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ऋचा (उपन्यास)

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ऋचा (उपन्यास)

lekhika-पुष्पा सक्सेना

मेरी बात

संविधान में नारी को पुरूषों के समकक्ष अधिकार दिए गए हैं। समाज द्वारा उसे ‘श्रद्धा की पात्री’ या ‘लक्ष्मी देवी’ की संज्ञा दी गई है। दुःख का विषय है, यही देवी कभी दहेज के नाम पर जलाई जाती है, कभी घरेलू हिंसा और बलात्कार की पीड़ा झेलती है। निर्दोष होने के बावजूद उसे अपराधिनी बनाकर, प्रश्नों और लांछनों के कठघरे में कैद कर दिया जाता है। समाज के हर वर्ग में स्त्री को स़्त्री होने की सज़ा दी जाती है। मारिया, सुनीता, सुधा, ऋचा सबकी एक-सी कहानी है।

अपने अधिकार और अपना सम्मानपूर्ण स्थान पाने के लिए औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी, संघर्ष करना होगा। उसे दूर्वा की तरह जीना है। बार-बार रौंदे जाने के बावजूद जिस तरह दूर्वा फिर सिर उठाकर खड़ी हो जाती है, औरत को भी उसी तरह चुनौतियों पर विजय पानी है, सिर उठाकर खड़ा होना है। माधवी की तरह एयरफ़ोर्स ज्वाइन करके आकाशीय ऊंचाइयां छूनी हैं ।

घरेलू हिंसा के प्रभाव से कामकाजी स्त्रियाँ भी अछूती नहीं हैं। पति द्वारा जलाकर खत्म करने के प्रयास के बावजूद नर्स सुनीता, भयवश सही बयान देने से डरती है। इंसपेक्टर अतुल का कहना है, अक्सर महिलाएँ ऐसे ससुरालवालों के सम्मान की रक्षा में झूठा बयान देती हैं, जिन्होंने उन्हें जलाकर खत्म करने की कोशिश की हो, बदनाम हम पुलिसवाले होते हैं। स्त्री का यही भय, उसका शत्रु है। आज तो सुनीता बच गई, पर कल किसी और तरीके से उसे ख़त्म किया जा सकता है। आँसू बहाकर जीते रहने की जगह साहस के साथ, उस नरक से बाहर आ जाने में ही उसकी समझदारी है।

सुधा ने अपने साथ अश्लील व्यवहार करने वाले युवकों को थप्पड़ मार, अपने साहस का परिचय दिया। प्रभावशाली पिता के बल पर युवकों का छूटना और सुधा को नौकरी से निकाल दिया जाना, अन्याय होते हुुए भी कटु सत्य है। सुखद पक्ष यह है कि समाज में आज भी परेश और विशाल जैसे साहसी युवक हैं, जो स्वर्णिम भविष्य की आस जगाते हैं। पुरूषों की मानसिकता में बदलाव आने से निश्चय ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव है। ऋचा की तेजस्विता स्मिता, सुनीता, सुधा जैसी भीरू लड़कियों को साहस प्रदान कर, सही राह पर चलने को प्रेरित करती है। वे चुनौतियों से पराजित नहीं होती, हिम्मत के साथ उनका सामना करती हैं और गर्वित, विजयश्री पाती हैं।

उपन्यास की नायिका ऋचा, एक जुझारू पत्रकार है। अपने बलात्कार की रिपार्ट वह स्वंय थाने में जाकर दर्ज कराती है। कहीं कोई साक्ष्य छूटने न पाए, इस बात का पूरा ध्यान रखती है, निर्भीक घोषणा करती है- ‘वह पत्रकार है, कई पुुरूषांे के साथ उसकी मित्रता है, पर भेड़ियों से पाला पड़ने का यह उसका पहला मौका है। अगर भेड़ियों को खुला छोड़ दिया जाए तो वे फिर शिकार करेंगे, इसीलिए उन्हें खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।

ऋचा ने दिखा दिया, बलात्कार की शिकार लड़की सम्मान की पात्री हो सकती है, बशर्ते वह स्वंय को अपराधिनी मानकर हिम्मत न हार जाए। वस्तुतः उसे तो सिर उठाकर चलना है, क्योंकि अपराधिनी वह नहीं, वरन् वे बलात्कारी हैं, जो एक कोमल लड़की पर अपनी ताकत आज़मा, अपने को विजयी समझते हैं। ऐसे कायरों को तो समाज की ऐसी अवमानना मिलनी चाहिए कि वे कभी सिर उठाकर न चल सकें।

उपन्यास की नायिका ने यह सिद्ध कर दिया, नारी स्वंयमेव शक्तिपुंज है। वह ऐसी दीपशिखा है, जो स्वंय जलकर, दूसरों का पथ आलोकित करती है। यह उपन्यास यदि किसी को प्रेरणा दे सके, तो मेरा लेखन सार्थक है।

पुष्पा सक्सेना
 
ऋचा

कॅालेज-डिबेट के लिए छात्र-छात्राएँ मेन हाॅल में जमा थे। ‘कॅालेज में प्रवेश के लिए लड़कियों के लिए 25: सीट आरक्षित की जानी चाहिए’, विषय को लेकर लड़के-लड़कियों में भारी उत्तेजना थी। एक-दूसरे को पराजित करने के लिए जोरदार तर्क दिए जा रहे थे। आशा ने लड़कियों की स्थिति की जो मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत की, उसके आधार पर लड़कियों की विजय निश्चित थी, पर ऋचा ने मंच पर पहुँचकर पासा ही पलट दिया। एक लड़की होकर वह विषय के विपक्ष में बोलेगी, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

मंच पर पहुँच, सधी आवाज में ऋचा ने अपनी बात कही थी –

“साथियों, मुझे दुःख है, विषय के पक्ष में बोलकर मेरी सहपाठिनें अपने पैरों पर स्वंय कुल्हाड़ी मार रही हैं।”

ऋचा के पहले वाक्य पर ही लड़कियों के बीच सुगबुगाहट शुरू हो गई। लड़के आगे सुनने को तैयार हो गए। ऋचा ने बात आगे बढ़ाई –

“…….. जी हाँ, मैं फिर अपनी बात दोहराती हूँ। दान में दी गई सीट-ग्रहण करने की अपेक्षा, मैं दूसरी बारी की प्रतीक्षा करूँगी। स्वाभिमानपूर्ण जीवन ही सच्चा जीवन है। आरक्षण का ठप्पा लगे सिंहासन पर बैठने की जगह अपने प्रयासों और योग्यता से प्राप्त स्थान श्रेयस्कर होता है। कम-से-कम मेरी अन्तरात्मा तो मुझे नहीं धिक्कारेगी कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे मुझे कॅालेज में स्थान मिला है। आरक्षण की बैसाखी हमें अपंग बना देगी। मैं स्पष्ट शब्दों में कहती हूँ, हमें कॅालेज में प्रवेश के लिए आरक्षण की बैसाखी नहीं चाहिए। हमें अपनी योग्यता के आधार पर प्रवेश चाहिए। हमें सिद्ध कर दिखाना है, लड़कियों को आरक्षण की सहायता नहीं चाहिए। धन्यवाद।

लड़को ने जोरदार तालियाँ बजाकर अपनी विजय घोषित कर दी। विशाल ने उठकर ऋचा के वक्तव्य की मंच से सराहना की। आशा ने विशाल को आड़े हाथों ले लिया –

“वाह, विशाल जी। यूनियन की बैठकों में तो लड़कियों के हित की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर आज पाला बदल लिया।”

“नहीं, आशा। लड़कियाँ दया की पात्री नहीं होतीं। उनके हित के लिए हर सम्भव प्रयास करूँगा, पर ऋचा की बातों की सच्चाई से क्या तुम्हें ऐतराज़ है ?”

