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आखिर जीत हमारी है

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जिस समय भिक्षुणी भिक्षुणियों के मठ की कुशलक्षेम जानने के लिए जा रही थी उस समय अत्याचार और विनाश का यह कांड नहीं हुआ था । इधर .... गांव के बाहर एक तालाब के किनारे बनी तीन झोंपड़ियों के पास एक ओजस्वी वृद्ध बैठा हुआ कुछ लिख रहा था । उससे थोड़ी ही दूर दूसरी ओर मुंह किए कुछ लोग जो शायद इसी गांव के रहने वाले थे और उस वृद्ध के नौकर प्रतीत होते थे, आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे ।

"इन यात्रियों को देखा है ?"

"हाँ ! अपने को यात्री कहते हैं परन्तु क्या यात्रियों का यही रंग-ढ़ंग होता है ? मैले कपड़े, आँखों में रात्रि के जागरण की खुमारी, घुटने और कोहनियाँ छिली हुई और घोड़ों पर न काठियाँ और न अन्य सामान ।"

"और इनके साथी ! हे मेरे भगवान् !"

"हाँ, एक के तो हाथ पाँव बंधे हुए थे, चेहरे भूतों के समान विकृत, मुंह लहूलुहान तथा कपड़े रक्त में भीगे हुए !"

"जैसे डाकू और हत्यारे हों ।"

"अरे, वह डाकू हत्यारे नहीं तो और कौन थे ? मैंने जब कहा कि यदि ठहरना ही है तो गाँव की धर्मशाला में क्यों नहीं ठहरते, इन झोंपड़ियों में ठहरना .... ऐसा क्या आवश्यक है ? तो कहने लगे कि हाँ, सब कुछ ऐसी ही बात है । तुम तो सुन रहे थे !"

"मैंने ही तो कहा था कि इन झोंपड़ियों के वासी किसी को अपने पास ठहराना अच्छा नहीं समझते । यदि आप लोग गाँव में जाना पसन्द नहीं करते तो अच्छा है कि आम्र वृक्षों के उस पार मन्दिर के खण्डहर में जाकर विश्राम करो । क्यों जी, एक दो कमरे तो अब भी वहाँ रहने योग्य हैं न ?

दूसरा अपनी धुन में बोला, "अच्छा हुआ कि वे वहाँ से चले गये । पर परदेशी कोई भी क्यों न हो, मैं तो उन पर विश्वास नहीं करता चाहे वह कितना ही दीन और गऊ बनकर क्यों न आये ।"

"क्यों भाई, अपनी गऊओं का कुछ पता चला?"

"तुम गऊओं की बात कहते हो, उनके साथ तो उनको ढूंढ़ने वाला भी वापस नहीं आया । हरिगोपाल कल शाम से अभी तक घर वापस नहीं आया है ।"

"कहीं किसी बाघ आदि ने तो उनको नहीं खा लिया ?"

"हां, ऐसी सम्भावना तो है परन्तु बाघ तो दूर ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में रहते हैं । मैदान में तो कोई भूला भटका ही आ पाता है ।"

कारण कुछ भी क्यों न हो परन्तु उनके खो जाने से बड़ी चिन्ता उत्पन्न हो गई । इधर का कष्ट तो सहा जा सकता है परन्तु छोटे-छोटे बछड़ों का माँ के अभाव में दिन रात रम्हाना बड़ा कष्टकर बन जाता है । छोटे महाराज विज्ञानान्द जिन्हें कभी औषधि निर्माण से अवकाश नहीं मिलता, उनकी करुण पुकार सुनकर कई बार काम छोड़कर बाहर आ खड़े होते हैं और उनको सांत्वना देने के लिए उनकी पीठों पर हाथ फेरते रहते हैं ।"

"सच है", दूसरे ने ठंडी सांस लेकर कहा । चिन्ता की रेखायें उसके माथे पर फैल गईं । एक क्षण चुप रहने के पश्चात् वह बोला, "बड़े महाराज न जाने किस प्रकार के सन्यासी हैं । उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं, मोह माया और ममता नहीं । महीनों चुप बैठे रहते हैं । मन आया तो संसार के कोलाहल में वापस लौट जाते हैं और छोटे-छोटे बच्चों से इतना घुल-मिल जाते हैं मानो वे इन्हीं के बच्चे हों, बड़े-बूढ़ों से किसी प्रकार की बातचीत नहीं करते । परसों स्‍त्रियों के एक उत्सव में जाकर उनमें इस प्रकार सम्मिलित हो गए मानो वे उनके धर्मगुरु हों, और उनसे अपनी पूजा करवा आये । अगर कभी वन में जाने का अवसर आया तो पागलों के समान पशु-पक्षियों की तरफ खड़े-खड़े देखते रहते हैं ।"

"क्या तुम्हें मालूम नहीं?" दूसरा बोला, "मुझे किसी ने बताया कि ये तक्षशिला विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के आचार्य थे । अब भी दिन-रात उसी के अध्ययन और मनन में संलग्न रहते हैं और नित्य-प्रति उसी के विषय में कुछ न कुछ लिखते रहते हैं ।"

"मनोविज्ञान ! क्या ?"

"तुम ठीक कहते हो भाई । मैं जब भी किसी काम से उनके पास गया हूँ तो मेरी बात बिना सुने ही वे मेरे प्रश्नों का उत्तर ठीक-ठीक दे देते हैं । पहले मैं यही सोचता था कि वे अपने योग बल से मेरे मन की बात जान लेते हैं क्योंकि कई बार मैंने उन्हें समाधि में भी देखा है । पर अब तुमसे उनकी वास्तविक योग्यता का पता लगा ।"

"परन्तु मनोविज्ञान भी योग का ही एक अंग है ।"

नौकर का वाक्य गले में अटका ही रह गया कि दूर कोई वन में से बेतहाशा भागा चला आ रहा था । पास आने पर पता चला यह तो आचार्य जी थे जिनके विषय में नौकर अभी-अभी कह रहा था । यह दार्शनिक तो हमेशा सिर नीचा किये चिन्तामग्न अवस्था में डूबा हुआ धीरे-धीरे चलने वाला व्यक्ति है, आज इस प्रकार सुधबुध खोकर क्यों भागा चला आ रहा है ? यह विचार उन दोनों के मन में आया और वे घबराकर उठ खड़े हुए ।

"छोटे स्वामी कहां हैं? गोपाल कहाँ है और तुम लोगों के कुल्हाड़े, फावड़े, गंडासे आदि चारा काटने के हथियार कहां हैं ?”

दोनों नौकरों ने आचार्य की तरफ बड़े अविश्वास से देखा और आचार्य की फटी-फटी आँखों में कुछ पाने के लिए घूर-घूरकर देखने लगे । उन्हें लगा आज से पूर्व जो आचार्य लोगों के मन का भेद जान लेता था, आज उसका अपना मन भ्रान्त हो गया है ।

एक नौकर ने रुकते-रुकते पूछा, "हम और हमारे हथियार यहीं हैं परन्तु आप अपनी घबराहट का कारण बतायें, जिसके लिए आप इतने ....।"

आचार्य ने भिक्षुणियों के मठ की ओर संकेत करते हुए कहा, "वहाँ एक ऐसा बीभत्स काम हो रहा है जिसे आँखें देख नहीं सकतीं ।"

"क्या डाकू आ गए हैं ?"

"डाकू ! डाकू भी उतने नीच और कमीने नहीं होते जितने नृशंस वे लोग हैं । उनके कुकृत्य का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं ।"

पहला नौकर बोला - "यद्यपि मैं आपका अभिप्राय पूर्णतः नहीं समझ सका, फिर भी अगर आप हमें डाकुओं से सामना करने के लिए ले जाना चाहते हैं तो अपने स्थान पर मैं आपको ऐसे व्यक्तियों का पता बताता हूँ जो हम लोगों से अधिक साहस तथा दृढ़तापूर्वक उनका सामना कर सकते हैं । वे लोग परदेसी हैं, जो भग्न मन्दिर में आकर ठहरे हैं । हमें उनके पास जाकर सारी स्थिति समझानी चाहिए । वह पहले यहीं ठहरना चाहते थे परन्तु हमने उन्हें ....।"

अधीरचित्त आचार्य ने नौकरों की बात पूरी होने से पहले ही कहा, "अरे, तुमने उन्हें यहां आश्रय क्यों नहीं दिया ?" फिर वह बिना किसी ओर ध्यान दिये उस भग्न मन्दिर की ओर दौड़ पड़े ।

रुद्रदत्त ने गहरी दृष्टि से आचार्य की ओर देखा । सब बातें सुनने के बाद उसने अपने साथियों से कहा, "धूमकेतु ! महाबाहु !! तथा बहराम !!! तुम लोग आचार्य के साथ जाओ ।"

तीनों आचार्य के बताये स्थान की ओर इस वेग से दौड़ पड़े जैसे कोई हिंस्र प्राणी अपने शिकार की ओर दौड़ता है ।

पाँच और एक का रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध सारे वातावरण में सनसनी उत्पन्न कर रहा था । हूणों के घेरे में फंसे उस युवक का सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया था । शरीर से रक्त की धारायें फूट रहीं थीं । कनपटी और आधे गाल की खाल कटकर गर्दन पर लटक रही थी । उसका अंगरखा पेट और छाती पर से फट गया था । धोती चीथड़े-चीथड़े हो गई थी तथा उसके गले में पहने मूल्यवान हार के मनके भूमि पर बिखरे पड़े थे । चारों तरफ से हो रहे आक्रमणकारियों के अगणित प्रहारों को रोकते-रोकते वह बेसुध-सा हो रहा था, उसकी आँखों के आगे अंधकार छा रहा था । अंग शिथिल पड़ गये थे । उतनी फुर्ती से अब उसकी खड़्ग नहीं चल रही थी । दूसरे हाथ की ढ़ाल अब उसे बोझ के समान लग रही थी । अत्यधिक रक्तस्राव और थकावट से वह निढ़ाल होकर गिर पड़ने की स्थिति में पहुंच गया था ।

परन्तु इस आसन्न मृत्यु की घड़ी में भी उसकी इच्छाशक्ति उतनी ही प्रबल थी । वह गिरता-गिरता भी शत्रुओं के प्रहारों को रोक रहा था । आखिर एक हूण का वार उसके कन्धे को छूता हुआ पेट पर जा लगा जिससे उसकी आंतें बाहर निकल आईं । ढ़ाल फेंककर उस वीर ने एक हाथ से अपना कोट सम्भाला और दूसरे से उन पर प्रहार करना चाहा । परन्तु वह बेसुध होकर भूमि पर गिर पड़ा जो उसी के रक्त से चिक्कण हो रही थी । तीन हूण भूखे भेड़िये की तरह उसकी इहलीला समाप्त करने अपनी खड़्गों को लेकर उसकी ओर लपके परन्तु पीछे से सनसनाते बाण उनकी खोपड़ियों में आ चुभे ।

"जीवित है ।" महाबाहु ने घायल सवार की छाती पर हाथ रखने के पश्चात् कहा "यदि किसी कुशल वैद्य की सहायता मिल जाती तो सम्भव है इसके प्राण बच जायें ।"

"इसका प्रबन्ध हो जायेगा" पीछे से दौड़कर आता हुआ आचार्य बोला, "परन्तु भय है कहीं मार्ग में दम न तोड़ दे । इसे बड़े घाव लगे हैं, सारा शरीर क्षत-विक्षत हो चुका है ।"

"आचार्य", दोनों नौकर जो आचार्य के पीछे पीछे भाग रहे थे, बोले "क्या छोटे महाराज के पास इन्हें ले चलें?"

"हां, परन्तु देखना, इसे सावधानी से उठाना ।"

नौकरों ने फुर्ती से घायल सवार के हार के बिखरे मोती एकत्र किए और उसे उठाकर झोंपड़ी की तरफ चल पड़े ।

मृत हूणों की ओर दृष्टि डालकर जब धूमकेतु और महाबाहु बहराम को लेकर घायल व्यक्ति के पीछे-पीछे चलने लगे तो आचार्य बोला, "ठहरिये ! इन राक्षसों के शिकार कुछ अन्य व्यक्ति भी हैं जिन्हें हमारी सहायता और सहारे की आवश्यकता है । आइये !" वह उन तीनों युवकों को लेकर एक ओर चल पड़ा ।

"मैं प्राकृतिक दृश्यों और भगवान की बनाई इस मनोहर छटा का आनन्द उठाने के लिए उस सामने वाली पहाड़ी पर बैठा था कि मैंने देखा हूण लुटेरों की एक छोटी सी टुकड़ी भिक्षुओं के मठ में घुस गई तथा थोड़े समय के पश्चात् जब वह बाहर निकली तो उन सिपाहियों की खड़गें रक्त से सनी थीं तथा भगवान् बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति उन्होंने अपनी बगल में दबा रखी थी । फिर वे भिक्षुणियों के मठ की ओर गए । परन्तु भिक्षुओं की हत्या का समाचार भिक्षुणियों के मठ में पहले पहुंच गया था । इसलिए उनके पहुंचने से पूर्व ही वन में जा छुपीं । परन्तु इन दुष्टों ने उन्हें ढ़ूंढ निकाला और उनमें से कई भिक्षुणियों को वृक्षों से बांध दिया और कुछ स्‍त्रियों के सतीत्व पर आक्रमण किया । दूर होने के कारण जो कुछ हुआ, उसे मैं अच्छी तरह नहीं देख सका ।"

सरकण्डे के झुण्ड को पार कर उनकी आंखें एक ऐसे दिल दहला देने वाले नारकीय अत्याचार के दृश्य से टकराई जिसने न केवल इन पीड़ित स्‍त्रियों के शरीरों को बीभत्स बना दिया था अपितु देखने वाले के मन और आंखों को क्षुब्ध कर रहा था । नंगे शरीर वाली, देवी के समान पवित्र, गौ के समान शीलवान् चालीस भिक्षुणियां वृक्षों से बंधी हुई थीं । उनकी बेसुध गर्दनें एक ओर लटक रही थीं और कईयों की आंखों से अविरल अश्रुधारायें बह रहीं थीं । उनकी कटी हुई छातियों से रक्त टपक टपक कर भूमि को भिगो रहा था । और छः युवा भिक्षुणियां .... अत्याचारी विदेशियों ने जिनके साथ बलात्कार किया था, पृथ्वी पर मुर्दों के समान पड़ीं थीं, मानो उनका सम्मान धरती में समा गया हो और मन, ऐसा लगता था मानो उन अपवित्र शरीरों को छोड़कर कहां अन्यत्र चला गया हो ।

"ओह, मेरे प्रभु !" महाबाहु के मुंह से वेदना भरी आह निकली ।

"विदेशी राक्षसो !" क्रोध में भरकर धूमकेतु बोला, "हिन्दू देवियों पर अत्याचार करने का तुम्हें ऐसा कठोर दण्ड दिया जाएगा कि इतिहास के सिवाय भूमण्डल में तुम्हारा अस्तित्व ही न रह सकेगा । हम भारतीय युवक या तो तुम्हें इस सृष्टि से ही मिटा देंगे या स्वयं को ।"

बहराम कई पग पीछे हटा और दूसरी ओर मुंह करके खड़ा हो गया । वह सन्यासी उन छः स्‍त्रियों के ऊपर चादर डालने और सहारा देने के लिए उनकी ओर बढ़ा ।
 
"सन्यासी महाराज" वह स्‍त्रियां सूखे कण्ठों से चिल्लाईं, "हमें हाथ मत लगाओ । हमारे शरीर भ्रष्ट हो चुके हैं । हमारा शरीर नष्ट हो चुका है, हम गन्दगी में रेंगने वाले कीड़े के समान हो गई हैं । अगर आप हमारे साथ सहानुभूति रखते हैं तो चिताएं बनवाएं । अग्नि की भीषण ज्वालाओं में ही हम अपनी कलुषित आत्मा की जलन मिटा सकती हैं । इस अपमानित जीवन को लेकर अब हम जीना नहीं चाहतीं । न जाने किन पापों के फलस्वरूप आज हमें यह दिन देखना पड़ा है । न जाने कौन सा प्रायश्चित हमारे इस कलंक को धो पाएगा ।"

"देवियो ! भिक्षुणियो !!" सान्त्वना भरे शब्दों में आचार्य ने कहा । उनकी आंखों में अश्रु उमड़ आये । उनका कण्ठ रुक गया । कोहनियों के सहारे उठती हुई भिक्षुणियां विस्मयाभिभूत होकर एक दूसरे की तरफ देखने लगीं, जैसे वे आपस में किसी को पहचान ही न रहीं हों । धूल में सनी अपनी हथेलियों से उन्होंने अपनी आंखें मलीं । क्या सपने देख रहीं हैं अथवा .... सहसा उनकी दृष्टि कटी छातियों वाली अपनी सहयोगिनियों की तरफ गई जो रक्त से स्नात बेसुध सी खड़ीं थीं । जब उन्होंने अपनी गर्दनों में लटकते हुए उन हारों को देखा जो उनकी बहिनों के मांस से पिरोकर बनाए हुए थे, वे घबराकर उछल पड़ीं । उन्होंने उस माला को उतार फेंका और चीखती चिल्लाती वन की तरफ भागने लगीं, मानो किसी सर्प का स्पर्श होने से घबरा उठीं हों । उनका शरीर पास खड़ी कटीली झाड़ियों से क्षत-विक्षत हो गया और वे बेसुध होकर झाड़ियों पर गिर पड़ीं ।

"हे मेरे प्रभु ! ओह भगवान् !!" सन्यासी ठंडी सांस भरता हुआ उन विक्षिप्‍त ललनाओं की ओर भागा ।

धूमकेतु ने शीघ्रता से वृक्षों के साथ बंधी भिक्षुणियों को खोला और उन्हें चादरें ओढ़ा दीं । तत्पश्चात् वह उन भिक्षुणियों की ओर बढ़ा जो झाड़ियों में उलझी बेसुध पड़ीं थीं ।

"आओ मेरी हतभागिनी बहनो ! काश हम पहले पहुंच सकते ।" सन्यासी स्‍त्रियों से बोला, "आओ, तुम मेरे साथ सामने की झोंपड़ियों तक चलो । वहां मेरा साथी तुम्हारी मरहम पट्टी कर देगा ।"

"हमारे घावों की मरहम पट्टी ! ओह ! इन घावों की जलन को तो अग्नि की ज्वाला ही शान्त कर सकती है । हम प्रायश्चित करना चाहती हैं । सन्यासी बाबा, यदि आप वास्तव में हम पर उपकार करना चाहते हैं तो कृपया हमारे लिए चिताएं बनवाइये । आप नहीं जानते महाराज, हमारी जन्म-जन्मान्तर की कमाई लुट चुकी है, हमारी वर्षों की तपस्या नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी है । इस असहाय आघात से हमारी आत्मा व्याकुल हो रही है परन्तु यह पापी शरीर उसको पकड़े बैठा है ।"

"ओह ! देवियो ...." इस उत्तर से सन्यासी पत्थर की मूर्ति के समान जड़ हो गया । महाबाहु का शरीर काँप उठा, वह कहने लगा - "बहिनो ! माताओ !! इस अत्याचार और पापपूर्ण स्थिति का सामना आप लोगों को देखना नसीब न होता यदि हमें समय पर इस बात का पता लग जाता । परन्तु होनी को कोई टाल नहीं सकता । जो दुर्घटना हो चुकी है उसे अब मिटाया नहीं जा सकता । यह सच है कि आप लोगों को असह्य अत्याचार का शिकार होना पड़ा है । इतनी दुर्दशा होने पर कोई भी भारतीय नारी जीवित रहना पसन्द नहीं करेगी । इस घृणित जीवन से मौत हजार गुनी अच्छी है । चाहे हमें यह कार्य करते हुए कितनी ही वेदना हो रही हो, परन्तु तब भी हम आपके लिए चिताएं तैयार कर देते हैं । परन्तु इससे पूर्व कि हम आपके लिए चिताएं बनायें मेरी करबद्ध प्रार्थना है कि मेरी बात को सुन लें ।"

"जिन छः दुष्ट हूणों ने आप लोगों पर अत्याचार किया है, वे मौत के घाट उतार दिये गये हैं । परन्तु मेरी बहिनो, केवल छः ही नहीं, अपितु कितने सहस्र इन्हीं के समान अपने अमानुषिक कुकृत्यों से भारतभूमि को पददलित कर रहे हैं । अगणित नारियों का सतीत्व नष्ट कर रहे हैं । कितने शान्तिप्रिय ग्रामीण किसानों, सन्यासियों, भिक्षुओं को मौत के घाट उतार रहे हैं, हमारे पवित्र स्थानों को जला रहे हैं, हमारे देवी-देवताओं का अपमान करते फिर रहे हैं । कितने ही गांव और नगर उनके अत्याचारों का शिकार हो चुके हैं । ज्ञान और शान्ति का देश आज हाहाकार की ज्वालाओं में जल रहा है, सारा देश इन आतताइयों के पैरों तले रौंदा जा रहा है । ऐसी विकट स्थिति का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक युवक के अन्दर देशप्रेम की जोत जगानी है ताकि वे अपने देश की मान मर्यादा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए कटिबद्ध हो जाएं और इस उठते तूफान को अपने वज्र समान कठोर वक्ष की दीवार से रोक दें । सोई जाति को जागृत करने के लिए प्रचार की अत्यधिक आवश्यकता है । मैं सन्यासी बाबा से तथा आपसे प्रार्थना करता हूं, आप लोग देश जागृति के पुण्य कार्य में अपना योग दें । देश के एक कोने से दूसरे कोने तक आप पर किये गये अत्याचारों का दिग्दर्शन कराते हुए लोगों में वह प्रतिकार की अग्नि प्रज्वलित करें जिस से हूण अत्याचारी भस्मसात् हो जायें । इस समय जब कि अपने घर में आग लग रही है, ज्ञान, ध्यान, पूजा, पाठ अच्छे नहीं लगते । देवियो, आप सन्यासी बाबा के कार्य में हाथ बटायें । यदि आप बोल नहीं सकती तब भी आप का यह रूप देश में प्रतिहिंसा की अग्नि जलाने में समर्थ है । यह सत्य है कि आप उदार हैं । दुष्टों को क्षमा की सामर्थ्य भी आपमें है और यह भी ठीक है कि इतना अपमान सहने के पश्चात् आप के आत्मबलिदान के निश्चय में बाधा उत्पन्न करना ठीक नहीं । अपने इस घृणित और अपमानित रूप को स्थान-स्थान पर दिखाते फिरने की सलाह देना भी बड़ा भारी अपराध है। परन्तु उन अनेक देवियों के लिए जिन्हें किसी भी दिन आप ही की तरह अपमान सहना पड़ेगा या जो इन राक्षसों के हाथों अपना सब कुछ नष्ट कर चुकी हैं, का बदला लेने के लिए अथवा उन असंख्य माताओं के हृदय की आग को शान्त करने के लिए जिनकी लाज इन दुष्टों की खड़्ग का शिकार हो चुकी है, उन स्‍त्रियों के लिए तुम लोगों की आवश्यकता है । वह एक ऐसी आवश्यकता है जिस के बिना हमारे सारे प्रयत्‍न, हमारा भविष्य अंधकार में विलीन हो जायेगा । मेरी तुम लोगों से प्रार्थना है कि अपने लिए भले ही मर जाओ परन्तु अपनी जाति के लिए, अपने देश के लिए जीती रहो, उस समय तक जब तक कि इस देश का एक-एक हिन्दू अपनी मर्यादा के लिए, अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए, अपने हाथ में खड़ग पकड़कर इन विदेशियों का शिरच्छेदन न कर दे । देवियो ! यह जाति जिसने सम्पूर्ण संसार को विद्या ज्ञान का अक्षय भंडार मुक्तहाथ से लुटा दिया था, जिस प्रकार इस देश के महापुरुषों ने अपने पराये का भेद न रखते हुए सम्पूर्ण संसार में अपने ज्ञान की गरिमा को बढ़ाया, अज्ञानियों और निरक्षर देशों के अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर अमर ज्ञान के दीपक जलाये, उस देश पर एक ऐसी जाति, जिसकी कोई संस्कृति नहीं, यहां तक कि जो मानव कहलाने का अधिकार नहीं रखती, हम पर आक्रमण कर हमें नष्ट कर रही है, जिस जाति के सैनिक सूअरों और बकरों के समान कामी तथा भेड़ियों के समान हिंसक और निर्दयी हैं, अपने अन्धे पशुबल और अटूट संगठन के बल से हमारी श्रेष्ठता और उच्चता को कुचलते हुए बढ़ रहे हैं । क्या सारे पीड़ित पुरुष तथा स्‍त्रियां आप ही की तरह चिता में जल मरेंगे ? नहीं, भारत कायरों के समान आत्मघात नहीं करेगा । अपने सम्मान की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यहां का प्रत्येक पुरुष लड़ मरेगा । इसलिए देवियो, एक बार अपनी ओजस्वी वाणी से राष्ट्र की आत्मा में प्राण फूंक दो, ताकि इस बढ़ते अत्याचार की बाढ़ को अपने त्याग और बलिदान के अटूट बन्धन से रोका जा सके ।"

जैसे-जैसे महाबाहु का व्याख्यान जोर पकड़ता गया, तैसे-तैसे उन निराश तथा अपने आपको घृणित और अपमानित समझने वाली भिक्षुणियों के हृदय आत्म-बलिदान तथा जातीय प्रेम से फूलने लगे । कटी छातियों वाली भिक्षुणियां अपनी वेदना भूल गईं। जो केवल निर्वाण प्राप्‍ति और सम्मान को ही सर्वोपरि समझती थीं, आज उनमें राष्ट्र अभिमान की ज्योति प्रज्वलित होने लगी । उस बूढ़े दार्शनिक की आंखों में आग की चिंगारियां फूटने लगीं, बूढ़ी भिक्षुणी एक पग आगे बढ़ कर बोली, "धर्मपुत्र ! तुम्हारी बातों में हमें ज्ञान का वह प्रकाश मिला है जो हमारे भावी जीवन को मार्ग दिखायेगा । हम सब आततायी हूणों से पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए अपनी कटी छातियों पर लिखे अत्याचार की कहानी सुनाती हुई घूमती फिरेंगी । जन-जन में स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर अपना तन, मन, धन अर्पण करने की भावना भड़कायेंगी और समूचे देश में क्रान्ति की वह आग लगायेंगी जिसकी ज्वाला में ये आततायी राक्षस जलकर भस्म हो जायें । अब से हमारी वाणी से ज्ञान, तपस्या और निर्वाण की बात नहीं निकलेगी, अपितु देश और जाति के सम्मान की रक्षा के लिए आग की चिंगारियाँ निकलेंगीं ।”

उन लाज लुटी युवतियों ने जमीन पर पड़े उन हारों को जिन्हें उन्होंने सर्प के समान डसने वाला समझकर गले से उतारकर फेंक दिया था, उठाकर फिर से गले में डाल लिया और बोलीं, "हमारे शरीरों की फटी चादरें और बहते रक्त की धाराओं का रूप इसी प्रकार विद्यमान रहेगा । हूणों के अत्याचारों की मुंह बोलती कहानी यह कटी छातियों के हार हमारे गले में पड़े रहेंगे । हम शपथपूर्वक कहती हैं कि तब तक हम चैन न लेंगीं जब तक कि पापी हूणों की सेनाएं भारतीय योद्धाओं से पराजित होकर नष्ट-भ्रष्ट नहीं हो जातीं । हम एक दिन से अधिक एक स्थान पर नहीं ठहरेंगी । इसके पश्चात् हे वीर आत्माओ ! जिस प्रकार राष्ट्र की पुकार को जन-जन को सुनाने का हमने बीड़ा उठाया है, उसी प्रकार तुम भी एक भीख हमें दे देना । हमारे इन कलुषित शरीरों को पवित्र करने के लिए सात-सात मन लकड़ियों की एक-एक चिता और चिंगारी दिला देना ताकि हम भगवान् के दरबार में अपनी करुण गाथा सुना सकें ।

"माताओ और बहनो !" तुम जो कुछ हमें कहोगी, हम करेंगे । सारी जाति अपनी हुतात्माओं और सतियों की राख को अपने मस्तक पर धारण करेगी । उन चिताओं पर प्रतिवर्ष मेले लगेंगे और तुम्हारा नाम इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा ।"

"इधर आओ बहिना !" सन्यासी बोला, "हम सबने राष्ट्र सेवा की शपथ ली है । एक क्षण भी नष्‍ट करने का अभिप्राय है लाखों भाई बहिनों का क्रूर हूणों के हाथों संहार और स्‍त्रियों का अपमान !"

