• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

आखिर जीत हमारी है

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
आखिर जीत हमारी है

पुजारी चौंक कर उठ बैठा । उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था । किसी अज्ञात भय की आशंका से वह काँप उठा ।

"हे ईश्वर ।"

संयम रखते हुए भी भय से एक चीख उसके मुंह से निकल ही गई जिसे सुनकर पास की चारपाइयों पर पड़े तीनों यात्री चौंककर उठ बैठे ।

"क्या बात है, पुजारी महाराज?"

पुजारी बोला, "सम्भवतः मैं कोई भयानक स्वप्न देखकर उठ बैठा हूँ । क्या आप लोगों को कोई कोलाहल सुनाई देता है ?"

"कोलाहल ? कैसा ?"

"जैसे कहीं बहुत दूर से लोग आर्तनाद कर रहे हों ।"

उस अँधेरी कोठरी में एकदम सन्नाटा छा गया और सब लोग कहीं दूर से आने वाले शब्द को सुनने का प्रयत्‍न करने लगे जो न जाने बाहर आंगन में, मैदान में, अथवा वन में कहीं था ।

"मुझे तो किसी प्रकार का शब्द सुनाई नहीं देता," उनमें से एक ने कहा, "सिवाय आंगन में खड़े पीपल के वृक्ष की पत्तियों की सनसनाहट के ।"

"ओह ! यह कोलाहल, तुम्हें क्या सुनाई नहीं दे रहा ?"

"हां ! हां ! अब तो कुछ सुनाई पड़ रहा है ।"

"ओह मेरे राम ! इस आर्तनाद का क्या अर्थ ?"

पुजारी ने उठकर अग्निकुंड में दबी आग को प्रज्वलित करने के लिए सूखे हुए फूँस की मुट्ठी डाली और कोठरी में पड़े दीपक को जलाया । इतने में तीनों यात्रियों ने खूंटियों पर लटकाये अपने शस्त्र उतार लिए । पुजारी ने एक को कोठरी का द्वार खोलते देखकर कहा, "कहां जा रहे हो ? न जाने बाहर कौन सी विपत्ति सहसा टपक पड़े ।"

वही यात्री बोला "सोते हुए मर जाने की अपेक्षा लड़कर जान देना हजार गुणा अच्छा है । हम वास्तविकता को जानना चाहते हैं । जिस काम का बीड़ा हमने उठाया है उसमें तो चौबीस घण्टे विपत्ति की आशंका लगी रहती है, जाने कब सिर धड़ की बाजी लगानी पड़े । यद्यपि हमें प्राणों के प्रति कोई ममत्व नहीं परन्तु फिर भी हम जीवित रहना चाहते हैं ।"

शिव मन्दिर का अंधकार में डूबा आंगन काले पानी की ऐसी झील समान दिखाई देता था, जिसमें कोई तरंग न उठ रही हो । पश्चिम दिशा में खड़े पीपल के वृक्ष के उस पार क्षितिज पर हल्की-हल्की लाली दिखाई दे रही थी ठीक ऐसे जैसे टहनियों की ओट में मंगल ग्रह चमक रहा हो ।

पुजारी और वे यात्री एक क्षण तक द्वार के बाहर चुपचाप खड़े रहे । हवा का एक तेज झोंका पीपल की पत्तियों को झंझोड़ता हुआ निकल गया । इतने में दूर गहन अन्धकार की भित्ति को फाड़ता हुआ चीत्कार और रुदन का शब्द वायुमण्डल को कँपाता हुआ सुनाई दिया जिस से पुजारी की नींद टूटी थी ।

"हे मेरे भगवान ! पुजारी भय से सिहर कर बोला, इस शोर में कितनी व्यथा और विवशता का आभास होता है । इसे सुनकर नाड़ियों का रक्त जमता सा अनुभव हो रहा है मानो घोर नर्क में पड़ी आत्माएँ कष्ट से रुदन कर रहीं हों ?"

"सामने छत पर चढ़ने की सीढ़ी किधर है ?"

"इस ओर," गहन अन्धकार में पुजारी ने अपना हाथ एक ओर हिला दिया और फिर स्वयं तीनों यात्रियों का मार्गदर्शन कराता हुआ कोठरी की उत्तरी पंक्ति की छत पर चढ़ने वाली सीढ़ियों की ओर चल दिया । वे सब बड़ी सावधानी से तेज कदम बढ़ाते हुए आंगन को पार कर सीढ़ियों से छत पर चढ़ गए ।

सामने दो मील दूर आम और कीकर के वृक्षों के झुंड और रेत के टीलों के बीच एक गांव जल रहा था । ऊँची-ऊँची अग्निशिखायें और धुएं के बादल जलती हुई झोंपड़ियों से उठकर चारों ओर फैल रहे थे । वह शोर उन लोगों का था जो उस आग से घिरे हुए थे, अथवा उसे बुझाने का प्रयत्‍न कर रहे थे ।

पुजारी बड़बड़ाया, "अरे ! यह तो हरिपुर जल रहा है इस शान्त वातावरण में जहां कोई आंधी या झक्कड़ दिखाई नहीं देता । यह आग कैसे लगी ?"

यात्रियों में से एक बोला, "आजकल एक ही तो उल्का है जो हँसती खेलती बस्तियों, झूमती हुई खेतियों को जलाकर राख कर देती है । वह है निरीह जनता पर बर्बर हूणों का अमानुषिक अत्याचार ।"

आग की लपटों की चमक और धुएं के बादलों में घिरी कितनी ही परछाइयां नाचती दिखाई देतीं । सारे वायुमंडल में रुदन और चीत्कार के शब्द गूँज रहे थे ।

पुजारी बोला, "समझ में नहीं आता हरिपुर वालों ने इन हूणों का ऐसा क्या अपराध किया है जिसके दण्डस्वरूप इन्होंने इनके घर-बार जला दिये हैं । अपराध ! इसमें इन ग्रामीणों का क्या अपराध ? हूण सैनिकों की टुकड़ियां इधर-उधर लूट मचाती फिरती हैं और भोली जनता तथा अबलाओं का अपमान करती फिरती हैं । वे प्रत्येक ग्राम में अपने भोजन के लिए बछड़े और आनंद के लिए स्त्रियां मांगते हैं । यदि गांव वालों ने विनाश और मृत्यु के डर से उनकी कामना पूरी कर दी तब तो ठीक, अन्यथा वे जबरदस्ती उनकी स्त्रियों और सम्पत्ति का अपहरण करते हैं, उनके घरों को आग लगाकर भस्म कर देते हैं और जो जान बचाकर भागने का प्रयत्‍न करता है उसे अपने पैने तीरों की मार से यमलोक में पहुंचा देते हैं ।"

पुजारी ने एक ठंडी सांस ली ।

यात्रियों में से एक अपने साथी से बोला, "परन्तु धूमकेतु, हमें इस अत्याचार के विरुद्ध कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए ।"

"हम निःसन्देह कुछ न कुछ करेंगे । बहुत कुछ करेंगे । परन्तु इसके लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी ।"

"परन्तु मेरा तात्पर्य इस समय कुछ न कुछ करने से है ।"

"पागल हो गए हो क्या महाबाहु !"

"जो तुम्हारे मन में आए कह लो, परन्तु मैं यह कभी सहन नहीं कर सकता कि विदेशी लुटेरों की एक टुकड़ी हमारे गांवों को रोंदती फिरे और हम खड़े देखते रहें ।"

"ठीक है मेरे भाई, देश और जाति के लिए इतनी उग्र तड़प स्तुत्य है; परन्तु किसी बड़ी शक्ति से टक्कर लेने के लिए हमें अपने आपको शक्तिशाली बनाना होगा, हमारे हृदयों में भी वही चिंगारी सुलग रही है परन्तु हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी । अवसर आने से पूर्व पग उठाना बुद्धिमत्ता नहीं ।"

महाबाहु ने खून का घूंट पीकर आवेश में कहा, "कृपा करके मुझे नीचे ले चलो अन्यथा मैं क्रोध के वशीभूत होकर छत से कूद पड़ूंगा और इन बर्बर हूणों पर टूट पड़ूंगा, चाहे उन्हीं के हाथों मारा जाकर इसी आग में ही क्यों न जल जाऊँ ।"

इससे क्या लाभ होगा ? जहां सौ ग्रामवासी मारे गए हैं वहां तुम एक ही गिनती बढ़ाओगे । तनिक समय और धैर्य से काम लो महाबाहु ! बहुत शीघ्र ही इन अत्याचारियों से गिन-गिनकर बदले लेंगे । चलो नीचे चलें ।"

परन्तु महाबाहु की उत्तेजना समाप्‍त नहीं हो रही थी । जब वह अपने साथियों के साथ सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था उस समय उसकी मुट्ठियां कसी हुईं थीं, उसकी आकृति में कठोरता दिखाई देती थी और आवेश से अपने दांत भींच रहा था ।

पुजारी भारी मन से चल रहा था । उसके पैरों की आवाज सुनकर वृक्षों की टहनियों पर बसेरा करने वाले पक्षी ने पंख फड़फड़ाए । अज्ञात भय की आशंका से उसके रोंगटे खड़े हो गए । तभी किसी ने द्वार खटखटकाया । पुजारी की टांगें कांपने लगीं । वह चलते-चलते रुक गया । धूमकेतु ने महाबाहु से कहा, "लीजिये, आप हूणों पर आक्रमण करने जाना चाहते थे न ? वह स्वयं ही आ पहुंचे हैं ।"

पुजारी बड़बड़ाया, "अथवा हमारा काल हूणों के रूप में आ पहुंचा है ।"
 
महाबाहु के ऊपर इन शब्दों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, वह ओजस्वी वाणी में बोला, "मृत्यु अथवा हूण कोई भी आए हम अपनी खड्गों से उसका स्वागत करेंगे ।"

द्वार पर थपथपाहट फिर सुनाई दी ।

तीसरा यात्री बोला, "सम्भवतया वह हूण न होकर उनके अत्याचार से बचकर आया कोई हिन्दू हो और यहां आश्रम की खोज में चला आया हो ?"

"क्या द्वार खोल दूँ ?" महाबाहु ने पूछा ।

एक क्षण सोचकर धूमकेतु ने उत्तर दिया - "हां, खोल दो ।"

"अरे बाबा" पुजारी रोकता हुआ बोला, "मैं ऐसे दुखियों को आश्रय देने में असमर्थ हूँ जिनके आगमन से मेरा और मन्दिर का अनिष्ट हो ।"

परन्तु महाबाहु पुजारी की बात पर ध्यान न देता हुआ मन्दिर के बड़े फाटक को खोलकर चल पड़ा । धूमकेतु पुजारी महाराज को ढांढस देता हुआ बोला, "महाराज, आज रात को कोई संकट हमारे शरीरों पर से गुजरकर ही आप तक पहुंच सकता है और हमारे जीते-जी कोई आपकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सकता ।"

"संकट चाहे तुम्हारे शवों पर होकर आए अथवा हड्डियों पर से, वह आएगा अवश्यमेव ।" भय से घबराया हुआ पुजारी अपना धैर्य और साहस खोकर बोला ।

मन्दिर के फाटक पर पहुंचकर महाबाहु ने अपनी खड्ग म्यान से बाहर निकाल ली और किवाड़ खोल दिए ।

"कौन है ?"

"दो यात्री हैं महाराज, यहां आश्रय की खोज में आए हैं ।"

"इतनी रात गए ?"

"हां महाराज, पिछले गांव में ठहरने को कोई उचित स्थान नहीं मिला और अगले गांव की दूरी ज्ञात नहीं थी और फिर दुर्भाग्य से हम रास्ता भूल गए, जिससे इतना विलम्ब हुआ और अब देखा तो गांव जल रहा था ।"

"अन्दर आ जाओ ।"

महाबाहु ने दोनों को अन्दर बुलाकर फाटक बन्द कर दिया और उन्हें साथ लेकर पुजारी की कोठरी की ओर चल पड़ा जिसका द्वार जलते हुए दीपक के प्रकाश में ऐसी सफेद चादर के समान दिखाई देता था जिस पर अभी कोई धब्बा न लगा हो ।

प्रकाश की लम्बी रेखाएं जो पुजारी की कोठरी से निकलकर आंगन में फैल रहीं थीं उनकी रोशनी में उन यात्रियों ने अजातबाहु शक्तिशाली रौद्र आकृति वाले महाबाहु को देखा तो वे चिन्ता में पड़ गए और जब वैसी ही दो अन्य आकृतियों को पुजारी के कमरे में देखा तो उनका दिल ही बैठने लगा । वे सोचने लगे आश्रय का स्थान ढूंढते-ढूंढते वे किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गए ?

महाबाहु के दोनों साथियों ने आने वाले आगन्तुकों की आकृति को ध्यानपूर्वक देखा । धूमकेतु बोला, "घबराओ मत भाइयो, हम शत्रु नहीं हैं, आप लोग निर्भय होकर यहां रह सकते हैं । परन्तु आप कौन हैं ?"

दोनों आगन्तुकों ने अपनी सामान की गठरियां चारपाइयों पर रख दीं और कहा, "हम ईरान के व्यापारी हैं और हीरे-जवाहरात का व्यापार करते हैं, यह हमारे पास इन हीरों के छोटे-छोटे नमूने हैं जिन्हें हम हीरों के बड़े-बड़े व्यापारियों को और राजदरबारों में दिखाते फिरते हैं । जहां जितनी मांग होती है उसे लिखकर अपने देश को भेज देते हैं । वहां से थोक माल हमारे काफिले वाले लाकर पहुंचा देते हैं और हम यहां उसकी कीमत वसूल कर लेते हैं । देवताओं की मूर्तियों के लिए ईरानी कलाकारों द्वारा बनाई हीरों की आँख सर्वोत्कृष्ट होती हैं ।"

धूमकेतु और महाबाहु का तीसरा साथी जिसकी पैनी दृष्टि अब तक ईरानियों पर गड़ी हुई थी, रहस्यमय ढ़ंग से बोला, "परन्तु खेद है कि तुम्हारे इन शिल्पियों ने अपने देश के देवताओं के लिए आँखें तैयार कीं थी । वह बहुत ही घटिया सिद्ध हुई क्योंकि तुम्हारे दूरदर्शी देवता न देख सके कि देश पर आक्रमण करने वाली हूण सेना कहां से आ रही है । लोगों के एक वर्ग का अधिक धनवान हो जाना तथा दूसरे वर्ग का सूखी रोटी के लिए तरसना किस क्रान्ति का श्रीगणेश कर रहा है ?"

दोनों ईरानी इस प्रकार चौंक उठे जैसे किसी ने उन पर सामने से वार किया हो । उनकी व्यापारिक दृष्टि सहसा चौकन्नी हो गई ।

पैनी दृष्टि से घूरते हुए भारतीय ने एक ईरानी से पूछा, "क्या आपका नाम शापूर है ?"

ईरानी ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया ।

"आप तीनों आज से छः वर्ष पूर्व तक्षशिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का अध्ययन करते थे ।"

"हां ! निःसन्देह ।"

"और आपका नाम बहराम है ?"

"जी हां ।"

"क्या आप नीशापुर के अग्नि मन्दिर के प्रमुख पुजारी के लड़के नहीं हैं ? आप ही तो तक्षशिला में सांख्य पढ़ने आये थे । परन्तु एक अप्रत्याशित दुर्घटना के कारण जिसका वर्णन करना उचित नहीं, शिक्षा पूरी किए बिना ही ईरान गए थे ।"

विस्मय और घबराहट से उनके माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं । बहराम ने अपनी आवाज को संयत रखने के लिए हल्की सी खंकार लगाई और कहा, "जिन दिनों हम तक्षशिला में पढ़ते थे आप भी वहीं अध्ययन करते होंगे अन्यथा आप भला हमें कैसे पहचान सकते थे । परन्तु जब तक हमें ज्ञात है, उन दिनों ऐसी कोई विद्या नहीं पढ़ाई जाती थी जिसको सीखकर अपरिचित होते हुए भी वर्षों के देखे व्यक्ति को प्रथम दृष्टि में ही पहचान लिया जाय ।"

हिन्दू ने अपनी आंखें उसके चेहरे से हटाकर साधारण स्वर में कहा, "मेरे मित्र, तुमने मुझे पहचानने का प्रयत्‍न ही नहीं किया है । यदि तुम थोड़ा ध्यान देते तो अपने आपको हीरों के व्यापारी के छद्म रूप में प्रकट करने का प्रयत्‍न न करते । भला यह कैसे सम्भव हो सकता है कि ईरान के प्रमुख पुजारी बख्त आफ्रीद का पौत्र और मन्त्री जरमेहर का पुत्र इन दिनों में जबकि अत्याचारी हूणों ने ईरान के राज्य की नीवों तक को हिला दिया हो, मजदकियों के विद्रोह ने राज्य के शासन का पासा पलट दिया हो तथा रोम के ईसाइयों की खड्ग सिर पर लटक रही हो, अपने देश को आपत्ति के भंवर में छोड़कर एक साधारण हीरों का व्यापारी अपने आपको प्रदर्शित करता फिरे ?"

दोनों ईरानी एक बार फिर चौंक पड़े । शापूर कथन की सत्यता पर आश्चर्य प्रकट करता हुआ बोला, "मेरा अनुमान था कि हिन्दू की आंखें केवल बाह्य आकृति का अध्ययन करके ही रह जायेंगी परन्तु यह तो हृदय के आन्तरिक भावों को पढ़ने में भी प्रवीण हैं । अहरमुजद की सौगन्ध ! हिन्दुस्तान से बाहर इतनी पैनी दृष्टि अन्यत्र दुर्लभ है ।"

चापलूसी मिश्रित प्रशंसा के बाद भी जब भारतीय आकृति से किसी प्रकार का भाव न प्रकट हुआ हो, थोड़ा चुप रहकर पुनः बोला, "राजनीति का कोई बहुमूल्य हीरा अथवा नीलम लेने को हम तैयार हैं बशर्ते कि हम उसका मूल्य चुकाने में समर्थ हों अन्यथा हम किसी ऐसे नीतिज्ञ अथवा राज्य का पता तुम्हें बतायेंगे जो उचित मूल्य पर तुम से वह पदार्थ खरीद सके । हिन्दुस्तान तथा ईरान की स्थिति समान है क्योंकि बर्बर हूणों के अत्याचार से दोनों को आपस में एक दूसरे पर विश्वास करना चाहिए । अपने रहस्य एक दूसरे के पास सुरक्षित समझने चाहिएं ।"

महाबाहु अपने तीसरे साथी की ओर आश्चर्य भरी दृष्टि से देख रहा था । शापूर ने बहराम की ओर देखा, वह उत्तर में कुछ ही कहने वाला था कि पुजारी ने छाती तक कम्बल खींचा और दूसरी तरफ करवट बदलते हुए कहा, "जब तुम लोग वार्तालाप बन्द करो, दीपक बुझा देना क्योंकि तेल व्यर्थ जल रहा है और जाने से पूर्व मुझे जगा देना क्योंकि तुम लोगों ने कहा था कि तुम दिन निकलने से पूर्व ही चले जाओगे ।"

हिन्दू ने पुजारी की बात की ओर ध्यान न देते हुए ईरानियों से पूछा, "मेरा अनुमान सत्य है न ?"

"हाँ"

"आप हम पर विश्वास करते हैं न ? यद्यपि हमारा आप से कोई परिचय नहीं, फिर भी आप हमें शुभ-चिन्तक दिखाई देते हैं ।"

"क्या मैं इसका एक अभिप्राय समझूँ कि आपको हमारे पथ-प्रदर्शन की आवश्यकता है ?"

"हां, मैं समझता हूं कि एक दूसरे की सहायता के बिना हम सफल नहीं हो सकेंगे ।"

"बहुत अच्छा, आप यह बताएं कि रात की दौड़-धूप और दिन के आराम को, हमारी भांति आप भी महत्वपूर्ण समझते हैं अथवा नहीं ?"

