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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

उसके अगले दिन भी दंड की यह रस्म पूरी की गई, उस दिन भी नगर में सन्नाटा रहा। इसके अगले दिन जुबैनी ने आज्ञा दे कर घोषणा करवाई कि कोई नगर निवासी इन दोनों स्त्रियों को अपने यहाँ शरण न दे वरना खलीफा के द्वारा निर्धारित दंड का भागी होगा। साथ ही आज्ञा दी कि इन दोनों को नगर की सीमा से बाहर कर दिया जाए ताकि यह जहाँ चाहें चली जाएँ। पहले वे दोनों नगर निवासियों के पास ही गईं कि कुछ सहायता लें किंतु सभी को डर था कि खलीफा के आदेश से जुबैनी उन्हें दंड देगा इसलिए जिसके पास जाती वह या तो उन्हें दुतकार कर भगा देता या खुद भाग जाता।

दो-चार जगह यह व्यवहार देख कर गनीम की माँ ने बेटी से कहा, इस शहर में हमें कोई भी व्यक्ति आश्रय नहीं देगा, सभी को अपनी जान की पड़ी है। यहाँ तो शरण क्या, कोई हमें भीख भी नहीं देगा जिससे हम पेट भर सकें। अब इस के अलावा और कोई उपाय नहीं है कि हम किसी अन्य देश में जाएँ। इधर जुबैनी ने कबूतर द्वारा खलीफा के पास संदेश भिजवाया कि आपके आदेश का पालन कर दिया गया। खलीफा ने उसी कबूतर से यह आदेश भिजवाया कि तीन मंजिल (एकदिवसीय यात्रा की दूरी) इधर-उधर तक के गाँवों में मुनादी करा दो कि इन लोगों की कोई आदमी सहायता न करे ताकि इन लोगों को फिर से अपने शहर में आने की कोई संभावना ही न रहे।

जुबैनी ने खलीफा के आदेशानुसार यह मुनादी तो करवा दी किंतु इन दोनों से कह भी दिया कि नए आदेश के अनुसार तुम्हें कोई शरण तीन मंजिलों तक नहीं मिल सकेगी। साथ ही उन दोनों को आधी-आधी अशर्फी भी चुपके से दे दी कि चार-छह दिन तक खाने का प्रबंध कर लें। वे दोनों जुबैनी के दिए कंबल ओढ़ कर ओर गले में पुराने कपड़ों की बनी भीख की झोली डाल कर शहर से निकलीं। रात के समय वे किसी मसजिद में जा कर पड़ी रहतीं और मसजिद न होती तो किसी टूटी-फूटी सराय के कोनों में ठहर जातीं। काफी दूर जाने पर वे एक गाँव में पहुँची। वहाँ किसानों की स्त्रियाँ उनके चारों ओर एकत्र हो गईं और पूछने लगीं कि कौन हो। उन्होंने बताया कि हम लोग खलीफा के आदेशानुसार प्रताड़ित किए गए हैं। स्त्रियों ने पूछा कि खलीफा ने तुम्हें यह दंड क्यों दिया तो उन्होंने पूरा हाल बताया।

किसानों की स्त्रियों को उनकी इस दशा पर बड़ी दया आई। उन्होंने उनके कंबलों को उतरवा कर उन्हें पहनने के लिए अपने कपड़े दिए और उन्हें भोजन कराया। किंतु वे गाँव में क्या करतीं, उन्हें गनीम को भी खोजना था। इसलिए एक दिन आराम करके दूसरे दिन वे वहाँ से चलीं और पूर्ववत माँगते-खाते हुछ दिनों बाद हलब नगर में पहुँचीं। वहाँ दो-चार दिन घूम कर गनीम का पता लगाने की कोशिश की। फिर वहाँ से रवाना हुईं ओर कई दिन के बाद मोसिल नगर पहुँचीं। वहाँ भी कई दिन तक पूछने पर गनीम का पता न चला तो वे दोनों बगदाद की ओर चलीं कि शायद वह उसी नगर में कहीं छुप रहा हो। यद्यपि इन भिखमंगी बनी हुई स्त्रियों को किसी छुपे हुए अपराधी का पता मिलना असंभव था तथापि आशा बलवती होती है। और वही आशा इन्हें द्वार-द्वार भटका रही थी। बेचारियाँ हर एक से गनीम के बारे में पूछतीं और हर जगह से जवाब मिलता कि हमें कुछ नहीं मालूम।

उधर फितना पर क्या बीती यह भी सुनिए। वह बेचारी अपने कारागार की तंग कोठरी में रात-दिन विलाप किया करती। उसी कोठरी से लगा हुआ खलीफा के आवास का आँगन था। वह अक्सर शाम को उस आँगन में टहलता और उसी समय अपनी प्रशासनिक समस्याओं पर विचार किया करता था। एक शाम को वह वहाँ टहल रहा था कि उसे अत्यंत करुण ध्वनि सुनाई दी। वह उसे सुन कर खड़ा हो गया। उसने ध्यान से सुना तो अपनी प्रेयसी फितना की आवाज पहचानी। वह कान लगा कर सुनने लगा। फितना रो-रो कर कह रही थी, अभागे गनीम, तू कहाँ है? तूने मेरी इतनी सेवा की और मेरी भलाई की और उसका बदला यह मिला कि आर्थिक रूप से बिल्कुल बरबाद हो गया। मालूम नहीं तू अब जिंदा है या खलीफा के डर से मर गया।

कुछ देर बाद उसकी आवाज फिर आई, ओ खलीफा हारूँ रशीद, तूने निरपराध गनीम पर ऐसा अत्याचार किया जैसा किसी बादशाह ने किसी पर नहीं किया होगा। क्या तुझे ईश्वर का भय नहीं है? कयामत में जब सारे लोग ईश्वर के समक्ष होंगे और जब उनसे उनके भले-बुरे कामों की पूछताछ की जाएगी उस समय तू अपने इस महाअन्याय का क्या औचित्य देगा? यह कहने के बाद फितना जोरों से विलाप करने लगी। खलीफा यह सुन कर बड़ी चिंता में पड़ा। उसने सोचा कि अगर फितना सच कह रही है और गनीम निर्दोष है तो वास्तव में उस पर और उससे भी अधिक उसकी बहन पर अन्याय हुआ। खलीफा के लिए जो भगवान का प्रतिनिधि होता है ऐसा अन्याय किसी प्रकार उचित नहीं है।

वह अपने कक्ष में गया और वहाँ राजमहल के मुख्य अधिकारी मसरूर को बुलाया और उसे आदेश दिया कि फितना को कैदखाने से निकाल कर मेरे पास ले आओ। मसरूर को फितना से स्नेह था। वह यह आदेश पा कर बड़ा प्रसन्न हुआ और फितना के पास जा कर बोला, सुंदरी, चलो, तुम्हें खलीफा ने बुलाया है। मुझे विश्वास है कि अब तुम कैद से छूट जाओगी। फितना तुरंत ही तैयार हो गई और मसरूर ने उसे खलीफा के सामने पेश कर दिया। खलीफा ने उसे देखते ही पूछा, तुमने यह कैसे कहा कि कयामत में मैं ईश्वर को मुँह नहीं दिखा सकूँगा। मैंने किस निरपराध व्यक्ति को हानि पहुँचाई है? तुम्हें मालूम है कि मैं न्याय के लिए प्रसिद्ध हूँ और किसी पर भी अन्याय नहीं करता न किसी और को अन्याय करने देता हूँ।

फितना समझ गई कि वह अभी जो विलाप कर रही थी उसे खलीफा ने सुन लिया है। वह जमीन से सिर लगा कर बोली, मालिक, मेरे मुँह से कुछ अनुचित निकला हो तो मैं क्षमा चाहती हूँ। यह जरूर कहूँगी कि दमिश्क का व्यापारी गनीम रंचमात्र भी अपराधी नहीं है। उसने मेरे प्राण बचाए और मुझे अपने घर में आराम से रखा। पहले वह मुझे देख कर मेरी ओर आकृष्ट हुआ था किंतु जब उसे मालूम हुआ कि मैं आपकी सेवा में हूँ तो उसका रवैया बिल्कुल बदल गया। उसने मुझ से स्पष्ट कहा कि शासक की संपत्ति प्रजाजन के लिए त्याज्य है। उसके बाद वह मुझसे पवित्र प्रेम करता रहा है, अपना बिस्तर हमेशा दूसरे कमरे में लगवाता रहा है। यह सुन कर खलीफा ने फितना को जमीन से उठाया और कहा कि तुम अपना पूरा हाल बताओ कि मेरी अनुपस्थिति में तुम्हें क्या-क्या अनुभव हुए हैं।

फितना ने आद्योपरांत अपना वृत्तांत सुनाया। खलीफा ने फितना से कहा, तुम्हारी बात के ढंग से लग रहा है कि तुम झूठ नहीं बोल रही हो। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आया कि जब मैं इतने दिनों से आया हुआ हूँ तो तुम अब तक चुप क्यों रही और फिर अपना हाल भेजा भी तो लिख कर भेजा। इस देरी का क्या कारण है? फितना बोली, सरकार, इसका कारण यह है कि एक महीने से अधिक हुआ गनीम अपना तमाम माल-असबाब मेरे सुपुर्द करके बाहर चला गया। इस बीच मेरी किसी आदमी से बात ही नहीं हुई जो आप के आगमन का समाचार देता। बहुत दिनों में अपनी दासी द्वारा आप का समाचार ज्ञात हुआ तो फौरन ही मैंने पत्र भेजा।

खलीफा ने कहा, अब मुझे वास्तव में यह महसूस हो रहा है कि मैंने गनीम और उसकी माँ और बहन के साथ घोर अन्याय किया है। मैं चाहता हूँ कि इस अन्याय का निराकरण करने के लिए उसका कुछ उपकार करूँ। तुम्हारे विचार से मुझे इस दशा में कार्य करने के लिए क्या करना चाहिए। फितना ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि खलीफा का क्रोध दूर हो गया है और वह दया दर्शाना चाहता है। उसने सिर झुका कर कहा, आप यह मुनादी करवा दीजिए कि गनीम का अपराध क्षमा किया गया। वह यह मुनादी सुनेगा तो वापस आ जाएगा। खलीफा ने कहा, ठीक है, मैं ऐसी ही घोषणा करवाए देता हूँ। उसका जो नुकसान हुआ है उससे दुगुना उसे दे दूँगा। और जब वह आएगा तो तुम्हारा विवाह भी उसके साथ कर दूँगा। खलीफा ने यह घोषणा तो करवा दी किंतु उसका कोई फल नहीं हुआ। न गनीम आया न किसी और ने उसका समाचार दिया। इस पर फितना ने खलीफा से कहा कि आप अनुमति दें तो मैं स्वयं गनीम को खोजने निकलूँ। खलीफा ने अनुमति दे दी।

फितना दूसरे दिन सवेरे ही एक तोड़ा अशर्फियों का ले कर निकली। बड़ी मसजिद में जा कर उसने संतों और फकीरों को दान दिया और उनसे अपने मनोरथ की सिद्ध के लिए आशीर्वाद प्राप्त किए। फिर वह जौहरियों के बाजार में गई और एक दलाल से मिली। यह दलाल बहुत ही धर्मप्राण व्यक्ति था और विदेशियों तथा बीमारों को भरसक सहायता किया करता था। इसीलिए कई धनवान व्यक्ति उसके पास पुण्यार्जन के निमित्त धन भेजा करते थे और जिस दीन-दुखी को सहायता चाहिए होती थी वह उसके पास आया करता था।

फितना ने उसे अशर्फियों की थैली दे कर कहा कि इस धन को भी दीन-दुखियों के काम में लगा देना। दलाल ने उसके राजसी वस्त्राभरण देखे तो समझ गया कि यह खलीफा की पत्नी या प्रेयसी है। उसने सिर झुका कर कहा, सुंदरी, मैं तुम्हारी आज्ञा से बाहर नहीं हूँ किंतु अच्छा होगा कि आप अपने हाथों ही से यह पुण्य कार्य करें। आप यदि मेरे घर चलने का कष्ट करें तो बहुत अच्छा रहेगा। मेरे यहाँ दो स्त्रियाँ आई हैं जो अत्यंत दीन दशा में हैं।

वे कल ही इस नगर में आई हैं और यहाँ उनकी कोई जान-पहचान नहीं है। मैंने उन्हें इसलिए अपने घर में ठहराया है कि वे अत्यंत दयनीय दशा में थीं। उनके वस्त्र मैले-कुचैले और फटे-पुराने थे। धूप में चलने के कारण उनका रंग सँवला गया था और भूख-प्यास ने उनके शरीरों को अति दुर्बल कर दिया था और वे हड्डियों का ढाँचा भर रह गई थीं। मैंने उन्हें अपनी पत्नी के सुपुर्द कर दिया कि वह उनकी अच्छी तरह देखभाल करे। मेरी पत्नी ने उन्हें गरम पानी से नहलाया और सुखद शैय्या बिछवा कर उन्हें आराम करने को कहा और पहनने के लिए उचित वस्त्रादि दिए। उनकी ऐसी खराब हालत थी कि मैंने उनसे उनका हाल पूछना ठीक नहीं समझा। अब आप उचित समझें तो मेरे घर पधार कर उनका हाल पूछ लें।

दलाल ने अपने घर का पता बताया तो फितना ने अपना शाही टट्टू तुरंत उस ओर दौड़ा दिया। दलाल भी उसके साथ दौड़ने लगा। फितना ने कहा, आप इस प्रकार न दौड़िए। आप जैसे सज्जन व्यक्ति के साथ मैं यह व्यवहार नहीं करना चाहती। आप अपना एक दास मेरे साथ कर दीजिए और स्वयं बाद में धीरे-धीरे आइए। दलाल ने अपना दास साथ कर दिया और फितना दलाल के घर जा कर सवारी से उतरी। दास ने अंदर जा कर सूचना दी कि एक बादशाही महल की महिला मिलने आई है। दलाल की पत्नी यह सुन कर जल्दी से उठी कि घर के दरवाजे पर जा कर राजमहिषी का स्वागत करे। फितना ने इसका अवसर न दिया। वह स्वयं दास के पीछे-पीछे चल कर जनानखाने में आ गई। दलाल की पत्नी उसके पाँव चूमने को झुकी। फितना ने यह भी न करने दिया। उसका सिर उठा कर वह बोली, महाभागे, मैं उन दो परदेशी स्त्रियों को देखने आई हूँ जो कल आपके घर पर आई हैं। दलाल की पत्नी उसे ले कर आगंतुकाओं की चारपाइयों के पास आ गई।

फितना ने उनके पास जा कर कहा, देवियो, मैं आप लोगों का हाल-चाल पूछने और आपकी सेवा करने के लिए आई हूँ। वे स्त्रियाँ गनीम की माँ और बहन थीं। माँ ने फितना को आशीष दी, भगवान तुम्हें इस सत्कार्य का भरपूर फल दे। हम लोगों पर तो ऐसी आपदा पड़ी है जो कि भगवान शत्रु पर भी न डाले। यह कह कर वह रोने लगी। उसे रोते देख कर फितना और दलाल की पत्नी की आँखों में आँसू आ गए। फिर फितना ने कहा, माताजी, आप कृपया अपना वृत्तांत मुझे बताएँ, मैं भरसक आपकी सहायता करूँगी।

गनीम की माँ ने कहा, बेटी, खलीफा की प्रेयसी फितना हमारे दुर्भाग्य का कारण बन गई है। फितना यह सुन कर भी चुप ही रही और ध्यानपूर्वक प्रौढ़ा की बात ऐसे सुनने लगी जैसे फितना को जानती ही न हो। गनीम की माँ ने कहा, मैं दमिश्क के प्रसिद्ध व्यापारी स्वर्गीय अय्यूब की पत्नी हूँ। मेरा पुत्र गनीम व्यापार के लिए बगदाद आया था। वहाँ उस पर फितना को भगाने का आरोप लगाया गया और खलीफा ने उसके वध की आज्ञा दी। लेकिन वह न मिला तो खलीफा ने दमिश्क के हाकिम को आदेश दिया कि गनीम की माँ और बहन को तीन दिन बीच शहर में कोड़े मारे जाएँ और घर का सामान लुटवा दिया जाए और घर गिरवा कर जमीन के बराबर करवा दिया जाए। हाकिम ने ऐसा ही किया और तीन दिन तक हम माँ-बेटी को पिटवा कर दमिश्क से निकाल दिया। इस सब पर भी हम दोनों को अपने भाग्य से कोई शिकायत नहीं रहेगी अगर मेरा प्यारा बेटा हमें देखने को मिल जाए। खलीफा की प्रेयसी के कारण हम पर और हमारे पुत्र पर जो कुछ अन्याय हुआ है वह हम खुशी से और हमेशा के लिए माफ कर देंगे और हमें उससे पूरी सहानुभूति और पूरा प्यार हो जाएगा अगर हमारा प्यारा गनीम हमें मिल जाए।

फितना बोली, माताजी, मैं ही वह अभागी फितना हूँ जो तुम्हारे दुर्भाग्य का कारण बनी। किंतु मेरे दुर्भाग्य से आप लोगों की जितनी प्रतिष्ठा नष्ट हुई है भगवान चाहेगा तो उस से दुगुनी बनेगी और जो कुछ तुम्हारी धन हानि हुई है उसके बदले कई गुना धन तुम्हें मिलेगा। मेरी बात पर खलीफा ने विश्वास कर लिया है और मुनादी करवा दी है कि गनीम का अपराध क्षमा कर दिया गया और गनीम खलीफा के दरबार में हाजिर हो। माताजी, अब तुम धीरज रखो। खलीफा अब तुम लोगों से कुपित नहीं है। वह गनीम से मिलना चाहता है। वह चाहता है कि जो अन्याय उससे गनीम पर हुआ है उसका पूरा बदला उसे काफी इनाम-इकराम दे कर कर दे। उसने मुझ से यह भी कहा है कि गनीम आएगा तो मैं तेरा विवाह उसके साथ कर दूँगा। आज से तुम मुझे भी अपनी बेटी समझो।

गनीम की माँ यह सुन कर पहले तो स्तंभित रही फिर खुशी के आँसू बहाने लगी। उसने उठ कर फितना को गले लगा लिया और रोने लगी। फितना भी उस से चिमट कर रोने लगी। फिर गनीम की माँ के साथ अलकिंत के पास गई और उसे गले लगा कर प्यार किया। फिर उन दोनों को धीरज बँधाते हुए कहने लगी, यहाँ पर गनीम का जो कुछ धन था उसका नुकसान नहीं हुआ है। वह सुरक्षित है और तुम लोगों को पूरा का पूरा मिलेगा यद्यपि मैं जानती हूँ कि धन से तुम्हारी तसल्ली नहीं होगी क्योंकि तुम गनीम को पाना चाहती हो। भगवान ने चाहा तो वह भी तुम्हें आ मिलेगा। भगवान के लिए कोई बात कठिन नहीं है। जब उसने तुम पर इतनी अनुकंपा की है तो गनीम का तुम से आ मिलना क्या मुश्किल है।

यह लोग यह बातें कर ही रही थीं कि दलाल आ गया और बोला, कुछ देर पहले मैंने देखा कि एक ऊँटवाला एक निर्बल रोगी को कजावे में रस्सी से बाँध कर यहाँ के बड़े औषधालय में लाया है। मैंने और ऊँटवाले ने उसे ऊँट से कजावे समेत उतारा। हमने बहुत कुछ इसका हाल पूछा परंतु उसने रोने के सिवा और कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उसे नितांत शक्तिहीन देखा तो यहाँ ले आया और उसे अपने बगलवाले मकान में उतारा। मैंने उसे साफ कपड़े पहनाए हैं और बाजार से उसके लिए परहेजी खाना मँगवाया है। खाना खा कर शायद उसे बोलने की ताकत आ जाए। फिर उनका हाल पूछ कर एक हकीम को लाऊँगा कि उसका ठीक इलाज हो सके।
 
फितना ने यह सुना तो बोल उठी, महोदय, मुझे भी उस बीमार के पास ले चलिए क्योंकि मैं भी उस रोगी को देखना चाहती हूँ। दलाल फितना को वहाँ ले गया। गनीम की माता ने कहा, इस धर्मात्मा दलाल के पास दूर-दूर से दीन-दुखी आया करते हैं। बेटी, यह रोगी कहीं तुम्हारा भाई ही न हो। फितना जब उस मकान में पहुँची तो देखा कि एक नौजवान मरीज पलंग पर पड़ा है, उसके बदन की हड्डियाँ भर रह गई हैं, उसका चेहरा बिल्कुल पीला और भयानक हो गया है और उसकी आँखों से निरंतर आँसू बह रहे हैं। फिर भी हृदय की भावनाओं ने अनजाने ही जोर मारा तो उसके पास झपट कर पहुँची और गौर से देखा तो पहचाना कि यह गनीम ही है। वह रो कर कहने लगी, हाय गनीम, तुम्हारी यह दशा। गनीम ने आँखें खोलीं और ध्यान से उसे देख कर बोला, अरे सुंदरी, तुम यहाँ। और यह कह कर बेहोश हो गया।

अब दलाल आगे बढ़ा। उसने फितना से कहा, आप अभी यहाँ से हट जाइए। कहीं ऐसा न हो कि आपको देख कर हर्षातिरेक के मारे मर जाए। फितना चली गई तो दलाल ने गुलाबजल छिड़क कर गनीम को सचेत किया और उसे एक शक्तिवर्धक शर्बत पिलाया। वह होश में आया तो चारों ओर देख कर बोला, सुकुमारी, तुम कहाँ हो? तुम वास्तव में मेरे सामने आई थी या मैंने तुम्हें स्वप्न में देखा था? दलाल बोला, यह स्वप्न नहीं, सत्य था। अब मुझे मालूम हुआ कि तुम्हीं गनीम हो। खलीफा ने मुनादी करवाई है कि तुम्हारा अपराध क्षमा किया गया। तुम धैर्य रखो। तुम्हारी साथिन तुम्हें सब कुछ बताएगी। मैं तुम्हारे लिए भरसक प्रयत्न करूँगा।

फिर दलाल दवा आदि के लिए चला गया। इधर फितना गनीम की माँ और बहन के पास गई और उसने दोनों को बताया कि आगंतुक रोगी गनीम ही है। गनीम की माँ वह सुन कर अपनी खुशी न सँभाल सकी और बेहोश हो गई। दलाल भी दवा लेने के पहले किसी काम से वहाँ आया था। फितना और दलाल के प्रयत्न से वह होश में आई और कहने लगी कि मुझे तुरंत मेरे बेटे के पास ले चलो। दलाल ने उसे रोका और कहा, यह ठीक नहीं रहेगा। बहुत कमजोर है। तुम्हारी दशा देख कर उसे दुख होगा और उसकी हालत और खराब हो जाएगी। इसलिए तुम अभी उसके पास न जाओ। माँ ने यह बात मान ली।

फितना ने कहा, माता जी, चिंता न करें। मैं और आप साथ-साथ ही गनीम के पास चलेंगे। मैं इस समय विदा लेती हूँ। महल में जा कर मुझे खलीफा को गनीम के मिलने का समाचार भी देना है। यह कह कर वह खलीफा के महल की ओर चल दी। महल में जा कर उसने खलीफा के पास संदेश भिजवाया कि मैं तुरंत ही आपको एक महत्वपूर्ण संदेश एकांत में देना चाहती हूँ। खलीफा दरबार से उठ कर अंदर आया। फितना ने उसके पाँव चूम कर कहा, सरकार, गनीम और उसकी माँ-बहन सभी मिल गए हैं। खलीफा को यह सुन कर आश्चर्य और हर्ष हुआ। उसने कहा, भाई, तुमने तो कमाल कर दिया। कैसे उन लोगों का पता लगाया? फितना ने दलाल से मिलने और उसके घर जा कर पहले गनीम की माँ-बहन और फिर स्वयं गनीम से मिलने का हाल कहा और बताया कि यद्यपि दोनों महिलाएँ कठिनाइयों के कारण इस समय कृशगात हो रही हैं किंतु बड़ी सुंदर हैं। खलीफा ने मन में निश्चय किया कि उन्हें देखूँगा और उनके सारे अपमान की भरपाई कर दूँगा।

उसने फितना से कहा, मैं तुम्हें गनीम के साथ जरूर ब्याह दूँगा। अब तुम जाओ उन सब को यहाँ लाओ। दूसरे दिन सुबह फितना अधीरतापूर्वक दलाल के घर पहुँची और गनीम का हाल पूछा। दलाल ने कहा, क्षमादान की बात सुन कर उसकी दशा सँभल गई और अब उसे आपके वियोग के अलावा कोई कष्ट नहीं है। हाँ, वह यह लालसा रखता है कि शीघ्रातिशीघ्र आपको और अपनी माँ-बहन को, जिनका उल्लेख मैंने कर दिया है, देखे।

यह सुन कर फितना पहले अकेली ही गनीम के पास गई, उसकी माँ और बहन को उसने कमरे के बाहर ही छोड़ दिया और कहा कि मैं बुलाऊँ तब अंदर आना। फितना के साथ दलाल भी था। उसने कहा, दोस्त, यही वह सुंदरी है जिसे देख कर कल तुम अचेत हो गए थे और बाद में कह रहे थे कि शायद मैंने स्वप्न देखा है। अब इससे अच्छी तरह मिलो। गनीम ने फितना की ओर देखा और कहा, मेरी प्यारी मित्र, पहले तुम यह बताओ कि तुम महल छोड़ कर मुझसे मिलने किस तरह आई। मैं तो समझता हूँ कि खलीफा एक क्षण को भी अपने पास से जाने नहीं देता। उसने तुम्हें कैसे आने दिया? फितना ने कहा कि मैं खलीफा की पूर्ण अनुमति से यहाँ आई हूँ और उसने मुझसे यह भी वादा किया है कि तुम्हारे साथ मेरा विवाह करवा देगा।

गनीम यह सुन कर बहुत खुश हुआ और बोला, तुम सच कहती हो कि खलीफा तुम्हारा मेरे साथ विवाह करा देगा? क्या इतनी सुखदायी बात संभव है? फितना ने कहा, इसमें आश्चर्य की तो बात ही नहीं है। खलीफा ने तुम्हें मरवा देने की जो आज्ञा दी थी वह गलत संदेह के आधार पर थी। जब तुम उसके हाथ न लगे तो उसने दमिश्क के हाकिम को आदेश दिया कि दमिश्कवाला तुम्हारा घर खुदवा कर जमीन के बराबर करवा दिया जाए, तुम्हारी संपत्ति लुटवा दी जाए और तुम्हारी माँ और बहन को तीन दिन तक सड़कों पर कोड़े लगवा कर दमिश्क से निकलवा दिया जाए। बाद में जब उसे मुझ से मालूम हुआ कि उसके सम्मान के ख्याल से तुमने मुझसे संबंध स्थापित नहीं किया था तो वह अपने जल्दबाजी में लिए हुए अन्याय पर लज्जित हुआ और अब सोच रहा है कि जैसे भी हो सके अपने अन्याय का प्रतिकार करे।

गनीम ने विस्तार से अपनी माँ और बहन के बारे में पूछा। फितना ने बताया तो वह रोने लगा। फितना ने कहा, जो हो गया उसे भूल जाओ। अब रोने की जरूरत नहीं, तुम्हारी माँ और बहन यहीं हैं। गनीम ने कहा कि उन्हें अंदर क्यों नहीं लाती? फितना ने बुलाया तो दोनों अंदर दौड़ी आईं और गनीम को गले लगा कर देर तक रोती रहीं। दलाल ने उन सभी को धीरज बँधाया। फिर गनीम ने अपना पूरा हाल बताया। उसने कहा, खलीफा के भय से बगदाद से भाग कर मैं एक गाँव में जा कर छुपा रहा। वहाँ मैं बीमार हो गया। मैं मसजिद में असहाय पड़ा रहता। एक किसान को मुझ पर दया आई और वह मुझे उठा कर अपने घर ले गया। जहाँ तक उससे हो सका उसने मेरी दवा-दारू कराई। किंतु जब मेरा रोग बढ़ता ही गया तो उसने एक ऊँटवाले को किराया दे कर कहा कि इस रोगी को बगदाद के बड़े शफाखाने में पहुँचा दे जहाँ बड़े-बड़े हकीम इसका इलाज करेंगे। ऊँटवाले ने मुझे रस्सियों से कजावे से बाँध दिया क्योंकि मुझ में बैठने की शक्ति भी नहीं थी और मैं ऊँट से गिर जाता। इसके बाद फितना ने सविस्तार अपना हाल बताया कि किस तरह खलीफा ने उसकी काल्पनिक कब्र पर मातम किया, कैसे उसने महल में पत्र भिजवाया, कैसे वह कैद में डाली गई और फिर दुबारा कैसे खलीफा की निगाहों में चढ़ी। गनीम की माँ और बहन ने भी अपना हाल बताया। फिर फितना ने कहा, अब हम सभी को दयामय भगवान को धन्यवाद देना चाहिए कि हम सब पर मुसीबत डाल कर हमें उससे बाहर निकाला।

दो-चार दिन में गनीम का रोग पूर्णतः जाता रहा और फितना ने सोचा कि उसे खलीफा के सामने पेश किया जाए, लेकिन इसके लिए गनीम के पास उपयुक्त वस्त्र मौजूद नहीं थे।

फितना फिर महल में जा कर धन लाई और हजार अशर्फियाँ दलाल को दे कर कहा कि इससे गनीम और उसकी माँ और बहन के लिए राजदरबार में पहने जाने योग्य कपड़े सिलवा दो। दलाल को इन बातों का बहुत ज्ञान था। उसने बढ़िया रेशमी थान खरीदे और तीन दिन के अंदर होशियार दर्जियों से तीनों के लिए कपड़ों के कई जोड़े तैयार करवा दिए।

फिर फितना ने एक दिन खलीफा से इन लोगों की भेंट का निश्चित किया। उस दिन गनीम और उसकी माँ-बहन नए कपड़े पहन कर दलाल के घर में दरबार में बुलाने की प्रतीक्षा करती रहीं। खलीफा के आदेशानुसार मंत्री जाफर बहुत-से सैनिकों और सरदारों के साथ आया और गनीम का हाल-चाल पूछने के बाद उससे कहा कि मैं तुम्हें और तुम्हारी माँ-बहन को खलीफा के महल में ले जाने के लिए आया हूँ। अतएव गनीम एक बढ़िया घोड़े पर सवार हुआ और फितना ने उसकी माँ और बहन को पर्देदार कजावों में ऊँटों पर बिठाया और एक गुप्त मार्ग से दोनों स्त्रियों को महल में ले आई। गनीम को मंत्री अपने साथ बाजारों से होता हुआ लाया और दरबार में ले गया। दरबार पूरी शान से लगा था।

सारे सरदार और राजदूत उपस्थित थे। गनीम ने भूमि को चूम कर खलीफा को प्रणाम किया और खलीफा की प्रशंसा में एक स्वरचित कसीदा पढ़ा जिसकी सभी लोगों ने प्रशंसा की।

