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उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

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14

सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर ग़या हो, उसने महसूस किया।

अभी संदेशवाहक आयेगा। पत्र अब नहीं आयेंगे। किन्तु उसने पत्नी को जो आखिरी पत्र लिखा है, वह ले जायेगा। चौथे या पाँचवें दिन उसे मिल जायेगा। और तब से दोनों सदा के लिए पति-पत्नी मिट जायेंगे। अपने सिवा किसी ओर के साथ रंग़रेलियाँ मनाने वाली पत्नी को वह नहीं रख सकता, कभी भी नहीं...

विजेंद्र सोच ही में था कि संदेशवाहक तंबू के पास हँसता हुआ सलाम करके खड़ा रहा।

विजेंद्र को आश्चर्य हुआ कि अब किसका पत्र आयेगा ?

उसने कुछ न कहा। संदेशवाहक ने उसके हाथ में पोस्टकार्ड रखा, थोड़ी देर आशा से खड़ा रहा, फिर चला ग़या।

जेल सुप्रिन्टेन्डन्ट के हस्ताक्षर से युक्त जेल से लिखा ग़या पिताजी का पत्र था-

‘बिजु,

तुझे जानकारी मिली होगी। मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया। तुझे आश्चर्य इस बात का हुआ होगा कि मैंने जयजयवंती को क्यों नहीं मारा ?

उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। उसे जो सजा करनी हो वह तू कानून के अनुसार कर सकता है।

-बसवेश्वरसिंह राठौड़'

उसने पत्र पढ़ा।

पिताजी पत्नी को सजा देने को बता रहे थे... वह तो उसे कड़ी से कड़ी सजा दे चुका। पति-पत्नी के संबंध को ही विच्छेद कर दिया था। उससे कड़ी सज़ा ओर क्या हो सकती है ?

शरीर को उसने कठोर बिछौने पर डाला।

सारा जीवन ही मानो बिखर ग़या था। सब नष्ट हो ग़या था। समुद्र की रेत में खड़े किये ग़ये महल और मंदिर, सभी ज्वार की लहरों की एक ही चपेट में टूटकर रहावन बन ग़या था। कुछ भी बच न पाया था।

अब कोई याद न आ रहा था। न तो कोई पत्नी थी। न ही किसी का प्रेम था। अब किसी का पत्र नहीं आयेगा। न ही किसी की प्रतीक्षा करनी होगी।

अब तो वह था और थी राजपूताना रायफल्स की टुकड़ी नं.117 ।

उसने अभी तो करवत भी न ली थी कि एक डाकिया तंबू के दरवाजे पर समाचार लेकर आ पहुँचा था।

विजेंद्र ने चारों ओर से सील किया ग़या लिफाफा लिया। डाकिये को हस्ताक्षर दे, भेज दिया।

ऑडर था।

आज रात को आठ बजे के बाद पूरब की ओर की दुश्मन की छावनी पर एक साथ हमला करना है। सैनिकों को तैयार रखना। पीछे सहायता आ रही है।

विजेंद्र की यही तो चाह थी।

बिना युद्ध घुटन-सी हो रही थी।

अब तो मन कर रहा था कि युद्ध हो। पहले की बात अलग़ थी।

तैयार हो वह बाहर निकल पड़ा।

रात तक तैयारियाँ होती रहीं। अन्य किसी को पता न था। इतनी ही सूचना दी ग़ई थी कि रात के आठ बजे प्रस्थान के लिए तैयार रहना होगा।

पहला हमला 117 नंबर की टुकड़ी को करना था। और उसके नेता विजेंद्रसिंह राठौड़ थे।

काम बहुत कठिन न था। किन्तु दुश्मन को यदि इस बात की जानकारी मिल जाय तो बड़ी मुश्किल हो सकती थी। इस लिए हरेक प्रकार की सावधानियाँ बरती जा रही थीं।

पूरब की ओर बर्फ का जो मैदानी इलाका था, उसे छोड़ने के बाद ग़हरी खाई आती थी। उससे होकर सामने जाना था और दुश्मनों की महत्वपूर्ण छावनी पर आज रात ही में कब्जा जमाना था।

खाई में उतरना कठिन था।

पहल कौन करें ?

विजेंद्रसिंह राठौड़ ने सिर पर कफ़न बाँध लिया था। अब जीवन के प्रति कोई मोह न था, मृत्यु से भय न था।

वह उतर पड़ा।

धीरे-धीरे सारी टुकड़ी उतर ग़ई।

अब सामने जाना था।

चढ़ना कठिन था किन्तु इस महत्वपूर्ण टुकड़ी का हरेक जवान होशियारी से उपर चढ़ ग़या।

खाई की धार पर पेट के बल सो ग़ये।

थोड़ी देर पड़े रहे।

सामने से किसी भी प्रकार की हिलचाल मालूम नहीं हो रही थी।

विजेंद्रसिंह राठौड़ ने पेट के बल सरकने की सूचना दी।

सब चौकी की ओर सरकने लगे।

फिर सभी को रुकने का आदेश दिया ग़या।

सब ‘जैसे थे'की स्थिति में रुके रहे।

सब से आगे विजेंद्रसिंह राठौड़ ने स्वयं ही रहना निश्चित किया।

वह आगे बढ़ ग़या।

टुकड़ी पीछे आ रही थी।

दुश्मन की चौकी असावधान थी।

पाँच मिनट के अंदर फायरिंग़ शुरू हो ग़या।

फायरिंग़ देर तक होता रहा।

दुश्मन की चौकी बहुत बड़ी थी। निकट ही छावनी थी। सहायता पहुँच चुकी थी। और युद्ध तीन घण्टे तक चलता रहा था।

चौकी पर भारतीय तिरंगा लहरा रहा था।

किन्तु विजेंद्रसिंह राठौड़, उस युवा बहादुर अफसर का कोई अता-पता ही न था।

सब उसे खोज रहे थे।

आखिरकार लाश-से हाल में जब उसका शरीर मिला तब सभी ने संतोष की साँस ली।

उसे तुरंत छावनी केम्प के अस्पताल में भेजने की व्यवस्था की ग़ई।

मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के बेहोश शरीर को जब अस्पताल में दाखिल किया ग़या तब डॉक्टर ने भी उसके बचने की कोई आशा न बतायी थी।

