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जिस समय भिक्षुणी भिक्षुणियों के मठ की कुशलक्षेम जानने के लिए जा रही थी उस समय अत्याचार और विनाश का यह कांड नहीं हुआ था । इधर .... गांव के बाहर एक तालाब के किनारे बनी तीन झोंपड़ियों के पास एक ओजस्वी वृद्ध बैठा हुआ कुछ लिख रहा था । उससे थोड़ी ही दूर दूसरी ओर मुंह किए कुछ लोग जो शायद इसी गांव के रहने वाले थे और उस वृद्ध के नौकर प्रतीत होते थे, आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे ।
"इन यात्रियों को देखा है ?"
"हाँ ! अपने को यात्री कहते हैं परन्तु क्या यात्रियों का यही रंग-ढ़ंग होता है ? मैले कपड़े, आँखों में रात्रि के जागरण की खुमारी, घुटने और कोहनियाँ छिली हुई और घोड़ों पर न काठियाँ और न अन्य सामान ।"
"और इनके साथी ! हे मेरे भगवान् !"
"हाँ, एक के तो हाथ पाँव बंधे हुए थे, चेहरे भूतों के समान विकृत, मुंह लहूलुहान तथा कपड़े रक्त में भीगे हुए !"
"जैसे डाकू और हत्यारे हों ।"
"अरे, वह डाकू हत्यारे नहीं तो और कौन थे ? मैंने जब कहा कि यदि ठहरना ही है तो गाँव की धर्मशाला में क्यों नहीं ठहरते, इन झोंपड़ियों में ठहरना .... ऐसा क्या आवश्यक है ? तो कहने लगे कि हाँ, सब कुछ ऐसी ही बात है । तुम तो सुन रहे थे !"
"मैंने ही तो कहा था कि इन झोंपड़ियों के वासी किसी को अपने पास ठहराना अच्छा नहीं समझते । यदि आप लोग गाँव में जाना पसन्द नहीं करते तो अच्छा है कि आम्र वृक्षों के उस पार मन्दिर के खण्डहर में जाकर विश्राम करो । क्यों जी, एक दो कमरे तो अब भी वहाँ रहने योग्य हैं न ?
दूसरा अपनी धुन में बोला, "अच्छा हुआ कि वे वहाँ से चले गये । पर परदेशी कोई भी क्यों न हो, मैं तो उन पर विश्वास नहीं करता चाहे वह कितना ही दीन और गऊ बनकर क्यों न आये ।"
"क्यों भाई, अपनी गऊओं का कुछ पता चला?"
"तुम गऊओं की बात कहते हो, उनके साथ तो उनको ढूंढ़ने वाला भी वापस नहीं आया । हरिगोपाल कल शाम से अभी तक घर वापस नहीं आया है ।"
"कहीं किसी बाघ आदि ने तो उनको नहीं खा लिया ?"
"हां, ऐसी सम्भावना तो है परन्तु बाघ तो दूर ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में रहते हैं । मैदान में तो कोई भूला भटका ही आ पाता है ।"
कारण कुछ भी क्यों न हो परन्तु उनके खो जाने से बड़ी चिन्ता उत्पन्न हो गई । इधर का कष्ट तो सहा जा सकता है परन्तु छोटे-छोटे बछड़ों का माँ के अभाव में दिन रात रम्हाना बड़ा कष्टकर बन जाता है । छोटे महाराज विज्ञानान्द जिन्हें कभी औषधि निर्माण से अवकाश नहीं मिलता, उनकी करुण पुकार सुनकर कई बार काम छोड़कर बाहर आ खड़े होते हैं और उनको सांत्वना देने के लिए उनकी पीठों पर हाथ फेरते रहते हैं ।"
"सच है", दूसरे ने ठंडी सांस लेकर कहा । चिन्ता की रेखायें उसके माथे पर फैल गईं । एक क्षण चुप रहने के पश्चात् वह बोला, "बड़े महाराज न जाने किस प्रकार के सन्यासी हैं । उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं, मोह माया और ममता नहीं । महीनों चुप बैठे रहते हैं । मन आया तो संसार के कोलाहल में वापस लौट जाते हैं और छोटे-छोटे बच्चों से इतना घुल-मिल जाते हैं मानो वे इन्हीं के बच्चे हों, बड़े-बूढ़ों से किसी प्रकार की बातचीत नहीं करते । परसों स्त्रियों के एक उत्सव में जाकर उनमें इस प्रकार सम्मिलित हो गए मानो वे उनके धर्मगुरु हों, और उनसे अपनी पूजा करवा आये । अगर कभी वन में जाने का अवसर आया तो पागलों के समान पशु-पक्षियों की तरफ खड़े-खड़े देखते रहते हैं ।"
"क्या तुम्हें मालूम नहीं?" दूसरा बोला, "मुझे किसी ने बताया कि ये तक्षशिला विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के आचार्य थे । अब भी दिन-रात उसी के अध्ययन और मनन में संलग्न रहते हैं और नित्य-प्रति उसी के विषय में कुछ न कुछ लिखते रहते हैं ।"
"मनोविज्ञान ! क्या ?"