"पहले तो नहीं, परन्तु अवश्य इसको स्वीकार करते हैं, वास्तव में शत्रुओं के साथ संघर्ष करते हुए बहुत सी बातों की शिक्षा हमने प्राप्‍त की है ।"

"महाराज !" हिन्दू ने पुजारी को आवाज दी और पुजारी जिसकी पलकें नींद से भारी हो रहीं थीं, चौंककर बोला, "क्यों, क्या हुआ ?"

"हम सब जा रहे हैं ।"

"अरे भाई, अभी तो डेढ़ पहर रात अवशेष है । इतने सवेरे भी क्या कोई प्रस्थान किया करता है ?"

"हां महाराज ! महत्वपूर्ण कार्यों के लिए समय नहीं देखा जाता । यह लीजिए पांच रजत मुद्राएं, हमारी ओर से भगवान शंकर की मूर्ति को भेंट चढ़ा दीजिएगा । यदि प्रभात वेला तक हमारे ठहरने का कार्यक्रम होता तो हम अवश्यमेव आरती में सम्मिलित होते ।"
 
चांदी की मुद्राओं को देखकर पुजारी की तन्द्रित आंखों में चमक पैदा हो गई, वह बड़े सहानुभूतिपूर्ण वचन बोला, "यदि आप लोग आध घड़ी ठहर सकते तो मैं आपके भोजन का प्रबन्ध कर देता ।"

धूमकेतु बोला, "नहीं महाराज, इसकी कोई आवश्यकता नहीं और फिर मार्ग के लिए तो खाद्य सामग्री हमारे पास है, जब भूख लगेगी खा लेंगे । आपने हमारे लिए जो कष्ट किया है उसके लिए धन्यवाद ।"

"शिव ! शिव ! इसमें धन्यवाद की कौन सी बात है, पुजारी जो यात्रियों को मंदिर के द्वार तक पहुँचाने आया था, फाटक खोलता हुआ बोला, "प्राणी मात्र की सेवा करना तो प्रत्येक का कर्त्तव्य है ।"

यात्रियों ने एक क्षण तक द्वार पर खड़े होकर बाहर दूर तक दृष्टि दौड़ाई । फिर पुजारी को अभिवादन कर वे अपने मार्ग पर चल पड़े । पुजारी खड़ा-खड़ा अंधकार में अदृश्य होते हुए यात्रियों को देखता रहा, जिनके पृष्ठ भागों पर धूँ धूँ कर जलते हुए हरिपुर की अग्निशिखाओं का प्रकाश पड़ रहा था ।

एक पहर दिन चढ़ने तक डेढ़ योजन का मार्ग तय कर वे पांचों यात्री गांव के पास पहुंचे । सारा दिन किसी एकान्त स्थान पर ठहर कर, दिन ढ़लते ही वे अपनी शेष यात्रा को आरम्भ करना चाहते थे परन्तु कहां ! इससे ईरानी तो क्या धूमकेतु और महाबाहु भी अनभिज्ञ थे ।

गांव के बाहर एक छोटा सा तालाब था जिसके किनारे एक कुटिया थी जो किसी साधु सन्यासी अथवा ब्रह्मचारी की प्रतीत होती थी, परन्तु इस समय वह खाली पड़ी थी, इसके पास तालाब की पक्की सीढ़ियों पर पैर फैलाकर वे सब अपनी टांगों की थकान मिटाने लगे । सामने गांव के कुएं पर तीन महिलाएं पानी भर रही थीं । पास में खड़ा कुत्ता रह-रहकर भौंक उठता था । एक बूढ़ा बैल कहीं से आकर तालाब के कच्चे घाट पर पानी पीने लगा । बकरी के दो मेमने दौड़े-दौड़े आए, झोंपड़ी के पास खड़ी बेरी के गिरे पत्तों को चबाने लगे ।

थोड़े समय तक विचार में डूबे रहने के पश्चात् रुद्रदत्त की दृष्टि ईरानियों पर स्थिर हो गई, जो धुएँ में छिपे गांव की ओर देख रहे थे । रात्रि के अंधकार तथा मार्ग की थकावट के कारण वह उनकी आकृतियों का अध्ययन समुचित रूप से नहीं कर सका था । अब वह चाहता था कि उसके वास्तविक स्वरूप को भली-भांति समझ सके । वे दोनों काफी सुन्दर थे । उनका रंग लाल गेहुंआ था तथा वे अभिजात वर्ग के दिखाई देते थे । रुद्रदत्त की तीव्र दृष्टि घूमती हुई उनके मुख से हट कर कलाइयों पर आकर ठहर गई । उनके सारे अंगों का निरीक्षण करती हुई वह दृष्टि मुख पर आकर रुक गई । तभी उनकी आंखों में जादूगर के सदृश्य चमक उत्पन्न हो गई ।

"बहराम !"

बहराम ने चौंक कर रुद्रदत्त की ओर देखा, "कहिए क्या कहना चाहते हैं ।" "क्या आप हमारे साथ मिलकर काम करना चाहते हैं ? परन्तु इन दिनों हमें अनेक बार अपना भेष बदलना पड़ता है इसलिए यहां से प्रस्थान करने से पूर्व आपको अपनी राष्ट्रीय वेशभूषा छोड़नी पड़ेगी क्योंकि हिन्दू युवकों के ईरानियों के समान लम्बी-लम्बी दाढ़ियां और बाल नहीं होते । इसलिए इनको भी.....।"

"हम अपने बाल कटवाने को तैयार हैं । जिस महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने घर-बार यहाँ तक कि अपने प्राणों को भी तुच्छ समझ रखा है उसके लिए तुच्छ बालों का क्या करेंगे ?"

"महाबाहु" रुद्रदत्त ने अपने साथी से कहा, "किसी नाई को ढूंढ़कर लाया जाए ?"

"नहीं, अपितु तुम हजामत का सामान यहीं जुटाओ । हम नहीं चाहते कि दो विदेशियों की भेष बदलने की अफवाह इस गांव में फैले जहां कि हमें सारा दिन व्यतीत करना है ।"

"बहुत अच्छा" । महाबाहु खड़ा हो गया ।

"और देखो, आते समय भोजन सामग्री भी लेते आना । इतने समय में धूमकेतु और मैं रसोई आदि का प्रबन्ध कर रखेंगे ।"

लम्बी डील-डौल और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व वाले महाबाहु ने जब गांव में प्रवेश किया तो पानी भरती युवतियां ठिठक कर खड़ी हो गईं । आने जाने वाले किसानों ने झुककर उसे अभिवादन किया, तथा चौपाल पर खेलने वाले बालकों ने उसके लिए स्थान छोड़ रखा था ।

नाई घर पर नहीं था और न ही बनिये की दुकान खुली थी । ऐसी विषम स्थिति में महाबाहु एक दीवार के सहारे खड़ा होकर कुछ सोचने लगा । तभी एक नन्हीं बालिका अपने पालतू कुत्ते के साथ उधर से गुजरी । एक अजनबी को आते देखकर वह ठिठकी और उसका कुत्ता गुर्राया ।

"यह कुत्ता मेला है जी"

"अच्छा"

"तुम इसको मालोगे तो नहीं ?"

"क्या तुम मेरे बाप को मिलना चाहते हो ?"

"हां, इस दुकान के मालिक से ।"

"वह तो संघ की बैठक में गए हैं ।"

"संघ ?"

"हां ! हां ! मन्दिर"

दुकान के साथ वाला दरवाजा खुल गया और किवाड़ पीछे एक बूढ़ी स्त्री की आवाज सुनाई दी, "महाराज, दुकान का मालिक तो मन्दिर में गया हुआ है । वहां सत्संग लगा हुआ है । बाहर ग्राम से दो बुद्ध भिक्षु धर्मप्रचार के लिए पधारे हुए हैं । सभी लोग वहीं एकत्रित हैं । वहां उनके दर्शनों के लिए किसान लोग भी खेतों में नहीं गए ।"

"दुकान का स्वामी कब तक वापस आएगा ?"

"कौन जाने महाराज, ज्ञान और धर्म की बातें सुनकर तो लोग घर-गृहस्थी को भी भूल जाते हैं । शायद सत्संग समाप्‍त होने के बाद ही आएँ ।"

"मैं कुछ सामग्री खरीदना चाहता था । क्या उनकी अनुपस्थिति में और नहीं दे सकता ?"

"नहीं महाराज, हम स्त्रियां तो चर्खे के सिवाय और कुछ नहीं जानतीं । मालूम पड़ता है आप पथिक हैं । आइये, मैं आपके बैठने के लिए खाट और भोजन के लिए थाली परोस देती हूँ ।"

महाबाहु ने कहा, "आपकी कृपा के लिए अनुगृहीत हूं, परन्तु मुझे भोजन की इच्छा नहीं । मैं तो केवल कुछ वस्तुएं ही मोल लेना चाहता था ।"

"जैसी आपकी इच्छा ।" कहकर उस स्त्री ने दरवाजा बन्द कर लिया । नन्हीं बालिका ने सिर उठाकर महाबाहु की ओर देखा जो सोच रहा था, मुझे वापस जाना चाहिए अथवा मंदिर की ओर । मूंछों में छिपे महाबाहु के चेहरे पर दृष्टि डालकर वह बोली, "तुम मंदिर जाओगे क्या ?"

महाबाहु एकदम चौंक पड़ा, "मंदिर किधर है ?" उसने पूछा ।

"यहीं पास में ही तो है, आओ मेरे साथ आओ ।" नन्हें-नन्हें पग भरती बालिका आगे-आगे चल पड़ी ।

मन्दिर के बाहर सीढ़ियों के दोनों ओर लोगों के जूते इस तरह पड़े दिखाई देते थे मानो किसी नदी के तट पर धूप सेकते हुए कछुओं का भारी समूह बैठा हो । साधारण जूतों के अतिरिक्त कुछ सोने के तल्ले की कढ़ाई वाले जूते भी पड़े थे ।

दुविधा में पड़ा महाबाहु सोच रहा था इस भरी सभा के मध्य में से दुकान के स्वामी को बुलाना कितना अनुचित है । वह उन लोगों का उपदेश सुनने का इच्छुक भी नहीं था । इस प्रकार अनिश्चित सी स्थिति में उसका ध्यान जूतों की कतारों की ओर चला गया, परन्तु उसके कान मन्दिर के अन्दर से आने वाली ध्वनि की ओर लगे थे जो दूर होने पर भी बड़ी स्पष्ट सुनाई दे रही थी ।

"उदारता, सन्तोष और त्याग किसी की बपौती नहीं, सभी लोग लोभ, ईर्ष्या, द्वेष की अग्नि में जल रहे हैं ।"

"यह बैल हमारा है, यह घर मेरा है, इसको बरतने का किसी को अधिकार नहीं । अन्य व्यक्ति किसलिए इसमें कदम रखें, उदारता, सन्तोष और त्याग किस के मन में नहीं बसते, सभी लोग अहंकार, ईर्ष्या और लोभ की अग्नि में जल रहे हैं । यह धन, खेत मेरे अधिकार में आ जाएं, इस लालच की पूर्ति के लिए मनुष्य इतना अन्धा हो जाता है कि उसे यह भी दिखाई नहीं देता कि प्रासाद बनाते समय पड़ौसी की झोंपड़ी तो नष्ट नहीं हो रही । अपने खाने के लिए नाना प्रकार के व्यंजनों को जुटाने में पड़ौसी को भूखे तो नहीं सोना पड़ेगा ? अपने ऊपर ओढी जाने वाली चादर के कारण गरीब आदमी के चिथड़ों की बलि तो नहीं ले रहा हूं । इस प्रकार की विचारधारा से छोटे-छोटे किसान, व्यापारी या छोटी-छोटी झोंपड़ियों वाले गांव, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं वाले नगर, यहां तक कि बड़े राज्यों के अधिपति भी प्रभावित हैं, प्रत्येक जगह पर स्वतन्त्रता, सरलता और पवित्रता के स्थान पर लूट-खसोट, बेईमानी और स्वार्थ का बोलबाला है । साम्राज्यवाद की लालसा के वशीभूत एक राजा दूसरे के राज्य पर अधिकार करना चाहता है जिससे युद्धों का श्रीगणेश होता है । अगणित नवयुवकों का रक्त पानी की तरह बहता है, माताओं की गोद सूनी हो जाती है, सुहागिनों के सुहाग उजड़ जाते हैं । क्या यह अच्छा नहीं होता कि प्रत्येक राजा अपने ही राज्य पर सन्तोष करे ? अगर इतने से भी उसकी साम्राज्य की लालसा शान्त न हो तो दूसरे राजाओं को उसके द्वारा किए गए युद्ध के आह्वान पर प्रेम और आदर के नाते मिलकर राज्य करने का प्रस्ताव रखना चाहिए तथा प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए प्रयत्‍नशील होना चाहिए । इस पर भी अगर दूसरे की इच्छा पूर्ति नहीं होती तो लाखों लोगों को संहार से बचाने के लिए उसे अपना राज्य छोड़ देना चाहिए ताकि अबलाओं का सतीत्व सुरक्षित रह सके । माताओं की कोख भरी रहे । खेत और बस्तियां हरी-भरी रह सकें । इससे अधिक पुण्य और क्या हो सकता है ?"
 
"आजकल हूणों की सेनाएं भारतवर्ष की सीमा में बढ़ती हुई आ रही हैं । प्रत्येक राजा उनकी इस प्रगति को रोकने के लिए युद्ध कर रहा है, स्थान-स्थान पर रक्त की नदियां बह रही हैं, शवों के ढ़ेर लग जाते हैं, देश में शान्ति समाप्‍त हो चुकी है । न जाने संसार अहिंसा और सन्तोष की किस लिए तिलाञ्जलि दे बैठा है ? क्या हूणों के प्रति भ्रातृत्व की भावना प्रदर्शित करके उनका आक्रामक स्थान पर अतिथि बनाकर स्वागत नहीं किया जा सकता ? क्या उनसे यह नहीं कहा जा सकता कि तुम हमारे शत्रु नहीं अपितु साथी हो, तुम्हारे स्वागत के लिए राज्य के दरवाजे ही नहीं, अपितु हमारे हृदय भी खुले हैं, यह सब वस्तुएं तुम्हारी हैं । राज्य की मान, देश की झूठी सीमाएं निर्धारित करके राजनैतिक अहंकार में डूबे हुए हैं । धर्म, अधर्म, सत्य, अहिंसा ....."

मंदिर से बाहर खड़े महाबाहु को इस भाषण को सुनकर ऐसा अनुभव हुआ जैसे उसके पैरों से जमीन खिसक रही हो, कभी-कभी उसे लगता जैसे वह धधकते अंगारों पर खड़ा है ।

बौद्ध भिक्षु के भाषण से उसे राष्ट्र के अपमान की बू आती दिखाई दी, वह क्रोध से तिलमिला उठा और आवेश से पागल हुआ मन्दिर के आंगन में जा खड़ा हुआ, जहां लोग बैठकर उस धर्म-प्रचारक की वाणी को ग्रहण कर रहे थे । एक पीठिका पर दो भिक्षु बैठे हुए थे तथा तीसरा खड़ा हुआ सब लोगों को अपने प्रवचन सुना रहा था । तीनों के वस्त्र उज्जवल थे, उनके चेहरे से निर्मल शान्ति की ज्योति प्रस्फुटित हो रही थी, तप और आध्यात्मिकता का प्रकाश उनके चेहरे पर दिखाई देता था, देवताओं के समान माया, मोह, ममता की सांसारिक बाधाओं से परे वे किसी आदर्श के प्रतीक लगते थे । खड़ा हुआ भिक्षु अपने मीठे स्वर में जनसमूह को संबोधित कर रहा था ।

"भगवान बुद्ध के भिक्षु और भिक्षुणियों को देखो जिनमें सब वर्गों के लोग हैं - स्त्री, पुरुष, धनी, निर्धन, राजा, रंक सभी ने अपनी सम्पत्ति, घर बार, पुत्र, कलत्र को छोड़कर संसार के माया मोह से मुक्ति प्राप्‍त कर ली है । आज संसार उनका घर है, सब लोग उनके मित्र हैं । उन्होंने सांसारिक शत्रुओं को पराजित करने की अपेक्षा काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय पाई है । चांदी, सोने या रेशमी वस्त्रों को एकत्रित करने की अपेक्षा विश्व प्रेम का धन एकत्रित किया है । चोर डाकू, पापी, अत्याचारी सभी के लिए उनके मन में प्रेम है । कोई भी उनका शत्रु नहीं, यदि कोई उन पर क्रोधित होता है, उन्हें गालियां देता है तो वे आशीष वचनों से उसे सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्‍न करते हैं ।"

"इसलिए भगवान् बुद्ध के भक्तजनो, भगवान् बुद्ध की शरण में आओ, अपना सर्वस्व त्यागकर भिक्षु बन जाओ । इससे संसार में सुख और शान्ति फैलेगी । यदि तुम इतना बड़ा त्याग नहीं कर सकते तो सत्य और अहिंसा का व्रत लो, भगवान् के बताये मार्ग पर चलो । यदि तुम्हारा कोई शत्रु तुम्हारे मुख पर थप्पड़े मारे तो उसको मुक्का मारने की अपेक्षा उसके हाथों को प्रेम से सहलाओ । यदि तुम्हारे खेतों पर अधिकार जमाए तो लड़ने की अपेक्षा उसे आशीर्वाद दो कि तुम्हें यह धरती खूब अन्न दे और अपने लिए अन्य कोई बंजर धरती का टुकड़ा लेकर जोत लो और अपने परिश्रम से उसे फुलवारी में बदल डालो । अपने मन से क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष को निकाल दो तथा अपने घरों में बड़े शस्‍त्रों को बाहर फेंक दो ताकि कभी क्रोध की दबी हुई चिन्गारी सुलग उठे तो रक्त की नदियां न बहें, भगवान् बुद्ध के नाम पर मैं तुम से प्रार्थना कर रहा हूँ कि अपने घर के शस्‍त्रों को लाकर हमें दे दो, हम उनको नदी में फेंक देंगे । हम संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक भगवान् बुद्ध के अहिंसा के राज्य को फैला रहे हैं । अब तीक्ष्णधार वाले शस्‍त्रों का स्थान मधुर वचनों ने ले लिया है । बर्बरता और अज्ञानता का समय बीत गया है । हम छोटे बड़े, राजा, धनी, गरीब, शत्रु, मित्र, सभी में एक ही आत्मा का प्रकाश देख रहे हैं । झूठी ईर्ष्या, द्वेष और घृणा को छोड़कर अहिंसा के रत्‍नजड़ित रथ पर चढ़कर हम मुक्तिमार्ग की ओर चल पड़े हैं ।"

उपदेश सुनने के अनन्तर अनेक श्रोतागण अपने-अपने शस्‍त्र ला ला कर चबूतरे पर ढ़ेर लगाने लगे ।

यह सारा कार्यक्रम बड़ी शान्ति से चल रहा था । भिक्षु लोग अपने स्थान पर बैठे हुए जनसमूह की ओर ताक रहे थे, ऐसा लगता था मानो उन्होंने जादू के प्रभाव से उनके मन और शरीरों पर अधिकार कर लिया है और वे जैसा चाहें उनसे करा रहे हैं । हथियारों की तो बात ही क्या, अगर वे उनसे उनके पशु, धन, स्‍त्री, पुत्र आदि जो भी मांगते श्रद्धालु जनता वह उनके अर्पण कर देती । परन्तु उस जनसमूह में केवल महाबाहु ही ऐसा व्यक्ति था जिस पर उस भाषण का कोई प्रभाव नहीं हुआ । अपितु एक विरोध की भावना उसके मन में उठ रही थी, उसके सामने ही जब लोग अपने अस्‍त्र-शस्‍त्र बौद्ध भिक्षुओं के समक्ष लाकर पटक रहे थे, और अपने विनाश की स्थिति उज्जवल कर रहे थे, उसका धैर्य छूटने लगा, वह तेज कदम रखता हुआ भिक्षुओं के सामने जा खड़ा हुआ । एक क्षण मौन रहकर उसने अपनी भारी वाणी में पूछा, "क्या मैं भी इस विषय में अपना विचार जनता के सामने प्रकट कर सकता हूं ?"

