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आजाद पंछी जम के चूस complete

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उसकी नजर जब रामू काका से टकराई तो उनके चहरे में एक-एक अजीब सी, शरारत थी और एक मुश्कान भी वो झेप गई और वही खड़ी रही तब तक जब तक वो बाहर नहीं चले गये

जल्दी से चाय पीकर वो तैयार होने लगी बहुत ही सलीके से तैयार हुई थी आज वो टाइट चूड़ीदार था और कुर्ता जो की उसके शरीर के हर भाग को स्पष्ट दिखाने की कासिश कर रहा था हर उतार चढ़ाव को साफ-साफ दिखा रहा था लाल और ब्लच का कॉंबिनेशन था पर ज्यादा ब्लैक था

सिल्क टाइप का कपड़ा था और उसपर एक महीन सा चुन्नी उसके इस शरीर पर गजब ढा रहा था बालों को सिर्फ़ एक क्लुचेयर के सहारे सिर्फ़ पीछे बाँध लिया था और बाकी के खुले हुए थे जोकि उसके स्लीव्ले कुर्ते से होकर गले के कुर्ते के ऊपर पीठ तक आते थे कसे हुए कुर्ते के कारण पीछे से गजब की खूबसूरत लग रही थी आरती एक बार फिर से दर्पण में अपने को निहारने के बाद वो झटके से अपना पर्स उठाकर कमरे से बाहर निकलकर लगभग उछलती हुई सी सीढ़िया उतरने लगी थी सोनल को डाइनिंग स्पेस पर बैठे देखकर वो थोड़ा सा सकुचा गई थी और धीरे-धीरे कदम बढ़ा कर डाइनिंग टेबल पर आ गई थी

सोनल- मम्मी,आज बहुत देर तक सोई आप

आरती- वो रात नींद नहीं आई इसलिए

सोनल- हाँ… जल्दी सो जाया करो मम्मी नहीं तो सुबह के काम में फरक पड़ जाएगा हाँ…

कामया- ह्म्म्म

और झुक कर अपना खाने में जुट गये थे दोनों बातें कम और जल्दी ही दोनों खाना खतम करके बाहर की ओर हो लिए बाहर लाखा काका नजर नीचे किए दोनों का इंतजार करते मिले सोनल और आरती के बैठने के बाद झट से ड्राइविंग सीट पर जम गया (रवि में लाखा को उसकी गैर हाजिरी में शोरूम छोड़ने का काम दिया था)

सोनल- लाखा एक काम कर पहले मम्मी को फैक्टरी छोड़ देते है और जरा मुझे मार्केट की ओर ले चल थोड़ा काम है

लाखा- जी

सोनल- एक काम करते है मम्मी आपको फैक्टरी छोड़ देती हूँ पहले, फिर मुझे थोड़ा मार्केट में काम है जाते हुए आपको लेते हुई चलूँगी।

आरती- पर क्या तुम वापस आओगी

सोनल- हाँ… क्यों मम्मी।

आरती- नहीं वो में सोच रही थी कि तुम शोरुम चले जाना जब मुझे आना होगा में तुमको फोन कर दूँगी तो तुम गाड़ी भेज देना

सोनल- यह भी ठीक है मम्मी।

आरती- हम्म

और गाड़ी अपनी रफ़्तार से फैक्टरी की ओर दौड़ पड़ी फैक्टरी के बाहर पहुँचते ही वहां एक सन्नाटा सा छा गया था मेमसाहब की गाड़ी जो थी सब थोड़ी देर के लिए अटेन्शन में थे फिर दो एक आदमी दौड़ते हुए गाड़ी की ओर आए सोनल के साथ आरती भी उतरी जैसे कोई अप्सरा हो हर किसी की नजर एक बार तो आरती के हुश्न के दीदार के लिए उठे ही थे और कुछ आहे भर कर शांत भी हो गये थे

सोनल के साथ आरती भी आगे बढ़ी और इधर उधर देखती हुई अपने आफिस की ओर बड़ी थी पीछे-पीछे बहुत से लोग सोनल को ओर उसे कुछ समझाते हुए आगे पीछे बने हुए थे थोड़ी देर बाद ही सोनल अपने काम से निकल गये और आरती अकेली रह गई आज पहला दिन ऐसा था जब आरती अपने आप फैक्टरी के काम को अकेला देखने के लिए रुकी थी नहीं तो हमेशा ही रवि या फिर सोनल उसके साथ ही होते थे

आफिस में हर कोई आरती मेडम के आस-पास होने की कोशिश कर रहा था हर कोई अपने आवाज में सहद घोल कर और आखों में और चेहरे में एक मदमस्त मुश्कान लिए आरती मेडम को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा था आरती यह बात अच्छे से जानती थी कि क्यों आज लोग उसके आस-पास और इतनी सारी बातें उससे शेयर कर रहे है कोई कुछ बताने की कोशिस कर रहा था तो कोई कुछ हर कोई अपनी इंपार्टेन्स उसके सामने साबित करने की कोशिश

कर रहा था थोड़ी देर में ही आरती को जो जानना था वो जान चुकी और एक-एक करके सारे लोग उसके केबिन से विदा हो गये अब वो अकेली रह गई थी थोड़ी देर में ही आफिस में सन्नाटा सा छा गया था बाहर चहल पहल थोड़ी सी रुक गई थी वो थोड़ा सा सचेत हुई कि क्या बात है पर जब घड़ी में नजर गई तो लंच टाइम था शायद इसलिए सबकुछ शांत था वो भी चहल कदमी करती हुई अपने केबिन से निकली और आफिस को देखती हुई बाहर की ओर चल दी दौड़ता हुआ उसका चपरासी उसके पीछे आया

चपरासी- मेडम

आरती- हाँ…

चपरासी- जी कुछ

आरती- नहीं नहीं आप जाइए हम थोड़ा सा काम देखकर आते है

चपरसी- जी और चपरासी हाथ बाँधे हुए अपनी नजर नीचे किए हुए पीछे हट गया आरती अपने आफिस से निकलते ही उसने एक नजर पूरी बिल्डिंग में घुमाई हर कही कोई ना कोई काम कर रहा था कुछ लोग खाना खा रहे थे आरती को देखकर थोड़ा सा चौके जरूर पर आरती के हाथ ऊपर कर करने से वो सहज हो गये और अपने काम में लगे रहे घूमते हुए आरती थोड़ा बाहर की ओर निकली और सामने का काम देखते हुए थोड़ा और बाहर वो देखना चाहती थी कि फैक्टरी सामने से कैसा देखता है सो वो थोड़ा और आगे बढ़ कर सामने से उसे देखती रही वो उसके

बारे में भी थोड़ा बहुत जानने की कोशिस करना चाहती थी आगे बढ़ते हुए साइड की ओर देखती जा रही थी छोटे छोटे झुग्गी टाइप बने हुए थे साइट पर काम करने वाले वर्कर वही रहते थे कुछ गंदे से बच्चे वही रेत और मिट्टी में खेल रहे थे शायद माँ बाप दोनों काम पर थे इसलिए उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था थोड़ा आगे चलने पर वो थोड़ा सा ठिठकी उसे कुछ याद आया वो थोड़ा सा रुकी और एक बार अपने चारो ओर देखती रही उसके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई हथेलिया आपस में जुड़ गई थी और कदम भारी से हो चले थे उसपर किसी की नजर नहीं थी सब अपने काम में व्यस्त थे एक बार फिर उसके कदम आगे की ओर बढ़े और पास में खेल रहे कुछ बच्चो को उसने हँसकर देखा एक छोटी सी लड़की उसके जबाब में मुस्कुराई

आरती- यहां रहती हो

वो लडकी- (मुस्कुराते हुए अपना सिर हिला दिया )

आरती- और कौन रहता है यहां

वो लड़की- (कुछ नहीं कहा बस मुस्कुराती रही )

आरती- अच्छा वो भोला कहाँ रहता है (आरती का गला सुख गया था पूछने में )

झट से पूछकर वो एक बार पीछे घूमकर देखने लगी शायद उसे डर था कि किसी ने उसकी आवाज तो नहीं सुनी हो।
 
उस लड़की ने अपने छोटे से हाथों को उठाकर एक कोने में बनी थोड़ी सी मजबूत सी घर की ओर इशारा कर दिया और आपस में फिर से खेल में मस्त हो गये और एक दूसरे के पीछे भागने लगे ।आरती उस ओर देखती रही बिल्कुल शांत था वहां का माहॉल बस बच्चो के खेलने और साइट से कुछ आवाजें इधार जरूर आती थी वो अपने कदम को धीरे-धीरे उस ओर बढ़ा रही थी जाने क्यों वो भोला को ढूँढ़ रही थी क्या काम था उसे वो तो अचानक ही उसे याद आ गया था कि रवि ने कहा था कि कन्स्ट्रक्षन साइट वाले घर में नहीं जाना तो आखिर वो रहता कहाँ है शायद यही देखना चाहती थी वो

थोड़ा आगे बढ़ कर वो जब उस कमरे के सामने पहुँची तो दरवाजा भिड़ाया हुआ सा था थोड़ा बहुत खुला था एक माटमेला सा परदा भी था पकिंग वुड से बना दरवाजा सिर्फ़ कहने को दरवाजा था और कुछ नहीं अंदर कोई हलचल नहीं थी ना कोई आवाज वो थोड़ा सा झुक कर उस दरवाजे के पास जाके हाथों से एक थपकी दी कोई आवाज नहीं शायद नहीं है आरती ने सोचा फिर भी मन नहीं माना एक जोर दार थपकी फिर दी

अंदर से एक तेज आवाज बाहर आई

भोला- कौन है बे

आरती सुन्न रह गई उस कड़कती हुई आवाज को सुनकर जानवर सा वर्ताब है इस भोला का तो सच में इंसान कम जानवर ज्यादा है यह वो बिना कुछ आवाज देकर वापस पलट गई जाने को पर पीछे से आवाज फिर आई

भोला- कौन है साले गोली मार दूँगा अंदर आ मादर चोद (भद्दी सी गाली देकर एक बार फिर से उसकी आवाज गूँजी )

आरती के हाथ पाँव फूल गये थे क्या करे वापस चल देती हूँ क्यों आई यहां मरने दो इसको मर ही जाना चाहिए इसे किसी जानवर से कम नहीं है इतनी बत्तमीजी पर कुछ करती इतने में झट से दरवाजा खुला और सिर्फ़ एक लूँगी पहने भोला उसके सामने अंधेरे में खड़ा था अंदर होने के कारण उसपर धूप नहीं पड़ रही थी और अंदर कोई इतना वेंटिलेशन नहीं था कि अंदर लाइट हो ढीली बँधी हुई लूँगी उसके कमर के चारो और बस झूल रही थी आरती को देखकर एक बार तो भोला भी सन्न रह गया पर एक मुश्कान उसके चहरे पर दौड़ गई और

भोला- आइए मेम साहब क्या बात है आज आप यहां कैसे

आरती थोड़ा सा सहज होकर अपने गले को तर करते हुए इधर उधर देखने लगी थी उसकी सांसें फूल रही थी और स्पष्ट दिख रहा था कि वो बेचैन है

भोला- आइए अंदर आइए यहां तक आई है तो थोड़ा सा पानी पीकर जाइए हाँ…

पर आरती वही खड़ी रही हिली तक नहीं वो अंदर जाना नहीं चाहती थी कितना गंदा सा था वो जगह ब्रिक्स से बना था ऊपर टीन की चद्दर थी रोशनी के नाम पर कुछ नहीं गंदी सी बदबू उसके नाक में घुस रही थी भोला दरवाजे के पास थोड़ी सी जगह बना के खड़ा था एक हाथ से अपनी लूँगी पकड़े जो कि शायद ढीली थी और एक हाथ से दरवाजे से टिक कर उसके सीने और कंधो पर अब भी पट्टी बँधी थी पेट के पास भी कमर के पास छिला हुआ था तभी भोला की आवाज ने उसे चोका दिया

भोला- वहां खड़ी रही तो कोई देख लेगा मेमसाहब कि आप यहां खड़ी है

और कुछ कहती या करती तब तक तो भोला के सख़्त हाथों ने उसे अंदर खींच लिया था वो लगभग चीखती हुई सी अंदर पहुँच गई थी उसकी चुन्नि उसके कंधे से, नीचे गिर पड़ी थी एक तरफ से और लड़खड़ाती हुई सी वो अंदर हो गई भोला ने पीछे से दरवाजा बंद कर दिया और उसके पास से गुज़रते हुए उसके गोल गोल नितंबों पर अपनी हथेलिया फेरते हुए वापस अपने बेड पर जाके लेट गया वैसे ही अधनन्गा

एक सिहरन सी दौड़ गई थी आरती के शरीर में पर हिम्मत करके

आरती- दरवाजा बंद क्योंकिया

भोला- खोल दीजिए मेमसाहब हमें क्या

पर आरती नहीं हिली खोल दो अगर किसी ने देख लिया तो यह कहाँ आ गई वो और क्यों और तो और इस भोला की हिम्मत तो देखो बिना कुछ कहे ही उसके शरीर को भी छू गया और वो कुछ नहीं कह सकी एक आवाज ने उसका ध्यान खींचा भोला अपने पैरों से बेड के पास पड़े हुए टीन के एक चेयर को खींच रहा था और ठीक बेड के पास ला के छोड़ दिया थोड़ा सा उठा और अपने हाथों से थोड़ा सा और आगे खींचा और आरती की ओर देखता हुआ

भोला----बैठिए मेमसाहब इस गरीब के घर में यही है बस

आरती हिली तक नहीं वो जाना चाहती थी पर ना जाने क्यों उसके कदम जम गये थे वो चाह कर भी अपने कदम को हिला नहीं पा रही थी उसकी सांसें फूल रही थी और नाक से सांस लेना दूभर हो गया था पर ना जाने क्यों वो वहां खड़ी थी और भोला आरती को लेटे लेटे देख रह आता लंबी सी खूबसूरत सी आरती काले रंग का टाइट चूड़ीदार पहने एक अप्सरा सी लग रही थी उसकी चुन्नि डल जाने के कारण उसकी गोल गोल गोलाइया उसे साफ-साफ देखाई दे रही थी वो लेटे लेटे उस सुंदरता का रस पान कर रहा था वो जानता था कि रवि यहां नहीं है और आरती आज फिर उसके पास क्यों आई है वो एक चरित्रहीन मनुष्य था लड़कियों और औरतों के बारे में उसे कुछ ज्यादा ही मालूम था किस औरत को कैसे और कहाँ चोट करने से वो उसके काबू में आएगी वो जानता था ।

एक हाथ बढ़ा कर उसने फिर से आरती की कोमल सी हथेलियो को पकड़ा और खींचते हुए उसे बेड के पास खींच लिया आरती पहले तो थोड़ा सा जोर लगाकर खड़ी रही पर भोला के शक्ति के आगे वो कुछ ना कर सकी खींचती हुई वो बेड के पास पहुँच गई

आरती- नहीं प्लीज़

भोला- बैठिया ना मेमसाहब कहाँ खो गई है आप कब तक खड़ी रहेंगी

और अपने पैरों से फिर से उस टीन के चेयर को और भी बेड के पास खींच लिया वो अब लगभग उसके पेट के पास पड़ा था आरती का हाथ अब भी भोला की सख़्त गिरफ़्त में था और वो उसे खींचता हुआ सा उस चेयर पर बैठने की कोशिश कर रहा था आरती ने भी जोर लगाना छोड़ दिया और ना चाहते हुए ही उस चेयर पर बैठ गई थी उसके घुटने बेड की ओर थे और वो बेड को छू रहे थे बैठने में थोड़ी सी असुविधा हो रही थी पर पता नहीं क्यों वो कुछ भी नहीं कर पा रही थी वो चाहती तो कब का यहां से निकल जाती या फिर उस भोला को खींचकर एक चाँटा लगाती और उसकी गुस्ताखी की सजा दे सकती थी पर क्यों वो चुप थी उसे नहीं पता बल्कि वो अपनी सांसों को कंट्रोल करती जा रही थी उसकी सांसें जब से वो यहां आई थी लगातार उसका साथ नहीं दे रही थी वो फुल्ती ही जा रही थी

 
वो बड़े मुश्किल से अपने सांसों को अपने अंदर थामे हुए थी और निरंतर अपने से लड़ते हुए अपने को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रही थी उसने बैठे ही भोला ने उसकी जाँघो में एक प्यार भरी थपकी दी और मुस्कुराते हुए

भोला- हो यह हुई ना बात बड़ी अच्छी लड़की हो तुम

अचानक मेम्साब से लड़की और वो भी अच्छी यह क्या हो रहा है आरती का शरीर अब सनसना रहा था भोला के गरम-गरम और लोहे जैसे कठोर हाथों ने जब उसके जाँघो को थपकी दी तो वो उसके चूड़ीदार को छूकर उसकी जाँघो तक और बहुत अंदर तक एक अजीब सी सिहरन पैदा कर गई थी चूड़ीदार का कपड़ा भी बहुत मोटा नहीं था कि वो भोला के हाथों की गर्मी को उसके स्किन तक ना पहुँचा सके वो तो लगता था कि सिर्फ़ उसकी स्किन को ही छूकर बैठ गया था

आरती एक बार भोला की ओर देखा और बैठकर अपनी नजरें झुका ली भोला बेड पर लेटा हुआ था सीधा हाथ अब उसके सिर के नीचे था और उल्टे हाथ से वो अपनी कमर से लेकर अपने सीने तक को सहलाते जा रहा था काले काले बाल और उसपर सख़्त मसमेशियो में घिरा वो दानव और बीच बीच में कही कही पट्टियाँ और लाल खून के निशान थे उसके शरीर में आरती का दिल बड़े जोरो से धड़क रहा था पर वो कुछ नहीं कर सकती थी वही किसी बुत की तरह से बैठी आने वाले पल का इंतजार करने के सिवा अब उसकी नजर थोड़ी साफ हो गई थी उसने एक बार भोला की ओर देखा वो अब भी उसे ही एक भूखी नजर से देख रहा था वो झेप गई और कमरे में इधर उधर देखने की कोशिश करने लगी थी बेड के पास एक दुनाली बंदूक रखी थी जो शायद उसकी ही थी और जमीन पर कुछ शराब की खाली बोटल थी कुछ छोटे बड़े प्लेट थे जो कि झूठे थे और कुछ में खाने के बाद सब्जी और हल्दी के दाग अब तक साफ देख रहे थे छोटे प्लेट में शायद कुछ नमकीन के आवसेश बचे हुए थे पूरा कमरा एक अजीब सी दुर्गंध लिए हुए था कही से रोशनी नहीं थी खिड़की भी बंद थी और दरवाजा भी उनके बीच से होती हुई कुछ रोशनी अंदर तक आती थी बस वही थी इतने में भोला की आवाज उसे सुनाई दी

भोला- क्या देख रही है मेमसाहब

आरती-

बस सिर हिला दिया ना करते हुए

भोला- मेरा जीवन तो मेमसाहब आप लोगो के लिए है

और एक अजीब सी हँसी से पूरा कमरा गूँज उठा वो अब भी आरती को घूरता हुआ अपने छाती और पेट को सहला रहा था और एक अजीब सी निगाहे आरती की ओर डाले अजीब सी बातें कर रहा था

भोला- कैसे आई थी मेमसाहब यहां गरीब की कुटिया में हाँ…

आरती क्या कहती कि क्यों आई थी वो एक बार भोला की ओर देखा और फिर जैसे-जैसे वो अपने हाथ अपने शरीर पर चला रहा था उस ओर गोर से देखने लगी फिर अचानक ही झेप कर अपनी निगाहे फेर ली

भोला- हाँ… हाँ… ही ही देखिए मेमसाब सब कुछ आपका ही दिया हुआ है और सबकुछ आपका ही है ही ही ही

आरती को अब थोड़ा सा गुस्सा आ रहा था कुछ नहीं कह रही है तो वो बढ़ता ही जा रहा है जो मन में आ रहा था कहे जा रहा था