खलीफा ने कहा, गनीम, हम तुम्हें देख कर बहुत खुश हुए। हम चाहते हैं कि तुम हमारे सामने विस्तारपूर्वक बताओ कि तुमने हमारी प्रिय दासी के प्राण किस प्रकार बचाए।

गनीम ने वह सारा वृत्तांत सविस्तार सुनाया। खलीफा उसे सुन कर प्रसन्न हुआ और आज्ञा दी कि गनीम को भारी खिलअत (सम्मान, वस्त्राभरण) दी जाए। गनीम ने खिलअत पहन कर फिर सलाम किया और कहा, मालिक मैं चाहता हूँ कि आजीवन आपकी चरणसेवा में लगा रहूँ। खलीफा ने यह स्वीकार कर लिया और उसे अपना दरबारी बनाने के साथ एक उच्च पद पर आसीन भी कर दिया। इसके बाद वह दरबार खत्म करके महल में आ गया।

महल में आ कर उसने मंत्री को बुलाया और कहा कि गनीम को यहाँ ले आओ। उसने फितना को भी बुलाया और उससे कहा कि गनीम की माँ और बहन को यहीं ले आओ। दोनों स्त्रियों ने भूमिचुंबन करके खलीफा का अभिवादन किया। खलीफा ने कहा, मैंने तुम दोनों को बड़ा कष्ट दिया है किंतु अब उस की पूरी भरपाई कर दूँगा। जुबैदा ने फितना से जलन होने के कारण उसके साथ कमीनी हरकत की। उसका दंड यह है कि उसकी यह जलन और बढ़े। मैं गनीम की बहन से विवाह करूँगा। और उसे रानी का पद दूँगा जिससे वह जुबैदा के अधीन न रहे। गनीम की माँ, तुम्हारी उम्र अभी अधिक नहीं हुई, तुम हमारे मंत्री जाफर से विवाह कर लो। गनीम, तुम्हें फितना से प्रेम है और मैं इसका विवाह तुम्हारे साथ कराऊँगा। यह कह कर खलीफा ने काजी और गवाहों को बुलाया और तीनों निकाह वहीं पढ़वा दिए। गनीम इसी बात को बहुत समझता कि अलकिंत खलीफा की दासी बन जाए, किंतु खलीफा ने उसे रानी का दरजा दे दिया। इस पर गनीम फूला न समाया। खलीफा ने यह भी आज्ञा दी कि यह सारा वृत्तांत लिखवा कर शाही ग्रंथागार में रखा जाए और उसकी नकलें सारे बड़े देशों को भेजी जाएँ।

मलिका शहरजाद ने गनीम और फितना की कहानी समाप्त की तो दुनियाजाद ने इसकी बड़ी तारीफ की। शहरजाद ने कहा कि अगली कहानी इससे भी अच्छी है। शहरयार ने कहा, मैं भी अगली कहानी सुनना चाहता हूँ, लेकिन अब दिन निकल आया है। अगली कहानी कल सुनाना।
 
पुराने जमाने में बसरा में एक बड़ा ऐश्वर्यवान और न्यायप्रिय बादशाह राज करता था। उसे सबकुछ प्राप्त था किंतु उसे बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई जिससे वह बहुत दुखी रहता था। नगर निवासी भी बादशाह के साथ मिल कर भगवान से प्रार्थना किया करते थे कि राजकुमार का जन्म हो। अंत में भगवान ने उन सब की बात सुनी और मलिका को गर्भ रहा और नौ महीने बाद उसके एक पुत्र पैदा हुआ। उसका नाम रखा गया जैनुस्सनम। बादशाह ने अपने राज्य के सभी प्रख्यात ज्योतिषियों को बुला कर आज्ञा दी कि शहजादे का भविष्य पूर्णरूपेण बताएँ। सबने उसकी जन्मपत्री अलग-अलग बनाई किंतु सब ने बाद में एकमत हो कर कहा कि यह शहजादा बड़ा साहसी और प्रतापवान होगा और अपनी पूर्ण आयु को भोगेगा किंतु इसके सामने जीवन में कई खतरे आएँगे। बादशाह ने कहा, इसमें तो चिंता की कोई बात नहीं है। जो साहसी होता है वह खतरों का सामना करता ही है। फिर बादशाहों का तो काम ही है कि खतरों से जूझें। यह खतरे और विपत्तियाँ ही बादशाहों को जीवन का मार्ग दिखाती हैं। तुम लोगों ने जी खुश करनेवाली भविष्यवाणी की है। यह कह कर बादशाह ने ज्योतिषियों को अच्छा इनाम दे कर विदा किया।

शहजादा बड़ा हुआ तो उसकी शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रत्येक विषय के लिए योग्यतम गुणी नियुक्त किए गए। कुछ ही दिनों में वह प्रत्येक विद्या और कला में निपुण हो गया। किंतु बुढ़ापे की औलाद होने की वजह से वह लाड़ में कुछ बिगड़ भी गया और अपव्ययी हो गया। कुंछ समय के बाद उसका पिता रोगग्रस्त हुआ और कोई दवा उस पर प्रभावकारी न हुई। मरने के पहले उसने जैनुस्सनम को नसीहत की कि तुम निठल्ले और स्वार्थी लोगों की संगत से बचना और अपव्यय न करना और जैसा बादशाहों को शोभा देता है दंड और उदारता की नीतियों में संतुलन रखना। फिर बूढ़ा बादशाह मर गया। जैनुस्सनम ने निश्चित अवधि तक उस का मातम किया और फिर राजसिंहासन पर बैठा। अनुभव तो था नहीं, एकबारगी इतना कोष पाया तो दोनों हाथों से लुटाने लगा और भोग-विलास में प्रवृत्त हो गया। उसकी माँ ने बहुत समझाने की कोशिश की किंतु उसने उसकी बात अनसुनी कर दी। फलतः खजाना खाली हो गया। राज्य-प्रबंध चौपट हो गया और सैनिक नौकरी छोड़ने लगे।

अब उसकी समझ में आया कि कहाँ गड़बड़ हो गई। उसने अपने नौजवान मित्रों को उच्च पदों से हटा दिया और अनुभवी राज्य-प्रबंधकों को रखा। उन्होंने उसे उसकी भूलें बताई और किसी तरह राज्य-प्रबंध चलाए रखा किंतु अच्छी तरह राज्य संचालन के लिए धन की आवश्यकता थी और जैनुस्सनम रात-दिन इसी चिंता में रहने लगा कि धन कहाँ से प्राप्त किया जाए।

एक रात को उसने स्वप्न में देखा कि एक वृद्ध उससे मुस्कुरा कर कह रहा है - ओ जैनुस्सनम, तुम यह बात समझ लो कि हर रंज के बाद खुशी आती है और हर विपत्ति के बाद सुख मिलता है। इसलिए निराश न हो। यदि चाहते हो कि इस दुख से उबरो तो फौरन अकेले ही काहिरा चले जाओ जो मिस्र की राजधानी है। वहाँ तुम्हारा भाग्य जागेगा और तुम्हारे दुख दूर हो जाएँगे। जगने पर उसने अपनी माँ से सपने का हाल कहा और यह भी कहा कि मैं अपना भाग्य जगाने को काहिरा जाऊँगा। उसकी माँ ने समझाया, बेटे, सपने तो रोजाना ही दिखाई देते हैं और अजीब-अजीब दिखाई देते हैं, वे सच्चे थोड़े ही होते हैं। तुम्हें अकेले इतनी लंबी यात्रा नहीं करनी चाहिए। जैनुस्सनम जिद्दी तो था ही, कहने लगा, अम्मा, तुम कैसी बातें करती हो। ऐसे सपने गलत नहीं होते। बड़े-बड़े नबियों को महत्वपूर्ण बातें सपने ही में दिखाई दीं। मुझे जो वृद्ध सपने में दिखाई दिया वह कोई महान संत था, उसकी बात झूठी नहीं हो सकती। माँ ने उसे बहुत समझाना चाहा कि इस बेकार की खतरनाक यात्रा से बाज आए किंतु जब जैनुस्सनम कोई बात मन में ठान लेता था तो उसे पूरा ही करके छोड़ता था। उसने राज्य का प्रबंध अपनी माँ के सुपुर्द किया और स्वयं गुप्त रूप से महल से निकल कर काहिरा की ओर रवाना हो गया। उसने अपने साथ एक भी आदमी न लिया।

कई दिनों की जोखिम-भरी ओर कष्टदायी यात्रा करने के बाद वह काहिरा के सुंदर और विशाल नगर में जा पहुँचा। हारा-थका वह एक मसजिद के अंदर जा कर सो रहा। उसने फिर स्वप्न में उसी बूढ़े को देखा जो कह रहा था, मैंने तुम्हारा साहस देखने के लिए तुम्हें काहिरा बुलाया था। तुम इस परीक्षा में पूरे उतरे। तुम बड़े शक्तिशाली राजा बनोगे। तुम बसरा लौट जाओ। वहीं पर तुम्हें अपार धन राशि मिलेगी।

जैनुस्सनम जगा तो सोचने लगा कि इस बूढ़े ने मुझे अच्छा बेवकूफ बनाया, अगर बसरा ही में मुझे धन प्राप्ति होनी थी तो काहिरा तक क्यों दौड़ाया। उसने सोचा कि यह भी अच्छा हुआ कि यह बात मैंने अपनी माँ के सिवा किसी और से नहीं कहीं, नहीं तो सभी लोग मेरी मूर्खता पर हँसते। खैर, बेचारा फिर बसरा को चल पड़ा और कुछ दिनों में वहाँ कुशलतापूर्वक पहुँच गया। उसकी माँ को उसके इतनी जल्दी लौट आने पर आश्चर्य हुआ और उसने इसका कारण पूछा तो जैनुस्सनम ने काहिरा की मसजिद में देखे दूसरे सपने का हाल बताया। माँ ने उसे धीरज दे कर कहा, ठीक ही है बेटा, तुम्हें यहीं बसरा में यथेष्ट धन प्राप्त होगा।

रात को जैनुस्सनम ने फिर सपने में उसी बूढ़े को देखा। वह कह रहा था, सुनो जैनुस्सनम, अब वह समय आ गया है जब तुम्हें अतुलित धनराशि मिलनेवाली है। अब मेरी बात को ध्यान दे कर सुनो। तुम्हारे पिता ने पहले अमुक जगह महल बनवाया था और वहाँ रहते थे। फिर उन्होंने यह महल बनवाया। पुराने महल में कोई नहीं रहता था। तुम वहाँ एक फावड़ा ले कर अकेले जाओ और जमीन खोदना शुरू करो। थोड़ी देर बाद तुम्हें बड़ा खजाना मिलेगा।

जैनुस्सनम ने सुबह अपनी माँ को बताया कि रात को वही बूढ़ा फिर मेरे सपने में आया था और उसने यह कहा है। यह सुन कर उसकी माँ हँसने लगी। बोली, यह बूढ़ा भी अजीब है। दो बार सपने में आ कर उसने तुम्हें बेकार इधर से उधर दौड़ाया, अब तीसरी बार भी कुछ बकवास कर गया, जिसका कोई मतलब नहीं हो सकता। जैनुस्सनम ने कहा, अब तो मुझे भी उसकी बात पर विश्वास नहीं रहा है लेकिन यह अंतिम बार है जब उसकी बात मान रहा हूँ। इस बार भी कुछ हाथ न आया तो आयंदा उसकी बात पर ध्यान न दूँगा। माँ ने कहा, चलो, यह भी करके देख लो। इतना तो स्पष्ट है कि पुराने मकान का सहन खोदने में काहिरा की यात्रा से कम मेहनत है। जैनुस्सनम ने कहा, कुछ अजब भी नहीं कि इस बार उसकी बात ठीक निकले। माँ ने कहा, तुम जो चाहो करो, मैं तो अब भी कहती हूँ कि यह सब बेकार की बातें हैं।

जैनुस्सनम ने कुछ उत्तर दिया किंतु माँ से छुपा कर उसने पुराने महल को खोदना शुरू कर दिया। उसने लगभग एक गज गहरा गढ़ा खोद डाला लेकिन वहाँ एक पैसा भी नहीं निकला। वह यकायक बैठ गया और सोचने लगा कि मैं फिर मूर्ख बना। मेरी माँ को मालूम होगा तो बहुत हँसेगी और कहेगी कि लड़का पागल हो गया है, बेकार ही महल खोद कर खराब किया। कुछ देर सुस्ताने के बाद वह फिर उठा और खोदने लगा। अकस्मात उसका फावड़ा किसी कड़ी चीज पर पड़ा और उसने सँभल कर खोदा तो संगमरमर की एक चट्टान पाई। उसको हटाया तो उसके नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं। उसने एक मोमबत्ती जलाई और उसके उजाले में सीढ़ियों से नीचे उतर गया। अंदर एक बड़ी दालान मिली जिसकी दीवारें चीनी मिट्टी की और छत बिल्लौर पत्थर की बनी थी और उसमें सीप की बनी हुई चार तिपाइयाँ रखीं थीं। हर तिपाई पर दस देंगें समाक पत्थर की बनी थीं। (समाक एक सफेद नरम पत्थर होता है।) पहले उसने सोचा कि देगों में उम्दा शराब होगी। लेकिन उसने एक देंग का ढक्कन खोला तो उसे अशर्फियों से भरा पाया। उसने और देंगें भी अशर्फियों से भरी पाईं।

अब उसने एक मुट्ठी अशर्फियाँ लीं और जा कर अपनी माँ को दिखाईं। वह यह देख कर बड़े आश्चर्य में पड़ी, फिर बोली, बेटे, भगवान ने तुम पर कृपा की है किंतु अब की बार इस धन को पहले की तरह न उड़ा देना। जैनुस्सनम ने कहा, विश्वास रखो, अब मैं तुम से पूछे बगैर कुछ भी खर्च नहीं करूँगा। फिर उसकी माँ ने कहा कि मैं भी उस जगह जा कर वह धन देखना चाहती हूँ।

जैनुस्सनम उसे ले गया। उसने अशर्फियों से भरी चालीस देंगें देखीं। फिर उसकी माँ ने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो एक कोने में समाक पत्थर का बना हुआ एक और पात्र दिखाई दिया। जैनुस्सनम ने उसे खोल कर देखा तो उसमें सोने की बनी एक चाबी निकली। राजमाता ने कहा, निश्चय ही यहाँ कोई और खजाना है जिसकी चाबी यहाँ रखी है। वे लोग दालान में घूम कर देखने लगे कि चाबी कहाँ लग सकती है। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें दालान के एक ओर एक दरवाजा दिखाई दिया जिसमें ताला लगा था। उन्होंने उसमें वह चाबी लगाई तो ताला खुल गया। ताला खोल कर वे लोग अंदर गए तो एक विशाल कक्ष देखा। उसमें आदमी की कमर जितने ऊँचे नौ सोने के खंभे बने थे। आठ खंभों के ऊपर अलग-अलग मनुष्यों की हीरे की बनी मूर्तियाँ रखी थीं जिनके कारण वह कक्ष जगमग कर रहा था। जैनुस्सनम उन मूर्तियों का सौंदर्य देखता ही रहा गया। नवें खंभे पर कोई मूर्ति नहीं थी। उस खंभे पर एक सफेद रेशमी कपड़ा मढ़ा था जिस पर लिखा था, प्रिय पुत्र, यह आठों मूर्तियाँ अनुपम और अमूल्य हैं किंतु नवें खंभे के लिए जो मूर्ति है वह इससे भी बढ़ कर है। अगर तुम उसे भी प्राप्त करना चाहते हो तो काहिरा चले जाओ। वहाँ मेरा पुराना सेवक मुबारक रहता है। वह वहाँ का प्रसिद्ध आदमी है और तुम्हें उसका मकान बगैर दिक्कत के मिल जाएगा। मुबारक को जब मालूम होगा कि तुम मेरे पुत्र हो तो वह उस जगह ले जाएगा जहाँ से नवीं मूर्ति तुम्हें मिल सकती है।

यह पढ़ कर जैनुस्सनम और धन-दौलत को भूल गया और उसे नवीं मूर्ति प्राप्त करने की धुन सवार हो गई। उसने अपनी माँ से कहा, अम्मा, अब मैं नवीं मूर्ति पाए बगैर नहीं रह सकता। मैं फिर काहिरा जाऊँगा। उसकी माँ बोली, अब मैं तुम्हें कैसे रोक सकती हूँ। तुम ऐसे महान सिद्ध के आदेश पर काम कर रहे है जो सर्वज्ञ है। तुम्हें उसके आदेश के पालन से कोई हानि नहीं हो सकती। तुम राज्य-प्रबंध की भी चिंता न करो, मैं मंत्री की सहायता से सब सँभाल लूँगी। लेकिन अब तुम पहले की तरह अकेले न जाना। अब की बार तुम्हें अकेले जाने का आदेश भी नहीं दिया गया है।

चुनांचे दूसरे दिन जैनुस्सनम कुछ चुने हुए सेवकों को साथ ले कर काहिरा की ओर चल दिया। कुछ दिनों बाद वह वहाँ कुशलपूर्वक पहुँचा। वहाँ जा कर लोगों से बातचीत की तो मालूम हुआ कि मुबारक सचमुच ही वहाँ का विख्यात नागरिक है। बादशाह को उसका घर ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई। उसका भवन विशाल था। दरवाजे पर आवाज लगाने पर एक नौकर ने द्वार खोला। जैनुस्सनम ने कहा, मैं परदेशी हूँ। तुम्हारे स्वामी की उदारता के बारे में बहुत कुछ सुना है। मैं चाहता हूँ कि उनका मेहमान बनूँ।
 


नौकर ने अंदर जा कर अपने स्वामी को यह बताया और उससे आदेश पा कर जैनुस्सनम और उसके आदमियों को अंदर ले गया। जैनुस्सनम ने देखा कि वह मकान अंदर से और भी शानदार था। एक सजी हुई दालान में मुबारक उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसे देख कर मुबारक ने उठ कर सलाम किया और पूछा कि आप कौन हैं, कहाँ से आए हैं?

जैनुस्सनम ने कहा, तुमने मुझे पहचाना नहीं। मैं बसरा के स्वर्गवासी बादशाह का पुत्र जैनुस्सनम हूँ। मुबारक ने कहा, मैं तो स्वर्गवासी बसरा नरेश का क्रीतदास हूँ। लेकिन मैंने आपको नहीं देखा। आपकी उम्र कितनी होगी? जैनुस्सनम ने कहा कि मैं बीस वर्ष का हूँ। मुबारक ने कहा, ठीक है, मैं बाइस वर्ष पूर्व बसरा से यहाँ आया था। लेकिन फिर भी मैं आश्वस्त हो जाना चाहता हूँ कि आप उसी बादशाह के पुत्र हैं। क्या आप कोई बात ऐसी बता सकते हैं जिससे इस विषय में मेरी तसल्ली हो जाए।

जैनुस्सनम ने कहा, कुछ दिन पहले एक स्वप्न देख कर मैंने अपने पिता के पुराने महल में खुदाई की थी। मुझे उसमें अशर्फियों से भरी हुई चालीस देंगें मिलीं। मुबारक ने पूछा कि आपने इन देंगों के अलावा और कुछ देखा? जैनुस्सनम ने कहा, एक सोने की चाबी से मैंने एक दरवाजा खोला तो उस कक्ष में मैंने आठ स्वर्ण-स्तंभों पर रखी हुई मानवाकार हीरे की मूर्तियों को देखा। नवाँ खंभा भी सोने का था किंतु उस पर कोई मूर्ति नहीं थी। उस पर एक सफेद रेशमी कपड़ा मढ़ा था जिस पर मेरे पिता की हस्तलिपि में लिखा था कि नवीं मूर्ति सबसे अच्छी है और अगर तुम उसे पाना चाहो तो काहिरा में मुबारक के पास जाओ। मुबारक यह सुन कर उसके पाँव पर गिर कर बोला, निस्संदेह आप मेरे स्वामी हैं। मैं आपको इच्छित स्थान पर अवश्य ले जाऊँगा। किंतु अभी आप थके हैं, दो-चार दिन आराम करें। मैंने काहिरा के प्रमुख व्यक्तियों को भोज दिया है, आप भी वहीं चले। जैनुस्सनम ने सहर्ष यह स्वीकार कर लिया। मुबारक उसे भोज स्थान पर ले गया और स्वयंसेवकों की भाँति बादशाह जैनुस्सनम के पास खड़ा रहा। वहाँ उपस्थित लोग ताज्जुब से देखने और एक-दूसरे से पूछने लगे कि यह कौन है जिसकी मुबारक दासों की भाँति सेवा कर रहा है।

जब सब मेहमान खाना खत्म कर चुके तो मुबारक ने उनसे कहा, आप लोग आश्चर्य में होंगे कि मैं इस नवयुवक की इतनी सेवा क्यों कर रहा हूँ। आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यह बसरा के बादशाह हैं मैं, इनके पिता का गुलाम था। वे मुझे मुक्त करने से पहले मर गए। अतएव अब मैं इनका गुलाम हूँ। यह अपने पिता के एकमात्र उत्तराधिकारी हैं। इस पर जैनुस्सनम ने कहा, मैं इस उपस्थित समूह के समक्ष घोषणा करता हूँ कि मैंने इन्हें अपनी दासता से मुक्त किया। सिर्फ एक बात, जो अभी मैंने इनसे कही है, इन्हें करनी पड़ेगी।

यह सुन कर मुबारक ने सिर झुका कर शाहजादे का आभार प्रकट किया। इसके बाद मदिरा का दौर चला। शाम तक सब लोग शराब पीते रहे, फिर मुबारक ने फल आदि दे कर सब को विदा किया। जैनुस्सनम ने रात भर आराम किया और दूसरे दिन कहा, भाई, अब मेरी यात्रा की थकन दूर हो गई है। मैं यहाँ घूमने नहीं बल्कि नवीं मूर्ति लेने आया हूँ। अब यह आवश्यक है कि उस काम के लिए चला जाए। मुबारक ने कहा, अच्छी बात है किंतु आपको एक बात जाननी जरूरी है। मार्ग में बहुत-सी भयोत्पादक बातें होंगी। यह आवश्यक है कि आप किसी बात से भय न खाएँ और किसी बात पर ध्यान न दें। नवयुवक बादशाह ने कहा, आप इत्मीनान रखें। मैं किसी भूत-प्रेत से न डरूँगा और जैसा आप कहेंगे वैसा ही करूँगा। वैसे भी मैं बादशाह हूँ, मुझे किसी बात से डरना नहीं चाहिए।

मुबारक यह सुन कर आश्वस्त हुआ। उसने अपने नौकरों को यात्रा की तैयारी का आदेश दिया। दूसरे दिन वे दोनों घर से चले। मार्ग के दर्शनीय स्थल देखते हुए वे लोग कई दिनों बाद एक बहुत सँकरे रास्ते से चलने लगे। मुबारक ने घोड़े और साथ के नौकर वहीं छोड़ दिए और आदेश दिया कि हम लोगों के लौटने तक तुम लोग यहीं हमारी प्रतीक्षा करना। अब वह जैनुस्सनम को ले कर पैदल चला। एक बार फिर उसने कहा, अब भयानक स्थान शुरू होता है। आप किसी अजीब से अजीब बात को देख कर भी डरिएगा नहीं। फिर वह उसे ले कर एक नदी के तट पर आ कर बैठ गया और बोला, इस नदी को पार करके हमें अपने उद्देश्य की प्राप्ति होगी।

जैनुस्सनम ने कहा, इतनी बड़ी नदी हम कैसे पार करेंगे? यहाँ तो कोई नाव भी नहीं है। मुबारक ने कहा, यहाँ अभी जिन्नों के बादशाह की भेजी हुई जादू की नाव आएगी। आप को मैं फिर चेतावनी देता हूँ कि उसका माँझी कैसा भी अजीब दिखे, आप एक शब्द भी न निकालें और न भयभीत हों। आप आश्चर्यवश हो कर उससे कुछ पूछताछ भी न करें। नाव पर चढ़ने के बाद एक शब्द भी आप के मुख से निकला कि तुरंत यह नाव अथाह जल में डूब जाएगी। जैनुस्सनम ने कहा, मैं बिल्कुल चुप रहूँगा। और भी जो बातें जरूरी हों वह आप मुझे बता दें ताकि मैं उनका ध्यान रखूँ।

वे लोग यह बातें कर ही रहे थे कि उन्होंने एक चंदन की नाव, जिसमें नीला रेशमी पाल लगा हुआ था, अपनी ओर आते देखी। उस बड़ी नाव का केवट एक माँझी था जिसका सिर हाथी का-सा था और शेष शरीर सिंह जैसा। नाव किनारे पर आई तो उसने एक-एक करके दोनों को अपनी सूँड़ से उठा कर नाव में बैठा दिया और पलक झपकते ही पार ले जा कर उसी प्रकार उन्हें दूसरे तट पर उतार दिया। फिर वह नाव अदृश्य हो गई। मुबारक बोला, अब हम लोग जिन्नों के देश में हैं। यहाँ की सुंदरता स्वर्गोपम है। देखिए, कैसे लहललाते खेत हैं जिनके चारों ओर सुंदर फूल और सब्जियाँ लगी हैं। फलदार पेड़ की शाखाएँ फलों के भार से धरती छू रही हैं। जगह-जगह सुंदर पक्षी कलरव कर रहे हैं।

जैनुस्सनम भी उस स्थान की शोभा देख कर मग्न हो गया। उसे लग रहा था कि उसकी रास्ते की सारी थकन उतर गई है, वह बहुत देर तक वहाँ की प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेता रहा। फिर दोनों आगे बढ़े और एक दिशा में चलने लगे। काफी देर चलने के बाद वे एक किले के पास पहुँचे। यह किला हीरे से निर्मित था। किले के चारों ओर बड़ी गहरी और चौड़ी खाई थी। खाई और किले की दीवार के बीच लंबे और घने पेड़ थे जिन्होंने किले को लगभग छुपा रखा था। किले के मुख्य द्वार के सामने खाई पर बारह गज लंबा और छह गज चौड़ा सीपी का पुल बना हुआ था। मुख्य द्वार पर भयानक जिन्नों का पहरा बैठा था ताकि बादशाह की अनुमति के बगैर कोई अंदर न आ सके।

मुबारक वहीं ठहर गया। उसने जैनुस्सनम से कहा, अगर हम यहाँ से आगे बढ़े तो यह महाभयानक जिन्न हमें जीवित नहीं छोड़ेंगे। अब मैं हम दोनों की रक्षा के लिए मंत्र पढ़ूँगा जिससे यहाँ जिन्न हमारे समीप न आ सकें। यह कह कर मुबारक ने अपनी कमर से बँधा हुआ एक थैला खोला। उसमें चार पटके थे। उसने एक पटका अपनी कमर और दूसरा अपनी पीठ पर बाँधा। बाकी दो पटके उसने इसी तरह बाँधने के लिए जैनुस्सनम को दिए। फिर उसने जमीन पर दो चादरें बिछाईं। उन चादरों के कोनों और किनारों पर पत्थर रख कर उसने उन्हें स्थिर कर लिया। फिर वह जैनुस्सनम से बोला, अब मैं जिन्नों के बादशाह का आह्वान करता हूँ। उसी का यह किला है। अगर वह यहाँ किसी भयानक रूप में आएगा तो उसका मतलब यह होगा कि वह हमारे आने से प्रसन्न नहीं है और हम लोग बड़े दुख में पड़ जाएँगे। किंतु अगर वह मानवीय रूप में आया तो आप की कामना पूर्ण हो जाएगी। आप इस बात का ध्यान रखें कि वह चाहे जो रूप भी धर कर आए, उसे झुक कर सलाम करें किंतु किसी भी दशा में उस चादर या उन पटकों को अपने शरीर से अलग न होने दें। यह शरीर से अलग हुए कि आपका शरीरांत हो जाएगा। जिन्नों के बादशाह के आगमन पर आप यह कहें कि मेरे पिता का, जो आप का सेवक था, अब देहांत हो चुका है और जो कृपा आप मेरे पिता पर किया करते थे वह मुझ पर भी करें। जब वह पूछे कि मैं तुम पर कौन-सी कृपा करूँ तो आप कहें कि मुझे अपने महल के तहखाने के लिए नवीं मूर्ति भी दे दीजिए।

इस प्रकार मुबारक ने जैनुस्सनम को सारी बातें दुबारा समझाईं और फिर मंत्र पढ़ने लगा। कुछ ही देर में बड़े जोर से बादल गरजने लगा और ऐसा भयंकर शब्द हुआ कि जान पड़ता था कि जमीन फट जाएगी। जैनुस्सनम यह कांड देख कर बहुत डरा। उसने बाहरी तौर पर तो शांति रखी किंतु उसका दिल जोरों से धड़कने लगा। मुबारक ने उसकी यह दशा देखी तो बोला, अब आपको घबराने की जरूरत नहीं। जितनी भयानकता होनी थी हो ली। अब यह अँधेरा भी छँट जाएगा और उजाला हो जाएगा। ऐसा ही हुआ। कुछ ही क्षणों में बादल, बिजली सब गायब हो गए और प्रकाश फैल गया। उसके बाद जिन्नों का बादशाह एक सुंदर मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ।

मुबारक के समझाने के अनुसार जैनुस्सनम ने खड़े हो कर झुक कर जिन्नों के बादशाह को सलाम किया। जिन्नों का बादशाह मुस्कुराता हुआ उसके समीप आया और बोला, मेरे बेटे, तुम्हारा स्वर्गीय पिता मेरा बड़ा घनिष्ठ मित्र था, मुझे उससे बड़ा स्नेह था। जब भी वह मेरे पास आता, मैं उसे हीरे की एक सुंदर मूर्ति भेंट में देता। वह उसे अपने साथ ले जाता। इस प्रकार मैंने उसे आठ मूर्तियाँ दीं। मैंने उससे यह भी कहा कि तुम नवीं मूर्ति के लिए भी स्वर्ण-स्तंभ बनवाओ और उस पर एक सफेद रेशमी चादर में अपने बेटे के लिए संदेश लिख कर छोड़ दो। तुमने वह संदेश पढ़ा और उसके अनुसार यहाँ आए हो। मैंने तुम्हारे पिता से प्रतिज्ञा की थी कि नवीं मूर्ति मैं जैनुस्सनम को दूँगा। नवीं मूर्ति सुंदरता में पहले की आठ मूर्तियों से कहीं अच्छी है। मैंने भी अपने प्रण के पालन हेतु वृद्ध के रूप में तुम्हें सपना दिया था और मैंने ही तुम्हारे पहले महल में छुपा हुआ खजाना तुम्हें दिलवाया था और तुमने अशर्फियों की देंगें पाईं और फिर अंदर के कमरे में जा कर उसे खोल कर तुमने स्वर्ण-स्तंभ पर स्थापित हीरक मूर्तियों को देख कर और फिर अपने पिता द्वारा लिखित संदेश को पढ़ा। मुझे मालूम है कि उस संदेश को पढ़ कर ही तुम मुबारक के साथ यहाँ आए हो।