"तुम ठीक कहते हो भाई । मैं जब भी किसी काम से उनके पास गया हूँ तो मेरी बात बिना सुने ही वे मेरे प्रश्नों का उत्तर ठीक-ठीक दे देते हैं । पहले मैं यही सोचता था कि वे अपने योग बल से मेरे मन की बात जान लेते हैं क्योंकि कई बार मैंने उन्हें समाधि में भी देखा है । पर अब तुमसे उनकी वास्तविक योग्यता का पता लगा ।"
"परन्तु मनोविज्ञान भी योग का ही एक अंग है ।"
नौकर का वाक्य गले में अटका ही रह गया कि दूर कोई वन में से बेतहाशा भागा चला आ रहा था । पास आने पर पता चला यह तो आचार्य जी थे जिनके विषय में नौकर अभी-अभी कह रहा था । यह दार्शनिक तो हमेशा सिर नीचा किये चिन्तामग्न अवस्था में डूबा हुआ धीरे-धीरे चलने वाला व्यक्ति है, आज इस प्रकार सुधबुध खोकर क्यों भागा चला आ रहा है ? यह विचार उन दोनों के मन में आया और वे घबराकर उठ खड़े हुए ।
"छोटे स्वामी कहां हैं? गोपाल कहाँ है और तुम लोगों के कुल्हाड़े, फावड़े, गंडासे आदि चारा काटने के हथियार कहां हैं ?”
दोनों नौकरों ने आचार्य की तरफ बड़े अविश्वास से देखा और आचार्य की फटी-फटी आँखों में कुछ पाने के लिए घूर-घूरकर देखने लगे । उन्हें लगा आज से पूर्व जो आचार्य लोगों के मन का भेद जान लेता था, आज उसका अपना मन भ्रान्त हो गया है ।
एक नौकर ने रुकते-रुकते पूछा, "हम और हमारे हथियार यहीं हैं परन्तु आप अपनी घबराहट का कारण बतायें, जिसके लिए आप इतने ....।"
आचार्य ने भिक्षुणियों के मठ की ओर संकेत करते हुए कहा, "वहाँ एक ऐसा बीभत्स काम हो रहा है जिसे आँखें देख नहीं सकतीं ।"
"क्या डाकू आ गए हैं ?"
"डाकू ! डाकू भी उतने नीच और कमीने नहीं होते जितने नृशंस वे लोग हैं । उनके कुकृत्य का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं ।"
पहला नौकर बोला - "यद्यपि मैं आपका अभिप्राय पूर्णतः नहीं समझ सका, फिर भी अगर आप हमें डाकुओं से सामना करने के लिए ले जाना चाहते हैं तो अपने स्थान पर मैं आपको ऐसे व्यक्तियों का पता बताता हूँ जो हम लोगों से अधिक साहस तथा दृढ़तापूर्वक उनका सामना कर सकते हैं । वे लोग परदेसी हैं, जो भग्न मन्दिर में आकर ठहरे हैं । हमें उनके पास जाकर सारी स्थिति समझानी चाहिए । वह पहले यहीं ठहरना चाहते थे परन्तु हमने उन्हें ....।"
अधीरचित्त आचार्य ने नौकरों की बात पूरी होने से पहले ही कहा, "अरे, तुमने उन्हें यहां आश्रय क्यों नहीं दिया ?" फिर वह बिना किसी ओर ध्यान दिये उस भग्न मन्दिर की ओर दौड़ पड़े ।
रुद्रदत्त ने गहरी दृष्टि से आचार्य की ओर देखा । सब बातें सुनने के बाद उसने अपने साथियों से कहा, "धूमकेतु ! महाबाहु !! तथा बहराम !!! तुम लोग आचार्य के साथ जाओ ।"
तीनों आचार्य के बताये स्थान की ओर इस वेग से दौड़ पड़े जैसे कोई हिंस्र प्राणी अपने शिकार की ओर दौड़ता है ।
