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महाबाहु ने अपनी प्रसन्नता को रोकते हुए कहा, "ठीक है, परन्तु अब जब कि वह स्थिति नहीं रही, आप लोगों को धोखे में रखने वाले उचित दंड पा चुके हैं । अब आप को अपने कर्त्तव्य को समझकर देश की रक्षा के लिए अपने रक्त की अंतिम बूंद तक दे देनी चाहिये । इसलिए आप सब लोग युद्ध की तैयारी करो । महाराज की आज्ञानुसार मैं उचित समझता हूँ कि जब तक युद्ध चलता है, प्रधान मन्त्रित्व का भार न्यायशास्त्री जी सम्भालेंगे तथा सेनापति का भार यह सैनिक अधिकारी अपने हाथ में ले लेगा जिसने अभी खड़े होकर सन्धि के बारे में सेना के सिपाहियों के रोष की सूचना दी थी ।"
"मगध, चालुक्य और मालवा की सेनाओं की एकत्रित बागडोर को श्री रुद्रदत्त संभालेंगे जो हमारी सेनाओं के निश्चित स्थान पर पहुंचने तक पहुंच जायेंगे । मैं नए सेनापति से प्रार्थना करता हूं कि वे एक सुन्दर रथ में तेज दौड़ने वाले घोड़ों को जुतवा दें और उसे शीघ्रातिशीघ्र बस्ती से बाहर जाने वाले मार्ग पर खड़ा करें ।"
महाबाहु ने आगे पूछा, "क्या अश्वशाला के प्रबंधक यहीं हैं ?"
"हाँ महाराज !" अश्वशाला के अधिपति ने कहा और खड़ा होकर बोला, "मेरे लिए क्या आज्ञा है?"
"कृपया मुझे दो ऐसी घोड़ियों के पास ले चलिए जो मदमत्त हों । और वैद्यजी, आप भी मेरे साथ आइये तथा कुछ औषधियां मुझे अपने औषधालय में से दीजिए ।"
अश्वशाला के अधिकारी और राजवैद्य के साथ तम्बू से बाहर निकलते हुए महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़ते हुए कहा, "मन्त्री जी, आप सभा विसर्जित कीजिए । महाराज को मेरे साथ चलना है । कृपया आप भी शीघ्र तैयार हो जाइये ।"
चार शस्त्रधारी सैनिकों को लेकर महाराज रथ पर बैठ गए । अश्वशाला के अधिकारी महाबाहु का संकेत पाकर राजवैद्य से एक तैल लेकर घोड़े को मालिश करने लगे । महाबाहु ने रथ का अच्छी तरह निरीक्षण किया, तत्पश्चात् अपनी जेब से एक डिबिया निकालकर उसको खोला और एक चूर्ण सा निकाल कर उसने घोड़ों के नथनों पर मला । घोड़े एक बार जोर से हिनहिनाए ।
रथ में बैठे महाराज ने कहा, "महाबाहु, लगता है आज तुम तक्षशिला की विद्या को सार्थक करने का प्रयत्न कर रहे हो ।"
"हाँ महाराज, जो रथ चलाने की विद्या सीखी थी, यदि आज ही वह काम न आई तो उस का लाभ ही क्या ? मेरी यह औषधि इनमें कबूतरियों की तरह उड़ने वाली शक्ति भर देगी । इसमें कोई सन्देह नहीं, यह घोड़े अपनी मंजिल पर पहुँचने के बाद जीवित नहीं बचेंगे । परन्तु इनका मुकाबला करने की शक्ति किसी जीवित प्राणी में नहीं मिल सकती ।"
"वास्तव में तुम महान् हो महाबाहु !"