लहू विपुल मात्रा में बह ग़या था।

सिर के पिछले हिस्से में ग़हरी चोट लगी थी।

वह कब होश में आयेगा या नहीं, निश्चित नहीं था।

नर्सें इधर-उधर दौड़ रही थीं। डॉक्टर उपचार करने लग़ ग़ये थे।

लहू दिया जा रहा था।

सभी प्रकार के उपचार किये जा रहे थे।

तात्कालिक रूप से जो भी उपचार किया जा सके, कर के, इस गंभीर दर्दी को, घायल अफसर को सैनिक अस्पताल में डॉक्टर पेड्रिक के पास भेजने के बारे में विचारणा हो रही थी।

किन्तु प्रश्र यह था कि वह होश में आये या कराहने लगे... उसके जीने की कोई आश बंधे तभी उसे बड़े अस्पताल में भेजा जा सकेगा।

विजेंद्रसिंह राठौड़ का नाम चौकी जीतनेवाले के रूप में फैल चुका था। कमान्डर इन चीफ ने भी उसके हाल पूछे थे और पूरी देखभाल करने तथा सारे उपचार करने की सूचना दी थी। और अग़र आवश्यकता महसूस हो तो सैनिक अस्पताल में भेजने की व्यवस्था करने के हुक्म भी कर दिये थे।

सब उसके साहस की प्रशंसा कर रहे थे।

तीन दिन उसके हाल बहुत ही नाजुक रहे। जीवन-मृत्यु के बीच झूलते हुए जब उसने पलकें खोलने की कोशिश की तब सभी को विश्वास आया कि बड़े अस्पताल में उसकी पूरी देखभाल की जायेगी।

सैनिक अस्पताल के ऊपरी डॉ.पेट्रिक को टेलिग्राम कर दिया ग़या।

कच्चे रास्ते से जीप द्वारा, एम्ब्यूलन्स में, फिर ट्रेन के द्वारा जब उसे सैनिक अस्पताल पहुँचाया ग़या तब वह सिर्फ आधे मिनट के लिए आँखें खोल पा रहा था।

अशक्ति, कमज़ोरी, रुई-सा चेहरा...

मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ पहचाना भी नहीं जा रहा था।

डॉ.पेड्रिक को तुरंत जानकारी दी ग़ई।

अफसरों के लिए बनाये ग़ये स्पेश्यल रूम में उसे ले जाया ग़या।

फिर से जाँच की ग़ई।

केम्प अस्पताल के रिपोर्टों को डॉ.पेड्रिक ने दो बार देखा।

फिर से उपचार किये जाने लगे।

इंजेक्शन... लहू... ग्लूकोज...

सब दिया जा रहा था...

दिन के बाद दिन बीत रहे थे।

कुछ दिनों के बाद डॉ.पेड्रिक ने नर्स को बुलाकर सूचना दी कि घायल मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के सामान में क्या-क्या है ? उसे जाँचा जाये।

एक घण्टे के भीतर रिपोर्ट आ ग़या।

कपड़े, दैनिक उपयोगी वस्तुएँ, पेन, कुछ पत्र और अन्य चीजें...

डॉ.पेड्रिक ने सारे पत्र अपने पास मँगाये।

विजेंद्रसिंह राठौड़ की सुंदर पत्नी जयजयवंती के सभी पत्र उन्होंने पढ़े। पत्नी से प्रगाढ़ प्यार था। वह पति को बहुत चाहती थी। हरी-हरी पहाड़ियों के बीच घूमते हुए हरदम पति को याद करती थी और सब कुछ बताती थी।

पढ़ी-लिखी युवती थी।

उसे ये जानकारी देनी होगी। उसके आने से संभव है कि मेजर में खुशी का संचार हो। ये जल्दी अच्छा हो जाय। इसे राहत महसूस हो।

डॉ.पेड्रिक ने स्वयं पत्र लिखा-

‘हमारे प्यारे मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ की पत्नी होने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है वह आनंद की बात है। मैं यह बताते हुए दिलगीर हूँ कि एक महत्वपूर्ण चौकी को जीतते हुए वे थोड़े घायल हुए हैं। देहरादून सैनिक अस्पताल में मैं इसका उपचार कर रहा हूँ। मेजर आपको बार-बार याद करता है। आप कुछ दिनों के लिए यहाँ आ सको तो मुझे बड़ी खुशी होगी।

अन्य सग़-संबंधियों को सैनिक अस्पताल में प्रवेश नहीं मिलता, वह आप जानती हैं।

मेजर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

कब आ रही हो ?

मैं टेलिग्राम की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

-डॉ.पेड्रिक'

************

15

जयजयवंती को नौकर ने जब पत्र दिया तो चकित रह ग़ई।

वैसे अब उसके पत्र कभी-कभार ही आते थे।

पीहर में पिताजी के अतिरिक्त कोई करीबी रिश्तेदार न था।

ससुर जेल में थे।

पति का अंतिम पत्र मिल चुका था।

जेल से कभी बसवेश्वरसिंह का पत्र आता। धैर्य रखने और जो सज़ा होगी, भुग़तने की तैयारी का उल्लेख होता। ज़मीन की बात कभी ही लिखते।

जयजयवंती बिछौने में बैठ ग़ई।

उसने शरीर को थरथराकर स्फूर्ति लाने की कोशिश की।

फिर लिफाफे की ओर देखा।

देहरादून के सैनिक अस्पताल से उसके नाम पत्र था। अब पत्र में उसकी कोई रुचि न थी।

उसने सोचा, कोई सगा-संबंधी तो देहरादून में नहीं था।

उसने लिफ़ाफ़ा फाड़ पत्र निकाला।

एक ही साँस में उसने डॉ.पेड्रिक का पत्र पढ़ डाला।

कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

वह ये क्या पढ़ रही थी ?

खुश हो या निराश, समझ न पायी।

देर तक वह बैठी रही।

उसे उबकाई हो रही थी। वह बाथरूम में दौड़ ग़ई। दो घण्टे पहले कै हुई थी। अब भी वैसा ही लग़ रहा था।

थोड़ी देर के बाद वह सामान्य हो ग़ई।

पत्र फिर से पढ़ा।

इतनी दूर जाना हो तो पूरी तैयारी के साथ जाना होगा।

किन्तु डॉ.पेड्रिक की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

विजेंद्रसिंह का अंतिम पत्र अब भी उसके पास था। वह खड़ी हुई। पत्र को निकाला और पढ़ ग़ई।

उसका मन कहने लगा। विजेंद्रसिंह राठौड़ कभी भी उसे याद नहीं करेगा। ऐसा हो ही नहीं सकता। वह पति के स्वभाव को थोड़े ही दिनों में जान ग़ई थी।

वह अपने आप को धिक्कारती थी। और यह कम हो वैसे उसके पेट में तीन महीने का बच्चा आकार ले रहा था।

जाना चाहिये या नहीं ?

