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आखिर जीत हमारी है

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महाबाहु ने अपनी प्रसन्नता को रोकते हुए कहा, "ठीक है, परन्तु अब जब कि वह स्थिति नहीं रही, आप लोगों को धोखे में रखने वाले उचित दंड पा चुके हैं । अब आप को अपने कर्त्तव्य को समझकर देश की रक्षा के लिए अपने रक्त की अंतिम बूंद तक दे देनी चाहिये । इसलिए आप सब लोग युद्ध की तैयारी करो । महाराज की आज्ञानुसार मैं उचित समझता हूँ कि जब तक युद्ध चलता है, प्रधान मन्त्रित्व का भार न्यायशास्‍त्री जी सम्भालेंगे तथा सेनापति का भार यह सैनिक अधिकारी अपने हाथ में ले लेगा जिसने अभी खड़े होकर सन्धि के बारे में सेना के सिपाहियों के रोष की सूचना दी थी ।"

"मगध, चालुक्य और मालवा की सेनाओं की एकत्रित बागडोर को श्री रुद्रदत्त संभालेंगे जो हमारी सेनाओं के निश्चित स्थान पर पहुंचने तक पहुंच जायेंगे । मैं नए सेनापति से प्रार्थना करता हूं कि वे एक सुन्दर रथ में तेज दौड़ने वाले घोड़ों को जुतवा दें और उसे शीघ्रातिशीघ्र बस्ती से बाहर जाने वाले मार्ग पर खड़ा करें ।"

महाबाहु ने आगे पूछा, "क्या अश्वशाला के प्रबंधक यहीं हैं ?"

"हाँ महाराज !" अश्वशाला के अधिपति ने कहा और खड़ा होकर बोला, "मेरे लिए क्या आज्ञा है?"

"कृपया मुझे दो ऐसी घोड़ियों के पास ले चलिए जो मदमत्त हों । और वैद्यजी, आप भी मेरे साथ आइये तथा कुछ औषधियां मुझे अपने औषधालय में से दीजिए ।"

अश्वशाला के अधिकारी और राजवैद्य के साथ तम्बू से बाहर निकलते हुए महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़ते हुए कहा, "मन्त्री जी, आप सभा विसर्जित कीजिए । महाराज को मेरे साथ चलना है । कृपया आप भी शीघ्र तैयार हो जाइये ।"

चार शस्‍त्रधारी सैनिकों को लेकर महाराज रथ पर बैठ गए । अश्वशाला के अधिकारी महाबाहु का संकेत पाकर राजवैद्य से एक तैल लेकर घोड़े को मालिश करने लगे । महाबाहु ने रथ का अच्छी तरह निरीक्षण किया, तत्पश्चात् अपनी जेब से एक डिबिया निकालकर उसको खोला और एक चूर्ण सा निकाल कर उसने घोड़ों के नथनों पर मला । घोड़े एक बार जोर से हिनहिनाए ।

रथ में बैठे महाराज ने कहा, "महाबाहु, लगता है आज तुम तक्षशिला की विद्या को सार्थक करने का प्रयत्‍न कर रहे हो ।"

"हाँ महाराज, जो रथ चलाने की विद्या सीखी थी, यदि आज ही वह काम न आई तो उस का लाभ ही क्या ? मेरी यह औषधि इनमें कबूतरियों की तरह उड़ने वाली शक्ति भर देगी । इसमें कोई सन्देह नहीं, यह घोड़े अपनी मंजिल पर पहुँचने के बाद जीवित नहीं बचेंगे । परन्तु इनका मुकाबला करने की शक्ति किसी जीवित प्राणी में नहीं मिल सकती ।"

"वास्तव में तुम महान् हो महाबाहु !"

"ऐसा नहीं महाराज ! मैं तो केवल देश का एक मामूली-सा सैनिक हूँ । परन्तु मुझे दुःख इसी बात का है कि आप इतने नादान किस तरह बने रहे । इतने बड़े राज्य की बागडोर आपके हाथों में थी जिसके लिए आप का सतर्क होना नितान्त आवश्यक था ।"

वह कटाक्ष महाराज के हृदय में तीर के समान चुभ गया । उनकी खोई हुई शक्तियाँ एकदम सजग हो उठीं ।

नए प्रधानमंत्री और सेनापति ने आकर सूचना दी कि कल की तोड़ी सड़क का सैनिकों ने पुनः निर्माण कर दिया है ।

महाबाहु ने अपनी पगड़ी पर गले का कपड़ा जोर से कसा और घोड़ों की रासें थामकर रथ पर जा बैठा ।

महाराज ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया, "पीछे से विद्रोही कर्मचारियों की कड़ी निगरानी रखी जाय ।"

चलने के लिए व्याकुल घोड़ों पर महाबाहु का चाबुक लगते ही वह हवा में बातें करने लगे । उत्तर में दोनों अधिकारियों के शब्द न जाने कहां विलीन हो गये ।

रथ की छत पर लगे ध्वज फहराने लगे और रथ की घंटियां टनाटन कर बजने लगीं । महाराज का कपड़ा इतनी जोर से फड़फड़ाने लगा मानो अभी उड़कर बाहर जा गिरेगा । सैनिकों ने किनारे के पर्दे खोलकर बाँध दिये । डाक की पहली चौकी बारह कोस पर स्थित थी । वहाँ पर घोड़े खड़े रहने के लिए महाबाहु ने घोड़ों की गति धीमी की । दूर से आती रथ की घंटियों की आवाज सुनकर चौकी के सैनिक अधिकारी ने बाहर आकर देखा । राजध्वज वाले रथ को देखकर उसने अपने सैनिकों को दो घोड़े लाने की आज्ञा दी और आप मार्ग में जाकर खड़ा हो गया । रथ के आते ही सब सैनिकों ने महाराज को सैनिक अभिवादन किया ।

महाबाहु बोला, "हमें घोड़ों की आवश्यकता नहीं । तुम हमें बताओ कि हूण राजदूत का रथ किस समय यहाँ से गया है ।"

"श्रीमान्, उन्हें गए तो एक पहर से अधिक समय हो गया है ।"

"वह किस गति से जा रहा था ?"

"वह बहुत तेज जा रहा था । मालूम होता था मानो वह अपने घोड़ों के प्राण ही लेकर छोड़ेगा । यदि राज्य कर्मचारी साथ न होता तो हम कभी भी उसके घोड़ों को न बदलते ।"

महाबाहु ने अपने घोड़ों को झटका दिया और वे फिर हवा से बातें करने लगे । चौकी के अधिकारी और साथियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा और आपस में बातें करने लगे ।

"इस प्रकार हूण दूत का पीछा किसी विशेष उद्देश्य से ही किया जा रहा दिखाई देता है ।"

"महाराज आप भी रथ में विराजमान थे ।"

"परन्तु यह रथ चलाने वाला कौन था ?"

महाराज ने और उनके चारों सैनिकों ने अपने जीवन में इतनी तेजी से दौड़ता हुआ रथ नहीं देखा था । पृथ्वी पर चलने वाले घोड़े छः सवारियों वाले रथ को इतनी द्रुत गति से ले उड़ेंगे, ऐसी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । ऐसा लगता था जैसे घोड़ों पर पागलपन सवार है, जैसे वह अपनी थकावट को भूलकर अपने लक्ष्य स्थान को शीघ्रातिशीघ्र पा लेने को व्याकुल होकर उड़ते चले जाते हैं ।

रथ हवा को चीरता, लम्बे रास्ते को पीछे छोड़ता, भागता जा रहा था । महाबाहु पत्थर के समान दृढ़ अपने स्थान पर स्थिर बैठा था । हूण राजदूत को पकड़ने की व्याकुलता, उसके हाथों में थमी रासों की गति घोड़ों को उत्तेजित कर रही थी और उसके हृदय की धड़कनें घोड़ों की टापों से ताल मिला रहीं थीं ।

महाराज ने अपने स्थान से आवाज दी, "देखना महाबाहु, इतने वेग से कहीं घोड़ों की छाती ही न फट जाय ।"

रथ के चक्रों की ध्वनि और वायुवेग के कारण महाराज का वह स्वर वायुमंडल में विलीन हो गया, जिसे महाबाहु सुन भी न सका । थोड़ी देर में दूसरी चौकी भी पीछे छूट गई । महाबाहु जोर से बोला, "आगे एक तिराहा आयेगा । उनमें से एक छोटा मार्ग है, परन्तु थोड़ा टूटा फूटा है । दूसरी एक ग्रामीण पगडंडी है जिससे हो कर भी रथ को ले जाया जा सकता है । तीसरी यह सड़क है जिस पर हम जा रहे हैं । बताइये, कौन सा मार्ग पकड़ा जाय ?"

महाराज बोले, "इस तिराहे से पूर्व एक डाक की चौकी भी आएगी । क्यों न वहाँ ठहर कर पूछ लिया जाय ?"

नहीं, अब रुका नहीं जा सकता क्योंकि घोड़ों के पट्ठे बड़ी बुरी तरह गर्म हो चुके हैं । यदि इन्हें रोका तो वहीं पर दम तोड़ देंगे ।"

"तो सीधी सड़क से ही चलो ।"

"ठीक है ।"

तीन उजड़ी बस्तियाँ एक के बाद एक करके पीछे रह गईं । एक जलती झोंपड़ी के पास से उनका रथ सपाट से निकल गया । सड़क पर किसी बैल की लाश पर इकट्ठे गिद्धों की टोली रथ की आवाज सुनकर चौंकी और उड़कर थोड़ी दूर जाकर बैठ गई । सूर्य अस्ताचल को प्रयाण कर गया । साए लम्बे होकर बढ़ने लगे । सायं के झुटपुटे में उड़ता हुआ एक मच्छर महाबाहु की आंखों में आ गिरा । "दुष्टो!" महाबाहु बड़बड़ाया, "तुम्हें भी आज ही समय मिला था मुझे अंधा बनाने का" कहते हुए महाबाहु का हाथ आँखों को मलने लगा ताकि वह मच्छर निकल जाय । पूर्णिमा का चाँद वृक्षों के पीछे से निकलता दिखाई दिया । सारा वातावरण मुखरित हो उठा ।

"मेरा विचार है आधी रात तक हम उन्हें पकड़ लेंगे ।" पीछे से महाराज ने पूछा ।

"हां ! शायद !! भगवान् ने चाहा तो हम शीघ्र ही अपने कार्य में सफल होंगे ।"

परन्तु आधी रात्रि से पहले ही उन्हें दूर धूल की रेत का बवंडर उड़ता हुआ दिखाई दिया ।

"महाबाहु, वह सामने देखो, क्या रथ का ध्वज दिखाई देता है ?"

"जी हाँ !" सैनिकों ने भी रथ से सिर बाहर निकाल कर चन्द्रमा के प्रकाश में देखा । परन्तु ऐसा दिखाई देने लगा मानो हूण दूत ने अपने रथ को और भी अधिक तेज कर दिया है । इधर महाबाहु ने अपने घोड़ों की बागें झटकीं, घोड़े और भी तेजी से दौड़ने लगे । हूण दूत ने जब देखा कि पीछे से एक रथ बड़ी तेजी से बढ़ता चला आ रहा है तो उसने भी अपने घोड़ों को ताबड़तोड़ मारना आरम्भ कर दिया ताकि वह और भी जोर से भागने लगें । महाबाहु के घोड़े चालीस कोस की यात्रा के बाद बिल्कुल बेदम हो चुके थे जब कि हूण दूत के घोड़े अभी पिछली चौकी पर ही बदले गए थे । चाबुक की मार पड़ते ही वे हवा में बातें करने लगे और धीरे-धीरे महाबाहु तथा उसके रथ का अन्तर बढ़ने लगा ।

"क्या बात है ?"

"कुछ नहीं !" महाबाहु ने अपने घोड़े की बागें फिर झटकीं और कोड़ हाथ में पकड़ लिया ।

"अब बचकर न जा सके महाबाहु !"

"अब नहीं बचेगा महाराज ।" महाबाहु बोला और उसने तीन चार घोड़ों पर गाड़ी .............................. ................ .................. ......... ............. अन्तर कम होना शुरू हो गया । शीघ्र ही महाबाहु का रथ धूल के बादल को चीरता हुआ हूण दूत के साथ दौड़ने लगा ।

महाबाहु हूण से ऊंचे स्वर में बोला, "घोड़ों को रोको, अन्यथा बाण मारकर दोनों घोड़ों को मार डालूंगा ।"

"रथ नहीं रुकेगा, तुम कौन हो रथ रोकने वाले ?"

अन्दर से मालव कर्मचारी ने सिर बाहर निकाल कर कहा, "हम मालवराज का आवश्यक सन्देश लेकर जा रहे हैं ।"

महाराज ने परदा उठाकर अपने कर्मचारी को आज्ञा दी, "मैं तुमसे कह रहा हूं रथ रुकवा लो । क्या तुम्हें राज्यध्वज लगा हुआ दिखाई नहीं देता ?"

"सन्धि-पत्र तुम्हारे पास है अथवा हूण के पास ?" महाराज ने अपने विस्मित तथा आश्चर्यचकित कर्मचारी से पूछा ।

"मेरे पास है महाराज ।"

"तो हम अपना रथ तुम्हारे पास लाते हैं, तुम इस पर कूद आओ ।"

महाबाहु अपने रथ को हूण दूत के रथ के साथ-साथ दौड़ाने लगा परन्तु मालव कर्मचारी अब भी कूदने से डर रहा था, शायद गिर पड़ने की सम्भावना से कुछ निश्चय न कर पा सकने के कारण ।

"कूद आओ" महाराज क्रोध से गरजे, "नहीं तो याद रखो मेरे सैनिक तुम्हें बाणों से मार देंगे और यहाँ से लौटकर मैं तुम्हारे सारे परिवार को सूली पर चढ़वा दूँगा । सिपाहियों ने अपने बाण धनुषों पर खींच लिए ।

"खबरदार, जो तुम रथ से बाहर कूदे ! लाओ, सन्धि-पत्र मुझे दे दो", हूण दूत ने अपना एक हाथ पीछे बैठे मालव अधिकारी की ओर किया । परन्तु महाराज की धमकी के डर से मालव कर्मचारी ने महाबाहु के रथ पर छलांग लगा दी और पीछे के डण्डे पर बन्दर के समान चिपक गया ।

"पहले इससे यह सन्धि-पत्र ले कर देख लें महाराज ।" हूण दूत के साथ रथ को दौड़ाते हुए महाबाहु ने कहा ।
 
रथ पर पूरी तरह चढ़कर मालव कर्मचारी ने रेशमी कपड़े में लिपटा सन्धि-पत्र निकालकर महाराज को दे दिया । उन्होंने तेजी से उसे खोल कर पढ़ा और अपने हस्ताक्षर और मोहर को देखा ।

"ठीक है ।"

"धोखेबाज, शैतान हिन्दू के बच्चे", क्रोध और असफलता से उत्तेजित हूण गालियाँ देने लगा । महाबाहु ने घोड़ों को हल्का किया । तभी हूण के हाथ में चमकीला खंजर चमका और महाबाहु की बाईं भुजा में आकर गड़ गया ।

महाराज क्रोध में बुड़बुड़ाये और उन्होंने अपनी कटार निकाली । तभी महाबाहु पीड़ा से कराहता हुआ बोला, "थोड़ा ठहरिये महाराज, पहले मुझे मालवा की ओर रथ मोड़ लेने दीजिए ।"

"क्या हम इसे बाणों से बींध डालें ?" सैनिकों ने महाराज से पूछा ।

महाबाहु बोला, "नहीं" । रथ को मोड़कर उसने बागें अपने दाँतों में पकड़ लीं और खंजर निकालकर घाव को हाथ से दबा दिया ।

हूण राजदूत को संबोधित करते हुए महाराज ने कहा, "मैं मालवा नरेश यशोवर्मन् कह रहा हूँ कि अपने सम्राट् मेहरगुल से कहना कि देशभक्त भारतीय किसी विदेशी आक्रान्ता से सन्धि नहीं किया करते अपितु युद्ध में मिला करते हैं ।"

गहरी अंधेरी रात्रि की कालिमा सर्वत्र व्याप रही थी । सारा वातावरण शान्त था । रह-रह कर झींगुरों की आवाजें उस सन्नाटे को भेदती हुई प्रकृति की भयानकता को बढ़ा रही थीं । शिशिर की रात में कोई भी प्राणी दिखाई नहीं देता था । पशु पक्षी और कीड़े मकोड़े तक अपने-अपने बिलों में सिकुड़े पड़े थे ।

उस वन में एक हल्की सी सरसराहट हुई । शायद कोई सिंह, बाघ अथवा भालू अपने शिकार की खोज में अपनी खोह से निकला हो !

परन्तु सरसराहट के पास आने पर पता चला कि वह कोई हिंसक पशु नहीं था अपितु दो आदमी थे जो न मालूम इस घनी अंधेरी रात्रि में शिकार की टोह में निकले थे अथवा मार्ग भूले यात्री थे या किसी सेना के गुप्‍तचर अथवा हूण सिपाही । इतना अवश्य था कि वह किसी आवश्यक कार्य को समाप्‍त कर लौटते दिखाई देते थे क्योंकि इस ठण्डी रात्रि में बिना कारण आने का साहस कोई नहीं कर सकता था ।

झाड़ियों के कांटों से बचते और सरकण्डों को इधर-उधर हटाते बढ़ते हुए वे चले आ रहे थे । रात्रि की ठण्ड या थकान अथवा भयानक अंधकार की विभीषिका का नाम तक उन होठों पर सुनाई नहीं देता था । उनकी चाल में कहीं भी सुस्ती अथवा आलस्य नहीं था । पूरी स्फूर्ति और उत्साह से बड़ी सावधानी से वे बढ़ते चले आ रहे थे ।

आगे चलने वाला युवक सहसा ठिठक कर खड़ा हो गया ।

"क्यों, क्या बात है?", पीछे-पीछे आते हुए दूसरे युवक ने रुकते हुए पूछा ।

"यहाँ किसी शव के सड़ने की दुर्गन्ध आ रही है । सम्भवतः पास ही किसी सिंह की गुफा है ।"

यहाँ पर वन अधिक घना नहीं था, थोड़ी दूर पर खेत दिखाई देते थे ।

"हमें थोड़ा सा हटकर चलना चाहिए क्योंकि दुर्गन्ध बढ़ती चली जा रही है ।" दोनों ने वह मार्ग छोड़ दिया और दूसरी दिशा में बढ़ने लगे ।

कंटीली झाड़ियां पार करते ही एक खुला-सा मैदान आ गया जिसके किनारे पर किसी नगर की अंधकार में डूबी अट्टालिकाओं पर कहीं-कहीं टिमटिमाते दीपकों की रोशनी दिखाई देती थी ।

परन्तु जिस दुर्गन्ध से बचने के लिए उन्होंने मार्ग बदला था, और भी तीव्र हो गई थी और इस प्रकार प्रतीत होता था जैसे वे किसी युद्ध-क्षेत्र के पास आ निकले हों, जहाँ हजारों शव पड़े सड़ रहे हैं ।

बातचीत से दोनों भारतीय युवक दिखाई देते थे । उनमें से एक बोला, "यदि समय होता तो अवश्य दुर्गन्ध का पता लगाते परन्तु अब तो आगे ही काफी देर हो चुकी है ।"

"आओ, हमें भी तो उधर से ही जाना है । रास्ते में एक नजर उधर भी डालते जायें ।"

रात की उस नीरवता में आदमियों की पदचाप सुनकर दो गीदड़ अपने स्थान से भागकर निकल गए और दूर जाकर रोने से लगे । थोड़ी दूर पर कोई प्राणी किसी शव को फाड़कर खा रहा था ।

"सिंह है शायद ।"

"नहीं, यह तो लकड़भग्गा दिखाई देता है क्योंकि इतनी सुगमता से मृतक शरीर की हड्डियों को चबाने वाला और कोई प्राणी नहीं हो सकता । यदि सिंह होता तो गीदड़ भला यहां कैसे दिखाई देते ?"

उन्होंने अपनी नाक पर कपड़ा रख लिया और शवों के पास से गुजरने लगे । सितारों के प्रकाश में उन्होंने देखा कि एक लम्बा-चौड़ा गड्ढ़ा खुदा हुआ था जिसमें कुछ मरे हुए मनुष्यों के शव पड़े थे । कुछ पर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी पड़ी थी और कुछ को जंगली जानवरों ने खींचकर बाहर निकाल लिया था जो अधखाये इधर-उधर पड़े सड़ रहे थे ।

शवों को इस प्रकार फेंकने का कोई कारण तो अवश्य होगा । इसको सोचते हुए दोनों यात्री क्षणभर खड़े रहे और लकड़भग्गे को देखते रहे जो शव को खा रहा था ।

शीघ्रता के कारण वह किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके । ठीक उस समय जब वह आगे बढ़ने लगे, किसी के आने की आहट से दोनों चौंक पड़े और पास ही एक झाड़ी में दुबक गए ।

दूर किसी गाड़ी के आने का शब्द सुनाई दिया, जिससे बचने के लिए वे दोनों और भी घनी झाड़ियों के पीछे हो गए ।

जिस ओर से गाड़ी आ रही थी उसी तरफ से एक विदेशी सैनिक का गीत अंधकार को भेदता हुआ उस सारे प्रान्त में गूंज उठा, जिसका आशय था - "यदि मेरे पास दो ढ़ालें होतीं, तो एक से मैं अपने शत्रु के प्रहारों को रोकता और दूसरी के नीचे ओ ! मेरी प्रियतमे ! मैं तुम्हें छुपाए साथ-साथ लिए फिरता !"

"...प्रत्येक आक्रमण के पश्चात् जब मेरा शरीर थकावट से चूर और घावों से छलनी हो जाता और सब सिपाही बेखबर सो रहे होते, और किसी शत्रु के आक्रमण का भय नहीं रहता, उस समय ओ मेरी प्राण-प्यारी ! मैं अपनी ढ़ाल के नीचे से तुम्हें निकालता और अपने आलिंगन में बांधकर सो जाता और तब तक हम स्वप्नों के देश में विचरते जब तक कि प्रकाश की किरणें आकर हमारी दुनियाँ को उजाड़ न देतीं और कूच का रणसिंघा न बज उठता ।"

दोनों यात्री पास आती इस गाड़ी को ध्यान से घूरने लगे, जिसमें दो खच्चर जुते हुए थे । पास आती गीत की ध्वनि हल्की पड़ती जा रही थी ।

"आनन्द मनाने के लिए तो है हूण और उनका सरदार हप्‍ताली और शव ढोने के लिए हैं हम किदारे ।" गाड़ी के भीतर बैठा हुआ कोई बोला ।

"हूं", गाड़ी हाँकने वाले ने कहा ।

"बस ! बस !! रोको । और आगे कहाँ ले जाओगे? रात के समय इन्हें गड्ढ़े में फेंकने की क्या आवश्यकता, यहीं मैदान में ही डाल दो । दिन निकलने से पहले इन्हें वन के खूंखार जानवर खा जायेंगे ।"

"हमें जैसी आज्ञा मिली है उसका पालन तो करना ही चाहिए । नीचे उतरो, यदि तुम्हें इस काम से घृणा है तो आकर खच्चरों की लगाम थामो, मैं इन्हें उठा-उठाकर गड्ढ़े में डाल देता हूँ ।"

"अवश्य ! यह काम तुम्हीं करो, इतने में यदि तुम बुरा न मानो तो वे शव .... अपनी ....पूर्ति ....।"

"मूर्ख, शैतान .....!"

"हा ! हा !! हा !!!" वह अट्टहास कर उठा, "मैं तो केवल तुम से मजाक कर रहा था ।"

"इतना सुन्दर गीत सुनकर तुम इतनी विद्रूप हँसी हँसोगे, ऐसी मुझे आशा न थी । अच्छा, और इस मृत लड़की के पैरों को पकड़कर नीचे गढ़े में फेंको । अभागी लड़की कितने खूंखार आततायियों की वासना का शिकार बनी ।"

झाड़ी में छिपे दोनों युवकों की आँखों में खून उतर आया, परन्तु उन्होंने प्रतिशोध की ज्वाला में जलती आग को शान्त किया ।

उसने गाड़ी में पड़े शवों को घसीट-घसीट कर उस गड्ढ़े में फेंकना शुरू किया जो आधे से अधिक भरा हुआ था, जिसके शब्द सुनकर एक बार फिर सारा वन गीदड़ों के रोदन से गूंज उठा ।

"यह किसको रो रहे हैं ?"

"आक्रमणकारियों की जान को ।" गाड़ी में बैठे सैनिक ने फिर मजाक किया ।

"आक्रमणकारियों की जान को कैसे ? इनकी कृपा से ही तो इन्हें भरपेट भोजन घर बैठे मिल गया । यह तो उन भारतीयों की जान को रोते होंगे जो अहिंसा के पुजारी न किसी को मारते ही हैं और अगर कोई मर जाय तो उसकी लाश को जलाकर भस्म कर देते हैं ।"

"बहुत ठीक ।" इतने में उसने दो शवों को खींचकर गड्ढ़े में डाल दिया ।

"मैं !" गाड़ी हाँकने वाले ने कुछ व्याकुलता सी अनुभव की । उसने एक क्षण सोचकर उत्तर दिया, "न मैं किदार हूं और न मैं हूण ।"

"तो?" आश्चर्य से चौंकते हुए उसने कहा, "मैं ईरानी हूं ।" उसकी आँखें गर्व से चमक उठीं ।

"ईरानी ! अरे, तुम्हें हूण सेना में किसने भरती कर लिया ?"

"किसी ने भी नहीं । अब मैं युद्धबन्दी हूं । जब मैं पकड़ा गया था, बहुत ही सुन्दर था और बहुत अच्छा गाता था । एक हूण सरदार ने मुझे अपनी सेवा में रख लिया । अब वह सरदार मारा जा चुका है । दूसरे सरदार ने मुझे नहीं निकाला और अपनी ही सेवा में लगा लिया । वे सब मुझसे बहुत प्रसन्न हैं ।"

"इससे क्या होता है ? आखिर तुम हो तो युद्धबन्दी ही । तुम्हें एक स्वतन्त्र किदार के साथ सम्मानपूर्वक बोलना चाहिए था, तुम मेरे बराबर कैसे बोल रहे थे ?"