आरती- फालतू बातें मत करो (

उसके आवाज में कड़कपन था जो की शायद भोला ने भी पहली बार सुना था थोड़ा सा चुप होकर वो फिर से आरती की ओर देखता हुआ मुस्कुराते हुए अपने सीने से हाथों को घिसते हुए पेट तक ले जाने लगा था उसकी नजर कमी अपर ही टिकी थी और पेट के बाद वो अपनी कमर के चारो ओर अपनी हथेलिया को घुमाने लगा था

भोला- तो कहिए मेमसाहब क्या सेवा करू और कैसे हाँ… ही ही ही

आरती- चुप

भोला- क्या मेमसाहब हम कुछ कहते है तो डाट देती है और आप कुछ कहती नहीं

और भोला का सीधा हाथ फिर से एक बार आरती की जाँघो को छूने लगा और धीरे-धीरे सहलाने लगा था वो धीरे-धीरे अपने हाथों को उसकी जाँघो के जाइंट की ओर बढ़ा रहा था और एकटक आरती के चहरे की ओर देखता भी जा रहा था आरती की आखें भोला की हरकतों को अनदेखा नहीं कर पाई जैसे ही उसका हाथ उसकी जाँघो से टकराया आरती का एक हाथ उसके हाथों पर आ गया और जोर लगाकर उसे हटाने की कोशिश करने लगी थी उसके चहरे में भय के भाव साफ-साफ देखे जा सकते थे वो बार-बार भोला की ओर बड़े ही मिन्नत भरे नजर से देख रही थी पर वो राक्षस तो जैसे दीवाना हो गया था

मुस्कुराते हुए अपने हाथों को ठीक से सहलाते हुए वो एकटक आरती के चहरे की ओर ही देखे जा रहा था

आरती का जोर काम नहीं आ रहा था पर वो क्या करती बैठी रही रुआंसी सी होकर उसे देखकर साफ कहा जा सकता था कि अब कभी भी रो देगी पर भोला का हाथ अचानक ही उसकी जाँघो से हट गया और वो सकते में आ गई गई एक बार उसके तरफ देखती हुई वो अपने कुर्ते को खींचते हुए फिर से जगह में बनाने की कोशिश करने लगी भोला अपने हाथ को फिर से माथे के नीचे ले गया और मुस्कुराते हुए देखता रहा अपने दूसरे हाथों को वो अब भी अपने शरीर पर ही चला रहा था हाँ… थोड़ा और नीचे की ओर ले जाने लगा था ढीली बँधी हुई लूँगी ओपचारिकता भर रह गई थी उसके लण्ड के ऊपर का हिस्सा लूँगी से बाहर किया दिख रहा था और घने बालों का गुच्छा तो साफ-साफ वो जान बूझ कर ऐसा कर रहा था बार-बार आरती की ओर देखता हुआ वो ऐसा दिखा रहा था कि जैसे वो उसके शरीर को नहीं बल्कि आरती के शरीर को सहला रहा था उसकी आखें बिल्कुल पत्थर के जैसे हो गई थी और आखों में एक वहशीपन ने जनम लेलिया था आरती का बुरा हाल था वो वहां कैसे बैठी थी वो नहीं जानती थी पर हाँ… उठने की कोशिश तो उसने नहीं की थी सांसों को कंट्रोल करने की कोशिश में ही लगी रही और भोला अपनी कोशिश में लगा था बार-बार अपने कमर के नीचे की ओर उसका हाथ चला जाता था तभी उसने वो किया जिसका की आरती ने सपने में भी नहीं सोचा था एक झटके से अपने बड़े से लण्ड को लूँगी के बाहर निकाल कर अपने हाथों से मालिश करने लगा वो अपनी हथेलियो को बार-बार उसके लंबाई के साथ-साथ ऊपर और फिर नीचे की ओर ले जाता था आरती की नजर जैसे ही उसके लण्ड पर पड़ी जितनी सांसें उसने रोक रखी थी एक बार में ही बाहर आ गई थी घबराहट से या फिर उत्तेजना से यह तो वही बता सकती थी पर भोला के होंठों पर एकलंबी सी मुस्कुराहट दौड़ गई थी

उसका एक हाथ [फिर से आरती की जाँघो तक आ गया था और अपने सिर को तकिये को फोल्ड करके टिका लिया था आरती की सांसें फूलने लगी थी और फिर से वो अपने हाथों के जोर से भोला के हाथों को हटाने की कोशिश करने लगी थी भोला भी कौन सा हटने वाला था चुपचाप अपने काम में लगा था वो बड़ी ही सरलता से अपने हाथों को घुमाकर अपनी सप्नीली रचना को अपने हाथों से सवारने में लगा था कपड़े के ऊपर से भी उसे आरती की नरम और मुलायम सी जाँघो का स्पर्श उसे अच्छा और लुभावना लग रहा था जितनी भी औरत उसकी जिंदगी में आई होंगी वो तो शायद इस कपड़ों से भी ज्यादा खुरदूरी थी या फिर सख़्त थी पर आरती मेडम का तो कोई सानी नहीं थी इतनी चिकनी थी कि हाथ रखते ही फिसल जाते थे भोला किसी तरह से अपने उत्तावलेपन को ढँके हुए और दबाए हुए मेमसाहब की जाँघो को सहलाते हुए एकटक उसकी और देखे जा रहा था और आरती जो की अपने पूरे जोर लगाने के बाद भी जब भोला के हाथ को को नहीं हटा पाई तो अपने पैरों के जोर से उस टीन की चेयर को ही पीछे की ओर धकेला पर वो गिर जाती अगर भोला के दूसरे हाथ ने कस कर उसके कलाईयों को पकड़ नहीं लिया होता आरती अब पूरी तरह से भोला के गिरफ़्त में थी

भोला- क्या मेमसाहब गिर जाती ना

आरती- प्लीज मत करो प्लीज़

उसकी आवाज में एक गुजारिश थी पर मना कही से भी नहीं था वो चाहती थी कि भोला उसे छोड़ दे पर कोशिश नहीं थी उसकी नरम नरम हथेलिया अब पूरी तरह से भोला के हाथों के ऊपर थी और दूसरा हाथ उसकी गिरफ़्त में था वो भोला की तरफ देखती पर क्या देखती वो तो अधनन्गा सा उसे ही घूर रहा था उसके चेहरे में जो वहशीपन था वो जानकर भी उसकी आखों से आखें नहीं मिला पा रही थी मन्नत तो कर रही थी पर जान नहीं थी उसका लण्ड आजादी से बार-बार झटके ले रहा था वो उसे ढकने की कोशिश भी नहीं कर रहा था बल्कि उसके हिलने से उसकी लूँगी और भी नीचे खिसक गई थी

आरती- प्लेआस्ीईईईईई नहियीईई पल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लीीआआआआअसस्स्स्स्स्स्स्सीईईईईई हमम्म्ममममममममममममम

भोला की उंगलियां आरती की जाँघो के जोड़ तक शायद पहुँच गई थी इसलिए मनाही के साथ-साथ एक सिसकारी भी उसके मुख से उस कमरे में गूँज गई थी भोला बड़े ही प्यार से आरती की जाँघो को सहलाते हुए धीरे-धीरे उसकी जाँघो के जाइंट तक पहुँच गया था और अपनी उंगलियों से उसे छेड़ रहा था आरती को उसकी उंगलियों के नाखून जैसे ही टच हुए वो थोड़ा और आगे की ओर हो गई और अपनी जाँघो को खोल दिया ताकि उसे नाखून ना टच हो पर भोला को लगा कि आरती ने उसे रास्ता दिया हैं वो और भी आगे की ओर बढ़ा और धीरे से अपनी उंगलियों से आरती की चुत को छेड़ता रहा एक गीला पन सा उसकी उंगलियों से टकराया वो जानता था कि आरती को बस थोड़ा सा उत्तेजित करने भर की देर है वो मना नहीं कर पाएगी दूसरे हाथ में आरती की नरम नरम हथेलिया अब तक उसकी गिरफ़्त में थी जो की अब वो धीरे-धीरे अपने लण्ड की ओर खींचने लगा था जो की आरती भी लगा रहा था पर वो जार लगाकर अपनी कलाईयो को छुड़ाने की कोशिश भी कर रही थी पर उसमें उतनी जान नहीं बची थी उसके हथेलिया लगभग उसके लण्ड तक पहुँच ही चुकी थी और पीछे की ओर से उसकी हथेलियो पर टच भी हो गये थे वो कुछ ना कर पाई थी और जो कर पाई थी वो था कि अपनी मुट्ठी को कसकर बंद करके अपनी कलाईयों को घुमाने लगी थी कि वो उससे टच ना हो पर भोला की ताकत के सामने वो कहाँ तक टिकती आखिर में वही हुआ जो की होना था भोला अपने मकसद पर कामयाब हो गया था आरती की हथेलिया उसके लण्ड को छू गई थी और वो अपने हाथों के जोर से आरती की हथेलियो को अपने लण्ड पर घिसने लगा था
 
भोला- हमम्म्म छू लो मेमसाहब कुछ नहीं करेगा आपके लिए बेताब है प्लीज़ मेमसाहब

आरती- नहीं प्लीज छोड़ो मुझे

भोला- थोड़ी देर मेमसाहब प्लीज़ थोड़ी देर के लिए नहीं तो यह शांत नहीं होगा

आरती- नहीं प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज कोई आ जाएगाआआआआआअ सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्शह

भोला- नहीं मेमसाहब कोई नहीं आएगा कोई नहीं आता यहां और मेरे कमरे में साले को मरना है क्या आप चिंता मत करो मेमसाहब

आरती- प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्शह

पर वो हार चुकी थी उसकी कालाई अब दर्द करने लगी थी अब उसमें ताकत नहीं बची थी भोला की पकड़ इतनी मजबूत थी की उसकी नाजुक कलाई टूट ही जाएगी उसने धीरे से बड़े ही अनमने मन से उसके लिंग को पकड़ लिया और धीरे से दबाने लगी

आरती- दर्द हो रहा है मेरा हाथ छोड़ो प्लीज

रुआंसी सी आरती के मुख से यह आवाज बड़े ही धीरे से निकली।

भोला ने झट उसके हाथ को छोड़ दिया और

भोला- माफ करना मेमसाहब गलती हो गई ध्यान नहीं दिया था क्या करू आपको देखता हूँ तो पागल हो जाता हूँ

जैसे ही भोला की गिरफ़्त उसकी कालाई से छूटी उसने झट से अपने हाथों को खींच लिया और उसे दूसरे हाथ से सहलाने लगी पर भोला भी कम नहीं था झट से अपने सीधे हाथों का जोर्र उसकी चुत में बढ़ा दिया और आरती झट से थोड़ा सा आगे हो गई दोनों हाथ उसके सीधे हाथ को रोकने को पर एकटक देखती हुई भोला की आखों से वो आखें नहीं मिला पाई भोला की आखों को देखकर उसे फिर से उसके लण्ड की ओर देखा

भोला- क्यों छोड़ दिया मेमसाहब प्लीज।

आरती ने बिना कोई ना नुकुर के थोड़ा सा आगे बढ़ कर उसके लण्ड को सीधे ही अपनी कोमल सी नाजुक सी हथेलियो के बीच में ले लिया और बहुत धीरे-धीरे दबाते हुए उसकी गर्मी और कडेपन के एहसास को अपने जेहन में समेटने लगी उसकी सांसें तो तेज चल ही रही थी पर अब तो जैसे धड़कन ज्यादा तेज हो गई थी उसकी चुन्नि तो कभी की उसकी जाँघो के ऊपर गिर चुकी थी और उसकी चूचियां कुर्ते के अंदर से बाहर की ओर निकलने को आतुर थी।

साँसे रुक रुक कर चल रही थी थोड़ी सी हल्की सी होंठों से एक बार फिर से उसकी आवाज निकली

आरती- प्लीज़ मत करो नाआआ रुक जाओ प्लीज़

भोला- हाँ… तो दा सा मेमसाहब बहुत मन कर रहा है प्लीज़

आरती- प्लीज नहियीईई प्लीज तुम्हारे नाख़ून लग रहे है

झट से भोला के हाथ उसकी चुत से अलग हो गये थे और आरती जैसे एक बार फिर से अधर में लटक गई थी।

साँसे एक बार फिर से थम सी गई और आखें एक बार फिर से भोला के चहरे पर क्यों इतनी चिंता करता है अगर लग रहा था तो लगे पर उसे ऐसे नहीं रुकना चाहिए था क्यों रुक गया पर अगले ही पल वो फिर से चौक गई थी भोला उन्ही उंगलियों को अपनी नाक के सामने ले जा कर सूंघने लगा था और फिर अपनी जीब को निकलकर थोड़ा सा चाट कर आरती की ओर देखता रहा। आरती की हथेलिया अब भी उसके लण्ड पर ही थी और धीरे-धीरे अपने आप उसका कसाव उसपर बढ़ता ही जा रहा था और उसे पता भी नहीं चला पता चला तो सिर्फ़ भोला को क्योंकी उस नरम नरम और कोमल उंगलियों की मालकिन ही थी जिसे वो अब तक अपने संपनो में देखता रहा था और जाने कितनी औरतों के साथ संभोग कर चुका था वो पड़े पड़े अपने दाँये हैंड को फिर से आरती की जाँघो तक ले आया और धीरे-धीरे फिर से उन गोल गोल और कोमल सी जाँघो को फिर से सहलाने लगा बड़े ही प्यार से वो जानता था कि अब आरती भी गरम हो चुकी थी उसके हाथों के कसाव से ही उसे पता चल रहा था और उसके हाथोंके सहलाने से भी आरती के चेहरे पर हर उतार चढ़ाव को वो निरंतर भाँपने में लगा था वो थोड़ा सा और आगे की ओर हो गया था ताकि वो आरती के और नजदीक हो सके उसके पास होते ही आरती के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई थी क्योंकी आरती के पैर तो बेड से टच थे ही भोला के पास आते ही उसके पेट और सीने के बाल चूड़ीदार पर से होते हुए उसकी टांगों से टच होने लगे थे वो शिहरन से भर उठी थी पर हर बार अपने सांसों को कंट्रोल करती हुई बैठी रही थी पर जैसे ही भोला की उंगलियां फिर से उसके चुत के पास पहुँची वो और नहीं रुक पाई थी एक जोर दार सांस उसके मुख और नाक से एक साथ निकली जो कि एक सिसकारी के रूप में पूरे कमरे को गूँज चुकी थी वो आरती का समर्पण था की इच्छा पता नहीं पर हाँ भोला अब फ्री था उसके हाथों को रोकने के लिए इस बार आरती के हाथ नहीं थे ना जोर लगा रहे थे और नहीं मना कर रहे थे वो तो बस अब उसके बालों के गुच्छे से भरे हुए सख़्त और मजबूत कलाईयो को सहलाते जा रहे थे और अपने चहरे को ऊपर उठाकर अपने अंदर बहुत सी सांसों को भरने में लगी थी

उसकी नजर अब बंद थी पर जानती सब थी कि क्या हो रहा था पर अपनी शरीर में उठ रही काम अग्नि के हाथों मजबूर थी उसकी जांघे अब बहुत खुल चुकी थी और वो अपनी चेयर से आगे की ओर भी होने लगी थी भोला के सख़्त और मोटे-मोटे उंगलियां उसकी चुत को चूड़ीदार के ऊपर से छेड़ रहे थे जो कि उसके अंदर के तूफान को जनम दे रहा था जिसे अब शांत करना ही था और वो ही इसे शांत कर सकता था अगर भोला चाहता तो एक ही झटके में आरती की अपने ऊपर खींच सकता था और वही अपने बेड पर लिटाकर उसके साथ वो सब भी करसकता था पर नहीं उसने ऐसा नहीं किया कर रहा था तो बस इतना की वो आरती की उत्तेजना को और भी बढ़ा रहा था

और आरती उसके बहाने के तरीके में बढ़ती जा रही थी जैसा वो चाहता था उसे करने दे रही थी हाँ उसकी उत्तेजना को जानने का एक ही तरीका था उसके हाथों में जो कुछ था उसे यानी कि भोला का लण्ड जो कि अब आरती की नरम उंगलियों के बीच में बहुत ही कसे हुए सा प्रतीत हो रहा था जैसे वो उसे निचोड़ कर रख देना चाहती थी और जोर-जोर से निचोड़ती ही जा रही थी उसकी सांसें लेने के तरीके से ही लगता था कि वो शायद बहुत थकी हुई है और जोर-जोर से सांसें लेती जा रही थी रुआंसी सी होकर कई बार तो खाँसती भी थी पर कोई मनाही नहीं और नहीं कोई ना नुकर हाँ थोड़ा और आगे होकर भोला की ओर इशारा जरूर हो जाता कि आगे बढ़ो सबकुछ तुम्हारा है पर भोला भी बहुत धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ा रहा था जिस चीज की इच्छा उसने की थी वो कोई मामूली चीज नहीं थी और नहीं रोज मिलने वाली चीज थी आरती वो तो एक नाचीज थी जिसकी कल्पना तो सिर्फ़ सपनो में ही हो सकता था या फिर कोई देवता ही कर सकता था किसी स्वर्ग की अप्सरा थी आरती उसकी नजर में सुडोल शरीर की मालकिन एक नम्र और मादक यौवन का मिस्रण लिए हुए एक चलती फिरती बला थी आरती जो कि उसके बेड के पास उसके आगे बढ़ने की राह देख रही थी
 
और भोला भी अपनी राह पर बढ़ता हुआ आगे की ओर बढ़ता ही जा रहा था वो अब आरती की जाँघो के बीच से आगे बढ़ा और अपनी हथेलियो को उसके पेट के ऊपर से एक बार घुमाकर वापस उसकी जाँघो पर ले आया आरती के मुँह से एक बार फिर से एक लंबी सी सिसकारी निकली और फिर वो हाँफने लगी थी भोला की हथेलिया अब आरती के खाली पेट तक भी पहुँचने लगी थी उसका कुर्ता भी अब उसके हाथों के साथ ही उठने लगा था उल्टे हाथों से वो आरति को संभालने के लिए उसके कंधे तक पहुँचा चुका था और कभी-कभी अपनी कमर को भी एक झटका दे देता था सीधे हाथ से आरती को सहलाते हुए जब वो अपनी उंगलियां उसकी कमर के चारो ओर उसकी खाली स्किन पर घुमाने लगा तो आरती का सिर धनुष की तरह ही पीछे हो गया था और भोला के मजबूत हाथो के सहारे के बिना वो शायद पीछे ही गिर जाती पर भोला ने उसे संभाल लिया था

खाली पेट पर आरती ने पहली बार भोला की खुरदरी उंगलियों का एहसास किया था वो उस स्पर्श को सहन नहीं कर पाई थी और अपनी जाँघो को और खोलकर और भी आगे की ओर हो गई थी भोला के लण्ड को कस कर पकड़ रखा था और उसकी पकड़ से अब तो भोला को भी तकलीफ होने लगी थी अपने उल्टे हाथ को वापस लाके उसने आरती की उंगलियों की पकड़ को थोड़ा सा हिलाया और उसे ऊपर नीचे करने का इशारा किया संपनो से जागी आरती की सिर्फ़ थोड़ी सी आखें खुली और फिर अपने कसाब को थोड़ा सा ढीला करके भोला के इशारे को समझ कर अपने हाथों को हल्के से ऊपर-नीचे करने लगी थी पर कसाव तो जैसे उसके बस में नहीं था वो कसता ही जा रहा था उस गरम-गरम लोहे की सलाख पर और तो और जब भोला की उंगलियां आरती के चूड़ीदारर की नाडे को छेड़ने लगी तो आरती जैसे होश में आ गई थी झट से उसका एक हाथ भोला के हाथों को रोकने में लग गया था

आरती- नहीं प्लीज

भोला-

आरती- नहीं प्लीज यहां नहीं कोई आ जाएगा प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज

भोला- कोई नहीं आएगा मेमसाहब प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज मना मत कीजिए प्लीज थोड़ी देर और

