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उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर
विनोद की माँ हस्मिती महेन्द्र की माँ राजलक्ष्मी के पास जाकर धरना देने लगी। दोनों एक ही गाँव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं।
राजलक्ष्मी महेन्द्र के पीछे पड़ गई- "बेटा महेन्द्र, इस गरीब की बिटिया का उध्दार करना पड़ेगा। सुना है, लड़की बड़ी सुन्दर है, फिर लिखी-पढ़ी भी है। उसकी रुचियाँ भी तुम लोगों जैसी हैं।
महेन्द्र बोला- "आजकल के तो सभी लड़के मुझ जैसे ही होते हैं।"
राजलक्ष्मी- "तुझसे शादी की बात करना ही मुश्किल है।"
महेन्द्र- "माँ, इसे छोड़कर दुनिया में क्या और कोई बात नहीं है।"
महेन्द्र के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे। माँ से महेन्द्र का बर्ताव साधारण लोगों जैसा न था। उम्र लगभग बाईस की हुई, एम.ए. पास करके डॉक्टरी पढ़ना शुरू किया है, मगर माँ से उसकी रोज-रोज की ज़िद का अन्त नहीं। कंगारू के बच्चे की तरह माता के गर्भ से बाहर आकर भी उसके बाहरी थैली में टँगे रहने की उसे आदत हो गई है। माँ के बिना आहार-विहार, आराम-विराम कुछ भी नहीं हो पाता।
अबकी बार जब माँ विनोदिनी के लिए बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई तो महेन्द्र बोला, "अच्छा, एक बार लड़की को देख लेने दो!"
लड़की देखने जाने का दिन आया तो कहा, "देखने से क्या होगा? शादी तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए कर रहा हूँ। फिर मेरे अच्छा-बुरा देखने का कोई अर्थ नहीं है।" महेन्द्र के कहने में पर्याप्त गुस्सा था, मगर माँ ने सोचा, "'शुभ-दृष्टि'1 के समय जब मेरी पसन्द और उसकी पसन्द एक हो जाएगी, तो उसका स्वर भी नर्म हो जाएगा।" राजलक्ष्मी ने बेफिक्र होकर विवाह का दिन तय किया। दिन जितना ही क़रीब आने लगा, महेन्द्र का मन उतना ही बेचैन हो उठा। मात्रा दो-चार दिन पहले वह कह बैठा- "नहीं माँ, यह मुझसे हर्गिज न होगा।"
छुटपन से महेन्द्र को हर तरह का सहारा मिलता रहा है। इसलिए उसकी इच्छा सर्वोपरि है। दूसरे का दबाव उसे बर्दाश्त नहीं। अपनी स्वीकृति और दूसरों के आग्रह ने उसे बेबस कर दिया है, इसीलिए विवाह के प्रस्ताव के प्रति नाहक ही उसकी वितृष्णा बढ़ गई और विवाह का दिन नज़दीक आ गया तो उसने एकबारगी 'नाही' कर दी। महेन्द्र का जिगरी दोस्त था बिहारी; वह महेन्द्र को 'भैया' और उसकी माँ को 'माँ' कहा करता था। माँ उसे स्टीमर के पीछे जुड़ी डोंगी- जैसा भारवाही सामान मानती थीं और वैसी ही उस पर ममता भी रखती थीं। वे बिहारी से बोलीं- "बेटे, यह तो अब तुम्हें ही करना है, नहीं तो उस बेचारी लड़की...."
बिहारी ने हाथ जोड़कर कहा- "माँ, यह मुझसे न होगा। अच्छी न लगी कहकर महेन्द्र जो मिठाई छोड़ देता है वह मैंने बहुत खाई; मगर लड़की के बारे में ऐसा नहीं हो सकता।"
राजलक्ष्मी ने सोचा, 'भला बिहारी विवाह करेगा! उसे तो बस एक महेन्द्र की पड़ी है, बहू लाने का ख्याल भी नहीं आता उसके मन में।'
यह सोचकर बिहारी के प्रति उनकी कृपा-मिश्रित ममता कुछ और बढ़ गई।
विनोदिनी के पिता कुछ ख़ास धनी न थे, परन्तु अपनी इकलौती बेटी को मिशनरी मेम रखकर बड़े जतन से पढ़ाया-लिखाया। इतना ही नहीं घर के काम में भी चाक-चौबंद किया। वे गुजर गए और बेचारी विधवा माँ बेटी के विवाह के लिए परेशान हो गई। पास में रुपया-पैसा नहीं, ऊपर से लड़की की उम्र भी ज़्यादा।
आखिर राजलक्ष्मी ने अपने मैके में गाँव के एक रिश्ते के भतीजे से विनोदिनी का विवाह करा दिया।
कुछ ही दिनों में वह विधवा हो गई। महेन्द्र ने हँसकर कहा, "गनीमत थी कि शादी नहीं की।"
कोई तीन साल बाद माँ-बेटे में फिर एक बात हो रही थी।
"बेटा, लोग तो मेरी ही शिकायत करते हैं।"
"क्यों भला, तुमने लोगों का ऐसा क्या बिगाड़ा है?"
"बहू के आने से बेटा पराया न हो जाए, मैं इसी डर से तेरी शादी नहीं करती- लोग यही कहा करते हैं।"
महेन्द्र ने कहा, "डर तो होना ही चाहिए। मैं माँ होता, तो जीते-जी लड़के का विवाह न करता। लोगों की शिकायतें सुन लेता।"
माँ हँसकर बोली- "सुनो, जरा इसकी बातें सुन लो।"
महेन्द्र बोला- "बहू तो आकर लड़के को अपना बना ही लेती है। फिर इतना कष्ट उठाने वाली माँ अपने-आप दूर हो जाती है। तुम्हें यह चाहे जैसा लगे मुझे तो ठीक नहीं लगता।"
राजलक्ष्मी ने मन-ही-मन गद्गद होकर हाल ही आई अपनी विधवा देवरानी से कहा, "सुनो मँझली, जरा महेन्द्र की सुनो! कहीं बहू आकर माँ पर हावी न हो जाए, इसी डर से वह विवाह नहीं करना चाहता। ऐसी बात कभी सुनी है तुमने?"
चाची बोलीं, "यह तुम्हारी ज्यादती है बेटे! जबकि जो बात हो, वही अच्छी लगती है। माँ का दामन छोड़कर अब घर-गृहस्थी बसाने का समय आ गया है। अब नादानी अच्छी नहीं लगती उल्टी शर्म आती है।"
राजलक्ष्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी। इस सिलसिले में उन्होंने जो कुछ कहा, वह जैसा हो मगर स्वमर भीगा तो नहीं था। बोलीं- "मेरा बेटा अगर और लड़कों की अपेक्षा अपनी माँ को ज़्यादा स्नेह करता है, तो तुम्हें शर्म क्यों लगती है, मँझली बहू? कोख का लड़का होता तो समझ में आता।"
राजलक्ष्मी को लगा, 'निपूती बेटे के सौभाग्यवाली सेईर्ष्या कर रही है।'
मँझली बहू ने कहा- "तुमने बहू लाने की चर्चा चलाई इसीलिए यह बात निकल गई, वर्ना मुझे क्या हक है?"