उसके बाद जिन्नों के बादशाह ने कहा, तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी और तुम्हें तुम्हारी वांछित वस्तु मिलेगी। अगर मैं तुम्हारे पिता से उसका वादा न करता तो भी नवीं मूर्ति तुम्हें ही देता। लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा। तुम मेरे लिए एक कन्या लाओ। उसकी अवस्था पंद्रह वर्ष की होनी चाहिए। वह रूपवती भी हो और उसका हृदय भी निर्मल हो। किंतु मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, तुम उसके साथ भूल कर भी दुष्कर्म न करना वरना तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। जैनुस्सनम ने कहा, मैं आपकी आज्ञानुसार आपके उपभोग के लिए एक पंद्रह वर्ष की कन्या जरूर लाऊँगा। किंतु कठिनाई यह है कि मैं उसका वाह्य सौंदर्य तो देख सकता हूँ किंतु उसके अंतःकरण का हाल मुझे किस प्रकार ज्ञात हो सकता है? हम मनुष्य एक- दूसरे के दिल का हाल नहीं जानते।

जिन्नों का बादशाह मुस्कुरा कर बोला, तुम बुद्धिमान हो। तुम्हारी बात ठीक है। तुम मनुष्य तो एक-दूसरे के दिल का हाल नहीं ही जानते, हम जिन्न लोग भी एक-दूसरे के दिल की बात नहीं जान पाते। लेकिन मैं तुम्हारी कठिनाई दूर करूँगा। मैं तुम्हें एक दर्पण दूँगा। इस आईने से तुम्हें हर एक कन्या के अंतःकरण का ज्ञान हो जाएगा। जब तुम्हें कोई पंद्रह वर्ष की सुंदरी मिले तो उसका रूप इस शीशे में देखना। यदि उसका अंतःकरण निर्मल होगा तो वह इस दर्पण में भी सुंदरी दिखाई देगी। किंतु अगर उसका हृदय मलिन होगा तो वह इसमें कुरूप दिखाई देगी। किंतु उसकी पवित्रता अक्षुण्ण रखने की जो शर्त मैंने रखी हैं मैं तुम्हें उसकी याद दिलाता हूँ। यह शर्त टूटी और तुमने उस कन्या को खराब किया तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा। इस बात में कोई रियायत नहीं होगी।

जैनुस्सनम ने कहा कि मुझे आपकी शर्त मंजूर है, मैं कन्या को आपके पास पवित्र स्थिति में लाऊँगा। जिन्नों के बादशाह ने वह जादुई शीशा उसे दे कर कहा, बेटे, अब जाओ। यही शीशा तुम्हारे भाग्य को चमकाएगा। जैनुस्सनम और मुबारक दोनों ने जिन्नों के बादशाह को प्रणाम किया और वह गायब हो गया। यह दोनों फिर नदी के तट पर आए जहाँ उस विचित्र माँझी ने उन्हें क्षण भर ही में दूसरे तट पर पहुँचा दिया। फिर वे उस जगह पर गए जहाँ उनके सेवक उनकी प्रतीक्षा में थे। वहाँ जा कर वे अपने घोड़ों पर सवार हुए और काहिरा पहुँच गए।

काहिरा में जैनुस्सनम ने कुछ दिनों तक आराम किया। तत्पश्चात मुबारक से कहा कि अब मैं जिन्नों के बादशाह के लिए कन्या ढूँढ़ने जाता हूँ। मुबारक ने कहा, इसके लिए बाहर जाना बेकार है। काहिरा में जितनी सुंदर कन्याएँ हैं उतनी संसार में कहीं नहीं। जैनुस्सनम ने कहा, आप की बात ठीक है किंतु काहिरा की सुंदरियाँ मिलें कैसे? मुबारक ने कहा, आप इसकी चिंता न करें। यहाँ एक बुढ़िया रहती है। वह सारे नगर की कन्याओं की खबर रखती है। मैं उसे बुला कर यह काम उसके सुपुर्द करता हूँ। मुझे आशा है कि वह बगैर किसी कठिनाई के आपकी वांछित कन्या ले आएगी। यह कह कर मुबारक ने उस बुढ़िया को बुलाया। वह महाधूर्त थी और कुटनीपन के काम में अति निपुण थी। उसने दो-चार दिन ही में बीसियों पंद्रह वर्ष की सुंदरियाँ ला कर खड़ी कर दीं। उन सब के चेहरे तो सौंदर्य में सूरज-चाँद को शरमाते थे किंतु जब जैनुस्सनम ने उनका रूप जादू के दर्पण में देखा तो हर एक को कुरूप पाया, एक भी लड़की ऐसी नहीं मिली जो उस दर्पण में सुंदर दिखाई देती।

अब तो मजबूरी में दूसरी जगह तलाश करना ही था। जैनुस्सनम और मुबारक दोनों बगदाद आए और एक बड़ा-सा मकान ले कर रहने लगे। वे बड़ी उदारता बरतते और रोजाना सैकड़ों आदमी उनके घर खाना खाते। उस मुहल्ले में मुराद नामक एक ईर्ष्यालु व्यक्ति रहता था जो प्रत्येक धनवान से जलता था क्योंकि वह स्वयं निर्धन था। वह जैनुस्सनम की उदारता का यश सुन-सुन कर कुढ़ता रहता था।

एक दिन शाम की नमाज के बाद मसजिद में बैठ कर मुराद ने मुहल्लेवालों से कहा - भाइयो, सुना है हमारी गली में एक आदमी रहने लगा है जो बेतहाशा धन लुटाता है। शहर में शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जिसकी उसने सहायता न की हो। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि कोई चोर-डाकू है वरना उसके पास इतना धन कहाँ से आया। हम लोगों को सावधान रहना चाहिए। खलीफा को मालूम हुआ कि हमारी गली में कोई अपराधी रहता है तो हम सब भी जाएँगे। लोगों ने कहा, तुम ठीक कहते हो। हमें इस आदमी की शिकायत कोतवाल से कर देनी चाहिए। तुम खुद ही यह काम क्यों नहीं कर देते? मुराद बोला, अच्छी बात है। कल मैं ही कोतवाल से उसकी शिकायत करूँगा।

मुराद को पता नहीं था किंतु उन आदमियों के बीच मुबारक भी बैठा सारी बातें सुन रहा था। दूसरे दिन सुबह मुबारक एक थैली में पाँच अशर्फियाँ और कुछ रेशमी थान ले कर मुराद के घर गया। मुराद ने उसे देख कर कटु स्वर में पूछा, तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आए हो? मुबारक ने अत्यंत विनम्रता से कहा कि हम दो परदेशी हैं जो आपके पड़ोस में रहने लगे। फिर उसने अशर्फियों की थैली और रेशमी थान उसे दे कर कहा, मेरे मालिक शहजादे ने आपकी सच्चरित्रता की ख्याति सुन कर मुझे आपके पास भेजा है और कहलवाया है कि यह तुच्छ भेंट स्वीकार करें, मुझे अपना सेवक समझें और अवसर मिले तो दर्शन दें।

यह सुन कर मुराद बिल्कुल पिघल गया। उसने कहा, शहजादे से कहिए कि मैं इस बात पर बड़ा लज्जित हूँ कि अभी तक आपकी भेंट को न आ सका। कल जरूर आऊँगा। फिर नमाज के बाद मसजिद में उसने मुहल्लेवालों से कहा, उस उदार व्यक्ति के बारे में मुझे भ्रम था। अब मुझे मालूम हुआ है कि वह चोर-डाकू नहीं बल्कि किसी देश का राजकुमार है। अब उसकी शिकायत कोतवाल से करने का कोई मतलब नहीं है। अन्य लोगों ने भी मुराद से सहमति प्रकट की।

दूसरे दिन मुराद अच्छे कपड़े पहन कर जैनुस्सनम के पास गया। जैनुस्सनम ने उसकी बहुत खातिर-तवाजो की। मुराद ने पूछा, आप इस नगर में किस उद्देश्य से आए हैं? जैनुस्सनम ने कहा, मैं एक पंद्रह वर्ष की अत्यंत रूपवती कन्या चाहता हूँ जिस का मन भी उतना ही निर्मल हो जितना उस का मुख। मुराद ने कहा, ऐसी कन्या का मिलना कठिन है किंतु मेरी जानकारी में एक ऐसी लड़की है। उसका पिता एक भूतपूर्व राज्य मंत्री है। उसने अपनी बेटी की संपूर्ण शिक्षा-दीक्षा खुद की है। वह कन्या अनिंद्य सुंदरी भी है। चाहेंगे तो उसका पिता उसका हाथ सहर्ष आपके हाथ में दे देगा। जैनुस्सनम ने कहा, लेकिन मैं उसे पहले खुद देखूँगा। मुझे शरीर के सौंदर्य के साथ मन का सौंदर्य भी चाहिए।

मुराद बोला, मुख दिखाने की बात मैं तय कर दूँगा किंतु आप उसके स्वभाव को कैसे जानेंगे? स्वभाव तो बहुत दिन साथ रहने पर ही जाना जाता है। जैनुस्सनम ने कहा, मैं किसी का मुख देख कर ही उसके मन की बात जान लेता हूँ। मुराद ने कहा कि मैं आज ही जा कर उस लड़की के पिता से बात करता हूँ। दूसरे दिन मुराद के साथ जा कर जैनुस्सनम कन्या के पिता से मिला। भूतपूर्व मंत्री ने जैनुस्सनम के परिवार आदि के बारे में पूछताछ कर अपनी पुत्री के विवाह की सहमति प्रकट की और पुत्री को बुला कर कहा, बेटी, दो क्षणों के लिए इन्हें अपना चेहरा दिखा दो।

लड़की ने चेहरे से नकाब उठाया तो जैनुस्सनम उसका रूप देख कर चकाचौंध हो गया और सोचने लगा कि यह तो मेरी ही हो कर रहे तो अच्छा हो। फिर उसने जादुई शीशे में उसका चेहरा देखा। दर्पण में भी वह पूर्ण सुंदरी दिखाई दी। यानी जैनुस्सनम को ऐसी ही लड़की मिल गई जैसी ढूँढ़ने वह निकला था। दोनों का विवाह तय हो गया। दो-चार दिनों में भूतपूर्व मंत्री ने काजी और गवाहों को बुला कर निकाह पढ़वा दिया। जैनुस्सनम ने लाखों के जेवर चढ़ावे में दिए और भूतपूर्व मंत्री ने भी भारी दहेज दे कर कन्या को विदा कर दिया।

जैनुस्सनम ने भी इस विवाह के उपलक्ष्य में बगदाद के प्रमुख व्यक्तियों को भोज दिया। फिर मुबारक ने उससे कहा कि अब हमें यहाँ रहने की आवश्यकता नहीं है, वापस काहिरा चलना चाहिए। जैनुस्सनम ने कहा, भाई, अब मेरा काहिरा जाने को जी नहीं चाहता। वहाँ जा कर अपनी पत्नी को मुझे जिन्नों के बादशाह को दे देना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ कि उसे ले कर अपने देश चला जाऊँ और उसके साथ आराम से रहूँ। मुबारक ने कहा, ऐसी बात मन में भी न लाइए। याद रखिए कि जिन्नों के बादशाह से जो प्रतिज्ञा आपने की है उसे भंग किया तो वह आपको जीवित नहीं छोड़ेगा। आप अपनी पत्नी से संभोग करने के पहले ही काल के ग्रास बन जाएँगे। अब आपके लिए यही उचित है कि अपने चित्त को दृढ़ करें और अपनी इच्छाओं पर संयम रख कर इस कन्या को जिन्नों के बादशाह को सौंप दें। उसके प्रसन्न रहने ही में आपकी हर तरह भलाई हैं।

जैनुस्सनम ने कुछ देर विचार करके कहा, आप की बात बिल्कुल ठीक है। मैंने तय किया है कि इस कन्या के साथ शारीरिक संपर्क नहीं करूँगा। किंतु संभव है कि बाद में मेरा चित्त डाँवाडोल हो जाए। इसलिए आप इस कन्या को अपने जिम्मे रखें और रास्ते भर मुझे उसका मुँह न देखने दें। इसके बाद मुबारक ने यात्रा की तैयारी पूरी की और सारे साज-सामान के साथ काहिरा होते हुए जिन्नों के देश की ओर यह सब लोग चले। सुंदरी ने जब यह देखा कि मेरा पति मेरे सामने नहीं आता तो उसने एक दिन मुबारक से इस बारे में प्रश्न किया। मुबारक ने कहा, सुंदरी, तू अपने पति को कभी नहीं देख सकेगी। उसने तुझ से विवाह अपनी पत्नी बनाने के लिए नहीं बल्कि जिन्नों के बादशाह को देने के लिए किया था। वह तो तुम्हें बहुत चाहता है किंतु अगर उसने तुम्हें जिन्नों के बादशाह को न दिया तो उसके हाथ से मारा जाएगा। वह यह सुन कर रोने लगी और बोली, तुम लोग कयामत में खुदा को क्या मुँह दिखाओगे? तुम विवाह का ढोंग रचा कर मुझे जिन्नों के हाथों से मरवाने के लिए लाए हो। वे दोनों भी दुखी हुए किंतु कर ही क्या सकते थे।

जैनुस्सनम ने कन्या को जिन्नों के बादशाह को भेंट किया तो वह उसे देख कर बड़ा खुश हुआ और बोला, मैं तुम से बहुत खुश हूँ कि तुम मेरे लिए ऐसी अच्छी कन्या लाए। अब तुम तुरंत अपने देश जाओ। वहाँ तुम्हें तहखाने में नवें खंभे पर वांछित हीरक मूर्ति मिलेगी। जैनुस्सनम उससे विदा हो कर मुबारक के साथ काहिरा गया, फिर कुछ दिन वहाँ रह कर बसरा की ओर रवाना हुआ। इस सारे अरसे में वह अपनी सुंदरी पत्नी को याद करके रोता रहा जिसे उसने मरने के लिए जिन्नों के बादशाह को दे दिया था और वह भी उसके और उसके पिता के साथ छल कर के। सारे रास्ते शोकमग्न रह कर वह बसरा पहुँचा।

उसके मंत्री और सभासद उसकी वापसी पर बहुत खुश हुए। सब से मिलने-जुलने के बाद वह अपनी माँ के महल में गया और उसे यात्रा का पूरा वृत्तांत बताया और कहा कि बगदाद के भूतपूर्व मंत्री की पुत्री से विवाह करके उसे जिन्नों के बादशाह को दे आया हूँ। बुढ़िया ने अत्यंत प्रसन्न हो कर कहा, अब तुम्हें जरूर नवीं हीरे की मूर्ति मिल जाएगी। अब तुम उस जगह चलो जहाँ पहलेवाली आठ मूर्तियाँ हैं। जैनुस्सनम ने मुँह से तो कुछ न कहा किंतु मन में कहता रहा कि ऐसी सुंदर जीवित मूर्ति को खोने के बाद मैं मुर्दा मूर्ति ले कर क्या करूँगा। इसी कुढ़न को लिए हुए माँ के साथ तहखाने में आया। किंतु वहाँ जा कर देखा कि नवें खंभे पर हीरे के बदले एक सुंदरी खड़ी है। पास जा कर देखा तो वही कन्या थी जिससे उसने विवाह किया था।

जैनुस्सनम उसे देख कर स्तंभित रह गया। सुंदरी बोली, तुम्हें तो दुख हो रहा होगा कि इसे तो मैं मरने के लिए छोड़ आया था, यह फिर मेरे सिर पड़ गई। जैनुस्सनम ने कहा, भगवान ही जानता है कि तुम्हें छोड़ने का मुझे कितना दुख था। किंतु मैं वचनबद्ध था। और फिर इस बात का डर था कि वचन तोड़ने पर जिन्नों का बादशाह मुझे मार डालेगा। मैंने तो रास्ते में भी कई बार सोचा कि वचन तोड़ कर तुम्हें अपने महल में ले आऊँ, किंतु मेरे वयोवृद्ध मित्र ने मुझे इस बात से रोके रखा। मुझे नवीं मूर्ति की बिल्कुल चिंता नहीं थी किंतु मुबारक ने जिन्नों के बादशाह को नाराज करने से मुझे बाज रखा। अब मैंने तुम्हें बैठे ही पा लिया है। अब मुझे नवीं मूर्ति की तो क्या, सारे संसार के धन-दौलत और राजपाट की कोई परवाह नहीं है।

जैनुस्सनम की माँ आश्चर्य के साथ यह सब बातें देख-सुन रही थी कि अचानक एक घनघोर शब्द हुआ और सारा भवन हिलने लगा। जैनुस्सनम की माँ यह देख कर और घबराई और चीख पड़ी। इतने में जिन्नों का बादशाह मनुष्य रूप में प्रकट हुआ और जैनुस्सनम की माँ से बोला, मलिका, मैं तुम्हारे पुत्र से ही स्नेह रखता था। मैं इसे सफल बादशाह देखना चाहता था इसलिए मैंने तरह-तरह से इसके शौर्य, विनय, आत्मसंयम और प्रतिज्ञा-पालन की परीक्षा ली। यह सुंदरी और सच्चरित्र कन्या भी मैंने अपने लिए नहीं, वास्तव में तुम्हारे पुत्र के लिए चुनी थी। इसलिए मैंने इसे यहाँ पहुँचा दिया और यह लो, नवें खंभे पर लगाने के लिए यह हीरक मूर्ति भी लो। यह कह कर उसने खंभे पर हीरक मूर्ति लगाई और गायब हो गया। सब लोग बहुत खुश हुए और राज्य में कई दिनों तक बादशाह के विवाह का महोत्सव रहा।
 
शहजादा खुदादाद और दरियाबार की शहजादी

उपर्युक्त कहानी के मध्य में एक यात्रा में जैनुस्सनम के दरियाबार देश मे जाने का भी उल्लेख है। वहाँ की एक चित्ताकर्षक कथा उस ने सुनी थी। वह कथा भी इस जगह कही जाती है।

हैरन नगर में एक बड़ा प्रतापी बादशाह था जिसे भगवान ने सब कुछ दे रखा था। किंतु उस के कोई संतान नहीं थी। एक रात को उसे सपने में दिखाई दिया कि एक दिव्य पुरुष उस से कह रहा है, उठ, भगवान तेरी मनोकामना पूरी करेगा। सुबह माली से अपने बाग का एक अनार मँगा कर खाना।

सवेरे नमाज पढ़ने के बाद उस ने माली से अनार मँगाया और उस में से निकले पचास दाने खाए क्योंकि उस की पचास रानियाँ थीं। इस के बाद वह एक-एक कर सभी के पास गया। ईश्वर की कृपा से एक रानी पीरोज के अलावा उस की सभी रानियाँ गर्भवती हो गईं। बादशाह को इस बात से बड़ी ग्लानि हुई। उसे विश्वास हो गया कि यह रानी बाँझ है। उस ने चाहा कि पीरोज का वध करवा दे किंतु उस के मंत्री ने उसे ऐसा करने से रोका और कहा कि संभव है वह भी गर्भवती हो किंतु उस में गर्भ के लक्षण प्रकट न हुए हों। बादशाह ने कहा, अच्छी बात है। मैं इसका वध नहीं कराऊँगा किंतु इसे अपने पास नहीं रहने दूँगा। मंत्री ने कहा, ठीक है। उसे आप अपने भतीजे सुमेर के पास, जो समारिया देश का हाकिम है, भेज दीजिए।

अतएव बादशाह ने पीरोज को समरिया भेज दिया और साथ ही अपने भतीजे को पत्र लिखा कि हम अपनी रानी को तुम्हारे पास भेज रहे हैं। यदि उस के कोई पुत्र पैदा हो तो मुझे खबर देना। समरिया में दिन पूरे होने पर पीरोज ने एक पुत्र को जन्म दिया। सुमेर ने सूचना भिजवाई कि रानी के पुत्र हुआ है। बादशाह यह सुन कर खुश हुआ किंतु उस ने पीरोज को वापस नहीं बुलाया। उस ने सुमेर को लिखा कि यहाँ भी भगवान की दया से उनचास रानियों के पुत्र हुए हैं, तुम पीरोज के पुत्र का नाम खुदादाद रखो, उस की पैदायश की सारी रस्में करो और उस की अच्छी शिक्षा का प्रबंध करो, हम यहाँ से उस का सारा खर्चा भेजेंगे।

सुमेर नवजात शिशु का पितृवत पालन करने लगा। जब खुदादाद बड़ा हुआ तो उसे बाण-विद्या, घुड़सवारी और तत्कालीन सारी विद्याओं, कलाओं की शिक्षा प्रवीण शिक्षकों से दिलाई गई और वह सारी विद्याओं में पारंगत हो गया। अठारहवाँ वर्ष लगते उस का रूप और शरीर ऐसा निखरा कि वह संसार का सबसे रूपवान पुरुष लगने लगा। उस में जवानी का जोश उभरा तो उस ने अपनी माँ से कहा, अगर तुम अनुमति दो तो मैं समरिया से निकल कर अपने बल की परीक्षा लूँ। मेरे पिता हैरन नरेश के बहुत-से शत्रु हो गए हैं। चारों ओर के बादशाह भी हैरन पर आक्रमण करना चाहते हैं। आश्चर्य है कि ऐसे कठिन समय में भी मेरे पिता ने मुझे क्यों नहीं बुलाया और मेरे शौर्य का उस ने लाभ क्यों नहीं उठाया। फिर भी मेरा घर बैठना उचित नहीं है। मेरे पिता ने मुझे नहीं बुलाया तो न सही, मुझे चाहिए कि मैं स्वयं ही उस की सेवा में उपस्थित हूँ। माँ ने उस से कहा, यह तो ठीक है कि देश को शत्रुओं का भय हो तो तुम्हें घर पर नहीं बैठना चाहिए। किंतु तुम अभी प्रतीक्षा करो। शायद वह तुम्हें बुला भेजे। बगैर बुलाए तुम्हारा जाना ठीक नहीं है।

खुदादाद ने कहा, जब राज्य पर ऐसा संकट पड़ा हो तो बुलावे की प्रतीक्षा करना बेकार बात है। मुझे इस समय इतनी बेचैनी हो रही है कि यदि मैं तुरंत अपने पिता की सेवा में उपस्थित नहीं होता तो शायद जीवित ही न रह सकूँगा। मैं वहाँ अपनी वास्तविकता प्रकट ही नहीं करूँगा। मैं अपने को परेदशी बताऊँगा ओर उस की सेवा करूँगा। मैं तभी यह बात बताऊँगा कि मैं उस का पुत्र हूँ जब वह मेरे शौर्य से प्रभावित हो जाएगा। फिर तो नाराजगी की बात न रहेगी।

किंतु उस की माँ ने उसे जाने की अनुमति नहीं दी। इस पर वह कुछ दिनों बाद एक सफेद घोड़े पर सवार हो कर शिकार के बहाने निकला और अपने साथ कुछ विश्वस्त साथी भी ले लिए। कुछ ही दिनों में वे सब हैरन पहुँच गए। खुदादाद ने बादशाह के दरबार में प्रवेश पा लिया और जा कर उसे फर्शी सलाम किया। बादशाह ने उस का वैभव और व्यवहार देख कर उसे कृपापूर्वक अपने पास बुलाया और उस का परिचय पूछा। खुदादाद ने कहा, मैं काहिरा नगर का निवासी हूँ और एक अमीर का बेटा हूँ। मैं संसार भ्रमण के लिए अपने देश से निकला हूँ। मैं ने सुना है आप को शत्रुओं ने परेशान कर रखा है। अनुमति हो तो आप के लिए रणक्षेत्र में पदार्पण करूँ। बादशाह इस बात से बड़ा खुश हुआ और उसे अपनी निजी सेना का मुख्य अधिकारी बना दिया।

खुदादाद ने कुछ ही दिनों में उस सेना को सज्जित और शिक्षित कर दिया और उस के नायकों को भी पारितोषिक और सम्मान दे कर प्रसन्न कर दिया। मंत्रिगण भी उस के व्यवहार से मुग्ध हो गए। दरबार में उस का सम्मान सारे शहजादों और सरदारों से अधिक होने लगा। उस पर बादशाह की कृपा अधिकाधिक हो गई। उस ने सेना का विस्तार और सुप्रबंध किया। यह देख कर राज्य के शत्रुगण भी बगैर लड़े अपने देशों को खिसक गए। बादशाह ने अपने बेटों के प्रशिक्षण का भार भी खुदादाद पर डाल दिया। यद्यपि वह अपने भाइयों में सबसे छोटा था तथापि सब का अधिष्ठाता हो गया। इस बात से शहजादे उस से और भी जलने लगे। वे आपस में कहने लगे कि हमारे बूढ़े पिता को जाने क्या हो गया है कि इस परदेशी को इतना चाहने लगा है कि हम सब पर उस का आदेश चलवा दिया है। उन्होंने एक मत से कहा कि यह स्थिति असह्य है।

वे सलाह करने लगे कि इस परदेशी का क्या किया जाए। एक ने राय दी कि इसे अकेला पा कर मार डालेंगे। एक अन्य शहजादे ने कहा कि यह ठीक नहीं है, यह बात छुपी न रहेगी और बादशाह हमें कठोरतम दंड देगा। अंत में एक शहजादे की बात सब को सबको पसंद आई। उस की राय थी कि हम लोग इस से शिकार खेलने की अनुमति लें और इस बहाने निकल कर किसी दूर देश को चले जाएँ, इस से हमारे पिता को चिंता होगी और वह खुद ही इसे मरवा डालेगा। इस उपाय पर सारे शहजादे एकमत हो गए और इस योजना को पूरा करने की तैयारी करके लगे। फिर एक दिन उन्होंने खुदादाद से कहा कि हम कल शिकार के लिए जाना चाहते हैं, शाम तक वापस आ जाएँगे। खुदादाद ने अनुमति दे दी। वे लोग तो फिर लौटे ही नहीं। तीसरे दिन बादशाह ने खुदादाद से पूछा कि शहजादे दिखाई नहीं देते, वे कहाँ चले गए।

खुदादाद ने कहा, सरकार, यह सेवक स्वयं इस चिंता में है। वे मुझ से शिकार की अनुमति ले कर गए थे। आज तीसरा दिन है उनका पता नहीं है। बादशाह को भी चिंता हुई। वह रोज खुदादाद से उनका हाल पूछता और वही उत्तर पाता। अंत में एक दिन उस ने क्रोध में आ कर खुदादाद से कहा, परदेशी, तूने इतना साहस कैसे किया कि शहजादों को शिकार पर भेज दिया और खुद उन के साथ नहीं गया। अब खैरियत इसी में है कि तू खुद उनकी खोज में जा और जहाँ भी मिलें उन्हें ले कर आ। तू उन्हें न लाया तो तेरा सिर उतरवा दूँगा।

खुदादाद बादशाह के क्रोध से डर गया और कुछ धन ले कर घोड़े पर सवार हो कर चला गया। वह नगर-नगर और गाँव-गाँव उन्हें तलाश करता रहा किंतु वे कहीं नहीं मिले। वह अक्सर विलाप किया करता और कहता, मेरे भाइयो, तुम लोग कहाँ हो? तुम किसी दुश्मन के हाथ में तो नहीं पड़ गए? जब तक तुम नहीं मिलते मैं हैरन वापस नहीं जा सकता और तुम्हारा कहीं पता नहीं है। अब उस ने बस्तियों को छोड़ कर जंगलों में उन्हें ढूँढ़ना शुरू किया। इसी खोज में वह एक गहन वन में जा पहुँचा। उस में काले पत्थर का एक विशाल भवन बना हुआ था। वह जा कर उस महल के नीचे खड़ा हो गया और ऊपर देखने लगा। काफी ऊँचे पर एक खिड़की खुली और एक अत्यंत सुंदर स्त्री, जिसके बाल बिखरे और वस्त्र मैले और फटे थे, धीरे-धीरे कुछ कहने लगी। खुदादाद ने कान लगा कर सुना। वह कह रही थी, ओ मुसाफिर, यहाँ से फौरन भाग जा, नहीं तो इस भवन का स्वामी तेरी दुर्दशा कर डालेगा। वह महाविकराल नरभक्षी हब्शी है। उस के पंजे में फँसा हुआ आदमी बचता नहीं। वह परदेशियों को पकड़ लाता है, उन्हें एक अँधेरे तहखाने में बंद कर देता है, फिर उन्हें एक-एक करके भून कर खाता है। खुदादाद ने पूछा, तुम कौन हो? स्त्री बोली, मैं काहिरा की रहनेवाली हूँ। बगदाद जा रही थी। इस वन से निकल रही थी कि यही हब्शी आ गया। इस ने मेरे सेवकों को मार डाला और मुझे इस जगह बंद कर दिया। वह मुझ से भोग करना चाहता है किंतु मैं बचती रही हूँ। आज मैं ने उस की बात नहीं मानी तो वह मुझे मार डालेगा। मैं उस का साथ करने से मर जाना पसंद करती हूँ। किंतु तुम क्यों जान देना चाहते हो? तुम भाग जाओ। वह भटके हुए मुसाफिरों को ढूँढ़ने गया है ताकि अपनी खाद्य सामग्री बढ़ाए। वह आता ही होगा। उस की दृष्टि तीक्ष्ण है, वह बहुत दूर से देख लेता है। तुम चले जाओ।

सुंदरी खुदादाद से यह सब कह ही रही थी कि वह राक्षस जैसा मनुष्य आ पहुँचा। वह पर्वताकार लगता था और बहुत ऊँचे तुरकी घोड़े पर बैठा था। उस की तलवार इतनी भारी थी कि उस के अलावा किसी और से उठ ही नहीं सकती थी और उस की गदा कई मन की थी। खुदादाद उसे देख कर डर गया और ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि इस राक्षस से बचा। हब्शी ने उसे तलवार निकाले देखा किंतु उसे तुच्छ जान कर अपने हथियार न सँभाले बल्कि चाहता था कि वैसे ही उसे हाथों से पकड़ ले। यह देख कर खुदादाद ने घोड़ा बढ़ाया और उस के घुटने पर एक तलवार की चोट की। घाव खा कर हब्शी ने घोर गर्जन किया और अपनी भारी तलवार निकाल कर खुदादाद पर चलाई। खुदादाद पैंतरा बदल कर बच गया वरना वहीं खीरे की तरह कट जाता। अब खुदादाद ने अपनी गदा इस कौशल और ऐसे कोण से चलाई कि हब्शी का हाथ ही कट कर गिर गया और वह घोड़े से नीचे आ रहा। खुदादाद झपट कर पहुँचा और अपनी तलवार से हब्शी का सिर उस के शरीर से अलग कर दिया।

वह सुंदरी खिड़की से यह युद्ध देख रही थी और भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि खुदादाद को विजयी बनाए। हब्शी की मृत्यु देख कर खुशी से फूली न समाई और पुकार कर कहने लगी, भगवान की बड़ी दया हुई। अब तुम इसकी कमर से चाबियों का गुच्छा लो और ताला खोल कर मेरे पास आओ।