आरती सिर्फ़ अपने माथे को हिलाकर ही मना कर पाई थी अब की बार जैसे उसकी आवाज गले में कही गुम हो गई थी रुआंसी सी भोला को एकटक देखती जा रही थी और भोला उसके नाडे को खोल चुका था और धीरे से अपने हाथों से उसके चूड़ीदार को ढीलाकरके थोड़ा सा नीचे कर दिया था उसकी सफेद कलर की डिजाइनर पैंटी की सिर्फ़ एक डोरी उसके सामने थी और सफेद कलर की लेस से उसके गोल्डन ट्राइंगल को नीचे तक ढँकी हुई थी अपनी उंगलियों के जोर से भोला ने अपने हाथों को फिर से आरती की जाँघो के बीच में पहुँचा दिया इस बार सलवार उसके बीच में नहीं थी और था तो सिर्फ़ पैंटी का महीन सा कपड़ा जो की उसकी उंगलियों को उसकी चुत के गीले पन को छूने से नहीं रोक पाया था एक उंगली से उसने उसे भी साइड में कर दिया था और झट से अपनी उंगली को आरती के भीतर तक समा दिया था आरती के मुँह से सिसकारी की लड़ी सी लग गई थी और शरीर को पीछे की ओर धकेल्ति हुई अपनी कमर को और आगे और आगे की और धकेलने की कोशिश करने लगी थी शायद वो भोला की उंगलियों के पास जाना चाहती थी पास और पास सांसों का एक तूफान सा उसके अंदर जनम ले रहा था और वो लगातार उसकी नाक और मुख से सिसकारी और आअह्ह के रूप में निकल रही थी गर्म हुई आरती की हथेलिया अब भोला के एक हाथ को और भी अपने अंदर की ओर इशारा कर रही थी और दूसरे हाथ में जो कुछ था हो उसे निचोड़ते हुए बहुत ही तेजी से अपनी ओर खींचने लगी थी उसकी नमर नरम उंगलियों के स्पर्श से तो भोला अपने काबू से बाहर हो ही चुका था आज उसका दूसरा अनुभव था जब मेमसाहब की नाजुक ऑर कोमल उंगलियां उसके लण्ड को समेटे हुए थी पर इतनी कामुकता जो मेमसाहब के अंदर छुपी थी वो आज वो पहली बार ही देख रहा था वो अपनी उंगलियों का स्पीड धीरे-धीरे उसकी चुत में बढ़ने लगा था उसके गीले पन से वो जान चुका था कि आरती ज़्यादा देर की मेहमान नहीं है पर वो तो अपने काम में लगा रहा और आरती को जितनी जल्दी शांत कर सकता था करने की पूरी कोशिश करने लगा और उधर आरती भी अपने शिखर पर पहुँचने ही वाली थी उसके शरीर में आचनक ही एक बड़ी सी उथल पुथल मची हुई थी जैसे वो लगातार अपनी चुत की ओर जाते हुए महसूस कर रही थी वो एक झटके से आगे बढ़ी, और झट से अपने एक हाथ को अपने दूसरे हाथ से जोड़ दिया और भोला के लण्ड को पूरा का पूरा अपनी हथेलियो में समेटने की कोशिश करने लगी थी

हान्फते हुए कब वो भोला के ऊपर गिर पड़ी उसे पता ही नहीं चला और भोला के पसीने की बदबू या कहिए उस जानवर की खुश्बू जैसे ही उसकी नाक में टकराई वो एक असीम सागार में गोते लगाने लगी थी उसके हाथों की पकड़ अब धीरे-धीरे उस लण्ड पर भी ढीली होने लगी थी पर भोला के हाथों की रफ़्तार अब भी कम नहीं हुई थी इसलिए अपने को संभालते हुए उसने भी अपनी पकड़ फिर से उस मजबूत से लण्ड को फिर से अपनी गिरफ़्त में ले लिया और बड़ी तेजी से जैसे कि भोला का हाथ चल रहा था उसे चलाने लगी अचानक ही भोला की उल्टे हाथ की गिरफ़्त उसके कंधों से लेकर अपने दूसरे कंधो तक पहुँच गई थी और वो झुकी हुई उसके सीने से चिपक गई थी और भोला के लण्ड से गरम-गरम लावा सा उसकी कोमल उंगलियों को छूते हुए नीचे की ओर बह निकला भोला की पकड़ इतनी मजबूत थी कि आरती की सांसें ही रुक गई थी नाक में ढेर सारी पसीने की बदबू के साथ ही उसके दाँत भी भोला के सीने में घुसने की कोशिश करने लगे थे मुख से सांसें लेने की और भोला की पकड़ के आगे लाचार आरती और कर भी क्या सकती थी दोनों थोड़ी देर के लिए वैसे ही पड़े रहे भोला की पकड़ भी सख्ती से आरती की गर्दन के चारो ओर थी और हर झटके में बहुत सा वीर्य वो निकलता जा रहा था।आरती के कोमल हाथों की पकड़ भी उसके लण्ड पर वैसे ही थी जैसे की पहले थी और वही भोला के पेट और सीने के बीच में अपने सिर का सहारा लिए हुए लंबी-लंबी सांसें छोड़ती हुई वो नार्मल होने की कोशिश कर रही थी भोला का भी यही हाल था

लेटे लेटे बहुत देर बार उनके कानों में एक साथ ही बाहर की हलचल की आवाजें उन तक पहुँचने लगी थी आरती एकदम से सचेत हो उठी और बड़ी ही डरी हुई नज़रों से भोला की ओर देखने लगी थी पर भोला को जैसे कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था वो लेटे लेटे आरती के बालों के साथ खेल रहा था अपनी चौड़ी और खुरदरी हथेली को वो आरती के सिर पर घुमा रहा था और उसकी नाक से निकलने वाली सांसों को वो अपने शरीर में महसूस कर रहा था आरती के जोर लगाने से वो भी थोड़ा सा सचेत हुआ और आरती पर से अपनी पकड़ ढीली करदी

आरती थोड़ा सा स्ट्रॅगल करने के बाद उठकर अपनी चेयर पर ठीक से बैठने लगी और धीरे से अपनी हथेलियो को भी भोला के लण्ड से आजाद कर लिया अपनी हथेलियों में लगा हुआ वीर्य उसने बेड की चादर पर ही पोन्छ लिया और अपनी चूड़ीदार को पकड़कर ठीक करने लगी उसकी नजर भोला पर नहीं थी पर हाँ बाहर की आवाज पर जरूर थी डर था कि कोई आ ना जाए अपने कपड़ों को ठीक करते हुए जब वो खड़ी हुई तो भोला की नजर चली गई वो एकटक उसे ही देख रहा था उसकी आँखों में अब भी वही भूख थी जो पहले थी अब भी उसकी नजर उसे खा जाने को तैयार थी पर आरती को जाना था आफिस अगर यहां किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा वो अपने चूड़ीदार को बाँधने के बाद अपनी चुन्नि को नीचे से उठाया और जैसे ही अपने को ढकने लगी कि भोला के एक हाथ ने उसे ऐसा करने से रोक लिया

भोला- रुकिये ना मेमसाहब थोड़ी देर और

आरती- नहीं

भोला की गिरफ़्त चुन्नी से ढीली पड़ गई और आरती ने झट से अपने को ढँक लिया और खड़ी हो गई वो एक बार भोला की ओर देख रही थी और फिर बाहर के दरवाजे की ओर भी उसकी नजर चली जाती थी बाहर के शोर को सुनकर वो डरी हुई थी हिम्मत नहीं हो रही थी कि कैसे जाए बाहर और यह बदमाश तो वैसे ही लेटा हुआ था जैसे कोई चिंता ही नहीं था पर आरती के चहरे पर चिंता की लकीरे साफ देखी जा सकती थी वो कभी भोला तो कभी दरवाजे की ओर ही देख रही थी वो थोड़ा सा चलती हुई दरवाजे तक पहुँची और उसकी गैप से बाहर की ओर देखने लगी थी वहाँ लेबर लोगों का हुजूम लगा हुआ था जो शायद वही रहते है कोई बीड़ी पी रहा था तो कोई कुछ कर रहा था पर हर कोई बाहर ही था आरती के तो होश उड़ गये थे वो पलटकर भोला की ओर देखने लगी चेहरा रुआंसा सा हो गया था रोने को थी वो अब कुछ पल

वो भोला को देखती रही जो अब भी अपने आपको ढके बिना ही वैसे ही लेटा हुआ था उसका मुरझाया हुआ लण्ड भी इतना बड़ा था कि वो लगभग तैयार ही दिख रहा था पर कोई चिंता नहीं थी उसे

आरती- सुनो बाहर बहुत लोग है प्लीज़ उठो मुझे जाना है

भोला- मेमसाहब में तो यहां हूँ दरवाजा भी नहीं रोका है फिर

आरती लगभग दौड़ती हुई सी वापस बेड के पास पहुँची थी

आरती- प्लीज किसी ने देख लिया तो में मर जाऊँगी प्लीज मेरी मदद करो

जैसे भोला के शरीर में एक करेंट दौड़ गया था एक झटके से उठा और अपनी लूँगी को अपने कमर में बाँधने लगा एकटक नजर से वो आरति की ओर देखने लगता आरती डर के मारे थोड़ा सा पीछे की ओर हो गई थी

भोला-, मेरे होते मेमसाहब आप चिंता क्यों करती है साली पूरी दुनियां में आग लगा दूँगा लेकिन मेमसाहब आपको कुछ नहीं होने दूँगा ही ही ही
 
आरती डर के मारे अब तक सिहर रही थी उसकी आवाज उसके गले में ही अटक गई थी खड़ी-खड़ी उसकी टाँगें काँपने लगी थी कैसी मुसीबत में पड़ गई थी और यह भोला तो जैसे कुछ समझता ही नहीं सिर्फ़ डायलाग मार रहा है वो काँपती हुई सी खड़ी-खड़ी भोला की ओर बड़ी ही मिन्नत भरी नजरों से देख रही थी भोला उठकर उसके पास आया और अपने दोनों हाथो को जोड़ कर उसके गालों को अपने हथेलियो में भर लिया और एक नजर उस पर मार मारकर दरवाजे पर पहुँच गया और उसे खोलकर बाहर निकल गया आरती ने जल्दी से अपने को दरवाजे के सामने से हटा कर साइड में कर लिया और बाहर की आवाजें सुनने लगी कड़कती हुई भोला की आवाज ही सुनाई दे रही थी और फिर भगदड़ मची हुई थी

भोला- क्यों काम पर नहीं जाना क्या बहन के लोडो साले दिहाड़ी माँगते समय तो साले सबसे आगे खड़े रहोगे चलो यहां से और मुझे सोने दो

बाहर फिर से एकदम सन्नाटा सा छा गया था उसकी बड़ी बड़ी गालियाँ जैसे ही उन तक पहुँची सब यहां वहां हो गये थे कुछ देर बाद ही उसे भोला अंदर आके फिर से दरवाजा बंद करते हुए दिखा यह क्या कर रहा है दरवाजा फिर से क्यों बंद कर रहा है उसे जाना है पर आवाज ही नहीं निकली वो एकटक भोला की ओर देखती रही भोला दरवाजा बंद करके एक बार फिर से अपनी लूँगी को खोलकर उसके सामने ही ठीक किया और धीरे-धीरे आरती की ओर बढ़ा आरती झट से थोड़ा पीछे हट गई दीवाल से टिक गई थी अपने पैर जितना पीछे कर सकती थी कर लिया था अब उसके पास जाने की कोई जगह नहीं थी दीवाल पर अपने हाथों से टटोल कर भी देख लिया हाँ दीवाल ही थी वो टिक कर खड़ी भोला की ओर देखती रही सांसें धमनियो को छूकर बाहर आ रही थी जोर-जोर से टिकने की वजह से और काँपने की वजह से धीरे-धीरे उसकी चुन्नी फिर से उसके कंधों से सरकने लगी थी और वो नीचे भी गिर पड़ती अगर भोला ने उसे संभाल नहीं लिया होता उसका सीना बिल्कुल भोला के सामने था और गोल गोल उभारों को अपने आप में छुपाने की कोई भी कोशिश नहीं थी आरती का सारा शरीर फिर से एक बार काँपने लगा था और सांसें रोक कर वो भोला ओर ही देख रही थी जाने क्या करेगा अब यहाँ कितनी देर हो गई है अगर कोई उसे ढूँढते हुए यहां तक आ गया तो वो क्या कहेगी पर भोला ने ऐसा कुछ नहीं किया आगे बढ़ कर धीरे से आरती की चुन्नी को उसके कंधे पर डालकर उसके कंधों को पकड़कर खड़ा हो गया और सीधे उसकी नजर से नजर मिलाकर

भोला- बहुत सुंदर हो मेमसाहब आप ऊपर वाले ने बड़े जतन से बनाया है आपको

और कहते हुए उसके हाथ धीरे से उसकी कमर पर से होते हुए धीरे धीरे उसके पेट पर जब उसकी हथेलिया पहुँची तो आरती थोड़ा सा और भी ऊँची हो गई साँसे बिल्कुल भोला के चहरे पर पड़ने लगी थी बड़ी मुश्किल से उसके मुख से आवाज निकली

आरति- प्लीज मत करो जाना है प्लीज ईईईई सस्स्स्स्शह

भोला- हमम्म्मममममम कितनी सुंदर हो कितनी मुलायम और मक्खन की तरह हो मेमसाहब

आरती- प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज जाने दो बहुत देर हो गई है

भोला- हाँ मेमसाहब देर तो हो गई है पर मेमसाहब क्या करू छोड़ने का मन नहीं कर रहा है और उसके दोनों हाथ अब आरती के शरीर को बड़े ही आराम से सहलाते हुए घूमने लगे थे वो धीरे से एक हाथ से आरती के पेट से होते हुए उसकी पसलियों को छूता हुआ ऊपर की ओर उठ रहा था और दूसरा हाथ धीरे-धीरे उसके गोल गोल नितंबों को सहलाते हुए पीछे से ऊपर की ओर उठ रहा था आरती का सारा शरीर फिर से एक काम अग्नि में जल उठा था वो फिर से तैयार थी पर जैसे ही भोला की मजबूत और कठोर हथेलिया उसकी चुचियों को छूते हुए इधर उधर होने लगी थे उसका सारा सब्र टूट गया था दोनों हाथों से कस कर भोला की मजबूत बाहों को कस कर पकड़ लिया था और अपनी चुचियों को भोला के हाथों में और भी धकेल दिया था पर भोला ने उन्हें दबाया नहीं था पर बड़े ही हल्के हल्के से उन्हें सहलाते हुए उनके आकार प्रकार का जाएजा ले रहा था और उनकी कोमलता को सहजता हुआ उनकी नर्मी के एहसास को महसूस कर रहा था अपने चेहरे पर पड़ती हुई आरति की सांसें अब उसके होंठों पर और नथुनो पर पड़ रही थी वो हल्के से कराहता हुआ

भोला- हाँ… मेमसाहब रुकिये में देखता हूँ फिर आप निकल जाना नहीं तो देर हो जाएगी

और कहता हुआ अपनी जीब को निकालकर उसके गोरे गोरे गालों को चाट कर उसके नथुनो को भी चाटता रहा और उसकी खुशबू को अपने अंदर समेटने की कोशिश करने लगा

भोला- कितनी प्यारी खुशबू है मेमसाहब आपकी हह, म्म्म्मममममम

और धीरे से आरती से अलग होते हुए उसकी दोनों चुचियों को हल्के से सहलाता रहा और दरवाजे की ओर चल दिया आरती की हालत खराब थी दीवाल पर टिकी हुई अपनी सांसों को कंट्रोल करती हुई वो भोला को दरवाजे की ओर जाते हुए देखती रही जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं है सांसें रोके हुए वो अपने को ठीक से खड़ा करती तब तक तो भोला दरवाजा खोल चुका था और एक कदम आगे बढ़ाया ही था कि एक लाल रंग की गेंद उसके पैरों के पास लुढ़कती हुई आ गई थी भोला ने एक बार उस गेंद को देखा और एक जोर दार लात लगाई थोड़ी दूर से एक बच्चे की रोने की आवाज आने लगी थी

भोला- चुप यहां नहीं खेलना जाओ घर के अंदर

आरती को जैसे हँसी आई थी वो सिहर कर अपने आपको आगे की ओर धकेल्ति हुई दरवाजे तक आ गई थी भोला अब भी बाहर ही था पीछे की आवाज सुनकर वो पलटा और आरती की ओर देखकर मुस्कुराता हुआ फिर से उसकी ओर बढ़ा और बाहर खड़े हुए ही अपने हाथों को बढ़ा कर उसकी चुन्नी को उसके कंधे पर ठीक से रखता हुआ

भोला- आप साड़ी में ज्यादा सुंदर लगती हो मेमसाहब

उसके गाल में एक थपकी दी और आखों से इशारा करते हुए इस ओर से जाने को कहा आरती नज़र घुमाकर जैसे ही बाहर निकली भोला के हाथों का स्पर्श उसकी जाँघो से लेकर पीछे नितंबों तक होता चला गया था पर वो मुड़ी नहीं ना ही इधर उधर देखा बस चलती चली गई और जब आखें उठाई तो अपने को फैक्टरी के पीछे की ओर पाया यहाँ से भी एक रास्ता अंदर फैक्टरी की ओर जाता था उसे अचानक वहां देखकर वहां काम करने वाले अचंभित हो गये थे और सिर्फ़ नजर झुका कर खड़े हो गये थे आरती जल्दी से उनको पार करते हुए अपने आफिस की ओर भागी पर रास्ते में उसके केबिन से पहले ही पीओन से उसे आवाज दे दी

पीओन- मेडम जी

आरती हाँ… उउउहह (खाँसती हुई ) हाँ…

पीओन- जी मेडम जी कोई आए हैं आपसे मिलने को में हर कही देख आया मेडम जी पर आप नहीं मिली।

आरती- कौन है

पीओन जो कि उसके पीछे-पीछे ही चल रहा था बोला कोई लड़का है कह रहा था भाभी जी कहाँ है

आरती ने एक बार उसकी ओर देखा और पीओन उसके कमरे का दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया

अंदर एक लड़का बैठा हुआ था बहुत ही दुबला पतला सा गोरा सा और नाजुक सा बड़ी-बड़ी आखें और किसी लड़की की तरह से दिखने वाला उठकर जल्दी से अपने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आरती घूमकर जब अपने सीट पर बैठी और उस सख्स को देखने लगी

आरती- जी कहिए

- जी में ऋषि हूँ धरम पाल जी का लड़का

आरती- ओहो हाँ… हाँ… अच्छा तुम हो

और एक मुस्कुराहट सी उसके होंठों में दौड़ गई थी रवि ने सच ही कहा था बिल्कुल लड़की छाप है लड़कियों के साथ पला बढ़ा है इसलिए शायद

आरती- हाँ… ठीक है कैसे आना हुआ

और अपने बालों को ठीक करने के लिए जैसे ही पीछे अपने हाथ ले गई तो उसके बालों से क्लुचेयर गायब था पता नही कहाँ गिर गया था खेर अपने साइड के बालों को लेकर बीच में एक गाँठ बाँध लिया उसने और ऋषि की ओर देखती हुई फिर से बोली

आरती- हाँ… बताओ

ऋषि- जी वो पापाजी ने कहा था कि आपसे मिल लूँ

क्माया के होंठो एक मधुर सी मुस्कान फेल गई थी

आरती- हाँ… और मिलकर क्या करूँ हाँ…

ऋषि- हिहिहीही जी पापा कर्हते है कि भाभी बहुत स्मार्ट है उनके साथ रहेगा तो सब सीख जाएगा हिहिहीही