महाबाहु ने भगवान् बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा उठा ली और सब लोगों के साथ चल पड़ा । उसकी खड़ग का मुट्ठा अहिंसा के देवता के साथ रगड़ खा रहा था ।

वह वैद्य जो रसों, रसायनों, विषों और उपविषों के ज्ञान में अत्यधिक अधिकार रखता था, शल्य चिकित्सा में भी अद्वितीय था । सब लोगों के पहुंचने से पहले ही उसने घायल घुड़सवार के घावों को सी दिया और उन पर पट्टी बांध दी थी । वह अपने कार्य में इतना मस्त था कि उसे सबके आने की खबर तक न लगी । उसने औषधि की एक खुराक मरणासन्न घायल के मुख में डाली । औषधि पहुंचते ही उस वीर का शरीर हिला और उसकी मूर्छा टूट गई । वह इतना कमजोर हो गया था कि उसे कुछ भी याद नहीं रहा । अपनी स्मृति को सजग करने के लिए वह इधर-उधर देखने लगा, मानो यह पहचानने का प्रयत्‍न कर रहा हो कि वह कहां है और ये लोग कौन हैं ?

"मेरा विचार है किन्हीं विदेशी सैनिकों के साथ युद्ध करते करते मैं घायल हो गया था ।"

"हां, यह सत्य है । परन्तु तुम लेटे रहो, अधिक बोलने अथवा हिलने का प्रयत्‍न मत करो ! आक्रमणकारी मारे जा चुके हैं और तुम एक हिन्दू सन्यासी की कुटिया में हो जहां तुम्हें किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।" धीरे से घुड़सवार ने अपनी गर्दन सिर के नीचे रखे तकिये पर गिरा दी ।

"कौन ? आचार्य जिज्ञासानन्द जी ?" धूमकेतु ने तक्षशिला के पुराने शिक्षक को पहचान लिया था ।

आचार्य जिज्ञासानन्द ने गर्दन मोड़ी । "ओह, धूमकेतु और महाबाहु ! और यह ईरानी विद्यार्थी ....?"

"किसे मालूम था कि आपके यहां दर्शन होंगे?" दोनों हिन्दुओं और ईरानियों ने सन्यासी के चरण छुए ।

"और यह हमारे वेदान्त आचार्य .... इनको आप लोगों ने नहीं पहचाना ?"

चारों शिष्यों ने अपने दूसरे गुरु के चरण स्पर्श किए और उनकी रण रज अपने मस्तक पर लगाई । वृद्ध सन्यासी बाबा ने आशीर्वाद देते हुए कहा, "मैं भी तो इन्हें पहचान नहीं सका ।"

"वास्तव में हम लोगों की भेंट ही ऐसी स्थिति में हुई कि ...."

वेदान्ती बाबा ने अन्तःकरण से आशीष देते हुए कहा, "महाबाहु, यद्यपि तुम्हारी रुचि वेदान्त की अपेक्षा राजनीति, शस्‍त्रास्‍त्र संचालन में अधिक थी, इस दृष्टि से तुम मेरे प्रकट रूप से शिष्य नहीं रहे, फिर भी एक ही कुल के विद्यार्थी होने के नाते तुम भी शिष्यों की श्रेणी में आते हो । किसी प्रकार का परिचय न होते हुए भी तुमने मेरी सहायता करके न केवल शिष्यता का ऋण चुकाया, अपितु मुझे एक ऐसा पाठ पढ़ाया जिससे मेरे ज्ञानचक्षु खुल गए । आज मुझे पता चला कि केवल वेदान्त की गुत्थियां सुलझाने में ही संसार का कल्याण नहीं, अपितु ज्ञान और शस्‍त्र, क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों ही समाज के पूरक अंग हैं । आज मैं अनुभव कर रहा हूँ कि मेरा कर्त्तव्य देश के प्रति भी कुछ है, इसके लिए भी मैं तुम्हारा आभारी हूँ । हम सब तुम्हारे कहने के अनुसार देश के कोने-कोने में घूमेंगे । दुखियारी भिक्षुणियो ! हम हूणों के अत्याचार की गाथा सुनाते हुए सारे देश में प्रबल प्रतिहिंसा की अग्नि प्रज्वलित करेंगे ताकि सारा देश हूणों के खून से देश की अगणित पीड़ित सन्तानों का तर्पण कर सके । आज से बैठकर खाना और नींद भर सोना हराम है । ध्यान, ज्ञान, पूजा-पाठ उस समय तक नहीं करेंगे जब तक मातृभूमि का कोना-कोना इन आतताइयों के चंगुल से मुक्त नहीं हो जाता ।"

"गुरुदेव, आपने हमारी जिम्मेदारी को संभालकर हमारे कंधों के भार को हल्का कर दिया ।"
 
"आज से ही हम अपने यज्ञ की अग्नि में समिधा लगाते हैं । इसी गांव से हम अपना काम आरम्भ करते हैं । मैं गाँव में जाकर सब लोगों को एकत्रित करता हूँ । अब हम जीवन और मृत्यु का युद्ध करेंगे । उसका पहला जत्था भी इसी गाँव से तैयार होगा । देवियो, आप जैसी साध्वी और गंगाजल की तरह पवित्र इन भिक्षुणियों की कटी छातियों और लुटे हुए सम्मान की चिंगारी सारे देश में आग लगाने के लिए काफी है ।"

"इनके अतिरिक्त गुरुदेव ! सामने के खंडहरों में ठहरे मेरे मित्र के साथ अत्याचार के कुछ और भी चित्र हैं जिनको देखकर पत्थर हृदय भी पसीज जायेगा।"

"अरे हाँ ! मैं तुम्हारे मित्र और उनके घायल साथियों को भूल ही गया था । मैं उन्हें भी यहीं बुलवाता हूँ ।"

महाबाहु बोला, "वे अपने ही स्थान पर ठीक हैं, श्री जिज्ञासानन्द जी ! आप पहले इन देवियों की मरहम पट्टी करें । फिर घावों पर लगने वाली दवाई तथा शक्तिवर्द्धक औषधियाँ लेकर, जिस खंडहर में सब लोग ठहरे हुए हैं, वहाँ जायें । जाते समय थोड़ा गर्म दूध और खाद्य सामग्री भी लेते जाइयेगा तथा एक नौकर यहाँ पर हम सबके भोजन का प्रबन्ध करे । जितनी देर में हम वहाँ का काम सम्भाल कर के वापस आते हैं, तब तक वेदान्ती जी महाराज लोगों को एकत्र कर आज की सभा का आयोजन करें ।"

वेदान्ती महाराज ने थोड़े ही समय में सारे गाँव को एकत्र कर लिया । किसान-जमींदार, दुकानदार, वृद्ध, स्‍त्रियाँ और पुरुष सन्यासी महाराज की आवाज पर गाँव की चौपाल में इकट्ठे हो गए । गाँव का बच्चा-बच्चा खेतों, खलिहानों गली बाजार से सिमट कर वहाँ पर आन उपस्थित हुआ । स्वार्थहीन, हमेशा ध्यान पूजन में निमग्न रहने वाले वीतरागी बाबा ने आज किस लिए हमें बुलाया है ? अथवा कोई विशेष बात होगी । सारा एकत्रित समूह आश्चर्य में डूबा चौकी पर शान्त खड़े सन्यासी बाबा की ओर टिकटिकी लगाये देख रहा था । उसका दुबला-पतला शरीर, शुभ्र दाढ़ी और हीरे के समान चमकने वाली आंखें सारे जनसमूह पर अपना सम्मोहन छोड़ रहीं थीं । प्रत्येक व्यक्ति बड़े शान्त भाव से अपने स्थान पर खड़ा था । कभी-कभी हल्की-हल्की कानाफूसी की फुसफुसाहट सुनाई देती और फिर शान्त हो जाती । गाँव के कुत्तों तक की आवाज सुनाई नहीं देती थी ।

कुछ नये व्यक्तियों के सभास्थल में प्रवेश करते समय सारे जनसमूह का ध्यान उधर आकर्षित हुआ । उनके पीछे-पीछे रक्त से भीगी, फटे चीथड़े पहने, कटी छातियों वाली भिक्षुणियाँ नीचा सिर किये चली आ रहीं थीं । उनके बाद तीन युवकों का सहारा लिए तीन आदमी आगे बढ़ रहे थे, जिनके सारे शरीर की चमड़ी को दुष्ट हूणों ने उतार दिया था । उनके सारे शरीर में से रक्त रिस रहा था । वे सब लोग चौकी के पास आकर खड़े हो गए । इस अद्‍भुत दृश्य को देखकर सारा जनसमूह संतृप्‍त भाव से एक दूसरे की ओर देखने लगा, मानो किसी ने उनकी जबान को ताला लगा दिया हो ।

महाबाहु वेदान्ती बाबा के पास चिन्तित भाव से खड़ा था । यह सोच रहा था कि आचार्य जी यद्यपि महान् विद्वान हैं और अपमान की चोट से उनका हृदय भी तिलमिला रहा है । परन्तु उन्होंने कभी इस प्रकार भाषण नहीं दिया जिससे जनता की सुप्‍त भावनाओं को जगाया जा सके, भले ही वह आध्यात्मवाद के विषय में कितना ही गम्भीर और सारगर्भित भाषण दे सकते हों, आत्मा, परमात्मा, जड़ और चेतन, जगत की रहस्यमय गुत्थियों को सुलझा सकते हों, परन्तु जनता के मर्मस्थल को छूकर देश और जाति के लिए प्राणोत्सर्ग करने की भावना को उद्दीप्‍त नहीं कर सकते । वह चाहता था आज जिस पवित्र यज्ञ का आरम्भ हो रहा है, फीका न रहे । अतः वह व्याख्यान को आरम्भ करने के लिए तैयार सन्यासी बाबा के पास जाकर बोला - "यदि आप आज्ञा दें तो मैं पहले अपना भाषण दे लूँ ?"

"बोलो ! हाँ, अवश्य बोलो !! अपितु मेरा तो विचार है कि आज का भाषण तुम्हीं दो । तुम अच्छे वक्ता हो । मैं बाद में तुम्हारे भाषण का अनुमोदन कर दूँगा ।"

महाबाहु ने बोलने के लिए गला साफ किया और फिर वह अपनी ओजस्वी वाणी में गरजा ।

"देश बन्धुओ ! आज पुण्यभूमि भारत पर जो विदेशियों का अत्याचार और अनाचार बढ़ रहा है वह किसी से छुपा नहीं है । और जो अब तक नई बातों से अनभिज्ञ हैं, यह अत्याचार के इन नमूनों को जो आपके सामने खड़े हैं, देखें कि किस प्रकार अनाथों, अबलाओं और देश के सच्चे सपूतों को कष्ट दिया गया है । आपको पता होना चाहिए कि चीनी तुर्किस्तान की वह असभ्य और खूंखार जाति हमारे प्रिय देश के ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में लूटमार करती फिरती है । सीमाप्रान्त के दो-चार राजाओं ने इस बाढ़ को रोकना चाहा परन्तु आपस में एकता न होने के कारण वे लोग एक-एक कर नष्ट हो गए । देश में शस्‍त्र धर्म का अभाव देखकर उन्होंने बिना बाधा के देश में मार-काट आरंभ कर दी । उन्होंने इतना भयंकर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया है जो पशुत्व की सीमा को भी पार कर गया है और जिसका वर्णन सुनने मात्र से मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है । वे लोग उद्यानों, खेतों और खलिहानों को आग लगाते फिरते हैं, कोमल और नन्हें बच्चों को भूनते खाते हैं । मन्दिरों, मठों को धराशायी करते फिरते हैं । भिक्षुओं, सन्यासियों की हत्या करते हैं, अबलाओं और भिक्षुणियों के सतीत्व को लूटते फिरते हैं । वह अत्याचार की आँधी जो अभी तक यहाँ नहीं पहुंची थी, उसके लक्षण यहाँ भी प्रकट होने शुरू हो गए हैं । आज उन्होंने पास के बौद्ध विहार के भिक्षुओं को तलवार के घाट उतार दिया, भिक्षुणियों की छातियाँ काट कर उनकी माला अपने गलों में धारण की । इन तीन उच्च घराने के व्यक्तियों की खालें खिंचवाकर इन्होंने लटका रखा था । हम ही जानते हैं कि किस प्रकार हमने जीवन और मृत्यु के बीच लटकते इन लोगों को वहाँ से छुड़ाया है । भले ही हमने उन लोगों को मार दिया है परन्तु इस प्रकार की उनकी अगणित टोलियां बढती चली आ रही हैं । वह सब लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे जैसा इनके साथ आपको दिखाई देता है । वह तुम्हारे घर की प्रत्येक वस्तु को लूट लेंगे । तुम्हारे बच्चों को अपने भालों की नोंक से छेद डालेंगे, तुम्हारी स्‍त्रियों को छीन लेंगे, तुम्हारे घरों को जला देंगे, बड़े बूढ़ों की खालें खिंचवा लेंगे । और अब तो अपने साथियों की मृत्यु का बदला लेने के लिए न जाने किन-किन नए तरीकों को अपनाकर प्रतिशोध की ज्वाला बुझायेंगे । इसलिए हे देश बन्धुओ ! आत्म-रक्षा और देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ, सारे देश में वह जागृति की लहर चलाओ कि चप्पे-चप्पे जमीन के लिए विदेशियों को लड़ना पड़े । गली-गली युद्ध-क्षेत्र बन जाए । प्रत्येक भारतीय त्रिशूलधारी शंकर के समान रिपु-मर्दन के लिए संहारक बन जाये, नारियां रण-चण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के दांत खट्टे कर दें । सारा देश प्रलयंकारी उद्‍घोष से शत्रुओं के दिल दहला दे और उनको यमलोक पहुंचा कर इस पृथ्वी को पवित्र करे ।"

"वीरो और वीरांगनाओ !! हमारे देश और जाति पर संकट के बादल उमड़ आये हैं । विनाश की बिजलियाँ हमारे चारों ओर चमक रही हैं । मौत की आंधियाँ चल रहीं हैं । इस समय कर्त्तव्य और बलिदान के चप्पुओं से हम देश और जाति की नाव को किनारे लगा सकते हैं । इसलिए हे मेरे वीरो, उठो ! शस्‍त्र संभालो और सिद्ध कर दो कि जिस प्रकार विद्या, बुद्धि-ज्ञान में कोई हमें हरा नहीं सका, उसी प्रकार हमारे खड़ग का वार सहने की शक्ति भी संसार की किसी जाति में नहीं है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस धर्म-युद्ध के लिए हमें महीनों अथवा सालों लड़ना पड़ सकता है । इसलिए सब लोग प्रतिज्ञा करो कि हम देश के स्वतंत्र होने तक अपना सुख-चैन, सगे-संबंधी, मित्र, स्‍त्री, बच्चे सब को छोड़ देंगे । यहाँ तक कि समय आने पर हम अपने शरीर की भी बलि दे देंगे । इतना दृढ़-संकल्प हमें अवश्य सफलता के सोपान पर चढ़ा ले जायेगा ।"

"भाइयो और बहनो ! खेत जोतने वाला किसान जिस प्रकार अपना रक्त-पसीना एक कर देता है ताकि समय आने पर वह सुख-चैन के दिन बिता सके । जिस प्रकार व्यापारी लोग धनोपार्जन के लिए अपना दिन का सुख-चैन बलिदान कर देते हैं ताकि शाम को आनन्द की नींद आ सके । उसी प्रकार जातियों के जीवन में उथल-पुथल का समय आता है, कभी संघर्ष की दीवारों से टकराना पड़ता है और कभी आनन्द की सुरभि से अपने तन मन को आह्‍लादित करना पड़ता है । जब घर में आग लगी हो, ऐसे समय चैन की बंसी बजाना कहाँ तक हमें शोभा देता है ?"

"भाइयो ! अब आप लोग अपने कर्त्तव्य को स्मरण करो । समय की पुकार है, अपने व्यक्तिगत काम छोड़ कर देश की स्वतंत्रता के युद्ध में कूद पड़ो । आज का तुम्हारा बलिदान, तुम्हारे बच्चे, तुम्हारी माँ बहिनों और भाइयों के जीवन को अक्षय सुख प्रदान करेगा । आओ, आज हम सब आपस के विरोध भुला दें । सब लोग चाहे वह किसी धर्म, सम्प्रदाय अथवा श्रेणी से संबन्ध रखते हों, एकता के सूत्र में बंध जायें और मां भारती की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व होम कर दें ।"

महाबाहु थोड़ी देर के लिए रुका, उसने शान्त खड़े जनसमूह पर दृष्टि डाली । उसके भावों के उतार चढ़ाव को देखा, अपने गले को साफ करता हुआ वह फिर बोला –

"मेरे प्यारे देशवासियो, मेरी आंख देख रही है कि तुम्हारा मन अपने कर्त्तव्य पर मर-मिटने के लिए तत्पर हो रहा है । जिस प्रकार मेरे हृदय की ज्वालाएं तुम्हारे हृदय में पहुँच रहीं हैं, उसी प्रकार तुम लोगों के हृदय की तड़प का मुझे अनुभव हो रहा है । यही सम्मानपूर्वक जीने की लालसा जिसके आगे हूण-यवन-तातार-शक कोई भी क्यों न हो, जलकर राख हो जाएगा । कोई भी शिकारी उसी समय तक सिंह को परेशान कर सकता है जब तक वह सो रहा होता है । परन्तु एक बार सजग हो जाने पर वह अपने एक ही पंजे की मार से उसकी बोटियां तक नोंच लेता है । उसी प्रकार तुम लोग सुप्‍त सिंह के समान हो, यह घर तुम्हारा है । जब चालीस कोटि सिंह मिलकर दहाड़ेंगे तो सारा भू-मंडल थरथरा उठेगा ।"

"अगला कार्यक्रम निश्चित करने के लिए कि हमें किस प्रकार अपने आप को संगठित कर शत्रुओं से लोहा लेना है, वह सब हम आज रात्रि को मन्दिर के प्रांगण में एकत्र होकर सोचेंगे ।"

महाबाहु का व्याख्यान समाप्‍त होने के पश्चात् कई क्षणों तक सन्नाटा छाया रहा । धीरे-धीरे लोगों में हरकत हुई, एक गगनभेदी जयकारे से वायुमंडल गूंज उठा ।

महाबाहु के ओजस्वी भाषण को सुनकर दोनों वृद्ध सन्यासियों की नसों में भी गर्म रक्त प्रवाहित हो गया, वे भी युवक सैनिकों की तरह अपनी छातियाँ फुलाकर खड़े हो गये । घायल तथा भिक्षु-भिक्षुणियों के नथुने क्रोध से फूलने लगे और वे प्रतिशोध की भावना से भूखी नागिन के समान फुंकार उठीं । उनकी आँखों में चिंगारियाँ निकल रहीं थीं ।

संन्यासियों की कुटिया के चारों तरफ आठ शस्‍त्रधारी ग्रामीण युवक पहरा दे रहे थे । आचार्य जिज्ञासानन्द अपनी पुस्तकें, औषधियाँ तथा मूल वस्तुओं को किसी अज्ञात स्थान में भेजने के लिए गाड़ी पर लदवा रहे थे ताकि निकट भविष्य में अत्याचारी हूणों के आक्रमण से वह अग्नि की भेंट न हो जाएं । भिक्षुणियाँ विस्मृत सी अपने ही ध्यान में खोई हुई बैठी थीं, उन्होंने भगवान् बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा अपने मध्य में एक पत्थर पर रखी हुई थी । दूर तालाब की सीढ़ियों पर महाबाहु, धूमकेतु तथा रुद्रदत्त एक दूसरे की ओर चिन्तातुर भाव से देखते हुए बैठे थे । एक सूखे पेड़ की शाखा पर लटकती सेम की बेल वातावरण में सुरभि भर रही थी । लाल नीले परों वाला पक्षी तालाब के ऊपर थोड़ा ऊंचे उड़कर फड़फड़ाया और पानी में गोता लगाकर एक मछली को चोंच में दबाकर आकाश में उड़ गया ।

महाबाहु चौंककर बोला, "अब आगे के लिए क्या सोचा है ?"

"मुझे अभी थोड़ी देर सोचने दो ।" रुद्रदत्त ने उत्तर दिया । इसके बाद वातावरण में शान्ति छा गई । धूमकेतु की दृष्टि अनायास ही गांव के एक ऊंचे मकान की मुंडेर से जा टकराई जिस पर गमलों में चार गेंदे के पौधे लगे हुए थे जो इस प्रकार दिखाई देते थे मानो चार मुर्गे बैठे हों । ढकी टहनियां उनके ऊपर तथा रक्तिम फूल उनके सिर की कलगियों से दिखाई देते थे । उनसे परे एक चील उड़ती हुई निकल गई ।

महाबाहु ने अनुभव किया जैसे रुद्रदत्त कुछ फैसला नहीं कर पा रहा है । चिन्ता के भाव उसके चेहरे पर स्पष्टतः उभर रहे थे । वह बोला, "मैंने कुछ निश्चय तो किया है परन्तु मुझे उस पर पूरा विश्वास नहीं है कि कहां तक सफल हो सकेगा । अगर तुम भी अपने विचार प्रकट करो कि भविष्य में इस समस्या को किस प्रकार हल करना है तो सम्भव है हम किसी और अच्छे परिणाम पर पहुंचें ।"

धूमकेतु कहने लगा, "आप से अधिक हम क्या सोचेंगे परन्तु जिन समस्याओं को हमें सुलझाना है वे कठिन तो अवश्य हैं इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु ऐसी बात नहीं कि हम उनको सुलझा ही न सकें । हमने इस बात का प्रण किया है कि देश और जाति को इन अत्याचारी हूणों के पंजे से पूर्णतः मुक्त करना है । इस विषय में हम इस परिणाम पर पहुंचे थे कि आक्रमणकारियों की सैनिक शक्ति और युद्ध कला का अध्ययन किया जाए । इसके पश्चात् हमें यह पता लगाना है कि सीमा प्रान्त के कौन-कौन से राजा अपने वैर-विरोध को छोड़कर शत्रुओं से लोहा लेने के लिए तैयार हैं । देश में एक ऐसा कौन सा प्रान्त है जहाँ अहिंसा और धर्म का प्रचार कम है ताकि वहाँ की जनता को अपने कर्त्तव्य का भान कराकर युद्ध के लिए उकसाया जाए ? जहां तक हमारे काम का प्रथम भाग है, वह हम समाप्‍त कर चुके हैं । सीमा प्रान्त के राज्यों की तरफ ध्यान देते-देते हमारी दृष्टि मालवा के राजा यशोवर्मन तथा मगध के सम्राट् नरसिंह बालादित्य पर जाती है । बल्लभी राज्यों के सरदारों और चालुक्यराज की भलाई भी इसी में है कि हूणों के विरुद्ध होने वाले युद्ध में हमारा पूरा सहयोग दें क्योंकि वह सब लोग भी हूणों के शत्रु हैं और उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं जबकि मातृभूमि के कंधों से पराधीनता का जुआ उतारकर फेंक दिया जाए । परन्तु इन लोगों के द्वेष और खानदानी झगड़े आपस में इन्हें एकत्र होकर युद्ध करने में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं । वास्तव में यही एक कारण है कि जिससे यह न तो अपने उद्देश्य को ही पा सकेंगे अपितु एक-एक करके सब समाप्‍त हो जायेंगे । सिकन्दर का उदाहरण हमारे सामने है । यदि आम्भी आदि सीमा प्रान्त के सब राजे पोरस का साथ देते तो कोई आश्चर्य नहीं था कि सिकन्दर इस पुण्यभूमि पर पैर रखने का दुःसाहस ही न करता ।"

"ओह !" महाबाहु बोला, "मेरा विचार था कि तुम सिकन्दर का उदाहरण अवश्य दोगे ।"

"तुमने ठीक सोचा महाबाहु । मैं अपनी बात पूरी करते हुए कहता हूं कि दो काम हमारे सामने मुख्य हैं जिन्हें हमें पूरा करना है । प्रथम, भारत के सब राजाओं को एक सूत्र में बांध देना है और दूसरा, साधारण जनता में जागृति उत्पन्न कर उन्हें शस्‍त्रास्‍त्र सिखाकर युद्ध के उपयुक्त सैनिक बनाना है । अपनी इस योजना को पूर्ण करने के लिए हमें कौन से मार्ग अपनाने पड़ेंगे, यही विचारणीय प्रश्न है ।"

"हाँ, यही बात है ।"

"यदि मालवा और मगध आपस में मिल जायें तो हमारी चिन्ता समाप्‍त हो जाती है परन्तु आपस के व्यक्तिगत झगड़े हमें कुछ करने नहीं देते ।"

"मालवा के महाराज को तो महाबाहु, आप समझा सकते हैं क्योंकि वह आपके अभिन्न मित्रों में से हैं । इस समय देश की अवस्था का प्रश्न है, अगर मित्रता नहीं तो भी देश की राजनीति और समय की पुकार के नाम पर उन पर दबाव डाला जा सकता है ।"

"वह तो करना ही पड़ेगा, इस बात की चिन्ता छोड़कर कि इसको वह मानते हैं अथवा नहीं ।"

"वह अवश्य इसको स्वीकारेंगे महाबाहु ! इन पाँच वर्षों में परिस्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया है । जब जहाज डूबने लगता है, उस पर सवार शत्रु मित्र सब मिलकर उसे डूबने से बचाने का प्रयत्‍न करते हैं ।"

"आपने अपना कोई विचार प्रकट नहीं किया", धूमकेतु ने रुद्रदत्त की तरफ संकेत करते हुए कहा "क्या हमसे इस विचार-विनिमय में आप कोई ऐसा मार्ग नहीं पा सकते जो निकट भविष्य में लाभदायक सिद्ध हो सके ...."

रुद्रदत्त मुस्कुराया, "आपकी बातों में मेरा ध्यान कहीं और जा पहुंचा था । मैं सोच रहा था मालवा के महाराज पर तो महाबाहु दबाव डालेगा परन्तु मगधपति को कौन आसन्न संकट से जूझने के लिए प्रेरणा देगा ? परन्तु इससे पूर्व मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या आप में से कोई मगधपति को जानता है या उसे पहचान सकता है ?

