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अलादीन और जादुई चिराग की कथा
चीन की राजधानी में मुस्तफा नाम का एक दरजी रहता था। वह गरीब आदमी था और बड़ी कठिनाई से अपने परिवारवालों का पेट भरता था। उस के पुत्र का नाम अलादीन था जो कुछ काम-काज नहीं करता था सिर्फ खेल-कूद में समय बिताता था। माता-पिता की बातों की उपेक्षा कर के सवेरे ही घर से निकल जाता और अपनी ही तरह के आवारा लड़कों के साथ दिन भर खेलता रहता। वह कुछ बड़ा हुआ तो उस के पिता ने उसे अपना काम सिखाने के लिए अपनी दुकान पर बिठाना शुरू किया किंतु न प्यार से न मार से, उसे कुछ भी सिखाया न जा सका। वह पिता की आँख बचा कर दुकान से भाग जाता और दिन भर खेल-कूद में बिता कर शाम को घर लौटता और मार खाता। मुस्तफा बहुत खीझता और परेशान होता कि मेरे मरने के बाद यह क्या करेगा। इसी चिंता में वह बीमार हो गया और कुछ महीनों बाद उस की मृत्यु हो गई।
अलादीन की माँ जानती थी कि अलादीन से दुकान न चल सकेगी इसलिए उस ने दुकान बेच दी और रूई खरीद कर सूत कातने का धंधा करने लगी। बूढ़ी माँ के इस कष्ट का भी अलादीन पर कोई प्रभाव न पड़ा। जब वह उस से कुछ काम करने को कहती तो वह उस से गाली-गलौज और झगड़ा करता। उस का साथ तो आवारा लोगों का था कि वह किसी भले आदमी की बात भी नहीं सुनता था।
कुछ दिन और बीते। अलादीन चौदह वर्ष का हो गया किंतु उस में बिल्कुल बुद्धि न आई, उसे यह विचार तक नहीं आया कि कुछ कमाई करके अपना और माँ का पेट पालना उस का कर्तव्य है। एक दिन वह बाजार में खिलंदड़ापन कर रहा था कि एक परदेशी ने कुछ देर तक उसे गौर से देखा और फिर उस के बारे में पूछताछ की कि यह किसका लड़का है और कहाँ रहता है।
वास्तव में वह परदेशी अफ्रीका का रहनेवाला एक जादूगर था और एक खास उद्देश्य से चीन आया हुआ था। वह जादू के अलावा रमल इत्यादि कई और विद्याएँ भी जानता था। वह जिस काम के लिए आया था उस में सहायता देने के लिए उसे यही लड़का उपयुक्त मालूम हुआ। एक दिन अकेले में अलादीन को पा कर वह बोला, बेटे, तुम मुस्तफा दरजी के लड़के तो नहीं हो? उस ने कहा, हूँ तो, किंतु कई वर्ष पूर्व मेरे पिता का देहांत हो गया है। यह सुन कर अजनबी ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया और खूब प्यार किया और आहें भर कर रोने लगा। अलादीन को इस पर आश्चर्य हुआ और उस ने पूछा कि तुम क्यों रो रहे हो।
जादूगर आहें भरता हुआ बोला, हाय बेटा, क्या कहूँ। तुम्हारा पिता मेरा बड़ा भाई था। मैं कई वर्षों तक देश-विदेश की यात्रा करने के बाद चीन आया हूँ। इस नगर में आने का मेरा उद्देश्य यही था कि मैं अपने बड़े भाई से मिलूँ। मैं इस खयाल से बहुत खुश था और मुझे विश्वास था कि इतने लंबे समय के बाद मुझे देख कर वे भी बड़े प्रसन्न होंगे। तुम्हारे मुँह से उनकी मृत्यु का समाचार सुन कर मुझे ऐसा दुख हुआ है जो कहा नहीं जा सकता। मेरे यहाँ आने का उद्देश्य तो मिट्टी में मिल गया और मार्ग का सारा श्रम वृथा हुआ। अब मेरी भगवान से प्रार्थना है कि तुम्हें लंबी उम्र दे। मैं तुम में तुम्हारे पिता के सारे हाव-भाव और चाल-ढाल देखता हूँ। तुम्हारी सूरत भी उनसे मिलती है, तुम्हें देख कर मुझे बड़ा संतोष होता है। यह कह कर उस ने जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे दे कर कहा, बेटा, तुम्हारी माँ कहाँ रहती है? तुम उन से मेरा सलाम कहना और कहना कि कल अवकाश मिलने पर मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊँगा और फिर उस जगह पर बैठूँगा जहाँ भाई साहब बैठते थे और इस तरह मन को संतोष दूँगा। अलादीन ने उसे अपने घर का पता बता दिया।
जादूगर के जाने के बाद अलादीन माँ के पास पहुँचा और बोला, अम्मा, क्या मेरे कोई चचा भी है। माँ ने इस से इनकार किया तो वह बोला, अभी एक आदमी मुझ से कह रहा था कि मैं तुम्हारा चचा हूँ। जब मैं ने उसे पिताजी के मरने की बात बताई तो वह मुझे गले लगा कर बहुत रोया और उस ने मुझे बहुत प्यार भी किया और पैसे भी दिए। उस ने तुम्हें सलाम कहा है और कहा है कि कल फुरसत मिली तो आऊँगा और उस जगह बैठ कर अपने मन को संतोष दूँगा जहाँ मेरा भाई बैठता था। उस की माँ ने कहा, तुम्हारे पिता का तो एक ही भाई था जो उस के जीवनकाल ही में मर गया। मैं ने तुम्हारे पिता से किसी और भाई के बारे में कुछ नहीं सुना।
दूसरे दिन अलादीन बाजार में अन्य लड़कों के साथ खेल रहा था तो उसे वही जादूगर मिला। उसे गले से लगा कर दो अशर्फियाँ दीं और कहा, इनसे खाद्य सामग्री ले कर अपनी माँ से खाना पकवा रखना, मैं शाम को तुम्हारे घर आऊँगा और हम सब लोग मिल कर भोजन करेंगे। तुम एक बार फिर अपने घर का ठीक-ठीक पता बताओ जिस से मैं शाम को वहाँ पहुँच सकूँ। अलादीन ने समझा कर पूरा पता बता दिया और जादूगर चला गया। अलादीन भी तुरंत अपने घर गया और उस ने अपनी माँ को दो अशर्फियाँ दे कर सारा हाल बताया। उस की माँ बाजार से अच्छी खाद्य सामग्री लाई और पड़ोसियों से पकाने और खाने के लिए अच्छे बरतन उधार माँग कर सारी दोपहर और तीसरे पहर भोजन बनाने में लगी रही।
भोजन तैयार होने पर उस ने अलादीन से कहा, अब शाम हो गई है। तुम्हारा चचा मकान की तलाश में भटक रहा होगा, तुम बाजार जा कर उसे अपने घर ले आओ। अलादीन ने जादूगर को अच्छी तरह घर का पता बताया था फिर भी वह उसे लेने के लिए उठा। किंतु द्वार पर पहुँच कर उसे लगा जैसे कोई दरवाजा खुलवा रहा है। दरवाजा खोलने पर उस ने देखा कि वही जादूगर दो बोतल शराब और कुछ फल हाथों में लिए खड़ा है। उस ने यह चीजें अलादीन को दीं और खुद मकान के अंदर चला गया। उस ने अलादीन की माँ को नम्रतापूर्वक नमस्कार किया और उस से पूछा कि मेरा भाई किस जगह बैठा करता था। उस ने जादूगर को वह जगह दिखा दी।