राजलक्ष्मी बोलीं- "मेरा बेटा अगर विवाह नहीं करता, तो तुम्हारी छाती क्यों फटती है! ठीक तो है, लड़के की जैसे आज तक देख-भाल करती आई हूँ, आइन्दा भी कर लूँगी- इसके लिए और किसी की मदद की ज़रूरत न होगी।"
मँझली बहू आँसू बहाती चुपचाप चली गई। महेन्द्र को मन-ही-मन इससे चोट पहुँची। कॉलेज से कुछ पहले ही लौटकर वह अपनी चाची के कमरे में दाखिल हुआ।
वह समझ रहा था कि चाची ने जो कुछ कहा था, उसमें सिवाय स्नेह के और कुछ न था। और उसे यह भी पता था कि चाची की एक भानजी है, जिसके माता-पिता नहीं हैं। वे चाहती हैं कि महेन्द्र से उसका ब्याह हो जाए। हालाँकि शादी करना उसे पसन्द न था। फिर भी चाची की यह आंतरिक इच्छा उसे स्वाभाविक और करुण लगती है। उसे मालूम था कि उनकी कोई संतान नहीं है।
महेन्द्र कमरे में पहुँचा, तो दिन ज़्यादा नहीं रह गया था। चाची अन्नपूर्णा खिड़की पर माथा टिकाए उदास बैठी थी। बगल में कमरे में खाना ढका रखा था। शायद उन्होंने खाया नहीं।
बहुत थोड़े में ही महेन्द्र की आँखें भर आतीं। चाची को देखकर उसकी आँखें छलछला उठीं। क़रीब जाकर स्निग्ध स्वर से बोला- "चाची!"
अन्नपूर्णा ने हँसने की कोशिश की। कहा, "आ बेटे, बैठ!"
महेन्द्र का मन भीगा हुआ था। चाची को दिलासा देने के विचार से वह अचानक बोल उठा, "अच्छा चाची, तुमने अपनी भानजी की बात बताई थी, एक बार दिखा सकती हो?" कहकर महेन्द्र डर गया।
अन्नपूर्णा हँसकर बोलीं- "क्यों? शादी के लड्डू फूट रहे हैं बेटा!"
महेन्द्र झटपट बोल उठा- "नहीं-नहीं, अपने लिए नहीं, मैंने बिहारी को राज़ी किया है। लड़की देखने का कोई दिन तय कर दो!"
अन्नपूर्णा बोलीं- "अहा, उस बेचारी का ऐसा भाग्य कहाँ? भला उसे बिहारी-जैसा लड़का नसीब हो सकता है!"
महेन्द्र चाची के कमरे से निकला कि दरवाज़े पर माँ से मुलाकात हो गई। राजलक्ष्मी ने पूछा, "क्यों रे, क्या राय-मशविरा कर रहा था?"
महेन्द्र बोला- "राय-मशविरा नहीं, पान लेने गया था?"
माँ ने कहा- "तेरा पान तो मेरे कमरे में रखा है।"
महेन्द्र ने कुछ नहीं कहा। चला गया।
राजलक्ष्मी अन्दर गई और अन्नपूर्णा की रुलाई से सूजी आँखें देखकर लमहे-भर में बहुत सोच लिया। छूटते ही फुफकार छोड़ी- "क्यों मँझली बहू महेन्द्र के कान भर रही थी, है न?"
और बिना कुछ सुने तत्काल तेज़ी से निकल गई।
2
कन्या देखने की बात महेन्द्र ने की ज़रूर मगर वह भूल गया फिर भी अन्नपूर्णा नहीं भूली। उन्होंने लड़की के अभिभावक, उसके बड़े चाचा को जल्दी में श्यामबाज़ार पत्र भेजा और एक दिन तय कर लिया।
महेन्द्र ने जब सुना कि देखने का दिन पक्का हो गया है तो बोला- "चाची, इतनी जल्दी क्यों की! बिहारी से तो मैंने अभी तक ज़िक्र नहीं किया।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "ऐसा भी होता है भला! अब अगर तुम लोग न जाओ तो वे क्या सोचेंगे?"
महेन्द्र ने बिहारी को बुलाकर सारी बातें बताईं कहा-"चलो तो सही, लड़की न जँची, तो तुम्हें मजबूर नहीं किया जाएगा।"
बिहारी बोला- "यह मैं नहीं कह सकता। चाची की भानजी को देखने जाना है। देखकर मेरे मुँह से यह बात हर्गिज न निकल सकेगी कि लड़की मुझे पसन्द नहीं।"
महेन्द्र ने कहा- "फिर तो ठीक ही है।"
बिहारी बोला- "लेकिन तुम्हारी तरफ से यह ज्यादती है, महेन्द्र भैया! खुद तो हल्के हो जाएँ और दूसरे के कन्धे पर बोझ रख दें, यह ठीक नहीं। अब चाची का जी दुखाना मेरे लिए बहुत कठिन है।"
महेन्द्र कुछ शर्मिन्दा और नाराज होकर बोला-"आखिर इरादा क्या है तुम्हारा?"
बिहारी बोला- "मेरे नाम पर जब तुमने उन्हें उम्मीद दिलाई है तो मैं विवाह करूँगा। यह देखने जाने का ढोंग बेकार है।"
बिहारी अन्नपूर्णा की देवी की भांति भक्ति करता था। आखिर अन्नपूर्णा ने खुद बिहारी को बुलवाकर कहा- "ऐसा भी कहीं होता है, बेटे! लड़की देखे बिना ही विवाह करोगे। यह हर्गिज न होगा। लड़की पसन्द न आए तो तुम हर्गिज 'हाँ' नहीं करोगे। समझे। तुम्हें मेरी कसम....!"
जाने के दिन कॉलेज से लौटकर महेन्द्र ने माँ से कहा- "जरा मेरा वह रेशमी कुरता और ढाका वाली धोती निकाल दो!"
माँ ने पूछा- "क्यों, कहाँ जाना है?"
महेन्द्र बोला- "काम है, तुम ला दो, फिर बताऊँगा।"
महेन्द्र थोड़ा सँवरे बिना न रह सका। दूसरे के लिए ही क्यों न हो, लड़की का मसला जवानी में सभी से थोड़ा सँवार करा ही लेता है।
दोनों दोस्त लड़की देखने निकल पड़े।
लड़की के बड़े चाचा अनुकूल बाबू ने अपनी कमाई से अपना बाग वाला तिमंजिला मकान मुहल्ले में सबसे ऊँचा बना रखा है।
गरीब भाई की माँ-बाप-विहीना बेटी को उन्होंने अपने ही यहाँ रखा है। उसकी मौसी अन्नपूर्णा ने कहा था, मेरे पास रहने दो। इससे खर्च की कमी ज़रूर होती, लेकिन गौरव की कमी के डर से अनुकूल राज़ी न हुए। यहाँ तक कि मुलाकात के लिए भी कभी उसे मौसी के यहाँ नहीं जाने देते थे। अपनी मर्यादा के बारे में इतने ही सख्त थे वे।
लड़की के विवाह की चिन्ता का समय आया। लेकिन इन दिनों विवाह के विषय में 'यादृशी भावना यस्य सिध्दर्भवति तादृशी' वाली बात लागू नहीं होती। चिन्ता के साथ-साथ लागत भी लगती। परन्तु दहेज की बात उठते ही अनुकूल कहते, 'मेरी भी तो अपनी लड़की है, अकेले मुझसे कितना करते बनेगा।' इसी तरह दिन निकलते जा रहे थे। ऐसे में बन-सँवरकर खुशबू बिखेरते हुए रंग-भूमि में अपने दोस्त के साथ महेन्द्र ने प्रवेश किया।
चैत का महीना। सूरज डूब रहा था। दुमंजिले का दक्षिणी बरामदा चिकने चीनी टाइलों का बना, उसी के एक ओर दोनों मेहमानों के लिए फल-फूल, मिठाई से भरी चाँदी की तश्तरियाँ रखी गईं। बर्फ़ के पानी-भरे गिलास जैसे ओस-बूँदों से झलमल। बिहारी के साथ महेन्द्र सकुचाते हुए खाने बैठा। नीचे माली पौधों में पानी डाल रहा था और भीगी मिट्टी की सोंधी सुगन्ध लिये दक्खिनी बयार महेन्द्र की धप-धप धुली चादर के छोर को हैरान कर रही थी। आसपास के दरवाज़े के झरोखों की ओट से कभी-कभी दबी हँसी, फुसफुसाहट, कभी-कभी गहनों की खनखनाहट सुनाई दे रही थी।
खाना खत्म हो चुका तो अन्दर की तरफ देखते हुए अनुकूल बाबू ने कहा- "चुन्नी, पान तो ले आ, बेटी!"