"ऐसा नहीं महाराज ! मैं तो केवल देश का एक मामूली-सा सैनिक हूँ । परन्तु मुझे दुःख इसी बात का है कि आप इतने नादान किस तरह बने रहे । इतने बड़े राज्य की बागडोर आपके हाथों में थी जिसके लिए आप का सतर्क होना नितान्त आवश्यक था ।"
वह कटाक्ष महाराज के हृदय में तीर के समान चुभ गया । उनकी खोई हुई शक्तियाँ एकदम सजग हो उठीं ।
नए प्रधानमंत्री और सेनापति ने आकर सूचना दी कि कल की तोड़ी सड़क का सैनिकों ने पुनः निर्माण कर दिया है ।
महाबाहु ने अपनी पगड़ी पर गले का कपड़ा जोर से कसा और घोड़ों की रासें थामकर रथ पर जा बैठा ।
महाराज ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया, "पीछे से विद्रोही कर्मचारियों की कड़ी निगरानी रखी जाय ।"
चलने के लिए व्याकुल घोड़ों पर महाबाहु का चाबुक लगते ही वह हवा में बातें करने लगे । उत्तर में दोनों अधिकारियों के शब्द न जाने कहां विलीन हो गये ।
रथ की छत पर लगे ध्वज फहराने लगे और रथ की घंटियां टनाटन कर बजने लगीं । महाराज का कपड़ा इतनी जोर से फड़फड़ाने लगा मानो अभी उड़कर बाहर जा गिरेगा । सैनिकों ने किनारे के पर्दे खोलकर बाँध दिये । डाक की पहली चौकी बारह कोस पर स्थित थी । वहाँ पर घोड़े खड़े रहने के लिए महाबाहु ने घोड़ों की गति धीमी की । दूर से आती रथ की घंटियों की आवाज सुनकर चौकी के सैनिक अधिकारी ने बाहर आकर देखा । राजध्वज वाले रथ को देखकर उसने अपने सैनिकों को दो घोड़े लाने की आज्ञा दी और आप मार्ग में जाकर खड़ा हो गया । रथ के आते ही सब सैनिकों ने महाराज को सैनिक अभिवादन किया ।
महाबाहु बोला, "हमें घोड़ों की आवश्यकता नहीं । तुम हमें बताओ कि हूण राजदूत का रथ किस समय यहाँ से गया है ।"
"श्रीमान्, उन्हें गए तो एक पहर से अधिक समय हो गया है ।"
"वह किस गति से जा रहा था ?"
"वह बहुत तेज जा रहा था । मालूम होता था मानो वह अपने घोड़ों के प्राण ही लेकर छोड़ेगा । यदि राज्य कर्मचारी साथ न होता तो हम कभी भी उसके घोड़ों को न बदलते ।"
महाबाहु ने अपने घोड़ों को झटका दिया और वे फिर हवा से बातें करने लगे । चौकी के अधिकारी और साथियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा और आपस में बातें करने लगे ।
"इस प्रकार हूण दूत का पीछा किसी विशेष उद्देश्य से ही किया जा रहा दिखाई देता है ।"
"महाराज आप भी रथ में विराजमान थे ।"
"परन्तु यह रथ चलाने वाला कौन था ?"
महाराज ने और उनके चारों सैनिकों ने अपने जीवन में इतनी तेजी से दौड़ता हुआ रथ नहीं देखा था । पृथ्वी पर चलने वाले घोड़े छः सवारियों वाले रथ को इतनी द्रुत गति से ले उड़ेंगे, ऐसी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । ऐसा लगता था जैसे घोड़ों पर पागलपन सवार है, जैसे वह अपनी थकावट को भूलकर अपने लक्ष्य स्थान को शीघ्रातिशीघ्र पा लेने को व्याकुल होकर उड़ते चले जाते हैं ।
रथ हवा को चीरता, लम्बे रास्ते को पीछे छोड़ता, भागता जा रहा था । महाबाहु पत्थर के समान दृढ़ अपने स्थान पर स्थिर बैठा था । हूण राजदूत को पकड़ने की व्याकुलता, उसके हाथों में थमी रासों की गति घोड़ों को उत्तेजित कर रही थी और उसके हृदय की धड़कनें घोड़ों की टापों से ताल मिला रहीं थीं ।
महाराज ने अपने स्थान से आवाज दी, "देखना महाबाहु, इतने वेग से कहीं घोड़ों की छाती ही न फट जाय ।"
रथ के चक्रों की ध्वनि और वायुवेग के कारण महाराज का वह स्वर वायुमंडल में विलीन हो गया, जिसे महाबाहु सुन भी न सका । थोड़ी देर में दूसरी चौकी भी पीछे छूट गई । महाबाहु जोर से बोला, "आगे एक तिराहा आयेगा । उनमें से एक छोटा मार्ग है, परन्तु थोड़ा टूटा फूटा है । दूसरी एक ग्रामीण पगडंडी है जिससे हो कर भी रथ को ले जाया जा सकता है । तीसरी यह सड़क है जिस पर हम जा रहे हैं । बताइये, कौन सा मार्ग पकड़ा जाय ?"