जादूगर ने वहाँ जा कर सिर झुकाया, फिर उस जगह को कई बार चूमा। इस के बाद वह रोते हुए कहने लगा, हाय हाय, मैं कैसा भाग्यहीन हूँ, भाई साहब। मैं इतनी दूर से यात्रा में तरह-तरह का कष्ट उठा कर यहाँ इसीलिए आया था कि तुम्हारे दर्शन करूँ। किंतु तुम्हारे दर्शन मेरे भाग्य में न थे, तुम पहले ही महायात्रा पर चले गए। अलादीन की माँ ने उसे उसी जगह बैठने को कहा तो वह बोला कि मैं अपने भाई की जगह कैसे बैठ सकता हूँ। अलादीन की माँ ने इस बारे में और आग्रह न किया और कहा, जहाँ जी चाहे बैठो। वह एक जगह बैठ गया और उस ने बातचीत शुरू कर दी।
उस ने कहा, भाभी, तुम्हें आश्चर्य तो हो रहा होगा कि यह कौन है लेकिन मैं तुम्हें सारी बात बताए देता हूँ। मैं इसी नगर में पैदा हुआ था किंतु चालीस वर्ष पूर्व मैं ने यह शहर छोड़ दिया। पहले मैं हिंदोस्तान गया। फिर फारस गया और इस के बाद मिस्र देश। इन महान देशों में कई वर्षों तक रह कर मैं अफ्रीका के बड़े देशों में जा कर रहा। वहाँ मैं ने देखे कि बड़े अच्छे लोग रहते हैं इसलिए मैं वहीं जा कर बस गया। इस के बावजूद मैं अपने जन्मस्थान को नहीं भूला। मुझे परिवारवालों और इष्ट मित्रों की बड़ी याद आती रही, विशेषतः अपने बड़े भाई की। मेरी सदैव आकांक्षा बनी रही कि जा कर उन से मिलूँ इस बार मैं ने अपना कारोबार गुमाश्तों के सुपुर्द कर दिया और लंबी यात्रा करके यहाँ आया तो यह कुसमाचार मिला कि वे परलोकवासी हो गए हैं। इस से मुझे इतना दुख हुआ जिस का मैं वर्णन नहीं कर सकता। कितने दुख की बात है कि मैं ने इतनी लंबी यात्रा के कष्ट उठाए और सब कुछ बेकार गया। खैर, मुझे अलादीन को देख कर तसल्ली हुई। यह मेरे प्रिय भाई की निशानी है। इसीलिए इसे पहली ही बार देख कर समझ लिया कि यह मेरे भतीजे के अलावा और कोई नहीं हो सकता। इस ने तुम्हें यह भी बताया होगा कि इस के पिता की मृत्यु की बात सुन कर मुझे कितना रोना आया था। भगवान को धन्यवाद है कि मैं ने उन के पुत्र को देखा, जैसे उन्हीं को दूसरे रूप में देख लिया।
यह बातें सुन कर अलादीन की माँ का भी जी भर आया और वह अपने पति की याद में फूट-फूट कर रोने लगी। अब जादूगर ने यह बातें छोड़ दीं और अलादीन से पूछा, बेटा, तुम जीविका के लिए क्या करते हो, तुमने कौन-सा धंधा अपनाया है और कौन-सा हुनर सीखा है? अलादीन ने शर्मा कर गर्दन झुका ली। उस की माँ ने कहा, यह बिल्कुल निकम्मा है। इस के पिता ने बहुत कोशिश की कि यह कुछ सीख जाए लेकिन इस ने कुछ न सीखा। इस ने सारा समय खेल-कूद ही में बरबाद किया है। आप ने भी इसे खेलते ही पाया होगा। आप इसे समझाएँ कि कुछ ढंग की बात सीखे और किसी कारआमद काम के सीखने में जी लगाए। इसे अच्छी तरह मालूम है कि इस का बाप कोई जायदाद नहीं छोड़ गया है। इसे यह भी मालूम है कि मैं दिन भर चरखा कातती हूँ और किसी प्रकार रूखी-सूखी का जुगाड़ करती हँ। कई बार मैं ने झुँझला कर चाहा कि इसे घर से निकाल बाहर करूँ ताकि भूखों मरने लगे तो कुछ काम-काज करे। लेकिन अपना ही पैदा किया हुआ बेटा होने की वजह से इस के साथ निर्दयता नहीं कर सकती। यह कह कर बुढ़िया फिर रोने लगी। जादूगर ने अलादीन से कहा, बेटा, क्या तुम्हारी माँ ठीक कह रही है? तुम अब बड़े हो गए हो। तुम्हें चाहिए कि कोई व्यापार करो। जरूरी नहीं है कि कोई एक खास काम ही करो, जिस पेशे में तुम्हारा जी लगता हो वही शुरू करो। तुम अपने मन की बात खुल कर मुझ से कहो, मुझ से जितनी भी हो सकेगी तुम्हारी सहायता करूँगा।
अलादीन इतना सुन कर भी चुप रहा। जादूगर ने फिर कहा, बेटे, अगर तुम चाहते हो कि ऐसा काम करो जिस में धन और प्रतिष्ठा दोनों मिले तो वह बजाजी का काम है। तुम चाहो तो मैं तुम्हें बजाजे की बड़ी दुकान खुलवा दूँ जिस में देश-विदेश के थान और तरह-तरह का कपड़ा हो और तुम उस में आराम से बैठ कर धन कमाओ। मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि तुम अपने मन की बात खुल कर मुझ से करो ताकि मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हारी सहायता कर सकूँ। अलादीन ने इशारे से कहा कि मुझे बजाजी का काम पसंद है और वही करना चाहता हूँ। उस ने देखा था कि कपड़े के व्यापारी बड़ी शान-शौकत से रहते हैं, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते हैं और भाँति-भाँति का स्वादिष्ट भोजन करते हैं। जादूगर ने कहा, अगर तुम्हें यह काम पसंद है तो बड़ी अच्छी बात है। कल मैं तुम्हारे लिए अच्छे कपड़े खरीद दूँगा क्योंकि इन कपड़ों में तुम्हारा व्यापारी समाज में प्रवेश नहीं हो सकेगा। मैं तुम्हारा परिचय एक बड़े व्यापारी से करा दूँगा और एक दुकान तुम्हें किराए पर ले दूँगा।
अलादीन की माँ, जो अब तक उस के अलादीन के चचा होने पर विश्वास न करती थी, उस की बातें सुन कर खुश हो गई। उस ने अलादीन का हाथ उसे पकड़ाया और कहा, अब तुम्हीं इसे राह पर लगाओगे तो लगेगा। यह कह कर उस ने भोजन निकाल कर परोसा और तीनों ने जी भर कर खाना खाया और बाद में मद्य, फल आदि खाए। फिर जादूगर कहने लगा कि अब रात काफी हो गई है, मैं जाता हूँ। कल सुबह फिर आऊँगा।
दूसरे दिन वह फिर आया और अलादीन को उस दुकान में ले गया जहाँ सिले-सिलाऐ कपड़े बिकते थे। उस ने अलादीन से कहा कि तुम्हें इन में से जो भी कपड़े का जोड़ा पसंद हो वह ले लो, मैं उस के दाम दे दूँगा। अलादीन यह सोच कर बहुत खुश हुआ कि उस का चचा उस के लिए यह करने को तैयार है। उस ने एक मूल्यवान जोड़ा पसंद किया। जादूगर ने उसे वह दिलवा दिया और उस से मेल खाते हुए जूते, पटका, पगड़ी आदि भी दिलवा दी। अलादीन ने सारी चीजें पहन लीं और शीशे में अपने को देखा तो बहुत खुश हुआ। फिर जादूगर उसे उस बड़े बाजार में ले गया जहाँ बड़े-बड़े व्यापारियों का व्यवसाय था। उस ने अलादीन से कहा, अगर तुम चाहते हो कि इन लोगों की तरह बनो तो यहाँ अक्सर आया करो और इन लोगों के तौर-तरीके देखा करो। फिर उस ने अलादीन को शाही इमारतें और अन्य दर्शनीय स्थल दिखाए।