वह विशाल हब्शी किले की सारी कुंजियाँ अपने पास ही रखा करता था। खुदादाद उस के पास आया। वह सुंदरी उस के पैरों पर गिरने को उद्यत हुई किंतु खुदादाद ने उसे बीच ही में उठा लिया। सुंदरी उस की प्रशंसा करने लगी और बोली कि मैं ने तुम्हारे जैसा वीर पुरुष और कोई नहीं देखा। खुदादाद ने उसे अभी तक दूर से देखा था, पास से देखा तो पहले की अपेक्षा वह कहीं अधिक सुंदर दिखाई दी। वे दोनों बैठ कर बातें करने लगे।

वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि एक ओर से चिल्लाने का शब्द सुनाई दिया। खुदादाद ने पूछा, यह आवाज कहाँ से आ रही है और उस का क्या मतलब है? सुंदरी ने कमरे के एक ओर बने हुए दरवाजे की और उँगली उठाई, यानी इशारे से बताया कि आवाज इस दरवाजे के पीछे से आ रही है। और पूछने पर वह बोली, यहाँ एक बड़ा-सा कमरा है। उस हब्शी ने यहाँ बहुत-से मनुष्य कैद कर रखे हैं। नए लोगों को ला कर वह यहीं रखता था और प्रतिदिन वहाँ जा कर एक मनुष्य को चुन कर बाहर लाता था और भून कर खा जाता था।

खुदादाद ने कहा कि मैं उन्हें इस कैद से छुड़ाना चाहता हूँ। वे दोनों उस दरवाजे के पास गए और विभिन्न कुंजियाँ लगा-लगा कर उसे खोलने का प्रयत्न करने लगे। कई कुंजियाँ लगने से ताला देर तक खड़खड़ाता रहा। अंदर से आनेवाली चीख-पुकार और बढ़ गई। खुदादाद को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि यह रोना-पीटना क्यों बढ़ गया है। सुंदरी ने कहा कि ताला खड़खड़ाने से वे समझते हैं कि हब्शी आया है और उनमें से किसी को ले जाएगा। उनकी आवाज भी ऐसी थी जैसे किसी गहरे कुएँ के अंदर से आ रही हो। ताला खुलने पर एक लंबा जीना दिखाई दिया। वे उत्तर कर नीचे गए तो देखा कि एक तंग अँधेरी जगह में सौ के लगभग आदमी पड़े हैं जिनके हाथ-पाँव बँधे हैं। खुदादाद बोला, मित्रो, अब भय त्याग दो। भगवान की दया से मैं ने तुम्हारे शत्रु हब्शी को मार डाला है। वे यह सुन कर बड़े खुश हुए।

खुदादाद ने उन के बंधन खोलने शुरू किए। जिनके बंधन खुलते थे वे औरों के भी खोलने लगते थे। इस प्रकार अल्प समय ही में सारे लोग मुक्त हो गए। तहखाने से बाहर निकल कर सबने खुदादाद के पाँव चूमे और उसे आशीर्वाद देने लगे। जब वे महल के बाहर खुले प्रकाश में आए तो खुदादाद ने देखा कि उनमें उस के वे सभी भाई हैं जिन्हें वह ढूँढ़ने निकला था। उस ने कहा, भगवान की बड़ी अनुकंपा है कि तुम लोग सही-सलामत हो। तुम्हारे पिता तुम्हारे वियोग में अति कातर हो रहे हैं। तुम लोगों में से तो कोई राक्षस के पेट में नहीं गया? यह कह कर उस ने उन्हें गिना और शेष समूह से अलग कर दिया। सारे शहजादे एक-दूसरे के गले मिले।

खुदादाद ने सुंदरी से पूछ कर हब्शी के भंडार-गृह का पता लगाया और सब लोगों को भरपेट भोजन कराया। उस ने यह भी देखा कि गोदामों में तरह-तरह की मूल्यवान वस्तुएँ, रत्न, सुगंधियाँ, रेशनी थान, मखमल आदि के ढेर लगे हैं। यह माल हब्शी ने व्यापारियों से लूटा था जिन्हें वह तहखाने के लिए पकड़ लाता था। उस गोदाम में सारे मुक्त बंदियों को ले जा कर खुदादाद ने कहा कि अपना-अपना माल उठा लें। सबने अपनी-अपनी गठरियाँ लीं तो खुदादाद ने शेष वस्तुओं में से भी अधिकांश उन्हें बाँट दीं। किंतु उस ने कहा कि इस सुनसान वन में से तुम लोग इन चीजों को ले कैसे जाओगे। उन्होंने कहा, यह हब्शी हमारे ऊँट और खच्चर भी पकड़ लाता था। वे कहीं बँधे होंगे।

खुदादाद पशुशाला में गया तो उस ने सैकड़ों ऊँटों और खच्चरों के अलावा शहजादों के घोड़े भी बँधे देखे। उनकी रखवाली हब्शी सेवक करते थे। वे सब इन बंदियों को छूटा देख कर समझ गए कि हमारा हब्शी मालिक मारा गया। वे सब जान बचा कर इधर- उधर भाग गए। खुदादाद ने उन्हें जाने दिया। फिर खुदादाद ने उस सुंदरी से कहा, तुम्हें यह हब्शी कहाँ से लाया था? हम तुम्हें वहीं पहुँचा देंगे। यह हैरन के शहजादे तो तुम्हारे देश को जानते ही होंगे, वही तुम्हें पहुँचा देंगे।

लड़की बोली, यह मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि मैं काहिरा की रहनेवाली हूँ। तुमने मेरी जान और इज्जत बचाई, इस के लिए तुम्हारी अति आभारी हूँ। मैं अपना और हाल क्या बताऊँ। बस इतना काफी है कि मैं भी एक शहजादी हूँ। एक दुष्ट ने मेरे पिता को मार डाला और उस के देश को लूट लिया। मैं वहाँ से भागी और यहाँ आ कर इस राक्षस जैसे हब्शी के हाथ पड़ गई। इस पर खुदादाद तथा अन्य शहजादों ने जोर दिया तो वह अपना विस्तृत वृत्तांत इस प्रकार बताने लगी।
 
उस सुंदरी ने कहा कि काहिरा के निकट दरियाबार नाम एक द्वीप है। उस का बादशाह सब प्रकार से सुखी था किंतु उसे संतान न होने का बड़ा दुख था। वर्षों की प्रार्थनाओं और सिद्धों के आशीर्वादों से उस के यहाँ एक पुत्री जन्मी। मैं ही वह अभागी हूँ। मेरे जन्म पर मेरे पिता ने बड़ा समारोह किया। मैं बड़ी हुई तो उस ने मुझे सारी विद्याओं और कलाओं की शिक्षा दिलवाई। उस ने मुझे राज्य के प्रबंध की स्वयं शिक्षा दी। उस का विचार यह था कि उस की मृत्यु के बाद मैं ही राज्य की अधिष्ठात्री बनूँ।

एक दिन मेरा पिता शिकार खेलने गया। उस ने एक हिरन के पीछे घोड़ा डाल दिया और अपने साथियों से बिछुड़ गया। शाम हो गई किंतु हिरन हाथ न आया। मेरा पिता एक पेड़ के नीचे जा बैठा और सोचने लगा कि राजधानी को किस प्रकार वापस हुआ जाए। रात होने पर उस ने देखा कि गहन वन के बीच एक जगह से प्रकाश आ रहा है। वह उधर चला। उसे आशा थी कि यह प्रकाश किसी गाँव से आ रहा होगा किंतु काफी दूर चलने के बाद उस ने देखा कि प्रकाश एक विशाल भवन से आ रहा है। वह उस ओर बढ़ा तो देखा कि घर में एक लंबा-चौड़ा हब्शी बैठा मांस खा रहा है और हाँडियाँ उठा कर उनसे शराब पी रहा है। उस ने यह भी देखा कि पास ही में एक अति सुंदर स्त्री बैठी है जिसके हाथ बँधे हैं और उस के पास ही दो-तीन वर्ष का एक लड़का बैठा है।

मेरे पिता को उस स्त्री पर दया आई और उस ने इरादा किया कि हब्शी को मार कर इस सुंदरी को छुड़ाऊँ। वह अवसर की प्रतीक्षा से खड़ा रहा। हब्शी जब आधा बैल खा चुका और सारी हाँडियों की शराब पी चुका तो स्त्री से कहने लगा, ओ मनमोहनी, तू कब तक मुझ से अलग-अलग रहेगी और कब तक मेरी इच्छा पूरी नहीं करेगी। तू यह तो देख कि मैं तुझ से कितना अधिक प्यार करता हूँ ओर कैसे तेरे ही ध्यान में मरता हूँ। तुझे भी चाहिए कि मुझ से इसी तरह प्रेम करे। स्त्री ने कहा, दुष्ट जंगली, क्या बकवास लगा रखी है। मैं, और तुम से प्रेम करूँगी। पहले अपनी सूरत तो आईने में देख। तू मुझे बराबर दुख दे रहा है। तू चाहे इस से भी अधिक दुख मुझे दे बल्कि मेरी जान भी ले ले तो भी मैं तेरी ओर मुँह कर के थूकूँगी भी नहीं।

हब्शी यह सुन कर क्रोध से पागल हो गया। उस ने उठ कर बाएँ हाथ से स्त्री को पकड़ा और दाहिने से तलवार निकाल कर उस का सिर काटने को उद्यत हुआ। इतने ही में मेरे पिता का छोड़ा हुआ तीर उस की छाती में घुस गया और वह मर कर गिर पड़ा। मेरे पिता ने अंदर जा कर सुंदरी की रस्सियाँ खोलीं और उस से पूछा कि तुम कौन हो और कैसे इस राक्षस के हाथ पड़ी। उस ने कहा, यहाँ से कुछ ही दूर सरासंग नामी एक कबीला रहता है। उस के निवासी अर्धसभ्य हैं। वहाँ का बादशाह मेरा पति है। यह दुष्ट हब्शी, जिसे अभी तुमने मारा है, मेरे पति का दरबारी था। यह मुझ पर बहुत दिनों से मुग्ध था। यह बराबर मुझे भगाने की ताक में रहता था। एक दिन मेरे पति को असावधान देख कर यह मुझे और मेरे इस बच्चे को ले भागा। यहाँ ला कर उस ने मुझे बाँध रखा और रोजाना चाहता था कि मेरे साथ संभोग करे। अभी तक भगवान ने कुछ ऐसी कृपा की कि यह मुझ पर हाथ न डाल सका। आज यह तुम्हारे हाथों मारा गया। मेरे पिता ने कहा, फिक्र न करो, मैं दरियाबार का बादशाह हूँ। मैं तुम्हें अपने महल में ले जाऊँगा। तुम जितने दिन चाहना वहीं रहना। सुंदरी ने यह मान लिया।

दूसरे दिन मेरा पिता उसे और उस के बालक को लिए हुए चला। कुछ देर में मेरे पिता के छूटे हुए साथी भी मिल गए। उन सभी को इस गहन वन में ऐसी सुंदरी को देख कर आश्चर्य हुआ। साथ ही वे बादशाह को देख कर खुश भी हुए। बादशाह ने विस्तारपूर्वक उन्हें बताया कि किस तरह यह युवती हब्शी के पंजे से छुड़ाई गई। बादशाह के साथियों में से एक ने स्त्री और दूसरे ने उस के लड़के को अपने पीछे घोड़े पर बिठा लिया और कुछ दिनों में पूरा काफिला राजमहल में जा पहुँचा।

मेरे पिता ने एक बड़ा और सुंदर महल उस स्त्री को दे दिया। उस ने उस के पुत्र की शिक्षा का भी प्रबंध कर दिया। एक वर्ष तक उस स्त्री ने अपने पति की राह देखी किंतु उस का कुछ भी समाचार न मिला तो उस से निराश हो गई और मेरे पिता को रिझाने लगी। वह उस से पहले ही आकृष्ट था इसलिए दोनों का विवाह हो गया। वह बच्चा भी कुछ वर्षों में सजीला जवान हो गया। वह सारी विद्याओं और राज्य संचालन आदि में भी प्रवीण हो गया। मेरे पिता और दरबार के सारे लोग उसे बहुत पसंद करने लगे। सब की राय हुई कि उस जवान के साथ मेरा विवाह कर दिया जाय और मेरे पिता के बाद राज गद्दी उसी को मिले। मेरे पिता भी इस से सहमत हो गए और वह नौजवान अपने भविष्य की कल्पना में मग्न रहने लगा।

किंतु मेरे पिता ने शादी की एक शर्त यह रखी कि वह फिर किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं करेगा। मुसलमानों में चार विवाह तक जायज हैं, इसलिए यह शर्त उसे अपमानजनक लगी और उस ने यह शर्त अस्वीकार कर दी। चुनांचे विवाह न हुआ। वह इस बात से बहुत नाराज हुआ और बदला लेने के लिए षड्यंत्र करने लगा। एक दिन अवसर पा कर उस ने मेरे पिता को मार डाला और मेरी हत्या के इरादे से मेरे महल में आया। किंतु हमारे मंत्री ने मुझे पहले ही एक गुप्त मार्ग से निकाल लिया था। मंत्री ने एक मित्र के घर रखा। दो दिन में एक जहाज के कप्तान से बात करके मुझे ऐसे बादशाह के देश की ओर रवाना कर दिया जिसका राजा मेरे पिता का मित्र था।

जहाज चला तो सब ठीक-ठाक था कि किंतु कुछ दिनों बाद ऐसा तूफान आया जिसे देख कर कप्तान और नाविक तक गश खा कर गिर पड़े। कुछ ही देर में जहाज के टुकड़े-टुकड़े हो गए और उस में के सब लोग डूब गए। किंतु मुझे एक तख्ता मिल गया जिस पर मैं बैठ गई और एक दिन बाद किनारे आ लगी। किंतु मुझे यह नहीं मालूम था कि भगवान ने और दुख देने के लिए मेरी जान बचाई है। मैं किनारे लगी और मैं ने भगवान को धन्यवाद दिया। मैं बहुत देर तक तलाश करती रही कि शायद मंत्री या जहाज का कोई अन्य व्यक्ति मुझे जीवित मिल जाए किंतु ऐसा नहीं हुआ।

मैं अपने पिता की याद करके और उस निर्जन स्थान में अपने को निपट अकेला पा कर रोने लगी और सोचने लगी कि समुद्र में डूब मरूँ।

इतने में मैं ने अपने पीछे कई मनुष्यों और घोड़ों की आवाज सुनी। पलट कर देखा तो कई घुड़सवार थे जिनके हाथों में शस्त्रास्त्र थे और जिनके मध्य एक नवयुवक था। वह जवान जरी की पोशाक पहने था और रत्नजटित पेटी कमर में बाँधे था। उनको मुझे उस स्थान पर देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन के नायक नवयुवक ने, जो वास्तव में एक शहजादा था, मेरे पास यह जानने के लिए भेजा कि मैं कौन हूँ और वहाँ कैसे पहुँची। उस आदमी ने तरह-तरह से मेरा हाल पूछा। मुझे और भी भय लगा कि यह लोग न जाने कौन हैं और जाने मेरी क्या दशा करें। इसलिए मैं जोर-जोर से रोने लगी। वह परेशान हो कर लौट गया। फिर शहजादे ने कई लोगों को एक साथ मेरे पास भेजा। उन लोगों ने भी मुझ से बहुत पूछा किंतु मैं रोती रही और मैं ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन लोगों ने तट पर बहुत-से तख्ते, मस्तूल आदि टूटे हुए पाए और समझ गए कि कोई जहाज टूट कर डूबा है और यह लड़की उस में से बच कर किनारे आ लगी है।

उन्होंने जा कर यह बात शहजादे को बताई। वह स्वयं मेरे पास आ कर मृदुलता से मेरा हाल पूछने लगा। उस ने यह भी कहा कि तुम अपना हाल बताओगी तो हम तुम्हारी मदद करेंगे और मैं तुम्हें अपनी माँ के पास ले जाऊँगा जो तुम्हें बड़े प्यार से रखेगी। मैं ने उसे पूरा हाल बताया। मेरा हाल सुन कर उस के आँसू आ गए। उस ने मुझे हर तरह से धैर्य बँधाया। फिर वह मुझे अपने साथ ले गया और अपनी माता का सौंप दिया। मैं ने उस वृद्धा को अपनी कहानी सुनाई तो उसे भी बड़ा दुख हुआ। वह मुझे पसंद तो पहले ही से करती थी इसलिए उस ने अपने पुत्र के साथ मेरा विवाह कर दिया।

किंतु यहाँ तक मुझे पहुँचा कर मेरी किस्मत फिर पलट गई। उस राज्य का एक पड़ोसी राजा उस का पुराना दुश्मन था। जिस रोज मेरी सुहागरात होनी थी उसी दिन उस ने आक्रमण कर दिया।

उस की सेना अति विशाल थी और उस ने कुछ घंटों ही में नगर को रौंद डाला। उस ने मेरे पति को और मुझे पकड़ने के लिए आदमी भेजे किंतु हम पहले ही बच निकले और छुपते-छुपाते समुद्र तट पर रात के समय पहुँचे। वहाँ एक मछुवारे की नाव बँधी थी। हम दोनों उसे खोल कर समुद्र में बढ़ने लगे। कुछ दूर जा कर वह नाव एक समुद्री धारा में पड़ गई। हमें कुछ नहीं पता था कि नाव किधर जा रही है। दो दिन बाद देखा कि एक जहाज हमारी ओर आ रहा है। हम समझे कि वह कोई व्यापारी जहाज है। इसलिए हमने सहायता के लिए आवाज दी। लेकिन यहाँ फिर धोखा हुआ। जहाज पर पाँच-सात डाकू थे। वे गदाएँ लिए हुए हमारी डोंगी पर आए और हमे बाँध कर अपने जहाज पर ले गए।

जहाज पर उन्होंने मेरा नकाब उठाया तो सब ठगे-से रह गए क्योंकि उन्होंने ऐसी सुंदर स्त्री कभी नहीं देखी थी। फिर उनमें झगड़ा होने लगा। हर एक चाहता था कि मेरा मालिक बने। फिर उनमें तलवार चलने लगी और एक अति बलवान डाकू को छोड़ कर सभी मारे गए। उस डाकू ने कहा, मैं तुझे काहिरा ले जा कर एक मित्र को भेंट करूँगा, उस ने मुझ से एक सुंदर दासी माँगी थी। लेकिन यह आदमी कौन है? तेरा भाई-बंद है या प्रेमी? मैं ने बताया कि यह मेरा पति है तो वह बोला, फिर तो इसका दुख दूर होना चाहिए, इस से तेरी दशा कब तक देखी जाएगी। यह कह कर उस ने मेरे पति को बँधा-बँधा ही समुद्र में डाल दिया।

मैं बहुत रोई-पीटी और पति के पीछे समुद्र में कूदने को तैयार हो गई किंतु डाकू ने मुझे मस्तूल से बाँध दिया और जहाज को चलाने लगा। वायु अनुकूल थी। और हमारा जहाज कुछ ही दिनों में एक छोटे-से नगर के तट पर आ लगा। डाकू ने वहाँ कई दास और कई ऊँट मोल लिए और स्थल मार्ग से काहिरा की ओर प्रस्थान किया। हम कई दिनों की यात्रा के बाद इस जंगल से गुजर रहे थे तो हमने उस राक्षस जैसे हब्शी को अपनी ओर आते देखा। पहले हमें आश्चर्य हुआ कि यह मीनार कैसे चल रही है। पास पहुँचा तो देखा कि आदमी है।

इस दुष्ट ने पास आ कर अपनी गदा उठाई और डाकू से कहा, अपने आदमियों के हाथ बाँध और अपने भी बाँध और इस सुंदरी को ले कर मेरे पीछे चला आ। किंतु डाकू और उस के दासों ने उस के साथ युद्ध किया फिर वे सब के सब मारे गए। नर भक्षी ने और लाशें छोड़ कर सिर्फ डाकू की लाश एक ऊँट पर रखी और ऊँट पर मुझे बिठाया और इस किले में ले आया। यह कल ही की बात है। शाम को उस ने डाकू की लाश को भून कर खाया और मुझे सारा हाल बताया कि किस तरह वह खाने को आदमी लाया करता है और कैसे उस ने तहखाने में आदमी बंद कर रखे हैं कि अगर किसी दिन नया भोजन न मिले तो इन्हीं में से किसी को भून खाए। उस ने कहा, मांस तो तेरा भी नरम होगा किंतु मैं तुझे मारूँगा नहीं बल्कि तुझ से विलास करूँगा। आज तो तू थकित और दुखी है इसलिए आज छोड़ता हूँ कल से तुझे मेरी शैय्या पर सोना पड़ेगा। किंतु इस की नौबत नहीं आई, आज तुमने इसे मार डाला।

खुदादाद ने कहा, अब तुम कुछ फिक्र न करो। यह उनचास शहजादे हैरन राज्य के हैं, इनमें से जिसके साथ तुम चाहो तुम्हें ब्याह दिया जाए। उस ने कहा, मैं तो अपने उद्धारकर्ता को ब्याहना चाहती हूँ। अन्य लोगों ने भी उस का समर्थन किया और वहीं खुदादाद के साथ दरियाबार को शहजादी ब्याह दी गई।

वह दिन तो विवाह समारोह और हँसी-खुशी में बीता, दूसरे दिन सब लोग वहाँ से हैरन की ओर चल दिए। दिन भर चलने के बाद शाम को एक अच्छी जगह देख कर उन्होंने रात के लिए पड़ाव डाला। शाम को भोजन करके सब ने खूब शराब पी। इसी उल्लास में खुदादाद सब लोगों के सामने अपनी पत्नी से बोला, अभी तक मैं ने सभी से अपनी वास्तविकता छुपाई थी। अब मैं अपना सच्चा हाल कहता हूँ। मैं भी इन उनचास शहजादों का भाई यानी हैरन के बादशाह का पुत्र हूँ। मुझे मेरे चचेरे भाई शहजादा सुमेर ने पाला-पोसा है। मेरी माँ का नाम पीरोज है। अब तुम्हें इस बात से भी संतोष होना चाहिए कि तुमने साधारण व्यक्ति से नहीं, एक शहजादे से विवाह किया है। दरियाबार की शहजादी ने कहा, तुमने अपने को छुपाया जरूर किंतु मुझे तुम्हारी चाल-ढाल और व्यवहार से अंदाजा हो गया था कि तुम अवश्य ही राजकुमार होंगे। साधारण आदमी में वे बातें बिल्कुल नहीं होतीं जो तुम में हैं।

खुदादाद के सौतेले भाई यह सुन कर प्रकटतः तो बड़े प्रसन्न हुए किंतु उन के दिलों में बैर की आग सुलगने लगी। वे चुपके-चुपके आपस में परामर्श करने लगे। वे इस बात को भूल गए कि एक दिन पहले ही खुदादाद ने उन्हें मौत के मुँह से बचाया था। उनमें से एक ने कहा, इसे विदेशी समझ कर तो हमारे पिता ने इसे हमारा अभिभावक बना दिया है, जब उसे मालूम होगा कि यह उस का पुत्र है तो स्पष्टतः इसे सारा राज-पाट सौंप देगा और हम कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए अच्छा है कि हम इसे यहीं खत्म कर दें। इस पर सारे शहजादे एकमत हो गए। उन्होंने रात गए खुदादाद के खेमे में घुस कर उस पर गदाओं की चोटें कीं और जब वह निश्चेष्ट हो गया तो स्वयं सारे ऊँट और सामान ले कर रात ही रात हैरन की ओर रवाना हो गए। हैरन पहुँच कर उन्होंने अपने पिता की चिंता यह कह कर दूर कर दी कि हम लोग बहुत दिन तक शिकार खेलते रहे। उन्होंने हब्शी के हाथों अपनी गिरफ्तारी और खुदादाद द्वारा मुक्ति की बात बिल्कुल छुपा ली।

उधर सुबह जब शहजादी ने खुदादाद के खेमे में उस का हाल देखा और शहजादों को गायब पाया तो वह सारी बात समझ गई और पति के लिए विलाप करने लगी। कुछ देर में जब उस का शोक कुछ कम हुआ तो उस ने ध्यान में खुदादाद को देखा। उस ने उस की साँस भी कुछ चलती देखी ओर शरीर भी गर्म पाया। वह खेमे को बंद करके एक निकटवर्ती कस्बे में गई और वहाँ से एक जर्राह को ले आई। किंतु वापस आ कर देखा तो खुदादाद अपने खेमे में नहीं था। उस ने समझा कि इस बीच कोई खूनी जानवर आ कर उसे उठा ले गया। अब वह सिर पीट-पीट कर रोने लगी। जर्राह दयावान था। वह उसे कस्बे में ले गया और एक मकान में उसे रख कर उस की सेवा के लिए दो दासियाँ नियुक्त कर दीं और कभी-कभी खुद भी जा कर हाल-चाल पूछ लेता।

एक दिन उस ने शहजादी को उदास देख कर कहा, सुंदरी, तुम कुछ विस्तार से अपना हाल कहो तो तुम्हारी सहायता का प्रयत्न करूँ। शहजादी ने उसे अनुभवी और हमदर्द देखा तो अपना और खुदादाद का हाल सुनाया। जर्राह को मलिका पीरोज का हाल मालूम था जिसे हैरन के बादशाह ने फिर अपने पास बुला लिया था और उस ने जान लिया था कि खुदादाद उसी का पुत्र था। जर्राह ने किराए पर दो ऊँट लिए और शहजादी के साथ हैरन को रवाना हुआ और एक सराय में पहुँच कर डेरा डाला। सरायवाले से नगर का हाल पूछने पर उस ने बताया, बादशाह अपने पुत्र खुदादाद के गायब होने से बहुत परेशान है। उस की माँ पीरोज ने उसे बहुत ढुँढ़वाया किंतु कहीं पता नहीं है। उस की याद करके उस के माँ-बाप और सरदार-सामंत सभी दुखी रहते थे। यूँ तो बादशाह के और भी उनचास बेटे हैं किंतु खुदादाद को कोई नहीं पहुँचता। वास्तव में खेद की बात है कि ऐसा शहजादा लापता हो जाए।

जर्राह ने दरियाबार की शहजादी को यह बताया तो बादशाह के पास जा कर उसे पूरा हाल बताने के लिए तैयार हो गई। जर्राह ने कहा, यह ठीक नहीं है। इसमें खतरा है। उनचास शहजादों में से किसी को भी तुम्हारे बारे में मालूम हुआ तो तुम्हारे बादशाह के पास पहुँचने के पहले ही वे तुम्हें मरवा देंगे। अच्छा यह होगा कि वह स्वयं खुदादाद की माँ के पास किसी तरह पहुँचूँ और जब उसे पूरा हाल बता दूँ तो तुम्हें बुलाऊँ। तब तक के लिए तुम यहीं सराय में ठहरो।

शहजादी ने यह मान लिया। जर्राह शहर में गया तो एक बड़े रास्ते में देखा कि एक भव्य महिला एक ऊँट पर सवार आ रही है। उस ऊँट का साज-सामान बहुत ही मूल्यवान था और उस ऊँट के पीछे बहुत-से गुलाम चल रहे थे। पुरवासी भी ऊँट को देख कर विनयपूर्वक सड़के के किनारे खड़े हो जाते और उस का अभिवादन करते थे। जर्राह ने भी एक किनारे खड़े हो कर उस का अभिवादन किया।

फिर उस ने एक आदमी से पूछा कि यह कौन है। उस ने बताया कि यह खुदादाद की माँ मलिका पीरोज है। यह सुन कर जर्राह उस की सवारी के पीछे लग गया। उस महिला ने एक मसजिद में जा कर नमाज पढ़ी और निर्धनों तथा भिखारियों को खूब दान दिया। बादशाह ने उस से कहा था कि तुम खुदादाद की वापसी का आशीर्वाद पाने के लिए भिखारियों को खूब दान दिया करो। जर्राह भीड़ में घुस गया और उस ने एक दास से कहा कि मैं मलिका से बात करना चाहता हूँ। उस ने कहा, भाई, इस समय तो उसे रात-दिन खुदादाद की ही चिंता है। वह इस विषय के अलावा किसी से कोई बात नहीं करती। जर्राह ने दास के कान में कहा, मुझे इसी बारे में उस से बात करनी है। दास ने कहा, अच्छी बात है। लेकिन रास्ते में तो बात हो नहीं सकती, तुम हमारे साथ महल तक चलो फिर मैं बात करवाने की कोशिश करूँगा।

महल पहुँच कर दास ने मलिका पीरोज से कहा कि एक परदेशी आप से बात करना चाहता है और कहता है कि आप ही के लाभ की बात है। मलिका ने जर्राह को अपने सामने बुलाया और कृपापूर्वक पूछा कि क्या बात है। जर्राह ने धरती चूम कर कहा कि मैं एक लंबी कहानी कहना चाहता हूँ। यह कह कर उस ने हब्शी से शहजादों और दरियाबार की शहजादी की रिहाई और फिर उस के घायल और लापता होने का हाल कहा।

पीरोज यह सुन कर बेहोश हो गई। दासियाँ गुलाब और केवड़े का पानी छिड़क कर उसे होश में लाईं। फिर उस ने जर्राह से कहा कि तुम सराय जा कर बहू शहजादी को मेरा और बादशाह का आशीर्वाद दो। यह कह कर उस ने जर्राह को विदा किया और खुद खुदादाद को याद करके रोने लगी।

कुछ देर में बादशाह वहाँ आया और मलिका से उस के रोने का कारण पूछा। पीरोज ने जो कुछ उस जर्राह से सुना था वह विस्तार से कह सुनाया।

शहजादों की कमीनगी सुन कर बादशाह को आग लग गई। वह कुछ कहे-सुने बगैर दरबार में आया। उस का लाल चेहरा देख कर सारा दरबार थर्रा उठा। बादशाह ने मंत्री को आदेश दिया कि हजार सिपाही ले जा कर उनचासों शहजादों को पकड़ो और रस्सियों में बाँध कर खूनी कैदियों के बीच डाल दो। मंत्री ने कुछ ही देर में इस आदेश का पालन किया और आ कर बादशाह को यह सूचना दे दी। बादशाह ने ऐलान किया कि एक महीने तक दरबार नहीं होगा।

फिर वह मंत्री के साथ मलिका पीरोज के महल में आया। कुछ देर के सलाह- मशविरे के बाद उस ने मंत्री को आदेश दिया कि अमुक सराय में जा कर दरियाबार की शहजादी और जर्राह को आदरपूर्वक यहाँ ले आओ। मंत्री एक सजा-सजाया ऊँट और एक उम्दा घोड़ा ले कर सराय को गया और ऊँट पर शहजादी और घोड़े पर जर्राह को सवार करा के चला। मार्ग में यह सवारी बड़ी शान से निकली और सभी को मालूम हो गया कि शहजादा खुदादाद की पत्नी दरियाबार की शहजादी है। सब लोग खुश हुए, उन्हें आशा बँधी कि अब शहजादे का भी पता चल जाएगा। सवारी जब महल के द्वार पहुँची तो तो बादशाह खुद अगवानी के लिए आया। शहजादी ने सवारी से उतर कर बादशाह और मलिका के पाँव चूमे। फिर तीनों गले मिल कर खुदादाद की याद में देर तक रोते रहे।

