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मलिका गुल अनार ने अपनी दासी से आग मँगवाई फिर उसने कहा, तू बाहर जा और कमरे का द्वार बंद कर दे और जब तक मैं न बुलाऊँ यहाँ न आना। दासी के जाने पर उसने एक संदूकचे से एक चंदन का टुकड़ा निकाल कर आग पर डाल दिया और जब उसमें से धुआँ उठने लगा तो वह कोई मंत्र पढ़ने लगी। बादशाह उस मंत्र के शब्द बिल्कुल न समझ सका और आश्चर्यपूर्वक मलिका की ओर देखता रहा। मंत्र ज्यों ही समाप्त हुआ कि समुद्र की सतह ऊँची होने लगा और समुद्र बढ़ते-बढ़ते राजमहल से जा लगा। कुछ देर बाद समुद्र का पानी फट गया और उसमें से एक सुंदर युवक निकला। उसकी मूँछें पानी की तरह हरी थीं। फिर एक शालीन प्रौढ़ महिला निकली जिसके पीछे पाँच सुंदर युवतियाँ थीं।
गुल अनार ने पानी के किनारे खड़े हो कर उन सब का अभिवादन किया। दो-चार क्षणों में वे लोग किनारे आ गए। युवक का नाम सुल्तान सालेह था और वह मलिका गुल अनार का भाई था। प्रौढ़ स्त्री गुल अनार की माँ थी। किनारे पर आ कर सालेह तथा उसकी माँ ने गुल अनार को गले लगाया और उसके मिलने पर आनंद के आँसू बहाए। गुल अनार ने अपने भाई, माँ और उनके साथ आए लोगों का यथोचित आदर-सत्कार किया। उसकी माँ ने कहा, बेटी, तुम्हारे वियोग में हम पर जो कष्ट पड़ा उसके वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। तुम्हारे भाई ने मुझे बताया था कि तुम किसी बात पर रूठ कर घर से निकल गई थीं। हम लोग तो बराबर तुम्हारे लिए रोते रहे। अब तुम बताओ कि तुम इस बीच कहाँ-कहाँ रहीं और तुम पर क्या बीती और यहाँ किस तरह पहुँचीं।
यह सुन कर गुल अनार अपनी माँ के चरणों पर गिर पड़ी। फिर कुछ देर बाद सिर उठा कर बोली, वास्तव में मुझ से बड़ा भारी अपराध हुआ जो आप लोगों को इस प्रकार छोड़ कर चली आई। मुझ पर बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ पड़ीं किंतु अंत में मैं इस सुखद स्थान पर पहुँच गई। यहाँ आ कर मुझे मालूम हुआ कि स्थल के बादशाह भी जल देशों के बादशाहों की तरह होते हैं। अब सालेह ने कहा, प्यारी बहन, जो हुआ सो हुआ। अब तुम हमारे साथ अपने देश को चलो। हम लोग तुम्हें अपने बीच पा कर आनंद से रहेंगे।
ईरान के बादशाह पास ही के एक स्थान से सब कुछ देख-सुन रहा था। वह मन में घबराने लगा कि अगर यह लोग मलिका को ले गए तो मैं तो जीते जी मर जाऊँगा क्योंकि मैं गुल अनार का बिछोह सहन नहीं कर सकता। लेकिन गुल अनार की बातों से उसे धैर्य हुआ। वह बोली, अब मैं यहाँ से कहीं नहीं जा सकती। एक तो यहाँ के बादशाह ने मुझे दस हजार अशर्फियों में खरीदा है, दूसरे उससे मुझे चार महीने का गर्भ है। उसके भाई और माँ ने फिर कुछ नहीं कहा।
गुल अनार ने दासियों को आवाज दे कर सारे मेहमानों के लिए नाना प्रकार के भोजन परसवा दिए। उसने उनसे भोजन करने के लिए कहा। किंतु इस पर उनके चेहरे लाल हो गए और मुँह और नथुनों से आग की लपटें निकलने लगीं। उन्होंने कहा, यह ठीक है कि तुम्हारा पति बादशाह हैं, किंतु क्या हम लोग इतने नीचे हैं कि वह हमारे साथ भोजन भी न करें। बादशाह कुछ दूर बैठा था। उनकी बात तो न सुन सका किंतु उनके मुँह और नथुनों से लपटें निकलते देख कर घबराया। गुल अनार ने उसके पास आ कर कहा, वे