साधारण अवस्था में इस प्रकार की आज्ञा देते हुए भिक्षु अवश्य कतराते परन्तु आज भिक्षु ऐसा नहीं कर सका, उसने महाबाहु से कहा, "आइये आप .... प्रसन्नता से जनता के समक्ष अपना विचार रखिये, यदि आप हमारे नियमों के विरुद्ध भी कुछ कहेंगे तो हम उदार मन से उसे भी सुनेंगे ।"

लम्बे-चौड़े कद और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला महाबाहु अपनी ओजस्वी वाणी में गरजता हुआ बोला । उसकी हुंकार मात्र से ही सारा जनसमूह शान्त और निस्तब्ध होकर बैठ गया । सब उस व्यक्ति को आश्चर्यचकित होकर देखने लगे, जिसके विषय में कोई कुछ नहीं जानता था कि वह कौन है और कहां से आया है ।

"मेरे देशवासियो ! धर्म-बन्धुओ !" उसने धीर-गम्भीर वाणी में कहना शुरू किया, "मैं एक अपरिचित पथ का यात्री हूं, भोज्य-सामग्री लेने के लिए आपके गांव में चला आया था । यह पता चलने पर कि दुकान का मालिक इस सत्संग में चला आया है, मैं भी इधर निकल आया । मेरा सौभाग्य है कि सारे ग्रामवासियों तथा देवतास्वरूप बौद्ध भिक्षुओं के दर्शन का अवसर मुझे प्राप्‍त हुआ है, मैंने भी आपके समान उनकी मधुर वाणी और मनोहर उपदेश का श्रवण किया है । इस संसार के मायाजाल में फंसे हम जैसे साधारण लोग इतनी उच्च भावनाओं का अनुमान भी नहीं कर सकते । इस ऊंचे ज्ञान को सुनकर मोह माया के बंधन टूटने लगते हैं और पाप भरे इस संसार से विरक्त होकर वन गमन की इच्छा उत्पन्न होती है । इन्हीं के त्याग भरे शब्दों का प्रभाव है कि आप लोग अपने अस्‍त्र-शस्‍त्रों को तिलांजलि देने के यहां आये हैं, ऐसे शस्‍त्रों को जो आपको शत्रुओं से बचाते थे । आपके पशुओं की चोरी से रक्षा करते थे । पूज्य भिक्षुओं का यह उपदेश सुनकर मेरा मन भी प्रभावित हुए बिना न रहा । परन्तु मुझ पर इनके भाषण का बिल्कुल उल्टा प्रभाव पड़ा । उल्टा इसलिए नहीं कि मैं आपकी भांति हिन्दू नहीं, इस कारण भी नहीं कि मैं त्याग और अहिंसा की महत्ता को नहीं समझता । अपितु इसका कारण यह है कि मैं कुछ ऐसी विकट परिस्थितियों से गुजरा हूं । मेरी आंखों ने देश और जाति पर वह अत्याचार होते देखे हैं जिनके आगे सभ्यता और शिष्टाचार का कोई मूल्य नहीं, मेरा तात्पर्य अत्याचारी हूणों की बर्बरता और राक्षसपन से है । सहस्रों ग्राम और नगर खंडहर हो गये, लाखों लोगों का नाश हुआ, अगणित अबलाओं का सतीत्व लूटा गया, हरी-भरी खेतियां जलाकर राख कर दी गईं । यह ठीक है कि इन बर्बरों के भाले की नोंक अभी आपके गांव तक नहीं पहुंची, परन्तु उनके अमानुषिक अत्याचार की कहानियां आज समूचे देश के कानों में गूंज रहीं हैं । कोई कारण नहीं कि वह आप तक न पहुंची हो । हमारे साधु-सन्यासी और भिक्षु यही उपदेश देते हैं कि किसी प्राणी को दुःख मत दो, किसी छोटे से छोटे जीव को मत सताओ । उनके इस कथन के प्रति किसी को इन्कार नहीं, परन्तु संसार में प्रतिदिन होने वाली घटनाओं को देखकर हमें बड़े दुःख से कहना पड़ता है कि सांसारिक व्यवहार और राजनीति में बुरे लोगों के साथ सच्चाई करने में हमेशा धोखा खाना पड़ता है । आप लोग हूणों को ही देखें, क्या आप में से कोई बता सकता है कि हिन्दुस्तान और हिन्दुओं ने इनका क्या बिगाड़ा था, इन पर किसी प्रकार का आक्रमण किया था अथवा इनको किसी अधिकार से वंचित रखा था, जिस कारण इन निर्दयी अत्याचारियों ने अहिंसा और शान्ति के पुजारी भारतीयों का नरमेध आरम्भ कर दिया, मनमानी लूट-खसोट शुरू कर दी । सैंकड़ों गांवों, हजारों एकड़ लहलहाती खेती को भस्मसात् कर दिया । सब स्थानों पर भारतीयों ने अपने शिष्टाचार और अहिंसा की ढ़ाल से इन को रोकना चाहा परन्तु प्रत्येक स्थान पर बर्बरता तथा बरछों की मार से यह दीवार टूटकर खंड-खंड हो गई । खम्भों से बंधे पिता-पुत्रों ने अपनी आंखों से बहिन और बेटियों पर राक्षसी बलात्कार होते देखा, उसी प्रकार पुजारी और भक्तों के सन्मुख उनके प्रिय देवताओं की मूर्तियों को खंडित किया गया, गगनचुम्बी मन्दिरों के तोरणों को धूल में मिला दिया गया ।"
 
“भाइयो, हमारे यह खलिहान और चौपाल, मुस्कुराते गृहस्थ और मन्दिरों की अक्षय पवित्रता देश की स्वतन्त्रता पर अवलम्बित है । देश की स्वतन्त्रता से साथ ही हमारा सम्मान जीवित है । इसकी प्रतिष्ठा के साथ ही इन महात्माओं, भिक्षुओं और सन्यासियों की दशा भी सुरक्षित है । देश की स्वतन्त्रता प्रत्येक भारतीय स्‍त्री-पुरुष आबाल वृद्ध को प्रिय है । इसकी रक्षा के लिए प्रत्येक को अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए कटिबद्ध रहना चाहिये । इन भिक्षुओं ने अहिंसा के आदर्श का केवल एक ही पक्ष लोगों के सामने रखा है । आप लोग अगर मुझे आज्ञा दें तो मैं आप को बताऊं कि इसका एक अन्य स्वरूप भी है और संसार के राजनीतिज्ञों की दृष्टि में अहिंसा के जिस रूप को माना गया है उसे आप के सामने उपस्थित करूँ । मैं मानता हूँ कि इसको बताने के लिए मेरे पास सुन्दर शब्द नहीं और न ही आप लोगों को प्रभावित कर देने वाले तर्क हैं । परन्तु मेरे पास सच्चाई और वास्तविकता का वह भीषण चित्र है जिसके कारण मैं आप जैसे समझदार व्यक्तियों के सामने भी बोलने का साहस करने लगा हूँ ।“

“हिन्दू अथवा ईरानी, अरब अथवा चीनी सब जातियां सृष्टि के आदि से ही प्रत्येक उस मनुष्य को जो उनसे प्रेम करता है, सुख देती रही हैं, प्रेम करती रही हैं, और शत्रुता रखने वाले अथवा कष्ट देने वाले प्राणियों को नष्ट करने का प्रयत्‍न करती रही हैं । अपने जीवन के सुख सम्मान और स्वतन्त्रता को सुरक्षित करने के लिए प्रत्येक आक्रमणकारी से लोहा लेती आई हैं । जब तक मनुष्य मनुष्य रहेगा देवता या कुछ और नहीं बन जाता वह यही कुछ करता रहेगा और यही करते रहना चाहिए । अहिंसा का व्यवहार उन लोगों के साथ चाहिए जो भले और सच्चे हों परन्तु उन लोगों के साथ अहिंसा बर्ताव जो धर्मान्धता, बर्बरता, अंधे जोश के मद में लूट-पाट, मारकाट की राक्षसी प्रवृत्ति का आश्रय लेकर हमारी शान्ति को नष्ट करने के लिए हम पर आक्रमण करें और अपने अत्याचारों से हमारे घर में हाहाकार उत्पन्न कर दें उन लोगों से अहिंसा और शिष्टाचार का व्यवहार करना मूर्खता ही नहीं अपितु पाप भी है ।”

“भाइयो, गाय जो अपने अमृत समान दूध से हमें पुष्ट करती है, वे बैल जो हमारी बंजर भूमि को जोत जोतकर लहलहलाती खेतियों के रूप में बदल देते हैं, उनके पालने के लिए हमें चारा अनाज की बालियां आदि देना शोभा देता है परन्तु उन हिंसक प्राणियों को जो हमारी भेड़-बकरियों को खा जायें और अवसर पाकर हमारे बच्चों को उड़ा ले जायें, उनका नाश करने के लिए हमें अपने शस्‍त्रों का प्रयोग करना चाहिए । इन देवस्वरूप भिक्षुओं के समान पवित्र आत्माओं, सम्पत्तियों, महात्माओं आदि की सेवा के लिए फल-फूल देना हमारा कर्त्तव्य है, इनके चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाना हमारा धर्म है, परन्तु वे लोग जो हमारे घरों में सेंध लगाकर खून पानी से इकट्ठी की गई हमारी धन सम्पत्ति को लूट ले जायें, हमारे पालतू पशुओं को हांक ले जायें, उनको हमें अपने पैने शस्‍त्रों से छेद डालना चाहिए, उनकी खोपड़ियां फोड़ देनी चाहियें । मानव सभ्यता सौन्दर्य और मानव रक्षा के लिए दुष्टों को दंड तथा सज्जनों को सराहना और पुरस्कार मिलना ही चाहिए ।”

"न्याय के ऊँचे सिद्धान्त और आत्म-रक्षा के जन्मसिद्ध अधिकार के आगे अहिंसा अथवा दया की न कभी किसी मनुष्य ने परवाह की और न ही प्रकृति ने की । परमात्मा जिसे सच्चा न्यायकारी कहा जाता है अथवा इस प्रकार कहना चाहिए कि जिससे बढ़कर सच्चा न्यायकारी कोई है ही नहीं, वह स्वयं मनुष्य को भले-बुरे कर्मों का फल देते समय ऐसी बातों की परवाह नहीं करता । उसके द्वारा भेजी गई मृत्यु उस समय की मानव की परिस्थितियों की परवाह नहीं करती । वह नहीं सोचती कि मां के प्यार से वंचित बच्चा भूख से तड़फकर बिलबिलाया करेगा और यह नन्हा-सा प्राणी समय के थपेड़े खाने के लिए अकेला रह जाएगा । अपने अटल नियमों का संचालन करते हुए यह न्यायकारी ईश्वर दयामय और करुणामय होता हुआ भी किसी पर दया नहीं करता और वास्तव में प्रकृति के कण-कण को उसकी नियमित सीमा के भीतर न रखते हुए मानव के विकास और सभ्यता की रक्षा के लिए इन्हें एक तरफ हटा ही देना चाहिए । यदि कोई लुटेरा अथवा अत्याचार करने वाली जाति किसी दूसरे देश अथवा जाति को गुलामी की जंजीर में जकड़ना चाहती है, उसके कन्धों पर दासता का जुआ रखना चाहती है, तो उस देश के नवयुवकों का यह कर्त्तव्य है कि वे अपनी चौड़ी छाती और विशाल भुजाओं से उस विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए दीवार बनकर खड़े हो जायं, अपनी खड्गों की बिजलियों और बरछों की अग्निशिखाओं से उसे सुखा-जलाकर भस्म कर दें । विदेशी अत्याचारियों का बार-बार उल्लेख करके मैं आप लोगों को उत्तेजित करने का आरोप नहीं लेना चाहता परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि हूणों का संकट मकड़ी के तार से बंधी खड्ग के समान हमारे सिरों पर लटक रहा है जो किसी समय भी चाहे दहकती दोपहर की प्रखरता में अथवा रात्रि के अंधकार के सन्नाटे में आप लोगों तक पहुंच सकता है । इसलिए भविष्य के ज्ञाताओं और परिस्थिति तथा वास्तविकता को समझने वाले भिक्षुओं से आज्ञा लेकर आप लोगों से प्रार्थना करूंगा कि शस्‍त्रों को, जो आपकी जान और सम्पत्ति की रक्षा करते हैं, नदी में न बहायें अपितु अपने पास सम्हालकर रखें ताकि आने वाले समय में ये आप की रक्षा के काम आ सकें । शस्‍त्र अपने आप किसी के विनाश का कारण नहीं होता । जब आपने किसी निरपराध मनुष्य अथवा पशु-पक्षी को दुःख नहीं देना तो इनका रखना किस प्रकार अहिंसा के व्रत को भंग करने वाला हो सकता है ? प्रभु न करे परन्तु संकट के समय आप मेरी बातों की सच्चाई को स्वीकार करेंगे कि एक पथिक के तुच्छ परामर्श को स्वीकार करके शस्‍त्र-विहीन होने से बच गए थे । परिस्थितियां स्वयमेव भविष्यवाणी कर रही हैं कि शीघ्र ही वह समय आने वाला है । एक भारतवासी होने के नाते आप लोगों का कर्त्तव्य है कि प्रत्येक व्यक्ति हूणों के आक्रमण के समय राज्य सेनाओं के साथ मिलकर उन पर टूट पड़े । यदि आप में साहस की कमी हो और आत्मरक्षा की क्षमता न हो तो अवश्य अपने शस्‍त्रों को फेंक दें जिससे आपकी रक्षा का बोझ किसी को उठाना ही न पड़े ।"

लोगों के हाथ रुक गए, जिन्होंने अपने शस्‍त्रों को चबूतरे पर रखा था उन्होंने उन्हें उठा लिया, रास्ते चलते पथिक की बातों में उन्हें सच्चाई और वास्तविकता का आभास हुआ, उसके भाषण ने उनके मन पर जादू के समान प्रभाव किया । वह आपस में कहने लगे, "हां भाई, यह व्यक्ति सच कहता है, यह सब हमारे ही कल्याण के लिए कह रहा है ।" इस प्रकार के भाव उनके मन को उद्वेलित कर रहे थे । उन में कुछ व्यक्ति उचित शब्दों से यात्री का धन्यवाद करने के लिए उसकी ओर बढ़े, परन्तु ठीक उसी समय द्वार पर एक शोर सा सुनाई दिया जिससे सारे जन-समूह में हलचल मच गई ।

यह कोलाहल किसी आने वाले संकट की सूचना थी जो प्रायः गावों को सावधान करने के लिए किया जाता था । विशेषतः उस समय जब टिड्डी दल का आक्रमण होने वाला हो, अथवा किसी नदी नाले का बांध टूट गया हो । तब लोगों की आवाजें भय और विवशता से लड़खड़ा रही थीं । सब लोग कांप रहे थे । बौद्ध भिक्षु जो महाबाहु के मुख से अहिंसा की नवीन व्याख्या सुनकर खिजे बैठे थे, उनकी आंखें भी जिज्ञासा की उत्कण्ठा से चमक उठीं । अपने पीछे भयग्रस्त किसानों को लिए गांव का मुखिया चौपाल पर आया और सबको सम्बोधित करते हुए घबराये हुए स्वर में केवल तीन वाक्य ही कह सका – “हूणों ने सारंगपुर को लूटकर जला दिया है । राक्षसों के सदृश उन्होंने भीषण अत्याचार और मारपीट की है और अब वह इधर ही बढ़े चले आ रहे हैं ।”

भिक्षुओं की आंखें पथरा गईं, एक क्षण के लिए वे जड़ समान वहीं के वहीं बैठे रह गए । जनसमूह की स्थिति ऐसी विकट हो गयी जैसे किसी ने आकाश से सांपों की भरी पिटारी फेंक दी हो । किसी अज्ञात आपत्ति से बचने के लिए वे लोग हड़बड़ाहट में एक-दूसरे से भिड़ जाते थे और फिर एक दूसरे को देखकर लज्जा से सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में क्षमा याचना करने लगते थे । इस प्रकार सब लोग सहायता की इच्छा से एकत्रित होकर खड़े हो गए ।

परन्तु महाबाहु ने भिन्न-भिन्न स्थानों पर खड़े हुए बीस-तीस नवयुवकों को देखा जो आने वाली विपत्ति से टक्कर लेने के लिए तैयार थे । यदि उन्हें इस बात का पता चल जाये कि आक्रमणकारियों की संख्या थोड़ी है और वह एक टोली के रूप में आ रहे हैं तो ये लोग अपने सम्मान की रक्षा के लिए उन पर टूट पड़ेंगे ।

समीप खड़े हुए लोगों में से एक वृद्ध व्यक्ति ने अजीब सा भाव प्रदर्शित करते हुए भिक्षुओं से कहा, "अभी-अभी आप लोग कह रहे थे कि विश्व प्रेम का भाव उत्पन्न कर लेने पर प्रत्येक प्रकार के दुःख दूर हो जाते हैं, कोई किसी से शत्रुता नहीं करता । इसलिए आप अपने हथियारों को नदी में फेंक देने की सलाह देते थे । अब यह अत्याचारी हूण हत्या और लूट मचाने हमारे ऊपर चढ़े आ रहे हैं । आप अपने विश्व प्रेम का अनोखा चमत्कार दिखाइये और विनाश से हमारी रक्षा कीजिए ।"

भिक्षु ज्ञान और तर्क की योग्यता रखते हुए भी शान्त थे । वे इस प्रकार के अनेक उत्तर देने की क्षमता रखते थे, परन्तु इस स्थिति में जिसे अत्याचार की आंधी ने उत्पन्न कर दिया था, इसके निराकरण का कोई उपाय नहीं पा रहे थे । उनके चेहरों पर घबराहट के चिन्ह लक्षित हो रहे थे और वह एक लज्जा की भावना का अनुभव कर रहे थे । उन्होंने पूर्णतः अपने पर काबू पा रखा था । उनमें इतनी शक्ति थी कि वह क्रोध को दबाये रखें परन्तु एक ऐसे जनसमूह पर जिस पर थोड़ी देर पहले उनकी वाणी का पूर्ण प्रभाव था और जो उनके आदेश पर बड़े से बड़ा बलिदान करने के लिए कटिबद्ध थे, उनके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का इस प्रकार असत्य सिद्ध हो जाना और अल्पबुद्धि ग्रामीणों के सन्मुख अपनी स्थिति को इतना विवश पाना इस घबराहट और दुःख का मुख्य कारण था । वे इस प्रत्यक्ष आक्षेप का कोई उत्तर नहीं दे सकते थे ।

व्याख्यान देने वाले भिक्षु को जैसे कुछ स्मरण हो आया हो, वह बोला - "हमारा एक साथी कई वर्ष हुए हप्‍तालियों के देश में धर्म प्रचारक के रूप में रह आया है । वह इनकी भाषा को बड़ी अच्छी तरह जानता है और उनसे बातें भी कर सकता है । हमें जहां तक हो सके, इन हूणों को समझाने का प्रयत्‍न करना चाहिए । बताइये हूणों की सेना कहां आ रही है ?"