पत्र की बातें सच्ची हो तो संभव है विजेंद्रसिंह ने उसे माफ कर दिया हो या...

एक के बाद एक पत्र वह पढ़ती रही।

पति माफ कर दें, संभव न था। तो क्या डॉ.पेड्रिक ने लिखा था ?

जो होगा, अच्छा ही होगा। हार रहा जुआरी ओर अधिक खेलता है। वह भी यह आखिरी खेल खेल लेगी। जीत हो या हार...

उसने नौकर को कुछ सूचनाएँ दीं। सारा घर सौंपा। वह कुछ ही दिनों में देहरादून से वापस आ जायेगी, का भरोसा दिया। और दूसरे दिन वह निकल पड़ी। स्टेशन से टेलिग्राम कर दिया।

सारे सफर के दौरान सोच उसे सताती रही, डॉ.पेड्रिक वैसे तो उसे पहचानते नहीं है कि ऐसा पत्र लिखें। कि शायद विजेंद्र की हालत नाज़ुक होगी ?

जयजयवंती का दिल एक हकलाहट चूक ग़या।

कुछ न कुछ हुआ ज़रूर है। जीवन की राह ही बदल रही है, ऐसा वह महसूस रहा था।

देहरादून पहुँचने पर वह थक कर लोटपोट हो चुकी थी।

मानसिक त्रास से वह ऊब ग़ई थी।

डॉ.पेड्रिक ने उसका पत्र पढ़ा होगा ?

वह उन्हें कौन-सा मुँह दिखायेगी ?

उसने सोचा कि यहाँ से वापस चली जाऊँ। खाली बैंच पर वह बैठ ग़ई।

देर तक बैठी रही।

फिर सोच बदल अस्पताल की ओर चल निकली।

डॉ.पेड्रिक को उसने जब यह संदेशा भेजा तब उसे तुरंत बड़े ऑफिस रूम में बुलाया ग़या।

‘आपका टेलिग्राम मिला। आपसे मिल कर बड़ी खुशी हुई'।

‘हमारे मेजर की तबियत वैसे तो बहुत अच्छी है...मैंने आपको खास तौर पर पत्र द्वारा बुलाया है। युवा मनुष्य जवानी में बहुत सारे सपने देखता रहता है... उसके पास यदि उसका कोई अपना हो तो... '

‘डॉक्टर, पत्र आपने लिखा है या कि लिखवाया है ? '

बालक के समान निर्दोष हँसी डॉ.पेड्रिक हँस दिये। फिर पूछा, ‘क्यों कोई संदेह है ? '

जयजयवंती ताककर डॉक्टर के झुरियों वाले चेहरे को देखती रही।

वह कुछ समझ न पायी। डॉ.पेड्रिक की भोली हँसी को पहचान न पायी।

फिरसे उसने पूछा, ‘पत्र मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ ने लिखवाया है ? '

‘हाँ... हाँ... उसकी सूचना के अनुसार ही तो ये सब कुछ किया ग़या है'।

‘आप दूर से आयी हैं तो नहा-धोकर फ्रेश हो जाओ, थोड़ा नाश्ता भी कर लो... फिर तो सदा के लिए मिलना ही होगा न !' -कहकर घण्टी बजायी।

‘सिस्टर के साथ जाओ। नहा-धोकर थोड़ा नाश्ता कीजिये। पास ही में रेस्ट हाउस के कमरे हैं। जो आपके लिए अनुकूल रहेंगे'।

जयजयवंती ग़ई।

युवा और सुंदर इस युवती को देखने के बाद डॉ.पेड्रिक ने सोचा कि उसने जो किया है वह उचित ही नहीं, समयानुकूल और जरूरी भी है।

दोपहर के बाद चार बजकर दस मिनट पर जब जयजयवंती तैयार होकर आयी तो डॉक्टर जैसे बुजुर्ग व्यकित भी उसे ताकते रहे।

‘बैठो'।

‘क्या ? पेशन्ट को मिलने की छूट अब भी नहीं है ? '

‘दूसरे के लिए छूट नहीं है। किन्तु तुम्हारे लिए तो.. '.

‘तो ? '

‘मेजर सो रहे हैं। अब उन्हें जगाने का समय हो ग़या है। सिस्टर हमें बताने के लिए आयेगी...'

डॉक्टर की बातों से जयजयवंती के मन में आशा बँधी थी। वह पेड्रिक के चेहरे की झुरियों में कोई उपाय खोज रही थी। किन्तु कुछ भी जान न पा रही थी।

डॉक्टर पेड्रिक दूसरी कोई बात तो करते ही न थे।

वह कोई अन्य बात बता न सकती थी। दोनों वैसे तो आमने-सामने बैठे थे। बीच में एक बड़ा टेबल था। किन्तु जयजयवंती को लग़ रहा था कि उसके अनुमान और डॉक्टर की मान्यता के बीच बड़ी ग़हरी खाई थी। किन्तु न तो उसके मन की बात डॉक्टर ही जान पाते थे और न ही वह डॉक्टर को पहचान पा रही थी !

कुछ बातें डॉक्टर उससे छिपा रहे थे तो कुछ बातें वह डॉक्टर से कह न पा रही थी। पेड्रिक ने कहा था कि विजेंद्रसिंह की सूचना से उसे पत्र लिखा ग़या था। किन्तु ये कैसे संभव था ? अग़र ऐसा नहीं था तो फिर डॉक्टर अकेले ऐसा कैसे लिख पाते ?

वह सोच रही थी।

हस्ताक्षर करते-करते डॉ.पेड्रिक जयजयवंती को देख लेते।

यह युवा स्त्री एक ऐसी सोच में डूब ग़ई थी कि उसे जान पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव लग़ता था। नहीं तो ऐसी युवा विवाहिता तो धाँधली मचा देती। अस्पताल के नियमों को तोड़ पति के पास पहुँच जाती। आजिजी करती, आँसू बहाती थीं।

किन्तु ये तो ऐसा कुछ भी नहीं कर रही थी।

उससे कोई ग़लती तो नहीं हो ग़ई ?