पाँच और एक का रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध सारे वातावरण में सनसनी उत्पन्न कर रहा था । हूणों के घेरे में फंसे उस युवक का सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया था । शरीर से रक्त की धारायें फूट रहीं थीं । कनपटी और आधे गाल की खाल कटकर गर्दन पर लटक रही थी । उसका अंगरखा पेट और छाती पर से फट गया था । धोती चीथड़े-चीथड़े हो गई थी तथा उसके गले में पहने मूल्यवान हार के मनके भूमि पर बिखरे पड़े थे । चारों तरफ से हो रहे आक्रमणकारियों के अगणित प्रहारों को रोकते-रोकते वह बेसुध-सा हो रहा था, उसकी आँखों के आगे अंधकार छा रहा था । अंग शिथिल पड़ गये थे । उतनी फुर्ती से अब उसकी खड़्ग नहीं चल रही थी । दूसरे हाथ की ढ़ाल अब उसे बोझ के समान लग रही थी । अत्यधिक रक्तस्राव और थकावट से वह निढ़ाल होकर गिर पड़ने की स्थिति में पहुंच गया था ।
परन्तु इस आसन्न मृत्यु की घड़ी में भी उसकी इच्छाशक्ति उतनी ही प्रबल थी । वह गिरता-गिरता भी शत्रुओं के प्रहारों को रोक रहा था । आखिर एक हूण का वार उसके कन्धे को छूता हुआ पेट पर जा लगा जिससे उसकी आंतें बाहर निकल आईं । ढ़ाल फेंककर उस वीर ने एक हाथ से अपना कोट सम्भाला और दूसरे से उन पर प्रहार करना चाहा । परन्तु वह बेसुध होकर भूमि पर गिर पड़ा जो उसी के रक्त से चिक्कण हो रही थी । तीन हूण भूखे भेड़िये की तरह उसकी इहलीला समाप्त करने अपनी खड़्गों को लेकर उसकी ओर लपके परन्तु पीछे से सनसनाते बाण उनकी खोपड़ियों में आ चुभे ।
"जीवित है ।" महाबाहु ने घायल सवार की छाती पर हाथ रखने के पश्चात् कहा "यदि किसी कुशल वैद्य की सहायता मिल जाती तो सम्भव है इसके प्राण बच जायें ।"
"इसका प्रबन्ध हो जायेगा" पीछे से दौड़कर आता हुआ आचार्य बोला, "परन्तु भय है कहीं मार्ग में दम न तोड़ दे । इसे बड़े घाव लगे हैं, सारा शरीर क्षत-विक्षत हो चुका है ।"
"आचार्य", दोनों नौकर जो आचार्य के पीछे पीछे भाग रहे थे, बोले "क्या छोटे महाराज के पास इन्हें ले चलें?"
"हां, परन्तु देखना, इसे सावधानी से उठाना ।"
नौकरों ने फुर्ती से घायल सवार के हार के बिखरे मोती एकत्र किए और उसे उठाकर झोंपड़ी की तरफ चल पड़े ।
मृत हूणों की ओर दृष्टि डालकर जब धूमकेतु और महाबाहु बहराम को लेकर घायल व्यक्ति के पीछे-पीछे चलने लगे तो आचार्य बोला, "ठहरिये ! इन राक्षसों के शिकार कुछ अन्य व्यक्ति भी हैं जिन्हें हमारी सहायता और सहारे की आवश्यकता है । आइये !" वह उन तीनों युवकों को लेकर एक ओर चल पड़ा ।
"मैं प्राकृतिक दृश्यों और भगवान की बनाई इस मनोहर छटा का आनन्द उठाने के लिए उस सामने वाली पहाड़ी पर बैठा था कि मैंने देखा हूण लुटेरों की एक छोटी सी टुकड़ी भिक्षुओं के मठ में घुस गई तथा थोड़े समय के पश्चात् जब वह बाहर निकली तो उन सिपाहियों की खड़गें रक्त से सनी थीं तथा भगवान् बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति उन्होंने अपनी बगल में दबा रखी थी । फिर वे भिक्षुणियों के मठ की ओर गए । परन्तु भिक्षुओं की हत्या का समाचार भिक्षुणियों के मठ में पहले पहुंच गया था । इसलिए उनके पहुंचने से पूर्व ही वन में जा छुपीं । परन्तु इन दुष्टों ने उन्हें ढ़ूंढ निकाला और उनमें से कई भिक्षुणियों को वृक्षों से बांध दिया और कुछ स्त्रियों के सतीत्व पर आक्रमण किया । दूर होने के कारण जो कुछ हुआ, उसे मैं अच्छी तरह नहीं देख सका ।"