आरती- हिहिहीही क्या सीख जाओगे हाँ…

ऋषि झेप कर इधर उधर देखने लगा और फिर से हिहीही कर उठा

आरती- हाँ… आज तो मुझे जाना है एक काम करो तुम कल आ जाओ हाँ… फिर देखते है ठीक है

ऋषि किसी स्कूली बच्चे की तरह से झट से खड़ा हो गया और हाथ बाँध कर जी कह उठा

ऋषि- तो में जाऊ

आरती- हिहीही हाँ… कहाँ जाओगे हाँ…

वो भी ऋषि को एक बच्चे की तरह ही ट्रीट कर रही थी

ऋषि-, जी घर और कहाँ और आप

आरती- घर क्यों

ऋषि- फिर कहाँ जाऊ

आरती- हाँ… अभी तो आए हो फिर घर चले जाओगे तो कोई पूछेगा तो क्या कहोगे

ऋषि- घर पर में ही हूँ और सभी तो दीदी के यहां गये है

आरती- हाँ… हाँ… याद आया तो चलो ठीक है

और अपना मोबाइल उठाकर सोनल का नंबर डायल करने ही वाली थी कि

ऋषि- आप कहाँ जाएँगी भाभी

आरती- में शोरुम जाउन्गी क्यों

ऋषि- कैसे गाड़ी चलानी आती है आपको

आरती- नहीं ड्राइवर को बुला लूँगी इसलिए सोनल को फोन कर रही हूँ

ऋषि- में छोड़ दूं आपको में वही से तो जाऊँगा

आरती- हाँ ठीक है लेकिन तुम्हे तकलीफ तो नहीं होगी

ऋषि- हिहीही नहीं क्यों कौन सा मुझे आपको उठाकर ले जाना है हिहिहीही

आरती को भी हँसी आ गई थी उसके लड़कपन पर हाँ… बिल्कुल बच्चा था बस बड़ा हो गया था शायद लड़कियों के साथ पालने से ही यह ऐसा हो गया था घर में सभी बड़े थे यही सबसे छोटा था इसलिए शायद वो अपना पर्स उठाकर ऋषि के साथ बाहर निकली और उसी के साथ शोरुम की ओर बढ़ चली।

रास्ते में ऋषि भी उससे खुलकर बातें करता रहा कोई अड़चान नहीं थी उसे भाभी के साथ बिल्कुल घर जैसा ही माहॉल था उसके साथ इस दोरान यह भी फिक्स हो गया कि कल से वो ही भाभी को लेने आएगा और दोनों फैक्टरी का काम देखेंगे और दोपहर को वो ही भाभी को शोरुम भी छोड़ देगा

आरती को भी ऋषि अच्छा लगा और दोनों में एक अच्छा रिस्ता बन गया था। सोनल से भी मिलवाया ऋषि थोड़ी देर तक बैठा हुआ वो भी उनके काम को देखता रहा और बीच बीच में जब उसकी आखें आरती से मिलती तो एक मुश्कान दौड़ जाती उसके चहरे पर

पूरा दिन कब निकल गया आरती को पता भी नहीं चला और शोरुम बंद करने का टाइम भी आगया रात को जब वो वापस घर पहुँची तो सबकुछ वैसा ही था जैसा जाते समय था कोई बदलाब नहीं पर जब आरती डाइनिंग रूम को क्रॉस कर रही थी तो अचानक ही उसकी नजर टेबल पर रखे ताजे और लाल पीले फूलो के गुच्छे पर पड़ी और वो चौक गई थी

सोनल की नजर भी एक साथ ही उन गुलदस्ते पर पड़ी यह यहां कौन लाया और क्यों? रामु के अलावा और कौन रहता है इस घर में?
 
सोनल की ओर देखते हुए वो कुछ कहती पर

सोनल- अरे रामु। सोनल अब रामु को काका या दादा नही कहती थी, डायरेक्ट नाम से बुलाती थी।

एक उची आवाज गूँज उठी थी रामु जो की किचेन में था दौड़ता हुआ बाहर आया और नजर नीचे किए वहां हाथ बाँधे खड़ा हो गया

रामु- जी बिटिया,

सोनल- यह फूल कौन लाया

रामू- जी वो फूल वाला दे गया था बिटिया कह रहा था मेमसाहब के लिए भिजवाया है

सोनल- अच्छा हाँ…

और वो अपने कमरे की ओर चल दी पर आरती वही खड़ी रही मेमसाहब मतलब वो नजर उठाकर एक बार रामु की ओर देखा तो वो गर्दन नीचे किए

वापस किचेन की ओर जाते दिखा वो जल्दी से उन फूलो के पास पहुँची और किसने भेजा था ढूँढने लगी थी कही कोई नाम नहीं था पर एक प्रश्न उसके दिमाग में घर कर गई थी किस ने भेजा उसे फूल आज तक तो किसी ने नहीं भेजा है कौन है

इसी उधेड़ बुन में वो अपने कमरे में पहुँची और चेंज करने लगी थी बाथरूम से जल्दी से तैयार होकर निकली थी कि नीचे जाकर खाना खाना है पर मोबाइल पर रिंग ने उसे एक बार फिर से जगा दिया शायद रवि का फोन है सोचते हुए उसने फोन उठा लिया पर वो किसी अजनबी नंबर से था

अरे यार यह कंपनी वाले भी ना रात को भी परेशान करने से नहीं चूकते, बिना कुछ सोचे ही उसने फोन काट दिया पर फिर वो बजने लगा क्या है कौन है वो हाथों में सेल लिए सीढ़ियो तक आ गई थी नीचे डाइनिंग स्पेस पर सोनल भी आती दिख रही थी।

आरती ने आखिर फोन उठा लिया

आरती- हेलो

- फूल कैसे लगे मेमसाहब

आरति-

जैसे थी वैसे ही जम गई थी यह और कोई नहीं भोला था इतनी हिम्मत तो सिर्फ़ वही कर सकता था और फोन भी, राक्षस है शैतान है वो वही खड़ी हुई सकपका गई थी और कुछ सूझ नहीं रहा था पर नीचे से सोनल की आवाज उसके कानों में टकराई तो वो संभली और झट से फोन काट कर जल्दी से डाइनिंग रूम में आ गई थी खाने खाते समय वो सिर्फ़ भोला के बारे में ही सोच रही थी क्या चीज है वो और कितनी हिम्मत है उसमें

जरा भी डर नहीं कि मुझे फोन कर ले रहा है वो भी रात में पर आरती के शरीर में एक तरंग सी दौड़ गई थी जैसे ही भोला का नाम उसके जेहन में आया था वो खाना तो खा रही थी पर उसे उस समय की घटना फिर से याद आ गई थी ना जाने क्यों बार-बार मन को झटकने से भी वो सब फिर से उसके सामने बिल्कुल किसी पिक्चर की तरह घूम रहा था

वो खाते खाते अपने आपको भी संभाल रही थी और अपने जाँघो के बीच में हो रही हलचल को भी दबाने की कोशिश करती जा रही थी पर वो थी कि धीरे-धीरे रात के घराने के साथ ही उसके शरीर में और गहरी होती जा रही थी वो एक बार फिर से कामुक होने लगी थी खाना खाना तो दूर अब तो वो अपने सांसों को कंट्रोल तक नहीं कर पा रही थी उसका दिल धड़क कर उसके धमनियो से टकराने लगा था पर किसी तरह से अपना खाना पूरा करके वो भी सोनल के साथ ही उठ गई थी

सोनल- कुछ सोच रही हो मम्मी

आरती- नहीं क्यों

सोनल- नहीं खाना नहीं खाया ठीक से तुमने

आरती- वो भूख नहीं थी पता नहींक्यों

सोनल---वो मम्मी चलते समय काफी पी ली थी ना शायद इसलिए

आरती- हा शायद।

आरती ने सोनल को झूठ बोला था पर क्या वो सच बता देती छी क्या सोचती है वो पर अब क्या वो तो अपने कमरे में जाने लगी थी पर क्या करेगी वो कमरे में जाकर रवि तो है नहीं फिर

नहीं वो नहीं जाएगी कही वो जल्दी से अपने कमरे में घुस गई और सारे बोल्ट लगा दिए और कपड़े चेंज करने लगी थी पर बाथरूम में घुसते ही फिर से भोला का वो वहशी पन वाला चेहरा उसके सामने था उसके लोहे जैसा लण्ड और हाथों का स्पर्श उसके पूरे शरीर में एक बार फिर से धूम मचा रहे थे वो बार-बार अपने को उस सोच से बाहर निकालती जा रही थी पर वो और भी उसके अंदर उतरती जा रही थी

वो फिर से उसी गर्त में जाने को एक बार फिर से तैयार थी जिससे वो बचना चाहती थी पर हिम्मत नहीं थी अपने कमरे में चेंज करने के बाद बैठी हुई रवि के फोन का वेट करती रही पर उसका फोन नहीं आया वो एक बार दरवाजे के पास तक हो आई कि कोई आवाज उसे सुनाई दे तो कुछ आगे बढ़े पर शायद खाने के बाद सब सो गये थे पर लाखा और रामु क्या वो भी क्या उन्हें भी इंतजार नहीं था पर क्या वो उनके पास चली जाए या क्या करे उनका इंतजार

हां इंतेजार ही करती हूँ आएँगे वो वो एक बार फिर उठी और हल्के से दरवाजे को अनलाक करके वापस आके बेड पर लेट गई और इंतजार करने लगी बहुत देर हो गई थी लेटे लेटे आरती का पूरा शरीर जल रहा था वो लेटे लेटे भोला के बारे में सोच रही थी और उसी सोच में वो काम अग्नि की आग में जलती जा रही थी और वो उसे शांत करने का रास्ता ढूँढने भी लगी थी पर कहाँ लाखा और रामु तो जैसे मर गये थे कहीं पता नहीं था आखिर थक कर आरती खुद ही उठी और अपना बेड छोड़ कर धीरे से अपने कमरे के बाहर निकली महीन सा गाउन पहने हुए अपने आपको पूरा का पूरा उजागार करते हुए वो खाली पाँव ही बाहर आ गई थी

वो सीढ़ियो पर उतरती हुई और गर्दन घुमाकर ऊपर भी

देखने की कोशिश करती रही पर कोई नहीं दिखा और नहीं कोई हलचल वो अपने आपको संभालती हुई बड़े ही भारी मन से अपने को ना रोक पाकर धीरे-धीरे अपने तन की आग के आगे हार कर सीढ़ियाँ चढ़ रही थी हर एक कदम पर वो शायद अंदर से रोती थी या फिर वापस लोटने की कोशिश करती थी पर पैरों को नहीं रोक पा रही थी वो कुछ ही सीढ़िया शेष बची थी कि पीछे से एक आहट सी हुई उसने पलटकर देखा तो रामु काका ऊपर की ओर ही आ रहे थे यानी रामु काका का काम खतम नहीं हुआ था अब ख़तम हुआ है यानी कि उसे भी जल्दी थी।

अगर थोड़ा और इंतजार करती तो हो सकता था कि वो ही उसके पास आ जाते और रामु भी एकदम से जहां था वहां ही रुक गया एक बार पीछे पलटकर देखा और धीरे-धीरे आरती की ओर बढ़ने लगा। आरती तो जैसे जम गई थी वो लगातार रामु काका को अपने पास आते हुए देखती रही और आते आते उनकी बाहों मे जैसे अपने आप ही पहुँच गई थी पीछे से जैसे ही रामु काका ने उसे बाहों में भरा एक लंबी सी सिसकारी उसके होंठों से निकली और वो रामु काका के शरीर से चिपक गई थी वो वही खड़ी रही और अपने महीन से गाउन के होते हुए भी रामु काका के शरीर की गर्मी को अपनी स्किन पर महसूस करती रही वो धीरे से अपनी हथेलियो को रामु काका के बड़े-बड़े और मजबूत हाथों के

ऊपर रखकर उन्हें सहलाने लगी थी वो धीरे से अपने सिर को पीछे करते हुए अपने समर्थन का और अपने समर्पण का इशारा दे चुकी थी हाँ… वो यहां आई ही इसलिए थी तो शरम कैसी उसे शांति चाहिए थी और परम आनंद के सागर में वो एक बार फिर से गोते लगाने को तैयार थी उसके अंदर की सारी झिझक और शरम ना जाने कहाँ हवा हो चुकी थी अब वो एक निडर आरती थी और एक सेक्स की भूखी औरत और उसके पास एक नहीं दो-दो मुस्टंडे थे उसके तन की आग को बुझाने को

बस उसे तैयारी करनी थी की कैसे और कितनी देर तक वो टिक सकती है और वो तैयार थी पूरी तरह से अपने होंठों को वो सिर को पीछे करते हुए रामु काका के खुरदुरे गालों पर अपने से ही घिसने लगी थी छोटे छोटे बालों के होते हुए भी उसे कोई चिंता नहीं थी बल्कि उसे वो अच्छा लग रहा था साफ और चिकनी त्वचा अब उसे अच्छी नहीं लगती थी उसे तो जानवरों के साथ रहने की आदत पड़ चुकी थी और अपने को उसी हाल में खुश भी पाती थी रामु काका की हथेलिया पीछे से होकर आरती के पेट से होते हुए उसकी चुचियों तक आ गई थी और धीरे धीरे उन्हें सहलाते जा रहे थे आरती के होंठ रामु के होंठों से मिलने को आतुर थे और वो अपने सिर को बार-बार घुमा कर रामु के होंठों के आस-पास अपने होंठों को घिसते जा रही थी। रामु भी आरती के इशारे को समझकर धीरे से अपने होंठों को उसके होंठों पर रखता हुआ

उसके होंठों को चूमने लगा था और बहुत ही हल्के और स्वाद लेता हुआ वो आरती के होंठों का रस अपने अंदर उतारता जा रहा था उसके हाथों पर आए आरती के शरीर के हर हिस्से को वो अपने कठोर हाथों से छूता और सहलाता हुआ ऊपर से नीचे और फिर ऊपर की ओर ले जाता था वो आरती के आतुर पन से वाकिफ नहीं था पर आज कुछ खास था वो नहीं जानता था कि क्या पर वो महसूस कर सकता था उसके किस करने की स्टाइल से और उसके शरीर से उठ रही तरंगो से उसकी सांसें फेकने के तरीके से और अपने शरीर को उसके हाथों के सपुर्द करने के तरीके से आज रामु भी कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था अपने हाथों को ऊपर ले जाते हुए वो आरती की जाँघो के बीच से सहलाता हुआ उसके छोटे से गाउनको अपने हाथों के साथ ही उठाता चला गया और उसे नंगा करता चला गया रामु के हाथों को अपने शरीर पर से घूमते हुए जब वो आरती के उभारों तक पहुँचे तो उसके निपल्स अपनी उत्तेजना को नहीं छुपा पाए थे वो इतने कड़े हो चुके थे कि एक हल्के से दबाब से ही आरती के मुख से निकली सिसकारी और झटके से पलटने की वजह बन गये थे वो झट से पलटकर रामु के होंठों पर फिर से चिपक गई थी एक सीढ़ी ऊपर होने की वजह से आरती अपने आपकोआज थोड़ा सा उँचा महसूस कर रही थी और अपनी पूरी जान लगाकर रामु के होंठों पर टूट पड़ी थी आरती की उत्तेजना से ही लगता था कि आज की रात एक कयामत की रात होगी और बहुत कुछ बाकी है जो कि पूरा करना है हाथों के स्पर्श से रामु के हाथ उसके गाउनको उसके कंधों तक ले आए थे और धीरे धीरे उसकी गर्दन से बाहर करने की कोशिश में थे पर आरती के होंठ तो जैसे उसके होंठों से चिपक गये थे और आरती उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं थी पर एक झटके से गाउन भी बाहर था और फिर रामु के होंठ आरती की गिरफ़्त में थे
 
वो पागलो की तरह से अपने आपको रामु काका की ओर धकेलती हुई और अपने को उनपर घिसती हुई उनपर गिरी जा रही थी और रामु के के चारो ओर किसी बेल की तरह से लिमटी हुई थी वो अपने टांगों को उठाकर भी रामु की कमर के चारो ओर से उसे कसने की कोशिश करती जा रही थी अब उसके शरीर पर सिर्फ़ एक वाइट कलर की लेस वाली पैंटी ही थी पर उसे कोई चिंता नहीं थी इस घर की बहू सीढ़ियो पर अपने नौकर के साथ रात को अपने शरीर की आग को ठंडा करने की कोशिश में थी उसे कोई चिंता नहीं थी थी तो बस अपने शरीर की जला देने वाली उस आग की जो उसे हर पल अपने आपसे अलग करने की कोशिश करती थी वो परेशान हो चुकी थी अपने से लड़ते हुए और अपने पति के अनदेखे पन से वो अब फ्री है और वो अब अपने को नहीं रोकना चाहती थी इसलिए भी आज वो अपनी उत्तेजना को छुपाना नहीं चाहती थी बल्कि खुलकर रामु काका का साथ दे रही थी जैसे अपने पति का साथ देती थी आज उसे कोई डर नहीं था और ना ही फिकर आज वो सब करेगी जो वो करना चाहती है और अपने आपको नहीं तड़पाएगी हाँ… अब और नहीं,बहुत हो चुका है इसी सोच में डूबी आरती कब रामु काका की गोद में चढ़कर आगे की ओर बढ़ने लगी थी उसे नहीं पता चला वो तो अपनी दोनों जाँघो को रामु की कमर के चारो ओर कस के जकड़े हुए अपनी चुत को उसके लण्ड के पास ले जाने की कोशिश में लगी हुई थी उसे पता ही नहीं चला कि कब रामु की गोद में चढ़े हुए वो उसके कमरे में पहुँच गई वो तो लगातार रामु को उत्तेजित करने में लगी थी कि जैसे भी हो उसका लण्ड उसे छू जाए और वो हासिल कर सके पर एक आवाज ने उसे वर्तमान में ले आया पीछे से एक आवाज

- अरे

और फिर दो हाथों ने उसे पीछे से भी सहलाना शुरू कर दिया आरती समझ गई थी कि वो लाखा काका है और उसे इस तरह से देखकर उनके मुख से निकला होगा पर वो तो जैसे सबकुछ भूल चुकी थी वो लगातार रामू काका के होंठों पर टूटी हुई थी और अपनी कमर को उसके पेट पर रगड़ रही थी पर एक जोड़ी हाथों के जुड़ने से उसकी मनोस्थिति कुछ और भी भड़क उठी थी वो हाथ उसके पीठ से लेकर उसके नितंबों तक जाते थे और फिर जाँघो को सहलाते हुए फिर से ऊपर की ओर उठने लगते थे अब तो होंठ भी जुड़ गये थे पीछे से और जहां जहां वो होंठों को ले जाते थे गीलाकरते हुए ऊपर या नीचे की ओर होते जाते थे आरती की कमर से धीरे-धीरे पैंटी का नीचे सरकना भी शुरू हो गया था वो अपने को रामू काका के गोद से आजाद करते हुए पीछे के हाथों को आजादी दे चुकी थी और फिर एकदम से वो रामू काका के होंठों को छोड़ कर अपने होंठों को पीछे की ओर ले गई थी शायद सांसों को छोड़ने के लिए पर दोनों के बीच में फासी हुई आरती के होंठों को पीछे से लाखा काका ने दबुच लिया और अपने होंठों से जोड़ लिया था आरती की सांसें भी लाखा काका के अंदर ही छूटती चली गई थी और पूरा शरीर किसी धनुष की भाँति पीछे की ओर होता चला गया था लाखा काका के चुबलने से और रामु काका के हाथों के सहलाने से वो अब अपने आप पर कंट्रोल नहीं कर पा रही थी

आरती- करो प्लीज जल्दी करो

रामू और लाखा को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था वो अपने काम में लगे हुए थे उस हसीना के शरीर के हर हिस्से को अपने हाथों और होंठों से छूते हुए बिना किसी रोकटोक के बिंदास घूम रहे थे आज का खेल उनके लिए बड़ा ही अजीब था वो इस घर की बहू अपने अंदाज में आ गई थी और जल्दी से अपने शरीर की आग से छुटकारा पाना चाहती थी आरती का एक हाथ लाखा काका को पीछे से अपने ओर खींचे हुए था और एक हाथ से वो रामु काका की गर्दन के चारो ओर किए उन्हें भी खींच रही थी शरीर के हर हिस्से पर उनके हाथों और चुभन के चलते वो अब और नहीं रुक पा रही थी लगातार वो अपने मुख से एक ही आवाज सिसकारी के रूप में निकालती जा रही थी