इस के बाद वह अलादीन को उस सराय में ले गया जहाँ वह ठहरा था। वहाँ कई व्यापारी भी ठहरे थे जिन से जादूगर ने मित्रता कर ली थी। जादूगर ने अलादीन को उन सब से मिलाया। सब ने एक साथ भोजन किया और सब लोग देर तक बातें करते रहे। शाम हुई तो अलादीन ने घर वापस जाना चाहा। जादूगर ने कहा कि तुम्हारा अकेले जाना ठीक नहीं है, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। यह कह कर वह उसे उस के घर ले आया। अलादीन की माँ ने अपने बेटे को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा तो अति प्रसन्न हुई और जादूगर की बड़ी प्रशंसा करने लगी और कहने लगी कि मेरा बेटा तो नालायक है फिर भी तुम इस पर इतने कृपालु हो। जादूगर बोला, यह अच्छा लड़का है। अच्छी राह चलेगा। कल तो शुक्रवार है, बाजार बंद रहेंगे। परसों मैं इस के लिए दुकान किराए पर लेने और उस में माल रखने का काम करूँगा। कल सभी व्यापारी सैर-तमाशे को जाएँगे। मैं भी इसे बड़े बागों और उत्तम स्थानों की सैर के लिए जाऊँगा।
यह कह कर जादूगर अपनी सराय को वापस चला गया। अलादीन बड़ा खुश था कि उसे शहर के बाहर के बड़े बाग देखने को मिलेंगे। अभी तक उस ने अपने घर के आसपास की गलियाँ और बाजार ही देखे थे और शहर के बाहर के बागों या गाँवों में कभी नहीं गया था। दूसरे दिन सुबह ही से कपड़े पहन कर वह जादूगर की प्रतीक्षा करने लगा। काफी देर तक वह न आया तो अलादीन दरवाजे के बाहर बैठ कर उस की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर में जादूगर आता दिखाई दिया। अलादीन ने घर के अंदर आ कर माँ से कहा कि चचा आ गया है और मैं उस के साथ जा रहा हूँ।
वह आगे बढ़ कर रास्ते ही में जादूगर से मिला। जादूगर ने उस से प्यार से बातें की और कहा कि मैं तुम्हें आज बड़े शानदार भवन और सुंदर उद्यान दिखाऊँगा। दोनों आगे बढ़े और जादूगर ने उसे सारी सुंदर इमारतें और बाग-बगीचे दिखाए। अलादीन उन सब को देख कर बहुत खुश हुआ।
चलते-चलते वे लोग काफी दूर निकल गए और उन्हें थकन महसूस होने लगी। किंतु जादूगर को अपने काम के लिए अलादीन को आगे ले जाना था इसलिए एक जल स्रोत के पास बैठ कर उस ने एक पोटली निकाली जिस में बहुत से स्वादिष्ट फल और कुलचे थे। उस ने आधे कुलचे अलादीन को दिए और कहा कि फल जितने भी चाहो तुम खाओ। इस बीच वह तरह-तरह की उपदेश की बातें भी करता रहा जिस से मालूम हो कि उस से बढ़ कर अलादीन का और कोई हितचिंतक नहीं है। वह कहने लगा, बेटे, देखो अब तुम बड़े हो गए हो। अब तुम्हें बालकों के साथ खेल-कूद करना शोभा नहीं देता। तुम्हें चाहिए कि समझदार लोगों का साथ करो और उन के रंग-ढंग सीखो। उन्हीं की राह पर चलने से तुम्हें मान-प्रतिष्ठा मिलेगी और तुम धनवान भी हो जाओगे। इसी तरह की बहुत-सी बातें उस ने कीं।
नाश्ता करने के बाद जादूगर फिर अलादीन को आगे ले चला और नगर से बहुत दूर पर वे लोग पहुँच गए। अलादीन इतनी दूर कभी भी नहीं आया था। वह थक भी गया था। वह पूछने लगा कि और कितनी दूर जाना है। जादूगर बोला, थोड़ी ही दूर पर ऐसा सुंदर बाग है जिसके आगे अभी तक देखे हुए बाग कुछ भी नहीं हैं। जब तुम उसे देखोगे तो स्वयं ही उस में दौड़ कर चले जाओगे। इसी तरह वह उसे दम-दिलासा देता हुआ बड़ी दूर ले गया। वह उस का जी बहलाने के लिए मनोरंजक कहानियाँ भी कहता जाता था। अंत में वे एक घने जंगल में जा पहुँचे जो दो पर्वतों के बीच में था।
यही वह स्थान था जहाँ वह दुष्ट जादूगर अलादीन को लाना चाहता था। यहीं उस का वह मनोरथ सिद्ध होना था जिसके लिए वह अफ्रीका से यहाँ तक भाँति-भाँति के कष्ट उठा कर आया था। यहाँ पहुँच कर वह बोला, यही वह सुंदर बाग है जिसका मैं ने जिक्र किया था किंतु वह आसानी से दिखाई नहीं देता। उस के लिए तरकीब करनी पड़ती है। आग जला कर उस में सुगंधियाँ डालनी पड़ती हैं। तुम यहाँ सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करो, मैं कहीं से आग ले कर आता हूँ। अलादीन ने लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और जादूगर ने कहीं से आग ला कर उन्हें सुलगाया। वे जलने लगीं तो उस ने कुछ सुगंधित वस्तुएँ आग में छोड़ीं और मंत्र पढ़ा। कुछ देर में भूचाल आया और जहाँ वे खड़े थे वहाँ लगभग एक वर्ग गज का पत्थर दिखाई दिया जिसके बीच में लोहे का एक कड़ा लगा हुआ था।
अलादीन डर कर भागने लगा तो जादूगर ने उसे पकड़ कर जोर से एक तमाचा उस के मुँह पर मारा जिस से उस के दाँतों से खून निकलने लगा। अलादीन रो कर कहने लगा, मैं ने क्या अपराध किया जिस पर आप ने मुझे मारा? जादूगर उसे पुचकारते हुए बोला, मैं तुम्हारे पिता की जगह हूँ।
मैं ने बगैर बात भी तुम्हें मार दिया तो क्या हुआ। मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही यह सब कर रहा हूँ जिस से तुम बड़े आदमी बनो और तुम इसी से भाग रहे हो। अब मैं जैसा कहता जाऊँ वैसा ही करते चलो। इस से तुम्हारा लाभ ही लाभ होगा। इसी प्रकार उस ने बहुत कुछ दिलासा देने के लिए कहा, जिस से अलादीन आश्वस्त हो गया। जादूगर ने उसे फिर समझाया, तुमने देखा कि मेरे मंत्र पढ़ने से भूचाल आ गया। अब तुम समझ लो कि इस पत्थर के नीचे एक गुप्त वस्तु तुम्हारे लिए रखी है जिस से तुम अत्यंत धनवान बन जाओगे।