“अगर लड़कियों को कोई सुविधा दी जाए तो क्या यह गलत बात है ? हमेशा हमें दबाया ही तो गया है।”

“तो अब दूर्वा की तरह विरोध के लिए तनकर खड़ी हो जाओ, आशा। जानती हो, अनगिनत पाँवों-तले कुचली जाने के बावजूद, दूर्वा जमीन से फिर सिर उठाकर खड़ी हो जाती है। लड़कियों को हरी दूब की तरह जीना सीखना चाहिए।”

ऋचा और स्मिता के पास आते ही आशा के चेहरे पर नाराज़गी आ गई।

“क्यों ऋचा, आज तो तुम विपक्षियों की आँख का तारा बन गई। अपनी टीम छोड़कर शत्रुओं से जा मिलीं।”

“बात दोस्ती या दुश्मनी की नहीं है, आशा। भीख में मिली वस्तु मुझे नहीं सुहाती। मैंने अपने मन की बात कही थी।”

“बातें बनाना बहुत आसान होता है, ऋचा। वक्त आने पर सच्चाई का पता लगता है। आरक्षण के सहारे अगर तुम्हें अच्छी आॅपारच्यूनिटी मिले, तब देखेंगे, तुम चांस लोगी या छोड़ोगी।”

“अरे… रे… रे, लगता है, अब यहाँ दूसरी डिबेट शुरू होनेवाली है। आशा जी, हार-जीत तो जीवन का सत्य है। इसे लेकर व्यर्थ झगड़ा नहीं बढ़ाना चाहिए। विशाल ने बीच-बचाव करना चाहा।”

“ठीक है, मैं झगड़ालू हूँ। आप ऋचा से बात करें, हम जाते हैं।” आशा रूष्ट हो गई।

आशा के जाने के बाद विशाल ने ऋचा को दुबारा बधाई दे डाली-

“सच ऋचा जी, मैं तो आपके विचारों का कायल हो गया। वैसे आगे क्या करने का इरादा है ?”

“मैंने भविष्य की तैयारी अभी से ही शुरू कर ली है, विशाल जी। ‘दैनिक बन्धु’ में पार्ट. टाइम रिपोर्टर का काम सम्हाल रही हूँ।”

“ओह, तो आप पत्रकार बनेंगी। वैसे एक सफल पत्रकार बनने के सारे गुण आपमें मौजूद हैं। मेरी बधाई !”

“धन्यवाद! आप तो शायद लाॅ फाइनल-इअर में हैं न ?”

“लगता है, काफी बदनाम हो गया हूँ। वैसे सही फ़र्माया। कानून की पढ़ाई पूरी होने में एक महीना बाकी है। उसके बाद आपका मुकदमा लड़ सकता हूँ।” विशाल हॅंस रहा था।

“अपने लिए न सही, पर दूसरी लड़कियों को अन्याय से मुक्ति दिलाने के लिए आपकी मदद ज़रूर लूँगी।”

“चलिए इसी बात पर एक-एक कम कॅाफ़ी हो जाए। जीत के लिए आप ही तो जिम्मेदार हैं। भले ही आपकी टीम फ़स्र्ट आई, पर फ़ायदा तो लड़कों को पहुँचा है न ?”

“ऋचा, तू कॅाफ़ी के लिए जा, हमें घर जाना है।” इतनी देर से चुप खड़ी स्मिता बोल पड़ी।

“अरे वाह ! आप तो बोलती भी हैं। मैंने तो समझा, आप ऋचा की जुबान ही बोलती हैं।”

“आपने गलत समझा, स्मिता बात भले ही कम करे, पर कई बातों में हम सबसे आगे है। क्यों ठीक कहा न, स्मिता।”

“जाओ हम तुमसे नहीं बोलते।” स्मिता का चेहरा लाल हो उठा।

“तो हम तीनों कॅाफ़ी-हाउस चलें ?”

“नहीं, विशाल जी, आज एक रिपोर्ट देनी है। आपकी कॅाफ़ी उधार रही। चल, स्मिता।”
 
स्मिता का हाथ पकड़ ऋचा चल दी। विशाल मुग्ध-दृष्टि से देखता रह गया।

“ऐ ऋचा, तू कैसे सबके सामने अपनी बात कह लेती है ? तुझे डर नहीं लगता ?” ऋचा के साथ चलती स्मिता सवाल पूछ बैठी।

“वैसे ही, जैसे नीरज के साथ प्यार करते तुझे डर नहीं लगा, मेरी स्मिता।” ऋचा ने परिहास किया।

“वो, हमने कुछ थोड़ी किया, हमें तो पता भी नहीं लगा।” बड़ी मासूमियत से स्मिता ने जबाव दिया।

“वैसे क्या प्रोग्रेस है ? सच कहूँ तो तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। भला तेरे मम्मी-पापा क्या नीरज को स्वीकार करेंगे ?”

“नहीं करेंगे तो हम मर जाएँगे, ऋचा।”

“मरें तेरे दुश्मन, अब ओखली में सिर दिया है तो मूसल की चोट से क्या डरना ?” ऋचा ने हिम्मत दी।

“तू अभी घर नहीं लौटेगी, ऋचा ?”

“सुना नहीं था, प्रेस में एक रिपोर्ट देनी है। बड़ी ज़ोरदार ख़बर है। कल का न्यूज-पेपर देखेगी तो जान जाएगी। मैं चलती हूँ, स्मिता।”

“एक बात कहूँ, ऋचा, तू बड़ी हिम्मत वाली है। न जाने किस-किस से पंगा लेती रहती है। दुनिया को ठीक करने का ठेका क्या तूने ही लिया है। हमे तो डर लगता है।”

“डर-डर के जीना होता तो पत्रकार बनने का सपना नहीं देखती, स्मिता। तू भी घर जा वरना तेरी मम्मी पुलिस में रिपोर्ट लिखा देगी।” बात खत्म करती ऋचा हॅंस पड़ी।

प्रेस जाती ऋचा सोच में पड़ गई। धनी माॅ-बाप की बेटी स्मिता का नीरज के साथ विवाह कैसे सम्भव होगा। माना, नीरज मेधावी छात्र है, चरित्रवान् होने के साथ ही वह स्मिता को बेहद चाहता है, पर विवाह के लिए इतना ही तो काफ़ी नही। एक कार्यालय में बड़े बाबू का बड़ा बेटा, नीरज ही घर भर की आशा का केन्द्र है। दो विवाह-योग्य छोटी बहिनों, सुधा और रागिनी के लिए भी नीरज का कुछ दायित्व बनता है। स्मिता के घरवाले अब जल्दी-से-जल्दी स्मिता का विवाह करने के लिए व्यग्र हैं। नीरज अभी एम.काम. की फाइनल परीक्षा दे रहा है। नौकरी एक दिन में तो नहीं मिल जाती। ऐसी स्थिति में स्मिता के साथ विवाह कैसे सम्भव होगा ?