महाराज बोले, "इस तिराहे से पूर्व एक डाक की चौकी भी आएगी । क्यों न वहाँ ठहर कर पूछ लिया जाय ?"
नहीं, अब रुका नहीं जा सकता क्योंकि घोड़ों के पट्ठे बड़ी बुरी तरह गर्म हो चुके हैं । यदि इन्हें रोका तो वहीं पर दम तोड़ देंगे ।"
"तो सीधी सड़क से ही चलो ।"
"ठीक है ।"
तीन उजड़ी बस्तियाँ एक के बाद एक करके पीछे रह गईं । एक जलती झोंपड़ी के पास से उनका रथ सपाट से निकल गया । सड़क पर किसी बैल की लाश पर इकट्ठे गिद्धों की टोली रथ की आवाज सुनकर चौंकी और उड़कर थोड़ी दूर जाकर बैठ गई । सूर्य अस्ताचल को प्रयाण कर गया । साए लम्बे होकर बढ़ने लगे । सायं के झुटपुटे में उड़ता हुआ एक मच्छर महाबाहु की आंखों में आ गिरा । "दुष्टो!" महाबाहु बड़बड़ाया, "तुम्हें भी आज ही समय मिला था मुझे अंधा बनाने का" कहते हुए महाबाहु का हाथ आँखों को मलने लगा ताकि वह मच्छर निकल जाय । पूर्णिमा का चाँद वृक्षों के पीछे से निकलता दिखाई दिया । सारा वातावरण मुखरित हो उठा ।
"मेरा विचार है आधी रात तक हम उन्हें पकड़ लेंगे ।" पीछे से महाराज ने पूछा ।
"हां ! शायद !! भगवान् ने चाहा तो हम शीघ्र ही अपने कार्य में सफल होंगे ।"
परन्तु आधी रात्रि से पहले ही उन्हें दूर धूल की रेत का बवंडर उड़ता हुआ दिखाई दिया ।
"महाबाहु, वह सामने देखो, क्या रथ का ध्वज दिखाई देता है ?"
"जी हाँ !" सैनिकों ने भी रथ से सिर बाहर निकाल कर चन्द्रमा के प्रकाश में देखा । परन्तु ऐसा दिखाई देने लगा मानो हूण दूत ने अपने रथ को और भी अधिक तेज कर दिया है । इधर महाबाहु ने अपने घोड़ों की बागें झटकीं, घोड़े और भी तेजी से दौड़ने लगे । हूण दूत ने जब देखा कि पीछे से एक रथ बड़ी तेजी से बढ़ता चला आ रहा है तो उसने भी अपने घोड़ों को ताबड़तोड़ मारना आरम्भ कर दिया ताकि वह और भी जोर से भागने लगें । महाबाहु के घोड़े चालीस कोस की यात्रा के बाद बिल्कुल बेदम हो चुके थे जब कि हूण दूत के घोड़े अभी पिछली चौकी पर ही बदले गए थे । चाबुक की मार पड़ते ही वे हवा में बातें करने लगे और धीरे-धीरे महाबाहु तथा उसके रथ का अन्तर बढ़ने लगा ।
"क्या बात है ?"
"कुछ नहीं !" महाबाहु ने अपने घोड़े की बागें फिर झटकीं और कोड़ हाथ में पकड़ लिया ।
"अब बचकर न जा सके महाबाहु !"