अलादीन ने कहा, वह कैसे होगा? जादूगर बोला, बात यह है कि तुम्हारे अलावा कोई और आदमी उस चीज को हाथ भी नहीं लगा सकता। तुम यह पत्थर उठाओ और जो रास्ता दिखाई दे उस पर चले जाओ। लेकिन पहले मुझ से कुछ जरूरी बातें समझ लो। मैं तुम से यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि वह दुर्लभ वस्तु तुम्हारे ही लिए है। अलादीन ने जादूगर की बातें मानना स्वीकार किया। न करता तो भी कोई रास्ता नहीं था। जादूगर ने उसे फिर प्यार से गले लगाया और कहा, तुम बड़े अच्छे लड़के हो। यह देखो यह एक लोहे का छल्ला है। इसे पहन कर इस शिला को उठाओ तो वह आसानी से उठ आएगी। अलादीन बोला, मैं इसे अकेला कैसे उठाऊँगा, आप भी हाथ लगाएँ। जादूगर बोला, अगर मैं इसे हाथ लगा पाता तो खुद ही उठा लेता, तुम से उठाने को क्यों कहता। यह सब मंत्रों की बात है, तुम नहीं समझ सकोगे। तुम भगवान का नाम ले कर उठाओ तो, यह तुरंत उठ जाएगी।
अलादीन ने कड़े को पकड़ कर जोर लगाया तो शिला बगैर दिक्कत के उठ आई। नीचे तीन-चार हाथ गहरा गढ़ा जो नीचे गई थीं। जादूगर ने अलादीन से कहा, बेटे, अब जो कुछ मैं कहूँ उसे ध्यान से सुनना और याद रखना। जब तुम इस सीढ़ी से नीचे उतरोगे तो आगे जा कर एक बड़ा सुंदर भवन मिलेगा। उस में तीन समानांतर दालान हैं। वहाँ कई ताँबे की देगें रखी हैं। उनमें अशर्फियाँ और रुपए भरे हैं। लेकिन तुम उन्हें हाथ न लगाना क्योंकि आगे तुम्हारे लिए इस से भी अच्छी चीज मिलेगी। जब तुम पहले दालान में जाओ तो अपने कपड़ों को कस कर अपने बदन से बाँध लेना। दूसरे और तीसरे दालान में भी इसी तरह कपड़ों को बदन से कसे हुए प्रवेश करना। खबरदार, दालान की दीवारों से तुम्हारा कोई अंग या तुम्हारा कपड़ा भी नहीं छूना चाहिए। इस बात का सब से पहले ध्यान रखना जरूरी है।
बदन या कपड़ा दीवारों से छुआ तो तुम वहीं भस्म हो जाओगे और तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए रोती-पीटती रह जाएगी।
जब तुम तीसरे दालान से आगे बढ़ोगे तो एक बाग मिलेगा जिस में तरह-तरह से फलदार वृक्ष हैं। तुम उन्हें न छूना। आगे जा कर तुम्हें एक चबूतरा मिलेगा जिस पर पचास सीढ़ियाँ चढ़ कर पहुँचा जाता है। चबूतरे पर एक कमरा है जिसके एक ताक में एक दीया जलता हुआ मिलेगा। तुम उसे उठा कर उस का तेल और बत्ती फेंक देना और उसे सावधानी से कपड़ों के अंदर रख लेना। तुम्हारे कपड़े खराब नहीं होंगे क्योंकि वह जादू का तेल है जो फौरन सूख जायगा। वापसी में तुम पेड़ों से जितने फल ले सको वह भी ले लेना। इस के बाद उसी तरह दालानों की दीवारों से बचते हुए वापस आ जाना। यह कहने के बाद जादूगर ने कुछ सोचा और लोहे का छल्ला जो उस से वापस लिया था उसे फिर दे दिया और कहा, इसे पहने रहोगे तो किसी प्रकार की उलझन में नहीं पड़ोगे। अब तुम बेझिझक इस गढ़े में कूद जाओ और जैसा मैं ने कहा है वैसा करो। इस से हम दोनों ही बड़े धनवान बन जाएँगे। तुम्हें फिर सारी जिंदगी कुछ करने की जरूरत नहीं रहेगी।
अलादीन हिम्मत करके गढ़े में कूद पड़ा। सीढ़ियों से उतर कर वह पहले दालान के सामने पहुँचा। वहाँ उस ने अपने कपड़े को कस कर अपने शरीर से लपेट कर बाँध दिया और डरते-डरते दालान में प्रवेश किया कि कहीं उस का कोई वस्त्र दीवार से न छू जाए। दूसरे और तीसरे दालान को भी उस ने इसी तरह डरते-डरते पार किया और फिर बाग में आ कर चैन की साँस ली। बाग के रास्ते से आगे बढ़ता हुआ वह ऊँचे चबूतरे पर बने कमरे में गया तो देखा एक ताक में एक दीया जल रहा है। उस ने उस का तेल-बत्ती फेंक कर उसे वस्त्रों के अंदर सीने से बाँध लिया। फिर वहाँ से उतर कर बाग के रास्ते वापस आने लगा और वहाँ के पेड़ों के फल तोड़े। वे दूर से तो लाल, पीले, हरे, आदि रंगों के फल लगते थे किंतु खेलने के लिए अपनी जेबों में तथा और जहाँ भी संभव हुआ उस ने यह रत्न भर लिए। उस ने अपनी ढीली आस्तीनों में भी यथासंभव फल भर लिए और कलाइयों के पास आस्तीनों को कस कर बाँध दिया ताकि फल गिर न पड़ें। अब यह हालत हो गई कि अंदर रखे रत्नों के कारण उस के कपड़े चारों ओर से फूल गए। किसी तरह दालान की दीवारों से बचता-बचाता एक-एक कदम सँभाल कर रखता हुआ वह सीढ़ियाँ चढ़ कर गढ़े में पहुँचा। वहाँ जा कर उस ने आवाज दी, चचा, मैं दीया ले कर आ गया हूँ, तुम मुझे हाथ बढ़ा कर बाहर निकालो।
जादूगर ने कहा, बेटा, मैं तुम्हें अभी निकालता हूँ लेकिन पहले तुम मुझे दीया दे दो। अलादीन ने कहा, मैं बाहर आ कर ही दीया निकाल सकता हूँ, इस जगह नहीं निकाल सकता। तुम मुझे बाहर निकालो। जादूगर ने कहा, नहीं, पहले चिराग दो, फिर मैं तुम्हें बाहर निकालूँगा। अब यही बहस शुरू हो गई। अलादीन कहता था कि बाहर निकालो तब चिराग दूँगा, जादूगर कहता था पहले चिराग दो फिर बाहर निकालूँगा। दरअसल अलादीन अपनी कठिनाई बता भी नहीं पा रहा था। चिराग उस ने सीने के पास रख कर उस के चारों ओर फल भर लिए थ। वैसे भी उस की आस्तीनें फलों के भार से फूली हुई थीं और गढ़े में इतनी जगह नहीं थी कि वह फलों (रत्नों) को बाहर निकाल कर सीने के पास से चिराग निकालता। गढ़े में जगह कम होने से उस का दम घुटा जा रहा था और वैसे भी थकावट से उस का बुरा हाल था।
जादूगर की समझ में भी यह बात न आई और वह अलादीन की बातों को उस की जिद समझ कर इतना क्रुद्ध हुआ कि जोर से चिल्लाया, तू मुझे चिराग नहीं देता तो यहीं चिराग को लिए मर जा। यह कह कर उस ने मंत्र पढ़ा जिस से शिला अपने आप उठ कर गढ़े के मुँह पर आ गई और उस के ऊपर मिट्टी भी इस तरह बराबरी से बिछ गई कि शिला का कोई चिह्न ऊपर से नहीं दिखाई देता था। जादूगर को चिराग तो नहीं मिला जिसे पाने के लिए उस ने यह सारा खटराग किया था किंतु उसे यह डर जरूर हुआ कि अलादीन गढ़े में मर जायगा और उस की मौत के लिए उसी को पकड़ा जाएगा। कारण यह था कि अलादीन की माँ रोती-पीटती और कई दूसरे लोगों ने भी उस के साथ अलादीन को वीरान जंगल की ओर जाते देखा था। वह सीधा अपनी सराय में गया और उसी दिन अपना सामान उठा कर अफ्रीका के लिए रवाना हो गया।