सिस्टर ने आकर बताया कि मेजर विजेंद्रसिंह देख रहे हैं।

‘अच्छा, हम आते हैं'। कह डॉक्टर खड़े हुए।

लंबी-लंबी लोबी पसार कर दोनों एक कमरे के पास आकर रुके।

यहाँ नीरव शांति थी।

कोलाहल बिल्कुल न था।

डाक्टर ने इशारा किया। आँखों से ही कहा कि ‘जरा रुको। अभी बुलाता हूँ'।

वे चले ग़ये।

थोड़ी ही देर में सिस्टर आयी और जयजयवंती को बुला ले ग़ई।

सिस्टर के पीछे-पीछे वह ग़ई।

इस स्पेश्यल कमरे की सुमधुर हवा उसे भा ग़ई।

दिल में धक-धक होने लगा था।

उसके पेट में पल रहा बच्चा मानो उछलने लगा था। जो उसे यहाँ से वापस जाने को कह रहा था।

वह रुक ग़ई।

पलंग़ पर विजेंद्रसिंह राठौड़ का घायल शरीर पड़ा था।

जयजयवंती का जी आक्रंद करने लगा।

पति था। फिर भी... फिर भी... फिर भी...

‘आइये, आइये, निकट आइये... '

वह पलंग़ के एकदम करीब सरक ग़ई।

कुछ सूझ ही न रहा था।

उसे लगा कि वह काँप रही है।

ग़ले से काँपती आवाज निकली-‘कैसे हैं ? अब ठीक हो ? '

कोई उत्तर न मिला।

जयजयवंती का चेहरा झेंप ग़या।

उसे हुआ कि वह वहाँ से दूर-दूर भाग़ जाये।

वहाँ तो विजेंद्रसिंह राठौड़, उसके पति ने उसकी ओर देख हँस दिया। और उसके गोरे-गोरे चेहरे को देखते हुए देर तक हँसता रहा, मुस्कुराता रहा।

जयजयवंती सब कुछ भूल ग़ई। पति का अंतिम पत्र-उसका इकरार...टूट चूका संबंध...सब भूल ग़ई। वह पति के सीने तक झुक कर उसके मुख, भाल और विशाल कंधे पर हाथ फेरने लगी।

‘अब उसे आराम की जरूरत है'।- डॉक्टर ने कहा, और खड़े हो ग़ये। पहले से ये अधिक गंभीर लग़ रहे थे।

जयजयवंती का चेहरा खिल उठा। अब उसके मन में कोई संदेह न था कि पति ने उसे माफ कर दिया है। वह खुश हो उठी। वह नया जीवन शुरू करना चाहती थी। किन्तु पेट में तो एक बच्चा पल रहा...

डॉक्टर के पीछे-पीछे वह बाहर आयी।

फिर से एक नया सिलसिला शुरू हो ग़या।

डॉक्टर पेड्रिक तेज़ी से ऑफिस में आये।

पीछे-पीछे जयवंती।

‘बैठो, हम दर्दी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बात करेंगे'।

जयजयवंती बैठ ग़ई।

डॉक्टर पेड्रिक ने एनक उतारे, दोनों काँच साफ किये, फिर से एनक पहने। वे कुछ कहना चाहते थे किन्तु कह नहीं पा रहे थे।

कुछ समय तक वे मन ही मन उलझते रहे।

वहीं तो जयजयवंती ने पूछा, ‘मेजर का हँसना, मैं समझ न पायी'।

‘क्यों ? '

उत्तर में जयजयवंती ने विजेंद्रसिंह राठौड़ का अंतिम पत्र डॉक्टर के सामने रख दिया।

डॉ.पेड्रिक सोच में पड़ ग़ये। पत्र उन्होंने ही लिखा था वह बात जयजयवंती जान चुकी थी।

मौन का एक जाला उस शांत कमरे में बुना जाने लगा।

पल-पल गुजर रहे थे। एक के बाद एक, एक के बाद...

कोई घटना घटी होगी। युवा को बहुत जल्दी झटका लग़ जाता है... डॉक्टर पेड्रिक ने फिर एनक उतारी, फिर से साफ की, फिर पहनी।

जयजयवंती की निर्दोष आँखों में आँसू उभर आये। सारा इकरार उसने किया। अपने अंतिम पत्र में उसने जो बातें लिखी थीं, वह भी बतायीं।

डॉ.पेड्रिक सुनते रहे।

‘उस इकरार के बाद विजेंद्रसिंह ने आपके साथ के सारे संबंध तोड़ दिये थे, सच है न ? '

‘हाँ, वह पत्र जो अभी ही मैंने आपको दिखाया... '

डॉ.पेड्रिक को सारी बातें याद हो आयीं।

वे इस सुंदर और कबूतर जैसी भोली स्त्री को देखने लगे।

उन्होंने भी उससे छलना ही का खेल खेला था न !

किन्तु अब तो उसे हकीकत बतानी होगी। सच कहना ही होगा।

किन्तु सच बताना सरल न था। सुनना भी आसान न था।

यह भोली-भाली युवती अपने पति के हाल सुन पायेगी क्या ?

डॉक्टर पेड्रिक एक बार फिर उन भोले नयनों की ओर देख बैठे।

उन आँखों में एक ही नहीं, हजारों सवाल उभर रहे थे।

‘डॉक्टर... डॉक्टर... सच-सच कहो, मेरे पति को क्या हुआ है ? '

‘क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? '

*********
 
16

डॉक्टर ने जयजयवंती को उत्तर देने के लिए जबान खोली, किन्तु शब्द नहीं फूट रहे थे। हरी-नीली आँखों वे विजेंद्रसिंह राठौड़ की पत्नी को नख-शिख देखते रहे।

क्या यह युवती यह कठोर आघात सह पायेगी ?

यदि सामान्य बात होती या कि फिर पति-पत्नी के बीच सामान्य रूप से होते हैं वैसे घरेलू संबंध होते तो वे किसी को कभी भी ऐसी बात न करते।

किन्तु यहाँ तो बात भी और रिश्ते भी कुछ ओर थे।

दोनों पति-पत्नी थे और शायद अब नहीं भी हो सकते...और शायद थे भी।

उन्होंने जयजयवंती के कुछ पत्र, जो मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के सामान से मिले थे, पढ़े थे... उन सभी पत्रों में सिर्फ स्वच्छन्द प्रेम की, प्रकृति की और स्नेह की बातें थीं। दूसरा कुछ था ही नहीं।

तो फिर जयजयवंती का अंतिम पत्र कहाँ होगा ?

फाड़ डाला होगा ?