"नहीं !!?"

"जब वह युवराज थे", धूमकेतु ने कहा, "तो केवल एक बार मैंने उन्हें देखा था और वह भी दूर से । परन्तु यह बात वर्षों पुरानी हो गई है और अब तो वह महाराजा बन गए हैं । इसलिए उनके रूप में काफी अन्तर आ गया होगा ।"

"क्या सचमुच तुमने उन्हें देखा था ?"

"क्या हम जान सकते हैं कि यह प्रश्न आपने किसलिए किया था ?"

"नहीं, कोई विशेष बात नहीं ।"

"परन्तु प्रश्न यह है कि मगधपति तक कैसे पहुंचा जा सकता है ?"

रुद्रदत्त बोला, "यदि महाराजा यशोवर्मन के पास भेजने का प्रश्न उठता तो महाबाहु दूत कार्य के लिए उपयुक्त थे परन्तु इस समय जब कि हममें से कोई भी उन्हें नहीं जानता, मैं स्वयमेव उनसे मिलने का प्रयत्‍न करूंगा ।"
 
महाबाहु और धूमकेतु ने आश्चर्य से अपने साथी के चेहरे की ओर देखा और उनकी आँखें आशा से चमक उठीं ।

"क्या आपको पूर्ण विश्वास है कि सफल हो सकेंगे ?"

"सफलता के विषय में तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि मगध के सम्राट् से राजनीति का खेल खेलने के लिए एक ऐसा मोहरा मेरे पास अवश्य है ।"

"मोहरा" महाबाहु और धूमकेतु ने आश्चर्य से अपने साथी की ओर देखा ।

अचानक ही थोड़ी दूर पर तीस-चालीस घुड़सवारों की एक टोली बढ़ती हुई आती दिखाई दी । उनकी बातचीत वहीं समाप्‍त हो गई । राष्ट्रोत्थान का काम जिसे इन्होंने अपने हाथों में लिया था, उसमें पग-पग पर संकट विद्यमान थे, परायों की ओर से भी और अपनों से भी । यद्यपि आने वाले सैनिक हिन्दू थे परन्तु फिर भी ....।"

महाबाहु और उसके साथी एकदम खड़े हो गए, उनके हाथ अपने शस्‍त्रों पर थे । आस-पास पटरी पर खड़े युवक भी एकदम वहां आकर एकत्रित हो गए । वेदान्ती बाबा भी अपने स्थान पर खड़ा उन आने वालों की तरफ घूर-घूरकर देख रहा था ।

सबसे आगे का घुड़सवार पास आने पर घोड़े से कूदकर नीचे उतरा । अपने घोड़े की लगाम अपने साथी के हाथ में पकड़ा दी और पास पहुँचकर चिन्ता घबराहट के स्वर में बोला, "हम मगध सेना के अंगरक्षक सैनिक हैं । अपने सम्राट् नरसिंह बालादित्य के साथ शिकार खेलने आये थे । सम्राट् सिंह का पीछा करते हुए हमसे बिछुड़ गए जिन्हें ढूंढते हुए हम आप तक आ पहुंचे हैं । वन में हमने एक मरे हुए सिंह को देखा है जिसके शरीर पर महाराजा का बाण लगा हुआ है, परन्तु सम्राट् का कुछ पता नहीं । वहां रक्त से भीगी झाड़ियों में कुछ मनुष्यों के शव पड़े हैं जो विदेशी दिखाई देते हैं जिससे वहाँ किसी मारकाट का होना सिद्ध होता है । सम्राट् का घोड़ा भी हमें वन में भटकता हुआ मिल गया है । हमारे मन रह-रहकर किसी अज्ञात आशंका से कांप उठते हैं । कृपया उनको ढूँढने में आप हमारी सहायता कीजिए ।"

रुद्रदत्त ने सवार की बातें सुनकर सन्तोष की साँस ली । वह रहस्य और गम्भीरता की मूर्ति बनकर अपने स्थान से चलकर सवार के सम्मुख आकर खड़ा हो गया । उसका मन सवार की व्यथित वाणी से प्रभावित होने की अपेक्षा, सन्तोष भाव से धड़कने लगा ।

उसने पूछा, "सिंह का पीछा करने वाले क्या मगध सम्राट थे ?"

"हाँ ! श्रीमान, कोई अनिष्ट की बात तो नहीं ....?"

"नहीं! भाई, किसी प्रकार की चिन्ता मत करो ।" महाबाहु तथा धूमकेतु के चेहरे भी गम्भीर हो गए ।

सवार ने अपनी भीगी आंखों के कोने को पोंछा, "हे प्रभु ! तेरा शत शत धन्यवाद ।" उसने सन्तोष की गहरी साँस ली ।

"तुम्हारे सम्राट" रुद्रदत्त ने गम्भीर वाणी में कहना शुरू किया, "घायल सिंह का पीछा करते-करते इधर आ निकले थे, यहाँ पांच हूणों ने उन पर आक्रमण कर दिया । उनके साथ युद्ध करते हुए वे अत्यन्त घायल हो गए । इससे पूर्व कि हूण उनकी हत्या कर देते, हमने समय पर पहुंचकर उन्हें यमलोक पहुंचा दिया और सम्राट को बचा लिया ।"

"हम आप के अत्यन्त आभारी हैं श्रीमान !"

"इसमें आभार प्रदर्शन की कोई बात नहीं । सैनिक, यदि हमें कुछ समय पूर्व इस बात का पता चल जाता तो सम्राट घायल भी नहीं होते । परन्तु अब चिन्ता की कोई बात नहीं । उनके घाव सी दिये गए हैं और चिकित्सा में प्रवीण सन्यासी महात्मा ने उन पर औषधि लगा दी है । अत्यधिक रक्त बहने के कारण उनमें काफी दुर्बलता आ गई है । परन्तु एक-दो दिन में वह इस योग्य हो जायेंगे कि रथ में बैठ कर राजधानी को वापस जा सकें ।"

"क्या हम उनके दर्शन कर सकते हैं ? हमें आज्ञा दीजिए ताकि हम उनको अधिक सुखी बनाने का कोई प्रयत्‍न करें ?"

रुद्रदत्त कुछ देर तक मौन खड़ा रहा, फिर गम्भीर वाणी में बोला, "आप सब लोग आराम करें । भोजनादि की व्यवस्था हम कर देते हैं । थोड़े समय के पश्चात् मैं आपको सम्राट के सन्मुख ले चलूँगा और यदि वह इस योग्य हुए कि बात कर सकें, तो सन्यासी बाबा से अनुमति लेकर मैं आपकी बातचीत भी करवा दूंगा । अधिक लोगों के उनके पास जाने और उनकी नींद में बाधा डालने से उन्हें कष्ट होगा जिसके लिए आपको भी कोई आपत्ति नहीं होगी ।"

"नहीं ! नहीं ! महाराज, हम आपकी आज्ञा के बिना उनके पास नहीं जायेंगे, परन्तु आप हमें इतना अवश्य बता दीजिए कि उनके जीवन को कोई खतरा तो नहीं है ?"

"नहीं, अब भय की कोई बात नहीं है ।"

"तो ...." तनिक विश्राम के विचार से मुड़ता हुआ सवार बोला, "मैं आप की आज्ञा से अपने साथियों सहित तालाब के किनारे बैठ कर आप की अनुमति की प्रतीक्षा करता हूँ ।"

"महाबाहु ! धूमकेतु !" रुद्रदत्त ने उन्हें उठने का संकेत किया ।

महाबाहु उठता हुआ बोला, "भगवान शायद हमारी कठिनाइयों को दूर करते प्रतीत होते हैं ।"

धूमकेतु ने कहा, "आप राष्ट्र की सेवा के लिए एक राजनैतिक खेल खेलने मगध जा रहे थे परन्तु प्रभु ने घर बैठे ही हमारी समस्या हल कर दी । वह मोहरा जिसका हमें ज्ञान नहीं, उसे बड़ी चतुराई से रखिए क्योंकि आपका प्रतिद्वन्द्वी शत्रु से 'बदला' और हमारा 'उपकार' दो प्रहारों के बीच में है, इसलिए हमारी विजय निश्चित है ।"

"अभी से ही ऐसी बातें किसलिए धूमकेतु ?"

"परन्तु आप कौन सा पग उठाने जा रहे हैं ? क्या हम उससे अनभिज्ञ ही रहेंगे ?"

"शीघ्रता न करो महाबाहु । आप लोगों के सन्मुख ही तो खेल खेला जायेगा ।"

"अच्छा चलिए ।" धूमकेतु साथ-साथ चलता हुआ बोला, "हमारा उद्देश्य खेल जीतना है, मोहरें गिनना नहीं ।"

"आप लोग", रुद्रदत्त सामने खड़े पहरे वालों से बोला, "अपने अपने स्थान पर लौट जाइये ।"

"महाराज, हम तो इसलिए आ गए थे", ग्रामीण युवक बोले, "कहीं घोड़ों पर आने वाले शत्रु पक्ष के न हों ।"

"नहीं, वे मित्र हैं, राजकर्मचारी हैं । आप लोग उनके पास जाकर भोजनादि के विषय में पूछ सकते हैं ।"

एक मरियल कुत्ता तालाब पर चढ़कर घोड़ों की ओर मुँह करके भौंकने लगा । झोंपड़ियों पर चढ़ी नीले फूलों वाली लताएं हवा के झोंके से हिल उठीं । गेंदे के फूलों पर बैठी तितलियां उड़ने लगीं । द्वार के पास खड़े आचार्य जिज्ञासानन्द से रुद्रदत्त ने पूछा, "घायल की कैसी हालत है, महाराज ?"

"अच्छा है ! हिमालय की आशुफलप्रद औषधियों के रसों से शीघ्र ही स्वस्थ हो जायेंगे ।"

"क्या उनसे बातचीत की जा सकती है ?"

"मेरे विचार में उनसे बातचीत करने में कोई हानि नहीं । परन्तु इस बात का ध्यान अवश्य रखना पड़ेगा कि वह आवेश में न आ जायें अथवा दुःख उन्हें न घेर ले ।"

"हम आपके आदेश का ध्यान रखेंगे", रुद्रदत्त ने पीछे मुड़कर हाथ से संकेत किया जिससे घुड़सवारों का नायक शीघ्रता से पग उठाता उनके पास आ खड़ा हुआ ।

"केवल तुम लोगों को चिन्ता से मुक्त करने के लिए मैंने सन्यासी महाराज से घायल सम्राट् से मिलने की आज्ञा ले ली है । तुम एक दृष्टि देख सकते हो और दो शब्दों में उनका कुशलक्षेम जान सकते हो ।"

सवार ने अनुग्रह से हाथ जोड़ लिए ।

तभी पीछे से वेदान्ताचार्य ने आकर पूछा, "घायल सम्राट् कौन ?" उनके स्वर में विस्मय था ।

रुद्रदत्त मुस्कराया, "आचार्य जी, आपने इतनी दौड़-धूप कर जिस व्यक्ति के प्राणों की रक्षा की है वह मगध सम्राट् श्री नरसिंह बालादित्य हैं ।"

"ओह !" आश्चर्य से अभिभूत होकर सन्यासी बोला, "बचाने वाले तो भगवान् हैं या आप लोग । यदि आप लोग यहां न होते तो नरपिशाच न केवल सम्राट् की हत्या कर देते अपितु हमें भी तलवार के घाट उतार देते ।"

उन सब ने झोंपड़ी के भीतर प्रवेश किया जहाँ घायल सम्राट् लेटे हुए थे ।

सम्राट् का सम्मान करते हुए वेदान्ताचार्य ने पूछा, "अब आपका स्वास्थ्य कैसा है महाराज ?"

सम्राट् के दुर्बल मुख-मण्डल पर दुःख और गौरव की मिली-जुली चमक उत्पन्न हो गई और वह बोला, "तो आप लोगों को पता चल गया? शायद कर्मचारी आ गए हैं । मैं अपना रहस्य पहले ही बता देता, परन्तु मैंने सोचा था कि आप लोगों में मिथ्याडम्बर की भावना काम करने लगेगी जिससे मुझे सच्ची शान्ति नहीं मिल सकेगी ।"

"क्या मैं जान सकता हूं कि किस-किस ने मुझे अत्याचारी हूणों के पंजे से बचाया है ? मैं बुरी तरह घायल हो गया था, अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मेरी शक्ति क्षीण हो रही थी और मेरी आंखों के आगे अंधकार छा रहा था । मैं केवल अपने आत्मबल के भरोसे ही आक्रमणकारियों के प्रहारों को रोक पा रहा था । मुझे केवल इतना ही स्मरण है कि किसी शत्रु की खड़ग से मेरे पेट की आँतें बाहर निकल आईं थीं और उसके पश्चात् जब मेरी आंखें खुलीं तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं जीवित हूँ ।"

"हम तीनों ने ।" रुद्रदत्त ने कहा, "आपकी इस विपत्ति में काम आने का सौभाग्य प्राप्‍त किया है । परन्तु हम से भी अधिक इसका श्रेय पूज्य सन्यासी बाबा को है जिनकी दौड़ धूप ने आपके संकट से घिरे होने की हमें सूचना दी थी । और उसके बाद चिकित्सक महाराज जिनकी औषधियों ने आपको स्वस्थ किया ।"

सम्राट् ने कृतज्ञता से अपने हाथ जोड़े और दोनों सन्यासियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया ।

"तुम लोग !" सम्राट् ने अपने कर्मचारी की ओर देखकर कहा, "अच्छा होता यदि मैं तुम लोगों से अलग न होता । कभी-कभी अत्यधिक आत्म-विश्वास भी संकट में डाल देता है ।"

"परमात्मा का धन्यवाद है जिसने इस विपत्ति से आपकी रक्षा की ।"

कर्मचारी के शब्दों में राजभक्ति की झलक थी । उसने आवेग से उमड़े आंसुओं को पोंछा ।

"मारने वाले से बचाने वाला अधिक बलवान् होता है", जिज्ञासानन्द बड़बड़ाया।

सम्राट् ने अपने सरदार से कहा, "दो घुड़सवार प्रान्त के अधिकारी के पास भेज दो ताकि वह रथ लेकर आ जाए । कल प्रातः या सायंकाल तक मुझे आशा है कि मैं यात्रा के योग्य हो जाऊंगा ।"

आज्ञा पाते ही कर्मचारी झोंपड़ी से बाहर चला गया और दोनों सन्यासी भी किसी कार्य से बाहर चले आए । रुद्रदत्त अपने दोनों साथियों के साथ उठता हुआ बोला, "आप आराम करें, हमारी बातचीत से आपको कष्ट होगा ।"

"नहीं-नहीं ! आप बैठिये, मेरा स्वास्थ्य अब पहले से ठीक है और अकेले पड़ा रहना तो बहुत ही अखरेगा । अब जब आपको इस बात का पता चल ही गया है कि मैं मगध सम्राट् हूं, मैं चाहता हूं आप मुझे कहें कि इस उपकार के लिए मैं आपको क्या पुरस्कार दूं?"

"पुरस्कार !" उपेक्षा से रुद्रदत्त मुस्कराया । उसके मन में सम्राट् के प्रति कोई बड़प्पन का भाव नहीं था । वह पूर्ववत् अपनी गम्भीर वाणी से बोला, "हमें किसी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं, हमने सम्राट् समझकर आपकी रक्षा नहीं की थी अपितु एक हिन्दू के नाते हमने आपकी जान बचाई थी । आपके प्राणों की रक्षा ही हमारा पुरस्कार है महाराज !"
 
सम्राट् ने अपनी पैनी दृष्टि रुद्रदत्त के चेहरे पर जमा दी । दो व्यक्तित्व एक दूसरे को समझ लेने के लिए उतावले हो उठे । उनकी दृष्टि आपस में टकराई, मानो कर्त्तव्य और भावना के दो स्फुल्लिंग आपस में टकराकर प्रकाशित हो उठे हों ।

"आप लोग क्या काम करते हैं ?"

"जब देश पर अत्याचारी हूणों की सेनायें छा रही हों, चहुं ओर विनाश की आंधी चल रही हो, देश की सेवा के सिवाय और कौन सा कम रह जाता है ? हम देश में जागृति का मंत्र फूँकने में प्रयत्‍नशील हैं और ऐसा करने के लिए लोगों को प्रेरणा देते हैं ।"

सम्राट् की दृष्टि में रुद्रदत्त का व्यक्तित्व ऊँचा उठने लगा । एक बार उन्होंने खिड़की से बाहर देखा जहाँ थोड़ी दूर पर एक वृक्ष के ठूंठ पर दो गिद्ध अपने पंखों को फैलाये बैठे थे । अभी-अभी उन्होंने कोई शव खाया था । बाहर से दृष्टि हटाकर सम्राट् बोला, "देशसेवा सचमुच महान् कार्य है, देश को आपत्ति से बचाना और आक्रमणकारियों का दमन करना प्रत्येक सच्चे हिन्दू का कर्त्तव्य है । जिस प्रकार अत्याचारी हूणों से आपने मेरी रक्षा की है उसी प्रकार सैंकड़ों अमूल्य प्राणों की भी अपने रक्षा की होगी । यदि आपने केवल मेरे ही प्राण बचाये होते तब भी महान् कार्य था । मैं ऐसी बात किसी स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं कह रहा अपितु कर्त्तव्य की भावना से प्रेरित होकर कह रहा हूँ क्योंकि विदेशियों के प्रति जितना रोष मेरी छाती में धधक रहा है उतना सम्भवतः किसी हिन्दू राजा के हृदय में नहीं होगा । फिर भी मैं आपकी देशभक्ति की प्रशंसा करता हूँ । हूण सेनाओं की जिस बाढ़ को मैं आज तक न रोक सका, उसको आप तीन व्यक्ति किस प्रकार रोक सकोगे ?"

रुद्रदत्त की गर्दन आत्माभिमान से ऊपर उठ गई । उसकी आंखें तेज से चमक उठीं । वह बोला, "तीन देशभक्त और एक सम्राट् मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं और यदि तीन सम्राट् और तीन देशभक्त मिल जायें तो सब कुछ किया जा सकता है ।"

"तीन सम्राट् ?"

रुद्रदत्त ने सम्राट् के मन में जिज्ञासा उत्पन्न कर दी । वह दो क्षण के लिए चुप हो गया । सारे वातावरण में अजीब सा मौन छा गया ।

"दो घुड़सवार भेजे जा चुके हैं महाराज !" बाहर से एक सैनिक ने आकर सूचना दी ।

"बहुत अच्छा !" सम्राट् बोला, "अब तुम लोग आराम करो । गांव के मुखिया को कहकर अपने और साथियों के ठहरने का प्रबन्ध कर लो । भोजन और घोड़ों के चारे की सब सामग्री नकद मूल्य देकर मोल लेना । किसी किसान व मजदूर को सताने का प्रयत्‍न मत करना । बस, जाओ और आराम करो । जब जरूरत होगी, तुम्हें बुलवा लेंगे ।"

कर्मचारी नमस्कार करके चला गया । एक बार फिर वातावरण में मौन छा गया । थोड़ी देर बाद सम्राट् मौन भंग करता हुआ बोला, "हमारी बातचीत का दौर जब अपनी अन्तिम सीमा पर पहुँच रहा था तभी मूर्ख कर्मचारी ने आकर उसमें बाधा डाल दी । परन्तु एक बार हम दुबारा उसको वहीं से आरम्भ कर सकते हैं । आप कह रहे थे तीन देशभक्त और तीन सम्राट् अगर मिल जायें तो सब कुछ किया जा सकता है । परन्तु वह सब योजनाएं जिन्हें आसानी से सोचा जा सकता है, उनको क्रियात्मक रूप देने के लिए अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है जिससे कई बार काम असम्भव दिखाई देने लगता है ।"

"अगर आप बुरा न मानें तो मैं यही कहूंगा कि बड़ों का बड़प्पन इसी में है कि वह ऐसी ही बाधाओं को दूर कर असम्भव को सम्भव कर दिखायें । धर्म, ज्ञान, नीति, युद्ध कला आदि प्रत्येक विषय में आज तक जितनी भी महान् बिभूतियाँ हुई हैं, उन्होंने असम्भव की धधकती भट्ठी में हाथ डालकर जीव्न और विजय के अज्ञात और अपरिचित अंगारों को सम्भव के ठण्डे क्षेत्रों में रखा है ताकि मानवता और धर्म उनसे उष्णता और प्रकाश प्राप्‍त कर सकें ।"

सम्राट् ने बोलने वाले को सिर से पैर तक देखा और बोले, "आप लोगों ने अपना परिचय केवल तीन ऐसे यात्रियों के रूप में कराया है जो देश सेवा में ही रत रहते हैं, परन्तु आप लोगों की बातें सुनकर उसकी सत्यता में सन्देह होता है । देश का दर्द रखने वाला साधारण यात्री जब सम्राटों और साम्राज्यों की जोड़-तोड़ और उनकी कठिनाइयों को हल करने की बातें करने लगता है तो उसके व्यक्तित्व को समझना कठिन हो जाता है ।"

धूमकेतु और महाबाहु ने देखा कि सम्राट् की आँखों में रुद्रदत्त का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता जा रहा है और वह भी स्वयम् अपने आपको रहस्यमय बनाता चला जा रहा है । सम्राट् के शंकाकुल प्रश्न के उत्तर में रुद्रदत्त मुस्कराया और बोला, "सम्राट ! हमने अपने परिचय में कहीं भी छल नहीं किया । जिस प्रकार इस यात्रा में सहसा एक घटना ने हमें आपकी सेवा का शुभ अवसर प्रदान किया और आपके सामने इतने स्पष्ट रूप से बात करने का मौका दिया, उसी प्रकार हमें और भी एक-दो राजाओं की सेवा का सौभाग्य प्राप्‍त हुआ है, इसलिए उन तक हमारी थोड़ी बहुत पहुँच है ।"

आचार्य जिज्ञासानन्द एक नौकर के साथ भीतर आया जिसके पास रुई के फोहे, केले का कोमल पत्ता और सफेद पत्थर की एक छोटी कटोरी थी जिसमें हरे सुनहरे रंग का स्वरस पड़ा हुआ था ।

"मैं आपके पेट का घाव देखना चाहता हूँ ।"

"देख लीजिए ।"

आचार्य जिज्ञासानन्द सम्राट् के घाव पर झुका । उसने अपनी अंगुलियों से, जिन पर परीक्षण के कारण कई प्रकार के धब्बे लगे हुए थे, सम्राट् के पेट पर बंधी पट्टी को खोला ।

"अब टीस तो नहीं ?"

"नहीं, दर्द तो नहीं है परन्तु यह स्थान सुन्न सा लगता है ।"

"यह सारी रात इसी अवस्था में ही रहेगा । दिन निकलने तक घाव पूर्णतया भर जायेगा और यह अवस्था दूर हो जायेगी ।" उसने पत्टी पर रूई से बूंद-बूंद टपका कर सारा रस घाव पर डाल दिया । सम्राट् ने हल्की सी फरेरी ली और उसके रोंगटे खड़े हो गए ।

"क्यों ?"

"इसके घाव से स्पर्श होते ही एक अजीब आनन्द मिश्रित सनसनाहट सी होती है ।"

"आनन्द सोम का, सन्नाटा गोमूत्र के शोरे का और ....।"

आचार्य पट्टी बांधता गया और अपनी धुन में औषधियों के गुणों का बखान करता गया जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था ।

दूसरा नौकर जिज्ञासानन्द की आज्ञानुसार एक कटोरे में कोई पीने की वस्तु लेकर आ पहुंचा ।

"ले आए ?"

"हाँ, श्रीमान ।"

"आपके शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव हो चुका है जिसको पूरा करने और हृदय की गर्मी बनाये रखने के लिए आपको ऐसे आठ प्याले पीने पड़ेंगे । मैंने इसमें एक ऐसी औषधि मिला दी है जो सारी रात आप को मूत्र त्याग की इच्छा नहीं होने देगी और आप बिना हिले-डुले लेटे रहेंगे । हिलने-जुलने का प्रयत्‍न न करें अन्यथा घाव खुलने का डर रहेगा ।"

गर्दन एक ओर मोड़कर सम्राट् ने कटोरे का रस पी लिया । "कुछ अजीब से स्वाद और सुगन्धि वाली औषधि है ।"

"हाँ ! हिमालय की कन्दराओं में जिस प्रकार अनेक चमत्कारी योगियों का निवास है, उसी प्रकार उसकी तराईयों में असंख्य गुणों और भिन्न-भिन्न स्वादों वाली औषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पहाड़ों की चोटियों पर उगी बूटियों और उसकी जड़ों में जमी धातुओं के मेल से, विद्या अनुभव और समाधि से प्रकाशित हुई मनुष्यों की बुद्धि कई ऐसे रसायनों का आविष्कार कर सकती है जिसकी सहायता से मृत्यु पर भी विजय पाई जा सके और प्रकृति के अनेक भेदों को उलट-पलट किया जा सके ।"

सम्राट् बोला "मेरा राजवैद्य भद्रशील भी यद्यपि अपनी कला में बड़ा योग्य है, परन्तु मेरा विचार है वह आप से मिलकर अभी कई बातें और सीख सकता है ।"

"भद्रशील... उसने, मेरा विचार है, तक्षशिला से शिक्षा ग्रहण की है । इस नाम का एक विद्यार्थी वहाँ आयुर्वेद श्रेणी में मुझसे पढ़ा करता था ।"

"ओह ! तो क्या आप तक्षशिला के आयुर्वेदाचार्य जिज्ञासानन्द हैं ?"