जब उन लोगों की तबीयत कुछ सँभली तो दरियाबार की शहजादी ने कहा कि मुझे आशा है कि जिन लोगों ने मेरे निर्दोष पति की इतनी निर्दयता से हत्या की हैं उनसे इसका बदला लिया जाएगा। बादशाह ने कहा, तुम भरोसा रखो यद्यपि वे मेरे पुत्र हैं तथापि मैं उन्हें जीता न छोड़ूँगा। उस के बाद वह कहने लगा, अपने बेटे खुदादाद का शव नहीं मिला है फिर भी मैं चाहता हूँ कि उस की याद बनाए रखने के लिए एक मकबरा बनवाऊँ। इस के बाद उस ने मंत्री को आदेश दिया। मंत्री ने नगर के बीच में एक जगह ले कर उस में सफेद संगमरमर का एक विशाल और सुंदर मकबरा कुशल कारीगरों से बनवा दिया। बादशाह को जब यह सूचना मिली कि मकबरा तैयार है तो उस ने एक दिन तय किया जब सारे लोग वहाँ जा कर मातम और कुरान पाठ करें।

वह दिन भी आ पहुँचा। नगर के सभी निवासी मकबरे पर पहुँच गए। बादशाह भी अपने दरबारियों और सरदारों-सामंतों के साथ वहाँ पहुँचा। कब्र पर एक काली मखमल की सुनहरे काम की चादर बिछी थी। बादशाह और अमीर उस पर बैठे। कुछ देर बाद फौजी सवारों की एक टुकड़ी आई। इस के जवान सिर नीचा और आँखें आधी बंद किए थे। उन्होंने कब्र की दो बार परिक्रमा की और फिर कब्र के सामने खड़े हो कर बोले, राजपुत्र, यदि हमारी शक्ति और शौर्य से तुम जीवित हो सको तो हम अपने प्राण दे कर भी तुम्हें जीवित कर देंगे किंतु यदि ईश्वर की इच्छा कुछ और हो तो हम लोग मजबूर हैं। यह कह कर वे लोग चले गए। फिर एक गिरोह महात्माओं का आया जो कुटीरों में रहते थे और किसी से मिलते-जुलते नहीं थे। उनका अगुआ एक वृद्ध था जिसने एक मोटी पुस्तक अपने सिर पर रखी थी। वे भी कब्र की तीन बार परिक्रमा कर के कब्र के सामने खड़े हो गए और बोले, हे राजकुमार, यदि हमारी सारी तपस्याओं के फलस्वरूप तुम पुनः जीवित हो जाओ तो हम इस के लिए तपस्याओं का फल अर्पित कर देंगे। यह कहने के बाद वे लोग भी जिधर से आए थे उधर ही चले गए।

इस के बाद सफेद टट्टुओं पर सवार और भव्य वस्त्राभूषण पहने सिरों पर रत्नों की मंजूषाएँ लिए हुए पचास अतीव सुंदर कुमारियाँ आईं। उन्होंने भी कब्र की कई बार परिक्रमा की। फिर उनमें सबसे अल्पायु और सुंदर स्त्री कब्र के सामने खड़े हो कर बड़े उच्च स्वर में बोली, शहजादे, हम तुम्हारी दासियाँ है। हमारा सौंदर्य तुम पर न्योछावर है। यदि इस के बदले तुम्हें जीवनदान मिले तो हम इस के लिए प्रस्तुत हैं। यद्यपि हमें ज्ञात है कि तुम जिस स्थान पर हो वहाँ यह चीजें काम नहीं आतीं। यह कहने के बाद सुंदरियों का गिरोह भी चला गया।

फिर बादशाह अपने दरबारियों और सरदारों के साथ खड़ा हो गया। इन सब ने भी तीन बार कब्र की परिक्रमा की। फिर बादशाह उच्च स्वर में बोला, ओ शहजादे, तुम कहाँ हो? तुम्हारे वियोग में मेरी आँखों की ज्योति जाने लगी है। यह कह कर वह फूट-फूट कर रोने लगा। उस के साथ के लोग भी रोने और मातम करने लगे। कुछ देर बार सब लोग अपने-अपने स्थानों को लौट गए और मकबरे का दरवाजा बंद कर दिया गया। बादशाह ने नियम बना दिया कि सप्ताह में एक दिन शहजादे के मकबरे पर इसी तरह का मातम हुआ करे।

फिर बादशाह ने आज्ञा दी कि उस के उनचास दुष्ट पुत्रों को निर्दोष खुदादाद की हत्या के अपराध में मृत्युदंड दिया जाए। सारे नगर में यह समाचार फैल गया। उन के लिए फाँसी की टिकटियाँ तैयार की जाने लगीं। लेकिन इस बीच एक व्यवधान उपस्थित हो गया। बादशाह द्वारा पहले पराजित हुआ एक शत्रु राज्य पर एक बड़ी सेना ले कर चढ़ दौड़ा। बादशाह ने खेदपूर्वक कहा कि आज खुदा बख्शे, साथ ही उस ने पराजय की स्थिति में भाग जाने की तैयारी भी कर रखी थी। युद्ध अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि एक ओर से सवारों की एक बड़ी टुकड़ी आई। पहले किसी को मालूम न था कि वे मित्र हैं या शत्रु किंतु उन्होंने आ कर शत्रु पर हमला किया और उसे मार भगाया।

हैरन का बादशाह बड़े आश्चर्य में पड़ा कि यह दैवी सहायता कहाँ से आ गई। उस ने भगवान को धन्यवाद दिया और अपने भृत्यों से कहा कि सहायक सेना में जा कर पूछो कि उस का सरदार कौन है और कहाँ से आया है। भृत्यों ने जा कर उस के सिपाहियों से पूछा तो उन्होंने कहा कि हमारा सरदार खुद ही बादशाह से मिलने जाएगा। शत्रुओं का संपूर्ण रूप से सफाया करने के बाद जब बादशाह की खुशी का ठिकाना न रहा तो वह इतना अभिभूत हुआ कि कुछ बोल भी न सका।

खुदादाद ने कहा, पिता जी, मैं आप का पुत्र खुदादाद ही हूँ जिसे आप सब लोग मरा हुआ समझते थे। ईश्वर ने मुझे शायद इसीलिए जीवित रखा कि मैं आज के कठिन समय पर आप के काम आऊँ। बादशाह ने कहा, बेटे, मुझे तो विजय से अधिक तेरे मिलने की प्रसन्नता है। मैं तो यह आशा ही छोड़ बैठा था कि कभी तेरा मुँह देख सकूँगा। इस के बाद पिता-पुत्र दोनों अपनी सवारियों से उतरे और एक-दूसरे से लिपट गए। बादशाह ने कहा, मुझे तुम्हारी वीरता की गाथा पहले ही मालूम हो चुकी है कि किस तरह तुमने हब्शी दानव को मार कर अपने भाइयों को छुड़ाया किंतु उन्होंने तुम से दगा किया। अब तुम अपनी माँ के पास चलो क्योंकि वह तुम्हारे वियोग से सूख कर काँटा हो गई है।

रास्ते में खुदादाद ने पूछा, मेरा हाल आप को मेरे भाइयों ने बताया? बादशाह ने कहा, वे दुष्ट क्या बताते। वे तो बंदीगृह में मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं। मुझे यह सब तुम्हारी पत्नी यानी दरियाबार की शहजादी ने बताया। उसी ने मुझ से माँग की कि तुम्हारे भाइयों से तुम्हारी मौत का बदला लूँ। खुदादाद यह सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ कि उस की पत्नी भी सही-सलामत यहीं पर मौजूद है। खुदादाद महल में पहुँचा तो उस की माँ और उस की पत्नी ने उसे गले लगा कर बहुत देर तक रोती रहीं। प्रजाजनों को मालूम हुआ कि खुदादाद जीवित है और अंत के युद्ध का विजेता है तो सारे नगर में उत्सव होने लगे और जगह-जगह पर नाच-गाना और खेल-तमाशे होने लगे।

बादशाह के पूछने पर खुदादाद ने अपना हाल यह बताया, जब मेरे भाइयों ने मुझे मरा जान कर रात में प्रस्थान किया तो सुबह वहाँ से एक किसान निकला। उस ने मुझे अचेत और रक्तरंजित देखा तो अपने गाँव में उठा लाया। उस ने मेरे घावों पर जड़ी-बूटियाँ पीस कर लगाईं और मुझे अच्छा कर दिया। स्वस्थ हो कर मैं सोच रहा था कि मैं यहाँ आऊँ। इतने में सुना कि आप का पुराना शत्रु आप पर आक्रमण करनेवाला है। मैं ने कई गाँवों के जवान इकट्ठे किए। वे सब आप की रक्षा के लिए जान देने को तैयार हो गए। मैं ने उनकी फौज बनाई और अवसर रहते आप की सेवा में आ गया।

बादशाह ने खुदादाद की बड़ी प्रशंसा की और मंत्री को आदेश दिया कि उनचास पुत्रों को फाँसी दी जाए। खुदादाद ने हाथ जोड़ कर कहा, निस्संदेह न्याय की दृष्टि से उन्हें यही दंड मिलना चाहिए। किंतु आखिरकार वे आप के पुत्र और मेरे भाई हैं। मैं ने हृदय से उनका अपराध क्षमा किया और आप से भी निवेदन करता हूँ कि उन्हें क्षमा करें। बादशाह ने कहा कि तुम कहते हो तो मैं उन्हें क्षमा करता हूँ। खुदादाद ने बंदीगृह से अपने भाइयों को बुलाया। उस ने एक बार फिर उसी तरह उन के बंधन खोले और उन्हें गले लगाय जैसे हब्शी दैत्य के महल में किया था। प्रमुख नागरिकों और सामंतों ने खुदादाद के हृदय की विशालता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बादशाह ने खुदादाद को उसी समय युवराज और राज्य का स्वामी घोषित कर दिया। उस ने जर्राह और खुदादाद के सहायक किसान को अपार धन-संपदा दे कर विदा किया और खुदादाद के सैनिकों को भी इनाम दिया।

शहरजाद ने यह कहानी खत्म की तो दुनियाजाद ने इस की बड़ी प्रशंसा की। शहरजाद ने कहा कि मेरे पास एक और अति मनोरंजक कथा सोते-जागते आदमी की है, यदि बादशाह मुझे प्राणदंड न दे तो मैं यह कहानी भी सुनाऊँगी, क्योंकि सवेरा हो गया है और कल ही कहानी सुनाई जा सकती है। बादशाह ने दूसरे दिन नई कहानी आरंभ करने की अनुमति दे दी।
 


शहरजाद ने कहा कि खलीफा हारूँ रशीद के जमाने में बगदाद में एक धनी व्यापारी था। उस का एक ही पुत्र था जिसका नाम अबुल हसन था। व्यापारी बड़ा कंजूस था। वह धन एकत्र ही करता था, खर्च बहुत कम करता था। इसलिए जब वह मरा तो उस ने बेहद धन-दौलत छोड़ी। अबुल हसन का स्वभाव इस से उलटा था। उस ने जब पिता का धन पाया तो दोनों हाथों से खर्च करने लगा। उस ने अपने मित्रों को खूब पैसा दिया। फिर उस ने अपनी दौलत के दो भाग किए। एक से उस ने मकान खरीदे जिनका किराया उस के सारे जीवन के लिए काफी था। दूसरे को उस ने पूर्ववत रागरंग पर लुटाना शुरू कर दिया। उस के यहाँ हमेशा नाच-गाना होता था और शराब चलती थी। वह अपने मित्रों के साथ अति मूल्यवान पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करता था। नाच-गाने की महफिलों के साथ भाँड़ और अन्य लोग उसे तरह-तरह के तमाशे दिखाते थे।

इस प्रकार एक ही वर्ष में अबुल हसन ने अपने पिता का सारा संचित धन खर्च कर डाला। जब उस ने मित्रों को दावतें देना छोड़ दिया तो उन्होंने भी उस के घर आना छोड़ दिया। यद्यपि वे सब अबुल हसन के कारण धनवान हो गए थे तथापि उन्होंने खराब भावना प्रदर्शित की। वे उस से राह-बाट में मुँह चुराने लगे। अगर वह किसी को रोक कर बात भी करता तो वह कोई बहाना बना कर अपनी राह चला जाता।

अबुल हसन को अपने मित्रों की इस अमैत्री से बड़ा क्षोभ हुआ। अक्सर पछताया करता कि मैं ने ऐसे लोगों पर क्यों धन लुटाया जिनकी आँखों में बिल्कुल शील नहीं है। एक दिन वह इसी चिंता में अपनी माँ के पास बैठा था। माँ ने उस से उदासी का कारण पूछा, क्योंकि वह साधारणतः प्रफुल्लित रहता था। वह कुछ न बोला तो माँ ने कहा, मैं जानती हूँ कि तुम्हें क्या दुख है। तुमने इस बीच बड़ी मूर्खता की कि अपना सारा धन लुटा दिया। मैं जानती थी कि तुम एक दिन धनहीन हो जाओगे। मैं तुम्हें तुम्हारी हरकतों से रोकती भी थी किंतु तुम तो अपनी लफंगे दोस्तों के फेर में पड़े थे। तुमने मेरी बात नहीं मानी। अब वे स्वार्थी और नीच लोग तुम्हारी बात कहाँ पूछते होंगे।

अबुल हसन ने कहा, वे मुझ से बात तो कम करते हैं किंतु वे नीच नहीं मालूम होते। संभव है कि वे अधिक व्यस्त हो गए हैं। मैं उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे ॠण माँगता हूँ। मुझे विश्वास है कि वे इस से इनकार नहीं करेंगे। यह कह कर वह एक-एक करके उन सभी के पास गया और उनसे व्यापार आरंभ करने के लिए ॠण माँगने लगा। किंतु सबने टका-सा जवाब दे दिया यद्यपि वह धन जिस पर वे ऐश कर रहे थे अबुल हसन ही का था। उनमें से कई ने तो अबुल हसन को फटकार भी दिया।

अब वह माँ के पास आ कर बोला, तुम ठीक कहती थीं। वे सभी बड़े दुष्ट और नीच हैं। मैं अब किसी व्यक्ति को मित्र नहीं बनाऊँगा। उस ने अपने बचे हुए धन को सँभाला, कुछ मुल्यवान गृह सामग्री बेच कर कुछ रुपया इकट्ठा किया और छोटा-मोटा व्यापार शुरू किया। शाम को वह नदी के पुल पर चला जाता और एक परदेशी को घर ले आता, उसे स्वादिष्ट भोजन कराता और आधी रात तक उस से बातें करता। फिर सुबह उसे विदा करके कहता कि अब तुम कभी मेरे घर न आना।

उस की यह हरकत इसलिए थी कि उसे अकेले भोजन करने की आदत नहीं थी। इसलिए खाने पर किसी को साथ रखता। मैत्री वह करना भी नहीं चाहता था। उस के मेहमानों में से अगर उसे संयोगवश कोई व्यक्ति बाद में किसी स्थान पर मिल जाता था तो वह उस की ओर से मुँह फेर लेता था और अगर वह अबुल हसन से कुछ बात करना चाहता था तो यह ऐसा बन जाता जैसे उसे पहले कभी देखा ही नहीं हो।

एक दिन अपनी दैनिक चर्या के अनुसार अबुल हुसन पुल पर किसी अकेले परदेशी की प्रतीक्षा में बैठा था। इसी समय खलीफा हारूँ रशीद केवल एक दास को ले कर उधर से निकला। खलीफा का नियम था कि वह कभी-कभी वेश बदल कर प्रजा का हाल देखने के लिए निकला करता था। इस समय भी उसे पहचानना संभव नहीं था। खलीफा के प्रशासन में मंत्रियों और अधिकारियों की कमी नहीं थी किंतु वह प्रजा की कठिनाइयाँ अपनी आँखों से देखना चाहता था।

इस समय खलीफा ने मोसिल के व्यापारी का रूप धरा था। और किसी आकस्मिक दुखदायी स्थिति से निपटने के लिए एक विशालकाय दास भी अपने साथ रखा था। अबुल हसन ने यही समझा कि वह मोसिल से आनेवाला कोई व्यापारी है। वह उस के समीप गया और सलाम करने के बाद उस से कहने लगा कि आप परदेशी हैं, मुझ पर इतनी कृपा कीजिए कि मेरी कुटिया पर चल कर रूखा-सूखा भोजन कीजिए और रात को वहीं शयन भी कीजिए।

खलीफा को आश्चर्य हुआ कि कोई ऐसा दानवीर हो सकता है जो खुद जा कर परदेशियों को अपने घर आ कर भोजन और शयन को कहे। अबुल हसन का चेहरा-मोहरा और बातचीत का ढंग भद्रतापूर्ण था। खलीफा की इच्छा हुई कि उस के बारे में कुछ विस्तारपूर्वक जाने। इसलिए उस ने अबुल हसन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। अबुल हसन ने उसे एक सजे-सजाए कमरे में बिठाया, जहाँ झाड़-फानूस आदि लगे थे। फिर उस के सामने स्वच्छ और मूल्यवान पात्रों में भाँति-भाँति के स्वादिष्ट व्यंजन ला कर रखे। उस की माँ पाक कला में प्रवीण थी और अपने पुत्र की प्रसन्नता के विचार से खुद ही भोजन बनाती थी। उस ने तीन तरह के सालन परोसे। एक मुर्गे के मांस का, एक कबूतर के मांस का और एक भुने हुए मांस का। भोजन की मात्रा इतनी अधिक थी कि कई व्यक्ति उस से तृप्त हो सकते थे। अबुल हसन खलीफा के सामने बैठ कर उस के साथ भोजन करने लगा। खलीफा ने भोजन की बड़ी प्रशंसा की।

भोजनोपरांत खलीफा के दास ने जल पात्र ला कर दोनों के हाथ धुलाए। फिर अबुल हसन की माँ ने बादाम और अन्य मेवे भिजवाए। कुछ रात ढलने पर अबुल हसन शराब की सुराहियाँ और प्याले लाया और उधर माँ से कहा कि मेहमान के गुलाम को पेट भर भोजन करा दे। फिर उस ने एक प्याला भर कर खलीफा को दिया और खलीफा के पीने के बाद प्याले में बची शराब खुद पी गया। खलीफा ने भी इस के जवाब में ऐसा ही किया। खलीफा ने अबुल हसन का शिष्ट व्यवहार देख कर उस का नाम, परिवार आदि पूछा। उस ने कहा कि मेरी कथा विचित्र है। खलीफा ने उसे सुनाने पर जोर दिया।

अबुल हसन बोला, मेरा नाम अबुल हसन है। मेरा स्वर्गीय पिता एक साधारण किंतु खाता-पीता व्यापारी था। उस के मरने पर उस का धन मुझे मिला। मैं ने अपनी नादानी में उस धन का अपव्यय कर दिया। मेरे पास कई दुष्ट प्रकृति के लोग मित्र बन कर आ गए और मैं ने उन पर अपना सारा धन लुटा डाला। जब मेरे पास कुछ नहीं रहा और उन्होंने देखा कि मैं अंदर से ढोल की तरह खोखला हो गया हूँ तो उन्होंने मेरे घर आना-जाना छोड़ दिया। मेरे पास धन की कमी हो गई थी। इसलिए व्यापार करने के लिए मैं ने उनसे उधार माँगा किंतु सभी ने मुझे धता बताया। मैं ने समझ लिया कि यह सभी लोग बड़े स्वार्थी और लज्जाहीन हैं। मैं ने भी उनसे संबंध तोड़ लिया और प्रण किया कि बगदाद के कमीने निवासियों से कोई सरोकार नहीं रखूँगा। हर रात को एक परदेसी को अपने साथ ला कर भोजन कराऊँगा और सवेरे उसे विदा करने के बाद उस से भी आगे के लिए कोई संबंध नहीं रखूँगा। इसी तरह मैं आज तुम्हें लाया हूँ।

खलीफा अबुल हसन की बातों से बहुत खुश हुआ। उस ने कहा, भाई, तुमने यह बड़ा अच्छा किया कि ऐसे स्वार्थी और नीच मित्रों का साथ छोड़ दिया। अब तुम वास्तव में सुख से होंगे। तुम्हारी यह आदत भी बड़ी अच्छी है कि एक विदेशी को केवल एक रात के लिए मेहमान बनाते हो फिर उस से कोई संबंध नहीं रखते। सच पूछो तो मुझे तुम्हारे भाग्य पर ईर्ष्या हो रही है।

फिर वह काफी देर तक मैत्री वार्ता और हँसी-मजाक करते रहे। फिर खलीफा ने कहा, अब सोना चाहिए क्योंकि कल मुझे बहुत दूर की यात्रा करनी है। मैं सुबह तुम्हारे जागने के पहले चला जाऊँगा। किंतु तुमने बड़ी सुंदरता से मेरा आतिथ्य सत्कार किया है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे अहसान का बदला दूँ। तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो। अबुल हसन ने कहा, मुझे भगवान ने मेरी जरूरतों से ज्यादा दिया है, मेरी कोई इच्छा नहीं। मेरा तुम पर कोई अहसान नहीं है। परदेशियों का सत्कार कर के मुझे खुद ही खुशी होती है। यह तो तुम्हारी कृपा है कि तुमने मुझे वह खुशी दी है।

खलीफा ने कहा, फिर भी तुम्हारी कोई इच्छा तो होगी ही। अबुल हसन ने कहा, मेरी इच्छा सुनोगे तो मुझ पर हँसोगे और मुझे पागल समझोगे। खलीफा ने फिर भी जोर दिया तो अबुल हसन बोला, तुम जानते ही हो कि बगदाद में हजारों गलियाँ हैं। प्रत्येक गली में एक या एक से अधिक मसजिदें हैं। हर एक मसजिद में एक मुअज्जिन होता है जो पाँचों वक्त नमाज के लिए अजान दिया करता है। इस गली की मसजिद का मुअज्जिन एक बूढ़ा है। वह बड़ी दुष्ट प्रकृति का आदमी है और मुहल्लेवालों की हानि करके और उन्हें कष्ट देने के उपाय सोचता रहता है। उस के चार साथी भी हैं जो उस की दुष्टता में उस का साथ देते हैं। वे उसी मुअज्जिन के घर में जा कर अपनी दुष्टतापूर्ण योजनाएँ बनाते हैं। उन लोगों से सभी को कुछ न कुछ क्षति पहुँची है। मुझे भी उनकी वजह से परेशानी हो रही है। मुझे तो उन लोगों की सूरत देख कर भी घृणा होती है।

खलीफा ने कहा, यह तो तुमने किस्सा बताया, अपनी इच्छा तो नहीं बताई। अबुल हसन बोला, अगर भगवान अपनी शक्ति से मुझे खलीफा हारूँ रशीद की तरह तख्त पर बिठा दे तो मैं इन पाँचों को यथोचित दंड दूँगा। खलीफा ने कहा, उन्हें क्या दंड दोगे? अबुल हसन बोला, बूढ़े को चार सौ कोड़े और उस के साथियों को सौ-सौ कोड़े लगवाऊँगा।

खलीफा बड़ा विनोदप्रिय था। उसे मजाक का एक मौका मिला। उस ने कहा, मित्र, मैं भी चाहता हूँ कि ऐसे दुष्टों को ऐसा ही कठोर दंड मिले। ईश्वर की लीला अपरंपार है। कुछ असंभव नहीं कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो और तुम पाँचों दुष्टों को यथोचित दंड दे सको। मैं तो व्यापारी मात्र हूँ और वह भी परदेशी। मुझे अधिकार होता तो मैं उन लोगों को तुम्हरे हाथ से दंड दिलवाता। अबुल हसन ने कहा, तुम निश्चय ही मुझे पागल समझ कर मेरा मजाक उड़ा रहे हो। भला मुझे ऐसा अधिकार कैसे मिल सकता है? खलीफा ने कहा, मैं मजाक नहीं उड़ा रहा, विशेषतः तुम्हारे जैसे उदार और शिष्ट व्यक्ति का कैसे मजाक उड़ाऊँगा जिसने मेरा ऐसा सत्कार किया है। खलीफा को तुम्हारी बात मालूम होगी तो वह भी तुम्हारी बात का समर्थन करेगा।

फिर खलीफा ने कहा, अब सोना चाहिए, बहुत रात हो गई है। अबुल हसन बोला, ठीक बाते है। यह थोड़ी-सी शराब रह गई है। हम लोग उसे खत्म कर दें फिर सोने के लिए जाएँ। हाँ, एक बात कहनी है। सवेरे तुम्हारी आँख खुले तो मुझ से विदा लिए बगैर चले जाना और दरवाजा बंद कर जाना। खलीफा ने कहा, अच्छी बात है। लेकिन एक बात मेरी चलेगी। अभी तक तुमने प्याले भर-भर कर शराब पिलाई है, यह बाकी बची शराब मैं तुम्हें पिलाऊँगा। अबुल हसन ने मान लिया। खलीफा ने एक प्याला खुद पिया फिर एक प्याला भर कर अबुल हसन को दिया और उस में नजर बचा कर बेहोशी की दवा, जिसे वह अपने साथ लाया था, मिला दी। बेहोशी की दवा बहुत तेज थी। उस ने फौरन अपना असर दिखाया। अबुल हसन ने खाली प्याला भी बड़ी कठिनाई से जमीन पर रखा। उस का सिर घुटनों में जा लगा। खलीफा यह देख कर खूब हँसा।

फिर खलीफा ने अपने दास को बुलाया। वह भोजन कर के आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़ा ही था। खलीफा ने कहा, इस आदमी को उठा कर कंधे पर रख कर ले चल। और इस मकान को अच्छी तरह पहचान ले। जब मैं आदेश दूँ तो महल से इस आदमी को इसी तरह ला कर इसी जगह छोड़ जाना। दास ने आसानी से अबुल हसन को कंधे पर लाद लिया और खलीफा ने चलते समय मकान का दरवाजा बंद कर दिया। महल में जा कर वह दास को लिए हुए चोर दरवाजे से अंदर पहुँचा। वहाँ बीसियों दास-दासियाँ खलीफा के शयन कक्ष के बाहर उस की प्रतीक्षा में थे।

खलीफा ने आज्ञा दी, इस आदमी को मेरे जैसे शयनवस्त्र पहनाओ और मेरे पलंग पर सुलाओ। तुम सब लोग रात भर जागते रहो। सुबह जागने के समय तुम लोग उसी प्रकार इसे प्रणामादि करना जैसे मुझे करते हो। इसकी आज्ञा का पालन भी यथावत करना ओर इसे खलीफा कह कर संबोधित करना। उन सबों ने कहा, बहुत अच्छा, हम ऐसा ही करेंगे। फिर खलीफा बाहर आया और उस ने मंत्री को उस के घर से बुला कर कहा, मेरे पलंग पर सोए हुए इस आदमी को देख लो। कल यह मेरे राजसी वस्त्र पहन कर मेरी जगह सिंहासन पर बैठेगा। तुम सब लोग इस के साथ ऐसा ही बरताव करना जैसा मेरे साथ करते हो। मेरे कोष से जो कुछ इनाम वगैरह किसा को दिलाए फौरन दे देना और इसी तरह जो दंड किसी को दिलवाए वह भी देना। सवेरे सभी दरबारी इसका स्वागत ऐसे ही करें जैसा मेरा करते हैं। फिर उस ने महल के प्रबंधक मसरूर को भी आदेश दिया कि हर सुबह जिस तरह मुझे नमाज पढ़ने के लिए जगाया करते हो वैसे ही इसे भी जगाया करना और अन्य व्यवहार भी ऐसे ही करना।

यह आदेश दे कर खलीफा बगल के एक कमरे में जा कर सो रहा। सुबह वह जल्दी ही जाग गया और परदे के पीछे छुप कर देखने लगा कि अबुल हसन क्या करता है और क्या बोलता है। उधर खलीफा के आदेशानुसार सारे कर्मचारी और दास-दासियाँ खलीफा के अपने शयन कक्ष में अबुल हसन की सेवा के लिए एकत्र थे। जब नमाज का समय हुआ तो मसरूर ने, जो अबुल हसन के सिरहाने खड़ा हुआ था, उस की नाक के नीचे सिरके में भीगा हुआ स्पंज रखा। सिरके की तेज गंध से अबुल हसन को छींक आई और उस ने खखार कर बलगम निकालना चाहा तो एक दासी ने आगे बढ़ कर उसे एक सोने के उगालदान में ले लिया। यह इसलिए किया जाता था कि नीचे बिछे हुए मूल्यवान कालीन गंदे न हो जाएँ और खलीफा को नित्य प्रति इसी तरह सिरके में डूबा स्पंज सुँघा कर जगाया जाता था ताकि वह उठ कर नमाज पढ़े।

अबुल हसन ने आँखें खोल कर अतिशय सुसज्जित शयन कक्ष देखा जिस में कीमती परदे लगे थे और जिस की दीवारों और छत पर रंग-बिरंगी सुंदर चित्रकारी की हुई थी। उस ने यह भी देखा कि अति सुंदर नवयौवना दासियाँ बीसियों की संख्या में खड़ी हैं, किसी के हाथ में उगालदान है किसी के हाथ में मोरछल, कइयों के हाथों में वाद्य यंत्र थे। महलों की रखवाली करनेवाले ख्वाजासरा (जनखे) भी सुनहरी पोशाक पहने खड़े थे। उस ने अपने पलंग के लिहाफ और चादर को भी देखा कि वे गुलाबी रंग के कमख्वाब नामी कपड़े के बने थे और उनमें हीरे-मोती की झालरें लटकती थीं। इसी प्रकार मसहरी आदि भी सोने की बनी हुई थी। पास ही एक तिपाई पर खलीफा का ताज रखा था।

यह देख कर अबुल हसन ने सोचा कि यह सब कुछ वास्तविक नहीं हो सकता। उस ने सोचा, गत रात्रि को मैं ने खलीफा होने की बात कहीं थी इसीलिए मुझे स्वप्न में यह चीजें दिखाई दे रही हैं। यह सोच कर वह फिर आँखें बंद करके सोने का प्रयत्न करने लगा। इस पर एक ख्वाजासरा पास आया और हाथ जोड़ कर बोला, हे दीनबंधु कृपासिंधु प्रजावत्सल महाराज, यह समय सोने का नहीं है। सूर्योदय होने ही वाला है। कृपा करके शैय्या त्याग करें और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना के लिए नमाज पढ़ें। अबुल हसन को यह सुन कर आश्चर्य हुआ किंतु उस ने अब भी इसे स्वप्न समझा और एक बार खोल कर फिर आँखें बंद कर लीं। ख्वाजासरा ने फिर विनय की, सरकार सुबह की नमाज का समय हो गया है। अब तुरंत शैय्या त्याग करें वरना नमाज का समय निकल जाएगा और आप को पश्चात्ताप होगा।

अब अबुल हसन को विश्वास हो गया कि यह स्वप्न नहीं है। स्वप्न इतनी देर तक ठहरा नहीं करता। उस ने आँख खोल कर देखा तो सुबह का उजाला फैल रहा था। उसे दिन के प्रकाश में भी वही चीजें दिखाई दीं जो कुछ देर पहले दीपकों के प्रकाश में देखी थीं। वह पलंग से उठ गया और बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे विश्वास हो गया था कि भगवान ने उस की सुन ली है और खलीफा का पद उसे प्रदान किया है। परदे के पीछे बैठा हुआ खलीफा अलग उसी दशा का आनंद ले रहा था। इतने में एक दासी ने सामने आ कर उस के पाँव चूमे और गाने-बजानेवाली दासियों ने मधुर संगीत छेड़ दिया। संगीत की लहरियों ने उसे आत्म-विस्मृत कर दिया और वह सोचने लगा कि यह सब क्या हो रहा है। उस ने आँखों पर हथेलियाँ रख लीं और सोचने लगा कि यह सुनहरे वस्त्र पहने हुए दास और यह मनमोहिनी नवयौवना दासियाँ और यह मधुर संगीत क्या है और कहाँ से आ गया। यह भी स्वप्न तो नहीं है, यह सोच कर वह अपनी आँखों पर हथेलियाँ रगड़ने लगा।

इतने में ख्वाजासरा मसरूर आया और सिर झुका कर बोला, सरकार, क्या कारण है कि आज आप ने नमाज अदा नहीं की? क्या रात को आप की नींद में व्याघात हुआ था? क्या, भगवान न करे, आप का शरीर कुछ अस्वस्थ है? अब सरकार उठ कर नित्य कर्म करें और फिर दरबार में पदार्पण करें। वहाँ सभी दरबारी और सामंत आप की राह देख रहे हैं। मसरूर की बातें सुन कर अबुल हसन को और विश्वास हुआ कि मैं जाग रहा हूँ और यह सब कुछ स्वप्न नहीं है किंतु उस की समझ में अब भी नहीं आया कि मुझे खलीफा पद कैसे प्राप्त हो गया। उस ने मसरूर से पूछा, तुमने यह बातें किस आदमी से कही हैं? किसे तुम बादशाह और खलीफा कहते हो? मैं ने तो तुम्हें कभी नहीं देखा। तुमने शायद किसी और के धोखे में मुझे खलीफा समझ लिया है?