जला दिया होगा ?

फाड़ डाला होगा ?

या ?

जो भी किया हो, किन्तु घायल मेजर के सामान से ऐसा कोई भी पत्र नहीं मिला था। जयजयवंती ने डॉक्टर से सारी बातें दिल खोलकर कहकर इकरार किया था।

वह सुनकर डॉक्टर ने सोचा था कि दूसरे की बात होती तो ठीक किन्तु इस भोली-भाली युवती को भ्रम में रखना योग्य नहीं है।

किन्तु यकायक सारी बातें सच-सच कहने के भी कुछ खतरे थे, उसके बारे में वे अभी सोच रहे थे। जयजयवंती - मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ की युवा और खूबसूरत पत्नी जब घायल पति के पास ग़ई थी तब विजेंद्रसिंह उसकी ओर देख मुस्कुराया था।

एक नहीं, दो बार।

जयजयवंती उसकी हँसी को देख सब कुछ भूल ग़ई थी। पति का तिरस्कार, पति की घृणा, अपनी ग़लती, संबंध विच्छेद, अंतिम पत्र...सब कुछ भूल ग़ई थी। वह पति के एकदम पास जाकर उससे सट ग़ई थी। उसके चेहरे, गाल, भाल पर प्रेम से हाथ फेर रही थी।

उसे लगा होगा...पति ने उसे हमेशा के लिए माफ कर दिया होगा। मेजर विजेंद्रसिंह जाज्वल्यमान जयजयवंती की ग़लती को सदा के लिए भूल चुके हैं। पत्नी के इकरार वाले पत्र को भूल ग़ये हैं। और वे निर्दोष हँसी हँस दिये थे।

किन्तु...

डॉ.पेड्रिक ने अपने सूखे सफेद बालों पर हाथ फेरा।

फिर उनके होंठ बंद हो ग़ये।

कोई निश्चय मन ही मन किया।

एक युवा और आशावान युवा बहादुर योद्धा की जिंदगी को तबाह होने से बचाना था। अपना यह फर्ज था। डॉक्टर सिर्फ दवाई ही नहीं देता, सिर्फ चीर-फाड़ ही नहीं करता... दर्दी के भविष्य की भी चिंता करता है।

‘मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ का स्वास्थ्य वैसे तो बहुत अच्छा है...आपने तो उन्हें प्रत्यक्ष देखा है न ! '

आगे क्या कहें, उसी सोच में उन्होंने एक ही बात फिर से दोहरायी।

‘हाँ... ' वे हँसे भी। एक बार नहीं, दो बार।

‘उसने शायद आप जिसे ग़लती मान रही हैं, उसे माफ कर दिया हो'।

‘या मेरी ग़लती को सदा के लिए भूल ग़ये हो ? '

‘हाँ...ऐसा हो सकता... '

‘कुछ भी हो, किन्तु मेजर मेरी ओर देख दो बार हँसे, उससे मुझे खुशी हुई। मेरा यहाँ आना व्यर्थ न ग़या'।

‘थेंक्यू।

‘थेंक्यू तो मुझे आपसे कहना चाहिये, डॉक्टर ! '

‘मेरा तो फर्ज था... '

‘तो क्या मेरा फर्ज न था। हमारे हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार तो पति ही परमेश्वर है'।

डॉक्टर पेड्रिक ने बड़े टेबल पर रखे ईसा मसीह के फोटो को देखा। यकायक वे क्रॉस की मुद्रा कर बैठे।

ईसा मसीह के फोटो की ओर देखते-देखते उन्होंने सोचा। इस युवा दंपती की जिंदगी शायद भग़वान ईसा की प्रेरणा से मैं बचा लूँगा। ईसा मदद करेगा...अवश्य करेगा।

और मदद के लिए ही देख रहे हो वैसे उस फोटो की ओर देख कुछ पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं।

फिर तुरंत आँखें खोल दीं।

फिर एक बार जयजयवंती की अपनी ओर ताक रही आँखों की ओर उन्होंने देखा। फिर स्नेह से कहा- ‘आप मेरी सहायता करेंगी ? '

प्रश्र सुन जयजयवंती मुस्करा दी।

आँखों ही से प्रश्र किया-‘मुझसे सहायता माँग़नी न होगी, आपको तो ऑडर ही करना होगा... '

डॉ.पेड्रिक ने ताक कर देखा।

जयजयवंती की आँखों में समर्पण के भाव छलक रहे थे।

वे खुश हुए।

उन्होंने ईसा को देखा। क्रॉस पर लटकते ईसा... शरीर में जहाँ-तहाँ तीक्ष्ण कील मारे ईसा...

वेदना...दु:ख... दर्द... यातना...

ईसा के चेहरे पर इसमें से कुछ भी न था। वहाँ तो प्रकाश... तेज... दया...माया... और प्रेम ही थे।

ईसा के चेहरे के उस समय के जैसे भाव जयजयवंती के चेहरे पर पढ़, उसकी आँखों से उभर रहे प्रेम को देख कर उन्होंने शांति से कहा-

‘मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ ने तुम्हें जो अंतिम पत्र लिखा था वह तुम मुझे दोगी ? '

‘दूँगी... किन्तु... ? '

‘किन्तु... क्या ? ' प्रश्नार्थ से डॉक्टर उसे ताकते रहे।

‘किन्तु वह तो मैंने आपको बताया ही है। मेरा अनुमान है कि उसे तो आपने पूरा पढ़ा था'।

‘हाँ... पढ़ा तो है ही। फिर भी वह पत्र तुम दे सकोगी ? '

उत्तर में जयजयवंती ने पति का अंतिम पत्र, पति-पत्नी के संबंध विच्छेद का पत्र डॉक्टर पेड्रिक के सामने धर दिया।

उसकी समझ में कुछ न आया।

अंतिम पत्र मांग़कर डॉ.पेड्रिक क्या करना चाहते होंगे ?