"अब नहीं बचेगा महाराज ।" महाबाहु बोला और उसने तीन चार घोड़ों पर गाड़ी .............................. ................ .................. ......... ............. अन्तर कम होना शुरू हो गया । शीघ्र ही महाबाहु का रथ धूल के बादल को चीरता हुआ हूण दूत के साथ दौड़ने लगा ।
महाबाहु हूण से ऊंचे स्वर में बोला, "घोड़ों को रोको, अन्यथा बाण मारकर दोनों घोड़ों को मार डालूंगा ।"
"रथ नहीं रुकेगा, तुम कौन हो रथ रोकने वाले ?"
अन्दर से मालव कर्मचारी ने सिर बाहर निकाल कर कहा, "हम मालवराज का आवश्यक सन्देश लेकर जा रहे हैं ।"
महाराज ने परदा उठाकर अपने कर्मचारी को आज्ञा दी, "मैं तुमसे कह रहा हूं रथ रुकवा लो । क्या तुम्हें राज्यध्वज लगा हुआ दिखाई नहीं देता ?"
"सन्धि-पत्र तुम्हारे पास है अथवा हूण के पास ?" महाराज ने अपने विस्मित तथा आश्चर्यचकित कर्मचारी से पूछा ।
"मेरे पास है महाराज ।"
"तो हम अपना रथ तुम्हारे पास लाते हैं, तुम इस पर कूद आओ ।"
महाबाहु अपने रथ को हूण दूत के रथ के साथ-साथ दौड़ाने लगा परन्तु मालव कर्मचारी अब भी कूदने से डर रहा था, शायद गिर पड़ने की सम्भावना से कुछ निश्चय न कर पा सकने के कारण ।
"कूद आओ" महाराज क्रोध से गरजे, "नहीं तो याद रखो मेरे सैनिक तुम्हें बाणों से मार देंगे और यहाँ से लौटकर मैं तुम्हारे सारे परिवार को सूली पर चढ़वा दूँगा । सिपाहियों ने अपने बाण धनुषों पर खींच लिए ।
"खबरदार, जो तुम रथ से बाहर कूदे ! लाओ, सन्धि-पत्र मुझे दे दो", हूण दूत ने अपना एक हाथ पीछे बैठे मालव अधिकारी की ओर किया । परन्तु महाराज की धमकी के डर से मालव कर्मचारी ने महाबाहु के रथ पर छलांग लगा दी और पीछे के डण्डे पर बन्दर के समान चिपक गया ।
"पहले इससे यह सन्धि-पत्र ले कर देख लें महाराज ।" हूण दूत के साथ रथ को दौड़ाते हुए महाबाहु ने कहा ।
"मगध, चालुक्य और मालवा की सेनाओं की एकत्रित बागडोर को श्री रुद्रदत्त संभालेंगे जो हमारी सेनाओं के निश्चित स्थान पर पहुंचने तक पहुंच जायेंगे । मैं नए सेनापति से प्रार्थना करता हूं कि वे एक सुन्दर रथ में तेज दौड़ने वाले घोड़ों को जुतवा दें और उसे शीघ्रातिशीघ्र बस्ती से बाहर जाने वाले मार्ग पर खड़ा करें ।"
महाबाहु ने आगे पूछा, "क्या अश्वशाला के प्रबंधक यहीं हैं ?"
"हाँ महाराज !" अश्वशाला के अधिपति ने कहा और खड़ा होकर बोला, "मेरे लिए क्या आज्ञा है?"
