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उपन्यास -साथ चलते हुए...

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उपन्यास --- साथ चलते हुए...

लेखक--जयश्री रॉय

बाहर फीके नीले आकाश में एक टुकड़ा चाँद उदास टँका था। पानी की महीन धार की तरह दूर चीरों की कतार पर चाँदनी उतर रही थी। चाँदी की पन्नियों की तरह ऊँचे पेड़ों के पत्ते चमक रहे थे। सोसायटी के स्वीमिंग पुल के पानी की सतह हल्के-हल्के लहराते हुए पंक्तिबद्ध जुगनुओं की तरह लगातार जल-बुझ रही थी। दूर बिल्डिंगों के माथे पर चमकते इश्तहार, उनकी सतरंगी रोशनियाँ - काँच की खिड़कियों, ऊँची इमारतों की सपाट दीवारों पर चमकती हुई, हजार रंगों में प्रतिबिंबित होती हुई... सब कुछ कितना मोहमय, स्वप्निल... जैसे सच न हो, इस दुनिया का न हो...

हाँ, यह सब सच नहीं, वह कोई सपना देख रही है जो थोड़ी ही देर में टूट जाएगा। इस कदर सपने से बाहर उसकी दुनिया बिल्कुल सुरक्षित है - वह, उसकी काजोल, उसकी तमाम खुशियों और खेल-खिलौनों के साथ। अभी, बस, थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा... वह सोचती है और रोती है। खुद को छला भी तो एक हद तक ही जाता है... थोड़ी ही देर में वह बेतरह थक आई थी। उसे वास्तविकता की तरफ लौटना पड़ेगा... अपने पाँवों से चलकर... इस विवशता की कोई कल्पना भी क्या कर सके...

हवा में बर्फ घुला था... अपने चेहरे पर चाकू की धार-सी फिरती हल्की हवा को महसूसते हुए उसने पूछा था, न जाने किससे - क्यों, मेरी काजोल ही क्यों...? न जाने कितनी बार... कोई जबाव नहीं मिला था, जैसा की हमेशा से होता है। आकाश, धरती - सब सपाट हो गया है, किसी अलंघ्य प्राचीर की तरह... कितनी ऊँची, कितनी कठोर, कितनी हृदयहीन... वह अदृश्य पाषाणों से टकराती फिरती है, शायद कोई दरवाजा कहीं खुला मिल जाय, कोई आस्ताना... छाति भर नालिश लिए, दुहाई लिए वह हर बंद दरवाजा खटखटाती है, साँकल खड़काती है - सुनो, कोई तो सुनो...

परदेश की जमीन पर बहुत पीछे छूट गए अपने भगवान की याद भी यकायक हो आई थी - कितने ही सारे नाम एक साथ! प्रार्थना करते हुए मन में कही गहरा अपराधबोध था। बचपन में हर बात के लिए कितनी आसानी से अपनी दादी के भगवान्जी के पास पहुँच जाती थी... परीक्षा में अच्छे अंक के लिए तो कभी हाऊसफुल चल रहे सिनेमा के टिकट के लिए... अब वह सरल विश्वास कहाँ रहा! संशय की चपेट में आकर जीवन का सब कुछ कितना कठिन और असाध्य हो गया है।

कभी-कभी ईर्ष्या होती है उन लोगों से जो अपनी सहज, सरल आस्था में निश्चिंत होकर जीते हैं। उनकी कोई समस्या नहीं। सारे प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं उनके पास। उनके सारे सुख-दुखों के जिम्मेदार उनके भगवान हैं और जो भी घटता है उनके साथ वह पहले से तय है जो उनके पिछले कर्मों का फल है...

उस रात उसने न जाने कितने दिनों के बाद उस तरह से डूबकर प्रार्थना की थी। जाने अपने किन पापों के लिए माफी माँगती रही थी - ईश्वर से, सबसे... अब कोई अहम नहीं, अभिमान नहीं, यहाँ प्रश्न काजोल का है, सिर्फ काजोल का...! कितनी मन्नतें, मिन्नतें, व्रत, उपवास, तीर्थ... काजोल ठीक हो गई तो वह यहाँ इतने का प्रसाद चढ़ाएगी, वहाँ अमुक देवी की थान में मत्था टेकेगी, यह करेगी, वह करेगी... कितनी भलनरेवल हो गई है वह, कितनी कमजोर... किसी डूबते हुए की तरह हर तिनके को पकड़ती हुई। कहीं से भी, कोई भी उसे थोड़ा आश्वासन दे दे, कह दे कि उसकी काजोल को कुछ नहीं होगा।

एक गहरी प्रार्थना के बाद जब वह सोने गई थी, मन बहुत हल्का हो आया था। लगा था, नहीं, सब ठीक हो जाएगा। पूरब में फैलती हल्की लाली में उसने काजोल का चेहरा एक बार फिर देखा था। वह किसी फरिश्ते की तरह मासूम और सुंदर लग रही थी। उसके छोटे-से बिस्तर में ही वह सिमट-सिकुड़कर सो गई थी - उसके नन्हें शरीर को अपनी बाँहों में लेकर... वह हल्के से कुनमुनाई थी और फिर नींद में डूब गई थी। उसे लगा था, वह कह रही है 'माई बार्वी, रोज...'

उसे उसके गुड्डे-गुड़ियों की दुनिया में रहने दो भगवान... इतनी बड़ी दुनिया है तुम्हारी, बस, एक छोटा-सा कोना, थोड़ी-सी हवा और जिंदगी... प्लीज भगवान... रोते हुए न जाने वह कब सो गई थी...

सुबह काजोल ने ही उसे उठाया था - माँ, उठोगी नहीं, मुझे स्कूल के लिए तैयार होना है... उसने उसकी दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने गालों से सटा ली थी - नम और ठंडे... उसे उस वक्त बुखार नहीं था।

- आज स्कूल नहीं, हमें हस्पताल जाना है, तुम्हारे कुछ टेस्ट करवाने...

उसने उसकी घुँघराली लटों को चूमते हुए कहा था, अपनी आवाज को सहज रखने की कोशिश करते हुए।

- प्लीज माँ, मुझे वहाँ नहीं जाना!

उसने रोनी-सी सूरत बनाई थी -

मुझे सुई से बहुत दुखता है...

- नहीं, कुछ नहीं होगा, मैं रहूँगी तुम्हारे साथ...

कहते हुए उसकी आँखें यकायक पिघल आई थीं। कहाँ बचा पाई थी वह अपनी बच्ची को उन कष्टकर सुइयों, दवाइयों से। केमो के पहले चक्र के कुछ ही दिनों बाद काजोल के सारे बाल झड़ गए थे। ओह, सोचकर वह आज भी गहरे आतंक और यातना में हो आती है... काजोल के रेशमी, घुँघराले बाल... कितने खूबसूरत थे! काजोल को दूध पीना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। मगर यह सुनकर कि दूध पीने से बाल जल्दी बड़े होते हैं, वह रोज नाक बंद करके एक गिलास दूध पी जाती थी, फिर आईने के सामने खड़ी होकर देखती थी, उसके बाल सचमुच बड़े हुए कि नहीं। रेपेंजल की तरह बाल होंगे मेरे, राजकुमार मेरे बाल पकड़कर बॉल्कनी तक आ जाएगा... काजोल अपने लंबे होते बालों को देखकर खुशी से किलकने लगती... वही बाल जब इस तरह से झड़ गए... उसे याद है, काजोल को गोद में लेकर उस दिन वह भी बहुत रोई थी।

...सुबह काजोल की चीख सुनकर उसकी नींद खुल गई थी। उसके कमरे में जाकर देखा था, काजोल बिस्तर में दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए चिल्लाए जा रही थी। उसके चारों तरफ बाल ही बाल बिखरे पड़े थे, बड़े-बड़े लच्छों में। उसका माथा सामने से बिल्कुल गंजा हो गया था। यह दृश्य देखकर वह एक पल के लिए सन्न होकर रह गई थी। हालाँकि डॉक्टर ने केमो के साथ बाल गिर जाने की बात पहले ही उसे बता दी थी, फिर भी अचानक वह दृश्य देखकर वह बेतरह घबरा उठी थी। दौड़कर काजोल को अपनी गोद में समेट लिया था। उसके बाद माँ-बेटी देर तक एक-दूसरे से लिपटकर रोती रही थी।

बाद में उसे इस बात पर बहुत ग्लानि हुई थी। अपनी बच्ची को सँभालने के बजाय वह खुद किस तरह से उसके सामने ऐसे कमजोर पड़ गई? इससे काजोल और भी असुरक्षित हो गई होगी, उसका डर बढ़ गया होगा।

मगर काजोल को अपनी माँ पर बहुत यकीन था - माँ की गोद में वह हमेशा सुरक्षित है। ठगी गई वह, अपने मासूम यकीन के हाथों मारी गई... माँ की गोद भी निरापद नहीं होती, वह अंत तक जान नहीं पाई...!

जानती वह भी कहाँ थी तब, सोचा था अपनी अथक सेवा, प्रार्थना और परिश्रम से काजोल को बचा लेगी... मगर कुछ भी काम न आ सका। आखिर काजोल चली गई, उसकी तरफ उम्मीद से निहारती हुई, बार-बार मदद के लिए पुकारती हुई - माँ... मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है, मैं जीना चाहती हूँ...

काजोल के जाने के साथ ही तब तक का सारा पाया, सहेजा हुआ जैसे एकदम से निरर्थक हो गया था। अंततः मौन से जीवन हार ही गया था और उसके साथ वह भी... उस क्षण वह जोर से चीखना चाहती थी, पूरी दुनिया को तहस-नहस कर देना चाहती थी, मगर चुप खड़ी रह गई थी - हस्पताल के बिस्तर पर अपनी बेटी का प्राणहीन चेहरा देखते हुए! उस समय सफेद चादर पर उसके लंबे घुँघराले बाल, घनी काली भौंहें और बंद आँखों पर झँपी सघन बरौनिया कितनी स्पष्ट और विलक्षण दिख रही थीं...! केमो खत्म होने के बाद फिर से कितने खूबसूरत बाल निकले थे उसके...

एक गहरी साँस लेकर उसने अपने अंदर टटोला था, नहीं! कहीं आँसू की एक बूँद नहीं बची है! शायद वह पहले ही अपने सारे आँसू खर्च कर चुकी है। कभी-कभी रोने के लिए भी वह तरस जाती है। देर तक ऐंठती रहती है। इस रोने का एक अकेला सुख भी गया... इस परती जमीन में अब कोई नमी नहीं, कुछ सजल नहीं। सूखा और बस सूखा- मीलों तक, युगों तक...

आज भी रह-रहकर काजोल का प्रश्न उसे समय-असमय घेर लेता है - माँ, मैं ठीक हो जाऊँगी न? मैं नहीं मरूँगी न? वह अपनी मूक विवशता में खड़ी-खड़ी उसे देखती रही थी और अंदर की चीख बाहर के कभी न टूटनेवाले सन्नाटे में बदल कर रह गई थी। एक माँ के वश में अपने बच्चे की सुरक्षा न रह जाय... इस विवशता का कोई नजीर नहीं। उन क्षणों के निःशब्द कोलाहल में डूबकर वह आज एक प्रस्तर प्रतिमा में तब्दील होकर जी रही थी - सारी संवेदनाओं से खाली होकर एकदम सपाट और निर्विकार...

फ्युनरल के बाद घर लौटकर उसने आशुतोष को अपने भारी-भरकम बैगों के साथ तैयार पाया था। नीचे कार में तापसी बैठी थी। ऊपर फ्लैट से कार की खिड़की से झाँकता हुआ उसका डार्क ग्लासेस पहना हुआ आधा चेहरा ही दिख रहा था। शायद वह सिगरेट पी रही थी। अधीर होकर उसने इस बीच कई बार कार का हार्न बजाया था।

हाथ में आशुतोष का दिया चेक थामे वह देर तक कोई प्रतिकिया व्यक्त किए बगैर खड़ी रह गई थी। जिंदगी की सारी संवेदनाओं का मूल्य चुका दिया गया था - उसके समर्पण, प्रतिबद्धता का मूल्य! अंकों में समेट लिया गया था जीवन की गहनतम अनुभूतियों को - यही हासिल था उसके जीवन के पंद्रह वर्षों की शर्त रहित संबद्धता का। एक कागज के टुकड़े में उसके धड़कते हुए जीवनानुभूतियों की कीमत लिखी हुई थी। उसे उसका प्राप्य मिल गया था। उसने न देखती हुई-सी दृष्टि से उस चेक पर लिखे अंक को देखा था - ...नहीं, आशुतोष ने अपनी तरफ से कुछ कम नहीं आँकी थी उसकी कीमत!

अलग तो वह भी हो जाना चाहती थी उससे। एक लंबी कानूनी लड़ाई उसने भी लडी है इसके लिए। मगर अभी, इस समय... कोई शत्रु भी शायद ऐसा न करे!

काजोल के मृत चेहरे की स्मृति अभी भी उसके मानस में ताजा थी। अभी भी उसकी देह की मीठी गंध, साँसों का मद्धिम स्वर उसके आसपास था, उसे पूरी तरह घेरे हुए। अभी उसके लिए उसका रोना शेष था, अभी तो उसकी स्मृति में उसका पूरा जीवन ही जीना शेष था।

अपनी बेटी के ब्लड कैंसर के साथ पाँच वर्ष की अथक लड़ाई ने उसे हर तरह से निचोड़ लिया था। वह अंदर से एकदम असक्त, अवश हो आई थी। इसी लड़ाई ने उसे आज हर तरह से हरा दिया था। बेटी ने साथ छोड़ा तो आज पति भी हाथ में बैग लिए जाने के लिए तैयार खड़ा है! क्या वह उसे थोड़ा, बस थोड़ा समय नहीं दे सकता था? ...इतना कि वह अपनी - उन दोनों की - बेटी का मातम मना सके!

उसकी अबूझ चावनी और ठगी-सी चुप्पी ने आशुतोष को एकदम से अधैर्य कर दिया था। नीचे तापसी रह-रहकर हार्न बजाए जा रही थी। खिड़की की तरफ मुँह करके 'आई एम कमिंग डैमिट!' कहकर वह उसकी ओर मुखातिब हुआ था -

'क्या हुआ? कुछ और चहिए तुम्हें? कुछ कहती क्यों नहीं?'

उसकी झुँझलाई हुई आवाज से चौंककर वह स्वयं में लौटी थी -

'नहीं, कुछ भी तो नहीं! मगर आशुतोष, तुम क्यों घर छोड़कर जाने लगे! घर तुम्हारा है, तुम लोग रहो। मैं वापस देश लौट रही हूँ।'
 
कितनी आसानी से उसने एक ही पल में अपना सब कुछ दे दिया था उन्हें- आशुतोष और तापसी को। कल तक इन्हीं चीजों से - अपनी दुनिया से - कितना मोह था उसे! इस घर की एक-एक चीज, एक-एक दीवार तक से गहरा लगाव था। तिनका-तिनका जोड़कर इस घर को बनाया था। आज सब कुछ बेगाना हो गया, कितनी सहजता से। वह काजोल को खो चुकी है, अब और कुछ खो नहीं सकती। कुछ खोने के लिए उसके पास बचा ही नही है... अब तो बस छूटना है, मुक्त होना है... सब बंधन हो गया है, पाश हो गया है... दम घुट रहा है उसका, इतनी रद्दी, कबाड... कहाँ पैर रखे, कहाँ बैठे... हटा दो, सब कुछ हटा दो!

और अधिक प्रतीक्षा न कर पा के तापसी भी ऊपर उठ आई है और अब उसे कौतुक भरी आँखों से देख रही है। उसकी आँखों की चमक और होंठों की मुस्कान में आज वह अपना पराजय नहीं देखती। वह इन चीजों से परे चली गई है - बहुत दूर...

कल तक इसी औरत को देखकर वह सर से पाँव तक जल उठती थी। उसका नाम सुनना तक उसे गँवारा नहीं था। कितनी बार लड़ पड़ी है आशुतोष के साथ इसी को लेकर। मन ही मन उसकी मृत्यु कामना तक कर चुकी है। मगर आज उसके अंदर कोई दाह, कोई दंश नहीं। काजोल की नन्ही देह के साथ ही सब कुछ जलकर राख हो चुका है - उसकी घृणा, असंतोष और शिकायतें...

कहते हैं, दुख मनुष्य को माँजता है, उसका परिष्कार और शोधन करता है... आज वह इस तथ्य को समझ पा रही है। कल तक उसके अंदर न जाने कितनी अभावात्मक बातें ठूँसी हुई थीं, मगर आज सब कुछ धुल-पुँछकर स्वच्छ हो गया है। कहीं कोई कलुष नहीं, मैल नहीं, हिंसा नहीं है, सब कुछ जैसे किसी गंगा में सिरा आई है अस्थियों की तरह... मृत्यु के परस से जीवन की सारी बातें कितनी तुच्छ, कितनी नगण्य हो जाती हैं!

जीवन, इसकी चाह मनुष्य को स्वाथी बनाता है, संकुचित भी, मगर दुख हृदय को विस्तार देता है, उसकी संकुल परिधि को फैलाकर प्रशस्त करता है। जब से काजोल के लिए उसने प्रार्थना करना शुरू किया था, उसका स्वर बदल गया था। पहले अपने सुख, अपने हित से बढ़कर कभी कुछ ईश्वर से चाहा नहीं था। मगर काजोल के लिए जीवन और आरोग्य माँगते हुए उसने अपने अनजाने ही सारे विश्व के लिए शांति और समृद्धि माँगना शुरू कर दिया था - ईश्वर! सभी को सुख दो, वैभव और खुशियाँ दो, साथ में बस मेरी काजोल को भी थोड़ी-सी जिंदगी दे दो...

उसने अभी तक कुछ भी तो नहीं देखा था। कितनी मासूम थी उसकी दुनिया। वहाँ चंदा मामा में अब भी वह प्राचीन बुढ़िया बैठकर रात दिन चरखा कातती है, संता क्लॉज क्रिसमस की रात उसके मोजे में उसकी मनपसंद उपहार रख जाते हैं... उसे जीने दो भगवा! इतनी बड़ी दुनिया है तुम्हारी। इसका एक छोटा-सा कोना उसे दे दो। थोड़ी धूप, हवा और खुशियाँ... और क्या चाहिए उसे... उसकी एकाग्र मन से की गई प्रार्थनाएँ कहीं नहीं पहुँचीं... उसकी आस्था में कोई कमी थी या आसमान ही बहुत दूर था... वह नहीं जानती और न अब जानना ही चाहती है, क्या फर्क पड़ता है...