सरकण्डे के झुण्ड को पार कर उनकी आंखें एक ऐसे दिल दहला देने वाले नारकीय अत्याचार के दृश्य से टकराई जिसने न केवल इन पीड़ित स्त्रियों के शरीरों को बीभत्स बना दिया था अपितु देखने वाले के मन और आंखों को क्षुब्ध कर रहा था । नंगे शरीर वाली, देवी के समान पवित्र, गौ के समान शीलवान् चालीस भिक्षुणियां वृक्षों से बंधी हुई थीं । उनकी बेसुध गर्दनें एक ओर लटक रही थीं और कईयों की आंखों से अविरल अश्रुधारायें बह रहीं थीं । उनकी कटी हुई छातियों से रक्त टपक टपक कर भूमि को भिगो रहा था । और छः युवा भिक्षुणियां .... अत्याचारी विदेशियों ने जिनके साथ बलात्कार किया था, पृथ्वी पर मुर्दों के समान पड़ीं थीं, मानो उनका सम्मान धरती में समा गया हो और मन, ऐसा लगता था मानो उन अपवित्र शरीरों को छोड़कर कहां अन्यत्र चला गया हो ।
"ओह, मेरे प्रभु !" महाबाहु के मुंह से वेदना भरी आह निकली ।
"विदेशी राक्षसो !" क्रोध में भरकर धूमकेतु बोला, "हिन्दू देवियों पर अत्याचार करने का तुम्हें ऐसा कठोर दण्ड दिया जाएगा कि इतिहास के सिवाय भूमण्डल में तुम्हारा अस्तित्व ही न रह सकेगा । हम भारतीय युवक या तो तुम्हें इस सृष्टि से ही मिटा देंगे या स्वयं को ।"
बहराम कई पग पीछे हटा और दूसरी ओर मुंह करके खड़ा हो गया । वह सन्यासी उन छः स्त्रियों के ऊपर चादर डालने और सहारा देने के लिए उनकी ओर बढ़ा ।
"इन यात्रियों को देखा है ?"
"हाँ ! अपने को यात्री कहते हैं परन्तु क्या यात्रियों का यही रंग-ढ़ंग होता है ? मैले कपड़े, आँखों में रात्रि के जागरण की खुमारी, घुटने और कोहनियाँ छिली हुई और घोड़ों पर न काठियाँ और न अन्य सामान ।"
"और इनके साथी ! हे मेरे भगवान् !"
"हाँ, एक के तो हाथ पाँव बंधे हुए थे, चेहरे भूतों के समान विकृत, मुंह लहूलुहान तथा कपड़े रक्त में भीगे हुए !"
"जैसे डाकू और हत्यारे हों ।"
"अरे, वह डाकू हत्यारे नहीं तो और कौन थे ? मैंने जब कहा कि यदि ठहरना ही है तो गाँव की धर्मशाला में क्यों नहीं ठहरते, इन झोंपड़ियों में ठहरना .... ऐसा क्या आवश्यक है ? तो कहने लगे कि हाँ, सब कुछ ऐसी ही बात है । तुम तो सुन रहे थे !"
"मैंने ही तो कहा था कि इन झोंपड़ियों के वासी किसी को अपने पास ठहराना अच्छा नहीं समझते । यदि आप लोग गाँव में जाना पसन्द नहीं करते तो अच्छा है कि आम्र वृक्षों के उस पार मन्दिर के खण्डहर में जाकर विश्राम करो । क्यों जी, एक दो कमरे तो अब भी वहाँ रहने योग्य हैं न ?
दूसरा अपनी धुन में बोला, "अच्छा हुआ कि वे वहाँ से चले गये । पर परदेशी कोई भी क्यों न हो, मैं तो उन पर विश्वास नहीं करता चाहे वह कितना ही दीन और गऊ बनकर क्यों न आये ।"
"क्यों भाई, अपनी गऊओं का कुछ पता चला?"