आरती- करो प्लीज जल्दी करूऊऊऊ उूुुउउफफफफफफफफ्फ़ आआआआआआह्ह

पर दोनों मूक बने हुए थे पर कब तक आज उस शेरनी के सामने सबकुछ बेकार था एक ही झटके में लाखा काका और रामु काका के सिर के बाल उसकी नरम नरम हथेलियो के बीच में थे और लगातार खींचते हुए वो उन्हें अपने होंठों के पास लाती जा रही थी और लगातार रुआंसी सी उसके मुख से आवाज निकलती जा रही थी

आरती- करो ना प्लीज जल्दी करो नाआआआआ

और एक ही धक्के में रामु थोड़ा सा पीछे की ओर क्या हुआ आरती ने पलटकर अपनी बाँहे लाखा काका की गर्दन के चारो ओर कस लिया और बिना किसी चेतावनी के ही अपने हाथों से उनकी लूँगी को खींचने लगी थी लाखा को जैसे करेंट लग गया था उसने आरती को इतना उत्तेजित नहीं देखा था पर खुशी थी कि आज मजा आ जाएगा (एक नौकर का मान) बिना किसी अड़चन के लाखा काका की लूँगी एक ही झटके में नीचे थी उन्होने बड़ा सा अंडरवेर पहेना था वो पर उसका लण्ड उसमें से बाहर आने को लगातार झटके ले रहा था बिना कोई शरम के आरती की हथेलिया उसके लण्ड के चारो ओर कस्स गई थी और पीछे खड़े हुए रामु काका की कमर के चारो ओर भी । रामु तब तक अपने कपड़ों से आजाद हो चुका था और जैसे ही वो आरती के पास खिचा थाउसके लण्ड ने आरती के नरम और नाजुक नितंबो को स्पर्श किया तो जैसे आरती का भाग्य ही खुल गया था वो फिर से पलटी और रामु काका के होंठों से जुड़ गई और अपनी एक जाँघ को उसकी कमर पर फँसा दिया उसका एक हाथ अब भी लाखा काका के लण्ड को उसके अंडरवेर के ऊपर से कस कर पकड़ रहा था और एक हाथ से रामु काका की गर्दन को खींचकर अपने होंठों से जोड़े रखा था पर रामु काका तो फिर से उसके होंठों का रस्स पान करने में व्यस्त हो गये थे पर आरती को तो कुछ और ही चाहिए था वो फिर से अपनी जाँघ को नीचे करती हुई थोड़ा सा पीछे हटी और अपने दूसरे हाथ से रामु काका के लण्ड को भी कस्स कर अपनी हथेली में पकड़ लिया था उधर लाखा तब तक अपने अंडरवेर से आजाद हो चुका था पर आरती की गिरफ़्त में उसके लण्ड के होने से वो उसे उतार नहीं पाया था उसकी हथेली ने जैसे ही आरती की हथेली को छुआ तो आरती का ध्यान उसकी ओर गया और फिर नीचे की ओर बालों के गुच्छे को देखकर उसने अपनी हथेलियो की गिरफ़्त को ढीला छोड़ा और तुरत ही वापस कस्स कर उस लण्ड को अपने हाथों में जकड़ लिया जैसे कि वो नहीं चाहती थी कि वो उसके हाथों से जाए अब वो दोनों के बीच में आगे पीछे की ओर होकर अपने को अडजस्ट करती हुई खड़ी हो गई और, अपनी हथेली को कस कर जकड़ी हुई सी उन लनडो को अपने नितंबो पर और अपने पेट और उसके नीचे की ओर ले जाने की कोशिश करने लगी थी रामु और लाखा दोनों आरती के इस रूप से थोड़े से अचंभित तो थे पर उनकी हालत भी अब खराब होने लगी थी उनकी उत्तेजना के सामने आरती की उत्तेजना कही ज्यादा ही थी आरती की पकड़ के सामने वो दो जैसे मजबूर थे पर जो अहसास उसके शरीर को छूने में और उसकी नरम हथेलियो से उन्हें मिल रहा था वो एक स्वर्गीय एहसास था

आरती की आवाज अब थोड़ा सा वहशी सी हो गई थी

आरती- काका चोदो आ अब नहीं तो तोड़ दूँगी आआआआअह्ह प्लीज ईईईईईईईईईई

रामु जैसे सपना देख रहा था वो कुछ करता पर इससे पहले ही वो आरती के धकेलने से नीचे गिर पड़ा और आरती उसके ऊपर

आरती- करो चाचा नहीं तो मार डालूंगी सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्शह करूऊऊऊऊऊऊऊऊओ

और पता नहीं कहाँ से आरती के अंदर इतना दम आ गया था कि रामु के बैठते ही वो खुद भी एक झटके से उसके मुख के सामने खड़ी हो गई थी और एक झटके में उसके सिर के बालों को कस कर पकड़ते हुए अपनी चुत के पास लेआई थी अब रामु की नाक उसके पेट के नीचे की ओर थी और रामु के सामने एक ही रास्ता था कि वो अपनी जीब को निकाल कर आरती की चुत को संतुष्ट करे और उन्होंने किया भी वो अपने सामने आरती की उत्तेजना को देख सकता था वो जिस तरह से गुर्राती हुई सी सांसें ले रही थी और एक वहशी सी आवाज से बोल रही थी उससे अंदाजा लगाया जा सकता था कि आरती की हालत क्या थी आरती की हथेली में अब भी लाखा काका का लण्ड मजबूती से कसा हुआ था और वो खड़े-खड़े आरती को रामू को धकेलते हुए और उसके चेहरे के पास इस तरह से जाते हुए भी देख रहे थे वो भी अचंभित थे कि आज आरती को क्या हो गया था आज वो इतना कामुक क्यों है पर उसे क्या वो तो जकड़ना चाहता था उसके साथ उसका तो पूरा समर्थन था ही सो वो भी थोड़ा सा मुस्कुराता हुआ आरती को अपनी जाँघो को खोलकर रामु के चहरे पर धकेलते और उसके बालों को खींचकर अपनी चुत से मिलाते हुए देख रहा था आरती के धक्के से और खींचने से रामू का चेहरा आरती की जाँघो के बीच में गुम हो गया था और लाखा काका किसी कुत्ते की तरह से अपने लण्ड को खीचे जाने से आरती की ओर ही बढ़ गये थे पर आरती की उतेजना को आज शांत करना इतना सहज नहीं था वो रामु काका को खींचते हुए और अपनी जाँघो को खोलकर उन्हें लगातार धकेलते हुए नीचे गिरा चुकी थी और अपने चुत को उनके चहरे पर लगातार घिसती जा रही थी रामु भी अपने आपको बचाने में असमर्थ था और अपनी जीब से आरती की चुत को लगातार चाटता हुआ अपने जीब को उसके चुत के अंदर और अंदर घुसाने की कोशिश करता जा रहा था उसके इस हरकत से आरती के अंदर का ज्वार अब दोगुनी तेजी से बढ़ने लगा था और पास खड़े हुए लाखा काका के लण्ड को भी अब वो खींचते हुए अपने चेहरे पर मलने लगी थी उसकी कामुक आवाज एक बार फिर निकली

आरती-- आआया इधार सस्शह आयो सस्शह

हाँफती हुई सी वो लाखा काका के लण्ड को धीरे से अपने होंठों के अंदर ले जाकर बड़े ही प्यार से एक बार चुबलने के बाद ऊपर लाखा काका की ओर बड़ी ही कामुक दृष्टि से देखा लाखा तो जैसे पागल ही हो गया था हर एक टच जो उसके लण्ड पर हो रहा था वो अपने आपको नहीं रोक पा रहा था और थोड़ा सा और आगे की ओर होता हुआ अपनी हथेलियो को आरती के सिर पर रखता हुआ उसे ऑर पास खीचने लगा था आरती- हाथ हटाओ काका प्लीज हाथ हटाओ सिर सीईईईई लाखा की जान निकल गई थी। आरती की भारी और भयानक सी आवाज सुन के वो नीचे की ओर देख रहा था और आरती को अपने लण्ड से खेलते हुए देखा। आरती भी अपने मुख को खोलकर उसके लण्ड को अंदर ले जाती और कभी उसे बाहर निकाल कर अपने जीब से चाट-ती और कभी , होंठों को जोड़ कर अपने हाथों में लिए उस लण्ड को बड़े ही प्यार से चूमती हर एक हरकत लाखा के लिए जान लेवा थी लाखा अपनी कमर को आगे किए हुए और अपने दोनों हाथों को अपने नितंबो पर रखे हुए आरती की हर हरकतों को देखता जा रहा था और अपने आपको तेजी से दौड़ता हुआ अपने शिखर की ओर बढ़ता जा रहा था और नीचे रामु तो जैसे अपने आपको बचाने की कोशिश छोड़ कर अपने को आरती के सुपुर्द ही कर दिया था वो अपने हाथों को आरती के नितंबो से होता हुआ उसकी कमर को कस्स कर पकड़ रखा था और अपनी जीब को लगातार उसकी चुत में चलाता जा रहा था वो जानता था कि आरती किसी भी क्षण झड जाएगी पर वो अपने काम में लगा रहा उसके चहरे पर आरती की चुत अब भयानक रफ़्तार के साथ आगे पीछे हो रही थी और धीरे-धीरे उसके अंदर से एक धार सी निकलने लगी थी और आरती के शरीर का हर हिस्सा जिस आग में झुलस रहा था वो एक बार फिर से उसके चुत की ओर जाते हुए लग रहा था वो अपने होंठों को जोड़े हुए लाखा काका के लण्ड को चूसती जा रही थी और अपनी कमर को हिलाते हुए कभी-कभी ज़ोर का झटका देती थी रामु का चहरा उस झटके में पूरा का पूरा ढँक जाया करता था पर आरती के मुख से निकले वाली सिसकारी और आहों की आवाजो के बीच में यह खेल अब अपने चरम पर पहुँच चुका था लाखा भी और आरती भी। नहीं तो सिर्फ़ रामु जिसका की लण्ड अब तक खंबे की तरह खड़ा हुआ अपने आपको सलामी दे रहा था

आरती- और जोर से काका करो प्लेआस्ीईईईईई और जोर से

और अपने मुख में लिए लाखा काका के लण्ड को उसी अंदाज में चुस्ती रही और एक पिचकारी सी उसके मुख के अंदर उतर गई

उूुउऊह्ह करते हुए उसने अपने मुख को उसके लण्ड से हठाया पर छोड़ा नहीं कस्स कर पकड़े हुए लगातार अपनी हथेलियो से उसके लण्ड को झटक रही थी और ऊपर खड़े हुए लाखा काका की ओर देखती हुई मदहोशी सी आखें बंद किए हुए अपने आपको रेस्ट करने लगी थी वो भी झड चुकी थी पर हटी नहीं थी अब भी वो अपनी कमर को झटके देकर अपने आखिरी ड्रॉप को रामु काका के मुख में डालने की कोशिश करती जा रही थी लाखा थक कर खड़ा था उसने ही धीरे से आरती के हाथों से अपने लण्ड को छुड़ाया था और हान्फता हुआ पीछे की ओर लड़खड़ाते हुए घिसक गया और धम्म से नीचे नंगा ही बैठ गया था रामु काका अब भी आरती की जाँघो की गिरफ़्त में थे और लाखा काका के छूटने के बाद आरती ध्यान रामु काका पर गया था वो अपने जाँघो को खोलकर धीरे से पीछे की ओर हटी थी और एकटक नीचे पड़े हुए रामु चाचा की ओर सर्द सी आखों से देखती जा रही थी काका हान्फता हुआ अपने चहरे को पोंछ रहा था और एकटक आरती की ओर ही देख रहा था आरती हाफ तो रही थी पर एक नजर जब रामु काका के खड़े और सख़्त लण्ड पर पड़ी तो जैसे वो फिर से उत्तेजित हो गई थी झट से वो रामु काका के ऊपर कूद गई थी और उसके होंठों को अपने होंठों में दबा लिया था एक टाँग को ऊपर करते हुए वो उनपर सवार हो चुकी थी उसकी चुत में अब भी गर्मी थी और अब वो और भी करना चाहती थी जैसे ही वो रामु काका के ऊपर सवार हुई अपनी चूची को रामु काका के होंठों पर घिसने लगी थी रामु भी अपने होंठों को खोलकर उसे चूसने लगा था वो अपनी जीब को और अपने होंठों को कसे हुए फिर से एक बार अपनी प्यारी बहू को अपने आगोश में लेने के लिया लालायित था उस सुंदर तन को उस सुंदर काया को और नरम और मखमली चीज को वो फिर से अपने शरीर के पास रखने को लालायित था अपने होंठों से से कसे हुए रामु उसकी चूचियां धीरे-धीरे चूसता जा रहा था और अपनी कमर को उसकी चुत की ओर धकेलता जा रहा था पर उसे ज्यादा मेहनत नही करनी पड़ी क्योंकी आरती की एक नरम सी हथेली ने और उसकी पतली और नरम उंगलियों ने एक सहारा दिया था उसके लण्ड को और वो झट से अपने रास्ते पर दौड़ पड़ा था एक ही झटके में वो अंदर और अंदर समाता चला गया था और आरती ने जैसे ही अपने अंदर उस गरम सी सलाख को जाते हुए पाया एक लंबी सी आह उसके मुख से निकली और वो एकदम सीधी बैठ गई और जम कर झटके देने लगी थी वो अपने अंदर तक उस लण्ड के एहसास को ले जाना चाहती थी और रामु तो जैसे उस हरकत के लिए तैयार ही नहीं था आज तक उसके लण्ड को इस तरह से किसी ने नहीं निचोड़ा था जिस तरीके से आरती कर रही थी वो अपने को उसके ऊपर रखे हुए अपनी चुत को अंदर से सिकोड़ती जा रही थी और अपनी जाँघो के दबाब से उसके लण्ड को जैसे चूस रही हो वो हर झटके में अपने को थोड़ा सा ऊपर उठाती पर गिरती ज्यादा थी ताकि उस लण्ड का कोई भी हिस्सा बाहर ना रह जाए और जैसे ही वो पूरा का पूरा अंदर चला गया वो एक बार फिर से रामु काका के ऊपर लेट गई और अपने होंठों को उनके होंठों पर रखे हुए उन्हें चूसने लगी पर अचानक ही वो

पूरा का पूरा अंदर चला गया वो एक बार फिर से रामु के ऊपर लेट गई और अपने होंठों को उनके होंठों पर रखे हुए उन्हें चूसने लगी पर अचानक ही वो अपनी जाँघो को रामु के दोनों ओर से खिसका कर सीधा कर लिया और उसके लण्ड को अपनी जाँघो में कस लिया
 
और लगभग क्रॉस करते हुए और धीरेधीरे अपनी कमर को हिलाने लगी रामु तो जैसे पागल हो गया था और अपनी उत्तेजना को ज्यादा देर नहीं रोक पाया और अपनी गिरफ़्त में आई आरती को कस्स कर पकड़ लिया और उसके होंठों को चूसते हुए कस्स कर अपनी कमर को ऊपर की ओर चलाने लगा पर हर झटके में वो अपने आपको झड़ता हुआ पा रह था और हुआ भी ऐसा ही वो ज्यादा देर रुक नहीं पाया और आरती के अंदर और अंदर तक अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हो गया पर आरती तो जैसे आज संतुष्ट नहीं होना चाहती थी वो अब भी अपनी कमर को उसी तरीके से चलाती जा रही थी और फिर थोड़ी देर बाद वो भी निढाल होकर उसके ऊपर फेल गई थी उसकी साँसे अब भी तेज चल रही थी पर हाँ… एक शांति थी बहुत ही शांत शांत होते हुए भी उसके हाथ और शरीर ऊपर पड़े होने के बावजूद रामू के शरीर से घिस रही थी आरती और अपने हाथों से भी उसके बाहों को सहलाते हुए अपने आपको शांत कर रही थी

रामू भी नीचे से आरती के शरीर को सहलाते हुए नीचे की ओर जाता था और अपने हाथों को उसकी हर उँचाई और घहराई को छेड़ते हुए ऊपर की ओर आ जाते थे आरती के मुख से एक हल्की हल्की सी सिसकारी के साथ अब बहुत ही धीरे-धीरे और हल्के से आवाजें आने लगी थी पर समझ में कुछ नहीं आरहा था पर हाँ… इतना तो पता था कि वो संतुष्ट है थोड़ी देर तक अपने को संभालने के बाद आरती साइड की ओर हुई और धीरे से उस गंदे से बेड पर वैसे ही नंगी लेट गई उसका चहरा अब दीवाल की ओर था

और रामु काका और लाखा काका उसके पीछे थे क्या कर रहे थे उसे पता नहीं और नहीं वो जानना चाहती थी वो वैसे ही पड़ी रही और अपनी सांसों को संभालने की कोशिश करती रही और पीछे लाखा काका अपने आपको दीवाल के सहारे बैठे हुए रामु की ओर देखता रहा लाखा ने अपने ऊपर अपनी लूँगी को डाल लिया था पर बाँधी नहीं थी

रामु भी धीरे से उठा और लाखा की ओर देखता हुआ एक बार पास लेटी हुई आरती की ओर नजर दौड़ाई और फिर लाखा की ओर और फिर नज़रों के इशारे से बातें

रामु- क्या और आरती की ओर इशारा करते हुए

लाखा- पता नहीं पूछ

रामू- बहू

और धीरे से अपनी हथेलियो को उसकी पीठ पर रखा और धीरे-धीरे सहलाते हुए कमर तक ले जाता रहा आरती के शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई और उसका दायां हैंड पीछे की ओर हुआ और रामु काका की हथेली को पकड़कर सामने की ओर अपनी चुचियों की ओर खींच लिया और अपनी बाहों से उसकी कालाई को कस कर अपने साइड और बाहों के बीच में कस्स लिया रामु काका की हथेली अब आरती की गोल गोल चुचियों पर थिरक रही थी और अपनी मजबूत हथेली से उनकी मुलायम और सुदोलता का धीरे-धीरे मर्दन कर रही थी आरती तो जैसे अपने आपको भूल चुकी थी वो वैसे ही लेटी हुई रामु काका के हाथों को बगल में दबाए हुए अपने शरीर पर उनके हाथों को घूमते हुए एहसास करती रही थोड़ी देर में ही आरती का रूप चेंज होने लगा था वो जैसे उकूड़ू होकर सोई हुई थी धीरे-धीरे सीधी होने लगी थी उसके शरीर में एक बार फिर से उत्तेजना भरने लगी थी आज वो बिल्कुल फ्रेश थी उसे इन दोनों ने निचोड़ा नहीं था बल्कि उसने इन दोनों को निचोड़ कर रख दिया था वो दोनों अपने को अब तक संभाल रहे थे पर रामु तो फिर से आरती की गिरफ़्त में पहुँच चुका था और अपना खेल भी खेलना चालू कर चुका था और आरती का पूरा साथ भी मिल रहा था आरती का शरीर एक बार फिर से तन गया था और वो आखें बंद किए हुए ही धीरे-धीरे अपने आपको रामु की ओर धकेल रही थी आरती की पीठ अब रामु के सीने से चिपक गई थी और रामु का हाथ उसके शरीर के सामने से घूमते हुए उसके हर उतार चढ़ाव को समझते और एहसास करते हुए फिर से उसकी चुत की ओर जाने लगा था रामु अपने हाथों को घुमा ही रहा था कि नीचे पड़े बिस्तर पर एक जोड़ी पाँव ने भी दखल दिया वो लाखा काका थे वो भी अपना हिस्सा लेने आए थे और धीरे से आरती के पास ही बैठ गये और अपने हाथों से उसकी जाँघो को सहलाते हुए धीरे-धीरे ऊपर चलाने लगे थे आरती अब धीरे-धीरे सीधी होती जा रही थी और अपने को रामू काका के साथ सटाते हुए वो अब पीठ के बल लेट गई थी