आज वह आशुतोष और इस औरत के लिए भी बस अच्छा ही चाहती है। कितनी छोटी-सी है ये जिंदगी। इसमें क्यों किसी की खुशी के रास्ते में आ जाना। वह किसी के सुख-शांति में बाधा नहीं बनना चाहती। उसे नहीं जीना तो क्या किसी और को नहीं जीना है... रहे सब अपनी मर्जी और खुशी से। वह किसी का रास्ता नहीं रोकेगी। किसी की खुशी के बीच आ जाना, यह भी तो एक तरह की हिंसा ही है।

'देश लौट रही हो!

आशुतोष के स्वर में गहरे आश्चर्य के साथ खुशी का भी रेश था। तापसी की भी बिन माँगे ही मन की मुराद पुरी हो गई थी। समंदर के किनारे तीन कमरों के इस खूबसूरत फ्लैट को वह आज तक ईर्ष्या और लोभ से देखा करती थी। उसके अपने अँधेरी गली के उस घुटन भरे कमरे की तुलना में यह घर स्वर्ग जैसा था। और अधिक प्रतीक्षा न कर पाके वह इसी बीच ऊपर उठ आई थी।

उसने आशुतोष का दिया हुआ चेक मेज पर रख दिया था। काजोल के बाद ये चीजें उसके लिए एकदम से बेमानी हो गई थी। इस खोने के बाद वह फिर कभी कुछ अर्जित नहीं पाएगी। काजोल उसे हमेशा के लिए हराकर चली गई है। उसने अपनी सूनी आँखें झपकाई थी, वहाँ - उसकी चावनी में - अब कुछ नहीं था - राग, द्वेष - कुछ भी नहीं। बस एक अडोल सन्नाटा और दर्द- किसी लंबे, सूने गलियारे की तरह - अंतहीन, अछोर, अझेल...

लायब्रेरी के अपने पार्ट टाइम नौकरी से उसने अब तक जो भी थोड़ा बहुत अर्जित किया है वह काफी होगा किसी तरह जी लेने के लिए। उसकी जरूरतें भी अब कितनी रह गई है... फिर उसका लेखन तो है ही। आर्थिक न सही, भावनात्मक सहारा तो वह देगा ही।

'मैंने नौकरी छोड़ने के लिए आवेदन पत्र दे दिया है। सारी औपचारिकताएँ पूरी होने तक सागरिका के पास रहूँगी, फिर देश...'

आशुतोष उसे अवाक-सा होकर देखे जा रहा था। चेहरे पर गहरी झेंप और ग्लानि के गड्मड्-से भाव थे। कहाँ तो वह एक लंबी-चौड़ी लड़ाई के लिए मन ही मन प्रस्तुत हो रहा था और कहाँ अब बिना किसी तनाव के उसे सब कुछ एकदम से मिल गया था। उसे जाते हुए देख वह कुछ कहते-कहते रुक गया था। तापसी ने बढ़कर उसका कंधा दबाया था, मगर न जाने क्यों उसने उसका हाथ अचानक झटक दिया था।

वह मुड़कर अपने कमरे में चली आई थी। अपने इतने दिनों के विवाहित जीवन से उसका हासिल बहुत थोड़ा ही था, इतना भी नहीं कि दो बक्से भर पाए। इस संबंध का असल वह खो चुकी थी - उसकी काजोल, उसकी बेटी... अब उसे क्या पाना था, क्या ले जाना था। काजोल जहाँ नहीं रह सकी, उसे भी नहीं रहना है। पड़ा रहने दो इन ईंट-पत्थरों को... इनसे सिर्फ बोझ ही बढ़ता है, आगे का सफर कठिन हो जाएगा... अकेली कहाँ उठा पाएगी इतना सब कुछ?

वह काजोल के कमरे में जाकर देखती है - उसकी अलमारी, पढ़ाई की मेज, खिलौने... मेज पर दवाई की शीशियाँ, जूठा चम्मच, कितना कुछ पड़ा है। उस दिन आखिरी बार अस्पताल जाते हुए काजोल ये दवाइयाँ खाकर गई थी। उससे निगली भी नहीं जाती थी इतनी सारी दवाइयाँ। कई बार उल्टी कर देती थी।

वह सूखी आँखों से सब कुछ देखती है। बीच-बीच में सीने से एक दीर्घ श्वास निकल आता है। मगर वह रो नहीं पाती। एक गहरी तकलीफ में अंदर का सब कुछ शून्य हो गया है। एकदम गूँगा, निर्वाक! सूखे में भाँय-भाँय करते हुए धरती-आकाश की तरह... आँखों में जलन है, और कुछ नहीं। सजलता के सारे सोते मर गए हैं, पानी पत्थर हो गया हैं...

अल्मारी खोलकर वह काजोल के कपड़े देखती है। उनमें अभी तक उसकी देह गंध बसी हुई है - ताजी और मीठी, फूलों की तरह... वह उनमें चेहरा धँसाए गहरी साँसें लेती है - सब कुछ अपने अंदर सहेज, समेट लेना है। घर खाली करना है, मगर इन सामानों से मन भर लेना है - कोने-कोने तक, आगे के निसंग सफर में यही साथ बनेंगे, संबल भी। न जाने धूप, बारिशों के कितने अनगिन मौसम आएँगे, तब यही होगा ओढ़ना-बिछौना... आश्रय! वह अपनी पूँजी सहेजती है - काजोल के रिबन - लाल रंग के। इनमें बँधे उसके बाल याद आते हैं - रेशमी, घुँघराले। उनका मसृन स्पर्श अब भी उसकी अंगुलियों के पोरों पर जीवंत है - धड़कता हुआ, स्पंदित...

उसकी मोतियों की माला, मखमली चप्पलों की जोड़ी... उनमें से झाँकते हुए दो गोरे, मुलायम पैर- एक जोड़े कबूतर की तरह... वे जैसे आज भी उसके आसपास दौड़ते फिर रहे हैं - माँ, जरा छुओ तो मुझे... वह आगे बढ़ती है और फिर थमककर रुक जाती है। चारों तरफ असहाय आँखों से तकती रहती है - काजोल, एक बार दिख जा बिटिया...

सारे घर में - हर जगह काजोल है, मगर कही नही है... भरा-पूरा घर खंडहर की तरह भाँय-भाँय करता है, उसे यकायक बहुत डर लगता है - मौत कितनी निष्ठुर है, कितनी भयंकर... एक स्याह दीवार की तरह अडिग खड़ी है उसके सामने। और उस पार है उसकी बच्ची - रोती हुई, उसे पुकारती हुई... वह अब भी उसकी आवाज, उसका अनवरत रुदन सुन सकती है!... ये आवाजें अब उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगी।

एक पल के लिए उसकी इच्छा होती है, वह भागकर आशुतोष के पास जाए, एक रात के लिए, बस एक रात के लिए उसकी बाँहों में आश्रय माँगे। कहे कि आशुतोष! आज की रात बहुत भारी है मुझ पर, मुझे अपनी पनाह दे दो... जो खो गया है वह हम दोनों के साझे का था। हम दोनों ने अपने प्यार से रचा था उसको... उसके दुख भी हमारे साझे का है। साथ रोने का भी एक सुख होता है शायद, आज वही दे दो मुझे। बस, इतना ही, और कभी कुछ नहीं माँगूँगी तुमसे... अकेले यह दुख मुझसे उठाया नही जा रहा...

मगर वह देख सकती है, यही, इसी कमरे से - आशुतोष बैल्कनी में खड़ा है। तापसी उसके कंधे से टिकी साथ खड़ी है। पूरे फ्लैट में बनते हुए ब्नोकोली सूप की सुगंध फैली हुई थी।

दो प्रेमियों का एक सुंदर घर... इसमें उसकी जगह कहाँ है! काजोल के साथ उसके भी दिन समाप्त हो गए हैं इस घर में। अब उसे चली जाना चाहिए... अपनी परछाईं तक समेटकर...

वह हाथ-पाँव सिकोड़कर काजोल के बिस्तर पर लेट जाती है। उसके छोटे-से रेशमी तकिए पर खून के धब्बे फैले हैं। आँखों के सामने काजोल का चेहरा तैर आता है - नाक, मुँह से रिसता हुआ खून और डरी हुई आँखों की कातर चावनी... वह अपनी आँखें कसकर मूँद लेती है... कहीं हिमपात हो रहा है, अगजग सफेद हो गया है - कफन की तरह, एक शव बनी पूरी दुनिया उसमें लिपटी पड़ी है। कहीं कोई हलचल नहीं, स्पंदन नहीं, बस मृत्यु का-सा अंतहीन मौन और स्तब्धता...

वह चुपचाप पड़ी रहती है। अंदर दुख पत्थर की तरह कई पर्तों में जम चुका था। उस वक्त वह सिर्फ रोना चाहती थी, बहुत-बहुत रोना चाहती थी - अपनी काजोल के लिए! एक अर्से से जो पीड़ाएँ उसके अंतस में गाँठ बाँधती रही थीं, आज उसकी गिरहें खोलना उसके लिए जरूरी हो गया था, वर्ना वह जी नहीं पाएगी, खुलकर साँस नहीं ले पाएगी। अंदर एक आहत पक्षी की-सी छटपटाहट भरी हुई है, जैसे दो टूटे पंख लगातार फरफरा रहे हैं... पसलियों में अटकी एक आँसू की बूँद धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है, इतनी बड़ी की उसे समूची डूबो दे...

वह अपने बिस्तर पर पड़ी रोती रही थी, शायद पूरी रात ही। लगा था, आज उसका मर्म ही आँसुओं में पिघलकर बह जाएगा। आशुतोष सामने की बाल्कनी में खड़ा देर तक सिगार पीता रहा था। तापसी ने विथोबेन का रिकार्ड लगा दिया था। शायद उसके रुदन की आवाज को दबाने के लिए। मगर उस रात उसकी आवाज दब नहीं पाई थी। पूरे घर की दीवारें, छत, दरवाजे - सब उसके आँसुओं में भीगकर तर-बतर हो गए थे। उसके रुदन में उसके पूरे जीवन के संबल के खो जाने की पीड़ा थी जो धीरे-धीरे उसके अंदर से बहकर पूरे घर में व्याप गई थी।

बीच में तापसी एक बार उसके कमरे में आई थी - उसे सूप का कप थमाने। सूप के कप से उठते वाष्प के पीछे उसका चेहरा लरजता हुआ-सा प्रतीत हुआ था। वह उसकी तरफ देखती रही थी - कभी वह उसकी अभिन्न सहेली हुआ करती थी। आज वह उसे पहचान भी नहीं पाती। कोई इतना भी कैसे बदल सकता है...

बहुत विश्वास किया था उसने उस पर। पंजाब के किसी छोटे-से शहर से आई थी। यहाँ आने के बाद उसके पति ने उसका जीना मुहाल कर रखा था। किसी ढाबेनुमा रेस्तराँ में अपने ससुरालवालों के साथ रोटियाँ बेलती रहती थी। कभी-कभी एक साथ कई सौ। ऊपर से ताने और तिरस्कार। माँ-बाप की इकलौती लड़की... खूब चाव और धूमधाम से शादी की गई थी उसकी। दहेज से घर भर दिया था बेटी का।

मगर इससे ससुरालवालों को संतुष्टि नहीं हुई। भूख और-और भड़क गई। नित नई चीजों की फरमाईशें होने लगी। न पूरी होने पर मार और अपमान। इसी तरह घुट-घुटकर जी रही थी जब उसे किसी परिचित के यहाँ शादी में मिली थी। खूब गोरी और तीखे नाक-नक्श की वह कमसिन लड़की उसे पहली ही नजर में भा गई थी।

उसकी प्रेरणा और सहायता से उसके बाद उसने स्वयं को स्वाबलंबी बनाया था। गाड़ी चलाना सीखकर, कंप्युटर कोर्स आदि करके सबसे पहले उसने अपने लिए एक नौकरी जुटाई थी और अंत में अपने पति से तलाक ले लिया था। उसके घरवाले इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। उनके लिए ससुराल में लड़कियों की तकलीफ एक आम बात थी जिससे कमोबेश सभी औरतों को अपने जीवन में कभी न कभी दो-चार होना ही पड़ता है।

 
एक दिन वह अपने ससुराल से भागकर रात के दो बजे उसके घर पहुँची थी - सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में! चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। उसके मुक्केबाज पति ने उसका चेहरा पंचिंग बैग समझकर कूट डाला था।

उसके बाद कानून की एक लंबी प्रक्रिया चली थी। उसे उसके पति से तलाक दिलवाने के लिए उसने रात दिन एक कर दिया था। उन दिनों एक बच्ची की तरह यही औरत उसकी गोद में सर रखकर रोया करती थी... कहती थी, अपर्णा दी, तुम मेरे पिछले जन्म की माँ हो!

एक बार उसे दो महीने के लिए अपने मायके जाना पड़ गया था। पिताजी बीमार थे, कई और भी काम निबटाने थे। आशुतोष पर तो नहीं, मगर हाँ, तापसी पर विश्वास था, पूरा घर उसके हवाले कर गई थी। आशुतोष को खाना बनाना बिल्कुल नहीं आता था। यह जिम्मेदारी उसने स्वेच्छा से उठाई थी। कहाँ था, अपर्णा दी, तुम निश्चिंत होकर जाओ, यहाँ मैं सब सँभाल लूँगी। आशुतोष जी को कोई तकलीफ नहीं होगी। वह बेफिक्र होकर चली गई थी।

लौटकर देखा था, तापसी ने उसका घर सँभाला नहीं था, पूरी तरह से हथिया लिया था। चारों तरफ इसी की चर्चा थी। आते ही परिचितों ने उसे सब कुछ बताया था। पार्टियों, उत्सवों में वह उसके गहने, कपड़े पहनकर आशुतोष की बीवी की तरह सम्मिलित हुआ करती थी। दिनों तक ऑफिस से छुट्टी लेकर आशुतोष घर में पड़ा रहता था। दोनों इसी बीच सात दिन के लिए कहीं एक साथ घूम भी आए थे। सब कुछ देख-सुनकर वह सन्न रह गई थी। कोई ऐसा भी कर सकता है! उसे यकीन करने में कठिनाई हो रही थी। आशुतोष पर नहीं, उसने तापसी पर विश्वास किया था, वह तो ऐसी नहीं थी! फिर...?

पूछने पर आशुतोष हिंसक हो उठा था। उसे न जाने क्या-क्या खरी-खोटी सुना गया था। तापसी भी सहज बनी रही थी। उसमें कहीं भी शर्म या किसी तरह का संकोच नहीं था। सीधी आँखों में आँखें डाले बिना पलक झपकाए बात करती थी। गजब का दुस्साहस था उसमें।

एक बार उसने दोनों को रंगे हाथों कार पार्किंग में पकड़ लिया था। फिर भी दोनों को शर्म नहीं आई थी। बड़ी ढिठाई से तापसी कहती रही थी, वह तो आशुतोष का मसाज कर रही थी। बर्फ में फिसलकर गिरने के बाद उसके पूरे शरीर में बहुत दर्द हो गया था। आशुतोष भी अपने कपड़े दुरुस्त करते हुए उसकी हाँ में हाँ मिला रहा था - सच, अब बड़ा अच्छा लग रहा है। वह दुख और शर्म से गड़कर रह गई थी। बिना कुछ कहे वहाँ से उठ आई थी। कभी-कभी दूसरे की बेशर्मी देखकर इनसान स्वयं शर्मिंदा होकर रह जाता है।

उसके बाद काजोल बीमार पड़ गई थी और वह उसकी बीमारी को लेकर बुरी तरह उलझकर रह गई थी। उसे उन दिनों और किसी बात का होश नहीं रह गया था। क्लीनिक में, अस्पतालों में रात दिन बैठे-बैठे वह काजोल के सिवा और कुछ भी सोच नहीं पाती थी। आशुतोष को इस बात से मनमानी करने का अवसर मिल गया था। इस बीच उसने कई बार उन दोनों को एक साथ देखा था, मगर ध्यान नहीं दे पाई थी। वह अपनी मरती हुई बेटी की उस समय देखभाल करती कि अपने विश्वासघाती पति के पीछे जासूसी करती फिरती! उसके मन में गहरी वितृष्णाजन्य उदासीनता पैदा हो गई थी। सब भाड़ में जाय, उसे परवाह नहीं।

उन दिनों उसे लगातार अस्पताल में काजोल के साथ रहना पड़ता था। घर लौटकर समझ पाती थी, उसकी अनुपस्थिति में तापसी उसके फ्लैट में रात बिताकर जाती है। कभी आशुतोष के बिस्तर में तापसी के बालों के क्लीप पड़े मिल जाते थे तो कभी कहीं कुछ और। उसने अपने सोने का कमरा अलग कर लिया था। आशुतोष ने कोई आपत्ति नहीं की थी। इन दिनों वह शरीर से संतुष्ट था शायद, इसीलिए उससे भी अच्छा व्यवहार करता था।

शुरू-शुरू के दिनों में वह हर रात उसके पास आ जाता था। बिना सेक्स के वह रह ही नहीं पाता था। सालों उसने यह अत्याचार झेला था, मगर अब यह सब उसके लिए असह्य हो उठा था। कई बार वह उसे बुखार से तपती हुई काजोल के पास से हाथ पकड़कर खींच लाता था। काजोल के रोने की धीमी-धीमी आवाज सुनते हुए वह विवश पड़ी रुँधती रहती थी। निःशब्द रोते हुए सरहाने का तकिया भीग जाता था।

आशुतोष की गाढ़े अंधकार में थरथराती हुई कामुक आवाज - अरे कुछ नहीं, बुखार में थोड़ी अपसेट हो गई है... वह घृणा, क्रोध और विवशता में सुलग-सुलग उठती थी। कभी उसके हृदयहीन कमेंटस् - कितनी ठंडी हो तुम, कुछ मजा ही नहीं आता... एक बार ऐसे ही किसी क्षण में वह उसे अपने से परे धकेलकर काजोल के कमरे में भाग गई थी।

वहाँ जाकर उसने देखा था - काजोल फर्श पर बैठी सिसक रही है, नाक से बहते हुए ताजे खून से उसका चेहरा और सारा नाइट गाउन लिसरा हुआ है। उसने उसे उठाकर अपने सीने में भींच लिया था। किसी डरे हुए चिड़िया के बच्चे की तरह काजोल का पूरा शरीर उस क्षण थरथरा रहा था -

माँ, मुझे बहुत डर लग रहा था, तुम मुझे छोड़कर क्यों चली जाती हो?