"सागरपुर के मार्ग पर" सूचना लाने वाला बोला, "अब वे कोई दस कोस तक पहुंचे होंगे ।"

"तो आओ ! हमारे साथ चलकर बताओ ।"

समाचार देने वाले ने इन्कार करते हुए कहा, "नहीं महाराज, मैं आप लोगों के साथ नहीं आऊँगा, अपने गांव वालों के साथ रहकर जीना मरना मुझे मंजूर है, परन्तु घर से दूर किसी पगडंडी के किनारे शत्रुओं के बरछे से ढ़ेर हो जाना मुझे स्वीकार नहीं ।"

कोई भी व्यक्ति भिक्षुओं के साथ जाने को तैयार न हुआ । उस स्तब्ध वातावरण को भंग करते हुए वह भिक्षु स्वयमेव बोला, "तो हम अकेले ही जाते हैं । यदि वे गाँव में आन पहुँचे तो रोकना असम्भव हो जायेगा । आप लोग मार्ग छोड़ दीजिए ।"

सब लोग एक तरफ हट गए, उनके मध्य से गम्भीर कदम रखते हुए वे भिक्षु मन्दिर के आंगन से बाहर चले गए ।

अब हमें क्या करना चाहिये ? किस उपाय से काम लिया जाये ? क्या अत्याचारी हूण भिक्षुओं के प्रभाव से रुक जायेंगे ? सारा जन समूह महाबाहु को घेरकर खड़ा हो गया और इस संकट के समय उसे सहायता करने के लिए कहने लगा ।

महाबाहु ने कहा, "भाइयो, मैं स्वयमेव एक पथिक हूँ, उल्टा आप लोगों को मुझे शरण देनी चाहिए ।" उनमें से एक बोला, "आपका सुगठित शरीर और प्रभावशाली व्यक्तित्व किसी साधारण यात्री के समान नहीं । यह सत्य है कि अकेले आप हूणों के बहते हुए प्रवाह को रोक नहीं सकते हैं । परन्तु आप हमें कोई ऐसा मार्ग सुझाएं जिससे हम इस विनाश से बच सकें । हम अत्यधिक घबरा गए हैं ।"
 
महाबाहु ने एक दृष्टि लोगों पर डाली और एक क्षण चुप रहकर बोला "अधिक विनाश से बचने का यही एक उपाय है कि आप निर्लज्ज बनकर गाय, बछड़े और बहू-बेटियां उनके अर्पण कर दें ।"

"इस अपमान की कल्पना तो हम स्वप्न में भी नहीं कर सकते । वह हमारे शवों के ऊपर से निकलकर ही उनको हाथ लगा सकते हैं । अपमानित होकर जीने से क्या लाभ ?"

भीड़ में से कितनी ही आवाजें आईं ।

महाबाहु बोला, "तो आप लोगों का क्या अभिप्राय है कि यदि मरना ही है तो ऐसी मौत मरा जाये जिससे शत्रुओं की भी उतनी ही हानि हो जितनी हमारी ? हम भेड़-बकरियों की तरह मिनमिनाते और भय से कांपते हुए प्राण न दें अपितु एक-एक पग पर साका करते हुए सिंहों के समान दहाड़ के और सन्मुख चोटें खाते हुए प्राण विसर्जन करें ।"

"हाँ ! हाँ ! हम सम्मान से जीना और सम्मान से मरना चाहते हैं ।"

"मैं भी आप लोगों के साथ उस पक्षी की तरह जो एक रात किसी वृक्ष पर बसेरा करने के कारण उस में आग लग जाने पर कृतज्ञता प्रकाशन के लिए जल मरता है, कन्धे से कन्धा भिड़ाकर बलि होने के लिए तैयार हूँ । यदि इस युद्ध में आप मेरे नेतृत्व को महत्त्व देते हो तो मैं अपनी सेवाएं प्रस्तुत करने में पीछे नहीं हटूँगा ।" परन्तु इस से पूर्व वह समाचार लाने वाले से बोला, "तुम बता सकते हो कि हूणों की कितनी सेना आ रही है ?"

"सारनपुर में तो वह अढ़ाई सौ के करीब थे परन्तु उनमें से आधे लूट का माल लेकर वापस चले गये हैं ।"

'बहुत ठीक', महाबाहु की आंखें तेज से उदीप्‍त हो उठीं । उसने शीघ्रता से भीड़ में से अस्सी नब्बे शस्‍त्रधारी नवयुवकों को ऐसे छांट लिया जैसे कोई घिसे सिक्के छांटकर निकाल लेता है ।

"शेष व्यक्ति .... " वह आदेश देता हुआ बोला, "अपने-अपने घरों में चले जाएं और अपने दरवाजे बन्द कर छतों पर चढ़ जायें । हम लोग आक्रमणकारियों को गांव में प्रवेश करने नहीं देंगे, अगर कोई टुकड़ी बलपूर्वक गांव में प्रविष्ट हो जाए तो आप लोग अपने पैने तीरों से, पत्थरों से उन बिना बुलाए अभ्यागतों की खूब अच्छी तरह से सेवा करें ।"

"वीरो" महाबाहु उन नवयुवकों को सम्बोधित करते हुए बोला, "आप लोगों को हार-जीत की अपेक्षा अपने कर्त्तव्य का अधिक ध्यान करना होगा । इन आक्रमणकारियों से देश की रक्षा करना प्रत्येक युवक का मुख्य कर्त्तव्य है । आप लोगों के शौर्य की परीक्षा की घड़ी आन पहुंची है । अपनी माताओं के दूध का मूल्य चुकाने का समय आ गया है । आप लोगों को धैर्य से काम लेना होगा, किसी घबराहट अथवा जल्दबाजी की आवश्यकता नहीं । मुझे इस प्रकार के युद्धों का काफी अनुभव है, मैं हर आने वाली आपत्ति से आपको जागरूक करता रहूंगा और सबको यथायोग्य आदेश देता रहूंगा । आप लोगों में से एक युवक वृक्ष पर चढ़े और देखे कि हूणों की सेना भिक्षुओं को कहां पर मिलती है तथा उनकी भेंट का क्या परिणाम होता है । यह बात सत्य है कि भिक्षुओं तथा सन्यासियों के उपदेश आक्रमणकारियों के मार्ग में बाधक नहीं बनते, फिर भी अपना कार्यक्रम निश्चित करने के लिए हमें इस परिणाम की प्रतीक्षा करनी होगी । भिक्षुओं से भेंट की सूचना हमें एकदम देकर वृक्ष से उतर आना ।" एक फुर्तीला युवक आज्ञा पालन करने के लिए बाहर खजूर के पेड़ पर चढ़ने के लिये चला गया ।

"अब आप पच्चीस-पच्चीस की टोलियों में विभक्त हो जाओ, जिनमें से एक दल मन्दिर की रक्षा के लिए यहीं रह जाये और दूसरा द्वार की रक्षा के लिए चला जाये तथा तीसरा द्वार के दोनों तरफ की बुर्जियों पर चढ़ जाये । आक्रमणकारियों की सेना सीधे द्वार पर आयेगी, अतः हवेली की टुकड़ी हूणों के द्वार के समीप आते ही उन पर अपने-अपने तीरों की मार आरम्भ कर दें । चोट खाई हुई हूण सेना हवेली की ओर अवश्य मुड़ेगी और किले की दीवार तोड़ने का प्रयत्‍न करेगी । दीवार तोड़ने से पूर्व ही द्वार की टुकड़ी निकल कर उन पर टूट पड़े और अपने पैने शस्‍त्रों की मार से उन्हें धराशायी करने का यत्‍न करे । इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनकी भारी संख्या के सामने हमारे नवयुवक न टिक सकेंगे इसलिए धीमे-धीमे पीछे हटते हुए उन्हें गांव में प्रविष्ट होने का अवसर दिया जाये ।"

"उसी समय हवेली के युवक ऊपर से उतरकर उनका मार्ग रोकें और शत्रुओं को धराशायी करने के लिए अपनी जान तक की बाजी लगायें । जब लोहे से लोहा टकरा रहा हो, युवक एक दूसरे के साथ जूझ रहे हों, तीसरी टुकड़ी मौत और विजय का प्रण लेकर युद्ध में आ कूदे और फिर जो होगा देखा जायेगा ।"

नवयुवकों के हृदय उत्साह से भर गये । उनकी धमनियों में गर्म रक्त प्रवाहित होने लगा । बताए हुए क्रम के अनुसार सब नवयुवक तीनों टुकड़ियों में विभक्त हो गये । अभी वे अपना स्थान लेने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतर ही रहे थे कि खजूर पर चढ़े व्यक्ति ने सूचना दी कि हूणों की सेना के सेनापति ने तीनों भिक्षुओं के सिर धड़ से अलग कर दिये हैं और गांव की ओर बढ़े चले आ रहे हैं । वह संख्या में सत्तर के करीब दिखाई देते हैं ।

हवेली की छत पर चढ़े धनुर्धारी नवयुवकों का नेतृत्व संभालते हुए महाबाहु ने दूर से आते हूणों को देखा और सबने अपने तूणीर से तीर निकालकर धनुषों पर चढ़ा लिए । ज्यों ही हूण सेना के घुड़सवार द्वार के निकट आये, उन पर तीरों की वर्षा होने लगी । अनेक सैनिक और उनके घोड़े घायल होकर गिर पड़े ।

महाबाहु की बाणवर्षा इतनी तीव्र गति से हो रही थी कि हूण सेना के तीन नायक धराशायी होकर गिर पड़े । हवेली की छत पर बैठे ग्रामीण नवयुवक महाबाहु को इतनी शीघ्रता से बाण छोड़ते देख कर विस्मय विमुग्य हो गये । उन्हें अपने कर्त्तव्य से च्युत होते देख महाबाहु ने उन्हें टोका ।

गांव की रक्षा के लिए बनाई गई महाबाहु की योजना इतनी सुन्दर थी कि उस पर आचरण करके शत्रुओं के आक्रमण को पूर्णतः असफल बनाया जा सकता था परन्तु हूण सिपाहियों की हठधर्मी के कारण जिसकी उन्हें आशा नहीं थी, उन्हें उनका कड़ा मुकाबला करना पड़ा । बचे हुए हूण सिपाहियों में से आधों ने द्वार को तोडना शुरू कर दिया, शेष ने मरे हुए घोड़ों की आड़ में लेटकर बाणवर्षा आरम्भ कर दी तथा लेटे-लेटे आड़ लेकर द्वार की ओर बढ़ने लगे । परन्तु यह प्रयत्‍न उन्हीं के लिए घातक सिद्ध हुआ । जिस समय हूणों के तीर हवेली के कमरों को तोड़ रहे थे, महाबाहु अपने युवकों को लेकर गुप्‍त रूप से नीचे उतर आया । उस समय हूणों की संख्या मुश्किल से पच्चीस-छब्बीस रह गयी थी जिनको आमने-सामने के युद्ध में ही हराया जा सकता था ।

गांव का द्वार यद्यपि युद्धों के लिए नहीं लगाया गया था परन्तु फिर भी इतना कमजोर नहीं था कि कुछ घायल सैनिक कन्धों के जोर से तोड़ सकें । बार-बार की असफलता से तंग आकर हूणों ने अपने शस्‍त्रों से उस पर प्रहार करना प्रारम्भ किया और जोर-जोर से हुंकार मारने लगे । उधर गांव वालों ने भी उनके साहस को नष्ट करने के लिए जय-जयकार करना आरम्भ कर दिया । अचानक ही यूं अनुभव हुआ जैसे भिड़ों के पांच-छः छत्ते आक्रमणकारियों पर टूट पड़े हों जिससे उनकी आवाजें चीखों और कराहटों में बदल गईं और वह चक्कर खाकर गिरते से प्रतीत हुए । असल में महाबाहु ने गांव के पिछले द्वार को खोलकर छुपते-छुपते वृक्षों और खेतों की ओट से निकलते अचानक शत्रुओं पर अन्धाधुन्ध बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी थी । घबराकर हूणों में भगदड़ मच गई परन्तु महाबाहु के बाणों ने किसी को जाने न दिया । फिर भी एक हूण सैनिक अपनी जान बचाकर भाग गया ।

विपत्ति और मौत के मंडराते बादल, दो घड़ी पूर्व जिन से रक्षा पाने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता था, योजना, साहस और आत्मोत्सर्ग का सहारा लेकर जिस आसानी से दूर हो गए उसकी खुशी में ग्रामीण युवकों ने अपने गगनभेदी नारों से आकाश मंडल को गुंजा दिया । सारा गांव आनन्द और उत्साह से परिपूर्ण हो उठा । ग्रामवधुएं अपनी-अपनी छतों पर खड़ी होकर मंगल गान गाने लगीं । परन्तु इस प्रसन्नता में भी अकेला महाबाहु मन्दिर की सीढ़ियों पर उदास भाव से खड़ा सोच रहा था कि मेरी अवस्था तो उस लड़के की सी हो गई है जो घर में आग लग जाने पर पानी के लिए कहारों को बुलाने गया और मार्ग में मुर्गों की लड़ाई का तमाशा देखने लग गया हो ।

वह एकदम चौंक पड़ा और अपनी प्रशंसा करने वाले ग्रामीणों को रास्ते के लिए एक ओर धकेलता हुआ बोला, "मुझे आज्ञा दीजिए । मैं और मेरे साथी एक आवश्यक कार्य से आगे जा रहे थे और मैं उन्हें बाहर ठहराकर उनके लिए गांव से खाद्य सामग्री लेने आया था कि...."

सामने खड़ी गांव वालों की भीड़ ने उसके वाक्य को पूरा होने से पूर्व कहा, "हम आप लोगों के लिए भोजन तैयार करते हैं ।" यह कहते हुए वे घरों को दौड़ गए । उन्होंने अपनी स्‍त्रियों को अभ्यागतों के स्वागतार्थ भोजन बनाने के लिए आदेश दिया । सारे गांव वाले संकट से रक्षा करने वाले इस साहसी युवक के लिए पकवानों का ढेर बनवा लाये । महाबाहु के अनेक बार कहने पर भी कि वे केवल पांच ही व्यक्ति हैं, कृतज्ञता प्रकाशनार्थ अपने साथ पचास व्यक्तियों की भोज्य सामग्री लेकर महाबाहु के साथ गांव से बाहर चल पड़े ।

गांव से बाहर सूनी कुटिया के आंगन में महाबाहु के दोनों साथी देवताओं के समान दिखाई पड़ रहे थे । उनके शरीर लम्बे-चौड़े तथा शान्त, जिनके चेहरों पर ओजस्विता टपक रही थी । उनके दोनों ईरानी साथी कुटिया में बैठे हुए थे ।

ग्रामवासियों के साथ नीची दृष्टि किए महाबाहु आकर अपने साथियों के पास खड़ा हो गया । थोड़ी देर शान्त रहकर अपनी देरी का कारण बताने के लिए कुछ कहना चाहा तभी रुद्रदत्त, जिसने प्रतिभा से गत रात्रि ईरानियों को आश्चर्यचकित कर दिया था, बोला, "महाबाहु ! हम तुम्हारी बात फिर सुनेंगे, वह सब घटनाएं जो विलम्ब का कारण बनीं हैं, हम से छुपी नहीं हैं । हूण लुटेरों का आक्रमण, उनका विनाश हमने आड़ में खड़े होकर सब देखा है । तुम्हारे बाणों के प्रहार से बच निकले अन्तिम हूण को शापूर ने मेरे आदेश से यमलोक पहुंचा दिया है । इस वृक्ष की ओट में पड़े हूण सवार की खोपड़ी और पसलियों में फंसे मेरे श‍स्‍त्र अभी तक निकाले नहीं गए । उसके घावों में अभी तक खून रिस रहा है । मुझे सब से पूर्व इन उदारचित्त गांव वालों का धन्यवाद करना है जो हम जैसे अपरिचित पथिकों का सत्कार करने पहुंचे हैं । प्रिय मित्रो ! प्रत्येक बर्तन में लाया हुआ थोड़ा-थोड़ा खाद्य पदार्थ इन बड़ के पत्तों पर परोसो और जब हम अपना भोजन समाप्‍त कर लें तो थोड़ा पानी पिलाकर हमें छुट्टी दे दो ताकि हम आप लोगों को कष्ट के लिए धन्यवाद देते हुए अपने गन्तव्य स्थान को प्रस्थान करें । परन्तु जाने से पूर्व आप लोगों को कटु सत्य से अवश्य अवगत करा जाना चाहता हूं कि आप लोगों ने मानवता और सभ्यता के शत्रु हूणों की टोली को उचित पुरस्कार दिया है । क्योंकि वे दूसरों की स्वतन्त्रता का अपहरण कर उनकी सम्पत्ति लूटना, बिना कारण ही जनता का रक्त बहाना अपने जीवन का सबसे बड़ा काम समझते हैं, किन्तु आज की परिस्थितियों का आपको ज्ञान होना चाहिए । साठ-सत्तर हूणों का इस प्रकार वापिस अपने शिविर में न पहुंचना उनके बड़े अधिकारियों से छुपा न रहेगा । अथवा किसी राह जाते यात्री या किसी द्रोही व्यक्ति द्वारा उन्हें इस घटना की सूचना अवश्य मिल जायेगी या किसी हूणों की टोली के इधर आ निकलने पर अपने साथियों की इस विनाशलीला को देखकर वह उत्तेजित हुए बिना न रहेगी । ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने पर उन बर्बरों द्वारा जिस नृशंसता का नग्न नृत्य किया जाएगा यह बताकर मैं आप लोगों को भयभीत नहीं करना चाहता । परन्तु मैं तुम लोगों को ऐसी स्थिति आने से पूर्व शीघ्रातिशीघ्र इस गांव को छोड़कर जितनी दूर तुम लोग जा सकते हो, चले जाने की सलाह देता हूँ । आप लोग अपने स्‍त्री बच्चों को लेकर सब प्रकार के मोह छोड़कर किसी बलवान हिन्दू राजा के राज्य का आश्रय लो जो आपकी रक्षा करने के योग्य हो । इसमें कोई संदेह नहीं कि आज हूणों की बाढ़ रोकने में कोई समर्थ नहीं हो पा रहा । जो भी राजा या रावल इनके मार्ग में आता है, तिनके की तरह मसल दिया जाता है । परन्तु वह दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान के सच्चे योद्धा कन्धे से कन्धा भिड़ाकर अपनी तलवारों की धारों से इनकी गर्दनों को उड़ा देंगे और शरणार्थी किसान, व्यापारियों, कलाकारों और आप जैसे अनेक ग्रामवासियों को अपने गांवों और नगरों में वापिस आकर चैन की नींद सोने का सौभाग्य प्रदान करेंगे तथा सर्वत्र सुख और शान्ति का साम्राज्य छा जायेगा ।"
 
धूमकेतु अपने गम्भीर तथा शान्त रहने वाले साथी की इतनी लम्बी वक्‍तृता सुनकर उसके मुंह की ओर देखने लगा । गांव वालों के चेहरे प्रसन्नता के स्थान पर गम्भीर हो गए । जिस समय वह उन अद्‍भुत यात्रियों को भोजन खिला रहे थे तो किसी अज्ञात भय की आशंका से रह-रहकर उनकी अंगुलियाँ कांप उठतीं थीं ।

सरकंडे के ऐसे घने वन के भीतर से जिसमें चार हाथ दूर खड़ा व्यक्ति भी दिखाई न दे, कोई वस्तु सरसराती हुई इधर को आ रही थी । कोई बाघ, सूअर अथवा नीलगाय । कार्तिक का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण कर रहा था । ढ़ाक के वृक्ष पर से एक उल्लू तीन बार बोला, उसकी भयानक चीत्कार सारे वन प्रांगण में गूँज उठी । थोड़ी देर में बढ़ती हुई सरसराहट के साथ पांच घोड़ों के मुंह सरकंडों के वन में से निकले, फिर आगे बढ़ते हुए अपने सवारों के लिए बाहर निकल आए । जिस तरफ मासू और झाणियों के छोटे-छोटे पौधे उगे हुए थे उस ओर किसी पगडण्डी का भान होता था ।

घोड़ों पर चढ़े सवार हूण थे, जो न जाने साधारण सैनिक थे अथवा लुटेरे अथवा किसी सेना के नायक । दो सुअर, एक बाघ और दो चीते मारकर उन्होंने घोड़ों पर लाद रखे थे, जिन के घावों से रिस-रिसकर खून की बूंदें टपक रही थीं जो घोड़ों की पसलियों और हूणों की टांगों से फिसलती हुई नीचे गिर रही थीं ।

उनके चौड़े चकले तथा पीतवर्ण चेहरे अत्यधिक विद्रूप और परुष दिखाई दे रहे थे । उनकी घिनौनी सूरत, मोटे भद्दे नयन नक्श और छिद्री तातारी दाढ़ी-मूंछों से बड़प्पन अथवा महत्ता के स्थान पर क्रूरता टपक रही थी । किसी प्रकार की खाल अथवा ऊन का चोंगा और अन्तर्वस्‍त्र पहने, पटके बांधे और उन पर अपने भारी भरकम खूनी शस्‍त्र सजाये, अपनी अक्खड़ बोली में कुछ बुदबुदाते हुए वन की ओर चलने लगे ।

थोड़ी दूर चलकर उन्होंने एक पगडण्डी पकड़ी जो आगे खेतों से निकलती हुई एक नगर के मार्ग से जा मिलती थी, जिस पर थोड़ी देर पहले हूणों ने अपना आधिपत्य जमाया था । दो पग चलकर एक हूण नायक ने अपनी गर्दन मोड़कर पीछे की ओर देखा और उसने अपने घोड़े की रास खींची ।

"क्यों, क्या हुआ ?" उसके साथी ने पूछा ।

"कोई वन में छिपा है ।"

"कोई गीदड़ अथवा खरगोश है ?"