मसरूर ने कहा, पृथ्वीपालक, आप यह क्या कह रहे हैं? क्या आप इस सेवक की परीक्षा ले रहे हैं? क्या आप ही खलीफा नहीं हैं? और क्या समस्त संसार में आ पका आदेश नहीं माना जाता? आप की कृपा हम सब पर रहे। जान पड़ता है आप ने रात कोई दुःस्वप्न देखा है जिस से यह अजीब बातें कर रहे हैं।

मसरूर की यह बातें सुन कर अबुल हसन हँसने लगा। हँसते-हँसते वह मसनद पर पीठ के बल गिर पड़ा। खलीफा को भी जोरों की हँसी आई और वह ठट्टा मार कर हँसनेवाला ही था कि उस ने यह सोच कर अपनी हँसी दबा ली कि कहीं अबुल हसन आवाज न पहचान पाए। अबुल हसन बहुत देर तक हँसता रहा। फिर वह उठ बैठा और एक लड़के को, जिस का रंग मसरूर की तरह काला था, बुला कर पूछने लगा कि सच बता मैं कौन हूँ। उस के लड़के ने सविनय निवेदन किया कि आप खलीफा हैं। अबुल हसन ने कहा, तू बड़ा झूठा है, इसी कारण तेरा रंग काले कुत्ते जैसा हो गया है। लड़के ने कहा, सरकार विश्वास कीजिए कि मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, आप वास्तव में खलीफा हैं।

अबुल हसन की समझ में अब भी नहीं आ रहा था कि यह सब लोग क्या कह रहे हैं। उसे फिर स्वप्न देखने का संदेह हुआ। उस ने पास खड़ी हुई एक दासी से कहा, हाथ बढ़ा कर मेरा हाथ अपने हाथ में ले और दाँतों से मेरी उँगली का पोर काट। दासी तो यह जानती थी कि खलीफा छुप कर सारी बातें देख रहा है। वह आगे बढ़ी और उस ने अबुल हसन की उँगली का पोर धीमे से दाँत के तले दबाया। कष्ट हुआ तो अबुल हसन ने अपना हाथ खींच लिया और कहा, हे भगवान, मैं रातोंरात ही खलीफा किस तरह बन गया। फिर उस ने एक बार और दासी से पूछा, तुझे भगवान की सौंगध है, सच कह कि क्या मैं वास्तव में तेरा स्वामी और खलीफा हूँ। उस ने कहा, निस्संदेह आप हमारे स्वामी खलीफा हैं।

जब अबुल हसन उठने लगा तो एक दास ने उसको सहारा दिया। जब वह खड़ा हुआ तो सारे महल में जयघोष उठने लगा और सारे ख्वाजासराओं और दासियों ने आगे बढ़ कर दुआएँ दीं कि भगवान आज दिन भर आप पर प्रसन्न रहें। अबुल हसन सोचता रहा कि यह क्या बात है, कल तक मैं अबुल हसन था आज खलीफा कैसे बन गया, कैसे मुझे अचानक ही यह महान पद मिल गया। फिर सेवकों ने उसे राजसी परिधान पहनाया और दरवाजे तक दोनों ओर पंक्तिबद्ध हो कर खड़े हो गए। शाही महल के प्रबंध कर ख्वाजासरा मसरूर उस के आगे चलता हुआ उसे दरबार तक ले गया।

अबुल हसन दरबार के कक्ष के अंदर जा कर सिंहासन के समीप इस प्रतीक्षा में खड़ा हो गया कि उसे सिंहासन पर चढ़ाया जाए। दो बड़े सरदारों ने उस की बाँह पकड़ कर सहारा दिया और उसे तख्त पर बिठा दिया।

वह ज्यों ही तख्त पर बैठा कि चारों ओर से सलामी की आवाजें उठने लगीं। वह यह जयघोष सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ। उस ने अपने दाएँ-बाएँ निगाह डाली तो देखा कि राज्य के बड़े-बड़े सरदार सिर झुकाए और हाथ बाँधे खड़े हैं। उस ने एक-एक कर के सारे सरदारों का अभिवादन स्वीकार किया। फिर राज्य का मंत्रि, जो सिंहासन के पीछे खड़ा था और दरबार का इंतजाम देख रहा था, अबुल हसन के सामने आया और फर्शी सलाम करके उसे दुआ देने लगा, भगवान आप को लाखों बरस की उम्र दे और सदैव अपनी कृपा आप के ऊपर बनाए रखे। भगवान करे कि आप के मित्र और शुभचिंतक सुखी और आप के शत्रु परास्त रहें। यह सब देख कर अबुल हसन को पूर्ण विश्वास हो गया कि मैं स्वप्न नहीं देखता, वास्तव में खलीफा बन गया हूँ।

फिर मंत्री ने उस से कहा कि महल के बाहर सेना पंक्तिबद्ध खड़ी है, आप उस का निरीक्षण करें। अबुल हसन सारे सरदारों के साथ बाहर गया और उस ने एक ऊँचे चबूतरे से फौज की सलामी ली। वह फिर दरबार में वापस हुआ और मंत्री ने प्रजा के आवेदन पत्र उस के सामने पेश किए। उनकी समझ में जैसा आया उसे वैसा ही फैसला किया। फिर मंत्री ने राज्य के समाचार सुनाने शुरू किए। अभी यह समाचार पूरे नहीं हुए थे कि अबुल हसन ने शहर के कोतवाल को बुलाया। वह आया तो उसे अपनी गली का नाम बता कर कहा, तुम सिपाहियों को ले कर वहाँ जाओ। वहाँ की मसजिद में एक बूढ़ा मुअज्जिन है। उसे तलवे ऊपर करके उन पर चार सौ डंडे लगवाओ और उस के चार साथियों को सौ कोड़े लगवाओ। फिर उन सबों को ऊँट पर पीछे की ओर मुँह करवा कर नगर भर में फिराओ ओर एलान कराते जाओ कि जो लोग अपने पड़ोसियों को दुख पहुँचाते हैं उनका यही परिणाम है। इस के बाद पाँचों आदमियों को नगर से निष्कासित करो। कोतवाल ने जा कर चुपके से खलीफा से पूछा तो उस ने इसकी अनुमति दे दी क्योंकि उसे अबुल हसन पहले से उन सभी की दुष्टों की बातें बता चुका था। कोतवाल यह आदेश पा कर अबुल हसन की गली में गया और दरबार में आ कर सूचना दी कि मैं ने खलीफा का आदेश पूरा कर दिया है। अबुल हसन ने मुस्कुरा कर उस से कहा, हम तुम्हारी मुस्तैदी से बहुत खुश हुए। खलीफा परदे के पीछे बैठा हुआ यह सब देख रहा था और इस तमाशे का आनंद ले रहा था। इस के बाद अबुल हसन ने आज्ञा दी, खजाने से एक हजार अशर्फियों का एक तोड़ा ले जाया जाए और उसी गली में, जिस में यह मुअज्जिन था, रहनेवाले व्यक्ति अबुल हसन की माँ को दिया जाए।

वह बुढ़िया तो यह सब तमाशा जानती नहीं थी। वह धन पा कर बड़ी प्रसन्न हुई और सोचने लगी कि खलीफा कैसे मुझ पर कृपालु हो गया। अबुल हसन के बारे में उस ने सोच लिया था कि कहीं घूमने-फिरने निकल गया होगा।

जब अबुल हसन राजकाज से निवृत्त हुआ तो सारे दरबारी और सरदार उसे सलाम करके विदा हो गए और उस के पास केवल मंत्री और प्रबंधक ख्वाजासरा मसरूर रह गए। फिर मंत्री की सहायता से अबुल हसन सिंहासन से नीचे उतरा और उसी भवन की ओर जाने लगा जहाँ से वह दरबार में आया था। रास्ते में अबुल हसन को दिशा जाने की जरूरत पड़ी। मसरूर ने एक ओर उसे ले जा कर शाही शौचालय खोल दिया। वह न केवल अति स्वच्छ था अपितु उस में मखमल का फर्श था। अंदर जाने के पहले उस के एक अंगरक्षक ने एक सुनहरे काम का स्लीपर, जिसे पहन कर खलीफा दिशा को जाता था, दिया। अबुल हसन उस का उपयोग नहीं जानता था इसलिए उस ने जूते को अपनी ढीली आस्तीन में रख लिया। इस बात पर मंत्री और मसरूर दोनों को बड़ी हँसी आई किंतु खलीफा के भय से उसे दबा गए। मंत्री ने कहा, सरकार, आप को शायद याद नहीं रहा। यह जूता शौचालय में पहन कर जाने के लिए होता है। यह सुन कर उस ने जूता पहन लिया।

शौचालय से निकलने पर मसरूर उसे भोजन के कक्ष में ले गया। उस के पहुँचते ही वहाँ का द्वार खोल दिया गया और सेवकगण गानेवालियों को बुलाने चले गए। जब वह भोजन करने को तैयार हुआ तो गानेवालियों ने मधुर स्वर में गाना-बजाना शुरू कर दिया। अबुल हसन को यह सब देख कर अति प्रसन्नता हुई और वह सोचने लगा कि मैं कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहा। फिर उस ने कहा कि यह स्वप्न नहीं हो सकता, स्वप्न इतना लंबा नहीं होता। मुझे अभी तक यह वहम था कि मैं खलीफा नहीं हूँ, कोई और हूँ किंतु वास्तविकता यह है कि मैं ही खलीफा हूँ क्योंकि मैं ने दंड और दान के जो आदेश दिए सब पर कार्य हुआ।

उस स्थान पर ढेर सारे सोने-चाँदी के बरतन थे और सात सुंदर दासियाँ उस के समीप गाना-बजाना कर रही थीं। छत में अति सुंदर सात झाड़ लगे थे जिनमें कपूर की बनी मोमबत्तियाँ जल रही थीं। फर्श पर चमचमाते भोजन पात्र रखे थे और कोनों में सात सुनहरी अँगीठियों में भाँति-भाँति की सुगंधियाँ जलाई जा रही थीं और सुंदर वस्त्रीभूषण पहने सात दासियाँ उस की सेवा के लिए खड़ी थीं। उन के हाथों में मोरछल और हलके पंखे थे जिनके हत्थों में रत्न जड़े हुए थे। अबुल हसन यह सब देख कर खुश हो रहा था। फिर वह भोजन के आसन पर बैठा। उस के बैठते ही सातों दासियाँ मोरछल और पंखियाँ झलने लगीं। अबुल हसन उन्हें देख कर खुश हुआ। वह बोला, तुम लोगों में से हर एक बारी-बारी से मोरछल हिलाए और बाकी मेरे साथ बैठ कर खाएँ।

चुनांचे उस ने तीन को अपनी दाईं और तीन को बाईं ओर बिठा लिया। वे उस के आदेश पर बैठ तो गईं किंतु खलीफा के भय से उन्होंने भोजन को हाथ नहीं लगाया।

अबुल हसन ने देखा तो मुस्कुरा कर बोला, तुम लोग खाना क्यों नहीं खा रही हो? वे सब चुप रहीं। फिर उस ने उन के नाम पूछने शुरू किए। एक ने अपना नाम मेहताब, दूसरी ने हसीना, तीसरी ने माहलका, चौथी ने नजीफा, पाँचवीं ने हूरे-जिनाँ और सातवीं ने अपना नाम साइका बताया। अब उस ने हँस कर मोरछल झलनेवाली दासी से कहा कि तुम भी अपना नाम बताओ। उस ने कहा कि मेरा नाम माहे-मुनीर है। खलीफा यह सब तमाशे देख कर आनंद ले रहा था कि एक बाहरी अनाड़ी व्यक्ति खलीफा बन कर किस तरह व्यवहार करता है।

जब अबुल हसन ने भोजन से हाथ खींचा तो प्रतीक्षारत सेवकगण जल्दी से आगे आए। एक ने उस के हाथों के नीचे चिलमची रखी और दूसरे ने पानी धार डाल कर उस के हाथ धुलाए। भोजन से निवृत्त होने पर सेवकगण उसे कक्ष में ले गए जहाँ उसे मसनद पर बिठा दिया गया। इस कक्ष की सजावट भोजन कक्ष से अधिक थी। उस में छत से सात कंदीलें लटक रही थीं जिनमें लाल जड़े हुए थे और उन के अंदर कई-कई बत्तियाँ जल रही थीं। उस की दीवारों पर कुशल कारीगरों द्वारा बनाए गए प्राकृतिक दृश्यों के रंगीन चित्र अंकित थे। उन के नीचे सूखे मेवों और ताजे फलों की सात कश्तियाँ लगी थीं। वहाँ भी अति सुंदरी सात दासियाँ और वे परम सुंदरी थीं। अबुल हसन उन पर भी मोहित हो गया और सबसे उन के नाम पूछने लगा और अपने हाथ से उन्हें मेवे खिलाने लगा।

फिर मसरूर उसे तीसरे कमरे में ले गया। वहाँ पर सात समूह गानेवालियों के थे। यह गायिकाएँ पिछली सभी गायकाओं से अधिक कुशल थीं। उन के अलावा सात अति सुंदर दासियाँ सात पात्र लिए खड़ी थीं जिनमें तरह-तरह के शरबत भरे थे। वहाँ उस के जाते ही गाना बजाना शुरू हुआ। उस ने थोड़ा-थोड़ा शरबत चख कर दासियों से कहा कि तुम्हें जो शरबत पसंद हो वह पी लो। उस ने इन दासियों से भी नाम पूछे ओर उन के बताने पर खूब खुश हुआ। वह बहुत देर तक उनसे हास-परिहास भी करता रहा। खलीफा भी छुपे-छुपे उस की सारी हरकतें देखता रहा और मजे लेता रहा।

सूर्यास्त होने पर ख्वाजासरा मसरूर अबुल हसन को चौथे कमरे में ले गया। वह भी वैसा ही सजा हुआ था जैसे और कमरे थे, बल्कि उनसे भी कुछ अधिक ही सजा हुआ था। इसमें हीरों जड़े सात फानूस थे जिनमें कपूर की बनी मोमबत्तियाँ जल रहीं थी और यह बत्तियाँ इतनी अधिक थीं कि कमरे में दिन जैसी रोशनी हो रही थी। कमरे के बाहरी दालान में गायिकाओं और वादिकाओं के सात समूह बैठे हुए थे और अपनी-अपनी कला का वे सभी प्रदर्शन कर रही थीं। वास्तव में वे अपनी-अपनी कलाओं में इतनी पारंगत थीं कि संसार में शायद कोई कलाकार उनकी स्पर्धा करने के योग्य नहीं होगा।

उन गायिकाओं के अतिरिक्त बहुत-सी अति सुंदर दासियाँ, जिनमें से हर एक अपने रूप से पूर्ण चंद्र को लजानेवाली थीं, बहुमूल्य वस्त्राभूषण पहने खड़ी थीं। उन के हाथों में सुनहरे पात्र थे। उनमें तरह-तरह के कुलचे, मिठाइयाँ और अन्य प्रकार की गजक थी जिसे मद्यपान के साथ प्रयोग किया जाता है। कमरे में एक ओर चाँदी की सात सुराहियाँ शराब की रखी थीं। उन के पास ही सात प्याले बिल्लौर पत्थर के बने हुए रखे थे। बगदाद नगर की यह रीति थी कि जितने बड़े आदमी थे वे दिन में मद्यपान से परहेज रखते थे बल्कि शराब का नाम भी अपनी जिह्वा पर नहीं लाते थे किंतु रात को घरों में छुप कर मद्यपान जरूर करते थे। यही रीति खलीफा के महल में चलती थी।
 
अबुल हसन जब इस मद्यपान के कक्ष में आया तो उस ने देखा कि यहाँ की दासियाँ पिछले कक्षों की सभी दासियों से अधिक सुंदर और आकर्षक हैं। उस ने उन्हें देखा तो देखता ही रह गया। उस की आवाज भी गले में फँसने लगी क्योंकि वह उन के सौंदर्य से अत्यधिक अभिभूत हो गया था। उस का जी चाहने लगा कि उन सुंदरियों के साथ हास-परिहास करूँ। किंतु संगीत के स्वर इतने ऊँचे उठ रहे थे कि कुछ कहना-सुनना मुश्किल था। अतएव उस ने ताली बजाई जिसका अर्थ था कि संगीत बंद हो जाए। अतएव संगीत बंद कर दिया गया। अबुल हसन ने अपने पास खड़ी हुई एक दासी को हाथ पकड़ कर अपने समीप बिठाया और पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है। उस ने कहा कि मेरा नाम सिलके-गुहर (मोती माला) है। अबुल हसन बोला, जिसने तुम्हारा नाम रखा है उस ने नाम रखने में कंजूसी की है। वास्तविकता यह है कि तुम्हारी दंत-पंक्ति हीरे की माला की तरह चमकती है। मैं सोच कर कोई इस से अच्छा तुम्हारा नाम रखूँगा। अब तुम अपने कोमल हाथों से भर कर मुझे मद्य का एक प्याला दो ताकि मैं तुम्हारे मुख की और देखता हुआ उसे पियूँ।

सिल्के-गुहर ने तुरंत ही स्वच्छ और सुगंधित मदिरा से भर कर एक प्याला अबुल हसन को दिया जिसे उस ने तुरंत ही खाली कर दिया। फिर अबुल हसन ने उस से कहा कि एक प्याला शराब तुम भी पियो। सिल्के-गुहर ने उस के आदेश पर एक प्याला भर कर पी लिया। शराब पी कर सिल्के-गुहर ने एक अति नवीन राग बाँसुरी पर गाया। इस राग को सुन कर अबुल हसन झूमने लगा।

इस के बाद अबुल हसन ने अपने हाथ से उसे एक फल खिलाया। और दूसरी दासी को अपने पास बिठा कर उस से उस का नाम पूछा। उस ने कहा कि मेरा नाम माहजबीं (चंद्रमा सदृश माथेवाली) है। अबुल हसन बोला, तुम्हारा भी नाम इस से अधिक सुंदर होना चाहिए था क्योंकि तुम्हारी आँखें चंद्रमा से भी अधिक प्रकाशवान हैं। उस ने उस के हाथ से भी शराब पी और उसे पीने को कहा और उसे भी फल खिलाया। इसी प्रकार उस ने सातों दासियों के हाथ से मदिरा पी और पिलाई और उसे काफी नशा हो गया और उस की आँखें बंद होने लगीं।

अब परदे के पीछे छुपे हुए खलीफा ने सिल्के-गुहर नाम की दासी को इशारा किया। दासी ने एक प्याला शराब का भरा और उस में बेहोशी की दवा डाल कर अबुल हसन के सामने लाई और बोली, हुजूर, अब इस रात का आखिरी जाम मेरे हाथ से पिएँ। इस के बाद मैं एक राग सुनाऊँगी। वह राग मैं ने आज सुबह ही बनाया है और अभी तक किसी और ने उसे नहीं सुना है। अबुल हसन ने एक ही साँस में सारा प्याला पी लिया। दासी ने बाँसुरी ले कर वह राग बजाया जिसे उस ने नवीनतम राग कहा था। अबुल हसन ने उसे पसंद किया और दुबारा सुनाने को कहा। जब दासी ने दुबारा वह राग सुनाया तो अबुल हसन ने चाहा कि उस की प्रशंसा करे। किंतु उस पर बेहोशी की दवा का पूरा असर हो गया इसलिए उस के मुँह से आवाज न निकल सकी और वह मुँह खोल कर रह गया। उस की आँखें बंद हो गईं और उस के हाथ-पाँव ऐसे ढीले हो गए जैसे किसी गश खाए हुए आदमी के हो जाते हैं। उस के हाथ से मद्यपान गिरने लगा जिसे एक दासी ने दौड़ कर सँभाल लिया।

अबुल हसन बेहोश हो गया तो खलीफा परदे के पीछे से निकल आया। उस ने अबुल हसन के शाही वस्त्र उतरवाए और उस के अपने कपड़े उसे पहनवा दिए। फिर उस ने उसी विशालकाय दास को आदेश दिया कि इसे इस के घर में लिटा आ और वापसी में द्वार खुला छोड़ देना। वह उसे उठा कर महल के चोर दरवाजे से निकला और जैसा खलीफा ने कहा था वैसा ही किया। खलीफा ने वहाँ उपस्थित लोगों को कहा, यह आदमी भगवान से प्रार्थी था कि एक दिन के लिए खलीफा बन जाऊँ तो गली के मुअज्जिन और उस के साथियों को दंड दूँ। मैं ने इसे यह अवसर दे दिया।

सुबह बेहोशी दूर होने पर जब अबुल हसन की आँख खुली तो से आश्चर्य हुआ कि मैं इस साधारण घर में किस तरह आ गया। वह महल की दासियों सिल्के-गुहर, मेहताब आदि को आवाज देने लगा कि तुम कहाँ मर गई हो, मेरी सेवा के लिए क्यों नहीं आतीं। जब कोई न बोला तो वह बड़ी ऊँची आवाज में उन्हें बुलाने लगा और नाराज हो कर अनाप-शनाप बकने लगा। उस की माँ यह चीख-पुकार सुन कर दौड़ी आई और उस से कहने लगी, बेटे, तुझे क्या हो गया है? तू किस पर बिगड़ रहा है?

अबुल हसन ने बड़े घमंड से उस की तरफ देखा और कहा, श्रीमती जी, आप किसे अपना बेटा कह रही हैं? माँ ने कहा, तू ही मेरा बेटा अबुल हसन है, और किस आदमी को मैं बेटा कहूँगी। यह अजीब बात है कि चौबीस घंटे के अंदर तू मुझे भूल गया। अबुल हसन ने सहूलियत से कहा, देवी जी, तुम्हें कुछ भ्रम हुआ है। मैं अबुल हसन नहीं हूँ। मैं खलीफा हूँ। उस की माँ ने कहा, हाय हाय बेटे, तुम कैसी बातें कर रहे हो। तुम अबुल हसन नहीं हो? अबुल हसन बोला, तुम बकवास किए ही चली जाती हो। मैं खलीफा हूँ और तुम मुझे अपना बेटा समझती हो।

बुढ़िया ने कहा, धीरे बोलो बेटे, इतनी बड़ी बात मुँह से नहीं निकालते। बगदाद के लोग तुम्हें पागल समझेंगे और तुम्हारी पिटाई कर देंगे। अबुल हसन ने कहा, खूब बातें करती हो तुम। पहले मुझे अपना बेटा बनाया, अब कह रही हो कि मैं पागल हूँ। मैं तुम से कहता हूँ कि मैं पागल नहीं हूँ। मैं अपने पूरे होश-हवास में हूँ। मैं खलीफा हूँ जिसे सब लोग अपने भूलोक का स्वामी कहते हैं और जिसके अधीन दुनिया के सभी राजा-महाराजा हैं। माँ बोली, हाय भगवान, मै क्या करूँ तुम्हारे सिर पर कोई भूत प्रेत सवार हो गया है या खुद शैतान तुम्हें बहका रहा है। भगवान तुम्हारी रक्षा करें। देखो, तुम अबुल हसन हो। तुम मेरी कोख से इसी घर में पैदा हुए हो। यहाँ की हर एक चीज को देखो और पहचानो। इसी घर पर तुम्हारा राज है, सारी दुनिया पर नहीं। खलीफा का पद तुम्हें न मिला है न मिल सकता है।

अबुल हसन कुछ देर माथे पर हाथ धर कर सोचता रहा जैसे कि कोई भूली हुई बात याद कर रहा हो। फिर धीरे-धीरे बडबड़ाने लगा, हो सकता है कि इस बुढ़िया की बात ठीक हो, यही मेरी माता हो और मैं खलीफा न हो कर अबुल हसन हूँ। फिर चौंक कर कहने लगा, नहीं-नहीं, यह नहीं हो सकता। न जाने मेरे मन में यह तुच्छ विचार कैसे आ गया कि मैं खलीफा नहीं बल्कि अबुल हूँ। बुढ़िया ने सोचा कि शायद इस ने कोई दुःस्वप्न देखा है जिस से अभी तक अच्छी तरह जाग नहीं सका है। उस ने प्यार से पूछा, बेटे, क्या तुमने रात को कोई स्वप्न देखा है जो ऐसी बातें कर रहे हो? तुम्हें खलीफा बनने की खब्त क्यों है?

अबुल हसन ने डाँट कर कहा, बुढ़िया, जबान सँभाल कर बोल। क्या तेरा दिमाग फिर गया है कि खलीफा को अपना बेटा बना रही है और बकवास करती ही जा रही है? इस के अलावा खलीफा की शान में गुस्ताखी भी करती जा रही है। बुढ़िया ने दुखी हो कर कहा, बेटा, भगवान के लिए ऐसी बातें न करो। क्या तुमने गली के मुअज्जिन और उस के साथियों का हाल नहीं सुना कि उन्हें कैसी कड़ी सजा दी गई। मुअज्जिन को चार सौ कोड़े लगे और उस के चार साथियों को सौ-सौ और फिर उन सबों को पीछे की ओर मुँह करके ऊँट पर बिठा कर शहर में घुमाया गया और फिर शहर से निकाल दिया गया। कहीं ऐसा न हो कि खलीफा के पास तुम्हारी यह बातें कोई पहुँचा दे और तुम्हारा भी वही हाल हो।

अबुल हसन ने कहा, तुम्हारी इस बात से और भी साबित हो गया कि मैं खलीफा हूँ। मैं तुम्हारा पुत्र नहीं हूँ न हो सकता हूँ। कल दिन में मैं ने ही आज्ञा दी थी कि मुअज्जिन और उस के साथियों को वही दंड दिया जाए जिसका तुमने अभी उल्लेख किया है। कोतवाल ने मेरे आदेश ही पर उन पाँचों दुष्टों को दंड दिया था और मुझे आ कर बताया था कि सजा दे दी गई।

अबुल हसन की माँ को बड़ी चिंता हुई कि इसे क्या हो गया कि मुअज्जिन की सजा की बात सुन कर यह और जोरों से कहने लगा कि मैं खलीफा हूँ। उस ने फिर कहा, बेटा, सोच-समझ कर बात करो, तुम्हारी बातों को अगर कोई सुनेगा तो तुम्हें क्या कहेगा। अबुल हसन को अब बड़ा क्रोध चढ़ा, वह बोला, देख मक्कार बुढ़िया, मैं ने तेरी बदतमीजी बहुत सह ली। अब अपनी जबान बंद कर ले। वरना मैं उठ कर तुझे इतना मारूँगा कि सारी जिंदगी याद करेगी। मैं खलीफा हँ और खलीफा रहूँगा। अब तेरी जबान से एक बार भी नहीं निकलना चाहिए कि मैं तेरा बेटा हूँ।

उस की माँ यह देख कर रोने लगी कि लड़के का पागलपन बढ़ता ही जा रहा है। अबुल हसन को यह देख कर और गुस्सा आया। वह अपने बिस्तर से उठा और उस ने हाथों में एक छड़ी ले ली और बुढ़िया से घुड़क कर कहने लगा, बोल, अब क्या कहती है? मैं कौन हूँ, खलीफा या तेरा बेटा? उस ने कातर दृष्टि से देख कर कहा, तुम मेरे बेटे हो, खलीफा कैसे हो जाओगे? तुम अबुल हसन हो। तुम्हें मैं ने जन्म दिया है और दूध पिलाया है। खलीफा के पद पर तो सिर्फ हारूँ रशीद हैं जिनकी हम दोनों और दूसरे लोग प्रजा हैं। वे सारे राजाओं के सर्वेसर्वा हैं। अभी कल ही उन्होंने कृपा करके मेरे पास एक हजार अशर्फियों का तोड़ा भिजवाया था।

अशर्फियों के नाम पर अबुल हसन को खलीफा होने का और भी निश्चय हो गया। उस ने अपनी माँ से कहा, धूर्त स्त्री, तू बड़ी कृतघ्न है। कल मैं ने ही अपने मंत्री जाफर के हाथ तेरे पास अशर्फियों का तोड़ा भिजवाया और आज तू बेटा बना कर मुझी पर कब्जा करना चाहती है? तेरी इस धृष्टता का दंड तुझे मिलना चाहिए। यह कह कर उस ने माँ का हाथ पकड़ा और डपट कर पूछा, मैं कौन हूँ? उस ने कहा, मेरा बेटा। अबुल हसन ने उसे एक छड़ी जमाई। वह इसी तरह बार-बार पूछता और जब बुढ़िया उसे बेटा बताती तो उसे छड़ी मारता। बुढ़िया के चिल्लाने से पड़ोसी घर में आ गए और उस के हाथ से छड़ी छीन कर कहने लगे, तुम्हें क्या हो गया है, अबुल हसन? कोई अपनी माँ को ऐसे मारता है?