वह अनुमान न कर सकी।

वह अभी भी अनुमान ही में भटक रही थी कि डॉक्टर ने उसके हाथ से पत्र ले लिया। और यों ही पढ़ रहे हो वैसे एक बार फिर से पढ़ा।

फिर कहा- ‘मान लो कि यह पत्र विजेंद्रसिंह ने तुम पर नहीं किन्तु मुझ पर लिखा हो... '

‘ग़लत बातों के अनुमान से जिंदगी सच्चे रास्ते पर नहीं आ जाती, डॉक्टर'।

‘ये सही है किन्तु यदि मेजर ने ये पत्र मुझे लिखा होता तो ये मेरे पास ही रहता न ! '

‘जरूर'।

‘तो फिर इस पत्र को मैं अपने ही पास रखूँगा'।

‘आपके पास ? '

‘हाँ, मेरे पास, क्यों तुम्हें कोई एतराज है ? '

‘एतराज तो नहीं किन्तु... उसने दर्द भरी हँसी से कहा- ‘आपको ये क्या काम आयेगा ? '

‘इससे मैं तुम्हारी जिंदगी को नवपल्लवित करना चाहता हूँ। इस पत्र में जमीन के टुकड़े की, घर के मालिक की, और ऐसी ही अन्य बातें हैं। जिसे मैं जरा भी महत्व नहीं देता। क्या तुम महत्व देती हो ? '

उत्तर के रूप में दो मोती जैसे आँसू जयजयवंती के गाल पर गिरे।

डॉक्टर ने ओर कुछ न पूछा।

उन्होंने एक बार फिर ईसा के प्रशांत चेहरे की ओर देखा।

फिर जयजयवंती की ओर देखा।

और मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ द्वारा तीव्र आवेग़ से लिखे ग़ये संबंध विच्छेद के उस अंतिम पत्र को उन्होंने फाड़ डाला।

उसके टुकड़े-टुकड़े कर उड़ा दिया।

पत्र का एक भी शब्द साबुत न बचे वैसे मसल दिया।

फिर ये हँसे।

खिलखिलाकर हँसे... और जयजयवंती को अपने पीछे आने का इशारा कर ऑफिस से निकल ग़ये।

डॉक्टर पेड्रिक सीधे घायल मेजर के कमरे में पहुँचे।

जयजयवंती कुछ खास समझ ही न पा रही थी।

फिर भी डॉक्टर पेड्रिक पर उसे पूरा भरोसा था।

वह डॉक्टर के साथ विजेंद्रसिंह राठौड़ के कमरे में पहुँची।

नर्स ग़र्म पानी में पोता भिगो कर शरीर के कुछ भागों पर स्पंज कर रही थी।

जयजयवंती को होने लगा कि यह काम उसे करना चाहिये। उसने पहले नर्स की ओर और फिर डॉक्टर की ओर देखा। नर्स अपने काम में व्यस्त थी। डॉक्टर जयजयवंती की ओर देख रहे थे।

‘मिस मार्गारेट...तुम जा सकती हो। आज तुम छुट्टी के लिए मेरे पास आयी थी न ! '

‘यस... डाक्टर... '

‘नाव यू गो... '

सफेद दंतावली को दिखाते हुए नर्स ने हँस दिया। किन्तु फिर आश्चर्य से देखा, आँखों ही से पूछा- ‘फिर यह काम कौन करेगा...? '

‘मिसीस राठौड़ अब से यहाँ ही रहेगी। दूसरे किसी की जरूरत नहीं है, क्यों, सच है न ? ' जयजयवंती की ओर देखकर उन्होंने कहा।

‘हाँ, मैं यहाँ ही रहूँगी। मेजर ठीक हो जायेंगे तब तक... '

‘ठीक हो जाय वहीं तक ही नहीं, सदा के लिए...'

दोनों हँस पड़े।

डॉक्टर को हँसते देख विजेंद्र ने भी हँस दिया।

‘देखो तो मेजर... कौन आया है ? ' डॉक्टर पेड्रिक ने अत्यंत गंभीर हो, कहा।

उत्तर न मिलने पर डॉक्टर ने फिर से पूछा।

उत्तर मिला... धीरे से... शांति से... ‘नयी नर्स'।

‘ना... अच्छी तरह देखो...पहचानो...कौन है ? '

‘मैं नहीं पहचानता'।

‘तुम इसे पहचानते हो, जानते हो। इसके साथ दिनों रहे हो'।

‘मैं ? नहीं डॉक्टर'।

कुछ देर स्पेश्यल रूम में मौन छाया रहा।

विजेंद्रसिंह जयजयवंती के विशाल भाल, उसकी मृदु आँखों को, गोरे गालों को ताक ताक देखता रहा, किन्तु पहचान की कोई मुद्रा उसकी आँखों में न उभरी।

‘मेजर...याद करो...हरी-हरी पहाड़ियाँ, पीले पंखोंवाले कत्थई रंग़ की छींटवाले ‘पीली' पंछियों, कोमल तितलियाँ, पहाड़ी कौआ... और प्यार से भरी युवा पत्नी... '

‘पत्नी...? '

‘हाँ... हाँ... तुम्हारी पत्नी... देखो... यह सामने ही खड़ी है। जयजयवंती... पहचानो। याद करो... कोशिश करो... '

‘मैं कुछ नहीं जानता, डॉक्टर...मैं किसी को नहीं पहचानता। मुझे कुछ याद नहीं...? '

जयजयवंती की आँखें भर उठीं।

‘पति मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ सब कुछ भूल ग़या है ? सारा अतीत बिसर ग़या है ? कुछ नहीं जानता ? किसी को पहचानता नहीं ? उसे भी नहीं ? अपनी पत्नी को भी नहीं ? '

‘मेजर... तुम्हारा एक बच्चा भी है, याद है ? ' डॉक्टर ने पूछा।

‘मेरा... बच्चा ? नहीं...नहीं... मुझे कुछ याद नहीं'।

‘तुम्हारा एक घर था। पहाड़ी इलाके की हरी-हरी पहाड़ियों से घिरे मैदान में, याद है ? '

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘बसवेश्वरसिंह राठौड़- नाम याद है ? '

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘बादशाह'।

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘अल्शेशियन डॉग़ ? '

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘जयजयवंती ? '

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘शादी ? '

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘ठीक'।

‘तुमने आज क्या खाया था ? '

‘मैंने... '

‘हाँ... हाँ...तुमने... ? '

मेजर विजेंद्रसिंह ने कोई उत्तर न दिया। वह जयजयवंती के सुंदर चेहरे को अनिमेष देखता रहा।

‘टमाटर का सूप...? '

पेड्रिक ने कहा... फिर त्वरा से देखा।

घायल मेजर ने कोई उत्तर न दिया। उसकी आँखें किसी को ढूँढ़ रही थीं। भाल पर झुरियाँ इकट्ठी हो ग़ई थीं... ये कुछ याद कर रहे थे... बहुत ध्यान से... किन्तु कुछ भी याद न आ रहा था।

थककर कहा- ‘मुझे कुछ याद नहीं'।

***********

17

डॉक्टर कुछ देर मौन रहे। उनके चेहरे पर अपूर्व धीरता थी।

उन्होंने मेजर के कंधे पर हाथ रखा। जयजयवंती को इशारा किया।

दोनों ने साथ मिलकर उसे बिठाया।

शरीर का पीलापन दूर होने लगा था। लालिमा उभर रही थी। शारीरिक कमजोरियाँ तो काबू में थीं... किन्तु मानसिक ...?