"कृपया मुझे दो ऐसी घोड़ियों के पास ले चलिए जो मदमत्त हों । और वैद्यजी, आप भी मेरे साथ आइये तथा कुछ औषधियां मुझे अपने औषधालय में से दीजिए ।"
अश्वशाला के अधिकारी और राजवैद्य के साथ तम्बू से बाहर निकलते हुए महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़ते हुए कहा, "मन्त्री जी, आप सभा विसर्जित कीजिए । महाराज को मेरे साथ चलना है । कृपया आप भी शीघ्र तैयार हो जाइये ।"
चार शस्त्रधारी सैनिकों को लेकर महाराज रथ पर बैठ गए । अश्वशाला के अधिकारी महाबाहु का संकेत पाकर राजवैद्य से एक तैल लेकर घोड़े को मालिश करने लगे । महाबाहु ने रथ का अच्छी तरह निरीक्षण किया, तत्पश्चात् अपनी जेब से एक डिबिया निकालकर उसको खोला और एक चूर्ण सा निकाल कर उसने घोड़ों के नथनों पर मला । घोड़े एक बार जोर से हिनहिनाए ।
रथ में बैठे महाराज ने कहा, "महाबाहु, लगता है आज तुम तक्षशिला की विद्या को सार्थक करने का प्रयत्न कर रहे हो ।"
"हाँ महाराज, जो रथ चलाने की विद्या सीखी थी, यदि आज ही वह काम न आई तो उस का लाभ ही क्या ? मेरी यह औषधि इनमें कबूतरियों की तरह उड़ने वाली शक्ति भर देगी । इसमें कोई सन्देह नहीं, यह घोड़े अपनी मंजिल पर पहुँचने के बाद जीवित नहीं बचेंगे । परन्तु इनका मुकाबला करने की शक्ति किसी जीवित प्राणी में नहीं मिल सकती ।"
"वास्तव में तुम महान् हो महाबाहु !"
"ऐसा नहीं महाराज ! मैं तो केवल देश का एक मामूली-सा सैनिक हूँ । परन्तु मुझे दुःख इसी बात का है कि आप इतने नादान किस तरह बने रहे । इतने बड़े राज्य की बागडोर आपके हाथों में थी जिसके लिए आप का सतर्क होना नितान्त आवश्यक था ।"
वह कटाक्ष महाराज के हृदय में तीर के समान चुभ गया । उनकी खोई हुई शक्तियाँ एकदम सजग हो उठीं ।
नए प्रधानमंत्री और सेनापति ने आकर सूचना दी कि कल की तोड़ी सड़क का सैनिकों ने पुनः निर्माण कर दिया है ।
महाबाहु ने अपनी पगड़ी पर गले का कपड़ा जोर से कसा और घोड़ों की रासें थामकर रथ पर जा बैठा ।
महाराज ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया, "पीछे से विद्रोही कर्मचारियों की कड़ी निगरानी रखी जाय ।"
चलने के लिए व्याकुल घोड़ों पर महाबाहु का चाबुक लगते ही वह हवा में बातें करने लगे । उत्तर में दोनों अधिकारियों के शब्द न जाने कहां विलीन हो गये ।
रथ की छत पर लगे ध्वज फहराने लगे और रथ की घंटियां टनाटन कर बजने लगीं । महाराज का कपड़ा इतनी जोर से फड़फड़ाने लगा मानो अभी उड़कर बाहर जा गिरेगा । सैनिकों ने किनारे के पर्दे खोलकर बाँध दिये । डाक की पहली चौकी बारह कोस पर स्थित थी । वहाँ पर घोड़े खड़े रहने के लिए महाबाहु ने घोड़ों की गति धीमी की । दूर से आती रथ की घंटियों की आवाज सुनकर चौकी के सैनिक अधिकारी ने बाहर आकर देखा । राजध्वज वाले रथ को देखकर उसने अपने सैनिकों को दो घोड़े लाने की आज्ञा दी और आप मार्ग में जाकर खड़ा हो गया । रथ के आते ही सब सैनिकों ने महाराज को सैनिक अभिवादन किया ।
महाबाहु बोला, "हमें घोड़ों की आवश्यकता नहीं । तुम हमें बताओ कि हूण राजदूत का रथ किस समय यहाँ से गया है ।"
"श्रीमान्, उन्हें गए तो एक पहर से अधिक समय हो गया है ।"
"वह किस गति से जा रहा था ?"
"वह बहुत तेज जा रहा था । मालूम होता था मानो वह अपने घोड़ों के प्राण ही लेकर छोड़ेगा । यदि राज्य कर्मचारी साथ न होता तो हम कभी भी उसके घोड़ों को न बदलते ।"
महाबाहु ने अपने घोड़ों को झटका दिया और वे फिर हवा से बातें करने लगे । चौकी के अधिकारी और साथियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा और आपस में बातें करने लगे ।
"इस प्रकार हूण दूत का पीछा किसी विशेष उद्देश्य से ही किया जा रहा दिखाई देता है ।"
"महाराज आप भी रथ में विराजमान थे ।"
"परन्तु यह रथ चलाने वाला कौन था ?"