चीन की राजधानी में मुस्तफा नाम का एक दरजी रहता था। वह गरीब आदमी था और बड़ी कठिनाई से अपने परिवारवालों का पेट भरता था। उस के पुत्र का नाम अलादीन था जो कुछ काम-काज नहीं करता था सिर्फ खेल-कूद में समय बिताता था। माता-पिता की बातों की उपेक्षा कर के सवेरे ही घर से निकल जाता और अपनी ही तरह के आवारा लड़कों के साथ दिन भर खेलता रहता। वह कुछ बड़ा हुआ तो उस के पिता ने उसे अपना काम सिखाने के लिए अपनी दुकान पर बिठाना शुरू किया किंतु न प्यार से न मार से, उसे कुछ भी सिखाया न जा सका। वह पिता की आँख बचा कर दुकान से भाग जाता और दिन भर खेल-कूद में बिता कर शाम को घर लौटता और मार खाता। मुस्तफा बहुत खीझता और परेशान होता कि मेरे मरने के बाद यह क्या करेगा। इसी चिंता में वह बीमार हो गया और कुछ महीनों बाद उस की मृत्यु हो गई।
अलादीन की माँ जानती थी कि अलादीन से दुकान न चल सकेगी इसलिए उस ने दुकान बेच दी और रूई खरीद कर सूत कातने का धंधा करने लगी। बूढ़ी माँ के इस कष्ट का भी अलादीन पर कोई प्रभाव न पड़ा। जब वह उस से कुछ काम करने को कहती तो वह उस से गाली-गलौज और झगड़ा करता। उस का साथ तो आवारा लोगों का था कि वह किसी भले आदमी की बात भी नहीं सुनता था।
कुछ दिन और बीते। अलादीन चौदह वर्ष का हो गया किंतु उस में बिल्कुल बुद्धि न आई, उसे यह विचार तक नहीं आया कि कुछ कमाई करके अपना और माँ का पेट पालना उस का कर्तव्य है। एक दिन वह बाजार में खिलंदड़ापन कर रहा था कि एक परदेशी ने कुछ देर तक उसे गौर से देखा और फिर उस के बारे में पूछताछ की कि यह किसका लड़का है और कहाँ रहता है।
वास्तव में वह परदेशी अफ्रीका का रहनेवाला एक जादूगर था और एक खास उद्देश्य से चीन आया हुआ था। वह जादू के अलावा रमल इत्यादि कई और विद्याएँ भी जानता था। वह जिस काम के लिए आया था उस में सहायता देने के लिए उसे यही लड़का उपयुक्त मालूम हुआ। एक दिन अकेले में अलादीन को पा कर वह बोला, बेटे, तुम मुस्तफा दरजी के लड़के तो नहीं हो? उस ने कहा, हूँ तो, किंतु कई वर्ष पूर्व मेरे पिता का देहांत हो गया है। यह सुन कर अजनबी ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया और खूब प्यार किया और आहें भर कर रोने लगा। अलादीन को इस पर आश्चर्य हुआ और उस ने पूछा कि तुम क्यों रो रहे हो।
जादूगर आहें भरता हुआ बोला, हाय बेटा, क्या कहूँ। तुम्हारा पिता मेरा बड़ा भाई था। मैं कई वर्षों तक देश-विदेश की यात्रा करने के बाद चीन आया हूँ। इस नगर में आने का मेरा उद्देश्य यही था कि मैं अपने बड़े भाई से मिलूँ। मैं इस खयाल से बहुत खुश था और मुझे विश्वास था कि इतने लंबे समय के बाद मुझे देख कर वे भी बड़े प्रसन्न होंगे। तुम्हारे मुँह से उनकी मृत्यु का समाचार सुन कर मुझे ऐसा दुख हुआ है जो कहा नहीं जा सकता। मेरे यहाँ आने का उद्देश्य तो मिट्टी में मिल गया और मार्ग का सारा श्रम वृथा हुआ। अब मेरी भगवान से प्रार्थना है कि तुम्हें लंबी उम्र दे। मैं तुम में तुम्हारे पिता के सारे हाव-भाव और चाल-ढाल देखता हूँ। तुम्हारी सूरत भी उनसे मिलती है, तुम्हें देख कर मुझे बड़ा संतोष होता है। यह कह कर उस ने जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे दे कर कहा, बेटा, तुम्हारी माँ कहाँ रहती है? तुम उन से मेरा सलाम कहना और कहना कि कल अवकाश मिलने पर मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊँगा और फिर उस जगह पर बैठूँगा जहाँ भाई साहब बैठते थे और इस तरह मन को संतोष दूँगा। अलादीन ने उसे अपने घर का पता बता दिया।
जादूगर के जाने के बाद अलादीन माँ के पास पहुँचा और बोला, अम्मा, क्या मेरे कोई चचा भी है। माँ ने इस से इनकार किया तो वह बोला, अभी एक आदमी मुझ से कह रहा था कि मैं तुम्हारा चचा हूँ। जब मैं ने उसे पिताजी के मरने की बात बताई तो वह मुझे गले लगा कर बहुत रोया और उस ने मुझे बहुत प्यार भी किया और पैसे भी दिए। उस ने तुम्हें सलाम कहा है और कहा है कि कल फुरसत मिली तो आऊँगा और उस जगह बैठ कर अपने मन को संतोष दूँगा जहाँ मेरा भाई बैठता था। उस की माँ ने कहा, तुम्हारे पिता का तो एक ही भाई था जो उस के जीवनकाल ही में मर गया। मैं ने तुम्हारे पिता से किसी और भाई के बारे में कुछ नहीं सुना।
दूसरे दिन अलादीन बाजार में अन्य लड़कों के साथ खेल रहा था तो उसे वही जादूगर मिला। उसे गले से लगा कर दो अशर्फियाँ दीं और कहा, इनसे खाद्य सामग्री ले कर अपनी माँ से खाना पकवा रखना, मैं शाम को तुम्हारे घर आऊँगा और हम सब लोग मिल कर भोजन करेंगे। तुम एक बार फिर अपने घर का ठीक-ठीक पता बताओ जिस से मैं शाम को वहाँ पहुँच सकूँ। अलादीन ने समझा कर पूरा पता बता दिया और जादूगर चला गया। अलादीन भी तुरंत अपने घर गया और उस ने अपनी माँ को दो अशर्फियाँ दे कर सारा हाल बताया। उस की माँ बाजार से अच्छी खाद्य सामग्री लाई और पड़ोसियों से पकाने और खाने के लिए अच्छे बरतन उधार माँग कर सारी दोपहर और तीसरे पहर भोजन बनाने में लगी रही।
भोजन तैयार होने पर उस ने अलादीन से कहा, अब शाम हो गई है। तुम्हारा चचा मकान की तलाश में भटक रहा होगा, तुम बाजार जा कर उसे अपने घर ले आओ। अलादीन ने जादूगर को अच्छी तरह घर का पता बताया था फिर भी वह उसे लेने के लिए उठा। किंतु द्वार पर पहुँच कर उसे लगा जैसे कोई दरवाजा खुलवा रहा है। दरवाजा खोलने पर उस ने देखा कि वही जादूगर दो बोतल शराब और कुछ फल हाथों में लिए खड़ा है। उस ने यह चीजें अलादीन को दीं और खुद मकान के अंदर चला गया। उस ने अलादीन की माँ को नम्रतापूर्वक नमस्कार किया और उस से पूछा कि मेरा भाई किस जगह बैठा करता था। उस ने जादूगर को वह जगह दिखा दी।