"हुजूर, मैं भला आपके बराबर कब बोल रहा था ?"

"बराबर की कहते हो ! तुम तो उल्टा मुझे डांट रहे थे ।"

"मुझे माफ किया जाय, मैं तो जनाब का सेवक हूँ हुजूर ।"

"नहीं-नहीं ! मैं तुझे जान से मारूँगा ।"

"हुजूर, यदि मैंने सचमुच अपराध किया है तो मुझे सरदार के पास ले जाकर उपस्थित कर दीजिए । वे जो दण्ड मुझे देंगे, मैं भुगतने को तैयार हूँ, चाहे मुझे मृत्युदंड क्यों न दें ।"

"मुझे हूण अधिकारियों को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है, जब अपने अपमान और तिरस्कार का दंड देने के लिए मेरे पास खड़ग है और मेरी भुजाओं में बल है ? यदि किसी ने पूछा तो कह दूंगा कि युद्धबन्दी था, अवसर मिलते ही भाग गया ।" अपने प्राणों की रक्षा के लिए ईरानी बंदी दौड़कर गाड़ी के पीछे जाकर खड़ा हो गया । बड़ी फुर्ती से उसने बांस निकालकर किदार सैनिक का वार रोका ।

सिपाही अपने वार के रुकते ही क्रोध में पागल हो उठा । उसने बड़ी ही फुर्ती से उस पर तीन-चार प्रहार किये जिससे बांस के टुकड़े-टुकड़े हो गए और वह दूर गड्ढ़े में जा गिरे । अवसर से लाभ उठाने के विचार से ईरानी एकदम कूदा और किदार से गुत्थमगुत्था हो गया । दोनों एकदम जमीन पर गिर पड़े और आपस में एक-दूसरे को मारने के लिए लड़ने लगे । प्राण रक्षा के इस संघर्ष में वह स्थान और दुर्गन्धि दोनों ही भूल गए ।

झाड़ी के पीछे छिपे दोनों यात्री जिन्हें आगे ही बड़ी देर हो चुकी थी, बाहर निकले परन्तु फिर एकदम पीछे हट गए । क्योंकि इतने ही समय में ईरानी बन्दी किदार सिपाही की रक्त से रंगी तलवार लिए कुछ बुड़बुड़ाता हुआ बाहर निकल आया था । इस समय उसे न विजय का उल्लास था, न प्राण बचाने की प्रसन्नता और न किए गए अपराध का भय ! वह इतना घबरा गया था कि उसको कुछ भी समझ में नहीं आता था कि अब वह क्या करे ?

वह फिर बुड़बुड़ाया, "कहीं भाग जाना चाहिए । परन्तु नहीं, पकड़ा जाऊंगा ! हूण हत्यारा समझकर और हिन्दू हूण समझकर मुझे मार डालेंगे ।"

झाड़ी में छिपे एक व्यक्ति ने कहा, "इसे अवश्य अपने साथ ले चलना चाहिए, काम आएगा ।"

"बात तो ठीक है, परन्तु हमें अभी तो अपने ही काम से फुर्सत नहीं है । लौटते समय यदि मिलता तो साथ ले चलते ।"

ईरानी सुध-बुध खोकर अपने ही स्थान पर जड़ समान खड़ा बड़बड़ा रहा था । ठण्ड, दुर्गन्ध कोई भी उसे विचलित नहीं कर पा रही थी, मानो वह पत्थर बन चुका था ।

"हूण सरदारों के पास ही चलूं । उन्हें सारी घटना सचमुच बता दूं । मृत्यु तो दोनों ही तरफ है, शायद .....।" वह भारी कदमों से लड़खड़ाता हुआ चल पड़ा और गाड़ी पर चढ़ गया । उसने बड़े भारी मन से गाड़ी को बस्ती की ओर मोड़ा ।

आकाश में अभी तक अंधेरा छाया हुआ था, रात अभी काफी लगती थी । गाड़ी की घंटियों का स्वर जब समाप्‍त हो गया तो दोनों यात्री अपने स्थान से उठकर उन स्‍त्रियों का शव देखने के लिए गड्ढ़े की ओर बढ़े जिन्हें वे अभी फेंककर गये थे ।

वह पाँच स्‍त्रियों और लड़कों के शव थे । तारों के प्रकाश में जो थोड़ा बहुत दिखाई देता उसमें यात्रियों ने देखा उनके शरीर पर कई प्रकार के घावों के चिन्ह थे जिनसे अब भी हल्का-हल्का रक्त रिस रहा था ।

एक यात्री बोला, "देश आज नरक बन गया है ।"

"जिस देश में एकता न हो, वहां इस प्रकार हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं । इतिहास यही बताता है कि जब-जब किसी देश या जाति के लोग अकर्मण्य और स्वार्थी हो जाते हैं, उनका इसी प्रकार नाश होता है । हम अत्याचारियों और आक्रमणकारियों के नाश में विश्वास रखते हैं, यही हमारा मूलमंत्र है और यही हमारे जीवन का उद्देश्य ।"
 
बातचीत से दोनों रुद्रदत्त के राष्ट्रवादी युवक दिखाई देते थे जो न मालूम किस काम से जा रहे थे ।

किदार सिपाही के शरीर से अब भी गर्म-गर्म रक्त निकल रहा था । उन्होंने शीघ्रता से अपने मार्ग पर पैर बढ़ाये और फिर अन्धकार में विलीन हो गए ।

स्यालकोट का विशाल नगर जो आजकल हूण सम्राट् मेहरगुल की राजधानी बना हुआ था, अंधकार में डूबा हुआ विकराल पर्वत के समान उत्तर-पश्चिम की ओर फैला हुआ था । सारा नगर शान्त और नीरव था । जिस ओर वह दोनों युवक जा रहे थे, हूणों की छावनी उनकी विपरीत दिशा में स्थित थी परन्तु शाही किला उसी दिशा में था । अब वह थोड़ा-थोड़ा दिखाई देने लगा था । यद्यपि दोनों यात्री मुख्य मार्ग से हटकर जा रहे थे, परन्तु उनकी चाल में किसी प्रकार का डर अथवा घबराहट नहीं थी । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता था कि वे अपने लक्ष्य से अपरिचित हैं । चलते-चलते वे एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहाँ कई धूनियां जल रही थीं । उनसे जलती आग की लपटों से स्थान रह-रह कर चमक उठता था ।

दोनों यात्री रुके । एक ने कहा, "क्यों न थोड़ा हाथ सेंक लें, ठंड बहुत पड़ रही है । किदार सिपाही की तलवार छूट गई थी, कहीं हम लोगों से अपनी कमन्द न छूट जाय ।"

"नहीं, ऐसी बात तो सम्भव नहीं है । आओ, थोड़ा हाथ ही सेंक लें । इस बुझती चिता की आग से सेकें, कहीं तेज आग से हमारे चेहरे न पहचाने जायें ।"

उसने नीचे झुककर राख को लकड़ी से एक ओर हटाया जिससे धधकते कोयले चमकने लगे, उनके साथ-साथ हड्डियों के टुकड़े भी चमकने लगे । आग के सामीप्य से उनको थोड़ी गर्मी अनुभव हुई । उस शमशान में उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई और अपने कानों को सतर्क कर लिया ।

"बस, इतना ही पर्याप्‍त है" कहकर पहला यात्री उठा । उसके पीछे दूसरा भी उठ खड़ा हुआ । दोनों बड़ी सावधानी से कदम बढ़ाते हुए चल पड़े जिधर किले के पिछली दीवार के ऊपर छोटी बुर्जी थी ।

अभी वे बुर्जी से थोड़ी दूर पर ही थे कि पाँच भीमकाय हूण पहरेदारों की टोली उधर आती दिखाई दी । दोनों पास ही मिट्टी की एक ढ़ेरी की ओट में छिप गए और उन्होंने अपनी सांस को रोक लिया ।

जब वे बातें करते हुए उनके पास से निकल गए तो पहला यात्री धीमे से बोला, "इनको गड्ढ़े का चक्कर लगाकर आने में कम से कम चौथाई घड़ी अवश्य लगेगी ....।"

"ठीक है, इतना समय काफी है, अब हमें देर नहीं करनी चाहिए ।" दोनों पेट के बल रेंगते हुए दीवार की ओर बढ़ने लगे । किले की दीवार के नीचे जाकर उन्होंने खड़े होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर अपनी-अपनी कमर से कमन्द खोली और पूरी शक्ति से ऊपर फेंकी । जब वह ऊपर जाकर फंस गई तो उन्होंने पूरी शक्ति से खींचकर उसकी परीक्षा की ।

उन्होंने भगवान् का स्मरण किया और दोनों क्षणभर में बन्दर की फुर्ती से दीवार के ऊपर जा पहुंचे । इस समय पूर्व से हल्की-हल्की पौ फट रही थी ।

किले में लोग जाग पड़े थे परन्तु सर्दी के कारण अपने-अपने बिस्तरों में सिकुड़े पड़े थे । इसलिए किले में अब भी शान्ति ही दिखाई देती थी । शायद इसलिए सब आलस्य में पड़े थे कि हूण सम्राट् मेहरगुल आजकल राजधानी में नहीं था । कल सायंकाल से वह अपने सैनिकों के साथ शिकार खेलने निकल गया था और अभी तक वापस नहीं आया था । आज दोपहर तक उसके आने की सम्भावना थी, इसलिए किले के कर्मचारियों ने आज की रात खूब आनन्द में बिताई थी, अभी तक शराब की खुमारी उनके चेहरे पर व्याप्‍त थी ।

कुछ थोड़े से दास और दासियाँ रसोई की आग जलाने और सफाई करने में लगे थे । दो जमादार हड्डियों के ढ़ेर से टोकरियाँ भर रहे थे । उन्होंने रात को मारे गये चकोरों, बत्तखों के परों को भी इकट्ठा किया, टोकरी के ऊपर खींची हुई बारहसिंगों और बछड़ों की खालों को डाला और बाहर फेंकने के लिए चले गए । चारों तरफ टूटे प्याले और मदिरा के बर्तन बिखरे पड़े थे ।

दिन निकलते ही किले की चहल-पहल बढ़ गई और चारों तरफ सब लोग अपने निश्चित काम में लग गए । रात के थके पहरेदारों के स्थान पर नए पहरेदार आ गए । कसाइयों की गाड़ियाँ बकरे-बछड़े, दुम्बे और पहाड़ी पक्षियों को पकाने के लिए दे आईं । भट्ठियों और चूल्हों के धूयें आकाश में उठने लगे । मसाला पीसने वाले सिलबट्टों की आवाज गूँजने लगी ।

एक हूण सरदार ने सोए पड़े एक युवक पर चिमटा खींचकर मारा और चिल्लाया, "बुद्धू के बच्चे, तेरी नींद नहीं खुलती जब तक सूरज आसमान पर नहीं चढ़ आता ? तिस पर चींटी के समान रेंगता हुआ चलता है ! मृतक की सन्तान ! आज तुझे कौड़े लगवाऊंगा, तभी ठीक होगा ।" फिर वह पास खड़े एक दास से बोला, "जब पानी ही समय पर नहीं पहुँचेगा तो कोई क्या पकायेगा और क्या गूँधेगा ?"

भंगियों और अन्य नौकरों ने दीवानखाने और दरबार को झाड़-पोंछकर सजा दिया था । रसोईघर से पकवानों की सुगन्धि चारों तरफ फैल रही थी । कुछ हूण सरदार जो शिकार पर नहीं गए थे, सम्राट् के आगमन पर होने वाले स्वागत का प्रबन्ध करने लगे, जिनमें छावनी के अधिकारी भी थे ।

शीघ्र ही दरबार से राजद्वार तक घुड़सवार सैनिकों की मार्ग के दोनों ओर एक पंक्ति खड़ी हो गई जिनके हाथों में चमकते भाले थे जिन पर रेशमी झंडियाँ फहरा रहीं थीं । शाही गुप्‍तचर ने अपने दो कर्मचारियों के कान में कुछ कहा जिससे वे दोनों छोटे बुर्ज की ओर चल पड़े ।

दोपहर आई और चली गई । तीसरा पहर भी धीरे-धीरे ढ़लने लगा और प्रतीक्षा की घड़ियाँ बढ़ने लगीं । परन्तु सैनिक अथवा अधिकारी अपने स्थान से न हिले, भूख और प्यास की चिन्ता किए बिना वह पूरे अनुशासन में अपने स्थान पर खड़े रहे । तभी सैनिकों के अग्रिम दस्ते ने आकर सूचना दी कि सम्राट् आधी घड़ी में राजधानी में प्रविष्ट हो जायेंगे ।

वह दोनों यात्री जो रात्रि के पिछले पहर कमन्द लगाकर बुर्ज पर चढ़े थे, न मालूम कि प्रकार लोगों की आंखों से बचकर राज्य के अन्तःपुर वाले बुर्जे के भीतर एक गुप्‍त चौबारे में आ दुबके थे । किले का यह भाग बहुत दिनों से निर्जन पड़ा था तथा दूसरे स्थानों की अपेक्षा यहाँ पर अन्धकार भी अधिक था । किसी दासी को दण्ड देने के लिए इस स्थान पर बन्द कर दिया जाता था जहाँ वह बेचारी किसी छछुन्दर अथवा चुहिया की भांति इन अंधेरी दीवारों में सिर टकराती मौत की घड़ियाँ गिना करती थी या छुटकारे के लिए अपने परमात्मा से प्रार्थाना करती रहती थी ।

एक छोटी सी खिड़की के पास कान लगाये वह दोनों खड़े थे । वहाँ से नीचे राजगृह का वह भाग दिखाई देता था जहाँ मेहरगुल कोई आवश्यक मामला आने पर अधिकारियों से भेंट किया करता था अथवा जहाँ विशेष बातों का निर्णय लिया जाता था । राजगृह के बाहर वाले द्वार से लेकर अन्तःपुर तक के रास्ते में तुर्किस्तान की कोमल बालों वाली खालें बिछी थीं और उन पर कहीं-कहीं फूल बिखरे पड़े थे । जब वह फूल मुरझाने लगते तो ईरानी लौंडियाँ इनके स्थान पर ताजा फूल बिखेर देतीं थीं ।

"हम एक ही स्थान पर बैठे हैं ।"

"हाँ, यह बात मुझे भी उचित दिखाई नहीं देती ।"

"तुम्हारे न तो अभी दाढ़ी ही आई है और मूंछें भी छोटी-छोटी हैं, रंग भी गोरा तथा आवाज भी काफी पतली है ।"

"किसी दासी को .....?"

"तुम्हें ईरानी भाषा बोलना आता है ?"

"हां, काम चलाने योग्य ।"

"तो अवश्य करना ! परन्तु अभी नहीं, जब हूण सम्राट् की सवारी गढ़ के द्वार पर आ पहुंचे और सब लोग उसके स्वागत में लग जाएं .....।"

"परन्तु तुमसे अलग होकर मैं कहाँ जाऊँ ?"

"सामने की छत पर किसी सैलून की ओट में अथवा किसी झरोखे की ओट में ।"

"कोई मुसीबत तो नहीं आ जायेगी ?"

"मुसीबत !" दूसरे यात्री के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई, "वह तो हमारे प्रत्येक पग पर खड़ी है । अपनी सावधानी और दूरदर्शिता के साथ हमें बचते रहना है ।"

"इन्हें साफ कर दीजिये ।"

"अभी?"

"हाँ !"

उसने अपने से छोटी अवस्था वाले युवक की सभी मूंछें अपनी कटार से साफ कर दीं । तभी किले के द्वार से शोर उठा, "हूण सम्राट् मेहरगुल की सवारी आ रही है ।"

"मैं जाऊँ?"

"जाओ ! परन्तु देखना यदि कोई दासी सावधानी से हाथ न आए तो जल्दबाजी से मत लाना । मेहरगुल को मैं आप समझ लूँगा, तुम केवल सेनापति का ध्यान रखना । यदि इस समय अवसर न मिला तो रात्रि को प्रयत्‍न करना पड़ेगा ।"

"मैं समझता हूँ ।" वह धीरे से नीचे उतर गया और कुछ क्षणों बाद ही सीढ़ियों पर आयी ईरानी दासी को भुजाओं से उठा लिया । उसने उसके मुँह में इस प्रकार कपड़ा ठूँस दिया था कि उसकी आहट तक सुनाई नहीं दी ।

"जितेन्द्र !"

जितेन्द्र उसका हाथ बंटाने के लिए उठा । दोनों ने मिलकर उस कोमल अंगों वाली ईरानी युवती के कपड़े उतारकर उसके हाथ-पांव बाँध दिये । मुँह में कपड़ा ठूंसकर उसकी गर्दन दबाई और उसे मूर्छित कर दिया । छोटी आयु के युवक ने शीघ्रता से उसके कपड़े पहने और उसे उठाकर भीतर कोठरी में ले गए ।

"किसी ने देखा तो नहीं, इन्द्रजीत ?"

"नहीं, किसी ने नहीं ! परन्तु तुम इसका पूरी तरह ध्यान रखना कहीं यह होश में न आ जाय । क्या मैं बाहर से सांकल लगा आऊँ ?"

"नहीं ! परन्तु देखना, सावधानी से हाथ डालना । जल्दबाजी और असावधानी हमारे प्राणों के साथ हमारे देश का भी अहित करेगी ।"

नकारात्मक सिर हिलाते हुए अपने सिर के लम्बे बालों में अंगुलियों से मांग निकालता हुआ इन्द्रजीत बाहर निकल गया । जितेन्द्र ने बाहर से सांकल बंद होने का शब्द सुना परन्तु फिर उसे खोल दिया गया था । ऐसा दिखाई दिया जैसे बादशाह के स्वागत ने सारे वातावरण को भय से नीरव कर दिया था । सब तरफ शान्ति विराज गई थी तथा सन्नाटा सा छा गया था । जो वस्तु जहाँ पड़ी थी, थोड़े समय के लिए वहीं स्थिर हो गई । थोड़ी देर के बाद किले के सब नगारे बज उठे । चारों तरफ से सैनिकों ने सम्राट् के अभिनन्दन में जयकारे लगाने शुरू कर दिये जैसे समुद्र में तूफान आ गया हो ।

जितेन्द्र जिस स्थान पर बैठा था, वह एक डरावनी अन्धेरी कोठरी थी जिसमें केवल एक ही द्वार था । उन्होंने यद्यपि अन्दर प्रवेश करते ही सारी कोठरी को अच्छी तरह से देख लिया था, फिर भी उनकी आंखें किसी रोशनदान अथवा खिड़की को देखने के लिए चारों ओर घूमीं । परन्तु उसमें केवल एक ही सुराख था जिसमें केवल हवा और थोड़ा प्रकाश आ सकता था, और कोई मार्ग भी नहीं था । वह सुराख दो-अढ़ाई फुट ऊंचाई पर था जहाँ पंजों के बल खड़े होकर जितेन्द्र ने बाहर की ओर देखा परन्तु मोटी दीवार की चौड़ाई से राजभवन के उस भाग को छोड़कर कुछ दिखाई न दिया । उसकी दृष्टि दूर उस धुन्ध से लिपटी छोटे बुर्ज की कोठरियों पर टिकी । ताजी हवा का एक झोंका आकर उसके मुंह पर लगा ।

भीतर अन्धकार था और सारा वातावरण शान्त पड़ा था, जो अकेले आदमी को बोझिल सा लग रहा था । रह-रह कर बेसुध पड़ी ईरानी दासी के सांस लेने की आवाज सुनाई दे रही थी । वह पूर्णतया मूर्छित थी । यौवन और कोमलता की पुतली, परन्तु आज उसकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं था ।

जितेन्द्र अपनी चिन्ताओं में डूबा हुआ था । उसका मस्तिष्क अपनी योजना पर दृष्टिपात करता और सामने आने वाली कठिनाई को दूर करने के विषय में सोचता जा रहा था और आंखें किले की दीवारों पर से घूमती चली जा रहीं थीं ।

"अगर कोई ऐसा रोशनदान या झरोखा होता जिससे वह बाहर की घटनाएं .....।" वह मन ही मन बड़बड़ाया परन्तु वाक्य पूरा होने से पहले ही उसकी दृष्टि दीवार के एक पत्थर पर जाकर ठहर गई । यह अन्य पत्थरों की अपेक्षा इतना बड़ा क्यों ? और इस पर लोहे का कुण्डा किसलिए ? परन्तु नहीं ! हो सकता है इसमें बंदी की हथकड़ी अथवा जंजीर बाँधते हों !

इससे यद्यपि उसकी चिन्तनधारा बन्द हो गई, परन्तु न मालूम क्या सोचकर उसने कुण्डे को पकड़ लिया और खींचना शुरू कर दिया । परन्तु कुण्डा अपने स्थान से टस से मस न हुआ, जैसे जंग ने उसे और कड़ा और न हिलने योग्य बना दिया हो । उसने अपनी कमर से कटार निकाली और उसकी मूंठ को उसमें फंसाकर दायें-बायें दबाव डालना शुरू किया । धीरे-धीरे वह चोकोर पत्थर हिलना शुरू हो गया और उस चौड़ी दीवार में इतना सुराख निकल आया जिसमें दो आदमी आसानी से छुप सकते थे । उसके अन्दर पतली जाली का एक झरोखा था जिसमें से बाहर का सारा दृश्य दिखाई देता था ।

उसने चैन की साँस ली ।

जाली में से उसने देखा, इन्द्रजीत उससे भी ऊपर की मंजिल में जो और भी सुनसान थी, दो खम्भों की ओट से ईरानी लौंडी बना खड़ा है, जो किसी काम के लिए ऊपर गई हो और सम्राट् की सवारी की वापसी पर वहीं खड़ी होकर जलूस का तमाशा देखने लगी हो ।

"लड़का निर्भय और समझदार लगता है, परन्तु कहीं दोनों के लिए संकट न बन जाय ।"

उसने ईरानी दासी के कोमल शरीर को उठाया और उस गह्वर में घुस गया । "रात से पहले तो .....।" उसने अपने अंगरखे में से एक पोटली-सी निकाली और उसे लड़की की नाक पर रख दिया । थोड़ी देर सुंघाने के बाद उसे फिर अपने अंगरखे में छुपा लिया । "रात से पहले कुछ करना ठीक नहीं रहेगा, फिर भी ... परन्तु अभी तो काफी दिन है ।"

बाहर झरोखे में से नीचे राजगृह का लम्बा-चौड़ा प्रांगण दिखाई दिया जिसका सफेद संगमरमर का चमकीला फर्श किले के पश्चिमी भाग की दो ऊंची उभरी हुई दीवारों में से आती हुई सूर्य की किरणों के टकराने से और भी अधिक चमक रहा था । खालें बिछी मार्ग की सीढ़ियों के नीचे दो घुड़सवार पहरेदारों के बरछों की नोंक नजर आ रहीं थीं । प्रांगण के एक कोने में अंतःपुर के द्वार पर एक ईरानी दासी खड़ी थी । हूण सम्राट शायद किले में प्रवेश के बाद किसी वस्तु का निरीक्षण करने अथवा आदेश देने में लग गए थे । इसीलिए उनके भीतर आने में अब तक विलम्ब हो रहा था ।

हूण सम्राट् मेहरगुल, जो बड़े ऊंचे कद का, लम्बे चौड़े डील-डौल वाला बलवान् सम्राट् था, शाही चाल से चल रहा था । उसके पीछे प्रमुख अधिकारियों की एक टोली आ रही थी, परन्तु अभी वह राजभवन की दीवार से दूर ही था । तभी एक भारतीय स्‍त्री की दुःख और प्रार्थना की डूबी आवाज सुनाई दी ।

"सम्राट् ! हूण सम्राट् !!"

"क्या बात है?" चलता-चलता सम्राट् रुक गया ।

"कुछ नहीं हजूर ।" हाथ हिलाकर किसी को परे हटाने का संकेत करते हुए पीछे सीढ़ियों पर से कोतवाल ने निवेदन किया ।

"हजूर सम्राट् ! मैं कुछ निवेदन ....।" वही आवाज फिर सुनाई दी । एक अधूरा वाक्य जो बीच में दबा देने के कारण पूरा होने से रह गया था ।

मेहरगुल अपने स्थान पर किसी मोटे वृक्ष के तने के समान खड़ा हो गया । उसके भारी पैर के नीचे लोमड़ी की खाल सिकुड़कर इकट्ठी हो गई जिसकी पश्म ने सम्राट् के जूतों को ढक दिया ।

"यह प्रार्थना करने वाला कौन है ?"

"हजूरेआली !" कोतवाल ने पहले दण्डवत् की, फिर निकट आकर बोला, "बाहर से लाई गई हिन्दू लड़कियों में से एक है ।"

"क्या कहना चाहती है?"