लोग चाहते हैं कि आप ही के साथ भोजन करें। अब यही उचित है कि आप उन लोगों के पास चलें और सब से यथायोग्य भेंट करें और सबके साथ भोजन करें। बादशाह ने कहा, मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती है किंतु उनके मुँह और नथुनों से तो आग निकलती है। गुल अनार हँस कर बोली, आप चिंता न करें। इस समय वे सोच रहे हैं कि आपने स्वयं न आ कर उनका अपमान किया है। वे लोग क्रोध में आते हैं तो उनके मुँह और नथुनों से आग निकलने लगती हैं। आप चलेंगे तो उनका क्रोध दूर हो जाएगा। मेरे भाई और माँ का कहना है कि मैं उनके साथ देश चलूँ। किंतु मैं आपके प्रेम में इतनी फँसी हूँ कि आप को छोड़ कर नहीं जा सकती। बादशाह यह सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा, मैं तुम्हारे जाने की बात से बड़ा दुखी था, अब तुम्हारी बात से मुझे ढाँढ़स मिला। मैं तुम्हारी माता और भाई से मिलने अभी चलता हूँ। उन्हें मुझ से कोई शिकायत नहीं रहेगी।
यह कह कर बादशाह गुल अनार के साथ उस मकान में गया जहाँ उसकी सास और साला मौजूद थे। उन लोगों ने बादशाह को देखा तो पृथ्वी से अपने सिरों को लगा कर नमन किया। बादशाह ने उनको एक-एक कर के उठाया और गले लगाया। फिर सब लोग बैठ कर प्रसन्नतापूर्वक बातें करने लगे। सालेह ने कहा, हम सब भगवान को बड़ा धन्यवाद देते हैं कि हमारी बहन बड़े कष्ट उठाने के बाद आप की छत्र छाया में आई और यहाँ बहुत ही प्रसन्न है। भगवान आपको चिरायु करे। बादशाह ने भी अभ्यागतों के स्वागतार्थ विनीत वचन कहे और सब लोग काफी देर तक सानंद बातचीत करते रहें।
रात पड़ने पर बादशाह ने भोजन लाने की आज्ञा दी। सब के साथ भोजन करने के बाद उसने पास के मकान में मेहमानों के लिए कोमल सुखदायी शैय्याएँ बिछवाईं और उनसे आराम करने को कहा। वह स्वयं गुल अनार को साथ ले कर अपने शयन कक्ष में चला गया। कुछ दिन बाद अतिथियों ने जाना चाहा तो बादशाह ने उन्हें आग्रहपूर्वक रोका कि गुल अनार के प्रसव तक तो रुक ही जाओ। वे लोग भी इस बात को सहर्ष मान गए और ईरान का सम्राट रोजाना उनके लिए नए-नए मनोरंजन प्रस्तुत करवाता रहा।
समय आने पर एक दिन गुल अनार प्रसव-पीड़ा से छटपटाने लगी। दूसरे दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र सुंदरता में चंद्रमा के तुल्य था इसलिए उसका नाम बद्र (चंद्रमा) रखा गया। गुल अनार की माँ ने अपने देश के अनुसार भी रस्में कीं और यहाँ के रिवाज के अनुसार छठी का भारी जोड़ा भी दिया। ईरान के सम्राट ने सार्वजनिक उत्सव की आज्ञा दी और देश के सभी निवासियों ने अपने-अपने घरों में राग-रंग का आयोजन किया।
शाही महल में जो उत्सव हुए उनका तो वर्णन ही असंभव है। बादशाह ने खजाने का मुँह खोल दिया और दीन-दुखियों को दान तथा सैनिकों, विद्वानों, कलाविदों आदि को भरपूर पारितोषिक दिए गए।
जब सौर गृहवास के दिन पूरे हो गए तो मलिका गुल अनार को स्नान करवाया गया और बादशाह, सुल्तान सालेह, उसकी माता तथा अन्य संबंधी नवयौवनाएँ बच्चे को देखने के लिए आए। सभी ने उसे उठा कर चूमा और तरह-तरह से प्यार-दुलार किया। सब के बाद सालेह बच्चे की दाई के पास गया और उसकी गोद से बच्चे को ले कर काफी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब लोग इधर-उधर की बातों में लगे थे तो सालेह चुपचाप कमरे के दरवाजों से बाहर निकला और तेजी से समुद्रतट की ओर चला। सब लोग तो इत्मीनान से रहे किंतु बादशाह घबराने लगा। सालेह तेजी से समुद्र तट पर पहुँचा और एक ऊँची जगह से झम से समुद्र में कूद पड़ा।