पूरी तरह से आखें बंद किए अपने शरीर पर दो जोड़ी हाथों को घूमते हुए पाकर आरती शरीर एक बार फिर से उत्तेजना के सागार में गोते लगाने लगा था वो अब पूरी तरह से लाखा काका और रामू काका के साथ अपने आपको फिर से उस खेल का हिस्सा बनाने को तैयार थी अपने एक हाथ से उसने रामू काका की हथेली को अपनी चुचियों के ऊपर पकड़ रखा था और दूसरे हाथों को लाखा काक की जाँघो पर घुमाने लगी थी लाखा काका भी अपने आप पर हो रहे इस तरह के प्यार को नहीं झुठला सके और नीचे होकर अपनी प्यारी बहू के होंठों को अपने होंठों में दबाकर उनको थोड़ी देर तक चूसते रह आरती ने भी कोई शिकायत नहीं की बल्कि अपने होंठों को खोलकर काका के सुपुर्द कर दिया और उनके चुबलने का पूरा मजा लेती रही रामू काका भी आरती की चुचियों को दबाते दबाते अपने होंठों को उसकी चुचियों तक लेआए और उसकी एक चुचि को अपने होंठों के बीच में दबा के चूसने लगे आरती की नरम हथेली रामू काका के बालों पर से होते हुए उन्हें अपनी चुचियों पर और अच्छे से खींचती रही और अपने दूसरे हाथों से काका को अपने होंठों के पास दोनों के हाथ अब आरती के पूरे शरीर पर घूमते रहे और आरती को उत्तेजित करते रहे आरती की जांघे अपने आप खुलकर उन दोनों की उंगलियों के लिए जगह बना दी थी ताकि वो अपने अगले स्टेप की ओर बिना किसी देर और रुकावट के जा सके

दोनो ने अपने हिस्से की आरती को बाँट लिया था दायां साइड रामु के पास था और लेफ्ट साइड लाखा काका के पास था जो कि अपने आपको जिस तरह से चाहे अपने होंठों और हथेलियो को उसके शरीर पर चला रहे थे हथेलियो के संपर्क में आते हर हिस्से का अवलोकन और सुडोलता को नापने के अलावा उसकी नर्मी और कोमलता का मिला जुला एहसास रामू और लाखा के जेहन तक जाता था कोई मनाही नहीं ना कोई इनकार बस करते रहो और करो और कोई सीमा नहीं किसी के लिए भी पूरा मैदान साफ है और कोई चिंता भी नहीं बस एक बात की चिंता थी कि कब और कैसे

आरती लेटी लेटी अपने शरीर पर घुमाते हुए दोनों के हाथों का खिलोना बनी हुई थी और अपने शरीर पर से उठ रही तरंगो को सिसकारी के रूप में बाहर निकालते हुए अपने दोनों हाथों से रामू और लाखा को अपने पास और पास खींचती जा रही थी रामु और लाखा की उंगलियां आरती की चुत में अपनी जगह बनाने लगी थी और एक के बाद एक उसकी चुत के अंदर तक उतर जाती थी और आरती को एक और स्पर्धा की ओर धकेलती जा रही थी वो कामातूर हो चुकी थी एक बार फिर दोनों के चुबलने से और उंगलियों के खेल से

दोनों की उंगलियां बीच में भी कई बार आपास्स में टकरा जाती थी और फिर जो जीतता था वो अंदर हो जाता था पर एक समय ऐसा भी आया जब एक साथ दो उंगलियां उसकी चुत में समा गई थी और आरती को कोई एतराज नहीं था उसने अपनी जाँघो को और खोलकर उन्हें निमंत्रण दे दिया और अपने होंठों को पता नही कौन था उसके होंठों में रहा ही रहने दिया अपने चूचियां को सीना तान कर, और भी उँचा कर दिया ताकि वो पूरा का पूरा उसके हथेलियो में समा जाए अंदर गई उंगलियां अपना कमाल दिखा रही थी और आरती के मुख से एक बार फिर से

आरती- अब चोदो जल्दी प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज

रामू- (जो कि उसके होंठों को अब चूस रहा था ) हाँ बहू बस थोड़ा सा रुक

आरती- नहीं चोदो जल्दी

एक अजीब सी गुर्राहट उसके गले से निकली जो कि रामु और लाखा दोनों के कानों तक गई थी उनकी उंगलियां चुत के अलावा उसके थोड़ी सी दूर उसके गांड से भी खेल रही थी और वो एक अजीब सी, आग आरती के शरीर में लगा रही थी वो अपनी गांड को सिकोड़ कर वहाँ कोई आक्रमण से बंचित रखना चाहती थी पर

शायद दोनों की उंगलियां वहाँ के दर्शन को भी आतुर थी और धीरे से एक उंगली उसके गांड से भी अंदर चली गई आरती एक बार अपने को नीचे दबाए हुए भी और नहीं किसी खेल को मना करती हुई एक आवाज उसके मुख से निकली

आरती-, नहीं वहां नहीं प्लीज वहां नहीं

हाँफती हुई सी उसके मुख से निकली थी पर उसके आग्रह का कोई भी असर उसे दिखाई नहीं दिया पर हाँ… उसका इनकार कमजोर पड़ गया था और उत्तेजना की ओर ज्यादा ध्यान था उसके शरीर को अब और इंतेजार नहीं करना था

एक ही झटके से वो उठ बैठी और दोनों की ओर देखती हुई लाखा काका पर लगभग कूद पड़ी लाखा काका जब तक कुछ समझते, वो उनके ऊपर थी और उनके सीधे खड़े हुए लण्ड के ऊपर आरती और धम्म से वो अंदर था

आरती- अहाआह्ह

जैसे ही वो अंदर गया आरती का शरीर आकड़ गया और थोड़ा सा पीछे की ओर हुई ताकि अपने चुत में घुसे हुए लण्ड को थोड़ा सा अड्जस्ट कर सके पीछे होते देखकर रामू ने उसे अपनी बाहों में भर कर उसे सहारा दिया और धीरे-धीरे उसके गालों को चूमते हुए

रामु- आज क्या हुआ है बहू हाँ…

और उसकी चूचियां पहले धीरे फिर अपनी ताकत को बढ़ाते हुए उन्हें मसलने लगा था लाखा काका तो नीचे पड़े हुए आरती की कमर को संभाले हुए उसे ठीक से अड्जस्ट ही करते जा रहे थे और आरती तो जैसे अपने अंदर उनके लण्ड को पाकर जैसे पागल ही हो गई थी वो बिना कुछ सोचे अपने आपको उचका कर उनके लण्ड को अपने अंदर तक उतारती जा रही थी

उसके अग्रसर होने के तरीके से कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि आरती कितनी उत्तेजित है

आरती के मुख से निकलती हुई हर सिसकारी में बस इतना जरूर होता था

आरती- और जोर्र से काका उूुउउम्म्म्मम और जोर से जल्दी-जल्दी करूऊऊऊ उूुउउम्म्म्म

और अपने होंठों से पीछे बैठे हुए रामु काका के होंठों पर चिपक गई थी उसकी एक हथेली तो नीचे पड़े हुए काका के सीने या पेट पर थी पर एक हाथ तो पीछे बैठे रामु काका की गर्दन पर था और वो लगा तार उन्हें खींचते हुए अपने सामने या फिर अपने होंठों पर लाने की कोशिश में लगी हुई थी लाखा काका का लण्ड उसके चुत पर लगातार नीचे से हमलाकर रहा था और दोनों हथेलियो को जोड़ कर वो आरती को सीधा बिठाने की कोशिश भी कर रहा था पर आरती तो जैसे पागलो की तरह कर रही थी आज वो उछलती हुई कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ हो जाती थी पर लाखा काका अपने काम में लगे रहे

रामु भी आरती को ही संभालने में लगा हुआ था और उसकी चुचियों को और उसके होंठों को एक साथ ही मर्दन किए हुए था और अपने लण्ड को भी जब भी तोड़ा सा आगे करता तो कामया के नितंबों की दरार में फँसाने में कामयाब भी हो जाता था वो अपने आप भी बड़ा ही उत्तेजित पा रहा था और शायद इंतजार में ही था कि कब उसका नंबर आएगा पर जब नहीं रहा गया तो वो आरती की हथेली को खींचते हुए अपने लण्ड पर ले आया और फिर से उसकी चुचियों पर आक्रमण कर दिया वो अपने शरीर का पूरा जोर लगा दे रहा था उसकी चूचियां निचोड़ने में पर आरती के मुख से एक बार भी उउफ्फ तक नहीं निकला बल्कि हमेशा की तरह ही उसने अपने सीने को और आगे की ओर कर के उसे पूरा समर्थन दिया उसकी नरम हथेली में जैसे ही रामू का लण्ड आया वो उसे भी बहुत ही बेरहमी से अपने उंगलियों के बीच में करती हुई धीरे-धीरे आगे पीछे करने लगी थी आरती का शरीर अब शायद ज्यादा देर का मेहमान नहीं था क्योंकी उसके मुख से अब सिसकारी की जगह, सिर्फ़ चीख ही निकल रही थी और हर एक धक्के में वो ऊपर की बजाए अपने को और नीचे की ओर करती जा रही थी लाखा की भी हालत खराब थी और कभी भी वो अपने आपको शिखर पर पहुँचने से नहीं रोक पाएगा

आज तो कमाल ही कर दिया था आरती ने एक बार भी उन्हें मौका नहीं दिया और नहीं कोई लज्जा या झिझक मजा आ गया था पर एक डर भी बैठ गया था पर अभी तो मजे का वक़्त था और वो ले रहा था

आखें खोलकर जब वो अपने ऊपर की आरती को देखता था वो सोच भी नहीं पाता था कि यह वही बहू है जिसके लिए वो कभी तरसता था या उसकी एक झलक पाने को अपनी चोर नजर उठा ही लेता था आज वो उसके ऊपर अपनी जनम के समय की तरह बिल्कुल नंगी उसके लण्ड की सवारी कर रही थी और सिर्फ़ कर ही नहीं रही थी बल्कि हर एक झटके के साथ उसे एक परम आनंद के सागर की ओर धकेलते जा रही थी वो अपनी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर और अप्सरा से भी ज्यादा कोमल और चंद्रमा से भी ज्यादा उज्ज्वल अपनी बहू को देखते हुए अपने शिखर पर पहुँच ही गया और एक ही झटके में अपनी कमर को उँचा और उँचा उठाता चला गया पर आरती के दम के आगे वो और ज्यादा नहीं उठा सका और एक लंबी सी अया के साथ ही ठंडा हो गया

आरती की ओर देखता पर वो तो जैसे शेरनी की तरह ही उसे देख रही थी दो बार झड़ने के बाद भी वो इतनी कामुक थी कि वो अभी तक शांत नहीं हुई थी लेकिन लाखा काका को छोड़ने को भी तैयार नहीं थी वो अब भी उसके लण्ड को अपनी चुत में लिए हुए अपनी चुत से दबाए जा रही थी और एक अजीब सी निगाहो से लाखा काका की ओर देखती रही पर उसके पास दूसरा आल्टर्नेटिव था रामु काका जो की तैयार था पीछे वो एक ही झटके से घूम गई थी और बिना किसी चेतावनी के ही रामु काका से लिपट गई थी अपनी बाँहे उनके गले पर रखती हुई और अपने होंठों के पास खींचती हुई वो उसपर सवार होती पर रामु ने उसे नीचे पटक दिया और ऊपर सवार हो गया था और जब तक वो आगे बढ़ता आरती की उंगलियां उसके लण्ड को खींचते हुए अपनी चुत के द्वार पर रखने लगी थी

रामु तो तैयार ही था पर जैसे ही उसने अपने लण्ड को धक्का दिया आरती के मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकली और वो उचक कर रामु काका के शरीर को नीचे की ओर खींचने लगी रामु काका भी धम्म से उसके शरीर पर गिर पड़े और जरदार धक्कों के साथ अपनी बहू को रौंदने लगे पर एक बात साफ थी आज का खेल आरती के हाथों में था आज वो उनके खेलने की चीज नहीं थी आज वो दोनों उसके खेलने की चीज थे और वो पूरे तरीके से इस खेल में शामिल थी और हर तरीके से वो इस खेल का पूरा आनंद ले रही थी आज का खेल उसे भी अच्छा लग रहा था और वो अपने को शिखर को जल्दी से पा लेना चाहती थी वो रामु काका को खींचते हुए अपने शरीर के हर कोने तक का स्पर्श पाना चाहती थी उसके मुख से आवाजो का गुबार निकलता जा रहा था

आरती- करूऊ काका जोर-जोर से करो बस थोड़ी देर और करूऊऊ

और अपने बातों के साथ ही अपनी कमर को उचका कर रामु काका की हर चोट का जबाब देती जा रही थी पर अब तक अधूरा छोड़ा हुआ लाखा काका का काम रामु काका ने आखिर में शिखर तक पहुँचा ही दिया एक लंबी सी आहह निकली आरती के मुख से और रामु काका के होंठों को ढूँढ़ कर अपने होंठों के सुपुर्द कर लिया था आरती ने । और निढाल सी पड़ी रही। रामू काका के नीचे । रामु भी अपने आखिरी स्टेज पर ही था आरती की चुत के कसाव के आगे और चोट के बाद वो भी अपने लण्ड पर हुए आक्रमण से बच नहीं पाया था और वो भी थक कर आरती के ऊपर निढाल सा पसर गया

आरती की हथेलिया रामु काका के बालों पर से घूमते हुए धीरे से उनकी पीठ तक आई और दोनों बाहों को एक हल्का सा धकेला और हान्फते हुए वही पड़ी रही कमरे मे दूधिया नाइट बल्ब की रोशनी को निहारती हुई एक बार अपनी स्थिति का जायजा लिया वो संतुष्ट थी पर थकि हुई थी नजर घुमाने की, हिम्मत नहीं हुई पर पास लेटे हुए रामु काका की जांघे अब भी उसे टच हो रही थी आरती ने भी थोड़ा सा घूमकर देखा पास में रामु काका पड़े हुए थे और लाखा काका भी थोड़ी दूर थे लूँगी ऊपर से कमर पर डाले हुए लंबी-लंबी सानसें लेते हुए दूसरी ओर मुँह घुमाए हुए थे। आरती थोड़ा सा जोर लगाकर उठी और पाया कि वो फ्रेश है और बिल्कुल फ्रेश थी कोई थकावट नहीं थी हाँ थोड़ी सी थी पर यह तो होना ही चाहिए इतने लंबे सफर पर जो गई थी

वो मुस्कुराती हुई उठी और एक नजर कमरे पर पड़ी हुई चीजो पर डाली जो वो ढूँढ़ रही थी वो उसे नहीं दिखी उसका गाउन और पैंटी कोई बात नहीं वो थोड़ा सा लड़खड़ाती हुई कमरे से बाहर की ओर चालदी और दरवाजे पर जाकर एक नजर वापस कमरे पर डाली रामु और लाखा अब भी लेटे हुए लंबी-लंबी साँसे ले रहे थे

वो पलटी और सीडीयाँ उतरते हुए वैसे ही नंगी उतरने लगी थी सीढ़ियो में उसे अपना गाउन मिल गया पैरों से उठाकर वो मदमस्त चाल से अपने कमरे की ओर चली जा रही थी

समझ सकते है आप क्या दृश्य होगा वो एक स्वप्न सुंदरी अपने शरीर की आग को ठंडा करके बिना कपड़ों के सीढ़िया उतर रही हो तो उूुुुुुुउउफफफफफफफफ्फ़

क्या सीन है यार,

संभालती हुई उसने धीरे से अपने कमरे का दरवाजा खोला और बिना पीछे पलटे ही पीछे से धक्का लगाकर बंद कर दिया और पलटकर लॉक लगा दिया और बाथरूम की ओर चल दी जाते जाते अपने गाउनको बेड की ओर उच्छाल दिया और फ्रेश होने चली गई थी जब वो निकली तो एकदम फ्रेश थी और धम्म से बेड पर गिर पड़ी और सो गई थी जल्दी बहुत जल्दी। सुबह कब हुई पता ही नहीं चला हाँ… सुबह चाय के समय ही उठ गई थी।

सोनल के ही साथ चाय पी थी नीचे जाकर

सोनल- मम्मी,आज क्या ऋषि आएगा आपको लेने

आरती- कहा तो था पता नहीं

सोनल- हाँ… मुझे तो आज स्कूल जाना है खाना खा के चली जाती हु आप फिर आराम से निकलना क्यों

आरती- ठीक है

सोनल- मम्मी मैं रुकु जब तक नहीं आता

आरती- क्या बताऊ कल तो बोला था कि आएगा

सोनल- फोन कर लो एक बार

आरती-नंबर नहीं है उसका

आरती- धत्त क्या मम्मी आप भी, नंबर तो रखना चाहिए ना अब वो आपके साथ ही रहेगा धरम पाल अंकल जी ने कहा है थोड़ा सा बच्चे जैसा है और कोई दोस्त भी नहीं है उसका

आरती- पर मेरे साथ क्यों

सोनल (थोड़ा हँसते हुए)- देखा तो है आपने उसे ही ही ही

आरती को भी हँसी आ गई थी कोई बात नहीं रहने दो उसे पर नंबर तो है नहीं कैसे पता चलेगा

देखा जाएगा

आरती- अगर नहीं आया तो लाखा के साथ निकल जाऊँगी गाड़ी में।

आरती- हाँ… ठीक है

और दोनों चाय पीकर तैयारी में लग गये ठीक खाने के बाद काम्पोन्ड में एक गाड़ी रुकने की आवाज आई थी रामु अंदर से दौड़ता हुआ बाहर की ओर गया और बताया कि धरंपाल जी का लड़का है

दोनों खुश थे चलो आ गया था

सोनल- उसे बुला लाओ यहां

रामु- जी

और थोड़ी देर में ही ऋषि उसके साथ अंदर आया था

आते ही सोनल को हेलो किया और आरती की ओर देखता हुआ नमस्ते भी किया था छोटा था पर संस्कार थे उसमें

सोनल- कैसे हो ऋषि

ऋष- अच्छा हूँ

सोनल- आओ खाना खा लो

ऋषि- जी नहीं खाके आया हूँ

सोनल- अरे थोड़ा सा डेजर्ट है लेलो

ऋषि- ठीक है

और आरती के साइड में खाली चेयर में बैठ गया और एक बार उसे देखकर मुस्कुरा दिया बहुत ही सुंदर लगा रहा था ऋषि आज महरून कलर की काटन शर्ट पहने था और उससे मचिंग करता हुआ खाकी कलर का पैंट ब्लैक शूस मस्त लग रहा था बिल्कुल शाइट था वो सफेद दाँतों के साथ लाल लाल होंठ जैसे लिपस्टिक लगाई हो बिल्कुल स्किनी सा था वो पर आदर सत्कार और संस्कार थे उसमें नजर झुका कर बैठ गया था सोनल के कहने पर और बड़े ही शर्मीले तरीके से थोड़ा सा लेकर खाने लगा था बड़ी मुश्किल से खा पा रहा था

सोनल- ऋषि अब से क्या तुम लेने आओगे मम्मी को

ऋषि- जैसा भाभी जी कहे

सोनल- नहीं नहीं वो तो इसलिए कि आरती ने बताया था कि तुम लेने आओगे इसलिए पूछा नहीं तो वो तो जाती ही है फैक्टरी का काम देखने

ऋषि- जी आ जाऊँगा यही से तो क्रॉस होता हूँ अलग रोड नहीं है इसलिए कोई दिक्कत नहीं है

सोनल- ठीक है तुम आ जाया करो हाँ कोई काम रहेगा तो पहले बता देना ठीक है और तुम्हारा नंबर दे दो