प्रेस में ऋचा का इन्तज़ार किया जा रहा था। कल सुबह के लिए ऋचा की रिपोर्ट ज़रूरी थी। धमाकेदार खबरें न हों तो समाचार-पत्र की माँग कैसे बढ़ेगी। पिछले पाँच महीनों से ऋचा अपनी क्लासेज के बाद प्रेस का काम करती थी। अपनी बेबाक रिपोर्टिग की वजह से कार्यालय वाले ऋचा को सम्मान देते। आज भी उसके पहुँचते ही सीतेश ने आवाज लगाई-

“लो भई, ऋचा जी आ गई। कहिए, आज क्या ख़बर है ? आप ही के लिए पहले पेज पर जगह खाली रखी है।”

“हाँ, यह ख़बर पहले पेज पर ही जानी चाहिए। बड़ी कंपनियों के चीफ़ अपने को क्या समझते हैं। उनकी नजर में तो कम्पनी में काम करने वाली लड़कियों की कोई इज्ज़त ही नहीं होती।” वाक्य समाप्त करती ऋचा का चेहरा तमतमा आया।

“अरे अरे अरे, लगता है, कोई गम्भीर मामला है। किसकी इज्जत लुट गई।” न चाहते हुए भी सीतेश के ओठों पर व्यंग्य की रेखा खिंच गई।

“लो खुद ही देख लो।” गुस्से में ऋचा ने पर्स से कागज निकाल सीतेश के सामने रख दिए।

कागज़ों पर सरसरी निगाह डाल, सीतेश चुप-सा पड़ गया।

“क्यों, अब चुप क्यों हो गए ? देखो, यह खबर ज्यों-की-त्यों हमारे अखबार में छपनी चाहिए।”

“ऋचा जी, ऐसी ख़बरों के लिए हमारे पास सबूत होना जरूरी है।”

“लड़की का खुद का बयान क्या किसी सबूत से कम है ?”

“क्या वो लड़की कोर्ट में बयान देने को तैयार होगी, ऋचा जी ?”

“क्यों नहीं, मुझे पूरा विश्वास है। मैंने उस लड़की से खुद बात की है, तुम इस रिपोर्ट को लेकर परेशान मत हो, सीतेश।”

“अच्छा होता, आप सम्पादक जी से बात कर लेतीं।” सीतेश हिचक रहा था।

“देखो सीतेश, सम्पादक जी ने हमेशा सच्ची रिपोटर्स को बढ़ावा दिया है। यह रिपोर्ट भी उनमें से एक है। अच्छा, अब चलती हूँ। बाय !”
 


“जरा रूकिए। एक बात बता दूँ, अक्सर लड़कियाँ कोर्ट में सच्ची बात न कहने को मजबूर हो जाती हैं। स्वंय माता-पिता बदनामी के डर से लड़की से झूठा बयान दिलवा देते हैं।” सीतेश ने अपनी राय दे डाली।

“ठीक कहते हो, सीतेश, पर कामिनी से पक्की बात कर ली है। वह सिर्फ़ सच्ची बात ही बताएगी।” पूरे विश्वास के साथ ऋचा बोली।

“कह नहीं सकता, समपादक जी आपकी इस रिपोर्ट को कैसे लेंगे। एनीहाउ, रिपोर्ट उनके सामने रख दूँगा।” सीतेश ने हार मान ली।

“हूँ, यह हुई न बात। अरे पत्रकार होने का दम भरते हो तो सच्चाई का डट कर सामना करना सीखो, सीतेश। हॅंसती ऋचा के चेहरे पर परिहास था।”

“काश, तुम्हारी तरह हिम्मत और विश्वास मुझमें भी होता।” सीतेश मायूस दिखा।

“कम आॅन, मैंने तो मज़ाक किया था। अरे, तुम तो हमारे समाचार-पत्र के एक अति महत्वपूर्ण संवाददाता हो, सीतेश। अच्छा, अब चलूँ, वरना अम्मा पत्रकारिता से मेरी छुट्टी करा देंगी।”

हॅंसती ऋचा घर की ओर चल दी।

साइकिल रखकर ऋचा ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, छोटे भाई आकाश ने माँ की नाराज़गी की खबर दीदी को दे दी।

“बड़ी देर कर दी, दीदी। माँ बहुत नाराज हैं।”

“अच्छा-अच्छा, माँ को मना लूँगी। बता, तेरा रिज़ल्ट कैसा रहा ?”

“बस पास हो गया, दीदी। क्या करूँ, कितनी भी मेहनत करूँ, नम्बर अच्छे नहीं मिलते। तुम हमेशा फ़स्र्ट आती हो और एक मैं हूँ ………।” आकाश उदास हो आया।

“घबरा नहीं, मेरे भाई। माँ तुझे इन्जीनियर बना देखना चाहती हैं, उनका सपना तुझे ही सच करना है। मेहनत करने से सफलता जरूर मिलती है।”

“अच्छा होता, मेरी जगह माँ तुम्हें इन्जीनियर बनातीं। ठीक कहा न ?”

“अच्छा, अब तो तू बड़ी बातें बनाने लगा है। लगता है, अपनी दीदी से कुछ चाहिए। वैसे एक सच जान ले, हमारे समाज में लड़के से ही सारी अपेक्षाएँ की जाती हैं। लड़की को तो पराई अमानत कहकर नकार दिया जाता है।”

“तुम पराई नहीं हो, दीदी।”

“सच, तू ऐसा सोचता है ? वैसे हम बातें कर रहे हैं, पर अभी तक माँ की फटकार नहीं सुनी। माँ कहाँ हैं, आकाश ?”

“मेरी कामयाबी की खुशी में मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने गई हैं।” आकाश हॅंस पड़ा।

“अच्छा, तो महारानी जी को याद आ गया, इनका कोई घर भी है। ये ले, बेटा प्रसाद ले।” माँ ने आते ही ताना दिया।

“पहले दीदी को प्रसाद दो, माँ। दीदी बड़ी हैं।”

“क्यों, तेरी दीदी ने कौन-सा कमाल किया है जो पहले उसे प्रसाद दूँ।”

“कमाल तो किया है, माँ। पूरे कॅालेज में हमारे लेक्चर की तारीफ़ हो रही है। हमारी वजह से हमारी टीम जीत गई।” ऋचा ने खुशी से बताया।

“बस-बस, तेरे कारनामे सुनते-सुनते कान पक गए। लाख बार समझाया, लड़की है तो लड़की की तरह रहना सीख। ससुराल में तेरे लेक्चर नहीं, तेरे गुण काम आएँगे।”

“अरे, वाह दीदी, हमें बताओ, तुमने अपने लेक्चर में क्या कहा ?”

“लड़कियों की खिलाफ़त की थी, आकाश।”

“तुझसे और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं! सारे दिन साइकिल लिए न जाने कहाँ-कहाँ घूमती फिरती है। इतना मना किया था लड़की को साइकिल न दिलाएँ, पर तेरे पापा की तो मत ही फिर गई। घर में काम करने को यह माँ जो बैठी है।” माँ का स्वर ऊंचा हो आया।

“ऐसा क्यों कहती हो, माँ ? घर में सबसे पहले उठकर नाश्ता-खाना तैयार करने के बाद ही तो कॅालेज और अखबार के दफ्तर जाती हूँ। अगर मेरी जगह आकाश होता तो ……”

“अरी, आकाश के साथ बराबरी करे है ? आकाश से तो हमारा वंश चलेगा।” किसने कहा, अखवार के दफ्तर में काम कर। लोग सोचते होंगे, हम लड़की की कमाई खाते हैं। बड़ी नेकनामी कराई है हमारी। अच्छी लड़कियों के क्या यही ढंग होते हैं ?