"हां ! वही हूं और वह मेरे दूसरे साथी वेदान्ताचार्य हैं । यह सोच कर सन्यास लिया था कि किसी स्थान पर कुटिया बनाकर ईश्वर आराधना में अन्तिम समय गुजारेंगे परन्तु यहां आकर भी पुरानी अभिरुचि उसी प्रकार रही । वह वेदान्त, तर्क और मनोविज्ञान पर पुस्तकें लिखते रहते हैं और मैं आयुर्वेद पर परीक्षण करता रहता हूँ, परन्तु आज पता चला इन दोनों विद्याओं से शस्‍त्रविद्या अधिक उत्तम है । यदि वह यात्री यहां न आए होते तो हूण लुटेरों की खड़ग किसी का सिर न छोड़ती । इन्हीं देशभक्त यात्रियों ने राष्ट्रवाद की एक अद्वितीय योजना बनाई है जिसके लिए हम ग्राम-ग्राम घूमेंगे, लोगों को आक्रमणकारियों के विरुद्ध सजग करेंगे । हमें समझ नहीं आता आप जैसे बड़े-बड़े राजा क्यों इस बाढ़ से टक्कर नहीं लेते । यदि आप लोगों ने इधर ध्यान न दिया तो समझ लीजिए हमारा धर्म, संस्कृति, सम्मान, गौरव कुछ भी सुरक्षित नहीं रहेगा । यदि एक राजा उनका सामना करने में असमर्थ हो तो दो करें, दो न हों तो चार । इस प्रकार सम्पूर्ण भारत के महाराजा विदेशी शत्रुओं से टक्कर लेने के लिए एक झंडे के नीचे संगठित होकर इस आपत्ति से देश की रक्षा करें । एक राजा को मिटते देख कर दूसरे का यह समझ लेना कि वह सुरक्षित रहेगा, उसकी भारी भूल है, क्योंकि इसके पश्चात् उसकी बारी अवश्य आएगी ।"

"आपके आने से पहले", सम्राट् बोला, "यही बातचीत हो रही थी ।"

"मैं चलता हूँ, आप इस बातचीत का क्रम जारी रखें । बल्कि मैं तो कहूंगा कि बातों का समय गया । अब तो आचरण की आवश्यकता है । अब तो आप कार्यशील हों अन्यथा आप को दुःख होगा कि आज तक क्यों व्यर्थ बातें बनाते रहे ।"

आयुर्वेदाचार्य अपने दोनों नौकरों के साथ चला गया । जब वह जा रहा था तो रुद्रदत्त ने उठकर उसे कोई बात कही जिस पर उसने कहा, "बहुत अच्छा ।"

औषधि की खुराक ने सम्राट् के हृदय को पूर्ण शक्ति प्रदान की । खिड़की में से आ रही ढ़लते सूरज की किरण लम्बी होकर सम्राट् के कान के पास रेंगने लगी, मानो आकाश से कोई संदेश लाई हो ।

सम्राट् ने मौन भंग किया, "ऐसा कुछ हो सकता है । परन्तु राजाओं के दरबारों में कुछ शक्तियां ऐसी होती हैं जिनकी राय राजाओं की अपनी इच्छा के विरुद्ध हुआ करती हैं ।"

रुद्रदत्त बोला, "श्रीमान ! धुरा यदि घूमने पर तुला हुआ हो तो पहिये के पंख आप साथ-साथ चक्कर काटने लगते हैं ।"

सम्राट् ने पहेलियों में बातें करना आरम्भ कर दिया जैसे वह किसी की समझ की परीक्षा करना चाहता हो । परन्तु रुद्रदत्त, जो बातचीत के प्रत्येक ढंग में निपुण प्रतीत होता था, उसे संतुष्ट करने पर तुला हुआ था । सम्राट् बोला, "धुरा घुमाने के लिए भी घोड़ों की तेज दौड़ने वाली जोड़ी और उनकी पीठों पर पटखने वाला कोड़ा चाहिये ।"

रुद्रदत्त मुस्कराया ।

"हँसते हो ?"

"हँसता आपकी बात पर नहीं बल्कि उस घटना पर हँसता हूँ जिसने आंधी की तरह दौड़ने वाले घोड़े और तेज चोट पहुंचाने वाला कोड़ा, दोनों उपस्थित कर दिये हैं । तीनों घोड़े हम आपके सामने उपस्थित हैं जिनसे आगे कोई चीज नहीं जा सकती और कोड़ा ....।"

बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी और आचार्य जिज्ञासानन्द एक खाल उतरे मानव शरीर को, जिससे लहू टपक रहा था, साथ लेकर भीतर पहुँचा ।

"ओह ! यह कौन ?" मारे आश्चर्य के सम्राट् की आंखें फटी की फटी रह् गईं । उसने एकदम उठना चाहा, परन्तु फिर आचार्य की आज्ञा को याद करके विवश हो लेटा रहा । "यह कौन अभागा है और उसकी यह अवस्था किसने बना दी है ?"

"यह वह कोड़ा है सम्राट् !"

खाल उतरा हुआ व्यक्ति दुर्बलता और वेदना भरे स्वर में बोला - "सम्राट् ! ...सम्राट् ! आप इस अवस्था में ?"

सम्राट् ने झट आवाज पहचान ली । "अरे शशि ! चांद जैसे सुन्दर युवक, तुम्हारी यह अवस्था किसने बना डाली ? ओह ! हे ईश्वर !" शोक का मारा सम्राट् मूर्छित हो गया । जिज्ञासानन्द थोड़ा-सा बिगड़ता हुआ बोला, "मैंने आदेश दिया था कि इन्हें कोई शोक पहुंचाने वाली बात न कही जाए !"

"शोक सोच समझकर ही पहुँचाया गया है, आचार्य महोदय ! वह औषधि यदि आप लाए हैं तो इन्हें सुंघा दीजिए ।"

"सुंघा देता हूँ । मैंने तो केवल इनके स्वास्थ्य रक्षा के लिए कहा था, नहीं तो अपने कामों को आप मुझसे अधिक अच्छा समझते हैं ।"

सम्राट् को चेतना आने पर रुद्रदत्त ने पूछा, "कोड़ा तेज है, श्रीमान् ?"

"....हाँ !" सम्राट् की आंखें क्रोध और बदले की भावनाओं से जलने लगीं । वह पूंछ कुचले नाग के सदृश फुंकारता और बल खाता हुआ बोला, "जिसने मेरे प्यारे मित्र की यह अवस्था बनाई है, ईश्वर की सौगन्ध ! मैं उसके शरीर बोटियां उड़वा दूँगा । मेरे राज्य की प्रत्येक बस्ती में उसकी एक-एक बोटी और एक-एक हड्डी पहुँचेगी, और दंड का आदेश सुनाने के पश्चात् उसे चौक अथवा चौपाल में फिंकवा दिया जाएगा, जहाँ आवारा कुत्ते उसे चचोड़ेंगे । और ...."

रुद्रदत्त ने सफलता की निश्चिन्तता का एक गहरा सांस लिया । फिर वह खाल उतरे नवयुवक से बोला "अपने दुःख की कथा तुम अपने आप सुना दो शशि विक्रम !"

नौकर ने धरती पर एक गद्दा बिछा दिया और उस पर धुनी हुई रूई का एक बहुत बड़ा गोला दोहरा-तेहरा करके रख दिया । शशि ने अपने बदन से चिपकी लहू से लिपटी चादर फैलाई और बैठ गया ।

एक क्षण के लिए शशि की आंखें किसी लज्जाभाव से नीचे को झुक गईं और वह कुछ बोलने से हिचकिचाता प्रतीत हुआ, जैसे वह अपना कोई भेद छुपाना चाहता हो । परन्तु फिर जी कड़ा करके बोला, "मूर्खता मैंने ही की थी जिसका मुझे दंड भी मिल गया । यह प्रेम किसी को अपमान के अतिरिक्त कुछ नहीं देता । इसकी उलझन में फँसकर मैं इस अवस्था को पहुँचा हूँ । मेरे मामा के बेटे का विवाह था और मैं आपसे आज्ञा लेकर उसमें सम्मिलित होने के लिए गया था । परन्तु सब ऊँच-नीच जानता हुआ प्रेम का रोग अपनी जान को लगा बैठा । गंधार का एक क्षत्री सरदार, जो मेरे नाना का दूर का नातेदार भी है, इन आक्रमणकारियों से जान बचाकर अपने एक बूढ़े जमींदार मित्र के पास मेरे ननिहाल से थोड़ी ही दूर पर ठहरा हुआ था । परिचय बढ़ाने और सम्बन्ध सुदृढ़ करने के लिए वह अपनी धर्मपत्‍नी और बेटी समेत विवाह के उत्सव में उपस्थित था । परन्तु उसकी बेटी, मैं उसकी सुन्दरता की क्या प्रशंसा करूँ, उसे देखकर मन यही कहने लगता था कि संसार और उसकी प्रत्येक वस्तु को छोड़कर उसी का हो जाऊँ, उसी को देखता रहूँ । उसको प्राप्‍त करने में जो रुकावटें हैं, उनको दूर करने के लिए सिर हथेली पर रखकर आपदाओं और संकटों कें कूद जाऊं । "फिर जो हो सो हो' कहकर मौत के मुंह में छलांग लगा दूँ । परन्तु दुर्भाग्य से मेरा एक प्रतिद्वन्द्वी भी था और वह था मालवा राज्य का छोटा सेनापति । वह मुझसे कहीं अधिक बलवान् था । बहुत संभव था कि प्रतिद्वन्द्वता के जोश में आकर हम में खड़ग चल जाता । परन्तु वह बोला - शशि विक्रम, तू बड़ा सुन्दर और प्यारा युवक है । जब मैं तुम्हें मार डालने की इच्छा करता हूं तो मेरा हृदय दया तथा करुणा से भर जाता है ।

आपस में मार-काट करने की अपेक्षा मेरे विचार में यह ठीक रहेगा कि हम उस लड़की से ही पूछ लें कि हम दोनों में से किसे चाहती है । यदि वह मुझे न चाहती होगी तो मैं तेरे लिए उसके प्रेम को त्याग दूंगा । और यदि उसने मुझे पसन्द किया तो तुम मेरे मार्ग के कांटे बनने का विचार छोड़ देना । मैने इसे मान लिया । परन्तु उस रात जब हमने एक एकांत फुलवाड़ी में उससे मिलने का प्रबन्ध किया था, कहीं से हूण लुटेरे आ घुसे और उन्होंने कुछ घरों को लूटा तथा कुछ स्‍त्रियों का अपहरण करके ले गए जिनमें वह लड़की भी थी ।"

"अब क्या विचार है ? - मेरे प्रतिद्वन्द्वी ने पूछा । मैंने कहा, मैं उसे छुड़ाने जाऊँगा चाहे इस प्रयत्‍न में मेरी जान क्यों न चली जाए । यही तो प्रेम की परीक्षा है ।"

उसने एक ठण्डी आह भरी और बोला, "ओह ! मेरी सेना यहाँ होती, एक टुकड़ी ही होती ।" फिर भी वह तैयार हो गया और हम दोनों घोड़ों पर, विवाह-शादी को भुला हूण लुटेरों का पीछा करने लगे ।

सम्राट् बोला, "तुमने मूर्खता की शशि ! तुम मुझे सूचना भेज देते, मैं सारा प्रबन्ध करा देता । खैर, आगे कहो ।"

"बस, आगे क्या कहूँ, आगे की व्यथा सुनाने की शक्ति नहीं है । वह लड़की तो क्या हाथ आती, हम दोनों स्वयं हूण सिपाहियों के हाथों बंदी हो गए, जिन्होंने तुरन्त हमें अपने गुप्‍तचर चौकी में भेज दिया । वहाँ हम पहचाने गए और राजनैतिक भेद उगलवाने के लिए हम पर अत्याचार किया जाने लगा । आखिर दोनों को इस अवस्था में पहुंचा दिया गया, जिस में आपके सामने बैठा हूँ । यदि राष्ट्रवादी योद्धा अपने प्राणों को संकट में डालकर मुझे वहाँ से निकाल न लाते तो आप के दर्शन प्राप्‍त न होते । दहकती अंगीठियों के बीच भूखा प्यासा उल्टा लटकता हुआ प्राण दे देता ।"

"आह ! ओह !!" सम्राट् ने क्रोध और दुःख के दो ठण्डे सांस भरे । उसने प्रार्थना की दृष्टि से आयुर्वेदाचार्य की ओर देखते हुए कहा, "कृपा करके शशि के बदन पर कुछ ऐसी औषधि लगा दीजिए जिससे इसकी टीसें बन्द हो जायें । मुझसे इसका दुःख देखा नहीं जाता ।"

"कहो तो" आचार्य जिज्ञासानन्द बोला, "इसकी वैसी ही खाल, वैसा ही सुन्दर बदन बना दूँ जैसा पहले था ।"
 
यद्यपि सम्राट् को आदेश था कि वह हिले-जुले नहीं किन्तु विस्मय, प्रसन्न्ता और धन्यवाद के तिगुने उत्साह से वह अपने स्थान पर उठ बैठा । "क्या सचमुच महाराज ? शशि का चेहरा आपकी चिकित्सा से पहले जैसा सुन्दर और कांतिवान् हो सकता है ?"

"ज्योतिष के हिसाब से वर्ष की विशेष घड़ियों में मन्त्र पढ़कर तोड़ी हुई हिमालय की अनोखी बूटियाँ जादू का प्रभाव रखती हैं । कायाकल्प का एक नवीन ढ़ंग, जिसकी यद्यपि मैंने इससे पहले किसी रोगी पर परीक्षा नहीं की, उसे इस पर सफलता से प्रयोग करूंगा । चिकित्सा कठिन अवश्य है पर हानिकारक नहीं । मैं नवजात बच्चे की भाँति इसके शरीर पर नई, कोमल और सुन्दर त्वचा उत्पन्न कर दूँगा ।"

शशि ने आचार्य के पाँव पकड़ लिए ।

"तो महाराज !" सम्राट् के स्वर में नम्रता अपनी अंतिम सीमा को पहुंच गई थी । "ऐसा कर दीजिए !"

"ठहरिए !" रुद्रदत्त बोला ! "मुझे किसी के व्यक्तिगत दुःख-सुख की परवाह नहीं है । अब जब कि रथ में आँधी की भाँति दौड़ने वाले घोड़े जोते जा चुके हैं और तेज कोड़ा पटका जा चुका है । जब तक धुरा संचालित नहीं होता, मैं किसी को कुछ करने की अनुमति नहीं दूंगा ।"

"आह, मुझ पर और मेरे मित्र पर उपकार करने वाले ! हमारे प्राण बचाने वाले ! धुरा घूम पड़ा है । अत्याचारी हूणों के अपवित्र पाँव अब एक घड़ी के लिए भी हिन्दुस्तान की पुण्यभूमि पर देखे नहीं जा सकते । नौकर को भेजकर मेरे सरदारों को बुला दो ।"

जब सरदार आ गए तो उसने उन्हें आज्ञा दी, "अभी जाकर घोड़ों पर सवार हो जाओ और उन्हें जितना तेज हो सके, दौड़ते हुए प्रान्त के अधिकारी के पास पहुंचो । उसे मेरी ओर से आज्ञा दो कि जितनी सेना उसके पास उपस्थित है, लेकर पड़ाव किए बिना धावा मारता हुआ यहाँ पहुंचे । और तुम यहाँ से सीधे राजधानी पहुंचो और सेनापति को आदेश दो कि स्थानीय रक्षा के लिए कुछ सैनिक टुकड़ियाँ छोड़कर शेष सारी सेना युद्ध के शस्‍त्रों और सामग्री से सुसज्जित कर मालवा और स्यालकोट के बीच उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ता चला जाए । हम वहीं उससे मिलेंगे ।" सम्राट् ने स्थान और दिशा के विषय में रुद्रदत्त का परामर्श लिया ।

"ठीक है । यहाँ पर मालवा और चालुकिया सेनाएं हमें मिल सकती हैं ।"

सरदार ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "श्रीमान जी, यदि मौखिक आदेश के सथान पर लिखी हुई आज्ञा मिल जाती तो ...."

"तो तुम इसे लिख लो - हम नीचे अपने हस्ताक्षर कर देंगे । उधर पूज्य आचार्य जी से लेखनी और पत्र ले लो ।"

सरदार आज्ञा पत्र तैयार करने चले गए । आचार्य जिज्ञासानन्द शशि विक्रम की चिकित्सा करने के लिए उसे बाहर ले गया और तीनों राष्ट्रभक्त युवक कुछ नया परामर्श करने के लिए बाहर निकल आए । ध्यान उचटने के कारण उनके पग तालाब की ओर उठने लगे जहां किसी अन्य स्थान की अपेक्षा अधिक सन्नाटा और मौन का वातावरण था ।

"सम्राट् कहता था ।" यदि शशि को दिखाने से पहले पूछते तो कहता मैं कुछ स्वस्थ हो जाऊं तो राजधानी जाकर सेना तैयार करता हूं । तुम उधर मालवा और चालूकिया सेनाओं को तैयार कराओ । जब और जहां तुम्हारा सन्देश पहुंचेगा, मैं सेना लेकर आ जाऊंगा । इस पर यदि जोर देते कि इस प्रकार तो हमारे संघर्ष में ढ़ील पड़ जायेगी और परिस्थिति अधिक बिगड़ जाएगी, तो उसने यही उत्तर देना था कि नवयुवको ! एक साधारण विवाह शादी का प्रबन्ध करना होता है तो इसके लिए भी सप्‍ताहों पहले तैयारियाँ करनी पड़ती हैं । ऐसे घोर संग्राम के लिए जो दो जातियों के भाग्य का निर्णय कर दे, तैयारी के लिए आखिर समय चाहिए ।

उन्होंने सम्राट् के चार रक्षक सैनिकों को घोड़े दौड़ाए जाते देखा । आयुर्वेदाचार्य किसी काम के लिए नौकर से केले के आठ-दस हरे-भरे पेड़ कटवाता दिखाई दिया परन्तु उन्होंने उसकी ओर ध्यान न दिया । वे तालाब की धुली हुई साफ-सुथरी पैड़ी पर बैठ गए । रुद्रदत्त बोला, "महाभारत के संग्राम में जब महारथी अर्जुन जी छोड़कर बैठ गया था, तो श्रीकृष्ण ने बहुतेरा उपदेश दिया परन्तु जानते हो कि उसकी खड़ग कब मौत की बिजलियां बरसाने लगी थी ?"

"जब धोखेबाज कौरवों के हाथों अभिमन्यु मारा गया था ।"

"हाँ ! उस समय बदले के आवेश में अंधे होकर उसने प्रण किया था कि यदि सांझ तक जयद्रथ को नहीं मारूंगा तो सूरज छिपने के पश्चात् स्वयं जीते-जी चिता में जल मरूंगा ।"

"ऐसे ही शशि की दुर्घटना देखकर सम्राट् का क्रोध भड़क उठा ।"

"इसी प्रकार यहाँ आदर्श और कर्त्तव्य अपने स्थान पर ठीक हैं । परन्तु वीरों की वीरता उस समय दहाड़ती है जब मन पर सम्मुख चोट पहुंचती है । सिपाही उस समय भभक उठता है जब साथ-साथ लड़ते हुए उसके बाप, भाई, मित्र के अंग शत्रुओं के प्रहारों से कट-कटकर गिरने लगते हैं । मांएं, बहिनें और धर्मपत्‍नियाँ उस समय रण-चण्डियाँ बनतीं हैं जब उनके बेटों, भाइयों और पतियों की लोथें घावों से निढाल होकर लुढकती और मरुस्थलों में सड़ती दिखाई देती हैं ।"

महाबाहु बातचीत को बदलते हुए बोला - "अब तीन काम हमारे सामने हैं । एक, जाकर मालवा के महाराज और चालूकिया सरदारों को तैयार करना । दूसरे, साधारण हिन्दू जनता को विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संगठित करके हथियारबद्ध कर देना ।"

"और तीसरे ?"

"तीसरा काम तो कोई काम नहीं । परन्तु काम का नाम अवश्य है और वह है सम्राट् के साथ उस समय तक रहकर उसके विचारों और प्रण की रक्षा करना, जब तक वह अपनी सेनाओं को लेकर मालवियों और चालूकियों के साथ युद्धक्षेत्र में नहीं कूद पड़ता ।"

"क्या आपका विचार है कि सम्राट् अपने प्रण से फिर जाएगा ?"

"ऐसा विचार करने का मेरे पास कोई कारण तो नहीं । राजाओं और सम्राटों के स्वभाव के बारे में केवल एक सावधानी है जिसको सामने रखना मेरे विचार से अत्यावश्यक है ।"

"आपका विचार ठीक प्रतीत होता है" रुद्रदत्त बोला ।

"तो फिर हममें से कौन क्या करे?" धूमकेतु ने पूछा ।

रुद्रदत्त ने कहा - "थोड़ा सोचने दीजिए श्रीमान् ! प्रश्न किसी की निश्चय शक्ति और तत्परता का नहीं, प्रत्युत योजनाओं को ऐसा कार्यरूप देने का है जिससे आगे चलकर कोई भूल न हो और हमारी विजय में सन्देह न रहे ।"

सब चुप हो गए और एक बार फिर हर एक विचारों की अथाह गहराइयों में खो गया । पीछे से आर्युवेदाचार्य के नौकरों के लकड़ी के हथकोल्हू से केले के तनों को पेलने और रस निकालने का शब्द सुनाई देता रहा । सरसराता और तलतल करता थोड़ा परे छप-छप का एक और शब्द उत्पन्न हो रहा था । सम्भवतः दूसरा नौकर किसी कुण्ड को धो रहा था । आखिर रुद्रदत्त बोला, "मेरे विचार में यह ठीक रहेगा कि आचार्य जिज्ञासानन्द और आधी छाती कटी भिक्षुणियों को लेकर मैं जनता में घूमूँ और श्री महाबाहु जाकर मालवा राज्य और चालूकिया सरदारों को तैयार कर लें ।"

"और श्री धूमकेतु ?"

"यह दोनों ईरानियों को लेकर संगठित हुए युवकों को शस्‍त्र विद्या और युद्ध-कला सिखलाने और ग्रामों तथा नगरों को प्राचीर युक्त बनवाने के लिए देश भर में घूमेंगे ।"

महाबाहु बोला "आपकी योजना के ठीक होने में सन्देह नहीं । परन्तु संभवतः आपने यह नहीं सोचा कि मालवा और चालूकिया सेनाओं का सेनापतित्व कौन करेगा । मालवा राज का बड़ा सेनापति बीमार पड़ा है । इधर खंडहरों में खाल उतरे, टूटी जूती की भांति निकम्मा बना पड़ा है । चिकित्सा से यदि वह ठीक भी हो गया तो भी इस पर कुछ ऐसा भरोसा नहीं किया जा सकता । जिस वीरता को स्‍त्री की सुन्दरता छू जाये वह पराक्रमहीन हो जाती है ।"

"सोचते समय यह कठिनाई भी मेरे ध्यान में थी महाबाहु ! और मैंने इसका यह हल सोचा है कि अब तीनों राजाओं की सेनाएं एक स्थान पर मिलें । उस समय उनका सेनापतित्व करने के लिए तुम उपस्थित होगे ही । इसमें सन्देह नहीं कि तीनों राजाओं की सेनाएं एक आदेश के नीचे लड़ती हुई शत्रु को हरा सकेंगी । परन्तु मुझे जनता की शक्ति पर अधिक भरोसा है । देश सेवा के नाम पर संगठित लाखों सशस्‍त्र हिन्दू श्रमिक, किसान, व्यापारी, विद्यार्थी न केवल सरकारी सेनाओं की किसी दुर्बलता अथवा भूल को दूर कर सकेंगे, बल्कि स्वयं अपनी शक्ति के भरोसे आक्रमणकारियों से भिड़कर उनका नाम तक मिटा डालेंगे । युद्ध की तैयारियों के लिए चाहे कितनी ही जल्दी क्यों न की जाए, परन्तु इसके लिए पन्द्रह-बीस दिन अवश्य चाहिएं । इस कालावधि में हम यदि अधिक नहीं तो साठ-सत्तर नगरों में अवश्य घूम लेंगे । जितने समय में युद्ध की आग भड़के, उतने में वेदान्ताचार्य और एक दो भिक्षुणियाँ, जो थोड़ा-बहुत बोलना जानती हैं, मेरी संगत में रहते हुए प्रचार का काम संभाल लेंगी । जबकि इसी समय में बहराम और शापूर श्री धूमकेतु से जनता को सैनिक बनाने का ढ़ंग सीख लेंगे । इस प्रकार युद्ध आरम्भ होते समय हम तीनों के पास इसके प्रबन्ध और देख-भाल के लिए अवकाश हो जाएगा और काम चलता रहेगा ।"

"चलो ठीक है । इन मृत हूण सैनिकों को तो ठिकाने लगा दिया गया है परन्तु उस हूण गुप्‍तचर का क्या बने ?"

"यदि जीवित रहता तो सम्भवतः किसी अवसर पर काम आ जाता । परन्तु हम इसे साथ-साथ खींचते नहीं फिर सकते ।"

"तो क्या इसकी गर्दन उड़ा दी जाये ?"

"और क्या !"

"हाँ ! क्योंकि यदि वह हमारे बढ़ते हुए कार्य के कारण किसी प्रकार भाग गया तो भारी क्षति पहुंचायेगा ।"

"अपने लिए" रुद्रदत्त हूण गुप्‍तचर की बात समाप्‍त करता हुआ बोला, "एक अच्छा सा घोड़ा मंगवा लो । तुम्हें श्री महाबाहु ! अभी मालवा को चल देना चाहिए ।"

धूमकेतु ने महाबाहु को परामर्श दिया, "अच्छा हो कि कुछ घुड़सवारों को सहायता के लिए साथ ले जाओ ।"

"न बाबा ! मैं तो अकेला ही ठीक हूं । यदि पहुंचने की शीघ्रता न होती, तो मैं घोड़ा भी न लेता । मुझे तो किसी दूत का भेष बदलकर शत्रुओं के बीच पैदल घूमकर ही आनन्द आता है । तब मैं वहाँ के सारे भेदों का पता लगाकर, राजनीति की छोटी सी चाल चलकर उनके सारे प्रयत्‍नों को तलपट करके रख देता हूँ ।"

"परन्तु आवश्यकता पड़ने पर खड़ग के हाथ भी तो खूब दिखाने आते हैं ।"

"वह तो प्रत्येक हिन्दू को आने चाहिएं । व्याकरण, वेदान्त, व्यापार, विद्यायें और कलाएं चाहे उसे आती हों परन्तु यदि उसे अवसर पड़ने पर शस्‍त्र चलाना और जान तोड़कर लड़ना नहीं आता, तो उसे कुछ भी नहीं आता ।"

सम्राट् को तीसरी पट्टी लगाकर और उसे तीसरी खुराक पिलाकर आयुर्वेदाचार्य कुण्ड के किनारे पहुंचा जहाँ उसके नौकर कई घड़े, कटोरियाँ, मटके और मर्तवान लिए खड़े थे । आचार्य जिज्ञासानन्द ने एक हाथ में बांस की दो आर-पार छेद की हुई नालियाँ पकड़ी हुईं थीं जिनके सिरों पर एक ओर मोम जैसी कोई वस्तु लगी हुई थी, दूसरे हाथ में मालाबारी ताड़ के पत्तों पर लिखी हुई किसी पुस्तक के दो पन्ने पकड़े हुए थे ।

"औषधियों से भरे इस कुण्ड में" वह शशि से कह रहा था, "तुम को पूरी पाँच घड़ियां डूबे रहना पड़ेगा । यह नालियाँ मैं तुम्हारे नथनों में लगा दूंगा जिनसे चिकित्सा का कार्य दो घड़ी में पूर्ण हो जाये । कुम्भक की हुई प्राणवायु के जोर से रोमों में से निकलता हुआ पसीना औषधियों की शक्ति को एकदम बढ़ा देगा । औषधियाँ अपनी पहली अवस्था में तुम्हारे शरीर को सुन्न करेंगीं । फिर जलन देंगी । परन्तु ऐसी अधिक नहीं कि सहन न की जा सके । इसके पश्चात् जब शरीर की त्वचा पहले की भांति ठीक हो जाएगी तो प्रत्येक प्रकार का कष्ट जाता रहेगा । बताओ, क्या तुम इस चिकित्सा के लिए तैयार हो ?"

"निःसन्देह श्रीमान् !"