- अब कभी नहीं जाऊँगी चंदा... प्रामिस...!

वह हिलक-हिलककर रो पड़ी थी। उस समय उसे अपने विवस्त्र शरीर का भी ख्याल नहीं आया था। उस दिन के बाद उसने आशुतोष को फिर कभी अपने पास फटकने नहीं दिया था।

तापसी की तरफ देखते हुए वह न जाने कहाँ-कहाँ भटकती चली गई थी। यंत्रणा का सिलसिला हर सिरे पर शुरू हो जाता है। कौन-सा हिस्सा है मन का जो दुखता नहीं... मना करने पर भी तापसी उसके सामने खड़ी रही थी - थोड़ा पी लो, सारा दिन कुछ खाया-पिया नहीं है तुमने...

आखिर उसने उसके हाथ से सूप का कप ले लिया था। उसके बाद उसने उसकी हथेली पर दो गोलियाँ रख दी थी, स्नायू को शांत रखनेवाली - ले लो, यु विल फिल बेटर...

उसने चुपचाप गोलियाँ गटक ली थी। कुछ देर चुप खड़ी रहने के बाद तापसी अचानक उसके पास बैठ गई थी। काफी देर तक दोनों के बीच एक असहज-सी खामोशी फैली रही थी। तापसी के चेहरे से उसके अंदर चल रहे किसी द्वंद्व का पता चल रहा था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, मगर कह नहीं पा रही हो। एक लंबी चुप्पी के बाद उसने उसकी तरफ देखा था, काँपती हुई-सी दृष्टि से -

मैं कोई सफाई नहीं दे रही अपर्णा... दी, मगर एक बात कहना चाहती हूँ।।

वह बिना कुछ कहे सूप के घूँट भरती रही थी।

- तुम जब अपने मायके गई थी...

- अब इन बातों को कहने-सुनने का कोई अर्थ नहीं... उसने बीच में ही उसे हाथ उठाकर टोका था।

- प्लीज, सुन लो, तुम्हारे लिए सुनना न सही, मेरे लिए कहना जरूरी है।

 
उसके बाद उसने उसे टोका नहीं था, मौन रहकर सुनती रही थी। अनायास तापसी की आँखों में आँसू भर आए थे - अपर्णा दी, तुम जब यहाँ नहीं थी, एक दिन मेरे ड्रिंक में कोई नशीली दवा मिलाकर मुझे बेसुधकर आशुतोष ने मुझे कई दिनों तक... सुनकर तापसी के साथ-साथ उसकी दृष्टि भी झुक गई थी। लगा था, कहीं से कसूरवार वह स्वयं भी है। इतना यकीन क्यों कर गई थी आशुतोष पर! उतना सब झेलने के बाद भी... मगर उसने तो... खैर! अब इन बातों में उलझने का कोई अर्थ भी नहीं रह गया है।

थोड़ी देर बाद तापसी ने फिर से बोलना शुरू किया था - जब भी मैं कुछ होश में आने लगती थी, वह जूस में मिलाकर मुझे फिर से कुछ पिला देता था, और मैं दुबारा अपना सुध-बुध खो बैठती थी। इसी तरह सोते-जागते, गहरे-हल्के नशे में मैं इस फ्लैट में सात दिनों तक पड़ी रही थी और जब पूरी तरह से होश में आई थी, मेरे पास वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं रह गया था। उसने कहा था, वह तुम्हें मना लेगा। हम तीनों साथ-साथ रहेंगे...

अचानक वह उसके पैरों के पास ढह गई थी-

यकीन करो, मैंने कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहा। यह सब बस हो गया... संयोग से जिस पुरुष के साथ मेरा संबंध बन गया वह तुम्हारा पति है... सच अपर्णा...दी...

- तुम कहना चाहती हो, तुम्हारा कोई कसूर नहीं? सब कुछ तुम्हारे अनचाहे, अनजाने...

इन सब बातों में दुबारा से न पड़ने के अपने निर्णय के बावजूद वह यह प्रश्न पूछे बिन नहीं रह पाई थी। प्रश्न सुनकर वह वहाँ पड़ी-पड़ी कुछ देर तक सिसकती रही थी और फिर धीरे-से अपना सर उठाया था -

झूठ नहीं कहूँगी, मुझे आशुतोष अच्छे लगते थे, मगर इससे आगे बढ़ने की शायद मैं अपनी तरफ से कभी हिम्मत नहीं कर पाती... तुम्हारा सुख देखकर भी ईर्ष्या होती थी। मैं सुंदर हूँ, कमउम्र भी, फिर भी मुझे कुछ नहीं मिला... और तुम, तुम्हारा ऐश्वर्य...

कहकर वह तेजी से उठकर वहाँ से चली गई थी। वह भी उसे रोककर उससे कुछ कह नहीं पाई थी। उसके सोचने-समझने की शक्ति जैसे एकदम से समाप्त हो गई थी। इतना सब कुछ एक साथ घटा था उसके साथ, वह सँभाल नहीं पा रही थी अपने आप को।

आँसुओं से भीगी उस रात के बाद लरजते हुए सही, वह जीवन की ओर पहला कदम बढ़ा पाई थी।

अपने घर से छूटकर वह फिर किसी एक जगह बँध नहीं पाई थी। स्वदेश लौटकर भी यहाँ-वहाँ भटकती ही रही थी। जब तक जाने का रास्ता खुला दिखता था, वह ठहरी रहती थी, मगर ज्यों ही कोई संबंध बंधन बनने लगता था, वह उसे तोड़कर चल देती। अब भटकन को ही उसने अपना ठिकाना बना लिया था। टूटे हुए साहिल पर घर बनाकर बार-बार बिखर जाने का एक अपना ही परवर्टेट किस्म का सुख होता है, यह उसने बेघर होकर जाना था। उसका घर उसकी काजोल से था, आशुतोष से था। अब जो वे नहीं तो वह इन ईंट-पत्थरों के मकानों का क्या करती!

कुछ दिन अल्मोड़ा में रहकर उसने अपनी दूसरी किताब पूरी की थी। स्कूल, कॉलेज के दिनों में लिखने-पढ़ने का शौक था। कॉलेज के मैगजीन में ही पहली बार छपी थी। फिर कुछ स्थानीय पत्रिकाओं में भी। शादी के बाद कई सालों तक सब कुछ छूट गया था। काजोल के थोड़ी बड़ी होने के बाद प्रवासी भारतीयों के प्रयास से छपनेवाली कुछ पत्रिकाओं के लिए उसने लिखा था, प्रसंशा भी मिली थी। फिर उसका पहला उपन्यास देश के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था से प्रकाशित हुआ था जिसकी अच्छी-खासी चर्चा हुई थी। इसके बाद अपने प्रकाशक के आग्रह पर उसने दूसरा उपन्यास शुरू किया था, मगर फिर अचानक काजोल के बीमार पर जाने की वजह से कई वर्षों तक कुछ भी लिखना संभव नहीं हो पाया था। अब जाकर इतने वर्षों के बाद उसने अपना अधूरा पड़ा हुआ उपन्यास पूरा किया था।

अर्चना के आग्रह पर वह छोटानागपुर के इस डाक बँगले में गर्मी की छुट्टियों तक रुकने के लिए तैयार हो गई थी। अर्चना उसके स्कूल के दिनों की मित्र थी। उसके पति यहाँ के जंगलों के ठेके लिया करते हैं। यह बँगला उन्हीं का था। अपने बेटे की परीक्षा पूरी होने के बाद वह भी यहाँ थोडे दिनों के लिए आनेवाली थी। दोनों ने एक ही साथ जीवन के बसंत, यौवन की उठान और फागुन, पतझड़ के दिन देखे थे। दोनों के सुख-दुख एक-से और साँझ के थे। तीन वर्ष पहले उसने भी एक सड़क दुर्घटना में अपनी पहली संतान को खो दिया था। दोनों के बीच सुख से ज्यादा दुख का रिश्ता था और शायद तभी इतना गहरा था।

यहाँ का हर तरह की आधुनिकता तथा भीड़-भाड़ से दूर शांत, वन्य जीवन उसे रास आ गया था। न कोई जाननेवाला न परेशान करनेवाला। वह घंटों जंगलों में भटकती रहती, या ईजी चेयर पर अधलेटी कोई किताब पढ़ती रहती। रातों को महुआ के नशे में बेसुध सो रहती, या बीच रात को उठकर जंगल के आदिम, अभेद्य दुनिया की रहस्यमयी संगीत सुनती रहती। कभी खिड़की के पास बनैले सूअरों का 'घोत-घोत' सुनाई पड़ता तो कभी दूर किसी भयभीत मोर का अनवरत केंका। गर्मी की ये लंबी दुपहरे वह प्रायः लिखते हुए बीता देती। आसपास जंगली फूलों की गंध, पहाड़ी सुग्गों का कलरव, चाँद का उठना, सघन पेड़ों के बीच से गुजरती हुई हवा का उदास मर्र-मर्र स्वर... उसे सब कुछ प्रिय लगने लगा था।

रातों को दूर से आती संथालों के माँदल की धप-धप और गीतों की स्वर-लहरी सुनती हुई वह बँगले के बरामदे में देर रात तक अनझिप आँखों से बैठी रहती। ऐसे में एक उदास सुकून से उसका नीरव मन भर उठता। कभी वह अतीत के सुख में डूब जाती तो कभी उसी सुख की स्मृति में आँखें भीगोती रहती। नीली धुंध में लिपटी रात उसे निशि की तरह दोनों हाथ फैलाकर अपने पास बुलाती। मोहाछन्न की तरह उसका मन चाहता कि वह बढ़े और हमेशा के लिए उन साँवली, अशरीरी बाँहों में खो जाए। कितनी रातें वह जागकर बीता चुकी है और कितने दिन सोकर, अब उसके पास हिसाब नहीं रह गया है। यह अच्छा है कि यहाँ वह समय के बंधन से छूट गई है। एक दूसरे से उलझे-गुँथे दिनों की एक लंबी फेहरिस्त कैलेंडर में दर्ज है, मगर उसकी याद में नहीं। ये दिन बस कट जाए किसी भी तरह।

वह भटकती फिरती है जाने कहाँ-कहाँ, मगर अपनी अंदरुनी दुनिया में आज भी खड़ी रहती है अपनी बेटी के सरहाने। काजोल मर गई है और वह मर रही है! बस, इतनी-सी बात है और यही बात है। हर बीतते दिन के साथ उसे प्रतीत होता है कि वह काजोल के थोड़ा और करीब हो गई है। दोनों के बीच की दूरी घट रही है। जीवन - ये जीवन ही तो है दोनों के बीच! साँसें, धड़कनें... क्या है? बाधा ही तो है... इन्हें हटाए बिना एक-दूसरे तक पहुँचा नहीं जा सकता। कैसी गहरी निराशाजन्य सोच है... मगर वह विवश हो गई है।

दुख ने जीवन में जो कुछ भी सुंदर था, उजला था को पूरी तरह से आच्छादित कर दिया है। पाले से ठिठुरी हुई हरियाली की तरह सब कुछ हो गया है, धीरे-धीरे मटमैला पड़ते हुए, जर्द होते हुए... कभी शायद ये बादल छँटे, धूप खिले... उसने सब कुछ समय के हाथों छोड़ दिया है। उसकी सोच, उसकी दुनिया तो बस काजोल, उसकी स्मृति के इर्द- गिर्द घूमती रहती है।वह जानती है, काजोल आज भी उसके बिना अकेली रह नहीं पाती होगी... कही खड़ी सीने से अपन छोटा-सा तकिया दबाए रो रही होगी - माँ! मुझे डर लग रहा है...

- मैं आती हूँ चंदा... रात-बिरात वह अपने कमरे का दरवाजा खोलकर खड़ी हो जाती है, सामने पसरे अंधकार को टटोलते हुए। वहाँ कोई नहीं होगा, वह जानती है, मगर मान नहीं पाती... कभी उसे डर लगता है, वह पागल हो जाएगी।

कई बार काउंसलर के पास भी गई थी, फिर जाना छोड़ दिया था। नींद की गोलियाँ भी बेकार हो गई थीं। बस सर भारी हो जाता था और आँखें लाल, ऊपर से दिन भर की थकावट और ऊँघ। अपने चारों तरफ काजोल के कपड़े, किताबें, फोटो आदि फैलाकर अनझिप आँखों से रात को ढलते देखना और सुबह का इंतजार करना। सुबह होते ही फिर उसी अभिशप्त रात की प्रतीक्षा... कि काजोल, उसकी स्मृति के साथ एकांत में हुआ जा सके। पूरी तरह से। काउंसलर ने कहा था, खुद को थोड़ा समय दो... उसने मान लिया था। इसकी कोई कमी नहीं... समय ही समय है उसके पास। और क्या है। कुछ भी तो नहीं।

खुद से निजात पाने के लिए वह यहाँ-वहाँ भटकती फिरती है। न जाने कहाँ-कहाँ। कभी जंगलों में घूम-घूमकर सेमल, पलाश और पुटुस के फूल इकट्ठा करती है और उन्हें लाकर गुलदस्ते में सजा देती है। पीले, सिंदूरी फूलों से कमरा दमक उठता है। वह उन्हें देखती है और एक अनाम गंध में भीगी लिखती रहती है। आँसुओं का अनुवाद पन्नों में उतरता है, संवेदनाएँ शब्द बन जाती हैं और जिंदगी धीरे-धीरे किताब की शक्ल अख्तियार कर लेती है। बाहर झिमाती दुपहरी में रसभीना महुआ निःशब्द टपकता रहता है, देखते ही देखते बँगले का अहाता सफेद फलों से अंट जाता है। हवा उसकी मादक गंध से बोझिल हो उठती है। दिन ढलता है अपनी अलस, मंथर गति से, वन-वनांतर में निझूम रात उतरती है, कभी आधे-पूरे चाँद के साथ, कभी असंख्य, अनगिन तारों के साथ... एक आदिम रहस्य-रोमांच से भरी समस्त वन भूमि थरथराती रहती है रात भर...

रास्तों में आते-जाते कई बार कौशल मिले थे। एक बार बँगले में आकर चाय भी पी गए थे। उसकी किताब की बहुत प्रशंसा भी की थी।

उस दिन सुबह-सुबह रेंजर साहब आ धमके थे। गेट के बाहर खड़ी उनकी जीप में बहुत सारे लोग ठूँसे बैठे शोर मचा रहे थे। वह देर से सोकर उठी थी और उस समय चाय का कप लेकर अलस भाव से बरामदे में बैठी हुई थी। उन्हें आया देखकर वह हडबड़ाकर उठ खड़ी हुई थी। ढीले जूड़े के बाल खुलकर पीठ पर बेतरतीब फैल गए थे। वह अपनी मुसी हुई अस्त-व्यस्त साड़ी में काफी असहज महसूस कर रही थी। मगर रेंजर साहब उसके आग्रह करने पर भी बैठे नहीं थे। वे काफी जल्दी में दिख रहे थे। खड़े-खड़े ही उसे दूसरे दिन उनके साथ पिकनिक में आने का निमंत्रण दिया था। उनके कई रिश्तेदार कोलकाता से गर्मी की छुट्टियाँ मनाने यहाँ आए हुए थे। सबने मिलकर पिकनिक जाने का कार्यक्रम बनाया था। न चाहते हुए भी उसे हाँ कहना पड़ा था।

दूसरे दिन सुबह-सुबह तीन-चार जीपों में भरकर वे घाटशिला पहुँचे थे। बड़े-बड़े पत्थरों के बीच गहरी बहती हुई नदी के किनारे एक अच्छी-सी जगह देखकर उन्होंने अपना सामान जमाया था। कुछ दूरी पर पत्थरों को जोड़कर बनाए गए चूल्हों पर बड़ी-बड़ी देगचियाँ चढ गई थीं। रेंजर साहब के बड़े जीजाजी उनके माली और खानसामा के साथ खाना बनाने में जुट गए थे। हाथ के करछुल को उन्होंने नाटकीय अंदाज से हवा में लहराया था -

'मुरगीर कॅसा माँगसो आर खिचुड़ी, केमोन...?'

'दारूण-दारूण...'

सभी कोरस में चिल्ला उठे थे। वह औरों के साथ मिलकर सूखी लकड़ियाँ चुन लाई थी। एक केंद के पेड़ के नीचे शतरंजी बिछाकर कुछ लोग बैठे थे। रेंजर साहब की पत्नी कमलिका सबके आग्रह पर रवींद्र संगीत गा रही थी - जे रातें मोर दुआर गुली भांगलो झॅरे... उनकी आवाज बेहद मीठी और सुरीली थी। गीत के बोल का दर्द तरल होकर हर तरफ अनायास व्याप गया था। वह शब्दों की पीड़ा में डूब-सी गई थी - कैसी गहरी चाह, कसक है आवाज में!

 
अपने बालों के ढीले-से बंगाली जूड़े में कमलिका ने सेमल के लाल फूल खोंस रखे थे। धूप की सफेद उजास में उनके गोरे चेहरे पर उसी की दुधिया आभा फैली थी। बिना बाँहवाले ब्लाउज से झाँकते उनके सुडौल हाथ बहुत सुंदर लग रहे थे। तराशी हुई अंगुलियों में हीरे, पन्ने की अँगूठियाँ दमक रही थीं। उनकी तरफ देखते हुए उसे अचानक ख्याल आया था, कमलिका का चेहरा बँगला सीने तारिका सुचित्रा सेन से बहुत मिलता है। वैसे ही आकर्षक, मांसल होंठ और दिलकश मुस्कराहट। हारानो सुर फिल्म देखने के बाद वह उसकी फैन हो गई थी। प्रायः एकांत में उस फिल्म के गीत गुनगुनाया करती थी - आमी जे तोमार, ओगो तुमी जे आमार...