"तुम गऊओं की बात कहते हो, उनके साथ तो उनको ढूंढ़ने वाला भी वापस नहीं आया । हरिगोपाल कल शाम से अभी तक घर वापस नहीं आया है ।"
"कहीं किसी बाघ आदि ने तो उनको नहीं खा लिया ?"
"हां, ऐसी सम्भावना तो है परन्तु बाघ तो दूर ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में रहते हैं । मैदान में तो कोई भूला भटका ही आ पाता है ।"
कारण कुछ भी क्यों न हो परन्तु उनके खो जाने से बड़ी चिन्ता उत्पन्न हो गई । इधर का कष्ट तो सहा जा सकता है परन्तु छोटे-छोटे बछड़ों का माँ के अभाव में दिन रात रम्हाना बड़ा कष्टकर बन जाता है । छोटे महाराज विज्ञानान्द जिन्हें कभी औषधि निर्माण से अवकाश नहीं मिलता, उनकी करुण पुकार सुनकर कई बार काम छोड़कर बाहर आ खड़े होते हैं और उनको सांत्वना देने के लिए उनकी पीठों पर हाथ फेरते रहते हैं ।"
"सच है", दूसरे ने ठंडी सांस लेकर कहा । चिन्ता की रेखायें उसके माथे पर फैल गईं । एक क्षण चुप रहने के पश्चात् वह बोला, "बड़े महाराज न जाने किस प्रकार के सन्यासी हैं । उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं, मोह माया और ममता नहीं । महीनों चुप बैठे रहते हैं । मन आया तो संसार के कोलाहल में वापस लौट जाते हैं और छोटे-छोटे बच्चों से इतना घुल-मिल जाते हैं मानो वे इन्हीं के बच्चे हों, बड़े-बूढ़ों से किसी प्रकार की बातचीत नहीं करते । परसों स्त्रियों के एक उत्सव में जाकर उनमें इस प्रकार सम्मिलित हो गए मानो वे उनके धर्मगुरु हों, और उनसे अपनी पूजा करवा आये । अगर कभी वन में जाने का अवसर आया तो पागलों के समान पशु-पक्षियों की तरफ खड़े-खड़े देखते रहते हैं ।"
"क्या तुम्हें मालूम नहीं?" दूसरा बोला, "मुझे किसी ने बताया कि ये तक्षशिला विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के आचार्य थे । अब भी दिन-रात उसी के अध्ययन और मनन में संलग्न रहते हैं और नित्य-प्रति उसी के विषय में कुछ न कुछ लिखते रहते हैं ।"
"मनोविज्ञान ! क्या ?"
"तुम ठीक कहते हो भाई । मैं जब भी किसी काम से उनके पास गया हूँ तो मेरी बात बिना सुने ही वे मेरे प्रश्नों का उत्तर ठीक-ठीक दे देते हैं । पहले मैं यही सोचता था कि वे अपने योग बल से मेरे मन की बात जान लेते हैं क्योंकि कई बार मैंने उन्हें समाधि में भी देखा है । पर अब तुमसे उनकी वास्तविक योग्यता का पता लगा ।"
"परन्तु मनोविज्ञान भी योग का ही एक अंग है ।"
नौकर का वाक्य गले में अटका ही रह गया कि दूर कोई वन में से बेतहाशा भागा चला आ रहा था । पास आने पर पता चला यह तो आचार्य जी थे जिनके विषय में नौकर अभी-अभी कह रहा था । यह दार्शनिक तो हमेशा सिर नीचा किये चिन्तामग्न अवस्था में डूबा हुआ धीरे-धीरे चलने वाला व्यक्ति है, आज इस प्रकार सुधबुध खोकर क्यों भागा चला आ रहा है ? यह विचार उन दोनों के मन में आया और वे घबराकर उठ खड़े हुए ।
"छोटे स्वामी कहां हैं? गोपाल कहाँ है और तुम लोगों के कुल्हाड़े, फावड़े, गंडासे आदि चारा काटने के हथियार कहां हैं ?”