संगमरमर के उस खाली किए, मंजे-पोंछे कुण्ड में, जो न जाने सन्यासियों ने गौओं को पानी पिलाने के लिए बनवाया था, न जाने इसमें जड़ी-बूटियों के कुछ प्रयोग किए जाते थे, शशि अपने शरीर से चादर उतारकर चित्त लेट गया । आचार्य ने झुककर उसके कानों में रूई के फोहे ठूंसे और नाक में बंसी की दोनों नलियाँ फंसा दीं, जिससे उसके नथुने फूल गए । कुण्ड के ऊपर एक लकड़ी रखकर उसने उस पर दोनों नलियाँ जमा दीं ।

तीनों राष्ट्रवादी युवक क्षण-भर के लिए अपना काम भूल गए और चिकित्सा के इस चमत्कार को देखने लगे । आचार्य जिज्ञासानन्द ने केले के रस से भरे हुए दो बड़े-बड़े घड़ों में, एक मर्तबान में से निकाल कर थोड़ी सी कोई भस्म घोली जिससे उसकी रंगत सुनहरी हो गई । फिर उसने अपने हाथ से दोनों घड़े बड़ी सावधानी के साथ कुण्ड में उड़ेल दिए । उसके तल में डूबा हुआ शशि ऐसा लगने लगा कि जैसे कोई सुन्दरी रेशम की रंगीन पतली चादर ओढ़े सो रही हो ।

किसी प्रकार तेजाब के मर्तबान में पहले उसने आठ मोती और सुखाये मृत साँप का एक टुकड़ा डाला । फिर हथेली पर मात्रा आंक कर थोड़ा सा लौह चूर्ण डाल दिया । जब इनको डाले थोड़ा समय हो गया तो उसमें छटाँक भर पारा डाल कर एकदम उसका मुंह जोर से बंद कर दिया । बाएं हाथ से उसे दबाया । दाएं से उसने एक और मर्तबान खोला और नौकर से केले के रस के तीसरे घड़े में थोड़ी मात्रा इस मर्तबान की भस्म की डलवाई और उसे आज्ञा दी कि लकड़ी की सहायता से उसे रस में भली प्रकार घोल दे । नौकर जब उसे घोल चुका तो आचार्य ने अपने हाथ का भांप उगलता मर्तबान उस घड़े में उड़ेल दिया और वह घड़ा कुण्ड में खाली कर दिया ।
 
नई औषधि के पड़ते ही सारी औषधि लाल होकर तुरन्त खौल उठी और उसमें नई झाग उठ-उठ कर कुण्ड के मुंह से टकराने लगी । बंसी की नलियों के इधर उधर हिलने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे नीचे पड़ा हुआ शशि औषधि की जलन से तिलमिला रहा है ।

"जादू करते हो आचार्य महोदय !" रुद्रदत्त आयुर्वेद के इस चमत्कार को देखकर बोला ।

"हाँ, परन्तु संसार में तलवार का जादू ही सबसे बड़ा है । मैं एक की चिकित्सा करूँ, दस की करूँ, सौ की करूँ । परन्तु आक्रमणकारी एक जाति की जाति को घायल करते जायें तो मेरे जैसे जड़ी-बूटियों वाले वैद्यों की टोलियां हार जाती हैं । उस समय तो आप जैसे योद्धाओं की टोलियां ही अपना जादू रचकर अत्याचार की इस बढ़ी आती बाढ़ को 'स्तब्ध' कर सकती हैं ।"

"धन्यवाद ! हम राष्ट्रवादी युवक अपने आप को कुछ ऐसा योद्धा तो नहीं समझते किन्तु जब लोग किसी को योद्धा और रणधीर कहकर पुकारें तो उसे कुछ बन ही जाना चाहिए ।"

टापों का शब्द सुनाई दिया जिसकी ओर उन्होंने गर्दन मोड़कर देखा । गांव में ठहरे हुए सम्राट् के सिपाहियों में से एक आज्ञानुसार घोड़ा लेकर आ गया था ।

"लम्बा, दम्भ, और आंधी जैसी तेजी, परन्तु थोड़ा हठीला है, इसलिए लगाम को ....।"

"चिन्ता न करो" महाबाहु कूदकर घोड़े पर सवार हो गया । "अच्छा !" उसने दायें हाथ में लगाम पकड़कर बायें हाथ को ऊपर उठाते हुए कहा, "ईश्वर हम सब को सफलता दे । भारत कार्य, ईश्वरी कार्य !"

उसने घोड़े को एड़ लगा दी ।

एक प्रातः जब सूर्य आसमान में ऊँचा चढ़ आया था, महाबाहु घोड़ा दौड़ाता हुआ एक गांव में पाठशाला के पास से गुजरा जहाँ धूप में बैठे कुछ विद्यार्थी पढ़ रहे थे । एक गोरा और मोटा सा ब्राह्मण अपने आसन पर बैठा किसी की जन्म-पत्री बना रहा था । जाते जाते मजाक में महाबाहु ने पूछा, "क्यों महाराज, मेरा भाग्य कैसा रहेगा ?"

सहसा चौंककर ब्राह्मण ने न जाने मजाक में अथवा गणित से देखकर ऊँचे स्वर में कहा, "इस प्रकार घोड़ा दौड़ाते हुए प्रश्न करने वाले के मार्ग में भारी संकट की सम्भावना है जिससे भगवान् ही बचाये तो बचाये ....।"

ब्राह्मण की आवाज पीछे ही रह गई और महाबाहु बड़बड़ाता हुआ आगे निकल गया ।

शायद ब्राह्मण के मुख में से भाग्य-विधाता ने अपने आप ही भाग्य की बात कह दी थी । वह संकट जिसके विषय में उसने कहा था, मार्ग में महाबाहु की ही प्रतीक्षा कर रहा था ।

शीतऋतु की सुहावनी धूप में निश्चिन्त महाबाहु अपने घोड़े को सरपट दौड़ाये लिए जा रहा था । उसके हृदय की धड़कनें और घोड़े की टापों की आवाज मिलकर एक अद्‍भुत सिहरन भर रही थीं । दूर-दूर तक वृक्षों की पत्तियों और खिलते फूलों की सुरभि से सारा वन प्रान्तर उल्लसित हो रहा था ।

सुनसान जंगल के वृक्षों के मध्य में से गुजरती एक निर्जन सी पगडंडी पर तीन घुड़सवार दिखाई दिए । पहले उन्होंने अपने घोड़े रोककर दूर जाते महाबाहु को पहचानने का प्रयत्‍न किया, फिर एक जयकारा लगाते हुए अपने घोड़ों को उसके पीछे लगा दिया ।

महाबाहु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चिन्त सा चला जा रहा था । वह अपने गन्तव्य स्थान पर शीघ्र ही पहुंच जाना चाहता था इसलिए मार्ग की किसी बाधा में उलझकर समय गंवाना नहीं चाहता था । उसने उनकी ओर साधारण दृष्टि डालकर तथा यह सोचकर कि ये लुटेरे हैं, घोड़े को और भी तेज कर दिया । उसे इस बात की स्वप्‍न में भी आशा नहीं थी कि ये घुड़सवार केवल लुटेरे नहीं हैं अपितु उसी का पीछा कर रहे हैं । उसने अपने घोड़े को और भी तेज कर दिया । अब भी वह यही समझ रहा था कि ये एक यात्री का पीछा कर उसका घोड़ा छीनने के अभिप्राय से ही पीछे-पीछे चले आ रहे हैं । साथ ही उसका यह भी विचार था कि मेरा घोड़ा उनके कहीं उत्तम नस्ल का है । थोड़ी देर बाद इन्हें पीछे छोड़ जायेगा और ये अपने आप वापस चले जायेंगे । इसलिए उसने घोड़े को जोर की एक और एड़ लगाई ।

परन्तु ऐसा लगा जैसे इनके घोड़े भी कम दौड़ने वाले नहीं थे । वे आंधी के वेग से दौड़ते चले आ रहे थे । वह अपने से आगे भागते हुए सवार को पकड़ने का निश्चय करके पीछा कर रहे थे । हूण सवार चाहते थे कि वे लम्बी लम्बी छलांगें लगाकर महाबाहु के घोड़े पर जा गिरें । दोनों के बीच का अन्तर कम होता चला जा रहा था । इस दौड़-धूप में कई बार वे एक दूसरे के समीप आए और दूसरे ही क्षण फिर दूर हो गए । हर बार महाबाहु का घोड़ा बिजली की सी गति से उन्हें पछाड़ देता था । किसी भी प्रकार उसे हाथ आता न देख एक हूण ने, जो सबसे आगे था और उनका सरदार प्रतीत होता था, कमर से कटार निकाली, परन्तु पीछे आने वालों के पास धनुष बाण भी थे । महाबाहु को हाथ आते न देखकर उन दोनों हूणों ने अपने कंधों से धुनुष बाण उतारकर उस पर अंधाधुंध बाणों की वर्षा करनी आरम्भ कर दी ।

"दुष्टो" घोड़े को भगाते हुए महाबाहु बड़बड़ाया । तभी दो बाण सनसनाते हुए उसके कानों के पास से गुजर गए । "काश मेरे पास भी धनुष होता ।" जिसे शीघ्रता से वह झोंपड़ी में ही भूल आया था । फिर भी तनिक चिन्ता किये बिना वह भागा चला जा रहा था और हर बार बाणों की मार से बाल-बाल बच जाता था । तभी एक हूण घुड़सवार ने अपना लक्ष्य साधने के लिए घोड़े को रोका । किन्तु इतने में ही दोनों का अन्तर इतना अधिक हो गया कि बाण की मार इस तक पहुंचनी असम्भव हो गई ।

महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़कर देखा । उसने एकदम पहचान लिया कि आगे यह स्वस्थ तथा बलिष्ठ शरीर वाला व्यक्ति हूणों का गुप्‍तचर चौकी का छोटा कोतवाल था और पीछे दो सिपाही थे । वह समझ गया यह लुटेरे नहीं हैं । यह तो मुझे पकड़ने के लिए ही पीछे आ रहे हैं और बहुत सम्भव है कि मार्ग में इनकी सहायता के लिए और भी घुड़सवार हों । एक सवार जो पीछे से बार-बार उस पर बाणों की वर्षा कर रहा था, उसके बाण अवश्य ही पीछे रह जाते थे परन्तु दूसरा व्यक्ति अपने साथी के साथ भागता हुआ बाणों की वर्षा करता आ रहा था । इस समय कोई अदृश्य शक्ति ही महाबाहु की रक्षा करती चली आ रही थी । आखिर एक बाण महाबाहु की भुजा में आकर लगा । एक सनसनाहट शरीर में फैल गई । क्रोध में आकर उसने अपनी भुजा में गड़ा बाण खींचकर निकाला और एक ओर फेंक दिया । महाबाहु ने दाएं हाथ में लगाम पकड़ी और बाएं हाथ में कटि में बंधी अपनी कटार निकाली और ठीक लक्ष्य करके उस बढ़े आते धनुर्धारी घुड़सवार पर पूरी शक्ति से फेंक मारी ।

महाबाहु का लक्ष्य अचूक था । वह अब भी अपने लक्ष्य स्थान पर ठीक लगा और कटार धनुर्धारी हूण की छाती में पूरी तरह घुस गई । हूण एक चीख मार कर घोड़े से नीचे गिर गया । हूण सरदार ने अपने सैनिक के गिरने की तनिक भी चिन्ता न की और महाबाहु के पीछे अपना घोड़ा दौड़ाता चला गया । तीसरा सैनिक अपने सरदार के साथ मिलना चाहता था परन्तु उसे अपने गिरे साथी को देखने और उसकी छाती में गड़ी कटार को निकालने के लिए उतरना पड़ा । तब तक दोनों सवार घने जंगल में अदृश्य हो गए थे ।

महाबाहु एक दो मोड़ घूमकर झाड़ियों से घिरे ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हो लिया जहाँ वृक्षों के पीछे एक नदी बह रही थी ।

"ओ मर्दये !" हूण सरदार बिगड़ी हुई टूटी-फूटी हिन्दुस्तानी में चिल्लाया, "यह लोमड़ियों की चालाकी मेरे सामने नहीं चल सकेगी । तुम लोग उस रात पता नहीं किस प्रकार निकल गए परन्तु आज मैं तुम्हें जीता नहीं छोड़ूंगा और तेरी गर्दन पर अपनी तलवार की नोंक गड़ाकर पूछूंगा, बता तूने बड़े कोतवाल और हूण जासूस का क्या किया ?"

जंगल से डरे हुए दो गीदड़ निकलकर भागे, झाड़ी में से तीतरों का एक जोड़ा फुर्र करके उड़ गया । वन अत्यधिक घना होता गया था, सरकण्डे के झुण्ड उनका मार्ग रोकने लगे परन्तु दोनों घोड़ों की दौड़ में किसी प्रकार की कमी न आई । वह फैली हुई टहनियों को चीरते हुए वन में घुसते चले गए ।

इस अंधाधुंध दौड़ में बाईं ओर के वन में एक शोर सा सुनाई दिया । कहीं से बीस-तीस व्यक्तियों का कण्ठ स्वर जयजयकारा लगा रहा था । बहुत दूर से शब्द आने के कारण महाबाहु यह अनुमान तो नहीं लगा सका कि कौन लोग हैं परन्तु किसी अज्ञात संकट की कल्पना से वह भी एक बार काँप उठा । सम्भव था कि यह शोर शिकार की टोह में आए शिकारियों का हो या किसानों का हो अथवा हूण लुटेरों का हो जो अचानक कहीं वन में से निकल आयें और अपने सरदार की सहायता को आन पहुँचें तथा प्रथम बार की तरह एक नया संकट उत्पन्न कर दें । क्योंकि उस दिन इसी प्रकार अचानक वन में से निकल कर हूण सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया था । वह इस बात पर पछता रहा था कि उस समय जबकि घायल होकर हूण सैनिक गिर पड़ा था तथा दूसरा उसकी देख-रेख के लिए पीछे रह गया था, वह पलट कर क्यों नहीं हूण सरदार पर टूट पड़ा । उसने अपने घोड़े का मुंह नदी की तरफ कर दिया जो थोड़ी दूर पर बह रही थी ।

महाबाहु का घोड़ा पसीने से भीगा हुआ था और उसके मुंह से सफेद झाग निकल रही थी । उसकी सांस बुरी तरह फूल रही थी, लम्बी दौड़ तथा एक पल का भी विश्राम न मिलने से वह काफी थक चुका था परन्तु फिर भी कमजोरी और थकान की परवाह किये बिना भागता चला जा रहा था । पीछे से शत्रु के घोड़े की टापें उसी वेग से निकटतर होती चली आ रही थीं । कहीं शत्रु उससे आगे न निकल जाये, इस आशंका से वह अपने घोड़े को और अधिक तेज करता जा रहा था ।

नदी तट पर उगी एक हरी झाड़ी पर महाबाहु की दृष्टि पड़ी, जिस पर मच्छर मंडरा रहे थे और दूसरी तरफ नदी का पाट दिखाई दे रहा था । उसने प्रयत्‍न किया कि वृक्षों की दीवार को पार कर देखे कि नदी कितनी चौड़ी है ताकि वह घोड़े पर बैठा ही बैठा नदी को फांद जाए । तभी एक मच्छर उसकी आंख में आकर गिर पड़ा और उसकी आंखें बन्द हो गयीं ।

"कैसा दुर्भाग्य है ।" दर्द से कराह कर उसने अपनी आंख को मला परन्तु तभी आवेश में भागते आते हुए घोड़े ने सरकण्डों के झुंड को चीरते हुए नदी में छलांग लगा दी । महाबाहु के चेहरे पर वृक्षों की पत्तियां टकराईं और उनमें से एक पत्ती की नोंक उसकी आंख में जा लगी । दोनों आंखों में इस अप्रत्याशित चोट से तिलमिलाते हुए उसने अपने एक हाथ में खड़ग और दूसरे में घोड़े की रास जोर से पकड़ ली और काठी पर जमे रहने का प्रयत्‍न किया । छलांग लगाते समय उसने उत्साह से घोड़े की पीठ पर प्यार की थपकी दी और घोड़े की पीठ के साथ लग गया ।

शायद कुछ दिन पूर्व वहां अत्यधिक वर्षा होने से नदी का जल चढ़ा हुआ था और स्थान-स्थान पर भंवर बन रहे थे । इसका पाट भी इतना चौड़ा हो गया था कि कोई भी घोड़ा कितनी लम्बी छलांग लगाने वाला क्यों न हो, नदी को पार नहीं कर सकता था । एक ऊंची छपाक के साथ दोनों पानी में गिर पड़े । महाबाहु ने पानी की ठंड का अनुभव किया और उसे लगा जैसे नदी की वेगवती लहरें उसे बहाये लिए जा रही हैं । उसने पानी के छीटों से भीगी आँखों को मला और उन्हें खोलने का प्रयत्‍न करने लगा परन्तु तब तक पीछा करने वाले हूण सरदार का घोड़ा भी पानी में कूद पड़ा था । सवार तथा उसका घोड़ा दोनों ही महाबाहु के पास आ गिरे थे जिससे बहुत सा पानी उछलकर महाबाहु पर आ पड़ा जिससे वह और उसका घोड़ा पूरी तरह डूब गए । महाबाहु ने पानी की उस दीवार को जो लहरों के भंवर में फंसने से उत्पन्न हो गयी थी, ढकेल कर हटाया ।

जरा होश आते ही दोनों शत्रुओं ने अपनी-अपनी तलवारें म्यान में से निकाल लीं और पानी में ही एक दूसरे पर प्रहार करने के लिए अपने घोड़ों का सहारा लेकर उछल पड़े । हूण सरदार ने अपनी तलवार पहले निकाल ली थी परन्तु महाबाहु ने उसे वार करने का अवसर नहीं दिया और उससे पूर्व ही उस पर वार कर दिया परन्तु पानी में अपना सन्तुलन न रखने के कारण उसका निशाना चूक गया जिससे हूण की गर्दन बच गई परन्तु खड़ग वाला हाथ कलाई समेत कटकर पानी में जा गिरा । सारा पानी थोड़ी देर के लिए लाल हो उठा ।

संभलने का अवसर न देते हुए, सर्दी से ठिठुरते हुए हाथ से उसने दूसरा प्रहार किया परन्तु इस बार उसके अपने हाथ से तलवार छिटक कर दूर जा गिरी । नदी का बर्फ के समान ठण्डा पानी हाथ पांव को सुन्न कर रहा था ।

हूण सरदार किसी दानव के समान लम्बा और हाथी के समान बलवान् था । महाबाहु और उसके साथी कोतवाल हूण गुप्‍तचर को उठा लाए थे । इसी पर क्रोध आने से उसने उसका पीछा किया था और इतनी दौड़-धूप करने पर भी जब वह हाथ न आया अपितु उसके एक साथी को भी उसने मार दिया, इससे उसका क्रोध और भी प्रज्वलित हो गया था । इस पर, महाबाहु ने तलवार से उसकी कलाई उड़ा दी थी जिससे वह बिल्कुल पागल हो उठा था । प्रतिशोध के लिए वह और भी अधिक प्रयत्‍न कर रहा था कि महाबाहु के पास पहुंचकर उसे अपने भारी-भरकम शरीर के दबाव से पानी में डुबो दे ।
 
इधर महाबाहु भी इसी घात में था कि किस प्रकार इस शत्रु का काम समाप्‍त किया जाए । अपने से बलवान् और दुर्धर्ष शत्रुओं के साथ अपने जीवन में अनेक बार जीवन और मरण के खेल खेल चुका था । परन्तु इस समय उसके घोड़े निढ़ाल हो चुके थे । बर्फ जैसे ठण्डे जल ने उनके शरीर को सुन्न कर दिया था । हूण सरदार ने यह सोचकर कि इस ठंड में किसी समय भी घोड़ा भंवर में फंसकर उसका साथ छोड़ जाएगा, अपने घाव की तनिक भी परवाह किये बिना अपने घोड़े को जोर से झटका दिया ताकि वह महाबाहु के पास पहुंच सके । घोड़े ने भी अन्तिम जोर लगाया और महाबाहु के पास तक जा पहुंचा । हूण सरदार घोड़े को छोड़कर महाबाहु पर कूद पड़ा ।

महाबाहु ने पहले तो अपने बलिष्ठ हाथों से हूण सरदार को रोकने का प्रयत्‍न किया । फिर वह भी अपने घोड़े को छोड़कर उसी से उलझ पड़ा । दोनों अच्छे तैराक तथा लम्बी डुबकी लगाने वाले थे । इस प्रकार नदी में ही लड़ते-लड़ते वह तेज धारा के साथ बहते हुए नदी का मोड़ मुड़ गए । हूण इस प्रयत्‍न में था कि किसी प्रकार महाबाहु का सिर उसके हाथ में आ जाए और उसे डुबोकर मार दे । आखिर इस संघर्ष में उसका हाथ एक बार उसके सिर पर जा ही पड़ा । लोहे के शिकंजे के समान उसने उसके सिर को दबा दिया और अपने भारी-भरकम शरीर का बोझ उस पर डाल दिया । महाबाहु ने डूबने से पहले एक लम्बा साँस अपनी छाती में भर लिया और अन्दाज से उसने अपने लोहे के समान कठोर हाथों से उसके गले को दबा दिया । उसकी पकड़ इतनी मजबूत होती जा रही थी कि हूण सरदार का शरीर मछली के समान तड़फने लगा । कुछ देर तक दोनों इसी प्रकार युद्ध करते रहे और एक दूसरे की जीवन लीला समाप्‍त करने का प्रयत्‍न करते रहे । आखिर हूण का दम टूटता सा नजर आया और महाबाहु के सिर को छोड़कर अपनी गर्दन छुड़ाने का प्रयत्‍न करने लगा ।

हूण पहले पानी से बाहर आया और तभी महाबाहु पानी से ऊपर निकल अया । उसके ऊपर आते ही हूण सरदार ने अपने बाएं हाथ का भरपूर मुक्का महाबाहु के मुंह पर दे मारा । अपने को संभालते हुए महाबाहु ने गुस्से में भरकर दोनों हाथों से ताबड़तोड़ मुक्के मारने शुरू कर दिये और एक बार उसके कटे हाथ को पकड़कर जोर से मरोड़ा और फिर दोनों गुत्थम-गुत्था हो गए ।

जिस समय यह दोनों एक दूसरे को परास्त करने में लगे हुए थे, उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था कि नदी की बालू पर धूप सेंकता हुआ एक मगरमच्छ अपना शिकार देखकर बिना शब्द किए पानी में सरक आया और उसकी तरफ आने लगा । मगरमच्छ बीस हाथ के करीब बढ़ा चला आ रहा था । दूर होने पर अचानक हूण की दृष्टि उस पर जा पड़ी । उसके मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई । इस विपत्ति के समय भी उसने साहस को तिलांजलि न दी और पानी में ही एक चक्कर काटकर पूरे जोर से महाबाहु को मगरमच्छ की ओर धकेल दिया । परन्तु गुत्थे हुए महाबाहु को वह अपने से अलग न कर सका । महाबाहु ने भी मगरमच्छ को देखा और आने वाले नये संकट का मुकाबला करने के लिए अपनी कमर में हाथ डाला जहां उसकी कटार नहीं थी । वह पहले ही हूण सैनिक को मारने के लिए प्रयोग की जा चुकी थी । उसने अपने शत्रु की कमर को टटोला और उसका खंजर निकालकर अपनी भुजाओं को पानी से बाहर निकाल लिया ।

मगरमच्छ अपनी पूंछ से पानी को हिलाता हुआ उनके सिर पर आ पहुंचा था । दोनों ने अपनी-अपनी रक्षा करने के लिए पानी में डुबकी लगाई और भिन्न दिशाओं में निकल गए । परन्तु घड़ियाल उसी दिशा में बढ़ रहा था जिधर महाबाहु जा रहा था । सिर बाहर निकालते ही महाबाहु ने मगरमच्छ को अपने सिर पर पाया । महाबाहु ने भी एकदम चक्कर काटकर मगरमच्छ पर पूरे जोर से आक्रमण कर दिया । उसने खंजर उठा कर पूरे जोर से उसकी आंख में घुसेड़ दिया और खंजर को उसकी आंख में गड़ा हुआ छोड़कर विपरीत दिशा में तेज हाथ मारता हुआ तट पर जाने का प्रयत्‍न करने लगा ।

अचानक चोट खाकर मगरमच्छ एकदम उछला और दर्द से चीख मारकर पानी में उलट गया । थोड़ी देर में क्रोध में भर कर सामने जाते हुए हूण सरदार की ओर लपका । जान बचाने के लिए सरदार ने गोता लगाने का प्रयत्‍न किया परन्तु मगरमच्छ के मुँह में उसका पैर आ गया । तट पर उगी झाड़ियों की ओर हाथ बढ़ाते हुए महाबाहु ने हूण सरदार की चीख सुनी, दुखभरी, हृदय को चीरने वाली । और फिर दोनों ही उस जल से अदृश्य हो गए ।

तट की झाड़ियों तक महाबाहु का हाथ नहीं पहुँच सका । उसने दुबारा प्रयत्‍न किया, तीसरी बार एक जड़ में हाथ डाला परन्तु बह भी उसके भार को न सम्भाल सकी और टूट गई । थकावट से चूर महाबाहु ने फिर एक बार प्रयत्‍न करने के लिए हाथ बढ़ाया । उसने लटकी एक टहनी पर हाथ मारा । वस्तुतः वह टहनी न होकर एक साँप था जो महाबाहु के हाथ का स्पर्श पाते ही ऊपर चढ़ने लगा । महाबाहु भी चौंक कर पीछे हट गया ।

तट पर जाती हुई स्‍त्री ने चीख मारी और चिल्लाई, "मुझे नाग ने खा लिया" और वह एक ओर भाग खड़ी हुई ।

स्‍त्री की आवाज सुनकर मछेरे जो पास ही धूप में अपने जाल सुखा रहे थे, दौड़े आए । उन्होंने एक आदमी को पानी चीरकर किनारे आते हुए देखा । एक ने अपने सिर की पगड़ी उसकी तरफ फेंकी जिसका किनारा महाबाहु ने पकड़ लिया ।

हल्की-सी फटकार के तौर पर एक वृद्ध मछेरा बड़बड़ाया, "स्नान करने के घाट को छोड़कर इधर नहाने क्यों निकल आए थे ? यदि डूब जाते तो क्या होता ?"

"होनहार तो टाली नहीं जा सकती थी" किनारे पर चढ़ते महाबाहु ने कहा, "अब कृपा करके मेरे लिए सूखे कपड़ों का प्रबन्ध कर दो तथा जल्दी से आग जला दो ताकि मैं अपने शरीर को गर्म कर सकूं । अगर यहाँ गर्म दूध मिल जाय तो बहुत ही कृपा होगी ।" उसने अपने गीले कपड़े की जेब में हाथ डालकर दो तीन सिक्के निकाले और मछेरों को दे दिये ।

"लो, यह तुम्हारा पुरस्कार है, जल्दी करो, मैं ठंड से मरा जा रहा हूँ ।" उसके दाँत बज रहे थे .... दूर किसी बड़े गाँव के घर दिखाई दे रहे थे ।

मछेरे महाबाहु को लेकर अपनी झोंपड़ियों को चल पड़े । तभी एक दृष्टि नदी में बहती किसी चीज पर पड़ी । "संभवतः कोई आदमी डूब रहा है", उसका शब्द पूरा होने से पहले ही सब ने उधर देखा । महाबाहु ने समझा शायद हूण सरदार मगरमच्छ के मुंह से बचकर निकल आया है । परन्तु ध्यान से देखने पर महाबाहु पहचान गया । वहां तो उन दोनों के घोड़े थे जो थकावट से चूर होने पर भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए हाथ पांव मार रहे थे ।

अपने घोड़े से दृष्टि मिलते ही महाबाहु उसकी इस अवस्था से द्रवित हो उठा, जिस प्राणी ने अपने स्वामी के लिए इतना किया था । महाबाहु चिल्लाया, "तुम सबको और भी इनाम दूंगा, इन घोड़ों को बचाओ....।"

दो नवयुवक मांझी पानी में कूद गए और घोड़ों की रासें थाम कर उन्हें तट तक घसीट लाये ।

"बहुत अच्छा ।"

थके हुए घोड़े बड़ी कठिनता से पानी के बाहर निकले परन्तु वे खड़े न हो सके । वहीं जमीन पर गिर पड़े ।

"इनके शरीर को पोंछो और इनके चारों ओर आग जला दो ताकि यह उष्णता अनुभव कर सकें । मैं तुम्हें कुछ दवाएं लिख देता हूँ, वह भी ले आना और इनकी मालिश करना । तुम में से कोई एक व्यक्ति इनके पास ठहरे और शेष मेरे साथ चलें ।"

स्‍त्रियां एक ओर चली गईं । मैले-कुचैले सूखे कपड़े पहने आग के पास महाबाहु बैठ गया और मछेरों द्वारा लाया गर्म-गर्म दूध पीने लगा । उसने आराम के लिए झोंपड़ी की दीवार से अपनी पीठ लगा ली ।

आग की उष्णता तथा गर्म दूध की गरमी से उसके शरीर में जान आई । वह अपने आपको हल्का सा अनुभव करने लगा । उसने आपस में बातें करते मछेरों से पूछा, "यह गांव किस के राज्य में है ?"