ऋषि - जी और खाने के बाद उसने अपना नंबर सोनल को दे दिया था और आरती को भी

आरती- तुम बैठो में आती हूँ तैयार होकर

सोनल के जाने के बाद ही आरती ने ऋषि से कोई बात की थी पर ऋषि टपक से बोला

ऋषि- तैयार तो है आप

आरती- अरे बस आती हूँ तुम रूको

ऋषि- जी झेपता हुआ खड़ा रह गया था

आरती पलटकर अपने कमरे की ओर चली गई थी सीढ़िया चढ़ते हुए ऋषि की बातों पर हँसी आ रही थी कि कैसे सोनल के हटते ही टपक से बोल उठा था वो शरारती है और हो भी क्यों नहीं अभी उम्र ही कितनी होगी उसकी 22 या 23 साल

उसने कमरे में पहुँचकर जल्दी से अपने कपड़ों को एक बार देखा और मेकप को सबकुछ ठीक था पलटकर चलती पर कुछ रुक सी गई थी वो एक बार खड़ी हुई कुछ देर तक पता नहीं क्या सोचती रही पर एक झटके से बाहर की ओर निकल गई थी

नीचे सोनल तो चली गयी पर ऋषि उसके इंतेजार में बैठा हुआ था ड्राइंग रूम में उसके आते ही वो खड़ा हुआ और एक बार मुस्कुराते हुए आरती की ओर देखा और उसके साथ ही बाहर की ओर चल दिया

गाड़ी में ड्राइविंग सीट के पास ही बैठी थी आरती ऋषि ड्राइविंग कर रहा था

ऋषि- फैक्टरी ही चले ना भाभी

आरती- हाँ… और नहीं तो कहाँ

ऋषि- नहीं ऐसे ही पूछा

आरती- हाँ… थोड़ा सा गुस्से से ऋषि की और देखा

आरती- मतलब

ऋषि झेपता हुआ कुछ नहीं कह पाया था पर ड्राइव ठीक ही कर रहा था बड़ी ही सफाई से ट्रफिक के बीच से जैसे बहुत दिनों से गाड़ी चला रहा हो

आरती- अच्छी गाड़ी चला लेते हो तुम तो

ऋषि- जी असल में बहुत दिनों से चला रहा हूँ ना 11 क्लास में ही चलाना आ गया था मुझे तो दीदी के साथ जाता था सीखने को दीदी से ही सिखाया है बिल्कुल चहकता हुआ सा उसके मुख से निकलता वो गुस्से को भूल गया था

आरती- हाँ… मुझे तो नहीं आती सीखने की कोशिश की थी पर सिख नहीं पाई

तपाक से ऋषि के मुख से निकाला

ऋषि- अरे में हूँ ना में सीखा दूँगा दो दिन में ही

आरती को उसके बोलने के तरीके पर हस्सी आ गई थी बिल्कुल चहकते हुए वो बोला था

आरती- ठीक है तुम सिखा देना और देखकर चलाओ नहीं तो टक्कर हो जाएगी
 
ऋषि मुस्कुराते हुए गाड़ी चलाता हुआ धीरे-धीरे फैक्टरी के अंदर तक ले आया था और आफिस बिल्डिंग के सामने खड़ी करके खुद बाहर निकला और दौड़ता हुआ साइड की ओर बढ़ा ही था कि आरती दरवाजा खोलकर बाहर आ गई थी

ऋषि की ओर मुस्कुराते हुए

आरती- क्या कर रहे थे में दरवाजा नहीं खोल सकती क्या

ऋषि- ही ही ही नहीं नहीं वो बात नहीं है में तो बस ऐसे ही पहली बार आपको ले के आया हूँ ना इसलिए

आरती- तुम ड्राइवर नहीं हो ठीक है

ऋषि धीरे-धीरे उसके साथ होकर चलता हुआ उसके केबिन की ओर बढ़ता जा रहा था

ऋषि- ठीक है

आरती को उसका साथ अच्छा लग रहा था भोला भाला सा था और शायद इतनी इज़्ज़त उसे कभी नहीं मिली थी जो उसे मिल रही थी घर में छोटा था और कुछ लजाया सा था इसलिए भी हो सकता था पर अच्छा था

आरती अपने आफिस में घुसते ही अपने टेबल पर आ गई थी और वहां रखे हुए बहुत से बिल और वाउचर्स को ठीक से देखने लगी थी ऋषि भी उसके सामने वाली सीट पर बैठा हुआ था और बड़े गौर से आरती की हर हरकतों को देख रहा था आरती भी कभी-कभी उसे ही देख लेती थी और एक बार नज़रें चार होने से ऋषि बस मुस्कुरा देता था और आरती उसे और समर्थन भी देती थी

बहुत देर तक जब आरती उन कागजों में ही उलझी हुई थी तो ऋषि से नहीं रहा गया

ऋषि - भाभी कितना काम कर रही हो

बड़े ही नाटकीय और लड़कपन सी आवाज निकालते हुए उसने भाभी को कहा था आरती की हँसी फूट पड़ी थी उसके इस अंदाज से

आरती- तो यहां काम ही करने आए है

ऋषि- अरे यार यह तो बहुत बोरिंग काम है क्या खाली साइन कर रही हो आप कब से

आरती- हाँ… यह सब खर्चे है जो कि किए हुए है और होंगे भी वोही तो देखना है तुमको हम को

ऋषि- अरे यार में तो बोर होने लगा हूँ अभी से चलिए ना बाहर घूमते है

आरती- क्या

ऋषि- तो क्या कितनी देर से आप तो काम कर रही है और में बैठा हुआ हूँ

बड़े ही नाटकीय तरीके से अपने हाथों को घुमाकर और अपनी बड़ी-बड़ी आखों को मटकाकर उसने बड़े ही उत्तावलेपन से कहा आरती उसकी ओर बड़े ही प्यार से और एक अजीब सी नजर से देखने लगी थी सच में बिल्कुल लड़कियों जैसा ही था बातें करते समय उसकी आखें और होंठों को बड़े ही तरीके से नचाता था ऋषि और साथ-साथ में अपनी हथेलियो को भी गर्दन को भी कुछ अजीब तरीके से

हँसती हुई आरती का ध्यान फिर से अपने काम में लगा लिया था और ऋषि की बातों को भी सुनते हुए उसकी ओर देखती भी जा रही थी

ऋषि- भाभी प्लीज ना ऐसे काम से तो अच्छा है कि में घर पर ही रहूं क्या काम है यह बस बैठे रहो और साइन करो कुछ मजा ही नहीं

आरती- ही ही ही क्या मजा करना है तुम्हें हाँ…

ऋषि अपनी हथेलियो को थोड़ा सा मटकाता हुआ अपनी ठोडी के नीचे रखता हुआ आरती की ओर अपनी बड़ी-बड़ी आखों से देखता रहा और बोला

ऋषि- यहां से चलिए ना भाभी कितनी बोरिंग जगह है यह

आरती- हाँ हाँ… चलते है अभी तो शोरुम जाना है जरा सा और बचा है फिर चलते है ठीक है अभी उनकी बातें खतम भी नहीं हुई थी कि डोर पर एक थपकी ने उनका ध्यान खींच लिया वो दोनों ही दरवाजे की ओर देखने लगे थे

पीओन अंदर घुसा और वही खड़े होकर बोला

पीओन- जी मेडम वो भोला आया है

आरती के मुख से आनयास ही निकला

आरती- क्यों

पीओन- जी कह रहा है कि मेमसाहब से मिलना है

वो कुछ और कहता कि भोला पीछे से अंदर घुस आया और दरवाजे को और पीओन को पास करते हुए टेबल तक आ गया

पीओन वापस चला गया पर आरती की नजर भोला की ओर नहीं देख पाई थी वो ऋषि की ओर देख रही थी और भोला के बोलने की राह देख रही थी ऋषि भी भोला को देखकर दूसरी तरफ देखने लगा था

इतने में भोला की आवाज आई

भोला- जी मेमसाहब वो दरखास्त देनी थी

उसके हाथों में एक कागज था और वो अब भी उसमें कुछ लिख रहा था और धीरे से एक बार आरती की ओर देखता हुआ आरती की ओर कागज को सरका दिया

आरती ने एक बार उस कागज को देखा फोल्डेड था पर उसकी मोटी-मोटी उंगलियों के नीचे से उस कागज को देखते ही नहीं जान पाई थी कि कैसी दरखास्त थी वो

भोला- जी सोच रहा था कि कल से ड्यूटी जाय्न कर लूँ खोली में पड़ा पड़ा थक गया हूँ और ड्यूटी जाय्न कर लूँगा तो आते जाते लोगों को देखूँगा तो मन लगा रहेगा और एक आवाज उसके पास से निकली जो कि किसी क्लिप के चटकने से हुई हो

आरती का ध्यान उसकी हथेलियो की ओर गया वो चौक गई थी उसकी एक उंगलियों में उसका ही वो क्लुचेयर था जिसे की वो एक हाथों से दबाता हुआ अपनी एक उंगली में लगाता था और खींचकर निकालता था आरती सहम गई थी और अपने हाथों को बढ़ा कर उस कागज को अपनी ओर खींचा और एक नजर ऋषि की ओर भी डाली जो कि अब भी अपनी ठोडी में कलाईयों को रखकर दूसरी ओर ही देख रहा था

बड़े ही संभालते हुए आरती ने उस कागज जो अपनी ओर खिचा था और खोलकर उस दरखास्त को पढ़ने लगी कि भोला की आवाज आई

भोला- साइन कर दो मेमसाहब अकाउंट्स में दे दूँगा नहीं तो तनख़्वाह बनते समय पैसा काट जाएगा

और फिर से वही क्लिप चटकने की आवाज गूँज उठी आरती भी थोड़ा सा संभली और उस पेपर को साइन करने के लिए अपना पेन उठाया पर वो सन्न रह गई उसको पढ़ कर लिखा था

आपको फूल कैसे लगे बताया नहीं बड़ी याद आ रही थी आपके जाने के बाद से ही इसलिए भेज दिए थे

और नीचे थोड़ा सा टेडी मेडी लाइन में भी कुछ लिखा था आप साड़ी में ज्यादा सुंदर दिखती है कसम से

आरती का पूरा शरीर एक अजीब सी सिहरन से भर उठा था सिर से लेकर पाँव तक सन्न हो गया था वो उस सिहरन को रोकने की जी जान कोशिश करती जा रही थी पर उसके हाथों की कपकपि को देखकर कोई भी कह सकता था कि उसका क्या हाल था पर भोला चालाक था आगे झुक कर उसने उसकागज को अपनी हथेलियो में वापस ले लिया और थोड़ा सा पीछे होकर कहा

भोला- जी में कल से काम पर आ जाउन्गा मेमसाहब और बाहर चला गया

आरती की सांसें अब भी तेज ही चल रही थी टांगों की भी अजीब हालत थी काप गई थी वो बैठी नहीं रहती तो पक्का था कि गिर ही जाती वो कुछ कहती पर ऋषि की आवाज उसे सुनाई दी

ऋषि- भाभी यह भैया का ड्राइवर है ना

आरती- हाँ…

ऋषि-आपकी तबीयत तो ठीक है भाभी

आरती- हाँ… क्यों

ऋषि नहीं वो आप हाफ रही थी ना इसलिए

आरती- नहीं ठीक है तुम इसे कैसे जानते हो

ऋषि- भोला को एक दिन ना वो भैया के साथ हमारे घर में आया था

आरती- क्यों

ऋषि- वो पापा से मिलने तब देखा था बड़ा ही गुंडा टाइप का है ना यह

आरती- क्यों तुम्हें क्यों लगा

आरती को ऋषि का भोला को गुंडा कहना अच्छा नहीं लगा जो भी हो पर गुंडा नहीं है।

ऋषि- असल में ना जब वो आया था तब ना रीना दीदी को बड़े ही घूर-घूर कर देख रहा था

आरती- यह रीना दीदी कॉन

ऋषि- अरे मेरी सबसे छोटी बहन रीना दीदी को नहीं जानती आप आपकी शादी में भी आए थे हम तो

आरती- अच्छा अच्छा अब कहाँ है

ऋषि- बिचारी की शादी हो गई

आरती के मुख से अचानक ही हँसी का गुबार निकल गया

और हँसते हँसते पूछा

आरती- बिचारी क्यों शादी तो सबकी होती है

ऋषि- हाँ… पर रीना दीदी मुझे बहुत मिस करती है फोन करती है ना तब कहती है

और ऋषि भी थोड़ा सा उदास हो गया था आरती को एक भाई का बहन के प्रति प्यार को देखकर बड़ा ही अच्छा और अपनी संस्कृति को सलाम करने का मन हुआ अपने को थोड़ा सा संभाल कर आरती ने कहा

- अरे रीना दीदी नहीं है तो क्या हुआ में तो हूँ तुम मुझे ही अपना दीदी मान लो है ना

ऋषि- हाँ… मालूम रीना दीदी ना मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी और में उनसे कभी भी कुछ नही छुपाता था मुझे बहुत प्यार करती थी वो हमेशा ही मेरा ध्यान रखती थी

आरती- चलो चलो अब इतने सेंटिमेंटल मत हो अब तुम बड़े हो गये हो और इतना सेंटिमेंटल होगे तो आगे कैसे बढ़ोगे चलो मुझे शोरुम छोड़ दो

आरती अब नार्मल थी पर उसकी नज़र उसकी उंगलियों पर पड़ गई थी शायद एक उंगली में नेल पोलिश लगाया हुआ था ऋषि ने और वो अपने शो रूम की ओर जाने को बाहर निकली थी जैसे ही आफिस को क्रॉस करती एक आदमी दौड़ता हुआ उसके पास आके खड़ा हो गया

वो आदमी- मेडम

आरती- हाँ…

वो आदमी- जी मेडम भोला को क्या काम देना है

एक बार फिर से एक सनसनी सी मचा दी, भोला के नाम से ही

आरती- पता नहीं बोलना भैया से बात करले

वो आदमी- जी मेडम

और आरती पलटकर बाहर हो गई ऋषि भी उसके साथ था और बराबरी पर ही चल रहा था दौड़ता हुआ आगे बढ़ कर गाड़ी कर डोर खोलकर अपनी ओर चला गया

और गाड़ी शोरुम की ओर भागने लगी थी शोरुम में मिश्रा जी बाहर ही काउंटर पर किसी पुराने ग्राहक को अटेंड कर रहे थे पर वो वहां नहीं रुक कर सीधे अपने केबिन की ओर ही बढ़ी पीछे-पीछे ऋषि भी था केबिन के अंदर जाते ही वो एक बार चौंक उठी अंदर रवि बैठा हुआ था

आरती-अरे आप कब आए और फोन भी नहीं किया

रवि- अरे बाबा एक साथ इतने सवाल बैठो तो और ऋषि कैसा है

ऋषि- जी अच्छा हूँ भैया आप कैसे है

आरती और ऋषि भी वही बैठ गये आरती रवि की ओर ही देख रही थी कि कुछ तो कहे

रवि- सर्प्राइज नहीं दे सकता क्या कहा तो था कि दो दिन में आ जाऊँगा

आरती- हाँ… पर फोन तो करते

रवि- फोन करते तो सरप्राइज क्या होता हाँ…

ऋषि बैठे बातें दोनों को नोकझोक बड़े ही शालीनता से देख रहा था और एक मंद सी मुश्कान उसके चहरे पर दौड़ रही थी कितना प्यार था भैया भाभी में

रवि- और ऋषि सुना है तू आज कल आरती को लेने जाता है घर

ऋषि- हाँ… ना

बड़े ही नाटकीय तरीके से उसने जबाब दिया रवि और आरती भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए थे

रवि- चलो बढ़िया है मुझे तो फुरसत नही अबसे एक काम किया कर तू ही आरती को लाया और ले जाया करना ठीक है कोई दिक्कत तो नहीं

आरती- क्यों इस बच्चे को परेशान करते हो

ऋषि- नहीं नहीं भैया कोई परेशानी नहीं मुझे तो अच्छा है एक कंपनी मिल जाएगी

रवि- कंपनी तेरी, मेरी बीवी है पता है

ऋषि- जी हाँ… पता है मुझे पर मेरी तो भाभी है ना और वैसे भी मुझे अकेला अच्छा नहीं लगता

रवि और आरती ऋषि की बातों पर हँसे भी जा रहे थे और मज़े भी लेते जा रहे थे रवि कहता था कि ऋषि लड़कियों की तरह ही बिहेव करता है पर देख आज रही थी आरती

पर था सीधा साधा भैया भाभी के साथ वो भी मजे लेरहा था उसे कोई बुरा नहीं लग रहा था वैसे ही हाथ नचाते हुए और आखें मटकाते हुए वो लगातार जबाब दे रहा था

रवि- तो ठीक है तो अब क्या करेगा कहाँ जाएगा तू

ऋषि- क्यों

तोड़ा सा आश्चर्य हुआ और रवि और आरती की ओर देखने लगा

आरती- अरे बैठने दो ना यही अभी घर जाके क्या करेगा

ऋषि तपाक से बोला

ऋषि- अरे फिल्म देखूँगा ना घर पर कोई नहीं है

रवि- हाँ… पता है कौन सी फिल्म देखेगा और यह तूने धोनी जैसे बाल क्यों बढ़ा रखे है

ऋषि- बाडी गार्ड सलमान खान वाली जी वैसे ही

रवि- क्यों उसमें तो करीना कपूर भी तो है

ऋषि मचलते हुए सा जबाब देता है

ऋषि- हाँ… पर सलमान खान कितना हैंडसम लगा है ना इस फिल्म में क्या बाडी है है ना भाभी

आरती अपनी हँसी नहीं रोक पा रही थी और हाँ में मुन्डी हिलाकर रवि की ओर देखने लगी थी और इशारे से ऋषि को छेड़ने से मना भी करती जा रही थी

रवि- क्या यार करीना भी तो क्या लगी है उसमें उधर ध्यान नहीं गया क्या तेरा

ऋषि- नहीं वो बात नहीं है हाँ… कितनी सुंदर लगी है ना वो और एक बार फिर से आरती का समर्थन लेना चाहता था वो आरती ने भी हाँ में अपना सिर हिला दिया था पर हँसी को कोई नहीं रोक पा रहा था

रवि- अच्छा ठीक है जा जाके सलमान खान को देख और सुन कल में तेरी भाभी को ले आउन्गा तू यहां से ले जाना फैक्टरी ठीक है

ऋषि जैसे बिचलित सा हो उठा था

ऋषि- क्यों आप क्यों

रवि- अबे काम है ना थोड़ा सा बैंक जाना है इसलिए और क्या और सुन हम परसो बॉम्बे जा रहे है

ऋषि उठते उठते फिर से बैठ गया उसका चहरा उदास हो गया था

आरती की हँसी बड़े जोर से फूट पड़ी और उसका साथ रवि ने भी दिया हँसते हँसते आरती का एक हाथ ऋषि के कंधे पर गया और उसे सांत्वना देने लगी थी

आरती- अरे ऋषि में तुम्हें फोन कर दूँगी अभी तुम जाओ ठीक है

ऋषि- पर आप चली जाएँगी तो में तो फैक्टरी नहीं जाऊँगा

रवि- अरे बाबा मत जाना घर में बैठकर फिल्म देखना पर रो तो मत

ऋषि- रो कहाँ रहा हूँ

और आरती की ओर पलट कर

ऋषि - बॉम्बे क्यों जेया रही है भाभी आप्

आरती रवि की ओर देखने लगी थी

रवि- अरे यार वो इम्पोर्ट एक्सपोर्ट वाले बिज़नेस के लिए एक अकाउंट खोलना है एक फॉरेन बैंक में इसलिए