जरा देर में संकोच से पीछे का दरवाज़ा खुल गया और सारे संसार की लाज से सिमटी एक लड़की हाथ में पानदान लिये अनुकूल बाबू के पास आकर खड़ी हुई। वे बोले, "शर्म काहे की बिटिया, पानदान उनके सामने रखो!"
उसने झुककर काँपते हुए हाथों से मेहमानों की बगल में पानदान रख दिया। बरामदे के पश्चिमी छोर से डूबते हुए सूरज की आभा उसके लज्जित मुखड़े को मंडित कर गई। इसी मौके से महेन्द्र ने उस काँपती हुई लड़की के करुण मुख की छवि देख ली।
बालिका जाने लगी। अनुकूल बाबू बोले- "ज़रा ठहर जा, चुन्नी! बिहारी बाबू, यह है छोटे भाई अपूर्व की लड़की, अपूर्व तो चल बसा, अब मेरे सिवाय इसका कोई नहीं।" और उन्होंने एक लम्बी उसाँस ली।
महेन्द्र का मन पसीज गया। उसने एक बार फिर लड़की की तरफ देखा।
उसकी उम्र साफ-साफ कोई न बताता। सगे-सम्बन्धी कहते, बारह-तेरह होगी। यानी चौदह-पन्द्रह होने की सम्भावना ही ज़्यादा थी। लेकिन चूँकि दया पर चल रही थी इसलिए सहमे से भाव ने उसके नवयौवन के आरम्भ को ज़ब्त कर रखा था।
महेन्द्र ने पूछा- "तुम्हारा नाम?"
अनुकूल बाबू ने उत्साह दिया- "बता बेटी, अपना नाम बता!"
अपने अभ्यस्त आदेश-पालन के ढंग से झुककर उसने कहा- "जी, मेरा नाम आशालता है।"
"आशा!" महेन्द्र को लगा, नाम बड़ा ही करुण और स्वर बड़ा कोमल है।
दोनों मित्रों ने बाहर सड़क पर आकर गाड़ी छोड़ दी। महेन्द्र बोला- "बिहारी, इस लड़की को तुम हर्गिज मत छोड़ो?"
बिहारी ने इसका कुछ साफ़ जवाब न दिया। बोला-"इसे देखकर इसकी मौसी याद आ जाती है। ऐसी ही भली होगी शायद!"
महेन्द्र ने कहा- "जो बोझा तुम्हारे कन्धे पर लाद दिया, अब वह शायद वैसा भारी नहीं लग रहा है।"
बिहारी ने कहा- "नहीं, लगता है तो ढो लूँगा।"
महेन्द्र बोला- "इतनी तकलीफ उठाने की क्या ज़रूरत है? तुम्हें बोझा लग रहा हो तो मैं उठा लूँ।"
बिहारी ने गम्भीर होकर महेन्द्र की तरफ ताका। बोला- "सच? अब भी ठीक-ठीक बता दो! यदि तुम शादी कर लो तो चाची कहीं ज़्यादा खुश होंगी- उन्हें हमेशा पास रखने का मौक़ा मिलेगा।"
महेन्द्र बोला- "पागल हो तुम! यह होना होता तो कब का हो जाता।"
बिहारी ने कोई एतराज न किया। चला गया और महेन्द्र भी यहाँ-वहाँ भटककर घर पहुँच गया।
माँ पूरियाँ निकाल रही थीं। चाची तब तक अपनी भानजी के पास से लौटकर नहीं आई थीं।
महेन्द्र अकेला सूनी छत पर गया और चटाई बिछाकर लेट गया। कलकत्ता की ऊँची अट्टालिकाओं के शिखरों पर शुक्ला सप्तमी का आधा चाँद टहल रहा था। माँ ने खाने के लिए बुलाया, तो महेन्द्र ने अलसाई आवाज़ में कहा- "छोड़ो, अब उठने को जी नहीं चाहता।"
माँ ने कहा- "तो यहीं ले आऊँ?"
महेन्द्र बोला- "आज नहीं खाऊँगा। मैं खाकर आया हूँ।"
माँ ने पूछा- "कहाँ खाने गया था?"
महेन्द्र बोला- "बाद में बताऊँगा।"
वे लौटने लगीं तो थोड़ा सोचते हुए महेन्द्र ने कहा-"माँ! खाना यहीं ले आओ।"
3
रात में महेन्द्र ठीक से सो नहीं पाया। आज ही वह बिहारी के घर पहुँच गया। बोला- "भई यारो, मैंने बड़ी ध्या न से सोचा ओर देखा- कि चाची यही चाहती है कि शादी मैं ही करूँ।"
बिहारी बोला- "इसके लिए सोचने की ज़रूरत नहीं थी। यह बात तो वे खुद कई बार कह चुकी हैं।"
महेन्द्र बोला- "तभी तो कहता हूँ, मैंने आशा से विवाह न किया तो उन्हें दु:ख होगा।"
बिहारी बोला- "हो सकता है!"
महेन्द्र ने कहा, "मेरा ख्याल है, यह तो ज्यादती होगी।"
"हाँ! बात तो ठीक है।" बिहारी ने कहा- "यह बात थोड़ी देर से आपकी समझ में आई। कल आ जाता तो अच्छा होता।"
महेन्द्र- "एक दिन बाद ही आया, तो क्या बुरा हो गया।"
विवाह की बात पर मन की लगाम को छोड़ना था कि महेन्द्र के लिए धीरज रखना कठिन हो गया। उसके मन में आया- इस बारे में बात करने का तो कोई अर्थ नहीं है। शादी हो ही जानी चाहिए।
उसने माँ से कहा- "अच्छा माँ, मैं विवाह करने के लिए राजी हूँ।"
माँ मन-ही-मन बोलीं- "समझ गई, उस दिन अचानक क्यों मँझली बहू अपनी भानजी को देखने चली गई। और क्यों महेन्द्र बन-ठनकर घर से निकला।"
उनके अनुरोध की बार-बार उपेक्षा होती रही और अन्नपूर्णा की साजिश कारगर हो गई, इस बात से वह नाराज़ हो उठीं। कहा- "अच्छा, मैं अच्छी-सी लड़की को देखती हूँ।"
आशा का ज़िक्र करते हुए महेन्द्र ने कहा- "लड़की तो मिल गई।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "उस लड़की से विवाह नहीं हो सकता, यह मैं कहे देती हूँ।"
महेन्द्र ने बड़े संयत शब्दों में कहा- "क्यों माँ, लड़की बुरी तो नहीं है।"
राजलक्ष्मी- "उसके तीनों कुल में कोई नहीं। ऐसी लड़की से विवाह रचकर कुटुम्ब को सुख भी न मिल सकेगा।"
महेन्द्र- "कुटुम्ब को सुख मिले न मिले लड़की मुझे खूब पसन्द है।" उससे शादी न हुई तो मैं दुखी हो जाऊँगा।"
लड़के की ज़िद से राजलक्ष्मी और सख्त हो गईं। वह अन्नपूर्णा से भिड़ गईं- "एक अनाथ से विवाह कराकर तुम मेरे लड़के को फँसा रही हो। यह हरकत है।"
अन्नपूर्णा रो पड़ी- "उससे तो शादी की कोई बात ही नहीं हुई, उसने तुम्हें क्या कहा, इसकी मुझे जरा भी खबर नहीं।"
राजलक्ष्मी इसका रत्ती- भर यकीन न कर सकीं।
अन्नपूर्णा ने बिहारी को बुलवाया और आँसू भरकर कहा- "तय तो सब तुमसे हुआ था, फिर तुमने पासा क्यों पलट दिया? मैं कहे देती हूँ शादी तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी। यह बेड़ा तुम न पार करोगे तो मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी होगी। वैसे लड़की अच्छी है।"
बिहारी ने कहा- "चाची, तुम्हारी बात मंजूर है। वह तुम्हारी भानजी है, फिर मेरे 'ना' करने की कोई बात ही नहीं। लेकिन महेन्द्र..."