“अच्छा माँ, मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ। प्लीज अब शान्त हो जाओ !” हॅंसकर ऋचा ने बात टालनी चाही।

“मेरी बात याद रखना, अगर तेरे ऐसे ही लच्छन रहे तो तेरा बियाह होने से रहा। रात-बिरात घर के बाहर रहना क्या अच्छे घर की लड़कियों के ढंग होते हैं ?”

“अब जाने भी दो, माँ। दीदी कितना थककर आई हैं। चलो दीदी, खाना खा लें।”

“मुझे भूख नहीं है, भइया। तू खाना खा ले।”

“हाँ-हाँ, भूख क्यों होगी, लेक्चर से ही पेट भर गया होगा।” गुस्से में माँ कमरा छोड़कर चली गई।

दो-चार कौर मॅुह में डाल ऋचा उठ गई थी। रात में देर तक नींद नहीं आई। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेकर भी ऋचा आकाश की ऊंचाइयाँ छूने के सपने देखती। माँ का आक्रोश अकारण ही नहीं था। प्राइमरी स्कूल में अध्यापक पिता ने किताबों से भले ही यह जाना कि लड़के और लड़कियों में भेदभाव करना ठीक नहीं, पर वास्तविकता किताबों में पढ़ी बातों से सर्वथा अलग थी। सामान्य बुद्धि वाली इला दीदी के मैट्रिक पास करते ही माँ ने उनकी शादी के लिए पापा को परेशान करना शुरू कर दिया था। पत्नी की ज़िद पर पापा ने दीदी के लिए वर की तलाश शुरू कर दी। हर जगह दहेज की माँग ने पापा को सच्चाई स्वीकार करने को मजबूर कर दिया। स्कूल के प्राॅविडेंट फन्ड से उधार लेकर दीदी की शादी कर दी गई। इला दीदी के पति एक कार्यालय में छोटे बाबू थे। घर में भाई-बहनों की लम्बी जमात में एक दीदी भी जुड़ गई। सास-ससुर, देवर, ननदों वाले भारी कुनबे में दीदी मुफ्त की नौकरानी बन गई थीं। झाडू-पोंछा, बर्तन-धोना, खाना पकाना, न जाने इतना काम दीदी कैसे अकेले निबटाती होंगी ! शायद माँ की ट्रेनिंग उनके काम आई हो। काश ! माँ ने दीदी को पढ़ने दिया होता तो आज वह भी आत्मनिर्भर बन, घर की आय बढ़ा पाने में मदद दे पातीं। माँ के दबंग स्वभाव के सामने पापा ने हमेशा अपने को निरीह पाया। हाँ, इतना जरूर था, ऋचा के समय उन्होंने उसकी शादी की जल्दबाजी नही की। माँ के लाख सिर पटकने के बावजूद ऋचा को कॅालेज भेजा। आने-जाने की सुविधा के लिए साइकिल खरीदवाई। इतना ही नहीं, अखबार के दफ्तर में काम करने की इजाज़त देने पर तो माँ ने खासा हंगामा खड़ा कर दिया, पर पापा नहीं झुके। माँ ने दलील पेश की थी-
 
“अखबार के दफ्तर में काम करेगी तो क्या हम मुँह दिखाने लायक रहेंगे ? नाक न काट जाएगी ? “

“नहीं, अब ज़माना बदल गया है। हमारी बेटी के काम करने से नाक नहीं कटेगी, बल्कि हमारा सम्मान बढ़ेगा।”

“तुम्हारी तो मत मारी गई है। बियाह लायक उमर वाली लड़की की सोचकर तो मैं सो भी नहीं पाती।”

“माँ, तुम आराम से सोया करो। खराब काम करने से नाक कटती है, नौकरी करने से नाक ऊंची होती है। हमें अभी शादी नहीं करनी है।” ऋचा दृढ़ थी।

“क्यों, तेरी दीदी की शादी हो गई तो क्या गुनाह हो गया ? आराम से अपने घर में है।”

“हमें दीदी वाला आराम नहीं चाहिए। एक बार अपने पाँवों पर खड़ी हो जाऊॅं, उसके बाद शादी की बात करना।”

“ठीक ही तो कहती है ऋचा। हमेशा इसके पीछे पड़े रहना ठीक नहीं। हमारी ऋचा बड़ी समझदार लड़की है। वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिससे हमारी बदनामी हो।”

“हाँ-हाँ, दुनिया में बस दो ही तो समझदार हैं, एक तुम और दूसरी तुम्हारी यह लाडली बेटी। जो मन में आए करो, पर अगर कोई ऊंच-नीच हो जाए तो हमें दोष मत देना।” माँ हथियार डाल देती।

माॅ भी गलत नहीं थी। मध्यमवर्गीय मानसिकता बेटी को बोझ ही तो मानती है। विचारों में डूबी ऋचा को कब नींद आ गई, पता ही नहीं लगा। सुबह माँ की पुकार पर ही नींद टूटी थी। सबको चाय देकर ऋचा ने अखबार खोला। पहले पेज पर उसकी दी गई रिपोर्ट गायब थी। तीसरे पेज पर एक छोटी-सी घटना की तरह खबर छापी गई थी। खबर में कम्पनी का नाम जरूर दिया गया था, पर अधिकारी का नाम गायब था। रोज घटनेवाली घटनाओं की तरह बस इतना ही छापना जरूरी समझा गया था कि अमुक कम्पनी के एक अधिकारी द्वारा एक कर्मचारी लड़की के साथ छेड़छाड़ की गई। रिपोर्ट देने वालों में ऋचा के साथ सीतेश का नाम भी छपा था। ऋचा का मन खट्टा हो गया। उसकी मेहनत पर कितनी आसानी से पानी फेर दिया गया था। सम्पादक से बात करने का निर्णय ले, ऋचा जल्दी-जल्दी घर के काम निबटाने लगी।

कॅालेज जाने के पहले ऋचा अखबार के कार्यालय पहॅंची थी। सम्पादक की टेबिल पर अखबार में छपी खबर पटक, उत्तेजित ऋचा ने सवाल किया –

“इस अन्याय का क्या मतलब है? घटना की पूरी खोजबीन करके रिपोर्ट मैंने तैयार की, पर नाम सीतेश का है ? रिपोर्ट भी पूरी नहीं छापी गई, क्योंए सर ?”

“देखो ऋचा, सच यह है, लड़कियों के साथ हुए हादसे की रिपोर्टिग अगर कोई लड़की करती है तो कभी-कभी लोगों को उसपर कम विश्वास होता है।”

“आपका कहने का क्या मतलब है, सर?”