उनके गीतों में डूबती हुई उसने थोड़ी दूर पर उधम मचाते हुए बच्चों को देखा था। उनकी माँएँ उन्हें बार-बार पानी के पास न जाने की हिदायत दे रही थी। एक घने पीपल के तने से पीठ टिकाए वह मुट्ठियों में भर-भरकर घास नोंचती रही थी। पीपल की नर्म, गुलाबी पत्तियों से छनकर आती धूप यहाँ-वहाँ तितली की तरह उड़ती फिर रही थी। गहरे लाल, नीले रंग के पतंगे जंगली फूलों पर हीरे की तरह जड़े चमक रहे थे। लकड़ी चुनते हुए उसे एक मोर पंख मिला था। उसने उसे अपने बालों में खोंस लिया था। ऐसा करते हुए उसने कौशल को अपनी तरफ देखते हुए पाया था। उसकी आँखों में कुछ बहुत जाना-पहचाना-सा था। उसने अपनी दृष्टि फेर ली थी। वह कुछ जानना-पहचानना नहीं चाहती।

एक छोटी-सी लड़की जिसका नाम शायद आलो था, अपनी सुनहरी चोटियाँ हिलाते हुए दौड़ती फिर रही थी। अपने लाल फ्राक के घेर में वह न जाने क्या-क्या चुन लाई थी - केंद, आँवला, कुचफल... धूप में उसके गाल टमाटर जैसे लाल हो रहे थे।

उसकी तरफ देखते हुए उसकी आँखों के सामने बहुत पीछे छूट गया एक चेहरा कौंध उठा था - काजोल का चेहरा! उसकी काली-डागर आँखों में संसार भर का कौतूहल हुआ करता था - माँ, यह क्या है? माँ, वह क्या है?

उसके अद्भुत सवालों के जवाब अधिकतर उसके पास नहीं होते थे। सोचते हुए वह यकायक बेतरह थक आई थी। पेड़ के तने से टिककर खुद को ढीला छोड़ते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी। काजोल का चेहरा कंकर पड़े पानी की तरह हिलते हुए धीरे-धीरे खो गया था, मगर वह जानती थी, जल के अंदर हिलते सेंवार की तरह वह उसके अंतस की गहराई में हर क्षण बनी रहती है।

'मेरी बेटी दीया भी इतनी ही बड़ी है।'

न जाने कब कौशल उसके पास आ खड़ा हुआ था।

'अच्छा! आज साथ क्यों नहीं लाए?'

उसने आग्रह के साथ पूछा था।

'वह मेरे साथ नहीं, अपनी माँ के साथ रहती है। हमारे डिवोर्स के बाद उसकी कस्टडी उसकी माँ को मिली है।'

कौशल ने यह बात बहुत ही सपाट लहजे में कही थी।

'ओह!'

उसने चौंककर कौशल की तरफ देखा था। वह अब एकटक उस बच्ची को देख रहा था। उसकी आँखों में न जाने क्या था कि उसका अपना मन अनचन कर उठा था। दोनों के बीच कुछ साझा था - शायद किसी बहुत अपने को खो देने का दर्द! अपने ही अनजाने बढ़कर उसने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया था। कौशल ने एक पलक उसकी तरफ देखा था, फिर अपनी दृष्टि फेर ली थी। नहीं, अपनी गीली आँखों की नुमाइश नहीं की जा सकती। हँसना सबके साथ होता है, मगर रोना तो अकेले ही पड़ता है... यह बात अपर्णा भी जानती है, तभी तो इस तरह से अनजान बन गई है। नहीं, उसने कुछ भी नहीं देखा, कुछ भी नहीं समझा...

खाना बन जाने के बाद कमलिका उन्हें बुलाने आई तो दोनों को एक साथ बैठे देखकर उसके होंठों पर कौतुक भरी मुस्कराहट फैल गई। मगर उसे देखकर भी दोनों ने एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा था। अपने में डूबे-से देर तक बैठे रहे थे। उनकी उंगलियाँ आपस में उलझी रही थीं।

उस दिन उसे लगा था, उसके अलक्ष्य कहीं एक दस्तक हुई है। वह अधीर आग्रह से अनायास आगे बढ़ना चाहती है, मगर ठहरी रह गई है, दरवाजा खोल नहीं पा रही है... एक वर्जित की ग्लानि... मन इतना डूबा हुआ है दुख की मटमैली अनुभूतियों में कि खुशी का क्षणिक अहसास भी अपराधबोध से भर देता है। अभी उसका मातम पूरा नहीं हुआ है, अभी उसका रोना शेष है! काजोल की गीली आँखों की स्मृति उसकी पलकों को सूखने नहीं देती। सारी हँसी, सारी खुशी एक नन्हे, निस्पंद देह पर वार आई है। एक रक्तहीन चेहरा और दो फीकी आँखों की कातर दृष्टि उसकी स्मृतियों का हासिल है, वहाँ वह मुस्कराहटों के लिए हथेली भर भी जगह कहाँ बनाए...

उसकी सूनी कोख उसके अंतस में, उसके रगो-रेश में व्याप गई है। अब यह शून्य कैसे पुरेगा, यह रीता हुआ मन - किसी परित्यक्त गाँव-सा... अब इसे कभी नहीं बसना है, कभी भी नहीं... बंजर रहेगा यह देश हमेशा, इसकी ऊसर जमीन पर कभी कोई फूल नहीं खिलेगा... वह निःस्तब्ध रात के एकांत में कराह-कराहकर रोती है, खिड़की पर खड़ा चाँद चुपचाप पिघलता है, उसके हिस्से की रात खत्म होती है, मगर नहीं होती... बनी रहती है - उसके मन में - अपने सारे अपरिमित अंधकार और सन्नाटे के साथ...

अपनी अभावात्मक मानसिक अवस्था में वह जिंदगी को अब कोई दूसरा मौका नहीं देना चाहती, और यही शायद उसकी यंत्रणा और त्रासदी है। एक मन की जमीन उर्वर हो रही है, शनैः-शनैः अखुँआ रही है, तैयार है खुशियों की सुनहरी फसल उगाने के लिए, दूसरा मन श्मशान बना पड़ा है - चिता की धधकती लपटों और चिरांध से भरी हुई... उसे जीवन का कोई उत्सव नहीं चाहिए, मेला नहीं चाहिए। अपने निर्जन में संपृक्त, संतुष्ट है वह!

कभी संवेदना के स्तर पर दिनों तक सपाट दीवार-सी बन जाती है वह, कभी इसी के आकस्मिक सैलाब से दुहरी होकर रह जाती है, बिखर-बिखर जाती है। यह अंदर की लड़ाई है जो उसे तोड़ रही है, निःशेष कर रही है - प्रतिदिन, तिल-तिल...

पिकनिक के दिन कौशल की आँखों के गहरे मौन ने उससे कुछ कहा था - शब्दों से परे होकर, बिल्कुल चुपचाप, मगर स्पष्ट... उसने उन्हें सुना नहीं, अनुभव किया था, अपने पूरे वजूद से। घर लौटकर उस रात के मौन में भी वही शब्द पारदर्शी तितली की तरह उसके आसपास उड़ते रहे थे। वह अपने सामने किताब खोले खिड़की पर झरते हुए चाँद को अनमन तकती रही थी।

जंगल के घने पर्दे के पीछे से निकलकर अब चाँदनी फैल रही थी - रहस्य की सफेद नदी बनकर - अपने में सब कुछ डुबोती हुई, समोती हुई। पलकों पर नींद भी थी और सपने भी, मगर न जाने कितनी रात तक वह अपने सामने पसरी तिलस्म की उस गहरी नीली दुनिया को तकती बैठी रह गई थी।

रात की नसों में सिमटा सन्नाटा धीरे-धीरे हवा में टपक रहा था - एक निःशब्द जादू की तरह... चारों तरफ उसी का असर था - जुगनू की तरह जल-जलकर बुझते हुए। वह बॉल्कनी में निकल आई थी। रात की चुप्पी को अपनी तेज आवाज से कुतरते हुए सैकड़ों झींगुरों का शोर और आसमान पर धुंध की तरह छाई हुई चाँदनी - सब कुछ एक आदिम रहस्य में डूबा हुआ। रात के उस पहर नींद और स्वप्न के रेशमी लिहाफ में पूरी दुनिया लिपटी हुई पड़ी थी...

वह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आ गई थी। जैसे कोई निशि उसे अरण्य की निविड़ दुनिया से हाथ हिलाकर बुला रही हो। वह चाहती तो भी रुक नहीं पाती। उस रात वह ओस और चाँदनी में भीगती न जाने कहाँ-कहाँ गई रात तक भटकती रही थी। उसे प्रतीत हो रहा था, ये समय उसकी हथेली पर अनायास उतरकर ठहर गया है - अपने काल की अद्भुत गंध और स्वाद के साथ - जीवित और स्पंदित - तारीखों की लंबी फेहरिस्त और हादसों के दर्ज ब्योरों के साथ। वर्तमान में होकर वह जैसे अतीत में जी रही थी, देहातीत होकर, किसी रूह की तरह...

उसकी नासापुटों में बहुत पहले बीत गए समय की बासी, बोसीदा गंध भरी थी, किसी मंदिर के गर्भ-गृह में घुमड़ते हुए सुगंधित धुएँ की तरह... सभ्यता की चकाचौंध से दूर अरण्य के इस प्राचीन धरती पर उस रात वह रहस्य और रोमांच की एक अद्भुत अनुभूति में सराबोर हो गई थी। यह शायद उस रात का जादू और किन्हीं उदास आँखों की भीरु चावनी का हैंगओवर था जो उसे भटका रहा था। अतीत और वर्तमान किसी अलस नदी की तरह समानांतर में बहती रही थी उसके भीतर बहुत धीरे-धीरे...

उस रात न जाने क्यों उसे रह-रहकर रुक्की माझी की कहानी याद आती रही थी। पुनिया ने ही कभी सुनाई थी। इसी जंगल की निविड़ दुनिया मे उसका प्यार पनपा और एक दिन फना हो गया था। एक आदिवासी लड़की होकर उसे एक अंग्रेज से प्यार हो गया था।

वह अंग्रेज यहाँ के आदिवासियों पर कोई डाक्युमेंटरी फिल्म बना रहा था। फिल्म बनाने के दौरान दोनों में संबंध बढ़ा और अंत में प्यार हो गया।

इस कहानी का हश्र वही हुआ जो होना था - एक दिन वह अंग्रेज अपनी फिल्म पूरी करके रुक्की से जल्दी लौट आने का वादा करके अपने देश लौट गया। बाद में अपने समाज की बहुत प्रताड़ना सहनी पड़ी थी उसे। आखिर एक दिन उसने महुआ के पेड़ से लटककर अपनी जान दे दी थी। उस समय उसे नौ महीने का गर्भ था।

लोग कहते हैं, आज भी महुआ के मौसम में जब जंगल की हवा महुआ की तीखी, तुर्श गंध से बोझिल हो जाती है और आसमान में पूनम का चाँद एकदम गोल होकर उठता है, लोगों को रुक्की की आत्मा दिखती है - हाईवे के बीचोबीच खड़ी रहती है, हर गाड़ी को रुकने के लिए इशारे करते हुए। न जाने इसकी वजह से कितने वाहनों के साथ अब तक दुर्घटना घट चुकी थी। प्रेम होता ही है ऐसा, एक हाथ से जीवन देता है तो हिंसक होने पर दूसरे हाथ से जीवन लेता भी है।

न जाने उस रात उसे क्यों ऐसा ख्याल आया था कि रुक्की का चेहरा उसने भी कहीं देखा है, कहाँ, सोच नहीं पाई थी। जब महुआ की मादक गंध से हवा बोझिल हो उठती है और सुडौल चाँद बीच आकाश में जगमगाता है, उसकी शिराओं में कुछ सर्द-सा दौड़ता रहता है, वह चाहकर भी स्वयं को सँभाल नहीं पाती, अन्यमनस्क-सी हो जाती है। इस अद्भुत-सी अनुभूति ने उसे कई बार दिनों तक परेशान कर रखा था।

इस घटना के दूसरे दिन ही उसे तेज बुखार आ गया था। वह दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रह गई थी। बुखार में अपने बिस्तर में पड़े रहने के दौरान उसे अजीब-से सपने आते थे। अस्पष्ट और आपस में गडमड... चाँदनी के कोहरे में डूबा एक रक्तशून्य चेहरा और दो पारे-सी थरथराती उदास आँखें... कोई बार-बार उसका नाम लेकर बुलाता रहता। वह नींद में बेचैन करवटें बदलती या कभी चौंककर उठ बैठती। ऐसे में उसका पूरा शरीर पसीने में डूबा हुआ होता था।

उसकी बीमारी की वजह से इसके बाद प्रायः रोज ही कौशल उसके पास बँगले में आने लगा था। एक शिला कहीं से पिघल रही थी धीरे-धीरे - शायद दोनों के ही अलक्ष्य। कौशल ने ही बाद में बताया था, उसके पिता का बहुत बड़ा एस्टेट है यहाँ। पहले वह कोलकाता के किसी नामी अखबार के लिए काम करता था। डिवोर्स के बाद वह यहाँ कई साल हुए वापस चला आया था। उसकी पत्नी का नाम नयन था और वह वहाँ के किसी बहुत बड़े राजनीतिज्ञ की इकलौती बेटी थी।

कौशल यहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था और यहाँ के स्थानीय लोग उसका बहुत ही सम्मान करते थे। वह यहाँ की बोली बहुत अच्छी तरह बोल लेता था। उसने गौर किया था, उसके साथ जंगलों में टहलते हुए रास्ते में वह स्थानीय लोगों से उनकी भाषा में रुक-रुककर बतियाता रहता था। एक बार उसने निहायत ही तटस्थ भाव से पूछ भी लिया था - आप इतना क्या बोलते रहते हैं इन लोगों के साथ! सुना है, आप कई-कई दिनों तक जंगलों में भी भटकते रहते हैं, चाँद सिंह कह रहा था...

- भटकता नहीं हूँ, जिंदगी की तलाश में रहता हूँ...

कौशल रहस्यमयी ढंग से मुस्कराया था -

कभी आप को भी ले चलूँगा साथ, स्वयं देख लीजिएगा, कैसे धरती की यह आदिम संतानें सभ्यता और विकास की दोहरी पाट में घुन की तरह पिसती जा रही हैं! एक प्राचीन और प्रांजल जीवन स्रोत के निरंतर मरते चले जाने की एक त्रासद गाथा है ये अपर्णा जी...

कहते हुए कौशल की आवाज में उदासी-सी भर गई थी।

 
इसके बाद एक दिन वह घने जंगलों में बसे आदिवासियों के गाँव में गई थी। कौशल ही ले गया था। वहाँ उसे एक अलग ही दुनिया का साक्षात्कार मिला था। कपड़ों और मुखौटों की बनावटी दुनिया से दूर धूल, मिट्टी और जज्बातों से बने खांटी-खालिस मनुष्य जो आज भी प्रकृति और जीवन के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए लड-मर रहे हैं, मगर प्रतिकूल परिस्थियों में भी रोना और गाना नहीं भूले हैं।

पूरे चाँद की उस रात में उसने उनके गोबर लीपे सुंदर आँगन में उनका सामूहिक नृत्य देखा था। बीच में संथाल औरतें उसे भी अपने साथ नृत्य करने के लिए खींच ले गई थी। महुआ, माड़ और कच्ची के नशे में सराबोर स्त्री-पुरुष पंक्तिबद्ध होकर एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले भोर रात तक नाचते रहे थे।

दूसरे दिन सुबह-सुबह पेड़ से उतारी गई ताजी, झागदार ताड़ी पीते हुए कौशल ने अचानक उससे कहा था -

कुछ स्वार्थी लोगों ने इन आदिम मानवों का चाँद, जंगल और आकाश चुरा लिया है अपर्णा। मैं वही इन्हें वापस दिलाना चाहता हूँ!

- इस काम में आप मुझे भी अपने साथ ले लीजिए कौशल...

पास ही खेलती हुई एक साँवली, गोल-मटोल बच्ची को अपनी गोद में समटते हुए उसने भी अनायास ही कह दिया था। उसकी बात सुनकर कौशल ने मुड़कर उसे पहली बार एक अलग ही नजर से देखा था। न जाने क्यों उसे प्रतीत हुआ था कि बंद मुट्ठी-सी उसकी तंग, अँधेरी दुनिया को आज अनायास एक आकाश, उसका असीम विस्तार मिल गया है...

इसके बाद वह भी यदा-कदा कौशल के साथ आदिवासियों की बस्ती में जाकर छोटे-मोटे कामों में उसका हाथ बँटाने लगी थी। कितना कुछ था वहाँ करने के लिए। जीवन की न्यूनतम सुविधाओं का भी वहाँ नितांत अभाव था। उसे देख-देखकर आश्चर्य होता था। कहाँ आ गई थी वह। आजादी के इतने दिनों बाद भी देश के इन पुरातन समाजों में सुख-सुविधा की पहली किरण तक उतर नहीं पाई थी। लोग पशु से भी बदतर जीवन जीने पर बाध्य थे।

तरक्की, आधुनिकता के चमचमाते राजमार्ग से परे जीवन की यह धूल भरी सँकरी पगडडियाँ अभाव, अज्ञानता की अँधेरी दुनिया में जाकर एकदम से विलीन हो जाती हैं। अब तक उसने समाचार पत्रों और टेलीविजन पर एक अलग ही भारत का चेहरा देखा था - चमकता हुआ, उज्जवल भविष्य की ओर मजबूत कदमों से बढ़ता हुआ... कल का सुपर पावर, न्याय और गणतांत्रिक शक्ति का अगुआ राष्ट! सबके लिए एक आदर्श, एक मिसाल... फेस्टीबल, एशियाड, कॉमन वेल्थ गेम, फाईव स्टार होटलों और महँगे मॉल, पिज्जा हट से सजा यह चमकता-दमकता देश... इसके अंदर इतना अँधेरा भी है! इतनी गरीबी, ऐसा अकल्पनीय शोषण और मारात्मक दोहन, हर स्तर पर, हर जगह... परत दर परत घुन लग गया है - बेईमानी, भ्रष्टाचार और चारित्रिक विचलन का...!

एक स्वप्नभंग की स्थिति थी यह उसके लिए। विदेश में इसी स्वदेश की याद को सीने से लगाए जीती रही थी वह - उस जैसे लोग! कहाँ है वह तरक्की, वह खुशहाली जिसके ऐलान और विवरण से समाचार पत्रों के पन्ने रँगे रहते है!