बादशाह यह देख कर हाय-हाय करने लगा और सिर पीटने लगा। मलिका गुल अनार ने हँस कर उसे धैर्य दिया, बादशाह सलामत, आप परेशान न हों। बच्चे को कुछ भी नहीं होगा। आप देखते तो जाइए। आप उसके पिता हैं तो मैं भी उसकी माँ हूँ, मैं तो कुछ भी चिंता नहीं कर रही।
बादशाह ने पूछा, लेकिन तुम्हारे भाई को यह क्या सूझी? उसने ऐसा क्यों किया? गुल अनार ने कहा, उन्होंने इसलिए यह किया कि बच्चे को हम लोगों की तरह जल और स्थल दोनों में रहने की आदत हो जाय। उसकी माँ तथा अन्य संबंधियों ने भी बादशाह को ऐसे आश्वासन दिए तो उसका चित्त स्थिर हुआ।
कुछ देर बाद समुद्र की सतह पर फिर उथल-पुथल होने लगी और सालेह बद्र को गोद में लिए हुए जल-तरंगों से बाहर आया। फिर वह हवा में उड़ता हुआ महल में आया जहाँ बादशाह और दूसरे लोग बैठे थे। बादशाह को यह देख कर ताज्जुब हुआ कि बच्चा अपने मामा की गोद में सो रहा है। सालेह ने बादशाह से कहा, सरकार, जब मैं आपके बच्चे को ले कर समुद्र में गया था तो आपको डर तो नहीं लगा था? बादशाह ने कहा, भाई, क्या पूछते हो। मेरी तो जान ही निकल गई थी। अब उसे सही-सलामत देख कर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे नए सिरे से जीवन मिला है।
सालेह ने कहा, बच्चे को कुछ हो ही नहीं सकता था। मैंने समुद्र में पैठने के पहले हजरत सुलैमान की अँगूठी पर खुदा महामंत्र इस्मे-आजम पढ़ लिया था। हमारे यहाँ की यह रीति हे कि हम लोगों की नस्ल में कोई बच्चा अगर पृथ्वी पर पैदा होता है तो हम इस्मे-आजम की शक्ति के बल पर उसे जल के अंदर ले जाते हैं। वही मैंने किया। यह कह कर उसने बच्चे को दाई की गोद में दे दिया।
फिर उसने अपने वस्त्रों से एक छोटा संदूकचा निकाला। उसमें से सौ हीरे, जो कबूतर के अंडों के बराबर थे, निकाले। इसके अलावा सौ लाल और नीलम जिनमें प्रत्येक लगभग आधी छटाँक का था निकाले और तीस हार भी नीलम के निकाले और उन्हें बादशाह को दे कर कहा, हमें मालूम न था कि मेरी बहन कितने ऐश्वर्यवान बादशाह को ब्याही है। हमारी यह तुच्छ भेंट स्वीकार करें।
ईरान का बादशाह उन रत्नों को देख कर आश्चर्य में पड़ गया। उनमें दो इतने बड़े थे कि समस्त पृथ्वी पर कहीं न होंगे। उसने हर्षपूर्वक इस भेंट को आँखों से लगाया और सालेह से कहा, भाई, मैं तुम्हारी विनयशीलता से अति प्रभावित हूँ। तुम उन रत्नों को, जिनसे कई राज्य खरीदे जा सकते हैं, तुच्छ भेंट कहते हो। फिर उसने अपनी मलिका से कहा, सुंदरी, तुम्हारे भाई साहब मुझे यह सारे रत्न भेंट में दे रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि इनमें थोड़े-से रख कर शेष उन्हें वापस करूँ। किंतु वे उन्हें लेने को तैयार नहीं हैं। तुम अगर उन पर जोर दो तो वे शायद मान जाएँ। गुल अनार ने उत्तर दिया, हे स्वामी, आप निःशंक हो कर उन्हें स्वीकार करें। इस प्रकार के रत्न पृथ्वी पर कम हैं, किंतु समुद्र में उनकी कोई कमी नहीं है। मेरे भाई को यह सब देने पर भी कोई हानि नहीं होगी। बादशाह यह सुन कर चुप हो गया और उसने वह पूरी भेंट स्वीकार कर ली।