"मेरे विचार से कोई आदमी था और संभवतः उनकी संख्या दो से अधिक है ।"

"तुम्हारी दृष्टि को धोखा हुआ होगा । हिंसक पशुओं से भरे वन में दिन छुपने के पश्चात् ....।"

परन्तु चौंकने वाले सवार ने बातचीत में समय नष्ट करना उचित न समझा । उसने घोड़े को एड़ लगाई और उस तरफ जहां उसे आदमियों के छुपे होने का सन्देह था, घुस गया । दूसरे ने भी उसका अनुसरण किया और चार-पांच सौ गज का चक्कर काट एक स्थान पर जाकर मिल गए ।

आश्रय लेने के लिए लोमड़ी झाड़ी से दौड़ती हुई निकल गई । दो पक्षी कीकर की डाली से उड़कर धुंधले आकाश में अदृश्य हो गए ।

उनमें से एक बोला 'तुम्हें धोखा हुआ होगा साकल ।'

"मैं कहता हूँ मैंने उन्हें छुपते हुए देखा है, हो सकता है कि वह भारतीय राजा के गुप्‍तचर हों अथवा राष्ट्रवादी आन्दोलन के क्रान्तिकारी, जिनके प्रति सतर्क रहने के लिए हमें विशेष आदेश दिया गया है । हम पर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व आ पड़ा है, जैसे तैसे हमें उन्हें ढूंढ निकालना चाहिए । अभी इतना अन्धेरा नहीं हुआ है । वह भागकर कहीं नहीं जा सकते ।"

उन्होंने पहले से अधिक बड़े घेरे में अपने निपुण घोड़े दौड़ाए परन्तु कोई भी आदमी दिखाई नहीं दिया । तब उनमें से एक सवार ने गूँजती हुई टूटी-फूटी हिन्दुस्तानी भाषा में आवाज लगाई - "किसान, शिकारी, यात्री अथवा कोई भी व्यक्ति जो इसमें छिपा हुआ हो, बाहर निकल आए । अन्यथा हम अपने चुम्बक पत्थरों से इस वन को आग लगा देंगे और सबको जीवित जला देंगे ।"

उत्तर में कोई भी आवाज या सरसराहट सुनाई न पड़ी । अंधेरा घना हो गया । किसी को न पाकर पांचों सवार बाहर निकल आए परन्तु साकल दूर से घूरता हुआ बोला, "यह देखो, वन के साथ गांव की पगडंडी छोड़े कुछ व्यक्ति दूसरी ओर जाते दिखाई देते हैं । इतनी शीघ्र वन में से निकलकर उनका पहुंचना बड़ा कठिन है, फिर भी हमें उनका पीछा अवश्य करना चाहिए ।"

"जैसा तुम कहो" कहकर सब ने अपने घोड़ों को उस दिशा में दौड़ा दिया जिस तरफ अंधकार में हिलती-डुलती आकृतियां बढ़ रहीं थीं । घोड़े के ऊपर यद्यपि भारी सवार और शिकार बांधे हुए थे फिर भी वे वेग से दौड़ रहे थे । थोड़ी-सी देर में ही उन्होंने उन लोगों को जा पकड़ा । सचमुच यही प्रतीत होता था जैसे वह बस्ती का मार्ग छोड़े किसी अन्य दिशा की ओर जा रहे हैं । दूर से ऐसा पता लगा कि शायद वे लोग हूणों का मुकाबला करने के लिए तैयार होने लगे हैं परन्तु पास ही करीब तीस या चालीस हूण सैनिकों की टोली वापिस जाते देख उन्होंने अपना विचार बदल दिया ।

"ठहरो !" हूण सरदार ने गर्जती हुई आवाज में कहा, जिसे सुनकर केवल पांच यात्री ही नहीं अपितु पैदल जाती हुई हूणों की टोली भी ठहरकर उसी ओर बढ़ने लगी । अंधेरा घना हो गया था, वृक्षों की ओट में खड़े यात्रियों को पहचानना कठिन हो गया, फिर भी वह भारतीय ही दिखाई देते थे ।

"तुम कौन हो ?" हूण सरदार ने हिन्दुस्तानी बोली में कहा ।

"यात्री हैं महाराज ! अगले गांव को जाना है ।"

"राजनपुर जायेंगे महाराज !"

"राजनपुर तो अगला नहीं है, वह तो उस से भी परे है, ग्यारह कोस की यात्रा पर इस सर्दी में कौन जाता है ? तुम झूठ बोलते हो ।"

"झूठ नहीं महाबली । हम एक आवश्यक कार्य से जा रहे हैं । आधी रात तक पहुंच जायेंगे, आवश्यकता के समय आदमी सुख-दुःख का ध्यान नहीं करता है ।"

"ऐसा कौन सा आवश्यक काम है तुम लोगों को ?"

"एक रोगी का पता लेना है ।"

"रोगी का पता लेने पांच आदमी जा रहे हैं !"

"हमारा पिता है श्रीमान्, हम तीन भाई उज्जैन में व्यापार करते हैं, यह दो नौकर हमें बुलाने आये हैं ।"

"क्या काम करते हो तुम ?"

"दलाली करते हैं महाराज ।"

"तो सवारी क्यों नहीं ली ?"

"अभी थोड़े ही दिनों से काम शुरू किया सरदार ! परदेश में इतनी जल्दी काम कहां चलता है ? हम कहीं से रुपया उधार लेकर ही सवारी का प्रबन्ध कर लेते परन्तु पिताजी के अधिक रोगग्रस्त होने का समाचार पाकर इतना घबरा उठे कि हमें यह भी ज्ञान न रहा कि पैदल की अपेक्षा सवारी पर शीघ्र पहुंचा जा सकता है । हम इसी अवस्था में पैदल चल पड़े ।"

"झूठ मत बोलो, तुम्हें हमारे साथ कोतवाली चलना पड़ेगा ताकि हम सत्य असत्य का निर्णय कर सकें ।"

"जहां जी चाहे चलिए महाराज ! जो कुछ यहां बताया है वही सब जगह कहेंगे । दुःख इस बात का है कि यहां देर हो जाने के कारण पहुंचने से पहले ही कहीं पिता के प्राण न निकल जायें । उनके अन्तिम दर्शन के लिए ही हम इतनी दूर से पैदल चले आ रहे हैं । आप अपने चार सैनिक हमारे साथ भेज दें, यदि हमारा कथन असत्य सिद्ध हो तो वे हमें आपके पास वापिस बांधकर ले आएं और फिर जो दण्ड देना चाहेंगे उसे भुगतने के लिए तैयार हैं । हमारा बूढ़ा पिता प्रत्येक श्वास के साथ यह आशा कर रहा होगा कि उसके बच्चे आ रहे होंगे । मृत्यु शैया पर पड़े एक वृद्ध पुरुष की हालत पर दया कीजिए और हमें जाने की आज्ञा दीजिए ।"

हूण सरदार का संकेत पाकर सैनिकों की टोली में से चार सिपाहियों ने निकलकर पांचों को घेर लिया और उन्हें कोतवाली तक ले जाने के लिए धक्के दे-देकर चलने पर विवश कर दिया ।

यह सब लोग उस गांव में पहुंचे जो थोड़े ही दिनों से हूणों के आधिपत्य में आया था । शुरू-शुरू में अवश्य ही उन्होंने गांव वालों से भोज्य पदार्थ सामग्री छीनी थी परन्तु बाद में गांव की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया था । न जाने क्यों अपने स्वभाव के विरुद्ध हूण लोगों को इन पांच गांव वालों पर दया आ गई थी । अथवा निरन्तर मार-काट और लूट-मार से उकताकर वे लोग शान्तिपूर्ण जीवन यापन करना चाहते थे अथवा यह भी संभव था कि यह गांव ऐसे स्थान पर स्थित था जहां से इन्हें आगे काम करने के लिए आज्ञा उपलब्ध होती रहती थी । इसलिए गांव के प्रति इन लोगों की भावनायें काफी उदार हो चली थीं, परन्तु फिर भी गांव वालों के अन्दर कुछ इस प्रकार का आतंक छाया हुआ था कि वे सब भीतर ही भीतर सहमे रहते थे । गांव की चौपाल की चहल-पहल, युवक युवतियों का अल्हड़पन समाप्‍त हो गया था । इतनी नीरवता देखकर लगता था जैसे यहां की स्त्रियां और बच्चे गांव छोड़कर कहीं अन्यत्र चले गये हैं । गांव का सारा काम वृद्ध और बच्चों पर आ पड़ा था और हूण सिपाही उन्हीं व्यक्तियों से बेगार लेते थे ।

गांव के बाहर फाटक पर चार किसानों ने आते हुए हूणों को देखकर अपने सिर से घास के गट्ठर उतारकर एक तरफ रख दिए और झुककर उन्हें सलाम करने लगे । एक बूढ़ा मोची उनके आगमन के डर से ऐसा घबराया कि बिचारा दीवार से टकरा गया और जमीन पर गिर पड़ा परन्तु गिरते हुए भी अभागा उनको सलाम करना न भूला । कुतिया के दो पिल्ले घोड़ों की टापों के नीचे आकर मर गए, उनकी चीख सुनकर पास खड़ी उनकी मां डर के मारे भौंक भी न सकी ।

हूणों की कोतावली एक बहुत बड़ी हवेली में थी । यह हवेली गांव के किसी धनवान व्यक्ति की ही थी जो अभागा इनकी तलवार की मार से मृत्यु को प्राप्‍त हो गया होगा या किसी अन्य मकान में रहने के लिए बाधित कर दिया गया था । एक बड़े खम्भे से बंधी मशालें जल रहीं थीं और उसमें पास ही भारी-भारी श्रंखलाओं का ढेर लगा हुआ था । उसके पास ही एक अजीब सी वस्तु पड़ी थी जो दूर से देखने में कपड़े के समान लगती थी परन्तु ध्यानपूर्वक देखने पर वह किसी जानवर की खाल थी । उसका निचला भाग रक्त और मिट्टी में लथपथ था । पास की बाहर गली में एक बड़े पत्थर पर पांच हूण सिपाही बैठे थे जो देखने में बड़े ही भयानक और खूंखार दिखाई देते थे । उनकी आंखें भी मशाल के समान जल रही थीं । वे अपने अधिकारियों को देखते ही सम्मानपूर्वक उठ खड़े हुए ।

अन्धकार के कारण जिन यात्रियों के चेहरे स्पष्ट दिखाई नहीं देते थे, वह मशालों के प्रकाश से स्पष्ट दिखाई देने लगे थे । वह यात्री वही पुराने हिन्दू और ईरानी युवक थे जो किसी महत्वपूर्ण काम के लिए इकट्ठे ही निकले थे, यद्यपि उन्हीं ने अपनी दाढ़ियां कटवा लीं थीं । पैदल सिपाहियों ने धक्के मार-मार यात्रियों को कोतवाली में धकेल दिया । कोतवाल को छोड़कर चारों हूण सरदार और उनकी पैदल टोली सैनिक चौकी की ओर लौट गए । कोतवाल भी घोड़ों पर से कूदकर नीचे उतरा और उसने घोड़े की लगाम पहरे वाले के हाथ में पकड़ाई तथा दो सिपाहियों को साथ लिए यात्रियों के पीछे-पीछे ड्योढ़ी में प्रविष्ट हो गया जहां जलती हुई मशालों का कड़वा धुआं दम घोट रहा था ।

"हप्‍ताली" !" आंगन में पहुंचकर उसने आवाज दी, "जरा इन धूर्तों को माफी तो देना ।"

आंगन में एक भाग में बने हुए रसोईघर में से, जिसके भीतर कई भट्टियां जल रही थीं और उन पर मांस की देगें पक रही थीं, पास ही कोयलों की अग्नि पर पूरी-पूरी लोमड़ियों को भूना जा रहा था । उनके पास लाल-लाल आंखों और घिनौने चेहरे वाला लम्बा चौड़ा एक बलिष्ठ हूण जो किसी जानवर की भूनी हुई टांग खा रहा था, उसे छोड़कर उठ खड़ा हुआ और वह बड़ी लापरवाही और घमण्ड से झूमता हुआ उनके पास आ खड़ा हुआ । उसने पहले वाले के हाथ से मशाल लेकर पांचों यात्रियों के चेहरों के इतना पास ले जाकर देखा कि यात्रियों को अपने चेहरे झुलसते हुए से प्रतीत हुए । पहले उसने हिन्दुओं के चेहरे और फिर ईरानियों के चेहरों को परखकर कहा - "हिन्दुस्तानी मूँछें और ईरानी चेहरे आपको कहां से मिले ?"

"ये कह रहे थे कि हम राजनपुर जा रहे हैं । किन्तु मेरा विचार है कि ये वन में छुपना चाहते थे । कुछ भी हो, इन्हें एक तरफ ले जाकर पूछताछ करो और यदि कोई महत्वपूर्ण बात पता चले तो मुझे सूचित करना ।"

कोतवाल आंगन में से निकलकर अपने कमरे में चला गया ।

"तुम हिन्दू !" हप्‍ताली पहरे वाले के कुल्हाड़े की नोंक महाबाहु के कन्धे पर चुभाता हुआ बोला, " बड़े धूर्त होते हो, अपने देश की रक्षा का सामर्थ्य तो तुममे है नहीं । परन्तु जब कोई अनार्य जाति जिसे प्रभु ने राज्य और सत्ता स्थापित करने की शक्ति दी है, तुम्हारे देश पर अधिकार करने का पवित्र कार्य करती है तो तुम उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचते हो, उसके मार्ग में रुकावटें उत्पन्न कर देते हो, ठीक उस नपुंसक पति की तरह जो अपनी स्‍त्री को स्वयं तो वश में कर नहीं सकता परन्तु किसी अन्य के प्रति उसको आसक्त होते देखकर धर्म, अनाचार और चरित्रहीनता का आरोप लगाकर आसमान सिर पर उठा लेता है ।"

महाबाहु अपने राष्ट्र के प्रति अपमानसूचक शब्दों को सुनकर क्षण-भर के लिए क्रोध और घृणा से तिलमिला उठा परन्तु फिर एक विवशता का अनुभव कर बोला, "श्रीमान्, हम तीन भाई हैं जो उज्जैन में आढ़त का काम करते हैं । राजनपुर में हमारे पिता अत्यधिक रुग्णावस्था में पड़े हैं । यह दोनों नौकर हमें बुलाने के लिए गए थे, इससे अधिक हम और कुछ नहीं जानते । यही बात हमने कोतवाल साहब से कही है । हमारा बूढ़ा पिता मृत्यु-शय्या पर पड़ा अपने जीवन की अन्तिम घड़ियां गिन रहा है । कृपया आप हम पर दया करें और हमें घर जाने दें । हम आपका यह उपकार आजन्म नहीं भूलेंगे ।"

वह जोर से हंसा, "मूर्खो, तुम किसी अहिंसा की मूर्ति अर्थात् मन्दिर के पुजारी के सन्मुख नहीं खड़े हो, अपितु एक हूण सरदार के सामने खड़े हो जो दस हजार शत्रुओं की जानों को चींटी के समान सस्ता और तुच्छ समझता है । हूण गुप्‍तचर हप्‍ताली के सामने मनुष्य तो क्या, वृक्ष और पत्थर भी अपने मन का भेद खोल देते हैं । यह तुम्हारी चालाकियां और मक्कारियां उसी समय तक हैं जब तक तुम मेरे जासूस के घर में पैर नहीं रखते ।”

और भीतर पहुंचने के पश्चात् .... इनके हथियार ले लो" उसने अधिक समय नष्ट न करते हुए पास खड़े सिपाही से कहा । और पांचों यात्री अपने शस्‍त्र सिपाहियों के हवाले करने लगे । हप्‍ताली ने दूसरी बार कुल्हाड़े की नोक महाबाहु के कन्धे पर रखकर उसे पीछे की ओर धकेला ।

"सात फुट के डील-डौल वाले, हाथी के समान बलिष्ठ शरीर वाले दलाल हिन्दुस्तान की कौन सी मण्डी में होते हैं ? चलो, अन्दर चलो ।"

उसने अपना लहू से भिगोया हुआ कुल्हाड़ा खींचा । "तुम आगे-आगे चलो", उसने अपने सिपाही से कहा और आप पीछे-पीछे चलने लगा ।

"आपका भोजन ?" बकावल ने आवाज देकर पूछा ।

"इधर ही भेज दो, मुझे बहुत भूख लगी है ।"

जिस दालान की तरफ हूण सिपाही इन पांचों यात्रियों को ले जा रहा था, उसके द्वार के पास कुण्डे पर लगी एक छोटी सी मशाल टिमटिमा रही थी । जिसकी आंगन के द्वार के पास के दाईं ओर किसी ने रक्त से भरी मटकी उस पर पलट दी हो अथवा द्वार के प्रवेश करते समय किसी व्यक्ति का सिर धड़े से अलग कर दिया गया हो और वह निष्प्राण शरीर दीवार से लटकता हुआ बहते हुए रक्त से उसे रंग रहा हो ।

सिपाही ने अपने मजबूत फौलादी हाथों से धक्का देकर दोनों किवाड़ों को खोल दिया । उसके भीतर प्रवेश करते समय महाबाहु ने अपनी अंगुली लहू से भीगी दीवार से लगाई जिससे ताजा रक्त उसकी अंगुलियों में चिपक गया ।

पांचों यात्री पूर्णतः जान गए थे कि पिता की बीमारी की मनघड़न्त कहानी पर हूण गुप्‍तचर को विश्वास नहीं है, उनके हजार बार शपथ लेने पर भी वह इसको सत्य नहीं मानेगा । उन सब ने मन में इस बात का निश्चय कर लिया कि वे अपने शब्दों पर दृढ़ रहेंगे क्योंकि वे जानते थे कि बार-बार अपने सामने बयान बदलने से उनकी जान के लाल पड़ जायेंगे । इसके साथ ही उन्होंने इस बात का भी निश्चय कर लिया कि चाहे कितना कठोर और नृशंस व्यवहार उनके साथ किया जाए, वह अपने निश्चय से टस से मस नहीं होंगे । परन्तु उनके मन में यह भय अवश्य था कि कहीं ईरानी इतना अधिक कष्ट सहन न कर सकें और हमारा भेद इन पर प्रकट कर दें ।
 
सिपाही का अनुसरण करते हुए उन्होंने दूसरा द्वार पार किया और पहले से भी बड़े आंगन में जाकर खड़े हो गए, जिसके मध्य में दीवार बनाकर गुप्‍तचर सरदार के रहने का स्थान बना दिया गया था । इसमें आधीन गुप्‍तचर और जल्लाद रहते थे । इस कमरे के फर्श पर भेड़ की खालें बिछी हुईं थीं तथा दीवारों पर अजगरों के चित्रों वाले चीनी पर्दे लटक रहे थे । एक बढ़िया बगदादी कंडाल बिछी हुई थी और जिस पर एक तुर्की खंजर भी पड़ा हुआ था ।

"इन धूर्तों से कहो कि दीवार के साथ चिपककर खड़े हो जाएँ और तुम जाकर देखो कि मेरे लिए भोजन लाया जा रहा है अथवा नहीं ?"