जादूगर ने वहाँ जा कर सिर झुकाया, फिर उस जगह को कई बार चूमा। इस के बाद वह रोते हुए कहने लगा, हाय हाय, मैं कैसा भाग्यहीन हूँ, भाई साहब। मैं इतनी दूर से यात्रा में तरह-तरह का कष्ट उठा कर यहाँ इसीलिए आया था कि तुम्हारे दर्शन करूँ। किंतु तुम्हारे दर्शन मेरे भाग्य में न थे, तुम पहले ही महायात्रा पर चले गए। अलादीन की माँ ने उसे उसी जगह बैठने को कहा तो वह बोला कि मैं अपने भाई की जगह कैसे बैठ सकता हूँ। अलादीन की माँ ने इस बारे में और आग्रह न किया और कहा, जहाँ जी चाहे बैठो। वह एक जगह बैठ गया और उस ने बातचीत शुरू कर दी।
उस ने कहा, भाभी, तुम्हें आश्चर्य तो हो रहा होगा कि यह कौन है लेकिन मैं तुम्हें सारी बात बताए देता हूँ। मैं इसी नगर में पैदा हुआ था किंतु चालीस वर्ष पूर्व मैं ने यह शहर छोड़ दिया। पहले मैं हिंदोस्तान गया। फिर फारस गया और इस के बाद मिस्र देश। इन महान देशों में कई वर्षों तक रह कर मैं अफ्रीका के बड़े देशों में जा कर रहा। वहाँ मैं ने देखे कि बड़े अच्छे लोग रहते हैं इसलिए मैं वहीं जा कर बस गया। इस के बावजूद मैं अपने जन्मस्थान को नहीं भूला। मुझे परिवारवालों और इष्ट मित्रों की बड़ी याद आती रही, विशेषतः अपने बड़े भाई की। मेरी सदैव आकांक्षा बनी रही कि जा कर उन से मिलूँ इस बार मैं ने अपना कारोबार गुमाश्तों के सुपुर्द कर दिया और लंबी यात्रा करके यहाँ आया तो यह कुसमाचार मिला कि वे परलोकवासी हो गए हैं। इस से मुझे इतना दुख हुआ जिस का मैं वर्णन नहीं कर सकता। कितने दुख की बात है कि मैं ने इतनी लंबी यात्रा के कष्ट उठाए और सब कुछ बेकार गया। खैर, मुझे अलादीन को देख कर तसल्ली हुई। यह मेरे प्रिय भाई की निशानी है। इसीलिए इसे पहली ही बार देख कर समझ लिया कि यह मेरे भतीजे के अलावा और कोई नहीं हो सकता। इस ने तुम्हें यह भी बताया होगा कि इस के पिता की मृत्यु की बात सुन कर मुझे कितना रोना आया था। भगवान को धन्यवाद है कि मैं ने उन के पुत्र को देखा, जैसे उन्हीं को दूसरे रूप में देख लिया।
यह बातें सुन कर अलादीन की माँ का भी जी भर आया और वह अपने पति की याद में फूट-फूट कर रोने लगी। अब जादूगर ने यह बातें छोड़ दीं और अलादीन से पूछा, बेटा, तुम जीविका के लिए क्या करते हो, तुमने कौन-सा धंधा अपनाया है और कौन-सा हुनर सीखा है? अलादीन ने शर्मा कर गर्दन झुका ली। उस की माँ ने कहा, यह बिल्कुल निकम्मा है। इस के पिता ने बहुत कोशिश की कि यह कुछ सीख जाए लेकिन इस ने कुछ न सीखा। इस ने सारा समय खेल-कूद ही में बरबाद किया है। आप ने भी इसे खेलते ही पाया होगा। आप इसे समझाएँ कि कुछ ढंग की बात सीखे और किसी कारआमद काम के सीखने में जी लगाए। इसे अच्छी तरह मालूम है कि इस का बाप कोई जायदाद नहीं छोड़ गया है। इसे यह भी मालूम है कि मैं दिन भर चरखा कातती हूँ और किसी प्रकार रूखी-सूखी का जुगाड़ करती हँ। कई बार मैं ने झुँझला कर चाहा कि इसे घर से निकाल बाहर करूँ ताकि भूखों मरने लगे तो कुछ काम-काज करे। लेकिन अपना ही पैदा किया हुआ बेटा होने की वजह से इस के साथ निर्दयता नहीं कर सकती। यह कह कर बुढ़िया फिर रोने लगी। जादूगर ने अलादीन से कहा, बेटा, क्या तुम्हारी माँ ठीक कह रही है? तुम अब बड़े हो गए हो। तुम्हें चाहिए कि कोई व्यापार करो। जरूरी नहीं है कि कोई एक खास काम ही करो, जिस पेशे में तुम्हारा जी लगता हो वही शुरू करो। तुम अपने मन की बात खुल कर मुझ से कहो, मुझ से जितनी भी हो सकेगी तुम्हारी सहायता करूँगा।
अलादीन इतना सुन कर भी चुप रहा। जादूगर ने फिर कहा, बेटे, अगर तुम चाहते हो कि ऐसा काम करो जिस में धन और प्रतिष्ठा दोनों मिले तो वह बजाजी का काम है। तुम चाहो तो मैं तुम्हें बजाजे की बड़ी दुकान खुलवा दूँ जिस में देश-विदेश के थान और तरह-तरह का कपड़ा हो और तुम उस में आराम से बैठ कर धन कमाओ। मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि तुम अपने मन की बात खुल कर मुझ से करो ताकि मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हारी सहायता कर सकूँ। अलादीन ने इशारे से कहा कि मुझे बजाजी का काम पसंद है और वही करना चाहता हूँ। उस ने देखा था कि कपड़े के व्यापारी बड़ी शान-शौकत से रहते हैं, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते हैं और भाँति-भाँति का स्वादिष्ट भोजन करते हैं। जादूगर ने कहा, अगर तुम्हें यह काम पसंद है तो बड़ी अच्छी बात है। कल मैं तुम्हारे लिए अच्छे कपड़े खरीद दूँगा क्योंकि इन कपड़ों में तुम्हारा व्यापारी समाज में प्रवेश नहीं हो सकेगा। मैं तुम्हारा परिचय एक बड़े व्यापारी से करा दूँगा और एक दुकान तुम्हें किराए पर ले दूँगा।
अलादीन की माँ, जो अब तक उस के अलादीन के चचा होने पर विश्वास न करती थी, उस की बातें सुन कर खुश हो गई। उस ने अलादीन का हाथ उसे पकड़ाया और कहा, अब तुम्हीं इसे राह पर लगाओगे तो लगेगा। यह कह कर उस ने भोजन निकाल कर परोसा और तीनों ने जी भर कर खाना खाया और बाद में मद्य, फल आदि खाए। फिर जादूगर कहने लगा कि अब रात काफी हो गई है, मैं जाता हूँ। कल सुबह फिर आऊँगा।
दूसरे दिन वह फिर आया और अलादीन को उस दुकान में ले गया जहाँ सिले-सिलाऐ कपड़े बिकते थे। उस ने अलादीन से कहा कि तुम्हें इन में से जो भी कपड़े का जोड़ा पसंद हो वह ले लो, मैं उस के दाम दे दूँगा। अलादीन यह सोच कर बहुत खुश हुआ कि उस का चचा उस के लिए यह करने को तैयार है। उस ने एक मूल्यवान जोड़ा पसंद किया। जादूगर ने उसे वह दिलवा दिया और उस से मेल खाते हुए जूते, पटका, पगड़ी आदि भी दिलवा दी। अलादीन ने सारी चीजें पहन लीं और शीशे में अपने को देखा तो बहुत खुश हुआ। फिर जादूगर उसे उस बड़े बाजार में ले गया जहाँ बड़े-बड़े व्यापारियों का व्यवसाय था। उस ने अलादीन से कहा, अगर तुम चाहते हो कि इन लोगों की तरह बनो तो यहाँ अक्सर आया करो और इन लोगों के तौर-तरीके देखा करो। फिर उस ने अलादीन को शाही इमारतें और अन्य दर्शनीय स्थल दिखाए।