अन्नपूर्णा बोलीं- "नहीं-नहीं बेटे, महेन्द्र से उसका विवाह किसी भी हालत में न होगा। यकीन मानो, तुमसे विवाह हो, तभी मैं ज़्यादा निश्चिंत हो सकूँगी। महेन्द्र से रिश्ता हो यह मैं चाहती भी नहीं।"
बिहारी बोला- "तुम्हीं नहीं चाहतीं तो कोई बात नहीं।"
और वह राजलक्ष्मी के पास जाकर बोला- "माँ, चाची की भानजी से मेरी शादी पक्की हो गई। सगे-सम्बन्धियों में तो कोई महिला है नहीं इसलिए मैं ही खबर देने आया हूँ।"
राजलक्ष्मी- "अच्छा! बड़ी खुशी हुई बिहारी, सुनकर। लड़की बड़ी भली है। तेरे लायक। इसे हाथ से जाने मत देना!"
बिहारी- "हाथ से बाहर होने का सवाल ही क्या! खुद महेन्द्र भैया ने लड़की पसन्द करके रिश्ता पक्का किया है।"
इन झंझट से महेन्द्र और भी उत्तेजित हो गया। माँ और चाची से नाराज़ होकर वह मामूली-से छात्रावास में जाकर रहने लगा।
राजलक्ष्मी रोती हुई अन्नपूर्णा के कमरे में पहुँचीं; कहा- "मँझली बहू, लगता है, उदास होकर महेन्द्र ने घर छोड़ दिया, उसे बचाओ!"
अन्नपूर्णा बोली- "दीदी, धीरज रखो, दो दिन के बाद गुस्सा उतर जाएगा।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "तुम उसे जानती नहीं बहन, वह जो चाहता है, न मिले तो कुछ भी कर सकता है। जैसे भी हो, अपनी बहन की लड़की से...."
अन्नपूर्णा- "भला यह कैसे होगा दीदी, बिहारी से बात लगभग पक्की हो चुकी।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "हो चुकी, तो टूटने में देर कितनी लगती है?"
और उन्होंने बिहारी को बुलवाया। कहा- "तुम्हारे लिए मैं दूसरी लड़की ढूँढ़ देती हूँ- मगर इससे तुम्हें बाज आना पड़ेगा।"
बिहारी बोला- "नहीं माँ, यह नहीं होगा। सब तय हो चुका है।"
राजलक्ष्मी फिर अन्नपूर्णा के पास गईं। बोलीं- "मेरे सिर की कसम मँझली, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ... तुम्हीं बिहारी से कहो! तुम कहोगी तो बिगड़ी बन जाएगी।" आखिर अन्नपूर्णा ने बिहारी से कहा- "बेटा, तुमसे कुछ कहने का मुँह नहीं है, मगर लाचारी है क्या करूँ। आशा को तुम्हें सौंपकर ही मैं निश्चिंत होती, मगर क्या बताऊँ, सब तो तुम्हें पता है ही।"
बिहारी- "समझ गया। तुम जो हुक्म करोगी, वही होगा। लेकिन फिर कभी किसी से विवाह करने का मुझसे आग्रह मत करना!"
बिहारी चला गया। अन्नपूर्णा की आँखें छलछला गईं। महेन्द्र का अमंगल न हो, इस आशंका से उन्होंने आँखें पोंछ लीं। बार-बार दिल को दिलासा दिया- "जो हुआ, अच्छा ही हुआ।"
और इस तरह राजलक्ष्मी- अन्नपूर्णा- महेन्द्र में किल-किल चलते-चलते आखिर विवाह का दिन आया। रोशनी हँसती हुई जली, शहनाई उतनी ही मधुर बजी जितनी वह बजा करती है। यानी उसके दिल के साथ कोई न था।
सज-सँवरकर लज्जित और मुग्ध-मन आशा अपनी नई दुनिया में पहली बार आई। उसके कंपित कोमल हृदय को पता ही न चला कि उसके इस बसेरे में कहीं काँटा है। बल्कि यह सोचकर भरोसे और आनन्द से उसके सारे ही संदेह जाते रहे कि इस दुनिया में एकमात्र माँ- जैसी अपनी मौसी के पास जा रही है।
विवाह के बाद राजलक्ष्मी ने कहा- "मैं कहती हूँ, अभी कुछ दिन बहू अपने बड़े चाचा के घर ही रहे।"
महेन्द्र ने पूछा- "ऐसा क्यों, माँ?"
माँ ने कहा- "तुम्हारा इम्तहान है। पढ़ाई-लिखाई में रुकावट पड़ सकती है।"
महेन्द्र बोला- "आखिर मैं कोई नन्हा-नादान हूँ। अपने भले-बुरे की समझ नहीं मुझे?"