आरती ने एक बार ऋषि की ओर देखा

ऋषि का मन टूट गया था पर अचानक ही उसके मुख से निकला

ऋषि- में भी चलूं भाभी और कस्स कर उसका हाथ को पकड़ लिया आरती की हथेलियो को

रवि और आरती की हँसी अब तो उनके आपे से बाहर थी पर आरती ने बातों को संभाला और

- हाँ… हाँ… चलो क्यों

रवि- अरे यार घूमने नहीं जा रहे है चल ठीक है धरम पाल जी से पूछ लेता हूँ ठीक है

ऋषि आरती की ओर बड़ी ही गुजारिश भरी नजरों से देख रहा था जैसे कि कह रहा हो कि मुझे छोड़ कर मत जाना पर भैया से हिम्मत नहीं पड़ रही थी

रवि ने धरम पाल जी को फोन लगाया

रवि- कैसे हैं आप

धरम पाल जी की आवाज तो वहां बैठे लोगों तक नहीं पहुँची पर

रवि- अच्छा ठीक है हाँ… वो ऋषि को भी ले आता हूँ

रवि- अरे नहीं सुनिए तो अगर मान लीजिए कि आरती को कोई दिक्कत हुई तो कम से कम ऋषि के सिग्नेचर तो चलेंगे ना इसलिए सोचा था

रवि- ठीक है तो हम परसो सुबह की फ्लाइट पकड़ते है हाँ… ठीक है

और फोन काट कर वो ऋषि की ओर मुस्कुराते हुए देखा

रवि- चल तुझे बॉम्बे घुमा लाता हूँ ही ही

ऋषि जैसे खुशी से पागल हो उठा था बड़े ही नाटकिये तरीके से

ऋषि ऊह्ह थॅंक यू भैया थॅंक यू आप कितने अच्छे है (और भाभी की ओर देखते हुए) कितना मजा आएगा ना भाभी है ना

आरती और रवि की हँसी एक साथ फूट पड़ी और जोर-जोर से हँसते हुए दोनों ने ऋषि को किसी तरह विदा किया और शोरुम के काम में लग गये कब रात हो गई और घर जाने का समय हो गया पता भी नहीं चला रात को खाने के बाद जब दोनों अपने कमरे में पहुँचे तो आरती ही रवि पर टूट पड़ी और एक अग्रेसिव खेल फिर शुरू हो गया आरती की हर हरकत मे रवि की जान निकलती जा रही थी इस बार भी रवि को दो बार झुकना पड़ा आरती को संतुष्ट करने के लिए

पर उसके जेहन में एक बात घर कर गई थी कि आरती उसके बिना नहीं रह सकती थी वो यह सोचकर उतावला हो रहा था कि दो दिन बाद मिलने से आरती कितनी उतावली हो जाती है पर एक पति को और क्या चाहिए था वो तो चाहता ही था की उसकी पत्नी उसे मिस करे और आते ही अपने मिस करने का गवाह इस तरीके से प्रस्तुत करे और आरती के लिए तो रवि था ही अपने शरीर की आग को बुझाने के लिए जो आग रामु लाखा और भोला ने लगाई थी वो उसे ही बुझानी थी भोला की हरकतों से वो इतनी उत्तेजित हो गई थी आज कि जैसे ही अपने पति के आगोश में गई थी वो

बस उस राक्षस के बारे में सोचती रह गई थी और रवि पर चढ़ाई कर दी थी रात को आरती ने रामु को कपड़े भी नहीं पहनने दिए और अपनी बाहों में कस कर उसे वैसे ही सोने को मजबूर किया

रात तो कट गई और सुबह भी जैसे तैसे और फिर बैंक के चक्कर और फिर शो रूम ऋषि भी आया पर रवि के सामने कोई ज्यादा हरकत नहीं की बस चुपचाप बैठा रहा और काम देखता रहा

फैक्टरी में भी गया था पर वैसे हो लौट आया था शोरुम में आरती और रवि को देखते ही बोला

ऋषि- आज फैक्ट्री नहीं आई आप भाभी

आरती- हाँ… सीधे यही आ गई थे शाम को भैया के साथ चली जाऊँगी क्यों

ऋषि- नहीं में गया था आप नहीं थी तो चला आया

इतने में पास में बैठे रवि का फोन बजा

रवि- हेलो हाँ… अरे यार तुझे बड़े काम की पड़ी है

रवि- अच्छा एक काम कर गेट पर रहना और गाड़ी का हिसाब देख लेना ऊपर-नीचे मत होना और घाव कैसे है ठीक है

आरती- कौन था

रवि- भोला काम की पड़ी है ठीक हो जाता फिर आता नहीं

रवि अपने काम में लग गया पर भोला नाम से ही आरती का शरीर एक बार फिर से सुन्न पड़ गया था सिर से पाँव तक सिहरन सी दौड़ गई थी पर बैठी हुई अपने आपको संभालने की कोशिश करती रही

आरती- आपने भी तो उसे सिर पड़ चढ़ा रखा है

रवि- अरे यार तुम जानती नहीं उसे साले का सिर कट जाएगा पर काम चोरी नहीं करेगा मर जाएगा पर नमक हलाली नहीं करेगा

आरती- हाँ…

पर वो तो कुछ और ही सोचने में व्यस्त थी ऋषि भी वही बैठा रहा कोई काम नहीं था पर हर बार जब भी आरती या फिर रवि की नजर उससे मिलती तो अपने दाँत निकलकर एक मुश्कान जरूर छोड़ देता था आरती को उसके भोलेपन पर बड़ा ही प्यार आ रहा था अपनी रीना दीदी को मिस करता था वो घर पर भी अकेला था और साथ देने को कोई नहीं

खेर जैसे तैसे शाम भी हो गई ऋषि को उन्होंने सुबह 5 बजे तक एयरपोर्ट पहुँचने को कह कर रवाना किया और वो भी रात होने तक घर पहुँचे पर सुबह के इंतेजार और जाने का टेन्शन के चलते कोई भी ऐसा सर्प्राइज नहीं हुआ जो कि इस कहानी में नया मोड़ ला सके।

सुबह होते ही रवि और आरती जब एरपोर्ट पहुँचे तो ऋषि भी वही था मस्त सा काटन शर्ट और पैंट पहने था देखने में किसी अच्छे घर का लड़का लगता था और पढ़ालिखा भी बस खराबी थी तो जब वो बोलता था या फिर इठलाता था रवि और आरती को देखते ही मचल सा गया था और जल्दी से उनके पास आके नमस्कार करते हुए

ऋषि-कितनी देर करदी भाभी कब से खड़ा हूँ अकेला

वो अब उससे पूरी तरह से लड़कियों जैसा ही बिहेव करने लगा था उसकी बातें भी इसी तरह से निकलने लगी थी और हरकतें तो थी ही

तीनो फ्लाइट में बॉम्बे पहुच जाते है रवि उनको होटल में छोड़कर बाहर निकल जाता है,

आरती और ऋषि दोनो होटल के रूम में बैठे है, और हंसी मजाक करते हुए टाइम पास कर रहे थे। ऋषि आरति से उसे साड़ी पहनाने को कहता कि उसे साड़ी बहुत अच्छी लगती है, आरति ऋषि को बिलुकल एक लड़की की तरह रेडी कर देती है,जिसमे ऋषि बहुत ही कामुक ओरत लगती है, ऋषि एक लैस्बियन लड़की की तरह आरति के साथ हरकतें करने लगता है, ऋषि की छेड़छाड़ से आरती गर्म होती रहती है, तभी

बिना कुछ कहे ही ऋषि ने आरती की पीठ पर अपने हाथों के लेजाकर पीठ पर से उसके पिन को खोलकर उसकी साड़ी को आजाद कर दिया और फिर से उसके पिन को वही ब्लाउस में लगा दिया और आरती की ओर देखकर मुस्कुराने लगा था और झुक कर एक हल्की सी पप्पी उसके गालों में दे डाली

कोई पूछना नहीं ना कोई ओपचारिकता और नहीं कोई शरम हाँ शरम थी तो बस

ऋषि को छूने से,

पर जैसे ही आरती ने ऋषि को मुस्कुराते हुए देखा और उसे अपने करीब खींचा तो

ऋषि- उउउहह क्या है

आरती- मेरे पास आना

ऋषि सरक कर आरती के करीब हो गया आरती का चेहरा उसके कंधों के पास था और वो थोड़ा सा ऊपर

आरती- और पास शरमाता क्यों है हाँ

ऋषि- और कितना पास हूँ तो और नहीं बस

आरती का उल्टा हाथ उसकी बगल से निकाल कर उसके कंधों और पीठ पर घूमने लगे थे ऋषि को शायद गुदगुदी हो रही थी पर अच्छा लग रह आता

ऋषि- उउउंम्म मत करो ना

आरती- ही ही क्यों

ऋषि- उउंम्म गुड गुडी होती है

और उसकी सीधी हथेली आरती के गालों पर घूमने लगी और बड़े ही प्यार से आरती की नजर से नजर मिलाए हुए वो बोला

ऋषि- मालूम रीना दीदी भी मुझे ऐसे ही प्यार करती थी

आरती- हाँ और बता तेरी रीना दीदी क्या-क्या करती थी

वो ऋषि से सट कर लेट गई थी उसकी साड़ी उसकी चूची के ऊपर से हट गई थी और वो एकदम से बाहर की ओर देखने लगी थी ऋषि की हथेली अब धीरे-धीरे उसके गालों से लेकर उसके गले तक और फिर उसके सीने की ओर बढ़ रही थी आरती की सांसो से साफ पता चल रहा था कि अब वो किसी भी कंडीशन में रुकने वाली नहीं थी उसे जो चाहिए था पता नहीं वो उसे मिलेगा कि नहीं पर हाँ… वो ऋषि की हरकतों को तो मना नहीं कर सकती थी अब

ऋषि की हथेली अब उसके गले और ब्लाउज के खुले हुए हिस्से को छूती जा रही थी और उसके होंठों से निकले शब्द आरती के कानों तक पहुँच रहे थे

ऋषि- कितनी साफ्ट स्किन है भाभी आपकी आअह्ह, कितनी साफ्ट हूँ आप और कितनी कोमल हो

उसका हाथ अब आरती के ब्लाउज के ऊपर से उसकी चूची को छू रहा था उसका हाथ ना तो उसकी चुचियों को दबा रहा था और नहीं उसे पिंच कर रहा था

जो उतावला पन आज तक आरती ने अपने जीवन में सहा था हर मर्द के साथ वो कुछ भी नहीं बस ऋषि के हाथ उसके आकार और गोलाइओ को नापने का काम भर कर रहे थे बड़े ही कोमल तरीके से और बड़े ही नजाकत से कोई जल्दी नहीं थी उसे जैसे उसे पता था कि आरती उसके पास से कही नहीं जा सकती या फिर कुछ और

आरती- अया उूउउंम्म क्या कर रह अहैइ उउउम्म्म्म

पर रोकने की कोई कोशिश नहीं हाँ… बल्कि अपने को और उसके पास धकेल जरूर दिया था

ऋषि- कुछ नहीं भाभी बस देख रहा था कि आपकी चुचे कितने सुंदर है ना मेरे तो है नही

आरती- लड़कों के नहीं होते पगले

ऋषि ---हां पर मुझे तो बहुत अच्छे लगते है ये

आरती- हाँ… प्लीज ऋषि अब मत कर

उसका एक हाथ ऋषि के हाथों के ऊपर था पर हटाने को नहीं बल्कि उससे वो ऋषि को इशारा कर रही थी कि थोड़ा सा जोर लगाकर दबा पर ऋषि तो बस आकार और प्रकार लेने में ही मस्त था उसके हाथ अब उसके ब्लाउसको छोड़ कर उसके रिब्स के ऊपर से होते हुए नीचे की ओर जाने लगे थे आरती का शरीर अब तो अकड़ने लगा था वो कमर के बल उठने लगी थी घुटनों के ऊपर उसकी साड़ी आ गई थी और कमर पर ऋषि के हाथों के आने से एक लंबी सी सिसकारी उसके

होंठों से निकली थी

ऋषि- अच्छा लगा रहा है भाभी

आरती- हाँ… हाँ… सस्स्स्स्स्स्स्स्शह

ऋषि---आप बहुत प्यारी है भाभी मन करता है में आपको इसी तरह प्यार करता रहूं कितनी साफ्ट हो आप

और उसके हाथों का स्पर्श अब तो आरती के लिए एक पहेली बन गया था आज जो आग ऋषि लगा रहा था क्या वो इसे भुझा पाएगा पर आरती तो उस आग में जल उठी थी उसे तो अब अपने आपको शांत करना ही था वो अपने चेहरे को ऋषिके सीने में सटा ले रही थी और अपनी लेफ्ट हाथ को ऋषि की पीठ पर घुमाते हुए उसे अपनी ओर खींचने लगी थी उसकी हथेली ऋषि की खुली हुई पीठ पर से धीरे-धीरे अंदर की ओर जाने और ऋषि ने उसके ब्रा की

स्ट्रॅप्स को छू लिया था

आरती एकदम से मूडी और ऋषि से लिपट गई थी ऋषि ने भी भाभी को अपने से सटा लिया था नहीं जानता था कि क्यों पर आरती का लपेटना उसे अच्छा लगा था ऋषि की हथेलिया अब उसके ब्लाउज के खुले हुए हिस्से से उसकी ब्रा को छूते थे तो वो उसके और पास हो जाता था

आरति के जीवन का यह एहसास वो कभी भी भूल नहीं पाएगी यह वो जानती थी पर ऋषि के थोड़ा सा अलग होने से वो थोड़ा सा चिड गई थी

आरती- क्या

ऋषि -- भाभी

आरती- क्या है रुक क्यों गया

ऋषि --आप बहुत उत्तेजित हो गई है है ना

आरती---हां क्यों तू नहीं हुआ

ऋषि कुछ कहता इससे पहले ही आरती ने उसे अपनी ओर खींचा और अपने होंठों से उसके होंठों को चूमने लगी ऋषि ने भी थोड़ी देर वैसे ही अपने होंठों को आरती के सुपुर्द करके चुपचाप उसे स्वाद लेने दिया फिर हटते हुए लंबी-लंबी सांसें छोड़ने लगा था

आरती- क्या हुआ हाँ…

ऋषि- कुछ नहीं एक बात कहूँ भाभी गुस्सा तो नहीं होंगी नाराज तो नहीं होंगी ना

आरती- क्या नाराज क्यों बोल ना

ऋषि साहस जुटा कर जैसे तैसे शब्दों को जोड़ कर आरती की ओर नजर गढ़ाए हुए एक विनती भरी आवाज में कहा

ऋषि--- जी भाभी कन आई टच यू, आइ वान्ट यू भाभी व्हाट टू लव यू प्लीज भाभी प्लीज यू आर सो साफ्ट भाभी आइ जस्ट वाना महसूस यू

आरती- यू जस्ट फेल्ट मी ऋषि

ऋषि- नो भाभी नोट दिस वे दा वे आई वॉंट प्लीज भाभी आई प्रॉमिस यू

आरती के पास जबाब नहीं था उसकी हालत खराब थी पर जिस तरह से ऋषि उससे गुजारिश कर रहा था वो एक अजीब सा तरीका था

आरती- आई म नोट गेटिंग यू ऋषि हाउ

ऋषि- जस्ट डू ऐज आई से भाभी प्लीज यू विल सी हाउ प्लेसुरबले इट ईज़ आई प्रॉमिस

आरती- प्लीज ऋषि आई म स्केर्ड व्हाट शुड आई डू प्लीज ऋषि

आरती ऋषि के गालों को छूते हुए उसके पास थी और ऋषि भी तेज सांसें लेता हुआ उसके बालों को छूता हुआ उसे बड़े प्यार समझा रहा था

ऋषि- भाभी प्लीज स्ट्रीप युवर साड़ी और ले डाउन आंड सी व्हाट आई डू जस्ट एंजाय

आरती- उूउउम्म्म्म ऋषि यू नो व्हाट यू आर सेयिंग कॅन यू मनेज आई म नोट शुवर अबाउत इट बॅट इफ यू से सो बट प्लीज ऋषि

आरती धीरे से ऋषि की ओर देखती हुई बेड से उतरी और साइड में खड़ी हुई ऋषि की ओर देखती हुई कमर से एक साथ ही पूरी साड़ी को खींच लिया और वही नीचे ही गिरने दिया वो अपनी पेटीकोट को उँचा करती हुई लगभग घुटनों तक उठाकर अपने आपको वापस बेड पर चढ़ा लिया और ऋषि की ओर देखती हुई उसके पास लेट गई

दोनों एक दूसरे को बड़े ही ध्यान से देख रहे थे आरती को श्योर नहीं था जो ऋषि ने उससे कहा था पर उसके पास अपनी काम अग्नि को बुझाने का कोई और रास्ता भी नहीं था ऋषि एक मर्द था शायद उसके अंदर का कोई चीज अब भी जिंदा हो या फिर वो सिर्फ़ दिखावा कर रहा हो असल में वो भी रवि रामु और लाखा के जैसा ही हो

पर ऋषि अपनी जगह पर ही बैठा रहा और मुस्कुराता हुआ आरती को बेड पर लेटा हुआ देखता रहा वो अभी साड़ी पहना था

आरती- तू नहीं उतारेगा साड़ी हाँ…

ऋषि---आप कितनी सुंदर हो भाभी कितनी गोरी कितनी कोमल हो भाभी

वो अपनी हथेली आरती की टांगों से लेकर धीरे-धीरे ऊपर उसकी जाँघो तक ले जा रहा था बड़े ही संभाल कर बड़े ही कोमलता से कही कोई ताकत का इश्तेमाल नहीं कर रहा था और नहीं कोई उतावलापन बड़े ही शांत और नजाकत से ऋषि उसके शरीर की सुदोलता का एहसास कर रहा था आरती का पूरा शरीर जल रहा था वो जानती थी कि जो ऋषि कर रहा है वो एक छलावा है पर वो मजबूर थी उसे ऋषि का इस तरह से उसे छुना अच्छा लग रहा था वो आजाद थी इधर उधर होने को अपने आपको तड़पने को उसे ऋषि के मजबूत हाथ नहीं रोक रहे थे वो तो बस उसके शरीर की रचना को देख रहा था उसकी कोमलता का एहसास भरकर रहा था

आरती की पेटीकोट उसके कमर तक आ पहुँची थी और उसकी पैंटी उसके कमर पर कसी हुई और उसकी जाँघो के बीच में जाकर गुम हो गई थी वो अपनी कमर के सहारे अपनी टांगों को खोलकर बंद करके और इधार उधर होकर अपनी उत्तेजना को छुपा रही थी और ऋषि अपने हाथों से उसकी कमर के पास उसके पेट को सहलाता जा रहा था

आरती का हाथ एक बार ऋषि के चहरे तक गया और उसे अपनी ओर खींचने लगी थी वो उसे किस करना चाहती थी

ऋषि ने एक बार उठकर उसे देखा और मुस्कुराता हुआ उसके पास आ गया और अपने होंठों को धीरे से आरती के होंठों पर रखा आरती झट से उसके होंठों पर टूट पड़ी पर ऋषि उससे अलग हो गया

ऋषि- आआअम्म्म्म ऐसे नहीं बी जेंटल भाभी बी जेंटल

और धीरे से अपने होंठों से आरती के होंठों को किस किया और फिर अपनी जीब को निकाल कर धीरे-धीरे उसके होंठों पर फेरने लगा था कोई जल्दी नहीं कोई ताकत नहीं बस एहसास सिर्फ़ स्पर्श और कुछ नहीं आरती की जिंदगी का पहला किस्स जो की इतना मधुर और सौम्य था वो अपनी आखें खोलकर ऋषि की ओर देखती रही उसकी साँसे बहुत तेज चल रही थी उसकी एक हथेली ऋषि के पीछे उसके बालों से लेकर उसके गले से होते हुए उसके ब्लाउज के खुले हिस्से में घूम रही थी वो जान बूझ कर अपनी हथेली को उससे भी नीचे ले गई और उसके ब्लाउज के खुले हिस्से से उसके अंदर डाल दिया और ऋषि को फिर से अपनी ओर खींच लिया ऋषि ने भी कोई संघर्ष नहीं किया और चुपचाप अपने होंठों को फिर से उसके होंठों पर रख दिया इस बार बारी आरती की थी
 
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