महाराज ने और उनके चारों सैनिकों ने अपने जीवन में इतनी तेजी से दौड़ता हुआ रथ नहीं देखा था । पृथ्वी पर चलने वाले घोड़े छः सवारियों वाले रथ को इतनी द्रुत गति से ले उड़ेंगे, ऐसी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । ऐसा लगता था जैसे घोड़ों पर पागलपन सवार है, जैसे वह अपनी थकावट को भूलकर अपने लक्ष्य स्थान को शीघ्रातिशीघ्र पा लेने को व्याकुल होकर उड़ते चले जाते हैं ।
रथ हवा को चीरता, लम्बे रास्ते को पीछे छोड़ता, भागता जा रहा था । महाबाहु पत्थर के समान दृढ़ अपने स्थान पर स्थिर बैठा था । हूण राजदूत को पकड़ने की व्याकुलता, उसके हाथों में थमी रासों की गति घोड़ों को उत्तेजित कर रही थी और उसके हृदय की धड़कनें घोड़ों की टापों से ताल मिला रहीं थीं ।
महाराज ने अपने स्थान से आवाज दी, "देखना महाबाहु, इतने वेग से कहीं घोड़ों की छाती ही न फट जाय ।"
रथ के चक्रों की ध्वनि और वायुवेग के कारण महाराज का वह स्वर वायुमंडल में विलीन हो गया, जिसे महाबाहु सुन भी न सका । थोड़ी देर में दूसरी चौकी भी पीछे छूट गई । महाबाहु जोर से बोला, "आगे एक तिराहा आयेगा । उनमें से एक छोटा मार्ग है, परन्तु थोड़ा टूटा फूटा है । दूसरी एक ग्रामीण पगडंडी है जिससे हो कर भी रथ को ले जाया जा सकता है । तीसरी यह सड़क है जिस पर हम जा रहे हैं । बताइये, कौन सा मार्ग पकड़ा जाय ?"
महाराज बोले, "इस तिराहे से पूर्व एक डाक की चौकी भी आएगी । क्यों न वहाँ ठहर कर पूछ लिया जाय ?"
नहीं, अब रुका नहीं जा सकता क्योंकि घोड़ों के पट्ठे बड़ी बुरी तरह गर्म हो चुके हैं । यदि इन्हें रोका तो वहीं पर दम तोड़ देंगे ।"
"तो सीधी सड़क से ही चलो ।"
"ठीक है ।"
तीन उजड़ी बस्तियाँ एक के बाद एक करके पीछे रह गईं । एक जलती झोंपड़ी के पास से उनका रथ सपाट से निकल गया । सड़क पर किसी बैल की लाश पर इकट्ठे गिद्धों की टोली रथ की आवाज सुनकर चौंकी और उड़कर थोड़ी दूर जाकर बैठ गई । सूर्य अस्ताचल को प्रयाण कर गया । साए लम्बे होकर बढ़ने लगे । सायं के झुटपुटे में उड़ता हुआ एक मच्छर महाबाहु की आंखों में आ गिरा । "दुष्टो!" महाबाहु बड़बड़ाया, "तुम्हें भी आज ही समय मिला था मुझे अंधा बनाने का" कहते हुए महाबाहु का हाथ आँखों को मलने लगा ताकि वह मच्छर निकल जाय । पूर्णिमा का चाँद वृक्षों के पीछे से निकलता दिखाई दिया । सारा वातावरण मुखरित हो उठा ।
"मेरा विचार है आधी रात तक हम उन्हें पकड़ लेंगे ।" पीछे से महाराज ने पूछा ।
"हां ! शायद !! भगवान् ने चाहा तो हम शीघ्र ही अपने कार्य में सफल होंगे ।"
परन्तु आधी रात्रि से पहले ही उन्हें दूर धूल की रेत का बवंडर उड़ता हुआ दिखाई दिया ।
"महाबाहु, वह सामने देखो, क्या रथ का ध्वज दिखाई देता है ?"