राजलक्ष्मी- "जो हो, साल-भर की ही तो बात है।"
महेन्द्र ने कहा- "इसके माँ-बाप रहे होते, तो मुझे कोई एतराज न होता लेकिन चाचा के यहाँ इसे मैं नहीं छोड़ सकता।"
राजलक्ष्मी-(अपने आप) "बाप रे आप ही मालिक, सास कोई नहीं! कल शादी और आज ही इतनी हमदर्दी! आखिर हमारी भी तो शादी हुई थी। मगर तब ऐसी बेहयाई न थी।"
महेन्द्र ने दृढ़ता से कहा- "तुम बिल्कुल मत सोचो, माँ! इम्तहान में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
4
आखिर राजलक्ष्मी असीम उत्साह से बहू को गृहस्थी के काम-काज सिखाने में जुट गई। भण्डार रसोई और पूजा-घर में आशा के दिन कटने लगे, रात को अपने साथ सुलाकर वह उसके आत्मीय बिछोह की कमी को पूरा करने लगीं।
काफ़ी सोच-समझकर अन्नपूर्णा आशा से दूर ही रहा करतीं। कोई अभिभावक जब खुद सारी ईख का रस चूसने लगता है, तब निराश बच्चे की रंजिश कम नहीं होती। महेन्द्र की हालत भी वैसी ही हो गई। उसकी आँखों के सामने ही नवयुवती वधू का सारा मीठा रस गिरस्ती के कामों में निचुड़ता रहे, यह भला कैसे सहा जा सकता है।
विनोद की माँ हस्मिती महेन्द्र की माँ राजलक्ष्मी के पास जाकर धरना देने लगी। दोनों एक ही गाँव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं।
राजलक्ष्मी महेन्द्र के पीछे पड़ गई- "बेटा महेन्द्र, इस गरीब की बिटिया का उध्दार करना पड़ेगा। सुना है, लड़की बड़ी सुन्दर है, फिर लिखी-पढ़ी भी है। उसकी रुचियाँ भी तुम लोगों जैसी हैं।
महेन्द्र बोला- "आजकल के तो सभी लड़के मुझ जैसे ही होते हैं।"
राजलक्ष्मी- "तुझसे शादी की बात करना ही मुश्किल है।"
महेन्द्र- "माँ, इसे छोड़कर दुनिया में क्या और कोई बात नहीं है।"
महेन्द्र के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे। माँ से महेन्द्र का बर्ताव साधारण लोगों जैसा न था। उम्र लगभग बाईस की हुई, एम.ए. पास करके डॉक्टरी पढ़ना शुरू किया है, मगर माँ से उसकी रोज-रोज की ज़िद का अन्त नहीं। कंगारू के बच्चे की तरह माता के गर्भ से बाहर आकर भी उसके बाहरी थैली में टँगे रहने की उसे आदत हो गई है। माँ के बिना आहार-विहार, आराम-विराम कुछ भी नहीं हो पाता।
अबकी बार जब माँ विनोदिनी के लिए बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई तो महेन्द्र बोला, "अच्छा, एक बार लड़की को देख लेने दो!"
लड़की देखने जाने का दिन आया तो कहा, "देखने से क्या होगा? शादी तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए कर रहा हूँ। फिर मेरे अच्छा-बुरा देखने का कोई अर्थ नहीं है।" महेन्द्र के कहने में पर्याप्त गुस्सा था, मगर माँ ने सोचा, "'शुभ-दृष्टि'1 के समय जब मेरी पसन्द और उसकी पसन्द एक हो जाएगी, तो उसका स्वर भी नर्म हो जाएगा।" राजलक्ष्मी ने बेफिक्र होकर विवाह का दिन तय किया। दिन जितना ही क़रीब आने लगा, महेन्द्र का मन उतना ही बेचैन हो उठा। मात्रा दो-चार दिन पहले वह कह बैठा- "नहीं माँ, यह मुझसे हर्गिज न होगा।"
छुटपन से महेन्द्र को हर तरह का सहारा मिलता रहा है। इसलिए उसकी इच्छा सर्वोपरि है। दूसरे का दबाव उसे बर्दाश्त नहीं। अपनी स्वीकृति और दूसरों के आग्रह ने उसे बेबस कर दिया है, इसीलिए विवाह के प्रस्ताव के प्रति नाहक ही उसकी वितृष्णा बढ़ गई और विवाह का दिन नज़दीक आ गया तो उसने एकबारगी 'नाही' कर दी। महेन्द्र का जिगरी दोस्त था बिहारी; वह महेन्द्र को 'भैया' और उसकी माँ को 'माँ' कहा करता था। माँ उसे स्टीमर के पीछे जुड़ी डोंगी- जैसा भारवाही सामान मानती थीं और वैसी ही उस पर ममता भी रखती थीं। वे बिहारी से बोलीं- "बेटे, यह तो अब तुम्हें ही करना है, नहीं तो उस बेचारी लड़की...."
बिहारी ने हाथ जोड़कर कहा- "माँ, यह मुझसे न होगा। अच्छी न लगी कहकर महेन्द्र जो मिठाई छोड़ देता है वह मैंने बहुत खाई; मगर लड़की के बारे में ऐसा नहीं हो सकता।"
राजलक्ष्मी ने सोचा, 'भला बिहारी विवाह करेगा! उसे तो बस एक महेन्द्र की पड़ी है, बहू लाने का ख्याल भी नहीं आता उसके मन में।'
यह सोचकर बिहारी के प्रति उनकी कृपा-मिश्रित ममता कुछ और बढ़ गई।
विनोदिनी के पिता कुछ ख़ास धनी न थे, परन्तु अपनी इकलौती बेटी को मिशनरी मेम रखकर बड़े जतन से पढ़ाया-लिखाया। इतना ही नहीं घर के काम में भी चाक-चौबंद किया। वे गुजर गए और बेचारी विधवा माँ बेटी के विवाह के लिए परेशान हो गई। पास में रुपया-पैसा नहीं, ऊपर से लड़की की उम्र भी ज़्यादा।
आखिर राजलक्ष्मी ने अपने मैके में गाँव के एक रिश्ते के भतीजे से विनोदिनी का विवाह करा दिया।
कुछ ही दिनों में वह विधवा हो गई। महेन्द्र ने हँसकर कहा, "गनीमत थी कि शादी नहीं की।"
कोई तीन साल बाद माँ-बेटे में फिर एक बात हो रही थी।
"बेटा, लोग तो मेरी ही शिकायत करते हैं।"
"क्यों भला, तुमने लोगों का ऐसा क्या बिगाड़ा है?"
"बहू के आने से बेटा पराया न हो जाए, मैं इसी डर से तेरी शादी नहीं करती- लोग यही कहा करते हैं।"
महेन्द्र ने कहा, "डर तो होना ही चाहिए। मैं माँ होता, तो जीते-जी लड़के का विवाह न करता। लोगों की शिकायतें सुन लेता।"
माँ हँसकर बोली- "सुनो, जरा इसकी बातें सुन लो।"
महेन्द्र बोला- "बहू तो आकर लड़के को अपना बना ही लेती है। फिर इतना कष्ट उठाने वाली माँ अपने-आप दूर हो जाती है। तुम्हें यह चाहे जैसा लगे मुझे तो ठीक नहीं लगता।"
राजलक्ष्मी ने मन-ही-मन गद्गद होकर हाल ही आई अपनी विधवा देवरानी से कहा, "सुनो मँझली, जरा महेन्द्र की सुनो! कहीं बहू आकर माँ पर हावी न हो जाए, इसी डर से वह विवाह नहीं करना चाहता। ऐसी बात कभी सुनी है तुमने?"
चाची बोलीं, "यह तुम्हारी ज्यादती है बेटे! जबकि जो बात हो, वही अच्छी लगती है। माँ का दामन छोड़कर अब घर-गृहस्थी बसाने का समय आ गया है। अब नादानी अच्छी नहीं लगती उल्टी शर्म आती है।"
राजलक्ष्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी। इस सिलसिले में उन्होंने जो कुछ कहा, वह जैसा हो मगर स्वमर भीगा तो नहीं था। बोलीं- "मेरा बेटा अगर और लड़कों की अपेक्षा अपनी माँ को ज़्यादा स्नेह करता है, तो तुम्हें शर्म क्यों लगती है, मँझली बहू? कोख का लड़का होता तो समझ में आता।"
राजलक्ष्मी को लगा, 'निपूती बेटे के सौभाग्यवाली सेईर्ष्या कर रही है।'
मँझली बहू ने कहा- "तुमने बहू लाने की चर्चा चलाई इसीलिए यह बात निकल गई, वर्ना मुझे क्या हक है?"