"कुछ नहीं सम्राट् ! यह तो मेरे कर्मचारी की मूर्खता के कारण श्रंगार कक्ष में न जाकर यहां आ गई ।"

"उसे उपस्थित करो ।" सम्राट् की आंखों में मस्ती की झलक उभर रही थी । शिकारघर से किले की ओर चलने से पहले उसने अखरोट की शराब के कई प्याले पी लिए थे ।

कोतवाल वापस जाते हुए सिपहियों को लड़की समेत बुलाने के लिए शीघ्रता से सीढ़ियां उतर गया । सम्राट् निश्चल होकर अपने स्थान पर खड़ा रहा । एक बार उसने तलवार की मूठ पर हाथ मारा, फिर अपनी छिछरी दाढ़ी को दबाया । सब अधिकारी अपने-अपने स्थानों पर जड़वत् हुए खड़े थे ।

"बोल, क्या कहती है ?" कोतवाल और दो सिपाहियों के आगे-आगे एक युवा लड़की को आते देखकर मेहरगुल ने भारी आवाज में पूछा । वह अच्छी भारतीय भाषा बोल लेता था ।

मैं पूछती हूँ हम ...." लड़की ने अपने गले को साफ करते हुए कहा, "किस अपराध में पकड़कर लाये गए हैं ।"

हूण सम्राट् की तीव्र दृष्टि पहले लड़की की ओर, फिर कोतवाल की ओर घूम गई ।

"महाबली" कोतवाल बोला, "यह वन में रहने वाले किसी ब्राह्मण की लड़की है । इसे राजसभा में बात करने का शिष्टाचार नहीं आता । मुझे आज्ञा दीजिए कि इसे ले जाकर उचित ढ़ंग से समझा दूँ ।"

"अच्छा होता" मदिरा के मद में मतवाले मेहरगुल ने लड़की के सुन्दर चेहरे की ओर देखते हुए कहा, "तुम यह बात पूछने के लिए रात को खाना खाने के दो घड़ी पश्चात् तक प्रतीक्षा करती जब तुम्हारा श्रंगार कर हमारे विलास भवन में लाया जाता परन्तु अगर तुम्हें अभी ही पूछना है तो पूछो ।"

"मुझे आपके आदमी क्यों पकड़कर लाये हैं ?"

"इसलिये कि तुम वन में अकेली बैठी बुरी लगती थी । सुन्दर युवतियाँ वीरों के पहलू में ही शोभा देती हैं ।"

हूण सम्राट् की आँखें वासना से चमक उठीं ।

इतना असभ्य उत्तर सुनकर जिसमें सम्पूर्ण स्‍त्री जाति का अपमान भरा हुआ था, उस लड़की के हृदय को ठेस लगी परन्तु इस परिस्थिति में जहाँ वह आपदाओं में घिरी थी, उसने बड़ी शान्ति और गम्भीरता से काम लिया । वह बड़े नम्र स्वर में बोली, "मुझे जब मेरे पिता की कुटिया से, जब वह बाहर गए हुए थे, पकड़ कर लाया गया । वह इस दुःख को कैसे सहन करेंगे ? हम संसार को त्यागकर वनों में रहते थे, कन्द मूल खाकर, झरनों का पानी पीकर ईश्वर-आराधना करते थे । किसी मनुष्य की तो बात ही क्या, चींटी तक को दुःख न देते थे । मैं हूण न्याय की दुहाई देकर पूछती हूँ आखिर हमारा अपराध क्या है ?"

मेहरगुल का हास्य गंभीरता में बदल गया । वह कहने लगा, "तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है । तुम्हारा पिता बहुत बड़ा विद्वान् होगा जो संसार को त्यागकर वनों में रहने लगा । उसने अपनी जाति को प्रत्येक प्रकार की सेवा, एकता और ज्ञान से वंचित कर दिया जो उसे ऐसा न करने पर अवश्य मिलते । केवल तुम्हारा ही पिता नहीं, तुम जैसी लड़कियों के हजारों पिताओं ने इसी प्रकार अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व को एक ओर रखकर वनों में निवास करना शुरू कर दिया और अपनी जाति को इस दिशा में पहुंचा दिया कि आज इस आलसी, निकम्मी और कायर जाति को ज्ञान देने के लिए मुझे ईश्वर ने कोड़ा बनाकर भेजा है । ऐसे पिताओं के घर में जन्म लेने वाली लड़कियाँ दण्ड की अधिकारिणी हैं और उनके लिए यही दण्ड है कि उन्हें बलपूर्वक उठा लाया जाय और जब आक्रमण करने वाले वीर अपनी वासना तृप्‍त कर लें, तो कुम्हलाये फूलों की भांति एक ओर फेंक दिया जाये ।"

अपमान की चोट खाई हुई दुःख और विवशता में डूबी लड़की ने फिर पूछा, "परन्तु मेरे साथ की अन्य लड़कियाँ तो ग्रामों और नगरों से पकड़कर लाई गईं हैं जिन के मां बाप ने तो संसार नहीं छोड़ा । उन्हें क्यों लाया गया है ?"

"इसलिए कि उनके पिताओं ने अपनी बस्तियों के अच्छे विद्वान् लोगों को न केवल वन में जाने दिया अपितु उन लोगों के संसार छोड़ने को कर्त्तव्य और त्याग का नाम देकर उनकी पूजा की तथा दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दी ।"

"अत्याचार ?" मेहरगुल बोला, "संसार में अत्याचार कोई वस्तु नहीं है । प्रत्येक असहाय और मन को अच्छी न लगने वाली परिस्थिति में ही अत्याचार दिखाई देता है । जो किसी न किसी दुर्बलता और अभाव पर प्रकृति का अटल विधान मनुष्य जाति को दिए बिना नहीं रहता ।"

"हो सकता है । यह सच है ।"

"यह पूर्णतः सच है । तुम शायद इसको सच नहीं समझती परन्तु सत्य के भी अनेक रूप हैं । किसी को इसका कोई रूप दिखाई देता है, किसी को कोई । युद्धप्रिय, विजयी जाति की सच्चाइयां कायर जातियों की समझ में नहीं आ सकतीं ।"

चार नौकर राजभवन के अन्दर से एक मसनद उठा लाये । हूण अधिकारी अपने सम्राट् मेहरगुल को, आशा के विरुद्ध, हारी जाति की एक लड़की के साथ वादविवाद करते देख कर आश्चर्य प्रकट करने लगे।

"मुझे छोड़ दो सम्राट् ! मैं आपका धन्यवाद करूँगी और मेरा वृद्ध पिता आपको आशीर्वाद देगा ।"

"आशीर्वाद ! हा हा हा !! तुम वनों में रहने वाले तिलकधारी ब्राह्मण आशीर्वाद दे-देकर भारतीय राजाओं को ही प्रसन्न कर सकते हो और शाप देकर डरा सकते हो । परन्तु हम हूणों को तो सुन्दरी ! तुम्हारे पिता के आशीर्वाद के स्थान पर तुम्हारे यौवन की अधिक आवश्यकता है परन्तु ....।" उसने अपना एक पाँव मसनद पर रखा, एक कठोर निश्चय उसके मन में आया, "तूने हूण सम्राट् को, जिसकी तलवार के सामने आज पूर्व और पश्चिम थर-थर कांप रहे हैं, इस निडरता से संबोधित किया है । इस उद्दंडता पर तुम्हें दंड दिया जायेगा ।"

"दण्ड?"

"कोतवाल !" महरगुल की आंखें क्रोध, बर्बरता और दानवता से चमक उठीं ।

"हजूरेआली !"

"अपने दो सिपाहियों को कहो कि एक कुत्ते को लाएं, इस लड़की की साड़ी नोंचकर इसे .....।"

अधिकारियों की आंखें चमकने लगीं । लड़की धक्का खाकर एक स्तम्भ से जा लगी, जैसे किसी ने उस पर सामने से प्रहार किया हो । पसीने में डूबी, अपने आपको सम्भालती वह खरखराती हुई आवाज में बोली, "क्या कहा आपने? क्या आवाज दी आपने ?" जैसे उसे अपने कानों पर विश्वास न आया हो ।

मेहरगुल ने अपना होंठ दबाया । तिब्बत का सफेद रंग वाला ऊँचे डोल का गद्दी कुत्ता .....।

कोतवाल ने आगे बढ़कर लड़की की साड़ी को पकड़ना चाहा ।

"ऐसा न करो... ऐसा करने की आज्ञा न दो । ईश्वर स्त्री जाति का अपमान नहीं सह सकते । महासती द्रोपदी को पापी कौरवों ने नंगा करने का दुस्साहस करना चाहा था । सब कुछ नष्ट हो गया था ।"

"हमने तुम्हारे देश की कहानियों में ऐसी कोई कहानी अवश्य सुनी थी । कोतवाल !"

"जी आलीजाह !"

"इसकी साड़ी खींच लो ।"

"यह ऐसा नहीं कर सकता । कोई भी ऐसा नहीं कर सकता ।"

"क्यों ! क्या तुम कोई ऐसा शाप देना जानती हो जिसके प्रभाव से तुम्हारे शरीर को छूने वाला पत्थर हो जाये ?"

"मैं इतना सामर्थ्य तो नहीं रखती, परन्तु इससे पहले कि कोई मेरे शरीर का निरादर करे, मेरी आत्मा शरीर से निकल जाएगी ।"

"हाँ ! चलो यह और भी तमाशा होगा । पुरानी किताबों में लिखा है कि मिस्र के जादूगर काहन किसी दूधमुँहें बच्चे के मांस का कीमा अपने शरीर पर मलकर अपनी आत्मा को अपनी इच्छा से बाहर निकाल लिया करते थे और फिर जब चाहते थे, शरीर में लौटा लेते थे ।"

लड़की को अपमान निश्चित दिखाई देने लगा, जिस पर उसने मौत को ही स्वीकार करने का निश्चय कर लिया । अपने इस निश्चय पर पहुंचकर उसके दिल को एक अनुपम शान्ति का आभास मिला, प्रत्येक प्रकार का भय अथवा घबराहट उसके हृदय से निकल गई । मृत्यु को सन्निकट देखकर वह बेधड़क होकर बोली, "हूण सम्राट ! मैं यह शरीर छोड़ने को तैयार हूँ । इसमें रहते हुए इसका इतना अपमान एक भारतीय लड़की से देखा न जाएगा । परन्तु एक बात तुम सब कान खोलकर सुन लो कि अत्याचार की जो आँधियाँ तुमने संसार में उठानी आरम्भ की हैं, ईश्वर इसे सहन नहीं करेगा । तुमने हिन्दुस्तान का धन लूटा, खेतियाँ उजाड़ीं, नगर-ग्राम जलाकर मरघट बना डाले । इस बहुत बड़ी राष्ट्रीय हानि को सम्भवतः भारतीय किसी प्रकार सहन कर लेते परन्तु जो तुमने राक्षसों और बर्बरों की भांति देवियों के सतीत्व भंग करने आरम्भ कर दिये हैं, इसे हिन्दू सूरमा सह नहीं सकेंगे । भारतीय युवक अपनी माताओं, बहनों के इस घोर अपमान का बदला लेने के लिए सिंहों की भाँति दहाड़ते हुए तुम पर टूट पड़ेंगे । योद्धाओं की खड़गें शीघ्र ही हूणों का अंत कर डालेंगीं और उनके शव गीदड़ों और चीलों का भोजन बनेंगे ।"

"इसे नंगी कर दो और सिपाहियों को कहो कि कुत्ते को लेकर आ जायें ।" मेहरगुल आप भी शीघ्रता से चलकर वहां जा खड़ा हुआ ।

और जब यह सब कुछ होने वाला था, एक दैवी विध्वंस, एक विनाश का गोला मेहरगुल के कान से टकराता कुत्ते और कोतवाल पर टूट पड़ा । छुरी हाथ में थामे एक ईरानी लौंडी ने इस कुकृत्य को रोकने के लिए अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर ऊपर से इन पर छलांग लगा दी । छुरी लगनी तो मेहरगुल की गर्दन पर थी, परन्तु वह उसकी कनपटी और कान को घायल कर सकी । बहुत ऊँचाई से अचानक गिरे शरीर की चोट से कोतवाल धरती पर गिर पड़ा और कुत्त चीख मारकर सटपटाने लगा । प्राणरहित युवती के पास ही लौंडी, जिसका शरीर बुरी तरह स्तम्भ से टकराया था, लहू में सांस तोड़ने लगी ।

जैसे किसी शत्रु ने आक्रमण किया हो । हूण सरदारों ने अपनी तलवारें म्यानों से सूत लीं । मेहरगुल के कान से लहू टपकता देखकर एक अधिकारी शाही हकीम को बुलाने दौड़ा, दूसरे ने अपना पटका घाव के नीचे कर दिया ।

पटके वाले सरदार को हाथ से परे हटाता क्रोध से गर्जता हुआ मेहरगुल बोला, "देखो ! एक स्त्री ने दूसरी स्त्री का सम्मान बचाने के लिए अपने प्राणों की बलि दी है अथवा कोई षड्यन्त्र है ?"

"जी आलीजाह !" चोट खाया हुआ कोतवाल अब अपने आपको थोड़ा सम्भाल चुका था ।

"पता लगाओ कि ऊपर से कूदने वाली सचमुच स्त्री है अथवा पुरुष ?"

"पुरुष है हजूर ।"

"फिर गुप्‍तचर ! हम पूछते हैं क्या तुम्हारा प्रबन्ध है ?"

कोतवाल थर-थर काँपने लगा ।

"गढ़ की नाकाबन्दी कराके जांच करवाओ । शायद शत्रुओं के कुछ और लोग भी ....।"

हकीम ने आकर दण्डवत् की और घाव पर पट्टी करने लगा । कोतवाल कर्मचारियों के नाम आवश्यक आदेश देने के लिए मुड़ा ।

"प्रत्येक स्थान छान मारा जाए, कोना-कोना, चप्पा-चप्पा । कोई संदिग्ध पुरुष तथा स्त्री पड़ताल से न बचे ।" मेहरगुल पट्टी बंधवा कर अंतःपुर की ओर चल पड़ा और सरदारों का समूह और सैनिकों की टोलियाँ वापिस जाने लगीं ।

जिस समय वह ईरानी लौंडी हूण कोतवाल पर गिरी, तो दीवार के गुप्‍त स्थान से छुपा हुआ जितेन्द्र उस नीच कृत्य से क्षुब्ध हो रहा था, तभी अचानक चौंक पड़ा । घटना की वास्तविकता को समझकर वह बड़बड़ाया, "ओह ! ऐसा देखकर वह कैसे चुप रह सकता था ! खैर, कुछ भी हो, वह अपना कर्त्तव्य पालन करता हुआ मरा है । मेहरगुल थोड़ा इधर न हटता तो कटार उसकी गर्दन में उतर गई होती । म्लेच्छ का भाग्य अच्छा ..... अब .....ढूंढते हुए यहाँ भी आएंगे । दीवार के अन्दर बने हुए इस गुप्‍त स्थान का सम्भवतः उन्हें पता हो ।"

साथी के मर जाने के शोक को भुलाकर, नई परिस्थिति में महल का मार्ग ढ़ूँढ़ने के लिए वह सोचने लगा । उसे सामने से दो आदमी कमरों की देखभाल के लिए आते दिखाई दिए ।

"अब क्या करना चाहिए?" प्राणों की रक्षा का प्रश्न उसके मस्तिष्क में चक्कर काटने लगा । परिस्थिति ऐसी थी जिसमें प्राण लेने के लिए आने वाले के साथ भी जी तोड़कर मुकाबला किया जाना असम्भव था । बल्कि यहाँ तो इसका प्रश्न ही नहीं था । पिंजरे में बन्द चूहे अथवा दड़बे में दुबकी मुर्गी को जैसे मौत का पंजा आकर सहसा दबोच लेता है, ऐसे ही कोतवाल के आदमी घड़ी भर में आकर उसे पकड़ लेंगे ।

दीवार के भीतर जो गुप्‍त स्थान बना हुआ था, वह बाहर कमरे में खड़े होकर दिखाई न देता था । भले ही साधारण व्यक्ति को उस का होना दिखाई न देता हो, किन्तु गिद्ध की आँख और अरबी कुत्ते की घ्राण शक्ति रखने वाले हूण सिपाहियों की दृष्टि से बचा न रह सकता था । वह अवश्य उसको पहले से ही जानते होंगे ।

बाहर कमरे में कई पैरों की चाप सुनाई दी । जितेन्द्र को ऐसा अनुभव हुआ कि आने वाले पग कमरे के फर्श पर नहीं, अपितु उसके हृदय पर पड़ रहे हैं । ठण्डे और बोझल, परन्तु उसके धैर्य में कमी न आई । वह इस बलहीन कर देने वाले अनुभव से चौंका । एक दृष्टि उसने बेसुध पड़ी लौंडी पर डाली, जिसकी पलकों में चेतना उत्पन्न होने लगी थी । उसने उसकी नाक पर बेसुध कर देने वाली औषधि की पोटली रखी, इसके पश्चात् अपने दोनों हाथों से गुप्त स्थान के पत्थर में लगा कुण्डा पकड़ लिया तथा दीवार में टांगें अड़ा लीं । आने वालों ने बाहर से इस कमरे के चक्कर न खाये परन्तु आगे वाले कमरे को ही देखभाल कर लौट गए, कुण्डे को किसी ने न छेड़ा । पश्चिम में पहुंचते हुए सूर्य की किरणें बाहर वाली दीवार के झरने में से छन-छनकर आने और उस पर फूल-पत्ते बनाने लगीं, जो मध्यम पड़ती हुई आखिर मिट गईं । थोड़े समय में ही सायंकाल का झुटपुटा रात के अन्धेरे में परिवर्तित हो गया और वहाँ मशालें और फानूस जगमगाने लगे ।

"अभी रात के पहले पहर तक यहीं छिपे रहना चाहिये कि लोग रात के भोजन से निपट लें परन्तु इतने समय तक मूर्छित रहने के कारण वह देवी कहीं मर न जाये जिसे राष्ट्रवादियों और हूण आक्रमणकारियों के संघर्ष में कष्ट उठाना पड़ा है," वह मन ही मन सोचता रहा ।
 
समय बीतता गया और इसके साथ ही आवाजें और प्रकाश रात को लुप्‍त होते गए । रात के पहले प्रहर का गजर बजा और एक भयंकर गूँज मौन की छाती को फोड़ती हुई चारों ओर फैल गई । परन्तु इसके पश्चात् पहले से भी अधिक सन्नाटा छा गया । खोल के भीतर बैठा हुआ जितेन्द्र अपने स्थान पर स्थिर बैठा रहा । साथी के मर जाने के शोक के साथ-साथ ही उसे अपने बच निकलने का कोई ढ़ंग दिखाई न देता था । आशा के विरुद्ध सोची हुई योजनाओं के उलट-पलट हो जाने का खेद, फिर आधुनिक परिस्थिति में अपने निश्चय को पूरा करने की धुन - इनमें से न जाने कौन सी वस्तु उसको घेरे हुए थी । इस प्रकार एक घड़ी समय बीत गया ।

एक घड़ी और बीती । इसके पश्चात् उसने धीरे-धीरे पूर्णतया बिना शब्द किए कुण्डे को चक्कर देकर गुप्‍त स्थान का मुंह खोल दिया । तंग और अंधेरा कमरा खाली पड़ा था, उसने सांस रोककर सुनने का प्रयत्‍न किया । उसका मन कहता था कि सम्भव है कोतवाल का कोई सिपाही अथवा गुप्‍तचर किसी कोने में दबा बैठा हो, परन्तु कोई साधारण सी सरसहाट भी अनुभव न हुई । उसने बेसुध लौंडी को उठाकर बाहर कमरे में डाल दिया । उसके मुंह पर बेसुध बना देने वाली औषधि वाली पोटली थोड़े समय तक और रखी । फिर दबके का द्वार बन्द करके पेट के बल रेंगता हुआ बाहर निकल आया ।

रात का अंधेरा अधिक गहरा हो गया था जिसको आकाश पर छाए हुए बादलों ने और भयानक बना दिया था । राजभवनों और पहरे के स्थानों को छोड़कर सभी प्रकाश बुझ चुके थे । सर्दी के बर्फीले झोंके कभी तेज, कभी धीमे चल रहे थे । आकाश में कभी-कभी मेंह की एक-आध बूंद टपककर वातावरण को और ठंडा, बोझल और उदासीन बना रही थी । परन्तु सर्दी के अतिरिक्त एक और वस्तु भी थी जो जितेन्द्र को बुरी तरह अनुभव हो रही थी, वह थी कुत्ते की भौंक । थोड़ा भोजन जो बना था उसे वह अपने साथी के साथ खाकर समाप्‍त कर चुका था और फिर ऐसा कोई अवसर हाथ न लगा कि वह गढ़ के भीतर से कुछ प्राप्‍त कर सकता । वह स्वाभाविक रूप से भूख-प्यास सहन करने वाला था । परन्तु न जाने वह यात्रा की थकान का प्रभाव था अथवा उस संघर्ष का जो उसने गढ़ में प्रवेश करने से लेकर अब तक किया था कि उसकी भूख साधारण अवस्था से कहीं अधिक तेजी से भड़क उठी थी । यहाँ तक कि उसे अपने शरीर में एक विशेष दुर्बलता का अनुभव होने लगा । परन्तु कुछ भी हो, उसका कर्त्तव्यपरायण हृदय प्रत्येक प्रकार की भीतरी दुर्बलताओं तथा बाह्य बाधाओं पर छा जाने पर तुला हुआ था । अपने स्थान पर लेटे हुए उसने किसी शब्द को सुनने की चेष्टा की । एक बार जिस प्रकार नेवला गर्दन उठाकर देखता है, उसने कोहनियों के सहारे अपने सिर को थोड़ा-सा ऊपर कर इधर-उधर देखा । इसके पश्चात् ठण्डी पथरीली छत पर पेट के बल रेंगता हुआ एक ओर को बढ़ने लगा ।

दो सीढ़ियाँ ऊपर चढ़कर वह गढ़ की सबसे ऊंची मंजिल पर जा बैठा और दूर तक फैली हुई छत को पार करने के लिए गढ़ की दीवार के कगूरों पर जा चढ़ा । यहाँ से वह कमन्द के द्वारा नीचे उतर जाना चाहता था परन्तु एक नई बाधा बीच में आ पड़ी । पिछली रात कमन्द उसके साथी के पास रह गई थी । एक ऐसी भूल थी जिसको कोई समझदार गुप्‍तचर नहीं करता ।

एक ठंडा सांस उसके होठों से निकला और विवशता की आह उसके मुंह से निकली । कगूरों के उभरे हुए किनारे चट्टानों की भांति ऊँचे दिखाई देने लगे और बाहर की गहराई से सिर चकराने लगा ।

"मूर्ख !" वह मन ही मन बड़बड़ाया । कुछ क्षणों तक वह कगूरों के अनगिनत पत्थरों में एक पत्थर बना अपने स्थान पर चुपचाप बैठा रहा । शीघ्र ही ठंडी हवा के झौंके से वह चौंक पड़ा और उसकी तबीयत इस नई कठिनाई पर सफलता प्राप्‍त करने के लिए कोई ढंग सोचने लगी । इसके सिवाय कोई मार्ग ही न था कि सारी दीवार का चक्कर काटकर कोई थोड़ा ऊँचा स्थान ढूंढे और पगड़ी और धोती की मिली जुली लम्बाई से लटकर नीचे कूद जाए । चाहे इससे प्राण जाएं अथवा रहें । फिर भी .....।"

राजभवन और बुर्ज के किनारे उसने पूरे धैर्य और सावधानी के साथ लांघे । इसके पश्चात् उसके रेंगने का वेग तेज हो गया । परन्तु राजकीय रसोई घर की सीमा पार करने के पश्चात् वह बढ़ता हुआ इस प्रकार रुका, जैसे उस पर किसी ने आगे से चोट की हो । उसकी रात के अंधेरे को चीरती हुई तीव्र दृष्टि अपने ठीक सामने किसी वस्तु पर जमकर रह गई । कोई मनुष्य उसी की भांति उसी की ओर बढ़ा आ रहा था । दोनों के बीच केवल इतना अन्तर था कि वह हाथ बढ़ाकर एक दूसरे को छू सकते थे । जिस प्रकार उसे देखकर वह ठिठका था, उसी प्रकार इसे देखकर वह डर के मारे इतना घबराया कि एक हल्की सी चीख के साथ बाहर की ओर नीचे लुढ़क गया । परन्तु उसने लुढ़कते समय जितेन्द्र की टांग हाथ में पकड़ ली । इस अचानक झटके और खिंचाव के कारण जितेन्द्र के हाथ से किनारा छूट गया ।

साठ-सत्तर हाथ की ऊंचाई पर से गिरकर हाड़-मांस के बने हुए मनुष्य की तो बात क्या, एक पत्थर अथवा काँसे की मूर्ति भी तो टुकड़े-टुकड़े हो जाती ! परन्तु जिस वस्तु पर वह गिरे, वह धरती के स्थान पर पीपल का एक छोटा-सा वृक्ष था जो गढ़ की दीवार के बीच पत्थरों में उगा हुआ था । दो मनुष्यों के भारी बोझ के आ पड़ने से उसका दुर्बल तना बुरी तरह झूला किन्तु टूटा नहीं । यदि वह जड़ को छोड़कर टहनियों की ओर गिरते तो उनमें से निकलकर नीचे आ पड़ते परन्तु ठीक जड़ के पास आ गिरने से उनके प्राण बच गये । उस समय जब मौत नीचे मुंह खोले खड़ी थी, जीवन के प्यार ने बिजली जैसी तेजी के साथ गिरने वालों की सूझ-बूझ तेज कर दी । उन्होंने तने को और एक बाहर को निकली हुई जड़ को दृढ़ता से पकड़ लिया और परिस्थिति को समझने के लिए अपनी सुध को स्थिर किया और इस भारी संकट की घबराहट को छोड़कर एक-दूसरे की ओर देखने लगे ।

"जीवन कितना प्यारा है !" दूसरा मनुष्य सूखे हुए गले से बोला कि "पहली बार गिरा तो तुम्हारी टांग पकड़ ली, दूसरी बार गिरा तो इस पेड़ से लिपट गया । जबकि मैं जानता हूँ कि जो अपराध मैंने किया है, उसका दंड मौत को छोड़कर और कुछ नहीं । रात भर जी लूँ, दिन निकलते ही मेरी गर्दन उड़ा दी जाएगी ।"

जितेन्द्र होश में आ चुका था । वह दीवार की आधी ऊंचाई पर था जहाँ से पगड़ी और धोती की सहायता से नीचे कूद जाना घातक नहीं था । उसने अंधेरे में दूसरे मनुष्य की आवाज को ध्यान से सुना, घूरती हुई तीव्र आंखों से उसके चेहरे को देखा और पहचान गया ।

"डरो मत ! मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूं । अधिक बातें पूछने और बताने का अवसर नहीं है । इसलिए इन्हें किसी और समय के लिए रख छोड़ो । क्या तुम अपने अधिकारी की हत्या करके आ रहे हो ?"