वह देख-सुनकर सन्न रह गई थी। यकायक अपने अब तक के जीवन पर ग्लानि हो आई थी उसे। जिस देश के अधिकतर लोग आज भी दो जून की रोटी के लिए तरसते हैं, भूख और बीमारी से तड़प-तड़पकर दम तोड़ देते हैं, वहाँ किसी भी तरह की ऐयाशी एक अपराध ही नहीं, एक बहुत बड़ा पाप भी है। उसे लगा था, उसे कौशल के जरिए जीवन का एक उद्देश्य मिल गया है, कुछ सार्थक करने का। वर्ना अब क के जीने में जीनेवाली कोई बात नहीं थी।

काजोल के बाद बहुत अकेली हो गई थी वह। अब लगता है, बहुत कुछ है उसके सूने आँचल में समेटने के लिए। इतना कि वह स्वयं गले-गले तक भर जाय। दूसरों के दुख अपने आँचल में सिमटकर सुख बन जाता है... औरों के दुख में रोने का सुख उसने आज तक जाना कहाँ था!

डॉ. सान्याल, जो एक अवकाश प्राप्त प्रोफेसर थे और कई साल पहले आकर यहाँ बस गए थे, गरीब आदिवासियों को मुफ्त में होम्योपैथी की दवाई देते थे। वे पैर से लाचार हो गए थे, अतः कहीं आ-जा नहीं पाते थे। लोग उनके पास आकर दवाई ले जाते थे। वह सुबह के समय जाकर उनकी मदद कर दिया करती थी। वैसे उनकी बेटी मानिनी भी इस काम में उनका हाथ बँटाती थी। डॉ। सान्याल की एक बहुत बड़ी लायब्रेरी भी थी जहाँ दुनिया जहान की किताबों का अच्छा-खासा संग्रह था। उनका भी अपना अलग आकर्षण था उसके लिए।

डॉ. सान्याल के विषय में पहली बार कौशल ने ही उसे बताया था। मगर वह उनसे मिलने उनके बँगले पर अकेली ही गई थी।

वह मार्च का एक बेतरह उदास और निर्जन दिन था जब वह पहली बार उनसे मिली थी।

उनके छोटे-से कॉटेज के गेट पर बँधी घंटी की डोर खींचकर न जाने कब तक वह खड़ी रह गई थी। उसके चारों तरफ अनवरत झरते हुए सूखे पत्तों का एकरस मर्र-मर्र आवाज और साँझ को कुतरते हुए हजारों झींगुरों का तेज शोर था। डूबते हुए दिन के म्लान आलोक में उतरती रात का नील तेजी से घुल रहा था। पश्चिम के सुदूर कोने में क्षितिज के पास आकाश का रंग गहरा गेरुआ हो आया था।

दूर बँगले के अंदर कोई कुत्ता लगातार भौंक रहा था। उसकी गूँजती आवाज और साँझ के झुटपुटे में डूबा हुआ वह छोटा कॉटेज बड़ा रहस्यमयी प्रतीत हो रहा था। आसपास के पेड़ों पर अंधकार के छोटे-छोटे गुच्छे यहाँ-वहाँ घोंसला डालने लगे थे। न जाने क्यों प्रतीक्षा के उन निःस्तब्ध क्षणों में वह एक अनचीन्हें अवसाद से घिरने लगी थी।

बहुत देर बाद जब कॉटेज का दरवाजा खुला था, अंदर जलती हुई मोमबत्ती की पीली, मद्धिम रोशनी अनायास सीढ़ियों पर उतर आई थी। उसी रोशनी की पृष्ठभूमि पर वह छाया नजर आई थी, किसी सूखे पत्ते की तरह लरजती हुई! चेन छुड़ाकर भाग छूटने के लिए आमादा विशालकाय कुत्ते को धीरे से दुलारती हुई वह नीचे उतर आई थी - घिसटते पाँवों से चलती हुई - टूटे, पीले पत्तों की बदरंग कालीन में डूबी हुई-सी, अपने पैरों के नीचे कुचलते सूखे पत्तों की चरमराहट से संध्या की अनमन निःस्तब्धता को अनायास भंग करते हुए...

पहली नजर में वह बहुत कम उम्र की लगी थी - दुबली-पतली और अवसन्न। उसे देखकर साँझ के आकाश में निकले किसी निसंग तारे की याद आती थी - उजला, मगर बहुत उदास... लौटते हुए शीत ऋतु के हिमेल संकेतों के बीच पनपकर छाते और दूर-दूर तक गूँजते बदरंग, बदहवास शून्यता के बीचोबीच खोई और भटकी-सी।।

गेट पर आकर भी वह चुपचाप खड़ी रही थी, आँखों में मौन प्रश्न लिए, उसके बोलने की प्रतीक्षा करती हुई-सी। उसे देखकर लगता था, बहुत दिनों से उसे अच्छी नींद नहीं मिली है। तंद्रिल आँखों में नींद और जगार लिए वह साँझ के धुएँ में डूबी अनमन खड़ी कोई परछाईं जैसी दिख रही थी, जैसे सच न हो, भ्रम हो। कुहरे की तरह।

आखिर उसने ही बढ़कर अपना परिचय दिया था। सुनकर बिना कुछ कहे वह उसे कॉटेज के अंदर ड्राइंग रूम से होते हुए अंदर के शयन कक्ष में ले गई थी।

पुराने फर्नीचरों और अन्य सजावट के सामानों के बीच एक व्हील चेयर पर डॉ. सान्याल बैठे थे - किसी पुराने पोट्रेट की तरह - धूसर और गंभीर...! झुरियों से भरे चेहरे और खिचड़ी दाढ़ी के बीच जडी हुई दो भावहीन आँखें और सख्ती से भींचे हुए होंठ! उन्हें देखकर ही न जाने क्यों ऐसा प्रतीत होता था कि वे अपने अंदर ढेर सारे गुस्से और हताशा को दबाए बैठे हैं।

उसके अभिवादन का उन्होंने अपने सर को हल्का-सा झटका देकर जवाब दिया था। उसकी बातें भी वे बड़ी विरक्ति के साथ सुनते रहे थे। इसी बीच वह लड़की जिसे डॉ. सान्याल ने खुकु कहकर संबोधित किया था, चाय बनाकर ले आई थी। चाय के कप तिपाई पर रखते ही डॉ. सान्याल ने उससे वहाँ से जाने के लिए कहा था। कहते हुए उनका लहजा बहुत शुष्क था। वह चुपचाप वहॉ से चली गई थी।

उसे वहाँ के माहौल में एक अजीब-से तनाव का अहसास हुआ था। डॉ. सान्याल का स्वभाव उसे सहज नहीं लगा था। बातें करते-करते उनकी पत्थर के टुकड़े की तरह सख्त आँखें अचानक जल उठती थीं। ऐसे क्षणों में उनका चेहरा बहुत क्रूर दिखता था। कोने के स्टैंड पर जलती मोमबत्ती की हल्की, बीमार-सी रोशनी में उनका कमर से नीचे का हिस्सा अँधेरे में डूबा हुआ था। उनकी पथरीली आँखें, चाकू के फाल की तरह तीखी हँसी, और अँधेरे-उजाले में डूबा हुआ पूरा शरीर उसे एक न समझ में आनेवाली सनसनाहट की जद में लिए हुए था। उनकी बातें बिद्वतापूर्ण थीं, मगर कहने का ढंग एक तरह से खतरनाक। वे एक-एक शब्द को जैसे चबा-चबाकर उगलते थे। किसी आदमखोर की तरह! उन्हें सुनते हुए तथा बातें करते हुए कई बार उसके पूरे शरीर पर अनायास झुरझुरी फैल गई थी।

वह जब देर शाम गए वहाँ से उठने लगी थी, डॉ।. सान्याल ने अपने विशिष्ट अंदाज में अपनी तरफ से उसे हर तरह से सहायता देने का आश्वासन दिया था। कमरे से निकलकर उसने राहत की साँस ली थी। अंदर उसका दम घुट रहा था। डॉ. सान्याल का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था - कठोर और हिंसक!

उस दिन उनके बँगले की सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने देखा था, साल के ऊँचे वृक्षों के पीछे हल्का पीलापन छाया था, शायद चाँद उग रहा था। मार्च की हल्की चलती हवा में जाते हुए मौसम की हल्की खुनक थी। कोहरे की झीनी चादर में चढ़ती रात का फीका अंधकार लिपटा था। पैरों के नीचे ताजे झरे पत्तों की नरम चरमराहट थी जो रात के सन्नाटे में बहुत तीखी होकर सुनाई पड़ रही थी। गेट से निकलने के बाद उसने मुड़कर गेट बंद किया था और तभी वह दिखी थी - रात के अँधेरे में प्रायः अदृश्य-सी। चंपा के एक फूलते हुए पेड़ के नीचे झूले पर बैठी हुई। डालों से छनकर आती हुई हल्की चाँदनी में उसका छोटा-सा माथा और दो कंधे चमक रहे थे। जैसे दो उजले कबूतर अँधेरे में दुबककर बैठे हुए हों।

वह विदा लेते हुए अभी कुछ कहने की सोच ही रही थी कि अंदर से डॉ. सान्याल की गुर्राती हुई आवाज आई थी और वह लगभग दौड़ती हुई उठकर वहाँ से चली गई थी। उसके पीछे दरवाजा एक झटके से बंद हो गया था। दरवाजा बंद होते ही वहाँ भयंकर सन्नाटा छा गया था। फीकी चाँदनी और कुहासे में डूबा वह छोटा-सा कॉटेज अब एकदम भुतैला दिखने लगा था। इस पहाड़ी प्रदेश में मार्च के महीने में भी ठंड महसूस हो रही थी। वहाँ से लौटते हुए न जाने क्यों उसे वह चेहरा याद आता रहा था। उसकी आँखों में मूक यातना और पीड़ा का एक अमूर्त और ठहरा हुआ स्तब्ध संसार था। बहुत स्पष्ट मगर निर्वाक... जैसे कोई चीत्कार अनायास पत्थर में परिवर्तित हो समय के फ्रेम में जम गई हो। उसे प्रतीत हुआ था, उस लड़की ने सदियों से बात नहीं की है। उसके होंठों पर शब्दों का एक बेचैन सैलाब है - किसी भी क्षण टूट पड़ने को तैयार...

उस रात सोते हुए भी उसे उसका ख्याल आता रहा था। निपट सन्नाटे और उदासी में घिरा हुआ वह चेहरा उसके मन के किसी अज्ञात कोने में चुपचाप अपना घोंसला डाल चुका था।

बाद में उसने कौशल से उस लड़की के विषय में पूछा था। उसने बताया था, उस लड़की का नाम मानिनी है। मानिनी डॉ. सान्याल की एकमात्र संतान थी। रिटायर होने के बाद यहाँ आकर बसते ही उनकी पत्नी का निधन हो गया था। इसके एक साल बाद किसी हादसे में उनके दोनों पैर बेकार हो गए थे। उसके बाद विगत पाँच सालों से वे इसी तरह व्हील चेयर पर बैठे हुए थे। मानिनी उनकी देखभाल करती थी। ननकू बाहर के काम कर दिया करता था।

उसके बाद वह अक्सर काम के सिलसिले में डॉ सान्याल के कॉटेज पर जाती रही थी। हर बार वह वहाँ उसे दिखती थी - छिपने का प्रयास करती हुई-सी। कभी-कभी उसे लगता था, वह सामने आना तो चाहती है, मगर जबरन किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा पीछे खींच ली जाती है। कोई न दिखती हुई जंजीर उसके पाँवों से लिपटी हुई थी जैसे। वह उस मनहूस माहौल में जीने के लिए अभिशप्त प्रतीत होती थी। एक परछाई की तरह निःशब्द इधर-उधर डोलती फिरती थी, निरुद्देश्य... उसके लिए दरवाजा खोलते हुए या चाय लाते हुए वह अधिकतर चुप ही रहती थी

डॉ. सान्याल के घर एक बारह-तेरह साल की आदिवासी लड़की मुल्की तथा यही अधेड आदमी ननकू काम किया करता था।

यह लड़की मुल्की डॉ. सान्याल की बेटी मानिनी के बहुत करीब थी। मानिनी उससे बहुत स्नेह करती थी। उसका गहरा साँवला रंग और वन्य लावन्य से टलमल सुंदर चेहरे में हमेशा एक हँसू-हँसू भाव बना रहता था। वह मानिनी को दीदिया कहकर बुलाती थी। अपने अजीब साज-सज्जा के लिए ही शायद उसने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। गले में कई लड़ियोंवाली लाल कूचफल की माला पहना करती थी और कसकर बाँधे जूड़े में किसी जंगली मुर्गे या मोर का पंख खोंसे रखती। उसके रग-रग में मानो संगीत बसा हुआ था। आँगन बुहारते हुए या घर के अन्य काम करते हुए वह अधिकतर गुनगुनाया करती थी। मानिनी के निसंग जीवन की शायद वही एकमात्र संगिनी थी।

उससे बिल्कुल विपरीत था ननकू का व्यक्तित्व। जैसा भीषण उसका रूप था, वैसा ही सांघातिक था उसका चरित्र। बात-बात पर दंराती निकाल लेता था। उसकी लाल, घुलघुली मद्दप आँखों की चावनी में अद्भुत हिंस्र भाव थे। सामान्य स्थितियों में भी वह सबको खा जानेवाली दृष्टि से घूरता रहता था। मगर डॉ. सान्याल का वह विशेष अनुगत था। उनके इशारे पर पुसे कुत्ते की तरह उठने-बैठनेवाला। बाद में किसी ने बताया था, डॉ. सान्याल ने ननकू को अफीम खिलाकर अपने वश में कर रखा था।

कौशल ने ही आगे बताया था, कई वर्ष पहले मानिनी का किसी आदिवासी लड़के के साथ प्रेम हो गया था। अरण्य का निर्जन जीवन, न कोई संगी, न साथी, सिर्फ बू्ढ़े बाप की सेवा और घर के काम काज। कब तक उससे यह अकेलेपन का बोझ उठता। उम्र का एक अपना तकाजा होता है...

 
एक लड़का था श्याम। यही, इसी इलाके का। छोटे-मोटे काम के लिए उनके बँगले पर आया करता था। देखने में गहरा साँवला, मगर बहुत आकर्षक था। अच्छी बाँसुरी बजाता था। एक बार उसने मानिनी को जंगली सूअर के आक्रमण से बचाया था। प्यार तो अंधा ही होता है, सो मानिनी को उससे प्यार हो गया। यह सचमुच का प्यार था या उसके अंदर के गहरे अभाव का परिणाम, कहा नहीं जा सकता, मगर सुनने में यही आता है, कि दोनों में बहुत गहरा प्रेम हो गया था।

दोनों चुपके-चुपके मिलते थे, खासकर तब जब ननकू डॉ. सान्याल के काम से कहीं बाहर गया हुआ होता था। मगर यह बात ज्यादा दिन छुप नहीं सकी थी। डॉ. सान्याल को जल्दी ही उनके संबंध के विषय में पता चल गया था। सुनकर उनके माथे पर खून ही सवार हो गया था। मानिनी को उन्होंने घर के अंदर बंद कर दिया था। कहते हैं, उस घटना के बाद से फिर कभी किसी ने उस लड़के को इस इलाके में नहीं देखा। वह एक अनाथ लड़का था। सगा-संबंधी कोई था नहीं पूछताछ करने के लिए। कोई कहता है, वह नेपाल की तराइयों में जाकर छिप गया तो कोई कहता है, डॉ. सान्याल ने रिश्वत खिलाकर पुलिस से उसकी हत्या करवा दी। पैसे के जोर पर यहाँ सब कुछ हो सकता है।

सुनकर उसका मन उदास हो गया था। इस दुनिया में कहीं प्रेम नहीं है तो कहीं प्रेम के लिए जगह नहीं है। सबके मन में किसी न किसी रूप में रहकर भी प्रेम हमेशा विस्थापित ही रह जाता है। न जाने यह सकींर्ण संसार कब इतना बड़ा हो सकेगा कि इसमें प्रेम के लिए भी पर्याप्त जगह बन सकेगी।

इस बीच एक बार फिर वह बीमार पड़ गई थी। लू लगने की वजह से कई दिनों तक बिस्तर से उठा नहीं जा सका था। इस दौरान कौशल ने उसकी काफी देखभाल की थी। बड़े बाजार से एक दिन डॉक्टर को भी बुला लाया था।

थोडे दिनों के बाद जब उसे कुछ राहत महसूस हुई थी, वह शाम को डॉ. सान्याल के कॉटेज में चली गई थी। उसे देखकर मानिनी स्वयं गेट खोलने के लिए चली आई थी। उसका हालचाल पूछते हुए उसने उसका हाथ पकड़ लिया था। उसे मानिनी के अधीर व्यवहार ने आश्चर्य में डाल दिया था। वह काफी संयत स्वभाव की लड़की थी। उसकी प्रतिक्रिया देख उसने भी झेंपकर उसका हाथ छोड़ दिया था।

उस दिन उसने गौर किया था, मानिनी किसी न किसी बहाने उनके कमरे में आती रही थी। डॉ. सान्याल की चुभती हुई निगाहों का उसने विशेष परवाह नहीं की थी। उसे लगा था, एक पंक्षी अपना पिंजरा तोड़कर उड़ जाना चाहती है। डॉ. सान्याल की आँखों में भी उसने एक तरह की चौंक देखी थी। वे उस दिन अतिरिक्त सावधान प्रतीत हुए थे।

जंगलों के अपने अद्भुत अनुभव सुनाते हुए एक दिन डॉ. सान्याल ने अपनी पुरानी बंदूक दिखलाई थी। वह अब भी साफ-सुथरी और चमकदार थी। लगता था, वे उसका काफी ख्याल रखते हैं।

- इससे मैं कई खूँखार जानवरों का शिकार कर चुका हूँ।

कहते हुए न जाने क्यों वे अपनी बेटी की तरफ देखकर कुटिल ढंग से मुस्कराे थे।

- खासकर उन आदमखोरों का जिनके मुँह में इनसानी खून का स्वाद लग चुका था।

- आप शिकार करते थे? कहते हुए उसने उनके व्हील चेयर की ओर अनायास देखा था।

उसका तात्पर्य समझकर वे मुस्कराए थे -

बिल्कुल! मैं हमेशा ऐसा नहीं था। मेरे पैर... एक आदमखोर ने ही चबा डाले थे!