"जी हाँ !" सैनिकों ने भी रथ से सिर बाहर निकाल कर चन्द्रमा के प्रकाश में देखा । परन्तु ऐसा दिखाई देने लगा मानो हूण दूत ने अपने रथ को और भी अधिक तेज कर दिया है । इधर महाबाहु ने अपने घोड़ों की बागें झटकीं, घोड़े और भी तेजी से दौड़ने लगे । हूण दूत ने जब देखा कि पीछे से एक रथ बड़ी तेजी से बढ़ता चला आ रहा है तो उसने भी अपने घोड़ों को ताबड़तोड़ मारना आरम्भ कर दिया ताकि वह और भी जोर से भागने लगें । महाबाहु के घोड़े चालीस कोस की यात्रा के बाद बिल्कुल बेदम हो चुके थे जब कि हूण दूत के घोड़े अभी पिछली चौकी पर ही बदले गए थे । चाबुक की मार पड़ते ही वे हवा में बातें करने लगे और धीरे-धीरे महाबाहु तथा उसके रथ का अन्तर बढ़ने लगा ।
"क्या बात है ?"
"कुछ नहीं !" महाबाहु ने अपने घोड़े की बागें फिर झटकीं और कोड़ हाथ में पकड़ लिया ।
"अब बचकर न जा सके महाबाहु !"
"अब नहीं बचेगा महाराज ।" महाबाहु बोला और उसने तीन चार घोड़ों पर गाड़ी .............................. ................ .................. ......... ............. अन्तर कम होना शुरू हो गया । शीघ्र ही महाबाहु का रथ धूल के बादल को चीरता हुआ हूण दूत के साथ दौड़ने लगा ।
महाबाहु हूण से ऊंचे स्वर में बोला, "घोड़ों को रोको, अन्यथा बाण मारकर दोनों घोड़ों को मार डालूंगा ।"
"रथ नहीं रुकेगा, तुम कौन हो रथ रोकने वाले ?"
अन्दर से मालव कर्मचारी ने सिर बाहर निकाल कर कहा, "हम मालवराज का आवश्यक सन्देश लेकर जा रहे हैं ।"
महाराज ने परदा उठाकर अपने कर्मचारी को आज्ञा दी, "मैं तुमसे कह रहा हूं रथ रुकवा लो । क्या तुम्हें राज्यध्वज लगा हुआ दिखाई नहीं देता ?"
"सन्धि-पत्र तुम्हारे पास है अथवा हूण के पास ?" महाराज ने अपने विस्मित तथा आश्चर्यचकित कर्मचारी से पूछा ।
"मेरे पास है महाराज ।"
"तो हम अपना रथ तुम्हारे पास लाते हैं, तुम इस पर कूद आओ ।"
महाबाहु अपने रथ को हूण दूत के रथ के साथ-साथ दौड़ाने लगा परन्तु मालव कर्मचारी अब भी कूदने से डर रहा था, शायद गिर पड़ने की सम्भावना से कुछ निश्चय न कर पा सकने के कारण ।
"कूद आओ" महाराज क्रोध से गरजे, "नहीं तो याद रखो मेरे सैनिक तुम्हें बाणों से मार देंगे और यहाँ से लौटकर मैं तुम्हारे सारे परिवार को सूली पर चढ़वा दूँगा । सिपाहियों ने अपने बाण धनुषों पर खींच लिए ।
"खबरदार, जो तुम रथ से बाहर कूदे ! लाओ, सन्धि-पत्र मुझे दे दो", हूण दूत ने अपना एक हाथ पीछे बैठे मालव अधिकारी की ओर किया । परन्तु महाराज की धमकी के डर से मालव कर्मचारी ने महाबाहु के रथ पर छलांग लगा दी और पीछे के डण्डे पर बन्दर के समान चिपक गया ।
"पहले इससे यह सन्धि-पत्र ले कर देख लें महाराज ।" हूण दूत के साथ रथ को दौड़ाते हुए महाबाहु ने कहा ।