कुछ दिन बाद सालेह ने बादशाह से कहा, आपने हमारा इतना स्वागत-सत्कार किया कि हम आपको यथोचित धन्यवाद नहीं दे सकते। लेकिन हमें यहाँ आए अब बहुत दिन हो गए हैं। मुझे अब अपने राज्य को वापस जाना चाहिए। आप तो जानते ही हैं कि बादशाह की अनुपस्थिति में राज्य-प्रबंध में कुछ न कुछ गड़बड़ पैदा हो जाती है। अतएव हमें अनुमति दीजिए कि हम आप से और बहन से विदा लें और अपने देश को सिधारें। बादशाह ने कहा, तुम्हें जाने देने को जी तो नहीं चाहता लेकिन बात तुम्हारी ठीक है और मैं विवशतापूर्वक तुम्हें विदा दे रहा हूँ। किंतु यह जोर दे कर कहता हूँ कि बद्र को न भूलना और बद्र तथा उसकी माँ को देखने के लिए कभी-कभी यहाँ आते रहना।
अतएव सालेह उससे विदा हो कर अपनी माता और कुटुंबीजनों के साथ अपने देश में गया। इधर सब लोग यथावत रहने लगे। बद्र जैसे-जैसे बड़ा होता रूप और गुण में और भी निखरता जाता और उसके माता-पिता उसके विकास को देख कर प्रसन्न होते। कभी-कभी बद्र का मामा और नानी भी उसे देखने को आते। बद्र कुछ बड़ा हुआ तो उसे विभिन्न विद्याएँ और कलाएँ सिखाने के लिए विद्वान अध्यापक रखे गए। पंद्रह वर्ष की अवस्था में वह सारी विद्याओं और कलाओं में निपुण हो गया। अब उसके पिता ने उसे युवराज घोषित कर के उसके हाथ में राज्य का प्रबंध दे दिया। उसने कुछ ही दिनों में शासन को सुचारु रूप से सँभाल लिया। उसके शासन प्रबंध से कर्मचारी और प्रजा दोनों प्रसन्न हुए। बादशाह ने यह देखा तो एक दिन पूर्व घोषणा के उपरांत अपने हाथ से अपना राजमुकुट उसे पहनाया और उसके सम्मानार्थ उसके हाथ चूमने के बाद वह स्वयं मंत्रियों और अमीरों की पंक्ति में जा बैठा। सामंतों, मंत्रियों आदि ने नए बादशाह को भेंटें दीं और उसकी आज्ञा का पालन करने लगे। राजदरबार से उठ कर जब राजमुकुट लगाए हुए बद्र अपनी माँ के पास गया तो उसने दौड़ कर उसे सीने से लगा लिया।
गुल अनार ने पानी के किनारे खड़े हो कर उन सब का अभिवादन किया। दो-चार क्षणों में वे लोग किनारे आ गए। युवक का नाम सुल्तान सालेह था और वह मलिका गुल अनार का भाई था। प्रौढ़ स्त्री गुल अनार की माँ थी। किनारे पर आ कर सालेह तथा उसकी माँ ने गुल अनार को गले लगाया और उसके मिलने पर आनंद के आँसू बहाए। गुल अनार ने अपने भाई, माँ और उनके साथ आए लोगों का यथोचित आदर-सत्कार किया। उसकी माँ ने कहा, बेटी, तुम्हारे वियोग में हम पर जो कष्ट पड़ा उसके वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। तुम्हारे भाई ने मुझे बताया था कि तुम किसी बात पर रूठ कर घर से निकल गई थीं। हम लोग तो बराबर तुम्हारे लिए रोते रहे। अब तुम बताओ कि तुम इस बीच कहाँ-कहाँ रहीं और तुम पर क्या बीती और यहाँ किस तरह पहुँचीं।
यह सुन कर गुल अनार अपनी माँ के चरणों पर गिर पड़ी। फिर कुछ देर बाद सिर उठा कर बोली, वास्तव में मुझ से बड़ा भारी अपराध हुआ जो आप लोगों को इस प्रकार छोड़ कर चली आई। मुझ पर बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ पड़ीं किंतु अंत में मैं इस सुखद स्थान पर पहुँच गई। यहाँ आ कर मुझे मालूम हुआ कि स्थल के बादशाह भी जल देशों के बादशाहों की तरह होते हैं। अब सालेह ने कहा, प्यारी बहन, जो हुआ सो हुआ। अब तुम हमारे साथ अपने देश को चलो। हम लोग तुम्हें अपने बीच पा कर आनंद से रहेंगे।