“ठीक कह रहा हूँ, लोग सोचते हैं, एक लड़की की दूसरी लड़की के साथ हमदर्दी होना वाजिब है। हो सकता है, घटना बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है। सीतेश का तुम्हारे साथ नाम देने से घटना की विश्वसनीयता बढ़ी है।”

“मैं यह बात नहीं मानती। विश्वसनीयता अखबार की होती है। कामिनी से सच निकलवाने में मुझे कितनी मेहनत करनी पड़ी थी, आप नहीं जानते।”

“मैं तुम्हारे काम की कद्र करता हूँ। मुझे विश्वास है, तुम एक अच्छी पत्रकार बनोगी। वैसे कामिनी के केस की सच्चाई क्या है, ऋचा?”

“सर, कामिनी को नौकरी मजबूरी में करनी पड़ रही है। अपनी विधवा माँ और दो छोटी बहिनों का वही सहारा है। उसकी इसी मजबूरी का फायदा कम्पनी के चीफ़ नागेश्वर राय उठाते रहे। बहाने बनाकर देर रात तक रोकना, रोज की बात थी।”

“देखो ऋचा, लड़कियाँ अगर काम पर बाहर निकलती हैं तो काम की वजह से देर हो ही सकती है। एक ओर वे समान अधिकारों की बात करती हैं और दूसरी ओर लड़की होने का फ़ायदा उठाना चाहती हैं।”

“आप गलत समझ रहे हैं, सर। बात सिर्फ देर तक रूकने की नहीं है। अगर आपने मेरी रिपोर्ट पढ़ी है तो जान गए होंगे, पार्टी अरेंज कराने के बहाने नागेश्वर राय कामिनी को होटल ले गए और वहाँ उसे कोल्ड डिंªक में नशा मिलाकर दिया गया ………..।”

“यह सच नहीं है, नागेश्वर राय ने बताया है। कामिनी अपनी मजबूरियों के बहाने उनसे रूपए एंेठती रही है। उस रात भी वह खुद अपनी मर्जी से उनके साथ गई थी।”

“ओह! तोे आपको नागेश्वर राय की सच्चाई में यकीन है? क्या इसीलिए कामिनी की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर उन्होंने उसका शील-हरण किया?” मन का सारा आक्रोश ऋचा के स्वर में उभर आया।

“देखो ऋचा, नागेश्वर राय शहर के सम्मानित व्यक्ति हैं। बेसहारा लड़कियों, अनाथ बच्चों के लिए वह एक मसीहा हैं। उनपर छींटें उड़ना ठीक नहीं। फिर भी तुम्हें उत्साहित करने के लिए खबर छापने की इजाजत दे दी थी।”

“थैंक्स, पर मैं इस घटना की जानकारी पुलिस में दूँगी।”

“कोई फ़ायदा नहीं। क्या कामिनी का तुरन्त मेडिकल चेक-अप किया गया था? पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई थी?”

“नहीं, क्योंकि कामिनी बेहद डर गई थी। उसके घरवालों को बदनामी का डर था।”

“फिर इस घटना को भूल जाओ। कोर्ट में मेडिकल रिपोर्ट चाहिए। पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज न कराना, तुम्हारे केस को कमजोर कर देगा। मैं अनुभवी इन्सान हूँ। कामिनी के साथ सहानुभूति है, पर इस केस में कोई दम नहीं है, ऋचा।”

सम्पादक जी ने अपनी बात खत्म कर, कागजों में सिर झुका लिया। क्षुब्ध ऋचा बाहर चली आई। सम्पादक की बातों में कुछ सच्चाई तो जरूर है। कोर्ट में उसने देखा है, मेडिकल रिपोर्ट की सच्चाई भी साक्ष्यों के अभाव में झुठला दी जाती है। कुछेक बार तो लड़की पर चरित्रहीनता का इल्ज़ाम तक लगया गया है। लड़की का बयान कोई अर्थ नहीं रखता। ज़रूरत होती है किसी चश्मदीद गवाह की, जिसने पूरा रस लेकर, बलात्कार की घटना को शुरू से आखिर तक देखा हो।

बेमन से ऋचा कॅालेज पहुँची। क्लास के लेक्चर पर ध्यान देना कठिन लग रहा था। पत्रकारिता के कोर्स का यह अन्तिम वर्ष है। परीक्षा के लिए एक महीना ही बचा है, उसे जी-तोड़ मेहनत करनी होगी।
 


क्लास से बाहर आते ही विशाल को इन्तजार में खड़े पाया। ऋचा को देखते ही विशाल के चेहरे पर मुस्कान आ गई-

“हेलो, ऋचा। कल का उधार उतारेंगी?”

“उधार, कौन-सा उधार?”

“वाह! पत्रकार अपना वादा इतनी जल्दी भूल जाते है।? अजी मोहतरमा, एक कम काॅफी मुझपर उधार है। सिर पर उधार हो तो भला नींद आ सकती है! इस बोझ को जल्दी-से-जल्दी उतारना चाहता हूँ। चलें?”

“आज मूड नहीं है…………..।”

“कॅाफ़ी आपका मूड बदल देगी, यह मेरा वादा है।”

मजबूरन ऋचा को विशाल के साथ जाना पड़ा था। वैसे भी घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। स्मिता आज कॅालेज नहीं आई थी। उसका भी हाल पता करना होगा। नीरज और स्मिता के साथ ऋचा को अच्छा लगता है। नीरज एम.काॅम. फाइनल परीक्षा के साथ बैंक-परीक्षा की तैयारी में जुटा है। आज अगर वे दोनों साथ होते तो ऋचा उनके साथ कामिनी की बात करके मन हल्का कर लेती।

कॅाफ़ी-हाउस में उस वक्त भीड़ थी। एक कोने की मेज खाली देख, विशाल ऋचा के साथ उसी ओर बढ़ गया।

“देख रहा हूँू, लोग यहाँ पढ़ने नहीं, कॅाफ़ी पीने आते हैं।” विशाल ने चारों ओर नजर घुमाई थी।

“आप भी उन लोगों में से एक हैं न?”

“जी नहीं, बन्दा क्लासेज ख़त्म करके आया है। वैसे भी नेक्स्ट वीक से प्रिपरेशन लीव शुरू हो रही है। आपकी क्लासेज भी तो खत्म हो रही होंगी?”

“हाँ, शायद एक वीक और आना होगा।”

“उसके बाद हम कैसे मिलेंगे?”

“क्यों, हमारे मिलने की अब और कौन-सी वजह होगी? आज तो हम आपका उधार उतारने आए है।”

“दिल की चाहत भी कोई चीज होती है, ऋचा। मेरा जी चाहता है, हम रोज मिलते रहें।”

“अपने दिल को काबू में रखिए, जनाब। दिल की हर बात मानना ठीक नहीं होता।”

“एक बात बताइए, आज आपके चेहरे पर कुछ नाराज़गी क्यों है?”

“छोड़िए, वह मेरा पर्सनल मामला है, अब आप कॅाफ़ी मॅंगा रहे हैं या यूंॅ ही बैठे बातंे करते रहेंगे?”