"मालवा राज्य है महाराज ।"

"अच्छा ! तो तुम में से एक आदमी गाँव के मुखिया के पास जाकर कहे कि एक राजकर्मचारी एक आवश्यक कार्य के लिए तुम्हें बुला रहा है ।"

"मुखिया का मिलना कठोर होगा महाराज ! क्योंकि महाराज स्वयं अपने अनुचरों के साथ इसी गाँव में ठहरे हुए हैं । वह तथा गाँव के सभ्रांत व्यक्ति उनकी सेवा में लगे हुए हैं ।"

"क्या सचमुच महाराज यहाँ पधारे हुए हैं ?" महाबाहु ने आश्चर्य से पूछा ।

"हाँ महाराज ! यह देखिये तीन सवार सामने चले आ रहे हैं । हो सकता है हमें ताजा मछली पकड़ने के लिए कहने आ रहे हों ।"

घुड़सवारों के समीप आने पर महाबाहु ने आवाज दी, "चन्द्रसेन !"

गरीब मछेरों के मध्य में मैले-कुचैले कपड़े पहने किस परिचित ने उसे आवाज दी ? वह हतप्रभ सा होकर उधर देखने लगा और आवाज देने वाले को पहचानने का प्रयत्‍न करने लगा ।

"ओह ! महाबाहु आप ? और इस वेष में ?" वह अपने घोड़े से कूदा और महाबाहु के गले से लिपट गया । आश्चर्य से उसके साथी सैनिक भी घोड़ों से नीचे उतरकर खड़े हो गए ।

"महाराज यहीं पर हैं क्या ?"

"हाँ ! यहीं हैं ।"

"मैं उन्हें मिलना चाहता हूँ ।"

"तो आइये ।"

"परन्तु इससे पहले तुम मेरे लिए साफ-सुथरे कपड़े मंगवा दो । मेरे कपड़े उधर झोंपड़ियों पर पड़े सूख रहे हैं । यदि यह लोग मेरी सहायता न करते तो मैं इस नदी में डूबकर मर जाता ।"

"परन्तु तुम इस नदी में आए कैसे ?"

"मैं महाराज से मिलने के लिए आ रहा था । रास्ते में हूण लुटेरों से मेरी मुठभेड़ हो गई । मेरा घोड़ा नदी में गिर पड़ा । हूण सरदार और मैं दोनों ही पिछले दो घंटे से नदी में युद्ध करते बहते चले आ रहे थे कि एक मगरमच्छ ने हम पर आक्रमण कर दिया । भाग्य से मैं तो बच गया परन्तु वह हूण उसके उदर में समा गया और थकावट से चूर मैं नदी के वेग के साथ बहता यहाँ आ गया हूँ ।"

"हे मेरे भगवान् ! तुम किन संकटों में जा फंसे ?" उसने मुड़कर कर्मचारी को आदेश दिया कि मेरे यहाँ से इनके लिए कपड़ों का जोड़ा ले आये ।

"इसे यह भी कह दो" महाबाहु ने कहा, "कि राज्य के पशु चिकित्सक को बुलाता लाये । मेरे रोगग्रस्त घोड़े नदी के तट पर गिरे पड़े हैं, वह इनकी सचमुच चिकित्सा आदि करेगा ।"

चन्द्रसेन ने सैनिक को पशुचिकित्सक को सूचित करने का आदेश भी दिया ।

घुड़सवार गाँव की तरफ घोड़े को दौड़ाता हुआ चला गया ।

"हूण से कहाँ मुठभेड़ हो गई थी आपकी ?" चन्द्रसेन ने पूछा ।

"क्या ऐसा होना असम्भव था ? आज जब सारा देश इनके अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर रहा है, किसी भी हिन्दू के साथ इनकी टक्कर हो जाना साधारण सी बात है । देश का कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं है जहाँ इन लोगों ने लूटमार न मचा रखी हो ।"

"परन्तु मालवा में ऐसी घटनायें नहीं हो रही हैं ।"

"क्यों ? क्या हूणों को मालवा में पराजित होना पड़ा है ? अथवा उन लोगों को यहाँ से भगा दिया गया ?"

"हार-जीत और युद्ध का तो अवसर ही नहीं आया, इससे पूर्व ही महाराज ने उनसे सन्धि कर ली है ।"

"सन्धि ! क्या कहा चन्द्र ! महाराज ने हूणों से सन्धि कर ली है ? ऐसे महाराज ने जो सच्चा, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा प्रजापालक है, उसने इन बर्बरों से सन्धि की है जो हमारे देश को, हमारे पूज्य स्थानों को हमारी मान्यताओं को नष्ट-भ्रष्ट करने में लगे हुए हैं, जिन्होंने न जाने कितनी स्‍त्रियों के सतीत्व भंग किए, कितनी गौओं और बछड़ों को अपने उदर में डाल लिया है - जिन्होंने यहाँ के देव-स्थानों को अपवित्र किया, हमारे शान्ति से रहने वाले किसानों की हरी-भरी खेती को जला डाला है ? उनसे महाराज ने .... क्या तुम उपहास तो नहीं कर रहे चन्द्र ?"

सब लोग इस बात को सुनकर हतप्रभ से हो गए । कुछ व्यक्तियों के चेहरों पर क्रोध की लालिमा व्याप्‍त हो गई । उन्हें इस सन्धि में अपने अपमान की गन्ध अनुभव हुई ।

उनके आत्मसम्मान को उभारते हुए महाबाहु ने कहा, "यदि सचमुच महाराज इस अपमानकारक सन्धि के लिए तैयार हो गए थे, तो क्या तुम लोगों का कुछ भी कर्त्तव्य नहीं था ? क्या देश और जाति का अपमान तुम लोगों का नहीं है ! क्या यह कायरता नहीं कि हमारा देश हाहाकार कर रहा हो और तुम आनन्द की बंसी बजाओ ?"

"क्या तुम अपनी उन प्रतिज्ञाओं को भूल गए हो जो तुमने राष्ट्र के प्रति कीं थीं ?"

"हमें सब कुछ स्मरण है महाबाहु ! परन्तु जब सारा राजदरबार ही इसका इच्छुक हो तो हम थोड़े से व्यक्ति भला क्या कर सकते थे ?"

"तुम लोग इस प्रकार की अपमानित स्थिति से त्यागपत्र देकर सेवाओं से मुक्त हो सकते थे । तुम्हें समझ लेना चाहिए था कि प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि इस प्रकार के राष्ट्रद्रोही पग उठाने वालों को या तो विवश कर दें अथवा उस राज्य को जिसमें इस प्रकार की कुचेष्टायें की जा रही हों, छोड़कर चला जाय अथवा अपने जागरण मन्त्र से समूचे राष्ट्र में जागृति की ज्योति जगा दे ।"

"तुम बड़ी कठोर बातें कह रहे हो महाबाहु ।"

"इसका कारण यही है चन्द्र ! कि आज तुम पदलोलुपता के मद में सत्य वचनों को कठोर कहने का साहस कर रहे हो, तुम भी उन दरबारियों की तरह चाटुकारिता की भाषा को ही सब कुछ समझने लगे हो । परन्तु मैं इस प्रकार के किसी वातावरण में नहीं पला । अतः मेरी सत्य बातें आज तुम्हें अजीब सी लग रहीं हैं ।"

अपने अधिकारी को किसी अपरिचित से इस प्रकार बातें करते हुए देखकर साथ वाला सिपाही दूर चला गया । उसने दोनों घोड़ों को एक वृक्ष के साथ बांध दिया और आप मछेरों की झोंपड़ियों की तरफ जाकर घूमने लगा ।

मछेरे नदी की ओर चले गए थे और उनकी स्‍त्रियाँ घरों को चली गईं थीं ।

महाबाहु के कठोर वचनों के प्रसंग को बदलने के लिए चन्द्रसेन ने पूछा, "जो हो चुका उसको छोड़ो, अब तुम ही बताओ क्या करना चाहिए ?"

"पहले यह बताओ कि यह सन्धि कब हुई है ?"

"कल रात हूण सम्राट् का दूत सन्धि की शर्तें मनवाकर आज प्रातः वापस चला गया है ।"

"हूँ !" महाबाहु ने एक गहरा साँस लिया, "क्या तुम्हें मालूम है कि सन्धि की शर्तें क्या थीं ?"

"सर्वप्रमुख तथा अपमानजनक शर्त यह कि महाराज की दस कुमारी कन्यायें मेहरगुल के रनिवास में भेजी जायें ।"
 
महाबाहु के माथे की त्योरियाँ चढ़ गईं, उसने क्रोध में अपने दाँतों से निचला होंठ काट लिया । चन्द्रसेन कहता गया, "धूर्त और कामी सेनापति ने महाराज को सम्मति दी कि सारी प्रजा में से दस सुन्दर लड़कियों को चुन लिया जाय और उन्हें राज-पुत्रियों के रूप में उनकी भेंट कर दिया जाये ।"

"धूर्त ! अपने अपमान को दूसरे पाप से दूर करना चाहता है ! प्रजा की पुत्रियाँ भेजने से क्या अच्छा यह नहीं है कि सेनापति को भूखे सिंह के पिंजरे में डाल दिया जाय ?"

"जब सेना के अन्य अधिकारी और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को इस बात का पता लगा तो उन्होंने शोक के तौर पर घरों की बत्तियाँ बुझा दीं और कुछ लोगों ने तो उस रास्ते में गड्ढ़े कर दिये जिस पर हूण दूत का रथ जाना था ताकि वह उलट जाए ।"

"क्या तुम जानते हो कि हूण दूत के जाने के बाद महाराज की क्या हालत हुई ?"

"मुझे तो यूं लगा जैसे वे बहुत परेशान थे । यद्यपि उन्होंने कोई बात कही तो नहीं जिससे उन्हें अपने कृत्य पर पश्चाताप हो रहा हो, परन्तु अब दुखित होने से क्या बनता है ? जो होना था वह तो हो चुका है ।"

"बनेगा क्यों नहीं चन्द्रसेन ! जो तीर कमान से निकल चुका है उसके पीछे एक और तीर छोड़ा जाएगा । पहला तीर तुम्हारे सेनापति, मंत्री आदि जैसे कायरों के धनुष से निकला है परन्तु दूसरा तीर देश के उन वीरों के धनुष से निकलेगा जो उसे मार्ग में ही काट डालेगा । चलो, तुम्हारा आदमी वस्‍त्र ले आया है । मैं इन्हें बदल लूँ फिर महाराज के पास चलते हैं ।"

"मेरे लिए क्या आज्ञा है ?" घुड़सवार ने चन्द्रसेन से पूछा ।

"मेरा और अपना घोड़ा लेकर सामने खड़े रहो, हम दोनों इन पर चढकर जायेंगे, तुम पीछे से पैदल आ जाना । अपितु नदी तट पर दूसरे सैनिक से पता करना कि छावनी तक घोड़ों को पहुंचाने में उसे तुम्हारी आवश्यकता तो नहीं ।"

कपड़े बदलकर महाबाहु झोंपड़ी से बाहर निकला । वह स्वस्थ और सुन्दर दिखाई देता था । चलने से पहले उसने मछेरों को पास बुलाया । दस पन्द्रह युवक और वृद्ध उसे घेरकर खड़े हो गए ।

महाबाहु स्वर में नम्रता और अपनाव का भाव भरकर बोला, "आपने मेरे जीवन की रक्षा की है इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । यदि आपको किसी प्रकार का कष्ट या असुविधा हो तो मुझे बताओ । मैं महाराज से कहकर उसे दूर कराने की चेष्टा करूंगा ।"

उनमें से एक वृद्ध बोला, "धन्यवाद कैसा महाराज ! यह तो हमारे बड़े भाग्य थे जो आपने हमारी झोंपड़ी को पवित्र किया । इस राज्य में जहाँ सिंह और बकरी एक घाट पानी पीते हों, चारों तरफ सुख शान्ति का बोलबाला हो, वहाँ किसी को क्या कष्ट हो सकता है महाराज !"

"तुम में से यदि कोई राज्य में नौकरी करने का इच्छुक हो तो मैं वह दिलवाने का प्रयत्‍न करूँ ?"

"नहीं ! नहीं महाराज !! हम नौकरी के इच्छुक नहीं हैं । भले ही नौकरी अच्छी हो परन्तु हमें अपने काम में अधिक आनन्द आता है । यह नदी है हमारा राजदरबार, जाल पकड़े नौकाओं पर भागते हुए सोने चाँदी सी चमकने वाली मछलियाँ पकड़ना ही हमारी नौकरी है । चाँदनी रातों में नदी के चमकते जल पर अठखेलियां करने से अधिक सुखद और आनन्ददायक जीवन क्या हो सकता ?"

"बहुत अच्छा !" महाबाहु मुस्कराया और उनका अभिवादन स्वीकार करता हुआ चन्द्रसेन के साथ घोड़े की ओर चल पड़ा जहाँ मछेरों के नंगे और मैले-कुचैले बच्चे खेल रहे थे, चाँदी के समान चमकने वाली नन्हीं-नन्हीं शंख की मालाएं गले में पहने हुए । कुछ बच्चों की कटियों में मूंगे, सीप और लोह के छल्लों से बनी तागड़ियां बंधी हुईं थीं । इन दोनों को पास से जाते हुए देख कुछ बड़ी आयु के बच्चों ने नमस्कार किया ।

"प्यारे बच्चो, हम तुम्हारे लिए मिठाई और फल भेजेंगे ।"

बच्चे प्रसन्नता से किलकारियाँ मारने और कूदने लगे । इसी कोलाहल में एक नन्हीं बच्ची चिल्लाई, "हम तुम्हें मछलियाँ भेजेंगे, हम आप ही पकड़ लेते हैं ।"

एक और बच्चा तालियाँ पीटता हुआ बोला, "हम तुम्हें गाने वाले मेंढ़क भेजेंगे ।"

तीसरा बच्चा बोला, "यदि तुम मुझे घोड़ा दो तो मैं तुम्हें अपनी सारी सीपियाँ दे दूंगा ।"

घोड़े पर जाते चन्द्रसेन और महाबाहु ने गर्दन मोड़कर प्यार भरे लहजे में कहा, "अच्छा मेरे खिलौनो, मैं तुम्हारे लिए अवश्य ..... भेजूंगा ।"

बाईं ओर मैदान में सैनिकों के खेमों की पंक्तियाँ दूर-दूर तक चली गई थीं । घुड़सवार सेना की गाड़ियाँ और घोड़ों के खाने के लिए दाने और चारे से भरी गाड़ियाँ अनाज मण्डी के गोदामों के समान दूर-दूर भरी खड़ी दिखाई देती थीं । सैनिक अपने-अपने घोड़ों की मालिश कर रहे थे । दूसरी ओर हस्तिसेना के हाथियों की पंक्तियां विकराल काले दैत्यों के समान खड़ीं थीं । हाथी आनन्द में झूमते हुए गन्ने खा रहे थे, उनके पैरों की लोहश्रंखलाएं रह-रहकर बज उठतीं थीं । यद्यपि भोजन का समय समाप्‍त हो चुका था फिर भी भोजनालय से धुएं की रेखाएं निकल-निकलकर आकाश में अदृश्य हो रहीं थीं ।

चलते-चलते वे दोनों राज भोजनालय के पास से गुजरे जिस में से सुस्वादु पकवानों की सुगन्धि आ रही थी । भोजनशाला की बाईं ओर सुनहरे जड़ाऊ चौबों वाले मखमल और अतलस के राजसी तम्बू दिखाई दिये जो बहुत ही सुन्दर तथा कलात्मक ढ़ंग से बने हुए थे । इन तम्बुओं के सामने सुन्दर रंग-बिरंगे फूलों के गमले रखे हुए थे और इनके द्वारों पर सशस्‍त्र सैनिक खड़े थे । श्वेत बजरी वाले मार्गों में सबसे ऊंचा महाराजा का तम्बू अपनी निराली शान से खड़ा था जिस पर पताका फहरा रही थी ।

"मेरे विचार से" महाराज की छौलदारी की तरफ बढ़ते हुए महाबाहु ने कहा, "चन्द्रसेन, तुम मुझे महाराज के खेमे के पास छोड़कर चले जाना और जब तक मैं उनसे मिलकर नहीं आता, तब तक तुम अपने मित्रों तथा एक जैसी विचार प्रणाली में बंधे युवकों की सभा बुला रखना ताकि आने के बाद जैसी भी स्थिति हो, उसके अनुरूप अगला कार्यक्रम निश्चित कर सकें ।"

"तुम्हें सन्देह है कि मैं अपने कार्य में सिद्ध नहीं हो सकूंगा चन्द्र !"

"नहीं, ऐसी बात नहीं महाबाहु ! परन्तु समय, स्थान और परिस्थिति मनुष्य से अधिक बलवान होते हैं । तब तक क्या कहा जा सकता है जब तक कि तुम मिलकर नहीं आते ।"

"तुम चिन्ता मत करो चन्द्र ! अगर दुर्भाग्यवश वह स्थिति न आ सकी तो महाराज से महान् जो हमारा राष्ट्र है उसकी कीर्ति को अक्षय बनाने के लिए हर सम्भव उपाय किया जायेगा ।"

"अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा ।"

राजा के खेमे पर पहुंच कर चन्द्रसेन और महाबाहु घोड़े से नीचे उतर गये । अंगरक्षक अपनी तलवारें पकड़े पहरा दे रहे थे, अपने घोड़े उनके हाथों में थमाकर दोनों महाराज के निवास स्थान की ओर चल पड़े ।

आंगन में खड़े पहरेदार से चन्द्रसेन ने महाबाहु का परिचय कराते हुए कहा, "आप महाराज के तक्षशिला के सहपाठी हैं । अत्यावश्यक कार्य से उनके दर्शन करने आये हैं ।" नमस्कार करते हुए अंगरक्षक महाराज को महाबाहु के आगमन की सूचना देने चला गया ।

महाबाहु वहीं एक आसन पर बैठ गया और चन्द्रसेन अपने अगले कार्य की पूर्ति के लिए वापस चला गया ।

तभी महाबाहु ने देखा कि एक सुन्दर, सुडौल और बड़े आकर्षक व्यक्तित्व का युवक उनके पास आ रहा था । वह महाराज का गुप्‍तचर था । यद्यपि नाम से दोनों एक दूसरे से परिचित थे परन्तु कभी मिले न होने के कारण वे एक दूसरे को पहचानते न थे ।

"आइये श्रीमान्" उसके पास आने पर महाबाहु ने कहा ।

और वह अपने स्थान से उठने लगा । बड़े ही उदार भाव से युवक ने महाबाहु को बैठे रहने का आग्रह करते हुए कहा, "बैठिये श्रीमान्, मुझे आपके दर्शन कर अजीब प्रसन्नता अनुभव हो रही है । यद्यपि अभी तक आप से परिचित नहीं हो सका परन्तु फिर भी .....।"

महाराज का यह गुप्‍तचर श्रीकान्त न्यायशास्‍त्री का पुत्र था । छोटी अवस्था से ही उसे राजमहलों में आने-जाने का अवसर मिलता रहा था, अतः वह यहाँ के नियमों से भली-भाँति परिचित था । इसीलिए उसकी वाणी और बोलने के ढ़ंग में अत्यधिक शिष्टाचार का समन्वय था । इसके अतिरिक्त उसमें ऐसी ईश्वरदत्त प्रतिभा भी थी जिसके कारण वह हर परिस्थिति और वातावरण के अनुरूप अपने को बना लेता था ।

यही कारण था कि महाराज ने उसे अपना विशेष गुप्‍तचर नियुक्त किया था, विद्वानों के मध्य अपनी विद्वत्ता, अहंकारियों के मध्य में खुशामद और मूर्खों के मध्य में महाज्ञानी ब्नकर उनके अन्दर के भेदों का पता लगा लिया करता था । परन्तु महाबाहु जो एक राज्य को दूसरे राज्य में मिला देने, सारे भारतखंड की राजनीति को अपने इशारों पर चलाने के लिए प्रयत्‍नशील था, जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में बाँधकर आततायी हूण जाति को भारत से खदेड़ने का बीड़ा उठाया था, उसकी दृष्टि में इसका कोई भी अस्तित्व नहीं था । वह जानता था कि श्रीकान्त उसे अपने वाग्जाल में फंसाकर जानना चाहता है कि वह किस उद्देश्य से आया है । वह मन ही मन हँसा । उसे इस युवक पर तरस आया । महाबाहु ने सोचा क्यों न मैं इसे बातचीत के ऐसे स्थान पर खड़ा करूं जहां यह स्वयमेव अपने मन की बात उगलनी आरम्भ कर दे, अन्यथा अपना पीछा छुड़ाने पर बाध्य हो जाय । परन्तु इस प्रकार के विवाद के लिए उसके पास समय नहीं था और वह यह भी नहीं चाहता था कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह वहां आया है उसे गुप्‍त रखे । वह चाहता था उसकी विचारधारा से जितने भी लोग परिचित होंगे उससे देश का ही कल्याण है । वह इस बात से परिचित था कि न्यायशास्त्री और उसका बेटा दोनों ही राष्ट्र की इस हीन स्थिति को देखना नहीं चाहते परन्तु फिर भी मालवा का सारा राजनैतिक सूत्र जिन प्रधानमन्त्री, कोषाध्यक्ष तथा सेनापति के हाथ में है वे बीच में ही कहीं बाधा उत्पन्न न कर दें, वह श्रीकान्त के सामने बिल्कुल अनजान ही बना रहा ।

श्रीकान्त महाबाहु के सामने की चौकी पर बैठ गया और निःसंकोच बोला, "मेरा विचार है कि आप महाराजाधिराज से मिलने आए हैं । यदि आपने सूचना न भेजी हो तो मुझे आज्ञा दें, मैं अन्दर समाचार भेज दूं ।"

"नहीं-नहीं, समाचार देने के लिए आदमी अन्दर गया हुआ है । मैं और महाराज तक्षशिला में इकट्ठे पढ़ा करते थे, आज किसी कार्यवश यहाँ आने का सौभाग्य मिला । सोचा, चलो महाराज से ही मिलता चलूं ।"

"ओह ! तो आप हमारे महाराज के सहपाठी हैं ! कई बार अपने अध्ययन के समय की बातें सुनाते हुए कहा करते थे, धूमकेतु और महाबाहु मेरे बहुत अभिन्न मित्र थे । आज इस अवस्था में आपका यहाँ आना अवश्य महाराज को प्रसन्न्ता देगा ।"

श्रीकान्त की तरफ आश्चर्य से देखते हुए महाबाहु ने कहा, "क्यों, महाराज किसी चिन्ता में ग्रस्त हैं ?"

श्रीकान्त ने चारों तरफ दृष्टि घुमाकर देखा और फिर बड़े रहस्यात्मक ढ़ंग से बोला, "कल रात हूण सम्राट् मेहरगुल का दूत स्यालकोट से सन्धि का सन्देश लेकर आया था । भारतीय राष्ट्रीयता के पोषक महाराज इस सन्धि के पूर्णतः विरोधी थे । वे नहीं चाहते थे कि कोई विदेशी हमारे देश को परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े । और फिर सन्धि की शर्तें भी इतनी हीन स्तर की तथा आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाने वाली थीं जिन्हें स्वीकार करना अपना गला घोंटना था ।"

"परन्तु सुनते हैं फिर भी उन्हें स्वीकार करना पड़ा ।"

"हां ! शायद आपको इसका पता चल चुका है परन्तु उसके लिए महाराज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि राज्य के कुछ व्यक्तियों ने, जिनके हाथ में आजकल राज्य की नीति का सूत्र है, महाराज को ऐसा करने पर बाध्य कर दिया था ।"

"परन्तु इस सबका दायित्व तो उन्हीं का ही समझा जाएगा ।"

"यह ठीक है कि वे इस दयित्व से मुक्त नहीं हो सकते, यही दुःख तो उन्हें साल रहा है । इस दुःख ने ही तो उनकी रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया है ।"

कुछ क्षण महाबाहु मौन बैठा सोचता रहा । शीघ्र ही उसके चेहरे का रंग बदलना शुरू हो गया । विपत्ति के बादलों की एक टुकड़ी तीव्र सूर्योदय के प्रकाश से म्लान होती दिखाई दी । उसकी आंखों में चमक पैदा हो गई । उसने घूरते हुए श्रीकान्त की ओर देखा ।

इस पैनी दृष्टि से नजर बचाता हुआ श्रीकान्त इधर-उधर देखने लगा । आखिर उसने साहस कर पूछा, "क्यों, क्या बात है .....?"

महाबाहु ने श्रीकान्त के प्रश्न पर कोई ध्यान न देते हुए कहा, "न्यायशास्‍त्री के सुपुत्र ! तुम तो राजा के प्रमुख चर हो न ? तुम्हारे विचार देश के सम्मान के पोषक हैं न, देश के प्रति क्या तुम्हारा कोई कर्त्तव्य नहीं था ? क्या तुम्हें ऐसा प्रयत्‍न नहीं करना चाहिए था कि राजदरबार में इस प्रकार के व्यक्तियों को प्रश्रय न मिले जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के पीछे देश की स्वतन्त्रता नष्ट करने पर तुल जायें ?"

फटी-फटी आंखों से देखते हुए श्रीकान्त ने कहा, "क्या मैं आपका परिचय जान सकता हूँ ?"

