

'संयोगवश मैं उससे मिलने गया था । होस्टल से पता लगाता हुआ मंदिर तक तब पहुंचा, जब दोनों के फेरे हो चुके थे।'

'फिर...?'

'फिर मेरे अंदर का धनवान शैतान जाग उठा | मैं उनके सामने गया तो वे दोनों डर गए । मैंने उनके सिरों पर हाथ फेरकर उन्हें आशीर्वाद दिया और -कि अब शादी तो हो ही चुकी है । मेरा दामाद टैक्सी ड्राइवर ही सही, है तो दामाद!'

कुछ पल रुककर उसने कहा

'मैंने उन लोगों को इस बंगले की चाबियां दी और कहा कि जाओ तुम लोग पुणे में हनीमून मनाना

'फिर...?'

'उन अभागों को नहीं मालूम था कि मैंने अपनी गाड़ी की ब्रेक-ऑयल का ढक्कन ढीला कर दिया है । वे लोग बहुत खुश-खुश गाड़ी लेकर चले और रास्ते में उनकी गाड़ी सैकड़ों फुट गहरे खड्डे में जा गिरी ।'

डॉली और राज सन्नाटे में रह गए।

बूढ़े ने अपनी आंखें खोली और भर्राई हुई आवाज में बोला 'उन दोनों की लाशें और गाड़ी तक नहीं मिली । उसके बाद जब मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ तो मेरी आत्मा तड़प उठी। 'वह मेरी इकलौती बेटी थी, जिसे मैंने अपने झूठे अंहकार की भेंट चढ़ा दिया । मैंने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की । मगर हर बार मुझ अभागे को किसी न किसी ने बचा लिया । जैसे आज तुम दोनों ने बचा लिया ।'
 
Back
Top