बात के अंत में आते-आते बंदूक पर उनकी हड़ियल अंगुलियों की पकड़ सख्त हो गई थी।

मानिनी जो उस समय लैंप का काँच साफ कर रही थी, अचानक उठकर कमरे से बाहर चली गई थी। डॉ. सान्याल के होंठों पर मुस्कराहट और भी गहरी हो गई थी। उसे हमेशा की तरह उन दोनों का व्यवहार अजीब लगा था। बाप-बेटी का संबंध सामान्य नहीं था। उसे अक्सर लगता था, यहाँ कहीं कुछ गलत है। शायद लोग जो बातें करते हैं, उनमें वास्तव मे कोई सच्चाई हो।

डॉ. सान्याल उससे तो बहुत गर्मजोशी से मिलते थे, मगर अपनी बेटी की उपस्थिति में उनका व्यवहार एकदम बदल जाता था। वे बेहद शुष्क और कठोर हो उठते थे।

मगर एक दिन थोड़ा दुर्बल भी पड़ गए थे, सिगार पीते हुए उन्होंने भावुक स्वर मे कहा था - मानिनी के सिवा मेरा और कोई नहीं है अपर्णा देवी। उसके बिना एकदम लाचार और विवश हो जाता हूँ। इस अरण्य में अपनी बेटी के बिना एक दिन भी शायद जीवित न रह पाऊँ...

उनकी बातें सुनते हुए उसने बरामदे में खड़ी मानिनी की तरफ देखा था। उसे उसकी आँखें जलती हुई-सी प्रतीत हुई थीं, जैसे मानसून की भीगी रातों में जंगल में टिमकती हुई असंख्य जुगनुओं की सुनहरी पाँत। उसके उदास चेहरे पर वे आँखें किसी और की लगी थीं। वह एक बार फिर असमंजस में पड़ गई थी। क्या है जो वह समझ नहीं पा रही!

उस दिन कॉटेज से निकलकर बाहर का गेट बंद करते हुए खिड़की के घिसे हुए काँच में से उसे दो आँखें दिखी थीं - बुझे हुए दीये की तरह - निष्प्नभ और धुआँई हुई-सी... वह कुछ क्षणों के लिए ठिठकी रह गई थी। वे आँखें भी वही ठहरी रह गई थीं। उसे लगा था, कहीं कोई शीशा चटका है, कुछ अनकहे शब्द हवा के परों पर तैरते हुए आए थे और उसमे अनाम गंध की तरह उतर गए थे। एक संक्षिप्त-से क्षण में उसे महसूस हुआ था, उसके अंदर की वर्षों से ऊसर पड़ी जमीन पर कोई फूल खिल गया है।

एक हाथ आत्मीयता की ऊष्मा से सराबोर उसकी तरफ बढ़ना चाह रहा है। न जाने उसे उससे कैसी उम्मीद हो गई है... उस दिन वह एक गहरे सम्मोहन और अनचीन्ही मनःस्थिति के साथ अपने कमरे में लौटी थी - शायद सारी रात करवट दर करवट जागने के लिए, एक स्वप्न ने उसे पलकभर सोने नहीं दिया था। किसी का यकीन इनसान को भला बना देता है। कोई पूजे तो पत्थर को भी भगवान बन जाना पड़ता है... दो काली, डागर आँखों की विश्वास भरी चावनी ने उसे किनारे-किनारे तक पूर दिया था, वर्ना आशुतोष के अविश्वास और तापसी के विश्वासघात ने उसे इन बीते दिनों में अंदर से कितना बौना कर दिया था...

दिन भर के काम के बाद वह और कौशल अधिकतर शामों को टहलते हुए मैना नदी के किनारे दूर तक निकल जाया करते थे। शाम के रंगभरे आकाश के नीचे मैना की दुबली धारा के साथ चलते हुए वे प्रायः चुप ही रहा करते थे। कौशल बहुत कम बोलता था और उसे उसका यह स्वभाव अच्छा लगता था। वह स्वयं भी कम बोलती थी और अब तो बहुत कुछ कहने-सुनने की इच्छा भी नहीं रह गई थी। कौशल का साथ उसे प्रिय लगने लगा था, क्योंकि वह बिना उसकी दुनिया में हस्तक्षेप किए चुपचाप उसके साथ हो लेता था। शायद उसकी भी अपनी एक निहायत निजी दुनिया थी जिसमें वह रात दिन डूबा रहता था।

उसकी गहरी काली आँखों में बहुत कुछ अनकहा-सा था, जैसे वह कुछ कहते-कहते एकदम से चुप हो गया हो। दोनों के बीच अजाने ही एक मौन का संबंध बन गया था। नदी की अबरकी रेत में पाँव धँसाए वह आसमान पर जंगली बत्तखों का उड़ना देखती रहती। पास ही आँवला के जंगल में चरते हुए हिरणों के पद्चाप सुनाई पड़ते। जंगली तोते झुंड के झुंड कलरव करते हुए पास के पेड़ों पर बैठते या अचानक भरभराकर उड़ जाते। दूर बंदरों का 'हुप-हुप' सुनाई पड़ता।

इन सब के बीच दोनों अपनी-अपनी दुनिया में डूबे चुपचाप बैठे रहते। कई बार कौशल की आँखों में उसे कुछ पहचाना-सा दिखता, मगर वह जान-बूझकर अनजान बन जाती। एक बार उसकी गहरी नीली टांगाइल साड़ी की तरफ देखकर उसने अनायास कहा था -

'ये रंग नयन पर बहुत फबता था। न जाने क्यों उसने वह साड़ी दुबारा उसके सामने फिर कभी नहीं पहनी थी। क्यों... कभी वह खुद से ही पूछती है और सवाल को टाल जाती है। वह किसी की तरह दिखना नहीं चाहती या... कौशल को किसी की याद दिलाना नहीं चाहती? कौशल उसे देखे... उसमें किसी और को क्यों? वह परछाई नहीं, हकीकत है, जैसी भी हो...

न चाहते हुए भी एक बार उसने कौशल से नयन के विषय में पूछ लिया था। पहले तो वह हिचकिचाया था, मगर फिर शुरू हुआ तो कहता ही चला गया था। कितनी बातें, कितना कुछ... जैसे कोई बाँध टूट गया हो... इतना कुछ अपने भीतर समेटे-समेटे शायद वह दरक जाने के कगार तक पहुँच गया था।

- शुरू-शुरू के दिन बहुत अनोखे थे... कहते हैं न, पहली नजर में प्यार का हो जाना... कुछ-कुछ वैसा ही... जवानी के दिन... बंगाल को तो आप जानती हैं... राजनीति का गढ़... जिसे देखो, मुट्ठियाँ तानकर, मुँह से फेन बहाकर बहस कर रहा है। युनिवर्सिटी के प्रोफेसर से लेकर एक मछली बेचनेवाला तक... तो हम भी कहाँ पीछे रहनेवाले थे... कितनी उमंगें, सपने, हौसला...हौसला- पूरी दुनिया को बदल डालने का... वह सब कुछ जो दुनिया को बीमार बनाता है, बाँटता-काटता है - जात-पात। मजहब, नस्ल, सरहद के नाम पर... हर मनुष्य को मनुष्य होने का सम्मान मिले, इनसान पहले इनसान बने... कम उम्र में लोग आदर्शवादी होते हैं न... यथार्थ से तब सामना कहाँ हुआ होता है? घर का खा-पीकर अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ना और उसीको जिंदगी की सच्चाई मान लेना...

कहकर अपनी ही बात पर कौशल देर तक हँसता रहा था। पहली बार उसने कौशल को इस तरह से खुलकर हँसते हुए देखा था। हँसते हुए कितना अलग, कितना आकर्षक दिखता था वह - जैसे यकायक उसकी उम्र के कई साल एक साथ घट गए हों। किसी टीनएजर लड़के की तरह... वह उसे मुग्ध होकर देखती रह गई थी। हँसी - उसकी आँखों, होंठों, चिबुक से बहकर पानी की उजली धार-सी समस्त शरीर में फैलती हुई... उसकी उस निश्छल हँसी की वन्या में वह उस दिन जैसे डूब-डूब गई थी। अंदर कुछ बहुत नर्म, बहुत कोमल-सा पनपा था - खरगोश के रेशमी बच्चे की तरह। वह अनमन हो आई थी - क्या है यह...?

उसे डर लगता है ऐसे क्षणों में। अपने इर्द-गिर्द लकीरें खींचती है, दीवारें खड़ी करती है... मगर उस नींव का क्या जिसके आसपास नमी इकट्ठी हो रही है, इतनी सारी... वह थरथराती है, और कसके खुद को समेटती है... न जाने कहाँ से सेंध लगे, न जाने कौन-सी दीवार गिरे, न जाने... उसकी आँखों में उसका मन उतर आता है, अपनी गहरी दहशत और डूब के साथ। कौशल देखता है और थमक जाता है - क्या हुआ अपर्णा?

कुछ भी तो नहीं... वह कानों तक रंग जाती है। कौशल उसे देखता है - पढ़ते हुए, सुनते हुए-सा - तुमने पूछा था... अगर अच्छा न लग रहा हो तो... वह अपनी बात अधूरी छोड़कर उसकी तरफ देखता रहता है। इन दिनों उसे कौशल की आँखों से डर लगता है, वे उसे देखती ही नहीं, पढ़-समझ भी लेती हैं... अपना इस तरह से किसी के सामने खुल जाना... पन्ना दर पन्ना... वह स्वयं को बहुत वलनरेवल महसूस करती है।

- नहीं, आप कहिए न... मैं सुन रही हूँ...।

वह सहज दिखने की कोशिश में और असहज हो आती है। कौशल देखता है, मगर नहीं देखता। इतनी सहूलियत तो देनी पड़ती है, अगर समय-असमय लेनी हो तो...

- क्या कहे... कौशल अपनी हथेलियों की तरफ देखता रहता है - होता बस वही है जो होना होता है... हमारे-आपके चाहने से कुछ नहीं होता। वर्ना... वह एक पल के लिए रुकता है और फिर धीरे-धीरे कहता है, जैसे सोच रहा हो - कहीं कुछ कमी नहीं थी। हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, टूटकर... साथ चलते हुए न जाने कब एक-दूसरे के विपरीत दिशा में चलने लगे... आपस में टकराने लगे, एक-दूसरे के रास्ते में आने लगे... न मैं गलत था न वह... हमारी नियत भी ठीक थी... फिर... नहीं समझ पाया... आज भी नहीं समझ पाया... क्यों सब कुछ इस तरह से खत्म हो गया...!

अपनी बात के अंत तक आते-आते उसकी आवाज में गहरी खोह-सी पैदा हो गई थी। अपर्णा के भीतर कुछ हल्के से दरका था, काँच की तरह पारदर्शी कुछ। एक अनाम विषाद में वह अनायास हो आई थी। क्यों कौशल की तकलीफ में इन दिनों वह हो आती है? पराए पीर के लिए उसके अंदर जगह कहाँ... अपना ही कुछ कम है क्या? वह सोचती है, मगर कुछ कर नहीं पाती। कौशल की यातना में असहाय पड़ी रहती है, गीली-गीली- कई पर्तों तक...।

 
- इनसान नहीं, अक्सर इनसान की परिस्थितियाँ गलत होती हैं... उसकी अपेक्षाएँ भी... और कभी-कभी हम खुद को भी समझ नहीं पाते... किसी समय विशेष में जब हम अजीब ढंग से रिएक्ट करते हैं तो स्वयं ही आश्चर्य में पड़ जाते हैं। लाइफ इज फुल ऑफ सरप्राइजेज...

कहते हुए उसने मुस्कराने का प्रयत्न किया था, मगर कौशल के चेहरे पर थोड़ी देर पहले छाई मुस्कराहट न जाने कहाँ खो गई थी। वह एकटक आसमान की ओर देख रहा था - शायद उसके भी पार... वह यकायक बहुत अकेली हो आई थी। कौशल उसके पास था, साथ नहीं...

- दुख इस बात का है कि इस सबके चपेट में वह छोटी-सी जान आ गई... मेरी दीया! जिस उम्र में बच्चों को सबसे ज्यादा भावनात्मक सुरक्षा की जरूरत होती है, उसी उम्र में हमने उससे उसका सब कुछ छीन लिया... किया हमने, चुका वह रही है... यह बात मुझे रातों को सोने नहीं देती। कहते हुए कौशल ने अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया था। अपर्णा उसके भींचे हुए जबड़े की तरफ देखती हुई चुपचाप बैठी रह गई थी। इस समय कोई शब्द उसे ढाँढ़स नहीं दे पाएगा, वह जानती है।

- दीया की चुप्पी, आँखों का गहरा मौन, उदास चेहरा मुझसे सवाल करते रहते हैं। एकदम से बड़ी हो गई हो जैसे। हमने उससे उसका बचपन, मासूमियत, सपने - सब चुरा लिए... एक बाप होकर मैं ऐसा कैसे कर सका... खुद ही सोच नहीं पाता... कौशल रेत पर औंधा लेट गया था - हमारा अहम, हमारा सम्मान - यही ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया हमारे लिए... इस सब के बीच वह नन्हीं-सी जान दाँव पर लगी है, इसका ख्याल नहीं आया हमें... कैसे इस तरह से संवेदनहीन, स्वार्थी हो जाते हैं हमलोग...

इसके बाद कौशल देर तक चुपचाप पड़ा रह गया था। उसकी गहरी, लंबी साँसों को सुनते हुए अपर्णा जानती थी, कौशल किन तकलीफों से गुजर रहा होगा। अपने हाथों से अपनों की जिंदगी बर्बाद कर देने का अहसास, उसकी ग्लानि... इन सबसे जूझना आसान नहीं होता होगा। उसका जी चाहा था, बढ़कर कौशल को अपनी गोद में समेट ले। कितना अकेला, कितना खोया हुआ लग रहा था वह। थोड़ी देर असमंजस की स्थिति में रहकर उसने जरा-सा आगे झुककर उसकी पीठ पर हाथ रखा था। पीठ पर हाथ का स्पर्श महसूसते ही कौशल का पूरा शरीर काँप उठा था। उसके हाथ को अपनी मुट्ठी में सख्ती से बाँधकर उसके बाद वह रोता रहा था - निःशब्द...

अपर्णा ने उसे रोका नहीं था। रो ले... मन का संताप, विवेक का दंश कुछ शांत हो, गल, बह जाय... अंदर सीझते-सीझते अंततः एक दिन संवेदनाएँ जलकर कोयला, राख बन जाती है या फिर बँधकर पत्थर... आँसू के साथ मन का बोझ भी बह जाता है, हल्का करता है भार...

- सॉरी... कुछ देर के बाद कुछ संयत होकर कौशल ने कहा था। अब उसके चेहरे पर शर्म के भाव थे।

- आप सोचेंगी कैसा मर्द है, बच्चों की तरह रोता है...

- इसमें सॉरी कहने की क्या जरूरत है... हम इनसान हैं, ईंट-पत्थर नहीं। दुख होगा तो आँसू भी आँखों में आएँगे ही। मुझे समझ में नहीं आता, इसमें मर्द-औरत होने की बात क्यों उठाई जाती है। मेरी माँ क्या कहती थी पता है कौशल बाबू, इनसान को रोना और गाना कभी नहीं भूलना चाहिए। उसकी बातें सुनकर कौशल के चेहरे की कठिन रेखाएँ सहज हो आई थीं। उसने धीरे-से कहा था - थैंक्स...

अपर्णा मुस्करा दी थी - किसलिए?

- फॅार बीइंग यू...

- कांट हेल्प बीइंग माय शेल्फ... कहते हुए अब वह खुलकर हँस पड़ी थी। साथ में कौशल भी। अनायास माहौल हल्का हो आया था। ठीक जैसे एक अच्छी बारिश के बाद धूप निकल आती है, धूली-धूली, निखरी... उस समय कौशल का चेहरा कितना उजला लग रहा था, शाम की ललछौंह धूप में चमकते हुए...

ऐसे ही कितने दिन- बेतरतीब, बिखरे-बिखरे... कभी पूरी शाम नदी किनारे टहलते हुए तो कभी जंगलों में दूर-दूर तक भटकते हुए। गहरी होती शाम या गिरती हुई रात में साथ-साथ चलना... जाने कहाँ-कहाँ... कई बार चाँद नहीं होता। गहरे स्लेटी अंधकार में झाड़ियों में जुगनुओं की अनवरत झिलमिल और झींगुरों की तेज आवाज... इसी में घुला कहीं पास बहते पहाड़ी नाले का कलकल और दूर से आती हुई सियारों की हूक... कभी वह डर जाती। कौशल का हाथ कसकर पकड़ लेती। अँधेरे में दोनों की साँसें तेज होकर सुनाई पड़तीं। गर्म, भाप उड़ाती हवा में कौशल की देह से उठती पसीने की गंध मिली रहती। साथ में अपर्णा के शरीर से आती हल्की, मीठी पर्फ्युम की सुगंध...

कौशल जैसे आँख मूँदें इन जंगली पगडंडियों में चल सकता था। कहता था, मेरी आँखों में पट्टी बाँध दीजिए और देखिए, मैं ठीक रास्ता पहचानकर चल सकूँगा। कभी झुककर जमीन पर जानवरों के पैरों के निशान देखता और रास्ता बदलकर चलने लगता - अभी इस तरफ से जाना ठीक नहीं होगा, थोड़ी देर पहले इधर से बाघिन गुजरी है, नदी की तरफ... साथ में उसके बच्चे हैं, अभी बहुत छोटे। ऐसे में बाघिन के सामने न पड़ना ही श्रेयस्कर है, बच्चों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त आक्रामक हो जाती है...

सुनकर वह सहम उठती। हवा में न जाने कैसी गंध होती, बहुत उग्र... दूर सियार कोरस में लगातार बोलते रहते, उधर पेड़ों की डालियों पर बंदर बेचैन होकर ऊधम मचाते। कौशल के पास सुनाने के लिए इस जंगल की न जाने कितनी कहानियाँ थी - वह किसी बच्चे की-सी उत्सुकता से सुनती रहती।

कौशल ने बताया था, एक बार उसके कैंप के अंदर रात को एक भालू घुस आया था। - फिर...? सुनकर उसकी आँखें विस्मय से फैल गई थी

- फिर क्या... मैं नेवाड़ के बिस्तर पर सोया था। वह भालू बिस्तर के नीचे घुसा लगातार खाट की पट्टियों को उधेड़े जा रहा था। जब उसके नाखून मेरी पीठ पर चुभने लगे तब जाकर मेरी नींद खुली और मैंने शोर मचाया...