राजलक्ष्मी बोलीं- "मेरा बेटा अगर विवाह नहीं करता, तो तुम्हारी छाती क्यों फटती है! ठीक तो है, लड़के की जैसे आज तक देख-भाल करती आई हूँ, आइन्दा भी कर लूँगी- इसके लिए और किसी की मदद की ज़रूरत न होगी।"
मँझली बहू आँसू बहाती चुपचाप चली गई। महेन्द्र को मन-ही-मन इससे चोट पहुँची। कॉलेज से कुछ पहले ही लौटकर वह अपनी चाची के कमरे में दाखिल हुआ।
वह समझ रहा था कि चाची ने जो कुछ कहा था, उसमें सिवाय स्नेह के और कुछ न था। और उसे यह भी पता था कि चाची की एक भानजी है, जिसके माता-पिता नहीं हैं। वे चाहती हैं कि महेन्द्र से उसका ब्याह हो जाए। हालाँकि शादी करना उसे पसन्द न था। फिर भी चाची की यह आंतरिक इच्छा उसे स्वाभाविक और करुण लगती है। उसे मालूम था कि उनकी कोई संतान नहीं है।
महेन्द्र कमरे में पहुँचा, तो दिन ज़्यादा नहीं रह गया था। चाची अन्नपूर्णा खिड़की पर माथा टिकाए उदास बैठी थी। बगल में कमरे में खाना ढका रखा था। शायद उन्होंने खाया नहीं।
बहुत थोड़े में ही महेन्द्र की आँखें भर आतीं। चाची को देखकर उसकी आँखें छलछला उठीं। क़रीब जाकर स्निग्ध स्वर से बोला- "चाची!"
अन्नपूर्णा ने हँसने की कोशिश की। कहा, "आ बेटे, बैठ!"
महेन्द्र का मन भीगा हुआ था। चाची को दिलासा देने के विचार से वह अचानक बोल उठा, "अच्छा चाची, तुमने अपनी भानजी की बात बताई थी, एक बार दिखा सकती हो?" कहकर महेन्द्र डर गया।
अन्नपूर्णा हँसकर बोलीं- "क्यों? शादी के लड्डू फूट रहे हैं बेटा!"
महेन्द्र झटपट बोल उठा- "नहीं-नहीं, अपने लिए नहीं, मैंने बिहारी को राज़ी किया है। लड़की देखने का कोई दिन तय कर दो!"
अन्नपूर्णा बोलीं- "अहा, उस बेचारी का ऐसा भाग्य कहाँ? भला उसे बिहारी-जैसा लड़का नसीब हो सकता है!"
महेन्द्र चाची के कमरे से निकला कि दरवाज़े पर माँ से मुलाकात हो गई। राजलक्ष्मी ने पूछा, "क्यों रे, क्या राय-मशविरा कर रहा था?"
महेन्द्र बोला- "राय-मशविरा नहीं, पान लेने गया था?"
माँ ने कहा- "तेरा पान तो मेरे कमरे में रखा है।"
महेन्द्र ने कुछ नहीं कहा। चला गया।
राजलक्ष्मी अन्दर गई और अन्नपूर्णा की रुलाई से सूजी आँखें देखकर लमहे-भर में बहुत सोच लिया। छूटते ही फुफकार छोड़ी- "क्यों मँझली बहू महेन्द्र के कान भर रही थी, है न?"
और बिना कुछ सुने तत्काल तेज़ी से निकल गई।
2
कन्या देखने की बात महेन्द्र ने की ज़रूर मगर वह भूल गया फिर भी अन्नपूर्णा नहीं भूली। उन्होंने लड़की के अभिभावक, उसके बड़े चाचा को जल्दी में श्यामबाज़ार पत्र भेजा और एक दिन तय कर लिया।
महेन्द्र ने जब सुना कि देखने का दिन पक्का हो गया है तो बोला- "चाची, इतनी जल्दी क्यों की! बिहारी से तो मैंने अभी तक ज़िक्र नहीं किया।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "ऐसा भी होता है भला! अब अगर तुम लोग न जाओ तो वे क्या सोचेंगे?"
महेन्द्र ने बिहारी को बुलाकर सारी बातें बताईं कहा-"चलो तो सही, लड़की न जँची, तो तुम्हें मजबूर नहीं किया जाएगा।"
बिहारी बोला- "यह मैं नहीं कह सकता। चाची की भानजी को देखने जाना है। देखकर मेरे मुँह से यह बात हर्गिज न निकल सकेगी कि लड़की मुझे पसन्द नहीं।"
महेन्द्र ने कहा- "फिर तो ठीक ही है।"
बिहारी बोला- "लेकिन तुम्हारी तरफ से यह ज्यादती है, महेन्द्र भैया! खुद तो हल्के हो जाएँ और दूसरे के कन्धे पर बोझ रख दें, यह ठीक नहीं। अब चाची का जी दुखाना मेरे लिए बहुत कठिन है।"
महेन्द्र कुछ शर्मिन्दा और नाराज होकर बोला-"आखिर इरादा क्या है तुम्हारा?"
बिहारी बोला- "मेरे नाम पर जब तुमने उन्हें उम्मीद दिलाई है तो मैं विवाह करूँगा। यह देखने जाने का ढोंग बेकार है।"
बिहारी अन्नपूर्णा की देवी की भांति भक्ति करता था। आखिर अन्नपूर्णा ने खुद बिहारी को बुलवाकर कहा- "ऐसा भी कहीं होता है, बेटे! लड़की देखे बिना ही विवाह करोगे। यह हर्गिज न होगा। लड़की पसन्द न आए तो तुम हर्गिज 'हाँ' नहीं करोगे। समझे। तुम्हें मेरी कसम....!"
जाने के दिन कॉलेज से लौटकर महेन्द्र ने माँ से कहा- "जरा मेरा वह रेशमी कुरता और ढाका वाली धोती निकाल दो!"
माँ ने पूछा- "क्यों, कहाँ जाना है?"
महेन्द्र बोला- "काम है, तुम ला दो, फिर बताऊँगा।"
महेन्द्र थोड़ा सँवरे बिना न रह सका। दूसरे के लिए ही क्यों न हो, लड़की का मसला जवानी में सभी से थोड़ा सँवार करा ही लेता है।
दोनों दोस्त लड़की देखने निकल पड़े।
लड़की के बड़े चाचा अनुकूल बाबू ने अपनी कमाई से अपना बाग वाला तिमंजिला मकान मुहल्ले में सबसे ऊँचा बना रखा है।
गरीब भाई की माँ-बाप-विहीना बेटी को उन्होंने अपने ही यहाँ रखा है। उसकी मौसी अन्नपूर्णा ने कहा था, मेरे पास रहने दो। इससे खर्च की कमी ज़रूर होती, लेकिन गौरव की कमी के डर से अनुकूल राज़ी न हुए। यहाँ तक कि मुलाकात के लिए भी कभी उसे मौसी के यहाँ नहीं जाने देते थे। अपनी मर्यादा के बारे में इतने ही सख्त थे वे।
लड़की के विवाह की चिन्ता का समय आया। लेकिन इन दिनों विवाह के विषय में 'यादृशी भावना यस्य सिध्दर्भवति तादृशी' वाली बात लागू नहीं होती। चिन्ता के साथ-साथ लागत भी लगती। परन्तु दहेज की बात उठते ही अनुकूल कहते, 'मेरी भी तो अपनी लड़की है, अकेले मुझसे कितना करते बनेगा।' इसी तरह दिन निकलते जा रहे थे। ऐसे में बन-सँवरकर खुशबू बिखेरते हुए रंग-भूमि में अपने दोस्त के साथ महेन्द्र ने प्रवेश किया।
चैत का महीना। सूरज डूब रहा था। दुमंजिले का दक्षिणी बरामदा चिकने चीनी टाइलों का बना, उसी के एक ओर दोनों मेहमानों के लिए फल-फूल, मिठाई से भरी चाँदी की तश्तरियाँ रखी गईं। बर्फ़ के पानी-भरे गिलास जैसे ओस-बूँदों से झलमल। बिहारी के साथ महेन्द्र सकुचाते हुए खाने बैठा। नीचे माली पौधों में पानी डाल रहा था और भीगी मिट्टी की सोंधी सुगन्ध लिये दक्खिनी बयार महेन्द्र की धप-धप धुली चादर के छोर को हैरान कर रही थी। आसपास के दरवाज़े के झरोखों की ओट से कभी-कभी दबी हँसी, फुसफुसाहट, कभी-कभी गहनों की खनखनाहट सुनाई दे रही थी।
खाना खत्म हो चुका तो अन्दर की तरफ देखते हुए अनुकूल बाबू ने कहा- "चुन्नी, पान तो ले आ, बेटी!"