"हाँ !" उस आदमी ने कांपती हुई आवाज में कहा ।

"क्या उसने तुम्हारे लिए प्राणदंड इसलिए निश्चित किया था कि तुमने पिछली रात अपने एक साथी नौकर को मार डाला था ?"

"और वह नौकर क्या खच्चर गाड़ी चलाने वाला एक किदार सिपाही था ?"

"तुम तो सब कुछ जानते हो ।"

"धीरे बोलो भले आदमी ! नीचे मोड़ पर से पहरे वालों की टोली इस ओर को आती हुई सुनाई दे रही है ।" और वह झट चुप कोकर भीत के साथ चिपक गए ।

टोली के सिपाही बातें करते जा रहे थे ।

"मेरी समझ में नहीं आता कि इतने कड़े पहरे के होते हुए शत्रु का वह गुप्‍तचर किस प्रकार गढ़ में घुसा होगा ?"

"भाई, तुम क्या जानो ! यह लोग बड़े उस्ताद हैं और अब नए राष्ट्रवादी युवक तो बस एक मुसीबत ही हैं ।"

"और क्या जी, मैंने सुना है कि इस देश में जादू मन्त्र बहुत है । क्या पता उसके जादू के प्रभाव ने पहरे वालों की दृष्टि बन्द कर दी हो !"

"वह जादू मन्त्र जानता होता तो छुरी से क्यों प्रहार करता ?"

"परन्तु भाई, गिरा वह इस प्रकार था जैसे आकाश से टूट पड़ा हो । किसी की समझ में नहीं आया कि उसने कहाँ से छलाँग लगाई ।"

सिपाही निकल गए तो जितेन्द्र ने थोड़ी ऊँचाई पर दाईं ओर बनी हुई खिड़की की ओर संकेत करके ईरानी बन्दी से पूछा, "कुछ पता है कि यहाँ कौन रहता है ?"

"कहाँ? इस खिड़की के भीतर ?"

हाँ ।"

"रहता तो कोई अवश्य है, परन्तु यह पता नहीं कि कौन रहता है । सम्भवतः सेना का बड़ा अधिकारी हो ।"

जितेन्द्र और इन्द्रजीत गढ़ की स्थिति का पता लगाने भेजे गए थे, परन्तु अपने ढ़ंग से उन्होंने निश्चय कर लिया था कि जिस प्रकार भी हो, वह हूण सम्राट् अथवा उसके सेनापति को मारने का प्रयत्‍न करेंगे । किन्तु घटनायें कुछ इस प्रकार की हुईं कि वह न केवल यहाँ की स्थिति का ही पूरी तरह पता लगा सके अपितु दोनों में से एक ने अपने प्राणों से ही हाथ धो लिया । सेवा की दृष्टि से उसका बलिदान चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो, परन्तु गुप्‍तचर के कर्त्तव्य को सामने रखते हुए यह किसी अनाड़ी और शीघ्रता करने वाले लड़के की हरकत से अधिक मूल्य न रखता था । जितेन्द्र के लिए अपने साथी की मौत की सूचना लेकर लौटना इतना शोकप्रद था, जितना पूरी स्थिति का पता लिए बिना जाना । इसमें सन्देह नहीं कि जितना समय उसे मिल सका था, उसमें उसने दूरी पर होती बातचीत और अपने अनुमानों से कुछ काम की सूचनायें इकट्ठी कीं थीं, परन्तु यह सूचनायें अधिक महत्वपूर्ण न थीं ।

अपने कार्य की असफलता का अनुभव कर, कुछ कर दिखाने की भावना एक बार फिर उसके मन में उभरी । इस प्रकार के एक दो गढ़ उसने देखे थे और उनकी बनावट के ढंग से वह भली प्रकार परिचित था । ऐसी खिड़की के पीछे अवश्य किसी ऊँचे अधिकारी अथवा कर्मचारी का निवास स्थान होना चाहिए । यदि इसका यह अनुमान झूठा नहीं था, तो इसके भीतर अवश्य हूण राज्य का कोई बड़ा अधिकारी सो रहा होगा । "यदि यहाँ से जाते-जाते उसे भी मौत के घाट उतार जायें, तो कुछ सफलता मिले", यह सोचकर उसने निर्भीक ईरानी से दबे स्वर में कहा, "तुम इसी प्रकार दीवार के साथ दुबके रहो, मैं अभी थोड़ी देर में आता हूँ ।"

"बाबा ! तुम कहाँ जाने लगे ? इस में खतरा है ।" ईरानी घबरा गया । परन्तु निर्भीक भारतीय को न मानते देखकर दीवार से चिपट गया ।

खिड़की खुली थी, परन्तु भीतर किसी फानूस अथवा दीपक का प्रकाश नहीं था । जितेन्द्र ने हाथ लम्बा करके खिड़की की बढ़ी हुई निचली कगार पकड़ ली और उससे लटक गया । दूसरा हाथ चौखट पर डालकर उछला और भीतर की दहलीज को पकड़ने के लिए दूर तक हाथ मारा, परन्तु दीवार इतनी चौड़ी थी कि किनारा हाथ न लगा और हाथ खाली लौट आने के कारण अपने बोझ से मजबूर होकर फिर कगार से आ लटका और झूलने लगा । इतना संघर्ष करते समय उसकी उंगलियों और कलाइयों को भारी शक्ति लगानी पड़ी थी । ऐसे ही एक और सफल प्रयत्‍न करने से पहले वह इसी प्रकार लटकते हुए एक पल सुस्ताना चाहता था । केवल एक पल .... परन्तु इस एक पल के ठहराव के बीच ही उसे सुस्ताने का अवसर न देते हुए एक मनुष्य का चेहरा खिड़की से बाहर झांकने लगा । परिस्थिति अति भयानक थी । एक पल की ढ़ील, जिसमें वह इसको कगारे में लटकता देखकर प्रहार कर सकता, मौत का संदेश ला सकती थी । परन्तु युवक ढ़ील का अभ्यस्त न था । इससे पहले कि वह उसका पता लगाये, उसने अपने बोझ को छोड़कर दूसरे हाथ से तेज फल की कटार उसके सिर को ताक कर फेंकी जो पाँच उंगल उसकी खोपड़ी में उतर गई ।

एक हल्की सी गरगराती कराहट खिड़की में से बाहर झांकने वाले के मुंह से निकली । जान तोड़न की अवस्था में उसने आकाश में किसी वस्तु को पकड़ने के लिए अपनी मुट्ठियां फैलाईं, फिर उसके पांव डगमगाए और वह लड़खड़ाकर बाहर, नीचे धरती पर जा गिरा ।

"भद्र !" एक शब्द हुआ, न जाने संतोष का न जाने आश्चर्य का । एक ठण्डी सांस जितेन्द्र के मुंह से निकली । उसकी कर्म-शक्ति फिर तेज हो गई । अब यहाँ थोड़ी-सी देर तक ठहरना भी खतरनाक था । उसने ईरानी को आवाज दी, "यह मोटी टहनी झुकाकर मेरे पास कर दो ।" और जब वह उसके हाथ में आ गई तो "अब मेरा हाथ पकड़ो ।"

सहारा लेकर वह पीपल के तने से आ चिपटा । अब उसने पगड़ी और धोती उतारी । दोनों के गांठ लगाकर इसका एक सिरा तने के साथ बांधा । उसने लंगोट पहना हुआ था । वह ईरानी बन्दी से बोला, "मेरे नीचे उतरते ही झट उतर आना, देर न करना ।" और वह बंदर की सी फुर्ती के साथ नीचे उतर गया ।

ईरानी बन्दी, जिसे हूण प्राणदण्ड दे चुके थे, का जीवन युवक से बंधा था । वह अपने प्राण बचाने वाले की आज्ञा का पालन करता हुआ झट नीचे उतर आया । कटार का प्रहार खाकर ऊपर से गिरने वाले के शव पर झुके हुए जितेन्द्र ने ईरानी को आदेश दिया कि इसके कपड़ों की तलाशी ले और उसने आप कटार की तीन रगड़ों में उस की गर्दन धड़ से अलग की और उसके ही कपड़े से लपेटकर उसे गोद में ले लिया ।

"टीन की एक नलकी और चमड़े की एक थैली । न जाने इन में क्या है ?"

"लाओ, इन्हें मुझे दे दो । जहाँ कहीं प्रकाश में इस को पहचानने का अवकाश मिला तो इन्हें भी देख लूँगा । अब इसके शव को एक ओर छुपाने में सहायता दो ।" वह लेटे ही लेटे धकेलते हुए दूर तक ले गए । फिर उसे किसी ओट में छुपाकर उठे और वेगपूर्ण पंजों से चलते, जितना शीघ्र हो सके, बाहर निकल जाने का प्रयत्‍न करने लगे ।

रात्रि के घोर अन्धकार में लिपटे दूर तक विस्तृत मैदान में अगणित तम्बुओं, छौलदारियों और मंडपों के धुंधले से अस्पष्ट रेखाचिन्ह क्षितिज को छू रहे थे और स्थान-स्थान पर देदीप्यमान अग्नि-ज्वालायें तथा मशालें उनको आलोकित कर रहीं थीं । तूफानों को पेट में छुपाए लहरें उठाते समुद्र की भान्ति एक मध्यम-सा गरजता शोर वहाँ उठ रहा था । मगध, मालवा तथा चालुक्य की चतुरंगिणी सेनाओं ने यहाँ पड़ाव डाला था । इसके अतिरिक्त रुद्रदत्त द्वारा संगठित पचहत्तर हजार युवक भी यहीं ठहरे थे जो अपने देश, धर्म तथा संस्कृति के अपमान और माताओं बहनों पर हूणों द्वारा किये गये अत्याचारों का बदला लेने के लिए, विजय अथवा मृत्यु का प्रण लेकर यहाँ पहुंचे थे । युद्धक्षेत्र के किनारे किसी राजधानी के खंडहरों के बीच बने एक मन्दिर के भीतर इस महान् सेना के सेनापति बैठे हुए कतिपय योजनायें बना रहे थे । मन्दिर द्वार की सीढ़ियों के बाहर नंगी तलवार का पहरा था । द्वार स्तंभों पर तेल में भीगे बिनौलों से भरी दो बड़ी-बड़ी हांडियाँ जल रहीं थीं जिनके थिरकते हुए प्रकाश में आंगन के ताक में रखी देवमूर्तियों की परछाइयाँ विभिन्न आकार बनाती और उछलती कूदती दिखाई देतीं थीं ।

मन्दिर का गुम्बद, कलश के पास से थोड़ा सा टूटा हुआ था जिसमें से आकाश झांक रहा था । परन्तु सुन्दर रंग-बिरंगे पत्थरों का फर्श पूर्णतया ठीक था । जब फर्श की धूल-मिट्टी झाड़ दी गई तो इसकी सुन्दरता खिल उठी । भक्तों की भुलाई-बिसराई मूर्ति जिसके चरणों में फल-फूल भेंट करके धूप और जोत जला दी गई थी, पूर्ववत् आशीर्वाद और स्फूर्तियां बरसाती प्रतीत होने लगी । यद्यपि मालवा के राजा ने जिस की सीमा में यह स्थान था, इस मन्दिर की देख-रेख तथा मरम्मत का आदेश दे दिया था किन्तु इस समय वह इसी भग्न स्थल पर ही सामरिक सभा बुलाने पर बाध्य थे ।

मगध सम्राट्, उसका सेनापति और महामंत्री, मालव का राजा, एक चालुक्य सरदार, रुद्रदत्त, महाबाहु, धूमकेतु, दोनों ईरानी थे । इनके चेहरों के उतार-चढ़ाव को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि विचार-विमर्श में कोई मतभेद आ उपस्थित हुआ है जिसे दूर करना बड़ा कठिन प्रतीत होता है । कुछ क्षण तक सब चुपचाप बैठे रहे, आखिर रुद्रदत्त ने मौन भंग किया । वह बोला कि मगध राज्य के योग्य एवं वीर सेनापति इस बात पर अड़े हुए हैं कि सारी सेना का नियंत्रण उन्हीं के हाथ में हो, और जिस प्रकार की सामरिक चालों, व्यूह रचनाओं से वह युद्ध का संचालन करना चाहें, उसमें कोई दूसरा हस्तक्षेप न करे । इसके अतिरिक्त वह यह भी चाहते हैं कि मगध, मालवा और चालुक्य की राज्य सेनायें ही युद्ध में भाग लें और राष्ट्रवादी युवक पीछे रहें और उन युवकों से उसी समय काम लिया जाय जब कि युद्ध-क्षेत्र की परिस्थिति अपने हितों के विपरीत जाती दिखाई दे । इस निश्चय के समर्थन में वह कहते हैं कि ये युवक हूण-शत्रुता तथा देशभक्ति में भले ही राज्य-सेनाओं से बढ़े हुए हों, परन्तु युद्धकला के ज्ञान और अनुभव के बारे में अभी तक वह उनके सामने बच्चे हैं । इसके अतिरिक्त मेहरगुल जैसे विदेशी आक्रमणकारी की रक्त की प्यासी सेना की तुलना में, जिसने बड़े-बड़े राज्य तलपट कर डाले, इन लोगों से बड़े-बड़े मोर्चों पर काम लेना हानिकारक होगा ।

"जी हां ! आप स्वयं ही सोच सकते हैं ।" मगध सेनापति बोला ।

रुद्रदत्त ने अपना व्याख्यान जारी रखा, "इसके विपरीत मेरा विचार है कि राज्य सेना और राष्ट्रवादी दलों का नेतृत्व महाबाहु को सौंप दिया जाये । इसलिए नहीं कि हमारे राष्ट्रवादी दल मगध सेनापति की आज्ञा से लड़ना नहीं चाहते अथवा मैं विजय की कीर्ति अपने महाबाहु को दिलाना चाहता हूँ, बल्कि बात यह है कि हमारे युवकों को जिस प्रकार से तैयार किया गया है उन्हें मगध सेनापति उस ढंग से लड़ा नहीं सकते और इधर हमारे युवक उस ढंग से लड़ना नहीं जानते जिस ढंग से सेनापति लड़ाना जानते हैं । किन्तु अकेला महाबाहु ही एक ऐसी व्यक्ति है जो युद्धकला के इस नवीन ढ़ंग के साथ-साथ मगध सेनापति के ढंग से भी पूर्णतया परिचित है । आप स्वयं जानते हैं कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में युद्धकला विज्ञान के यह प्रसिद्ध विद्यार्थी रह चुके हैं ।

उसने एक दीर्घ निश्वास खींचा, परन्तु कोई न बोला । वह पुनः कहने लगा, "परन्तु ऐसी परिस्थिति में, जब कि एक-दूसरे के विरुद्ध राय देने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही राय को ठीक समझता हो और कोई भी अपनी बात छोड़ने को तैयार न हो, तो ऐसी नाजुक घड़ी में जब शत्रु की सेनाओं का आगे बढ़ते आना पुनर्विचार अथवा पुनरीक्षण का अवकाश भी न देता हो, तो ऐसे समय में यही उचित है कि सुलझाव के लिए कोई बीच का मार्ग अपना लेना चाहिये । यह स्पष्ट है कि हूण सम्राट् सारे भारतवर्ष पर दासता का जुआ रखने के लिए पहले मालवा के राजा पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहा था, क्योंकि मालवा के महाराजा ने शत्रुओं के साथ सन्धि का निश्चय कर लेने के पश्चात् भी अपना विचार बदल लिया था । परन्तु इसी समय जब उसे सूचना मिली कि चालुक्य सरदार और मगध सम्राट् भी मालवा के महाराज के साथ मिलकर टक्कर लेने की तैयारी कर रहे हैं और उनके अतिरिक्त हिन्दू राष्ट्रवादियों का एक दल भी उनसे मिल गया है, तो उसने लामबंदी और भी तेज कर दी । परन्तु हमारे राष्ट्रवादियों ने योजनानुसार हूण सम्राट् के सम्बंधियों तथा कर्मचारियों को, चकित कर देने वाली वीरता के साथ भरे दरबार में मृत्यु के घाट उतारकर उसे इतना भड़का दिया कि यदि पहले वह एक मास तक आक्रमण करता तो अब युद्ध के लिए झट तैयार हो गया । वास्तव में प्रयोजन ही यह था कि यदि क्रोध और शीघ्रता की झुंझलाहट में वह पूरी तैयारी न होने के पूर्व ही पग उठा ले और उसके सैनिक गठन में त्रुटियाँ रह जायें तो उस पर सुगमता से चोट की जा सकती है । हमारे गुप्‍तचरों की सूचना है कि यही बात हो गई है । हूण सम्राट् मेहरगुल ने अपने निश्चय से पहले ही कूच कर दिया है । उसकी युद्ध सम्बन्धी योजनाओं के अधूरेपन की सूचनाएं हमारे तक पहुंच चुकी हैं । भगवान् ने चाहा तो हमारी ही विजय होगी । किन्तु इस समय हम अपनी युद्ध सम्बन्धी योजनाओं में उपस्थित समस्या का हल ढूंढ़ रहे हैं । यदि महाबाहु और मगध सेनापति ठीक समझें तो मेरा तो यही विचार है कि जिस मार्ग से अब हूण सेना बढ़ी आ रही है, उससे पर्याप्‍त अन्तर छोड़कर महाबाहु रात्रि के अन्धकार में अपने युवकों को स्यालकोट की ओर ले जाये । जब हूण सेना इस ओर को बहुत आगे निकल आये और हमारी सेनाओं से टक्कर लेने लगे तो यह अपने युवकों को दो भागों में बांटकर, एक से हूण सेना पर रात को धावा बुलवा दे और दूसरी टुकड़ी हूणों की खाद्य सामग्री और यातायात के साधनों को नष्ट करती हुई उनकी राजधानी पर टूट पड़े । क्यों ?

अपना सुझाव देकर उसने मगध सेनापति की ओर देखा ।

"हाँ, यह ढंग ठीक है । मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं ।"

"और महाबाहु, आपको?"

महाबाहु बोला, "सैनिक का कार्य आपत्ति प्रकट करना नहीं, आज्ञा का पालन करना है ।" उसके चेहरे पर किसी प्रकार के हठ तथा क्रोध के कोई भी चिन्ह न थे ।

रुद्रदत्त कहने लगा, "मेरा अभिप्राय आपत्ति अथवा आज्ञा से नहीं, बल्कि मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि युद्धकला के अनुसार तो इस योजना में कोई त्रुटि नहीं है ?"
 
महाबाहु का चेहरा गम्भीर हो गया । उसने कहा, "यदि मगध सेनापति इधर युद्ध में किसी प्रकार की त्रुटि न आने दें तो मैं अपने काम को तो पूरी तरह निभा दूंगा । यदि वह शत्रु को एक पग भी आगे न बढ़ने देंगे तो हमारे सूरमाओं की खड़ग उनको पीछे भी न हटने देंगीं और चक्के के दो पाटों में आये हुए हूणों को हम पीस कर रख देंगे ।"

रुद्रदत्त गहरी चिन्ता में पड़ गया जैसे इस निश्चय में अभी कोई अधूरापन रह गया हो और वह उसे भी दूर कर डालना चाहता हो ।

कोई न बोला । गहरा मौन छा गया । सुलगती धूप के धूंएं की लकीर ऊपर उठकर ताना-बाना बनाती रही और मूर्ति के सुन्दर दैवी मुख से ज्योति की किरणें फूटती रहीं । द्वार में से बाहर दिखाई देने वाला नक्षत्र-समूह बता रहा था कि रात का दूसरा पहर समाप्‍त होने को है ।

अन्त में रुद्रदत्त बोला, "यदि मगध के सेनापति अनुचित न समझें तो मैं चाहता हूँ कि हमारे दस हजार वीरों की एक सेना इस ओर लड़ने वाले राज्यसैनिकों से पर्याप्‍त दूरी पर उपस्थित रहे । ईश्वर न करे, यदि युद्ध स्थिति हमारे पक्ष में बिगड़ने लगे और महाबाहु अपने सैनिकों को लेकर आने में विलम्ब कर जाये, तो ये लोग युद्धक्षेत्र में कूदकर हमारी सहायता करेंगे ।"

सेनापति बोला, "दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से आपका विचार ठीक है । ऐसा ही कीजिए ।"

रुद्रदत्त ने एक गहन निश्वास लिया परन्तु इसे संतोष से बाहर निकालने का अवसर न मिला । सहसा चौंककर उसने अपनी गर्दन पर इस प्रकार हाथ मारा जैसे कोई आग की चिंगारी उस पर आ गिरी हो । छोटी-सी कोई जीवित वस्तु उसकी पीठ पर गिरी जिस पर चौंककर, महाबाहु ने अपने खडग की मूठ से दो-तीन वार किए ।

इसी के साथ किसी बोझल वस्तु के भद से गिरने का शब्द बाहर सुनाई दिया परन्तु इस पर किसी ने भी ध्यान न दिया ।

"तक्षक ! शैलचूर ? कैटलू ? हमदराबाद ...?"

बाहर से आए हुए आयुर्वेदाचार्य ने मूर्ति के चरणों में जलते हुए दीपक को उठाकर मरे हुए सर्प को देखा और कहा - "कैटलू है, अति विषैला और अप्राप्य श्रेणी का ।"

मालव महाराज अपने राजवैद्य को बुलाने दौड़े । मगध सम्राट् तथा चालुक्य सामन्त भी अपने राजवैद्यों को बुलाने के लिए बाहर निकल गए ।

आयुर्वेदाचार्य ने पीछे से आवाज लगाई, "यदि जहरमुहरा न मिले तो आग का एक अंगारा भिजवा दो और घृत से भरा मिलास ।" वह बुड़बुड़ाया, "साधारण जहरमुहरे से भी कोई काम बनता दिखाई नहीं देता । क्या ही अच्छा होता मेरी औषधियाँ मेरे ही पास होतीं । काटा भी तो दुष्ट ने ठीक गर्दन पर है ।"

ईरानी युवक बहराम बोला, "मैंने सुना है कि कुछ तबीब घाव पर मुँह लगाकर साँप का विष चूस लिया करते हैं । यदि आज्ञा हो तो मैं इसे चूसकर देख लेता हूँ । मैं यदि मर भी गया तो कोई बात नहीं । रुद्रदत्त के प्राणों पर मुझ जैसे सहस्रों जीवन भेंट किए जा सकते हैं ।"

"चूस लो । परन्तु तुम्हारे मुँह में कोई घाव तो नहीं ? तुम्हें दांतों का कोई रोग तो नहीं ?

"जी नहीं ।"

रुद्रदत्त, जो अपनी मानसिक शक्ति से विष के प्रभाव को दबाने का प्रयास कर रहा था, बोला, "विचित्र प्रकार का विष है, मेरा सारा शरीर जल उठा है, हाथ-पांव की ऐंठन बढ़ती जा रही है, और आँखों के सामने अंधकार छा रहा है ।"

बहराम ने कई बार घाव को चूसकर थूक दिया ।

परन्तु रुद्रदत्त की हालत बिगड़ती गई, "मेरा सांस रुक रहा है और मस्तिष्क और आँखें निकम्मी हो रही हैं । मैं मरने से नहीं डरता, परन्तु दुःख इस बात का है कि प्रिय भारतवर्ष को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराने का जो प्रण किया था, उसे पूरा न कर सका ।"

आयुर्वेदाचार्य बोला, "चिन्ता न करो, मैं तुम्हें मरने से बचा लूंगा ।"

"यदि तुम मुझे मरने से बचा लोगे तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं भारत एवं भारतीयता को मरने से बचा लूंगा ।"

"यदि मगध के राजवैद्य के पास मुहरे न मिले, यदि मेरी बताई औषधियाँ भी उसके पास न हुईं और तुम्हारे हृदय अथवा नाड़ी की गति भी रुक गई तो भी मैं तुम्हें बचा लूंगा । मैं गोबर के ढेर में तुम्हारे शव को सुरक्षित कराके, तीव्रगामी घोड़े पर चढ़कर माधोपुर पहुंचूंगा और वहाँ से मुहरें तथा औषधियाँ लाकर फिर से तुम्हारे मृत शरीर में जीवन डाल दूँगा ।"

मूर्छा बढ़ी आ रही थी, मृत्यु की परछाइयां लिए हुए ।

"मूर्छा को बढ़ने दो, अपने मानसिक बल से इसे न रोको, कहीं इसी संघर्ष में तुम्हारे मस्तिष्क की कोई नस न फट जाये ।"

"महाबाहु ! यदि कुछ न हुआ तो मेरी मृत्यु के पश्चात् सभी कुछ तुम करना ...उत्साह ...साहस... दूरदर्शिता ...." बस इतना कहकर रुद्रदत्त बेसुध हो गया ।

महाबाहु, जो थोड़ा समय पूर्व ही उत्साहित तथा महान् साहसी बना हुआ था, रुद्रदत्त के मूर्छित होते ही डगमगा गया । उसने बड़े जोर से अपने दिल को दोनों हाथों से पकड़ लिया ।

"यह हुआ कैसे?" महाबाहु ने यह प्रश्न अब पूछा । पहले इधर-उधर दवा-दारू लाने की भाग-दौड़ में इस ओर ध्यान ही न गया था । "मन्दिर की छत में साँप कहां से आया ?"

तीनों राजवैद्य दौड़े हुए आए, उनके पीछे कुछ अनुचरों के हाथ में घी तथा चिंगारियां थीं ।

आयुर्वेदाचार्य ने पूछा, "आप में किसी के पास जहरमुहरे हैं ? सांप काटने की कोई औषधि है ?"