ईरान के बादशाह पास ही के एक स्थान से सब कुछ देख-सुन रहा था। वह मन में घबराने लगा कि अगर यह लोग मलिका को ले गए तो मैं तो जीते जी मर जाऊँगा क्योंकि मैं गुल अनार का बिछोह सहन नहीं कर सकता। लेकिन गुल अनार की बातों से उसे धैर्य हुआ। वह बोली, अब मैं यहाँ से कहीं नहीं जा सकती। एक तो यहाँ के बादशाह ने मुझे दस हजार अशर्फियों में खरीदा है, दूसरे उससे मुझे चार महीने का गर्भ है। उसके भाई और माँ ने फिर कुछ नहीं कहा।
गुल अनार ने दासियों को आवाज दे कर सारे मेहमानों के लिए नाना प्रकार के भोजन परसवा दिए। उसने उनसे भोजन करने के लिए कहा। किंतु इस पर उनके चेहरे लाल हो गए और मुँह और नथुनों से आग की लपटें निकलने लगीं। उन्होंने कहा, यह ठीक है कि तुम्हारा पति बादशाह हैं, किंतु क्या हम लोग इतने नीचे हैं कि वह हमारे साथ भोजन भी न करें। बादशाह कुछ दूर बैठा था। उनकी बात तो न सुन सका किंतु उनके मुँह और नथुनों से लपटें निकलते देख कर घबराया। गुल अनार ने उसके पास आ कर कहा, वे लोग चाहते हैं कि आप ही के साथ भोजन करें। अब यही उचित है कि आप उन लोगों के पास चलें और सब से यथायोग्य भेंट करें और सबके साथ भोजन करें। बादशाह ने कहा, मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती है किंतु उनके मुँह और नथुनों से तो आग निकलती है। गुल अनार हँस कर बोली, आप चिंता न करें। इस समय वे सोच रहे हैं कि आपने स्वयं न आ कर उनका अपमान किया है। वे लोग क्रोध में आते हैं तो उनके मुँह और नथुनों से आग निकलने लगती हैं। आप चलेंगे तो उनका क्रोध दूर हो जाएगा। मेरे भाई और माँ का कहना है कि मैं उनके साथ देश चलूँ। किंतु मैं आपके प्रेम में इतनी फँसी हूँ कि आप को छोड़ कर नहीं जा सकती। बादशाह यह सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा, मैं तुम्हारे जाने की बात से बड़ा दुखी था, अब तुम्हारी बात से मुझे ढाँढ़स मिला। मैं तुम्हारी माता और भाई से मिलने अभी चलता हूँ। उन्हें मुझ से कोई शिकायत नहीं रहेगी।
यह कह कर बादशाह गुल अनार के साथ उस मकान में गया जहाँ उसकी सास और साला मौजूद थे। उन लोगों ने बादशाह को देखा तो पृथ्वी से अपने सिरों को लगा कर नमन किया। बादशाह ने उनको एक-एक कर के उठाया और गले लगाया। फिर सब लोग बैठ कर प्रसन्नतापूर्वक बातें करने लगे। सालेह ने कहा, हम सब भगवान को बड़ा धन्यवाद देते हैं कि हमारी बहन बड़े कष्ट उठाने के बाद आप की छत्र छाया में आई और यहाँ बहुत ही प्रसन्न है। भगवान आपको चिरायु करे। बादशाह ने भी अभ्यागतों के स्वागतार्थ विनीत वचन कहे और सब लोग काफी देर तक सानंद बातचीत करते रहें।
रात पड़ने पर बादशाह ने भोजन लाने की आज्ञा दी। सब के साथ भोजन करने के बाद उसने पास के मकान में मेहमानों के लिए कोमल सुखदायी शैय्याएँ बिछवाईं और उनसे आराम करने को कहा। वह स्वयं गुल अनार को साथ ले कर अपने शयन कक्ष में चला गया। कुछ दिन बाद अतिथियों ने जाना चाहा तो बादशाह ने उन्हें आग्रहपूर्वक रोका कि गुल अनार के प्रसव तक तो रुक ही जाओ। वे लोग भी इस बात को सहर्ष मान गए और ईरान का सम्राट रोजाना उनके लिए नए-नए मनोरंजन प्रस्तुत करवाता रहा।