“साॅरी, आपका मूड देखकर लगता है, आपको कोल्ड कॅाफ़ी देनी चाहिए। क्यों ठीक कहा न? कोल्ड कॅाफ़ी ही आपका पारा नीचे ला पाएगी।” विशाल ने हॅंसते हुए वेटर को दो कोल्ड कॅाफ़ी लाने का आॅर्डर दे दिया।

कोल्ड कॅाफ़ी का सिप लेते हुए विशाल ने ऋचा से फिर उसकी नाराज़गी की वजह जाननी चाही थी। अनजाने ही कामिनी की घटना सुनाकर, रिपोर्टिग में फेर-बदल की बात भी ऋचा सुना गई। पूरी बात सुनकर विशाल गम्भीर हो गया। शान्त रहकर उसने ऋचा को समझाना चाहा –

“पत्रकार को सफलता आसानी से नहीं मिलती। कई बार तो उसकी जान पर भी आ पड़ती है। ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ, बड़ी घटनाओं का सावधानी से मुकाबला करने की समझ देती हैं। ऐसी बातों से निराश न होकर, आगे के लिए तैयार रहना चाहिए, ऋचा।”

विशाल की बातों ने ऋचा को राहत-सी दी। ठीक कहता है विशाल। कामिनी के केस मे जो कमियाँ रह गई, अगली बार वैसी ग़लतियाँ नहीं होनी चाहिए।

“थैंक्स! अापकी बातें याद रहेंगी।”

“मेरी बातें नहीं, मुझे याद रखिएगा, यही इल्तिज़ा है।” विशाल परिहास पर उतर आया।

“बातें ही इन्सान को उसका व्यक्तित्व देती है।, विशाल जी।” ऋचा भी हॅंस रही थी।

“देखिए मैं वकील हूँ, आपको कुछ देर पहले जो राय दी, उसकी फ़ीस तो देनी होगी?”

“वाह! हमने कौन-सी राय माँगी थी? आप तो बड़े अच्छे वकील बनेंगे। बताइए, क्या फ़ीस चाहिए?”

“कल शाम कम्पनी गार्डेन में मिलते हैं। ठीक पाॅच बजे आपका इन्तजार करूँगा। कहिए, मामूली फ़ीस है न मेरी?”

“चलिए, मंजूर है, बशर्ते क्वालिटी की आइसक्रीम आप खिलाएँगे।” ऋचा की आवाज में शोखी उभर आई।
 
घर वापस लौटती ऋचा का मन हल्का हो आया। सुबह का आक्रोश और क्षोभ मिट चुका था। कामिनी के बाॅस से वह जरूर बात करेगी। उन्हें यॅंू ही नहीं छोड़ेगी। वह कामिनी से क्षमा माँगेंगे। उसकी दूसरे विभाग में नियुक्ति करें, तभी उन्हें छोड़ा जा सकता है। इस काम में वह विशाल और रोहित की मदद लेगी। कॅालेज के यूनियन का तेज-तर्रार प्रेसीडेंट रोहित अन्याय के विरूद्ध लड़ने के लिए मशहूर है। धनी बाप का इकलौता बेटा रोहित शहर में एक बड़ा-सा घर लेकर रहता है। ऋचा भी रोहित को मानती है। कुछ केसेज में रोहित ने ऋचा की मदद की है। दोनों में अच्छी मित्रता है, पर रोहित ने कॅालेज की लड़कियों के साथ अपनी दोस्ती का कभी फ़ायदा नहीं उठाया। ऋ़चा को रोहित की सहायता का पूरा विश्वास रहता है।

दरवाजा खोलते आकाश ने खबर दी, नीरज और स्मिता बड़ी देर से ऋचा का इन्तजार कर रहे हैं। दोनों परेशान दिख रहे हैं, उसपर माँ उनसे ऋचा दीदी की शिकायतें करके, उन्हें और परेशान कर रही हैं।

“अरे स्मिता-नीरज, मैं तो तुम्हें कॅालेज में ढॅूँढ़ रही थी। तुम दोनों आज कॅालेज क्यों नहीं आए?”

“कुछ ज़रूरी काम था। ऋचा, हमें तुझसे कुछ खास बातें करनी हैं।” बात खत्म करती स्मिता ने पास बैठी ऋचा की माँ पर दृष्टि डाली थी।

“माँ, इनके लिए कुछ चाय-नाश्ता आकाश के हाथ भिजवा सकोगी?” ऋचा की बात पर मॅंुह-ही-मुँह में कुछ बुदबुदाती माँ चली गई।

“अब बता, क्या बात है, स्मिता? कोई ख़ास बात है, क्या?”

“हाँ, ऋचा, पर यहाँ सारी बात बता पाना मुश्किल है।” स्मिता ने बुझे स्वर में कहा।

“कुछ अता-पता तो बता। नीरज, आप ही बताइए, क्या बात है?”

“स्मिता के लिए अमेरिका से रिश्ता आया है। इसके घरवालों ने ‘हाँ’ कर दी है। अगले हफ्ते ही प्रशान्त और स्मिता की शादी होना तय हुआ है। समझ में नहीं आता कि क्या करें?”

“तेरी मर्जी पूछी गई थी, स्मिता?”

“लड़कियांे की मर्जी कितने घरों में पूछी जाती है, ऋचा। मम्मी-पापा की निगाह में अमेरिका में नौकरी करने वाले लड़के से अच्छा वर मिलना कठिन है।”

“भले ही वहाँ उसने किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर रखी हो। तेरे मम्मी-पापा प्रशान्त को कितना जानते हैं, स्मिता?” ऋचा के स्वर में आक्रोश था।

“शायद बिल्कुल नहीं, अखबार में शादी के लिए एडवर्टाइज किया था। पापा ने फोन पर बात की और आज सवेरे वह घर आकर ‘हाँ’ कर गया।”

“वाह! यह तो परी-लोक वाली कहानी हो गई। सपनों का राजकुमार हवाई जहाज में बैठकर आया। हमारी शहजादी स्मिता को देखा और जेट-स्पीड में शादी की तैयारी कर डाली।” ऋचा हॅंस पड़ी।

“देख ऋचा, यह वक्त मजाक करने का नहीं है। हमारी जान पर आ गई है और तुझे कहानियाँ सूझ रही है?” स्मिता रोने-रोने को हो आई।

“नीरज, आपका क्या कहना है?” ऋचा अब गम्भीर थी।

“मेरी स्थिति तो आपसे छिपी नहीं है। अभी मेरी नौकरी नहीं है। बाबूजी पर बोझ हूँ। नौकरी के लिए कम-से-कम पाँच-सात महीने तो इन्तजार करना ही होगा। मेरा भविष्य अनिश्चित है……।”

“यानी आप मैदान छोड़कर भाग रहे हैं। क्या स्मिता से आपका प्यार बस यहीं तक था?”

“नहीं, ऋचा। मैं स्मिता को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ, पर आज की स्थिति में मैं उसे सपोर्ट कैसे करूँगा? आप तो जानती हैं, स्मिता के घर किसी चीज की कमी नही है। वह हमारे घर के अभावों को कैसे झेल सकेगी?”

“मैं तुम्हारे साथ किसी भी स्थिति में खुश रहूँगी, नीरज। तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकती।” स्मिता ने रूमाल से आँसू पोंछ डाले।

“नीरज, आपका क्या सोचना है?” ऋचा की सवालिया दृष्टि नीरज पर गड़ गई।

“सच तो यही है कि मैं भी स्मिता को बेहद प्यार करता हूंॅ। प्यार में धोखे का सवाल नहीं उठता। ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई स्मिता को जान लेनी चाहिए। मेरे साथ उसे काँटों की सेज पर सोना होगा, ऋचा।”

“मैं तैयार हूँ, नीरज के साथ मुझे काँटों की चुभन भी महसूस नहीं होगी। नीरज के सिवा मैं और किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।” स्मिता ने आँसू रोकने चाहे थे।

“तूने अपनी मम्मी से नीरज के बारे में बात नहीं की, स्मिता?”