- फिर भालू ने क्या किया? अपर्णा की आँखों की पुतलियाँ डर से और भी फैल गई थीं।

- क्या करता... वह बिचारा तो खुद ही इतना डरा हुआ था... बाहर निकलने के लिए पूरे कैंप में इधर से उधर दौड़ता फिर रहा था। कभी मैं उससे टकराता, कभी वह मुझ पर गिर पड़ता। आखिर कैंप का पर्दा उठाकर मै किसी तरह बाहर निकला तो वह भी मेरे पीछे-पीछे निकलकर जंगल में भाग खड़ा हुआ। सुनकर अपर्णा स्तंभित होकर रह गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह हँसे कि रोए। उसके चेहरे के भाव देख कौशल कौतुक से हँसता रहा था - अरे, आप तो सुनकर ही इतना डर गईं?

- और नहीं तो क्या... आप को हँसी आ रही है!

- भई! हम जंगली लोग हैं, जंगली-जानवरों से कैसे डर सकते हैं। ये बाघ-भालू तो हमारे भाई-बंधु, पडोसी हैं... रोज का मिलना-मिलाना, घर में आना-जाना है...

- बहुत हुआ... इतना हाँकने की जरूरत नहीं... अपर्णा ने मुँह बनाया था - अभी जो एक बाघ आ गया तो... क्या करेंगे?

- मैं क्या करूँगा, जो करेगा बाघ ही करेगा... कहते हुए कौशल एक बार फिर ठहाका लगाकर हँस पड़ा था। अपर्णा भी खुद को रोक नहीं पाई थी, हँस पड़ी थी - वेरी फनी...

- यस मैम, इनडिड वेरी फनी...

कौशल देर तक हँसता रहा था। अपर्णा उसके चेहरे पर से अपनी नजर हटा नहीं पाई थी। मुग्ध होकर देखती रह गई थी। कुछ देर के बाद यकायक गंभीर होकर कौशल ने उसे देखा था, उसी पहचानी-सी दृष्टि से। वह सकपका गई थी, समझ में नहीं आया था, क्या करे, बस ठगी-सी उसे देखती ही रह गई थी, काँपी हुई पलकों से। दोनों के बीच ठिठका हुआ एक पल न जाने कितनी दूर तक खींचा था, बहुत असहज और मौन... एक चोरी और दो रँगे हुए चेहरे... कहीं कुछ साझे का था, समान हिस्से का था, साथ-साथ का था...

कभी-कभी बातें करते हुए कौशल उसका हाथ अपने हाथ में ले लेता, वह मना नहीं करती। उसकी हथेली की ऊष्णता धीरे-धीरे उसकी शिराओं में उतरती और वह एक अनाम इच्छा से भर उठती। ऐसे क्षणों में उसे आश्चर्य होता था। उसे लगा था, वह हर तरह से मर गई है। मगर इनसान शायद मरने से पहले कभी नहीं मरता। वह बार-बार जीवन की ओर लौटना चाहता है, जीवन का उत्सव चाहता है। कृष्ण की तरह ही है जीवन की यह जिजीविषा, राम के वनवास में भी उसी की तरह प्रेम का महारास चाहता है। सूरजमुखी की तरह अंधकार से मुँह मोड़कर उजाले की ओर बढ़ना चाहता है... और यह चाहना ही सहज, स्वाभाविक है शायद। फिर ये मन किस वर्जित की ग्लानि में डूबकर खुशियों के इंगित अदेखा करता है! कभी-कभी हाँड़-मांस का इनसान होना ग्लानिकर क्यों हो जाता है! मिट्टी के ढेले और मेह-बारिश में गले भी नहीं...! यह उनकी प्रकृति ही नहीं, नियति भी तो है...

किसी असतर्क-से क्षण में वह अपनी देह की अबाध्य चाहना सुनती है और अनमन हो जाती है। एक वर्जित-सी इच्छा, जिसे दमित किया जा सकता है, मगर शेष नहीं, गाहे-बगाहे उद्दंडता से अपना सर उठाती है। उसने अब स्वयं से लड़ना छोड़ दिया है, हथियार गिरा दिए हैं। तभी जीना कुछ-कुछ सहज हो गया है, वर्ना एक अर्से तक अपने ही हाथों लहूलुहान होती रही थी।

कभी-कभी उसने कौशल को उसकी नजर बचाकर देखा था। गहरे साँवले रंग और तीखे नाक-नक्शेवाले कौशल का व्यक्तित्व काफी आकर्षक था। वह हमेशा हल्के-फीके रंगों की सूती शर्टस् तथा जींस पहना करता था। कभी बहुत पास होने पर उसकी देह की हल्की गंध मिलती - पसीना, कोलोन और सिगरेट की मिली-जुली गंध! एक चिनगारी हल्के से जलकर बुझ जाती। ऐसे में वह एकदम से उठ खड़ी होती और चलने के लिए तैयार हो जाती। कौशल भी अपने स्वभाव के अनुसार बिना कुछ पूछे उसके साथ हो लेता।

 
शाम के नीले, मटमैले अंधकार में दोनों निःशब्द चलते रहते। ऊपर माधवी के फूलों की तरह तारे एक-एककर खिल उठते, एक मोतिया आब से आकाश के श्यामल विस्तार को निखारते हुए। सर के ऊपर उड़ते पक्षियों के पंखों की हल्की झटपट के साथ वर के अधखाए फल इधर-उधर बिखर जाते। एक उदास शाम रात के नीरव में धीरे-धीरे डूबकर खो जाती। कोई रात की पक्षी घने जंगलों के बीच से कहीं रह-रहकर उदास स्वर में बोलती रहती, एक ही लय में...

कौशल उसे बँगले के गेट तक पहुँचाकर अक्सर बाहर से ही लौट जाता था। कभी-कभी उसके आग्रह पर अंदर भी आ जाता था। वे देर रात गए तक बरामदे में बैठकर बेगम अख्तर की गजलें सुना करते थे। कभी शहर से लौटते हुए कौशल वाइन की बोतलें भी ले आया करता था, जिसे फ्रिज में ठंडा न कर पाने की विवशता में वे गर्म ही गुटकते रहते। रात का निःशब्द कोलाहल तीव्न होते-होते न जाने कब शिथिल पड़ जाता। रात्रि की गहन नील पृष्ठभूमि में जंगल की आदिम दुनिया एक रहस्यमयी छवि की तरह स्तब्ध पड़ी रहती।

एक रात जब कौशल उसके कॉटेज से निकल रहा था, अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी हथेली पर चंपा का एक पीला फूल रख दिया था। चंपा के ये फूल मानिनी ने उसे भेजे थे। वह रोज मुल्की के हाथों उसके लिए रकम-रकम के मौसमी फूल भिजवाती थी। साथ में उसके किचन गार्डन में उगाई हुई सब्जियाँ भी।

चंपा की तेज-तुर्श गंध में रात की हल्की गर्म हवा नहाई हुई थी। कौशल ने हल्की चाँदनी में उसे देखा था। उसकी वे हर पल सिसकती हुई-सी आँखें इस समय बुझकर दो गहरी काली, शांत झील में तब्दील हो चुकी थीं। अब वहाँ सपनों के उजले राजहंस थे, इच्छाओं के नीले, ताजे कमल थे और था आकाश में चमकते हुए चाँद का टूटता-जुड़ता प्रतिबिंब... कैसा मायावी था सब कुछ, एकदम अशरीरी, देहातीत, यथार्थ से परे...

कौशल ने उस फूल के साथ उसकी अंगुलियाँ भी अपनी मुट्ठी में बाँध ली थी। अपर्णा ने प्रतिरोध नहीं किया था। बस, सोती-सी आँखों से तकती रही थी। उनके बीच वह रात एक टुकड़ा चाँद और चंपा के उस फूल के साथ न जाने कितनी देर तक ठिठकी रह गई थी। उन्होंने एक-दूसरे से कुछ कहा नहीं था, सिर्फ सुनते रहे थे चुपचाप... उस दिन बोलने के लिए उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं पड़ी थी। मन बोलने के लिए कब भाषा का मुखापेक्षी हुआ है, अपने अंदर के अर्थमय मौन को बहुत शिद्दत से महसूसते हुए पहली बार शायद उन्होंने इस तरह से सोचा था। कुछ है जो उन्हें अजाने बदल रहा है...

नाजुक उंगलियों-सा वह फूल अपने सरहाने रखकर कौशल उस रात सोया था और सुबह तक खुशबू की एक तरल नदी में डूबता-उतराता रहा था। नींद में शायद अपर्णा थी, अपने मोरपंखी आँचल में ढेर सारे नक्षत्र समेटे, आँखों से बोलते हुए, एकदम चुप रहकर... उस रोशनी, उस सुगंध, उस जादू को वह और किस नाम से पुकारता... इसके बाद से लगभग हर रोज वह अपर्णा के कॉटेज से एक महकते हुए फूल का सौगात लेकर लौटा था। धीरे-धीरे वह इकट्ठा होकर उसके भीतर एक पूरा बगीचा बन गया था।

उन कुछ दिनों के साथ ने उन्हें एक-दूसरे के काफी नजदीक ला दिया था। वे अधिकतर दुपहर के निर्जन एकांत में या साँझ के उतरते हुए अंधकार में साथ-साथ घूमते या देर तक कही बैठे रहते। खिड़की-दरवाजे पर ग्रीष्म ऋतु की गर्म, तांबई संध्या निःस्तब्ध झरती रहती - रकम-रकम के रंगों में, सुगना की क्षीण धारा में सुडौल चाँद का प्रतिबिंब बनता-बिगड़ता, काँपता, कभी पनकौड़ी के साथ झप्-से किसी ताल के नीले जल में डूब जाता... चंपा की तेज सुगंध में हवा मदिर हो उटती... ये सारे अक्स उनके अंदर धीरे-धीरे इकट्ठे होते जाते। एक अनाम संबंध मधु के छत्ते की तरह उनके अंदर चुपचाप आकार ले रहा था, उनके ही अनजाने।

एक साँझ जब आकाश का रंग गहरा कासनी हो रहा था और नदी के ऊपर जंगली सुग्गे झुंड में उडते हुए कलरव कर रहे थे, कौशल ने अपर्णा की संध्या तारा-सी उज्ज्वल आँखों में ढेर-से अनकहे शब्द देखे थे, अपनी ही तासीर से लरजते हुए... वे सुनने के लिए नहीं, जीने और अनुभव करने के लिए बने थे। वह अनुभव अनाम गंध की तरह उसके अंदर गहरे तक उतरा था। वह जैसे किनारे-किनारे तक भर आया था। किसी भी क्षण छलक पड़ने को आमादा...

उसने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया था, अपर्णा ने कुछ कहा नहीं था, बस, एक पलक उसे देखा भर था, न जाने कैसी आँखों से। कौशल को लगा था, अपर्णा की दो गर्म हथेलियों में उसका सारा अकेलापन किसी मेले की गुंजार भरी खूबसूरती बनकर सिमट आया है। उस छोटे-से क्षण में सुख की एक पूरी दुनिया थी, उसने उसे जिया था उस दिन आखिरी बूँद तक...

अपनी उंगली के पोरों पर उसके हल्के-से स्पर्श का स्वप्निल स्वाद लिए उस रात कौशल अपने कमरे में लौटा था - एक खुमार और अद्भुत मनःस्थिति के साथ। अपर्णा उसके पीछे उसकी देहगंध में डूबी माधवी की छाँव में लेटी रही थी देर तक... रात की साँवली सलाइयों पर एक नर्म कहानी धीरे-धीरे बुनती रही थी आखिरी प्रहर तक।

कुछ विशेष घटा नहीं था दोनों के बीच दैहिक स्तर पर, मगर मन किनारे-किनारे तक पुर आया था, भर आषाढ़ की किसी आप्लावित नदी की तरह! उसकी जलभरी आर्द्र, मेघिल आँखों को देखकर न जाने क्यों कौशल को उस दिन अनायास ख्याल आया था, मछली ही पानी में नहीं, अपितु पानी भी मछली में रहता है, अपने जीवन के लिए, कुछ इसी तरह... अपनी सोच उसे किसी कविता की तरह लगी थी, खूबसूरत और पागल...

उस क्षण का असीम सुख जैसे अपर्णा से भी गुजरकर जा नहीं पाया, रह गया अंदर - सारे दुखों का उत्स बनकर। एक बहुत बड़े सुख की तुलना में जीवन की दूसरी बातें गौण होकर रह गईं। बहुत बाद में जाकर समझ पाई थी वह, एक अकेला सुख किस तरह जीवन के तमाम सुख-दुखों पर भारी पड़ जाता है। जो गुजर न सका वह क्षण उसके जीवन का सबसे बड़ा संबल और अभाव बनकर रह गया...

एक बार मानिनी ने कहा था, कभी तुम्हें लगता नहीं अपर्णा, मृत्यु का ही एक विस्तार है जीवन - किस्तों में मिलती मौत... हर क्षण, प्रतिपल क्षरता हुआ, शेष होता हुआ, जैसे पीले पत्ते झरते हैं पतझर में... नीरव और निरंतर... एक मौन, पथराए संगीत में डूबा हुआ क्षरण... जैसे कोई रुदाली बधाइयाँ गा रही हो या फिर सुहाग की रात कोई मर्सिया... सिसक-सिसककर! शोक और आह्लाद का बेमेल गीत - टूटने का, खत्म होने का - हमेशा-हमेशा के लिए... कभी ध्यान से सुनो, बेसुध हो जाओगी...! जैसे रात रानी की सुगंध से गश आने लगता है... मेरे साथ तो ऐसा ही होता है... मृत्यु के नीले, विषाक्त नशे में डूबी जीती रहती हूँ - मॅरॅन रे तुमी मोर श्यामो सॅमान... सुनकर वह सहम उठी थी। मरण-इच्छा के अजीब आब्सेशन से भरी हुई प्रतीत होती थी वह।

वह एक ही क्षण में मानिनी से आकर्षित और विकर्षित महसूस करती थी, मगर एक दुर्निवार मोह उसे उससे दूर भी जाने नहीं देता था किसी तरह। वह एक कदम बढ़ती थी तो दो कदम पीछे लौट आती थी उसकी तरफ। उन आँखों का नीरव सम्मोहन ही कुछ ऐसा था, जंजीर बन जाता था हाथ-पाँव की।

इसी बीच उसका दूसरा उपन्यास लगभग पूरा हो आया था। उसका फाइनल ड्राफ्ट अपने प्रकाशक को थमाकर वह अगले महीने अमेरिका जाना चाहती थी। वहाँ युनीवर्सिटी में उसका कुछ जरूरी काम रह गया था। अपर्णा के जीवन की कहानी ने उसे कहीं गहरे से छुआ था। एक खूबसूरत, प्रांजल जीवन इस तरह से उदासी में घुलकर जाया हो जाएगा... वह अक्सर सोचा करती, किस तरह से मानिनी के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव लाया जाय। इस निविड़ वन में तो वह एक दिन घुटकर मर ही जाएगी।

इस बीच मौसम भी यकायक बदला था। बीच-बीच में बूँदा-बाँदी होने लगी थी। मानसून शायद जल्दी ही आनेवाला था।

उस शाम जब वह डॉ. सान्याल के कॉटेज पर पहुँची थी, सावन के बादल आकाश में घिर आए थे। हवा तेज और ठंडी थी। सूखे, जर्द पत्तों की मोटी कालीन पूरे पोर्टिको में बिछी हुई थी। बारिश कभी भी शुरू हो सकती थी। डॉ. सान्याल से मिलकर उसने उनका धन्यवाद किया था। बढ़ते हुए जान-पहचान के साथ इसी बीच वह उसे काका बाबू कहकर संबोधित करने लगी थी। उन्होंने भी उससे बहुत गर्मजोशी से हाथ मिलाया था। फिर कभी वहाँ आने पर उनसे मिलने का आग्रह किया था।

चलोगी, धूप नहाई जमीन और सूरजमुखी के देश में?

लौटते हुए वह हर कदम पर ठिठकी थी। उसकी आँखें भी। उसे मानिनी से मिलना था। और फिर अचानक उसे वह दिखी थी - पीली और उदास, मुर्झाए हुए अमलतास की तरह। साँझ की नीली उदासी में परछाई की तरह अवसन्न घुली हुई, फना होती हुई-सी...

पास जाने पर उसने बिना कुछ कहे उसका हाथ थाम लिया था और फिर उसे चंपा के नीचे झूले पर बैठा कर स्वयं भी उसके बगल में चुपचाप बैठ गई थी। उन दोनों के बीच एक भरा-भरा-सा मौन देर तक पसरा रहा था। शायद उन दोनों के पास ही बहुत कुछ था कहने-सुनने के लिए, तभी वे इस तरह से खामोश हो गए थे, शब्दों की खोज में। मानिनी की आँखें किसी घायल पक्षी की मौन छटपटाहट से भरी हुई थी जैसे - बेचैन मगर निर्वाक... आखिर अपर्णा ने ही अपने बिखरे शब्द समेटे थे -

तुम्हें ही ढूँढ़ रही थी तब से, कहाँ थी?

- कॉफी बना रही थी... फिल्टर कॉफी, बाबा को पसंद है...

- हूँ... अपर्णा ने हवा में उड़ती कॉफी की गंध को एक लंबी साँस के साथ सीने में भरा था - और और उसकी चंपा की कलियों-सी नाजुक अंगुलियाँ अपनी मुट्ठी में समेटकर पूछा था -

चलोगी मेरे साथ?

उसने अपनी वाष्पित आँखें उठाई थीं। वहाँ न पूछा गया प्रश्न था - कहाँ?

- वहीं - धूप नहाई जमीन और मुस्कराते हुए सूरजमुखी के देश में... जहाँ तुम्हें बोलने के लिए किसी से भाषा उधार न लेनी पड़े और जहाँ तुम्हारे पंखों को सारा आकाश मिले...

न जाने उसकी बातों में ऐसा क्या था कि मानिनी सुनते ही बाँध टूटी नदी की तरह बहने लगी थी। उसकी उन मरू-सी शुष्क आँखों में न जाने कितने समंदर छिपे थे, उनकी गहराई और विस्तार में वह भी डूबने लगी थी। कॉफी की गंध घुली वह तेजी से गिरती शाम - गहरी कत्थई और गर्म - उनके बीच अचानक भीगने लगी थी। अब तक हल्की झींसी भी गिरने लगी थी। हवा भीगी मिट्टी की सोंधी गंध से अनायास तर हो आई थी। अपनी हथेलियों से उसके आँसू पोंछते हुए उसने अपना सवाल एक बार फिर उसके सामने दोहराया था -

मानिनी, चलोगी न मेरे साथ?