"मेरा नाम महाबाहु है और मैं महाराज का सहपाठी हूँ । इससे अधिक मैं आपको कुछ नहीं बता सकता । देश के कल्याण की भावना जिस प्रकार तुम्हारे हृदय में है, उसी प्रकार मेरे हृदय में भी उसकी अग्नि प्रज्वलित है । मैं चाहता हूँ इस यज्ञ में तुम भी हमारे साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलो । इसके अतिरिक्त मैं चाहता हूँ कि तुम इस बात से भी अनभिज्ञ न रहो कि भरतखंड के अनेक राजाओं के साथ मेरा परिचय है जिन्हें एक ध्वज के नीचे खड़ा करके उस आती हुई बाढ़ को पर्वत के समान आगे आकर रोकने का हमने बीड़ा उठाया है । "

श्रीकान्त ने अभिवादन करते हुए कहा, "आपकी कीर्ति और साहस के विषय में मैंने अभी तक सुना ही था परन्तु आज देखने का भी अवसर आया है । मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि इस प्रकार के देशद्रोहियों को नष्ट करने में मुझे सफलता नहीं मिली । मेरे प्रयत्‍न को सेनापति और प्रधानमन्त्री छिन्न-भिन्न करते रहे ।"

"कोई चिन्ता की बात नहीं है श्रीकान्त ! मैं महाराज के पास जा रहा हूँ । तुम देखना या तो विद्रोही लोग कारागार में होंगे अथवा मेरी लाश फांसी के तख्ते पर लटकती दिखाई देगी । परन्तु दूसरी परिस्थिति तभी सम्भव हो सकती है यदि महाराज कर्त्तव्य ज्ञान, धर्म और देशभक्ति की भावनाओं से बिल्कुल च्युत हो चुके होंगे ।"

"प्रभु न करे महाराज इतनी हीन स्थिति को पहुंचें ।"

थोड़ी देर में अंगरक्षक की पदचाप सुनाई पड़ी ।

महाबाहु ने श्रीकान्त से पूछा, "तुम भी चलोगे न ?"

"जी ! मैं भी आपके साथ चलूँगा ।"

तम्बू में प्रविष्ट होते हुए अंगरक्षक ने कहा, "आइये श्रीमान् ! यद्यपि प्रधानमंत्री और सेनापति महाराज से मंत्रणा कर रहे थे परन्तु फिर भी मैंने आपकी सूचना महाराज तक पहुँचा दी है । इसलिए महाराज ने आपको बुलाया है ।"

"किसी महत्वपूर्ण विषय पर तो मंत्रणा नहीं हो रही थी ?" श्रीकान्त ने पूछा ।

"मेरा विचार है शायद नहीं....। वास्तव में रात्रि को महाराज अच्छी तरह सो नहीं सके, अतः दोनों उनका कुशलक्षेम पूछने आए हैं ।"

महाबाहु उठकर खड़ा हो गया और उसने श्रीकान्त को चलने का संकेत किया ।

श्रीकान्त ने कहा, "चलिए ।"

स्वर्ण की कढ़ाई वाले रेशमी पर्दों से घिरे हरे रंग के कालीनों वाले मार्ग से चलते हुए वे महाराज के तम्बू में पहुंचे जहाँ दो चौकियों पर प्रधानमन्त्री और सेनापति विराजमान थे । सामने मालवा का युवक महाराज अपनी शाल ओढ़े पलंग पर लेटा हुआ था । उसके चेहरे की कान्ति मलिन हो रही थी । मालूम होता था जैसे किसी अन्तर्वेदना से दुःखित वह अपने आप से लड़ रहा है ।

तम्बू में प्रविष्ट होते ही महाबाहु ने महाराज को प्रणाम किया ।

"आओ, महाबाहु आओ !" अपने सहपाठी मित्र के साथ उठकर गले मिले । फिर अपने पलंग के पास पड़ी जड़ाऊ चौकी की तरफ संकेत करते हुए बोले, "बैठो !"

महाबाहु ने सेनापति और प्रधानमन्त्री को अभिवादन किया, तत्पश्चात् अपने आसन पर बैठ गया ।

महाराज बोले, "महाबाहु, किसे आशा थी कि आज तुम से भेंट होगी ।"

"हां महाराज ! संसार में बहुत सी बातें आशा के विपरीत ही हुआ करती हैं ।"

सेनापति और प्रधानमंत्री ने चौंककर इस युवक की तरफ देखा । उन्हें अनुभव हुआ जैसे इसके कथन में कटाक्ष का अंश हो ।

महाराज ने कहा, "क्यों महाबाहु, तुम तो दार्शनिकों के समान बातें करने लगे ?"

"नहीं महाराज ! ऐसी कोई बात नहीं । परन्तु परिस्थितियां और समय मनुष्य को सब कुछ बना देता है ।" महाबाहु के चेहरे पर उपेक्षा की लकीर उभर आई ।

"क्या मार्ग में कोई दुर्घटना हो गई है महाबाहु ?"

"दुर्घटनाएं तो आजकल प्रतिक्षण ही घट रही हैं कहीं व्यक्तियों के साथ, कहीं राष्ट्रों के साथ, कहीं मठों में और कहीं मन्दिरों में । भारत का कोई स्थान नहीं जहाँ इस प्रकार की दुर्घटनाओं का बोलबाला न हो ।"

"तुम्हारे इन रहस्यात्मक संकेतों को न समझने के कारण मुझे अपनी बुद्धि पर अविश्वास होता जा रहा है महाबाहु ! क्या तुम स्पष्टतः सब बातें नहीं कह सकते ?"

प्रधानमंत्री बीच में ही बोल उठा, "देखो महाबाहु, तुम हमारे अतिथि हो, फिर भी मेरी धृष्टता क्षमा करना । आजकल महाराज की अवस्था अच्छी नहीं है । इसलिए इस प्रकार की उलझन भरी बातों से उनको परेशान करने का प्रयत्‍न मत करो ।"

"नहीं ! नहीं !! महामंत्री जी, मेरा ऐसा कोई अभिप्राय नहीं है । मैंने तो स्वभाव से ही ऐसा कहा है । मुझे मालूम नहीं था कि महाराज भी किसी दुर्घटना का शिकार हुए हैं ।"

सारा वातावरण एकदम क्षुब्ध हो उठा । श्रीकान्त महाबाहु के कथन के ढ़ंग से प्रभावित हुए बिना न रहा । प्रधानमंत्री और सेनापति एक दूसरे का मुंह देखने लगे । थोड़ी सी देर में इस युवक ने सब के दिलों में हलचल मचा दी । किसी को कोई उत्तर न सूझा ।

नीरवता को भंग करते हुए महाबाहु ने पूछा, "क्या मैं जान सकता हूँ महाराज, कि आपके रोग का क्या कारण है ? यदि सम्भव हो सका तो मैं अपना सर्वस्व बलिदान करके भी आपकी प्रसन्नता को वापिस लाने का प्रयत्‍न करूंगा ।"

श्रीकान्त बीच में ही बोल उठा, "महाराज की अस्वस्थता का और कोई कारण नहीं श्रीमान् ! केवल अपनी स्थिति के विरुद्ध परिस्थितियों की विवशता के कारण, इन्हें हूण सम्राट मेहरगुल से सन्धि करनी पड़ी है ।"

"श्रीकान्त !" प्रधानमंत्री चीखा, "तुम्हें बात करने का शिष्टाचार भी नहीं आता ।"

सारा वातावरण उत्तेजित हो उठा । श्रीकान्त सहम कर ठिठक गया । प्रधानमंत्री और सेनापति की आँखें भूखे भेड़िये के समान स्फुलिंग छोड़ने लगीं ।

महाबाहु मुस्कराया और वातावरण में नरमी लाने का प्रयत्‍न करते हुए बोला, "मुझे सब मालूम है, महामन्त्री ! आप जैसे राजनीतिज्ञ और सम्राट् जैसे धर्मरक्षक लोगों ने, जिन पर इस आपत्ति के समय सारी जाति की आँखें लगी हैं, इस प्रकार शत्रुओं के साथ सन्धि कर ली है । और फिर उन शर्तों पर जिन के सुनने पर ही आत्मसम्मान रखने वाला व्यक्ति उन्हें मानने से पूर्व मर जाना श्रेयस्कर समझता है । कोई भी देशभक्त इसको सहन नहीं कर सकता ।"

प्रधानमंत्री क्रोधाभिभूत होकर बोला, "श्रीमान्, यह हमारी निज की बातें हैं । समय के अनुसार अपने राज्य की रक्षा के लिए क्या उचित या अनुचित है, उसे देखना आपका काम नहीं, हमारा है । मैं नहीं चाहता महाराज की इस अस्वस्थता के समय आप इस प्रसंग पर अधिक बातें करें ।"

"शायद आप नहीं जानते, इतना बड़ा निश्चय हमने बड़े सोच-विचार के बाद किया था और अब जब हमने आगे पग रख लिया है, मैं नहीं चाहता इसे उलझाकर अपनी प्रजा तथा देश को मुसीबत में डालूँ । फिर संधि करने के बाद वह हमारे मित्र बन गए हैं । उनका अनिष्ट सोचना उनके प्रति विश्वासघात करना है ।"
 
"मन्त्री महोदय ! मैं नहीं चाहता ऐसा कुछ कहूं जिनसे आप को कष्ट हो । फिर भी मैं इतना अवश्य कहूंगा कि ऐसी घृणित शर्तें रखने वाला हमारा मित्र नहीं हो सकता । जिसने हमारे सम्मान को ठुकरा दिया है उसके प्रति वफादार होना कायरता का द्योतक है । मैं नहीं चाहता उस राजा की कीर्ति को कलंक लगने दूं जिसके साथ मैंने जीवन के उन क्षणों को बिताया है जो हमारे लिए सर्वोत्कृष्ट थे । हाँ, यदि महाराज अपने आप को इतना हीन देखना चाहते हों तो मैं कुछ नहीं कहता ।"

"नहीं, नहीं महाबाहु !! तुम कहो । कल से जब से मैंने अपने आपको बेच दिया है, मैं बेचैन हूँ । मुझे कुछ नहीं सूझता । तुम अवश्य मुझे कहो महाबाहु, मुझे इस बात से शक्ति मिलती है ।"

"क्षमा करना महाराज" महामन्त्री बोला, "मैंने तो केवल इस उद्देश्य से यह कहा था कि महाराज आगे ही चिन्तित हैं । उस पर इस प्रकार अपमानकारक बातें कहकर आपका मित्र आपकी बेज्जती कर रहा है जिसको मैं कभी भी सहन नहीं कर सकता ।"

"मैं महाराज के मन पर किसी चिन्ता या संकट का बोझ लादने नहीं आया और न ही मेरी यह इच्छा है कि मैं महाराज को अपमानित करूं क्योंकि महाराज, महाराज होने से पूर्व मेरे मित्र हैं और ऐसे मित्र जिनके लिए मैं अपना तन, मन, धन बलिदान कर सकता हूँ । मैं तो केवल इस अभिप्राय से आया था कि महाराज को उस अपमान से बचा सकूँ जो परिस्थितियों की विवशता के नाम पर किया जा रहा है ।"

"तुम ठीक कहते हो महाबाहु ! तुम मुझे और अधिक कष्ट पहुंचाओगे, ऐसी मैं स्वप्‍न में भी आशा नहीं कर सकता । मैं जानता हूँ इतनी विवशताओं में फंसी मेरी स्थिति को हल करने का उपाय लेकर ही तुम आए होंगे । जब से मैंने सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं, मेरा मन और शरीर जल रहा है । आज प्रातः जब हूण दूत और मेरा कर्मचारी उसके साथ चले गए तब से मुझे अनुभव हो रहा है जैसे मेरी आत्मा की शक्ति और आंखों की ज्योति कोई छीन ले गया है । आज अपने लोगों को मुँह दिखाने की शक्ति भी मुझमें नहीं है, जैसे मैंने कोई महान् पाप किया हो । बार-बार मेरा मन मुझे धिक्कार रहा है और इच्छा होती है कि इस जिन्दगी से अच्छा है कि मैं वैराग्य ले लूँ । सेनापति कहता था सन्धि कर लो, सन्धि ! सन्धि !! सन्धि !!! हर एक के मुँह में सन्धि ही सन्धि थी, मानो सबने कायरता का बाना पहन रखा है । कोई भी व्यक्ति यह कहने वाला नहीं था - महाराज ! आत्मसम्मान की रक्षा के लिए तलवारें निकालकर दासता की श्रृंखला तोड़ दो, इन आततायियों को मार-मार कर देश से बाहर निकाल दो, गौ ब्राह्मण और स्त्रियों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व होम कर दो ।"

महाबाहु बोला, "नहीं महाराज ! यह आपकी भूल है । आपको इस प्रकार की सलाह देने वालों की यहां भी कमी नहीं । परन्तु कुछ व्यक्तियों ने उन लोगों को ऐसा करने नहीं दिया । और अपने स्वार्थ और देश को बचाने वाले द्रोही यहाँ भी उसी प्रकार उपस्थित थे जिस प्रकार सिकन्दर को आश्रय देने वाले उस समय उपस्थित थे ।"

सेनापति चमककर बोला, "श्रीमान् ! आपकी इस प्रकार की बातें हमारे सम्मान को ललकार रही हैं । आपने बिना समझे-बूझे इस प्रकार के शब्द कहे हैं । यदि आप कल की सभा में उपस्थित होते तो इस प्रकार का दोषारोपण करके हमें अपमानित करने का दुःसाहस न करते । उस समय प्रत्येक पदाधिकारी सन्धि की ही बात कह रहा था । उसे किस आधार पर झूठ कहा जा सकता है !"

"सेनापति जी !" महाबाहु दृढ़ तथा गम्भीर शब्दों में बोला, "यदि आप उस समय को सत्य कहते हैं तो मैं उसको झूठ सिद्ध करने की सामर्थ्य भी रखता हूँ । यहाँ आने से पूर्व मैं बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ । उन लोगों के विचार मैंने आपके सामने स्पष्ट कर दिये हैं ।"

"अर्थात् ?"

"वह सन्धि के प्रस्ताव के समर्थक नहीं थे । उन्हें उसका विरोध करने का समय ही नहीं दिया गया ।"

सेनापति के चेहरे से अविश्वास टपक रहा था, उसने घृणा से अपना मुँह बिचकाया ।

तभी प्रधानमंत्री बोला, "मैं आप के साथ वृथा विवाद करना उचित नहीं समझता । महाराज और हम जिनका उनसे हर समय का सम्बंध है, आप से अधिक जानते हैं । आपको पधारे अभी एक पहर भी नहीं हुआ । इतने समय आप हूण सरदार के समय की स्थिति के विषय में कैसे कह सकते हैं । और उस समय आप उपस्थित भी नहीं थे जब वह सन्धि-पत्र लेकर लौटा था ।"

"यह सच है मन्त्री महोदय", महाबाहु बोला, "मैं आप लोगों से अधिक इस विषय में नहीं जानता । परन्तु मैं महाराज से प्रार्थना करूंगा कि इस बात की सत्यता के लिए वह अपने सब कर्मचारियों को आमन्त्रित करें और उन्हें निःसंकोच अपने विचार कहने का अधिकार दें । मैं आपका अतिथि हूं, मेरा निज का भी कुछ सम्मान है । यदि मेरी बातें असत्य हुईं तो मन्त्री महोदय और सेनापति के समक्ष ही क्यों, सब के सामने होने वाले अपमान का दंड भोगने को प्रस्तुत हूँ ।"

"आपका अभिप्राय ?"

"अभिप्राय केवल इतना ही है श्रीमान् कि यदि आप राजकीय क्षेत्रों से संबन्धित नहीं हैं तो आप को यह बता देना मेरा कर्त्तव्य है कि एक बार का राजदरबारों का निर्णय बदला नहीं जाया करता । इस प्रकार सब कर्मचारियों को पूर्व निश्चय पर पुनः निश्चय करने के लिए बुलाने से हमारे राज्य प्रबन्ध पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और कई बार इस प्रकार के परिवर्तन से कई प्रकार की राजनैतिक उलझनें उत्पन्न हो जातीं हैं जिनका फल राज्य ही नहीं, अपितु राष्ट्रों को भी भुगतना पड़ता है ।"

महाबाहु बोला, "मन्त्रिवर, मैं सदा से ही सुनता आया हूँ कि आप बहुत योग्य राजनीतिज्ञ हैं । आपका तर्क वास्तव में कौटिल्य की नीति से कम महत्व का नहीं । यह ठीक है कि राजनैतिक क्षेत्रों में एक बार के किये गये निर्णय को बदला नहीं जा सकता, उससे होने वाले भयंकर परिणामों की बात भी नितान्त सत्य है । परन्तु इस संकट के समय जब सारी जाति और सारा राष्ट्र परतन्त्रता की बेड़ियों में बांधा जा रहा है, आने वाली उलझन की परवाह न करते हुए, देश की रक्षा के लिए हर प्रकार का खतरा मोल लिया जा सकता है ।"

प्रधानमंत्री बिना बोले महाबाहु को घूरता रहा । इस धृष्ट युवक को समझने में उससे कहीं भूल हो गई है, अथवा इसकी बुद्धि में कहीं अन्तर है, वह निश्चय न कर सका । उधर सेनापति, महाराज के चेहरे का अध्ययन कर रहा था ताकि वह उनके ऊपर पड़ते हुए प्रभाव को भाँप सके । परन्तु महाराज बिल्कुल निर्विकार भाव से बैठे उन लोगों की बातें सुन रहे थे ।

श्रीकान्त महाबाहु के वाक्चातुर्य से अत्यधिक प्रभावित था परन्तु उसने भी अपने चेहरे पर किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होने दिया । अपितु इसके विपरीत उसने यही दिखाने का प्रयत्‍न किया जैसे वह दोनों के विचारों का समर्थक है ।

महाराज बोले, "तो हम सब सरदारों को बुलवा लेते हैं ।"

"जैसी महाराज की आज्ञा, परन्तु फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि यह सुझाव लाभप्रद नहीं रहेगा", सेनापति ने कहा ।

"ओह प्रधानमंत्री !" महाराज उठते हुए बोले, "सब सरदारों को बुलाने में तुम संकट का अनुभव क्यों करते हो, वे सब तो अपने हैं ।"

"जैसी आपकी आज्ञा" कहकर क्रोध को दबाये हुए प्रधानमंत्री अपने स्थान से उठा और अपने चोबदारों के सरदार को जो तम्बू के बाहर खड़ा था, बुलाकर आज्ञा दी कि सब सरदारों को मन्त्रणा स्थान पर एकत्र करो । एक अत्यन्त आवश्यक बात पर विचार करना है ।

अपने स्थान पर वापस आकर प्रचार मन्त्री ने चाहा कि इस आज्ञा को रोकने के लिए उसी विषय पर चर्चा चलाई जाय और महाराज को होने वाली सन्धि को तोड़ने से उत्पन्न संकट से अवगत कराया जाय तथा महाबाहु के प्रभाव को कम करने का प्रयत्‍न किया जाय । परन्तु महाबाहु ने प्रसंग बदलते हुए पूछा - "हूण राजदूत किस समय यहाँ से गया था ?"

"दो बजे दिन चढ़ने के बाद वह यहां से चला गया था । रात्रि को ही सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर हो गए थे, अतः सवेरे मैंने उस से मिलना उचित न समझा । न जाने क्यों मुझे उसके चेहरे से घृणा हो गई थी और भविष्य में भी मैं उनका मुंह देखना नहीं चाहता था", महाराज बोले ।

"उसका कारण यही था महाराज कि अन्तःकरण से आप उस सन्धि के विरुद्ध थे ।"

"तुम ठीक कहते हो महाबाहु ।"

सेनापति ने प्रसंग बदलने का प्रयत्‍न करते हुए कहा, "महाराज के अस्वस्थ होने का एक कारण यह भी था ।"

"बिल्कुल ठीक कहा, आपने सेनापति ।" महाबाहु ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा, "महाराज ने सन्धि की शर्तों में अपने कर्त्तव्य, आत्मसम्मान और राष्ट्र का अहित देखा था । एक विवशता ने उन्हें हस्ताक्षर करने पर विवश कर दिया था जिसके फलस्वरूप उनकी आत्मा उन्हें धिक्कार रही थी और वे अशान्ति का अनुभव कर रहे थे ।"

कार्यदक्ष चोबदारों की टुकड़ी बड़ी शीघ्रता से सब सरदारों को एकत्रित कर लाई । उनके बैठने के लिए चौकियाँ लगा दीं गईं और शीघ्र ही सरदार आकर अपने-अपने स्थानों पर बैठने लगे ।

न जाने क्यों सेनापति और प्रधानमंत्री के हृदय किसी अज्ञात आशंका से धड़कने लगे । प्रधानमंत्री ने अपने आप को संयत रखते हुए सारी स्थिति को संभालने के लिए अपने आप को तैयार किया । उसने निश्चय किया कि कर्मचारियों के आने पर वह किसी को कुछ कहने का अवसर न देगा और सरदारों को अपने पूर्व निर्णय पर दृढ़ रहने के लिए प्रेरित करेगा । परन्तु महाबाहु ने इस बार उसे अवसर न दिया । अभी कुछ लोग आ रहे थे कि उसने पूर्ण उपस्थिति की चिन्ता किये बिना खड़े होकर अपना भाषण आरम्भ कर दिया ।

"मालव वीरो ! राष्ट्र और देश के रक्षको, एक राह पर चलते पथिक को महाराज की कृपा से आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्‍त हुआ है । आप में से कुछ लोग मुझे जानते हैं परन्तु कुछ लोगों के लिए मैं अब भी अपरिचित हूँ । यह मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे आप से भी परिचित होने का स्वर्ण अवसर मिल रहा है ।

"महाराज मेरे तक्षशिला के सहपाठी हैं । उसी समय से हम आपस में घनिष्ठ मित्रों के समान एक दूसरे से व्यवहार करते आ रहे हैं । इस समय हूण आक्रान्ताओं ने भारत को पददलित कर रखा है, हमारी सभ्यता संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने में यह लगे हुए हैं । हमारे देश की माताओं, बहनों को अपमानित किया जा रहा है । देश के आप्‍त पुरुषों के तपस्यारत शीश मस्तक से उड़ा दिये जाते हैं । सारा देश त्राहि-त्राहि मचा रहा है । मैं आप लोगों से उस पवित्र भूमि की रक्षा के लिए एक सूत्र में आबद्ध होकर युद्ध करने का प्रस्ताव लेकर आया हूं जिसके विषय में मैं समय मिलने पर अपने विचार प्रकट करूंगा ।"

सेनापति अब तक अपमान और झुंझलाहट को दबाये बैठा था परन्तु अब इस स्थिति को संभालना उसकी शक्ति से बाहर होता चला जा रहा था । उसके जोशीले सैनिक स्वभाव ने राजनीति, दूरदर्शिता, स्थान और अवसर की उपेक्षा कर दी । वह दरबारी अनुशासन को एक ओर रखते हुए महाबाहु के भाषण में हस्तक्षेप करता हुआ बोला –

"क्या मैं पूछ सकता हूं, अब जबकि मालव महाराज के साथ हूण सम्राट् की सन्धि हो चुकी है और तीर हाथ से निकल चुका है, हूण आक्रमणकारियों से युद्ध करके उन्हें पराजित करने के विषय में आपकी उच्च योजना क्या महत्व रखती है ? सन्धि होने के पश्चात् दोनों पक्ष आपस में मित्रता के सूत्र में बंध जाते हैं । हूण सम्राट् मेहरगुल अब हमारे राजराजेश्वर के राजनैतिक मित्र बन गए हैं । आपको अथवा किसी और को यह शोभा नहीं देता कि मालव महाराज के दरबार में उनके किसी सम्राट् मित्र के विरुद्ध घृणा अथवा युद्ध के विचार फैलाने का प्रयत्‍न करे । मैं महाराज से भी विनम्र प्रार्थना करूंगा कि परिस्थिति की नजाकत को समझें और केवल इस कारण कि वह ऐसा करके अपने एक अतिथि मित्र को प्रसन्न कर रहे हैं, दरबारी और राजनैतिक उलझनें उत्पन्न न होने दें ।"

भारी आवाज के साथ उसने अपना कथन समाप्‍त किया और आशा भरी दृष्टि से महाराज की ओर देखा ताकि सभा समाप्‍ति की घोषणा की जाय परन्तु सम्राट् की दृष्टि महाबाहु पर जा टिकी । महाबाहु खड़ा होकर बोला, "सेनापति महोदय ! हिन्दू-हूण मित्रता की वास्तविकता हमसे छुपी नहीं है । यदि सन्धि और मित्रता का पत्र हूणों को हिन्दुओं की ओर से मिलता तो वह अवश्य हमारे मित्र होते । आज हमारे मन पश्चाताप की आग में न जल रहे होते । इस बात को स्वप्‍न में भी नहीं सोचा जा सकता कि एक सच्चा भारतीय एक ऐसी जाति से मित्रता के लिए तैयार हो जायेगा जिसने हमारे देश को पराधीन करने का बीड़ा उठाया है, जिसने हमारे पवित्र स्थानों का अपमान किया है, हमारे भोले कृषकों को मौत के घाट उतारा है, हमारे मकान और फसलों को आग में जला डाला है । इस पर भी जब कि सन्धि पत्र पर हम हस्ताक्षर कर चुके हैं तथा तीर कमान से निकल चुका है, इस विषय में मैं आपको एक ऐसी योजना बताऊँगा जो कमान से निकले तीर को वापिस ला सकती है । मैं अपनी योजनाओं को आपके सम्मुख रखूंगा ताकि आपके हृदयों में जो निराशा की भावना घर कर गई है, उससे आप मुक्त हो सकें । परन्तु इससे पूर्व मैं महामंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि वह कौन सी ऐसी विवशता थी जिससे बाधित होकर इस प्रकार की घृणास्पद तथा अपमानकारक शर्तों को माना गया ?"