“बात की थी, ऋचा, पर पूरी बात सुनने के पहले ही वह गुस्से से काँपने लगीं। उनका वश चले तो वह नीरज को ही नहीं, उसके परिवार वालों को भी जेल में सड़ने को डलवा दें। हाँ, ऋचा, उन्होंने यही धमकी दी है कि अगर मैं नीरज से शादी की बात करूँगी तो वह नीरज का भविष्य ख़त्म करा, उसे दर-दर का भिखारी बना देंगी।”
 


“तेरे पापा का क्या रूख होगा, स्मिता?”

“पापा तो शायद मेरा खून करके अपने को भी गोली मारकर खत्म कर लेंगे। वे लोग बेेहद क्लास-कांशस हैं, ऋचा।”

“इस हालत में तो बस एक ही तरीका है।”

कौन-सा तरीका, ऋचा?

“तुम दोनों फ़ौरन शादी कर लो।”

“क्या ……आ ………..?” स्मिता चैंक गई।

“तुम दोनों बालिग हो। जिन्दगी के फ़ैसले लेने का तुम्हें पूरा हक है।”

“यह तो मैंने भी सोचा था, पर शादी के बाद मैं स्मिता की ज़रूरतें कैसे पूरी करूँगा। स्मिता मेरी ज़िम्मेवारी है, इसका भार बाबूजी पर कैसे डालूँ, ऋचा?”

“इस मामले में हमें रोहित की मदद लेनी होगी। याद है, पिछले साल रोहित ने नेहा और राहुल की शादी कितनी विषम परिस्थितयों में कराई थी। हमें रोहित से मिलना होगा।”

“तो देर क्यों, हम अभी रोहित के घर चलते हैं, ऋचा। पता नहीं, कल घर से बाहर आ सकॅंू या नहीं। माँ का पहरा तोड़ना आसान नहीं होगा।”

“वाह! इसका मतलब आज भी पहरा तोड़कर हमारी अनारकली अपने सलीम से मिलने आई है। चलो, हम अभी रोहित के पास चलते हैं।” इस वक्त भी ऋचा परिहास करने से नही चूकी।

ऋचा के फिर बाहर जाने की बात पर माँ का पारा चढ़ना स्वाभाविक ही था। लड़की का पाँव घर में टिकता ही नहीं। आने की देर नहीं, फिर जाने को तैयार बैठी है। लड़कियों के भला ये लच्छन ठीक हैं? न जाने क्या खुसुर-पुसुर चल रही है! जने क्या करने पर तुली है!

माँ की नाराज़गी की परवाह न कर, ऋचा, स्मिता और नीरज के साथ बाहर निकल गई। आॅटो से तीनों रोहित के घर पहंॅुचे। रास्ते में ऋचा मनाती रही, रोहित घर में ही मिल जाए। अकेलापन काटने के लिए अक्सर रोहित यार-दोस्तों के साथ महफ़िल जमाता है। फक्कड़ स्वभाव का रोहित, सबको प्रिय था। काॅल-बेल पर रोहित को दरवाज़ा खोलता देख, ऋचा ने चैन की साँस ली –

“थैंक्स गाॅड, रोहित, तुम घर पर हो।”

“क्यों मेरा रेपुटेशन बिगाड़ रही हो? वैसे इस वक्त आने की वजह? ज़रूर सीरियस मामला है। ये तुम्हारे अन्दर का पत्रकार भविष्य में तुम्हारे पति का जानी दुश्मन जरूर बन जाएगा। अभी से वाॅर्न कर रहा हूँ।” रोहित हॅंस रहा था।

“थैंक्स फाॅर दि वार्निग। क्या हम अन्दर आ सकते हैं या दरवाजे पर ही खडे़ रहना होगा?” ऋचा मुस्करा रही थी।

“ओह! अायम साॅरी। आओ।”
 


सबके बैठ जाने पर ऋचा ने संक्षेप में स्मिता और नीरज की समस्या बता दी। इसके पहले भी कई मामलों में ऋचा ने रोहित की मदद ली थी। दोनों के बीच बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी। कुछ देर सोचने के बाद चुटकी बजाते रोहित के चेहरे पर खुशी आ गई।

“लो, तुम्हारी समस्या का समाधान अभी किए देता हूँ। मेरे एक दोस्त को अकाउंट्स रखने के लिए एक ईमानदार आदमी की तलाश है। वैसे नीरज की क्वालीफ़िकेशन के लिए यह काम छोटा है, पर इस वक्त नीरज को पैर जमाने के लिए एक सहारा हो जाएगा। शाम को दो-तीन घण्टे मेरे दोस्त का अकाउंट देख लेगा। वह अच्छी तनख्वाह दे सकता है।”

“मैं तैयार हूँ। इस मदद के लिए आभारी हूँ।” नीरज का चेहरा चमक उठा

“चलो, एक मुख्य समस्या का हल तो मिल गया, पर रहने की जगह की समस्या तो हल नहीं होगी, रोहित?”

“यह सच है, हमारा घर बहुत छोटा है और इन परिस्थितियों में शादी करने के बाद क्या होगा, कह नहीं सकता।” नीरज सोच में पड़ गया।

“अरे, इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। हम यारों के यार हैं। जब तक तुम्हें, तुम्हारे घर में जगह नहीं दी जाती, तुम दोनों हमारे आउट-हाउस में रह सकते हो। वैसे भी वो खाली पड़ा है।”

“लो, अब तो कोई समस्या ही नहीं रह गई। थैंक्स, रोहित।”

“कमाल करती हो। अरे, सबसे बड़ी समस्या, इनकी शादी का क्या होगा?”

“अब ऋचा जी, हमारी भावी जुझारू पत्रकार, इनका हुक्म तो मानना ही होगा, पर एक रात का वक्त तो इस गरीब को देना ही होगा।”

रोहित की बातों पर सब हॅंस पड़े। लगा, अचानक कुहासा छंट गया। तय किया गया, कल दोपहर ऋचा किसी तरह स्मिता को अपने साथ रोहित के घर ले आए। नीरज भी अपने एक-दो दोस्तों के साथ ठीक समय पर पहुँच जाएगा। पण्डित और विवाह की तैयारी रोहित ने अपने जिम्मे ले ली। अक्सर ऐसे कामों में पिता द्वारा अर्जित की गई सम्पत्ति का रोहित इसी तरह सदुपयोग करता था। खुशी-खुशी सबको विदा कर, रोहित पण्डित जी को निमन्त्रण देने निकल गया।

घर पहुँचने पर आशा के विपरीत माँ को प्रसन्न देख, ऋचा ताज्जुब में पड़ गई। आज के अपने कारनामे के लिए वह डाँट खाने को तैयार आई थी, पर घर का तो माहौल ही दूसरा था। प्यार से माँ ने खाना खाने को बुलाया था –

“सारा दिन हो गया, खाना खाने की सुध नहीं आई। आ, तेरे मन की सब्जी बनाई है।”

“माँ, आज सूरज किधर से निकला था?”