"श्रीमान्, यह किसको ध्यान आ सकता था कि युद्धक्षेत्र में भी ऐसी आवश्यकता पड़ सकती है ।"

आयुर्वेदाचार्य ने अधिक पूछताछ किये बिना एक भृत्य से चिमटा पकड़ा और आग का एक दहकता अंगारा रुद्रदत्त की गर्दन पर रख दिया । त्वचा चिड़चिड़ शब्द करके जली । वेदना से रुद्रदत्त की आंखों के मूर्छित पर्दे तनिक तड़पे और चेतना की इस थोड़ी-सी अवधि से लाभ उठाकर आयुर्वेदाचार्य ने गर्म घी का गिलास रुद्रदत्त को पिला देना चाहा, परन्तु एक घूंट से अधिक घी रुद्रदत्त के गले के नीचे न उतरा ।

तीनों महाराज भी भीतर पहुंचे । मालवा नरेश ने पूछा, "परन्तु यह साँप मन्दिर की छत से गिरा कैसे ?"

परन्तु आयुर्वेदाचार्य ने इस बात का उत्तर देने अथवा इस की बाबत पूछने का अवसर न दिया । वह रुद्रदत्त के मूर्छित शरीर को धरती पर लिटाता हुआ बोला, "रुद्रदत्त की मृत्यु निश्चित है । यदि इसकी मानसिक शक्ति प्रबल न होती तो अब तक कभी के स्वर्ग सिधार चुकते । अब चौथाई घड़ी के भीतर इसकी नाड़ी और हृदय की गति रुक जायेगी और प्राणपखेरू उड़ जायेंगे । परन्तु मैं देश के इस अनोखे और ऊंचे सपूत को मरने नहीं दूंगा । मेरे लिए एक वायु के समान दौड़ने वाला घोड़ा और चार सशस्‍त्र सैनिक तैयार करा दें । वहां से मुहरे और रसायन लेकर लौट आऊंगा । अभी आप लोग गोबर का बड़ा ढ़ेर लगवा दें और रुद्रदत्त के शरीर को उस ढ़ेर में दबवा दें । सूर्योदय होने पर जब सेनायें यहाँ से कूच करने लगें, उस समय रुद्रदत्त के शरीर की देख-रेख के लिए यहां विश्वस्त सैनिकों की एक टुकड़ी छोड़ जायें । मेरा विचार है कि सर्प अकस्मात ऊपर से नहीं गिरा होगा, इसमें भी किसी षड्यन्त्र की प्रतीति होती है ।"

"मेरा भी यही विचार है", मालव नरेश ने कहा ।

इतने ही में सैनिकों ने आकर सूचना दी कि घोड़े और सैनिक तैयार हो गये हैं । आयुर्वेदाचार्य कुछ कहे बिना अपने कार्य पर चल पड़े ।

"यह सर्प अवश्य ही किसी ने फेंका होगा", चालुक्य सामन्त ने सबके मन से उभर आते सन्देह को सामने लाते हुए कहा ।

"परन्तु किसने?" मगध सम्राट् ने पूछा ।

चिन्ता और शोक में डूबे महाबाहु ने अपने कन्धों को हिलाया । बाहर द्वार पर कुछ व्यक्ति किसी आवश्यक कार्य के लिए भीतर जाने की प्रार्थना करते सुनाई दिये । एक आवाज को पहचानकर मालव नरेश ने कहा, "मेरे दरबारी गुप्‍तचर श्रीकान्त हैं ! बुलाओ, ताकि पूछें कि राजधानी से ऐसे असमय में कैसे पहुंचे हैं ?"

एक चालुक्य सामन्त श्रीकान्त को बुला लाया । गठे बदन और गम्भीर चेहरे वाला युवक भी उसके साथ था । दोनों ने एक साथ प्रणाम किया और महाराज को प्रश्न करने का अवसर न देते हुए श्रीकान्त ने पूछा, "क्या अभी-अभी यहां कोई दुर्घटना हुई है ?"

"हाँ!" महाबाहु ने उत्तर दिया । तीनों महाराज तथा अन्य व्यक्ति आश्चर्य से गुप्‍तचर की ओर देखने लगे ।

बाहर पथरीले मार्ग पर दौड़ते हुए घोड़ों की टापें सुनाईं दीं ।

श्रीकान्त बोला, "संभवतया हमें क्षण-भर की ही देरी हो गई । परन्तु इसके लिए मैं दोषी हूं, मेरा साथी नहीं । आज से पांच दिन की बात है कि मालव में देशभक्त वीरों को सूचना मिली कि पदच्युत प्रधानमंत्री कारागार में बन्दी होते हुए राजद्रोही कार्यों में संलग्न है और बन्दीगृह का एक स्वामी शत्रु पहरेदार से राजदरबार की सूचनायें मंगवाता है और मालव नरेश पर भी प्रहार करने की कोई भीषण योजना बना रहा है । जांच करने पर यह बात सत्य प्रमाणित हुई है । इस युवक ने यह सूचना मुझे दे दी । मैंने इस काम पर अपने आदमियों को लगाकर पता निकाला कि कंवलनयन नामक एक व्यक्ति ने, जो प्रकटतया गलियों में स्त्रियों के श्रंगार की वस्तुएं बेचता है, नदी पर के एक वनवासी सपेरे को सेर भर चांदी देकर इस बात पर सहमत कर लिया है कि वह राज-राजेश्वर मालवधीश पर एक भयंकर विषैला साँप फेंककर उन्हें मार डाले । सम्भव है कि यदि सपेरे को यह ज्ञान होता कि कंवलनयन मालवाधीश को ही मृत्यु के घाट उतरवाना चाहता है तो वह उस दुष्कर्म के लिए तैयार न होता । परन्तु उस नीच ने सपेरे को बताया कि यह सांप एक कंजूस साहूकार पर फेंकना है जो धन के ढ़ेर को इकट्ठा किये बैठा है और उससे न स्वयं लाभ उठाता है, न किसी दूसरे को उठाने देता है । उसकी योजना थी कि वह किसी न किसी तरह राजप्रासाद में घुसकर यह सांप महाराज पर फिंकवाये, परन्तु उसे पता चल गया था कि मालव नरेश उत्तर-पश्चिमी मंडल में सेना की भर्ती के लिए जा चुके हैं । अतः कंवलनयन उसे छल कपट से इधर ले आया । जब सपेरा इधर आया तो उसे वास्तविकता का ज्ञान हो गया और वह स्पष्ट इन्कार कर गया । परन्तु नीच कंवलनयन ने जो इस काम को पूरा करने पर तुला हुआ था, सेर भर चांदी और देकर यह सांप सपेरे से खरीद लिया और उसे लेकर स्वयं इस ओर चल पड़ा । यदि हमें यह भी पता लग जाता कि वह यह कार्य स्वयं करेगा तो हम इधर आने में कोई देर न करते । किन्तु हम समझते रहे कि यह काम सपेरा ही करेगा । इस कारण वह जब तक हमारे लोगों की आंखों के सामने उपस्थित है तब तक कोई भय और शीघ्रता की बात नहीं है । परन्तु सारे तथ्य का ज्ञान हमें कंवलनयन के इधर चलने के डेढ़ पहर बाद हुआ । हमने तुरन्त घोड़े कसवाये और फुर्ती से इधर चल पड़े । मन्दिर की पिछली दीवार पर प्रकाश तो है किन्तु वहां प्रहरी नहीं खड़ा किया । यदि वहां प्रहरी होता तो निश्चय ही कंवलनयन वहां नहीं पहुंच सकता था । जब से इस राष्ट्रवादी के साथ मेरा परिचय हुआ है, मैं इसके साहस को देख देखकर चकित होता रहा हूं । किन्तु आज रात तो इस युवक ने अपने चमत्कार से मुझे और भी विस्मित कर दिया । हम अन्धाधुंध घोड़े दौड़ाते आ रहे थे । मेरी आंखें रात के डूबे अंधेरे मार्ग को देखती आ रही थीं कि अकस्मात् मन्दिर से चार सौ गज की दूरी पर इसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया और मन्दिर के कलश से चिमटी किसी वस्तु पर खींच मारा - "ईश्वर करे" वह युवक बड़बड़ाया, "सांप इसने अभी फेंका न हो ।"

"देखो-देखो !" मालव महाराज ने कहा ।

दो सरदार रक्त में लथपथ एक मृत शरीर को उठा लाये, बाण उसकी गर्दन से आर-पार निकल चुका था ।

मालव महाराज ने एक लम्बा सांस लिया, फिर राष्ट्रवादी युवक को प्रशंसा भरी दृष्टि से देखता हुआ बोला, "तुमने सराहनीय कार्य किया है, तुम्हें इसके लिए क्या दिया जाये ?"

"राजराजेश्वर, देशसेवा का प्रण लेते समय हमने देने का ही प्रण लिया है, लेने का नहीं । मैंने अपना कर्त्तव्य पालन किया है और कर्त्तव्य ही स्वतः अपना पारितोषिक होता है ।"

युवक के उस आदर्श की उच्चता इस प्रकार चमकी जिस प्रकार अंधेरी रात में कोई ज्योति जल उठती है ।

सब चुपचाप खड़े रहे । एक क्षण के लिए महाबाहु तथा धूमकेतु के चेहरों पर गौरव का अनुभव हुआ । फिर मिट गया । श्रीकान्त ने फिर पूछा, "आह! परन्तु राजराजेश्वर, मैं यह पूछना तो भूल ही गया कि सांप ने किसको काटा है और अब वह किस अवस्था में है ?"

मालव महाराज इस प्रश्न का उत्तर न दे सके । अन्य लोग भी चुप रहे । महाबाहु बोला, "श्रीकांत, इस विषधर ने हमारे आन्दोलन के संचालक श्री रुद्रदत्त को काटा है । वे मूर्छित हैं । उनका श्वास रुक गया है और नाड़ी थम गई है ।"

"ओह ! आह !!"

महाबाहु उन्हें धैर्य देते हुए बोला, "परन्तु घबराने की कोई बात नहीं है । हमारे आयुर्वेदाचार्य चार सैनिकों के साथ घोड़ों को सरपट दौड़ाते हुए औषधियां और मुहरे लाने गए हैं और कल सायं से पूर्व ही यहां आ जायेंगे । उन्होंने विश्वास दिलाया था कि वह श्री रुद्रदत्त को मरने न देंगे । हो सकता है कि तुमको इसकी सूचना मिल चुकी हो कि हूण सम्राट् मेहरगुल अपने सैनिकों के साथ आक्रमण के लिए चल पड़ा है । हमारी ओर से यह निश्चित हुआ है कि उससे दो पड़ाव के पश्चात् टक्कर ली जाये । इस कारण हमें सेनाओं को लेकर दिन निकलते ही यहाँ से कूच कर देना होगा । हमारे जाने के पश्चात् आप, यह युवक, मालव के राजवैद्य और मगध सेना के पचास सैनिक यहाँ रहेंगे । आयुर्वेदाचार्य के वापस आने तक तुम्हारा यह काम रहेगा कि रुद्रदत्त के शरीर की पूर्ण सावधानी से रक्षा करें और इसके पश्चात् भी, जब तक वह पूर्णतया स्वस्थ न हो जायें, उनकी देख-रेख करते रहें । आचार्य के आदेशानुसार अब रुद्रदत्त के शरीर को गोबर में दबा दिया जाये । इसके लिए पुजारी की पास वाली कोठरी ठीक रहेगी । भिक्षुणियां हमारे साथ जायेंगी । जब रुद्रदत्त की चेतना लौट आए और मृत्यु का भय टल जाये तो इसकी सूचना हमें युद्धक्षेत्र में भिजवा दी जाये ताकि हम निश्चिन्त होकर लड़ें । हम ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं । भगवान् ही हमारा सहायक होगा । अच्छा नमस्कार ! आइये श्रीमान् !"
 
युद्ध के लिए सजाये हाथियों की श्रृंखलाएं खनखनाईं और एक घोड़ा हिनहिनाया ।

रात की शेष घड़ियां शीघ्र ही बीत गईं । अभी उषा की लालिमा भी पूर्व में प्रकट न हुई थी कि महाबाहु तथा उसके वीर साथी शस्‍त्रों से लैस होकर कूच के लिये तैयार थे । एक भाग राजकीय सेनाओं के साथ रहने के लिए छोड़ दिया गया ।

चार विशालकाय युवकों तथा वेदान्ताचार्य के साथ महाबाहु भिक्षुणियों के तंबू पर पहुंचा, जिन्हें प्रातः साथ चलने की सूचना दी जा चुकी थी ।

महाबाहु ने आवाज लगाकर तंबू का पर्दा उठाया । भिक्षुणियां तैयार बैठी थीं । वह बोला, "पचास कजावों वाले ऊंट आपके लिए तैयार खड़े हैं, आप उन पर सवार हो जायें । मेरी इच्छा तो यही थी कि आप समरभूमि से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर ठहरें । फिर भी...."

वृद्ध भिक्षुणियां बोलीं, "हम रणभूमि में अवश्य आपके साथ चलेंगीं । हमने भिक्षुओं को त्याग और तप करते और मालायें फिराते तो देखा है किन्तु अब हमारे नेत्र इस दृश्य को भी देखना चाहते हैं कि किस प्रकार योद्धा अपने खड़गों से बिजलियाँ बरसाते हैं और अपने प्राणों की आहुतियां देते हैं । तुम बार-बार यही कहते थे कि देशसेवा सबसे बड़ी तपस्या है और घोर संग्राम में बोटी-बोटी कटकर मरने वाला सूरमा सबसे बड़ा तपस्वी है । हम चाहती हैं कि तुम्हारे इस कथन को साक्षात् रूप में देखें ।"

"अच्छा आओ ।"

मध्यम से प्रकाश में राष्ट्रवादियों के जत्थे क्रम से चल पड़े । भिक्षुणियों के सवार होने पर ऊंटों ने बिलबिलाकर रात के सन्नाटे को भंग किया और शुभ आशीर्वाद की भांति उषा की लाली उभर आई ।

कूच से थोड़ा समय पूर्व पचास युवक सरपट घोड़े दौड़ाते अन्धकार एवं शीत को रौंदते हुए उस प्रदेश की ओर आगे निकल गये जिस ओर शेष सेना ने जाना था । यह अग्रिम दस्ता था । यद्यपि जिस मार्ग से इन दस्तों ने जाना था वह आम रास्ता नहीं था, तदापि अग्रिम दस्ते के युवक मार्ग में यह प्रबन्ध करते गए कि उनकी सेना के कूच की सूचना शत्रु को किसी प्रकार भी न लगे ।

दिन को किसी घने वन में रुककर और रात को दिन के ठहराव की पूरी कसर निकाल देने वाली रफ्तार से चलकर महाबाहु अपने जत्थों को ऐसे स्थान पर ले गया जहाँ स्यालकोट और उस स्थान का अंतर लगभग एक जैसा ही रह गया था, जहाँ उसके अनुमानुसार भारतीय सेना तथा हूण फौज में टक्कर होनी थी । यहाँ पहुंचकर ज्ञात हुआ कि हूण फौज आज दोपहर यहाँ से होकर निकल गई है ।

इस स्थान पर जहाँ इन्होंने पड़ाव डाला था, एक ओर घने वन और दूसरी ओर टीले थे । कोई भी गाँव यहाँ से छः-सात कोस से कम की दूरी पर नहीं था । परन्तु उन गाँवों में रहने वाले भी हूणों के नाम से घर छोड़कर कहीं-कहीं भाग गये थे । अब दूर-दूर तक कहीं भी किसी प्राणी का नामोनिशान तक भी दिखाई न देता था । हूणों के गुप्‍तचर तथा सीमा के कुछ विद्रोही वहां अवश्य मौजूद थे किन्तु अग्रिम दस्ते के युवकों ने उन्हें बड़ी सावधानी से बन्दी बना लिया था । अब इस सेना की सूचना न किसी हूण को थी न ही किसी भारतीय को ।

रात को चारों ओर पहरा कड़ा करके पशुओं को चारा डालकर वीरों ने एक पहर तक नींद ली और फिर उठकर शौचादि से निपटकर भोजन बनाने की तैयारियां करने लगे । एक पहर में खा-पीकर तैयार हो गये । इनकी संख्या सवार तथा पदाति कुल मिलाकर साठ हजार थी । निश्चय यह हुआ था कि धूमकेतु तथा बहराम तीस हजार युवकों को लेकर हूण सेना पर पीछे से टूट पड़ें और शेष तीस हजार वीरों को लेकर महाबाहु हूण राजधानी स्यालकोट पर टूट पड़े और वहाँ हूण सम्राट् की बेगमों, सम्बन्धियों, राजकोष तथा शस्त्रागारों पर अधिकार करके उस ठिकाने को ही नष्ट कर डालें जहाँ से आक्रमणकारियों की यह आंधी उठ-उठकर विनाश और विध्वंस मचाती है ।

महाबाहु को अपने सैनिक अनुभव के आधार पर पूरी आशा थी कि यदि इसके बताए हुए ढंग से आक्रमण किए गए तो भारतीय सेना और पीछे जाने वाला राष्ट्रवादियों का दल हूण सेना को हरा देंगे । इधर वह आप हूण राजधानी को नष्ट करके उस पर अधिकार कर लेगा और पांच हजार युवकों को इसकी रक्षा के लिए छोड़कर शेष पच्चीस हजार के साथ वह फुर्ती से युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचेगा और वहाँ यदि परिस्थिति कुछ बिगड़ती दिखाई दी तो झट उसे जा संभालेगा । उसके ये अनुमान इतने ठीक थे जितनी प्रत्येक बार ठीक उतरने वाली कोई और बात हो सकती है ।

अब ढ़ील देने का समय नहीं था । उसने अपने वीरों को दो भागों में बांटकर और दूसरे आक्रमण का निश्चय करके ऐसा प्रतीत होता था कि इनका आधा समय किसी ने छीन लिया है । एक-एक क्षण अनमोल था । परन्तु कूच की आज्ञा देने से पहले महाबाहु ने अपने युवकों को अपना कर्त्तव्य निभाने और देश के लिए बोटी-बोटी कट मरने का साहस देने के लिए भाषण देना आवश्यक समझा ।

आज्ञा पाकर सारे युवक दो भागों में बंट गए, फिर अलग-अलग भागों के साथ अपने-अपने जत्थे के बीच में अपने सेनानायक का भाषण सुनने के लिए चुपचाप खड़े हो गए । महाबाहु एक ओर से होकर एक ऊँचे स्थान पर आ खड़ा हुआ । सेना में एकदम मौन छा गया । महाबाहु ने भाषण देना आरम्भ किया –

"वीर युवको ! जब से तुमने देशरक्षा के लिए अपना तन, मन, धन न्यौछावर करने का प्रण लिया है, मेरे अनेक भाषण तुमने सुने हैं । भारत का नाम संसार भर में ऊँचा और उज्जवल बनाने के लिए त्याग और बलिदान के मार्ग पर चलने की, तुमने अपने देश के देवताओं और महापुरुषों को साक्षी करके प्रतिज्ञायें की हैं । इसके लिए न तुम्हें किसी प्रकार का प्रलोभन दिया गया था न भय दिखाया गया था । यह देश तुम्हारा अपना घर है, और अपने घर के लिए किसी डर अथवा लालच से काम नहीं लिया जाता । जब किसी घर में आग लगाई गयी हो अथवा चोर, डाकू उसे लूटने के लिए आ गए हों, तो घर वाले उसे बचाने के लिए किसी लालच या डर के कारण अपने प्राण संकट में नहीं डाला करते । उसको बचाते हुए किसी पुरस्कार प्राप्‍त करने का विचार उनके मन में नहीं हुआ करता । आज हमारा देश अत्याचारी हूणों के आक्रमणों से नष्ट हो रहा है । कहीं देवालय गिराये जाते हैं, कहीं स्त्रियां भगाईं जाती हैं । कहीं बस्तियां लुटती हैं, कहीं गौएं कटती हैं । प्रत्येक ओर एक हाहाकार मचा हुआ है । धरती काँप रही है । जनता लहू के आँसू बहा रही है । अत्याचारी हूणों ने भारत के शान्तिप्रिय लोगों पर जो अत्याचार किए हैं, वह आज किसी से छुपे हुए नहीं हैं । उनको सुनकर कानों में छाले और हृदयों में छेद पड़ जाते हैं । उन्होंने हमारे दुधमुंहें बच्चों को बरछों की नोकों में पिरोया, हमारी सतवती सुहागनों की मांगों का सिन्दूर जूतों से पोंछा और हमारी बहिनों माताओं के सत चौराहों और बाजारों में भंग किए । आज हम शत्रु से उन अत्याचारों का बदला लेने के लिए, यदि बदले का शब्द हमारे पूर्वजों के आचार के अनुसार कानों को बुरा लगता हो, तो उन्हें दण्ड देने के लिए तैयार होकर जा रहे हैं । यदि हम सत्य पर हैं, यदि देश रक्षा ईश्वरीय कार्य है तो निःसन्देह हमारी विजय होगी और शत्रु के मृतक शरीर कफन और चिता के सम्मान से वंचित इस देश की धरती पर गीदड़ों और गिद्धों का ग्रास बनेंगे जहाँ उन्होंने आंधियां उठा रखी हैं । किन्तु एक बात तुमको भूलनी नहीं चाहिये कि तुम्हारी टक्कर उस युद्धकुशल जाति से है जिसकी फौजों ने आधी पृथ्वी के बड़े-बड़े सम्राटों को सिंहासनों से उठाकर मरणासन्न कर दिया है । हूण सिपाही न केवल युद्धकला में निपुण हैं अपितु शरीरिक दृष्टि से भी बलवान होते हैं । परन्तु इसकी तुलना में तुम्हारी पीठ पर देशभक्ति की ऐसी शक्ति विद्यमान है जिसके सम्मुख बड़ी से बड़ी शक्ति भी नहीं ठहर सकती । देशरक्षा के जोश के आगे लूटमार की इच्छा के पाँव जम नहीं सकते । हमने अपनी खडगों के बांध से न केवल शत्रु के बढ़ने को रोक देना है, अपितु उसके आक्रमणों को विफल बना देना है और उसे सदा-सदा के लिए नष्ट कर देना है । अपमानित हजारों देवियों की खून से रोती आँखों, और निरपराध मारे गए लाखों बच्चों और बूढ़ों के सड़ते हुए शवों का ध्यान रखकर मैं तुम में से आधे वीर युवकों के साथ हूण राजधानी स्यालकोट पर आक्रमण करता हूँ । शेष युवक हमारी राजसेना से लड़ती शत्रुसेना पर टूट पड़ें । मैं विश्वास दिलाता हूं कि विजय हमारी ही होगी ।"

भाषण समाप्‍त होते ही दोनों दल अपने-अपने निश्चित स्थानों की ओर चल पड़े ।

भारतीय सेना अभी बरसाती नदी के इस पार ही थी, कि गुप्‍तचरों ने सूचना दी कि हूण फौज दस कोस पर आ पहुंची है । मगध सेनापति जिसके हाथ में अपने राज्य की सेना के साथ-साथ मालव और चालुक्य सेनाओं की कमान भी थी, चाहता था कि यदि नदी को पार करके शत्रु से मुठभेड़ हो तो अच्छा है ।

नदी के उस स्थान पर जहाँ राजकीय सेनायें इस समय आ पहुंची थीं, न कोई पुल था, न नौकाओं का बेड़ा जिसमें चढ़ाकर सेनाओं को पार उतार दिया जाता । दो छोटी, पुरानी, निकम्मे नौकाएं, सम्भवतः मनु महाराज के काल की, दुर्बल रस्सी से बंधी थीं जिनमें तीस-तीस व्यक्तियों से अधिक एक बार न आ सकते थे और जिसके खेवट, चप्पुओं और बाँसों को कहीं छुपाकर सेना के भय से पता नहीं कहां भाग गए थे । नये प्रबन्ध का समय नहीं था । जो सामग्री पास थी, उसी से काम निकालना था । मगध के सेनापति ने बारह-बारह हाथी नदी के पाट से थोड़ा-थोड़ा अन्तर बीच में रखकर बिठा दिए । दोनों ओर बांसों समेत लिपटी हुई छोलदारियां और खम्बे एक किनारा हाथियों की पीठ पर और दूसरा नदी के तट पर रखवा दिए और इन पुलों पर से होकर पैदल सेना दूसरी ओर उतरने लगी ।

परन्तु न जाने गुप्‍तचरों से ही शत्रु की फौज का अन्तर बताने में कुछ गलती रह गई थी । न जाने हूण सिपाही ही साधारण मानवीय वेग की अपेक्षा हवा के पंखों पर उड़ते आ रहे थे कि अभी कोई दो हजार भारतीय सैनिक ही पार उतरे होंगे, हूण फौज के अग्रिम दस्ते, धूल उड़ाते सिर पर आ पहुंचे और अपनी निरन्तर विजयों और प्राकृतिक युद्धप्रियता के कारण आते ही इस बल से आक्रमण कर दिया कि एक बार तो भारतीय सेना का धैर्य डगमगा गया । दो सौ पग के अन्तर पर पहुंचकर उन्होंने अपने घोड़ों की बागें खींची, नीचे कूदे और घोड़ों का मुंह पीठ पीछे करके उनके पुट्ठों पर एक जोर का कोड़ा मार दिया, जिससे वह जिधर से आए, उधर की ओर हवा हो गए । सम्भवतः यह कोई निश्चित किया हुआ संकेत था, जिससे पीछे आने वाली विशाल सेना को पता लग जाए कि उनका अग्रिम दस्ता शत्रु से छुरी कटारी हो गया है और इन पर और पैदल सिपाही सवार होकर इनके साथ आ मिलें ।

अपने घोड़ों को उल्टा भगाकर वह आगे बढ़े । उनके सिरों पर लोमड़ी की खालों और समूरों के टोप, शरीरों पर बैल के चमड़े के खफतान, हाथों में लम्बे बरछे और चौड़ी ढालें थीं । चौड़े फल के कुल्हाड़े और खंजर कमरों से बंधे थे । इतना बिफर कर उन्होंने आक्रमण किया कि कि भारतीय सैनिकों को, जो नदी से पार उतर गये थे और शत्रु को आता देखकर जिनके सरदार उनको क्रम से खड़ा करने लगे थे, आधे से अधिक को मार, शेष को उठाकर नदी की धार में पटक दिया, जो तैरते-डूबते हाथियों समेत उल्टे किनारे की ओर हट आए ।