उसने न जाने किन नजरों से देखा था उसे -

नहीं, मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती अपर्णा...

उसका जबाव सुनकर उसके अंदर जैसे एक पूरा आकाश ही टूटकर गिरा था। उसे उससे इस बात की उम्मीद नहीं थी। एक गहरे शून्य और डूब से यकायक भर उठी थी वह। पता नहीं, अपने ही अनजाने उसने इस बीच क्या-क्या सोच लिया था उसे लेकर। बहुत दूर निकल आई थी वह। जिसे उसने रास्ता समझा था वह दरअसल पानी की गीली लकीरें थीं जिन्हें अंततः मिट जाना ही होता है। उसके लाख पूछने पर भी उसने अपने इनकार की कोई वजह नहीं बताई थी। बस एक ही बात दोहराती रही थी कि एक दिन उसे सारी सच्चाई का पता चल ही जाएगा। आज वह वहाँ से चली जाय।

अपर्णा को जाते हुए देखकर वह रोती रही थी। बार-बार अपने ही हाथों से अपने पिंजरे का द्वार बंदकर लेना... कितनी विवश है वह, कितनी भाग्यहीन। धूप नहाई दुनिया का निमंत्रण उसकी आँखों में अंगारे भर देता है। कुछ भी चाहने का दुःसाहस अब उसमें नहीं। एक बार सपने देखने की सजा वह आज तक पा रही है - तिल-तिलकर मरते हुए। हर रोशनी, हर खुशी से रिक्त होकर एक विराट शून्य में बुझे हुए किसी तारे की तरह। किसी की दो उदास आँखों की दृष्टि उसे आज भी समय-असमय घेरकर निंतात अकेली कर देती है... एक पुकार 'मेम साहब...' उसे न जाने कितनी रातों से जगाए हुए है। वह अब जीवन से कुछ चाहेगी तो किस साहस से?

उसे श्याम से हुई अपनी आखिरी मुलाकात याद आती है... चंपा के फूलते हुए पेड़ के नीचे। उस दिन चाँद नहीं था। आकाश का रंग रात के उतरने के ठीक पहले का-सा था - इस्पाती नीला। उसी रंग में घुल गया था गोपाल का साँवला रंग। हल्के अंधकार में दो आँखें किसी तुलसी चौरे पर झिलमिलाते सांध्य प्रदीप जैसी उजली दिख रहीं थी। हमेशा की तरह उनमें ढेर सारा कौतूहल और भय, ठीक जैसे किसी हिरण की आँखों में होता है। उसके लिए साल के दोने में जामुन चुन लाया था। सकुचाकर उसके हाथों में रखते हुए उसके होंठों के कोने में काँपती हुई वह सलज्ज हँसी, ठीक किसी खुशरंग तितली की तरह- आपके लिए मेम साहब...

- फिर मेम साहब... मैंने कहा नहीं था, मुझे नाम से पुकारो... उसने कपट गुस्से में अपनी आँखें फैलाई थी - तुम मेरी कोई बात नहीं सुनते श्याम...

- अरे नहीं मेम सा...ह...ब... श्याम आदतन फिर से उसे मेम साहब कह गया था और फिर रगड देकर अपनी जुबान को रोकने की कोशिश की थी। गहरे होते अंधकार में उसकी आवाज की लरज को महसूस करते हुए उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकी थी - अबकी बार तुम्हें जरूर सजा मिलेगी... तुमने अपना घर का काम भी नहीं किया... ए बी सी डी तुम्हें अब तक आधी भी याद नहीं हो सकी। मैं तुमसे बहुत गुस्सा हूँ श्याम...

बिना कुछ कहे श्याम ने अपनी हथेली आगे बढ़ा दी थी, सजा के लिए।

- नहीं, आज छड़ी नहीं, तुम्हें कुछ और दंड मिलेगा...

- उ का? पूछते हुए श्याम की आवाज में सचमुच का डर था। अंधकार में फैली हुई दो निर्दोष आँखों में वन की अटूट निविड़ता और खोयापन... उनकी तरफ देखते हुए उसका मन अनायास भर आया था। ऐसी बलिष्ठ देह का युवा पुरुष और मन से इतना सरल, भोला... धीरे से हाथ बढ़ाकर उसने उसे अपने करीब खींच लिया था - मुझे चूमो श्याम...

श्याम उसके शरीर से लगा काँपता खड़ा रह गया था। उसकी देह से उठती पसीने, `मिट्टी की आदिम, वन्य गंध, मांसल उत्ताप उसे अधीर किए जा रही थी। शिराओं में उष्ण होता रक्त सुनहरा पड़ने लगा था, गालों में उत्तेजना की ललछौंह कौंध थी।

- श्याम... उसने अधीर होकर उसकी बाँह में अपने नाखून खुबा दिए थे। एक चिहुँक के साथ श्याम उसके गाल की तरफ झुका था, मगर उसने अपने होंठ आगे कर दिए थे - यहाँ, होंठों पर...

 
श्याम ने सिहरकर पीछे हटने की कोशिश की थी, मगर उसने उसे सख्ती से अपनी बाँहों में बाँध लिया था - श्याम...

...अपने होंठों पर एक फीके नमकीन स्वाद को महसूसते हुए वह हिलक-हिलककर रोती रही थी। उस दिन दोनों को ननकू ने एक साथ देख लिया था। इसके बाद कई दिनों तक श्याम उससे मिलने नहीं आया था। वह रोज नदी के किनारे बैठकर उसका रास्ता देखती और फिर निराश होकर घर लौट आती। उसका मन रात दिन आशंकाओं से भरा रहता, न जाने श्याम क्यों नहीं आया, न जाने उसके साथ क्या हुआ होगा...

और फिर मुल्की ही वह मनहूस खबर उसके पास ले आई थी - श्याम हवालात में बंद है। उसकी माँ ने जो थाने में साफ-सफाई का काम करती थी, कहला भेजा है, वह उसे एक बार देख आए...

वह गई थी पुलिस स्टेशन, देर शाम को, जंगल का बीहड़ रास्ता तय करके, अकेली ही... उसके अनुनय-विनय का कोई असर थनेदार पर नहीं हुआ था। बेशर्मी से हँसता रह था - आप भद्र घर की महिलाओं को यह सब शोभा नहीं देता मैडम... जाइए, घर जाइए... आपको हमारा हवलदार पहुँचा आएगा, रात हो रही है...

लौटते हुए हवलदार को शायद उस पर दया आ गई थी। किसी से न कहने की बात कहकर चुपके से उसे श्याम के लॉकअप में ले गया था। उसने वहाँ श्याम को देखा था, मगर पहचान नहीं पाई थी... अँधेरी कोठरी के कच्चे फर्श में वह तुड़ा-मुड़ा पड़ा था - अपने ही खून, पिशाब और पाखाने में सना हुआ... उसके चारों तरफ दुर्गंध के भभाके उड़ रहे थे, साथ में मच्छरों की अनवरत भनभनाहट, अह्यय गर्मी... अस्पष्ट आवाज में शायद वह बार-बार पानी... पानी कह रहा था।

वह वहाँ दो क्षण भी रुक नहीं पाई थी। रोते हुए भाग आई थी। नहीं, वह उसका श्याम नहीं हो सकता... श्याम तो कितना सुंदर है, कितना बलिश्ठ...और वहाँ, वह जो पड़ा हुआ था... गंदगी की ढेर में टूटा-फूटा... उसका चेहरा कहाँ था!... कूटा-पिसा मांस का एक बदसूरत लोथड़ा - गहरा बैंजनी, खून के थक्कों में जमा हुआ... ऊपर के दो हिस्सों में फटे हुए होंठ के बीच से झाँकते चार दाँत... अँधेरे में चमकते हुए... उसके रूप को और भी भयानक, और भी कदर्य कर रहे थे। वह थाने के बाहर एक पुराने पीपल के नीचे बैठकर देर तक उल्टी करती रही थी। लगा था, दोपहर का सब खाया-पीया बाहर आ जाएगा।

हवलदार को उसकी हालत देखकर दया आ रही थी - मेम साहब, औरतजात होकर आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था। यह सब तो यहाँ चलता ही रहता है...

वह बिना कुछ कहे लड़खड़ाती हुई-सी चलती रही थी। उसका दिमाग शून्य हो चुका था। वह बस इतना जानती थी कि उसे इस जगह से जितनी दूर हो सके चली जाना है... उस गंदी, अँधेरी कोठरी से, उस भयानक, वीभत्स चेहरे से... वहाँ जहाँ उसका प्यार है, चंपा की मादक सुगंध है, नीले आकाश में सोने की थाल-सा भरा-पुरा चाँद और श्याम की मधुर बाँसुरी है...

उसे इस कुरूप संसार में नहीं रहना जहाँ इतनी पाशविकता है, इतनी घृणा है, इतनी हिंसा है... उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं। सब झूठ है, दुःस्वप्न है... वह जितनी जल्दी हो सके अपने श्याम के पास चली जाएगी, अभी चली जाएगी... वह यकायक बेतहाशा दौड़ने लगी थी, दौड़कर जंगल के बीच खो गई थी। हवलदार पीछे से पुकारता रह गया था - अरे रे मेम साहब...

वह सारी रात वह जंगल में भटकती रही थी पागलों की तरह, श्याम को पुकारती हुई, उसे ढूँढ़ती हुई। दूसरे दिन सुबह डॉ. सान्याल अन्य लोगों के साथ आकर उसे जंगल से अचेतावस्था में उठाकर ले गए थे। आसपास के लोगों से कहा था, उसकी बेटी को मिर्गी के दौरे पड़ते हैं। तब से सचमुच मानिनी को मिर्गी के दौरे पड़ने लगे थे। बीच-बीच में गहरी उतरती शाम में वह अचानक काँपने लगती है और कुछ अस्पष्ट बड़बड़ाते हुए अचेत हो जाती है...

उस दिन अपर्णा मानिनी के बँगले से बहुत निराश होकर लौटी थी। मानिनी ने स्वयं को इस अरण्य में एक तरह से दफ्न कर लिया है। वह खुद जीना नहीं चाहती, कोई किस तरह से उसकी मदद कर सकता था।

एक दिन आदिवासियों के एक गाँव से देर शाम को लौटते हुए उसने कौशल को मानिनी के विषय में बताया था। कौशल मुस्कराकर रह गया था - औरत... प्यार की मारी, और क्या... बाप कैसा भी हो, उसे इस तरह से अकेला छोड़ नहीं सकती।

- क्यों प्यार हम लोगों के लिए कारावास बन जाता है कौशल? कभी सोचती हूँ तो स्वयं ही जबाव नहीं दे पाती।

उसकी उदास आवाज में मेले में खोए किसी बच्चे की-सी निसंगता थी। एक छोटा-सा पहाड़ी नाला पारकर वे दूसरे किनारे पर आए थे। अपने पैर से एक लीच को अलग करते हुए कौशल ने अँधेरे में ही उसका चेहरा टटोला था -

प्यार को कारावास या आलिंगन में बदल देना हमारे ही वश में होता है अपर्णा... संबंध पाश में बदल जाए, इससे पहले ही उसे अपने से काटकर परे कर देना चाहिए।

- इतना सहज नहीं होता सब कुछ... जिन्हें काटकर फेंक देने की बात आप कर रहे हैं, वे जंगलात नहीं, जिंदा रिश्ते हैं... हथियार भले दूसरों पर चलाए, दर्द तो खुद को ही सहना पड़ता है।।

कहते हुए उसके स्वर में डूबता हुआ-सा कोई अहसास था। पुरते हुए किसी घाव के टाँके अनायास उधड़ गए थे शायद... कौशल ने जबाव में कुछ भी नहीं कहा था, चुपचाप चलता रहा था। दोनों के बीच का पसरा हुआ मौन झींगुर की तेज आवाज से टूटता-बिखरता रहा था। एक जंगल उनके आसपास से सिमटकर अनायास उनके भीतर तक उग आया था जैसे। बहुत सघन और निविड़...

देर तक चुप रहने बाद उसने संकोच के साथ पूछा था - आप आजकल कहाँ रहते हैं? दिनों तक नहीं दिखते... रेंजर साहब भी कह रहे थे... उन्हें आपकी बहुत फिक्र रहती है...

- सिर्फ उन्हें? चलते हुए कौशल ने मुड़कर उसकी तरफ देखा था। सुनकर अँधेरे में वह रंग गई थी। बिना कोई जवाब दिए चलती रही थी। चुपचाप।

- बहुत काम है और समय बहुत कम... कौशल ने न जाने कैसी अजनबी आवाज में कहा था। सुनकर वह कहीं से सहम आई थी।

- समय कम है... माने?

- माने... माने तो मै भी नहीं जानता अपर्णा... बस एक गट फीलिंग है... परछाइयाँ गहरी हो रही हैं, घिर रही हैं, उनका घेरा तंग हो रहा है, आसपास कस रहा है... कहीं एक टाइम बम रखा है, टीक्-टीक्कर रहा है, किसी भी क्षण फट सकता है...

उसकी बातें सुनकर अपर्णा सहम उठी थी - कौशल...

- नहीं, डरो नहीं... कौशल ने रुककर उसका हाथ पकड़ लिया था - अपर्णा, अपने आसपास देखो, कितना अंधेर है... किस दुनिया में जी रहे हैं हम... एक तरफ ऐसी जगमगाहट, ऐश्वर्य का वल्गर प्रदर्शन, खुशहाली और दूसरी तरफ... अपर्णा, कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, यहाँ - अपने आसपास देखो - आजादी के इतने वर्षों बाद भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा जीवन की न्युनतम सुविधाओं से भी वंचित है, कीड़े-मकौडों की तरह जी रहा है...

अपनी कलाई पर उसकी कसती हुई अंगुलियों को महसूस करते हुए वह चलती रही थी। यहाँ आने के बाद उसे भी यह बातें उद्वेलित करती रही थीं। एक ही देश, समाज के लोगों के जीवन के बीच ऐसी असामानता... कोई ऐश्वर्य की पराकाष्ठा में जी रहा है और कोई दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज है। उसने आदिवासियों की बस्तियों में देखा है, लोग किस अकल्पनीय अभाव में जी रहे हैं! भूखे-नंगे बच्चे... अपुष्ट और बीमार, मरणासन्न वृद्ध, कंकालसार स्त्री-पुरुष... हर जगह वही पीले, भूखे चेहरे, अवसन्न आँखें और मौन प्रश्नों के अंबार...

कौशल अब भी कह रहा था - अपर्णा, सोचो जरा, एक तरफ आजादी के इतने साल बाद भी देश के नागरिकों को पीने का स्वच्छ पानी तक उपलब्ध नहीं और दूसरी तरफ हमारे नेताओं, अफसरों की ऐयाशी... इन नेताओं के रूप में हमने सफेद हाथी पाल लिए हैं। यह लाख दो लाख मंत्री... इनके रख-रखाव, विदेश यात्राएँ, मनोरंजन, मोटी तनख्वाह... इसी में तो हम इनकम टैक्स देनेवालों के आधे से अधिक पैसे खर्च हो जाते होंगे, नहीं? आखिर यह किसके प्रतिनिधि हैं? जिस देश की एक बड़ी संख्या गरीबी की रेखा के नीचे आज भी जीने के लिए अभिशप्त है, उनके प्रतिनिधियों को ऐसी शान-ओ-शौकत में जीने का हक कैसे मिल सकता है? मंत्रियों के बँगलों की सजावट, रख-रखाव में लाखों फूँक दिए जाते हैं। उनकी पार्टियाँ, विदेशों के दौरे, वहाँ उपचार... मुगल गार्डन के फूलों के पीछे करोड़ों उड़ाए जाते हैं, प्रधानमंत्री का हवाई जहाज विदेशों से फर्नीस्ड होकर आता है... अपर्णा यहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा जैसी आवश्यक चीजों के लिए हमेशा फंड का अभाव बना रहता है, लेकिन एशियाड, कामनवेल्थ, सेमिनारों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है।

अपर्णा ने आहिस्ता से कौशल की बाँह छूई थी - कौशल... टेक इट इजी...

- टेक इट ईजी...! टेल मी, फॉर हाउ लांग टु टेक इट ईजी? कौशल की आवाज उत्तेजना से थरथरा रही थी - कहोगी, क्यों सिर्फ कुछ नगर, महानगर जगमगा रहे है, क्यों सारे देश की पूँजी का निवेश गिने-चुने महानगरों, शहरों में हो रहा है? कोई शहर शंघाई बन रहा है तो कोई प्रदेश पिछड़ता ही चला जा रहा है... कोई कौम तरक्की की राह पर है तो कोई संप्रदाय मिट जाने की कगार पर पहुँच रहा है... यह प्रांतीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता इसी असमानता, अन्याय और शोषण का परिणाम है और इन सब की जड में है हमारी राजनीति - वोट की राजनीति, तुष्टिकरण की राजनीति, फूट की राजनीति...

- हमें भावुकता से नहीं, दिमाग से काम लेना चाहिए... लड़ना है, मगर हमारा हथियार सही होना चाहिए। हथियार बंदूक भी होता है और अंहिसा भी... बड़ी शक्तियों के सामने भूखे-नंगों के हथियार ऐसे होने चाहिए जिसे आसानी से कुचला न जा सके। ऐसी विषम परिस्थितियों में लगता है, गांधी आज भी प्रासंगिक हैं, अहिंसा का कोई विकल्प नहीं हो सकता... इतिहास के पन्ने पलटकर देख लो, यह कारगर है, इसलिए भी अनिवार्य है... यह सेना, विशाल स्टेट पावर के आगे दो-चार लाठी, बंदूकों की क्या औकात... मटियामेट कर दिए जाएँगे...

उसकी बात पर कौशल यकायक चुप हो गया था, देर तक बिना कुछ कहे चलता रहा था। चाँदनी में भीगा जंगल गीला-गीला चमक रहा था। पेड़ों के नीचे गहरा अंधकार पसरा था। कोई रात का पक्षी रुक-रुककर निरंतर बोल रहा था। चलती हवा में अजीब सरसराहट थी। पूरा वन-प्रांतर एक गहरे रहस्य में डूबा जैसे स्तब्ध पड़ा था।

 
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