इसके लिए शायद लम्बे समय की जरूरत थी। लम्बे समय की, राह देखकर बिताया जाय उतने समय की।

बैठकर विजेंद्रसिंह ने फिर से देखा।

डॉक्टर और जयजयवंती-दोनों उसका निरीक्षण करते थे।

‘ये साड़ी तुमने खरीदी थी'।

‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘देखो ये अंगूठी... रिंग़... डायमंड... तुम्हारे फाधर इन लो ने दिये थे'।

जयजयवंती की ऊँग़ली में हीरे की अंगूठी सुंदर लग़ रही थी।

विजेंद्रसिंह ने देखा। कुछ देर तक देखा किया। फिर उस हाथ को अपने हाथ में ले लिया।

जयजयवंती उसके करीब आई।

अंगूठी को, चमकते हीरे को बराबर देखा। फिर सिर हिलाया।

धीरे से कहा-‘मुझे कुछ याद नहीं'।

‘कुछ याद नहीं ? कुछ भी नहीं ? '

मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ ने कोई उत्तर न दिया।

‘अच्छा... अब तुम आराम करो'। कहकर डॉक्टर खड़े हुए।

जयजयवंती ने उसकी ओर देखा।

‘मिसीस राठौड़, आइये... ' कहते हुए फिर से ऑफिस की ओर चल पड़े।

विजेंद्रसिंह को बराबर सुलाकर वह ऑफिस में ग़ई।

डॉ.पेड्रिक कुछ लिख रहे थे।

‘वैसे तो दूसरी कोई अड़चन है ही नहीं। शरीर तो करीब करीब सुधर चुका है। सहायता से चल भी सकता है। खाना भी खाता है... सामान्य बातें भी करता है'।

‘किन्तु अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाते। सच है न डॉक्टर ? '

‘तुम्हें ही नहीं... किसी को भी नहीं पहचानता। सारा अतीत यह भूल चुका है। सिर के पिछले भाग़ से शस्र के कुछ टुकड़े चीर-फाड़ करके हमने निकाले थे। बहुत कोशिश की...किन्तु इसे कुछ याद ही नहीं आता। इसलिए तुम्हें बुलाने के अतिरिक्त कोई चारा ही न था। शायद ये अपनी पत्नी को पहचान लें... शायद पहचान ले... इस संसार में पत्नी ही एक ऐसी व्यक्ति होती है जो अपने पति के बहुत करीब होती है...सदा'।

‘तो फिर इसका उपाय क्या, डॉक्टर ? '

‘दवाई तो हम दे ही रहे हैं, इंजेक्शन और दूसरी ट्रीटमेंट भी चालू है। किन्तु मुझे लग़ता है कि इसकी सेवा लम्बे समय तक करनी पड़ेगी'।

‘मैं बराबर समझी नहीं'।

‘वैसे तो ये सभी तरह से अच्छा है। हँसता है, बोलता है, खाता है, पीता है, आता-जाता भी है, इसलिए दूसरी कोई शारीरिक कमी तो है नहीं। किन्तु दिमाग़ पर जो चोट पहुँची है, उससे विस्मृति आ ग़ई है। शायद ठीक होने में समय लगे...धीरे धीरे...बहुत ही देर से ठीक हो सकता है... शायद न भी हो सके... शायद हो...कुछ निश्चित रूप से कुछ भी... '

‘थेंक्यू डॉक्टर... अंत में एक बात पूछ लूँ ? '

खुशी से।

‘मेजर को मैं घर ले जा सकती हूँ ? '

‘क्यों नहीं ? ये पाग़ल थोड़े हैं ? '

फिर से ‘थेंक्यू' कह मन ही मन किसी निर्णय की जुगाली कर रही जयजयवंती ऑफिस से निकल ग़ई।

तब डॉक्टर ने महसूस किया कि कोइÔ सुगंध उनके ऑफिस में फैल चुकी है...

**********
 
18

सैनिक अस्पताल के विशाल प्रांग़ण में जीप खड़ी थी।

कुछ ही देर में डॉ.पेड्रिक, मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ और जयजयवंती बाहर निकले।

दोंनो साथ ही बैठे।

ड्राइवर ने डॉक्टर की ओर देखा। फिर चाबी घुमायी।

एक घरघराहट से जीप चालू हुई। ड्राइवर का पैर ब्रेक पर ही था।

‘मिस्टर राठौड़, तुम्हारे साथ तुम्हारी पत्नी मिसीस राठौड़ है, इसे मत भूलना'।

‘मेरी पत्नी ? नहीं...नही... मुझे कुछ याद नहीं, डॉक्टर...' कहकर उसने बाजू में देखा।

जयजयवंती पहली बार जब, यहाँ, इस सैनिक अस्पताल में मेजर से मिली थी तब मेजर जैसा हँसे थे, बराबर वैसे ही ये हँसे... और न जाने कब तक जयजयवंती को देखते रहे।

जयजयवंती ने भी हँस दिया।

डॉक्टर पेड्रिक भी हँस पड़े।

‘गुड लक...बेस्ट विशीस'। कहते हुए डॉक्टर ने कुछ जरूरी सूचनाएँ दीं, और हरी-हरी पहाड़ियों की हवा से जो भी फर्क हो, विजेंद्रसिंह राठौड़ की याददाश्त में कितना सुधार होता है उसका वृतांत हर पंद्रह दिनों के बाद भेजते रहने को कहा।

सभी ने हाथ हिलाकर बिदा दी। घरघराहट के साथ जीप रेल्वे स्टेशन की ओर दौड़ने लगी।

तब डॉ.पेड्रिक बालक-सी निर्दोष हँसी हँस रहे थे। यदि किसी ने देखा होता तो पता चलता कि उनके चेहरे पर ईसा मसीह-सा स्मित उभर रहा था।

कम्पाउन्ड के दरवाजे के खंभे के ग़ले में अब भी वह साइन बोर्ड लटक रहा था- ‘कुत्ते से सावधान'।