इस के बाद वह अलादीन को उस सराय में ले गया जहाँ वह ठहरा था। वहाँ कई व्यापारी भी ठहरे थे जिन से जादूगर ने मित्रता कर ली थी। जादूगर ने अलादीन को उन सब से मिलाया। सब ने एक साथ भोजन किया और सब लोग देर तक बातें करते रहे। शाम हुई तो अलादीन ने घर वापस जाना चाहा। जादूगर ने कहा कि तुम्हारा अकेले जाना ठीक नहीं है, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। यह कह कर वह उसे उस के घर ले आया। अलादीन की माँ ने अपने बेटे को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा तो अति प्रसन्न हुई और जादूगर की बड़ी प्रशंसा करने लगी और कहने लगी कि मेरा बेटा तो नालायक है फिर भी तुम इस पर इतने कृपालु हो। जादूगर बोला, यह अच्छा लड़का है। अच्छी राह चलेगा। कल तो शुक्रवार है, बाजार बंद रहेंगे। परसों मैं इस के लिए दुकान किराए पर लेने और उस में माल रखने का काम करूँगा। कल सभी व्यापारी सैर-तमाशे को जाएँगे। मैं भी इसे बड़े बागों और उत्तम स्थानों की सैर के लिए जाऊँगा।
यह कह कर जादूगर अपनी सराय को वापस चला गया। अलादीन बड़ा खुश था कि उसे शहर के बाहर के बड़े बाग देखने को मिलेंगे। अभी तक उस ने अपने घर के आसपास की गलियाँ और बाजार ही देखे थे और शहर के बाहर के बागों या गाँवों में कभी नहीं गया था। दूसरे दिन सुबह ही से कपड़े पहन कर वह जादूगर की प्रतीक्षा करने लगा। काफी देर तक वह न आया तो अलादीन दरवाजे के बाहर बैठ कर उस की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर में जादूगर आता दिखाई दिया। अलादीन ने घर के अंदर आ कर माँ से कहा कि चचा आ गया है और मैं उस के साथ जा रहा हूँ।
वह आगे बढ़ कर रास्ते ही में जादूगर से मिला। जादूगर ने उस से प्यार से बातें की और कहा कि मैं तुम्हें आज बड़े शानदार भवन और सुंदर उद्यान दिखाऊँगा। दोनों आगे बढ़े और जादूगर ने उसे सारी सुंदर इमारतें और बाग-बगीचे दिखाए। अलादीन उन सब को देख कर बहुत खुश हुआ।
चलते-चलते वे लोग काफी दूर निकल गए और उन्हें थकन महसूस होने लगी। किंतु जादूगर को अपने काम के लिए अलादीन को आगे ले जाना था इसलिए एक जल स्रोत के पास बैठ कर उस ने एक पोटली निकाली जिस में बहुत से स्वादिष्ट फल और कुलचे थे। उस ने आधे कुलचे अलादीन को दिए और कहा कि फल जितने भी चाहो तुम खाओ। इस बीच वह तरह-तरह की उपदेश की बातें भी करता रहा जिस से मालूम हो कि उस से बढ़ कर अलादीन का और कोई हितचिंतक नहीं है। वह कहने लगा, बेटे, देखो अब तुम बड़े हो गए हो। अब तुम्हें बालकों के साथ खेल-कूद करना शोभा नहीं देता। तुम्हें चाहिए कि समझदार लोगों का साथ करो और उन के रंग-ढंग सीखो। उन्हीं की राह पर चलने से तुम्हें मान-प्रतिष्ठा मिलेगी और तुम धनवान भी हो जाओगे। इसी तरह की बहुत-सी बातें उस ने कीं।
नाश्ता करने के बाद जादूगर फिर अलादीन को आगे ले चला और नगर से बहुत दूर पर वे लोग पहुँच गए। अलादीन इतनी दूर कभी भी नहीं आया था। वह थक भी गया था। वह पूछने लगा कि और कितनी दूर जाना है। जादूगर बोला, थोड़ी ही दूर पर ऐसा सुंदर बाग है जिसके आगे अभी तक देखे हुए बाग कुछ भी नहीं हैं। जब तुम उसे देखोगे तो स्वयं ही उस में दौड़ कर चले जाओगे। इसी तरह वह उसे दम-दिलासा देता हुआ बड़ी दूर ले गया। वह उस का जी बहलाने के लिए मनोरंजक कहानियाँ भी कहता जाता था। अंत में वे एक घने जंगल में जा पहुँचे जो दो पर्वतों के बीच में था।
यही वह स्थान था जहाँ वह दुष्ट जादूगर अलादीन को लाना चाहता था। यहीं उस का वह मनोरथ सिद्ध होना था जिसके लिए वह अफ्रीका से यहाँ तक भाँति-भाँति के कष्ट उठा कर आया था। यहाँ पहुँच कर वह बोला, यही वह सुंदर बाग है जिसका मैं ने जिक्र किया था किंतु वह आसानी से दिखाई नहीं देता। उस के लिए तरकीब करनी पड़ती है। आग जला कर उस में सुगंधियाँ डालनी पड़ती हैं। तुम यहाँ सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करो, मैं कहीं से आग ले कर आता हूँ। अलादीन ने लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और जादूगर ने कहीं से आग ला कर उन्हें सुलगाया। वे जलने लगीं तो उस ने कुछ सुगंधित वस्तुएँ आग में छोड़ीं और मंत्र पढ़ा। कुछ देर में भूचाल आया और जहाँ वे खड़े थे वहाँ लगभग एक वर्ग गज का पत्थर दिखाई दिया जिसके बीच में लोहे का एक कड़ा लगा हुआ था।
अलादीन डर कर भागने लगा तो जादूगर ने उसे पकड़ कर जोर से एक तमाचा उस के मुँह पर मारा जिस से उस के दाँतों से खून निकलने लगा। अलादीन रो कर कहने लगा, मैं ने क्या अपराध किया जिस पर आप ने मुझे मारा? जादूगर उसे पुचकारते हुए बोला, मैं तुम्हारे पिता की जगह हूँ।
मैं ने बगैर बात भी तुम्हें मार दिया तो क्या हुआ। मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही यह सब कर रहा हूँ जिस से तुम बड़े आदमी बनो और तुम इसी से भाग रहे हो। अब मैं जैसा कहता जाऊँ वैसा ही करते चलो। इस से तुम्हारा लाभ ही लाभ होगा। इसी प्रकार उस ने बहुत कुछ दिलासा देने के लिए कहा, जिस से अलादीन आश्वस्त हो गया। जादूगर ने उसे फिर समझाया, तुमने देखा कि मेरे मंत्र पढ़ने से भूचाल आ गया। अब तुम समझ लो कि इस पत्थर के नीचे एक गुप्त वस्तु तुम्हारे लिए रखी है जिस से तुम अत्यंत धनवान बन जाओगे।