पांचों यात्री दीवार के सहारे खड़े हो गए, सिपाही ने सरदार का रखा कुल्हाड़ा उठाकर एक दृष्टि यात्रियों पर डाली और फिर रसोईघर के नौकरों को देखने के लिए उसी रास्ते वापिस चला गया ।

हप्‍ताली को अकेला देखकर महाबाहु के मन में विचार आया कि "इसी के शस्‍त्रों से, जो कमरे में पड़े हैं, इस अभिमानी का काम समाप्‍त कर दिया जाए और सिपाही के पास जाने से पूर्व आंगन से निकल सीढ़ियों द्वारा मकान पर चढ़ जायें और वहां से छलांग लगाकर अंधेरे में लुप्‍त हो जायें तो......?"

उसने रुद्रदत्त की ओर देखा, जिसने आंखों से उसको इतना साहस न करने का संकेत दिया । हप्‍ताली बिफरे हुए सिंह की तरह इधर-उधर टहल रहा था । महाबाहु ने विवशता की आह भरी । बाहर चलती वायु के झोंके से एक पर्दा थोड़ा सा हिला और आठ हथियारबन्द युवकों ने कमरे में प्रवेश किया और वे चुपचाप एक चौकी पर आकर बैठ गए । गुप्‍तचर ने अपनी रक्षा का पूरा प्रबन्ध कर रखा था ।

यदि महाबाहु जल्दबाजी और दुस्साहस के आवेश में हप्‍ताली पर प्रहार कर देता....? उसे अपनी भूल का आभास हुआ । नौकर ने आकर चौकी के सामने लकड़ी की एक टिकटिकी रखी और उस पर एक चौरस फट्टा रख दिया जिसके तल पर किसी पशु की खाल मढ़ी हुई थी । रसोईघर के नौकर ने आकर भोजन परोसना आरम्भ कर दिया ।

फट्टे के दाईं ओर उन्होंने दो छुरियां और एक कुल्हाड़ी रख दी फिर अपने साथ खाद्य पदार्थ रखने आरम्भ कर दिये । बादाम और अखरोट के तेल से तली हुई एक बछड़े की सिरी, जंगली नीलगाय की भूनी हुई टांग जिसे अंगूरी सिरके की पुल लगी हुई थी तथा पहाड़ी मकई और गेहूँ की मोटी रोटी जिस में बादाम और सेब के टुकड़े डले हुए थे, परोसी गई । अरबी खजूरों का हलवा, खट्टे अनारों के रस में बनाया हुआ अचार । बादाम और शहद और किसी सुगन्धित पदार्थ के अर्क में तले चकोर के अण्डों के टुकड़े वहां रखे गए ।

वह चुपचाप खाना खाने लगा । कभी-कभी केवल हड्डियों को तोड़ने के लिए कुल्हाड़ी तथा छुरी की आवाज सुनाई दे जाती थी, किन्तु जब उसकी भूख कुछ शान्त हुई तो उसने मुंह उठाकर यात्रियों की ओर देखा ।

"हमने सुना है कि हिन्दू ...." मुंह का ग्रास चबाता हुआ बोला "झूठ बोलना पाप समझते हैं । इसलिये सच बताओ कि तुम किस राजा के गुप्‍तचर हो ? कहां से आ रहे हो ! और किधर जाना चाहते हो ?"

धूमकेतु बोला, "महाराज, आपको न जाने क्यों ऐसा भ्रम हो गया है । हम राजनपुर के रहने वाले हैं और उज्जैन में आढ़त का काम करते हैं । हमने शुरू में ही आप से सत्य बात कही थी और अब भी वही बात कह रहे हैं । क्या हम नहीं जानते कि यदि हमने झूठ बोला तो हम सूली पर लटका दिये जायेंगे ?"

हप्‍ताली ने एक चबाई हुई हड्डी उठाई और धूमकेतु के मुंह पर दे मारी । "तुम्हारी और तुम्हारे राजनपुर की .... पाजी कहीं के ! मेरी भद्रता की तुम इस प्रकार अवहेलना कर रहे हो ? तुम्हारी यह हठधर्मी ! तुम अभी सब कुछ उगल दोगे जब तुम्हें खम्बों से बांध दिया जायेगा और गर्म चिमटों से तुम्हारे शरीर की बोटियां नुचवाई जायेंगी ।"

भोजन समाप्‍त करके उसने थोड़ा-सा गर्म पानी पिया और नौकर के हाथ से दांतों को कुरेदने के लिए तीलियां लेकर दांत में फंसे मांस के रेशे निकालने लगा ।

थोड़ी देर बाद कठोर स्वर में बोला "आओ, आज सत्य बोलना सिखाऊंगा ।"

उसकी आवाज सुनकर बाहर बैठे सिपाहियों ने वह फट्टा धकेलकर एक ओर कर दिया जो दालान के उस भाग को प्रांगण से अलग करता था । इसके हटते ही यात्रियों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो नरक के द्वार खुल गए हों ।

खुले आंगन में घना अन्धकार छाया हुआ था और उन्हें कितनी ही प्रकार की कराहटें, आहें और दबी हुई चीत्कार की आवाजें सुनाई देती थीं जो हृदय को कचोटती हुई निकल जाती थीं । सारे आंगन में दीपक अथवा मशाल नहीं जलाया हुआ था । दो स्थानों पर बड़ी-बड़ी अंगीठियां जल रहीं थीं जिनके ऊपर रखी कड़ाही में कोई वस्तु खौल रही थी और अंगीठियों के पास चार हूण जल्लाद किसी आदमी को पकड़े उसके शरीर को जला रहे थे । उसी अंधेरे में किसी स्‍त्री की सिसकियां भर भरकर कराहने की आवाज सुनाई दे रही थी । न मालूम उस बेचारी के साथ कैसा अमानुषिक व्यवहार किया जा रहा था । लकड़ियों की बनी तीन टिकटिकियों पर तीन आदमी उल्टे लटक रहे थे । हूण जल्लाद जो नृशंसता के प्रतीक दिखाई देते थे, अपनी कला में निपुण थे । उन तीनों व्यक्तियों की खालें उन्होंने बड़ी सफाई से उतारी थीं जैसे किसी सांप के शरीर से केंचुली उतारी गई हो । खाल उतरे व्यक्तियों के शरीरों से अभी तक खून रिस-रिसकर टपक रहा था ।

"ये लोग" हप्‍ताली उनकी ओर संकेत करते बोला, "परसों पकड़े गए थे, तुम अपने आपको दलाल कहते हो, ये अपने आपको यात्री बताते थे जो एक के बाद दूसरे तीर्थ की यात्रा कर रहे थे । परन्तु मैं इनको जानता था । एक मालवा राजा का उप-सेनापति है दूसरा मगध के राजपंडित का बेटा तथा तीसरा एक जमींदार है जो वहां की राजनीति में प्रमुख स्थान रखता है । परन्तु हूण सम्राट मेहरगुल के विरुद्ध षड्यन्त्र रचना और उनके रहस्यों को जानने का प्रयत्‍न करना एक ऐसा अक्षम्य अपराध है जिसको सहन नहीं किया जा सकता । यह लोग कई दिनों से छुपे-छुपे फिर रहे थे, परन्तु मेरे गुप्‍तचरों ने इनका आखिर पता लगाकर इन्हें बन्दी बना लिया और यहां ले आए । उसी समय इनका सिर धड़ से अलग किया जा सकता था । परन्तु भुट्टे की तरह सिर काट देना कोई दण्ड नहीं । मेरे इन जल्लादों ने यन्त्रणा देने के ऐसे अद्‍भुत प्रयोगों का आविष्कार किया है जिनके सामने नरक के दुःख भी हेय हैं । लड़कों और स्‍त्रियों के मान भंग की लज्जास्पद क्रिया के अतिरिक्त वह ऐसे कुकृत्य भी जानते हैं जिन से आत्मा स्वर्ग या नरक किसी के योग्य नहीं रहती । इनके शरीर की खालें उतार दीं गईं हैं । प्रातः जब इनके शरीर ओस में भीग जायेंगे तो इनको खोलकर इनके शरीरों पर नौशादर और मिर्चों का चूर्ण छिड़का जायेगा, उस समय इनका नाच देखने योग्य होगा । फिर या तो मनुष्य के मांस को खाने वाले तिब्बती कुत्तों की चार जोड़ियां इनकी बोटियों को नुचवाने के लिए छोड़ी जायेंगीं या इनके शरीर के आधे भाग पर बर्फ तथा दूसरे आधे भाग पर गर्म-गर्म खौलता तेल डाला जायेगा । अथवा इनकी आंखों की पुतलियां निकालकर उनके स्थान पर नमक की डलियां लगा दी जायेंगीं और दोपहर के बाद उनको खुले मैदान में ले जाकर बांध दिया जायेगा ताकि कौवे और चील इनको नोंच-नोंच कर अपनी भूख मिटा सकें ।"

इस प्रकार के अत्याचार को देखकर यात्रियों के मन में प्रतिहिंसा की आग भड़क रही थी तथा कभी-कभी इस भयंकर स्थिति की कल्पना कर उनका सारा शरीर अवसन्न सा हो जाता था । हूण सरदार का मानवता को निपीड़ित करने वाले इन दृश्यों को दिखाने का मात्र अभिप्राय इनके अतिरिक्त क्या हो सकता था कि कोई भी ऐसी भयंकर स्थिति में से होकर मरना नहीं चाहेगा । इसलिए अपने मन का सारा भेद उसके सामने सच-सच प्रकट कर देगा । अपना वह रहस्य जिसे वे यमराज और नरक के देवता को बताने के लिए तैयार नहीं थे, उसे बता डालेंगे ।

उस रौरव नगरी के एक कोने में पहुंच कर वह रुका । महाबाहु की दृष्टि बाईं ओर की सीढ़ियों के मार्ग पर पड़ी और उसका मन उसे मारकर भाग जाने को हुआ, परन्तु साथ वाले दालान के अंधेरे में घूरकर देखने से उसे पता लगा कि वहां दस बारह सिपाही चुपचाप बैठे थे । जलती आग की लपटों में उनके भालों की नौंके चमक उठती थीं ।

हूण गुप्‍तचर दोनों हाथ पीठ पर ले जाकर और टांगों को थोड़ा चौड़ा करके शाही ढ़ंग से खड़ा होकर बोला, "दलालों और यात्रियों का छद्मवेश छोड़कर अब भी क्या तुमने सच बताने का निश्चय किया अथवा नहीं ? बोलो, दूसरों को विपत्ति में फंसे देखकर प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि जिस प्रकार भी हो सके, बुद्धि से काम ले और अपने आपको उस भयंकर स्थिति में पड़ने से बचाये ।"

धूमकेतु हाथ जोड़कर कहने लगा, "श्रीमान, अब हम किस प्रकार आप को विश्वास दिलायें ? साधारण से आदमी होते हुए हम किस प्रकार अपने आप को किसी राजा का सेनापति या पुरोहित बतायें ?"

धूमकेतु का उत्तर सुनकर हूण गुप्‍तचर की आंखें क्रोध से जल उठीं, अंधेरे में हाथ से टटोलकर उसने दीवार पर टंगा समुद्री घोड़े की खाल का कोड़ा उतारा और उन सब पर अन्धाधुंध बरसाने लगा - "कुत्ते के बच्चो ! शैतान के बेटो ! मैं अभी जल्लादों को बुलाकर तुम्हारी जुबान खिंचवाता हूं, फिर देखना किस तरह सच्ची बात आप से आप बाहर निकलकर आती है । मैं गर्म-गर्म सलाखें तुम्हारे शरीरों में ठुकवा दूंगा और बैलों के समान तुमसे कोल्हू चलवाऊंगा ।"

उसने तीन बार ताली बजाई जिसे सुनकर तीन जल्लाद हाथों में मसाल और कोड़े लेकर आ गए । अंधेरे में छुपी बैठी सिपाहियों की टोली भी तेज कदमों से चलती हुई आकर उन्हें घेरकर खड़ी हो गई । उन्होंने अपने तेज बरछे पांचों यात्रियों की छाती पर तान लिए ताकि जल्लादों के काम में बाधा डालने पर उनकी छातियों को बींध दें ।

"चीनी यात्री फाहियान और यवन राजदूत मैगस्थनीज ने", हप्‍ताली अपनी ही धुन में बोलता चला गया, "अपने लेखों में लिखा है कि हिन्दू ऐसे हैं वैसे हैं किन्तु वह यह लिखना न जाने क्यों भूल गया कि हठधर्मी होने में संसार की कोई भी जाति इनका मुकाबला नहीं कर सकती । सब यातनायें, सब कष्ट सह अन्त में मृत्यु तक का आलिंगन करने में किसी प्रकार भी हिचकिचाएंगे नहीं, परन्तु जिस बात के लिए एक बार ना निकल गई उसे हां में बदलना .... उतरवाओ इनके कपड़े ।"

तीनों जल्लादों ने अपने शस्‍त्र एक ओर रख दिये, हाथ की मशालें दीवार में लगे कुण्डों में लटका दीं और झटके मार-मार कर यात्रियों के कपड़े उतारने लगे । महाबाहु मन ही मन क्रोध में जलने लगा । एक बार उसने फिर रुद्रदत्त की तरफ देखा ।

"इनको बांध दो, जल्दी करो ।"

जल्लादों ने फुर्ती से उनके हाथ बैलों की चमड़ी की रस्सी से पीछे की ओर बांध दिये, फिर पैरों को जकड़कर बांध दिया । इसके पश्चात् अपनी छुरियां-नस्तर और दूसरे शस्‍त्र उठा लिए ।

हप्‍ताली के कमरे की ओर अंधेरे में कोई चेहरा उसकी ओर आता हुआ दिखाई दिया । वह राजदूत सा लगता था । वह उनके पास आकर रुक गया । अभिवादन करने के पश्चात् उसने अपने थैले में से नलकी निकाली जिसमें भेड़ की खाल के ऊपर लिखा एक पत्र था जिस पर मोहर लगी हुई थी ।

"क्या बहुत आवश्यक है ?"

"हां महाराज ! प्रातःकाल इसका उत्तर लेकर मुझे वापस जाना है । मुझे कठोरता से इस आज्ञा पालन के लिए कहा गया है कि मैं दिन निकलने से पूर्व ही यहां से चल पड़ूँ ।"

"बहुत अच्छा ! इसके बाद उसने अपने सिपाहियों को आज्ञा दी कि इनको इसी प्रकार बंधे-बंधाए कोठरियों में बन्द कर दो । कल प्रातः इनसे पूछताछ की जाएगी ।"

"आइये ।"

वह राजदूत को अपने साथ लेकर कमरे की ओर चल पड़ा । वे जल्लाद सिपाही बंधे हुए कैदियों को उठाकर कोठरियों की ओर चल पड़े जिनके दरवाजे लोहे के बने हुए थे । मरे हुए कुत्तों की तरह घसीटते हुए उन पांचों यात्रियों को कमरे के ठण्डे फर्श पर पटक दिया ।

"लोहार बुलाकर इनके पैरों में बेड़ियां भी कसवा दी हैं क्या ?"

"इस बारे में तो कुछ कहा नहीं गया, परन्तु कोई बात नहीं, प्रातः तो उनका फैसला कर ही दिया जाएगा । रात-रात में ही ये यहां से भागकर कहां जा सकते हैं ?"

"चलो चलें"

उन्होंने मशालें उठाईं और बाहर से दरवाजे में ताला लगाकर चले गए । जाते-जाते मशाल के प्रकाश में रुद्रदत्त की तीव्र दृष्टि छत और दीवारों की देखभाल कर रही थी । उसने देखा कि जाते-जाते वे लोग लापरवाही के कारण कुछ अस्‍त्र कोठरी में ही भूल गए हैं ।
 
बड़ी देर तक सन्नाटा सा छाया रहा, आखिर शापूर बोला, "यह राजदूत तो हमारे लिए देवदूत के समान सिद्ध हुआ है ।"

बहराम ने कहा, "हां, परन्तु इस सहायता से हमें क्या लाभ पहुंच सकता है, सिवाय इसके कि अपमानपूर्वक मृत्यु की घड़ी और बढ़ गई जो अब तक हमारी इस लीला को समाप्‍त कर आनन्द की नींद में बदल चुकी होती । प्रातः तक अर्थात् साढ़े तीन पहर तक के लिए हमें और अधिक मानसिक दुःख भुगतना पड़ेगा ।"

"बहराम !" रुद्रदत्त की इच्छा शक्ति मानो गहन अन्धकार में गूंजती सी सुनाई दी, "साढ़े तीन पहर के समय में बहुत कुछ किया जा सकता है ।"

"जैसे कोठरी के अन्धकार में कमरे के सौ-पचास चक्कर काटना अथवा इसकी दीवारों से सिर पटक कर मर जाना ।"

"व्यर्थ की बातें मत करो बहराम !" उसका साथी उसे डाँटता हुआ बोला, "हिन्दुओं को अपनी जानें अपने ईरानी मित्रों से कम प्यारी नहीं ? और उनके सामने एक महान् उद्देश्य है जिसे यह लोग तभी प्राप्‍त कर सकते हैं जब यहां से सुरक्षित भाग सकें ।"

धूमकेतु बोला, "हमारे ईरानी मित्रो ! हमें दुःख है कि हमारे साथ मिलकर आप लोग भी इस विपत्ति में आ फंसे हो परन्तु हम इस संकट को टालने का भरसक प्रयत्‍न करेंगे और भाग्य से यदि ऐसा समय आया तो अपने से पूर्व आप लोगों को यहां से भगाने का प्रयत्‍न करेंगे ।"

रुद्रदत्त बोला, "यदि आप थोड़ा समय चुप रहें और मुझे सोचने दें ।"

इसके पश्चात् मशान की सी निस्तब्धता छा गई । केवल सांस लेने की आवाज सुनाई दे रही थी । आधी घड़ी के बाद रुद्रदत्त बोला, "यहां से निकलने की योजना मैंने बना ली है । किसी प्रकार की घबराहट और जल्दबाजी के बिना आप लोगों ने उस पर आचरण किया, तो मेरा विचार है हम अवश्य ही सफलता प्राप्‍त करेंगे । आप लोग अपने दांतों से काटकर पहले मेरे तथा फिर महाबाहु के हाथों की रस्सियां खोल दो । हूण सरदार कोठरी से जाते समय अपनी दो छुरियां तथा एक मोगरी यहीं भूल गया है जिनको मैंने मशालों के प्रकाश में देख लिया है । इसी समय मैंने यह भी देख लिया था कि झरोखे के पास के दो-तीन पत्थर ढ़ीले से दिखाई देते हैं । रात के अन्तिम पहरों में प्रत्येक व्यक्ति को नींद का खुमार अधिक प्रभाव डालता है । इस समय सिवाय पहरे के एक दो सिपाहियों के बाकी सब नींद में बेसुध पड़े होंगे । सम्भव है पहरे के सिपाहियों पर भी नींद का जादू असर कर जाए । अगर कोई जागता भी रहे तो किसी प्रकार का शोर उत्पन्न होने से पूर्व ही उसे समाप्‍त करने का ढ़ंग मुझे आता है । जितने समय में रात की यह मौन और गहरी नींद की खुमारी की घड़ी आए, मैं महाबाहु के कन्धे पर चढ़कर झरोखे के पत्थरों को खिसकाने में सफल हो जाऊंगा ।"

बहराम उसके हाथों के रस्से खोलने के लिए अंधेरे में धरती पर घिसड़ता हुआ पास आकर बोला, "एक बार यहाँ से जीवित बाहर निकल जायें फिर भले ही पीछा करने वालों के हाथों मारे जायें परन्तु इस अपमानपूर्वक मृत्यु से वह मरना हजार गुना अधिक अच्छा है ।"

"आप मौत की बात क्यों करते हैं ? ईश्वर ने चाहा तो हम दिन निकलने से पहले सुरक्षित निकल जायेंगे । यदि हमारा मौका लगा तो अपने अपमान का उत्तर इन हूणों को ऐसे रूप में देकर जायेंगे जिससे यह जानवर सिर पीटने लगें ।"

बहराम के दांत चूहे की भांति तेज थे । थोड़ी देर में उसने रुद्रदत्त के बन्धनों को काट डाला और उसे स्वतन्त्र कर दिया ।

रुद्रदत्त ने उठकर महाबाहु के बन्धन भी शीघ्रता से काट दिए । महाबाहु शीघ्र ही अपने बंधन खुलने पर झरोखे के नीचे जाकर खड़ा हो गया । रुद्रदत्त ने फर्श से छुरियां और मोगरी उठायीं और सावधानीपूर्वक चलकर महाबाहु के पास जा पहुंचा और अंधेरे में उसकी पीठ को टटोलकर उसके कन्धों पर उचककर चढ़ गया ।

झरोखे के बाहर चलने-फिरने की आवाजें धीमी होती चली जा रहीं थीं । अंगीठियों और भट्ठियों की आग धीमी पड़ती जा रही थी । अत्याचार से पीड़ितों की कराहटें भी धीमी पड़ गई थीं । उस अंधेरे में एक-आध परछाई हिलती हुई दिखाई दे जाती थी । बड़ी सावधानी और साहस से रुद्रदत्त ने महाबाहु के कन्धों पर खड़े होकर पत्थरों को उखाड़ने का प्रयत्‍न करना आरम्भ कर दिया ।

धीरे-धीरे परन्तु बंधे हुए नम्बर से पत्थर एक दूसरे के पश्चात् उखड़ने लगे । एक बार थोड़ी सी खड़खड़ाहट हुई परन्तु सावधान हाथों ने उसे बड़ी चतुराई से सम्भाल लिया । इसके पश्चात् रुद्रदत्त बिना शब्द के नीचे उतर आया ।

"क्यों, बाहर कोई है ?"