“क्यों, क्या सूरज देवता रोज नया रास्ता चुनते हैं?” माँ ऋचा का परिहास नहीं समझ सकी।

“रोज की बात तो नहीं जानती, पर आज सूरज देवता ने कृपा की है।”

“अरी, हम तेरे दुश्मन थोड़ी हैं। जो कहते हैं, तेरे भले के लिए ही कहते हैं। आज तेरी गंगा मौसी आई थीं।”

“क्या कह रही थीं गंगा मौसी?” अचानक ऋचा के मुँह का स्वाद बिगड़ गया।

“अरें, गंगा हमारी सच्ची हमदर्द है। तेरे लिए अपने देवर का रिश्ता लाई है। बैंक में बाबू है…।” खुुशी से माँ उमगी पड़ रही थी।

“माँ, हज़ार बार कह चुकी हूँ, अभी मुझे शादी नहीं करनी है- नहीं करनी है। गंगा मौसी का देवर बाबू हो या महाराजा, हमें मतलब नहीं।”

थाली छोड़कर ऋचा उठ खड़ी हुई।

पस वाले कमरे से पापा भी आ गए। बोले –

“क्या बात है, ऋचा बेटी?”

“कोई नई बात नहीं है, पापा। माँ को हमारा घर में रहना नहीं सुहाता।”

“जरा देखो तो लड़़की की बातें? अरे, हम क्या इसके दुश्मन हैं? माँ हूँ इसकी ……” माँ ने आँचल आँखों पर रख लिया।

“ऋचा, तू तो समझदार है, क्यों माँ का दिल दुखाती है। मैंने कह दिया है न कि बिना तेरी मर्जी के तेरी शादी नहीं करूँगा। चलो, माँ से माफी माँग लो।” हमेशा की तरह पापा ने ऋचा को शान्त कर दिया।

सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाकर ऋचा बिस्तर पर चली जरूर गई, पर आँखों में नींद का नाम नहीं था। स्मिता के मम्मी-पापा क्या उसका नीरज के साथ विवाह आसानी से स्वीकार कर लेंगे? धनी माँ-बाप की इकलौती बेटी स्मिता के यहाँ किसी चीज की कमी नहीं थी, कमी थी तो बस समय की। पिता अपने कारोबार को बढ़ाने की धुन में यह भूल ही गए कि घर में एक बेटी भी है, जो माता-पिता के प्यार को तरसती है। माँ ने अपने को किटी-पार्टीज और सोशल फंक्शन्स में बिजी कर लिया। बेटी को जन्म जरूर दिया, पर उसकी परवरिश गवर्नेस ने की। नैनी के कठोर अनुशासन ने स्मिता को भीरू बना दिया। वह अपनी बात कहने से भी डरती। ऊॅंची सोसायटी का कायदा-कानून सीखते-सीखते उसका आत्मविश्वास ही डगमगा गया।
 


कॅालेज में सहमी-डरी-सी स्मिता ने ऋचा का ध्यान आकृष्ट किया था। उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा, ऋचा ने उसके खोए आत्मविश्वास और कुण्ठा को काफ़ी हद तक दूर किया था। धीरे-धीरे स्मिता, ऋचा के निकट आती गई। उसका अकेलापन ऋचा को पाकर भर-सा गया। अक्सर उनकी दोस्ती को लेकर लोग मज़ाक करते। ऋचा जैसी दबंग लड़की की सहमी-सी स्मिता से मित्रता, शायद इसीलिए सम्भव थी कि हमेशा विपरीत वस्तुएँ एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होती हैं।

वैसी स्मिता का नीरज से प्यार होना, ऋचा को भी चैंका गया था। पहल नीरज की ओर से ही हुई थी। छुईमुई-सी स्मिता से नीरज का परिचय कॅालेज की लाइब्रेरी में हुआ था। उन दिनों ऋचा डिबेट के लिए दूसरे शहर गई हुई थी। एक किताब ढॅूँढ़ती स्मिता परेशान हो उठी थी। अचानक नीरज की आवाज ने चैंका दिया था- “मे आई हेल्प यू?”

“जी …..ई …..ई …. वो किताब ……” स्मिता हड़बड़ा आई थी। उसकी घबराहट देखकर नीरज हॅंस पड़ा।

“डरिए नहीं, मैं कोई हौआ नहीं, इसी कॅालेज का स्टूडेंट हूँ। बताइए, कौन-सी किताब चाहिए?”

अपने को सहेज, स्मिता ने किताब का नाम बताया था। कुछ ही देर में किताब स्मिता को थकाकर, नीरज ने अपना परिचय दे डाला। पूरे एक हफ्ते दोनों की मुलाकातंे लाइब्र्रेरी में होती रहीं। नीरज के गम्भीर स्वभाव में एक ठहराव था, जो स्मिता को आश्वस्त कर जाता। नीरज के साथ पंख समेटे, स्मिता के पंख खुलने लगे थे। उसने सपने देखने शुरू कर दिए …..। नीरज ने अपने बारे में कहीं कुछ नहीं छिपाया। मेधावी नीरज को पूरा विश्वास था, एम्.काम्. में टाॅप करने के बाद उसके लिए अच्छी नौकरी पाना कठिन नहीं होगा। स्मिता के साथ विवाह वह नौकरी के बाद ही करना चाहता था, पर आज परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ ले लिया है कि नीरज भी अपने घरवालों से सहयोग की अपेक्षा नहीं रख सकता। दो ब्याह-योग्य बहनों के पहले नीरज का विवाह स्वीकार नहीं होगा।

देर रात तक जागने के बाद अलार्म से ही ऋचा की नींद टूटी थी। काम-निबटाती ऋचा को अचानक विशाल याद हो आया। नीरज और स्मिता के विवाह के समय विशाल की उपस्थिति अच्छी रहेगी। पूरा वकील न सही, पर एकाध महीने में तो वह वकालत की परीक्षा पास कर ही लेगा। कोई कानूनी अड़चन आने पर विशाल की मदद मिल सकेगी। स्मिता को साथ लेकर पहले विशाल के पास जाने का निर्णय लेकर ऋचा तैयार होने लगी। रात की घटना की वजह से माँ अभी भी नाराज़ थी, कहीं किसी वजह से स्मिता को घर में न रोक लिया जाए।

स्मिता को घर से बाहर आता देख, ऋचा ने आश्वस्ति की साँस ली थी। स्मिता के चेहरे पर घबराहट देख, ऋचा ने तसल्ली दी थी-

“घबरा नहीं, सब ठीक होगा।”

“हमें डर लग रहा है, ऋचा……।”

“यह डर उस वक्त कहाँ था, जब नीरज के साथ प्रेम की पींगें बढ़ा रही थी?” ऋचा ने चिढ़ाय।

“न जाने क्या होगा, ऋचा?” स्मिता डरी हुई थी।

“अरे, अब हम आ गए हैं, डर की कोई बात नहीं है। बस थोड़ी देर बाद तू श्रीमती नीरज शर्मा बन जाएगी।” ऋचा ने हॅंसी में स्मिता का डर दूर करना चाहा।

“डरूँ कैसे नहीं। जानती है, सुबह-ब्रेकफास्ट पर वह प्रशान्त आ गया था।”

“सच! ल्गता है, बेचारा तेरे प्यार में दीवाना हो गया है। यह तो बता, तूने उसके लिए कौन-सी स्पेशल डिश बनाई थी। भई उसे इम्प्रेस तो करना ही था।” ऋचा को उस गम्भीर समय मंे भी मज़ाक सूझ रहा था।
 
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