परन्तु हूण सैनिक सुस्ताना अथवा अपनी फौज की प्रतीक्षा करना नहीं जानते थे । बिफरे हुए दरिन्दों की भांति वे पानी में गिरे हुए भारतीय सैनिकों पर कूदे और एक हाथ से उन पर बरछों से वार करते और दूसरे से तैर कर पानी के बहाव को काटते हुए तट की ओर बढ़े । तट पर चढकर अपनी थोड़ी संख्या और शत्रु की टिड्ड़ी दल की चिन्ता किए बिना भूखे भेड़ियों की भांति पागल होकर उन पर टूट पड़े ।

मगध सेनापति इस अचानक आक्रमण से घबराने के साथ-साथ क्रोध के मारे आपे से बाहर हो गया । वह आक्रमणकारियों के छोटे से दल की इतनी वीरता और अपने सैनिकों की ऐसी घबराहट से झल्ला उठा, परन्तु इसके साथ ही उसने हूणों की बढ़ी आती सेना पर भी दृष्टि रखी ।

तट के पास पहुंचकर हूण सिपाहियों ने थोड़े गहरे पानी में पाँव जमाए और हाथों के बरछे सामने खड़े भारतीय सिपाहियों पर, जो इन पर तीरों की बौछार करने लगे थे, ताक कर मारे और आप कटि से खंजर निकाल, चौड़ी, चकोर अथवा तिकोनी ढ़ालें सामने करके किनारे पर चढ़ने लगे । इस समय वह कमाई हुई नीली इस्पात की खंजरें हाथों में पकड़े, उन्हें इस प्रकार फिरा रहे थे जैसे बिजलियाँ चमक रहीं हों ।

इन सिपाहियों की संख्या साधारण अनुमान के अनुसार चार हजार से अधिक न थी जिसके ऊपर, किनारे पर चढ़ने के संघर्ष में तट पर खड़े भारतीय सैनिकों का दस्ता बाण वर्षा कर रहा था । कुछ ने उन पर तेज धार के चक्कर भी फेंके । कितनों के खंजर पकड़े हाथ बाणों से कटकर पानी में जा गिरे और कितनों के कंधे और घुटने बिंध गए । वे बुरी तरह घायल होकर गिरे और लहू मिली लहरों में बढ़ते दिखाई दिए । फिर भी उन में से आधे तट पर चढ़ आए किन्तु भारतीय सेना का एक दस्ता दीवार बनकर उनके सामने आ गया । धनुर्धारी एक ओर हट गए थे ।

हूण चाहे कितने ही वीर थे परन्तु भारतीय सैनिकों की दुगुनी चौगुनी संख्या के सामने उनका कोई वश न चला । भारतीय सैनिकों ने उनको अपनी तलवारों की नोकों पर धर लिया । आधे वहीं खेत रहे और शेष धकेलकर नदी में गिरा दिए गए । इतनी देर में शेष सेना सिर पर आ पहुंची थी ।

हूण सेनापति को भी यह आशा न थी कि भारतीय सेनाएं इतनी निकट आ पहुंची होंगी । उसका अनुमान था कि नदी पार करके कोई कोस आगे जाकर कहीं मुठभेड़ होगी । उसने निश्चय किया था कि नदी के किनारे पहुंचकर उसके सिपाही दोपहर का खाना खायेंगे, घोड़ों और सांडनियों को भी दाना-चारा डाला जाएगा, इतने में सेनाओं का बेड़ा, जिसका उन्होंने कई दिन से गुप्‍त ढ़ंग से प्रबन्ध कर रखा था, तैरता हुआ आ पहुंचेगा । परन्तु अब एकदम शत्रु को सामने देखकर और नौकाओं को न पाकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । भारतीय सेनाएं रात की नींद को हराम करके मारा-मार करती इतनी दूर आ गई हैं, यह बात तो उसकी समझ में आ सकती थी, परन्तु नौकाओं के न मिलने का कारण उसकी समझ में न आया । यदि भारतीय सेनाओं ने उनको पकड़ लिया होता तब भी एक बात थी, किन्तु उनका तो नदी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कहीं चिह्न तक दिखाई न देता था ।
 
इस आश्चर्य को पहले इस गौरव के अनुभव ने दबाया, कि उसके हरावल दस्ते ने पूरी वीरता के साथ शत्रु के साथ टक्कर ली । फिर वह इस दुःख में बदल गया कि हरावल दस्ते के तीन चौथाई वीर मौत के घाट उतर गए हैं । यदि यह थोड़ा समय पहले पहुंच सकते, तो ...

हूण सेनापति ने आज्ञा दी कि पूरा रिसाला, नौ हजार का नौ हजार, तीन टुकड़ियों में बंटकर नदी को पार करे और जब वह दूसरे किनारे पर जाकर शत्रु पर आक्रमण करे तो उसकी ओट लेकर शेष फौज नदी को तैर कर पार कर जाए ।

दो-दो सौ की पच्चीस पंक्तियां बनाकर पाँच हजार बीच में और दो-दो हजार दायें-बायें फैलकर हूण रिसाले के वीर सिपाहियों ने सामने से आती तीरों और चक्कोरों की बौछारों को ध्यान में न लाते हुए अपने घोड़े वेग से बहती नदी में डाल दिये । आज्ञा पाकर पैदल सिपाहियों की एक भारी संख्या सवारों की रकाबें और घोड़ों दुमें थाम कर साथ हो गई ।

नदी के ऊँचे किनारे टूट-टूट कर फैल गए । उनके पास का पानी गदला हो गया । लहरों में झाग उठने लगे और पानी का तल ऊंचा हो गया ।

भारतीय सेना के धनुर्धरों के दस्ते इस बात पर तुल गए कि चाहे कुछ हो, शत्रु के सिपाहियों को तट पर पग रखने नहीं देंगे । वह इस फुर्ती से बाण चलाते थे कि आश्चर्य होता था । एक दस्ता दंदानों वाली धारों के चक्कर फेंक रहा था, जो एक से अधिक गर्दनें उड़ाते चले जाते थे । नदी के ऊपर तीर और चक्कर इस प्रकार छाए हुए थे कि धूप की किरणों को पानी की सतह पर पड़ने से रोक दिया था । इधर हूण घुड़सवारों, बल्कि सारी हूण फौज की सफलता इसी में थी कि रिसाला नदी पार करके भारतीय सेनाओं पर टूट पड़े । भारतीय सैनिकों ने रिसाले के सवारों के साथ-साथ उनके घोड़ों को भी बींध डाला । माथे थूथनियों पर अचूक बाण खा-खाकर घोड़े तड़पे, और उन्होंने सवारों को पानी में गिरा दिया । वे बेसुध और मूर्छित होकर बह गए । अब उस पार खड़ी हूण फौज अपने रिसाले की सहायता के लिए भारतीय धनुर्धारियों पर बाण बरसाने लगी । इससे उनको पर्याप्‍त सहारा मिला, यदि वह उनके पानी में उतरते ही बाणवर्षा आरम्भ कर देती तो इतनी हानि न होती ।

हूण सेना के बाणों की बाढ़ के मारे, भारतीय सैनिक उनके बाणों को काटते, बचाते, बाध्य होकर थोड़ा पीछे हटे । इतने में ही हूण घुड़सवारों की टुकड़ी तट पर आकर अंधाधुन्ध भाले चलाने लगी, और इसके साथ पार उतारे पैदल हूण सिपाही जिनके चमड़े के खफतानों से अभी तक पानी की बूंदें टपकती थीं, तलवारों से आग बरसाने लगे । इधर दाएं-बाएं की घुड़सवार टुकड़ियाँ और उनकी सहायता से पार पहुंचे हुए पैदल सिपाहियों ने भारतीय सेना में पहलुओं पर चोट करके उसके ऊपर घेरा डालने का प्रयत्‍न किया । इधर इस उलझाव से लाभ उठाकर शेष हूण फौज भी तैरती हुई पार आने लगी ।

घुड़सवारों के साथ पार उतरे पैदल हूण अपने रिसाले से हटकर अपनी तलवारों के हाथ दिखा रहे थे । परन्तु रिसाला जो विनाश कर रहा था, वह असह्य था । वह इस प्रयत्‍न में लगा था कि भारतीय सेना को दो भागों में बांट देने के लिए बीच में दरार को अधिक चौड़ी करके भारतीय सेना की शक्ति को तोड़ डाले । वह रोष के साथ जयकारे लगाता और बरछे चलाता प्रलय मचाने लगा । परन्तु मगध के सेनापति की युक्ति ने इनके रोष को मिट्ती में मिला दिया । इसकी आज्ञा पाकर दो सौ सैनिक हाथी जिन पर निडर धनुर्धारी सवार थे, दीवार बनकर उनके सम्मुख आ डटे । तुर्किस्तान और अरबी घोड़ों से कालपी और आसाम की चट्टानें ट्कराने लगीं ।

रिसाले की शक्ति को असफल होते देखकर, दाएं-बाएं आक्रमण करने वाली टुकड़ियां अपने स्थानों से हटकर इससे आ मिलीं और उनकी कतारें एक के पश्चात् एक हाथियों के दस्ते पर लगातार आक्रमण करने लगीं । परन्तु पहाड़ों जैसे सैनिक हाथी अपने स्थानों से न हटे । बरछों और बाणों के प्रहारों की परवाह न करते हुए अपने पाशविक आवेश में आकर घुड़सवारों को सूंडों में पकड़-पकड़ कर हवा में उछाल दिया । दानवाकार भारतीय पशुओं ने डटकर तुर्किस्तानी घोड़ों को धकेल-धकेल कर गिराया और कुचल डाला । इनकी स्तम्भों जैसी टांगें शत्रु के घोड़ों और सवारों के लहू से लथपथ हो गईं । उन पर उनके मांस की बोटियां चिमट गईं और आंतड़ियों के रस्सों के समान लिपटती टूटती गईं । निकट था कि रिसाला बुरी तरह हार खाकर पीछे हटे, कि इनकी शेष फौज स्थान-स्थान से नदी को पार करती दल बादल की भाँति तट पर चढ़ आई और इसका बड़ा भाग अन्य स्थानों पर आक्रमण करने की अपेक्षा हाथियों के दस्ते पर ही टूट पड़ा । उनकी इच्छा थी कि उसे चारों ओर से घेरकर बीच में ले लें और जिस प्रकार बन पड़े, उसे समाप्‍त कर डालें ।

हूण सेनापति, जो इस भाग की कमान करता था, सम्भवतः यह समझता था कि यदि वह हाथियों को समाप्‍त कर सका तो शेष हिन्दुस्तानी सेना जी छोड़कर हथियार डाल देगी । चाहे कुछ हो, हूण फौज का सारा बल अब हाथियों के इस दस्ते को नष्ट करने पर लग रहा था ।

हूण सिपाही अपने देश के भूखे भेड़ियों की भाँति खूंखार बनकर आक्रमण कर रहे थे । हाथी यद्यपि एक-एक हल्ले में बीस-बीस को कुचल डालते थे । परन्तु उनके आक्रमण का जोर भी न घटता था । एक परा टूटता था, तो दूसरा उसका स्थान ले लेता था, एक दस्ता घायल होकर पीछे हटता था तो दूसरा आगे आ जाता था । उन्होंने अपनी तलवारों से कितने ही हाथियों की सूंडें काट डालीं, कुल्हाड़े और गदाएं मार-मारकर उनके सुन्दर दांत जिन पर सोने की चूड़ियां चढ़ीं थीं, तोड़ डाले और आँखों और पेटों में बार-बार बरछे भौंके ।

यद्यपि हाथी अब भी शत्रु के लिए यमदूत सिद्ध हो रहे थे, परन्तु मगध सेनापति को अनुभव हो रहा था कि इनके प्राण संकट में हैं । यदि इनको शीघ्र ही युद्धक्षेत्र से न हटा लिया गया तो मौत से भिड़ जाने वाले बर्बर हूणों का टिड्डी दल प्रत्येक प्रकार की हानि की चिन्ता किए बिना उनको समाप्‍त कर डालेगा ।

परन्तु क्या ही अच्छा था कि यह विचार उसको थोड़े समय पहले आ गया होता । हाथियों के समरांगण से हटाए जाने का ठीक समय वह था, जब शेष हूण फौज इधर आने के लिए नदी में उतरी थी । उसने अपने विशेष सैनिकों को आज्ञा दी कि वह हूण सिपाहियों को पीछे हटा दें जो हाथियों के चहुं ओर घेरा डालने के प्रयास में आसपास के भारतीय दस्तों को चीरते, ऊपर से होकर एक धनुष के रूप में दोनों ओर से बढ़े आ रहे थे । परन्तु यह विशेष सैनिक हूण तलवारों की बिजलियों को न रोक सके । वह शत्रु के साथ वीरता के साथ टकराए अवश्य, किन्तु भारी प्राण हानि उठाने के पश्चात् बुरी तरह घायल होकर पीछे हटे । इतने समय में हूणों ने झट हाथियों के गिर्द घेरा डाल लिया और वह पहले से दस गुनी कठोरता और भयानकता से उन पर आक्रमण करने लगे ।

हाथियों के पूरे दस्ते का मारा जाना सैनिक दृष्टिकोण से एक ऐसी हानि थी जिसकी न केवल इस समय युद्धक्षेत्र में कमी पूरी होनी ही असम्भव थी, बल्कि जिससे, ईश्वर न करे, पराजय की सम्भावना भी उत्पन्न होती थी । दूसरी ओर शत्रु की पैदल फौजें भारतीय सेनाओं पर अंधाधुंध प्रहार कर रहीं थीं । दूर तक फैले हुए समरांगण में शत्रुदल की संख्या पचहत्तर हजार से किसी प्रकार कम प्रतीत न होती थी । क्या किया जाए ? एक क्षण के लिए जैसे मगध सेनापति का मस्तिष्क बेकार सा हो गया । वह मगध सम्राट् और मालव महाराज के साथ एक ऊँचे टीले पर खड़ा था ।

"यदि हाथी मारे गए सेनापति ?" मगध सम्राट् ने पूछा ।

"तो बहुत बुरा होगा पृथ्वीनाथ !"

मालव नरेश ने याद दिलाया, "हमारे वह दस हजार राष्ट्रवादी युवक उस टीले के पीछे आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े हैं । उनके युद्धक्षेत्र में बुलाने के लिए इससे उपयुक्त समय और कौन सा आएगा ?"

"आह !" मगध सेनापति ने कहा, "उनका तो मुझे ध्यान ही न था ।"

आवश्यक आदेश लेकर कई घुड़सवार राष्ट्रवादी नवयुवकों को युद्धक्षेत्र में लाने के लिए गए । जैसे किसी को भिड़ों का छत्ता आ चिपटता है, उसी प्रकार एक-एक हाथी पर सौ-सौ रोष से बिफरे हुए हूण गदाओं, बरछों और तलवारों से प्रहार कर रहे थे । यद्यपि होदों में बैठे भारतीय धनुर्धारी ऊपर तीर बरसा रहे थे, परन्तु बाणों की बौछार उनको परे हटाने में असफल सिद्ध हो रही थी । यदि एक हूण मरता तो चार उसका स्थान ले लेते थे । सामने के हाथियों का बुरा हाल हो रहा था । होदों से ढकी पीठों को छोड़कर उनके शरीर का कोई अंग घायल होने से न बचा था । उनसे वह कष्ट सहा नहीं जा रहा था । वह चीखने लगे थे ।

इनके सवार पीछे से होदों में कूदे और महावतों ने हथौड़ों से लोहे की नौकीली सीखें विवश हुए हाथियों के मस्तिष्कों में ठोक दीं । हाथी बेसुध होकर गिरे, और बीसियों हूणों को नीचे दबा लिया ।

राष्ट्रवादी युवकों का दल वृक्षों से ढके एक टीले की ओट में दूर पीछे तक फैला खड़ा था और इस बात से दुःख अनुभव कर रहा था कि इन्हें क्यों देश के शत्रु के विरुद्ध खड़ग के जौहर दिखाने का अवसर नहीं दिया जाता । वह ओट में खड़ा युद्धक्षेत्र स्थिति को देख रह था, परन्तु विवश था । अब जो इसे युद्धक्षेत्र में कूदने की आज्ञा मिली तो वह अपने नायक की कमान में, घात से निकलकर हाथियों के दस्तों पर आक्रमण करने वाली हूण टोलियों पर सहसा टूट पड़ा ।

मगध का सेनापति जो श्री महाबाहु के इन युवकों को अनाड़ी और अनुभवहीन बताकर किसी खातिर न लाता था, अब जान गया कि देश के लिए मर-मिटने वाले किस प्रकार के लड़ाके हैं । जिस प्रकार सूर्य की किरणों से बादल फट जाते हैं, उसी प्रकार इनके तूफानी आक्रमण से हूण सिपाहियों की वह जत्थाबन्दी, जिसने हाथियों को घेर रक्खा था, टुकड़े-टुकड़े हो गई । बीच में स्थान छोड़कर उन्होंने हाथियों के अधिकारियों को कहा कि वह जीवित बचे हाथियों को बाहर निकाल ले जाएं । उसने वैसा ही किया । उन्नीस हाथी मर चुके थे और इकत्तीस बुरी तरह घायल होकर चीख रहे थे । इनके महावतों को मौत ने इतना अवकाश नहीं दिया था कि इनके मस्तिष्क फाड़कर उन्हें घावों की पीड़ा से छुड़ा दें और मौत की ठंडी नींद सुला दें ।

हाथियों को घेरे से बाहर निकलते देखकर हूण असफलता के अपमान और क्रोध की दोहरी आग से जल उठे । बचे-खुचे घायल हाथियों को उन्होंने मार गिराया और राष्ट्रवादी युवकों पर टूट पड़े जो उनकी असफलता के कारण बने थे । उन्होंने चारों ओर से सिमट कर उन पर धावा कर दिया और हाथियों की भांति उनको घेरे में लेने के लिए संघर्ष करने लगे । परन्तु मगध सेनापति इन वीरों को जिन्होंने एकदम युद्ध का पासा पलट दिया था, खोना न चाहते थे । उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि जैसे भी हो, उनको हूणों के घेरे से बचाया जाये । अब दोनों ओर की दूर तक फैली हुई पंक्तियाँ एक समूह-सा बनाकर एक दूसरे के शीश उड़ाने लगीं और युद्धक्षेत्र सिमट गया ।

परन्तु इतनी बड़ी सेनाओं के लिए यह युद्धक्षेत्र बहुत छोटा था । अपने ही सैनिकों के वार अपने आदमियों को लग सकते थे, इसलिए राष्ट्रवादी दल के दक्ष और रणधीर नायक ने अपने सिमटे और घिरे हुए युवकों को फैल जाने की आज्ञा दी । वह तलवारों से आग बरसाते दाएं-बाएं फैल कर प्रलय मचाने लगे ।

हूण बादशाह मेहरगुल और उनका सेनापति चकित थे । उन्हें आशा न थी कि भारतीय इतने वीर और लड़ाके हो सकते हैं । उन्होंने ईरान तथा तूरान की अनगिनत फौजों को इससे भी आधी सेना के साथ अनेक बार हराया था । भारतीयों की सफल वीरता का दूसरा अर्थ था हूण आक्रमणकारियों का अपमान और हूण साम्राज्य का विनाश । हूण वीरता का हिन्दुस्तान के युद्धक्षेत्र में चौपट हो जाना सहन नहीं किया जा सकता था । उन्होंने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि अपने प्रहारों की तेजी को और बढ़ा दें, कुछ अतिरिक्त फौजी दस्ते युद्धक्षेत्र में झोंक दिये ।

अब एक-एक हूण सिपाही आग का गोला होकर प्रहार करने लगा और घमासान युद्ध आरम्भ हो गया । तलवारों के वारों से कटे हुए मुण्ड हवा में उछलते थे । लहू की उड़ती हुई छींटों से आसपास का आकाश लाल हो रहा था । दृष्टि सीमा तक फैले हुए समरांगण में तलवारें बिजलियों की भांति चल रहीं थीं । मरने वालों का लहू और चर्बी लड़ने वालों के टखनों और पिंडलियों तक आ रहे थे और यह बह-बह कर बरसाती पानी के सदृश नालियां बनाता नदी में गिरता था । वायु में प्रत्येक वस्तु को लपेट ले जाने वाली मौत की गन्ध उत्पन्न हो रही थी । लड़ाके सूरमा मृत सिपाहियों के शवों के ढेरों पर से होकर एक-दूसरे पर चोट करते थे और इन ढेरों की संख्या असंख्य होती जाती थी । बार-बार उठते नारों और जयकारों से आकाश गूंज रहा था ।

ऐसा लगता था कि दोनों फौजों के सिपाहियों के मस्तिष्क में अब वीर कायर, दुर्बल बलवान, हूण हिन्दू का विचार निकल गया है । मार देने और मर जाने का पागलपन उनके सिरों पर सवार हो गया है । भयानक से भयानक युद्ध में घुस जाने, कड़े से कड़े घेरे को तोड़ डालने के लिए उन्होंने अपने प्राणों को दाव पर लगा दिया था ।

दोनों फौजें एक दूसरे पर टूट पड़ती थीं । आन की आन में सैंकड़ों योद्धा कटकर मौत के घाट उतर जाते थे परन्तु दोनों सेनायें अपने स्थान से हटने का नाम न लेतीं थीं । उनमें थरथरी, मोड़, झुकाव अवश्य उत्पन्न होते थे परन्तु खलबली मचती दिखाई न देती थी ।

दोनों सेनाओं के सेनापति और सम्राट् अपने योद्धाओं की वीरता और साहस प्रदर्शन के दृश्य में इतने मग्न थे कि यदि उन पर कोई पीछे से प्रहार करने के लिए आता, तो सम्भवतः वह न चौंकते ।

परन्तु धीरे-धीरे अज्ञात ढ़ंग से, किन्तु वास्तव में ऐसा अनुभव होता था, कि भारतीय सेनायें पीछे हट रही हैं । यद्यपि वह चप्पा-चप्पा धरती के लिए घोर संग्राम कर रहीं थीं परन्तु लगता था कि हूण आगे बढ़ रहे थे । चिन्ता की गहरी छाया मगध सेनापति और भारतीय नरेशों के हृदयों तक छाने लगी ।

सब कई क्षणों तक गहरी सोच में डूबे रहे । हूण फौजों का दबाव लगातार बढ़ता रहा ।

"क्या सोच रहे हो सेनापति ?" मगध सम्राट् ने पूछा ।

सेनापति के चेहरे पर उदासी फैलती प्रतीत होती थी । उसने अपने धैर्य को स्थिर रखने की चेष्टा करते हुए उत्तर में सम्राट् से प्रश्न किया, "पृथ्वीनाथ क्या सोच रहे हैं ?" उसके इस कथन में घबराहट थी ।

"पहले तुम बताओ ।" सम्राट् ने आज्ञा दी । सम्राट् के शब्दों में गजहठ के साथ एक और भाव भी झलक रहा था अन्तिम दाव खेलने वाली वीरता, आत्म-बलिदान - इन दोनों में से न जाने कौन सा ?

"मैं आपकी सेवा में यह निवेदन करने के लिए सोच रहा था कि युद्ध का रंग-ढंग कुछ बिगड़ता दिखाई दे रहा है । इसलिए आप मालव महाराज और चालुक्य सरदार को लेकर युद्धक्षेत्र से निकल जाएं और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच जायें । हम यहाँ जी तोड़कर शत्रु से लोहा ले रहे हैं । यदि विजय प्राप्‍त हुई तो ठीक है । परन्तु यदि ईश्वर न करे ....."