समय आने पर एक दिन गुल अनार प्रसव-पीड़ा से छटपटाने लगी। दूसरे दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र सुंदरता में चंद्रमा के तुल्य था इसलिए उसका नाम बद्र (चंद्रमा) रखा गया। गुल अनार की माँ ने अपने देश के अनुसार भी रस्में कीं और यहाँ के रिवाज के अनुसार छठी का भारी जोड़ा भी दिया। ईरान के सम्राट ने सार्वजनिक उत्सव की आज्ञा दी और देश के सभी निवासियों ने अपने-अपने घरों में राग-रंग का आयोजन किया।
शाही महल में जो उत्सव हुए उनका तो वर्णन ही असंभव है। बादशाह ने खजाने का मुँह खोल दिया और दीन-दुखियों को दान तथा सैनिकों, विद्वानों, कलाविदों आदि को भरपूर पारितोषिक दिए गए।
जब सौर गृहवास के दिन पूरे हो गए तो मलिका गुल अनार को स्नान करवाया गया और बादशाह, सुल्तान सालेह, उसकी माता तथा अन्य संबंधी नवयौवनाएँ बच्चे को देखने के लिए आए। सभी ने उसे उठा कर चूमा और तरह-तरह से प्यार-दुलार किया। सब के बाद सालेह बच्चे की दाई के पास गया और उसकी गोद से बच्चे को ले कर काफी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब लोग इधर-उधर की बातों में लगे थे तो सालेह चुपचाप कमरे के दरवाजों से बाहर निकला और तेजी से समुद्रतट की ओर चला। सब लोग तो इत्मीनान से रहे किंतु बादशाह घबराने लगा। सालेह तेजी से समुद्र तट पर पहुँचा और एक ऊँची जगह से झम से समुद्र में कूद पड़ा।
बादशाह यह देख कर हाय-हाय करने लगा और सिर पीटने लगा। मलिका गुल अनार ने हँस कर उसे धैर्य दिया, बादशाह सलामत, आप परेशान न हों। बच्चे को कुछ भी नहीं होगा। आप देखते तो जाइए। आप उसके पिता हैं तो मैं भी उसकी माँ हूँ, मैं तो कुछ भी चिंता नहीं कर रही।
बादशाह ने पूछा, लेकिन तुम्हारे भाई को यह क्या सूझी? उसने ऐसा क्यों किया? गुल अनार ने कहा, उन्होंने इसलिए यह किया कि बच्चे को हम लोगों की तरह जल और स्थल दोनों में रहने की आदत हो जाय। उसकी माँ तथा अन्य संबंधियों ने भी बादशाह को ऐसे आश्वासन दिए तो उसका चित्त स्थिर हुआ।
कुछ देर बाद समुद्र की सतह पर फिर उथल-पुथल होने लगी और सालेह बद्र को गोद में लिए हुए जल-तरंगों से बाहर आया। फिर वह हवा में उड़ता हुआ महल में आया जहाँ बादशाह और दूसरे लोग बैठे थे। बादशाह को यह देख कर ताज्जुब हुआ कि बच्चा अपने मामा की गोद में सो रहा है। सालेह ने बादशाह से कहा, सरकार, जब मैं आपके बच्चे को ले कर समुद्र में गया था तो आपको डर तो नहीं लगा था? बादशाह ने कहा, भाई, क्या पूछते हो। मेरी तो जान ही निकल गई थी। अब उसे सही-सलामत देख कर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे नए सिरे से जीवन मिला है।
सालेह ने कहा, बच्चे को कुछ हो ही नहीं सकता था। मैंने समुद्र में पैठने के पहले हजरत सुलैमान की अँगूठी पर खुदा महामंत्र इस्मे-आजम पढ़ लिया था। हमारे यहाँ की यह रीति हे कि हम लोगों की नस्ल में कोई बच्चा अगर पृथ्वी पर पैदा होता है तो हम इस्मे-आजम की शक्ति के बल पर उसे जल के अंदर ले जाते हैं। वही मैंने किया। यह कह कर उसने बच्चे को दाई की गोद में दे दिया।