अबुल हसन ने लाल आँखें करके उन्हें देखा और कहा, तुम क्या बक रहे हो? अबुल हसन कौन है? पड़ोसी यह सुन कर परेशान हुए और बोले, तुम्हीं हो अबुल हसन, और कौन होगा? हम तुम्हारे पड़ोसी हैं। यह तुम्हारा घर है और यह तुम्हें जननेवाली तुम्हारी माँ है। अबुल हसन चीखा, बकवास बंद करो तुम लोग। मैं इस दुष्ट स्त्री को जानता भी नहीं। मैं तुम्हें भी नहीं जानता। मैं खलीफा हूँ। खलीफा के भी कहीं पड़ोसी होते हैं?

पड़ोसियों ने समझ लिया कि अब यह पागल हो गया है और इस से अधिक बातचीत की तो यह हम से भी मारपीट करेगा। उन में से एक उस क्षेत्र के दारोगा को जानता था और दौड़ कर उसे बुला लाया। अबुल हसन ने दारोगा से डाँट-डपट की तो उस ने उसे दो-चार चाबुक जड़ दिए और जब अबुल हसन भागने लगा तो उसे सिपाहियों ने पकड़ लिया। पुलिसवाले उस के हाथों में हथकड़ी और गले में जंजीर डाल कर ले चले। रास्ते में सिपाही उसे घूँसों और थप्पड़ों से मारते जाते थे जैसे पागल आदमियों को काबू में रखने के लिए किया जाता है। बेचारा अबुल हसन हैरान था कि मेरा मस्तिष्क तो ठीक है, यह लोग मुझ से उन्मत्तों जैसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं। फिर भी उस की समझ में कुछ न आया।

दारोगा ने उसे हवालात में बंद कर दिया। रोजाना चालीस-पचास कोड़े उस पर पड़ते। तीन सप्ताह तक उसे इसी हालत में रखा गया। दारोगा रोज उसे पूछता कि तू कौन है और वह जब स्वयं को खलीफा बताता तो उस पर कोड़े पड़ते। उस की माँ रोज हवालात में जा कर देखती और उस की दशा पर आँसू बहाती। अबुल हसन दिनोंदिन सूखता जा रहा था। रात-दिन उसे मार और अपमान से शारीरिक और मानसिक कष्ट रहता था। उस की पीठ और बाजुओं पर मार के कारण काले-नीले निशान पड़ गए थे और जगह-जगह से खाल भी उधड़ गई थी। वह बराबर रोता रहता था। लेकिन उस की माँ की हिम्मत उस से बात करने की नहीं होती थी कि कहीं उस का पागलपन बढ़ न जाए।

जब अबुल हसन ने चुप रहना शुरू किया तो उस की माँ ने सोचा कि इस से बात करूँ, शायद वह कुछ सँभला हो। उधर वह बराबर सोचता था कि मैं किस बात को सपना समझूँ और किसे सच। वह सोचने लगा था कि महल और दरबार की सारी बातें स्वप्न ही होंगी। स्वप्न की बात न होती तो इतने दिन मेरी यह दुर्दशा क्यों होती और मेरे हजार आवाज देने पर भी मेरी दासियाँ और दास क्यों न आते। साथ ही वह यह भी सोचता कि अगर वह सब सचमुच सपना था तो मेरी आज्ञा से मंत्री ने मेरी माँ को अशर्फियाँ क्यों दीं और कोतवाल ने मुअज्जिन को और उस के साथियों को दंड क्यों दिया। वह बहुत सोचता कि असलियत क्या है। उस की समझ में कुछ नहीं आता था किंतु इस द्विविधा का परिणाम यह हुआ कि उस ने स्वयं को खलीफा कहना छोड़ दिया।

ऐसे ही जब एक दिन उस की माँ उसे देखने आई तो उस ने माँ को बड़े विनयपूर्वक प्रणाम किया। माँ यह देख कर खुश हुई और बोली, बेटा, अब तुम्हारा क्या हाल है? वह निराधार विचार जिसने तुम्हारी यह दशा करवाई अब भी तुम्हारे मन में है या नहीं? अबुल हसन ने कहा, अम्मा, जो कुछ अपराध और जो कुछ धृष्टता मुझ से हुई उसे क्षमा कर दो। पड़ोसियों से जो दुर्व्यवहार मैं ने किया उस के लिए उनसे क्षमा चाहता हूँ और यह बात उन्हें बता देना। मैं खलीफा बिल्कुल नहीं हूँ। मैं अबुल हसन हूँ। तुम मेरी माँ हो और मैं तुम्हारा बेटा हूँ।

उस की माँ यह सुन कर प्रसन्न हुई। उस ने समझा कि बेटे का दिमाग ठीक हो गया है। वह कहने लगी, मेरे विचार से उस परदेशी के कारण यह सब हुआ जिसे तुम आखिरी बार घर लाए थे। वह जाते समय दरवाजा खुला छोड़ गया था जिस से शैतान ने आ कर तुम्हें बहका दिया। अबुल हसन ने कहा, मैं तो समझता था कि मोसिल का वह व्यापारी द्वार बंद करके गया है किंतु तुमने दरवाजा खुला देखा तो निश्चय ही शैतान ने आ कर मुझे बहका दिया। अबुल हसन की माँ ने दारोगा से कहा कि मेरा बेटा ठीक हो गया है तो उस ने उसे छोड़ दिया।

अब फिर अबुल हसन पहले की तरह कारोबार करने और रोज शाम को एक परदेशी का आदर-सत्कार करके सुबह उसे विदा देने लगा। एक दिन वह पुल पर नए मेहमान की खोज में बैठा था कि खलीफा फिर मोसिल के व्यापारी के वेश में उसी दास के साथ वहाँ आया। अबुल हसन उसे दूर से देख कर जान गया कि यह वही मोसिल का व्यापारी है जिसके कारण मुझ पर इतनी मुसीबतें पड़ीं। यही दरवाजा खुला छोड़ गया था जिस से शैतान ने आ कर मुझे बहका दिया। वह डर कर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि इस बार इसकी लाई हुई मुसीबत से मुझे बचा। उस के पास आने पर अबुल हसन उस की ओर से मुँह फेर कर नदी की लहरों की ओर देखने लगा।

खलीफा उसे खोज ही रहा था और इसलिए पुल पर आया था। खलीफा का इरादा था कि एक बार फिर उसे महल में ले जा कर तमाशा देखे। उसे जासूसों से यह भी मालूम हो गया था कि तीन सप्ताह तक अबुल हसन को हवालात में मार पड़ी है और उस के कष्टों का यथोचित प्रतिकार भी करना चाहता था। इसलिए खलीफा जा कर उस के पास खड़ा हुआ और बोला, सलाम अलैकुम। अबुल हसन ने अभद्र हो कर कहा, भाड़ में जाए तुम्हारा सलाम अलैकुम। तुम अपनी राह लगो। क्यों मुझे परेशान कर रहे हो?

खलीफा ने कहा, तुमने मुझे नहीं पहचाना? महीना भर हुआ कि तुमने अपने घर ले जा कर मेरी अभ्यर्थना की थी। अबुल हसन ने कहा, मुझे कुछ भी याद नहीं कि कब तुम मेरे घर आए थे। मैं तुम्हें नहीं जानता। अपनी राह चले जाओ। खलीफा ने समझा कि शायद यह इसलिए ऐसा व्यवहार कर रहा है कि एक व्यक्ति को एक ही बार ले जाने की प्रतिज्ञा कर चुका है। खलीफा ने कहा, आश्चर्य है कि तुम मुझे इतनी जल्दी भूल गए। ऐसा मालूम होता है कि तुम पर इस बीच कुछ ऐसी विपत्ति पड़ी है कि तुम बहुत उद्विग्न हो गए हो। अगर तुम मुझ से अपनी मुश्किल कहो तो मैं उस में तुम्हारी सहायता का प्रयत्न करूँ। अबुल हसन ने कहा, क्या सहायता करोगे?

खलीफा ने आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया और कहा, भाई, अगर मेरी वजह से तुम्हें कोई कष्ट हुआ तो मैं तुम से उस के लिए क्षमा चाहता हूँ। तुम्हें शिकायत है तो आज रात मैं तुम्हारे घर जरूर ठहरूँगा और तुम्हारी बात सुन कर तुम्हारी शिकायत दूर कर दूँगा। तुम्हारे घर का भोजन और मदिरा मुझे अब तक याद है और तुम्हारा सद्व्यवहार भी। इसलिए आज तो तुम्हें मेरा आतिथ्य सत्कार करना ही होगा। अबुल हसन ने कहा, भाई, मैं ने पहले भी कहा और बार-बार कहूँगा कि तुम चले जाओ। तुम अपना यह मायाजाल कहीं और फैलाओ। मैं ने एक बार तुम्हें अपने घर ले जा कर बहुत दुख झेले हें, अब और सहने की मुझ में शक्ति नहीं। भगवान के लिए मेरा पीछा छोड़ो। खलीफा ने उसे दोबारा गले लगाया और कहा, बड़े अफसोस की बात है कि मुझ से नाराज हुए चले जाते हो और इसका कारण भी नहीं बताते। तुम मुझे बताओ तो कि तुम पर मेरे कारण कौन-सी मुसीबत पड़ी। मैं तुम्हें उस का पूरा बदला दूँगा।

अबुल हसन बेचारा खलीफा की बातों में आ गया। उस ने खलीफा को पास बिठा लिया। उस ने विस्तारपूर्वक राजमहल का हाल कहा। खलीफा तो यह सब कुछ खुद ही करा ओर अपनी आँखों से देख चुका था। मजे ले कर सब सुनता रहा। अबुल हसन ने वह सारा वर्णन करके कहा, यह सपना मेरे मन में ऐसा समा गया है कि मैं खुद को खलीफा समझने लगा और इस के कारण लोगों से मुझे घोर अपमान सहना पड़ा और मैं ने बड़ी मार खाई। उस से भी अधिक खेद मुझे इस बात का है कि मैं ने उस मूर्खता में अपनी माँ पर हाथ उठाया। मैं ने उसे गालियाँ भी दीं और पड़ोसियों को भी भला-बुरा कहा। और यह सब इसलिए हुआ कि तुमने मेरी बात नहीं मानी और जाते समय द्वार बंद नहीं किया जिस से शैतान ने मुझे बहका दिया।

खलीफा को तो सब मालूम था। अबुल हसन की बातें सुन कर जोरों से हँसने लगा। अबुल हसन और बिगड़ा और बोला, मैं ने तो समझा था कि तुम्हें अपने काम पर पछतावा होगा लेकिन तुम हँस रहे हो। तुम्हें मेरी बात का विश्वास नहीं है। यह कह कर उस ने अपना कुरता उतार दिया। खलीफा ने काले निशान देखे तो बड़ी सहानुभूति प्रकट की और एक बार फिर उसे गले लगा कर कहा, भाई, मुझे तुम्हारी बात पर पूरा विश्वास हुआ। तुम्हारी दुर्दशा पर मुझे बड़ा खेद हे। मैं अपनी गलती मानता हूँ और उस का बदला भी दूँगा। लेकिन आज मैं तुम्हारा मेहमान अवश्य बनूँगा।

यद्यपि अबुल हसन ने किसी व्यक्ति की दोबारा अभ्यर्थना न करने का प्रण किया था और इस आदमी के कारण उस पर घोर कष्ट भी पड़ा था तथापि वह इस प्रकार उस के पीछे पड़ा कि अबुल हसन इनकार न कर सका और उसे ले कर अपने घर में आया। रास्ते में खलीफा ने कहा, तुम मुझ पर विश्वास रखो कि हर हाल में तुम्हारी भलाई की बात करूँगा। मैं तुम्हारा हितचिंतक हूँ और तुम्हें मुझ पर किसी तरह का संदेह नहीं करना चाहिए। अबुल हसन ने कहा, चलो, मान लिया। किंतु आज के बाद तुम कभी मेरे यहाँ आतिथ्य सत्कार की आशा न रखना। तुम्हारे कारण जो दुख मुझ पर पड़े हैं उन्हें भूल पाना मेरे लिए संभव नहीं है। खलीफा ने मुस्कुरा कर कहा, भाई, बड़े अड़ियल आदमी हो। मैं इतनी देर से तुम्हारी दोस्ती का दम भर रहा हूँ और तुम्हें विश्वास नहीं होता। लेकिन मैं तुम्हें विश्वास दिला कर ही रहूँगा।

वे लोग बातें करते-करते अबुल हसन के घर पहुँचे। उस की माँ ने रोज की तरह भोजन का प्रबंध कर रखा था। खाने के बाद अबुल हसन की माँ ने फल, शराब आदि भेजी। यह करके वह अपनी कोठरी में जा कर सो रही। इन दोनों ने खूब शराब पी। जब अबुल हसन को नशा चढ़ गया तो खलीफा ने उस से पूछा, तुम्हें किसी से प्रेम हुआ है? वह बोला, न मुझे प्रेम हुआ है न मेरी विवाह की इच्छा है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि दोस्तों के साथ अच्छी शराब पियूँ और गप्पे लड़ाऊँ। हाँ, एक सुंदरी को जरूर चाहता हूँ जिसने उस सपने में मेरे साथ बैठ कर मद्यपान किया था। किंतु वैसी स्त्री राजमहल ही में मिल सकती है, और फिर यह सब स्वप्न ही की तो बातें हैं। कौन सचमुच की ऐसी स्त्री है।

अब उस ने शराब का प्याला भर कर खलीफा को दिया, आज रात का अंतिम प्याला मेरे हाथ से पियो। खलीफा उसे पी गया फिर उस ने वह रस्मी तौर पर अपनी ओर से अंतिम प्याला अबुल हसन को दिया, लेकिन फिर से उस में बेहोशी की दवा डाल दी और प्याला उसे दे कर कहा, लो, यह प्याला पियो और सपनेवाली महलों की सुंदरी का ध्यान धर कर सो जाओ। अबुल हसन ने मुस्कुरा कर प्याला लिया और पी गया और कुछ क्षणों में बेहोश हो कर गिर गया। खलीफा ने अपने बलिष्ठ दास को संकेत किया और वह अबुल हसन को कंधे पर डाल कर ले चला। खलीफा भी बाद में निकला और उस ने अब की बार द्वार बंद कर दिया। महल में पहुँच कर खलीफा ने दास से कहा कि इसे उसी कक्ष में ले जा कर लिटा दे जहाँ से उठा कर इस के घर ले गया था। फिर ख्वाजासराओं (जनखों) से कहा कि इस के वस्त्र उतार कर इसे मेरे कपड़े पहना दो। उन्होंने उस की आज्ञा का पालन किया।

खलीफा रात को एक कमरे में जा कर सो गया और सुबह होते ही अबुल हसन के कमरे के पास छुप कर बैठ गया कि उस का तमाशा देख सके। जब अबुल हसन पर से बेहोशी की दवा का असर हटा और उस की नींद खुली तो वह फिर भौचक्का रह गया। उस ने देखा कि वह न केवल अपना पुराना राजमहलवाला सपना देख रहा है बल्कि वहाँ की हर चीज बिल्कुल वैसी ही रखी है जैसी उस ने पहले देखी थी। यहाँ तक कि सोने का उगालदान भी वही रक्खा था। उस की आँख खुलते ही वहाँ उपस्थित गायिकाओं ने सुर मिलाए और साजों पर गाना शुरू किया। विशेषतः नफीरी की आवाज पर तो अबुल हसन झूम उठा। उस ने यह भी देखा कि उस के चारों ओर ख्वाजासरा लोग खड़े हैं और उस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस ने दालान पर हर तरफ नजर दौड़ाई और पहचान गया कि पिछली बार भी सपने में यही दालान देखी थी। फिर खलीफा के इशारे पर गाना बंद हुआ क्यों कि वह अबुल हसन की बातें सुनना और उस की हरकतें देखना चाहता था।

अबुल हसन ने स्वप्न से जागने के लिए दाँत से अपनी उँगली काटी और कहने लगा, अजीब मुसीबत है। मैं वही सपना फिर देख रहा हूँ जो मैं ने पिछली बार देखा था और जिसके कारण मुझ पर हवालात में इतनी मार पड़ी। कल मैं ने जिसे मेहमान बनाया था उस ने फिर बदमाशी की। उसी के कारण पिछली बार मैं ने वह सपना देखा जिस से महीना भर मेरी दुर्दशा होती रही। इस बार मैं ने ताकीद की थी कि दरवाजा बंद कर जाना किंतु वह दुष्ट फिर दरवाजा खोल कर चला गया जिस से मुझे शैतान ने बहका दिया मुझे फिर ऐसा सपना दिखाई दे रहा है जिस से मैं स्वयं को खलीफा समझूँ और दोबारा अपमान सहन करूँ। हे भगवान, मुझे शैतान के जाल से बचा।

यह कह कर उस ने आँखें बंद कर लीं और बहुत देर तक लेटा रहा ताकि सपना समाप्त हो जाए। किंतु जब आँखें खोलीं तो सभी वस्तुएँ यथावत देखीं। उस ने फिर आँखें बंद कर लीं और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि मुझे शैतान की माया से बचा। वह शायद इसी तरह पड़ा रहता किंतु खलीफा के इशारे से उसे दास-दासियों ने चैन न लेने दिया। आरामे-जाँ नाम की एक सुंदर दासी जिसे पहले भी अबुल हसन ने बहुत पसंद किया था, उस के निकट आ कर बैठ गई और बोली, ऐ सारी दुनिया के मालिक, दासी का अपराध क्षमा हो। मेरी प्रार्थना है कि आप निद्रा त्याग करें। यह समय सोने के लिए नहीं है। सूरज निकल आया है।

अबुल हसन ने डाँट कर कहा, भाग जा शैतान यहाँ से। दासी का रूप धर कर आया है और मुझे खलीफा कह कर बहका रहा है? आरामे-जाँ बोली, यह क्या फरमा रहे हैं सरकार? आप खलीफा नहीं तो कौन हैं? आप ही सारे संसार के मुसलमानों एवं अन्य धर्मावलंबियों के स्वामी हैं और मैं आप की एक तुच्छ दासी हूँ। लगता है आप ने रात कोई दुःस्वप्न देखा है। आप आँखें खोलें, आप का भ्रम दूर हो जाएगा। रात को आप बहुत देर तक सोए और हमने आप के शयन में विघ्न डालना उचित न समझा, इसी बीच आप ने सपना देखा होगा।

अबुल हसन ने आँख खोली तो सारी दासियों को फिर मौजूद पाया। इस बार वे उस के अति निकट आ खड़ी हुईं। फिर आरामे-जाँ कहने लगी, हुजूर, यह समय आप के जागने का है, देखिए उजाला हो गया है। अबुल हसन ने आँखें मल कर कहा, तुम मुझे खलीफा क्यों कह रही हो? मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं खलीफा नहीं हूँ। मैं अबुल हसन हूँ। आरामे-जाँ बोली, हम लोग किसी अबुल हसन को नहीं जानते। हम आप को जानते हैं जो हमारे स्वामी और खलीफा हैं। हाँ, आप यह न कहें कि मैं खलीफा नहीं हूँ। अबुल हसन ने चारों ओर नजर दौड़ाई और बोला, हे भगवान, इस सपने की तो सभी चीजें जैसी की तैसी दिखाई दे रही हैं। क्या फिर तेरी यही मरजी है कि यह स्वप्न मेरा दिमाग फेर दे और मैं पहले जैसे दुख उठाऊँ और मार खाऊँ?

खलीफा को यह सब सुन कर बड़ी हँसी आ रही थी किंतु उस ने हँसी पर काबू रखा। अबुल हसन उपर्युक्त बातें कह कर फिर आँखें बंद करके लेट गया। आरामे-जाँ फिर बोली, सरकार, इस दासी ने दो बार आप से निवेदन किया कि आप शैय्या को छोड़ें। समय गुजर रहा है। सारे दरबारी और सरदार आप के स्वागत के लिए खड़े हैं। आप ही का तो आदेश है कि आप को सूर्योदय के पहले जगा दिया जाए। फिर उस के इशारे से दोनों और दो-दो दासियों ने उस के बाजू पकड़ कर उसे उठा दिया और उसे ला कर मसनद पर बिठा दिया और स्वयं उस के सामने आकर्षक नृत्य और गान करने लगीं। साथ ही चारों ओर से कुशल वादकों ने बाजे बजाने शुरू कर दिए।

अबुल हसन यह सब देख कर सोचने लगा कि कहीं सचमुच तो ऐसा नहीं कि मैं वास्तविक खलीफा हूँ और मैं ने हवालात में बंद होने और मार खाने का सपना ही देखा हो। वह इस बात को पूछना चाहता था किंतु गाने-बजाने का बहुत शोर हो रहा था। उस ने हाथ के इशारे से नाच-गाना रोका और अपने आगे नाचती हुई दासी महलका को पास बुला कर पूछा, सच बता कि मैं कौन हूँ।
 
वह बोली, आप बार-बार हमारी परीक्षा क्यों ले रहे हैं? आप निःसंदेह खलीफा हैं। आप कुछ अधिक सोए रहे और आप ने कोई सपना देखा है। कल ही आप ने पाँच आदमियों को सजा दिलाई और एक वृद्धा के पास अशर्फियाँ भेजीं। फिर आप भोजन कक्ष में गए और अमुक-अमुक वस्तु का स्वाद लिया। फिर आप ने फल खाए और हम लोगों के हाथों से मद्य पान किया और हमारा गाना सुनते हुए अपने पलंग पर सो गए। सुबह आप बहुत देर से उठे हैं। अन्य दासियों और ख्वाजासराओं ने भी महलका की बात का समर्थन किया और सब के सब कहने लगे, अब आप उठें। नमाज का समय अभी नहीं बीता है। नमाज पढ़ें और दरबार करें।

अबुल हसन ने दासियों से कहा, तुम सब झूठी और मक्कार हो। तुम्हें भगवान ने रूप और कलाएँ तो प्रदान की हैं किंतु तुम में झूठ बोलने की आदत भी डाल दी है। तुम मुझे फिर बहकाने आई हो? पहले भी मैं ने ऐसा ही सपना देखा था। उस का असर ऐसा हुआ कि मेरा बड़ा अपमान हुआ और मुझे रोज पचास कोड़े कई सप्ताह तक खाने पड़े। मेरी पीठ की खाल उधड़ गई और मेरी बाँहों और पीठ पर मार के काले-नीले निशान पड़ गए। महलका ने जवाब दिया, सरकार, यह आप का भ्रम है। आप को सजा देनेवाला और मारनेवाला दुनिया में कहाँ है। आप ने स्वप्न मात्र देखा है। आप कहीं बाहर गए ही नहीं। रात भर इस कक्ष में सोते रहे हैं। हाँ, आज सुबह आप की आँखें देर में जरूर खुली हैं। अबुल हसन ने सिर थाम कर कहा, शायद तू ठीक कहती है। जब मैं इस महल से बाहर ही नहीं निकला तो यह सब सपना ही होगा।

किंतु उस का संदेह नहीं गया। वह सोचता रहा कि वास्तविकता क्या है, मैं खलीफा हूँ या अबुल हसन? मैं मार खाने को सपना समझूँ या इस सब को जो मैं देख रहा हूँ? फिर उस ने ऊपर के कपड़े उतारे और अपनी बाँहों पर पड़े मार के निशान देखे। उस ने दासियों को यह निशान दिखा कर कहा, धूर्तो, देखो। कहीं सोए हुए आदमी के बदन पर ऐसे मार के निशान पड़ते हैं जिन्हें दबाने से दर्द हो। अब तो यह निश्चित हो गया कि मैं खलीफा अलीफा नहीं, केवल गरीब अबुल हसन हूँ। कोई विश्वास नहीं कर सकता कि किसी पर सपने में मार पड़े और उस के शरीर पर मार के वास्तविक निशान पड़ जाएँ। फिर भी उसे वर्तमान दृश्यों के स्वप्न होने को सिद्ध करना था। उस ने एक दासी से कहा, तू मेरी उँगली में काट खा। खलीफा के इशारे से दासी ने उस की उँगली में जोर से दाँत गड़ा दिए। अबुल हसन ने चीख कर उँगली खींची। इस के साथ ही जोर से बाजे बजने लगे।

अबुल हसन के मस्तिष्क ने इतने सोच-विचार और इतने उलझन के बाद काम करना बंद कर दिया था। उस ने कुर्ता भी नहीं पहना और जब दासियों ने गाने के साथ नाच शुरू कर दिया तो वह उठ कर सिर्फ पजामा पहने हुए उन के साथ नाचने लगा। वह बराबर ताली बजा रहा था और नृत्य की भंगिमाओं में कभी इधर झुकता था कभी उधर और बराबर थिरक रहा था। कभी वह इतना झुकता कि दुहरा-सा होता जाता, कभी पीछे की तरफ झुक जाता। संक्षेप में यही कहना चाहिए कि कोई मसखरापन ऐसा नहीं बचा जो अबुल हसन ने नाचती और हँसती दासियों के आगे न किया हो।

खलीफा अब हँसी न रोक सका। लेकिन अबुल हसन अपनी धुन में वह हँसी न सुन पाया। कुछ देर हँसने के बाद खलीफा ने पुकार कर कहा, बंद कर अबुल हसन। क्या तू हँसाते-हँसाते मुझे मार ही डालना चाहता हैं? खलीफा के बोलते ही नाच-गाना और बाजे बंद हो गए। अबुल हसन भी नाच रोक कर देखने लगा कि आवाज किस ओर से आई और किस ने मुझे नाम ले कर पुकारा।

खलीफा को देख कर उस ने कहा, अच्छा, तो आप ही व्यापारी बने हुए थे। फिर वह अपनी दशा देख कर कुछ लज्जित हुआ और उसे लगा कि खलीफा ने उस के साथ मजाक किया है। फिर उसने कहा, सरकार आप ही तो दो बार मोसिल के व्यापारी बन कर आए थे और आप ही के कारण मुझ पर हफ्तों मार पड़ी। खलीफा ने कहा, तुम ठीक कहते हो। किंतु अब मैं तुम्हारे साथ इतनी भलाई करूँगा कि सभी पहलेवाले कष्ट भूल जाओगे। यह कह कर खलीफा ने आदेश दिया कि अबुल हसन को दरबारियों जैसे वस्त्र पहनाए जाएँ।

अबुल हसन ने कहा, सरकार यह तो बताएँ कि मेरे साथ यह सलूक क्यों किया गया। खलीफा ने कहा, देखो, मैं हर महीने की पहली तारीख को वेश बदल कर प्रजा के बीच जाता हूँ। महीने भर पहले तुमने मेरा अच्छा आतिथ्य सत्कार किया और तभी तुमने कहाँ कि अगर एक दिन को खलीफा बन जाऊँ तो मुअज्जिन और उस के साथियों को कोड़े लगवाऊँ। इसलिए मैं तुम्हें बेहोश कर के यहाँ ले आया और एक दिन के लिए खलीफा बना दिया। किंतु इस से तुम वाकई अपने को खलीफा समझने लगे और सब से मार-पीट करने लगे। तभी तुम्हें हफ्तों मार पड़ी। कल रात को फिर मैं तुम्हारे घर से तुम्हें बेहोश करके ले आया कि तुम कुछ और तमाशा दिखाओ।

अबुल हसन ने कहा, पृथ्वीपालक, अब मुझे कोई शिकायत नहीं है। यदि आप के मनोरंजन के लिए मुझ पर मार पड़े तो मैं इसे अपना सौभाग्य समझूँगा। किंतु आप से एक निवेदन करना चाहता हूँ। मुझे अनुमति दीजिए कि मैं आप का सेवक बन कर रहूँ, हमेशा मुझे आप के पास आने की अनुमति हो। खलीफा ने कहा, मैं ने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तुम जब चाहो मेरे पास आ सकते हो, तुम्हें कोई नहीं रोकेगा। यह कह कर खलीफा ने उसे दरबार की नौकरी दे दी और उस का मासिक वेतन एक हजार अशर्फी नियत कर दिया।

जब खलीफा दरबार को गया तो अबुल हसन अपनी माँ के पास गया। उस ने बताया कि मैं ने पहले भी कोई स्वप्न नहीं देखा था बल्कि खलीफा ने अपने मनोरंजन के लिए मेरे साथ यह किया और अब एक हजार अशर्फी मासिक पर मुझे अपना दरबारी बनाया है। यह समाचार उस के पड़ोस ही में नहीं, सारे नगर में फैल गया। उस दिन से अबुल हसन रोज दरबार में जाया करता और अपनी बकवास और मसखरेपन से खलीफा का जी बहलाया करता। एक दिन खलीफा ने उसे महल में जा कर मलिका जुबैदा से मिलाया और फिर वह अकसर मलिका के पास भी आने-जाने लगा।

एक दिन मलिका जुबैदा ने खलीफा से कहा, यह अक्सर महजबीन नाम की दासी को बड़े प्यार से देखा करता है और वह भी इस से राजी मालूम होती है। कहिए तो दोनों का विवाह करवा दें। खलीफा ने कहा, यह तो तुमने मेरे मन की बात कह दी। मैं ने इस से वादा भी किया था कि तुम्हें मनचाही स्त्री दूँगा किंतु अभी तक यह न जान पाया कि इसे कौन स्त्री पसंद है। फलतः अबुल हसन का महजबीन से विवाह कर दिया गया। महजबीन मलिका जुबैदा की प्रिय दासी थी इसलिए उस ने खूब दहेज महजबीन को दिया। खलीफा ने भी अबुल हसन की शादी पर खूब धूम-धाम की। अबुल हसन अपनी पत्नी को खलीफा के दिए हुए मकान में ले गया। दोनों ने कई रोज तक वहाँ अपने तौर पर खूब जश्न किया। फिर दोनों पति-पत्नी आराम से रहने लगे। वे सिर्फ उसी समय एक-दूसरे से अलग होते जब अबुल हसन दरबार में जाता और महजबीन मलिका जुबैदा के पास उस की संगिनी बन कर जाती।

अबुल हसन महजबीन के सान्निध्य में इतना मस्त हो गया कि उसे खर्च की कोई परवाह न रही। दोनों अच्छे से अच्छे कपड़े पहनते, बढ़िया भोजन करते और शराब पीते और दास-दासियों और ख्वाजासराओं को, जो उन के घर आया करते थे, बगैर खिलाए- पिलाए नहीं आने देते थे और साथ ही उन्हें वापसी में उत्तमोत्तम वस्त्र और अच्छा इनाम देते। वे तरह-तरह के मूल्यवान मेवे, अचार, मुरब्बे आदि प्रयोग करते और खाते समय गायन-वादन आदि का भी प्रबंध करते थे। इस प्रकार उन्होंने अमीर-उमरा की तरह रहना शुरू किया, यद्यपि उनकी आय इतनी न थी। रसोइयों और सेवकों ने उनका यह हाल देखा तो खुद भी लूट शुरू कर दी ।