"और हूणों से सन्धि का विचार भी तुम्हारे मन में आया हो..." सम्राट् ने पूछा । उनकी आँखों में लाली थी, उस लाली से भिन्न जो युद्धक्षेत्र के रक्तमय रंग से उत्पन्न हुई हो ।

सेनापति बोला, "सन्धि का विचार आया अवश्य था परन्तु इसे परे हटा देना पड़ा क्योंकि मालव महाराज ने सन्धि का वचन देकर उसे तोड़ दिया है । इसलिए अब हूण सम्राट् इस बारे में हमारे शब्दों पर विश्वास न करेगा ।"
 
घोड़े पर चढ़े मगध सम्राट् की छाती तन गई और मूंछें ऊपर को उठ गईं । वह अपने सेनापति की ओर धूल-भरी दृष्टि से देखता हुआ बोला, "अब सुनो मैं क्या सोच रहा था । मैंने निश्चय किया है कि मालव महाराज और चालुक्य सरदार मेरा साथ दें तो ठीक, नहीं तो मैं अकेला अपने संरक्षक दस्ते को लेकर युद्धक्षेत्र में कूद जाऊं । विजय यदि नहीं मिलती तो आत्म-बलिदान दे डालूं । देश की रक्षा हेतु लड़ता-लड़ता अपने प्राणों की आहुति दे डालूं । भारतीय जनता के हजारों सपूतों को गाजर मूली की तरह कटवाकर यदि हम तीन सम्राट् अपने प्राण बचाकर समर भूमि से टल गए तो प्रजा यह कहेगी कि यह धर्मयुद्ध नहीं था, केवल अपने राज्य और रंगरलियों को बनाए रखने के लिए राजाओं ने स्वार्थ की लड़ाई लड़ी थी ।"

"पृथ्वीनाथ !" मगध सेनापति बोला, "राजनीति के दृष्टिकोण से यह आत्म-बलिदान नहीं, आत्महत्या है । यदि हम यहाँ से बचकर चले गए तो यहाँ की हार को किसी और समय जीत में बदल सकेंगे । हम इससे दस गुणी सेनाएं भरती करेंगे । अब हमारे साथ दो राजा हैं, फिर हिन्दुस्तान के दस-बीस राजाओं को अपने साथ मिलायेंगे । इस युद्धक्षेत्र के अनुभव से अपनी सैनिक तैयारियों की त्रुटियाँ दूर कर लेंगे ।"

मालव महाराज मगध सम्राट् से बोला, मैं स्वयं आप के साथ युद्ध में कूद जाना चहता हूं । देखिये ! श्री महाबाहु के राष्ट्रवादी युवक किस प्रकार चप्पा-चप्पा धरती के लिए भयानक साके कर रहे हैं । क्या मरते समय एक राजा को एक सिपाही से अधिक पीड़ा होती है ? सुख की सेजों पर तो राजा सोए, और बाणों की शैया पर जनता के युवक लेटें, धिक्कार है ऐसे राज्य को ।"

चालुक्य सामन्त बोला, "हारकर बच निकले वालों के चेहरों पर प्रकृति का एक-एक कण फटकार भेजता है । फटकारी और दुतकारी हुई आत्माएं लोक परलोक में सुख नहीं पातीं । मैं रणभूमि से हटकर कहीं नहीं जाऊंगा ।"

मगध सम्राट् बोला, "सेनापति, सेना की कमान मालव महाराज को दे दो और तुम समरांगण से अपने दो विश्वस्त अधिकारियों को लेकर निकल जाओ । मैं यह आज्ञा क्रुद्ध होकर नहीं देता, बल्कि प्रसन्नता से देता हूँ । यदि हम हार गए तो जैसा कि तुम ने कहा था, दस गुनी सेना भरती कर लेना और हिन्दुस्तान के दस-बीस और राजाओं को साथ मिलाकर शत्रु से टक्कर लेना ।"

"पृथ्वीनाथ !" मगध सेनापति बोला । उसकी आवाज में थरथराहट थी । "मैंने सावधानी और दूरदर्शिता के विचार से निवेदन किया था, नहीं तो ...." इससे अधिक वह कुछ न कह सका । राजाओं के प्रकट हुए विचारों से चोट खाकर उसके वीरता और बलिदान के भाव जाग उठे । उसने अपनी तलवार सूती और घोड़े की बाग पकड़ता हुआ बोला, "आइए देखें, मेहरगुल की गर्दन को पहले किसकी खड़ग छूती है ?"

अपने सेनापति और राजाओं को रणक्षेत्र में कूदते देखकर भारतीय सेना का दबता हुआ उत्साह पुनः प्रचण्ड हो गया और उनकी खड़गें फिर विध्वंसकारी वार करने लगीं और हूण दबाव में आ गए । उनके प्रचण्ड वारों का प्रहार खाकर हूणों का दल अपने स्थान पर रुक गया । परन्तु यह रोक थोड़े समय तक ही विद्यमान रही ।

यद्यपि हूण सेनापति पर्याप्‍त समय से मैदान में लड़ रहा था, परन्तु हूण सम्राट् मेहरगुल, मध्य एशिया का वह खूनी दरिन्दा जो कहा करता था कि मैं खुदा का कोड़ा हूँ और अपराधी जातियों को दंड देने के लिए धरती पर उतारा गया हूँ, अभी तक युद्ध में नहीं कूदा था । भारतीय राजाओं को युद्ध में उतरते देखकर पाशविक आवेश में उसने अपनी चार हाथ लम्बी खड़ग सूती और रनवीश अशरफ के दो हजार अनुभवी वीर सिपाहियों को साथ लेकर भारतीय सूरमाओं के परे के परे साफ करता, पंक्तियों में दरारें डालता, रौंदता, कुचलता आगे बढ़ने लगा । इस साक्षात काल का मगध सेनापति ने केवल कुछ क्षण सामना किया, फिर वह बुरी तरह घायल होकर गिर पड़ा । पचासों घोड़े और सैनिक उसके शव को कुचलते, रौंदते ऊपर से निकल गए । परन्तु मालव महाराज ने उसका बदला ले लिया, उसने एक भरपूर बाण मारकर हूण सेनापति की गर्दन उड़ा दी ।

मेहरगुल मगध सम्राट् को मौत के घाट उतारकर भारतीय सेना के पैर उखाड़ देना चाहता था और मगध सम्राट् के दिल में हार जीत का विचार भुलाकर एक बार मेहरगुल से दो-दो हाथ करने की तीव्र इच्छा भड़क रही थी । दोनों पूरा जोर लगाकर एक दूसरे के सिर पर जा पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे थे । दो जातियाँ एक दूसरे की शत्रु, दोनों में से एक को मिटा देने पर तुली हुईं थीं । राक्षस जैसे डील वाला हूण सम्राट् भयंकर और खूनी, मतवाले हाथी की भांति बढ़ा आ रहा था परन्तु मगध सम्राट् छोटे और पतले शरीर वाले भूखे सिंह के सदृश देश रक्षा और कर्त्तव्य के जोश में भरकर अपने शत्रु पर झपटना चाहता था । दोनों ओर की सेनाएं जानती थीं कि यह टक्कर बहुत कड़ी और भयानक होगी और इसका परिणाम युद्ध के भाग्य का निर्णय कर डालेगा । मेहरगुल और उसके असंख्य दस्तों के प्रहारों की रोक के लिए बचे खुचे राष्ट्रवादी युवकों ने अपनी चौड़ी छातियों की दीवार बना दी और उनकी खडगें हूण की आग के मुकाबले बिजलियां बरसाने लगीं । किन्तु हूण फिर पहले की भाँति आगे आने लगे और भारतीय सेना के पाँव उखड़ते दिखाई देने लगे । परन्तु इस समय तक सहायता, जिसने आना था, आ ही पहुँची ।

धूमकेतु के पैंतालीस हजार ताजादम राष्ट्रवादी युवक नदी की ओर से अचानक युद्धक्षेत्र में आ कूदे ।

उड़ती हुई धूल में जब वह नदी के पास पहुंचे थे, तो ठीक उस समय नौकाएं लाने के लिए भेजा हुआ आलस्यगामी हूण अधिकारी दो सौ नौकाओं का बेड़ा लिए आ पहुँचा । उन्होंने अपनी फौजों और भारतीय सेनाओं को तो उस पार लड़ते देख लिया था परन्तु दूसरी ओर से आने वाले भारतीय राष्ट्रवादी दस्तों को उन्होंने यही समझा कि यह उन्हीं की कुमक है । निकट आने पर जब उन्हें पहचाना, तो इससे पहले कि वह नौकाओं को आगे निकाल ले जाए अथवा डुबो दे, इन दस्तों ने सहसा हमला करके हूण अधिकारियों को मार डाला, खेवटों को पानी में पटक दिया और स्वयं नौकाएं खेते पार उतर आए । लड़ने वालों ने भी नौका वालों की भाँति इनको अपने कुमक समझा । इस ओर से और आ भी कौन सकता था ? किसको संभावना थी कि भारतीयों के दल इस ओर से भी आ सकते हैं ?

राष्ट्रवादियों के इन दस्तों ने युद्ध का पासा पलट दिया । कुमक आते देखकर भारतीय दलों का डूबता हुआ साहस फिर उभरा, और वह फिर जमकर वीरता से लड़ने लगे ।

मरने वाले हूणों की संख्या एकदम दुगुनी, चौगुनी, दस गुनी हो गई थी, अब तो सौ गुणी तक पहुंच गई । अब समरांगण में केवल बारह सौ शाही दस्ते के हूण अपने बादशाह के प्राणों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे ।

"आह नीच !" मगध सम्राट् और मालव महाराज ने अपनी तलवारें रोक लीं ।

मेहरगुल ने सन्धि का झंडा ऊँचा कर दिया था । "हम भारतीय शूरवीरों से प्राणों की भीख मांगते हैं", हूणों का दोभाषिया ऊँची आवाज में बोला ।

"रण में बर्बरों का वध कर डालो ।"

"सन्धि के बहाने बचकर निकल जाने वाले शत्रु को जीवित न छोड़ो ।" राष्ट्रवादी अधिकारी चिल्लाए ।

परन्तु सन्धि की प्रार्थना को ठुकरा देना मगध कुल के सम्राटों की वीरता की नीति के विरुद्ध था । उसने आज्ञा दी कि युद्ध बन्द करने का रणसिंघा बजा दिया जाए ।

एक शब्द पीतल के वाद्ययंत्र से निकला और बिजली की भांति चलने वाली तलवारें अपने स्थान पर रुक गईं । रुकते-रुकते भी राष्ट्रवादी युवकों ने सात सौ हूण उड़ा दिए ।

राष्ट्रवादी युवकों का एक और दल जो स्यालकोट को जीतकर लौटा था, श्री महाबाहु की कमान से दिनों के पड़ाव घंटों में मारता आ पहुंचा और नौकाओं द्वारा झट नदी पार करके अपनी सेना से आ मिला । महाबाहु ने आवाज दी, "मगध सम्राट् ! शत्रु की सन्धि की प्रार्थना स्वीकार न करें ।"

मेहरगुल ने आगे बढ़कर पहले मगध सम्राट् के चरणों को छुआ, फिर मालव महाराज और चालुक्य सामन्त के । इसके पश्चात् वह महाबाहु और धूमकेतु के चरणों की ओर बढ़ा परन्तु महाबाहु क्रोध और घृणा से एकदम कई पग पीछे हट कर बोला, "दूर रहो" । उसका हाथ अपनी खड़ग के मूठ की ओर गया ।

"जी महाबाहु ।" मगध सम्राट् उदारता की मूर्ति बना हुआ बोला, "मैंने इसको प्राणदान दे दिया है और चरणों पर गिरे शत्रु पर प्रहार करना मगध के क्षत्रिय सम्राटों के धर्म के विरुद्ध है ।"

"सम्राट् ! आप धर्म के नाम पर अधर्म कर रहे हैं । इस मानवता के कलंक और प्रकृति के फोड़े को, जिसने लाखों स्त्रियों के सुहाग उजाड़ दिए, करोड़ों बच्चों को अनाथ बना डाला, इस महाराक्षस को, जिसकी आज्ञा से इसकी राक्षसी सेना ने हजारों सतवंतियों के सत तोड़े और लाखों गौओं के गले काटे, क्षमा करना और जीवित छोड़ देना भारी भूल है । मैं और मेरे साथी इसका कड़ा विरोध करते हैं ।"

"महाबाहु ! मैं तुम्हारे विरोध और अपनी भूल को मानता हूँ । परन्तु मैंने इसकी सन्धि की प्रार्थना स्वीकार कर ली है । तुम अच्छा न समझोगे कि एक क्षत्री अपने दिए वचन से फिर जाए ।"

परिस्थिति ऐसी थी, जिसमें थोड़ी सी हठ आपस का ही बिगाड़ खड़ा कर देती । दूरदर्शी महाबाहु ने इसे बिगड़ने का अवसर न दिया ।

मेहरगुल ने अपना पटका खोलकर गले में डाल लिया । अपराधियों की भाँति वह कुछ बोला जिसे दुभाषियों ने दोहराया ।

"हूण सम्राट् कहते हैं कि प्राणदान दिया जाए । हम आपके देश हिन्दुस्तान को छोड़कर अपने देश को लौट जायेंगे । हमें केवल स्यालकोट तक जाने की आज्ञा मिल जाए जहां से हम अपनी बेगमों को साथ ले सकें । हम किसी प्रकार का धोखा नहीं करेंगे । हमारे साथ चाहे अपनी सेना की दो टोलियां भेज दीजिए ।"

महाबाहु बोला - "अब तो तुम हिन्दुस्तान से निकलोगे ही । न निकलोगे तो ढूंढ-ढूंढ कर समाप्‍त कर दिए जाओगे । स्यालकोट में अब तुम्हारा क्या रखा है ? उस पर हमारे राष्ट्रवादी युवकों का अधिकार हो चुका है और भारत का झंडा उस पर लहरा रहा है । तुम अपनी बेगमों और शहजादियों को सुरक्षित अवस्था में अपने देश ले जाना चाहते हो, जबकि हमने स्यालकोट के गढ़ में से सात हजार भगाई हुई युवा लड़कियां तुम्हारी कैद में से निकाल ली हैं जिन्हें तुम लोगों ने बलात्कार करके अधमुई बना डाला था ? इन देवियों के अपमान का बदला लेने के लिए एक बार जी में आया था कि तुम्हारी बेगमों और शहजादियों को जनता में बांट दूं जिससे दूसरी जातियों के सम्मान लूटने वाले राक्षस हूणों को पता लग जाए कि उनके सम्मान और गौरव को भी नष्ट किया जा सकता है । परन्तु हमारे युवक इतने गिरे हुए चरित्र के नहीं हैं । हम युद्धक्षेत्र में सन्मुख लड़ने आए हजारों की अपेक्षा लाखों शत्रुओं को मौत के घाट उतार सकते हैं किन्तु संसार भर को मानवता और उच्चता का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति के समर्थक होते हुए हमारे युवक ऐसा नीच कार्य नहीं कर सकते । तुम्हारी स्त्रियां, बहिनों और बेटियों की भांति हमारी देखरेख में सुरक्षित हैं । तुम्हारे यहां से जाने के पश्चात् उन्हें तुम्हारे पीछे-पीछे तुम्हारे देश को भेज दिया जाएगा ।"

"हम भारतीयों के ऊंचे शिष्टाचार की प्रशंसा करते हैं । आपने हमें और हमारे बाल-बच्चों को प्राणदान दिया, इसके लिए तुम्हारा कोटि-कोटि धन्यवाद । हम कश्मीर और लद्दाख के मार्ग से जायेंगे ।"

पता नहीं कब दिन ढ़ला, पता नहीं कब सूर्य पश्चिमी क्षितिज को छूने लगा ।

सब के पांव को एक बार और छूकर, मार खाए हुए कुत्ते की भांति हारा हुआ हूण सम्राट् मेहरगुल गर्दन झुकाए पैदल, मरी हुई चाल के साथ एक ओर को चल पड़ा । उसके सरदार पीछे-पीछे हो लिये जिनको दूर खड़े ऊंटों पर चढ़ी भिक्षुणियों ने भी देखा ।

घायल पड़े दम तोड़ते सिपाहियों की हुंकारें, घायल घोड़ों और हाथियों की चीखें वातावरण को भयंकर और शोकमय बना रही थीं । युद्धक्षेत्र में से लहू ढलवां धरती पर धारायें बनाता यहाँ वहाँ प्रत्येक स्थान से, शब्द उत्पन्न करता नदी में गिर रहा था । दूर कहीं वन में उल्लू बोल रहे थे ।

पुजारी की कोठड़ी के बाहर ढलती धूप में चारपाई बिछाए, रुद्रदत्त एक तकिये के सहारे बैठा था । चाहे आयुर्वेदाचार्य की जादूभरी औषधियों ने उसे मौत के मुँह से बचा लिया था, परन्तु विष का प्रभाव उसके चेहरे की नीलिमा और शरीर की दुर्बलता के रूप में प्रकट था ।

"हूण आक्रमणकारी बचकर निकल गया, महाबाहु !" उसने पूछा ।

दूसरी चारपाई पर बैठा महाबाहु बोला, "मगध सम्राट् की कृपा से, हमने उनका विरोध किया परन्तु वह न माने । यदि मैं और विरोध करता तो ......।"

"मुझे पता है । वह यहाँ आये थे और उन्होंने सारा वृत्तान्त सुनाया था । अभी उनके हाथियों की धूल दृष्टि से ओझल नहीं हुई । बताते थे कि श्री धूमकेतु को विजय स्तम्भ की आधारशिला रखने के लिए पीछे छोड़ आए हैं, और आप राजधानी में पहुंचकर विजयोत्सव मनायेंगे ।"

"मैंने उन्हें परामर्श दिया ।" महाबाहु बोला, "कि विजय स्तम्भ की आधारशिला को किसी विशेष स्थान की अपेक्षा अपनी जाति के युवकों के हृदय में त्याग और बलिदान के प्रचार से रखो जिससे वह प्रत्येक समय में विजय प्राप्‍त करें । परन्तु यदि स्वार्थ अहिंसा और भोग विलास हो गया तो .....।"

रुद्रदत्त ने दूसरी बार महाबाहु की बात को काटा । उसने कहा, "महाबाहु ! महाभारत में एक कथा आती है कि जब महाराज परीक्षित तक्षक नाग से डसे जाने के कारण परलोक सिधारे और उनके पुत्र महाराजा जन्मेजय ने समर्थ ऋषियों द्वारा ऐसा यज्ञ आरम्भ किया जिसके मंत्रों के बल से संसार के कोने-कोने से सांप खिंच-खिंच कर हवन कुंड की अग्नि में गिरने और राख होने लगे तो आखिर सांपों का एक जोड़ा इन्द्र के सिंहासन के पाद से लिपट गया । मंत्र शक्ति कुछ ऐसी प्रबल थी कि सिंहासन समेत वह सांप का जोड़ा हवन कुंड की ओर खिंचने लगा । इस पर इन्द्र ने सांपों पर दया करके ऋषियों से कहा कि इनको प्राणदान दिया जाए, नहीं तो सृष्टि से जीवों की एक योनि मिट जाएगी । यदि इन्द्र और आस्तिक सांपों के उस जोड़े के प्राण न बचाते तो मनुष्य जाति और दूसरे जीव-जन्तु, जो इसी जोड़े की सन्तान के कारण संसार भर में प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में मर जाते हैं, न मरते ।"

"यह तो है ।"

"मैं पूछता हूं कि तुमने यह कथा पढ़ी है अथवा नहीं ?"

"पढ़ी है, नहीं क्यों ?"

"ठीक, तो मैं पूछता हूं कि सांपों का वह जोड़ा क्या फिर इन्द्र के सिंहासन से लिपटा रहा ?"

"जहां तक स्मरण है उस कथा में तो इस बात का कोई वर्णन नहीं । परन्तु विचार है कि वह जोड़ा थोड़े समय तक, जब तक उसका भय दूर न हुआ होगा, उस सिंहासन से लिपटा रहा होगा । इसके पश्चात् शनैः शनैः उतरकर इधर-उधर घूमता हुआ किसी ऐसे स्थान पर जाकर रहने लगा होगा जो सांपों के रहने योग्य हो ।" महाबाहु ने उत्तर दिया ।
 
रुद्रदत्त फिर बोला, "उस समय भी इन्द्र और आस्तिक की इस दया पर महाराज जन्मेजय अथवा कोई और भी सही, कुछ लोगों ने बुरा मनाया होगा । तो मैं समझता हूँ और मेरा विचार है कि तुम इसका समर्थन करोगे कि बुरा मानने वाले उन लोगों ने बड़ी भूल की जो मनुष्य के शत्रु उस सांप के जोड़े को पीछे से ढूंढकर न मार डाला और उन्हें अंडे बच्चे देने और बढ़ने का अवसर दिया ।"

महाबाहु की आँखें खुल गईं । वह चौंक पड़ा । उसके चेहरे पर लज्जा की लाली फैल गई ।

"मुझसे सचमुच बड़ी भूल हुई रुद्रदत्त ! मगध सम्राट् ने चाहे उनको प्राणदान दे दिया परन्तु मुझे चाहिए था कि उनके युद्धक्षेत्र से निकल जाने के पश्चात् अपने राष्ट्रवादी युवकों के दो दस्ते उनके पीछे भेज देता तो उनको किसी वन में ठिकाने लगा देते ।"

"अब धूमकेतु कहाँ है ?"

"मगध की राजकीय सेनाओं का एक दल लेकर स्यालकोट तक गया है, उनको वहाँ का अधिकार दिला दें और अपने राष्ट्रवादी युवकों को वापस साथ ले आए ।"

"और वे ईरानी ?"

"बाहर हैं । उन्हें पहरे वालों और आयुर्वेदाचार्य के पास छोड़ आया हूं ।"

"चार घोड़े तैयार कराओ ।"

"आप यात्रा कर सकेंगे ?"

"करनी पड़ेगी । नहीं तो एक सांप बीस बच्चे देगा और वह हजारों मनुष्यों को डसेंगे ।"

"पांच सौ हूण उसके साथ हैं ।"

"कोई चिन्ता नहीं । काम हम अपने ढ़ंग से करेंगे । और वह ढ़ंग कभी असफल नहीं हुआ ।"

महाबाहु नीचे उतर गया । रुद्रदत्त ने खड़े होकर कई दिन की दुर्बलता और आलस्य को परे हटाने के लिए अपने कन्धों को हिलाया और भुजाओं को दो-तीन बार झटका । उसकी छाती तन गई और आंखों में अपरिचित मानसिक शक्ति चमकने लगी ।

"घोड़े तैयार हैं ।"

रुद्रदत्त उठ खड़ा हुआ । उसने भूरे रंग की ऊनी चादर अपने कंधों पर लपेटी और खड़ग कमर में बांध ली । "चलिये ।"

मन्दिर की सीढियों के नीचे चार सेवक घोड़े पकड़े खड़े थे । दोनों ईरानियों ने रुद्रदत्त को नमस्कार किया ।

"भारतीयों को लड़ते देखा, शापूर ?"

"देखा श्रीमान ! भारतीय की खड़ग से मौत भी पनाह माँगती है ।"

"भारतीय के लिए विधाता ने मौत बनाई ही नहीं, शापूर ! वह एक जीवन से दूसरे जीवन में, एक युग से दूसरे युग में संसार को वीरता, उच्चता, ज्ञान और धर्म के कारनामे दिखाता, शरीर बदलता चला जाता है ।"

"सच है । तक्षशिला में विशारद की उपाधियां प्राप्‍त कर लेने के पश्चात् भी भारतीयों से बहुत कुछ सीखना शेष रह जाता है ।"

"हां, श्रीमान् ! यदि मगध सम्राट् के स्थान पर कोई और सम्राट् होता तो मेहरगुल इस प्रकार बचकर न जा सकता था ।"

"अब दो ईरानी और दो भारतीय" उसने अपने घोड़े की बाग थामते हुए कहा, "हिन्दुस्तान के तीन राजाओं की भूल का प्रायश्चित करने जा रहे हैं । प्रार्थना कीजिए कि ईश्वर हमें सफलता दे ।" उसने मध्यम धूप में चमकती हुई घोड़े की पीठ पर थपकी दी और अपना पैर रकाब में रखा । किन्तु ....

ठीक उसी समय मन्दिर की दीवार के मोड़ से वृद्ध बौद्ध भिक्षुणी इस ओर आती दिखाई दी । उन्हें कहीं जाते देखकर वह दूर ही से बोली, "बेटा !"

रकाब में उसी प्रकार पैर रखे रुद्रदत्त के मन में कोई भाव उत्पन्न हुआ जिसका प्रभाव उसके चेहरे पर झलक आया । "एक आवश्यक काम पर जा रहे हैं मां ! तुम्हारा आशीर्वाद लेना भूल गए थे । इसके लिए क्षमा करो और अब हमें आशीर्वाद दो कि हमें सफलता मिले ।"

"सफलता मिले बेटा ! तुम लोगों को, राष्ट्रवादी वीरों को सदा सदा सफलता मिले । भारत का कण कण यह आशीर्वाद देता है परन्तु बेटा, अपने काम पर जाने से पहले हमारे काम को सफल बनाते जाओ । सब सामग्री तैयार है । अपने पवित्र हाथों से हमारी चिताओं को अग्नि देते जाओ ।"

जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने सामने से धक्का मारा हो । जैसे मस्तिष्क की गहराइयों में किसी पुरानी स्फूर्ति ने सहसा उभरकर शरीर और आत्मा दोनों को चौंका दिया हो । सवार होने वालों के पैर रकाबों से बाहर निकल आए ।

"मां ...."

"बेटा, तुम ने वचन दिया था कि जब आक्रमणकारियों से देश सुरक्षित हो जाएगा, जब सूरमाओं के खांडे अत्याचारी हूणों को उनके पाप का दंड दे चुकेंगे, तब तुम्हारे हाथ हमारे आत्मदाह में हमारी सहायता करेंगे ।"

"हमें वह वचन याद है माँ । परन्तु ...."