"नहीं"

"थकना क्या था । सारे पत्थर उखड़ चुके हैं परन्तु इन्हें अपने स्थान से इसलिए नहीं हटाया कि अभी रात अधिक नहीं बीती है । हमें अभी थोड़े समय तक और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।"

"अच्छा"

महाबाहु और उनके साथी अपने-अपने स्थान पर आकर बैठ गए । समय की लम्बी और भारी घड़ियां बीतने लगीं । कोई आधा पहर बीत जाने के पश्चात् रुद्रदत्त उठा और धीरे से बोला, "मेरे विचार से अब हमें अधिक विलम्ब नहीं करना चाहिए । पहले मैं और महाबाहु बाहर निकलेंगे और परिस्थिति तथा मार्ग का पता लगाकर सबको यहां से बाहर ले जायेंगे । इसमें यदि अनुमान से अधिक समय लग गया तो आप लोग चिन्ता न करें क्योंकि ऐसी परिस्थिति में जल्दबाजी और घबराहट से बना बनाया काम बिगड़ जाता है, जिससे मैं घृणा करता हूँ । हमारे बाहर निकलने के पश्चात् आप इन पत्थरों को फिर अपने स्थान पर ही लगा दें ताकि यदि पहरेदार मशाल लेकर इधर आ निकले तो उन्हें किसी प्रकार का सन्देह न हो । आओ बहराम, तुम और महाबाहु मेरे हाथों से पत्थर ले-लेकर जमीन पर रखते जाओ ।"

महाबाहु का साथी रुद्रदत्त झरोखे के पत्थरों को हटाकर चुपचाप बाहर निकल आया । इसके पश्चात् महाबाहु ने भी उसी का अनुसरण किया । आंगन में पूरा सन्नाटा और अंधकार छाया हुआ था । आग ठंडी हो चुकी थी, मशालें बुझ चुकी थीं । हवा का तेज झोंका दीवारों से टकराकर सरसराहट उत्पन्न कर देता था जिसके साथ मिलकर पहरेदारों के खुर्राटे तथा घायलों की कराहटें अधिक भयानकता उत्पन्न कर रहीं थीं ।

दोनों फर्श पर औंधे लेट गए और क्षण भर तक अंधेरे में चारों तरफ अपनी दृष्टि दौड़ाई और आस-पास की आवाजों को सुनने का प्रयत्‍न किया । रुद्रदत्त ने अपना मुंह महाबाहु के कान के पास ले जाकर धीमी आवाज में फुसफुसा कर कहा, "इस हवेली का नक्शा उज्जैन के तुम्हारे मित्र हरिवल्लभ के घर से मिलता-जुलता है । जब हूण गुप्‍तचर हप्‍ताली हमें अपने अत्याचार के शिकार घायल और खाल उतारे आदमियों को दिखा रहा था तो मेरी दृष्टि इस मकान की बनावट की ओर थी । बीस हाथ दूर दाईं तरफ सीढ़ियां हैं जो ऊपर छत तक जाती हैं । हवेली के कंगारे बाहर खड़े पीपल या किसी बड़े पेड़ को छूते हों तो कोई आश्चर्य नहीं, यदि कोई मोटी टहनी हो जिसे पकड़कर चढ़ा जा सके तो बाहर निकलना बड़ा ही सुगम हो जाएगा । अब तुम बिना शब्द किये रेंगते-रेंगते सीढ़ियों द्वारा ऊपर चढ़ जाओ और हूणों की छावनी में पहुंचो जो पूर्व की ओर थोड़ी ही दूर पर स्थित है । वहां से पांच घोड़े चुराकर पश्चिमी द्वार के बाहर जिधर से हम लाए गए थे, खड़े रहो । यह काम डेढ़ घण्टे के भीतर हो जाना चाहिए । मैं इतने समय में कार्य से निपट कर सब साथियों को लेकर पहुंच जाऊंगा ।"

"बहुत अच्छा, परन्तु यहां आप जो कुछ भी करने लगे हैं उसे करते हुए कोई संकट न खड़ा कर लेना ।"

"देश की सेवा का" रुद्रदत्त कर्त्तव्य की भावना में खोया हुआ आवेश में बोला, "जबसे यह बीड़ा उठाया है विपत्तियों की चिन्ता न आज तक कभी की है, न भविष्य में करूंगा । मेरी सावधानी और दूरदर्शिता ने हमेशा संकटों से मेरी रक्षा की है । उसी तरह मैं अब भी काम करूंगा । तुम किसी प्रकार का विलम्ब न करो । परन्तु ठहरो, हम तो अभी नंगे हैं, आओ पहले कपड़े पहन लें । काश, हमारे शस्‍त्र भी वहीं पड़े मिलें, खैर ....।"

पेट के बल रेंगता हुआ महाबाहु अपने और अपने साथियों के कपड़े उठा लाया । उसने बड़ी फुर्ती से अपने कपड़े पहने । फिर बड़ी सावधानी से घिसड़ता हुआ सीढ़ियों के ऊपर चढ़कर अन्धेरे में खो गया ।

रुद्रदत्त ने अपने कपड़े पहने और शेष एक कोने में छिपाकर रख दिये । अपने स्थान पर लेटे ही लेटे उसने तीन गहरे सांस लिए । उसकी आंखों में प्रतिकार की अग्नि जलने लगी और वह किसी भयानक अजगर की भांति दीवार के साथ-साथ तेजी से घिसड़ता हुआ हूण गुप्‍तचर के कमरे की ओर बढ़ने लगा ।

परदे के पीछे लकड़ी के फट्टे में थोड़ा-सा स्थान शायद अन्दर हवा आने के लिए रखा गया होगा । भीतर गहन अंधकार था और सोने वाले के खुर्राटों की आवाज ही सुनाई देती थी । रुद्रदत्त ने लेटे ही लेटे आस-पास नजर दौड़ाई । फिर वह परदा उठाकर अन्दर झांकने लगा । छत से लटका कन्दील हल्का-हल्का जल रहा था और तख्तों पर इधर पीठ किए तोतों के पंखों से भरे गद्दे पर सिंह की खाल ओढ़े हप्‍ताली सो रहा था । पूर्व की दीवार के झरोखों में, जिन पर पड़े हुए परदे इस समय एक ओर हट गए थे, ताजी हवा भीतर आ रही थी । एक कोने में इनके अस्‍त्र-शस्‍त्र, जिस अवस्था में हूण सिपाही ने रखे थे, पड़े थे ।

भीतर प्रवेश करते समय रुद्रदत्त ने चारों ओर एक बार फिर देखा और अन्दर प्रविष्ट हो गया । भेड़ की खाल पर चुपचाप चलता हुआ वह अपने हथियारों की ओर बढ़ा और उसने अपनी खड़ग उठा ली और उसे म्यान से निकाल कर चौकी की ओर बड़ी सावधानी से बढ़ा जिस पर हूण सरदार निश्चल पड़ा सो रहा था । पहले उसने खड़ग के एक ही वार में उसका काम तमाम करने की सोची, परन्तु न मालूम क्या सोचकर उसने खड़ग रोक ली और सोते सरदार की कनपटी पर पूरे जोर से एक घूंसा मारा । वेदना से वह तड़पकर उछला और दूसरे क्षण बेसुध हो जमीन पर लुढ़क गया । केवल एक हल्की सी घरघराहट उसके मुंह से निकली । रुद्रदत्त ने झट उसके सिर की तरफ बैठकर अपने दोनों अंगूठों से उसके गले को इतने जोर से दबाया कि उसकी मूर्छा लम्बी हो जाए । इससे निपटकर उसने उसके हाथ पांव बांधे और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया । आप औंधा लेटकर गुप्‍तचर को अपनी पीठ पर लादकर तथा हथियारों के गट्ठे को अपने मुंह में दबाकर कैदियों की ओर बढ़ने लगा ।

ठीक उस समय पहरेदारों के बैठने के स्थान पर से किसी सैनिक के अंगड़ाई लेकर जागने का शब्द सुनाई दिया । दालान का परदा हिला और एक पहरेदार की धुन्धली सी छाया किसी प्रकार का प्रकाश लिए बिना आंगन से निकली । दीवार के साथ बढ़ता हुआ रुद्रदत्त जहां का तहां धरती से चिपक गया । पहरेदार अपने भारी खुरदरे जूतों से फर्श पर आवाज करता हुआ आंगन के एक ओर गया । फिर उसने टिकटिकियों पर लटकते खाल उतारे आदमियों को देखा और इसके पश्चात् बड़बड़ाता हुआ कैदखाने की कोठरी की तरफ आया । रुद्रदत्त को उसका ताला खींचकर देखने का शब्द सुनाई दिया । इसके बाद वह उल्टे पांव वापस जाकर दालान में परदे की ओट में चला गया ।
 
रुद्रदत्त ने चैन की सांस ली, दैव की कृपा थी कि उसके हाथ में मसाल नहीं थी, नहीं तो उसे अवश्य देख लेता । और यह अच्छा ही रहा कि धूमकेतु और वह दोनों ईरानी उसके ताला खटखटाने पर चुप बैठे रहे । नहीं तो यदि वह यह समझकर कि यह अपना ही आदमी है, कुछ बोल पड़ते तो सारे किए-कराए पर पानी फिर जाता । कुछ समय तक और वह इसी स्थान पर पड़ा रहना चाहता था । उसे डर था कि कहीं हप्‍ताली को होश न आ जाए । लाचार वह फिर बढ़ने लगा परन्तु वह कैदियों की कोठरी के स्थान पर सीढ़ियों की तरफ मुड़ गया । गुप्‍तचर के शरीर को उसी प्रकार पीठ पर लादे और एक हाथ में हथियारों को सम्भाल उसने एक के बाद एक करके तीस सीढ़ियां पार कीं । छत पर पहुंचकर उसने एक नजर चारों तरफ डाली और कानों से आहट सुनने का प्रयत्‍न किया परन्तु चहुं ओर घोर सन्नाटा था । मुंडेरे के साथ घिसड़ता हुआ वह बड़ के टहने के नीचे जा पहुंचा जो मुंडेरे से कोई डेढ़ गज की ऊंचाई पर से होता हुआ बाहर छत पर फैला हुआ था । पता नहीं इतना चतुर होते हुए भी हूण गुप्‍तचर ने टहने को क्यों नहीं कटवा दिया था ।

टहने की छाया के नीचे जहां अधिक अन्धेरा था, उसने गुप्‍तचर को लिटाकर उसकी गर्दन की नाड़ियों को और दबाया और फिर नीचे आकर इसी प्रकार के तीन मूर्छित शरीरों को ऊपर उठा लाया । वे तीनों खाल उतरे बेसुध बन्दी थे जो न जाने कितने समय से टिकटिकियों पर लटक रहे थे । रक्त मिश्रित झाग उनके मुंह से निकल रही थी तथा उनके शरीर का रक्त मस्तिष्क में भर गया था ।

पांचवीं बार जब वह अपने साथियों को लेने के लिए नीचे उतरने लगा तो एक अंधेरी फुर्तीली छाया पहाड़ी रींछ की भांति पास के चौबारे की खिड़की से छत पर कूदी और दबे पांव रुद्रदत्त की ओर बढ़ी जो इतनी देर से न जाने क्या कुछ नीचे से लाकर रखता जाता था ।

शाही दूत के कार्य को पूरा करते हुए यद्यपि कोतवाल आधी रात से पहले सोने के कमरे में न जा सका था । फिर भी न जाने रात की इन पिछली घड़ियों में उसकी नींद क्यों खुल गई थी । पहले उसने दो-चार बार करवट बदलकर सो जाने का प्रयत्‍न किया परन्तु जब आंख न लगी तो उसने खिड़की पर पड़े पर्दे को एक ओर हटा दिया और कभी आकाश में टिमटिमाते तारों और कभी छत को देखने लगा । उसकी तेज आंखों ने देखा कि गहन अंधकार में जो बड़ के फैले होने से और भी घना हो गया था, एक छोटा-सा टुकड़ा टूटा और शीघ्र गति से हिलता-डुलता सीढ़ियों के रास्ते अदृश्य हो गया । थोड़ी देर बाद फिर सीढ़ियों से होती वह छाया सरकती हुई अंधेरे में लुप्‍त हो गई ।

"या मेरे खुदा ! यह क्या जादू है" वह बड़बड़ाया । उसने एक दो बार अपनी आंखें मलीं जैसे उसे अपनी दृष्टि पर विश्वास नहीं हो रहा था । परन्तु यही बात उसने फिर एक बार देखी तो उसके मन में इस को जानने की इच्छा तीव्र हो उठी । संसार के सभी बच्चों की तरह छोटी आयु में भूत-प्रेतों की कहानियां उसने सुनी थीं परन्तु वे कैसे होते हैं और कहां रहते हैं, यह उसे मालूम न था । एक बार एक भय की सिहरन उसके शरीर में उठी । उसके हृदय की धड़कन तीव्र हो गई परन्तु शीघ्र ही उसका उल्लास जाग उठा । वह चीनी तुर्किस्तान की सीमा के एक खूंखार परिवार का पैंतीस वर्ष का निडर युवक था जिसकी सारी आयु युद्धों और विपत्तियों में ही बीती थी । उसे अपने बाहुबल पर पूर्ण विश्वास था । उसने अपने ऊपर का कपड़ा फेंका, सिंह की खाल का लंगोटा पहने वह झट से छत पर उतर आया, जिधर भूतों की छाया रहस्यमय अंधेरे में फिर रही थी ।

हूण सरदार के छत पर कूदने की आवाज से रुद्रदत्त एकदम चौंका । वह समझा शायद हमारे भाग निकलने की तैयारियों का भेद खुल गया है । परन्तु नहीं, ऐसा होता तो पहरेदार अवश्य नीचे शोर मचाते । यह तो ऊपर चौबारे पर सोने वाला कोई है जिसकी आंख यूं ही इस समय खुल गई होगी और अचानक बाहर देखने पर मैं उसे नजर आ गया हूँ । किन्तु यदि वह साधारण नौकर होता तो भी अपने सरदार को सूचित करता और उसे पकड़ने के लिए एक से अधिक व्यक्ति आते परन्तु इसका अकेले सोने के कपड़े पहने, बिना किसी हथियार के आगे बढ़ते आना साहस, निडरता तथा बेबाकी का द्योतक है । यह इस प्रकार का गुण है जो किसी बड़े सरदार या उसके उत्तराधिकारी में ही होना चाहिए । हो सकता है वह कोतवाल ही हो ...

यह विचार बिजली की सी तेजी से रुद्रदत्त के मस्तिष्क में घूम गया । बिना किसी घबराहट और भय के इस राष्ट्रीय उत्थान के कार्य में तत्पर वीर हृदय ने सोच लिया कि इस विपत्ति से किस प्रकार जूझना है ।

फुर्ती से वह सीढ़ियों के अंधेरे में घुस गया और पहली सीढ़ी पर दीवार से पीठ लगाकर खड़ा हो गया । यदि उसके तीन साथी नीचे न होते और उन बेसुध व्यक्तियों का प्रबन्ध जैसा कि उसने सोचा था, वह कर चुका होता तो वह प्रहार करने का विचार त्याग हवेली से नीचे उतर जाता । परन्तु अब टक्कर लिए बिना काम बनना कठिन था । परन्तु इसके लिए उसकी खड़ग शेष हथियारों के साथ वृक्ष के टहने के नीचे पड़ी थी । किन्तु उसकी तरफ आने वाला वह व्यक्ति भी निःशस्‍त्र था । जो भी हो, वह इसका मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया ।

हाथी की भांति पका हुआ गठीला शरीर जिसकी गर्दन के ऊपर युद्धप्रिय चेहरा चमक रहा था, इधर को बढ़ता हुआ आ रहा था । आन की आन में उसकी टक्कर रुद्रदत्त से हो गई थी । आने वाले ने टहने की ओर ध्यान न दिया क्योंकि इसका कोई भी ख्याल नहीं था । वह तो अंधेरे में उस छाया की वास्तविकता का पता लगाना चाहता था जो एक रहस्यमय रूप में इधर-उधर अदृश्य हो जाती, न जाने किस विचार से वह सीढ़ियों के पास कुछ दूरी पर रुका और फिर सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा और इसके साथ ही ....।

जिस प्रकार किसी भारी मंजनीक से पत्थर निकलता है, रुद्रदत्त ने भूखे तेन्दुए के समान अपने स्थान से छलांग लगाई और असावधान हूण की छाती में इतनी जोर की टक्कर लगाई कि वह उल्टे पांव छत पर धड़ाम से गिर पड़ा । उसके गिरते ही रुद्रदत्त उसकी छाती पर चढ़ बैठा और वे दोनों आपस में गुत्थम-गुत्था हो गये । उसके शरीर में दानव के समान बल था । वह अपने पूरे जोर से रुद्रदत्त को मार डालने के लिए संघर्ष करने लगा परन्तु रुद्रदत्त भी कम शक्ति नहीं रखता था, उसके अंग लौह सदृश कठोर और दृढ़ थे । वह द्वन्द्व युद्ध में बहुत सिद्धहस्त था । अपनी स्फूर्ति तथा दांव पेचों की विविधता के कारण उसने अपने प्रतिद्वन्द्वी के प्रयत्‍न को निष्फल कर दिया ।

छत के पक्के फर्श पर लड़ने से उसके घुटने और कोहनियां छिल गईं तथा उनमें से खून निकलने लगा था । इस संघर्ष में वे दोनों बार-बार उठते और गिरते थे । इस प्रकार वे दोनों छत की मुंडर की ओर बढ़ते गए ।