जरा देर में संकोच से पीछे का दरवाज़ा खुल गया और सारे संसार की लाज से सिमटी एक लड़की हाथ में पानदान लिये अनुकूल बाबू के पास आकर खड़ी हुई। वे बोले, "शर्म काहे की बिटिया, पानदान उनके सामने रखो!"
उसने झुककर काँपते हुए हाथों से मेहमानों की बगल में पानदान रख दिया। बरामदे के पश्चिमी छोर से डूबते हुए सूरज की आभा उसके लज्जित मुखड़े को मंडित कर गई। इसी मौके से महेन्द्र ने उस काँपती हुई लड़की के करुण मुख की छवि देख ली।
बालिका जाने लगी। अनुकूल बाबू बोले- "ज़रा ठहर जा, चुन्नी! बिहारी बाबू, यह है छोटे भाई अपूर्व की लड़की, अपूर्व तो चल बसा, अब मेरे सिवाय इसका कोई नहीं।" और उन्होंने एक लम्बी उसाँस ली।
महेन्द्र का मन पसीज गया। उसने एक बार फिर लड़की की तरफ देखा।
उसकी उम्र साफ-साफ कोई न बताता। सगे-सम्बन्धी कहते, बारह-तेरह होगी। यानी चौदह-पन्द्रह होने की सम्भावना ही ज़्यादा थी। लेकिन चूँकि दया पर चल रही थी इसलिए सहमे से भाव ने उसके नवयौवन के आरम्भ को ज़ब्त कर रखा था।
महेन्द्र ने पूछा- "तुम्हारा नाम?"
अनुकूल बाबू ने उत्साह दिया- "बता बेटी, अपना नाम बता!"
अपने अभ्यस्त आदेश-पालन के ढंग से झुककर उसने कहा- "जी, मेरा नाम आशालता है।"
"आशा!" महेन्द्र को लगा, नाम बड़ा ही करुण और स्वर बड़ा कोमल है।
दोनों मित्रों ने बाहर सड़क पर आकर गाड़ी छोड़ दी। महेन्द्र बोला- "बिहारी, इस लड़की को तुम हर्गिज मत छोड़ो?"
बिहारी ने इसका कुछ साफ़ जवाब न दिया। बोला-"इसे देखकर इसकी मौसी याद आ जाती है। ऐसी ही भली होगी शायद!"
महेन्द्र ने कहा- "जो बोझा तुम्हारे कन्धे पर लाद दिया, अब वह शायद वैसा भारी नहीं लग रहा है।"
बिहारी ने कहा- "नहीं, लगता है तो ढो लूँगा।"
महेन्द्र बोला- "इतनी तकलीफ उठाने की क्या ज़रूरत है? तुम्हें बोझा लग रहा हो तो मैं उठा लूँ।"
बिहारी ने गम्भीर होकर महेन्द्र की तरफ ताका। बोला- "सच? अब भी ठीक-ठीक बता दो! यदि तुम शादी कर लो तो चाची कहीं ज़्यादा खुश होंगी- उन्हें हमेशा पास रखने का मौक़ा मिलेगा।"
महेन्द्र बोला- "पागल हो तुम! यह होना होता तो कब का हो जाता।"
बिहारी ने कोई एतराज न किया। चला गया और महेन्द्र भी यहाँ-वहाँ भटककर घर पहुँच गया।
माँ पूरियाँ निकाल रही थीं। चाची तब तक अपनी भानजी के पास से लौटकर नहीं आई थीं।
महेन्द्र अकेला सूनी छत पर गया और चटाई बिछाकर लेट गया। कलकत्ता की ऊँची अट्टालिकाओं के शिखरों पर शुक्ला सप्तमी का आधा चाँद टहल रहा था। माँ ने खाने के लिए बुलाया, तो महेन्द्र ने अलसाई आवाज़ में कहा- "छोड़ो, अब उठने को जी नहीं चाहता।"
माँ ने कहा- "तो यहीं ले आऊँ?"
महेन्द्र बोला- "आज नहीं खाऊँगा। मैं खाकर आया हूँ।"
माँ ने पूछा- "कहाँ खाने गया था?"
महेन्द्र बोला- "बाद में बताऊँगा।"
वे लौटने लगीं तो थोड़ा सोचते हुए महेन्द्र ने कहा-"माँ! खाना यहीं ले आओ।"
3
रात में महेन्द्र ठीक से सो नहीं पाया। आज ही वह बिहारी के घर पहुँच गया। बोला- "भई यारो, मैंने बड़ी ध्या न से सोचा ओर देखा- कि चाची यही चाहती है कि शादी मैं ही करूँ।"
बिहारी बोला- "इसके लिए सोचने की ज़रूरत नहीं थी। यह बात तो वे खुद कई बार कह चुकी हैं।"
महेन्द्र बोला- "तभी तो कहता हूँ, मैंने आशा से विवाह न किया तो उन्हें दु:ख होगा।"
बिहारी बोला- "हो सकता है!"
महेन्द्र ने कहा, "मेरा ख्याल है, यह तो ज्यादती होगी।"
"हाँ! बात तो ठीक है।" बिहारी ने कहा- "यह बात थोड़ी देर से आपकी समझ में आई। कल आ जाता तो अच्छा होता।"
महेन्द्र- "एक दिन बाद ही आया, तो क्या बुरा हो गया।"
विवाह की बात पर मन की लगाम को छोड़ना था कि महेन्द्र के लिए धीरज रखना कठिन हो गया। उसके मन में आया- इस बारे में बात करने का तो कोई अर्थ नहीं है। शादी हो ही जानी चाहिए।
उसने माँ से कहा- "अच्छा माँ, मैं विवाह करने के लिए राजी हूँ।"
माँ मन-ही-मन बोलीं- "समझ गई, उस दिन अचानक क्यों मँझली बहू अपनी भानजी को देखने चली गई। और क्यों महेन्द्र बन-ठनकर घर से निकला।"
उनके अनुरोध की बार-बार उपेक्षा होती रही और अन्नपूर्णा की साजिश कारगर हो गई, इस बात से वह नाराज़ हो उठीं। कहा- "अच्छा, मैं अच्छी-सी लड़की को देखती हूँ।"
आशा का ज़िक्र करते हुए महेन्द्र ने कहा- "लड़की तो मिल गई।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "उस लड़की से विवाह नहीं हो सकता, यह मैं कहे देती हूँ।"
महेन्द्र ने बड़े संयत शब्दों में कहा- "क्यों माँ, लड़की बुरी तो नहीं है।"
राजलक्ष्मी- "उसके तीनों कुल में कोई नहीं। ऐसी लड़की से विवाह रचकर कुटुम्ब को सुख भी न मिल सकेगा।"
महेन्द्र- "कुटुम्ब को सुख मिले न मिले लड़की मुझे खूब पसन्द है।" उससे शादी न हुई तो मैं दुखी हो जाऊँगा।"
लड़के की ज़िद से राजलक्ष्मी और सख्त हो गईं। वह अन्नपूर्णा से भिड़ गईं- "एक अनाथ से विवाह कराकर तुम मेरे लड़के को फँसा रही हो। यह हरकत है।"
अन्नपूर्णा रो पड़ी- "उससे तो शादी की कोई बात ही नहीं हुई, उसने तुम्हें क्या कहा, इसकी मुझे जरा भी खबर नहीं।"
राजलक्ष्मी इसका रत्ती- भर यकीन न कर सकीं।
अन्नपूर्णा ने बिहारी को बुलवाया और आँसू भरकर कहा- "तय तो सब तुमसे हुआ था, फिर तुमने पासा क्यों पलट दिया? मैं कहे देती हूँ शादी तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी। यह बेड़ा तुम न पार करोगे तो मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी होगी। वैसे लड़की अच्छी है।"
बिहारी ने कहा- "चाची, तुम्हारी बात मंजूर है। वह तुम्हारी भानजी है, फिर मेरे 'ना' करने की कोई बात ही नहीं। लेकिन महेन्द्र..."