दोनों नौकरों ने आचार्य की तरफ बड़े अविश्वास से देखा और आचार्य की फटी-फटी आँखों में कुछ पाने के लिए घूर-घूरकर देखने लगे । उन्हें लगा आज से पूर्व जो आचार्य लोगों के मन का भेद जान लेता था, आज उसका अपना मन भ्रान्त हो गया है ।
एक नौकर ने रुकते-रुकते पूछा, "हम और हमारे हथियार यहीं हैं परन्तु आप अपनी घबराहट का कारण बतायें, जिसके लिए आप इतने ....।"
आचार्य ने भिक्षुणियों के मठ की ओर संकेत करते हुए कहा, "वहाँ एक ऐसा बीभत्स काम हो रहा है जिसे आँखें देख नहीं सकतीं ।"
"क्या डाकू आ गए हैं ?"
"डाकू ! डाकू भी उतने नीच और कमीने नहीं होते जितने नृशंस वे लोग हैं । उनके कुकृत्य का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं ।"
पहला नौकर बोला - "यद्यपि मैं आपका अभिप्राय पूर्णतः नहीं समझ सका, फिर भी अगर आप हमें डाकुओं से सामना करने के लिए ले जाना चाहते हैं तो अपने स्थान पर मैं आपको ऐसे व्यक्तियों का पता बताता हूँ जो हम लोगों से अधिक साहस तथा दृढ़तापूर्वक उनका सामना कर सकते हैं । वे लोग परदेसी हैं, जो भग्न मन्दिर में आकर ठहरे हैं । हमें उनके पास जाकर सारी स्थिति समझानी चाहिए । वह पहले यहीं ठहरना चाहते थे परन्तु हमने उन्हें ....।"
अधीरचित्त आचार्य ने नौकरों की बात पूरी होने से पहले ही कहा, "अरे, तुमने उन्हें यहां आश्रय क्यों नहीं दिया ?" फिर वह बिना किसी ओर ध्यान दिये उस भग्न मन्दिर की ओर दौड़ पड़े ।
रुद्रदत्त ने गहरी दृष्टि से आचार्य की ओर देखा । सब बातें सुनने के बाद उसने अपने साथियों से कहा, "धूमकेतु ! महाबाहु !! तथा बहराम !!! तुम लोग आचार्य के साथ जाओ ।"
तीनों आचार्य के बताये स्थान की ओर इस वेग से दौड़ पड़े जैसे कोई हिंस्र प्राणी अपने शिकार की ओर दौड़ता है ।
पाँच और एक का रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध सारे वातावरण में सनसनी उत्पन्न कर रहा था । हूणों के घेरे में फंसे उस युवक का सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया था । शरीर से रक्त की धारायें फूट रहीं थीं । कनपटी और आधे गाल की खाल कटकर गर्दन पर लटक रही थी । उसका अंगरखा पेट और छाती पर से फट गया था । धोती चीथड़े-चीथड़े हो गई थी तथा उसके गले में पहने मूल्यवान हार के मनके भूमि पर बिखरे पड़े थे । चारों तरफ से हो रहे आक्रमणकारियों के अगणित प्रहारों को रोकते-रोकते वह बेसुध-सा हो रहा था, उसकी आँखों के आगे अंधकार छा रहा था । अंग शिथिल पड़ गये थे । उतनी फुर्ती से अब उसकी खड़्ग नहीं चल रही थी । दूसरे हाथ की ढ़ाल अब उसे बोझ के समान लग रही थी । अत्यधिक रक्तस्राव और थकावट से वह निढ़ाल होकर गिर पड़ने की स्थिति में पहुंच गया था ।
परन्तु इस आसन्न मृत्यु की घड़ी में भी उसकी इच्छाशक्ति उतनी ही प्रबल थी । वह गिरता-गिरता भी शत्रुओं के प्रहारों को रोक रहा था । आखिर एक हूण का वार उसके कन्धे को छूता हुआ पेट पर जा लगा जिससे उसकी आंतें बाहर निकल आईं । ढ़ाल फेंककर उस वीर ने एक हाथ से अपना कोट सम्भाला और दूसरे से उन पर प्रहार करना चाहा । परन्तु वह बेसुध होकर भूमि पर गिर पड़ा जो उसी के रक्त से चिक्कण हो रही थी । तीन हूण भूखे भेड़िये की तरह उसकी इहलीला समाप्त करने अपनी खड़्गों को लेकर उसकी ओर लपके परन्तु पीछे से सनसनाते बाण उनकी खोपड़ियों में आ चुभे ।
"जीवित है ।" महाबाहु ने घायल सवार की छाती पर हाथ रखने के पश्चात् कहा "यदि किसी कुशल वैद्य की सहायता मिल जाती तो सम्भव है इसके प्राण बच जायें ।"
"इसका प्रबन्ध हो जायेगा" पीछे से दौड़कर आता हुआ आचार्य बोला, "परन्तु भय है कहीं मार्ग में दम न तोड़ दे । इसे बड़े घाव लगे हैं, सारा शरीर क्षत-विक्षत हो चुका है ।"
"आचार्य", दोनों नौकर जो आचार्य के पीछे पीछे भाग रहे थे, बोले "क्या छोटे महाराज के पास इन्हें ले चलें?"