छत के मुंडेर से दो हाथ के फासले पर सहसा कोतवाल को महसूस हुआ कि उसका शत्रु उसे बलपूर्वक धकेल मुंडेर से नीचे गिरा देना चाहता है । कोतवाल ने अपने को बचाने का भरसक प्रयत्‍न किया परन्तु रुद्रदत्त ने उसे ऐसा अवसर ही नहीं दिया कि अपनी दिशा बदल सके । इसलिए अब वह प्रहार करने की अपेक्षा प्रहार बचाने में लगा हुआ था परन्तु यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न था कि उसका शत्रु इतना दुबला-पतला होने पर भी इतना बल कहाँ से ले आया । किसी मनुष्य में इतनी शक्ति की कल्पना भी नहीं कर पा रहा था । थोड़ा-थोड़ा खिसकता हुआ वह कोतवाल को मुंडर के पास धकेल लाया । दोनों के सांस फूल रहे थे, जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए वे एक दूसरे को परास्त करने में अपनी एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे । ऐसे समय में कोतवाल ने मौका पाकर रुद्रदत्त का गला पकड़ लिया और इतने जोर से दबाया कि रुद्रदत्त का सांस रुकने लगा, उसकी आंखें बाहर को निकल आईं । परन्तु रुद्रदत्त में यह विशेषता थी कि कितनी भी कठिन परिस्थिति आने पर भी वह अपना विवेक नहीं खोता था । उसने कोतवाल की कलाई पकड़कर इतने जोर से मरोड़ी कि उसकी हड्डी कड़कड़ा उठी जिससे कोतवाल का दबाव नर्म पड़ गया । वह दर्द से कराह उठा । अवसर पाकर रुद्रदत्त ने उसको नीचे दबा लिया और जोर का धक्का देकर उसे मुंढ़ेर पर ले आया । कोतवाल की आंखों के आगे अंधेरा छा गया । उसने चीख मारने का प्रयत्‍न किया परन्तु रुद्रदत्त ने उसका मुंह हाथों में दबा दिया । कोतवाल ने भूखे भेड़िये की तरह उसके हाथ को अपने मुंह में दबाकर चबा डाला परन्तु रुद्रदत्त ने इसकी परवाह न कर अपनी मुट्ठी से उसकी कनपटी पर इतने जोर से मुक्का मारा कि वह लड़खड़ा कर मुंडेर के नीचे गिरने लगा । गिरते-गिरते उसने रुद्रदत्त की टांग पकड़ ली और दोनों बीस हाथ नीचे भूमि पर गिर पड़े । भाग्य से रुद्रदत्त कोतवाल के ऊपर जा गिरा, इससे उसे तनिक चोट कम आई परन्तु अचानक उतने ऊंचे से गिरने के कारण एक तरह की मूर्छा उस पर भी छा गई । परन्तु शीघ्र ही मूर्छा टूटने पर उसे अपनी स्थिति का बोध हुआ । यह समय उसके लिए सुसताने और दम लेने का नहीं था क्योंकि जरा सी भी देरी उसके सारे प्रयत्‍नों पर पानी फेर सकती थी । अपनी चोटों की चिन्ता न करते हुए वह एकदम वृक्ष के ऊपर चढ़ गया और वहां से छत पर जा उतरा । पूर्ववत् मूर्छित शरीरों को एक नजर देख वह रेंगता हुआ शीघ्रता से जेल में बैठे अपने साथियों के पास जा पहुंचा ।

प्रत्येक वस्तु अंधकार में सोई पड़ी थी । इतना बड़ा युद्ध छत के ऊपर लड़ा गया था उसके बारे में स्वप्‍नरत पहरेदारों को पता भी न लग सका ।

संकेत पाकर भीतर के लोग बाहर आ गए । उन्होंने झरोखे के पत्थरों को पूर्ववत् यथास्थान टिका दिया । वे सब अपने साथी के पीछे-पीछे बड़ी सावधानी और फुर्ती से सीढ़ियां चढ़कर छत पर जा पहुंचे । बड़ के टहने के नीचे जहां अंधकार में चार मूर्छित शरीर पड़े हुए थे, उसके पास पहुंच कर रुद्रदत्त ने ईरानियों से दबे स्वर में कहा, "इनको मेरी और धूमकेतु की पीठ पर एक-एक करके बांध दो । जब तक हम वापिस नहीं आते, तुम यहां हमारी यहां प्रतीक्षा करो ।"

दोनों ईरानी उन रक्त से लथपथ शरीरों और हिन्दुओं की ओर आश्चर्य से देखने लगे । उनकी आंखों में असीम उत्साह और साहस दिखाई दे रहा था । बिना कुछ पूछे उन्होंने एक-एक शरीर दोनों पीठों पर बांध दिया ।

"थोड़ा सावधानी से आना धूमकेतु !" रुद्रदत्त को अपनी ओर आने का संकेत करते हुए मुंडेर पर चढ़ गया और वृक्ष के टहने के ऊपर से फिसलता हुआ किसी बाजीगर के समान मूर्छित शरीर को पीठ पर बांधे हुए उतरने लगा । उनका अनुसरण करता हुआ धूमकेतु भी उसी प्रकार नीचे उतरने लगा । दोनों ईरानी विस्फारित नेत्रों से एक दूसरे का मुंह ताकने लगे ।

अहर-सुजद की कसम ! इन हिन्दुओं में आश्चर्यजनक ....।"

दोनों शरीरों को नीचे रखकर दोनों वापिस लौट आए और शेष दोनों को पहले की तरह बांधकर उतरते हुए उन्होंने ईरानियों को भी नीचे आने का संकेत करते हुए कहा कि आते समय शस्‍त्रों का बंडल भी उठाते लायें ।

नीचे पहुंच कर धूमकेतु ने पूछा, "तीनों भला वही हैं जिनको उल्टा लटका रखा था परन्तु यह चौथा व्यक्ति कौन है ?"

"हप्‍ताली !"

"बहुत अच्छा ।"

"परन्तु एक और भी है ।"

"वह कौन ....?"

"कोतवाल ।"

"कोतवाल कहां ऊपर ....?

"नहीं, यह रहा" रुद्रदत्त ने दीवार के साथ निर्जीव पड़े कोतवाल के शरीर की ओर संकेत करते हुए कहा । धूमकेतु ने आगे बढ़कर उसकी छाती पर हाथ रखा ।

"परन्तु यह तो मर चुका है ।"

"मृत अथवा जीवित, इसे यहां नहीं छोड़ा जा सकता है ।"

"हां, ठीक है ।"

उन्होंने चारों बेसुध शरीर अपने-अपने कन्धों पर उठा लिये । कोतवाल के पैर धूमकेतु ने पकड़े और बाहें रुद्रदत्त ने । और इस प्रकार वह बस्ती से बाहर निकलने के लिए पश्चिमी द्वार की ओर चल दिए । रुद्रदत्त ने अपनी धोती को जरा ढ़ीली कर जमीन पर छोड़ दिया ताकि वह जमीन पर झाड़ू की तरह उसके पद-चिन्हों को पोंछती जाए ।

भौं ! भौं ! भौं !!" द्वार के एक टूटे खण्डहर में से एक कुत्ता इस जोर से भौंका कि उस सुनसान रात में ईरानियों के हृदय की धड़कन तेज हो गई ।

"कमबख्त !" शापुर के मुंह से निकला । बहराम एकदम ठिठका और दूसरी दिशा में चलने लगा ।

"इस तरफ चलो ।" पीछे से रुद्रदत्त की आवाज सुनाई दी ।

"इधर कुत्ता है जो भौंक-भौंककर सारी गली को जगा देगा ।"

"नहीं भाई, तुम इधर से ही चलो । यह कुत्ते की आवाज नहीं है । यह तो महाबाहु है जिसे अनेक जानवरों की बोलियां आती हैं । वह हमें इधर ही आने का संकेत कर रहा है ।"

प्रसन्नता की एक लहर ईरानियों के शरीर में दौड़ गई । नव उत्साह और निश्चिन्तता की सांस लेते हुए वे लोग घोड़ों की पीठ पर एक-एक बेसुध शरीर को लेकर चढ़ बैठे । मृत्यु के दानवी चंगुल से बच निकलने के लिए उन्होंने भगवान् का कोटिशः धन्यवाद किया और अपने घोड़ों को एड़ लगाई ।

“रातों रात हमने राजनपुर की अपेक्षा ऊधोनगर पहुंचना है, कल सारा दिन मंदिर में बिताना है और वहीं कोतवाल की लाश को ठिकाने लगाना है । इसके पश्चात् .... ।” उसने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़कर अपने घायल हाथ से घोड़ों की रास को मजबूती से पकड़ा ।

अंधकारपूर्ण वातावरण में दुबला-पतला सा लाल चांद पूर्व के आकाश में इस प्रकार निकल आया जैसे किसी दुखिया की पलकों में कोई रक्त-रंजित आंसू निकलकर अटक गया हो, मन की दुःख भरी कहानियां लिए और अन्धकार की भयंकर आग छुपाए ।

बूढ़ी भिक्षुणी, जिसका मस्तिष्क ज्ञान और तपस्या की कठोर साधना से देदीप्यमान था, भिक्षुओं के मठ के पास पहुंची । जीवन के प्रति अनासक्त होने पर भी आज उसकी आंखों में अधीरता दृष्टिगोचर हो रही थी । रह-रहकर उसके पग डगमगा जाते थे जो अवस्था विशेष से उत्पन्न न होकर किसी बहुत बड़ी घटना के फलस्वरूप ही दिखाई देते थे । वह सिवाय किसी बड़े धार्मिक उत्सव के और कभी इस मठ में नहीं आती थी । किसी काम के लिए वह अपने मठ से बाहर निकली थी कि उसने भिक्षुओं के मठ से इस प्रकार की आवाज सुनी जिससे किसी अज्ञात भय की आशंका से वह कांप उठी और उसका मन किसी अपशकुन की कल्पना करने लगा । इस बात को जानने के लिए कि वहां क्या हो रहा है, उसके पांव आप से आप उठकर मठ की तरफ बढ़ने लगे ।

मठ के अन्दर से गर्म पानी की नाली बाहर निकलती थी । दीवार के पास जिस स्थान से वह नाली बाहर आती थी वहां से गुजरते हुए भिक्षुणी का पैर अचानक उस गाढ़े पानी के ऊपर पड़ गया जो बड़ी तीव्र गति से बाहर आकर गिर रहा था । छपाक से पैर के गिरते ही बूढ़ी भिक्षुणी के साफ सफेद वस्‍त्रों पर कीचड़ के छींटे फैल गए जिन्हें देखकर वह घबराहट से हड़बड़ा उठी ।

"लाल छींट, लाल कीचड़ !"

वह रुकी और एक दम दो कदम पीछे हट गई, जैसे किसी ने धक्का देकर उसे पीछे की ओर धकेल दिया हो । उसकी विस्फारित आंखें नाली की ओर उठ गईं जहां से लाल-लाल पानी बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था । वह अपने स्थान पर जड़वत् खड़ी की खड़ी रह गई । इसके बाद उसने नीचे झुककर उस कीचड़ में अपनी अंगुली डुबोकर देखी ।

"ओह मेरे ईश्वर, इसमें तो रक्त है ! रक्त !!"

दो क्षण तक भिक्षुणी की सारी चेतना लुप्‍त हो गई । वह अवसन्न-सी खड़ी अपनी अंगुली को देखती रही, फिर बड़ी घबराहट से सीधी पगडंडी को छोड़कर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भागती हुई अपने मठ की ओर बढ़ने लगी । कांटे की झाड़ियों में उलझकर उसकी चादर फट गई, मार्ग में पड़े एक पत्थर से ठोकर खाकर वह गिरते-गिरते बची ।

महिला मठ के बाहर द्वार पर कुछ अधेड़ और युवा भिक्षुणियां खड़ी बूढ़ी भिक्षुणी को दौड़ते हुए आते देख रही थीं । धीरे-धीरे वहां पर भिक्षुणियों का समूह एकत्रित होने लगा । उन लोगों ने समझा शायद किसी हिंस्र पशु के भय के कारण वह भागी चली आ रही है । परन्तु पगडंडी बिल्कुल साफ थी । इसलिये उन सबका विस्मय भय में बदल गया ।

द्वार पर एकत्रित भिक्षुणियों की पास आकर वह रुकी और अस्फुट शब्दों में जो कुछ उसने समझा था, कह दिया । अज्ञात भय से कांपती हुई सब भिक्षुणियां एकदम घबराकर वन में इस्ततः भागने लगीं ।

भिक्षुओं के मठ के द्वार से, रक्त से रंजित खड़गें लिए, छः हूण सिपाही निकले । भगवान् बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति उनके हाथों में थी ।

"फटे कम्बल, काठ के प्याले, और फूंस के बिस्तर ....।"

"खाली ! सब खाली !! पूर्णतः निस्तब्ध !!!"

सहसा उनकी दृष्टि भय से वन में भागती स्‍त्रियों की तरफ गई "अरे, वह देखो !"

वे बड़े जोर से चिल्लाये मानो कोई पहाड़ी रींछ चीखा हो, और उनकी तरफ दौड़ने लगे । झाड़ियों में से एक चीख निकली और उसके पश्चात् एकदम मौत का सा सन्नाटा व्याप्‍त हो गया और सब स्‍त्रियां उनकी आंखों से ओझल हो गईं । परन्तु सिपाही, जो जंगलों में छुपी लोमड़ियों और कुंजों में छिपे बारहसिंगों तक को ढ़ूंढ निकलते थे, उनकी तीव्र दृष्टि से भला वे कैसे बच सकतीं थीं ! शीघ्र ही उन्होंने उन छिपी भिक्षुणियों को बाहर निकालकर भेड़ बकरियों की तरह एक स्थान पर इकट्ठा कर लिया और उन्हें खदेड़ते हुए एक तरफ को चल पड़े ।

"लोमड़ियो ! क्या तुम हमें धोखा देकर छुपना चाहती थीं ?"

विदेशी भाषा न समझ आने पर भी वे उनके आशय को समझ गई और भय से कांपती हुईं बोलीं - "आप हमारी हत्या क्यों करना चाहते हैं ? हम वीतरागी भिक्षुणियां हैं, हमने संसार का त्याग कर रखा है । आप लोग किस लिए भगवान् बुद्ध की मूर्ति का अपमान करते हैं ?"

"दुबली, पतली, सुन्दर ! यदि धन नहीं तो ये ही सही, दिल बहलाव के काम तो आयेंगी ही ।"

उन छः हूण सैनिकों ने छः सुन्दर युवा भिक्षुणियों को जिनके नक्श तीखे और सुन्दर थे, तपस्या की कठोर साधना ने जिनकी आंखों के मद को सुखाया नहीं था, छांट लिया और शेष सब को नंगा करके उन्हीं की चादरों से वृक्ष से बांध दिया और बड़ी फुर्ती से उन असहाय भिक्षुणियों की छातियां काट डालीं । एक भयंकर चीत्कार से सारा वायुमंडल कांप उठा । वृक्षों पर बैठे पक्षी भी भय से उड़ने लगे । भिक्षुणियों के घावों से निकलती खून की धारायें उनके शरीर को भिगोती हुईं पृथ्वी पर गिरने लगीं । कटी छातियों को अपनी तलवार से उन्हीं की चादर की रस्सियों से पिरोकर उन नृशंस आतताइयों ने छः हार बनाये । उन हारों को पकड़े वह भय से निश्चेष्ट उन छः सुन्दरियों की ओर बढ़े जिन्हें उन्होंने अपने लिए छांटा था ।

"हे सुन्दरियो, तुम्हारे कानों में न तो कर्णफूल हैं, न हाथों में कंगण ! स्‍त्रियों का श्रंगार किए बिना उनसे प्रेम करना पाप है इसलिए यही अद्‍भुत हार पहन लो" अब वह टूटी फूटी भारती भाषा में कह रहे थे ।

आतंक और निर्ममता के इस भयंकर दृश्य को न देख सकने के कारण उनकी आंखें बंद हो गईं । रक्त से लथ-पथ मानव के के गर्म-गर्म टुकड़ों को अपने गर्दन और छातियों पर लगते देखकर उनके शरीरों से ठंडे पसीने की धारायें बहने लगीं । उनकी चीखें निकलने लगीं और निश्चेष्ट होकर वे भूमि पर गिर पड़ीं ।

अपने कठोर हाथों से उन्हें उठाते हुए वे अट्टहास कर उठे और बड़े जोर से उन्हें झकझोरते हुए बोले - "नाचो सुन्दरियो, नाचो । हम तुम्हारा नाच देखना चाहते हैं ।" और वे जोर से खिलखिलाकर हंसने लगे ।

विभ्रान्त सी खड़ी स्‍त्रियों ने इस आवाज को सुनकर अपने आंखें खोलीं, भय से घबराई हुई अपने पांवों को इधर-उधर रखने लगीं ।

"नाचो, अच्छी तरह नाचो !" रक्त से भीगी खड़गों को उनकी ओर करते हुए भूखे भेड़ियों की तरह हूण गरजे । उसी समय जंगल से शेर ने दहाड़ लगाई । मृत्यु को इतने निकट देखकर वे विपत्तिग्रस्त भिक्षुणियां तेज आंधी में हिचकोले खाती लताओं की तरह डोलने लगीं । उनके मस्तिष्कों में अतीत की वे स्मृतियां घूम गईं जब वे भिक्षुणियां नहीं बनी थी अपितु उससे भी पहले जब वयःसन्धि में उनका अल्हड़पन मुखरित हो रहा था । कुछ भूली बातें भूला अभ्यास भय की चोट खाकर ऊपर उठा और उनके पांव की गति नाच की ताल पर आप से आप चल पड़ी । एक विचित्र नाच जिसमें मस्तिष्क हृदय की और हृदय मस्तिष्क की शरण मांग रहा था । एक अचेतन सी अवस्था जहां आत्मा .... उस पक्षी की भांति जो अपने को व्याघ्र के चंगुल में फँसा हुआ पाकर तड़प रहा हो, प्रतीत हो रही थी । आंखों में दहशत और पापपूर्ण वासना लिये वे हूण सिपाही उनकी ओर बढ़े । उनके समीप आने पर हतभागी भिक्षुणियों ने अपनी गर्दन झुका ली ताकि वे अपनी खड़ग के एक ही वार से उनके इस पापपूर्ण अध्याय को समाप्‍त कर दें । परन्तु उन दुष्टों ने उनको मारने के स्थान पर उन्हें शीघ्रता से अपनी क्रूर बाहों में भर लिया और पशुत्व का परिचय देने लगे ।

वायु का वेग थम गया । एक घुटन सी वातावरण में छा गई थी । यूं लगता था मानो कोई भयंकर आंधी आने वाली है । पास ही भगवान् बुद्ध की मूर्ति धूलि में पड़ी हुई थी । सहसा वन की ओर से सनसनाता हुआ एक बाण आया और एक हूण की टांगों को छीलता हुआ पृथ्वी में गड़ गया । झाड़ियों में से एक घायल सिंह लड़खड़ाता गर्जता हुआ नीचे लुढ़का, तड़पा और ठंडा हो गया ।

छहों हूण उठ खड़े हुए और बाण आने की दिशा की ओर देखने लगे । दूर एक बांका सजीला युवक अपने घोड़े पर बैठा भागा चला आ रहा था । एक हूण अपने स्थान से चलकर उस मृत सिंह की पसलियों से बाण खींचने लगा । घुड़सवार ने दूर से उसे ललकारा और चिल्लाया "इसे मत छेड़ो, यह मेरा शिकार है"।

परन्तु हूण ने उसकी परवाह न की, बाणों समेत उसने मृत सिंह को अपनी भुजाओं पर उठा लिया ।

"मैं कहता हूं उसे यहीं रख दो ।"

"बको मत" विजय तथा बल के घमण्ड में चूर हूण सैनिक ने सवार को झिड़का और मृत सिंह को भुजाओं में लिए उसके समक्ष तनकर खड़ा हो गया । क्रोधाभिभूत सवार अपने घोड़े से कूदा और उसने अपनी खड़ग के एक ही वार से उस विदेशी हूण के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया । उसकी गर्दन उछलकर दूर जा गिरी और धड़ शेर के साथ ही जमीन पर लुढ़क गया ।

शेष पांचों हूण जिन्हें सवार ने अभी तक देखा ही नहीं था, अपने साथी का इस प्रकार अन्त देख क्रोध में चीखते हुए उस युवक पर प्रहार करने के लिए उसकी तरफ दौड़ पड़े और उन्होंने सवार को घेर लिया । इनके आने से पूर्व ही सवार युद्ध के लिए तैयार हो चुका था । उसने अपनी ढ़ाल कन्धे से उतारकर हाथ में पकड़ ली तथा निर्भीक होकर उन पांचों के साथ युद्ध करने लगा ।
 
Back
Top