"श्री महाबाहु !" प्रधानमंत्री, जिसके अंग क्रोध से फड़क रहे थे, आवेश से उत्तेजित होता हुआ बोला, "मैं अभी तक यही समझता था कि आप केवल महाराज के सहपाठी हैं और राह जाते इनसे मिलने चले आए हैं, इसीलिए आप की बातों को मैंने विशेष महत्व नहीं दिया क्योंकि मैं समझता था आप भी आम लोगों के समान अपना महत्त्व प्रदर्शित करने के लिए ऐसी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं । परन्तु अब मैं अनुभव कर रहा हूं कि आप की बातों के पीछे कोई राजनैतिक षड्यन्त्र काम कर रहा है । आपको मालूम होना चाहिए कि इस राज्य का प्रधानमंत्री होने की स्थिति में मेरा कर्त्तव्य है कि ऐसा कोई कार्य न होने दूं जिससे मेरे राज्य में अशान्ति और अराजकता फैलने का डर हो । इसलिए मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति के सामने जिस के आने का उद्देश्य हमारे सामने रहस्यमय है, उस समय की दरबार की स्थिति या राज्य की वास्तविक स्थिति का रहस्योद्‍घाटन करने को तैयार नहीं हूं । अपने राज्य की कोई भी कमजोरी अथवा मजबूरी एक अपरिचित को नहीं बताई जा सकती जिसके कारण हमें इन शर्तों को मानना पड़ा है ।"

महाबाहु बोला, "आपको यह सब कुछ कहने का अधिकार है परन्तु मैं इतना आप को विश्वास दिलाता हूँ कि मेरा उद्देश्य महान् है । उसको बताने के लिए मैं यहाँ आया था परन्तु अब तक न बताने का कारण केवल यही था ताकि मैं अपने उद्देश्य की सफलता के विषय में निर्णय कर सकूँ और जान सकूँ कि कोई ऐसी बाधा तो नहीं है जिसको मैं पार करने में असमर्थ रहूंगा । आप इस राज्य के सर्वोच्च पदाधिकारी हैं और सबसे अधिक राजनीतिज्ञ माने जाते हैं । परन्तु मैं भी थोड़ा-बहुत राजाओं के सम्पर्क में रहा हूँ और दरबारी शिष्टाचार और कूटनीति का अनुभव रखता हूँ । आपने सन्धि करने की विवशता को बताने से इन्कार कर दिया परन्तु मुझे पूर्ण विश्वास है कि थोड़ी देर बाद आप इस भेद को बताने के लिए विवश हो जायेंगे ।"

प्रधानमंत्री और सेनापति का यह प्रयत्‍न था कि महाबाहु के सम्मान को चोट पहुंचाई जाये परन्तु महाबाहु अपनी बातों में उन्हें इस तरह उलझा रहा था ताकि वह इस सन्धि के वास्तविक रहस्य को सब के सन्मुख प्रकट करने में समर्थ हो सके ।

मालवा राज्य के यह दोनों व्यक्ति अपनी कूटनीति और भाषण देने की कला में बहुत प्रसिद्ध माने जाते थे । इधर महाबाहु भी देश विदेश के भ्रमण के कारण बहुत ही चतुर हो गया था, विशेषकर मनोविज्ञान में उसकी पहुँच थी । इसलिए वह अपनी योग्यता की धाक सारे दरबार पर जमा रहा था और यह दोनों महापुरुष हतप्रभ होते दिखाई दे रहे थे । महाराज इसकी बातों को सुनने में इतने तल्लीन थे कि इन्हें राज्य के अपमान की बात भी याद नहीं रही । दरबार का वातावरण भी इस योग्य बन गया था कि महाराज को हर कोई स्वतन्त्र होकर अपनी बात कह सकता था ।

"माननीय अधिकारियो", महाबाहु बोला, "किन कारणों से सन्धि करने पर कोई राज्य विवश होता है यह जानना भी कोई कठिन नहीं परन्तु उस विवशता को दूर करने के उपाय भी हो सकते हैं । अपनी बुद्धि से जो कुछ मैं जान पाया हूँ उनमें मुख्यतः यही कारण हो सकते हैं । प्रथम कारण तो आप स्वयमेव सोच सकते हैं कि वहाँ का राजा या कर्मचारी कायर तथा युद्ध का नाम सुनकर घबराने वाले हों । परन्तु मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता क्योंकि मालव अपनी वीरता और साहस के लिए प्रसिद्ध हैं, उनका इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है । दूसरा कारण है कि हमें स्वाधीनता और पराधीनता के अन्तर का पता न हो, हम इस बात से अनभिज्ञ हों कि विजित जाति पराजित जाति पर कितने अमानुषिक, नारकीय अत्याचार करती है । परन्तु आप लोगों के समान बुद्धिमान्, कर्मशील तथा संसार के इतिहास का ज्ञान रखने वालों से ऐसी आशा नहीं की जा सकती । तीसरा कारण तभी संभव हो सकता है जब शत्रु के समक्ष युद्ध करने के लिए हमारे पास सेना की कमी हो और हमें विश्वास हो जाए कि मुट्ठी भर सैनिक शत्रुओं की बाढ़ को रोकने में असमर्थ होंगे । इसको दूर करने का उपाय तो मैं अभी आप लोगों को बताऊंगा परन्तु इसके न होते हुए भी इतना तो सब जानते हैं कि इसके लिए अधिक सेना भर्ती की जा सकती है । चौथा कारण यह भी हो सकता है कि राज्य के पास धन की कमी हो परन्तु उसके लिए देश के सेठों से धन लिया जा सकता है । युद्ध कर लगाये जा सकते हैं जिसे लोग अपनी स्वतन्त्रता, सम्मान और रक्षा के लिए सहर्ष दे सकते हैं । राजकुमारियों, रनिवास की रानियों तथा प्रजाजनों की स्‍त्रियों से उनके आभूषण मांगकर युद्ध व्यय को पूरा किया जा सकता है । जहाँ अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना तन, मन, धन बलिदान किया हो, जहाँ के स्‍त्री, पुरुषों और बच्चों ने जीवन का एक-एक कण मिटा देने से संकोच न किया हो उनकी रक्षा के लिए ऐसी कौन-सी प्रिय वस्तु है जिसने हमें यह अपमान-जनक कृत्य करने पर विवश कर दिया था । मैं नहीं जानता ऐसा कारण कौन सा है जिसे बताने में प्रधानमंत्री संकोच कर रहे हैं । इसलिए मैं आप सब उपस्थित सरदारों से पूछता हूं कि कल रात कौन सी ऐसी विवशता थी जिसने आपको अपने भाल पर कलंक का टीका लगाने पर विवश किया और सन्धि का प्रस्ताव मानने के लिए आपने अपना मत दे डाला ?"

सारा वातावरण स्तब्ध हो गया । प्रधानमंत्री और सेनापति निश्चय भी न कर पाये थे कि हमें क्या उत्तर देना है कि महाराज बोले, "मेरे प्रिय पदाधिकारियो, यह सभा मेरी आज्ञा से ही बुलाई गई है । प्रधानमंत्री और सेनापति इस के विरुद्ध थे । परन्तु मेरे प्रिय मित्र ने मुझे विश्वास दिलाया कि वह एक ऐसा मार्ग बनायेंगे जिससे हम इस प्रकार की अपमानित करने वाली शर्तों से छुटकारा पा जायें और अपनी स्वतन्त्रता को अक्षुण्ण रख सकें । अतः आज इस सभा में मैं आप सब को आज्ञा देता हूं कि आप में से जो भी चाहे स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार रख सकता है और उन सब मजबूरियों को व्यक्त कर सकता है जिसके कारण उन को सन्धि के लिए हां करनी पड़ी थी । मैं आपको अभयदान देता हूँ । किसी बड़े से बड़े व्यक्ति ने भी अगर आप पर किसी प्रकार का दबाव डाला है तथा ऐसा करने पर विवश किया है तो उसका नाम बताया जाये ।"

दरबार में होते हुए परिवर्तन को देखकर प्रधानमंत्री ने एक बार फिर प्रयत्‍न किया कि वह सब पर अपना प्रभावशाली अंकुश रख सके । उसने कहा, "महाबाहु, बातों द्वारा यह सब हल निकालने बहुत सहज हैं, वास्तविक स्थिति आ पड़ने पर उनसे जूझना और बात है । कोषाध्यक्ष कहते हैं कि मेरे पास दो हाथियों के खाने लायक भोजन भी नहीं है । छः मास से वेतन न मिल पाने के कारण सैनिक विद्रोह करने पर उतारू हैं । मैं आपको यह सब कुछ बताने में पहले ही संकोच न करता । राजसिंहासन का अनन्य भक्त होते हुए राज्य की इस कमजोरी को आपके सामने प्रकट करना मैंने उचित नहीं समझा ।"

धीमे से द्वार का परदा हटा और रक्षक सैनिकों का अधिकारी अपना सिर अन्दर कर नम्रता से बोला, "यदि आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूँ ।"

"अवश्य कहो" महाराज ने कहा ।

"मैं प्रधानमंत्री के उन आरोपों का खण्डन करता हूँ जो उन्होंने सैनिकों पर यह कहकर लगाए हैं कि वह वेतन न मिलने के कारण विद्रोह पर उतारू हो गए हैं । यह सच है कि उन्हें कई मास का वेतन नहीं मिला परन्तु एक विदेशी आक्रमणकारी से युद्ध करके अपने देश की रक्षा करने के लिए उन्होंने कभी विरोध नहीं किया । हमारा प्रत्येक सैनिक हूणों का शत्रु है और उनसे टक्कर लेना अपना धर्म समझता है । यही कारण था कि आज प्रातः इस सन्धि की बातें सुनकर वे क्षुब्ध हो उठे और उन्होंने हूण दूत की गाड़ी को रोकने के लिए रास्ते की सड़क तोड़ दी थी और भोजन तक न किया था ।"

प्रधानमंत्री ने थूक निगलने का प्रयत्‍न किया, फिर अपनी आँखों से अधिकारी को धमकाता हुआ बोला, "मैं नहीं जानता यह अधिकारी कौन है । सेनापति ही इसके चाल-चलन के विषय में कुछ बता सकते हैं । परन्तु इतना मैं अवश्य कहूंगा कि यह व्यक्ति झूठ बोल रहा है । इसके अन्तर में क्या है, मैं नहीं कह सकता ।"

तम्बुओं के दूसरे द्वार से जिधर से रनवास का मार्ग था, एक वृद्धा ने राजदरबार में प्रवेश किया । प्रधानमन्त्री और सेनापति के चेहरों का रंग उड़ने लगा । "क्यों, क्या बात है ?" महाराज ने उसके अनुचित प्रवेश को बुरा मानते हुए पूछा ।

भय से काँपती हुई वह वृद्धा बोली, "महाराज, अपराध क्षमा हो ! कल जब हम कूच करते हुए इस पड़ाव की ओर आ रहे थे तो रनवास के रक्षक सैनिकों की टुकड़ी के साथ एक पदाधिकारी जिसका बाद में पता चला कि वह हमारा सेनापति था, छोटी महारानी की पालकी के साथ इस प्रकार चल रहा था जैसे उसकी नीयत अच्छी न हो । कल रात सन्धि की सभा के कारण आप रनवास में नहीं गए इसलिए महारानी जी आप को बता नहीं सकी । उन्होंने मुझे आपको यह बताने के लिए भेजा था परन्तु मैं आपका स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण आने का साहस न कर सकी । अब पुनः महारानी ने मुझे आप को सूचित करने के लिए भेजा है ।"

महाराज की आंखें क्रोध से जलने लगीं, उन्होंने गर्जती आवाज में कहा, "सेनापति, क्या यह बात सत्य है ?"

सेनापति का चेहरा भय से सफेद हो गया, वह कांपता हुआ बोला, "महाराज, यह आक्षेप बिल्कुल निराधार है । मैं नहीं समझ सका ऐसा जघन्य अपराध मुझ पर क्यों थोंपा जा रहा है । या तो यह बुढ़िया ठीक सन्देश लेकर नहीं आई अथवा इस सैनिक अधिकारी ने मुझे भरी सभा में लज्जित करने के लिए कोई षड्यन्त्र रचा है क्योंकि अभी-अभी वह प्रधानमंत्री पर भी इस प्रकार का दोषारोपण करके हटा है ।"

प्रधानमंत्री अपने आसन से उठ खड़ा हुआ जैसे वह इस स्थान पर देर तक ठहरना उचित नहीं समझता था । वह बोला, "महाराज, मैं और सेनापति आपका कुशलक्षेम पूछने आए थे । हमें आशा न थी कि आपका मित्र और अन्य सभासद हमें अपमानित करने का प्रयत्‍न करेंगे ।"

दरबारी गुप्‍तचर अपने स्थान पर खड़ा होकर कुछ बोलना ही चाहता था परन्तु प्रधानमंत्री ने उसे बोलने का अवसर न देकर कहा "तुम श्रीकान्त ! तुम भी षड्यंत्र में शामिल हो, जिसकी मुझे पूर्ण आशा थी क्योंकि तुम्हारे पिता न्यायशास्‍त्री का मैंने हमेशा विरोध किया है । उनके भ्रष्टाचार के लिए मैं हमेशा उन्हें टोकता रहा हूँ ।"

पदाधिकारियों की पंक्ति में बैठा न्यायशास्‍त्री खड़ा होकर बोला, "इसके प्रति महाराज स्वयमेव जानते हैं । मुझे प्रतिरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं ।"

महाराज ने कहा, "श्रीकान्त, तुम क्या कहना चाहते थे ?"

"महाराज" श्रीकान्त थूक को सिटकता हुआ बोला, "परसों रात मैं घूमता हुआ महामन्त्री के तम्बू के पास से गुजरा तो मुझे सेनापति की आवाज सुनाई दी ।"

"जो कुछ तुमने सुना श्रीकान्त, उसे निर्भय होकर कहो ।"

श्रीकान्त बोला - सेनापति प्रधानमंत्री से कह रहा था, "तुम कहते हो कि तुम महाराज बन गए तो मुझे प्रधानमंत्रित्व का पद दोगे परन्तु मैं वह कुछ नहीं चाहता, मुझे तो महाराज के ...... जिसके विरह में तड़प-तड़प कर मैं प्राण दे रहा हूँ ।" मैं समझ नहीं सका इनका संकेत किधर है । मुझे इतना अवश्य पता चल गया कि दोनों अधिकारी मदिरापान से उन्मत्त हो रहे हैं । इसलिए अपने कर्त्तव्य के नाते मैंने अपने गुप्‍तचर इनके पीछे लगा दिये । इस के बाद जो सूचना मुझे मिली है उसे सुनकर मैंने दाँतों तले अपनी जीभ दबा ली .....।"

"क्या सूचना थी ?"

"गुप्‍तचर की सूचना थी कि हूण दूत के यहाँ आने से पूर्व प्रधानमंत्री और वह दूत यहाँ से दो कोस दूर एक वन में मिले थे । उसने प्रधानमन्त्री को एक पत्र दिया था । आज जब प्रधानमंत्री आपको मिलने आये थे उस समय वह पत्र उन्होंने अपने अंगरखे की जेब में रखा था ।"

महाराज प्रधानमंत्री को बीच में ही टोकते हुए बोले, "अच्छा हो कि तुम उस पत्र को मुझे दे दो ।"

"परन्तु महाराज, यदि ऐसा कोई पत्र हो तभी तो वह आपके सामने उपस्थित किया जाए ।"

"तो तुम्हें अपनी सच्चाई और राजभक्ति सिद्ध करने के लिए अपनी तलाशी दे देनी चाहिए । यदि वह पत्र तुम्हारे पास न निकला तो भगवान् की शपथ, मैं श्रीकान्त की गर्दन उड़ा दूंगा जिसने मेरे राज्य के प्रधानमंत्री पर इस प्रकार का झूठा आरोप लगाया है ।"

"तलाशी ! क्या मालवा का दरबार इतना गिर गया है कि उसके प्रधानमंत्री और सेनापति की सबके सामने तलाशी ली जायेगी ? क्या आपके यहाँ आजीवन सेवा करने का यही विधान लिखा है ? मैं एक सम्मानित व्यक्ति हूँ, इससे तो यही अच्छा है कि आप मेरा त्यागपत्र ले लेते ।"

महाबाहु अपने स्थान से उठा और प्रधानमंत्री तथा सेनापति पर लगाये आरोपों की श्रंखला बनाता हुआ बोला, "जो कुछ अब मैं आप लोगों के सन्मुख कहने लगा हूं उस पर आप पूर्ण ध्यान दें । मालवा राज्य और महाराज को जिन लोगों ने हानि पहुँचाने का प्रयत्‍न किया है, वह यही दोनों व्यक्ति हैं । बदनाम और निकम्मे अधिकारियों की एक टोली इनको पूरी तरह सहयोग दे रही है, जो समय आने पर आप सब के सामने प्रकट हो जाएगी । आपके सेनापति तथा इनके छोटे भाई ने, जो सेनानायक के पद पर काम कर रहे थे, अपना सारा जीवन दुराचार में ही व्यतीत किया है जिसका प्रमाण मैं आपको बताने लगा हूँ । आज से एक सप्‍ताह पूर्व इनके छोटे भाई एक सम्बंधी के विवाह में सम्मिलित होने के लिए एक गाँव में गए थे । वहीं मगध सम्राट् का एक अधिकारी जिसका नाम शशिविक्रम था, वह भी आया हुआ था । ये दोनों एक अतिथि की कन्या पर आसक्त हो गए, परन्तु उसी रात हूणों ने उस गाँव पर आक्रमण कर दिया और दूसरे लोगों के साथ उस लड़की को भी ले गए । उसकी तलाश में ये दोनों हूणों के जाल में फंस गए । हूणों ने उन दोनों की खालें उतरवाकर उन्हें अपनी टिकटिकियों पर उल्टा लटका दिया । भाग्यवशात् हम लोग वहाँ पहुंच गए और इन दोनों को बचा लाए । इनमें से शशि की तो चिकित्सा हो रही है परन्तु आप लोगों का सेनानायक गाँव की एक धर्मशाला में अधमरे कुत्ते की तरह पड़ा हुआ सिसक रहा है । इधर आपके सेनापति इतने गिरे हुए निकले कि महाराज से विश्वासघात करके देश के साथ ही द्रोह करने में लगे हुए हैं । इन्होंने न केवल राज्य के साथ ही द्रोह किया अपितु आपके कई सेनापतियों की इज्जत पर भी डाका डाला है और अब अपने स्वामी और आप लोगों के महाराज के सम्मान पर भी हाथ डालने का प्रयत्‍न करने लगे हैं ।"

"प्रधानमंत्री के बारे में तो आप अपने राज्य के गुप्‍तचर से पूरी तरह सब कुछ जान ही चुके हैं कि किस प्रकार वह महाराज का वध करके स्वयं गद्दी का स्वामी बनना चाहता है । यद्यपि इनके कुचक्रों का सारा ब्यौरा प्रकट नहीं हुआ है परन्तु इनका केवल यही अपराध अक्षम्य है कि यह बिना महाराज को पता दिये हूण दूत से एकान्त वन में मिला है और यहाँ के वातावरण को ऐसा बनाने का प्रयत्‍न किया है जिससे ऐसी सन्धि की ऐसी घृणित शर्तों पर हस्ताक्षर कराये जायें ।"

"इससे सिद्ध होता है कि दोनों प्रमुख अधिकारियों ने न केवल राज्य के साथ द्रोह किया है अपितु देश की स्वतन्त्रता को भी बेचने का प्रयत्‍न किया है और वर्षों से चली आ रही मालवा की प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया है ।"

महाराज क्षण भर मौन बैठे रहे । सारी सभा दोनों को घृणाभरी दृष्टि से देख रही थी । इस व्याकुल स्थिति को तोड़ते हुए वह बोले, "प्रधानमंत्री, तुम्हारे लिए उचित है कि तुम अपनी तलाशी देकर अपराध को स्वीकार कर लो ताकि अपने विरुद्ध उठे आरोपों से तुम्हारी रक्षा हो सके अन्यथा .....।"

प्रधानमंत्री गर्दन नीचे किये अपने स्थान पर बैठा रहा । उसने जरा भी हिलने-जुलने का प्रय‍त्‍न न किया ।

"तो रक्षकगण !" महाराज बोले, "इन दोनों के शस्‍त्र ले लो । सिरों पर धारण की हुई पगड़ियां, रत्‍नजड़ित अंगूठियां तथा गले में लटकती मालायें उतार लो ताकि मैं स्वयमेव इनकी तलाशी लूं । यदि वह पत्र इनके पास से न निकला तो यह आभूषण और शस्‍त्र इनको वापिस कर दिये जाएंगे अन्यथा इनके हाथों और पांवों में बेड़ियाँ डालकर इन्हें कारागार में डाल दिया जायेगा ।"

तलाशी लेने पर प्रधानमंत्री के पास से दो वस्तुएँ मिलीं - एक पत्र तथा दूसरी एक पुड़िया जिसमें मटियाले रंग का कोई चूर्ण था ।

महाराज ने पुड़िया राजवैद्य को देते हुए कहा, "इस चूर्ण का पता लगाओ कि यह क्या है ?"

महाराज ने पत्र पढ़ना शुरू किया, "तुम्हारे चर ने तुम्हारी मोहर लगी चिट्ठी हमें दी । यदि तुम ऐसा कर सको तो हम तुम्हें मालव का राजा स्वीकार करेंगे । इस समय हम मगध पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं । हम चाहते हैं कि जब तक तुम अपना काम पूरा न कर लो, महाराज से हमारी सन्धि करवा लो । सुना है कि तुम्हारे महाराज की पुत्री बड़ी सुन्दर है । उसका हमारे अन्तःपुर में पहुंचना अत्यावश्यक है, और भी भेंट में कुछ सुन्दरियाँ आनी अनिवार्य हैं । इसके अतिरिक्त बहुमूल्य हीरे जवाहरातों की भेंट भी आनी चाहिए अन्यथा अपने महाराज को जता देना कि हम शर्त न मानने पर मगध से पहले मालवा को ही नष्ट करने के लिए आक्रमण कर देंगे और इस राज्य की ईंट से ईंट बजा देंगे । यह सब बातें सन्धि-पत्र में भी लिख कर भेज रहे हैं । तुम बड़े समझदार मन्त्री हो । तुम्हारे काम का हम उचित पुरस्कार देंगे और तुम्हें हमारी ठोस सुरक्षा मिलेगी ।"

महाराज की क्रोधित दृष्टि मन्त्री पर पड़ी और प्रधानमंत्री ने झुक कर महाराज के पाँव पकड़ लिये । दया ! दया !! अन्नदाता !!! मुझ से बड़ा भारी अपराध हुआ है, मुझे क्षमा करें महाराज ।"

महाराज ने जोर की लात प्रधानमंत्री की छाती में मारी जिसकी चोट से लुढककर वह राजवैद्य के चरणों में जा गिरा । गिरने से सम्भलता हुआ राजवैद्य बोला, "संखिया है महाराज !"

"लाइये ! इसे मुझे दीजिए", महाबाहु ने हाथ बढ़ाकर वैद्य के हाथ से वह पुड़िया ले ली और उसे देखकर बोला, "इस पुड़िया की सलवटों से पता लगता है जैसे इसमें से कुछ चूर्ण निकाला गया है । इसका अभिप्राय है किसी को मारने के लिए इसका प्रयोग किया जा चुका है । इस प्रकार की हत्या दो कारणों से संभव है - या तो अपने किसी शत्रु को नष्ट करने के लिए अथवा किसी ऐसे व्यक्ति को मारने के लिए जिससे बहुत बड़े लाभ की संभावना हो । प्रधानमंत्री राज्य के सबसे बड़े अधिकारी हैं । इनका शत्रु कौन हो सकता है अथवा किसकी हत्या का इन्हें लाभ हो सकता है ? पत्र से जो संकेत मिलता है उससे हम भली-भांति जान सकते हैं कि मन्त्री का उद्देश्य किसके लिए था ।"

"ओ मेरे राम !" श्रीकान्त घबराकर बोला, "महाराज, क्या आपने भोजन कर लिया है ?"

"नहीं, भोजन तो वैसे ही पड़ा है । मन ठीक न होने से मैंने उसे छुआ तक भी नहीं ।"

"तो दीजिए, मैं उसकी परीक्षा करना चाहता हूँ ।"

श्रीकान्त ने रेशमी कपड़े में ढका भोजन का थाल उठाया, तभी सेनापति भय से चीख कर गिर पड़ा ।

महाराज ने सैनिक अधिकारी को आज्ञा दी, "इन दोनों को बन्दी बनाकर कारागार में डाल दो और विश्वस्त कर्मचारियों को इनकी देख-रेख के लिए नियुक्त कर दो ताकि ये कहीं भाग नहीं सकें ।"

जब दोनों बन्दी सभा-स्थल से चले गए, महाराज ने महाबाहु का धन्यवाद करते हुए कहा, "मेरे प्रिय मित्र, आज तुम्हारे प्रयत्‍न से मेरे प्राणों की रक्षा हो गई है । अगर तुम एक रात पूर्व आ गए होते, मालवा के सम्मान की रक्षा भी हो जाती ।"

"अब भी कुछ चिन्ता नहीं महाराज ! प्रभु ने चाहा तो वह अब भी बच जायेगी ।" अब महाबाहु सबको सम्बोधित करता हुआ बोला, "प्रभु की कृपा से हम उस बिगड़ी स्थिति को फिर से बना लेंगे जिसे कुछ राज्यद्रोहियों ने उत्पन्न कर दिया था । मेरे पास समय थोड़ा है । अतः संक्षेप में मैं आप को सहर्ष सूचित कर रहा हूँ कि दैवयोग से मैंने और मेरे दो साथी रुद्रदत्त और धूमकेतु ने मगध सम्राट् नरसिंह बालादित्य को हूणों के पंजे से बचाने का सौभाग्य प्राप्‍त किया है तथा देश की दुर्दशा का वर्णन कर उन्हें इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वे मालव और चालुक्यों के साथ अपने पुराने वैमनस्य को भुलाकर हूणों के विरुद्ध एक झण्डे के नीचे युद्ध करने के लिए तैयार हों । अब तक मगध की सेनायें अपने स्थान से कूच कर चुकी हैं । रास्ते में पड़ी हूणों की चौकियों को नष्ट-भ्रष्ट करती वे इधर आ रही हैं और एक निश्चित स्थान पर वे चालुक्यों और मालवा की सेनाओं की प्रतीक्षा करेंगीं । इसके अतिरिक्त हूणों के अत्याचारों से अपमानित हुए कुछ सन्यासियों और भिक्षुओं की टोली गाँव-गाँव, नगर-नगर घूमती हुई जनता को उत्तेजित करती इधर आ रही हैं । धूमकेतु और अन्य व्यक्ति जनता के नवयुवकों को शस्‍त्रास्‍त्र की शिक्षा देते हुए, छापेमार टोलियों के रूप में एक-एक सैनिक गढ़ बनाते चले आ रहे हैं । अब एक क्षण की देर किए बिना आपको अपनी सेनाओं को तैयार होने की आज्ञा देनी चाहिए और युद्ध के लिए जो सामान आवश्यक है, उसको एकत्रित करना चाहिए । आपके कथनानुसार हूण राजदूत दो घड़ी दिन चढ़े यहाँ से चला है । यदि वह पूरी तेजी से नहीं जा रहा है तो उसने अधिक से अधिक बीस कोस का मार्ग तय किया होगा । स्यालकोट को यहाँ से सीधी सड़क जाती है । यदि मुझे अच्छा रथ और घोड़े मिल जायें तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे मार्ग में ही पकड़ लूँगा और स्यालकोट पहुंचने नहीं दूंगा ।"

"महाबाहु !" प्रसन्न्ता के आवेश में महाराज बोले, "भाग्य की रेखाओं की बागडोर थामे तुम आए दिखाई देते हो । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम जो भी समझो, करो और युद्ध के खर्च के लिए ....।"

महाराज उठे और अपने सन्दूक में से अपना मुकुट और मालायें निकाल लाये और उन्हें सभास्थल के मध्य में रखते हुए बोले, "मेरी यह वस्तुयें युद्ध के खर्च के लिए रख लीजिए । जब देश-रक्षा के लिए अपना शरीर तक बलिदान करने की प्रतिज्ञा कर ली है, तब यह आभूषण किस योग्य हैं ?"

रनिवास का पर्दा हिला और अनेक कोमल हाथों से उतरे आभूषण फर्श पर गिरने लगे । कर्मचारियों ने जब यह दृश्य देखा तो उनकी देशभक्ति की भावना को देखकर उन्होंने भी अपने आभूषणों को उतारकर देशार्पण करना आरम्भ कर दिया ।

"राजाधिराज", महाबाहु बोला, "देश सेवा के लिए किसी ने इन्हें अभी तक प्रेरित ही नहीं किया था । नहीं तो यह कैसे सम्भव हो सकता था कि ये लोग जो वास्तव में सच्चे स्वामिभक्त और राष्ट्रभक्त हैं, मां भारती की पुकार न सुनते ! आपने कहा था किसी भी कर्मचारी ने युद्ध के लिए आपको प्रोत्साहन नहीं दिया । अब भी वही लोग बैठे हुए हैं । इनमें से कौन अपने और देश के सम्मान के लिये मर-मिटने के लिए तैयार दिखाई नहीं देता ?"

पदाधिकारी बारी-बारी से उठकर कहने लगे, "महाराज, हमें प्रधानमंत्री ने भ्रम में रखा था और स्वतन्त्रतापूर्वक अपना मत व्यक्त करने की स्वतन्त्रता नहीं दी थी ।"
 
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