"परन्तु नहीं बेटा !" वृद्ध भिक्षुणी जिस के चेहरे पर मिट जाने की प्रबल इच्छा चमक रही थी, रुद्रदत्त की बात काटती हुई कहने लगी "अब अधिक समय तक इस मलिन शरीर के साथ जिया नहीं जाता जिसके साथ पापों की भयानक काली स्मृतियां चिमटी हुई हैं और जिस पर अत्याचारों के घाव बने हुए हैं । हम उसी दिन जल मरतीं जिस दिन हम से बलात्कार हुआ था, परन्तु तुम्हारी प्रेरणा और देश रक्षा के कर्त्तव्य से प्रेरित होकर इसे आज तक टाले रखा था ।"

"तो मां ! देश रक्षा का कर्त्तव्य अब कौन सा पूर्ण हो चुका है ? जब तक देश और जाति रहेंगे, इनकी रक्षा की आवश्यकता भी बनी रहेगी ।"

"यह ठीक है बेटा परन्तु देश के संकट के दिन कुछ समय के लिये तो टल ही गए हैं । इतने समय में, बल्कि ईश्वर करे इससे भी पहले हम फिर जन्म लेकर शुद्ध आत्माओं और पवित्र शरीरों के साथ फिर कर्मक्षेत्र में आ पहुंचेंगी और अपना छोड़ा हुआ कर्त्तव्य फिर से सम्भाल लेंगी । बेटा ! तुम को हमारे आत्मिक दुःख का पता नहीं । हमारी स्थिति ऐसी है जैसे फूलों पर मंडराती तितली को संडास कोठड़ी में बन्द कर दिया जाये, जैसे गंगा की मछलियाँ किसी सड़े हुए जोहड़ के कीचड़ में जा पड़ें, जैसे हरे-भरे वनों में कुलेले करने वाली हिरनियाँ किसी तपते, गर्म, पथरीले बन्दीगृह में बन्द कर दी गई हों, ....गन्दगी के ढ़ेर में गाड़ दिया जाय । परन्तु नहीं, अपने आत्मिक दुःख का ठीक ठीक चित्र खींचने के लिए पूरी उपमा हमें नहीं सूझती । "बेटा ! तुम राष्ट्रवादी युवक ब्रह्मचारी हो । जिस कर्त्तव्य को लेकर कर्मक्षेत्र में उतरे थे, उसे पूर्ण रूप से निभाते जा रहे हो । किसी आलस्य तथा पतन के दाग तुम ने अपनी आत्मा पर नहीं आने दिये ।"

"....तुमको वेदना की उस झुलस देने वाली कसक और प्रायश्चित की उस असह्य चुभन का पता नहीं जो किसी पथभ्रष्ट आत्मा को प्रत्येक समय तड़पड़ाती रहती है । ऐसी अवस्था में हमारा संसार से विदा हो जाना ही ठीक है ।"

"बहुत अच्छा माताओ !" भावावेश में आने वाले रुद्रदत्त की आवाज भारी हो गई । "चलो, जिन आँखों ने धर्म और आदर्श की रक्षा के लिए लड़ने वाले भारतीय वीरों को समरभूमि में अंग-भंग कटवाकर गिरते देखा है, वह आज सत और पवित्रता की मतवाली भारत की नारियों को शान्तचित्त से चिताओं पर चढते देख लेती हैं ।"

घोड़ों की बागें फिर नौकरों को थमा दी गईं और वह चारों युवक वृद्ध भिक्षुणी के पीछे-पीछे चलते मन्दिर की वाटिका में पहुंचे जहाँ पेड़-पौधों से खाली धरती के एक चौकोर टुकड़े पर मालवा नरेश द्वारा भिजवाए चंदन की बहुत सी चिताएं बनी हुईं थीं, और उनमें से प्रत्येक के पास एक भिक्षुणी खड़ी थी, चुपचाप और बिना हिले-जुले, पत्थर की मूर्ति । धैर्य, सहनशीलता, तत्परता और शीघ्रता के भाव उनके चेहरों पर उभरकर अपने स्थान पर ठहरे हुए प्रतीत होते थे ।

वृद्ध भिक्षुणी अपने साथ वाली भिक्षुणियों के साथ जा खड़ी हुई । वह बोली, "हे भगवान ! पता नहीं तुम्हारे कितने रूप और कितने नाम हैं, और न इस बात का पता है कि तुम तक पहुँचने के कितने मार्ग हैं - कर्म और ज्ञान, यज्ञ और सन्यास ! किसी युग में कोई मार्ग अच्छा माना जाता है और किसी में कोई । अपने काल के अनुसार त्याग और तप द्वारा उस पदवी तक पहुंचने का प्रयत्‍न करना चाहा था जो तेरे मार्ग के निकट पहुंचा देती हैं । परन्तु न जाने किस के पाप के कारण एक महान् घोर अत्याचार ने हमारा सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर डाला और हम पथभ्रष्ट होकर रह गईं । इसके पश्चात् शान्ति और एकान्त में रहने वाली इन आंखों ने धर्मयुद्ध की भूमि पर वीरता और बलिदान के वह दहकते दृश्य देखे जिन्होंने मन के दृढ़ विचारों में उथल पुथल मचा दी । हमने देखा कि आत्मोन्नति के लिए सुख भरे घरबार को त्यागकर वनों को जाने वालों की तुलना में देश रक्षा के लिए अंग-अंग कटवाने वाले शूरवीर कहीं सच्चे और ऊंचे हैं, जहां तप तथा समाधि की तुलना में कर्त्तव्य का यह खेल आधी घड़ी में समाप्‍त हो जाता है, प्राणायाम की तुलना में प्राणों की आहुति देना और कपाल में श्वास चढ़ा लेने की तुलना में अपना शीश मातृभूमि की भेंट चढ़ा देना अधिक विस्मयजनक है । पुरुष योद्धा बनें, और स्त्री योद्धा जनें । आज तक के जीवन के अनुभव से यही बात ठीक लगती है । हम प्रार्थना करती हैं कि अगले जन्म में ईश्वर हमें देश सेवा की सामर्थ्य दे । इस जन्म में स्त्री बन इन राष्ट्रवादी युवकों पर बोझा सिद्ध हुई हैं । अगले जन्म में इनका बोझ हल्का करने वाली बनें ।"

उसने चुम्बक से कपड़े के टुकड़े पर आग का पतंगा झाड़ा और उसे जलाकर लम्बी लकड़ी से बांधी घी में भीगी सूत की पट्टी पर रख दिया जिससे कुछ क्षणों में अग्नि ज्वाला उठने लगी ।

"लो बेटा !" उसने जलती हुई मशाल रुद्रदत्त के हाथ में दे दी । "अपने पवित्र हाथों से हमारी चिताओं को आग दे दो जिससे यह विमान बनकर हमें परलोक में ले जाएं ।"

भिक्षुणियाँ चिताओं में जा बैठीं । रुद्रदत्त और उनके साथी एक क्षण के लिए चुपचाप खड़े रहे । फिर रुद्रदत्त का संकेत पाकर महाबाहु ने बारी-बारी चिताओं को आग लगा दी और बरतनों में से घी-सामग्री के कड़छे भर-भरकर उन पर डाले ।

धूएं के गोले और आग की लपटों के बीच थोड़े समय तक मन्त्रों के जाप की हल्की सी ध्वनि उठती रही । आग और मौत ने प्रत्येक वस्तु को लपेट में ले लिया ।

सूर्य अस्त हो गया । पता नहीं, सामग्री डालने का पात्र महाबाहु के हाथ से गिर पड़ा । बहराम और शापूर ने अपनी आँखों के आंसू पोंछे । पीछे दूर खड़े ऊंटों में से एक शोक भरे स्वर में बिलबिलाया ।

रुकी हुई हवा फिर चल पड़ी ।

"देर हो रही है महाबाहु !" रुद्रदत्त बोला ।

महाबाहु ने एक ठण्डी साँस भरी । "चलो ।"

चारों ने इनकी चिताओं को नमस्कार किया । नौकरों को उचित ढ़ंग से समझाया । फिर चिताओं के प्रकाश और गर्मी को पीछे छोड़ यह आगे चल पड़े ।

मन्दिर के सामने घोड़े उसी प्रकार खड़े थे । वे तुरन्त उन पर चढ़ गए और उनकी बागें उठा लीं । उत्तर-पश्चिम हिन्दुस्तान के मार्ग, वन और पहाड़ियाँ रुद्रदत्त और महाबाहु को इस प्रकार ज्ञात थीं जिस प्रकार किसी को अपने हाथ की रेखायें । यात्रा की आवश्यकता को ध्यान में रखकर कुछ भोजन उनके साथ था जिसमें से आवश्यकतानुसार कुछ उन्होंने घोड़ों की पीठों पर ही खाया । सरपट तो नहीं, फिर भी पर्याप्‍त वेग से वह चलते गए । जब नवमी का चाँद डूब रहा था तो रुद्रदत्त ने चलते-चलते कहा "सर्प की कृपा से इतना लाभ तो हुआ है कि शीत और नींद दोनों पास नहीं फटकते ।"

"अभी आपको और चिकित्सा करानी चाहिए थी ।"

"औषधि मेरे पास है जिसके सेवन से कुछ दिनों में ठीक हो जाऊंगा । महाबाहु ! युद्ध में तुम्हें कोई घाव तो नहीं आया ?"

"छाती पर तलवारों के दो गहरे घाव और रान पर बरछे की हूल । मरहम लगाकर उन पर पट्टियाँ बांधी हुई हैं । दिन निकलने पर जहाँ घोड़े बदलेंगे वहां इनको भी बदल लूंगा ।"

"और श्री बहराम और शापूर के तो कोई चोट नहीं आई ?"

बहराम बोला, "साधारण घाव हैं जिन पर मगध के राजवैद्य ने अपने हाथ से औषधि लगाकर पट्टी कर दी है और उनमें कोई विशेष पीड़ा नहीं ।"

"युद्ध में कूदकर घाव खाए बिना लौटना वीरता को लाज लगाना है । जो वीर अपने शरीर को चिता तक घाव के बिना ले जाता है वह महापापी है ।"

घोड़ों की टापों से डरकर दो चरख अपनी भद्दी चाल से दौड़ कर एक सघन वृक्ष की ओट में जा छुपे । टहनियों में बसेरा लेने वाली दो तुगतारें बोलीं । एक बहुत बड़ा तारा टूटा और उसकी लकीर प्रकाश फैलाती दूर रेत और पत्थरों के ऊंचे टीले के पीछे जाकर ओझल हो गई ।

इसी प्रकार अपने घोड़ों की टापों से चरखों, भेड़ियों और बसेरा लेने वाले पक्षियों को डराते वह दो रातें और दो दिन लगातार चलते रहे । प्रत्येक स्थान पर यही सूचना मिली कि वह, जिन का पीछा किया जा रहा है, यहां से होकर आगे चले गए हैं । तीसरी रात जब वह जम्मू की सीमा की एक बस्ती में से होकर आ रहे थे तो उन्होंने वहां एक अनोखी घबराहट देखी जो गाँव के स्वाभाविक जीवन पर अचानक छाई प्रतीत होती थी ।

"क्या बात है महाशय ?" अपना घोड़ा रोककर रुद्रदत्त ने एक से पूछा ।

"श्रीमान् ! वह वृद्ध घबराहट की सी अवस्था में बोला, "एक घुड़सवार कह गया है कि परसों जो हूण सम्राट् अपने सरदारों समेत यहाँ से होकर गया था और जिसको काश्मीर नरेश ने अतिथि बनाकर ठहरा लिया था, वह महाराज की हत्या करके काश्मीर राज्य सम्भाल बैठा है ।"

रुद्रदत्त का चेहरा एकदम गम्भीर हो गया ।

महाबाहु और ईरानियों को जैसे किसी ने छाती पर बरछा मारा ।

वह वृद्ध व्यक्ति बोला, "कई मनुष्य सम्भवतः राजघराने से सम्बंध रखने वाले, गाँव के बाहर मठ में आकर ठहरे हैं । पूरी बात उनसे ही मालूम हो सकेगी । परन्तु वहां के पुजारी ने रोक दिया है कि गांव का कोई वासी यहाँ न आए ।"

और कुछ कहे बिना रुद्रदत्त ने अपने घोड़े की बाग मठ की ओर उठा दी । "मुझ से बड़ी भूल हुई, मार्ग में महाबाहु बोला, "यदि मैं उनको वहीं ठिकाने लगा देता तो आज एक राज्य नष्ट न होता । इसका सारा पाप मेरे ही ऊपर है ।"

"बड़े अचम्भे की बात है", शापूर कहने लगा, "कि पाँच सौ हूणों के सामने किस प्रकार एक राज्य की सेनाओं ने हथियार डाल दिए और वहां के कर्मचारियों ने उसके अधीन होना स्वीकार कर लिया ।"

बहराम बोला, "संसार बदल गया, परन्तु कश्मीरी न बदले । जो विजय पाता दिखाई दिया, उसी का बनना स्वीकार कर लिया । तूफान के सम्मुख चट्टान बनकर खड़ा हो जाना सम्भवतः इनके जातीय चरित्र के विरुद्ध है । जब मैं तक्षशिला में पढ़ता था तब भी, यद्यपि ऐसी तो नहीं, परन्तु इससे मिलती-जुलती घटना हुई थी ।"

रुद्रदत्त ने अपने घोड़े की बागें दाईं पगडंडी पर मोड़ीं । वह बोला, "सीमा के प्रान्तों में जहाँ बलिदान के प्रचार की कमी हो और केन्द्र की सैनिक-शक्ति शिथिल हो जाए वहां के लोगों के स्वभाव में ऐसे दोष आ ही जाया करते हैं । कुछ भी हो, काश्मीर पर हमारा अधिकार होना चाहिये । उत्तर की ओर से हिन्दुस्तान की रक्षा के लिए ऐसा होना आवश्यक है ।"

महाबाहु को जैसे कोई शक्ति पीछे की ओर खींच रही थी । वह कहने लगा, "यदि आज्ञा दें तो मैं उल्टा जाकर मालव, मगध अथवा स्यालकोट से अपनी सेनायें ले आऊँ ? आज से दसवें दिन हमारे सैनिक काश्मीर की पहाड़ियों में लड़ाई के मोर्चे संभाल लेंगे ।"

"और आज से पाँचवें दिन तुर्किस्तान से हूण फौज मेहरगुल की सहायता के लिए आ पहुँचेगी । क्या तुम्हारा विचार है कि उसने अपने देश से कुमक न मंगवाई होगी ? यदि नहीं मंगवाई, तो भी आजकल में वह इसके लिए अपना संदेश भेज देगा । नहीं महाबाहु ! दस दिन अथवा पाँच दिन की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती । जो कुछ हम करने आए हैं, वह इससे बहुत पहले कर डालना चाहिए ।"

"हम चार आदमी ?"

"चार आदमियों की संख्या को थोड़ी समझना अथवा उनमें किसी प्रकार की वृद्धि करना यह एक ऐसी बात है जिसे मेरे विचार से मठ के भीतर पहुँच कर संकटग्रस्तों से मिल लेने के पश्चात् तक उठा रखना चाहिए । जो योजना हम अब बनायें, संभव है उनसे मिलकर हमें उसको बदल डालना पड़े ।"

"बहुत अच्छा !"

एक विद्वान् और चतुर दीखने वाला युवक पुजारी सायंकाल के झुटपुटे में द्वार के भीतर खड़ा लाल-लाल आकाश में कुछ देख रहा था कि देखकर चौंका । अपने चिन्ता-भरे चेहरे पर स्वागत की मुस्कराहट उत्पन्न करता हुआ वह बोला, "आइये श्रीमान् !"

उन्होंने अभिवादन किया ।

"हम रात को यहां विश्राम करना चाहते हैं ।" महाबाहु ने कहा ।

"बड़ी प्रसन्नता से, परन्तु मेरा विचार है..." उसने घूरती हुई दृष्टि से आने वालों की ओर देखकर कहा, "पूरा सुख और आराम संभवतः आप को यहां न मिल सके क्योंकि कुछ लोग जो पहले से यहाँ ठहरे हुए हैं, वह किसी बहुत बड़े संकट में से निकलकर आए हैं और दुःख की आग अभी उनकी बातचीत और क्रियाकलाप से दूर नहीं हुई ।"

"वास्तव में", महाबाहु बोला, "हम उन लोगों से ही मिलना चाहते हैं । हमें किसी ऐसे व्यक्ति ने भेजा है जो ऐसे दुःखों और संकटों की चिकित्सा जानता है ।"

"यह बात और भी अच्छी है, भीतर चलिए । दाएं हाथ की कोठड़ियों में काश्मीर का राज्यच्युत अल्पायु का राजकुमार ठहरा हुआ है । यदि उसका सिंहासन दिलाना सम्भव न हो, तो उसे किसी मित्र राजा के दरबार में ले जाइए जहाँ उसको प्राणों का भय न हो और वह अपने दुःख के दिन भली प्रकार बिता सके ।"

मठ के ऊँचे फाटकों वाले द्वार के पथरीले फर्श पर से जब इन के घोड़े निकले तो एक गूंज उत्पन्न हुई जिसमें छत के नीचे बैठे दो कबूतर फड़फड़ाते हुए उड़ गए ।
 
भीतर दो पालकियाँ और दस बारह घोड़े खड़े थे । परे कुछ सेवक भोजन बना रहे थे जिनसे कुछ मसालों की सुगन्धि, जो काश्मीर की भूमि से सम्बन्ध रखती है, हवा में फैली हुई थी । कर्मचारी और राजघराने की महिलायें मन्दिर में प्रार्थना करने गईं हुईं थीं । केवल राजकुमार सोलह-सत्रह वर्ष का एक सुन्दर नवयुवक कोठड़ी में पलंग पर सिर झुकाए बैठा था । उसके चेहरे पर चिन्ता की गहरी लकीरें बनी थीं । जब उसने गर्दन उठाकर देखा तो मध्य भारत के चार सशस्‍त्र युवक द्वार पर खड़े थे ।

"आइये ! मैं समझता हूं हम एक दूसरे को नहीं जानते । कहिये, आप किस से मिलना चाहते हैं ?"

"राजकुमार !" रुद्रदत्त बोला, "काश्मीर में जो कुछ हुआ उसकी सूचना हमें अभी इस गाँव में मिली है । हम उसे ही रोकने के लिए आ रहे थे । खेद है कि हम समय पर न पहुँच सके ।"

"पिताजी ने", राजकुमार कहने लगा, "उस हारे हुए नीच हूण को अपने यहाँ अतिथि बनाकर ठहरा लिया । प्रत्येक प्रकार का सुख दिया । किसे पता था कि वह यों धोखा और अनर्थ करेगा ? ओह ! मैं इस शोक से पागल हुआ जाता हूं । प्राण बचाकर भागने के पश्चात् कुछ नहीं सूझता कि कहां जाऊं ? क्या करूं ?"

महाबाहु का दिल भर आया । रुद्रदत्त बोला, "आप स्वयं कुछ न करें । केवल उन लोगों को सहायता दें जो कुछ करना चाहते हैं ।"

"बताइये, मैं क्या सहायता दूं ?"

"एक ऐसा व्यक्ति हमारे साथ कर दीजिए जिसको काश्मीर के वनों, पहाड़ों, राजधानी की गलियों और राजप्रासाद के कमरों आदि की पूरी जानकारी हो, जिसके प्रभाव से कहीं छुपकर ठिकाना अथवा विश्राम मिल सकता हो ।"

दो क्षण तक सोचकर राजकुमार ने कहा, "यदि आपको आपत्ति न हो तो इस काम के लिये मैं स्वय़ं अपने आपको उपस्थित कर सकता हूँ । अपना राजपाट पाने के लिए नहीं, बल्कि पिता की हत्या का बदला लेने के लिए मैं मौत के मुँह में भी कूदने को तैयार हूँ । आप रात को आराम करें । कल दिन निकलते ही हम चल पड़ेंगे ।"

"आराम और बदला?" रुद्रदत्त ने तीव्र दृष्टि से राजकुमार की ओर देखते हुए कहा, "राजकुमार ! मृत को जीवित करना और जीवित को मृत बनाना यह काम दिन में नहीं होते ।"

"तो मैं अभी तैयार हूं । अभी चलिए ।"

जब कर्मचारी लौटे तो महाबाहु ने उन्हें अपना परिचय कराया । सारी बात समझाई और साधारण विचार विनिमय के पश्चात् उन्हें आवश्यक आदेश दिए । किवाड़ की ओट में से राजमाता ने कहा, "बेटा ! जाते हुए मन्दिर में मूर्ति के चरणों को छूकर देवी से आशीर्वाद लेते जाना । भगवान तुम्हारी रक्षा करे ।"

पाँच घुड़सवार मठ से बाहर निकले । द्वार पर मोटी बत्ती का एक धूएं वाला दीपक जल रहा था और बाहर चबूतरे के पास के अग्निकुंड में जलती हुई लकड़ियां चटक रही थीं । पुजारी से रात को गप लड़ाने वाले तीन किसान अन्दर जाने से पहले आग के किनारे खड़े होकर थोड़ा अपने हाथ पांव सेंकने लगे थे ।

एक पगडंडी के मोड़ पर, जब रात बीत चुकी थी और पर्याप्‍त दिन चढ़ आया था, एक मोटे और आकाश से बातें करने वाले वृक्ष की ओट में से निकलकर एक बरछे वाले हाथ ने उनका मार्ग रोका । "किधर मुंह उठाए जा रहे हो ?" एक काश्मीरी सैनिक वृक्ष की आड़ से निकलकर सामने आ खड़ा हुआ ।

"क्षमा करना," रुद्रदत्त बोला, "हम मार्ग भूल गए हैं ।"

"बलभद्र !" राजकुमार ने अपने रक्षक दस्ते के सैनिक को पहचान कर आवाज दी ।

"कौन, अन्नदाता राजकुमार ?"

"हाँ ।"

पहरेवाले ने पुराने स्वभाव के अनुसार राजकुमार को प्रणाम किया । राजकुमार ने कहा, "हम आवश्यक काम के लिए इधर जाना चाहते हैं ।"

"जाइए अन्नदाता ।" पहरे वाले में राजकुमार को रोकने का साहस न था ।

"क्या हूण शिकार खेलने के लिए आ गया है ?"

"अभी आया है ।"

"तो हमें किसी ऐसे रास्ते से उस तक ले चलो कि किसी की दृष्टि हम पर न पड़े । कोई देख ले तो कहना कि प्रजा के पीड़ित लोग हैं । प्रार्थना करने जा रहे हैं । समझ गए?"

"समझ गया अन्नदाता !"

"तो सोचते क्या हो ? डरते हो ?"

"अन्नदाता की सेवा में डर किस बात का ? परन्तु अच्छा हो कि घोड़ों को यहीं छोड़ दिया जाए ।"

सवारों ने नीचे उतर कर घोड़ों को पेड़ की जड़ों से बाँध दिया और चट्टानों और झाड़ियों की ओट में होते हुए वे काश्मीरी सैनिकों के साथ-साथ चलने लगे ।

काश्मीर की धरती के रंग-बिरंगे सुन्दर फूल और बहार पग-पग पर खिली थी । परन्तु इनकी ओर किसी ने ध्यान न दिया । जीवन तथा मौत के अन्तिम संघर्ष पर जाते हुए उनका ध्यान हूण सम्राट् की गर्दन और अपनी खड़ग के अतिरिक्त और किसी वस्तु की ओर न जा सकता था । उनके पट्ठे सतर्क और नाड़ियों में लहू की गति तेज हो गई थी ।

"अरे, तुम कौन हो ? किधर जाते हो ?" एक हूण सरदार ने ठीक उस समय उन्हें टोका जब यह मेहरगुल के पीछे कोई कोई पन्द्रह पग पर जा पहुंचे थे ।

"हम प्रजा के दुखी किसान हैं । न्याय चाहते हैं ।"

हूण सम्राट् ने गर्दन मोड़कर आने वालों की ओर देखा । रुद्रदत्त ने एकदम छलांग लगाई और खड़ग का एक भरपूर वार कर उसकी गर्दन उड़ा दी ।

यह काम इतनी तेजी से हुआ कि हूण और काश्मीरी, सभी जो वहाँ उपस्थित थे, स्तम्भित हो गए । परन्तु इस पर भी इनको पकड़ने के लिए इनकी ओर दौड़े । रुद्रदत्त के साथियों ने तलवारें मियानों से सूंत लीं ।

परन्तु रुद्रदत्त के धैर्य में कमी न आई । अपने स्थान पर खड़ा वह हूण अधिकारियों को डांटता हुआ बोला, "सावधान ! जो तुमने एक पग भी आगे बढ़ाया । जिन राष्ट्रवादी युवकों ने, अभी थोड़े ही दिन हुए, युद्धक्षेत्र में तुम्हारे धूएं बखेर दिये थे, उनका दस हजार का एक दल इस पहाड़ी की ओट में तैयार खड़ा है । और तुम काश्मीरी कर्मचारियो ! सुनो !! मैं राजकुमार की ओर से तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि एक-एक हूण को चाहे वह यहाँ है चाहे राजधानी में, पकड़ लो और सूली पर चढ़ा दो । यदि तुमने आज्ञा मानने में तनिक भी ढील की तो याद रखो, तुम्हारे परिवारों के बच्चे-बच्चे सूली पर लटकवा दिए जायेंगे ।"

रुद्रदत्त की धमकी काम कर गई । हूण अधिकारी चकित और घिरे हुए अपने स्थान पर खड़े रहे । काश्मीरी राजकर्मचारी एक क्षण तो हिचकिचाए, तब राजकुमार ने अपने सिर का कपड़ा हटाकर स्वयं उन्हें आज्ञा दी, "हिन्दुस्तान की सेनाएं हमारी सहायता को आ पहुँची हैं, शत्रु मारा जा चुका है । उसके एक-एक आदमी को पकड़कर मौत के घाट उतार दो ।"

काश्मीरी कर्मचारियों ने राजकुमार को झुककर प्रणाम किया । कुछ ने हूण सरदारों को बंदी बना लिया और उनके हथियार छीन लिए और शेष राजकुमार की आज्ञा का पालन करने के लिए प्रसन्नता और जोश में भरे, दूसरे हूण सरदारों को पकड़वाने के लिए राजधानी की ओर दौड़े ।

रुद्रदत्त ने अपनी खड़ग की नोंक मेहरगुल के कटे हुए सिर में भोंकी । "श्री बहराम !"

"जी"

"इधर आओ ।"

बहराम उसके सामने आकर खड़ा हो गया ।

"दोनों हाथ फैलाओ ।"

बहराम ने घुटने टेककर दोनों हाथ फैला दिए ।

खड़ग की नोंक में फंसे हूण आक्रमणकारी के सिर को बहराम की ओर बढ़ाता हुआ रुद्रदत्त बोला, "महर्षि जरदुस्त के ईरान की सेवा में भारत की ओर से यह तुच्छ भेंट स्वीकार करो । हमने अपनी पुण्यभूमि हिन्दुस्तान से अत्याचारी आक्रमणकारियों के प्रभाव को मूल से उखाड़ दिया है । तुम जाकर अपने देश से विदेश के राजनैतिक और धार्मिक प्रभाव को समाप्‍त कर डालो । हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं ।"

बहराम ने मेहरगुल का कटा हुआ बोझल सिर अपने हाथों में ले लिया । दोनों ईरानियों के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव थे ।

फूलों से लदी पहाड़ी पर से हवा के सुगन्धित झोकों में तैरती किसी पक्षी की मधुर आवाज सुनाई दी । कमलों समेत झील पर से दो राजहंस उड़े और नीले आकाश में उड़ते चले गए । सूर्य पर आया छोटा-सा बादल परे हट गया । धूप की आनन्ददायी और स्वर्णमयी किरणों से सारी घाटी जगमगा उठी ।

••• इति •••
 
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