अलादीन ने कहा, वह कैसे होगा? जादूगर बोला, बात यह है कि तुम्हारे अलावा कोई और आदमी उस चीज को हाथ भी नहीं लगा सकता। तुम यह पत्थर उठाओ और जो रास्ता दिखाई दे उस पर चले जाओ। लेकिन पहले मुझ से कुछ जरूरी बातें समझ लो। मैं तुम से यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि वह दुर्लभ वस्तु तुम्हारे ही लिए है। अलादीन ने जादूगर की बातें मानना स्वीकार किया। न करता तो भी कोई रास्ता नहीं था। जादूगर ने उसे फिर प्यार से गले लगाया और कहा, तुम बड़े अच्छे लड़के हो। यह देखो यह एक लोहे का छल्ला है। इसे पहन कर इस शिला को उठाओ तो वह आसानी से उठ आएगी। अलादीन बोला, मैं इसे अकेला कैसे उठाऊँगा, आप भी हाथ लगाएँ। जादूगर बोला, अगर मैं इसे हाथ लगा पाता तो खुद ही उठा लेता, तुम से उठाने को क्यों कहता। यह सब मंत्रों की बात है, तुम नहीं समझ सकोगे। तुम भगवान का नाम ले कर उठाओ तो, यह तुरंत उठ जाएगी।
अलादीन ने कड़े को पकड़ कर जोर लगाया तो शिला बगैर दिक्कत के उठ आई। नीचे तीन-चार हाथ गहरा गढ़ा जो नीचे गई थीं। जादूगर ने अलादीन से कहा, बेटे, अब जो कुछ मैं कहूँ उसे ध्यान से सुनना और याद रखना। जब तुम इस सीढ़ी से नीचे उतरोगे तो आगे जा कर एक बड़ा सुंदर भवन मिलेगा। उस में तीन समानांतर दालान हैं। वहाँ कई ताँबे की देगें रखी हैं। उनमें अशर्फियाँ और रुपए भरे हैं। लेकिन तुम उन्हें हाथ न लगाना क्योंकि आगे तुम्हारे लिए इस से भी अच्छी चीज मिलेगी। जब तुम पहले दालान में जाओ तो अपने कपड़ों को कस कर अपने बदन से बाँध लेना। दूसरे और तीसरे दालान में भी इसी तरह कपड़ों को बदन से कसे हुए प्रवेश करना। खबरदार, दालान की दीवारों से तुम्हारा कोई अंग या तुम्हारा कपड़ा भी नहीं छूना चाहिए। इस बात का सब से पहले ध्यान रखना जरूरी है।
बदन या कपड़ा दीवारों से छुआ तो तुम वहीं भस्म हो जाओगे और तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए रोती-पीटती रह जाएगी।
जब तुम तीसरे दालान से आगे बढ़ोगे तो एक बाग मिलेगा जिस में तरह-तरह से फलदार वृक्ष हैं। तुम उन्हें न छूना। आगे जा कर तुम्हें एक चबूतरा मिलेगा जिस पर पचास सीढ़ियाँ चढ़ कर पहुँचा जाता है। चबूतरे पर एक कमरा है जिसके एक ताक में एक दीया जलता हुआ मिलेगा। तुम उसे उठा कर उस का तेल और बत्ती फेंक देना और उसे सावधानी से कपड़ों के अंदर रख लेना। तुम्हारे कपड़े खराब नहीं होंगे क्योंकि वह जादू का तेल है जो फौरन सूख जायगा। वापसी में तुम पेड़ों से जितने फल ले सको वह भी ले लेना। इस के बाद उसी तरह दालानों की दीवारों से बचते हुए वापस आ जाना। यह कहने के बाद जादूगर ने कुछ सोचा और लोहे का छल्ला जो उस से वापस लिया था उसे फिर दे दिया और कहा, इसे पहने रहोगे तो किसी प्रकार की उलझन में नहीं पड़ोगे। अब तुम बेझिझक इस गढ़े में कूद जाओ और जैसा मैं ने कहा है वैसा करो। इस से हम दोनों ही बड़े धनवान बन जाएँगे। तुम्हें फिर सारी जिंदगी कुछ करने की जरूरत नहीं रहेगी।
अलादीन हिम्मत करके गढ़े में कूद पड़ा। सीढ़ियों से उतर कर वह पहले दालान के सामने पहुँचा। वहाँ उस ने अपने कपड़े को कस कर अपने शरीर से लपेट कर बाँध दिया और डरते-डरते दालान में प्रवेश किया कि कहीं उस का कोई वस्त्र दीवार से न छू जाए। दूसरे और तीसरे दालान को भी उस ने इसी तरह डरते-डरते पार किया और फिर बाग में आ कर चैन की साँस ली। बाग के रास्ते से आगे बढ़ता हुआ वह ऊँचे चबूतरे पर बने कमरे में गया तो देखा एक ताक में एक दीया जल रहा है। उस ने उस का तेल-बत्ती फेंक कर उसे वस्त्रों के अंदर सीने से बाँध लिया। फिर वहाँ से उतर कर बाग के रास्ते वापस आने लगा और वहाँ के पेड़ों के फल तोड़े। वे दूर से तो लाल, पीले, हरे, आदि रंगों के फल लगते थे किंतु खेलने के लिए अपनी जेबों में तथा और जहाँ भी संभव हुआ उस ने यह रत्न भर लिए। उस ने अपनी ढीली आस्तीनों में भी यथासंभव फल भर लिए और कलाइयों के पास आस्तीनों को कस कर बाँध दिया ताकि फल गिर न पड़ें। अब यह हालत हो गई कि अंदर रखे रत्नों के कारण उस के कपड़े चारों ओर से फूल गए। किसी तरह दालान की दीवारों से बचता-बचाता एक-एक कदम सँभाल कर रखता हुआ वह सीढ़ियाँ चढ़ कर गढ़े में पहुँचा। वहाँ जा कर उस ने आवाज दी, चचा, मैं दीया ले कर आ गया हूँ, तुम मुझे हाथ बढ़ा कर बाहर निकालो।
जादूगर ने कहा, बेटा, मैं तुम्हें अभी निकालता हूँ लेकिन पहले तुम मुझे दीया दे दो। अलादीन ने कहा, मैं बाहर आ कर ही दीया निकाल सकता हूँ, इस जगह नहीं निकाल सकता। तुम मुझे बाहर निकालो। जादूगर ने कहा, नहीं, पहले चिराग दो, फिर मैं तुम्हें बाहर निकालूँगा। अब यही बहस शुरू हो गई। अलादीन कहता था कि बाहर निकालो तब चिराग दूँगा, जादूगर कहता था पहले चिराग दो फिर बाहर निकालूँगा। दरअसल अलादीन अपनी कठिनाई बता भी नहीं पा रहा था। चिराग उस ने सीने के पास रख कर उस के चारों ओर फल भर लिए थ। वैसे भी उस की आस्तीनें फलों के भार से फूली हुई थीं और गढ़े में इतनी जगह नहीं थी कि वह फलों (रत्नों) को बाहर निकाल कर सीने के पास से चिराग निकालता। गढ़े में जगह कम होने से उस का दम घुटा जा रहा था और वैसे भी थकावट से उस का बुरा हाल था।
जादूगर की समझ में भी यह बात न आई और वह अलादीन की बातों को उस की जिद समझ कर इतना क्रुद्ध हुआ कि जोर से चिल्लाया, तू मुझे चिराग नहीं देता तो यहीं चिराग को लिए मर जा। यह कह कर उस ने मंत्र पढ़ा जिस से शिला अपने आप उठ कर गढ़े के मुँह पर आ गई और उस के ऊपर मिट्टी भी इस तरह बराबरी से बिछ गई कि शिला का कोई चिह्न ऊपर से नहीं दिखाई देता था। जादूगर को चिराग तो नहीं मिला जिसे पाने के लिए उस ने यह सारा खटराग किया था किंतु उसे यह डर जरूर हुआ कि अलादीन गढ़े में मर जायगा और उस की मौत के लिए उसी को पकड़ा जाएगा। कारण यह था कि अलादीन की माँ रोती-पीटती और कई दूसरे लोगों ने भी उस के साथ अलादीन को वीरान जंगल की ओर जाते देखा था। वह सीधा अपनी सराय में गया और उसी दिन अपना सामान उठा कर अफ्रीका के लिए रवाना हो गया।