एक दिन रसोइए ने आ कर खर्च का हिसाब दिखा कि इतना बनियों का उधार हो गया है। कुछ देर में तोशखाने के अध्यक्ष ने बताया कि बजाजों से इतने-इतने के कपड़े उधार लिए गए हैं। अबुल हसन और महजबीन ने अपने पास का सारा नकद रुपया दे दिया, फिर भी बहुत-सा कर्ज बाकी रहा। अबुल हसन ने खलीफा से वादा किया था कि वेतन के अलावा कुछ नहीं माँगूँगा।

शादी में जो मिला था वह उस ने माँ को दे दिया था। वह कहीं से कुछ नहीं माँग सकता था। महजबीन भी जुबैदा से इतना ले चुकी थी कि उसे और कुछ माँगने की हिम्मत नहीं हुई।

अबुल हसन ने महजबीन से कहा, यह तो बड़ी मुसीबत है। इस से छुटकारे की एक ही तरकीब समझ में आती है। तुम तरकीब बताओ, लेकिन तरकीब में पूरी सफलता निश्चित होनी चाहिए। अबुल हसन ने कहा, सफलता निश्चित है। लेकिन इस के लिए हम दोनों को मरना होगा। महजबीन भड़क कर बोली, तुम्हें मरने का शौक है तो तुम मर जाओ, मैं तो नहीं मरती। मुझे तो बहुत कुछ दुनिया देखनी है। अबुल हसन ने कहा, आखिर हो तो औरत ही, अक्ल कहाँ से आएगी तुम में। औरतों के बारे में तो विद्वानों ने कहा ही है कि बुद्धिहीन होती हैं। अरे, मैं सचमुच मरने को कहाँ कह रहा हूँ, मैं तो सिर्फ यह कह रहा था कि हम लोग मरने का बहाना करते। एक तुम हो कि मरने का नाम सुना और होश गायब हो गए। महजबीन ने कहा कि अगर बहाना ही बनाना है तो मैं तैयार हूँ लेकिन तुम मुझे पूरी योजना बताओ कि मैं उस पर कार्य कर सकूँ।

अबुल हसन ने कहा, मैं दालान में पश्चिम की ओर पाँव करके लेट जाऊँगा। तुम मेरे सिर पर एक पगड़ी रख देना और मेरे शरीर पर सफेद चादर डाल देना। फिर कपड़े फाड़ कर बाल बिखरा कर विलाप करते हुए जुबैदा के पास जाना। वह जरूर तुम्हें कुछ धन दे देगी ताकि मेरा जनाजा अच्छी तरह से निकले। और वह तुम्हें भी नए थान देगी कि अपने कपड़े सिला लो। जब तुम धन ले कर महल से आना तो मैं उठ बैठूँगा और तुम लेट कर मरने का स्वाँग करना। मैं तुम पर सफेद चादर डाल कर कपड़े फाड़ कर बाल बिखरा कर खलीफा के पास जाऊँगा और तुम्हारे मरने की सूचना दूँगा। आशा है कि जुबैदा जितना देगी खलीफा उस से अधिक देगा। महजबीन ने कहा, यह योजना बहुत अच्छी है। वे लोग निस्संदेह हमारी अच्छी मदद करेंगे। हमने होशियारी और पूरे सहयोग के साथ काम किया तो जरूर फायदा होगा।

अतः अबुल हसन पश्चिम की ओर पाँव करके लेट गया। उस की पत्नी ने उसे सफेद चादर उढ़ा दी और उस के मुँह पर मलमल का कपड़ा डाल कर पगड़ी रख दी ताकि उस की साँस न रुके। फिर अपने सिर का कपड़ा फाड़ कर बाल बिखरा कर विलाप करने लगी और ऐसी ही हालत में जुबैदा के महल में गई और उसे अबुल हसन की मौत की खबर दी। जुबैदा तथा अन्य दासियों को यह सुन कर बहुत अफसोस हुआ। महजबीन जुबैदा की चहेती दासी रह चुकी थी। उस ने महजबीन को एक हजार अशर्फियाँ और कमख्वाब का एक भारी थान दिया और कहा कि थान को कफन के काम में लाना और अशर्फियों से अंतिम संस्कार करना। महजबीन अपने घर आई और उस ने अशर्फियों का तोड़ा और थान दिखाया। अबुल हसन इन्हें देख कर बहुत खुश हुआ और उठ कर खड़ा हो गया।

अब महजबीन ने कहा कि मैं मरने का स्वाँग रचती हूँ और तुम जा कर खलीफा से कुछ सहायता की जुगाड़ करो। अबुल हसन ने कहा, तुम मुझे क्या सिखा रही हो। मेरी ही बताई हुई तो यह तरकीब है। मैं इन बातों में तुम से कुछ कम चतुर नहीं हूँ। तुम मुर्दा तो बनो फिर देखो कि मैं कितना बढ़िया नाटक करता हूँ। अब महजबीन पश्चिम की ओर पाँव करके लेट गई और अबुल हसन रोता-पीटता दरबार की ओर चला गया। दरबार में जा कर उस ने इतने ऊँचे स्वर में विलाप किया कि वहाँ के सारे कामकाज रुक गए और सब लोग उस की ओर देखने लगे। खलीफा ने पूछा, अबुल हसन, तुम्हें क्या हुआ है? क्यों इस तरह रो रहे हो? उस ने कहा, सरकार, मैं तो लुट गया। आप ने जिस सुंदरी महजबीन से मेरी शादी कराई थी वह भगवान को प्यारी हो गई। अब मैं क्या करूँ, सरकार?

खलीफा को उस का दुख देख कर बड़ा खेद हुआ और उस के चेहरे पर दुख के चिह्न प्रकट हुए। यह देख कर खुशामदी दरबारियों ने भी हाय-हाय करनी शुरू कर दी। खलीफा ने भी एक हजार अशर्फियाँ और भारी कमख्वाब का थान दे कर उसे विदा किया। उस ने घर जा कर यह चीजें महजबीन को दिखाईं तो महजबीन भी बहुत खुश हुई। उधर खलीफा को महजबीन के मरने का इतना अफसोस हुआ कि वह दरबार का काम जल्दी निबटा कर महल में आया और बेगम को शोकमग्न देख कर दिलासा देने लगा, भगवान की इच्छा के आगे किसी का वश नहीं है। अब तुम महजबीन को भूल जाओ। वह वापस नहीं आ सकती। जुबैदा ने कहा, आप क्या कह रहे हैं? महजबीन नहीं बल्कि अबुल हसन मरा है। मैं तो महजबीन के वैधव्य से दुखी थी। खलीफा ने हँस कर मसरूर से कहा, देखो बेगम जैसी समझदार औरत ऐसी पागलपन की बात कर रही हैं, मरी है महजबीन और यह कह रही हैं कि अबुल हसन मरा है। अरे बेगम साहबा, अबुल हसन के मरने का रंज न करो, वह तो मरा ही नहीं है। तुम अगर अपनी पुरानी और प्रिय दासी की मृत्यु का शोक करो तो समझ में आनेवाली बात है और स्वाभाविक भी है। अबुल हसन हट्टा-कट्टा है। अभी कुछ ही देर पहले वह अपनी स्त्री की मौत पर रोता-बिलखता दरबार में आया था। सभी लोगों ने उसे देखा। यह मसरूर भी उस समय मौजूद था, यह भी मेरी बात की पुष्टि करेगा। इस से पूछो कि मैं ने क्रिया-कर्म के लिए अबुल हसन को एक हजार अशर्फियाँ और कमख्वाब का एक थान दिलवाया है या नहीं। अबुल हसन रोते-रोते ही दुआएँ दे कर चला गया।

मलिका जुबैदा बोली, हुजूर, मैं जानती हूँ कि विनोदप्रियता आप के स्वभाव में है इसीलिए ऐसी बात कह रहे हैं। किंतु यह अवसर हँसी-मजाक का नहीं है। अबुल हसन बहुत अच्छा आदमी था। आप का तो वह प्रिय दरबारी था। स्वाभाविक तो यह था कि आप को उस की मृत्यु पर खेद होता और आप हैं कि कहते हैं महजबीन मर गई। खलीफा ने कहा, बेगम, मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ कि मैं मजाक नहीं करता। यह वास्तविकता है कि अबुल हसन जीता है और महजबीन की मृत्यु हो गई है। जुबैदा ने कहा, आप को कुछ भ्रम है। दासी का पति मरा है, वह नहीं मरी। अभी कुछ देर पहले वह रोती हुई मेरे पास आई थी और बहुत देर तक अपने पति की मृत्यु पर विलाप करती रही। उस की दशा देख कर यह सब दासियाँ रोने लगीं बल्कि मुझे भी रोना आ गया। आप इन सब से पूछ सकते हैं कि यह बात ठीक है या नहीं। मैं ने महजबीन को मृतक का संस्कार करने के लिए एक हजार अशर्फियाँ और कमख्वाब का एक थान दिया है। मैं तो आप के पास अबुल हसन के मरने की खबर भिजवानेवाली थी। दोनों देर तक इसी तरह तकरार करते रहे।

अंत में तंग आ कर खलीफा ने मसरूर से कहा, मैं जानता हूँ कि महजबीन मरी है। फिर भी यह बहस खत्म होनी चाहिए। तुम जा कर अपनी आँखों देख कर आओ कि महजबीन मरी है या नहीं। मसरूर के जाने के बाद भी खलीफा और जुबैदा में बहस होती रही। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े थे। खलीफा ने कहा, इसी बात पर हम दोनों में बाजी लग जाए। अगर अबुल हसन के मरने की तुम्हारी बात सच निकले तो मैं फलाँ बाग तुम्हारे नाम कर दूँगा और अगर महजबीन की मौत की मेरी बात सच निकली तो मैं तुम्हारा कठपुतलियोंवाला महल ले लूँगा। जुबैदा ने कहा कि मुझे यह शर्त मंजूर है। वे दोनों मसरूर की वापसी की प्रतीक्षा करने लगे।

अबुल हसन को यह तो मालूम ही था कि इस बात को ले कर खलीफा और मलिका जुबैदा में तकरार हो जाएगी और वास्तविकता की जाँच कराई जाएगी। इसलिए वह होशियार था। उस ने अपना दरवाजा बंद कर रखा था लेकिन एक छेद से अपने घर की ओर आनेवालों को देख रहा था। जब उस ने मसरूर को सीधा अपने घर की ओर आते देखा तो समझ गया कि यह खलीफा का भेजा हुआ आ रहा है। उस ने महजबीन से कहा, जल्दी से एक बार फिर मरने का नाटक करो। महजबीन पश्चिम की ओर पाँव करके लेट गई और अबुल हसन ने उस पर खलीफा का दिया हुआ कमख्वाब का थान डाल दिया और दरवाजा खोल कर उस के सिरहाने अपनी आँखों पर रूमाल रख कर बैठ गया।

मसरूर आया और जब उस ने अबुल हसन को मातम करते देखा तो उसे संतोष हुआ कि खलीफा बेगम के सामने अपनी बात सिद्ध कर देगा। अबुल हसन उठा और आदरपूर्वक उस के हाथ चूम कर कहने लगा, आप देख रहे हैं कि मुझ पर कैसा पहाड़ टूटा है। महजबीन जैसी स्त्री मुझे कहाँ मिलेगी। आप तो खुद उसे अच्छी तरह जानते थे। मसरूर की आँखों में भी आँसू आ गए। उस ने महजबीन के सिर की ओर का कफन उठा कर उस का मुख देखा। महजबीन ने साँस रोक ली।
 
मसरूर ने उस का मुँह फिर ढक कर कहा, भाई, भगवान की मरजी में कौन दखल दे सकता है। महजबीन को मैं अपनी बहन की तरह चाहता था और मुझे उस की मृत्यु पर बड़ा दुख है। कुछ देर बार वह बोला, स्त्रियों में बुद्धि नहीं होती। अब यह देखो कि मलिका जुबैदा जैसी औरत इस बात पर अड़ी हुई है कि तुम मरे हो, महजबीन जीवित है। वह देर से इस बात पर खलीफा से झाँय-झाँय कर रही है। मैं तो जानता ही था कि महजबीन मरी है क्योंकि मेरे सामने तुम दरबार में रोते-पीटते आए थे, और मैं ने इस बात को कहा भी। लेकिन जुबैदा फिर भी अपनी बात पर अड़ी रही तो खलीफा ने मुझे भेजा कि तथ्य का पता लगाऊँ। अब मैं ने जो देखा है वह कहूँगा और खलीफा को सच्चा साबित करूँगा।

अबुल हसन बोला, खलीफा को भगवान चिरायु करे। उनकी मुझ पर बड़ी कृपा रही है। उनकी बात सही साबित करने को मैं खुद ही महल में जाता किंतु बार-बार मुर्दे को घर में छोड़ कर कहाँ जाऊँ। मसरूर ने कहा, तुम्हें खलीफा के पास जाने की जरूरत नहीं है। महजबीन का मुर्दा चेहरा मैं ने खुद देखा है और यही कहूँगा। अगर मुझे खलीफा को इस मामले की आँखों देखी सूचना न देनी होती तो मैं स्वयं यहाँ बैठता और तुम्हारे दुख में सम्मिलित होता। लेकिन मजबूरी है। मैं अब चलता हूँ।

अबुल हसन ने उठ कर दरवाजे तक मसरूर को पहुँचाया। जब मसरूर दूर चला गया तो उस ने जुबैदा के ऊपर से थान उठाया और कहा, अब तुम उठ बैठो। मुझे विश्वास है कि मलिका जुबैदा मसरूर की बात पर विश्वास नहीं करेंगी और अपनी किसी विश्वस्त दासी को यहाँ का हाल जानने के लिए भेजेंगी। महजबीन ने उठ कर वही मातमी कपड़े पहन लिए। दोनों दरवाजे के छेदों से बाहर देखते रहे कि देखें, अब कौन अंदर आता है ताकि उस के अनुसार कार्य करें।

मसरूर ने महल में पहुँच कर कहा, वही बात है जो मैं कहता था। महजबीन मरी है। खलीफा ने यह सुन कर जोरों से ठहाका लगाया और कहा बेगम साहिबा, आप शर्त हार गई हैं, अब कठपुतलियों का महल मेरे हवाले कीजिए। मसरूर भी हँसने लगा। जुबैदा का चेहरा लाल हो गया। खलीफा ने मसरूर से कहा, पूरा हाल बताओ। मसरूर ने कहा, हे पृथ्वीपालक, मैं पहुँचा तो देखा कि घर का दरवाजा खुला है। अबुल हसन मुर्दे के सिरहाने बैठा आँसू बहा रहा था। महजबीन दालान के बीच पड़ी थी और आप का दिया हुआ कमख्वाब का थान उस के ऊपर पड़ा था। मैं लाश के पास पहुँचा और उस के सिर की तरफ से कफन उठा कर देखा। महजबीन की साँस बंद थी और चेहरा पीला पड़ा था और कुछ सूजा भी था। मैं ने फिर से कफन उस के मुँह पर डाल दिया और कुछ देर बैठ कर चला आया। मुझे महजबीन के मरने से कोई संदेह तो पहले भी नहीं था किंतु आप के कहने से गया तो अपनी आँखों से देख कर आया हूँ कि महजबीन मर गई।

खलीफा ने जुबैदा से कहा, अब तो तुम्हें अबुल हसन के मरने का संदेह नहीं होना चाहिए, मसरूर अपनी आँखों से देख कर आया है। जुबैदा ने कहा, मुझे इस हब्शी के कहने पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। मैं न अंधी हूँ न पागल। मैं ने खुद यहाँ महजबीन को विलाप करते देखा है। मैं कैसे मान लूँ कि वह मरी है और उस का पति जिंदा है? मसरूर बोला, मालिक, मैं खलीफा और आप दोनों ही की कसम खा कर कहता हूँ कि मैं ने जो कुछ कहा है सच कहा है। जुबैदा ने दाँत पीस कर कहा, मसरूर मियाँ, मैं तुम्हारा झूठ साबित करूँगी। अपनी विश्वस्त दासी को भेज कर असलियत का पता करूँगी।

फिर उस ने उपस्थित दासियों से पूछा, सच कहो कि खलीफा के शुभागमन के कुछ पहले कौन मेरे पास रोता और बाल नोचता आया था। उन सबों ने एक स्वर से कहा कि महजबीन आई थी। फिर जुबैदा ने अपनी भंडारिन से कहा, मेरे कहने पर तुमने किसे कमख्वाब का थान और हजार अशर्फियाँ दी थीं? उस ने कहा, महजबीन को। जुबैदा ने दाँत पीस कर कहा, झूठे हब्शी, अब बता कि तू क्या कहता है? यह सब दासियाँ क्या कह रही हैं। क्या यह सब झूठ है और उन के साथ मैं भी झूठी हूँ?

मसरूर तो जुबैदा का क्रोध देख कर चुप हो रहा लेकिन खलीफा ने हँस कर कहा, विद्वानों ने स्त्रियों को बुद्धिहीन कहा है सो ठीक ही कहा है। तुम यह तो देखो कि मसरूर खुद अपनी आँखों से महजबीन की लाश देख कर आया है और अबुल हसन को इस ने उस के सिरहाने बैठ कर रोते देखा है। अब भी तुम्हें विश्वास क्यों नहीं होता? जुबैदा ने कहा, मसरूर पर मुझे विश्वास कैसे हो? वह तो आप की-सी ही कहेगा। अनुमति हो तो मैं भी अपनी एक विश्वस्त दासी भेज कर पता लगाऊँ।

खलीफा ने अनुमति दे दी। उसे विश्वास था कि दासी मसरूर के वक्तव्य का समर्थन करेगी और फिर जुबैदा को विश्वास हो जाएगा। जुबैदा ने एक बूढ़ी दासी को, जिसने जुबैदा को दूध पिलाया था, अबुल हसन के घर वास्तविकता का पता लगाने के लिए भेजा और कहा, तुम आ कर निर्भय हो कर जो देखा है सच-सच कहना। मैं तुम्हें इनाम दूँगी। बुढ़िया जुबैदा और खलीफा को अभिवादन करके अबुल हसन के घर को चल दी।

अबुल हसन दरवाजे की सेंध से देख रहा था। दूर से बुढ़िया को आते देखा तो समझ गया कि यह जुबैदा की भेजी आ रही है। उस ने अपनी पत्नी से कहा, अब मैं मरने का स्वाँग करता हूँ और तुम मातम का स्वाँग करो। वह दालान में लेट गया और महजबीन ने उस के मुँह पर पगड़ी और शरीर पर जुबैदा का दिया हुआ थान डाल दिया। जब बुढ़िया दासी उन के घर पहुँची तो उस ने दरवाजा खुला पाया और देखा कि महजबीन उसी प्रकार बाल बिखराए कपड़े फाड़े छाती पीटते हुए महाविलाप कर रही है। बुढ़िया ने उस से कहा कि मैं तुम्हारे मातम में शरीक नही हो सकूँगी क्योंकि मुझे दूसरे काम को भेजा गया है। महजबीन ने उस की बात अनसुनी कर दी जैसे बहुत दुख में हो और बोली, हाय अम्मा, मेरा दुर्भाग्य तो देखो। खलीफा और मलिका ने कितने चाव से हमारा विवाह कराया था लेकिन मेरा सुहाग दो दिन भी नही रहा। फिर वह छाती पीट कर चिल्लाने लगी, अबुल हसन, तुम मुझे छोड़ कर कहाँ चले गए? तुम्हारे बगैर मैं क्या करूँगी? मुझे किसके सहारे छोड़े जा रहे हो?

बूढ़ी दासी ने देखा कि यहाँ तो जो कुछ है वह मसरूर के कथन से उलटा है। उस ने कहा, खुदा की मार पड़े उस मुए मसरूर पर, उस ने झूठ बोल कर खलीफा और बीबी में झगड़ा डलवा दिया।

फिर उस ने महजबीन से कहा, बेटी, तुमने और कुछ सुना है। वह नालायक हब्शी मसरूर खलीफा से क्या कह रहा था? उस ने कहा कि तुम (भगवान न करे) मर गई हो और अबुल हसन तुम्हारी लाश के सिरहाने बैठ कर आँसू बहा रहा है। इस बात पर जुबैदा बीबी क्रुद्ध हुईं और उन्होंने मुझे यहाँ भेजा।

महजबीन रो कर बोली, अम्मा, काश मसरूर का कहा हुआ सच होता। रँड़ापे से तो मौत कहीं अच्छी है। हाय, अब मेरे जीवन में भी क्या रखा है। यह कह कर वह फिर बुक्का फाड़ कर रोने लगी। बुढ़िया भी उस के साथ मिल कर रोने लगी। इसी विलाप के बीच उस ने चतुरता से अबुल हसन के मुँह से पगड़ी उठा कर मुँह देखा और रोती हुई बोली, अबुल हसन, भगवान तुझे स्वर्ग भेजे और तेरी आत्मा को शांति दे। तू कितना भला आदमी था। फिर महजबीन से कहने लगी, अच्छा बेटी, खुदा हाफिज। मैं तो चाहती थी तुम्हारे साथ बैठ कर मातम करती रहती किंतु कुछ ऐसी विवशता है कि तुम्हारे यहाँ अधिक नहीं ठहर सकूँगी। जुबैदा बीबी मेरी राह देख रही होंगी। इस झूठे मसरूर ने उन्हें नाराज कर रखा है। उस बेशर्म ने उन्हीं की कसम खा कर कहा है कि तुम मर गई हो और तुम्हारा पति जीवित है जब कि मैं देख रही हूँ कि वह मरा पड़ा है और तुम उस की लाश पर रो-पीट रही हो। यह कह कर वह आँसू पोंछती हुई चली गई।

अबुल हसन भी उठ बैठा और दोनो दरवाजे बंद करके उस की सेंध से देखने लगा कि देखिए अब क्या होता है। साथ ही वे सोचने लगे कि अब इस झूठ को किस प्रकार निभाया जाए। पैसा तो मिल गया किंतु खलीफा और जुबैदा तो बुरी तरह पीछे पड़े हैं। उधर बुढ़िया अपनी कमजोरी के बावजूद पाँव घसीटती हुई महल को गई। वह जुबैदा के कमरे में पहुँची और उसे बुला कर सारी बात बताई। उस ने कहा, मेरे साथ आओ और सारी बात खलीफा के सामने बताओ। मसरूर खुश-खुश बैठा था कि दासी वही कहेगी जो मैं ने कहा है। लेकिन दासी मसरूर से बोली, मियाँ, तुम बड़े ही झूठे आदमी हो। तुमने कैसे यहाँ सब के सामने कहा कि महजबीन मर गई है और अबुल हसन जीवित है? मैं ने खुद अपनी आँख से देखा कि वह मरा पड़ा है और बेचारी महजबीन छाती पीट-पीट कर रो रही है। तुम्हें ले कर ही महल का प्रबंध बनाया गया है। ऐसे जिम्मेदार आदमी हो कर तुम्हें सफेद झूठ बोलते शर्म नहीं आई? तुम्हें तो इस प्रकार अपने स्वामी को धोखा देने के अपराध में करावास मिलना चाहिए।

मसरूर चीख कर बोला, क्या बकवास कर रही है बुढ़िया? मरने के करीब हो गई है लेकिन झूठ बोलना न छोड़ा। कयामत के दिन खुदा को क्या मुँह दिखाएगी। तुझे नरक में जाने का भी डर नहीं है। मैं ने खुद उस स्त्री को मृत देखा है। बुढ़िया बुरी तरह बिगड़ कर बोली, झूठा तू खुद और तेरे बाप दादे। मुझे झूठा बना रहा है। मैं खुद देख कर आ रही हूँ कि अबुल हसन की लाश पड़ी है। उस का मरा मुँह देखा है। मसरूर बोला, शैतान की खाला, बराबर झूठ बोले जा रही है। खुदा तेरा मुँह काला करे। बुढ़िया बोली, तेरा मुँह तो पहले ही से काला है, भगवान तुझसे समझेगा। जुबैदा ने खलीफा से कहा, देखिए आप का नौकर कितना झूठा और धृष्ट है। इस ने मेरी दूध पिलानेवाली को क्या-क्या नहीं कहा। आप सब कुछ सुन कर भी चुप रहे, उसे कुछ नहीं कहा।

यह कह कर जुबैदा ने अंतिम अस्त्र अपनाया यानी रोना शुरू कर दिया।

खलीफा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि किसे झूठा समझे किसे सच्चा। वह बहुत देर तक चुप रहा। अन्य लोग भी चुप हो गए। अंत में खलीफा ने कहा, हम दोनों में कोई दूसरे के सामने अपने को सच्चा साबित नहीं कर सका। मसरूर और तुम्हारी दाई भी एक-दूसरे को झूठा कह रहे हैं।

अब एक ही बात मुमकिन है। वह यह कि हम सभी अबुल हसन के घर चल कर देखें कि क्या बात है। जुबैदा ने मंजूर किया क्योंकि अबुल हसन का घर पास ही था। सब लोग पैदल ही चल पड़े। रास्ते में भी मसरूर और बुढ़िया दासी झगड़ते और एक-दूसरे को झूठा कहने लगे। जुबैदा ने भी दाई का पक्ष ले कर मसरूर को बुला-भला कहा। मसरूर बोला, मलिका, यह सच्ची हो तो मेरे साथ शर्त बदे। मैं झूठा हूँ तो इसे एक सुनहरी कमख्वाब का थान दूँ और अगर इसका झूठ साबित हो तो यह मुझे ऐसा ही थान दे। जब इसे कमख्वाब का थान देना पड़ेगा तो मालूम होगा कि झूठ बोलने का नतीजा क्या होता है। बुढ़िया बोली, मुझे शर्त मंजूर है। थान मसरूर ही को देना पड़ेगा, मुझे नहीं।

अबुल हसन और महजबीन दोनों ने देखा कि सभी लोग चले आ रहे हैं। महजबीन घबरा कर बोली, मारे गए। अबुल हसन बोला, डरती क्यों हो। घबराहट में तुम वह भी भूल गई जो मैं ने तुम से कहा था। तुम वही करो, बाकी बात मैं सँभाल लूँगा। उस के बाद दोनों ही अपने-अपने कफन के लिए मिला हुआ थान अपने-अपने ऊपर डाल कर लेट गए।

जब खलीफा, जुबैदा और उनका दल मकान पर पहुँचा तो सब लोग दरवाजा ठेल कर अंदर पहुँचे और देखा कि दोनों मुर्दे की तरह पड़े हैं। जल्दी में वे यह भी न सोच पाए कि दोनों मुर्दों पर कफन कैसे पड़ा है।

जुबैदा ने खलीफा से कहा, हाय, अभागी महजबीन बेचारी अपने पति का वियोग नहीं सहन कर सकी और खुद भी मर गई। फिर दाईं और मसरूर की ओर देख कर बोली, तुम लोगों के बार-बार आने-जाने से इसका रंज इतना बढ़ा कि यह भी मर गई। खलीफा ने कहा, नहीं, यह बात बिल्कुल नहीं है। पहले महजबीन मरी है, फिर रंज की वजह से अबुल हसन मरा है। मैं शर्त जीत गया और कठपुतलियों का महल तुम्हारे हाथ से गया। जुबैदा ने कहा, आप का बाग मेरा हुआ क्योंकि मैं जीती हूँ। अभी मेरी दाई महजबीन को जीवित देख गई है, स्पष्ट है कि वही बाद में मरी है। इसी तरह की बहस मसरूर और बूढ़ी दासी के बीच होने लगी क्योंकि कोई भी शर्त हारना नहीं चाहता था। अजीब स्थिति थी। सभी के आने पर भी समस्या जहाँ की तहाँ रही। अब यह कौन बताता कि पहले किसकी मृत्यु हुई।

खलीफा ने बहुत देर तक विचार किया। फिर अबुल हसन और महजबीन के बीच में बैठ गया और पुकार कर बोला, मैं इसी समय एक हजार अशर्फियाँ उस आदमी को दूँगा जो स्पष्ट रूप से सिद्ध कर सके कि इन दोनों में पहले कौन मरा। एक हजार अशर्फियों का लालच दोनों को हुआ। अबुल हसन ने अपने ऊपर का थान उतार फेंका और खलीफा के पैरों पर गिर कर बोला, सरकार, पहले यह मरी थी। इसी तरह महजबीन जुबैदा के पाँवों पर गिर कर बोली, महारानी, मैं नहीं, यह पहले मरा है। जुबैदा मुर्दों को बोलते देख कर चीख कर खलीफा से लिपट गई। खलीफा भी स्तंभित-सा रह गया।

कुछ देर बाद स्वस्थ होने पर जुबैदा हँसते हुए बोली, दुष्टा, तेरे ही कारण मैं और खलीफा दिन भर एक-दूसरे से लड़ते रहे। खैर, मुझे यही संतोष है कि तू जीवित है। तुझे सजा न दूँगी। लेकिन यह तो बता कि यह तमाशा क्यों किया था? इसी प्रकार खलीफा ने भी हँसते हुए अबुल हसन से कहा, क्यों बे, यह क्या हरकत थी? तुम दोनों के इस नाटक से हम लोग आपस में लड़ते रहे और इस समय मेरी हँसी नहीं रुक रही। अगर मैं ने हँसना शुरू किया तो शायद हँसते-हँसते मर जाऊँगा।

अबुल हसन ने कहा, सरकार, आप ने कृपापूर्वक हम दोनों का विवाह कराया। हम लोग आनंदपूर्वक रहने लगे। किंतु हमारा आनंद अधिक ही बढ़ गया। मेरा हाथ खुल गया और मैं अनाप-शनाप खर्च करने लगा। मुझ पर इतना कर्जा हो गया कि तनख्वाह में उस की अदायगी संभव हो नहीं थी। आप की सेवा में आने के बाद व्यापार भी मैं ने बंद कर दिया था। विवश हो कर आखिर इस नीच हरकत पर उतर आया ताकि झूठ बोल कर ही कुछ पैसा मिल जाए। मैं ने सब कुछ आप से कह दिया। आप का अधिकार है चाहे क्षमा करें चाहे दंड दें।

खलीफा ने हँस कर कहा, यह क्यों नहीं कहता कि मैं ने जो छल तुझ से किया था तूने उस का बदला ले लिया। खैर, मुझे तेरा नाटक बहुत पसंद आया। तूने यह भी अच्छा किया कि किसी और के आगे हाथ नहीं फैलाया। अब यह तीन हजार अशर्फियाँ और दोनों थान तुम लोगों के हुए। लेकिन आयंदा सँभल कर खर्च करना। अब की बार ऐसी हरकत हुई तो कठोर दंड दिया जाएगा। अबुल हसन और उस की पत्नी ने सिर नवाया। इस के बाद सारी जिंदगी उन दोनों ने हँसी, खुशी और आराम से बिताई।

दुनियाजाद ने कहा, बहन, यह कहानी तो बड़े मजे की रही। शहरजाद ने कहा, मैं अलादीन और जादुई चिराग की कहानी भी सुनाऊँगी। शहरयार ने कहा, कल सुनाना, आज सवेरा हो गया है।
 
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