"हां, परन्तु देखना, इसे सावधानी से उठाना ।"
नौकरों ने फुर्ती से घायल सवार के हार के बिखरे मोती एकत्र किए और उसे उठाकर झोंपड़ी की तरफ चल पड़े ।
मृत हूणों की ओर दृष्टि डालकर जब धूमकेतु और महाबाहु बहराम को लेकर घायल व्यक्ति के पीछे-पीछे चलने लगे तो आचार्य बोला, "ठहरिये ! इन राक्षसों के शिकार कुछ अन्य व्यक्ति भी हैं जिन्हें हमारी सहायता और सहारे की आवश्यकता है । आइये !" वह उन तीनों युवकों को लेकर एक ओर चल पड़ा ।
"मैं प्राकृतिक दृश्यों और भगवान की बनाई इस मनोहर छटा का आनन्द उठाने के लिए उस सामने वाली पहाड़ी पर बैठा था कि मैंने देखा हूण लुटेरों की एक छोटी सी टुकड़ी भिक्षुओं के मठ में घुस गई तथा थोड़े समय के पश्चात् जब वह बाहर निकली तो उन सिपाहियों की खड़गें रक्त से सनी थीं तथा भगवान् बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति उन्होंने अपनी बगल में दबा रखी थी । फिर वे भिक्षुणियों के मठ की ओर गए । परन्तु भिक्षुओं की हत्या का समाचार भिक्षुणियों के मठ में पहले पहुंच गया था । इसलिए उनके पहुंचने से पूर्व ही वन में जा छुपीं । परन्तु इन दुष्टों ने उन्हें ढ़ूंढ निकाला और उनमें से कई भिक्षुणियों को वृक्षों से बांध दिया और कुछ स्त्रियों के सतीत्व पर आक्रमण किया । दूर होने के कारण जो कुछ हुआ, उसे मैं अच्छी तरह नहीं देख सका ।"
सरकण्डे के झुण्ड को पार कर उनकी आंखें एक ऐसे दिल दहला देने वाले नारकीय अत्याचार के दृश्य से टकराई जिसने न केवल इन पीड़ित स्त्रियों के शरीरों को बीभत्स बना दिया था अपितु देखने वाले के मन और आंखों को क्षुब्ध कर रहा था । नंगे शरीर वाली, देवी के समान पवित्र, गौ के समान शीलवान् चालीस भिक्षुणियां वृक्षों से बंधी हुई थीं । उनकी बेसुध गर्दनें एक ओर लटक रही थीं और कईयों की आंखों से अविरल अश्रुधारायें बह रहीं थीं । उनकी कटी हुई छातियों से रक्त टपक टपक कर भूमि को भिगो रहा था । और छः युवा भिक्षुणियां .... अत्याचारी विदेशियों ने जिनके साथ बलात्कार किया था, पृथ्वी पर मुर्दों के समान पड़ीं थीं, मानो उनका सम्मान धरती में समा गया हो और मन, ऐसा लगता था मानो उन अपवित्र शरीरों को छोड़कर कहां अन्यत्र चला गया हो ।
"ओह, मेरे प्रभु !" महाबाहु के मुंह से वेदना भरी आह निकली ।
"विदेशी राक्षसो !" क्रोध में भरकर धूमकेतु बोला, "हिन्दू देवियों पर अत्याचार करने का तुम्हें ऐसा कठोर दण्ड दिया जाएगा कि इतिहास के सिवाय भूमण्डल में तुम्हारा अस्तित्व ही न रह सकेगा । हम भारतीय युवक या तो तुम्हें इस सृष्टि से ही मिटा देंगे या स्वयं को ।"
बहराम कई पग पीछे हटा और दूसरी ओर मुंह करके खड़ा हो गया । वह सन्यासी उन छः स्त्रियों के ऊपर चादर डालने और सहारा देने के लिए उनकी ओर बढ़ा ।