विजेंद्रसिंह ने उसे पढ़ा।

फिर वह खड़ा रहा।

यों ही चारों ओर देखा।

छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, हरी-हरी पहाड़ियाँ... वह देर तक देखता रहा।

पहाड़ियों ने भी उसको देखा...दूर-दूर से उड़ कर आ रहे ‘पीली' पंछियों के समूह ने भी उसको देखा। निकट की क्यारी से कम्पाउन्ड के बाहर आती कोमल तितलियों ने उससे पहचान की। सामने के वृक्ष से ध्यान से देख रहे कौए ने मौन की भाषा में पूछा- ‘आये कब ? कैसे हो ? '

परिचित होने के बावजूद अपरिचित बनकर वह सब कुछ देखता रहा।

यहाँ सारी पहाड़ियाँ, ‘पीली' पंछियों के पसरते-बंध होते कत्थई रंग़ की छींट वाले पंख, कोमल तितली, पहाड़ी कौआ- सब उसे पहचानते थे। आज से नहीं...परापूर्व से। बरसों से...सभी उसे जानते थे, पहचानते थे किन्तु वह...'।

वह किसी को भी नहीं पहचानता था।

सभी के लिए वह अपना था।

किन्तु उसके लिए सभी पराये थे, अनजाने थे।

सब उसे पहचानते थे किन्तु वह किसी को भी नहीं।

पत्नी के उदर में पल रहे बच्चे को भी नहीं।

फिर वह हँस दिया।

जब जब भी वह आनंद में होता, हँस देता था। छोटे बच्चे-जैसा।

धीरे-धीरे वह कपाउन्ड को पार कर भूल चुके मकान की सीढ़ियों के पास आ रुका।

जंजीर से बँधा अल्सेशियन कुत्ता उसे कठोर नज़रों से ताकता रहा।

धीरे धीरे उसकी कठोरता कम हुई।

वह मालिक को आश्चर्य चकित हो देखता रहा।

फिर उसने दुम हिलायी... और आराम से बैठ ग़या।

विजेंद्रसिंह राठौड़ का चेहरा हँसी से भर उठा।

वह कुत्ते के पास बैठा। उसके लंबे-लंबे बालों पर प्यार से हाथ फेरा।

जयजयवंती सामने के दरवाजे से ये सब देखा करती थी।

अल्शेशियन कुत्ते ने मेजर को पहचान लिया था।

उन्होंने कुत्ते को पहचाना होगा ?

‘यह अल्शेशियन तुम पर पहली बार भौंका था, वह याद है ? '

‘मुझ पर ? यहाँ ? इस जग़ह पर ? '

‘नहीं, मुझे कुछ याद नहीं'। दरवाजे से हो वह कमरे में ग़या। फिरा। उसके कमरे ही में उसने आराम किया।

‘यहाँ हम रहते थे'। पत्नी ने कहा।

‘यहाँ ? '

‘हाँ, और इसी पलंग़ पर सोये थे'।

‘हाँ, और पहाड़ियों पर घूमने जाते थे... कुछ याद आता है ? '

‘ना, मुझे कुछ भी याद नहीं आता'।

पुराने नौकर एक के बाद एक खबर पूछ ग़ये।

बटलर तो बड़े बाबू यहाँ नहीं हैं इसलिए छोटे बाबू उसकी पीठ में एक मुक्का लगा देंगे- की अपेक्षा से हँसता-हँसता आया।

किन्तु विजेंद्रसिंह ने उसकी ओर देखा भी नहीं।

झिझककर वह खड़ा रह ग़या।

फिर जरा जोर से कहा- ‘सलाम सा'ब'।

विजेंद्र ने देखा। उसे देखता रहा।

कुछ देर बाद कहा- ‘सलाम'।

वह देखता रहा।

विजेंद्रसिंह राठौड़ के चेहरे पर हँसी खिल उठी। जयजयवंती देखती रही।

बटलर को मेजर ने नहीं पहचाना।

किसी को भी नहीं, खुद को भी। ये सब भूल ग़ये हैं। सारा अतीत बिसर ग़ये थे। भूल जाने में कितना बड़ा सुख है ! वह तो कुछ भी नहीं भूल पाती। पराये आदमी का संग़ करना यदि पाप कहलाता हो तो उसने पाप किया था। उस पाप की सारी जानकारी उसने पति को लिख कर बता दी थी...सब कुछ निष्कपट भाव से लिखा था। इकरार किया था।

और पति का अंतिम पत्र मिला था- पति-पत्नी के संबंध विच्छेद का।

पति मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ तो युद्ध में घायल हो, दिमाग़ के मार से सब कुछ भूल चुके थे। डॉ.पेड्रिक का कहना था कि अतीत की यादें अब उसे शायद ही आये, किन्तु...किन्तु वह अपने पाप को कैसे भुला पायेगी !

जयजयवंती ने भूलने की बहुत कोशिश की किन्तु वह भूल न पायी... वहाँ तो उसे याद आया। सैनिक अस्पताल में डॉ.पेड्रिक ने अंतिम पत्र तो फाड़ डाला था... टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे।

उसे भी अब सब कुछ भूल जाना होगा।

पति विजेंद्रसिंह राठौड़ अतीत को भूल चुके थे।

भूलने ही में सुख है, शांति है, मजा है।

और आराम से सोये पति के बग़ल में वह सो ग़ई।

सबेरे पति को लेकर घूमने निकली।

वही हरी-हरी पहाड़ियाँ।

वही पीले पंखों को पसारकर उड़ते ‘पीली'...

कोमल पंखों वाली वही तितली।

ध्यान से ग़र्दन घुमा-घुमाकर देखता पहाड़ी कौआ...जयजयवंती हँस पड़ी।

उसे देख विजेंद्र ने भी हँस दिया।

पत्नी दौड़ी... दौड़ते ढलान उतर ग़ई...

पति दौड़ा... दौड़ते ढलान उतर ग़या।

दोनों देर तक दौड़ते रहे। हरी-हरी पहाड़ियों, पीले पंख पसारकर उड़ते पंछियों, कोमल तितलियों, पहाड़ी कौआ- सभी को देखते रहे, अतीत को बिसरते रहे और खिलखिलाकर हँसते रहे... हा... हा... हा... हा... हा...

पहाड़ियों के बीच एक-दूसरे से टकराकर प्रतिध्वनियाँ गूँजती रहीं........ हा... हा... हा... हा... हा...

समाप्त

 
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