अन्नपूर्णा बोलीं- "नहीं-नहीं बेटे, महेन्द्र से उसका विवाह किसी भी हालत में न होगा। यकीन मानो, तुमसे विवाह हो, तभी मैं ज़्यादा निश्चिंत हो सकूँगी। महेन्द्र से रिश्ता हो यह मैं चाहती भी नहीं।"
बिहारी बोला- "तुम्हीं नहीं चाहतीं तो कोई बात नहीं।"
और वह राजलक्ष्मी के पास जाकर बोला- "माँ, चाची की भानजी से मेरी शादी पक्की हो गई। सगे-सम्बन्धियों में तो कोई महिला है नहीं इसलिए मैं ही खबर देने आया हूँ।"
राजलक्ष्मी- "अच्छा! बड़ी खुशी हुई बिहारी, सुनकर। लड़की बड़ी भली है। तेरे लायक। इसे हाथ से जाने मत देना!"
बिहारी- "हाथ से बाहर होने का सवाल ही क्या! खुद महेन्द्र भैया ने लड़की पसन्द करके रिश्ता पक्का किया है।"
इन झंझट से महेन्द्र और भी उत्तेजित हो गया। माँ और चाची से नाराज़ होकर वह मामूली-से छात्रावास में जाकर रहने लगा।
राजलक्ष्मी रोती हुई अन्नपूर्णा के कमरे में पहुँचीं; कहा- "मँझली बहू, लगता है, उदास होकर महेन्द्र ने घर छोड़ दिया, उसे बचाओ!"
अन्नपूर्णा बोली- "दीदी, धीरज रखो, दो दिन के बाद गुस्सा उतर जाएगा।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "तुम उसे जानती नहीं बहन, वह जो चाहता है, न मिले तो कुछ भी कर सकता है। जैसे भी हो, अपनी बहन की लड़की से...."
अन्नपूर्णा- "भला यह कैसे होगा दीदी, बिहारी से बात लगभग पक्की हो चुकी।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "हो चुकी, तो टूटने में देर कितनी लगती है?"
और उन्होंने बिहारी को बुलवाया। कहा- "तुम्हारे लिए मैं दूसरी लड़की ढूँढ़ देती हूँ- मगर इससे तुम्हें बाज आना पड़ेगा।"
बिहारी बोला- "नहीं माँ, यह नहीं होगा। सब तय हो चुका है।"
राजलक्ष्मी फिर अन्नपूर्णा के पास गईं। बोलीं- "मेरे सिर की कसम मँझली, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ... तुम्हीं बिहारी से कहो! तुम कहोगी तो बिगड़ी बन जाएगी।" आखिर अन्नपूर्णा ने बिहारी से कहा- "बेटा, तुमसे कुछ कहने का मुँह नहीं है, मगर लाचारी है क्या करूँ। आशा को तुम्हें सौंपकर ही मैं निश्चिंत होती, मगर क्या बताऊँ, सब तो तुम्हें पता है ही।"
बिहारी- "समझ गया। तुम जो हुक्म करोगी, वही होगा। लेकिन फिर कभी किसी से विवाह करने का मुझसे आग्रह मत करना!"
बिहारी चला गया। अन्नपूर्णा की आँखें छलछला गईं। महेन्द्र का अमंगल न हो, इस आशंका से उन्होंने आँखें पोंछ लीं। बार-बार दिल को दिलासा दिया- "जो हुआ, अच्छा ही हुआ।"
और इस तरह राजलक्ष्मी- अन्नपूर्णा- महेन्द्र में किल-किल चलते-चलते आखिर विवाह का दिन आया। रोशनी हँसती हुई जली, शहनाई उतनी ही मधुर बजी जितनी वह बजा करती है। यानी उसके दिल के साथ कोई न था।
सज-सँवरकर लज्जित और मुग्ध-मन आशा अपनी नई दुनिया में पहली बार आई। उसके कंपित कोमल हृदय को पता ही न चला कि उसके इस बसेरे में कहीं काँटा है। बल्कि यह सोचकर भरोसे और आनन्द से उसके सारे ही संदेह जाते रहे कि इस दुनिया में एकमात्र माँ- जैसी अपनी मौसी के पास जा रही है।
विवाह के बाद राजलक्ष्मी ने कहा- "मैं कहती हूँ, अभी कुछ दिन बहू अपने बड़े चाचा के घर ही रहे।"
महेन्द्र ने पूछा- "ऐसा क्यों, माँ?"
माँ ने कहा- "तुम्हारा इम्तहान है। पढ़ाई-लिखाई में रुकावट पड़ सकती है।"
महेन्द्र बोला- "आखिर मैं कोई नन्हा-नादान हूँ। अपने भले-बुरे की समझ नहीं मुझे?"
राजलक्ष्मी- "जो हो, साल-भर की ही तो बात है।"
महेन्द्र ने कहा- "इसके माँ-बाप रहे होते, तो मुझे कोई एतराज न होता लेकिन चाचा के यहाँ इसे मैं नहीं छोड़ सकता।"
राजलक्ष्मी-(अपने आप) "बाप रे आप ही मालिक, सास कोई नहीं! कल शादी और आज ही इतनी हमदर्दी! आखिर हमारी भी तो शादी हुई थी। मगर तब ऐसी बेहयाई न थी।"
महेन्द्र ने दृढ़ता से कहा- "तुम बिल्कुल मत सोचो, माँ! इम्तहान में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
4
आखिर राजलक्ष्मी असीम उत्साह से बहू को गृहस्थी के काम-काज सिखाने में जुट गई। भण्डार रसोई और पूजा-घर में आशा के दिन कटने लगे, रात को अपने साथ सुलाकर वह उसके आत्मीय बिछोह की कमी को पूरा करने लगीं।
काफ़ी सोच-समझकर अन्नपूर्णा आशा से दूर ही रहा करतीं। कोई अभिभावक जब खुद सारी ईख का रस चूसने लगता है, तब निराश बच्चे की रंजिश कम नहीं होती। महेन्द्र की हालत भी वैसी ही हो गई। उसकी आँखों के सामने ही नवयुवती वधू का सारा मीठा रस गिरस्ती के कामों में निचुड़ता रहे, यह भला कैसे सहा जा सकता है।