फिर उसने अपने वस्त्रों से एक छोटा संदूकचा निकाला। उसमें से सौ हीरे, जो कबूतर के अंडों के बराबर थे, निकाले। इसके अलावा सौ लाल और नीलम जिनमें प्रत्येक लगभग आधी छटाँक का था निकाले और तीस हार भी नीलम के निकाले और उन्हें बादशाह को दे कर कहा, हमें मालूम न था कि मेरी बहन कितने ऐश्वर्यवान बादशाह को ब्याही है। हमारी यह तुच्छ भेंट स्वीकार करें।
ईरान का बादशाह उन रत्नों को देख कर आश्चर्य में पड़ गया। उनमें दो इतने बड़े थे कि समस्त पृथ्वी पर कहीं न होंगे। उसने हर्षपूर्वक इस भेंट को आँखों से लगाया और सालेह से कहा, भाई, मैं तुम्हारी विनयशीलता से अति प्रभावित हूँ। तुम उन रत्नों को, जिनसे कई राज्य खरीदे जा सकते हैं, तुच्छ भेंट कहते हो। फिर उसने अपनी मलिका से कहा, सुंदरी, तुम्हारे भाई साहब मुझे यह सारे रत्न भेंट में दे रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि इनमें थोड़े-से रख कर शेष उन्हें वापस करूँ। किंतु वे उन्हें लेने को तैयार नहीं हैं। तुम अगर उन पर जोर दो तो वे शायद मान जाएँ। गुल अनार ने उत्तर दिया, हे स्वामी, आप निःशंक हो कर उन्हें स्वीकार करें। इस प्रकार के रत्न पृथ्वी पर कम हैं, किंतु समुद्र में उनकी कोई कमी नहीं है। मेरे भाई को यह सब देने पर भी कोई हानि नहीं होगी। बादशाह यह सुन कर चुप हो गया और उसने वह पूरी भेंट स्वीकार कर ली।
कुछ दिन बाद सालेह ने बादशाह से कहा, आपने हमारा इतना स्वागत-सत्कार किया कि हम आपको यथोचित धन्यवाद नहीं दे सकते। लेकिन हमें यहाँ आए अब बहुत दिन हो गए हैं। मुझे अब अपने राज्य को वापस जाना चाहिए। आप तो जानते ही हैं कि बादशाह की अनुपस्थिति में राज्य-प्रबंध में कुछ न कुछ गड़बड़ पैदा हो जाती है। अतएव हमें अनुमति दीजिए कि हम आप से और बहन से विदा लें और अपने देश को सिधारें। बादशाह ने कहा, तुम्हें जाने देने को जी तो नहीं चाहता लेकिन बात तुम्हारी ठीक है और मैं विवशतापूर्वक तुम्हें विदा दे रहा हूँ। किंतु यह जोर दे कर कहता हूँ कि बद्र को न भूलना और बद्र तथा उसकी माँ को देखने के लिए कभी-कभी यहाँ आते रहना।
अतएव सालेह उससे विदा हो कर अपनी माता और कुटुंबीजनों के साथ अपने देश में गया। इधर सब लोग यथावत रहने लगे। बद्र जैसे-जैसे बड़ा होता रूप और गुण में और भी निखरता जाता और उसके माता-पिता उसके विकास को देख कर प्रसन्न होते। कभी-कभी बद्र का मामा और नानी भी उसे देखने को आते। बद्र कुछ बड़ा हुआ तो उसे विभिन्न विद्याएँ और कलाएँ सिखाने के लिए विद्वान अध्यापक रखे गए। पंद्रह वर्ष की अवस्था में वह सारी विद्याओं और कलाओं में निपुण हो गया। अब उसके पिता ने उसे युवराज घोषित कर के उसके हाथ में राज्य का प्रबंध दे दिया। उसने कुछ ही दिनों में शासन को सुचारु रूप से सँभाल लिया। उसके शासन प्रबंध से कर्मचारी और प्रजा दोनों प्रसन्न हुए। बादशाह ने यह देखा तो एक दिन पूर्व घोषणा के उपरांत अपने हाथ से अपना राजमुकुट उसे पहनाया और उसके सम्मानार्थ उसके हाथ चूमने के बाद वह स्वयं मंत्रियों और अमीरों की पंक्ति में जा बैठा। सामंतों, मंत्रियों आदि ने नए बादशाह को भेंटें दीं और उसकी आज्ञा का पालन करने लगे। राजदरबार से उठ कर जब राजमुकुट लगाए हुए बद्र अपनी माँ के पास गया तो उसने दौड़ कर उसे सीने से लगा लिया।